Monday, March 16, 2026
Home Blog Page 565

जब चीन में छात्रों पर चढ़ा दिए गए थे टैंक ?

एक ऐसा समय जब चीन में छात्रों पर टैंक चढ़ा दिए गए है! चीन में एक जगह है थियानमेन चौक। थियानमेन का मतलब होता है-स्वर्गिक शांति का दरवाजा। लेकिन यही थियानमेन चौक एक बड़े नरसंहार की कहानी बयां करता है। इस जगह को अब किले जैसा बना दिया गया है, मगर 4 जून, 1989 को यहां एक खूनी नरसंहार हुआ था। जिसमें लोकतंत्र बहाली के समर्थन में जुटे लाखों छात्रों पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने टैंक चढ़ा दिए थे। माना जाता है कि इस नरसंहार में कम से कम 10 हजार छात्र कुचलकर मार डाले गए थे। एशिया में ऐसे कुछ छात्र आंदोलनों की कहानी जानते हैं, जिसमें छात्रों ने अपने प्रदर्शनों से सत्ता को हिलाकर रख दिया था। चीन का थियानमेन चौक आंदोलन, भारत में जेपी आंदोलन और ताइवान की सनफ्लावर क्रांति की कहानियों के बारे में जानते हैं। साल 1980 के शुरुआती दशक के दौर में चीन कई बदलावों से होकर गुजर रहा था, जिनमें निजी कंपनियों और विदेशी निवेश को अपनाए जाने की बात उठ रही थी। तत्कालीन चीनी नेता डेंग श्याओपिंग को उम्मीद थी कि इन कदमों से चीनी अर्थव्यवस्था को बल मिलने के साथ ही लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार आएगा। लेकिन इस सोच के ठीक उल्टा हुआ। इन कदमों के साथ भ्रष्टाचार बढ़ने के मामले सामने आए। उसी वक्त आम लोगों के बीच राजनीतिक स्वतंत्रता से लेकर खुलकर बातचीत होने की आकांक्षाओं का जन्म हुआ। ऐसे ही दौर में छात्र लोकतांत्रिक बदलाव की चाहत को लेकर विरोध प्रदर्शन करने लगे थे।

साल 1989 में राजनीतिक स्वतंत्रता का दायरा बढ़ाए जाने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। इसी दौरान चीन के एक बड़े चीनी नेता हू याओबैंग की हत्या हो गई, जो चीन में आर्थिक और राजनीतिक बदलावों की हिमायती थे। 1989 के अप्रैल में याओबैंग की अंत्येष्टि में लाखों लोग शामिल हुए, जिन्होंने सेंसरशिप कम करने से लेकर अभिव्यक्ति की आजादी की मांग को उठाया। इसी के बाद से चीन की राजधानी बीजिंग के थियानमेन स्क्वायर में चीनी छात्र जुटने लगे थे। कुछ अनुमानों में कहा गया है कि इस चौराहे पर 10 लाख छात्र जुट गए थे।

चीनी सेना ने जब छात्रों पर टैंक चढ़ाए तो उसने जून में यह कहा था कि 200 आम लोगों और कई दर्जन सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है। मगर, 2017 में ब्रिटिश सरकार के दूतावास के सर एलन डोनाल्ड के डिप्लोमेटिक केबल के खुफिया दस्तावेज सामने आए, जिसमें कहा गया था कि थियानमेन स्क्वॉयर पर मरने वाले छात्रों की संख्या 10 हजार थी। राजनयिक अधिकारी ने लिखा था – छात्रों को लगा कि उनके पास चौराहे से हटने के लिए एक घंटे का समय है लेकिन सिर्फ 5 मिनट में ही चीन की बख्तरबंद आर्मी के वाहनों ने हमला बोल दिया। छात्रों ने एक-दूसरे से कोहनियां मिला लीं, लेकिन उन्हें कुछ सैनिकों के साथ कुचल दिया गया। मरने के बाद भी उनके टैंकों को कुचला गया। बाद में उनके शरीर के अवशेषों को बुलडोजर से बटोरकर जला दिया गया और नालियों में बहा दिया गया।

आखिरकार, छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए हजारों लोग ताइपे की सड़कों पर उतर आए। सूरजमुखी आशा का प्रतीक बन गया। देशव्यापी विरोध को देखते हुए आखिरकार सरकार ने व्यापार समझौते को रोक दिया। छात्र आंदोलन के दो साल बाद ताइवान की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) ने कुओमिन्तांग (KMT) को सत्ता से बाहर कर दिया, जो आज भी सत्ता में बनी हुई है।

सनफ्लावर स्टूडेंट मूवमेंट शब्द का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों द्वारा सूरजमुखी को आशा के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने के लिए किया गया था क्योंकि यह फूल हेलियोट्रोपिक है। दरअसल, यह शब्द तब पॉपुलर हुआ, जब एक फूलवाले ने ताइवानी संसद विधान युआन भवन के बाहर छात्रों को 1,000 सूरजमुखी भेंट किए। यह सनफ्लावर 1990 के वाइल्ड लिली मूवमेंट का भी एक संकेत था जिसने ताइवान के लोकतंत्रीकरण में एक मील का पत्थर स्थापित किया था। इस आंदोलन को ’18 मार्च छात्र आंदोलन’ या ‘ताइवान विधानमंडल पर कब्जा’ आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है।

इंदिरा गांधी के खिलाफ भी महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दों को लेकर जेपी ने आंदोलन शुरू किया था। जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया और उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखा और देश के बिगड़ते हालात के बारे में बताया। उसके बाद देश के अन्य सांसदों को भी पत्र लिखा और कई इंदिरा गांधी के कई फैसलों को लोकतांत्रिक खतरा बताया। लोकपाल बनाने की जेपी की मांग को लेकर हंगामा शुरू हो गया था। जयप्रकाश नारायण ने सरकार को हटाने को लेकर आंदोलन तेज कर दिया। 8 अप्रैल 1974 को जयप्रकाश नारायण ने विरोध के लिए जुलूस निकाला, जिसमें सत्ता के खिलाफ आक्रोशित जनता ने हिस्सा लिया। इसमें लाखों लोगों ने भाग लिया। जब इंदिरा को लगा कि उनकी सत्ता के नीचे से जमीन खिसक रही है तो उन्होंने आपातकाल लगा दिया।

लंदन में शेख हसीना को शरण देने को लेकर क्या बोला ब्रिटेन?

हाल ही में लंदन में शेख हसीना को शरण देने को लेकर ब्रिटेन ने एक बयान दे दिया है! बांग्लादेश की निवर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना के लंदन प्लान पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। हसीना को बांग्लादेश में हालात बिगड़ने के कारण सोमवार को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उन्होंने सुरक्षा की चिंता में बांग्लादेश छोड़ दिया और तुरंत भारत आ गईं। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आज संसद को इस बारे में ब्रीफ किया। उन्होंने कहा कि शेख हसीना ने पीएम पद से इस्तीफा देने के तुरंत बाद भारत आने की अनुमति मांगी थी और शॉर्ट नोटिस पर भारत ने उनकी सुरक्षित यात्रा की व्यवस्था कर दी थी। शेख हसीना अभी भारत में हैं, लेकिन वो निर्वासन के दिन लंदन में बिताना चाहती हैं। इसके लिए उनकी ब्रिटिश सरकार से बातचीत हुई है, लेकिन कुछ फाइनल नहीं हो सका है। दरअसल, ब्रिटिश सरकार ने शेख हसीना को किसी भी तरह का कानूनी संरक्षण देने से इनकार कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने शेख हसीना से कहा है कि अगर उनके खिलाफ कोई कानूनी-कार्यवाही शुरू होती है तो ब्रिटेन उनका बचाव नहीं करेगा। अंग्रजों के इस रुख के बाद शेख हसीना ने दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना शुरू कर दिया है।

इधर, भारत ने शेख हसीना को हर संभव सहायता का भरोसा दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आज सर्वदलीय बैठक में बताया कि हसीना बांग्लादेश के घटनाक्रम से सदमे में हैं। हिंडन एयर बेस पर उनका प्लेन उतरने के बाद उन्हें सुरक्षित स्थान पर ठहराया गया है। सब कुछ प्लानिंग के अनुसार होता तो शेख हसीना लंदन के लिए उड़ान भर चुकी होतीं, लेकिन अब कम से कम दो दिन तक उनके भारत में ही रहना होगा। दो दिन के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी कि वो लंदन जाएंगी भी या नहीं। अगर उन्होंने लंदन नहीं जाने का फैसला किया तो संभव है कि वो किसी दूसरे देश में शरण लें।

बता दे कि 26 फरवरी, 2009 की शाम। भारत के पैराशूट रेजिमेंट की छठी बटालियन के मेजर कमलदीप सिंह संधू को एक आपातकालीन कोड मिला। यह कोड वही था जो किसी भी आपात स्थिति में सेना की त्वरित तैनाती के लिए भेजा जाता है। इस बार, यह कोड बांग्लादेश के लिए था। बांग्लादेश में उस समय एक गंभीर संकट चल रहा था। देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को अपनी ही सेना के एक हिस्से, बीडीआर (बांग्लादेश राइफल्स) के विद्रोह का सामना करना पड़ रहा था। बीडीआर के जवानों ने अपने ही अधिकारियों और उनके परिवारों पर हमला कर दिया था। हसीना की सरकार का सेना से भरोसा डिग गया। उन्होंने भारत से मदद मांगी। आज 15 वर्ष बाद शेख हसीना फिर भारत की मदद से ही बांग्लादेश से सुरक्षित निकल सकीं। 2009 में हसीना की गुहार पर भारत ने तुरंत कार्रवाई की थी। 1,000 से ज्यादा भारतीय पैराशूट सैनिकों को पश्चिम बंगाल के कालाकुंडा एयर फोर्स स्टेशन पर भेजा गया। भारत के तत्कालीन विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और चीन के राजनयिकों से संपर्क किया और उनसे हसीना को समर्थन देने की अपील की। दूसरी तरफ, भारत ने बांग्लादेश में सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी कर ली थी। भारतीय सैनिकों को जोरहट और अगरतला से भी बुलाया गया था। योजना थी कि भारतीय सैनिक बांग्लादेश में तीनों तरफ से प्रवेश करेंगे और ढाका के जिया इंटरनैशनल एयरपोर्ट (जिसे बाद में हजरत शाह जलाल इंटरनैशनल एयरपोर्ट नाम दिया गया) और तेजगांव एयरपोर्ट पर कब्जा कर लेंगे। इसके बाद, वे प्रधानमंत्री के आवास गणभवन पर कब्जा करेंगे और हसीना को सुरक्षित स्थान पर ले जाएंगे।

भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने कहा कि भारत ने अपनी सेना को अलर्ट पर रखा था और हसीना की सुरक्षा के बारे में चिंतित था। लेकिन, भारत ने बांग्लादेश में हस्तक्षेप नहीं किया। ढाका में बीडीआर के विद्रोहियों ने अपने डीजी और उनकी पत्नी की हत्या कर दी थी। बांग्लादेशी सेना के प्रमुख जनरल मोइनुद्दीन अहमद पर विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव था। लेकिन, अगर वह ऐसा करते तो इससे और भी हिंसा हो सकती थी और हसीना की जान को खतरा हो सकता था। भारत ने बांग्लादेशी सेना को बल प्रयोग रोकने की चेतावनी दी थी।

बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश सचिव तौहीद हुसैन के मुताबिक, बांग्लादेश को साफ बता दिया गया था कि अगर सेना बल प्रयोग करेगी तो भारतीय पैराशूट सैनिक एक घंटे के भीतर ढाका में उतर जाएंगे। भारत ने सिर्फ चेतावनी नहीं दी थी बल्कि इसे अमल में लाने के लिए पूरी तरह तैयार था। लेकिन, आखिरकार भारत ने हस्तक्षेप नहीं किया। हुसैन ने कहा, ‘मुझे बताया गया कि बांग्लादेशी सैन्य प्रमुख से साफ-साफ कह दिया गया है कि वो बल प्रयोग नहीं करें वरना भारतीय पैराट्रूपर्स ढाका कूच करने को तैयार हैं।’ भारत के एक शीर्ष अधिकारी ने हुसैन के दावों का समर्थन किया। उन्होंने कहा, ‘भारत भभकी नहीं दे रहा था बल्कि पूरी तैयारी थी कि अगर हालात काबू से बाहर हुए तो बांग्लादेश पर चढ़ाई कर दी जाएगी।’

वैसे तो भारत के हस्तक्षेप ने बांग्लादेश के इतिहास को बदल दिया होता, लेकिन ऐसा नहीं करने का भी एक बड़ा प्रभाव पड़ा। भारत ने हसीना को बचाने के लिए बल प्रयोग करने की धमकी देकर बांग्लादेशी सेना को इतना कमजोर कर दिया कि हसीना अपने विरोधियों का सामना करने के लिए स्वतंत्र हो गईं। भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कई प्रयास किए थे, लेकिन वहां हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और पूर्वोत्तर भारत में विद्रोहियों को समर्थन देने के मामले में बांग्लादेश ने भारत की चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया। भारत ने बांग्लादेश में हस्तक्षेप न करके एक बड़ा जोखिम उठाया था, लेकिन इसने हसीना को सत्ता में मजबूत होने में मदद की। 15 वर्ष पूर्व का वह वाकया भारत और बांग्लादेश के संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

आखिर बॉक्स ऑफिस क्यों पड़ा है ठंडा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि वर्तमान में बॉक्स ऑफिस ठंडा क्यों पड़ा है! साल के पहले छह महीनों में बॉक्स ऑफिस पर करीब 1550 करोड़ रुपए की ही कमाई हुई, जो बीते साल इस दौरान कमाए 2000 करोड़ रुपए के आंकड़े से काफी कम है। बेशक इससे फिल्मवालों में निराशा का माहौल है, तो सिनेमवाले भी चिंतित हैं। साल 2024 के पहले छह महीने बीते चुके हैं, लेकिन फिल्म जगत में निराशा का माहौल है। साल की पहली छमाही में हिंदी बॉक्स ऑफिस पर करीब 1550 करोड़ करोड़ रुपए की कमाई हुई है। जो कि बीते साल इसी दौरान हुई 2000 करोड़ रुपए की कमाई से काफी कम है। बॉक्स ऑफिस की खराब हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते छह महीनों में एक भी फिल्म 200 करोड़ क्लब में नहीं पहुंची। वहीं 100 करोड़ क्लब में भी महज पांच फिल्मों ने ही एंट्री की है। इनमें भी 2 फिल्मों ने जून महीने में ही इस प्रतिष्ठित क्लब में आमद दर्ज कराई है। यानी कि साल के पहले पांच महीनों में सिर्फ तीन फिल्में 100 करोड़ क्लब में पहुंची। इन पांच फिल्मों में ‘फाइटर’, ‘शैतान’, ‘गॉडजिला वर्सेज कॉन्ग’, ‘कल्कि 2898 एडी’ और ‘मुंज्या’ का नाम शामिल है। वहीं आठ फिल्मों ने जरूर 50 करोड़ से 100 करोड़ के बीच कमाई करके बॉक्स ऑफिस को सहारा दिया। इनमें ‘क्रू’ 90 करोड़, ‘आर्टिकल 370’ 82 करोड़, ‘तेरी बातों में’ 80 करोड़, ‘बड़े मियां छोटे मियां’ 59 करोड़, ‘हनुमान’ 57 करोड़, ‘चंदू चैंपियन’ 55 करोड़, ‘मैदान’ 52 करोड़ और ‘श्रीकांत’ 50 करोड़ जैसी फिल्में शामिल हैं। बीते साल हिंदी बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई फिल्मों ने 5000 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करके नए रेकॉर्ड बनाए थे।पठान की कमाई को अगर हटा दें, तो बीते साल और इस साल की पहली छमाही का प्रदर्शन कमोबेश एक जैसा ही रहा।’  वहीं 2023 की पहली छमाही में हिंदी बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई फिल्मों ने 2000 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी। 

लेकिन इस साल पहली छमाही के दौरान हिंदी बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई फिल्मों ने महज 1550 करोड़ रुपए की कमाई की। फिल्मी दुनिया के जानकारों की अगर मानें, तो यह सबको पहले से ही पता था कि साल 2024 बॉक्स ऑफिस पर कमाई के लिहाज से बीते साल 2023 से पिछड़ने वाला है। वह तो जून में रिलीज हुई मुंज्या और प्रभास की मेगा बजट फिल्म कल्कि की वजह से फिर भी साल की पहली छमाही की कमाई का आंकड़ा 1550 करोड़ पार कर गया। वरना इससे पहले तो इतनी कमाई होना भी मुश्किल नजर आ रहा है। हालांकि जानकारों का भी यह भी कहना है कि पहले रमजान, फिर आईपीएल, फिर लोकसभा चुनाव और फिर टी 20 क्रिकेट विश्व कप के चलते साल की पहली छमाही को काफी नुकसान हुआ। हालांकि फिल्मी दुनिया वाले आने वाले छमाही में बीती छमाही से ज्यादा कमाई होने की उम्मीद जता रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि बीते साल की शुरुआत में शाहरुख खान की फिल्म पठान की मेगा सक्सेस ने बॉक्स ऑफिस पर पॉजिटिव माहौल बना दिया था। जबकि इस साल ऐसी सुपरहिट फिल्म की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है। प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर कहते हैं, ‘साल की पहली छमाही में फिल्म इंडस्ट्री का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। अगर पिछले साल की पहली छमाही से तुलना करें, तो बीते साल जनवरी में सुपरहिट हुई शाहरुख खान की पठान जैसी फिल्म की कमी साफतौर पर महसूस हुई। पठान ने 500 करोड़ से ज्यादा की कमाई करके साल की शुरुआत में ही इंडस्ट्री में जोश भर दिया था। पठान की कमाई को अगर हटा दें, तो बीते साल और इस साल की पहली छमाही का प्रदर्शन कमोबेश एक जैसा ही रहा।’ 

वहीं फिल्म ट्रेड एनालिस्ट कोमल नाहटा कहते हैं, ‘साल 2024 के पहले छह महीने कुछ ख़ास नहीं रहे। खासकर पिछले तीन महीने तो बेहद खराब बीते। बेशक साल 2024 की पहली छमाही में बॉक्स ऑफिस के खराब प्रदर्शन से फिल्म इंडस्ट्री में घबराहट की स्थिति है। बता दें कि जानकारों का भी यह भी कहना है कि पहले रमजान, फिर आईपीएल, फिर लोकसभा चुनाव और फिर टी 20 क्रिकेट विश्व कप के चलते साल की पहली छमाही को काफी नुकसान हुआ। हालांकि फिल्मी दुनिया वाले आने वाले छमाही में बीती छमाही से ज्यादा कमाई होने की उम्मीद जता रहे हैं। खासकर सिनेमावालों की हालात खराब है। जून के आखिर में रिलीज हुई कल्कि से जरूर थोड़ी राहत मिली है। लेकिन पहली छमाही की सबसे बड़ी हिट सबसे छोटी फिल्म मुंजया को कहना चाहिए, क्योंकि इसके अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद किसी को नहीं थी।’

क्या 15 अगस्त को होने वाली है फिल्मों की जंग ?

अब आने वाले 15 अगस्त को फिल्मों की जंग होने वाली है! काफी लंबे अरसे से सिनेमाघरों पर फिल्मों की रिलीज को तरस रहे दर्शकों के लिए आने वाले 15 अगस्त को फिल्मों की लाइन लगने वाली है। इंडिपेंडेंस डे की रिलीज डेट पर रिलीज हो रहीं पांच फिल्मों ‘स्त्री 2’, ‘खेल खेल में’, ‘वेदा’, ‘तंगलान’ और ‘डबल स्मार्ट’ के बीच साल का सबसे बड़ा क्लैश होने वाला है। पेश है सिनेमावालों की चुनौतियों पर एक रिपोर्ट :बीते कुछ महीनों में बॉक्स ऑफिस पर चुनिंदा बड़ी फिल्में ही रिलीज हुई हैं। इसके चलते सिनेमाघरों पर दर्शकों का अकाल पड़ा हुआ है। लेकिन आने वाले इंडिपेंडेंस डे पर एक साथ पांच फिल्मों की रिलीज के चलते साल का सबसे बड़ा क्लैश होने वाला है। जी हां, इस बार 15 अगस्त को बॉलिवुड की तीन फिल्में राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर की फिल्म स्त्री 2, अक्षय कुमार की फिल्म खेल खेल में और जॉन अब्राहम, शरवरी वाघ की फिल्म वेदा रिलीज होंगी। इनके अलावा चियान विक्रम की तमिल फिल्म तंगलान का हिंदी डब वर्जन और संजय दत्त की तेलुगू फिल्म डबल स्मार्ट का हिंदी डब वर्जन भी रिलीज होगा। फिल्मी दुनिया के जानकारों की अगर मानें, तो एक साथ इतनी सारी फिल्मों को दिखाना सिनेमावालों के लिए बड़ी चुनौती होगा। वहीं हरेक निर्माता अपनी फिल्म के लिए ज्यादा से ज्यादा स्क्रीन पाने की जुगत लगाएगा। ऐसे में, आने वाले दिनों में फिल्मों और उनके सितारों के बीच दिलचस्प मुकाबला होने वाला है। उनके लिए फिल्म का कॉन्टेंट सबसे महत्वपूर्ण है। जिस फिल्म में दम होगा, उसे ज्यादा दर्शक देखेंगे। वहीं जो कमजोर होगी, वह महा मुकाबले में खुदबखुद पीछे रह जाएगी।’बीते कुछ महीने से बॉक्स ऑफिस पर फिल्में रिलीज नहीं हो रही हैं। लेकिन अब एक साथ इतनी सारी फिल्में रिलीज हो रही हैं।

15 अगस्त को बॉलिवुड और साउथ सिनेमा की पांच बड़ी फिल्मों के क्लैश पर हैरानी जताते हुए राजधानी स्थित डिलाइट सिनेप्लैक्स के जनरल मैनेजर राजकुमार मेहरोत्रा कहते हैं, ‘कई महीनों से फिल्में रिलीज नहीं हो रही थीं और अब एक साथ पांच फिल्में रिलीज हो रही हैं।’ जब हमने मेहरोत्रा से पूछा कि आखिर सबको अपनी फिल्म 15 अगस्त को ही क्यों रिलीज करनी है? इसके जवाब में उन्होंने बताया, ’15 अगस्त की रिलीज डेट हमेशा से बॉलिवुड फिल्मों के लिए लकी मानी जाती है। इस दौरान न सिर्फ बच्चों के एग्जाम खत्म हो जाते हैं, बल्कि त्योहारों के चलते लॉन्ग वीकेंड भी होते हैं। इसलिए तमाम फिल्मवाले इस रिलीज डेट पर अपनी फिल्में रिलीज करना चाहते हैं।’

फिल्मी दुनिया के जानकारों का मानना है कि त्योहारों पर दो फिल्मों का क्लैश हो तो भी कोई दिक्कत नहीं आती। लेकिन उससे ज्यादा फिल्मों का मुकाबला होने पर सिनेमावालों व फिल्मवालों दोनों के लिए मुश्किल होती है। प्रोड्यूसर व फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर 15 अगस्त पर पांच बड़ी फिल्मों के क्लैश से हैरान हैं। वह बोले, ‘पहले जब इस क्लैश की घोषणा हुई थी, तो सबको लग रहा था कि कुछ फिल्में पोस्टपोन हो जाएंगी। लेकिन अब सारी की सारी फिल्में आ रही हैं। बेशक सिनेमावालों के लिए इतनी सारी फिल्मों को स्क्रीन देना आसान नहीं होगा और फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूटरों के बीच ज्यादा स्क्रीन के लिए खींचतान भी होगी। हालांकि दर्शकों को इतनी फिल्मों की रिलीज से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए फिल्म का कॉन्टेंट सबसे महत्वपूर्ण है। जिस फिल्म में दम होगा, उसे ज्यादा दर्शक देखेंगे। वहीं जो कमजोर होगी, वह महा मुकाबले में खुदबखुद पीछे रह जाएगी।’

सिनेमावाले जहां इतने अरसे से इसलिए परेशान थे कि उनके पास फिल्मों की कमी थी। इसलिए उन्हें पुरानी फिल्मों को दोबारा भी रिलीज करना पड़ा। लेकिन अब त्योहारी सीजन आते ही उनकी परेशानी यह है कि एक साथ रिलीज हो रही इतनी सारी फिल्मों के बीच स्क्रीन का बंटवाला कैसे हो। वेव सिनेमाज के वाइस प्रेसिडेंट योगेश रायजादा से जब हमने इंडिपेंडेंस डे पर होने वाले इस मेगा क्लैश के बारे में पूछा, तो वह कहते हैं, ’15 अगस्त के मौके पर इतनी फिल्मों की रिलीज के साथ काफी अरसे से सूने पड़े बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की भीड़ लौटने की उम्मीदें हैं।’

जब हमने योगेश से पूछा कि इतनी फिल्मों के लिए स्क्रीन कैसे जुटाई जाएंगी? उन्होंने कहा, ‘पहले भी इस तरह के मौके आ चुके हैं जब तीन-चार फिल्मों के क्लैश पर हमने हैंडल किया है। हालांकि हरेक निर्माता अपनी फिल्म के लिए ज्यादा से ज्यादा स्क्रीन चाहता है। लेकिन असली फैसला जनता की अदालत में होता है। फिल्म को मिले रिस्पॉन्स के आधार पर अगले दिन स्क्रीन घट या बढ़ भी जाती हैं।’

क्या 50 साल पहले भी शेख हसीना के साथ ऐसा ही हुआ था?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 50 साल पहले भी शेख हसीना के साथ ऐसा ही हुआ था या नहीं! आधी सदी और समय का चक्र पूरा हो गया। शेख हसीना आज फिर बेघर हो गईं। बांग्लादेश में आरक्षण आंदोलन ने शेख हसीना सरकार की बलि ले ली। निवर्तमान प्रधानमंत्री को जान बचाने के लिए देश छोड़ना पड़ा है। प्रधानमंत्री आवास में अराजकता का माहौल है। लोग वहां से फर्नीचर एवं अन्य सामान कंधों पर उठाकर ले जा रहे हैं। सबसे दुखद तस्वीर शेख मुजीब उर रहमान की मूर्ति तोड़ते हुई आई। करीब 50 वर्ष पहले सैन्य तख्ता पलट में इसी मुजीब उर रहमान समेत उनके परिवार के 18 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। मुजीब की दो बेटियां शेख हसीना और शेख रिहाना ही बच पाईं, वो भी भारत की मदद से। आज समय का चक्र पूरा हुआ तो शेख हसीना फिर भारत की शरण में हैं। 1975 में उनके पिता और बांग्लादेश के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद भारत ने शेख हसीना को शरण दी थी। 1975 के सैन्य तख्ता पलट में हसीना और रिहाना इसलिए बच पाईं क्योंकि दोनों 15 दिन पहले ही बांग्लादेश से निकलकर जर्मनी चली गई थीं। हसीना के पति न्यूक्लियर साइंटिस्ट थे और जर्मनी में ही थे। 30 जुलाई, 1975 की वो तारीख थी जब हसीना अपने पिता से आखिरी बार मिल पाई थीं। दो हफ्ते बाद 15 अगस्त, 1975 को हसीना को पता चला कि सैन्य तख्ता पलट में उनके पिता की हत्या हो गई। लेकिन उन्हें तब तक पता नहीं था कि पिता ही नहीं, पूरा परिवार खत्म हो चुका है।हसीना के बेटे जॉय और प्रणब दा के बेटे अभिजीत में गहरी दोस्ती हो गई। प्रणब दा की पत्नी ने हसीना का खास ख्याल रखा। 2015 में जब प्रणब मुखर्जी की पत्नी का निधन हुआ तो शेख हसीना तुरंत दिल्ली पहुंच गईं। भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मुजीब परिवार की दोनों बेटियों की चिंता हुई। उन्होंने जर्मनी में अपने राजदूत हुमायूं राशिद चौधरी को हसीना के पास भेजा।

हसीना की इंदिरा गांधी से बात हुई। उन्होंने भारत में शरण लेने का फैसला किया। फिर प्लानिंग हुई कि बिना किसी को भनक लगे हसीना और रिहाना को भारत कैसे लाया जाए? आखिरकार 24 अगस्त की दोपहर शेख हसीना ने अपने पति के साथ जर्मनी के फ्रैंकफर्ट से उड़ान भरीं। भारत ने उन्हें लाने एयर इंडिया का एक विमान भेजा था। 25 अगस्त, 1975 के तड़के विमान दिल्ली पहुंच गया। उन्हें 56 रिंग रोड स्थित एक सेफ हाउस में रखा गया। उनकी असली पहचान छिपाने के लिए मिस्टर और मिसेज मजूमदार की नई पहचान दी गई। खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनका खास ख्याल रखा।

कुछ दिनों के बाद शेख हसीना को पंडारा पार्क के सी ब्लॉक स्थित तीन कमरों के एक मकान में शिफ्ट कर दिया गया। चौतरफा सुरक्षा कर्मियों का पहरा था। डिटेक्टिव भी तैनात किए गए। हसीना के साइंटिस्ट पति को नई दिल्ली स्थित परमाणु ऊर्जा आयोग में नौकरी मिल गई। वहां उन्होंने सात वर्ष काम किया।  इंदिरा गांधी ने प्रणब मुखर्जी को शेख हसीना की जिम्मेदारी सौंपी। मुखर्जी ने हसीना के गार्जियन की भूमिका निभाने में कोई कोताही नहीं बरती। हसीना भी प्रणब दा ही नहीं, उनके परिवार में घुल-मिल गईं। हसीना के बेटे जॉय और प्रणब दा के बेटे अभिजीत में गहरी दोस्ती हो गई। प्रणब दा की पत्नी ने हसीना का खास ख्याल रखा। 2015 में जब प्रणब मुखर्जी की पत्नी का निधन हुआ तो शेख हसीना तुरंत दिल्ली पहुंच गईं।

शेख हसीना के विमान का रुख आज भी दिल्ली की ओर है। 50 वर्ष पहले जर्मनी से दिल्ली आईं हसीना को छह साल यहां गुजारने पड़े थे। वो 17 मई, 1981 को अपने वतन बांग्लादेश लौट पाई थीं। इस बार बांग्लादेश में सैन्य तख्तापलट नहीं हुआ है और न ही हसीना के परिवार को कोई नुकसान पहुंचा है। लेकिन आरक्षण आंदोलन की आड़ में हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग के साथ को कुचलने की जो साजिश हुई है, लेकिन उन्हें तब तक पता नहीं था कि पिता ही नहीं, पूरा परिवार खत्म हो चुका है। भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मुजीब परिवार की दोनों बेटियों की चिंता हुई। उन्होंने जर्मनी में अपने राजदूत हुमायूं राशिद चौधरी को हसीना के पास भेजा।वह 1975 के आघात जैसा ही है। हसीना आज फिर बेघर हैं। ईश्वर जाने इस बार उन्हें दिल्ली कब तक अपने आगोश में रखती है। हसीना का नसीब जाने वो इस बार कब वतन लौट पाएंगी?

आखिर शेख हसीना ने क्यों छोड़ा बांग्लादेश?

आज हम आपको बताएंगे कि शेख हसीना ने बांग्लादेश को क्यों छोड़ा! बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन बेकाबू हो गए हैं। प्रदर्शनकारी ढाका में स्थित पीएम हाउस में घुस चुके हैं। इस बीच प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका छोड़ दिया है। शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया है। कहा जा रहा है कि वो भारत की शरण लेंगी। छात्रों के प्रदर्शन से शुरू हुआ आंदोलन इतना कैसे बढ़ गया कि शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा? शेख हसीना के बैकफुट पर आने के बड़े कारण हम आपको बता रहे हैं। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। ये प्रदर्शन देखते देखते हिंसक हो गया। विवाद उस 30 प्रतिशत आरक्षण को लेकर है, जो स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को दिए जा रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि मेरिट के आधार पर सरकारी नौकरियां नहीं दी जा रही है। सरकार अपने समर्थकों को आरक्षण देने के पक्ष में है।

बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर शुरु हुए छात्र आंदोलन में विपक्षी दल भी फ्रंटफुट पर आ गए। विपक्ष ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध किया। विपक्षी पार्टी बांग्‍लादेश नैशनल‍िस्‍ट पार्टी ने खालिदा जिया के नेतृत्‍व में लाखों की भीड़ जुटाकर शेख हसीना की कुर्सी को हिला दिया। विपक्ष ने हसीना से इस्तीफे की मांग की। सरकार भी विपक्ष के विरोध का सामना करने में विफल रही। बांग्लादेश में चल रहे प्रदर्शनों में सेना ने भी सरकार का साथ देने से मना कर दिया। हिंसक प्रदर्शनों में 90 लोगों की जान जा चुकी है। इसके बाद बांग्लादेश की सेना ने कहा कि अब वह प्रदर्शनकारियों पर गोलियां नहीं चलाएंगे। सेना मुख्यालय में बांग्‍लादेश आर्मी चीफ ने हालात के बारे में चर्चा की और ऐलान किया कि अब प्रदर्शनकारियों पर एक भी गोली नहीं चलाई जाएगी। इस बयान के बाद सेना का प्रर्दशनकारियों के लिए सॉफ्ट कॉर्नर नजर आया।

बांग्लादेश में हिंसा भड़काने में पाकिस्तान का भी हाथ है। बांग्लादेश की सिविल सोसायटी ने पाकिस्तान उच्चायोग पर कट्टरपंथी छात्र प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान अंदरखाने छात्रों को समर्थन के जरिए बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। कुछ रिपोर्ट में खुलासा हुआ है क पाकिस्तान ‘मिशन पाकिस्तान’ समर्थक जमात से जुड़े छात्र प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग के संपर्क में है, जो बांग्लादेश में प्रतिबंधित है।

बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति वैसे ही खराब थी, वहीं इस आंदोलन से इसे और झटका लगा है। वहां तेजी से बेरोजगारी बढ़ रही है। शेख हसीना लंबे समय से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। हाल ही में जब वो फिर से बांग्लादेश की पीएम बनीं, तो बेरोजगारों छात्रों में गुस्सा बढ़ गया। छात्र सड़क पर उतर आए और आंदोलन करने लगे। यही नहीं बांग्लादेश में दिख रहे एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स को लेकर उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया पार्ट ऑफ लाइफ हो गया है। वहां किसी चीज का विरोध करने के लिए भारत को बीच में खींचकर लाना एक प्रैक्टिस हो गया है। पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स की बात है तो ये साजिशें रची जाती हैं। बांग्लादेश में भी पाकिस्तानी एजेंसी ऐसी साजिश करती रही है। पर बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते बहुत प्रगाड़ है और वहां एंटी इंडिया सेंटिमेंट सफल नहीं हो सकेगा। मालदीव में देखें तो वह भी वेलकम इंडिया की बात कर रहे हैं।

विदेश मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के पड़ोस में अस्थिरता बढ़ रही है लेकिन भारत का अप्रोच नेबहुड फर्स्ट का है। बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार अमिताभ सिंह कहते हैं कि ये सही है कि फिलहाल बांग्लादेश की राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन अगर विपक्षी पार्टी बीएनपी और जमात के इतिहास को देखा जाए तो ऐसे में अगर इन दलों को वहां की राजनीति में स्पेस मिलता है तो पूर्वोत्तर के लिए भारत विरोधी गतिविधियों और अवैध नारकोटिक्स के खतरे पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाएगा। ये दो ऐसे तत्व हैं, जि्न्हें काबू में करने को लेकर शेख हसीना की सरकार ने बहुत काम किया है।

इसे लेकर भारत पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से संयम के साथ नजर बनाए हुए रहा है। सब जानते हैं कि एक बार कोई देश राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ जाए तो उस के बाद राजनीतिक सिस्टम को मुख्यधारा में लौटने में कितना वक्त लगता है, पड़ोसी देश श्रीलंका इसका एक उदाहण रहा है।पड़ोस में स्थितियां भारत के लिए चुनौतीपूर्ण जरूरी हैं लेकिन भारत की जो क्षमता है, अप्रोच है, भारत अपना रचनात्मक रोल अदा करता रहेगा।

क्या बांग्लादेश में आ सकता है एंटी इंडिया प्रधानमंत्री?

आने वाले समय में बांग्लादेश में एंटी इंडिया प्रधानमंत्री आ सकता है! बांग्लादेश में शेख हसीना के राज का अंत भले ही बांग्लादेश के युवा नई आजादी की तरह देख रहे हैं और सोशल मीडिया में भी इसका जश्न मना रहे हैं। लेकिन शेख हसीना का जाना भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि शेख हसीना के जाने से बांग्लादेश में भारत विरोध सेंटिमेंट्स को और बढ़ावा मिलने का डर है। हालांकि बांग्लादेश में वहां की आर्मी ने टेकओवर किया है और बांग्लादेश आर्मी के भारत की आर्मी के साथ अच्छे संबंध हैं। भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ तैनात हैं लेकिन बांग्लादेश के मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय सेना भी अलर्ट पर है। फॉरेन अफेयर्स एक्सपर्ट पारुल चंद्रा कहती हैं कि शेख हसीना का जाना भारत के लिए बहुत बड़ा सेटबैक है क्योंकि पिछले 15 साल से जब से वह प्रधानमंत्री थीं भारत-बांग्लादेश के संबंध बहुत अच्छे थे। उन्होंने भारत के स्ट्रैटजिक- सिक्योरिटी इंटरेस्ट का बहुत ध्यान रखा। उन्होंने जो भी कदम उठाए, अगर वे भारत से संबंधित थे तो वे भारत के स्ट्रैटजिक इंटरेस्ट को ध्यान में रखकर लेती थी। जबकि भारत इतने सालों में भी उनको तीस्ता अग्रीमेंट नहीं दे पाया। ये उनके लिए डोमेस्टिक स्तर पर काफी मुश्किल स्थिति पैदा करता था क्योंकि वहां के दूसरे राजनीतिक दल और जनता ये मुद्दा बार बार उठाते थे कि बांग्लादेश में तीस्ता का पानी कब आएगा। फिर भी उन्होंने अपनी तरफ से भारत जो चाहता था वह भारत को दिया चाहे वह कनेक्टिविटी, सिक्योरिटी, ट्रेड हो या फिर नॉर्थ ईस्ट के इंसर्जेंट को वहां से भगाना हो।

फॉरेन अफेयर्स एक्सपर्ट पारुल कहती हैं कि चीन ने अफगानिस्तान से लेकर नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव सब जगह अपनी पकड़ बनाई है। चीन से बांग्लादेश को भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में बहुत मदद मिलती थी, फिर भी शेख हसीना यह ध्यान रखती थी की भारत के इंटरेस्ट पर असर ना पड़े। वह कहती हैं कि शेख हसीना के साथ भारत का नाम इतना जुड़ा था कि अब बांग्लादेश में भारत विरोध सेंटिमेंट्स को बढ़ावा मिलने का खतरा है। बांग्लादेश नैशनल पार्टी, जमाते इस्लामी को प्रो पाकिस्तान माना जाता है। भारत को इस बात की भी चिंता रहेगी कि बांग्लादेश में जो रेडिकल एलिमेंट्स हैं उनका भारत में क्या असर होगा।

आईडीएसए में रिसर्च फैलो और साउथ एशिया एक्पर्ट स्मृति पटनायक कहती हैं कि यह देखना होगा कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में अवामी लीग रहेगी या नहीं। बांग्लादेश में दिख रहे एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स को लेकर उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया पार्ट ऑफ लाइफ हो गया है। वहां किसी चीज का विरोध करने के लिए भारत को बीच में खींचकर लाना एक प्रैक्टिस हो गया है। विदेश मामलों के जानकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि भारत के पड़ोस में अस्थिरता बढ़ रही है लेकिन भारत का अप्रोच नेबहुड फर्स्ट का है। पड़ोस में स्थितियां भारत के लिए चुनौतीपूर्ण जरूरी हैं लेकिन भारत की जो क्षमता है, अप्रोच है, भारत अपना रचनात्मक रोल अदा करता रहेगा। वह कहते हैं कि जहां तक पड़ोसी देशों में एंटी इंडिया सेंटिमेंट्स की बात है तो ये साजिशें रची जाती हैं। बांग्लादेश में भी पाकिस्तानी एजेंसी ऐसी साजिश करती रही है। पर बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते बहुत प्रगाड़ है और वहां एंटी इंडिया सेंटिमेंट सफल नहीं हो सकेगा। मालदीव में देखें तो वह भी वेलकम इंडिया की बात कर रहे हैं।

आईडीएसए में रिसर्च फैलो और साउथ एशिया एक्पर्ट स्मृति पटनायक कहती हैं कि बांग्लादेश आर्मी के साथ भारत के अच्छे संबंध हैं। 2007 से बांग्लादेश आर्मी के साथ भारत का संबंध बदला है। भारत रीजनल पावर है। इसलिए बांग्लादेश में जो भी रिजीम रहे चाहे वह मिलिट्री रीजीम हो, वह भी चाहेगा कि इंडिया का सपोर्ट रहे। भारत की आर्मी और बांग्लादेश की आर्मी की जॉइंट एक्सरसाइज होती रहती हैं।अगर वे भारत से संबंधित थे तो वे भारत के स्ट्रैटजिक इंटरेस्ट को ध्यान में रखकर लेती थी। जबकि भारत इतने सालों में भी उनको तीस्ता अग्रीमेंट नहीं दे पाया। ये उनके लिए डोमेस्टिक स्तर पर काफी मुश्किल स्थिति पैदा करता था क्योंकि वहां के दूसरे राजनीतिक दल और जनता ये मुद्दा बार बार उठाते थे कि बांग्लादेश में तीस्ता का पानी कब आएगा। नेवी और कोस्ट गार्ड के साथ ही एयरफोर्स के साथ भी एक्सरसाइज होती है। भारत की नैशनल डिफेंस अकेडमी में बांग्लादेश के ऑफिसर भी ट्रेनिंग लेते हैं।

क्या बांग्लादेश की अस्थिरता का भारत पर पड़ेगा प्रभाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बांग्लादेश की अस्थिरता का भारत पर प्रभाव पड़ेगा या नहीं! बीते 21 जून को जब शेख हसीना नई दिल्ली में थीं, तो वो उनका 15 दिनों के भीतर दूसरा भारत दौरा था। अपने इस दौरे में उन्होंने ना सिर्फ पीएम मोदी से मुलाकात की, बल्कि इसके साथ ही वो विपक्षी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके परिवार से बेहद आत्मीयता से मिलीं। इसके बाद वो चीन के दौरे पर गई, लेकिन दौरा छोड़कर वापस आ गई। माना जा रहा है कि चीन को ये बात रास नहीं कि हसीना ने दो हफ्तों के भीतर दूसरी बार भारत का दौरा किया। हसीना के कार्यकाल में बांग्लादेश उन पड़ोसी देशों में से रहा है, जिसके भारत के साथ बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। अब ढाका में सेना के बूटों की धमक है,प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं, राजनीतिक उठापठक मची है, स्थिरता कोसों दूर है। लेकिन इस अस्थिरता का असर भारत पर भी पड़ना तय है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष वी पंत कहते हैं कि शेख हसीना ने साल 2009 से बांग्लादेश को संभाले हुई थी। अब कौन आएगा और उस देश को संभालेगा, जिसमें फिलहाल इतनी विभाजनकारी रेखाएं देखने को मिल रही हैं। खासतौर से 2009 के बाद से वहां आर्थिक तौर पर देश अच्छा कर रहा था। भारत बांग्लादेश के साथ अपनी सीमाएं साझा करता है। अब सवाल ये है कि अगर सेना भविष्य में नई सरकार की बहाली की दिशा में काम करती है तो वहां किस तरह के राजनीतिक विकल्प होंगे ये कोई नहीं जानता।

फिलहाल खालिदा जिया हों या फिर जमात, राजनीतिक स्थिरता को लेकर किसी के पास भी कोई जवाब नहीं हैं। चरमपंथी समूहों का क्या रोल होगा, कोई नहीं जानता और इसे लेकर भारत के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी ही। एक शांत बांग्लादेश ही भारत के हित में है यही वजह है कि भारत ने कभी भी वहां हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। भारत ने हमेशा से बांग्लादेश का अंदरूनी मामला बताया। दरअसल भारत और बांग्लादेश 4100 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं।

ऐतिहासिक तौर पर बांग्लादेश की राजनीति की धुरी दो ही राजनीतिक दलों के इर्द गिर्द रही है। अवामी लीग और खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी साल 2009 से पहले जब जिया शासन में थी तो उस वक्त एंटी इंडिया सेंटीमेंट खासतौर पर देखने को मिला था। पार्टी पर आईएसआई से संबंध के भी आरोप लगते रहते हैं। माना जाता है कि उस दौरान भारत विरोधी राजनीतिक माहौल ने भारतीय विदेश नीति के लिए खासी चुनौती सामने रख दी थी।

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार अमिताभ सिंह कहते हैं कि ये सही है कि फिलहाल बांग्लादेश की राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन अगर विपक्षी पार्टी बीएनपी और जमात के इतिहास को देखा जाए तो ऐसे में अगर इन दलों को वहां की राजनीति में स्पेस मिलता है तो पूर्वोत्तर के लिए भारत विरोधी गतिविधियों और अवैध नारकोटिक्स के खतरे पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाएगा। ये दो ऐसे तत्व हैं, जि्न्हें काबू में करने को लेकर शेख हसीना की सरकार ने बहुत काम किया है।

कहा जा रहा है कि छात्रों के गुस्से से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन के पीछे आईएसआई का भी हाथ होने के संकेत नजर आ रहे हैं, ऐसे में भारत जानता है कि अगर पड़ोसी देश इस्लामी कट्टरपंथ के चंगुल में ना आ तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसे ही होगा, इसे लेकर भारत पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से संयम के साथ नजर बनाए हुए रहा है। सब जानते हैं कि एक बार कोई देश राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ जाए तो उस के बाद राजनीतिक सिस्टम को मुख्यधारा में लौटने में कितना वक्त लगता है, जिसमें फिलहाल इतनी विभाजनकारी रेखाएं देखने को मिल रही हैं। खासतौर से 2009 के बाद से वहां आर्थिक तौर पर देश अच्छा कर रहा था। भारत बांग्लादेश के साथ अपनी सीमाएं साझा करता है। अब सवाल ये है कि अगर सेना भविष्य में नई सरकार की बहाली की दिशा में काम करती है तो वहां किस तरह के राजनीतिक विकल्प होंगे ये कोई नहीं जानता।पड़ोसी देश श्रीलंका इसका एक उदाहण रहा है। अमिताभ सिंह कहते हैं कि भारत के लिए एक खतरा चीन की और से भी है। अपने सामरिक हितों को देखते हुए चीन बदली हुई हर राजनीतिक परिस्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेगा, जो कम से कम भारत के हित में तो बिल्कुल नहीं होगी।

बांग्लादेश में अचानक से कैसे हो गया तख्तापलट?

आज हम आपको बताएंगे कि बांग्लादेश में अचानक से तख्तापलट कैसे हो गया! बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन और बढ़ते बवाल के बीच शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। यही नहीं बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने उनके आवास पर धावा बोला। बिगड़ते हालात को देखते हुए शेख हसीना भारत पहुंची हैं। उनका विमान दिल्ली से सटे गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर उतरा है। इस बीच एनएसए अजीत डोभाल ने शेख हसीना से मुलाकात की है। वहीं बांग्लादेश में हालात पर भारत की भी निगाहें हैं। बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर हाई अलर्ट घोषित किया है। बीएसएफ जवानों की गश्त सीमा पर बढ़ा दी गई है। बीएसएफ के डीजी खुद बॉर्डर एरिया पर पहुंच चुके हैं। उधर विदेश मंत्री एस. जयशंकर बांग्लादेश के हालात पर चर्चा के लिए पीएम मोदी से मिलने पहुंचे हैं। उन्हें बांग्लादेश के हर अपडेट की जानकारी दी। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बांग्लादेश छोड़ भारत पहुंचीं शेख हसीना से मिलने के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पहुंचे। शेख हसीना का विमान गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पर उतरा है। वहीं शेख हसीना से एनएसए डोभाल मिले हैं। माना जा रहा कि करीब आधे घंटे तक उनकी ये मुलाकात हुई है।मुलाकात के बाद अजीत डोभाल की गाड़ी हिंडन एयरबेस के अंदर से निकली। कई गाड़ियों का काफिला साथ में था। वेस्टर्न एयर कमांड के एयर मार्शल पंकज मोहन सिन्हा भी एयरबेस से बाहर निकले।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर बांग्लादेश की स्थिति पर अपडेट लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंचे हैं। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने पीएम मोदी को बांग्लादेश के हालात पर जानकारी दी है। जिस तरह से शेख हसीना का विमान भारतीय सरजमीं पर उतरा और बांग्लादेश में जैसे हालात हैं, माना जा रहा कि उस पर भी प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जयशंकर के बीच चर्चा हुई।

बांग्लादेश में बिगड़े राजनीतिक हालात और हिंसा के मद्देनजर विदेश मंत्रालय ने ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। नागरिकों को बांग्लादेश नहीं जाने की अपील की गई है। एअर इंडिया ने ढाका में विमान सेवाएं सस्पेंड कर दी है। बांग्लादेश और भारत के बीच चलने वाली रेल सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। पहले रेल सर्विस रद्द करने के बाद फ्लाइट सर्विस सस्पेंड किया गया है। भारत में बांग्लादेश हाई कमीशन की सुरक्षा बढ़ाई गई है। बांग्लादेश में भयंकर विरोध प्रदर्शनों के बीच, प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यही नहीं वो अपनी बहन के साथ राजधानी ढाका छोड़कर ‘सुरक्षित स्थान’ के लिए रवाना हो गईं। जानकारी के मुताबिक, नई दिल्ली आ रही हैं। उनका विमान झारखंड-बिहार होते हुए दिल्ली में लैंड करेंगे। वहीं बांग्लादेश में बिगड़े हालात तो भारतीय सीमाओं पर भी चौकसी बढ़ा दी गई है। अधिकारियों के अनुसार, सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर अपनी सभी इकाइयों को ‘हाई अलर्ट’ पर रखा है। उधर केंद्र सरकार ने ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। भारत ने बांग्लादेश में जारी हिंसा के कारण अपने सभी नागरिकों को अगली सूचना तक पड़ोसी देश की यात्रा न करने की सलाह दी है।

बांग्लादेश में पूरा घटनाक्रम तब सामने आया है जब प्रदर्शनकारियों ने कोटा विरोध प्रदर्शनों के बीच हसीना के इस्तीफे की मांग की थी। इन विरोध प्रदर्शनों में लगभग 300 लोग मारे जा चुके हैं। इस बीच, हालात इतने बिगड़ गए हैं कि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हजारों प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री आवास में घुस गए। दूसरी ओर से प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हिंसक विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहे देश से भागने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेख हसीना एक सैन्य हेलीकॉप्टर से भारत रवाना हुईं। वह और उनकी बहन सुरक्षित स्थान के लिए प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास छोड़ चुकी हैं।

सूत्रों के मुताबिक, शेख हसीना देश छोड़ने से पहले देशवासियों को संबोधित करना चाहती थी। वो एक भाषण रिकॉर्ड करना चाहती थीं। लेकिन उन्हें ऐसा करने का अवसर नहीं मिल सका। रविवार को, राजधानी ढाका में घातक झड़पें हुईं, करीब 94 लोग मारे गए। मारे गए लोगों में 14 पुलिस अधिकारी शामिल हैं, और सैकड़ों अन्य घायल हुए हैं। बढ़ती हिंसा के जवाब में, सेना ने ढाका और कई अन्य प्रमुख शहरों और जिलों में कर्फ्यू लगा दिया। यह कर्फ्यू राजधानी और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में लगाया गया है। इस बीच सरकार ने सोमवार से बुधवार तक तीन दिन की छुट्टी का ऐलान किया है। अदालतों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का भी आदेश दिया।

हिमाचल प्रदेश में बादल फटने से फिर 13 लोगों की मौत.

0

हिमाचल प्रदेश में श्रीखंड के पास समेज और बागी सेतु के बीच के क्षेत्र में बुधवार देर रात एक और बादल फटा। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) ने गुरुवार सुबह तक 13 शव बरामद किए हैं। अभी भी एक गायब है. इससे पहले 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव के दौरान उन छह कांग्रेस विधायकों ने बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के समर्थन में ‘क्रॉस वोटिंग’ की थी. उनके साथ-साथ सुक्खू सरकार के समर्थक तीन स्वतंत्र दलों ने भी बीजेपी को वोट दिया. क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। 68 सदस्यीय विधानसभा में दोनों पार्टियों को 34-34 वोट मिले और विजेता का फैसला लॉटरी से हुआ।

हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले का समेज गांव. 31 जुलाई की मूसलाधार बारिश के बाद फिर वही आफत इस समुदाय पर आई। इससे पहले वहां कम से कम 33 लोग लापता थे. एक के बाद एक घर पानी में बह गये। इस बार बुधवार रात आई आपदा में 13 लोगों की मौत हो गई. एनडीआरएफ आपदा प्रभावित इलाकों में बचाव अभियान चला रही है. एनडीआरएफ कमांडेंट बलजिंदर सिंह ने न्यूज एजेंसी को बताया, ”राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया टीम हिमाचल के विभिन्न दूरदराज के इलाकों में बचाव अभियान के लिए पहले से ही तैयार थी. समाज में बार-बार बादल रहित बारिश होना एक ऐसी आपदा है। बचाव कार्य सक्रियता के साथ जारी है. आज सुबह तक 13 शव बरामद किये जा चुके हैं.

मौसम विभाग के मुताबिक 7 अगस्त को हिमाचल भारी बारिश से तरबतर हो गया. 24 घंटे में मंडी जिले के जोगिंदरनगर में सबसे ज्यादा 110 मिमी बारिश हुई. सिरमौर जिले में भी भारी बारिश हुई. अगले कुछ दिनों के लिए राज्य के बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, चंबा और मंडी जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है। संयोग से, हिमाचल प्रदेश के शिमला, मंडी और कुल्लू जिले 31 जुलाई से मूसलाधार बारिश और भूस्खलन से प्रभावित हैं। ढहने से कई घर, स्कूल, अस्पताल नष्ट हो गए। कई लोग लापता हैं, मृतकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 27 जून से 3 अगस्त तक राज्य में अकेले बारिश के कारण हुए हादसों में 79 लोगों की मौत हो गई. 31 जुलाई की रात को शिमला के निरमंड, मलाणा, मंदिर पधर, रामपुर, हरपा बने कुल्लू में कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई। हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पिछले हफ्ते स्थानीय लोगों से मुलाकात की थी. लापता लोगों की तलाश के लिए बचाव अभियान जारी है।

दिल्ली ही नहीं, देश के एक राज्य में भी शनिवार को होने वाले मतदान की ‘नियति’ तय होगी. कांग्रेस नेता सुखविंदर सिंह सुक्खू हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रह पाएंगे या नहीं, इसका स्पष्ट संदेश छह विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में मिल जाएगा.

2022 के हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में वे सभी छह सीटें कांग्रेस के खाते में चली गईं। उस चुनाव में जीतने वाले छह पूर्व विधायक फिर से उन सीटों के लिए उम्मीदवार हैं। लेकिन कांग्रेस का नहीं, बीजेपी का टिकट! ये हैं रवि ठाकुर (लाहुल-स्पीति), राजेंद्र राणा (सुजानपुर), सुधीर शर्मा (धर्मशाला), इंद्रदत्त लक्ष्मणपाल (बड़सर), चैतन्य शर्मा (गगरेट) और देवेंद्र भुट्टो (कुटलेहा)।

संयोगवश, 29 फरवरी को हिमाचल विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने पार्टी व्हिप की अवज्ञा करने और मुख्यमंत्री सुखुर सरकार के बजट प्रस्ताव से संबंधित धन विधेयक के पक्ष में मतदान नहीं करने के लिए छह बागी कांग्रेस विधायकों को ‘दल-बदल विरोधी अधिनियम’ के तहत बर्खास्त कर दिया। .

इससे पहले 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव के दौरान उन छह कांग्रेस विधायकों ने बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के समर्थन में ‘क्रॉस वोटिंग’ की थी. उनके साथ-साथ सुक्खू सरकार के समर्थक तीन स्वतंत्र दलों ने भी बीजेपी को वोट दिया. क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए। 68 सदस्यीय विधानसभा में दोनों पार्टियों को 34-34 वोट मिले और विजेता का फैसला लॉटरी से हुआ।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त की पीठ ने छह निलंबित कांग्रेस विधायकों द्वारा हिमाचल विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने 18 मार्च को कहा था कि 1 जून को होने वाले चुनाव के साथ ही हिमाचल की चार लोकसभा सीटों पर भी उपचुनाव होंगे.

68 सीटों वाली हिमाचल विधानसभा में फिलहाल छह सीटें खाली हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास 34 विधायक हैं. विपक्षी खेमे में बीजेपी के 25 और उनके तीन सहयोगी दल निर्दलीय हैं. यानी अगर बीजेपी उपचुनाव में छह सीटें जीतती है तो दोनों पार्टियों के विधायकों की संख्या 34 हो जाएगी! ऐसे में मुख्यमंत्री सुक्खू का भविष्य अनिश्चित हो जायेगा.