Monday, March 16, 2026
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आखिर किस मिशन के लिए इसरो और नासा हुए एक?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इसरो और नासा किस मिशन के लिए एक हुए हैं! इसरो ने अमेरिका के साथ मिलकर स्पेस मिशन के लिए अपने अंतरिक्ष यात्री को चुना गया है। इसरो ने इंडो यूएस स्पेस मिशन के लिए ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को चुना है। शुक्ला मुख्य मिशन पायलट होंगे। वहीं, ग्रुप कैप्टन प्रशांत नायर बैकअप के रूप में काम करेंगे। भारतीय अंतरिक्ष यात्री एक अमेरिकी मिशन के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करेंगे। इसरो ने अमेरिकी एजेंसी के साथ अंतरिक्ष उड़ान समझौते (एसएफए) पर हस्ताक्षर किए हैं। जानते हैं आखिर ये समझौता क्या है। भारतीय अंतरिक्ष यात्री एक अमेरिकी मिशन के हिस्से के रूप में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करेंगे। इसरो ने वास्तव में एक्सिओम स्पेस के साथ एक अंतरिक्ष उड़ान समझौते (एसएफए) पर हस्ताक्षर किए हैं। एक्सिओम स्पेस नासा की तरफ से संबद्ध सर्विस प्रोवाइडर है। यह यह समझौता आई.एस.एस. के आगामी एक्सिओम-4 मिशन के लिए है। यह समझौता भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) भेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसरो के अनुसार नियुक्त चालक दल के सदस्यों को बहुपक्षीय चालक दल संचालन पैनल की तरफ से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर उड़ान भरने की मंजूरी दी जाएगी। यह स्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ता है, इसके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी रुचि पैदा करने की संभावना है। संभावित रूप से स्पेस एक्सप्लोरेशन में भविष्य के संयुक्त उपक्रमों का रास्ता खोलेगा।ये गगनयात्री अगस्त, 2024 के पहले सप्ताह से मिशन के लिए अपना प्रशिक्षण शुरू करेंगे। मिशन के दौरान ‘गगनयात्री’ आईएसएस पर साइंटिफिक रिसर्च और टेक्नोलॉजी प्रदर्शन प्रयोग करेंगे। इसके साथ ही अंतरिक्ष गतिविधियों में शामिल होंगे।

एक्सिओम-4 मिशन के तहत ही भारतीय अंतरिक्ष यात्री आईएसएस जाएंगे। यह नासा का चौथा निजी अंतरिक्ष यात्री मिशन है। इसे प्राइवेट अमेरिकी कंपनी एक्सिओम स्पेस मैनेज कर रही है। मिशन के तहत आईएसएस के साथ चौदह दिनों तक डॉक करने की उम्मीद है। पिछले साल जब एक्सिओम-4 मिशन की घोषणा की गई थी, तो नासा ने कहा था कि एक्स-4 चालक दल के सदस्य अपनी उड़ान के लिए नासा, अंतरराष्ट्रीय भागीदारों और स्पेसएक्स के साथ ट्रेनिंग करेंगे। एक्सिओम स्पेस ने स्पेसएक्स के साथ लॉन्च प्रोवाइड कराने के लिए कॉन्ट्रेक्ट किया है।नासा की वेबसाइट के अनुसार यह मिशन इस साल अगस्त से पहले संभव नहीं हो सकेगा। इसमें अंतरिक्ष स्टेशन से ट्रांसपोर्टेशन के लिए, और प्राइवेट अंतरिक्ष यात्रियों को ड्रैगन अंतरिक्ष यान के लिए सिस्टम, प्रक्रियाओं और आपातकालीन तैयारी से परिचित कराना शामिल है।

इसरो कहा कि मिशन के दौरान ‘गगनयात्री’ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर अंतरिक्ष गतिविधियों में शामिल होंगे। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि इस मिशन के दौरान प्राप्त अनुभव भारतीय मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए फायदेमंद होंगे। इससे इसरो और नासा के बीच मानव अंतरिक्ष उड़ान सहयोग भी मजबूत होगा। यह सहयोग भारत के स्पेस एक्सप्लोरेशन प्रयासों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ता है, इसके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी रुचि पैदा करने की संभावना है। संभावित रूप से स्पेस एक्सप्लोरेशन में भविष्य के संयुक्त उपक्रमों का रास्ता खोलेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने पिछले साल वाशिंगटन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक के बाद कहा था कि भारत और अमेरिका 2024 में एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजने के लिए सहयोग कर रहे हैं। पिछले साल ही नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान कहा था कि अंतरिक्ष एजेंसी 2024 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के मिशन के लिए एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को ट्रेनिंग देगी। बता दें कि इसरो के अनुसार नियुक्त चालक दल के सदस्यों को बहुपक्षीय चालक दल संचालन पैनल की तरफ से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर उड़ान भरने की मंजूरी दी जाएगी। ये गगनयात्री अगस्त, 2024 के पहले सप्ताह से मिशन के लिए अपना प्रशिक्षण शुरू करेंगे। एक्सिओम-4 मिशन के तहत ही भारतीय अंतरिक्ष यात्री आईएसएस जाएंगे। यह नासा का चौथा निजी अंतरिक्ष यात्री मिशन है। इसे प्राइवेट अमेरिकी कंपनी एक्सिओम स्पेस मैनेज कर रही है।मिशन के दौरान ‘गगनयात्री’ आईएसएस पर साइंटिफिक रिसर्च और टेक्नोलॉजी प्रदर्शन प्रयोग करेंगे। नासा की वेबसाइट के अनुसार यह मिशन इस साल अगस्त से पहले संभव नहीं हो सकेगा।

क्या देश में फिर से बढ़ रहे हैं डेंगू के मामले?

वर्तमान में देश में फिर से डेंगू के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं !देश में बढ़ रहे डेंगू के केस को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने शुक्रवार को डेंगू की स्थिति को लेकर उच्च स्तरीय बैठक की। इस बैठक में राज्यों को सलाह दी गई कि मॉनसून के इस सीजन में डेंगू से बचाव के साथ-साथ अस्पताल में तैयारियों में कोई कमी न हो। बारिश का मौसम आते ही डेंगू का खतरा बढ़ जाता है और ऐसे मे जरूरी है कि सभी जागरूक रहे। राज्यों के नगर निगमों को भी कहा गया है कि लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाएं और पानी का जमाव न हो, इस पर ध्यान दिया जाए। स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों को कहा है कि हॉट स्पॉट की खास निगरानी की जाए, जहां पर डेंगू के फैलने का ज्यादा खतरा होता है। अस्पतालों में डेंगू से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए विशेष बेड्स का इंतजाम हो। मॉनसून के मौसम से पहले एहतियाती कदम उठाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों की जरूरत है, जब डेंगू के मामले आमतौर पर अगस्त, सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के आसपास चरम पर होते हैं। बैठक में बताया गया कि पिछले चार वर्षों में साल दर साल मामले बढ़ रहे हैं। हालांकि डेंगू के मामले आमतौर पर अक्टूबर में चरम पर होते हैं लेकिन इस साल के रुझान से पता चलता है कि 31 जुलाई 2024 तक मामलों की संख्या पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में सतर्कता बरतने की बहुत जरूरत है।

दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, यूपी, पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के साथ- साथ विभिन्न राज्यों के नगर निगमों के अधिकारियों ने भी इस बैठक में हिस्सा लिया। अगस्त- सितंबर में डेंगू के काफी केस देखने को मिलते हैं और कई राज्यों में डेंगू के केस बढ़ भी रहे हैं। इस वर्ष पिछले साल की तुलना में डेंगू के मामलों में इजाफा देखा जा रहा है। एडीज मच्छर के काटने से डेंगू व चिकनगुनिया जैसी बीमारियां होती हैं। स्कूल के लिए भी राज्यों को एडवाइजरी भेजी जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि केंद्र सरकार ने जांच किट के लिए राज्यों को हर प्रकार की आवश्यक सहायता प्रदान की है और फॉगिंग तथा सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) कार्यों के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की है। स्वास्थ्य कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया गया है। केंद्रीय मंत्री ने राज्यों से कहा है कि केंद्र सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लें और लोगों को जागरूक करना होगा।

एडीज मच्छर के काटने से डेंगू व चिकनगुनिया जैसी बीमारियां होती हैं। स्कूल के लिए भी राज्यों को एडवाइजरी भेज रहे हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों की यूनिफॉर्म ऐसी हो, जिसमें उनका ज्यादातर तन ढका हो ताकि मच्छर न काट सकें। केंद्रीय अस्पतालों में विशेष वॉर्ड में 24 घंटे डॉक्टर रहे। एक सेंट्रल हेल्पलाइन शुरू करने को कहा गया है। राज्य भी अगले चार- पांच दिनों में हेल्पलाइन शुरू करें ताकि डेंगू के बारे में जानने या मदद की जरूरत हो, तो उस व्यक्ति को मदद मिल सके। बैठक में यह बताया गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय समेत सभी के सहयोग से डेंगू से होने वाली मौतों की संख्या में कमी आई है। स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने कहा कि 1996 में डेंगू से मृत्यु दर 3.3 प्रतिशत थी, जो 2023 में घटकर 0.17 प्रतिशत रह गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि केंद्र सरकार ने जांच किट के लिए राज्यों को हर प्रकार की आवश्यक सहायता प्रदान की है और फॉगिंग तथा सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) कार्यों के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की है। बता दें कि जब डेंगू के मामले आमतौर पर अगस्त, सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के आसपास चरम पर होते हैं। बैठक में बताया गया कि पिछले चार वर्षों में साल दर साल मामले बढ़ रहे हैं।

हालांकि डेंगू के मामले आमतौर पर अक्टूबर में चरम पर होते हैं लेकिन इस साल के रुझान से पता चलता है कि 31 जुलाई 2024 तक मामलों की संख्या पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में सतर्कता बरतने की बहुत जरूरत है।स्वास्थ्य कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया गया है। केंद्रीय मंत्री ने राज्यों से कहा है कि केंद्र सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लें और लोगों को जागरूक करना होगा। स्वास्थ्य कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया गया है। केंद्र सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लें और लोगों को जागरूक करना होगा।

आखिर कैसा है देश के मौसम का मिजाज ?

आज हम आपको बताएंगे कि देश के मौसम का मिजाज आखिर कैसा है! दिल्ली-NCR से लेकर यूपी बिहार तक में सावन झूमकर बरस रहा है। बीते कुछ दिनों से राजधानी में रोजाना हो रही बारिश से मौसम काफी सुहावना हो गया और उमस भी काफी कम हो गई है। वहीं अन्य राज्यों में भी बारिश ने गर्मी को मात दे दी है लेकिन पहाड़ों पर बारिश का विकराल रूप देखने को मिल रहा है। पहाड़ों पर बारिश लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है।बता दें कि हिमाचल प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड के भी लोगों का बारिश ने बुरा हाल कर दिया है। यहां पर मौसम कब पलटी मार जाए कोई नहीं बता सकता है। आज के लिए भी IMD ने उत्तरकाशी के जिलों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने देहरादून समेत चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और नैनीताल में येलो अलर्ट जारी किया है। हिमाचल प्रदेश में तो बादल फटने से काफी नुकसान हुआ है। वहीं उत्तराखंड में नदियां उफान पर हैं। आइए जानते हैं आज कैसा रहेगा देशभर का मौसम। दिल्ली में वीकेंड की शुरुआत बारिश के साथ होने वाली है।

मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार दिल्ली में आज बादल छाए रहेंगे जो गरजने के साथ बरस भी सकते हैं। बुधवार को हुई झमाझम बारिश की वजह से राजधानी का मौसम कूल-कूल हो गया है। ऐसे में दिल्लीवासियों के इस वीकेंड में उमस कोई दखल नहीं देगी। वहीं आज राजधानी का अधिकतम तापमान 34 डिग्री और न्यूनतम तापमान 26 डिग्री रहने की उम्मीद है। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले तीन-चार दिनों तक दिल्ली में रिमझिम बारिश होती रहेगी।

दिल्ली के साथ ही यूपी में भी बारिश का दौर चल पड़ा है लेकिन अच्छी बारिश के लिए उत्तर प्रदेश के लोगों को थोड़ा इंतजार करना पडे़गा। मौसम विभाग ने आज भी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में बारिश की संभावना जताई है। IMD ने आज यूपी के सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, संतरबिदासनगर व आसपास इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। वहीं बांदा, चित्रकूट, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, हापुर, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, कासगंज, एटा, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, बिजनौर, अमरोहा में बारिश के साथ ही बिजली गिरने की भी चेतावनी दी है।

हिमाचल प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड के भी लोगों का बारिश ने बुरा हाल कर दिया है। यहां पर मौसम कब पलटी मार जाए कोई नहीं बता सकता है। आज के लिए भी IMD ने उत्तरकाशी के जिलों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने देहरादून समेत चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और नैनीताल में येलो अलर्ट जारी किया है। बीते कुछ दिनों से उत्तराखंड के कई जिलों में भारी बारिश हो रही है।

बिहार में भी मॉनसून मेहरबान होता दिख रहा है। मौसम विभाग ने बिहार के नौ जिलों के लिए अगले 36 घंटे के दौरान आंधी और आकाशीय बिजली गिरने और भारी बारिश होने का ‘रेड अलर्ट’ जारी किया है। वहीं अरवल, बेगूसराय, भागलपुर, गया, जमुई, जहानाबाद, कैमूर, कटिहार, खगड़िया, लखीसराय, मुंगेर, नालंदा, नवादा, रोहतास और शेखपुरा जैसे जिलों के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ भी जारी किया। IMD के अनुसार अगले दो-तीन दिन में औरंगाबाद, बांका, भागलपुर, गया, जमुई, कटिहार, मुंगेर, नवादा और रोहतास जिलों में अलग-अलग स्थानों पर बादल गजरने के साथ बरस भी सकते हैं।

यही नहीं दिल्ली में दो दिनों से बारिश नहीं हो रही है लेकिन राजधानी में ठंड़ी हवाओं का जोर देखने को मिल रहा है। मौसम विभाग की मानें तो आज दिल्ली के कुछ इलाकों में बारिश पड़ सकती है। आज दिल्ली का अधिकतम तापमान 34 डिग्री और न्यूनतम तापमान 27 डिग्री रहने की संभावना है जो कल के तापमान से अधिक है। वहीं इस सप्ताह के अंत तक दिल्ली का अधिकतम तापमान गिरकर 31 डिग्री सेल्सियस पर आ सकता है। मैदानी ही नहीं पहाड़ी इलाकों में भी बारिश की वजह से लोग काफी परेशान हैं। मौसम विभाग ने उत्तराखंड में अगले 3-4 दिनों के लिए भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। IMD के अनुसार अगले चार-पांच दिन उत्तराखंड के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। इसके साथ ही राज्य के दो जिलों देहरादून और बागेश्वर में मंगलवार से भारी बारिश हो सकती है। वहीं उत्तरकाशी, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली, नैनीताल, पौड़ी और टिहरी में लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। IMD ने बारिश का अलर्ट जारी करते हुए लोगों से अपील की गई है कि वे फिलहाल पहाड़ों की यात्रा करने से बचें।

आखिर क्या है सुप्रीम कोर्ट में आया नया दूसरी पत्नि का पेंशन केस?

आज हम आपको सुप्रीम कोर्ट में आया नया दूसरी पत्नी का पेंशन केस के बारे में जानकारी देने वाले हैं ! सुप्रीम कोर्ट ने एक अनोखे मामले में दूसरी पत्नी को पेंशन देने का फैसला सुनाया है। मामला इसलिए भी खास है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई बार कह चुका है कि पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करना गैरकानूनी है। जस्टिस संजीव खन्ना, संजय कुमार और आर. महादेवन की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के एक कर्मचारी से जुड़ा है। कर्मचारी की मौत के बाद उसकी दूसरी पत्नी ने पेंशन के लिए अर्जी दी थी, जिसे कंपनी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह शादी गैरकानूनी थी। महिला ने इसके बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और लगभग 23 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा कि महिला की ‘पत्नी’ के रूप में स्थिति पर कोई विवाद नहीं है, सिवाय इसके कि उसने उस व्यक्ति से तब शादी की थी जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि तीनों एक साथ रहते थे। कोर्ट ने मामले के तथ्यों को बहुत ही असामान्य बताते हुए अपने स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए महिला को राहत दी।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि हम मानते हैं कि जय नारायण महाराज और राधा देवी, 20 अप्रैल 1984 को राम सवारी देवी (पहली पत्नी) की मौत के बाद एक-दूसरे के साथ रहे। एक-दूसरे की देखभाल की। राधा देवी को इस उम्र में ‘पत्नी का दर्जा’ देने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, जो उन्हें पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने का अधिकार देता है। यह उन्हें सम्मान के साथ जीने और आर्थिक रूप से हेल्प में सहयोग करेगा। ऐसी परिस्थितियों में, मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखते हुए और पूर्ण न्याय करने के लिए कोर्ट ने फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हैं और निर्देश देते हैं कि राधा देवी को पेंशन मिलेगी। 1 जनवरी 2010 से आज तक या 31 दिसंबर को या उससे पहले पारिवारिक पेंशन का भुगतान किया जाएगा। उन्हें अपनी मृत्यु तक पारिवारिक पेंशन मिलेगी। जय नारायण महाराज साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड में काम करते थे और 1983 में रिटायर हुए थे। उनकी पहली पत्नी का देहांत 1984 में हुआ था और 2001 में उनका निधन हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद, उनकी दूसरी पत्नी ने पेंशन के लिए आवेदन किया था, जिसे कंपनी ने खारिज कर दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी महिला को राहत देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राधा देवी को पेंशन देने का आदेश दिया है।

यही नहीं जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि शादी एक पवित्र बंधन है जिसके कानूनी पहलू और सामाजिक मान्यता होती है। हमारी संस्कृति में नैतिकता को बहुत महत्व दिया जाता है। लेकिन समय के साथ हम पश्चिमी सभ्यता को अपना रहे हैं जो कि हमारी संस्कृति से अलग है। भारत का एक वर्ग लिव-इन रिलेशनशिप को अपना रहा है। जस्टिस मौदगिल ने ये बात एक ऐसे मामले में कही जिसमें एक लिव-इन कपल ने सुरक्षा की मांग की थी।इस मामले में एक 40 साल से ज़्यादा उम्र की महिला और 44 साल से ज़्यादा उम्र के पुरुष ने याचिका दायर की थी। दोनों ने अपने परिवार वालों से जान का खतरा बताया था। दोनों ने कोर्ट से सुरक्षा की मांग करते हुए कहा था कि परिवार वाले उनके रिश्ते में दखल न दें। इस मामले में महिला का पहले से तलाक हो चुका है जबकि पुरुष शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं। दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं और लिव-इन में रहना चाहते हैं।

कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि हर लिव-इन रिलेशनशिप को शादी नहीं माना जा सकता। सिवाय इसके कि उसने उस व्यक्ति से तब शादी की थी जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि तीनों एक साथ रहते थे। कोर्ट ने मामले के तथ्यों को बहुत ही असामान्य बताते हुए अपने स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए महिला को राहत दी।दोनों का रिश्ता शादी की तरह नहीं है क्योंकि इसमें शादी जैसे गुण नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर इस रिश्ते को शादी माना गया तो ये उस पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय होगा जो इस रिश्ते के खिलाफ हैं।

आखिर बारिश के चलते क्यों हो रही है प्रशासन की लापरवाही?

वर्तमान में बारिश के चलते प्रशासन की लापरवाही देखी जा सकती है! राजधानी दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में पिछले हफ्ते एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में डूबने से 3 छात्रों की मौत हो गई। ये मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ कि विश्वस्तरीय दिल्ली में बारिश के पानी में डूबने से 2 और मौतें हो गईं। बुधवार को मूसलाधार बारिश के बाद दिल्ली की सड़कें दरिया का रूप ले लीं। गाजीपुर इलाके में भारी जलजमाव में डूबने से 22 साल की एक महिला और उसके 3 साल के बेटे की मौत हो गई। ये हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है। गुरुवार को राजस्थान की राजधानी जयपुर में भारी बारिश के बाद बेसमेंट में डूबने से 3 लोगों की मौत हो गई।

देहरादून में आर्मी से रिटायर्ड शख्स समेत 2 की डूबने से मौत हो गई। दिल्ली से सटे गुरुग्राम में राह चलते करंट लगने से 3 जिंदगियां खत्म हो गईं। सोचकर देखिए कि दुनिया की उभरती महाशक्तियों में खुद को गिन रहा देश, दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाला देश, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश, विश्वगुरु बनने का सपना देखने वाला देश, 2047 तक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने को लालायित देश…और उसकी राजधानी में मौसमी बरसात के पानी में डूबने से जिंदगियां चली जा रही हैं।डिसिल्टिंग के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं लेकिन अक्सर काम सिर्फ कागजों में होता है। बारिश के पानी की निकासी के लिए बनने वालीं स्टॉर्म वॉटर ड्रेन मिट्टी, कूड़े और कचरे से चोक रहती हैं। ऊपर से स्टॉर्म वॉटर ड्रेन से ही सीवेज लाइन को भी कनेक्ट कर दिया जाता है, इससे समस्या और बढ़ती है। बाकी शहरों का भी वही हाल है। जरा सी बारिश क्या हुई, सड़कें तालाब बन जाती हैं। सड़कें दरिया बन जाती हैं। स्विमिंग पूल बन जाती हैं।मौत का ट्रैप बन जाती हैं। क्या पता पानी के नीचे कोई मेनहोल खुला हो जिसमें राह चलता शख्स समा जाए। क्या पता पानी के भीतर तारों के मकड़जाल से निकलकर छिपा हुआ कोई तार मौत बनकर इंतजार कर रहा हो। कुछ भी हो सकता है। हो सकता क्या है, हो रहा है।

आखिर जरा सी बारिश में हमारे शहर घंटों तक तालाब में क्यों तब्दील हो जाते हैं? इसके लिए दोषी सरकारें तो हैं ही, हम भी कम नहीं हैं। अतिक्रमण की वजह से नालियां तक पाट दी जाती हैं। चोक कर दी जाती हैं। बढ़ते शहरीकरण की अंधी दौड़ में कुकुरमुत्तों की तरह नई-नई अवैध कॉलोनियां उग जाती हैं। अनियमित कॉलोनियां। जहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। अवैध कॉलोनियां बसती भी तो ऐसे हैं। न सड़क, न नाली। वोट बैंक की वजह से सियासी चुप्पी और नौकरशाही के करप्शन या फिर लापरवाही की वजह से ऐसी कॉलोनियां उगती ही जाती हैं।

दुनिया की बड़ी ताकतों में शुमार होने का दम भरने वाला देश अपने शहरों में प्रॉपर ड्रेनेज सिस्टम तक नहीं बना पा रहा। शहरों से पानी ड्रेनेज लाइन के जरिये नदियों तक छोड़ा जाता है। लेकिन आम तौर पर ड्रेनेज सिस्टम ब्लॉक रहते हैं। मॉनसून से पहले गाद नहीं निकलता। डिसिल्टिंग के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाते हैं लेकिन अक्सर काम सिर्फ कागजों में होता है। बारिश के पानी की निकासी के लिए बनने वालीं स्टॉर्म वॉटर ड्रेन मिट्टी, कूड़े और कचरे से चोक रहती हैं। ऊपर से स्टॉर्म वॉटर ड्रेन से ही सीवेज लाइन को भी कनेक्ट कर दिया जाता है, इससे समस्या और बढ़ती है।

भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। शहरों पर लोड बढ़ रहा लेकिन उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर उस लोड को सहने लायक नहीं रहते। बता दें कि सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाला देश, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश, विश्वगुरु बनने का सपना देखने वाला देश, 2047 तक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने को लालायित देश…और उसकी राजधानी में मौसमी बरसात के पानी में डूबने से जिंदगियां चली जा रही हैं। यही नहीं मौत का ट्रैप बन जाती हैं। क्या पता पानी के नीचे कोई मेनहोल खुला हो जिसमें राह चलता शख्स समा जाए। क्या पता पानी के भीतर तारों के मकड़जाल से निकलकर छिपा हुआ कोई तार मौत बनकर इंतजार कर रहा हो। कुछ भी हो सकता है। इन्हीं सबका नतीजा है जरा सी बारिश से सड़कों पर सैलाब और उनमें दम तोड़तीं जिंदगियां। आखिर कब जागेंगे हम? एक देश के तौर पर। एक समाज के तौर पर। एक व्यक्ति के तौर पर। आखिर कब जागेंगे हम?

जानिए कहानी क्रांतिकारी वीर राव तुलाराम की!

आज हम आपको क्रांतिकारी वीर राव तुलाराम की कहानी सुनाने जा रहे हैं! इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट से नई दिल्ली की तरफ आने पर पड़ता है राव तुला राम मार्ग। इस नाम पर बस सड़क ही नहीं, फ्लाईओवर, अस्पताल, कॉलेज और इमारतें भी हैं। राव तुला राम वह क्रांतिकारी हीरो हैं, जिन्होंने देश की आजादी के पहले संग्राम में अहम रोल अदा किया। उनका जन्म रेवाड़ी के रामपुरा में हुआ था, 9 दिसंबर 1825 को। तब रेवाड़ी को अहिरवाल का लंदन भी कहा जाता था, जहां राव तुला राम के पिता राव पूर्ण सिंह का राज था। उनकी रियासत आज के दक्षिण हरियाणा में फैली थी, जिसमें करीब 87 गांव थे। राव तुला राम महज 14 साल के थे जब उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें सिंहासन संभालना पड़ा। लेकिन अंग्रेजों की नजर भी गद्दी पर थी और उन्होंने धीरे-धीरे आधी रियासत पर कब्जा जमा लिया। अपनी जमीन वापस पाने के लिए राव तुला राम ने सेना तैयार करनी शुरू कर दी।

इस बीच 1857 की क्रांति भड़क गई। राव तुला राम और उनके चचेरे भाई गोपाल देव ने अहिरवाल का नेतृत्व संभाल लिया। राव तुला राम को दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर का भी साथ मिला। उन्होंने हरियाणा में अंग्रेजों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी। 17 मई 1857 को राव तुला राम 400 से 500 लोगों के साथ रेवाड़ी की तहसील पहुंचे और सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया। काबुल में उनका शाही सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। रामपुरा गांव में आज भी उनके वंशज रहते हैं।अपना हेडक्वॉर्टर बनाने के लिए उन्होंने रामपुरा गांव को चुना। उन्होंने रेवाड़ी के लोगों से दान और कर्ज लेकर पांच हजार लोगों की सेना तैयार कर ली। 2 अक्टूबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोवर्स को राव तुला राम को हराने के लिए भेजा गया।

राव तुला राम को अंदाजा हो गया था कि रामपुरा के मिट्टी के किले में ब्रिटिश सेना को रोक पाना मुमकिन नहीं। कमांडर जेरार्ड समेत कई अफसर मारे गए। हालात बिगड़ते देख कार्यवाहक ब्रिटिश कमांडेंट मेजर कॉलफील्ड ने तोपखाने से बमबारी करने का हुक्म दे दिया। राव तुला राम के सैनिक बहादुरी से डटे रहे, मगर उनकी हार हुई। लेकिन वह वहां से निकलने में कामयाब रहे।इसलिए उन्होंने किला छोड़ दिया। शोवर्स ने राव तुला राम के पास पैगाम भेजा कि अगर वह सरेंडर कर दें तो उनके साथ बेहतर सलूक किया जाएगा। राव तुला राम ने यह ऑफर ठुकरा दिया और आजादी की शर्त सामने रखी। इस बात से गुस्साए अंग्रेजों ने 10 नवंबर 1857 को एक और बड़ी सेना भेज दी। इस बार जबरदस्त तोपखाने के साथ कर्नल जेरार्ड को कमान सौंपी गई।

कर्नल जेरार्ड की सेना नारनौल की तरफ बढ़ रही थी। रास्ता रेतीला था। अंग्रेजी सेना नसीबपुर के मैदान के पास पहुंची थी, तभी राव तुला राम की सेना ने हमला बोल दिया। अंग्रेजी सेना के छक्के छूट गए। कमांडर जेरार्ड समेत कई अफसर मारे गए। हालात बिगड़ते देख कार्यवाहक ब्रिटिश कमांडेंट मेजर कॉलफील्ड ने तोपखाने से बमबारी करने का हुक्म दे दिया। राव तुला राम के सैनिक बहादुरी से डटे रहे, मगर उनकी हार हुई। लेकिन वह वहां से निकलने में कामयाब रहे।

जख्मी राव तुला राम पहले राजस्थान पहुंचे, जहां इलाज कराने के बाद वह तात्या टोपे की सेना में शामिल हो गए। तात्या टोपे की सेना की भी जब हार हुई, तो वह पहले ईरान गए और फिर अफगानिस्तान। बता दें कि जिसमें करीब 87 गांव थे। राव तुला राम महज 14 साल के थे जब उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें सिंहासन संभालना पड़ा। लेकिन अंग्रेजों की नजर भी गद्दी पर थी और उन्होंने धीरे-धीरे आधी रियासत पर कब्जा जमा लिया। अपनी जमीन वापस पाने के लिए राव तुला राम ने सेना तैयार करनी शुरू कर दी। वहां उन्होंने भारत की आजादी के लिए मदद मांगी। अफगानिस्तान के शासक को उन्होंने मदद के लिए तैयार भी कर लिया था, लेकिन डिसेंट्री (पेचिश) की वजह से इतनी तबीयत बिगड़ी कि 23 सितंबर 1863 को काबुल में ही राव तुला राम का निधन हो गया। राव तुला राम को अंदाजा हो गया था कि रामपुरा के मिट्टी के किले में ब्रिटिश सेना को रोक पाना मुमकिन नहीं। कमांडर जेरार्ड समेत कई अफसर मारे गए। हालात बिगड़ते देख कार्यवाहक ब्रिटिश कमांडेंट मेजर कॉलफील्ड ने तोपखाने से बमबारी करने का हुक्म दे दिया।काबुल में उनका शाही सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। रामपुरा गांव में आज भी उनके वंशज रहते हैं।

क्या हवाई जहाज पर नहीं होता है बिजली गिरने का असर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हवाई जहाज पर बिजली गिरने का असर नहीं होता है! बिहार में हाल ही में आसमानी बिजली गिरने से कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई है। कहीं पशुपालक तो कहीं किसान ने जान गंवाई है। बिजली की चपेट में आने से आरा में 3, जहानाबाद में 4, रोहतास में 3, औरंगाबाद में 4 और गया में 1 व्यक्ति की जान चली गई। मरने वालों में बच्चे और महिलाएं भी हैं। बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में बिजली गिरने की घटनाएं हाल के दिनों में बढ़ी हैं। बीते जून से लेकर जुलाई के दौरान देश भर में बिजली की चपेट में आने से कम से 150 से ज्यादा लोगों की मौत की रिपोर्ट दर्ज की गई हैं। भारी बारिश के दौरान आसमानी बिजली आफत बनकर टूटती है, जिसमें फसलें और पेड़-पौधे नष्ट हो जाते हैं। वहीं, कई इंसानों की जान तक चली जाती है। आइए- समझते हैं कि क्या है आसमानी बिजली, यह कितनी घातक है। एक रिपोर्ट के अनुसार, एक आसमानी बिजली में औसतन 10,000 वोल्ट जितना करंट होता है। वहीं, एक बिजली का तापमान 54 हजार डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंच सकता है। यानी यह हमारे सूर्य के सतह के तापमान से 5 गुना ज्यादा गर्म हो सकता है। आमतौर पर आसमानी बिजली की रफ्तार गोली से 30 हजार गुना तेज होती है। ब्रिटेन की वेबसाइट मेट ऑफिस के अनुसार, दुनिया में हर साल 140 करोड़ बिजली आसमान से गिरती है। यानी 1 दिन में औसतन 30 लाख बिजली धरती पर गिरती है। बिजली गिरने की रफ्तार इतनी तेज होती है कि यह चंद्रमा पर 55 मिनट में पहुंच सकती है। यानी दिल्ली से देहरादून तक जाने में इसे महज 1.5 सेकेंड ही लगेंगे।

लंदन स्थित मौसम विभाग की एक स्टडी के अनुसार, दुनियाभर में हेलीकॉप्टरों की वजह से भी काफी बिजली गिरती है। दरअसल, आसमान में उड़ते वक्त हेलीकॉप्टर निगेटिव चार्जेज को सोखते हैं। ऐसे में अगर ये हेलीकॉप्टर ऐसे इलाकों से गुजरते हैं जहां बादल पॉजिटिव रूप से चार्ज हों तो वहां पर आसमानी बिजली गिरने की आशंका बढ़ जाती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सना रहमान के अनुसार, आकाशीय बिजली को अक्सर साइलेंट किलर भी कहा जाता है। क्योंकि इससे हर साल होने वाली मौतें लू, बाढ़, भूस्खलन और चक्रवात से भी ज्यादा हैं। इसके बाद भी इस बारे में ज्यादा चर्चा नहीं होती और न ही यह अखबारों या न्यूज चैनलों की सुर्खियां बन पाती है। चूंकि, बिजली गिरने का समय और जगह अलग-अलग होती है, ऐसे में शायद इसे प्राकृतिक आपदा भी नहीं माना जाता है।

हमारी धरती के वायुमंडल में जब विद्युत आवेश डिस्चार्ज होता है तो उससे पैदा हुई गड़गड़ाहट यानी थंडरिंग को गाज या आसमानी बिजली कहते हैं। दुनिया में हर साल 140 करोड़ आसमानी बिजली पैदा होती है। इसे सबसे पहले 1872 में वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने पहचाना था, जिन्होंने पहली बार बिजली चमकने की सटीक वजह बताई थी। उन्होंने बताया कि आकाश में बादल छाने के दौरान उसमें मौजूद पानी की छोटी-छोटी बूंदों में मौजूद कण हवा की रगड़ से चार्ज हो जाते हैं। कुछ बादलों पर पॉजिटिव तो कुछ पर निगेटिव चार्ज आ जाता है। जब ये दोनों तरह के चार्ज वाले बादल मिलते हैं तो उनके मिलने से लाखों वोल्ट की बिजली पैदा होती है। एक बिजली में 10 हजार वोल्ट जितना करंट पैदा होता है।

आसमानी बिजली से एक बार 1.60 लाख ब्रेड सेंकी जा सकती है। अगर ग्लोबल वॉर्मिंग पर लगाम समय रहते नहीं लगाई गई तो साल 2100 में आज के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा बिजली गिरने की आशंका रह सकती है। आसमान में उड़ने वाले प्लेन पर भी बिजली गिरती है, मगर इन पर इसका असर नहीं होता है। दरअसल, 1963 के बाद हवाई जहाजों पर बिजली गिरने से कोई हादसा नहीं हुआ है, क्योंकि अब प्लेन को खास तरीके से डिजाइन किया जाता है, जिससे बिजली इसे नहीं छूती है। ज्यादातर प्लेन एल्युमिनियम के बने होते हैं जो बिजली को प्लेन के बाहरी हिस्से पर चारों ओर फैला देते हैं और अंदर नहीं जाने देते हैं। प्लेन की ईंधन टंकी को भी बिजली के खतरनाक प्रवाह से गुजार दिया जाता है, ताकि किसी तरह की विस्फोट की आशंका न रहे।

छत्तीसगढ़ शासन के लाइटनिंग मैनेजमेंट मैगजीन के अनुसार, बिजली गिरने की सबसे ज्यादा आशंका दोपहर में होती है। यह इंसान के सिर, गले और कंधे पर सबसे ज्यादा असर करती है। इसमें एक्सरे होती है। आसमान से गिरने वाली बिजली करीब 5 किलोमीटर तक लंबी हो सकती है। बिजली की रफ्तार ध्वनि से कई गुना तेज होती है। यही वजह है कि हमें गिरती हुई बिजली पहले दिखाई देती है और उसकी गड़गड़ाहट बाद में सुनाई देती है। अगर बारिश न हो रही हो और बादल भी न हो, तो भी आप बिजली से सुरक्षित नहीं है, क्योंकि बिजली तूफान के सेंटर से 3 मील दूर तक गिर सकती है।

आरक्षण के लिए क्या बोले सुप्रीम कोर्ट के जज?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने आरक्षण के लिए एक बयान दे दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जजों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से एससी-एसटी में कोटे के अंदर कोटे को मंजूरी दे दी है। यानी एससी-एसटी कोटे में उप-वर्गीकरण (सब कैटेगरी) किया जा सकता है। सात जजों की संविधान पीठ ने ईवी चिन्नैया के 2004 के फैसले को पलट दिया। उस फैसले में अनुसूचित जातियों के भीतर कुछ उप-जातियों को विशेष लाभ देने से इनकार किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पंकज मिथल ने कहा कि आरक्षण किसी वर्ग की पहली पीढ़ी के लिए ही होना चाहिए। जस्टिस मिथल ने आरक्षण की समय-समय पर समीक्षा करने का आह्वान किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या दूसरी पीढ़ी सामान्य वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। जस्टिस मिथल से स्पष्ट रूप से कहा कि आरक्षण किसी वर्ग में केवल पहली पीढ़ी के लिए होना चाहिए। यदि दूसरी पीढ़ी आ गई है तो आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। साथ ही राज्य को यह देखना चाहिए कि आरक्षण के बाद दूसरी पीढ़ी सामान्य वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आई है या नहीं। इस मामले में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र मिश्रा शामिल थे।

ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्थापित हो चुका है कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जाति एक ‘विषम वर्ग है, न कि समरूप’। एससी एसटी समुदाय के लोग अक्सर व्यवस्थागत भेदभाव के कारण सीढ़ी चढ़ने में सक्षम नहीं होते हैं। अनुच्छेद 14 जाति के उप वर्गीकरण की अनुमति देता है। कोर्ट को यह जांच करनी चाहिए कि क्या वर्ग समरूप है और किसी उद्देश्य के लिए एकीकृत नहीं किए गए वर्ग को आगे वर्गीकृत किया जा सकता है, राज्यों को एससी और एसटी में ‘क्रीमी लेयर’ की पहचान करनी चाहिए और उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करना चाहिए। अनुसूचित जातियों में से कुछ को होने वाली कठिनाइयों और पिछड़ेपन का सामना प्रत्येक जाति द्वारा अलग-अलग तरीके से किया जाता है। ईवी चिन्नैया का फैसला गलत है। यह तर्क दिया गया कि कोई पार्टी राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए किसी उप जाति को आरक्षण दे सकती है, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। अंतिम उद्देश्य वास्तविक समानता का एहसास करना होगा। जैसा कि न्यायिक घोषणाओं में माना गया है।, इसे अनुभवजन्य डेटा द्वारा समर्थित होना चाहिए। जब कोई व्यक्ति किसी डिब्बे में चढ़ता है, तो वह दूसरों को उस डिब्बे में चढ़ने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश करता है। केवल सामाजिक न्याय के कारण उन्हें लाभ मिला है, लेकिन जब राज्य उन लोगों को लाभ देने का फैसला करता है जिनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। मैंने 1949 में डॉ. अंबेडकर के भाषण का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक हमारे पास सामाजिक लोकतंत्र नहीं होगा, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र का कोई फायदा नहीं है।

राज्य संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित अनुसूचित जाति सूची के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते। राज्यों की सकारात्मक कार्यवाही संविधान के दायरे के भीतर होनी चाहिए। आरक्षण प्रदान करने के राज्य के नेक इरादों से उठाए कदम को भी अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट द्वारा उचित नहीं ठहराया जा सकता है। मैं बहुमत के फैसले से सम्मानपूर्वक असहमत हूं। इस मामले में, बिना किसी कारण के ईवी चिन्नैया पर पुनर्विचार करने का संदर्भ दिया गया और वह भी फैसले के 15 साल बाद। संदर्भ ही अपने आप में गलत था। विधायी शक्ति के अभाव में, राज्यों के पास जातियों को उप-वर्गीकृत करने और अनुसूचित जाति के सभी लोगों के लिए आरक्षित लाभों को उप-वर्गीकृत करने की कोई क्षमता नहीं है।

शीर्ष अदालत ‘ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ मामले में 2004 के पांच-जजों की संविधान पीठ के फैसले पर फिर से विचार करने के संदर्भ में सुनवाई कर रही थी। इसमें यह कहा गया था कि एससी और एसटी सजातीय समूह हैं। फैसले के मुताबिक, इसलिए, राज्य इन समूहों में अधिक वंचित और कमजोर जातियों को कोटा के अंदर कोटा देने के लिए एससी और एसटी के अंदर वर्गीकरण पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं। शीर्ष अदालत ने 2004 में फैसला सुनाया था कि सदियों से बहिष्कार, भेदभाव और अपमान झेलने वाले एससी समुदाय सजातीय वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनका उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। अब सुप्रीम ने इस फैसले को पलट दिया है। पीठ 23 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इनमें से मुख्य याचिका पंजाब सरकार ने दायर की थी। याचिका में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले को चुनौती दी गई थी।

क्या मोदी सरकार पर उठ गया है मिडिल क्लास का भरोसा ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार का मिडिल क्लास पर भरोसा उठ गया है या नहीं! मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में अब मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ अधिक पड़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में देश को अमृत काल की ओर ले जाने का वादा किया था, लेकिन पिछले हफ्ते मोदी सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए इस वादे को किनारे करते हुए मिडिल क्लास पर टैक्स का बोझ बढ़ा दिया है। मोदी सरकार ने शेयर बाजार में निवेश, प्रॉपर्टी की बिक्री पर टैक्स नियमों में बदलाव किए हैं, जिससे मिडिल क्लास के हाथों में कम पैसे बचेंगे। वहीं अमीरों पर बोझ लग्जरी सामानों पर ज्यादा टैक्स लगाकर किया गया है लेकिन वे दुबई और सिंगापुर से खरीदारी करके इसे आसानी से टाल सकते हैं। मोदी सरकार का कहना है कि इन बदलावों का मकसद टैक्स सिस्टम को आसान बनाना है, लेकिन मिडिल क्लास को लग रहा है कि उन पर टैक्स का बोझ और बढ़ा दिया गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले बजट भाषण में अमृत काल शब्द का इस्तेमाल तक नहीं किया, जबकि पिछले दो सालों में उन्होंने अपने भाषणों में कई बार इस शब्द का इस्तेमाल किया था। शायद यह सही ही था क्योंकि अब मोदी सरकार को संसद में पहले जैसा बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में मोदी का वादा अब सपना नहीं, बल्कि एक चुनौती बन गया है। समृद्धि का स्वर्णिम दौर तो अपने आप आ जाएगा, लेकिन फिलहाल मिडिल क्लास, जो प्रधानमंत्री के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है, उन्हें ज्यादा टैक्स चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।

कोरोना महामारी के बाद से शेयर बाजार में निवेश एक राष्ट्रीय जुनून बन गया है। अब इस पर ज्यादा सख्ती से टैक्स लगाया जाएगा। यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब सरकार लंबे समय के निवेश पर भी मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में लेगी, जिसमें बायबैक से होने वाला मुनाफा भी शामिल है। इसके साथ ही, प्रॉपर्टी की बिक्री पर महंगाई के मुकाबले इंडेक्सेशन बेनिफिट को भी खत्म कर दिया गया है, जिससे लोगों को कम टैक्सेबल प्रॉफिट दिखाने का मौका मिलता था। हालांकि, कैपिटल गेन टैक्स को 20% से घटाकर 12.5% कर दिया गया है। लेकिन यह राहत ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ज्यादातर बड़े शहरों में, जो लोग एक या दो दशक पहले खरीदी गई प्रॉपर्टी को बेचने की योजना बना रहे हैं, उन्हें टैक्स चुकाने के बाद उम्मीद से कम पैसे मिलेंगे। उनके लिए कम से कम इतना तो किया जा सकता था कि 2019 से पहले होने वाले कैपिटल गेन को टैक्स फ्री कर दिया जाता।

1988 में ब्रिटेन ने भी ऐसा ही तरीका अपनाया था। उनका मानना था कि काम और संपत्ति से होने वाली आय पर समान रूप से टैक्स लगना चाहिए। सरकार का कहना है कि उसका मकसद टैक्स सिस्टम को आसान बनाना है, न कि ज्यादा राजस्व कमाना। लेकिन संपत्ति रखने वाले लोग इन बदलावों को इसी नजरिए से देख रहे हैं। तथाकथित ‘ऑक्टोपस क्लास’ यानी लगभग 10 लाख सुपर-एलीट खर्च करने वालों के लिए 10 लाख रुपये से ज्यादा कीमत वाले हैंडबैग, घड़ियों और अन्य लग्जरी सामानों पर विदहोल्डिंग टैक्स लगेगा। यह 18% से 28% के माल और सेवा कर (जीएसटी) के अलावा होगा। हालांकि, अमीर लोग अपनी जरूरत का सामान खरीदने के लिए दुबई और सिंगापुर जा सकते हैं।

इस साल के टैक्स कोड में हुए बदलावों से मिडिल क्लास काफी परेशान है। कुल कर राजस्व में व्यक्तिगत कर का योगदान पहले ही 30% है, जो कंपनियों द्वारा दिए गए 26% से ज्यादा है। भारत में 10 में से 8 काम करने वालों को नियमित वेतन नहीं मिलता है। जो लोग नौकरी करते हैं, उनमें से 10% से भी कम लोग 50,000 रुपये प्रति माह से ज्यादा कमाते हैं। मोदी उन लोगों से और कितना पैसा वसूलना चाहते हैं, जो अमृत काल पर विश्वास करते हुए महंगाई के बीच गुजारा करने के लिए कर्ज में डूबते जा रहे हैं। क्रेडिट कार्ड और अन्य असुरक्षित कर्ज सहित खुदरा कर्ज अब उद्योगों को वर्किंग कैपिटल या विस्तार के लिए दिए जाने वाले बैंक कर्ज से 1.5 गुना ज्यादा है। इस बीच, कंपनियों के लिए कम कर व्यवस्था नए निवेश को प्रोत्साहित नहीं कर रही है। 2019 में दी गई एक बड़ी छूट, जिसकी कीमत सरकारी खजाने को 100 अरब डॉलर पड़ी, ने कॉर्पोरेट मुनाफे को तो बढ़ाया है, लेकिन इससे रोजगार सृजन में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

2020 में, केंद्र सरकार ने निर्माताओं के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहनों के रूप में और 24 अरब डॉलर की पेशकश की थी। लेकिन इससे अब तक केवल 8,50,000 नौकरियां ही पैदा हुई हैं। जबकि भारत को हर साल 80 लाख नौकरियों की जरूरत है। हालिया केंद्रीय बजट में, सरकार ने नौकरियों और इंटर्नशिप के लिए 24 अरब डॉलर की पेशकश की, जिसमें आखिरकार उस रोजगार संकट को स्वीकार किया गया, जिसने मोदी के वोटों में सेंध लगाई। 2014 और 2019 में, गरीबों की तुलना में अमीर और मध्यम वर्ग के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने मोदी का समर्थन किया था। मोदी के अमीर समर्थकों को उस समय कोई दिक्कत नहीं हुई, जब उन्होंने 2016 में देश की 86% नकदी पर रातोंरात प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ महीनों बाद जीएसटी जिस तरीके से लागू किया उससे छोटी कंपनियां उत्पादन नेटवर्क से बाहर हो गईं।

2020 में कोरोना महामारी के दौरान लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं। इस आपदा में भी मिडिल क्लास पर तगड़ी मार पड़ी। इन सबके बावजूद मिडिल क्लास ने मोदी के पक्ष में वोट किया। कुछ महीने पहले चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री विपक्ष पर मुस्लिमों के बीच पुनर्वितरण के लिए निजी संपत्ति को छीनने की साजिश रचने का आरोप लगा रहे थे। अब वह क्या कर रहे हैं और उनके फैन क्लब को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है – चाहे अमृत काल आए या न आए।

क्या प्रधानमंत्री पर चन्नी की शिकायत का पड़ेगा कोई प्रभाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि प्रधानमंत्री पर चन्नी की शिकायत का क्या प्रभाव पड़ेगा! पंजाब के जालंधर से कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत की है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को चिट्टी लिखकर अपील की है कि वो प्रधानमंत्री के खिलाफ सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की अनुमति दें। चन्नी का कहना है कि केंद्रीय मंत्री और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर के भाषण की कुछ बातें लोकसभा की कार्यवाही से हटा दी गई थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने हटाए गए शब्दों को भी अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर साझा किया है। कांग्रेस सांसद ने संसदीय कार्यवाही के नियमों का हवाला देकर कहा है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा करके विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है। तो सवाल है कि अब आगे क्या होगा? दरअसल, लोकसभा की कार्यवाही की नियम पुस्तिका में एक अध्याय विशेषाधिकार प्रस्ताव से संबंधित है। रूलबुक में वर्णित नियम संख्या 222 में कहा गया है, ‘कोई भी सदस्य, लोकसभा अध्यक्ष की सहमति से किसी दूसरे सदस्य या लोकसभा या किसी समिति के खिलाफ विशेषाधिकार उल्लंघन का प्रस्ताव ला सकता है।’ नियम 225(1) में कहा गया है कि अगर लोकसभा अध्यक्ष नियम 222 के तहत विशेषाधिकार प्रस्ताव के नोटिस से सहमत होते हैं तो वो सदन की कार्यवाही के दौरान नोटिस देने वाले सदस्य को प्रस्ताव लाने की अनुमति दे सकते हैं। उनके कहने पर नोटिस देने वाला सदस्य अपनी सीट पर खड़ा होकर प्रस्ताव के बारे में संक्षिप्त बयान दे सकता है। लेकिन अगर लोकसभा अध्यक्ष ने नोटिस को अस्वीकार कर दिया और प्रस्ताव से सहमति नहीं जताई तो वो सदन में अपने आसन से अपना फैसला सुना सकते हैं।समिति अपनी रिपोर्ट में यह भी बता सकती है कि उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाए। ऐसा करते वक्त वो सदस्य का दिया नोटिस पढ़ सकते हैं और आखिर में यह बता सकते हैं कि इसे ठुकरा दिया गया है।

मान लीजिए कि अगर लोकसभा स्पीकर चरणजीत सिंह चन्नी का नोटिस स्वीकार कर लेते हैं और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की अनुमति देते हैं तो क्या होगा? नियम 225(1) कहता है कि लोकसभा अध्यक्ष नोटिस में कही गई बातों से सहमत होते हैं तो वो किसी भी वक्त प्रस्ताव लाने की अनुमति दे सकते हैं। नियम 225(2) कहता है कि अगर अनमुति दी जाने पर आपत्ति की जाए तो अध्यक्ष अनुमति दिए जान के पक्ष वाले सदस्यों को अपनी सीट पर खड़े होने को कह सकते हैं। अगर ऐसे सदस्यों की संख्या कम से कम 25 हुई तो अध्यक्ष कहेंगे कि प्रस्ताव लाने की अनुमति है। अगर 25 से कम सदस्य खड़े हुए तो अध्यक्ष सदन को बताएंगे कि प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। अब नियम 226 कहता है कि अगर प्रस्ताव लाने की अनुमति मिल गई तो लोकसभा में प्रस्ताव पर विचार होगा और तय होगा कि आरोपों की जांच के लिए प्रस्ताव को विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जाए।

विशेषाधिकार समिति का एक चेयरपर्सन और 14 सदस्य होते हैं। अगर विशेषाधिकार समिति के पास चरणजीत सिंह चन्नी के प्रस्ताव के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आरोप की जांच की मांग पहुंचती है तो समिति का दायित्व है कि वह जांच करे और अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे। समिति रिपोर्ट में न केवल यह बताएगी कि चरणजीत सिंह चन्नी का आरोप सही है या गलत बल्कि यह भी बताएगी कि अगर आरोप सही है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए। समिति अपनी रिपोर्ट में यह भी बता सकती है कि उसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाए।

दरअसल, प्रधानमंत्री भी लोकसभा के एक सदस्य होते हैं। नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से चुनकर आए हैं। प्रधानमंत्री लोकसभा में सदन के नेता होते हैं। प्रधानमंत्री भी लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमों से बंधे हैं। उनके कहने पर नोटिस देने वाला सदस्य अपनी सीट पर खड़ा होकर प्रस्ताव के बारे में संक्षिप्त बयान दे सकता है। लेकिन अगर लोकसभा अध्यक्ष ने नोटिस को अस्वीकार कर दिया और प्रस्ताव से सहमति नहीं जताई तो वो सदन में अपने आसन से अपना फैसला सुना सकते हैं।सदन के नेता की हैसियत से उन्हें बाकी सदस्यों से इतर कुछ अतिरिक्त सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन विशेषाधिकार उल्लंघन के मामले में विशेष छूट हासिल नहीं होती है। इसलिए संसद प्रधानमंत्री को भी उनके असंसदीय आचरण के लिए दंडित कर सकती है।