Sunday, March 15, 2026
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शहीद कैप्टन अंशुमन के माता-पिता क्या बोले?

हाल ही में शहीद कैप्टन अंशुमन के माता-पिता ने एक बयान दिया है! शहीद कैप्टन अंशुमान सिंह के पिता का कहना है कि बहू हमारा घर छोड़कर जा चुकी हैं। अपना एड्रेस भी चेंज करा लिया है। उन्होंने कहा कि कीर्ति चक्र की कोई निशानी मेरे पास नहीं है। यूपी के देवरिया में एक न्यूज चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा कि NOK का जो निर्धारित मापदंड है वह ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, दोनों लोगों को इस बात से अवगत करा चुका हूं। शहीद अंशुमान की मां ने कहा कि बहुएं भाग जाती हैं। शहीद कैप्टन अंशुमान के पिता ने कहा कि बेटे की पांच महीने की शादी थी, कोई बच्चा नहीं है। पीछे जो तस्वीर है बस वही है। आज हमारे पास क्या है। उन्होंने कहा कि इस बारे में सवाल पूछे जाने चाहिए। इसमें बदलाव होना चाहिए। जैसे कारगिल की लड़ाई के बाद 67, 33 % हुआ था। लेकिन इसकी व्याख्या ठीक से होनी चाहिए। एनओके की परिभाषा क्या होगी। शहीद की पत्नी परिवार में रहेगी तो क्या होगा, नहीं रहने पर क्या होगा, बच्चें रहेंगे तो क्या होगा, माता पिता का क्या होगा?

कितने लोग परिवार के लोग उस पर निर्भर थे और वह कितनी जिम्मेदारी छोड़कर गया है। उन चीजों पर संशोधन हो। कैप्टन अंशुमान के माता-पिता ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि वह इस मामले में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से बात करेंगे। अंशुमान की मां ने कहा कि बहुएं भाग जाती हैं। मेरे जैसा किसी को दुख न हो। ऐसे मामले कई आ रहे हैं। मां-बाप को छोड़कर बहुएं भाग जा रही हैं। NOK का मतलब होता है Next to kin निकटतम परिजन। अविवाहित के लिए यह माता-पिता होता और विवाहित के लिए जीवनसाथी। यह किसी व्यक्ति के सेवा में दर्ज की जाने वाली जानकारी होती है। ट्रेनिंग/ सेवा के दौरान कोई इमरजेंसी या मृत्यु होती है तो NOK को ही आधिकारिक जानकारी दी जाती है। बता दें कि 19 जुलाई, 2023 को सियाचिन में शहीद हुए कैप्‍टन अंशुमान सिंह को पिछले दिनों कीर्ति चक्र से सम्‍मानित किया गया। राष्‍ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में उनकी पत्‍नी स्‍मृति और मां मंजू सिंह ने यह सम्‍मान लिया। इस कार्यक्रम के बाद स्‍मृति ने बताया कि कैसे उनकी अंशुमान सिंह से मुलाकात हुई और शादी के मात्र पांच महीने बाद ही वह विधवा हो गईं। कीर्ति चक्र लेते समय स्‍मृति के चेहरे पर जो भाव थे, उसकी तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कर लोगों ने भावुक कमेंट किए। हालांकि, अब शहीद का परिवार दूसरी खबरों से चर्चा में आ गया है। अंशुमान के माता और पिता ने बहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पिता ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह एनओके (नेक्‍स्‍ट टू किन) नियम की परिभाषा तय करे। अभी इसके लिए जो मानदंड हैं, वे ठीक नहीं हैं। आइए आपको बताते हैं कि एनओके आखिर है क्‍या?

जब कोई शख्‍स सेना में भर्ती होता है तो उसे माता-पिता का नाम निकटतम रिश्‍तेदारों के रूप में दर्ज किया जाता है। शादी के बाद माता-पिता की जगह पत्‍नी का नाम दर्ज हो जाता है। जवान के शहीद होने के बाद आर्थिक मदद से लेकर तमाम सैन्‍य सुविधाएं उसकी पत्‍नी को मिलती है। इसी को एनओके कहा जाता है। कैप्‍टन अंशुमान सिंह के माता और पिता ने इसी नियम में बदलाव की मांग की है।

देवरिया में अपने घर पर एक चैनल से बातचीत में कैप्‍टन अंशुमान सिंह के पिता रवि प्रताप सिंह ने कहा- ‘एनओके का जो निर्धारित मापदंड है वह ठीक नहीं है। इस बारे में मैं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को अवगत करा चुका हूं। पांच महीने की शादी थी। कोई बच्‍चा नहीं है। बहू ने हमसे बगैर पूछे मेरे बेटे का परमानेंट पता भी बदलवा दिया है। अब हमारे पास क्‍या बचा है। इस नियम में चेंज होना चाहिए। अगर बहू परिवार में रहेगी तो क्‍या होगा। नहीं रहेगी तो क्‍या होगा। बच्‍चे होंगे तो क्‍या होगा। शहीद के ऊपर परिवार की कितनी जिम्‍मेदारी थी, ये सब भी देखना चाहिए। मेरे बेटे को कीर्ति चक्र मिला। मेरी पत्‍नी भी बहू के साथ सम्‍मान लेने गई पर वह कीर्ति चक्र को छू तक नहीं पाई। दो दिन पहले रायबरेली में राहुल गांधी से मुलाकात में मैंने यह मुद्दा उठाया था। राहुल जी ने मुझे आश्‍वासन दिया है कि वह राजनाथ सिंह से इस बारे में बात करेंगे और इसका कुछ हल निकाला जाएगा।’

इसी तरह, मां मंजू सिंह ने कहा- ‘राहुल गांधी जी से बातचीत में मैंने यही कहा कि मेरे साथ तो यह घटना हो गई। पर नियमों में परिवर्तन हो ताकि आगे किसी अंशमुन सिंह के मां बाप को ऐसी समस्‍या का सामना न करना पड़े। बहुए भाग जा रही हैं। ऐसी घटनाएं समाज में बढ़ती जा रही हैं।’ गौरतलब है कि अंशुमान सिंह की पत्‍नी स्‍मृति सिंह पंजाब के गुरदासपुर की रहने वाली हैं। अंशुमान के पिता का दावा है कि बेटे की तेरहवीं के अगले दिन ही वह अपने मायके चली गईं और दोबारा लौटकर नहीं आईं।

आखिर शहीद के सम्मान पर किसका हक पहला होता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि शहीद के सम्मान पर पहला हक आखिर किसका होता है! क्या किसी सैनिक के शहीद होने के बाद उनके माता-पिता को कोई मदद नहीं मिलती और शहीद सैनिक की पत्नी को ही सारी आर्थिक मदद मिलती है? ऐसा नहीं है। यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि सियाचीन में शहीद कैप्टन अंशुमान सिंह के माता-पिता ने सवाल किया है। कैप्टन अंशुमान को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया है। शहीद अंशुमान के माता पिता का कहना है कि उनकी पत्नी मायके चली गई हैं। वे सरकार से मांग कर रहे हैं कि एनओके (नेक्स्ट ऑफ किन यानी निकटतम परिजन) के नियमों में बदलाव किया जाए। सेना सूत्रों के मुताबिक इंश्योरेंस की राशि में से 50 लाख रुपये शहीद अंशुमान की मां को और 50 लाख रुपये की राशि उनकी पत्नी को मिली है। यूपी सरकार से जो आर्थिक मदद मिली उसका 35 लाख रुपये शहीद की पत्नी और 15 लाख रुपये शहीद की मां को मिला है। नियमों के मुताबिक जब सेना में कोई भी अफसर या जवान भर्ती होता है तो उन्हें एक डिटेल फॉर्म भरना होता है जिसे- आफ्टर मी फोल्डर कहते हैं। इसमें एनओके की पूरी जानकारी होती है। अगर सैनिक की शादी नहीं हुई है तो उनके माता या पिता में से कोई उनका एनओके हो सकता है। सैनिक ने जिसे नॉमिनी बनाया है और जितने पर्सेंट का बनाया है उसे यह मिलेगा। चाहे वह माता-पिता हो, पत्नी हो या फिर बच्चे। साथ ही डिपेंडेंड पैरंट्स को मेडिकल फैसिलिटी मिलती रहती है।शादी होने के बाद उनकी पत्नी ही एनओके होती है! 

अगर सैनिक की मौत हो जाती है या शहादत होती है तो उस स्थिति में अलग अलग आर्थिक मदद है। सामान्य तौर पर देखें तो तीन तरह की फैमिली पेंशन होती है। पहली है ओर्डिनरी फैमिली पेंशन। यह उस स्थिति में एनओके को मिलती है जब किसी बीमारी की वजह से या सामान्य स्थिति में सैनिक की मौत होती है। यह आखिरी सैलरी का 30 पर्सेंट होता है। दूसरी पेंशन है स्पेशल फैमिली पेंशन। यह उस स्थिति में एनओके को मिलती है जब सैनिक की ड्यूटी के दौरान या ड्यूटी की वजह से मौत होती है। यह सैलरी का 60 पर्सेंट होता है। तीसरी पेंशन होती है लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन। यह बैटल कैजुवल्टी होने पर एनओके को मिलती है। यह सैलरी का 100 पर्सेंट होता है। नियमों के मुताबिक पेंशन के हकदार एनओके ही होते हैं। इसके अलावा अगर सैनिक को वीरता के लिए कोई गैलेट्री अवॉर्ड मिलता है तो वह भी एनओके को ही जाता है। इसके साथ मिलने वाली राशि भी एनओके के पास ही जाती है।

अगर सैनिक शादीशुदा थे तो एनओके पत्नी ही होंगी। ऐसी स्थिति में माता पिता को क्या मिलता है। सैनिक की जो इंश्योरेंस की राशि होती है, जो पीएफ की राशि होती है, जो एक्स ग्रेशिया होता है और जो ग्रेच्युटी होती है, उसके लिए सैनिक जिसे चाहें उसे नॉमिनी बना सकते हैं। उन्हें अपनी विल लिखनी होती है जिसकी पूरी डिटेल सेना के पास होती है। सैनिक ने जिसे नॉमिनी बनाया है और जितने पर्सेंट का बनाया है उसे यह मिलेगा। चाहे वह माता-पिता हो, पत्नी हो या फिर बच्चे। साथ ही डिपेंडेंड पैरंट्स को मेडिकल फैसिलिटी मिलती रहती है।

अगर एनओके पत्नी है और वह दूसरी शादी कर लें तो उसके भी अलग अलग नियम है। अगर पत्नी को ओर्डिनरी फैमिली पेंशन मिल रही है तो वह दूसरी शादी करते ही बंद हो जाएगी, चाहे उनके बच्चे हों या ना हो। लेकिन अगर पत्नी को स्पेशल फैमिली पेंशन मिल रही है तो वह मिलती रहेगी। अगर पत्नी बच्चों को छोड़ देती है तो सैलरी का जो 60 पर्सेंट पेंशन में मिल रहा होता है उसका 30 पर्सेंट पत्नी को और 30 पर्सेंट बच्चों को मिलेगा। बता दें कि नियमों के मुताबिक जब सेना में कोई भी अफसर या जवान भर्ती होता है तो उन्हें एक डिटेल फॉर्म भरना होता है जिसे- आफ्टर मी फोल्डर कहते हैं। इसमें एनओके की पूरी जानकारी होती है। अगर सैनिक की शादी नहीं हुई है तो उनके माता या पिता में से कोई उनका एनओके हो सकता है। शादी होने के बाद उनकी पत्नी ही एनओके होती है। ऐसे ही अगर पत्नी को लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन मिल रही है और दूसरी शादी करने पर वह जारी रहेगी। अगर वे बच्चों को छोड़ती है तो फिर जो सैलरी का 100 पर्सेंट पेंशन मिल रही थी उसका 30 पर्सेंट पत्नी को मिलेगा और 70 पर्सेंट बच्चों को मिलेगा।

आखिर क्या कहती है विश्व की जनसंख्या रिपोर्ट?

आज हम आपको बताएंगे कि विश्व की जनसंख्या रिपोर्ट आखिर क्या कहती है! जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2100 तक भारत की आबादी लगभग 1.5 अरब हो जाएगी, जो चीन की 633 करोड़ की आबादी से दोगुनी से भी ज्यादा होगी। ये आंकड़े बताते हैं कि आने वाले सालों में भारत के पास बहुत बड़ी जनसंख्या होगी, जो देश के विकास में मददगार हो सकती है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि साल 2085 तक भारत की आबादी (1.61 अरब) चीन की आबादी (806 करोड़) से दोगुनी हो जाएगी और यह अंतर आगे और बढ़ता चला जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2085 में भारत जनसंख्या के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच जाएगा। गुरुवार को जारी ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024’ रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले 50-60 वर्षों के दौरान दुनिया की जनसंख्या में वृद्धि जारी रहने का अनुमान है और 2024 में यह 8.2 अरब तक पहुंच जाएगी, जबकि 2080 के दशक के मध्य तक लगभग दुनिया की आबादी लगभग 10.3 अरब हो जाएगी।ऐसे में सदी के अंत तक भारत की जनसंख्या लगभग 1.5 अरब हो जाएगी, लेकिन फिर भी यह दुनिया में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश बना ही रहेगा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की जनसंख्या वर्ष 2054 में घटकर 1.21 अरब तक पहुंच जाएगी। वर्तमान में चीन की आबादी 1.41 अरब है। हालांकि, चरम स्थिति पर पहुंचने के बाद वैश्विक जनसंख्या में धीरे-धीरे गिरावट आने का अनुमान है और यह सदी के अंत तक घटकर 10.2 अरब रह जाएगी। भारत पिछले साल चीन को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन गया था और 2100 तक यह इसी स्थान पर बना रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार भारत की जनसंख्या 2024 में 1.45 अरब तक पहुंच सकती है। वहीं, 2054 में यह बढ़कर 1.69 अरब तक पहुंच जाएगी। यह भी अनुमान है कि सदी के अंत तक 2100 में भारत की आबादी घटकर 1.5 अरब हो जाएगी, लेकिन इसके बावजूद यह दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बना रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र डीईएसए के जनसंख्या प्रभाग की वरिष्ठ अधिकारी क्लेयर मेनोजी ने कहा, ‘भारत वर्तमान में जनसंख्या के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश है और पूरी शताब्दी में इसके शीर्ष पर ही बने रहने का अनुमान है। वर्तमान में भारत की जनसंख्या 1.45 अरब तक पहुंच सकती है और बाद में यह बढ़कर 1.69 अरब भी हो जाएगी।वर्ष 2100 में 51.1 करोड़ की जनसंख्या के साथ पाकिस्तान विश्व का तीसरा सबसे बड़ा आबादी वाला देश बना रहेगा। रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 126 देशों और क्षेत्रों में जनसंख्या 2054 तक बढ़ती रहेगी तथा संभवतः सदी के अंत में या 2100 के बाद अपने चरम पर पहुंच जाएगी।’ मेनोजी ने कहा, ‘ऐसा माना जा रहा है कि 2060 के दशक के आसपास भारत की आबादी चरम पर होगी और फिर इसमें धीरे-धीरे कमी आनी शुरू हो जाएगी। ऐसे में सदी के अंत तक भारत की जनसंख्या लगभग 1.5 अरब हो जाएगी, लेकिन फिर भी यह दुनिया में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश बना ही रहेगा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की जनसंख्या वर्ष 2054 में घटकर 1.21 अरब तक पहुंच जाएगी। वर्तमान में चीन की आबादी 1.41 अरब है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की आबादी साल 2054 तक 38.9 करोड़ पहुंच जाएगी और इसी के साथ पाकिस्तान, अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व का तीसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। वर्तमान में अमेरिका दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और इसकी कुल जनसंख्या 34.5 करोड़ है। वहीं, 2054 में इसकी आबादी 38.4 करोड़ हो जाएगी और यह दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा।गुरुवार को जारी ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024’ रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले 50-60 वर्षों के दौरान दुनिया की जनसंख्या में वृद्धि जारी रहने का अनुमान है और 2024 में यह 8.2 अरब तक पहुंच जाएगी, जबकि 2080 के दशक के मध्य तक लगभग दुनिया की आबादी लगभग 10.3 अरब हो जाएगी। वर्ष 2100 में 51.1 करोड़ की जनसंख्या के साथ पाकिस्तान विश्व का तीसरा सबसे बड़ा आबादी वाला देश बना रहेगा। रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 126 देशों और क्षेत्रों में जनसंख्या 2054 तक बढ़ती रहेगी तथा संभवतः सदी के अंत में या 2100 के बाद अपने चरम पर पहुंच जाएगी। संयुक्त राष्ट्र डीईएसए के जनसंख्या प्रभाग की वरिष्ठ अधिकारी क्लेयर मेनोजी ने कहा, ‘भारत वर्तमान में जनसंख्या के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश है और पूरी शताब्दी में इसके शीर्ष पर ही बने रहने का अनुमान है। वर्तमान में भारत की जनसंख्या 1.45 अरब तक पहुंच सकती है और बाद में यह बढ़कर 1.69 अरब भी हो जाएगी।’इस समूह में विश्व के कई सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश भारत, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान और अमेरिका शामिल हैं।

आखिर क्या खासियत रखता है पीएम मोदी का ऑस्ट्रिया दौरा?

आज हम आपको बताएंगे कि पीएम मोदी का ऑस्ट्रिया दौरा आखिर क्या खासियत रखता है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस हफ्ते रूस की यात्रा पर गए थे। रूस की यात्रा के बाद पीएम मोदी ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना पहुंचे। यहां ‘वंदे मातरम’ की धुन से पीएम मोदी का जोरदार स्वागत किया गया। पीएम मोदी ने ऑस्ट्रिया की यात्रा को सफल करार दिया। प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा, ‘भारत की तरह ही ऑस्ट्रिया का इतिहास और संस्कृति भी बहुत पुरानी और भव्य रही है। एक-दूसरे के साथ हमारा संपर्क भी ऐतिहासिक रहा है। हमारे देशों के बीच मित्रता में नयी ऊर्जा का संचार हुआ है। मुझे वियना में विविध कार्यक्रमों में भाग लेने की खुशी है। चांसलर कार्ल नेहमर के आतिथ्य और स्नेह के लिए आभार।’ दरअसल 1983 में इंदिरा गांधी के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला ऑस्ट्रिया दौरा था। मोदी मॉस्को में पुतिन से मिलने के बाद सीधे वियना गए। यह बहुत महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रिया यूरोपियन देश है, लेकिन NATO का हिस्सा नहीं है। NATO अमेरिका के नेतृत्व वाला सैन्य गठबंधन है, जो रूस के खिलाफ है। इस हफ्ते NATO के 32 नेता वाशिंगटन डीसी में मिले थे। यह दौरा पूरी दुनिया देख रही थी। मोदी ने पुतिन से कहा कि मासूम बच्चों की मौत से बहुत दुख होता है। उन्होंने कहा कि बम, बंदूक और गोलियों के बीच शांति की बातचीत सफल नहीं हो सकती। किसी भी संघर्ष का हल युद्ध के मैदान में नहीं मिल सकता। मोदी के बयान से पता चलता है कि रूस की ओर से एक बच्चों के अस्पताल पर मिसाइल हमले को लेकर भारत बहुत चिंतित है। यह हमला तब हुआ जब मोदी रूस में थे। दिसंबर 2023 में, विदेश मंत्री एस जयशंकर पुतिन और उनके विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मिलने मास्को गए थे। तब भी रूस ने यूक्रेन पर सबसे बड़ा हवाई हमला किया था। यह हमला फरवरी 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से सबसे बड़ा था। यूक्रेनी सेना के अनुसार, इस हमले में कम से कम 31 लोग मारे गए थे।

मोदी ने पुतिन से मिलने के अगले दिन वियना में चांसलर कार्ल नेहमर से मुलाकात की। उन्होंने फिर जोर देकर कहा कि यह युद्ध का समय नहीं है। समस्याओं का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं हो सकता। कहीं भी निर्दोष लोगों की जान जाना अस्वीकार्य है। यह दोहराव पश्चिमी देशों के लिए भारत का स्पष्ट संदेश था। पश्चिमी देश मोदी और पुतिन की द्विपक्षीय बैठक को लेकर चिंतित थे।

1955 में, चारों देशों ने ऑस्ट्रियाई सरकार के साथ ऑस्ट्रियाई राज्य संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि से ऑस्ट्रिया एक स्वतंत्र देश बना। सोवियत संघ चाहता था कि ऑस्ट्रिया तटस्थ रहे। ऑस्ट्रिया की स्थिति पूंजीवादी पश्चिमी यूरोप और पूर्व में साम्यवादी खेमे के बीच है। इसलिए चारों देशों ने ऑस्ट्रिया की क्षेत्रीय अखंडता और अनुल्लंघनीयता का संकल्प लिया।

1955 की संधि ने ऑस्ट्रिया को तटस्थता के लिए बाध्य किया। सभी देशों ने इस संधि का अनुमोदन किया। ऑस्ट्रिया का संविधान सैन्य गठबंधनों में शामिल होने और ऑस्ट्रियाई क्षेत्र में विदेशी सैन्य ठिकाने स्थापित करने पर रोक लगाता है।

1952-53 में, ऑस्ट्रिया के लोगों ने जवाहरलाल नेहरू से मदद मांगी। नेहरू पश्चिमी देशों और सोवियत संघ दोनों में सम्मानित थे। ऑस्ट्रिया एक संप्रभु राष्ट्र हासिल करना चाहता था। भारत उन कुछ देशों में से एक था जिन्होंने 1952 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में ऑस्ट्रिया की अपील का समर्थन किया था। ऑस्ट्रिया की अपील थी कि मित्र देशों का कब्ज़ा खत्म हो और उसकी संप्रभुता बहाल हो। ऑस्ट्रिया के विदेश मंत्री, कार्ल ग्रुबर ने कहा कि इतने महत्वपूर्ण देश (भारत) की सहमति-जिसकी तटस्थता पूर्व-पश्चिम संघर्ष में किसी भी संदेह से परे है-ऑस्ट्रिया के लिए विशेष रूप से फायदेमंद थी। जून 1953 में, ग्रुबर और नेहरू लंदन में एलिजाबेथ द्वितीय के राज्याभिषेक में शामिल हुए थे। उस समय की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अगली सुबह दोनों की मुलाकात हुई थी। अपनी पुस्तक द पॉलिटिकल सेटलमेंट आफ्टर द सेकेंड वर्ल्ड वॉर (1972) में, ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन व्हीलर-बेनेट ने लिखा है कि एक राजनयिक मध्यस्थ के रूप में नेहरू की भूमिका ने ऑस्ट्रियाई संधि चर्चाओं में एक पूरी तरह से नया कारक पेश किया। प्रसिद्ध ऑस्ट्रियाई दार्शनिक, कोचलर ने 21 जून, 1953 को ऑस्ट्रियाई दैनिक न्यूस ओस्टररेइच में प्रकाशित एक रिपोर्ट के हवाले से कहा, ‘प्रधानमंत्री नेहरू… संदेह के बिना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी ‘अच्छी सेवाएं’ राज्य संधि को साकार करने के उनके प्रयासों में ऑस्ट्रिया का समर्थन करने में प्रभावी हो सकती हैं।’

जून 1955 में, राज्य संधि के माध्यम से ऑस्ट्रिया को पूर्ण स्वतंत्रता मिली। उसके लगभग एक महीने बाद, नेहरू ने देश की राजकीय यात्रा की, जो किसी विदेशी नेता की पहली यात्रा थी। बुधवार को चांसलर नेहमर ने नेहरू की भूमिका को याद किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सुनते हुए कहा, ‘स्थिति कठिन थी, प्रगति करना कठिन था। यह विदेश मंत्री ग्रुबर थे जिन्होंने बातचीत में समर्थन मांगने के लिए प्रधानमंत्री नेहरू से संपर्क किया, ताकि उन्हें सकारात्मक निष्कर्ष पर लाया जा सके। यही हुआ भी। भारत ने ऑस्ट्रिया की मदद की और ऑस्ट्रियाई राज्य संधि के साथ बातचीत सकारात्मक निष्कर्ष पर पहुंची।’

भारत और ऑस्ट्रिया के बीच 10 नवंबर, 1949 को राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे- इस साल इसकी 75वीं वर्षगांठ है। 1983 में इंदिरा गांधी की यात्रा के एक साल बाद, ऑस्ट्रिया के चांसलर फ्रेड सिनोवाट्ज भारत आए थे। राष्ट्रपति के आर नारायणन नवंबर 1999 में ऑस्ट्रिया के राजकीय दौरे पर गए थे। ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति डॉ. हेंज फिशर फरवरी 2005 में आए थे, और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अक्टूबर 2011 में ऑस्ट्रिया का दौरा किया था। ऑस्ट्रिया के विदेश मंत्री अलेक्जेंडर शालेनबर्ग का भारत से एक दिलचस्प रिश्ता है। जब वह मार्च 2022 में एक उच्च-स्तरीय व्यापार प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आए, तो पता चला कि उनके पिता, वोल्फगैंग शालेनबर्ग, 1974 और 1978 के बीच भारत में ऑस्ट्रिया के राजदूत थे, और वर्तमान विदेश मंत्री ने नई दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ाई की थी। अलेक्जेंडर शालेनबर्ग ने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए ऑस्ट्रियाई विदेश सेवा में प्रवेश किया और 2019 में, अपने देश के विदेश मंत्री बने। वह 2021 में तीन महीने के लिए चांसलर बने, और दिसंबर 2021 से विदेश मंत्री हैं। इसलिए, जब शालेनबर्ग जयशंकर से मिले, तो उनके बीच तुरंत तालमेल बैठ गया – क्योंकि दोनों करियर राजनयिक थे जो विदेश मंत्री बने, दोनों प्रख्यात सरकारी अधिकारियों के बेटे।

बुधवार को, चांसलर नेहमर और प्रधानमंत्री मोदी ने द्विपक्षीय साझेदारी को उच्च स्तर पर ले जाने की क्षमता को पहचाना। दोनों देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध में संतुलित रुख अपनाया है। भले ही ऑस्ट्रिया ने रूस के खिलाफ EU के प्रतिबंधों का समर्थन किया था। लेकिन 11 अप्रैल, 2022 को चांसलर नेहमर युद्ध की समाप्ति पर चर्चा करने के लिए राष्ट्रपति पुतिन से मिलने वाले पहले यूरोपीय नेता बने। ऑस्ट्रिया ने यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध काफी हद तक बरकरार हैं, और वह रूस से गैस का आयात जारी रखे हुए है।

आखिर कैसे फैला पा रहे हैं आतंकी संगठन अपना नेटवर्क?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आतंकी संगठन अपना नेटवर्क आखिर कैसे फैला पा रहे हैं! जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी उन इलाकों में अपना नेटवर्क फैला रहे हैं जो लंबे वक्त से शांत रहे हैं। जम्मू के कठुआ में जहां आतंकियों ने भारतीय सेना के गश्ती दल पर घात लगाकर हमला किया वह इलाका भी एक दशक से भी ज्यादा वक्त से शांत रहा है। आतंकी पिछले 2-3 सालों से जम्मू में अपनी हरकतों को अंजाम दे रहे हैं। लगातार हो रहे घात लगाकर हमले से इंटेलिजेंस पर तो सवाल उठे ही हैं, यह सवाल भी उठ रहा है कि आतंकियों को इन इलाकों में लोकल सपोर्ट क्यों मिल पा रहा है। बिना लोकल सपोर्ट के घात लगाकर हमला करना और फिर भाग जाना आतंकियों के लिए संभव नहीं है। सोमवार को कठुआ में आतंकियों ने सेना के गश्ती दल में घात लगाकर हमला किया और फिर जंगलों में भाग गए। आतंकियों को पकड़ने के लिए संयुक्त तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। खोजी कुत्तों, मेटल डिटेक्टर, हेलिकॉप्टर और यूएवी से भी निगरानी की जा रही है। माना जा रहा है कि इस हमले में तीन से चार तक आतंकी शामिल थे और उनमें ज्यादा विदेशी थे। लेकिन सूत्रों का कहना है कि आतंकियों को स्थानीय लोगों ने मदद पहुंचाई है। लोकल गाइड के जरिए आतंकियों को सेना के मूवमेंट की जानकारी मिली और फिर उन्होंने रेकी कर अपना मिशन प्लान किया। हमला करके वे आसानी से निकल भी गए, जो बिना लोकल सपोर्ट के नहीं हो सकता। पहले आतंकियों ने पुंछ-रजौरी के इलाके में कई वारदातों को अंजाम दिया। ये इलाके भी करीब दो दशकों तक शांत रहे हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में सेना के जवानों के काफिले पर आतंकवादियों द्वारा किया गया हमला एक कायरतापूर्ण कृत्य है जिसकी निंदा की जानी चाहिए और इसके लिए कठोर जवाबी कार्रवाई की जानी चाहिए।फिर रियासी और अब कठुआ में आतंकी वारदात को अंजाम दिया है।

सुरक्षा एजेंसी के एक अधिकारी के मुताबिक कश्मीर में सेना की मजबूत एंटी इन्फिल्ट्रेशन ग्रिड है जिससे आतंकियों के लिए वहां वारदात करना और भाग निकलना मुश्किल है। लेकिन जम्मू के रजौरी-पुंछ इलाके में सैनिकों की संख्या कम की गई थी जिसका आतंकियों ने फायदा उठाया। कठुआ में भी सैनिक उस तरह तैनात नहीं हैं जिसे कश्मीर के इलाकों में हैं। एक अधिकारी ने कहा कि जब सेना की लगातार मौजूदगी होती है तो स्थानीय लोगों से कनेक्ट होता है और ह्यूमन इंटेलिजेंस मजबूत होता है।

सैनिक दो-तीन साल में बदलते जरूर हैं लेकिन पुराने सैनिक नए सैनिकों को स्थानीय लोगों से मिलवाते हैं तो भरोसा जारी रहता है। लेकिन जब बड़ी संख्या में सैनिकों को हटा दिया गया और करीब तीन-चार साल का पूरा गैप हो गया तो फिर स्थानीय लोगों से कनेक्ट बनाना इतना आसान नहीं होता। जम्मू-कश्मीर पुलिस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन्हें भी इंटेलिजेंस नहीं मिल पा रहा है। सवाल इसलिए क्योंकि पुलिस के लोग हमेशा वहां होते हैं और पुलिस में स्थानीय लोग ही होते हैं। इसके बावजूद अगर आतंकी बड़ी वारदातों को अंजाम देकर भाग निकलते हैं तो सवाल उठने लाजिमी हैं।

आतंकी हमले में अपने पांच बहादुर सैनिकों को खोने से देशभर में दुख के साथ गुस्सा है। सरकार ने जहां आतंकवादी विरोधी अभियान जारी रखने का संकल्प दोहराया है वहीं रक्षा सचिव ने कहा है कि सैनिकों की मौत का बदला लिया जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में सेना के जवानों के काफिले पर आतंकवादियों द्वारा किया गया हमला एक कायरतापूर्ण कृत्य है जिसकी निंदा की जानी चाहिए और इसके लिए कठोर जवाबी कार्रवाई की जानी चाहिए।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि कठुआ में आतंकवादी हमले में हमारे पांच बहादुर सैनिकों की मौत से मुझे गहरा दुख हुआ है। शोक संतप्त परिवारों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं। इस कठिन समय में राष्ट्र उनके साथ मजबूती से खड़ा है। आतंकियों को पकड़ने के लिए संयुक्त तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। खोजी कुत्तों, मेटल डिटेक्टर, हेलिकॉप्टर और यूएवी से भी निगरानी की जा रही है। माना जा रहा है कि इस हमले में तीन से चार तक आतंकी शामिल थे और उनमें ज्यादा विदेशी थे।आतंकवाद विरोधी अभियान जारी है। हमारे सैनिक क्षेत्र में शांति और व्यवस्था कायम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। रक्षा सचिव गिरिधर अरमाने ने कहा कि कठुआ हमले में पांच जवानों की मौत का बदला लिया जाएगा और भारत इसके पीछे की बुरी ताकतों को हराएगा।

आखिर कौन लेगा हाथरस में हुई भगदड़ की जिम्मेदारी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि हाथरस में हुई भगदड़ की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा! उत्तर प्रदेश के हाथरस के सिकंदराराऊ में मंगलवार सैकड़ों लोगों के लिए अमंगल रहा। दरअसल सिकंदराराऊ कस्बे के फुलरई गांव में भोले बाबा का सत्संग चल रहा था जिसमें लाखों लोग आए थे। भरी गर्मी में सत्संग सुनने पहुंचे लोगों ने कल्पना भी नहीं की थी उनमें से कुछ लोगों के लिए ये आखिरी सत्संग बन जाएगा। यूपी के हाथरस में हुए इस हादसे में 121 लोगों की मौत हो गई जबकि दर्जनों लोग जिंदगी मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं लेकिन अभी भी सत्संग सुनाने वाले बाबा फरार है। पुलिस अभी भी भोले बाबा की तलाश कर रही है लेकिन बाबा का कोई सुराग नहीं मिल रहा। हाथरस में भोले बाबा के सत्संग में मची भगदड़ से हुए हादसे पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह के अनुसार इस सत्संग में करीब 80,000 लोगों के आने की अनुमति दी गई थी लेकिन उस दिन सत्संग में करीब दो लाख से अधिक लोग शामिल थे। हाथरस में भोले बाबा के सत्संग में मची भगदड़ से हुए हादसे पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह के अनुसार इस सत्संग में करीब 80,000 लोगों के आने की अनुमति दी गई थी लेकिन उस दिन सत्संग में करीब दो लाख से अधिक लोग शामिल थे।ऐसे में जब परमिशन ही 80 हजार लोगों की थी तो इस सत्संग में 2 लाख लोग कैसे पहुंच गए। अगर पहुंच गए तो पुलिस प्रशासन ने बिना सुरक्षा के इंतजामों के धार्मिक कार्यक्रम को शुरू करने की अनुमति ही कैसे दे दी? क्या प्रशासन की तरफ से सत्संग वाली जगह की व्यवस्था चेक की गई थी कि वो दो लाख लोगों के लिए ठीक है या नहीं ?

भोले बाबा के इस सत्संग में दो लाख लोग पहुंच गए थे लेकिन बाबा का सत्संग आयोजन करवाने वालों की तरफ से वहां पर 80 हजार लोगों के लिए भी कोई सुविधाएं नहीं थी। जहां पर बाबा का सत्संग हो रहा था वहां पर एंट्री, एग्जिट के कोई पॉइंट ही नहीं बने थे। लोग कहीं से भी आ जा रहे थे। अगर वहां पर एंट्री एग्जिट प्वाइंट बनाया गया होता तो शायद इस भगदड़ वाले हादसे को रोका जा सकता था। इसके साथ ही हर जगह पर एक इमरजेंसी रास्ता होता है वो भी इस सत्संग वाली जगह पर नहीं था। अगर वो बना होता तो शायद लोगों को जान नहीं जाती।

भोले बाबा का ये सत्संग कम से कम 10 एकड़ की जमीन पर हुआ था। इतनी बड़ी जगह होने के बावजूद यहां पर लोगों के आने जाने के लिए एक रास्ता बनाया गया था वो भी कच्चा था। जबकि गाइडलाइन के अनुसार अगर कोई बड़ा कार्यक्रम होता है जिसमें हजारों में लोग शामिल होते हैं उसमें आने-जाने के लिए कई रास्ते बनाए जाते हैं। हालांकि यहां पर भी लापरवाही दिखाई गई। वहीं जिस मैदान में ये सत्संग हो रहा था उसमे कई जगह पर गड्ढे थे जिन्हें भी नहीं भरा गया था। कई मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भगदड़ के दौरान कई लोगों के पैर इन्हीं गड्ढों में पैर फंस गए। जिसकी वजह से वो लोग गिर गए और पीछे वाले लोग उन्हें रौंदते हुए आगे बढ़ गए।

हादसे के चश्मदीदों का कहना है कि सत्संग में भीड़ के अनुसार कोई भी व्यवस्था नहीं थी। पंखे, कूलर भी बहुत ही कम संख्या में थे। इसके साथ ही प्रशासन की तरफ से तैनात किए गए पुलिसकर्मियों की संख्या भी कम थी। वहीं बाबा के आने-जाने वाले रास्ते पर बैरिकेडिंग भी नहीं था। जब सत्संग के बाद वहां पर भगदड़ मची तो कार्यक्रम का आयोजन करने वाले आयोजक वहां से गायब हो गए। मुसीबत की घड़ी में लोगों को उनकी कोई मदद नहीं मिली। जिसकी वजह से ये हादसा इतना बड़ा हो गया।

हाथरस में ये हादसा आयोजकों के साथ ही प्रशासन की चूक की वजह से हुआ। अगर प्रशासन वक्त रहते सत्संग में लोगों की संख्या बढ़ने पर वहां के सुरक्षा के इंतजामों के चेक कर लेता तो शायद वो 121 लोग अपने परिवार के साथ हंसी खुशी से रह रहे होते। वहीं इस कार्यक्रम का आयोजन करने वालों को भी एक बार सोचना चाहिए था कि जो लोग उनके सत्संग में आ रहे हैं वो भोले बाबा के ही भक्त यानी कि उनके अपने हैं। ऐसे में उन्हें अपना मानते हुए अगर सभी सुरक्षा के इंतजाम जैसे सत्संग वाली जगह को समतल कर दिया होता , आने जाने के लिए कई रास्ते बनाए होते और मेडिकल सुविधा की व्यवस्था की होती तो ये हादसा न होता।

क्या पीएम मोदी कांग्रेस को लेंगे आड़े हाथ?

पीएम मोदी अब कांग्रेस को आड़े हाथ ले सकते हैं!18 वीं लोकसभा के पहले सत्र का समापन हो गया है। संसद सत्र में इस बार लोकसभा चुनाव नतीजों का असर साफ दिखाई पड़ा। सांसदों के शपथ से लेकर आखिरी दिन सदन में प्रधानमंत्री के जवाब तक यह देखने को मिला। कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के दूसरे दलों ने सदन के भीतर और बाहर पूरी एकजुटता दिखाई। पहली बार नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे राहुल गांधी के भी आक्रामक तेवर लोकसभा में दिखाई पड़े। इन सबके बीच पीएम मोदी ने अपने ही अंदाज में लोकसभा और फिर राज्यसभा में विपक्ष खासकर कांग्रेस की धार को कुंद करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। इन सबके बीच एक खास बात यह भी रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निशाने पर प्रमुख तौर पर कांग्रेस ही रही। लोकसभा में बोलते हुए 2 जुलाई मंगलवार को नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को अब से परजीवी पार्टी के रूप में जाना जाएगा। वह अपने सहयोगी दलों की कीमत पर फलती फूलती है। कांग्रेस 2024 से परजीवी कांग्रेस पार्टी के रूप में जानी जाएगी। परजीवी वो होता है जो जिस शरीर के साथ रहता है, उसी को खाता है। पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस भी जिस पार्टी के साथ गठबंधन करती है, उसी के वोट खा जाती है। अपनी सहयोगी पार्टी की कीमत पर फलती फूलती है। जहां-जहां भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला था या कांग्रेस बड़ी पार्टी थी, वहां कांग्रेस का स्ट्राइक रेट सिर्फ 26 प्रतिशत है। लेकिन जहां ये किसी का पल्लू पकड़कर चलते थे, जहां जूनियर सहयोगी थे, जहां किसी अन्य दल ने उन्हें कुछ मौका दे दिया, ऐसे राज्यों में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट 50 प्रतिशत है। उन्होंने इंडिया गठबंधन में कांग्रेस के सहयोगी दलों का जिक्र करते हुए कहा कि इस चुनाव में कांग्रेस को मिलीं 99 सीट में से ज्यादातार सीट उनके सहयोगियों ने उन्हें जिताई हैं इसलिए यह परजीवी कांग्रेस है।

कांग्रेस को घेरते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पार्टी के नेता दक्षिण भारत में उत्तर के खिलाफ बोलते हैं तो उत्तर में जाकर पश्चिम के खिलाफ जहर उगलते हैं, ये महापुरुषों के खिलाफ बोलते हैं और इन्होंने भाषा के आधार पर बांटने की हर कोशिश की है। प्रधानमंत्री ने कहा जिन नेताओं ने देश के हिस्सों को भारत से अलग करने की वकालत की थी, उन्हें चुनाव में टिकट देने का पाप कांग्रेस ने किया है। कांग्रेस पार्टी खुलेआम एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ लड़ने के लिए अफवाह फैला रही है। मोदी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस देश में आर्थिक अराजकता फैलाने की दिशा में सोची समझी चाल चल रही है। चुनाव के दौरान जो बातें की गईं। वे (कांग्रेस) अपने शासन वाले राज्यों में जिस तरह के कदम उठा रहे हैं, वो आर्थिक अराजकता की तरफ घसीटने वाला रास्ता है। उनके राज्य देश पर आर्थिक बोझ बन जाएं, ये खेल जानबूझकर खेला जा रहा है।

लोकसभा के बाद राज्यसभा में बुधवार बोलते हुए पीएम मोदी ने आपातकाल का विशेष जिक्र किया। उन्होंने आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनाव को संविधान की रक्षा के लिए संपन्न हुआ पूरे विश्व का सबसे बड़ा चुनाव करार देते हुए बुधवार को कहा कि हालिया लोकसभा चुनाव भी अगर संविधान की रक्षा का ही चुनाव था तो देशवासियों ने बीजेपी को इसके योग्य पाया। उन्होंने आपातकाल की याद दिलाते हुए कहा कि उस दौर में संविधान पर जुल्म हुआ, लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा दी गई थीं। प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को संविधान की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी बताया और कहा कि इसका विरोध ही उसके जेहन में है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल ने 2024 के लोकसभा चुनाव को देश के इतिहास का पहला चुनाव बताया जिसका मुद्दा संविधान की रक्षा था। उन्होंने सवाल किया कि अभी भी यह फर्जी विमर्श चलाते रहोगे क्या? क्या आप भूल गए 1977 का चुनाव? अखबार बंद थे, रेडियो बंद था, बोलना भी बंद था। और एक ही मुद्दे पर देशवासियों ने वोट किया था। लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए वोट किया था। संविधान की रक्षा के लिए पूरे विश्व में इससे बड़ा कोई चुनाव नहीं हुआ है।

पीएम मोदी ने इन बातों के अलावा राहुल गांधी पर भी जमकर निशाना साधा। विपक्ष की अगुवाई कांग्रेस पार्टी कर रही है लेकिन पीएम मोदी ने परजीवी कांग्रेस वाली बात कहके कहीं न कहीं कांग्रेस के साथी दलों के मन में सवाल पैदा करने की कोशिश की। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की हिंदू वाली टिप्पणी का जवाब पीएम मोदी ने दिया। साथ ही संविधान की बात को लेकर कांग्रेस पार्टी जिस तरीके से चुनाव के बाद संसद में भी आगे बढ़ रही थी उस पर पीएम मोदी ने आपातकाल के जरिए वार किया है। इस चुनाव में विपक्ष की सीटें बढ़ी हैं और विपक्षी दलों की ओर से सरकार बनाने के बावजूद इसे पीएम मोदी की हार बताई जा रही है। पीएम मोदी ने उस नैरेटिव पर भी तीसरी बार लगातार 60 साल बाद किसी पार्टी की सत्ता में वापसी की बात से प्रहार किया। सरकार बनने के बाद पीएम मोदी के सामने विपक्ष की चुनौती है और इस चुनौती का सामना करने के लिए पीएम मोदी का भी अंदाज कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा है।

आखिर क्यों मनाया जाएगा संविधान हत्या दिवस जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि संविधान हत्या दिवस आखिर क्यों मनाया जाएगा! सड़क से लेकर संसद तक, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कभी पीएम मोदी को ‘तानाशाह’ बताया तो कभी अपने भाषण में ‘संविधान खतरे में है’ के नारे लगाए। राहुल गांधी ने 4 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने संविधान को बचा लिया है। वहीं लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दल ‘संविधान बचाओ’ के नारे से बीजेपी पर लगातार तीखे हमले कर रहे थे। लेकिन बीजेपी ने एक बार फिर विपक्ष के हमलों का करारा जवाब देते हुए बड़ा फैसला किया है। केंद्र सरकार की ओर से अधिसूचना जारी कर 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया गया है। अधिसूचना में लिखा गया है, ’25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा की गई थी, उस समय की सरकार ने सत्ता का घोर दुरुपयोग किया था और भारत के लोगों पर ज्यादतियां और अत्याचार किए थे। भारत के लोगों को देश के संविधान और भारत के मजबूत लोकतंत्र पर दृढ़ विश्वास है। इसलिए, भारत सरकार ने आपातकाल की अवधि के दौरान सत्ता के घोर दुरुपयोग का सामना और संघर्ष करने वाले सभी लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया है।

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तानाशाही मानसिकता का परिचय देते हुए देश पर आपातकाल थोपकर हमारे लोकतंत्र की आत्मा का गला घोंट दिया था। लाखों लोगों को बिना किसी गलती के जेल में डाल दिया गया और मीडिया की आवाज को दबा दिया गया। भारत सरकार ने हर साल 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। यह दिन उन सभी लोगों के महान योगदान को याद करेगा, जिन्होंने 1975 के आपातकाल के अमानवीय दर्द को सहन किया था।

सरकार के इस फैसले का एक तरफ एनडीए के नेता स्वागत कर रहे हैं, तो वहीं विपक्षी के नेता आलोचना कर रहे हैं। 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किए जाने के बाद कांग्रेस नेता विवेक तन्खा, पवन खेड़ा और प्रमोद तिवारी की प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस नेता विवेक तन्खा ने कहा कि मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ, जब भारत सरकार की ओर से एक अधिसूचना जारी की गई कि 25 जून को हर साल देश भर में इमरजेंसी का रिमेंबरेंस डे मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि 1975 की घटना को उठाना, भाजपा की हताशा को दर्शाता है। हताशा के कारण ये 50 साल पुराने मुद्दे को उठा रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि भाजपा को पिछले महीने की चार तारीख को 440 वोल्ट का एक ऐसा करंट लगा था कि 400 का सपना देखने वाले 240 पर सिमट गए। उनका संविधान बदलने का सपना चूर-चूर हो गया। लेकिन अब उनके सपने में संविधान आना शुरू हुआ, जब संविधान के नारों से संसद गूंज उठा, तो अब संविधान हत्या दिवस की बात हो रही है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री से कहा कि 10 वर्षों में आपकी सरकार ने हर दिन ‘संविधान हत्या दिवस’ ही तो मनाया है। आपने देश के हर गरीब व वंचित तबके से हर पल उनके आत्मसम्मान को छीना है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ‘जब मध्य प्रदेश में भाजपा नेता आदिवासियों पर पेशाब करता है या जब यूपी के हाथरस की दलित बेटी का पुलिस जबरन अंतिम संस्कार कर देती है, तो वो संविधान की हत्या नहीं तो और क्या है? जब हर 15 मिनट में दलितों के खिलाफ एक बड़ा अपराध होता है और हर दिन छह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, तो वो संविधान की हत्या नहीं तो और क्या है?’

बीजेपी ने कहा कि हर साल 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाना लोगों को कांग्रेस की ‘तानाशाहीपूर्ण मानसिकता’ के खिलाफ लड़ने वालों के बलिदान और शहादत की याद दिलाएगा। पार्टी ने उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने लगभग 50 वर्ष पहले इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल के खिलाफ लड़ते हुए यातनाएं झेलीं और अपने प्राण दे दिए। भाजपा प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि 25 जून 1975 वह काला दिन था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ‘तानाशाही मानसिकता’ ने संविधान में निहित लोकतंत्र की ‘हत्या’ करके देश पर आपातकाल थोप दिया था। भाजपा के राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में सरकार के निर्णय को ‘ऐतिहासिक’ बताया और कहा कि इससे लोगों को इस घटना और संविधान को निरस्त करने के पीछे की ताकत को समझने का अवसर मिलेगा।

रोबोटिक्स क्या है और यह कैसे काम करता है?

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रोबोटिक्स एक बहु-विषयक क्षेत्र है जिसमें रोबोट का डिज़ाइन, निर्माण, संचालन और उपयोग शामिल है। रोबोट प्रोग्राम करने योग्य मशीनें हैं जो स्वचालित रूप से कार्य कर सकती हैं, आमतौर पर ऐसे वातावरण में जो मनुष्यों के लिए खतरनाक या दोहरावदार होते हैं।

रोबोटिक्स के घटक:

  1. यांत्रिक संरचना: यह रोबोट के भौतिक शरीर को संदर्भित करता है, जिसमें जोड़, एक्ट्यूएटर (मोटर), सेंसर और पर्यावरण के साथ गति और बातचीत के लिए आवश्यक कोई भी उपांग (जैसे हाथ या पहिए) शामिल हैं।

2. इलेक्ट्रॉनिक्स: रोबोट में माइक्रोकंट्रोलर या प्रोसेसर जैसे इलेक्ट्रॉनिक घटक होते हैं जो उनके “दिमाग” के रूप में कार्य करते हैं। ये घटक संवेदी जानकारी को संसाधित करते हैं और गति और व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए आदेशों को निष्पादित करते हैं।

3. सेंसर: रोबोट अपने पर्यावरण को समझने के लिए विभिन्न सेंसर का उपयोग करते हैं। इनमें दृष्टि के लिए कैमरे, दूरी मापने के लिए अल्ट्रासोनिक सेंसर, स्पर्श सेंसर, संतुलन के लिए जाइरोस्कोप आदि शामिल हो सकते हैं।

4. एक्ट्यूएटर: ये ऐसे तंत्र हैं जो रोबोट को वस्तुओं को हिलाने या हेरफेर करने की अनुमति देते हैं। उदाहरणों में मोटर, वायवीय एक्ट्यूएटर, हाइड्रोलिक एक्ट्यूएटर आदि शामिल हैं।

5. सॉफ्टवेयर: रोबोटिक्स में रोबोट के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए प्रोग्रामिंग शामिल है। यह बुनियादी कार्यों के लिए सरल एल्गोरिदम से लेकर स्वायत्त निर्णय लेने और सीखने के लिए जटिल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) तकनीकों तक हो सकता है।

रोबोटिक्स कैसे काम करता है:

1. संवेदन: रोबोट सेंसर का उपयोग करके अपने आस-पास की जानकारी इकट्ठा करते हैं। इसमें वस्तुओं का पता लगाना, दूरी मापना, पैटर्न पहचानना आदि शामिल हो सकते हैं।

2.प्रसंस्करण: सेंसर द्वारा एकत्र की गई जानकारी को रोबोट के ऑनबोर्ड कंप्यूटर या माइक्रोकंट्रोलर द्वारा संसाधित किया जाता है। यह प्रसंस्करण निर्धारित करता है कि रोबोट को अपनी प्रोग्रामिंग और प्राप्त डेटा के आधार पर क्या कार्रवाई करनी चाहिए।

3. निर्णय लेना: संसाधित जानकारी के आधार पर, रोबोट अपनी अगली क्रियाओं के बारे में निर्णय लेता है। यह पूर्व-प्रोग्राम किए गए निर्देश, मानव ऑपरेटर से आदेशों की प्रतिक्रियाएँ या AI एल्गोरिदम का उपयोग करके स्वायत्त रूप से लिए गए निर्णय हो सकते हैं।

4. क्रियान्वित करना: एक बार निर्णय लेने के बाद, रोबोट अपने एक्ट्यूएटर्स का उपयोग कार्यों को निष्पादित करने के लिए करता है। इसमें किसी अलग स्थान पर जाना, कोई वस्तु उठाना, वेल्डिंग या असेंबली जैसे कार्य करना आदि शामिल हो सकते हैं।

5. प्रतिक्रिया: इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, रोबोट अक्सर सिस्टम को प्रतिक्रिया प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, यह पुष्टि करना कि कोई कार्य पूरा हो गया है, त्रुटियों की रिपोर्ट करना, या पर्यावरण में परिवर्तन के आधार पर व्यवहार को समायोजित करना।

रोबोटिक्स के अनुप्रयोग:विनिर्माण: रोबोट का उपयोग असेंबली, वेल्डिंग, पेंटिंग और पैकेजिंग जैसे कार्यों के लिए विनिर्माण उद्योगों में व्यापक रूप से किया जाता है। अन्वेषण: रोबोट का उपयोग अंतरिक्ष अन्वेषण (जैसे मार्स रोवर्स) और अंडरवाटर एक्सप्लोरेशन (आरओवी) में किया जाता है जहाँ मानव उपस्थिति अव्यावहारिक या खतरनाक होती है।

चिकित्सा: सर्जिकल रोबोट सर्जनों को सटीकता और सटीकता के साथ न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी करने में सहायता करते हैं।

कृषि: रोबोट फसल बोने, कटाई करने और छंटाई जैसे कार्यों को स्वचालित कर सकते हैं, जिससे दक्षता में सुधार होता है और श्रम लागत कम होती है। लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग: रोबोट का उपयोग गोदामों में छंटाई, माल परिवहन और इन्वेंट्री प्रबंधन जैसे कार्यों के लिए किया जाता है।

संक्षेप में, रोबोटिक्स मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर विज्ञान को जोड़ती है ताकि स्वायत्त या अर्ध-स्वायत्त रूप से कार्य करने में सक्षम मशीनें बनाई जा सकें। AI और सेंसर तकनीक में प्रगति विभिन्न उद्योगों और रोजमर्रा की जिंदगी में रोबोट की क्षमताओं और अनुप्रयोगों का विस्तार करना जारी रखती है।

रोबोटिक्स इंजीनियरिंग और विज्ञान का एक क्षेत्र है जो रोबोट के डिजाइन, निर्माण, संचालन और उपयोग से संबंधित है। रोबोट प्रोग्राम करने योग्य मशीनें हैं जो स्वायत्त या अर्ध-स्वायत्त रूप से कार्य कर सकती हैं, अक्सर मानव कार्य को बदलने या सहायता करने के लक्ष्य के साथ। रोबोटिक्स के क्षेत्र में मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित विभिन्न विषय शामिल हैं।

मैकेनिकल डिज़ाइन: इसमें रोबोट की भौतिक संरचना को डिज़ाइन करना शामिल है, जिसमें जोड़, एक्ट्यूएटर (मोटर), फ़्रेम और आंदोलन और हेरफेर के लिए आवश्यक कोई अन्य यांत्रिक घटक शामिल हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स और नियंत्रण प्रणाली: रोबोट माइक्रोकंट्रोलर, सेंसर और एक्ट्यूएटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक घटकों से लैस होते हैं। ये घटक रोबोट की गति को नियंत्रित करने, संवेदी जानकारी की व्याख्या करने और आदेशों को निष्पादित करने के लिए एक साथ काम करते हैं।

पेरिस ओलंपिक में उनके ही प्रतिद्वंदी किशोर, नीरज के साथी खिलाड़ी खेल छोड़ना चाहते थे!

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नीरज के साथ ओलंपिक में पुरुष भाला फेंक में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। उन्हें पदक जीतने का पूरा भरोसा है. वह अपने विरोधियों के बारे में सोचे बिना खुद को चुनौती देना चाहते हैं। कुछ ही दिनों में पेरिस ओलंपिक शुरू हो जाएगा. पुरुष भाला फेंक में भारतीय खेल प्रेमियों की नजरें नीरज चोपड़ा के साथ-साथ किशोर जेना पर भी होंगी. 2022 एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता किशोर भी पदक के दावेदारों में से एक हैं। हालांकि वह कुछ दिनों से बेहतरीन फॉर्म में नहीं हैं. हालाँकि, किशोर आश्वस्त हैं।

किशोर भाला फेंक विश्व रैंकिंग में सातवें स्थान पर हैं। 85 मीटर से अधिक भाला फेंक सकता है लेकिन पिछले छह स्पर्धाओं में एक बार 80 मीटर से अधिक भाला फेंक चुका है। साल का सर्वश्रेष्ठ परिणाम 80.84 मीटर है। पिछली अंतरराज्यीय प्रतियोगिता में कांस्य पदक मिला था। एक साक्षात्कार में, किशोरी ने दावा किया, “ओलंपिक की तैयारी प्रतियोगिताओं में हर कोई तकनीकी रूप से सही जगह पर रहने की कोशिश करता है। फिटनेस बनाए रखने के लिए. गलतियाँ सुधारने के लिए. आवश्यक परीक्षण पूरा करने के लिए. वह इस तरह से खेलने की कोशिश करते हैं कि उन्हें चोट न लगे. ओलंपिक में जल्दी शीर्ष फॉर्म में आना एक समस्या हो सकती है। सही समय पर सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में होना जरूरी है. मैं पेरिस में अपना सर्वश्रेष्ठ दूँगा। मैं आश्वस्त हूँ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन सुधारने का लक्ष्य रखें. अगर मैं ऐसा कर सका तो पदक जीत सकता हूं।’

किशोर ने कहा कि टोक्यो ओलंपिक में नीरज की स्वर्ण जीत ने उन्हें प्रोत्साहित किया. उन्होंने कहा, ”जब नीरज ने स्वर्ण पदक जीता तो हम सभी बहुत खुश थे। लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर थोड़ा निराश था. ऐसा लग रहा था मानो हम एक ही खेल खेल रहे हों. कितनी दूर चला गया नीरज? मैं नहीं कर सकता.’मैंने तभी तय कर लिया, मुझे भी नीरज के यहां पहुंचना है. इसका फायदा मुझे पिछले एशियाई खेलों में मिला.’ इस बार मैं तैयार हूं.

हालांकि उससे पहले ही किशोर ने खेल छोड़ने के बारे में सोच लिया था.

जुलाई 2021 में, उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने के लिए लेबनान में प्रतिस्पर्धा की। हालांकि उन्होंने वहां गोल्ड जीता, लेकिन उन्हें टोक्यो का टिकट नहीं मिला। 78.96 मीटर की दूरी पर भाला फेंका गया. किशोर ने कहा, ”मैंने लेबनान में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया. 79 मीटर भी नहीं फेंक सके. उनकी अपनी योग्यता पर संदेह उत्पन्न हो गया। कड़ी मेहनत करने के बावजूद भी मुझे परिणाम नहीं मिल रहे थे। उस वक्त पिता पास ही खड़े थे. प्रोत्साहित। नहीं तो शायद मैं खेल छोड़ देता। मैं कुछ और करने की सोच रहा था.”

2022 तक वह कई कोशिशों के बावजूद 80 मीटर की दूरी पार नहीं कर सके. उन्होंने मार्च 2023 में पहली बार 80 मीटर पार किया। इंडियन ग्रां प्री में 81.05 मीटर का भाला फेंक। किशोर नहीं रुके. देश के सर्वश्रेष्ठ भाला फेंक खिलाड़ियों में से एक ने कहा, “उस थ्रो ने मुझे आत्मविश्वास दिया।” उसके बाद मैं जुलाई में श्रीलंका में एक प्रतियोगिता में गया. आखिरी प्रयास में मैंने 84.38 मीटर भाला फेंका. यहां तक ​​कि बुडापेस्ट विश्व चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई करने में भी असफल रहे। उन्हें 85.20 मीटर की दूरी पर भाला फेंकना होता.

सीधे क्वालिफाई करने में असफल रहने के बावजूद, किशोर ने बुडापेस्ट में विश्व चैंपियनशिप में जगह बनाई। मौका रैंकिंग के हिसाब से दिया गया. किशोर ने कहा, ‘नीरज ने बुडापेस्ट में गोल्ड जीता। 87.54 मीटर की दूरी पर भाला फेंक। मैंने 84.77 मीटर थ्रो किया. मैं पदक नहीं जीत पाने पर भी खुश था। इसके बाद मैंने एशियन गेम्स में 87.54 मीटर थ्रो करके सिल्वर जीता। उस सफलता ने मुझे पेरिस का टिकट दिला दिया। इसके बाद मैंने काम की मात्रा बढ़ा दी. अब मैं नियमित रूप से 85 मीटर से ऊपर भाला फेंक सकता हूं।’ मैं आश्वस्त हूँ मैं पेरिस में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूंगा. हमारा लक्ष्य एशियाई खेलों की तरह दो पदक लाने का होगा।”

किशोर पहले से पदकों के बारे में सोचकर खुद को तनाव में नहीं डालना चाहते। तैयारी में कोई कमी नहीं है. अन्य प्रतिस्पर्धियों की भी चिंता नहीं। किशोर पेरिस में खुद को चुनौती देकर पदक लाना चाहता है। इसके बाद मैंने काम की मात्रा बढ़ा दी. अब मैं नियमित रूप से 85 मीटर से ऊपर भाला फेंक सकता हूं।’ मैं आश्वस्त हूँ मैं पेरिस में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूंगा. हमारा लक्ष्य एशियाई खेलों की तरह दो पदक लाने का होगा।”