Saturday, March 14, 2026
Home Blog Page 588

आखिर उत्तराखंड के मजबूत गढ़ से कैसे हारी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि उत्तराखंड के मजबूत गढ़ से बीजेपी कैसे हारी है! उत्तराखंड में चल रहे विधानसभा उपचुनाव के वोटों की गिनती में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। प्रदेश की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे। 10 जुलाई को दोनों सीटों पर वोट डाले गए थे। आज चुनाव परिणाम घोषित किया जा रहा है। दोनों ही सीटों के शुरुआती रुझानों में भाजपा पिछड़ती नजर आ रही है। भाजपा को बद्रीनाथ विधानसभा सीट पर कोई खास फायदा होता नहीं दिख रहा है। वहीं, मंगलौर विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी तीसरे स्थान पर खिसकती दिख रही है। मंगलौर सीट पर विधायक सरवत करीम अंसारी के निधन के बाद उपचुनाव हो रहा है। वहीं, बद्रीनाथ विधानसभा सीट के कांग्रेस विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी के पाला बदलने के बाद उपचुनाव हो रहा है। बीजेपी दोनों सीटों पर बाहरी दूसरे दलों से आए उम्मीदवारों पर भरोसा करती दिख रही है। इस कारण कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ ढीली बनती दिख रही है। उपचुनाव के शुरुआती रुझान इसी तरफ इशारा करते दिख रहे हैं। बद्रीनाथ निवर्तमान विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी ने लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। इसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई थी। भाजपा ने उन्हें पार्टी उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतारा है। लेकिन, उपचुनाव के मैदान में वह पिछड़ते दिख रहे हैं। वहीं, मंगलोर सीट पर विधायक के निधन के बाद सहानुभूति की लहर का असर नहीं दिख रहा है। कांग्रेस उम्मीदवार यहां पर भी आगे चल रहे हैं। हालांकि, मंगलौर विधानसभा सीट पर कांग्रेस और बसपा के बीच चुनावी टक्कर होती दिख रही है। भाजपा यहां तीसरे स्थान पर की पिछड़ती नजर आ रही है।

बद्रीनाथ सीट पर भाजपा को कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। बद्रीनाथ से राजेंद्र सिंह भंडारी विधायक चुने गए। हालांकि, उन्हें भाजपा अपने पाले में लाने में कामयाब रही। ऐसे में यह सीट खाली हो गई। यहां से राजेंद्र भंडारी को एक बार फिर चुनावी मैदान में उतारा गया। हालांकि, इस सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बीच टक्कर होती दिख रही है। बद्रीनाथ विधानसभा सीट पर भाजपा ने पूर्व विधायक राजेंद्र भंडारी को उम्मीदवार बनाया। उनके समर्थन में पुष्कर सिंह धामी तक चुनावी मैदान में प्रचार करने उतरे। वहीं, मंगलौर विधानसभा सीट से करतार सिंह भड़ाना को प्रत्याशी बनाया गया। करतार सिंह भड़ाना हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विधायक रह चुके हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की सदस्यता ली थी। इस प्रकार भाजपा ने बाहरी उम्मीदवारों पर भरोसा जताया।

वहीं, कांग्रेस अलग रणनीति के साथ उपचुनाव के मैदान में उतरी। कांग्रेस ने मंगलौर सीट पर अनुभवी और बद्रीनाथ सीट पर नए चेहरे को चुनावी मैदान में उतारा। मंगलौर सीट से काजी मोहम्मद निजामुद्दीन और बद्रीनाथ सीट से प्रत्याशी लखपत बुटोला भाजपा को कड़ी टक्कर देते दिखे। उत्तराखंड उपचुनाव के चार राउंड के वोटों की गिनती के बाद असर साफ दिख रहा है। मंगलौर विधानसभा सीट पर कांग्रेस की बढ़त लगातार बड़ी हो रही है। कांग्रेस उम्मीदवार काजी मोहम्मद निजामुद्दीन ने 4898 वोटों की बढ़त बना ली है। तीसरे राउंड के वोटों की गिनती के बाद काजी मोहम्मद निजामुद्दीन 16,696 वोटों के साथ आगे निकलते दिख रहे हैं। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के उबैदुर रहमान मोंटी 11,798 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर हैं। भारतीय जनता पार्टी के करतार सिंह भड़ाना 7630 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर हैं।बद्रीनाथ विधानसभा सीट पर तीसरे राउंड में भी कांग्रेस उम्मीदवार लखपत सिंह बुटोला बढ़त बनाई हुई है। कांग्रेस उम्मीदवार लखपत सिंह बुटोला लगातार पहले नंबर पर बने हुए हैं। उन्हें अब तक 7223 वोट मिले हैं। वहीं, भाजपा के राजेंद्र सिंह भंडारी 6062 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर हैं। इस प्रकार कांग्रेस उम्मीदवार ने 1161 वोटों की बढ़त बनाई हुई है।

बीजेपी ने पिछले समय में दूसरे दलों से नेताओं को लेकर चुनावी मैदान में उतारा है। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान ऐसे मामले कई सीटों पर देखने को मिले। इन उम्मीदवारों से पार्टी का आम कार्यकर्ता कनेक्ट ही नहीं कर पाया। उत्तराखंड में भी यह होता दिख रहा है। बद्रीनाथ सीट पर 2017 के चुनाव में भाजपा ने कब्जा जमाया था। लेकिन, 2022 में पार्टी हार गई। इसके बाद विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी को अपने पाले में ले आए। फिर उम्मीदवार बना दिया। इसको लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी थी। वहीं, मंगलौर में भी कारतार सिंह भड़ाना को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं में कोई खुशी नहीं दिखी थी। कार्यकर्ता उदासीन हुए तो फायदा विपक्ष को मिलता दिख रहा है।

जब देश में हुआ पहली बार रेनल ऑटोट्रांसप्लांट सफल!

हाल ही में देश में पहली बार रेनल ऑटोट्रांसप्लांट सफल हो चुका है! एम्स दिल्ली में सात साल के एक बच्चे की दुर्लभ किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी हुई, जो सक्सेसफुल रही। यह बच्चा रेसिस्टेंट रेनोवास्कुलर हाइपरटेंशन नाम की बीमारी से पीड़ित था। इस बीमारी में उसकी किडनी की धमनियों के सिकुड़ने से हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत हो जाती थी। एम्स के डॉक्टरों ने यह ऑपरेशन 29 जून को किया। इसमें बच्चे की अपनी किडनी को निकालकर उसके शरीर के ही दूसरे हिस्से में ट्रांसप्लांट किया गया। डॉक्टरों के मुताबिक भारत में ऐसी सर्जरी पहली बार हुई है, वहीं दुनिया में ऐसा तीसरी बार हुआ है। पश्चिम बंगाल के रहने वाले 7 वर्षीय प्रणिल चौधरी की धमनी में एक एन्यूरिज्म पाया गया था, जिसकी वजह से उसकी दाहिनी किडनी में खून का प्रवाह सही तरीके से नहीं हो पा रहा था। इस वजह से उसका ब्लड प्रेशर 150/110 तक पहुंच जाता था। पिछले साढ़े तीन साल में दो बार उसके यूरिन में खून भी आया था। डॉक्टरों ने आगाह किया कि लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से दिमाग, हार्ट और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंच सकता है।

सर्जरी और किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन के एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर मंजुनाथ मारुति पोल ने बताया कि एन्यूरिज्म के लक्षण दिखने पर उसका इलाज स्टेंटिंग या सर्जरी से किया जाता है। उन्होंने बताया कि इस मामले में एन्यूरिज्म किडनी हिलम (डिस्टल) के पास स्थित था और उसका फ्यूसीफॉर्म आकार स्टेंटिंग को अव्यवहारिक और अप्रभावी बना रहा था। इसी के कारण सर्जिकल इलाज का निर्णय लिया गया। आठ घंटे तक चली इस सर्जरी को डॉ पोल और एम्स में सीवीटीएस कार्डियक सर्जरी के प्रोफेसर डॉ. प्रदीप के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम ने अंजाम दिया। सात दिन बाद बच्चे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। उसके टेस्ट से पता चला है कि सर्जरी के बाद उसकी किडनी दूसरी किडनी की तरह ही ठीक से काम कर रही है।7 साल का मासूम पिछले एक साल से हाइपरटेंशन को नियंत्रित करने के लिए रोजाना दवा ले रहा था। हालांकि, सर्जरी के बाद अब उसे इसके लिए दवा लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, ‘ऑटोट्रांसप्लांटेशन प्रक्रिया का उद्देश्य गुर्दे की शारीरिक रचना को बहाल करना, रेनोवास्कुलर हाइपरटेंशन का इलाज करना शामिल है।’

इस दुर्लभ सर्जरी की जटिलता के बारे में बताया। हमारे सहयोगी अखबार टीओआई को उन्होंने बताया कि ऑटोट्रांसप्लांटेशन का पहला उदाहरण 2014 में कोरिया में आया था, जब एक 13 वर्षीय मरीज की सर्जरी की गई थी। लेकिन ये प्रक्रिया असफल रही और सर्जरी के तुरंत बाद किडनी को निकालना पड़ा। दूसरा मामला 2021 में लंदन में एक चार साल की बच्ची का था। डॉ. पोल ने कहा कि सात साल का इस मरीज की सर्जरी का केस दुनिया का तीसरा मामला है। ये पहला सफल राइट किडनी एन्यूरिज्मकेटोमी और ऑटोट्रांसप्लांटेशन है।

यही नहीं बीएमसी के केईएम अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने पहली बार सफल हार्ट ट्रांसप्लांट किया है। केईएम देश का पहला बीएमसी अस्पताल है, जिसने हार्ट ट्रांसप्लांट जैसी जटिल सर्जरी करके इतिहास रचा है। मरीज इस वक्त डॉक्टरों की टीम की निगरानी में है। 56 साल पहले भी यहां एक बार हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया था लेकिन वह सफल नहीं हुआ था। यह अस्पताल के इतिहास में पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट है। औरंगाबाद के रहने वाले 38 वर्षीय राहुल चौहान (बदला हुआ नाम) को 35 की उम्र में पहली बार हार्ट अटैक आया था। एंजियोप्लास्टी की गई, लेकिन कुछ महीने बाद फिर दिल से जुड़ी दिक्कतें सामने आने लगीं। उन्हें जो स्टेंट लगाया गया था उसमें ब्लॉक पाया गया। हार्ट की पंपिंग कैपेसिटी भी कम हो गई थी। हार्ट फैल्योर से बचाने के लिए उन्हें दवाओं पर रखा गया था। डॉक्टरों के मुताबिक, अब केवल हार्ट ट्रांसप्लांट से ही उनकी जान बचाई जा सकती थी। ऐसे में राहुल ने पहले पुणे के अस्पताल का रुख किया, लेकिन उन्हें केईएम जाने का सुझाव दिया गया। केईएम में राहुल दो महीने तक एडमिट थे। हार्ट का वेट किया जा रहा था, लेकिन अचानक वह नाउम्मीद हो गए और उन्होंने अस्पताल से जाने का निर्णय लिया। इस पर केईएम अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें मुंबई में ही रहने की सलाह दी। परिवार डोंबिवली में किराए के घर में रुका हुआ था। आखिरकार अस्पताल से फोन आया। एक महिला का ब्रेन डेड हुआ था। उनका हार्ट राहुल का लगाया जा सकता था। 

राहुल का हार्ट ट्रांसप्लांट हो गया, लेकिन इसके पीछे परिवार का 2.5 साल का पहाड़ जैसा संघर्ष था। राहुल के पिता कहते हैं, राहुल निजी कंपनी में सिक्युरिटी गार्ड हैं। तबीयत खराब होने के बाद काम छूट गया। घर चलाने के लिए ऑटो रिक्शा चलाना शुरू किया, लेकिन तबीयत खराब होती गई और वह काम करने स्थिति में नहीं रहा। केईएम हमारे लिए स्वर्ग है। यहां के डॉक्टर हमारे लिए भगवान। ईश्वर ने जो मेरे बेटे के लिए लिखा है, वो होगा। कुछ बुरा भी हुआ तो जिम्मेदार अस्पताल नहीं होगा, क्योंकि मैंने देखा है कि 3-4 महीने में एक परिवार की तरह डॉक्टरों ने हमारे साथ व्यवहार किया है।

क्या आतंकवादियों से हार चुकी है पाकिस्तान की सरकार?

वर्तमान में पाकिस्तान की सरकार आतंकवादियों से पूरी तरह हार चुकी है! पाकिस्तान की सरकार ने एक बार फिर चरमपंथियों के आगे घुटने टेक दिए हैं। ऑपरेशन-ए-इस्तेहकाम को हरी झंडी दिए जाने के दो दिन बाद ही शहबाज शरीफ सरकार बैकफुट पर आ गई है। सोमवार देर रात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम पर सफाई दी और कहा कि ‘देश में कोई बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान नहीं किया जा रहा है।’ पीएमओ के बयान में कहा गया है कि ‘हाल ही में घोषित अज्म-ए-इस्तेहकाम को गलत तरीके से समझा जा रहा है और इसकी तुलना पहले शुरू किए गए सशस्त्र अभियान जर्ब-ए-अज्ब, राह-ए-नजात आदि से की जा रही है।’ पाकिस्तान एक बार फिर सैन्य अभियान शुरू करने जा रहा है। अभियान का फैसला चीन के वरिष्ठ मंत्री के पाकिस्तान दौरे के एक दिन बाद लिया था। चीनी मंत्री लियु जियानचाओ ने साफ कर दिया था कि सुरक्षा स्थिति बहाल हुए बिना चीन आगे पाकिस्तान में निवेश नहीं करेगा।बयान में आगे कहा गया है कि ‘पिछले अभियानों में प्रभावित क्षेत्रों से आतंकवाद का पूरी तरह से सफाया करने के लिए स्थानीय आबादी को बड़े पैमाने पर विस्थापित करना पड़ा था। वर्तमान में देश में ऐसा कोई निषिद्ध क्षेत्र नहीं है।’ पाकिस्तान ने 15 जून 2014 को अफगानिस्तान सीमा से लगे उत्तरी वजीरिस्तान इलाके में आतंकवाद विरोधी एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया था, इसमें सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा पहले से जारी ऑपरेशनों के अलावा राजनीतिक, कूटनीतिक, कानूनी और सूचना संबंधी पहलू शामिल होंगे।’ इसमें यह भी कहा गया है स्पष्टीकरण से सभी गलतफहमियों को दूर होने के साथ ही इस विषय पर अनावश्यक बहस बंद हो जानी चाहिए।जिसे जर्ब-ए-अज्ब नाम दिया गया था। अभियान शुरू होने के एक महीने के भीतर इलाके से 80 हजार परिवारों से जुड़े लगभग 9.5 लाख लोगों को विस्थापित किया गया था।

शहबाज शरीफ सरकार का ये बयान ऐसे समय में आया है जब इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI), जमीयत-ए-उलेमा इस्लाम फजल (JUI-F), अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) और अन्य विपक्षी दलों ने नए सैन्य अभियान का विरोध किया है। विपक्षी दलों ने मांग की है कि ऐसा कोई भी निर्णय लेने से पहले संसद को विश्वास में लिया जाना चाहिए। पीएमओ ने कहा, ‘ऐसे किसी बड़े पैमाने के सैन्य अभियान पर विचार नहीं किया जा रहा है, जिसमें आबादी के विस्थापन की आवश्यकता होगी।’ इसमें कहा गया है कि ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम पाकिस्तान में स्थायी स्थिरता के लिए एक बहु-क्षेत्रीय, बहु-एजेंसी, संपूर्ण-प्रणाली राष्ट्रीय दृष्टिकोण है।

बयान में आगे कहा गया है कि नए ऑपरेशन का उद्देश्य पहले से ही मौजूद खुफिया-आधारित गतिशील ऑपरेशनों को सक्रिय करना है, जिससे देश में हिंसक चरमपंथ को जड़ से उखाड़ फेंका जा सके। ताकि देश में आर्थिक विकास और समृद्धि के लिए एक समग्र सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित किया जा सके। बयान में कहा गया है, ‘इसमें सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा पहले से जारी ऑपरेशनों के अलावा राजनीतिक, कूटनीतिक, कानूनी और सूचना संबंधी पहलू शामिल होंगे।’ इसमें यह भी कहा गया है स्पष्टीकरण से सभी गलतफहमियों को दूर होने के साथ ही इस विषय पर अनावश्यक बहस बंद हो जानी चाहिए।

पाकिस्तान सरकार ने शनिवार नेशनल ऐक्शन प्लान की एपेक्स कमेटी की बैठक में ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम को मंजूरी दी थी। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर और पाकिस्तान के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री के साथ ही वरिष्ठ प्रशासनिक और सैन्य अधिकारी शामिल हुए थे। इसके बाद कहा जा रहा था कि पाकिस्तान एक बार फिर सैन्य अभियान शुरू करने जा रहा है। अभियान का फैसला चीन के वरिष्ठ मंत्री के पाकिस्तान दौरे के एक दिन बाद लिया था।पाकिस्तान ने 15 जून 2014 को अफगानिस्तान सीमा से लगे उत्तरी वजीरिस्तान इलाके में आतंकवाद विरोधी एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया था, जिसे जर्ब-ए-अज्ब नाम दिया गया था। पीएमओ ने कहा, ‘ऐसे किसी बड़े पैमाने के सैन्य अभियान पर विचार नहीं किया जा रहा है, जिसमें आबादी के विस्थापन की आवश्यकता होगी।’ इसमें कहा गया है कि ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम पाकिस्तान में स्थायी स्थिरता के लिए एक बहु-क्षेत्रीय, बहु-एजेंसी, संपूर्ण-प्रणाली राष्ट्रीय दृष्टिकोण है।अभियान शुरू होने के एक महीने के भीतर इलाके से 80 हजार परिवारों से जुड़े लगभग 9.5 लाख लोगों को विस्थापित किया गया था। चीनी मंत्री लियु जियानचाओ ने साफ कर दिया था कि सुरक्षा स्थिति बहाल हुए बिना चीन आगे पाकिस्तान में निवेश नहीं करेगा। पाकिस्तान के नए अभियान के पीछे चीन के दबाव को प्रमुख वजह माना जा रहा है।

क्या पाकिस्तान को चीन दे रहा है स्टील्थ पनडुब्बियां?

वर्तमान में चीन पाकिस्तान को स्टील्थ पनडुब्बियां दे रहा है! चीन इन दिनों पाकिस्तान के लिए हंगोर क्लास की पनडुब्बियां बनाने में व्यस्त है। इस क्लास की पहली पनडुब्बी दो महीने पहले ही समुद्री ट्रायल के लिए लॉन्च की गई थी। हंगोर क्लास की पनडुब्बियां उन्नत एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस हैं, जिन्हें समुद्र में डिटेक्ट करना मुश्किल होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि चीन इतने कम पैसे में पाकिस्तान जैसे कंगाल मुल्क को इतनी ताकतवर तकनीक से लैस पनडुब्बी क्यों दे रहा है। अब पता चला है कि दरअसल, चीन के पाकिस्तान को हंगोर क्लास की पनडुब्बी देने का कारण हिंद महासागर और अरब सागर में शक्ति संतुलन बदलना है, जिसका लाभ बीजिंग को होगा। चीन ने पाकिस्तान के लिए बनाई गई पहली हंगोर क्लास पनडुब्बी की लॉन्चिंग अप्रैल 2024 में वुहान में की थी। दोनों देशों ने पनडुब्बियों के लिए अनुबंध पर 2015 में हस्ताक्षर किए थे, जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पाकिस्तान की यात्रा पर थे। इस सौदे के तहत, चार पनडुब्बियों का निर्माण चीन के डब्ल्यूएसआईजी द्वारा किया जाना है, जबकि शेष चार का निर्माण प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (टीओटी) समझौते के तहत पाकिस्तान में कराची शिपयॉर्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स में किया जाना है। एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस, ये पनडुब्बियां पाकिस्तान को अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी भारत पर रणनीतिक बढ़त दिलाती हैं, जिसके पास ऐसी कोई स्टील्थ पनडुब्बी नहीं है।

पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, AIP प्रणाली गैर-परमाणु पनडुब्बियों को वायुमंडलीय ऑक्सीजन की आवश्यकता के बिना संचालित करने की अनुमति देती है। AIP प्रणाली से लैस पनडुब्बियां लगभग शोर रहित होती हैं, जिससे वे परमाणु हमला करने वाली पनडुब्बियों की तुलना में अधिक स्टील्थ होती हैं। अपने पुराने सहयोगी पाकिस्तान को स्टील्थ पनडुब्बियों की आपूर्ति करने में बीजिंग का लक्ष्य हिंद महासागर पर प्रभुत्व की दौड़ में भारत को पीछे छोड़ना हो सकता है। ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि चीन के साथ भारत का पुराना सीमा विवाद है। वहीं, अमेरिका भी चीन के खिलाफ भारत को हथियारों से लैस कर रहा है।

चीन की वैश्विक समुद्री शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा हिंद महासागर में उसकी बढ़ी हुई सैन्य उपस्थिति पर निर्भर करती है, जिसमें तेल और माल के लिए महत्वपूर्ण शिपिंग लेन हैं। 2017 में, चीन ने हिंद महासागर के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा खोला था। चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक मजबूत पाकिस्तानी नौसेना को महत्वपूर्ण मानता है। 2022 में, पाकिस्तानी नौसेना ने अपने सबसे उन्नत युद्धपोत तुगरिल को सेवा में शामिल किया। शंघाई शिपयार्ड में निर्मित और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और सुपरसोनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों से लैस, तुगरिल एक बहुमुखी पोत है जो कई मिशनों को अंजाम देने में सक्षम है।

उसी वर्ष, पाकिस्तान ने चीन से चार शक्तिशाली गाइडेड मिसाइल युद्धपोतों में से दूसरा तैमूर को खरीदा। शंघाई में निर्मित, तैमूर पाकिस्तान की नौसेना बलों की भौगोलिक पहुंच का विस्तार करता है। पाकिस्तान के साथ चीन की साझेदारी उसे हिंद महासागर में पैर जमाने का मौका देती है, जिसने भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ा दी हैं। चीन की तरह, भारत भी कच्चे तेल और माल के परिवहन के लिए हिंद महासागर पर बहुत अधिक निर्भर है। भारत अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव में नौसैनिक ठिकानों और बंदरगाहों में चीन के निवेश को हिंद महासागर के समुद्री क्षेत्र की घेराबंदी के रूप में देखता है। 2022 में, भारत ने श्रीलंका के हंबनटोटा में एक चीनी शोध पोत के डॉकिंग का विरोध किया, इस डर से कि जहाज भारत की रक्षा क्षमताओं की निगरानी कर सकता है।

पाकिस्तानी नौसेना को स्टील्थ पनडुब्बियों से लैस करके, चीन पाकिस्तान और भारत के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा सकता है। चूंकि भारत ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका जैसे क्वाड का हिस्सा है, इसलिए हिंद महासागर में भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तेज हो सकती है। हिंद महासागर पर प्रभुत्व की दौड़ में भारत को पीछे छोड़ना हो सकता है। ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि चीन के साथ भारत का पुराना सीमा विवाद है। वहीं, अमेरिका भी चीन के खिलाफ भारत को हथियारों से लैस कर रहा है।हिंद महासागर में अपनी सामरिक उपस्थिति बढ़ाकर, चीन अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए समुद्री मार्गों का भी विस्तार कर रहा है। चीन के तेल का अस्सी प्रतिशत मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है – इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच एक संकरा जलमार्ग जो हिंद महासागर के पूर्व में स्थित है।

जब ग्रीस में अपना दम दिखा आए राफेल लड़ाकू विमान!

हाल ही में भारत के राफेल लड़ाकू विमान ग्रीस में अपना दम दिखा कर आए है! भारतीय वायु सेना के राफेल लड़ाकू विमान इन दिनों ग्रीस में उड़ान भर रहे है। इस उड़ान में उनके साथ ग्रीक एयरफोर्स के राफेल और मिराज 2000 लड़ाकू विमान हिस्सा ले रहे हैं। भारतीय विमानों को ग्रीस के एंड्राविडा में 117 फाइटर विंग में तैनात किया गया है। इस एयर बेस पर नाटो के प्रमुख रामस्टीन फ्लैग अभ्यास के लिए तैयारियां की जा रही है, जिसे पहली बार जर्मनी से बाहर आयोजित किया जाएगा। इस बीच ग्रीस में भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों को उड़ान भरता देख तुर्की और पाकिस्तान की टेंशन बढ़ गई है। तुर्की अपने पड़ोसी ग्रीस को सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, वहीं पाकिस्तान को करीबी दोस्त। भारतीय राफेल ग्रीस में एफ-16 के साथ अभ्यास कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल पाकिस्तान करता है। ग्रीस की मीडिया के अनुसार, भारतीय राफेल विमानों ने मंगलवार को हेलनिक एयरफोर्स के 114वें फाइटर विंग के 335 और 336 स्क्वाड्रन में शामिल राफेल और मिराज 2000-5 फाइटर जेट के साथ अपना पहला संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास को पूरा किया। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के चार राफेल विमान पूरे सप्ताह चलने वाले संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास में हिस्सा लेंगे। संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास के पहले चरण में टोही उड़ानें पहले ही पूरी हो चुकी हैं। इसके बाद ग्रीक और भारतीय लड़ाकू विमान विभिन्न इलाकों में अधिक चुनौतीपूर्ण परिदृश्यों को अंजाम देने वाले हैं।

भारतीय वायु सेना के ये राफेल लड़ाकू विमान अमेरिका में “रेड फ्लैग 24” अभ्यास में शामिल होने के बाद से ही ग्रीस में मौजूद हैं। बताया जा रहा है कि भारतीय लड़ाकू विमानों को ग्रीस में रोकने का फैसला एयर फोर्स के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल डेमोस्थनीज ग्रिगोरियाडिस की पहल पर किया गया है। ग्रिगोरियाडिस भारत-ग्रीस रक्षा संबंधों के हिमायती हैं और दोनों देशों की सेनाओं के बीच करीबी संबंध रखना चाहते हैं। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच विकसित हो रहे रणनीतिक संबंधों के ढांचे के भीतर सितंबर में भारत को चार ग्रीक एफ-16 भेजने पर पहले ही सहमति हो चुकी है।

भारत, ग्रीस के साथ रक्षा सबंधों को मजबूत कर एक साथ तुर्की और पाकिस्तान दोनों को झटका देने की तैयारी में है। तुर्की का ग्रीस के साथ द्वीपों को लेकर गंभीर विवाद है। वही तुर्की कश्मीर पर पाकिस्तान का समर्थन करता है। ऐसे में भारत का ग्रीस के साथ जाना तुर्की के लिए एक कड़ा संदेश साबित हो सकता है। यही नहीं आपको बता दें कि राफेल एम को खास तौर पर एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें एक शक्तिशाली लैंडिंग गियर लगा हुआ है, जो एक छोटे रनवे पर तेजी से उतरने के बावजूद जल्द खराब नहीं होता है। इसके अलावा इसमें अरेस्ट लैंडिंग के लिए टेल हुक और एयरक्राफ्ट कैरियर पर पार्किंग के लिए फोल्डेबल विंग भी है। ये विशेषताएं इसे आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य पर तैनाती के लिए आदर्श बनाती हैं, जिससे इंडियन ओशन रीजन में हमारी सैन्य शक्ति मेंउल्लेखनीय वृद्धि होने के आसार हैं। 

दूसरी ओर ग्रीस के एफ-16 का अध्ययन कर भारतीय वायु सेना के पायलट इसकी खूबियां और ताकत को अच्छे से समझ सकते हैं। मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व सर्वोपरि है, क्योंकि ये चोकपॉइंट वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से चीन के लिए। राफेल एम के शामिल होने से भारत को इन महत्वपूर्ण जलमार्गों में निर्णायक लाभ मिलता है। दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक के रूप में, मलक्का जलडमरूमध्य मध्य पूर्व और अफ्रीका से चीन के ऊर्जा आयात के लिए महत्वपूर्ण है। मलक्का जलडमरूमध्य के वैकल्पिक मार्ग सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। राफेल एम की अग्रिम तैनात वाहकों से संचालन करने की क्षमता भारतीय नौसेना को इन क्षेत्रों में शक्ति प्रक्षेपण के लिए लचीलापन प्रदान करती है। विमान की उन्नत स्ट्राइक क्षमताएं, जिसमें एक्सोसेट AM39 एंटी-शिप मिसाइल शामिल है, भारतीय नौसेना को संभावित समुद्री खतरों को बेअसर करने और इन महत्वपूर्ण मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती हैं।

राफेल एम की क्षमताएं भारतीय नौसेना को इस महत्वपूर्ण चोकपॉइंट की प्रभावी रूप से निगरानी और नियंत्रण करने की अनुमति देती हैं।दोनों देशों की सेनाओं के बीच करीबी संबंध रखना चाहते हैं। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच विकसित हो रहे रणनीतिक संबंधों के ढांचे के भीतर सितंबर में भारत को चार ग्रीक एफ-16 भेजने पर पहले ही सहमति हो चुकी है।इससे पाकिस्तानी वायु सेना का सरप्राइज एलिमेंट खत्म हो जाएगा, जिसका वह लगातार धौंस दिखाता है।

क्या तिब्बत के जरिए भारत को घेरने जा रहा है चीन?

चीन तिब्बत के जरिए भारत को घेरने जा रहा है! चीन के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट जे-20 माइटी ड्रैगन को हाल में ही सैटेलाइट इमेज में तिब्बत के शिगात्से एयर बेस पर खड़े हुए देखा गया है। इसके साथ ही जे-10 लड़ाकू विमान की भी तैनाती की गई है। 12,408 फीट की ऊंचाई पर चीन के इन दो सबसे खतरनाक लड़ाकू विमानों की तैनाती ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। चीन की इस तैनाती ने जे-20 और भारत के राफेल लड़ाकू विमान के बीच तुलना को बढ़ावा दिया है। चीन के पास भले ही भारत की तुलना में विमानों की संख्या बहुत अधिक हो, लेकिन सिर्फ यही चीज वायु शक्ति के वास्तविक सैन्य माप को नहीं दर्शाती है। इनमें हथियारों की क्षमताएं, उनकी तैनाती, रणनीति और संचालन की अवधारणाएं और सबसे महत्वपूर्ण बात पायलट की अपनी योग्यता और अनुभव मायने रखते हैं। चीनी J-20 को अमेरिकी F-22 के काउंटर के रूप में बताया जाता है, जिसमें लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और हथियारों को अपने अंदर छिपाने की क्षमता है। उनकी मौजूदगी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) के उच्च-स्तरीय प्लेटफॉर्म, लड़ाकू अभियानों के लिए अपने उच्च-ऊंचाई वाले हवाई ठिकानों का उपयोग करने की इसकी क्षमता और भारतीय वायुसेना द्वारा सुखोई और राफेल की अग्रिम तैनाती का मुकाबला करने के लिए इस क्षेत्र में हवाई शक्ति को पेश करने की इसकी बढ़ती क्षमता को दर्शाती है।

यह एक राजनीतिक संकेत भी है कि भारत के साथ सीमा विवाद अब एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि संप्रभु हवाई क्षेत्र का मुद्दा है। भविष्य में इसके ठिकानों की अधिक नियमित सक्रियता से विवादित क्षेत्रों के करीब हमारी सीमाओं पर हवाई गतिविधि में वृद्धि होगी और भारत की प्रतिक्रिया का परीक्षण करने के लिए अधिक बार हवाई उल्लंघन होगा। यह भी स्पष्ट है कि सभी विमान खुले टरमैक (रनवे से सटा पार्किंग बे) पर पंक्तिबद्ध हैं, किसी भी विस्फोट-संरक्षित एयरफील्ड बुनियादी ढांचे और बिखरे हुए कठोर विमान आश्रयों की अनुपस्थिति और छलावरण के किसी भी प्रयास के बिना। टरमैक पर और उसके आसपास विस्तारित लड़ाकू अभियानों के लिए आवश्यक सहायक जमीनी उपकरणों की स्पष्ट अनुपस्थिति अस्थायी तैनाती की उच्च संभावना को इंगित करती है। प्लेटफार्मों का मिश्रण और केजे 500 की उपस्थिति चीनी वायु सेना के जटिल बड़े मिशनों के बढ़ते संचालन और लंबी दूरी पर हवाई शक्ति को इस्तेमाल करने की बढ़ती क्षमताओं को रेखांकित करती है।

बीजिंग ने अपनी गतिशीलता और रसद सहायता को बनाए रखने के लिए लगातार एक मजबूत सीमा अवसंरचना का निर्माण किया है, बल अनुपात में सुधार करने के लिए अपनी सेना की तैनाती में वृद्धि की है, और भारत-चीन सीमा पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र के 29 सत्रों के बावजूद सैन्य उपस्थिति के साथ अपने राजनीतिक रुख को बनाए रखना जारी रखा है। विवादित क्षेत्रों में बफर जोन के निर्माण की तीखी मांगों के आगे झुकना भविष्य में हवाई बफर जोन की मांगों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है। यह चीनियों को रणनीतिक रूप से क्षेत्र में भारतीय वायु सेना की उपस्थिति और संचालन को प्रतिबंधित करने के लिए अनुकूल है। यदि वर्तमान स्थिति का सावधानीपूर्वक समाधान नहीं किया गया तो सीमा के निकट अग्रिम हवाई पट्टियाँ और विवादित क्षेत्रों पर संप्रभु हवाई क्षेत्र “नो-फ्लाई ज़ोन” बन सकते हैं, जो खुफिया, निगरानी और टोही मिशनों, AD लड़ाकू हवाई गश्तों के साथ-साथ हवाई गतिशीलता और हवाई रसद के लिए IAF विमानों के लिए दुर्गम हो सकते हैं।

फिलहाल, भारतीय के चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के मुख्य बेड़े में सुखोई Su-30, MiG-29 और मिराज 2000 शामिल हैं। इन्हें 4.5 जनरेशन के राफेल के दो स्क्वाड्रन से और अधिक ताकत दी गई है। राफेल को खास तौर पर चीन से निपटने के लिए तैनात किया गया है। हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सुरक्षा के लिए राफेल के दो स्क्वाड्रन काफी नहीं हैं। सरकार भी भारतीय वायु सेना की घटती लड़ाकू हवाई शक्ति सूची से वाकिफ है, लेकिन भारत के महाद्वीपीय खतरे में इस रणनीतिक महत्वपूर्णता को संबोधित करने की तत्परता का अभाव गंभीर चिंता का विषय है।

7,000 किमी से अधिक शत्रुतापूर्ण सीमाओं और बचाव किए जाने वाले संप्रभु हवाई क्षेत्रों की विशाल मात्रा को देखते हुए, 4.5 पीढ़ी के राफेल के दो स्क्वाड्रन हमारी वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कहीं भी पर्याप्त नहीं हैं। चीन को सैन्य रूप से दूर रखने के लिए, 4.5-पीढ़ी के विमानों की संख्या को मजबूत करने के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) की कमी को तत्काल पूरा करना, न केवल भारतीय वायु सेना की आवश्यकता है, बल्कि कई कारणों से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है।

क्या राफेल एम विमान बदल सकता है भारत की तस्वीर?

आने वाले समय में राफेल एम विमान भारत की तस्वीर बदल सकता है! भारतीय नौसेना अपने नए विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत के लिए फ्रांसीसी राफेल-एम, मरीन लड़ाकू विमान को खरीदने जा रही है। राफेल एम मरीन फाइटर जेट्स के शामिल होने से भारतीय नौसेना की क्षमताओं और हिंद महासागर क्षेत्र आईओआर की रणनीतिक गतिशीलता पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। राफेल एम, मरीन राफेल लड़ाकू विमान का एक नेवल वेरिएंट है, जो भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता और युद्ध की तस्वीर को बदल सकता है। इतना ही नहीं, अपने विस्तारित रेंज और ज्यादा हथियारों के साथ उड़ान भरने की इसकी क्षमता दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा करने के लिए पर्याप्त है। भारतीय वायु सेना के रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन एमजे ऑगस्टीन विनोद वीएसएम ने लिखा कि राफेल एम अत्याधुनिक एवियोनिक्स से लैस है, जिसमें थेल्स आरबीई2 एए एईएसए रडार और स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली शामिल है, जिसे मेटियोर बीवीआरएएएम दृश्य सीमा से परे हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल के साथ जोड़ा गया है।दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक के रूप में, मलक्का जलडमरूमध्य मध्य पूर्व और अफ्रीका से चीन के ऊर्जा आयात के लिए महत्वपूर्ण है। राफेल एम की क्षमताएं भारतीय नौसेना को इस महत्वपूर्ण चोकपॉइंट की प्रभावी रूप से निगरानी और नियंत्रण करने की अनुमति देती हैं। ये उन्नत प्रणालिया बेहतर परिस्थितिजन्य जागरूकता और युद्ध प्रभावशीलता सुनिश्चित करती हैं, जिससे भारतीय नौसेना हवाई श्रेष्ठता स्थापित करने, सटीक हमले करने और हवाई रक्षा, जमीनी समर्थन और समुद्री हमलों जैसे विविध मिशनों को पूरा करने में सक्षम होती है।

राफेल एम को खास तौर पर एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेशन के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें एक शक्तिशाली लैंडिंग गियर लगा हुआ है, जो एक छोटे रनवे पर तेजी से उतरने के बावजूद जल्द खराब नहीं होता है। इसके अलावा इसमें अरेस्ट लैंडिंग के लिए टेल हुक और एयरक्राफ्ट कैरियर पर पार्किंग के लिए फोल्डेबल विंग भी है। ये विशेषताएं इसे आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य पर तैनाती के लिए आदर्श बनाती हैं, जिससे इंडियन ओशन रीजन में हमारी सैन्य शक्ति मेंउल्लेखनीय वृद्धि होने के आसार हैं।

राफेल एम के उन्नत सेंसर और नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध क्षमताएं समुद्री डोमेन जागरूकता को बढ़ाती हैं। यह क्षमता विशाल समुद्री क्षेत्रों की निगरानी, संभावित खतरों की पहचान और ट्रैकिंग और संचार की समुद्री लाइनों (SLOCs) की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। राफेल एम की लंबी दूरी कर मार करने की क्षमता, एरियल रिफ्यूलिंग के साथ मिलकर भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल पहुंच का विस्तार करती हैं। यह रणनीतिक पहुंच संभावित विरोधियों के लिए एक दुर्जेय निवारक के रूप में कार्य करती है और पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की शक्ति प्रक्षेपण की क्षमता को बढ़ाती है।

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व सर्वोपरि है, क्योंकि ये चोकपॉइंट वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से चीन के लिए। राफेल एम के शामिल होने से भारत को इन महत्वपूर्ण जलमार्गों में निर्णायक लाभ मिलता है। दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक के रूप में, मलक्का जलडमरूमध्य मध्य पूर्व और अफ्रीका से चीन के ऊर्जा आयात के लिए महत्वपूर्ण है। राफेल एम की क्षमताएं भारतीय नौसेना को इस महत्वपूर्ण चोकपॉइंट की प्रभावी रूप से निगरानी और नियंत्रण करने की अनुमति देती हैं।

बढ़ी हुई खुफिया, निगरानी और टोही क्षमताएं समुद्री यातायात की वास्तविक समय पर ट्रैकिंग को सक्षम बनाती हैं, यह सुनिश्चित करती हैं कि किसी भी संभावित खतरे या अवैध गतिविधियों का तुरंत पता लगाया जाए और उनका समाधान किया जाए। मलक्का जलडमरूमध्य के वैकल्पिक मार्ग सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। राफेल एम की अग्रिम तैनात वाहकों से संचालन करने की क्षमता भारतीय नौसेना को इन क्षेत्रों में शक्ति प्रक्षेपण के लिए लचीलापन प्रदान करती है। बता दें कि जिसे मेटियोर बीवीआरएएएम दृश्य सीमा से परे हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल के साथ जोड़ा गया है। ये उन्नत प्रणालिया बेहतर परिस्थितिजन्य जागरूकता और युद्ध प्रभावशीलता सुनिश्चित करती हैं, जिससे भारतीय नौसेना हवाई श्रेष्ठता स्थापित करने, सटीक हमले करने और हवाई रक्षा, जमीनी समर्थन और समुद्री हमलों जैसे विविध मिशनों को पूरा करने में सक्षम होती है। विमान की उन्नत स्ट्राइक क्षमताएं, जिसमें एक्सोसेट AM39 एंटी-शिप मिसाइल शामिल है, भारतीय नौसेना को संभावित समुद्री खतरों को बेअसर करने और इन महत्वपूर्ण मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती हैं।

क्या अमेरिका करने वाला है चीन के खिलाफ बड़ी कार्रवाई?

अमेरिका अब चीन के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करने वाला है! हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता का जवाब देने के लिए अमेरिका ने बड़ी योजना बनाई है। इसके तहत अमेरिका सेना जापान में अपने सैन्य बलों को अपग्रेड करने के लिए 10 अरब डॉलर खर्च करने जा रही है। रक्षा विभाग ने बुधवार को बताया है कि अमेरिका दर्जनों नवीनतम लड़ाकू विमान को जापान भेजेगा। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, पेंटागन ने बताया है कि इनका इस्तेमाल ‘अमेरिका-जापान गठबंधन को बढ़ाने, क्षेत्रीय प्रतिरोध को मजबूत करने और हिंद प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता को मजबूत करने के लिए किया जाएगा।’ पेंटागन ने अपनी विज्ञप्ति में बताया है कि आधुनिकीकरण की योजना के तहत उत्तरी जापान के मिसावा एयरबेस पर 36 F-16 फाइटर जेट की जगह पांचवी पीढ़ी के F-35A लड़ाकू विमान लेंगे। इसके सात ही दक्षिणी द्वीप ओकिनावा के कडेना एयर बेस पर 36 नए F-35EX जेट तैनात किए जाएंगे, जो पिछले साल 48 पुराने F-15C/D जेट की जगह लेंगे। जापान का उत्तर में रूस और पूर्वी सागर में द्वीपों को लेकर चीन के साथ क्षेत्रीय विवाद चल रहा है। इस बीच उत्तर कोरिया ने अपने बढ़ते मिसाइल कार्यक्रम चिंता का विषय बन गया है, जिसके तहत प्योंगयांग ने जापानी क्षेत्र में मिसाइलें भेजी हैं। पेंटागन ने यह भी कहा है कि हिरोशिमा के दक्षिण में होन्शू के मुख्य द्वीप पर स्थित मरीन कॉर्प्स एयर स्टेशन इकाकुनी में तैनात F-35B विमानों की संख्या में बदलाव किया जाएगा। हालांकि, इस बारे में कोई संख्या नहीं बताई। पेंटागन की विज्ञप्ति में कहा है कि जापान में संयुक्त बल के सबसे एडवांस युद्धक विमान को तैनात करने की योजना जापान की रक्षा के लिए अमेरिका की दृढ़ प्रतिबद्धता और दोनों देशों के स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा दृष्टिकोण को दर्शाती है।

जापान में अमेरिकी सेना अपनी क्षमता को ऐसे समय में मजबूत कर रही है, जब टोक्यो के लिए चीन, रूस और उत्तर कोरिया का खतरा बढ़ रहा है।योजना जापान की रक्षा के लिए अमेरिका की दृढ़ प्रतिबद्धता और दोनों देशों के स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा दृष्टिकोण को दर्शाती है। F-15EX अमेरिकी वायुसेना का सबसे नया लड़ाकू विमान है। हालांकि, यह F-35 जैसा स्टील्थ लड़ाकू विमान नहीं है, जिसे मिसावा एय़र पर तैनात किया जाना है। जापान का उत्तर में रूस और पूर्वी सागर में द्वीपों को लेकर चीन के साथ क्षेत्रीय विवाद चल रहा है। इस बीच उत्तर कोरिया ने अपने बढ़ते मिसाइल कार्यक्रम चिंता का विषय बन गया है, जिसके तहत प्योंगयांग ने जापानी क्षेत्र में मिसाइलें भेजी हैं! 

जापान का कडेना एयर बेस अमेरिकी वायु सेना के 18वीं विंग का घर है। इसका महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि अमेरिकी वायु सेना इसे अपने प्रशांत क्षेत्र का आधार कहती है। चार दशकों से भी अधिक समय से वहां मौजूद F-15s इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रतिरोध का केंद्रीय प्रतीक रहे हैं। लेकिन 2022 में डबल इंजन लड़ाकू विमानों की सेवा अवधि समाप्त होने के बाद अमेरिकी वायु सेना ने इन विमानों को कडेना से वापस बुलाना शुरू कर दिया था। ऐसे में F-14EX की स्थायी उपस्थिति एयर बेस पर अमेरिकी बलों की संरचना में स्थिरता लाएगी।बता दें कि एयर स्टेशन इकाकुनी में तैनात F-35B विमानों की संख्या में बदलाव किया जाएगा। हालांकि, इस बारे में कोई संख्या नहीं बताई। पेंटागन की विज्ञप्ति में कहा है कि जापान में संयुक्त बल के सबसे एडवांस युद्धक विमान को तैनात करने की योजना जापान की रक्षा के लिए अमेरिका की दृढ़ प्रतिबद्धता और दोनों देशों के स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझा दृष्टिकोण को दर्शाती है।  यही नहीं बता सकता चीन समुद्री रास्‍ते से मलक्‍का स्‍ट्रेट के जरिए दुनियाभर को अपना सामान भेजता है। इन देशों को उम्‍मीद है कि इस रेललाइन से आर्थिक विकास होगा और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। साल 2018 में मलेशिया के तत्‍कालीन राष्‍ट्रपत‍ि महात‍िर मोहम्‍मद ने कहा था कि इस प्रॉजेक्‍ट में बहुत ज्‍यादा खर्च आएगा और इसी वजह से वह इसे ठंडे बस्‍ते में डाल रहे हैं। उन्‍होंने कहा था, ‘मेरा मानना है कि चीन खुद भी चाहता है कि मलेशिया एक दिवालिया देश नहीं बने।’ F-15EX अमेरिकी वायुसेना का सबसे नया लड़ाकू विमान है। हालांकि, यह F-35 जैसा स्टील्थ लड़ाकू विमान नहीं है, जिसे मिसावा एय़र पर तैनात किया जाना है। अमेरिकी वायु सेना ने F-35 को लंबे समय से F-16 की जगह लेने वाले लड़ाकू विमान के रूप में देख रही है।

क्या सिंगापुर तक बुलेट ट्रेन चला पाएगा चीन?

चीन ने सिंगापुर तक बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारी पूरी कर ली है! चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने पिछले सप्‍ताह मलेशिया की यात्रा की। चीनी प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका देश दक्षिण पूर्व एशिया के देशों मलेशिया, लाओस और थाइलैंड में अपने रेलवे के प्रॉजेक्‍ट को आपस में जोड़ना चाहता है। इसके लिए चीन एक अध्‍ययन कराना चाहता है ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ाया जा सके। चीन अपने बेल्‍ट एंड रोड प्रॉजेक्‍ट के तहत इस रेललाइन को बनाना चाहता है। ली ने मलेशिया के ईस्‍ट कोस्‍ट रेल लिंक के भूमिपूजन समारोह में हिस्‍सा लिया। चीन अगर ऐसा करने में सफल होता है तो वह सिंगापुर तक बुलेट ट्रेन दौड़ाने में सफल हो जाएगा। इससे पूरे दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में चीन का प्रभाव काफी बढ़ जाएगा।  दरअसल मलेशिया की सरकार देश की पहली हाई स्‍पीड रेलवे बनाना चाहती है जो राजधानी क्‍वालालंपुर को पड़ोसी सिंगापुर से जोड़ेगी। चीन ने इस इलाके में बीआरआई के तहत बहुत बड़े पैमाने पर निवेश किया है। उसकी कोशिश है कि अफ्रीका की तरह से ही एशिया में भी आधारभूत ढांचे बनाकर अपने प्रभाव को बढ़ाया जा सके। चीन ने 10 अरब डॉलर के प्रॉजेक्‍ट की योजना बनाई है जो चीन के पूर्वी शहर कुनमिंग शहर को एशियाई देशों के रास्‍ते सिंगापुर से रेलमार्ग से जोड़ेगा। इससे चीन की मलेशिया के पश्चिमी तट पर स्थित पोर्ट कलांग तक सीधी पहुंच हो जाएगी जो रणनीत‍िक रूप से बेहद महत्‍वपूर्ण मलक्‍का स्‍ट्रेट तक चीन को रास्‍ता मुहैया करा देगा।

अभी चीन समुद्री रास्‍ते से मलक्‍का स्‍ट्रेट के जरिए दुनियाभर को अपना सामान भेजता है। इन देशों को उम्‍मीद है कि इस रेललाइन से आर्थिक विकास होगा और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। साल 2018 में मलेशिया के तत्‍कालीन राष्‍ट्रपत‍ि महात‍िर मोहम्‍मद ने कहा था कि इस प्रॉजेक्‍ट में बहुत ज्‍यादा खर्च आएगा और इसी वजह से वह इसे ठंडे बस्‍ते में डाल रहे हैं। उन्‍होंने कहा था, ‘मेरा मानना है कि चीन खुद भी चाहता है कि मलेशिया एक दिवालिया देश नहीं बने।’ इसके बाद साल 2020 में एक और समझौता हुआ जिसमें चीन ने खर्च को कम कर लिया और फिर रेल प्रॉजेक्‍ट पर काम शुरू हुआ।

दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को कनेक्‍ट करने के लिए तीन रेललाइन बिछाने की योजना है। इसमें पहला- पश्चिमी लाइन है जो चीन को म्‍यांमार के रास्‍ते थाइलैंड से जोड़ेगी। दूसरा- मध्‍य लाइन जो लाओस के रास्‍ते थाइलैंड को जोड़ेगी। तीसरी- पूर्वी लाइन जो वियतनाम, कंबोडिया और थाइलैंड को जोड़ेगी। एक और रेल लाइन बनाई जाएगी जो थाइलैंड की राजधानी बैंकाक, मलेशिया और सिंगापुर को जोड़ेगी। यह वही इलाका है जहां पर मलक्‍का स्‍ट्रेट है जिसे चीन की दुखती रग कहा जाता है। दुनिया की फैक्‍ट्री कहे जाने वाले चीन को हमेशा यह खौफ रहता है कि मलक्‍का स्‍ट्रेट पर उसे भारत और अमेरिका की सेना घेर सकती हैं। मलक्‍का स्‍ट्रेट से ही दुनिया का 30 फीसदी व्‍यापार होता है।

इसी वजह से चीन वैकल्पिक रास्‍ते तलाश रहा है। चीन ग्‍वादर पाकिस्‍तान और म्‍यांमार में रेललाइन बिछाने या सड़क बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि उसकी हिंद महासागर तक सीधे पहुंच हो जाए। मलेशिया में हाई स्‍पीड ट्रेन दौड़ाने की चीन की कोशिश में कई बाधाएं आ रही हैं। अब तक केवल लाओस से चीन के बीच ही हाई स्‍पीड ट्रेन प्रॉजेक्‍ट ही आगे बढ़ पाया है। मलेशिया की तरह से थाइलैंड भी बहुत ज्‍यादा खर्च की वजह से इससे बच रहा है और उसे चीन से भी मदद लेने में भी चिंता हो रही है। यह प्रॉजेक्‍ट पहले साल 2028 में पूरा होना था अब यह लटक सकता है। यही नहीं इस प्रॉजेक्‍ट से फायदा होने पर भी विशेषज्ञ आशंका जता रहे हैं। बता दें कि हंबनटोटा प्रॉजेक्‍ट समेत चीन के बनाए कई प्रॉजेक्‍ट दुनिया में सफेद हाथी साबित हुए हैं। बता दें कि उसकी कोशिश है कि अफ्रीका की तरह से ही एशिया में भी आधारभूत ढांचे बनाकर अपने प्रभाव को बढ़ाया जा सके। चीन ने 10 अरब डॉलर के प्रॉजेक्‍ट की योजना बनाई है जो चीन के पूर्वी शहर कुनमिंग शहर को एशियाई देशों के रास्‍ते सिंगापुर से रेलमार्ग से जोड़ेगा। इससे चीन की मलेशिया के पश्चिमी तट पर स्थित पोर्ट कलांग तक सीधी पहुंच हो जाएगी जो रणनीत‍िक रूप से बेहद महत्‍वपूर्ण मलक्‍का स्‍ट्रेट तक चीन को रास्‍ता मुहैया करा देगा। बाद में चीन लोन के बल पर इन प्रॉजेक्‍ट पर पूरी तरह से कब्‍जा कर लेता है और फिर अपनी मनमानी करता है। चीन की कोशिश है कि इस आर्थिक चाल का फायदा उठाते हुए दक्षिण चीन सागर पर अपनी पकड़ को मजबूत किया जाए।

क्या चीन को भारत ने दक्षिण सागर में दे दिया है जवाब ?

हाल ही में भारत ने चीन को दक्षिण सागर में जवाब दे दिया है! दक्षिण चीन सागर में चीन के लगातार दबाव और हिंद महासागर क्षेत्र आईओआर में रणनीतिक विस्तार के बीच भारत इस साल बंगाल की खाड़ी में अन्य ‘क्वाड’ देशों, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ शीर्ष स्तरीय मालाबार नौसैनिक अभ्यास की मेजबानी करेगा। रक्षा सूत्रों ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि नौसैनिक अभ्यास में एडवांस पनडुब्बी रोधी युद्ध पर प्रमुख ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही मालाबार अभ्यास का 28वां एडिशन अक्टूबर में भारत के पूर्वी समुद्री तट पर आयोजित किया जाएगा ताकि चार देशों के बीच सैन्य अंतर-क्षमता को और बढ़ाया जा सके। सूत्र ने बताया कि मालाबार में जटिल सतह, वायु-रोधी और पनडुब्बी रोधी युद्ध अभ्यास के साथ-साथ संयुक्त युद्धाभ्यास और एडवांस सामरिक अभ्यास किए जाएंगे, ताकि युद्ध कौशल को बेहतर बनाया जा सके। अभ्यास के लिए पांचवें देश को आमंत्रित करने की अभी कोई योजना नहीं है। मालाबार 1992 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय अभ्यास के रूप में शुरू हुआ था। अब इसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया नियमित भागीदार के रूप में शामिल हैं। पिछले साल अगस्त में सिडनी में आयोजित किया गया था। बदले में जापान ने 2022 में योकोसुका में अभ्यास की मेजबानी की थी।

इस साल मालाबार अभ्यास अगस्त-सितंबर में भारत की तरफ से अपने पहले प्रमुख बहु-राष्ट्रीय हवाई युद्ध अभ्यास ‘तरंग शक्ति’ की मेजबानी करने के कुछ समय बाद ही होगा। क्वाड देशों के अलावा, यूके, फ्रांस, जर्मनी, यूएई और सिंगापुर जैसे अन्य देशों की वायु सेनाएं भी इस अभ्यास में भाग लेंगी। आक्रामक चीन अधिकांश देशों की रडार स्क्रीन पर सबसे ऊपर है। 355 युद्धपोतों और पनडुब्बियों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना के साथ, बीजिंग दक्षिण चीन सागर में अपने पड़ोसियों, विशेष रूप से फिलीपींस को विस्तारवादी क्षेत्रीय दावों के साथ मजबूत कर रहा है, साथ ही कई नए कृत्रिम द्वीपों का निर्माण भी कर रहा है। भारत के साथ भूमि सीमाओं पर भी चीन की इसी तरह की ‘ग्रे जोन’ और सलामी-स्लाइसिंग रणनीति स्पष्ट है। आईओआर में चीन की बढ़ती उपस्थिति पर भी बड़ी चिंता है। अगस्त 2017 में जिबूती में अपना पहला विदेशी बेस स्थापित करने के बाद बीजिंग अफ्रीका के पूर्वी तट पर अतिरिक्त लॉजिस्टिक टर्न-अराउंड सुविधाओं की तलाश कर रहा है। चीन तंजानिया, मोजाम्बिक, मेडागास्कर और कोमोरोस जैसे कई देशों में कदम रख रहा है। बेशक, बीजिंग के पास पाकिस्तान के ग्वादर और कराची बंदरगाहों तक पूरी पहुंच है। एंटी-पायरेसी एस्कॉर्ट बलों के हिस्से के रूप में चीनी युद्धपोत भी अब लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में घूम रहे हैं।

इसके अलावा चीनी सर्वेक्षण और रिसर्च जहाजों के साथ-साथ उपग्रह और मिसाइल-ट्रैकिंग जहाज लगभग हमेशा IOR में मौजूद रहते हैं ताकि नेविगेशन और पनडुब्बी संचालन के लिए उपयोगी समुद्र विज्ञान और अन्य डेटा का मानचित्रण किया जा सके। उन्होंने कहा कि चीन यहां अधिक दक्षता के साथ काम करने के लिए IOR में अपने पानी के नीचे के डोमेन जागरूकता को बढ़ा रहा है। भारत, निश्चित रूप से, क्वाड और कई अन्य देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को द्विपक्षीय और बहुपक्षीय रूप से लगातार बढ़ा रहा है। भारत के पास अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के साथ सैन्य रसद समझौते भी हैं। ये युद्धपोतों और विमानों के लिए पारस्परिक ईंधन भरने, मरम्मत और बर्थिंग सुविधाएं प्रदान करते हैं। रूस के साथ एक ऐसा ही समझौता अब विचाराधीन है।

मालाबार से पहले, भारत का 6000 टन वजनी बहुउद्देशीय स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस शिवालिक, दक्षिण चीन सागर और उत्तरी प्रशांत महासागर में लंबी दूरी की तैनाती पर है। एक पी-8आई लंबी दूरी का समुद्री गश्ती विमान वर्तमान में हवाई के पर्ल हार्बर में दुनिया के सबसे बड़े नौसैनिक अभ्यास रिमपैक में भाग ले रहा है। एक अन्य सूत्र ने कहा कि रिमपैक भारतीय तट से 9,000 समुद्री मील की दूरी पर हो रहा है।अभ्यास के रूप में शुरू हुआ था। अब इसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया नियमित भागीदार के रूप में शामिल हैं। पिछले साल अगस्त में सिडनी में आयोजित किया गया था। बदले में जापान ने 2022 में योकोसुका में अभ्यास की मेजबानी की थी। एक भारतीय पनडुब्बी, आईएनएस वागीर भी पिछले साल पहली बार विस्तारित तैनाती में ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट तक गई थी। उन्होंने कहा कि मालाबार वार्ता मजबूत सहयोग, साझा मूल्यों और चारों देशों की सामूहिक क्षमता के बारे में है, ताकि एक स्वतंत्र, खुला और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र सुनिश्चित किया जा सके, जिसे चीन बाधित करने की कोशिश कर रहा है।