Friday, March 13, 2026
Home Blog Page 607

क्या अब सरकार तोड़ेगी आतंकवादियों का नेटवर्क?

आने वाले समय में सरकार आतंकवादियों का नेटवर्क तोड़ सकती है! ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसे कुछ गांवों में छोटे-छोटे दुकान हैं, जहां पर सिम कार्ड से जुड़े फ्रॉड को अंजाम दिया जाता है। सिम कार्ड स्वैपिंग, एक व्यक्ति के नाम पर कई सिम कार्ड निकालकर आतंकी या उग्रवादी संगठनों को बल्क में बेचा जाता है। साथ ही कस्टमर केयर कॉलर बनकर देश के दूसरे हिस्से में लोगों के साथ ऑनलाइन फ्रॉड भी किए जा रहे हैं। इन दुकानों में 8वीं-10वीं पढ़े या फेल छात्र दिनभर फोन लिए चिपके रहते हैं और लोगों को चूना लगाते रहते हैं। साइबर फोरेंसिक एंड साइबर लॉ एक्सपर्ट सोनाली गुहा ने बताया कि देश के दूर-दराज इलाकों में एक आधार पर कई सिम कार्ड हासिल करने, बार-बार अंगूठा लगाने के बहाने कई सिम कार्ड जारी कर दिए जाते हैं, जिन्हें खुफिया तरीके से बेच दिया जाता है। इसके उन्हें अच्छे पैसे मिलते हैं। हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मामले में एक व्यक्ति एक सिम कार्ड की वकालत की है। कंज्यूमर साइबर सेफ्टी पर काम करने वाला एक इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन नॉर्टन लाइफ लॉक के एक सर्वे के अनुसार, बीते साल त्योहारों के समय करीब 62 फीसदी भारतीयों को ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान धोखाधड़ी का सामना करना पड़ा। साइबर सेफ्टी पर काम करने वाली एक संस्था aag-it.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में बीते 1 साल में 100 करोड़ ई-मेल्स एक्सपोज किए गए, जिसमें हर पांचवा व्यक्ति धोखाधड़ी का शिकार हुआ था। हर घंटे करीब 1,000 ऑनलाइन फ्रॉड के मामले सामने आ रहे हैं। वहीं, IIT कानपुर से जुड़ी एक संस्था फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन के सर्वे के अनुसार, हर दिन औसतन 23 हजार साइबर क्राइम हो रहे हैं। हाल ही में महादेव बेटिंग ऐप स्कैम केस इसका एक बड़ा उदाहरण है।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में ऑनलाइन धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के बीच केंद्र से आग्रह किया कि वह व्यक्तियों को एक से अधिक प्रीपेड सिम कार्ड जारी करने की निगरानी एवं विनियमन के प्रयास तेज करे। दरअसल, यह आदेश ‘सुमित नंदवानी बनाम हरियाणा राज्य’ मामले का हिस्सा था जिसमें पिछले महीने हरियाणा में एक व्यक्ति की जमानत याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया था। उसने कथित तौर पर ऑनलाइन स्कैम करने के लिए 35 सिम कार्ड लिए थे। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। जस्टिस अनूप चितकारा की एकल पीठ ने कहा कि एक व्यक्ति को एक से अधिक सिम कार्ड जारी नहीं किए जाने चाहिए।

यह मामला बीते साल का है जब एक व्यक्ति ने बताया कि उसे व्हाट्सऐप पर एक मैसेज मिला था। इसमें पूछा गया था कि क्या वह घर से काम करते हुए पैसे कमाना चाहता है। मैसेज भेजने वाले शुरुआत में उसे कुछ पैसे पेमेंट किए थे, जिसने उसे ज्यादा पैसे जमा करने के लिए प्रेरित किया और आखिरकार उसे 8 लाख रुपए से अधिक की ठगी का शिकार होना पड़ा। पुलिस ने पाया कि नंदवानी एक पॉइंट-ऑफ-सेल एजेंट के तौर पर काम करता था, जिसने घोटाले में इस्तेमाल किए गए सिम नंबरों को एक्टिवेट कर उनका इस्तेमाल किया। दूरसंचार मंत्रालय के नियम के मुताबिक, अभी एक आईडी पर 9 मोबाइल कनेक्शन मिल सकता है। फिलहाल सरकार पहले भी यह साफ कर चुकी है कि वह सिंगल आईडी पर सिम कार्ड की संख्या सीमित करने पर विचार नहीं कर रही है। सोनाली गुहा बताती हैं कि यह प्रस्ताव वैसे तो अच्छा है, मगर इसमें अभी कई तरह की दिक्कतें आएंगी। भारत में अभी वैसी व्यवस्था नहीं है और न ही वह इसके अभी तैयार है। अभी भी यहां पर सिम कार्ड से होने वाले फ्रॉड से निपटने के लिए बाकायदा एक तंत्र नहीं है। संचार साथी जैसे पोर्टल जरूर बनाए गए हैं, मगर अभी यह शुरुआती चरण में है। आने वाले दिनों में सरकार को इसके लिए मजबूत तंत्र बनाना होगा, क्योंकि देश में बड़े पैमाने पर आतंकी या उग्रपंथी फर्जी सिम कार्ड हासिल करके वारदातों को अंजाम देते हैं या मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला के जरिए कालेधन को भेजन के लिए सिम कार्ड का इस्तेमाल हो रहा है।

एक व्यक्ति एक सिम कार्ड की सिफारिश अच्छी बात है। मगर, इंटरनेशनल मार्केटिंग कर रही सिम कार्ड्स कंपनियां फिर वर्चुअल सिम कार्ड या ई-सिम कार्ड जारी करना शुरू कर देंगी। जिसे ट्रैक करना और भी मुश्किल होगा। अभी फिजिकल सिम कार्ड होने से टावर से ट्रैक करना आसान होता है। एक आधार पर बार-बार अंगूठा लगवाकर कई सिम कार्ड बनवा लिए जाते हैं। इसीलिए ऐसे नेटवर्क गांवों या दूर-दराज के इलाकों में ज्यादा पनपते हैं। विदेशों में फिजिकल सिम कार्ड की जगह वर्चुअल सिम कार्ड्स का ज्यादा इस्तेमाल होता है। वहां पर सिम कार्ड की कोई लिमिट नहीं होती है, मगर हर सिम का रिकॉर्ड रखा जाता है। यहां तक कि किसने किस सिम से कितनी बार कॉल किया या कब एक्टिवेट किया या उससे क्या-क्या ऑनलाइन काम किए गए। भारत में अभी ये सिर्फ कारपोरेट हाउसेज में ही है, आम लोगों तक इसकी पहुंच नहीं है। यहां पर वर्चुअल सिम कार्ड के लिए कोई मजबूत तंत्र भी नहीं है।

जब संयुक्त छात्र मोर्चा ने मनाया जीत का जश्न!

हाल ही में संयुक्त छात्र मोर्चा ने जीत का जश्न मनाया है! लखनऊ विश्वविद्यालय में शनिवार को सयुंक्त छात्र मोर्चा द्वारा 2024 के आम चुनाव में इंडिया गठबंधन की सफलता और तानाशाही के खिलाफ संविधान और लोकतंत्र के पक्ष में आए जनादेश के स्वागत में मार्च कर व एक दूसरे को मिठाई खिलाकर जश्न मनाया गया। इस मौके पर सयुंक्त छात्र मोर्चा ने कहा कि भारतीय जनता का यह जनादेश नरेन्द्र मोदी सरकार की अथाह तानाशाही के खिलाफ है, चुनाव आयोग समेत तमाम संस्थाओं को नियंत्रित करने के बावजूद इंडिया गठबंधन की उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में सफलता आश्वश्तकारी है। भारतीय जनता पार्टी को बहुमत न मिलना यह दर्शाता है कि देश की जनता मोदी सरकार की वादाखिलाफी और कॉरपरेटपरस्ती से त्रस्त रहीं हैं और अब BJP जनादेश की अवमानना करते हुए सरकार भले बना ले पर मजबूत विपक्ष की सदन से लेकर सड़क तक जबरदस्त उपस्थिति उसे अब और जनविरोधी नीतियां नहीं लागू करने देगी। सभा को सम्बोधित करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर रविकांत चंदन ने कहा है कि इस बार के लोकसभा के चुनाव में लोकतंत्र और संविधान की जीत हुई है। और हम लोग उम्मीद करते हैं कि आगामी समय में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की लड़ाई में और मजबूती मिलेगी। लूट, झूठ और नफरत की राजनीति को उत्तर की जनता ने खारिज कर दिया है। बता दें कि संयुक्त छात्र मोर्चा ने हाल में आए NEET परिणाम और उसमें हुई धांधली को लेकर NTA की घोर निंदा की , जिसने लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को अंधेरे में डाल दिया है। जनांदोलनों की अग्रिम पंक्ति में रहने की अपनी भूमिका को और मज़बूती से निभाएंगे। संयुक्त छात्र मोर्चा ने हाल में आए NEET परिणाम और उसमें हुई धांधली को लेकर NTA की घोर निंदा की , जिसने लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को अंधेरे में डाल दिया है। जिसमें यह माँग की गई कि NEET परीक्षा परिणाम में हुई धांधलेबाज़ी की निष्पक्ष जाँच कराई जाए।जिसमें यह माँग की गई कि NEET परीक्षा परिणाम में हुई धांधलेबाज़ी की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। जनादेश का स्वागत करते हुए समाजवादी छात्र-सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महेन्द्र यादव ने कहा कि विषम परिस्थितियों के बीच सम्पन्न हुए आम चुनाव में कैसे उत्तर प्रदेश की जनता ने मोदी-योगी की झूठ, लूट और नफ़रत की राजनीति को सिरे से ख़ारिज किया है। इस बार के चुनाव अंबेडकर, गांधी, फूले, पेरियार और भगत सिंह के विचारो की जीत है। भाजपा की सांप्रदायिक और कॉरपोरेट परस्त राजनीति को जनता ने खारिज कर दिया है।ख़ासकर अयोध्या की जनता ने यह साफ तौर पर संदेश दे दिया है कि इस देश में सांप्रदायिक नफ़रत की राजनीति नहीं चलेगी, बल्कि यह देश PDA के लिए समर्थित सामाजिक न्याय और बाबा साहब के संविधान को लेकर आगे बढ़ेगा।

वहीं AISA के प्रदेश अध्यक्ष आयुष श्रीवास्तव का कहना था कि ― INDIA गठबंधन के इस परिणाम के साथ, छात्रहित और छात्र राजनीति को ध्यान में रखते हुए, लखनऊ का संयुक्त छात्र मोर्चा कैम्पस लोकतंत्र, बेरोज़गारी, झूठे मुक़दमे में फँसाये गए राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए, एकबद्ध हो कर संघर्षरत रहेगा। NSUI छात्र नेता प्रिंस प्रकाश ने कहा कि, भाजपा जो 400 पार का नारा और संविधान को बदलने की आवाज़ उठा रही थी आज वह अपने दम पर सरकार बनाने में विफल साबित हुई। यह जनमत साफ तौर पर दर्शाता है कि इस देश की जनता ने मोदी और शाह की तानाशाही वाली राजनीति को सिरे से ख़ारिज कर दिया है।

SFI, BBAU राज्य कमेटी सदस्य अभिषेक का कहना था कि, यह जनादेश लोकतंत्र में जीवन फूंकने वाला जनादेश है। सभी प्रगतिशील छात्र-संगठन इस समय अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए आने वाले दिनों में देश और समाज के मुद्दों पर होने वाले जनांदोलनों की अग्रिम पंक्ति में रहने की अपनी भूमिका को और मज़बूती से निभाएंगे। संयुक्त छात्र मोर्चा ने हाल में आए NEET परिणाम और उसमें हुई धांधली को लेकर NTA की घोर निंदा की , जिसने लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को अंधेरे में डाल दिया है। जिसमें यह माँग की गई कि NEET परीक्षा परिणाम में हुई धांधलेबाज़ी की निष्पक्ष जाँच कराई जाए।

लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता एडवोकेट ज्योति राय का कहना है कि इस बार के चुनाव अंबेडकर, गांधी, फूले, पेरियार और भगत सिंह के विचारो की जीत है। भाजपा की सांप्रदायिक और कॉरपोरेट परस्त राजनीति को जनता ने खारिज कर दिया है।

खाने पीने के मामले में कौन सा राज्य है सबसे ज्यादा खर्च वाला?

आज हम आपको बताएंगे कि खाने-पीने के मामले में कौन सा राज्य सबसे ज्यादा खर्च वाला है! जीवनयापन के कुल खर्च में खाने-पीने की चीजों की हिस्सेदारी पूरे देश के स्तर पर पिछले 10 वर्षों में घटकर घटकर 50% से नीचे आ गई है। हालांकि, बिहार और असम जैसे राज्यों में यह अब भी इससे अधिक है। बिहार और असम के लोगों के कुल खर्च में खाने-पीने की चीजों का हिस्सा सबसे अधिक है। तेलंगाना और केरल में यह सबसे कम है। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और यूपी जैसे राज्यों के लोग खाने-पीने में दूध और इससे बनी चीजों पर सबसे अधिक खर्च कर रहे हैं। यह जानकारी हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे 2022-23 की विस्तृत रिपोर्ट में सामने आई है। इसे स्टैटिस्टिक्स ऐंड प्रोग्राम इंप्लिमेंटेशन मिनिस्ट्री ने जारी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, टोटल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर में खाने-पीने की चीजों की हिस्सेदारी बिहार और असम में सबसे अधिक 54% और केरल में सबसे कम 39% है। शहरी इलाकों में भी यह आंकड़ा बिहार और असम में सबसे अधिक 47% रहा। चावल की सबसे कम 3.19% हिस्सेदारी राजस्थान के लोगों के फूड एक्सपेंडिचर में है। हरियाणा (88.56%), पंजाब (87.54%) और राजस्थान (84.77%) के लोगों के खाने-पीने में गेहूं पर खर्च का हिस्सा अधिक है। नॉन-फूड आइटम्स पर खर्च के मामले में सभी प्रमुख राज्यों के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कन्वेंस की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। इसके बाद ड्यूरेबल गुड्स और एंटरटेनमेंट का नंबर है। नॉन-फूड आइटम्स में ड्यूरेबल गुड्स की सबसे अधिक हिस्सेदारी केरल में है।सबसे कम 35% हिस्सेदारी तेलंगाना में रही है। यूपी के ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति कुल खर्च में फूड आइटम्स का हिस्सा 47% और शहरी इलाकों में 41% है। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा क्रमश: 41% और 37% का है।

ओवरऑल पिछले 10 वर्षों में औसत मंथली पर कैपिटा कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (MPCE) में फूड पर खर्च घटा है। 2011-12 में ग्रामीण इलाकों में कुल मासिक खर्च में खाने-पीने की हिस्सेदारी 52.9% थी। 2022-23 में यह 46.4% पर आ गई। शहरों में भी आंकड़ा 42.6% से घटकर 39.2% पर आ गया। गांवों में खाने-पीने पर प्रति व्यक्ति एक महीने का खर्च औसतन 1750 रुपये और शहरों में 2530 रुपये रहा। टोटल फूड कंजम्पशन में बेवरेजेज और प्रोसेस्ड फूड की हिस्सेदारी बढ़ी है और राष्ट्रीय औसत 9.6% का है। अधिकतर राज्यों में सबसे अधिक खर्च इसी पर है है। दूध और इससे बनी चीजी की हिस्सेदारी का राष्ट्रीय औसत 8.3% है। हालांकि हरियाणा (41.7%), राजस्थान (35.5%), पंजाब (34.7%), गुजरात (25.5%), यूपी (22.6%) और एमपी (21.5%) में दूध और दूध से बने उत्पादों का हिस्सा फूड कंजम्पशन में सबसे अधिक है। राजस्थान (33.2%), हरियाणा (33.1%), पंजाब (32.3%) और यूपी (25.2%) के शहरी इलाकों में भी मिल्क एंड मिल्क प्रोडक्ट्स का हिस्सा सबसे अधिक है।

वहीं, खाने-पीने पर कुल खर्च में अंडे, मछली और गोश्त की सबसे अधिक 23.5% हिस्सेदारी केरल के ग्रामीण इलाकों में है। इसके बाद असम (20%) और पश्चिम बंगाल (18.9%) का नंबर है। सबसे कम 2.1% हिस्सेदारी हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में है। 2.6% हिस्से के साथ इससे ऊपर गुजरात और राजस्थान हैं। शहरी इलाकों के खान-पान में अंडे, मछली और गोश्त की हिस्सेदारी के मामले में केरल 19.8% और वेस्ट बंगाल 18.9% के साथ आगे हैं। अनाज में भी चावल की सबसे अधिक 95.93% हिस्सेदारी असम में है। इसके बाद छत्तीसगढ़ (92.24%) और तेलंगाना (92.06%) का नंबर है। यूपी में आंकड़ा 39.99% और महाराष्ट्र में 36.39% है। चावल की सबसे कम 3.19% हिस्सेदारी राजस्थान के लोगों के फूड एक्सपेंडिचर में है। हरियाणा (88.56%), पंजाब (87.54%) और राजस्थान (84.77%) के लोगों के खाने-पीने में गेहूं पर खर्च का हिस्सा अधिक है। नॉन-फूड आइटम्स पर खर्च के मामले में सभी प्रमुख राज्यों के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कन्वेंस की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।2022-23 में फासला घटा और यह करीब 71% ही अधिक रह गया है। – इसके सारे आंकड़ों का छोटे-छोटे वनलाइनर्स बना दीजिए। इसके बाद ड्यूरेबल गुड्स और एंटरटेनमेंट का नंबर है। नॉन-फूड आइटम्स में ड्यूरेबल गुड्स की सबसे अधिक हिस्सेदारी केरल में है।

सर्वे के मुताबिक, 2022-23 में ग्रामीण इलाकों में ऐवरेज मंथली पर कैपिटा कंजम्पशन एक्सपेंडिचर 3773 रुपये और शहरी इलाकों में 6459 रुपये रहा। 2010-11 में ये आंकड़े 1430 रुपये और 2630 रुपये पर थे। इस तरह रूरल एरिया में खर्च 2.6 गुना और अर्बन एरिया में 2.5 गुना बढ़ गया।बता दें कि शहरी इलाकों में भी यह आंकड़ा बिहार और असम में सबसे अधिक 47% रहा। सबसे कम 35% हिस्सेदारी तेलंगाना में रही है। यूपी के ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति कुल खर्च में फूड आइटम्स का हिस्सा 47% और शहरी इलाकों में 41% है। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा क्रमश: 41% और 37% का है। इसके साथ ही रूरल-अर्बन गैप घटा है। 2010-11 में शहरों में औसत MPCE गांवों से 84% अधिक था। 2022-23 में फासला घटा और यह करीब 71% ही अधिक रह गया है। – इसके सारे आंकड़ों का छोटे-छोटे वनलाइनर्स बना दीजिए।

लोकसभा चुनाव के नतीजे के क्या है अनुमान?

आज हम आपको लोकसभा चुनाव के नतीजे के अनुमान बताने जा रहे हैं! इस बार लोकसभा चुनाव के बाद लोगों में चर्चा हो रही है कि इस नतीजे से सत्ता पक्ष भी खुश है और विपक्ष भी खुश है। कुछ लोग कह रहे हैं कि NDA तो इसलिए खुश है क्योंकि उसे तीसरी बार सत्ता मिली है लेकिन विपक्ष क्यों खुश है? विपक्ष के खुश होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि नरेन्द्र मोदी की लहर में विपक्ष धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था और विपक्ष को तोड़ा जा रहा था। विपक्ष उस भूमिका में भी नहीं था कि अपनी लड़ाई भी लड़ सके। लेकिन आज विपक्ष उस स्थिति में है कि वह अपनी लड़ाई विपक्ष में रहते हुए भी लड़ सकता है। सत्तापक्ष की हार यह है कि जहां से सबसे अधिक सीटें पिछले चुनाव में आई थीं, वह राज्य था उत्तर प्रदेश लेकिन वहां कड़ी पटखनी मिली। BJP ने 400 सीटों का विशाल लक्ष्य तय किया लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव जितनी सीटें भी लाने में असफल रही। सत्तापक्ष की जीत इस मायने में है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हैट्रिक लगा रहे हैं। वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसे दूसरे नेता होंगे, जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दिन देश में अलग ही माहौल नज़र आ रहा था। सिर्फ यूपी में ही नहीं पूरे देश में जश्न का माहौल था। दिन बड़ा भी था क्योंकि राम मंदिर बनने का सपना पूरा हो रहा था। उस दिन जो उत्साह नज़र आ रहा था उसी से BJP की ओर से यूपी समेत पूरे देश में ज़बरदस्त लहर बनाने की कोशिश की गई। लेकिन जनता में यह मुद्दा धीरे-धीरे धूमिल पड़ गया और BJP इसे समझ नहीं पाई। BJP राम मंदिर को ही ट्रंप कार्ड मान रही थी जो चल नहीं सका। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, समाजवादी पार्टी को यूपी में 37 सीटें मिलना और अवध क्षेत्र में BJP की करारी हार होना। अमूमन लोगों में यह विमर्श हावी रहा कि राम मंदिर तो मिल गया लेकिन इसके अलावा और भी मुद्दे हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान BJP के एक-दो नेताओं ने ऐसे बयान दिया कि संविधान में बदलाव किए जा सकते हैं। हालांकि बाद में उन्होंने या पार्टी ने उन बयानों से किनारा भी कर लिया। लेकिन I.N.D.I.A. गठबंधन के नेताओं ने इसे अच्छे से भुनाया। राहुल गांधी अपने चुनाव प्रचार के दौरान जनसभाओं में संविधान दिखाते हुए नज़र आए। वह दोहराते रहे कि हम संविधान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में BJP पिछड़े वोट बैंक को साधने में सफल रही थी, लेकिन इस बार पिछड़ा वर्ग ने BJP का साथ नहीं दिया।

संघ और BJP का चोली दामन का साथ रहा है लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में दोनों दूर-दूर रहे। बल्कि यूं कहा जा सकता है कि BJP ने संघ का सहयोग मांगा ही नहीं। पूरे देश में आम लोगों के बीच सामाजिक व संपर्क कार्यों में लगे RSS के प्रचारक और स्वयंसेवक चुनाव प्रक्रिया के दौरान नज़र नहीं आए। इसके पहले 2004 के लोकसभा चुनाव में RSS के स्वयंसेवकों की ऐसी निष्क्रियता दिखी थी, जिसके वजह से ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के बावजूद BJP को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने अपने बयान में यह संकेत दिया था कि BJP को किसी की ज़रूरत नहीं है।

पिछले एक दशक में BSP ने खुद को काफी कमज़ोर किया है। BSP पर आरोप लगते रहे कि वह BJP की बी टीम के रूप में काम कर रही है। इस बार BSP ने मुस्लिम कैंडिडेट को टिकट बंटवारे में प्राथमिकता दी ताकि I.N.D.I.A. गठबंधन के वोट बैंक में सेंध लग सके लेकिन दलित वर्ग और मुस्लिम वोटर्स ने BSP को वोट देना वोट की बर्बादी समझा। 2024 के लोकसभा चुनावों में BSP का वोट प्रतिशत गिरकर 2.07% रह गया, जो कि 2019 में 3.67% था। BSP का वोट प्रतिशत 1.6% कम हुआ और सीटें जीरों हो गईं।

I.N.D.I.A. गठबंधन जाति जनगणना को लेकर शुरू से मुखर रहा। बिहार में जातीय जनगणना की राजनीति तेजस्वी और नीतीश कुमार ने शुरू की। बिहार में जातीय जनगणना कराई गई। इसके बाद यह कार्ड अखिलेश और राहुल गांधी दोनों ने आक्रामक तरीके से खेला। इसके बहाने वे OBC तक पहुंचे। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सफलता भी मिली। हालांकि चुनाव के बीच में नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष के जातीय जनगणना के मुद्दे पर काउंटर करने की ज़रूर कोशिश की। उन्होंने कहा कि विपक्ष पिछड़ों के आरक्षण को मुस्लिमों में बांटना चाहती है लेकिन कहीं न कहीं लगातार इस मुद्दे पर टिके रहने का लाभ विपक्ष को मिला। बेरोज़गारी और महंगाई का मुद्दा जनता में था लेकिन यह हाशिए पर चला गया था। राम मंदिर के बहाने BJP इस बार का चुनाव हिंदुत्व के अजेंडे पर लड़ने में लगी रही। विपक्ष बेरोज़गारी और महंगाई के मुद्दे पर टिका रहा। लेकिन BJP इसकी कोई काट पेश नहीं कर पाई। हर बार ऐसा होता था कि चुनावी मैदान में BJP हिंदुत्व की पिच तैयारी करती थी और विपक्ष को न चाह कर भी इसी पिच पर खेलना पड़ता था। इस बार I.N.D.I.A. गठबंधन ने बेराज़गारी और महंगाई का चुनावी पिच तैयार किया।

आखिर कौन से फैसले कर चुकी है गठबंधन सरकार?

आज हम आपको बताएंगे कि गठबंधन सरकार कौन से फैसले कर चुकी है! भारतीय राजनीतिक इतिहास में 2024 का लोकसभा चुनाव खास है। यह चुनाव देश, संविधान, आरक्षण तथा लोकतंत्र पर आधारित रहा है। चुनाव के नतीजों ने इन्हीं सिद्धांतों को साफ-साफ दोहराया है। हालांकि, BJP के नेतृत्व वाले NDA ने 290 से अधिक सीटें प्राप्त कर बहुमत हासिल कर लिया, लेकिन विपक्ष भी महत्वपूर्ण स्थिति में उभरकर आया है। जनता का फैसला इससे अधिक स्पष्ट नहीं हो सकता था। इसका आशय है कि जनता चाहती है विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों की राजनीतिक आकांक्षाओं के प्रति BJP का रुख अधिक समझौतावादी और कम टकरावपूर्ण हो। परिणाम BJP को जवाबदेह बनाता है और पहले से अधिक रचनात्मक व कल्याणकारी योजनाओं के लागू होने की मांग करता है। BJP को लोकतांत्रिक भावना से उस संदेश पर ध्यान देना चाहिए और 10 वर्षों के बाद गठबंधन की राजनीति के फिर से उभरने की वास्तविकता के प्रति खुद को फिर से उन्मुख करना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र के केंद्र में लोग हैं और लोग होने भी चाहिए। इसलिए यह चुनाव कई आयामों पर भारतीय राजनीति के एक क्रांतिकारी पुनर्गठन का संकेत देता है। यह विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच शक्ति का एक बेहतर संतुलन बहाल करता है। राष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली सभी प्रमुख पार्टियों को इस जनादेश से सही सबक सीखना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की जीवनरेखा इसकी विविधता है, इसे भी सभी दलों को समझना चाहिए।

2024 लोकसभा चुनाव ने यह भी उजागर किया कि भारत में चुनावी सफलता किसी पार्टी की विभिन्न जातियों और समुदायों को प्रभावी ढंग से एकजुट करने, सामाजिक विरोधाभासों का प्रबंधन करने और विविध आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने की क्षमता पर निर्भर करती है। सामाजिक रूप से सबसे वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व सभी दलों को सुनिश्चित करना ही होगा। हमें इस बात पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है कि कई जातीय-समुदायों को सामाजिक-राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिए बगैर चुनावों में सफल नहीं हुआ जा सकता। विशेष रूप से यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्य में तो बिल्कुल नहीं। सभी दलों को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए अटूट प्रतिबद्धता दिखानी होगी और यह मानना चाहिए कि सामाजिक न्याय चुनाव, शासन और नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत का कोई भी राजनीतिक दल इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

इस बार नई सरकार को एक खास सवाल से भी निपटना होगा। 2026 के बाद पहली जनगणना के प्रकाशन के बाद लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन होना है, फिर महिला आरक्षण भी लागू होना है। इस खास सवाल के लिए सरकार को भारत की विविधता, इसके संघवाद में राज्यों और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका पर विचार करना होगा। बहुदलीय लोकतंत्र में एकरूपता लागू करना संघीय राजनीति का उद्देश्य नहीं हो सकता और लोगों ने भी इस चुनाव में अपना यही मत स्पष्ट रूप से बता दिया है। जनादेश ने यह भी संकेत दे दिया है कि EVM का भय अनावश्यक है। हालांकि चुनावी प्रक्रिया में जनता के विश्वास को मजबूत करने के लिए गंभीर और तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। EVM काफी समय से मौजूद है और अब तक उन्होंने ऐसे नतीजे दर्ज किए हैं जो प्रचारकों और पर्यवेक्षकों द्वारा फील्ड से रिपोर्ट की गई बातों से मेल खाते हैं। नई सरकार की जिम्मेदारी है कि वह लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरे, और उनके हितों के लिए नई लोक कल्याणकारी योजनाएं लागू करे।

जनता ने अपना जनादेश स्पष्ट रूप से गठबंधन सरकार के लिए दिया है, तो विपक्ष को भी जवाबदेह बनाया है। जनता ने BJP को खारिज नहीं किया है, फिर भी उसने उसकी अजेयता और अचूकता के बड़े सपनों पर विराम लगाया है। यह एक मिथक है कि गठबंधन सरकारें आपदा का कारण बनती हैं। हाल के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय – अर्थव्यवस्था के उदारीकरण से लेकर अमेरिका-भारत असैन्य परमाणु समझौते तक – गठबंधन सरकारों द्वारा ही लिए गए थे। गठबंधन सरकारें राष्ट्रीय चर्चा को जन्म देती हैं और भारतीय संघवाद के लिए आगे का रास्ता खोलती हैं। सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर पड़े समूहों का लोकतंत्र को बनाए रखने और उसे मजबूत करने में हमेशा सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि BJP वास्तव में कुछ अंतर से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, पर NDA के क्षेत्रीय घटकों-विशेष रूप से तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) का समर्थन सरकार के गठन और प्रभावी कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है। व्यापक प्रशासनिक अनुभव वाले राजनेताओं के नेतृत्व में क्षेत्रीय सहयोगियों की अधिक भूमिका न केवल संवाद और चर्चा के आधार पर नीति निर्माण में योगदान देगी, बल्कि संघीय चरित्र को भी मजबूत करेगी।

भारतीय संसद में एक मजबूत विपक्ष का होना लक्ष्यों को हासिल करने के लिए और भी अधिक अनुकूल है। हालांकि, उसे राजनीतिक ताकतों के संतुलन का भी गंभीरता से आकलन करना चाहिए। बेशक इस चुनाव के नतीजों से दिखाई देता है कि BJP पहले जैसी स्थिति में नहीं है, लेकिन विपक्ष के भी उत्थान का क्षण अभी नहीं आया है। चुनावी नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय मतदाता बहुत समझदार हैं और वे संविधान को एक अमूर्त चीज के रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन के निहितार्थों वाले दस्तावेज के रूप में देखते हैं। वे एक मजबूत विपक्ष के महत्व को भी जानते हैं और उन्होंने भारत में लोकतंत्र के कायाकल्प में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सभी राजनीतिक दलों को बाध्य कर दिया है।

क्या नीट की एग्जाम में थी कई खामियां ?

हाल ही में हुई नीट की एग्जाम में कई खामियां नजर आई है! NEET अंडरग्रेजुएट परीक्षा 2024 में गड़बड़ी को लेकर सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा। कांग्रेस समेत सियासी पार्टियां नीट परीक्षा रद्द करने की मांग कर रही हैं। यही नहीं उन्होंने एग्जाम के दौरान फर्जीवाड़े के आरोप लगाए हैं। इसके लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घेरा है। वहीं नीट परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों के बीच थर्ड पार्टी की जांच में बड़ा खुलासा सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, एक स्वतंत्र एजेंसी की पड़ताल में पाया गया कि इस साल 5 मई को हुई NEET परीक्षा के कई केंद्रों पर सुरक्षा मानकों का घोर उल्लंघन हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक, कई केंद्रों पर अनिवार्य दो सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे और कुछ जगहों पर तो प्रश्न पत्र रखने वाले ‘स्ट्रांग रूम’ भी खुले पाए गए। वहां कोई सुरक्षा गार्ड भी नहीं थे। सेफ्टी को लेकर यह समीक्षा NTA यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के निर्देश पर एक स्वतंत्र एजेंसी की ओर से की गई थी। NTA ही वो एजेंसी है जो NEET परीक्षा का आयोजन करती है। रिव्यू टीम ने कुल 4,000 में से 399 परीक्षा केंद्रों का दौरा किया था। यह केंद्र NTA और रिव्यू टीम ने आपसी सहमति से चुने थे। रिव्यू टीम ने 16 जून को अपनी रिपोर्ट NTA को सौंप दी थी। परीक्षा केंद्र की भौतिक सुरक्षा, परीक्षा केंद्र तक पहुंच, केंद्र पर लोगों की आवाजाही, आवश्यकतानुसार तलाशी जैसी चीजों की जांच की गई। रिव्यू टीम ने यह भी जांचा कि छात्रों को उनकी तय सीटों पर ही बैठाया गया था या नहीं।हैरानी की बात यह है कि यह रिपोर्ट परीक्षा परिणाम घोषित होने के 12 दिन बाद NTA को सौंपी गई। रिपोर्ट में क्या-क्या खुलासे हुए, जानिए आगे।

रिव्यू टीम ने पाया कि 399 में से 186 केंद्रों यानी 46 फीसदी पर प्रत्येक परीक्षा कक्ष में अनिवार्य दो सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे। NTA के नियमों के अनुसार, परीक्षा केंद्रों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की लाइव फीड दिल्ली स्थित NTA मुख्यालय में एक केंद्रीय नियंत्रण कक्ष को भेजी जानी चाहिए। वहां विशेषज्ञों की एक टीम के जरिए इसकी निगरानी की जानी चाहिए। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि 399 में से 68 केंद्रों यानी करीब 16 फीसदी पर स्ट्रांग रूम में कोई सुरक्षा गार्ड तैनात नहीं था। नियमों के मुताबिक, प्रश्न पत्रों के वितरण तक स्ट्रांग रूम की सुरक्षा एक गार्ड के जरिए की जानी चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 83 केंद्रों पर बायोमेट्रिक स्टाफ, उन कर्मचारियों से अलग था जिन्हें उन केंद्रों के लिए नामित किया गया था। इस समीक्षा का उद्देश्य परीक्षा के दिन केंद्रों पर निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन न करने या किसी भी गड़बड़ी की पहचान करना था। जैमर काम कर रहे हैं या नहीं, सभी जरूरी कमरों को कवर कर रहे हैं या नहीं। परीक्षा केंद्र की भौतिक सुरक्षा, परीक्षा केंद्र तक पहुंच, केंद्र पर लोगों की आवाजाही, आवश्यकतानुसार तलाशी जैसी चीजों की जांच की गई। रिव्यू टीम ने यह भी जांचा कि छात्रों को उनकी तय सीटों पर ही बैठाया गया था या नहीं।

यह भी देखा गया कि क्या केंद्र पर पर्याप्त संख्या में निरीक्षक, सीसीटीवी स्टाफ और अन्य आवश्यक कर्मचारी मौजूद थे या नहीं। 4 जून को लोकसभा चुनाव परिणामों के दिन NEET-UG 2024 के नतीजे घोषित होने के बाद से ही NTA आलोचनाओं का सामना कर रहा है। पहले, असामान्य रूप से बड़ी संख्या में 67 उम्मीदवारों को 720/720 पूरे मार्क्स मिले। कुछ कैंडिडेट्स को 718 या 719 अंक मिले। कुछ लोगों ने दावा किया कि परीक्षा की योजना में ये अंक संभव नहीं थे। बता दें कि वहां कोई सुरक्षा गार्ड भी नहीं थे। सेफ्टी को लेकर यह समीक्षा NTA यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के निर्देश पर एक स्वतंत्र एजेंसी की ओर से की गई थी। NTA ही वो एजेंसी है जो NEET परीक्षा का आयोजन करती है। रिव्यू टीम ने कुल 4,000 में से 399 परीक्षा केंद्रों का दौरा किया था। यह केंद्र NTA और रिव्यू टीम ने आपसी सहमति से चुने थे। रिव्यू टीम ने 16 जून को अपनी रिपोर्ट NTA को सौंप दी थी। वहीं बिहार में नीट पेपर लीक होने के आरोपों का भी सामना NTA कर रहा है, जहां राज्य पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए 13 लोगों में से चार कैंडिडेट हैं, जिन्होंने NEET की परीक्षा दी थी। इसके अलावा, गुजरात के गोधरा में दो परीक्षा केंद्र भी राज्य पुलिस की जांच के घेरे में हैं। यहां कथित तौर पर उम्मीदवारों को उनकी OMR शीट में सही उत्तर भरने में मदद की गई थी।

अब लोकसभा नहीं विधानसभा पर फोकस करें चुनाव आयोग!

वर्तमान में चुनाव आयोग अब लोकसभा नहीं विधानसभा पर फोकस करने लग गया है! लोकसभा चुनाव-2024 खत्म होने के बाद अब चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव कराने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसे देखते हुए सबसे पहले इन चारों राज्यों की वोटर लिस्ट को अपडेट करने का काम शुरू किया जा रहा है। इसमें जो भी नौजवान 1 जुलाई को 18 साल के हो रहे हैं। वह भी अपना नाम वोटर लिस्ट अपडेट करने के इस स्पेशल समरी रिवीजन के माध्यम से जुड़वा सकते हैं। आयोग ने बताया कि इसके लिए बीएलओ हर घर में जाकर इस बात को सुनिश्चित भी करेंगे कि वहां जो वोटर थे। उनमें कोई शिफ्ट तो नहीं हो गया, किसी की डेथ तो नहीं हो गई या फिर किसी का नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाना है। वोटर लिस्ट को अपडेट करने संबंधित तमाम जानकारियां लेकर लिस्ट को अपडेट किया जाएगा। जिसका फाइनल प्रकाशन 20 अगस्त को अपडेट करने के साथ ही लॉक कर दिया जाएगा। फिर चुनाव इसी वोटर लिस्ट के आधार पर कराए जाएंगे। आयोग ने बताया कि हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल 3 नवंबर, 2024, झारखंड का 26 नवंबर और महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल 5 जनवरी, 2025 को खत्म हो रहा है। इन्फोर्मेशन स्लिप के वितरण के दौरान बनाई गई सूची से मिलान करते हुए मतदाता सूची से शिफ्टेड, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम नियमानुसार हटाने के निर्देश दिए।ऐसे में इन तीनों राज्यों के लिए समय रहते विधानसभा चुनाव कराने हैं। इसके लिए सबसे पहले वोटर लिस्ट को अपडेट करना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इसी साल 30 सितंबर से पहले तक जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव कराने अनिवार्य हैं। ऐसे में इन चारों राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने के लिए तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।आयोग का यह भी कहना है कि इस दौरान इन सभी राज्यों में चुनाव के दौरान कितने पोलिंग स्टेशन बनाए जाने चाहिए। इसका भी आंकलन किया जाएगा। जिसमें ग्रुप हाउसिंग सोसायटी, झुग्गी बस्तियां, शहर के बाहरी इलाके और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मतदाताओं के हिसाब से उनके नजदीक में ही पोलिंग स्टेशन बनाए जाएंगे। ताकि किसी भी वोट डालने के लिए काफी दूर ना जाना पड़े।

हालांकि, जिस तरह से हाल ही में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं। इसे देखते हुए इस राज्य में विधानसभा चुनाव कराना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में पहली बार विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। आशंका है कि चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान आतंकवादी राज्य में कहीं ना कहीं हमले कर सकते हैं। हालांकि, लोकसभा चुनाव में जिस तरह से जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर वोट डालने में भाग लिया। इसे देखते हुए आयोग बहुत उत्साहित है। आयोग का कहना है कि हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र समेत जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव कराने की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे। बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाता सूची से गलत तरीके से कई लोगों के नाम हटाए जाने की शिकायतें प्राप्त हुई हैं। ऐसी शिकायतों का नियमानुसार सत्यापन करते हुए कार्रवाई की जाए। उन्होंने वोटर इन्फोर्मेशन स्लिप के वितरण के दौरान बनाई गई सूची से मिलान करते हुए मतदाता सूची से शिफ्टेड, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम नियमानुसार हटाने के निर्देश दिए।

बताया गया कि अभी भी जिन मतदाताओं के पास पुराना लेमिनेटेड मतदाता पहचान पत्र है, उसे बदलते हुए नए रंगीन आईडी उपलब्ध कराए जाएंगे। किसी भी कारण से अब तक छूटे मतदाताओं को भी मतदाता सूची से जोड़ने के लिए अभियान शुरू किया जाएगा। निर्वाचन कार्य से जुड़े पदाधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्रों में भ्रमण करते हुए मतदाता सूची के निर्माण कार्य की प्रक्रिया को गति देने का निर्देश दिया गया। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार सभी बीएलओ सुपरवाइजर घर-घर जाकर बीएलओ के कार्यों का सत्यापन करें। बीएलओ के सत्यापित घरों में से 10 प्रतिशत घरों का बीएलओ सुपरवाइजर भौतिक सत्यापन करें एवं मुख्यालय से मिले स्टिकर चिपकाएं। जिसमें ग्रुप हाउसिंग सोसायटी, झुग्गी बस्तियां, शहर के बाहरी इलाके और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मतदाताओं के हिसाब से उनके नजदीक में ही पोलिंग स्टेशन बनाए जाएंगे। ताकि किसी भी वोट डालने के लिए काफी दूर ना जाना पड़े।बताया गया कि 1 जुलाई से मुख्यालय के पदाधिकारी जिलों का भ्रमण करेंगे और मतदाता सूची को स्वच्छ बनाने के लिए भारत निर्वाचन आयोग के मापदंडों के अनुरूप कार्यों की समीक्षा करेंगे।

रोहित शर्मा ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 92 रन की पारी के दौरान 10 रिकॉर्ड बनाए.

0

रोहित शर्मा ने टी20 वर्ल्ड कप में पहली बड़ी रन वाली पारी खेली. उन्होंने अपने आखिरी सुपर 8 मैच में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 41 गेंदों में 92 रन बनाए। उनकी बल्लेबाजी से ऑस्ट्रेलिया भारत से हार गया. भारतीय कप्तान ने इस पारी में 10 मिसालें कायम कीं.

रोहित के 10 उदाहरण:

1) रोहित अंतरराष्ट्रीय टी20 क्रिकेट में 200 छक्के लगाने वाले पहले बल्लेबाज बने।

2) रोहित ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 19 गेंदों में अर्धशतक बनाया, जो मौजूदा टी20 विश्व कप में सबसे तेज है।

3) ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ रोहित का 19 गेंदों में अर्धशतक टी20ई में सबसे तेज है।

4) रोहित मौजूदा विश्व कप में पावर प्ले में अर्धशतक बनाने वाले पहले बल्लेबाज बने।

5) रोहित ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आठ छक्के लगाए। उन्होंने भारतीय बल्लेबाजों में एक टी20 मैच में सबसे ज्यादा छक्के लगाए हैं.

6) रोहित टी20 इंटरनेशनल में सबसे ज्यादा रनों के मालिक बन गए। उन्होंने 4165 रन बनाए. रोहित ने पाकिस्तान के कप्तान बाबर आजम (4145) को पीछे छोड़ दिया है।

7) रोहित ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 132 छक्के लगाए, जो सबसे ज्यादा हैं।

8) टी20 इंटरनेशनल में भारतीय बल्लेबाजों में सबसे तेज अर्धशतक लगाने की लिस्ट में रोहित पांचवें नंबर पर हैं। युवराज सिंह (12 गेंदों पर 50) शीर्ष पर हैं।

9) टी20 वर्ल्ड कप में एक पारी में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले कप्तानों की लिस्ट में रोहित दूसरे नंबर पर हैं। क्रिस गेल टॉप पर (98 रन) हैं.

10) टी20 वर्ल्ड कप में भारतीय बल्लेबाजों में एक पारी में सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में रोहित दूसरे नंबर पर हैं. शीर्ष पर सुरेश रैना (101 रन) हैं.

ये मैसेज अब सोशल मीडिया पर भारतीय टीम के लिए उड़ रहा है. पिछले दो सालों में भारतीय क्रिकेट फैंस के सपनों को दो देशों ने चकनाचूर कर दिया है. भारत पिछले नवंबर में 50 ओवर के विश्व कप फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार गया था। वहीं इससे पहले रोहित शर्मा पिछले टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड से हार गए थे. भारत से हारकर ऑस्ट्रेलिया पहले ही टी20 वर्ल्ड कप से हट चुका है. और मौजूदा टी20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में भारत एक बार फिर उसी इंग्लैंड के सामने हार गया है. गुरुवार को गुयाना में यह तय हो जाएगा कि भारत दो साल पहले का नुकसान चुका पाएगा या नहीं.

भारतीय कप्तान रोहित शर्मा ने कहा कि वे इस बारे में नहीं सोच रहे हैं कि सेमीफाइनल में प्रतिद्वंद्वी कौन है. भारत अपना सामान्य खेल खेलेगा. ऑस्ट्रेलिया से हारने के बाद रोहित ने कहा, ”हम कुछ अलग नहीं करना चाहते. मैं वही क्रिकेट खेलूंगा जो मैं खेल रहा हूं। यह देखने की जरूरत नहीं है कि प्रतिद्वंद्वी कौन है.” तनाव मत करो. हम तभी सफल होंगे जब हम इस तरह की क्रिकेट खेलेंगे।”

पहले सेमीफाइनल में दक्षिण अफ्रीका का मुकाबला अफगानिस्तान से होगा. दूसरे सेमीफाइनल में भारत-इंग्लैंड के बीच मुकाबला. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई स्पिनर ब्रैड हॉग का मानना ​​है कि दक्षिण अफ्रीका इस बार टी20 वर्ल्ड कप जीतने का बड़ा दावेदार है. हॉग के शब्दों में, ”दक्षिण अफ़्रीकी टीम में इस बार संतुलन बहुत बढ़िया है. अगर वे फाइनल में पहुंचते हैं तो ट्रॉफी जीतेंगे।

रोहित ने सोमवार को टी20 विश्व कप के सुपर आठ में ऑस्ट्रेलिया को लगभग अकेले ही हरा दिया। वह 41 गेंद पर 92 रन बनाकर आउट हुए. रोहित के प्रशंसक स्वाभाविक रूप से निराश थे क्योंकि वह सिर्फ आठ रन से शतक बनाने से चूक गए। लेकिन कप्तान ने कहा कि उन्होंने शतक के बारे में सोचकर बल्लेबाजी नहीं की. रोहित की टिप्पणी, ”मैंने शतक बनाया या नहीं, यह कोई बड़ी बात नहीं है. मेरा लक्ष्य गेंदबाज पर दबाव बनाना है. सफलता तभी मिलेगी जब आप ऐसा कर सकेंगे।

विश्व कप के पहले चरण में पेस अटैक भारत का मुख्य हथियार था। न्यूयॉर्क में पेसर्स को फायदा मिल रहा था।’ लेकिन सुपर आठ चरण में स्पिनर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खासकर चाइनामैन स्पिनर कुलदीप यादव. रोहित ने कहा, ”मुझे पता था कि कुलदीप यहां की पिच पर अच्छी गेंदबाजी करेंगे. वेस्टइंडीज को पिच पर कुलदीप की जरूरत है. मुझे यकीन है कि वह अगले मैचों में भी बड़ी भूमिका निभाएंगे।” ये मैसेज अब सोशल मीडिया पर भारतीय टीम के लिए उड़ रहा है. पिछले दो सालों में भारतीय क्रिकेट फैंस के सपनों को दो देशों ने चकनाचूर कर दिया है. भारत पिछले नवंबर में 50 ओवर के विश्व कप फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार गया था। वहीं इससे पहले रोहित शर्मा पिछले टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में इंग्लैंड से हार गए थे. भारत से हारकर ऑस्ट्रेलिया पहले ही टी20 वर्ल्ड कप से हट चुका है. और मौजूदा टी20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में भारत एक बार फिर उसी इंग्लैंड के सामने हार गया है. गुरुवार को गुयाना में यह तय हो जाएगा कि भारत दो साल पहले का नुकसान चुका पाएगा या नहीं.

आबकारी नीति मामले में सीबीआई ने तिहाड़ जेल में अरविंद केजरीवाल से पूछताछ की.

जमानत खारिज होने के दिन ही केजरी से तिहाड़ जेल में सीबीआई ने पूछताछ की थी, बुधवार को उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा. पूछताछ के बाद उनका बयान दर्ज किया गया. बुधवार को उन्हें कोर्ट में पेश करने की इजाजत भी सीबीआई को मिल गई. दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (यूपी) प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में जमानत खारिज होने के दिन एक बार फिर हमला बोला। मंगलवार को सीबीआई ने तिहाड़ जेल जाकर उनसे एक्साइज भ्रष्टाचार मामले में पूछताछ की. पूछताछ के बाद उनका बयान दर्ज किया गया. बुधवार को उन्हें कोर्ट में पेश करने की इजाजत भी सीबीआई को मिल गई. सीबीआई उसे अपनी हिरासत में लेने के लिए कोर्ट में आवेदन कर सकती है. कुछ मीडिया संस्थानों ने उनकी गिरफ्तारी की खबर प्रकाशित की, लेकिन सीबीआई की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. केजरीवाल की जमानत मामले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है.

केजरी से पूछताछ को लेकर आप नेता संजय सिंह ने एक वीडियो संदेश में कहा, ‘जब सुप्रीम कोर्ट में केजरीवाल की जमानत की संभावनाएं प्रबल हैं, तो केंद्र और सीबीआई झूठा मामला तैयार कर दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने की साजिश रच रहे हैं. ये पूरा देश देख रहा है. देश की जनता अरविंद केजरीवाल के साथ है।” संयोग से, केजरी को उत्पाद शुल्क भ्रष्टाचार मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया था। दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने गुरुवार को उन्हें जमानत दे दी. केंद्रीय जांच एजेंसी ने शुक्रवार सुबह आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में केस दायर किया. दिल्ली हाई कोर्ट ने ईडी की याचिका के जवाब में केजरीवाल की जमानत निलंबित कर दी. हाईकोर्ट ने शुक्रवार को तत्काल आधार पर ईडी के मामले की सुनवाई की. हालाँकि, सुनवाई के बाद फैसले को निलंबित कर दिया गया। मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई. हाईकोर्ट ने सुनवाई में राउज एवेन्यू कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी. इसके चलते केजरीवाल को फिलहाल तिहाड़ में ही रहना होगा.

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के विरोध में रविवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. लेकिन सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अर्जी अगले बुधवार तक के लिए स्थगित कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वे देखना चाहते हैं कि दिल्ली हाई कोर्ट बुधवार तक ईडी मामले में फैसला सुनाता है या नहीं. उसके बाद सुनवाई पर निर्णय लिया जायेगा. दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को उनकी जमानत खारिज कर दी. राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने आदेश दिया कि दिल्ली उत्पाद शुल्क भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार अवरिंद केजरीवाल को तीन दिन के लिए सीबीआई हिरासत में भेजा जाए। मंगलवार को सीबीआई द्वारा इसे अदालत में पेश करने के बाद फैसले का आदेश दिया गया। इससे पहले, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) प्रमुख को इसी मामले में गिरफ्तार करने के बाद एक अन्य केंद्रीय एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हिरासत में ले लिया था।

पिछले गुरुवार (20 जून) को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने केजरी की स्थायी जमानत याचिका मंजूर कर ली थी. गुरुवार को ईडी ने केजरी की जमानत को 48 घंटे के लिए टालने की याचिका दायर की, लेकिन जज न्याय बिंदु ने इसे खारिज कर दिया. इस आदेश को ईडी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा मंगलवार को केजरीवाल की जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद सीबीआई की एक टीम पूछताछ के लिए तिहाड़ गई थी. उनका भाषण भी रिकॉर्ड किया गया. बुधवार को केंद्रीय जांच एजेंसी को उन्हें कोर्ट में पेश करने की इजाजत भी मिल गई. वहीं, तिहाड़ अधिकारियों ने बुधवार को केजरीवाल को राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया। विशेष न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष दोनों पक्षों ने अपने बयान दिये. वहां सीबीआई ने केजरी को गिरफ्तार कर अपनी हिरासत में लेने का अनुरोध किया. केंद्रीय जांच एजेंसी के वकील ने कोर्ट से कहा, ”आबकारी मामले में जांच की प्रगति के लिए केजरीवाल से पूछताछ की जरूरत है.” इसलिए सीबीआई उन्हें अपनी हिरासत में लेना चाहती है.” केजरी के दावे के बावजूद बिना किसी नोटिस के उनसे जेल में पूछताछ की गई. इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री के वकील ने सीबीआई की याचिका का विरोध किया. लेकिन जज ने इसे खारिज कर दिया और केजरी को तीन दिन के लिए सीबीआई हिरासत में भेजने का आदेश दिया.

48 साल बाद होगा संसद में स्पीकर का चुनाव.

स्पीकर चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष में सहमति नहीं बन पाई, संसद में टकराव शुरू, चार दशक बाद चुनाव करीब 48 साल बाद सत्ता बनाम विपक्ष गठबंधन बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला करने जा रहा है। जैसी कि उम्मीद थी, एनडीए उम्मीदवार ओम बिड़ला हैं। पिछली लोकसभा में भी वह स्पीकर थे. देश चलाने के लिए आम सहमति जरूरी है. इसलिए वह सभी को साथ लेकर चलना चाहते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नई लोकसभा के पहले सत्र के पहले दिन यह दावा किया। लेकिन आज उनकी सरकार लोकसभा अध्यक्ष पद पर विपक्ष के साथ आम सहमति नहीं बना सकी. मोदी सरकार की तीसरी सरकार की शुरुआत में संसद आम सहमति के बजाय सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव में तब्दील हो गई.

लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव आम तौर पर सर्वसम्मति के आधार पर किया जाता है। कांग्रेस समेत विपक्षी खेमे की शर्त थी कि वे बीजेपी के स्पीकर उम्मीदवार को समर्थन देने को तैयार हैं. हालांकि परंपरा के मुताबिक उपसभापति का पद विपक्ष को दिया जाना चाहिए. संविधान में प्रावधान के बावजूद पिछले पांच वर्षों में कोई उपसभापति नियुक्त नहीं किया गया है. इस बार डिप्टी स्पीकर की नियुक्ति की जाएगी और यह पद विपक्ष के लिए छोड़ दिया जाएगा – मोदी सरकार ने ऐसा कोई आश्वासन देने से इनकार कर दिया है। परिणामस्वरूप, विपक्षी खेमे ने एक प्रति-उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला किया।

नतीजतन, लगभग 48 साल बाद बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए विपक्ष और सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच मुकाबला होने जा रहा है. जैसी कि उम्मीद थी, एनडीए उम्मीदवार ओम बिड़ला हैं। पिछली लोकसभा में भी वह स्पीकर थे. पिछले साल शीतकालीन सत्र में बिड़ला ने एक साथ 100 से ज्यादा सांसदों को निलंबित कर रिकॉर्ड बनाया था. उनके विरोध में भारत के उम्मीदवार, आठ बार के कांग्रेस सांसद, केरल के दलित नेता के सुरेश हैं। लोकसभा में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव बुधवार सुबह 11 बजे शुरू होगा. इस चुनाव के लिए कांग्रेस और बीजेपी ने व्हिप जारी कर दिया है.

स्वतंत्र भारत के इतिहास में अध्यक्ष पद के लिए केवल तीन बार मतदान हुआ है। पहली बार 1952 में. दूसरी बार 1967 में. तीसरी बार आपातकाल के बाद 1976 में। विरोधियों का तर्क है कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भी ‘अघोषित आपातकाल’ की स्थिति लौट आई है। लोकसभा स्पीकर चुनाव में भी दोबारा वोटिंग होती है. नरेंद्र मोदी आम सहमति की बात करते हैं लेकिन अपनी मर्जी थोपना चाहते हैं. लेकिन इस बार विपक्ष सुच्यग्रा मेदिनी को बिना लड़े नहीं छोड़ेगा. संख्या बल से ओम बिड़ला की जीत पक्की है। पहले से ही, एनडीए के 293 सांसद इंडिया अलायंस के 234 सांसदों से कहीं अधिक हैं। जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के चार सांसदों ने भी एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला किया है. लेकिन स्पीकर पद के लिए मतदान जारी रहने से मोदी सरकार असहज स्थिति में है. संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष से चुनाव में न जाने की अपील की। लेकिन सरकार ने इस बात का जवाब नहीं दिया कि विपक्ष उपसभापति का पद क्यों खाली नहीं करना चाहता. राहुल गांधी ने इसके लिए नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री की बातों का कोई मतलब नहीं है. उनका कहना है कि आम सहमति जरूरी है. बाहर बोले, सबको मिलजुल कर काम करना होगा. अंदर कुछ और करो.”

मंगलवार सुबह राहुल गांधी ने कहा कि विपक्षी खेमे में हर कोई बीजेपी के स्पीकर उम्मीदवार को समर्थन देने के लिए तैयार है. हालांकि परंपरा के मुताबिक उपसभापति का पद विपक्ष को दिया जाना चाहिए. राजनाथ सिंह मोदी सरकार के दूत बनकर विपक्ष से बात कर रहे थे. उन्होंने ही सोमवार रात कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, अखिलेश यादव जैसे विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व से बात की थी. खड़गे ने विपक्ष की शर्तों के बारे में राजनाथ को जानकारी दी. राजनाथ ने कहा, वह फिर फोन करेंगे और सरकार की स्थिति बताएंगे। राहुल की शिकायत, ‘वह फोन दोबारा नहीं आया’ राहुल ने यह भी शिकायत की कि खड़गे का अपमान किया गया.

संसद भवन में राजनाथ सिंह ने सबसे पहले डीएमके के टीआर बालू से बात की और स्पीकर पद के लिए समर्थन मांगा. बालू बोलने के लिए बाहर आए तो कांग्रेस के केसी बेनुगोपाल उन्हें दोबारा राजनाथ से बात कराने के लिए ले गए। वेणुगोपाल ने कहा कि विपक्ष को उपसभापति का पद खाली करने का आश्वासन देना चाहिए. राजनाथ वादे से मुकर गए. उन्होंने कहा, डिप्टी स्पीकर पद पर चर्चा बाद में की जाएगी. वेणुगोपाल ने बाहर आकर कहा कि सरकार विपक्ष को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है. उस वक्त तक एनडीए उम्मीदवार के तौर पर ओम बिड़ला का नामांकन दाखिल हो चुका था. उन्होंने नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की. कांग्रेस के के सुरेश का नामांकन बिना देर किये जमा कर दिया गया.

संसदीय कार्य मंत्री रिजिजू ने सवाल किया, ”विपक्ष विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव एक साथ क्यों करा रहा है?” दो अलग चीजें. उप सभापति का मुद्दा बाद में आएगा.”””””””””””””’ ”””””””””””””””’ ”””””””””””””””’ ””””””””””’ मोदी सरकार के पहले पांच वर्षों के दौरान एडीएमके के एम थंबीदुरई को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। लेकिन पिछले पांच साल से डिप्टी स्पीकर का पद खाली था. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस लोकसभा में उपाध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा।

संख्या अधिक होने के बावजूद, अमित शाह ने अध्यक्ष पद के लिए अधिक से अधिक वोटों से जीत सुनिश्चित करने के लिए सहयोगी दलों के साथ बातचीत शुरू कर दी है। चुनाव में जाने से पहले बुधवार सुबह एक और बैठक होगी. दूसरी ओर, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राहुल गांधी के साथ विपक्षी नेताओं के साथ बैठक की।