Saturday, March 7, 2026
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क्या कांग्रेस पार्टी को लेना चाहिए अपने भूतकाल से सबक?

वर्तमान में कांग्रेस पार्टी को अपने भूतकाल से सबक लेना चाहिए! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि यदि कांग्रेस सत्ता में वापस आती है, तो वह लोगों के सोने और मंगलसूत्र जो परिभाषा के अनुसार हिंदुओं के हैं छीन लेगी और इसे ‘घुसपैठियों’ और ‘कई बच्चों वाले लोगों’ में बांट देगी। उन्होंने आगे कहा है कि कांग्रेस संपत्ति कर और विरासत कर सहित ऊंचे टैक्स लगाएगी, जो लोगों से उनकी संपत्ति और यहां तक कि उनके बच्चों को दी गई वसीयत भी छीन लेंगे। पीएम मोदी इसके लिए ‘जिंदगी के बाद भी लूटो’ वाक्यांश का उपयोग करते हैं। क्या इसकी संभावना लाखों में एक भी है? अब तक कांग्रेस की जीत का कोई भी जिक्र आमतौर पर हंसी-मजाक के साथ किया जाता रहा है। लेकिन अचानक मोदी ने इसे एक ऐसी संभावना के रूप में खड़ा कर दिया है जिससे मतदाताओं को डरना चाहिए। ऐसा करके उन्होंने कांग्रेस को सुर्खियां और विश्वसनीयता प्रदान की है जिसके लिए राहुल गांधी को आभारी होना चाहिए।कांग्रेस ने गुस्से में मोदी के आरोपों का खंडन किया है। साथ ही चुनाव आयोग से मुसलमानों के खिलाफ इस नफरत भरे भाषण और पार्टी की बदनामी को रोकने के लिए कहा है। आधिकारिक कांग्रेस प्रवक्ता घोषणा करते हैं कि उनके घोषणापत्र में संपत्ति को जब्त करने और फिर से बांटने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। लेकिन पार्टी के भीतर कई लोग समाजवाद के प्रति कांग्रेस की पुरानी प्रतिबद्धता को दोहराना चाहते हैं। पार्टी के घोषणापत्र में संभवतः अमीरों पर कर लगाकर प्रत्येक गरीब परिवार को प्रति वर्ष एक लाख रुपये देने का वादा किया गया है। यह निश्चित रूप से कांग्रेस की मूल विचारधारा के अनुरूप पुनर्वितरण है। कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने ऑफ द रिकॉर्ड कहा कि उन पर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों तरफ से हमले हो रहे हैं। घोषणापत्र में सभी जातियों और अल्पसंख्यक समूहों की गणना करते हुए एक सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण का वादा किया गया है। इससे पता चलेगा कि किसके पास कितनी आय और संपत्ति है। इसे सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए शुरुआती बिंदु के रूप में बताया गया है। हालांकि, राहुल गांधी ने जनसंख्या हिस्सेदारी के अनुसार पुनर्वितरण का सुझाव देते हुए ‘जितनी आबादी, उतना हक’ नारे का इस्तेमाल किया है। विवादों से बचने के लिए घोषणापत्र स्पष्ट होने से इनकार करता है।

 चुनाव अभियान अतिशयोक्ति, अर्धसत्य और झूठ का अवसर होते हैं। दोनों पक्षों की तरफ से लगाए गए आरोप आंशिक रूप से सत्य हैं। भाजपा ने अमीर-बनाम-गरीब के मुद्दे को हिंदू-बनाम-मुस्लिम मामले में बदल दिया है। और कांग्रेस निश्चित रूप से आजादी के बाद से पुनर्वितरण की पार्टी रही है। वास्तव में, उसने 1970 के दशक में अपने उत्कर्ष के दिनों में कठोर पुनर्वितरण उपाय लागू किए थे। लेकिन ये इतने बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए कि कांग्रेस ने 1980 के दशक और उसके बाद खुद ही टैक्स दरों में कटौती कर दी। सामाजिक न्याय की कथित खोज में उन कठोर टैक्स को फिर से लागू करना मूर्खता होगी। इंदिरा गांधी ने गरीबी उन्मूलन (‘गरीबी हटाओ’) के लिए अधिकतम आयकर दर बढ़ाकर 97.75% और संपत्ति कर दर 3.5% कर दी। फिर भी आजादी के बाद तीन दशकों में गरीबी अनुपात में बिल्कुल भी गिरावट नहीं आई जबकि जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई। इसलिए, गरीब लोगों की कुल संख्या लगभग दोगुनी हो गई। यह क्रूर समाजवाद का एक भयानक अभियोग है। यदि किसी ने 1947 में भविष्यवाणी की होती कि अंग्रेजों के जाने के बाद गरीबों की संख्या दोगुनी हो जाएगी, तो उसे अंग्रेजों का चमचा कहा जाता। फिर भी नतीजा वही निकला।

कड़े टैक्स ने व्यापार को सफेद से काले धन की ओर धकेल दिया और गरीबी कम किए बिना आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचाया। बाद में कांग्रेस ने ही इन कठोर दरों को कम कर दिया, जिससे तेज आर्थिक विकास हुआ और गरीबी में कमी आई। नेहरू ने 1953 में विरासत कर और 1957 में संपत्ति कर लगाया। ये कागज पर कठोर दिखते थे, लेकिन अक्षम, भ्रष्ट कर विभाग और योजना बनाने में अमीरों की सरलता कर आश्रयों का मतलब था कि विरासत कर के रूप में बहुत कम धन एकत्र किया गया था। कांग्रेस ने स्वयं 1985 में संपदा शुल्क अधिनियम को समाप्त कर दिया क्योंकि इसे एकत्र करने की प्रशासनिक लागत एकत्रित राशि (20 करोड़ रुपये प्रति वर्ष) से अधिक हो गई थी। संपत्ति कर से भी निराशाजनक रिटर्न मिला, लेकिन काले धन को बढ़ावा देने और हजारों भारतीय करोड़पतियों के प्रवासन में मदद मिली। कर आश्रय। इसे 2016 में भाजपा द्वारा समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह उच्चतम आय पर 2 से 12% का अधिभार लगाया गया, जिससे कहीं अधिक राजस्व प्राप्त हुआ।

हालांकि, कांग्रेस का चुनाव आयोग से यह शिकायत करना सही है कि भाजपा इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रही है। बीजेपी का कहना है कि 2006 में मनमोहन सिंह ने कहा था कि मुसलमानों को पुनर्वितरण का पहला लाभार्थी होना चाहिए। कुल मिलाकर, सिंह के भाषण में सबसे गरीब समूहों – एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों के लिए सहायता मांगी गई। लेकिन सिंह की एक टिप्पणी ने सुझाव दिया कि मुसलमानों को पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उस समय भाजपा ने आपत्ति जताई और सरकार ने स्पष्ट किया था कि सिंह सभी गरीबों के लिए प्राथमिकता चाहते थे, मुसलमानों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं। इसका प्रमाण यह है कि कांग्रेस अगले आठ वर्षों तक सत्ता में रही लेकिन मुसलमानों को किसी भी पुनर्वितरण में कोई प्राथमिकता नहीं दी। बीजेपी का यह दावा करना कि 2006 की बहस कांग्रेस और मुसलमानों के खिलाफ उसके वर्तमान अपशब्दों को सही ठहराती है, झूठ है। चुनाव आयोग ने हेमा मालिनी का अपमान करने के लिए कांग्रेस प्रवक्ता की खिंचाई की है। इसे पुनर्वितरण मुद्दे पर निर्णायक रूप से कार्य करना चाहिए।

ऐसी अभिनेत्रियां जो बिना अभिनेता के भी फेमस हो गई!

आज हम आपको ऐसी अभिनेत्री के बारे में बताएंगे जो बिना अभिनेता के भी फेमस हो चुकी है! हीरो नहीं होगा, तो फिल्म नहीं बनेगी’ ये सोच सालों से बॉलीवुड में रही है। फिल्म इंडस्ट्री को हमेशा से नायक प्रधान इंडस्ट्री कहा गया है। उसके बगैर किसी फिल्म की कल्पना मुहाल है। ये माना जाता रहा है कि हीरो ही वो एलिमेंट है, जो फिल्म चला सकता है। उसी के दम पर पब्लिक थिएटर में आती है, हीरोइन तो बस ग्लैमर ऐड करने के लिए होती है। मगर हालिया रिलीज ‘क्रू’ में तब्बू, करीना कपूर और कृति सेनन जैसी ए लिस्टेड हीरोइन ने साबित कर दिया कि वे किसी हीरो को मोहताज नहीं हैं। उससे पहले यामी गौतम ‘आर्टिकल 370’ और अदा शर्मा ‘बस्तर:द नक्सल स्टोरी’ में बिना किसी हीरो के नजर आईं। हिंदी फिल्मों में नायिकाओं का में काम हीरो के साथ प्यार-रोमांस करने का माना जाता रहा है, मगर बीते समय में नायिकाओं ने दिखा दिया है कि उनका काम पर्दे पर सिर्फ हीरो से इश्क लड़ाना नहीं है बल्कि वो सब कुछ करना है, जो एक हीरो करता आया है। अलबत्ता आज के दौर में वे फिल्म में हीरो की जरूरत को खारिज करती नजर आ रही हैं। इस साल की पहली तिमाही में प्रदर्शित हुई ‘आर्टिकल 370’ के बाद आई ‘बस्तर :नक्सल स्टोरी’ में हीरोइन के साथ कोई हीरो नहीं था और अब हाल ही में रिलीज हुई ‘क्रू’ में दर्शकों को बेबो जैसी ग्लैमरस हीरोइन के साथ हीरो न होने की कमी बिलकुल नहीं खली।

इस साल की पहली तिमाही में प्रदर्शित हुई फिल्मों में से तीन फिल्में बिना हीरो की रही हैं। ‘आर्टिकल 370’ में आतंकवाद से जूझने वाली यामी गौतम के साथ फिल्म में कोई हीरो नहीं था। बावजूद इसके फिल्म में यामी की दमदार परफॉर्मेंस ने दर्शकों का दिल जीता और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर वर्ल्ड वाइड सौ करोड़ का आंकड़ा पार किया। अदा शर्मा की ‘बस्तर:द नक्सल स्टोरी’ में भी कोई हीरो नहीं था। फिल्म पूरी तरह से आईपीएस अफसर बनीं अदा पर आधारित थी। फिल्म भले बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली,मगर अदा के अभिनय की तारीफ जरूर हुई। हालांकि अदा शर्मा इस फिल्म से पहले पिछले साल आई ‘द केरला स्टोरी’ में अपने रोल के साथ-साथ बॉक्स ऑफिस पर भी अपना जलवा दिखा चुकी हैं। बीते साल ‘द केरला स्टोरी’ ने बॉक्स ऑफिस पर वर्ल्ड वाइड तीन सौ करोड़ का आंकड़ा पार किया था। उस फिल्म में भी अदा के साथ कोई हीरो नहीं था। हाल ही में रिलीज हुई ‘क्रू’ जैसी फीमेल सेंट्रिक फिल्म में तब्बू, करीना कपूर और कृति सेनन जैसी ए लिस्टेड ऐक्ट्रेस ने जता दिया कि वे बगैर किसी हीरो के अपनी शानदार परफॉर्मेंस से बॉक्स ऑफिस को चमका सकती हैं। फिल्म की फर्स्ट डे की कमाई तकरीबन बीस करोड़ रही और पहले वीकेंड में फिल्म ने वर्ल्ड वाइड साठ करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है।

बॉलिवुड में आउट एंड आउट नायिका प्रधान फिल्मों की धारा को मोड़ने का श्रेय काफी हद तक विद्या बालन और रानी मुखर्जी को जाता है। 2011 में आई रानी मुखर्जी और विद्या बालन अभिनीत ‘नो वन किल्ड जेसिका’ ने न केवल क्रिटिक्स बल्कि दर्शकों के दिल में भी जगह बनाई थी। दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म में दोनों कद्दावर अभिनेत्रियों को किसी हीरो के सहारे की जरूरत नहीं पड़ी थी। इसके बाद आई कहानी वन में विद्या को उनके अभिनय के लिए न केवल भरपूर तारीफें मिली बल्कि फिल्म ने अच्छी-खासी कमाई भी की। कमाल की बात ये है कि फिल्म की हीरो खुद विद्या ही थीं। इसके बाद विद्या लगातार ‘बेगम जान’, ‘नीयत’ जैसी कई फिल्मों में बिना हीरो के दिखीं, तो वहीं रानी मुखर्जी ने भी इस ट्रेंड को आगे बढ़ाया। उनकी ‘मर्दानी वन’ और टू में हीरो की कोई जगह नहीं थी, तो ‘हिचकी’ भी पूरी तरह से उन्हीं पर आधारित थी। कुछ अरसा पहले सत्य घटना पर आधारित ‘मिसेज चटर्जी वर्सेज नॉर्वे’ में अपने अभिनय का डंका बजा कर रानी ने साबित कर दिखाया कि अपनी फिल्म की हीरो वे खुद हैं। अपनी फिल्मों में हीरो के बिना आगे बढ़ने वाली नायिकाओं में तापसी पन्नू का भी शुमार है।

पिंक’, ‘थप्पड़’, ‘सांड की आंख’, ‘शाबाश मिट्ठू’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने हीरो की जरूरत को ही खत्म कर दिखाया। हालांकि ये हीरोइनें जब भी बिना कोई हीरो वाली या ऐसी नायिका प्रधान फिल्म करती हैं, जिसमें हीरो का रोल छोटा हो, तो इन्हें कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता रहा है। तापसी खुद कह चुकी हैं, ‘एक हीरो की जितनी सैलरी होती है, हमारी फीमेल सेंट्रिक फिल्म का टोटल बजट उतना होता है। इसके अलावा नायिका प्रधान फिल्मों में कोई बड़ा नाम करना नहीं चाहता। मेरी तमाम फिल्मों की कास्टिंग में इतनी बड़ी समस्या आई कि पूछो मत। जिन एक्टर्स की महज एक फिल्म आई है या जिन्होंने मल्टीस्टारकास्ट वाली फिल्म में काम किया है, उन एक्टर्स तक ने कह दिया कि हमें सलाह दी गई है कि ऐसी फिल्म का हिस्सा न बनें, जिसमें हीरोइन की भूमिका बड़ी हो। बड़े हीरोज की फिल्म में हम तो छोटा-मोटा रोल कर लेते हैं। मैंने मिशन मंगल और सूरमा में छोटे रोल किए थे। मगर मेरी फिल्म में कोई बड़ा नाम नहीं जुड़ा।’

रानी, विद्या और तापसी के अलावा कंगना रनौत की भी कई फिल्में बिना हीरो के रही हैं। श्रीदेवी की करियर की आखिरी फिल्म ‘मॉम’ में वे खुद नायक थीं, जबकि 2016 में प्रदर्शित हुई ‘नीरजा’ से अभिनेत्री के रूप में साख जमाने वाली सोनम कपूर के साथ हीरो नदारद था। मगर फिल्म चर्चित रही थी। यंग ऐक्ट्रेस में जाह्नवी ने कपूर ‘मिली’ में, तो नुशरत भरूचा ने ‘अकेली’ में बिना हीरो वाली कहानी को चुनने का साहस किया। इस बदलाव पर ‘कहानी’ जैसी सुपर हिट फीमेल सेंट्रिक फिल्म के लेखक सुरेश नायर भी कहना है, ‘नायिका प्रधान फिल्मों का दौर आता -जाता रहा है, मगर नायक प्रधान फिल्मों का दौर हमेशा रहा, मगर आज सिनेरियो बदल गया है। ओटीटी के आने के बाद लोग अच्छे कॉन्टेंट को तवज्जो दे रहे हैं। फिल्मों का नरेटिव भी बदला है। यही वजह है कि हीरोइन के सब्जेक्ट वाली फिल्मों की तादाद बढ़ी है, फिर दूसरी अहम बात ये भी है कि आज बड़े से बड़ा हीरो भी तो बॉक्स ऑफिस की गैरंटी नहीं रह गया।इसके बावजूद हीरोइन ओरिएंटेड फिल्मों की राह आसान नहीं है। मुझे याद है, कहानी में विद्या बालन के साथ मेल एक्टर को कास्ट करने में हमें काफी मुश्किलें आईं थीं। हमने कई अच्छे और बड़े एक्टर्स से संपर्क किया था, मगर कोई भी राजी नहीं हुआ। हर एक्टर का कहना था फीमेल सेंट्रिक फिल्म में उनके हिस्से में क्या आएगा? इसी के बाद हमने उस रोल के लिए परमब्रत चटर्जी को लिया था।’

मदर इंडिया’ जैसी स्ट्रॉन्ग हीरोइन ओरिएंटेड फिल्में पहले भी बनती रही हैं। मगर ये मानना पड़ेगा कि हीरो के डॉमिनेंस वाली इंडस्ट्री में हीरोइन का रोल बदल गया है। पहले मेकर्स को ये शिकायत होती थी कि हीरोइन ओरिएंटेड फिल्में पैसा नहीं कमा पातीं, मगर अब नजारा बदल गया है। ताजा फिल्मों की बात करें, तो ‘आर्टिकल 370’ ने अच्छी कमाई की और क्रू का वीकेंड कमाल का रहा। आज दर्शक अलग कहानी देखना चाह रहे हैं।

आखिर क्यों बनाई गई द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल क्यों बनाई गई है! इन दिनों बॉलीवुड फ़िल्म ‘द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल’ को लेकर काफी चर्चा है। इस फ़िल्म का सेंसरशिप तो हो चुका है लेकिन सेंसर बोर्ड इस फ़िल्म को रिलीज करने के लिए सर्टिफिकेट नहीं दे रहा है। फिल्म के मेकर्स और डायरेक्टर सेंसर बोर्ड के चक्कर लगा लगाकर थक चुके हैं लेकिन सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी या उनकी टीम से कोई भी इस फ़िल्म को लेकर कुछ भी बोलने से परहेज कर रहे हैं। Waseem Rizvi से जब पूछा गया कि सेंसर बोर्ड आखिर क्यों नहीं दे रही सर्टिफिकेट, तो उन्होंने वीडियो के जरिए जवाब दिया, ‘पाकिस्तान से जब फतवा जारी किया गया, उसके बाद हमने शिकायत दर्ज कराई है। पाकिस्तान की कट्टरपंथी संगठने चाहती हैं कि हम हार मान लें। वो चाहर रहे हैं कि हम फिल्म को रिलीज ना करें और सौदेबाजी कर लें। सबसे अहम बात फतवे में ये कि उसमें ममता बनर्जी को पाकिस्तान के लिए अच्छी हुकुमत बताया गया है। ममता बनर्जी जिस तरह के विवाद को जन्म दे रही हैं, वो इस देश के लिए खतरा है।’बात सिर्फ ये है कि बात अगर उठाई जा रही है तो उसकी कुछ न कुछ असलियत है। हमारी फिल्म शहजहां शेख जैसे किरदारों के ऊपर बनी हुई है। बंगाल में केवल एक शहजहां शेख नहीं, बंगाल में बीसों शहजहां शेख हैं। चर्चित होने का कोई इसमें मसला नहीं है। हमारी बात को, हमारे विषय को कमजोर करने के लिए ऐसी बात की जाती है।’ इसके बाद वसीम रिजवी ने कहा, ‘आप ये नहीं कह सकते कि ये फिल्म ममता बनर्जी को ध्यान में रखकर बनाई गई है। ये फिल्म दिखाती है कि बंगाल में हिंदुओं की क्या स्थिति है। रोहिंग्या को किस तरह से सरकारी सहूलियत दी जा रही है। ये फिल्म ऐसे परिवार पर बनी है जो बंगलादेश से भारत इस मकसद से आए हैं कि उनको यहां कि नागरिकता मिल जाएगी। ये बंगलादेश में हुए दंगों के वक्त पीड़ित परिवार है। फिल्म की कहानी इस बारे में है न कि ममता बनर्जी के ऊपर बनी है।’

फिल्ममेकर से जब पूछा गया कि क्या चर्चे में आने के लिए जान-बूझकर बनाई जाती हैं ऐसी फिल्में, इस पर उन्होंने कहा, ‘जब भी कोई मु्द्दा उठाया जाता है तो उसे कमजोर करने के लिए कहा जाता है कि ये विवादित है और ये चर्चा में आने के लिए उठाया गया है। बात सिर्फ ये है कि बात अगर उठाई जा रही है तो उसकी कुछ न कुछ असलियत है। हमारी फिल्म शहजहां शेख जैसे किरदारों के ऊपर बनी हुई है। बंगाल में केवल एक शहजहां शेख नहीं, बंगाल में बीसों शहजहां शेख हैं। चर्चित होने का कोई इसमें मसला नहीं है। हमारी बात को, हमारे विषय को कमजोर करने के लिए ऐसी बात की जाती है।’

फ़िल्म ‘द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल’ पश्चिम बंगाल में रोहिंज्ञाओं के अवैध प्रवास और हिंदुओं के उत्पीड़न पर आधारित एक पीरियड ड्रामा फ़िल्म है।बता दें कि उसमें ममता बनर्जी को पाकिस्तान के लिए अच्छी हुकुमत बताया गया है। ममता बनर्जी जिस तरह के विवाद को जन्म दे रही हैं, वो इस देश के लिए खतरा है।’ इसके बाद वसीम रिजवी ने कहा, ‘आप ये नहीं कह सकते कि ये फिल्म ममता बनर्जी को ध्यान में रखकर बनाई गई है। ये फिल्म दिखाती है कि बंगाल में हिंदुओं की क्या स्थिति है। रोहिंग्या को किस तरह से सरकारी सहूलियत दी जा रही है। ये फिल्म ऐसे परिवार पर बनी है जो बंगलादेश से भारत इस मकसद से आए हैं कि उनको यहां कि नागरिकता मिल जाएगी। इसमें देश के एक सबसे बड़े कंट्रोवर्शियल मुद्दे को उठाकर इस फ़िल्म के निर्माता वसीम रिजवी और फ़िल्म के निर्देशक सनोज मिश्रा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से अनचाहे ही बैर मोल ले लिया है। इनके खिलाफ पाकिस्तान के करांची स्थित एक आतंकवादी संगठन ने फतवा तक जारी कर दिया है और फ़िल्म को रिलीज ना करने की धमकी दे रखी है। इस फ़िल्म में यजुर मारवाह, अर्शिन मेहता गौरी शंकर , जितेंद्र नारायण सिंह, अल्फिया शेख, दीपक कम्बोज, देव फौजदार, गरिमा कपूर, रीना भट्टाचार्य, डॉक्टर रामेंद्र चक्रवर्ती, नरेश शर्मा, अवध अश्विनी, रॉनव वर्मा, आशीष राजपूत, अभिषेक मिश्रा, मयूर, अनुज दीक्षित, अनिल अंजुलीन, दीपक सुथा, श्रीवन आदर्श, नित महल और प्रीति शुक्ला भी हैं।

आखिर वर्तमान में गानों में क्यों लाई जा रही है एडल्ट्री?

वर्तमान में गानों में एडल्ट्री लाई जा रही है! मशहूर पंजाबी सिंगर रहे अमर सिंह ‘चमकीला’ पर बनी बायोपिक OTT प्लैटफॉर्म पर रिलीज हुई है। इस फिल्म में पंजाबी भाषा में कुछ डबल मीनिंग गीत भी हैं। इस फिल्म के बहाने भारतीय लोकगीतों में बढ़ रही अश्लीलता एक बार फिर चर्चा में आ गई है। पिछले कुछ दशकों में अश्लील म्यूजिक कंटेंट क्यों बढ़ा है? इसका हमारे समाज, भाषा और हमारी संस्कृति पर क्या असर पड़ता है? इस तरह के कंटेंट को सुनने वाले या बनाने वाले कौन हैं? क्या इसे रोका जा सकता है और इस पर रोक लगाने को लेकर हमारे सामने किस तरह की चुनौतियां हैं? पहले लोक जीवन में नाच-नौटंकी, अखाड़े, नुमाइश और मेले ही मनोरंजन के साधन थे। इस तरह के मनोरंजन के कार्यक्रमों को खासकर अडल्ट पुरुष ही देखने जाते थे। इसमें कुछ डबल मीनिंग संवाद वाले नाटक और कुछ भद्दे गीत भी परोसे जाते थे। उस समय इस तरह के कंटेंट के फैलने की कोई व्यवस्था नहीं थी। लेकिन 80 के दशक के बाद जब कैसेट का दौर आया तो कुछ लोग इस तरह के अश्लील या डबल मीनिंग गीतों को लेकर प्रयोग करने लगे। यह कमोबेश हर जगह था। सिनेमा भी इससे अछूता नहीं था। इसका विरोध भी अलग-अलग स्तर पर हुआ। बोलने व सुनने वालों की तादाद ज़्यादा होने की वजह से इस तरह के प्रयोग भोजपुरी और पंजाबी में ज़्यादा सफल भी हुए। 90 का दशक आते-आते इस तरह के गीतों को और बल मिला क्योंकि टेप-रिकॉर्डर और वॉकमैन के जरिए ऐसे गीतों को सुनने के लिए प्राइवेट स्पेस मिला। इसके जरिए कुछ गायकों ने स्टारडम भी हासिल किया। लेकिन इसके बाद भी अच्छा कंटेंट अश्लील कंटेंट पर हावी रहा। लेकिन 2000 के दशक में सीडी प्लेयर के आने से ऐसे अश्लील और डबल मीनिंग गीतों को सुनने के साथ-साथ देखने का भी माध्यम मिला। इससे डबल मीनिंग कंटेंट के बाजार ने और रफ्तार पकड़ ली। 2011 के दशक में मोबाइल फोन के रूप में और भी ज़्यादा प्राइवेट स्पेस मिल गया। इसे बाजार ने भी अच्छे से भुनाया। वहीं, गीतों को रिलीज करने के लिए गायकों की प्राइवेट कंपनियों से निर्भरता धीरे-धीरे खत्म होने लगी। गाने डिजिटल प्लैटफॉर्म पर रिलीज होने लगे। अश्लील गीत सस्ती लोकप्रियता का माध्यम बन गए। खासकर भोजपुरी भाषा में बड़ा श्रोता वर्ग होने की वजह से ऐसे अश्लील गीतों की बाढ़ आ गई। ऐसे में भोजपुरी गीत डबल मीनिंग नहीं, खालिस अश्लील हो गए।

फिल्म ‘चमकीला’ के रिलीज होने के बाद कुछ लोग इसके गानों का विरोध कर रहे हैं तो कुछ लोग इसको जस्टिफाई करने में लगे हैं। लेकिन भारतीय सिनेमा पर यह आरोप लगभग 80 बरसों से लग रहे हैं। हिंदी फिल्मी गीतों पर भी अश्लीलता का आरोप कोई नया नहीं है। साल 1944 में एक फिल्म आई थी, जिसका नाम था ‘मन की जीत’। इस फिल्म में उस दौर के जानेमाने शायर जोश मलियाबादी ने एक गीत लिखा था, जिसके बोल थे, ‘मेरो जोबना का देखो उभार’, जो एक बानगी मात्र है। इसके अलावा भी ऐसे गीतों की कई मिसालें मिलती हैं। ‘खलनायक’ फिल्म में जब आनंद बक्शी ने गीत लिखा था कि ‘चोली के पीछे क्या है’ तो इसको लेकर कितना बवाल हुआ। लेकिन उसके बाद कई गाने आए, जिनको रेखांकित किया जा सकता है। कुछ दिनों तक सुनने के बाद इस तरह के गाने काफी सामान्य लगते हैं। 90 के दशक में पूरे साउथ के सिनेमा पर अश्लीलता का असर था। 80 के दशक में मराठी में दादा कोंडके की फिल्मों ने तो डबल मीनिंग संवाद के मामले में सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। वहीं, साल 2000 के बाद जो भोजपुरी फिल्मों का स्वर्ण काल होना चाहिए था, वह पूरी तरह अश्लीलता में डूब गया और आज भोजपुरी फिल्मों को दर्शक नहीं मिल रहे हैं।

अश्लील गीतों की जब भी चर्चा शुरू होती है तो एक बात निकलकर सामने आती है कि समाज में ऐसे गीतों को सुनने वाले बड़ी संख्या में हैं। जब ऐसे गीतों की डिमांड सोसायटी में है तो इसी वजह से इन्हें बनाया जा रहा है। लेकिन यह तो ऐसा ही हुआ कि जैसे कहीं ड्रग्स की ज़्यादा डिमांड हो तो वहां इसकी सप्लाई को कानूनी मान्यता दे दी जाए। मांग के आधार पर डबल मीनिंग और अश्लील गीतों को बनाना और उसे समाज में परोसा जाना बिलकुल गलत है। स्थिति यह है कि हम लोग इन गीतों के इतने आदी हो चुके हैं कि यह हमें सामान्य लगने लगे हैं। आने वाली हमारी पीढ़ी को लगेगा कि गीत ऐसे ही होते हैं, जिसे लोग गा रहे हैं या सुन रहे हैं। ऐसा भोजपुरी गीतों के साथ हुआ है। ऐसा कह कर हमारा सिस्टम, हमारे समाज के लोग, ऐसे गाने लिखने और गाने वाले अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं।

अश्लील गीत हमारी भाषा, संस्कृति और संस्कारों को संक्रमित करते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कामगार लोग देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में गए। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए अच्छे-बुरे गीत भी अपने साथ लेकर गए। परिवार से दूर प्राइवेट स्पेस में अश्लील गीतों ने ज़्यादा जगह बनाई। इसकी वजह से जो लोग भोजपुरी भाषी नहीं हैं, उन्हें लगता है कि भोजपुरी के लोकगीत ऐसे ही होते हैं। जबकि भोजपुरी लोक गीतों की बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है। लगभग 15 साल पहले भोजपुरी में एक गीत आया ‘ए डबल चोटी वाली तोहके टांग ले जाइब हो’। यहां डबल चोटी से मतलब उन बच्चियों से है जो दो चोटियां बनाकर स्कूल जाती हैं। मनचलों ने इस गीत को माध्यम बनाकर स्कूल जाने वाली बच्चियों को छेड़ना शुरू कर दिया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। इस तरह के गीत समाज के बड़े वर्ग को लड़कियों व महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के लिए उकसाते हैं।

आज के दौर में गाने डिजिटल प्लैटफॉर्म से ही रिलीज हो रहे हैं। ऐसे में जिन प्लैटफॉर्म से गीत रिलीज हो रहे हैं, उनके लिए सरकार की ओर से गाइडलाइंस होनी जरूरी हैं। जिस तरह फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, ठीक उसी तरह गीतों के लिए भी सेंसर बोर्ड होना चाहिए। साथ ही ऐसे गीतों को रिलीज होने से रोकने के लिए डिजिटल और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को कानून के दायरे में लाना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ी समस्या है कि OTT प्लैटफॉर्म के लिए भी कोई सेंसर बोर्ड नहीं है। चूंकि OTT प्लैटफॉर्म के लिए ही अभी सेंसर बोर्ड जैसी कोई व्यवस्था नहीं है तो लोक गीतों के लिए तो दूर की बात है। बिहार में अश्लील गीतों को पब्लिक प्लैटफॉर्म पर बजाने से रोकने के लिए गाइडलाइंस जारी की गई थीं। कुछ दिनों तक सख्ती रही लेकिन फिर स्थिति वैसी ही हो गई। डिजिटल प्लैटफॉर्म पर ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अगर कुछ प्रतिशत लोग किसी गाने को अश्लील बताते हुए रिपोर्ट करते हैं तो उस गाने पर फौरन रोक लग जाए। AI के आने के बाद तो ऐसा होना आसान हो सकता है।

आखिर वर्तमान की राजनीति से क्यों बच रहा है आम आदमी?

वर्तमान में आम आदमी राजनीति से बच रहा है! इन दिनों लोकसभा चुनाव को लेकर फिजा में चारों तरफ सियासी सरगर्मियां हैं। मैं अपने घर से ऑटो से ऑफिस के लिए निकला। ऑटो शेयरिंग था लेकिन बतौर सवारी मैं अकेला था। ऑटो वाले भैया से मेरी बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने मेरे बारे में पूछा कि कहां रहते हैं, क्या करते हैं? वह मेरे पेशे  के बारे में जानकर कुछ शहर की और कुछ अपने मोहल्ले की समस्याओं के बारे में बताने लगे जिनसे उन्हें रोज जूझना पड़ता है। चुनावी माहौल की वजह से मैं भी उससे पूछ बैठा कि राजनीति में क्या चल रहा है। आपके यहां से इस बार कौन जीतेगा? उन्होंने तुरंत मेरे सवाल से किनारा कर लिया और पल्ला झाड़ते हुए बोले कि ‘राजनीति से मेरा कोई लेना देना नहीं है। मैं इन चक्करों में नहीं पड़ता। मुझे अपने बच्चे पालने हैं।’ उसके इस जवाब से मैं तो अपराधबोध में आ गया। सोचने लगा कि हमारे आसपास ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो अक्सर यह कहते हुए मिल जाते हैं, ‘मैं तो राजनीति से दूर रहता हूं। अरे भाई, राजनीति से मेरा घर नहीं चलता, मेरा घर तो नौकरी से चलता है भाई, यह राजनीति किसी को रोटी नहीं देती। मेरा राजनीति से क्या लेना-देना। मेरे साथ राजनीति मत करो।’ कई लोग यह भी कहते हुए मिल जाते हैं कि बहुत राजनीति कर रहे हो। इस तरह के जवाब काफी पढ़े-लिखे लोग भी देते हैं। कई बार यह भी कहा जाता है कि पढ़ने-लिखने वाले छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए जबकि छात्र हमारे देश का भविष्य हैं। उनकी सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा है। उनकी शिक्षा कैसी होगी, यह सब राजनीति से जुड़े लोग तय करते है। ऐसे में छात्रों को राजनीति से दूर रहने की नसीहत देना कितना सही है? और सिर्फ छात्र ही नहीं, राजनीति पर सबका अपना नजरिया होना चाहिए।

लेकिन क्या एक लोकतांत्रिक देश में राजनीति के प्रति इतनी उदासीनता सही है? अंग्रेजी में एक कहावत है- If Politics decides your future then you decide what your Politics should be यानी जब राजनीति ही तय करती है कि आपका भविष्य क्या होगा, ऐसे में आपको यह जरूर तय करना चाहिए कि आपकी राजनीति क्या हो जाने-माने शायर जावेद अख्तर कहते हैं कि राजनीति से खुद को दूर रखने की बात वैसी ही है, जैसे कोई दिल्ली में रहता हो और कहे कि हमारा प्रदूषण से कोई लेना-देना नहीं है। जब हमारा खाना-पीना, आना-जाना, हमारी सुरक्षा, हमारी कमाई, हमारा खर्च, हमारी बचत, हमारी स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा और यहां तक कि हमें किस तरह की हवा में सांस लेनी है, यह भी राजनीति से तय होता है तो हम खुद को राजनीति से दूर कैसे रख सकते हैं?

राजनीति करने का मतलब, चुनाव लड़ने से नहीं है। हम जिस राजनीति की बात कर रहे हैं या जिस तरह से हमें राजनीति करने का अधिकार हमारे संविधान से मिला है, उसका मतलब सिर्फ वोटों की होड़ से नहीं है। इसका मतलब किसी राजनीतिक पार्टी या नेता के पीछे झंडे लेकर और टोपी पहनकर दौड़ने से भी नहीं है। किसी पार्टी का पार्ट टाइम या फुल टाइम कार्यकर्ता बनने से भी नहीं है। राजनीति से मतलब है कि हम जिस देश में रहते हैं, उसकी नीतियां कैसी हों और कौन लोग बना रहे हैं? इसके पीछे उनकी मंशा क्या है? इससे हमारे जीवन, हमारे समाज, हमारे बच्चों, आने वाली हमारी पीढ़ियों और हमारे देश के वर्तमान व भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? राजनीति का अर्थ इन सब बातों के प्रति सजग रहने से है। इसके लिए लोकतांत्रिक तरीके से अपने वोट के जरिए, सोच-समझ कर सही व्यक्ति का चुनाव करने से है।

सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे समाज में राजनीति के प्रति नकारात्मक धारणा एक दिन में नहीं आई है। आजादी के बाद से ही धीरे-धीरे और बहुत सुनियोजित तरीके से राजनीति को हमारे दिमाग में बहुत गलत अर्थो में फिट किया गया है। राजनीति के प्रति एक डर भी बहुत सुनियोजित तरीके से दिमाग में बैठाया गया ताकि लोग राजनीतिक रूप से इतने जागरूक न हो सकें, जितनी जागरूकता की जरूरत एक लोकतांत्रिक देश में रहने वाले नागरिकों को होती है। जो लोग राजनीतिक रूप से ताकतवर हैं, वे नहीं चाहते हैं कि इस पूरी व्यवस्था में उनके अलावा कोई दूसरा आए या राजनीति के प्रति अपना तार्किक विचार रख सके। राजनीति से जुड़े लोग तो सिर्फ यही चाहते हैं कि आप वैसा ही सोच सकें, जैसा वे चाहते हैं। कई बार अनायास ही कह दिया जाता है कि भाई तुम इस राजनीति में मत पड़ो। कई बार सलाह के रूप में तो कई बार धमकी के रूप में भी यहां मतलब सिर्फ राजनीति से ही नहीं है। यहां यह मेसेज दिया जाता है कि तुम किसी भी उस प्रपंच में मत पड़ो, जिसमें तुमसे बड़े दिग्गज पहले से शामिल हैं। राजनीति को आम जनमानस में इस तरह से रेखांकित किया जाता रहा है कि यह गुंडे, मवाली और भ्रष्ट लोगों के लिए बनी है। इसका नतीजा यह हुआ कि राजनीति धीरे-धीरे सही अर्थ से दूर होती चली गई और लोग उस राजनीति से भी बचने लगे जो सही मायने में हमें करनी चाहिए। इसी सोच का नतीजा है कि सरकार की तरफ से लोगों को वोट डालने के लिए छुट्टी दी जाती है मगर उस दिन लोग वोट देने के बजाय घूमने निकल जाते हैं।

1947 से पहले देश में जो राजनीति थी, वह आजादी की लड़ाई के लिए थी। शुरुआती दौर में हमारे देश के लोगों को लगता था कि यह राजा से राजा की लड़ाई है, इससे हमारा क्या लेना-देना? जिसका नतीजा था कि हम 200 बरसों तक गुलाम रहे। लेकिन महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई को आम जनमानस की लड़ाई बना दिया। गांधी ने बताया कि यह लड़ाई हमारी आपकी और सबकी है। खेत में काम करने वाले किसान और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर, सबको लगने लगा कि यह हमारी लड़ाई है। इसी तरह यह राजनीति भी सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं है जो चुनाव लड़ रहे हैं। जब राजनीति से ही हमारा सब कुछ सुनिश्चित होता है तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी राजनीतिक भागीदारी को तय करें।

क्या वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक चालान भरना मुश्किल होता जा रहा है ?

वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक चालान भरना मुश्किल होता जा रहा है! सड़कों पर ज्यादातर वाहन चालकों को पता है कि ई-चालान से चीजें आसान नहीं हैं। इस डिजिटल प्रक्रिया को समझना शायद शहर की सड़कों से भी ज्यादा मुश्किल है। ई-चालान सिस्टम को देखने पर पता चलता है कि अलग-अलग तरह की गलतियों के लिए अलग-अलग तरह के चालान होते हैं और जुर्माना भरने की अलग-अलग समय सीमा तय होती है। सोशल मीडिया पर लोगों ने ये सवाल पूछे हैं कि जुर्माना कहां भरना है, क्योंकि ऐसा लगता है कि पेमेंट करने के लिए कई पोर्टल हैं। ट्रैफिक पुलिस की वेबसाइट ही जुर्माना भरने की इकलौती जगह नहीं है। देश में लोगों के लिए ई-चालान लाकर सुविधा आसान तो की गई है लेकिन यह उतनी है नहीं। इस तरह का चालान 15 दिनों तक ट्रैफिक पुलिस के पास रहता है और आप इसे ट्रैफिक पुलिस की वेबसाइट पर जमा कर सकते हैं।इसके कई कारण हैं, देरी से मिलते चालान के एसएमएस सूचनाएं: कई बार हफ्तों बाद चालान का एसएमएस आता है। गलत गाड़ी नंबर पढ़ने की वजह से गलत चालान: गाड़ी नंबर गलत पढ़ने के कारण कभी-कभी गलत चालान जारी कर दिया जाता है। पेमेंट में दिक्कत: वेबसाइट का इंटरफेस उलझन भरा होने और जुर्माना पुलिस को जमा करना है या कोर्ट में, इस बारे में जानकारी ना मिलने के कारण लोग चालान का भुगतान नहीं कर पाते हैं।

ई-चालान आपको तीन तरीकों से मिल सकता है, ट्रैफिक पुलिस वाला सड़क पर ही ई-चालान मशीन का इस्तेमाल करके आपको चालान दे सकता है। नियम तोड़ने पर ट्रैफिक पुलिस अपने मोबाइल फोन के कैमरे से आपकी गाड़ी की फोटो खींचकर अगर आप ट्रैफिक नियम तोड़ रहे हैं VOCA के जरिए ई-चालान जारी कर सकता है। तरह का चालान 60 दिनों तक ट्रैफिक पुलिस के पास रहता है और आप इसे ट्रैफिक पुलिस की वेबसाइट पर जमा कर सकते हैं। अगर 60 दिनों में भुगतान नहीं किया जाता है, तो चालान को वैधानिक कार्रवाई और भुगतान के लिए वर्चुअल कोर्ट में भेज दिया जाता है।रेड लाइट जंप करने या तेज रफ्तार में गाड़ी चलाने पर ऑटोमैटिक कैमरे आपकी गाड़ी की फोटो खींचकर उसे सेंट्रलाइज्ड सर्वर पर भेज देते हैं, जिससे आपको ई-चालान मिल सकता है। पुलिस का दावा है कि उल्लंघनकर्ताओं के फोन नंबर पर एसएमएस के माध्यम से संदेश तुरंत भेजे जाते हैं। फोन नंबर में विवरण को अपडेट करने की जिम्मेदारी उपयोगकर्ता की है। यदि कोई फोन नंबर लिंक नहीं है, तो चालान स्पीड पोस्ट द्वारा पंजीकृत पते पर भेजा जाता है। मालिक को जुर्माना देने या चालान लड़ने के लिए व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिरी लगानी पड़ती है।

अगर आपको लगता है कि चालान गलत कट गया है, तो आप उसका विरोध कर सकते हैं। आप इसे वर्चुअल कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं और फिर आपको एक ‘डिजिटल कोर्ट’ में भेज दिया जाएगा। वहां एक निर्धारित समय के साथ एक मीटिंग लिंक बनाया जाएगा और मामले की सुनवाई एक मजिस्ट्रेट की ओर से की जाएगी। मजिस्ट्रेट डिजिटल कोर्ट में मामले के तथ्यों के आधार पर आदेश पारित करेगा। बता दें कि देश में लोगों के लिए ई-चालान लाकर सुविधा आसान तो की गई है लेकिन यह उतनी है नहीं। इसके कई कारण हैं, देरी से मिलते चालान के एसएमएस सूचनाएं: कई बार हफ्तों बाद चालान का एसएमएस आता है। गलत गाड़ी नंबर पढ़ने की वजह से गलत चालान: गाड़ी नंबर गलत पढ़ने के कारण कभी-कभी गलत चालान जारी कर दिया जाता है। पेमेंट में दिक्कत: वेबसाइट का इंटरफेस उलझन भरा होने और जुर्माना पुलिस को जमा करना है या कोर्ट में, इस बारे में जानकारी ना मिलने के कारण लोग चालान का भुगतान नहीं कर पाते हैं। ये मामूली गलतियों के लिए होते हैं, जैसे कि ‘नो पार्किंग’ जोन में गाड़ी खड़ी करना। इस तरह का चालान 60 दिनों तक ट्रैफिक पुलिस के पास रहता है और आप इसे ट्रैफिक पुलिस की वेबसाइट पर जमा कर सकते हैं। अगर 60 दिनों में भुगतान नहीं किया जाता है, तो चालान को वैधानिक कार्रवाई और भुगतान के लिए वर्चुअल कोर्ट में भेज दिया जाता है।

ऐसे अपराधों के लिए होते हैं जो ‘समाज के खिलाफ‘ जाते हैं, जैसे कि रेड लाइट जंप करना। इस तरह का चालान 15 दिनों तक ट्रैफिक पुलिस के पास रहता है और आप इसे ट्रैफिक पुलिस की वेबसाइट पर जमा कर सकते हैं। अगर भुगतान नहीं किया जाता है, तो इसे वैधानिक कार्रवाई और भुगतान के लिए वर्चुअल कोर्ट में भेज दिया जाता है।

आखिर क्या है चुनावों का प्याज कनेक्शन?

आज हम आपको चुनावों का प्याज कनेक्शन बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव के बीच देश के प्याज किसानों के लिए राहत की खबर आई है। केंद्र सरकार ने 5 महीने पहले प्याज के निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटा लिया है। प्याज पर बैन हटने के बाद केंद्र सरकार ने 6 देशों – बांगलादेश, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), भूटान, बहरीन, मॉरिशस और श्रीलंका को 99,150 टन प्याज का निर्यात करने की अनुमति दी है। सरकार की तरफ से पर्याप्त घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है। दूसरी तरफ चुनाव के बीच विपक्षी दल कांग्रेस लगातार प्याज निर्यात पर बैन और प्याज किसानों के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही थी। सरकार के इस फैसले को लोकसभा चुनाव से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। जानकार मान रहे हैं कि सरकार चुनावी मौसम में प्याज के आंसू नहीं रोना चाहती है। कांग्रेस की तरफ से महाराष्ट्र के किसानों से जुड़े विषय को लगातार केंद्र पर निशाना साधा जा रहा था। कांग्रेस का आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रदेश के प्याज किसानों की निरंतर उपेक्षा कर रहे हैं। पार्टी महासचिव जयराम रमेश का कहना था कि बीजेपी ने कोल्हापुर में 50,000 करोड़ रुपये के निवेश को क्यों खतरे में डाला? पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में ‘लाल श्रेणी’ के मोडानी प्रोजेक्ट्स को मंजूरी क्यों दी गई है? सिर्फ गुजरात के सफेद प्याज से ही निर्यात प्रतिबंध क्यों हटाया गया है? रमेश ने कहा कि दिसंबर 2023 से, महाराष्ट्र में प्याज किसान मोदी सरकार के प्याज निर्यात पर प्रतिबंध से जूझ रहे हैं।

महाराष्ट्र में बीजेपी प्याज किसानों की नाराजगी नहीं मोल लेना चाहती है। प्याज एक्सपोर्ट पर बैन लगने किसानों को उनकी उपज की उचित कीमत नहीं मिल पा रही थी। किसानों की नाराजगी यहां स्थानीय उम्मीदवार और पार्टी नेता भी महसूस कर रहे थे। नासिक बीजेपी पदाधिकारियों ने स्वीकार किया कि केंद्र की घोषणा डिंडोरी निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी के लिए एक बड़ी राहत है। बीजेपी पदाधिकारी ने कहा कि इससे हमें प्याज किसानों को लुभाने में मदद मिलेगी, जो प्रतिबंध लगाए जाने के बाद असंतुष्ट थे। निर्यात के लिए अनुमत मात्रा ‘बहुत कम’ है। प्याज निर्यातक विकास सिंह ने कहा कि नासिक से हर महीने लगभग 48,000 टन प्याज निर्यात किया जाता है। महाराष्ट्र में अहमदनगर जैसे अन्य जिले हैं जहां से कम मात्रा में निर्यात किया जाता है। मुझे उम्मीद नहीं है कि इतनी कम मात्रा में निर्यात की अनुमति दी जाएगी और इससे एपीएमसी में थोक कीमतों में सुधार करने में मदद मिलेगी।इससे एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के उम्मीदवार भास्कर भगारे को फायदा हुआ था। अब हमें विश्वास है कि निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के लिए चीजें बेहतर होंगी। केंद्रीय मंत्री और डिंडोरी से बीजेपी उम्मीदवार भारती पवार ने कहा कि घोषणा से प्याज किसानों ने राहत की सांस ली है। निर्यात प्रतिबंध को लेकर डिंडोरी में प्याज किसानों की तरफ आलोचना झेलने वाली पवार ने कहा कि मेरा मानना है कि यह किसानों को राहत देने के लिए सरकार का एक नया कदम है। डिंडौरी में प्याज की खेती करने वाले वोटरों की अच्छी खासी संख्या है।

खेती के मौसम के दौरान, महाराष्ट्र असंतोषजनक वर्षा और जल संकट से प्रभावित था। अधिकतर किसान अपनी सामान्य फ़सल का केवल 50 प्रतिशत ही उत्पादन कर पाए थे। जब अंततः प्याज की कटाई और खुदाई हुई तो किसानों को निर्यात प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। इसके कारण बिक्री की कीमतें बेहद कम हो गईं। परिणामस्वरूप, पिछले पांच महीनों में किसानों को काफी नुकसान हुआ है। सरकार के फैसले को लेकर किसानों और व्यापारियों के एक वर्ग में नाराजगी भी है।सरकार चुनावी मौसम में प्याज के आंसू नहीं रोना चाहती है। कांग्रेस की तरफ से महाराष्ट्र के किसानों से जुड़े विषय को लगातार केंद्र पर निशाना साधा जा रहा था। कांग्रेस का आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रदेश के प्याज किसानों की निरंतर उपेक्षा कर रहे हैं। पार्टी महासचिव जयराम रमेश का कहना था कि बीजेपी ने कोल्हापुर में 50,000 करोड़ रुपये के निवेश को क्यों खतरे में डाला? पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में ‘लाल श्रेणी’ के मोडानी प्रोजेक्ट्स को मंजूरी क्यों दी गई है? प्याज व्यापारियों के एक वर्ग को लग रहा है कि निर्यात के लिए अनुमत मात्रा ‘बहुत कम’ है। प्याज निर्यातक विकास सिंह ने कहा कि नासिक से हर महीने लगभग 48,000 टन प्याज निर्यात किया जाता है। महाराष्ट्र में अहमदनगर जैसे अन्य जिले हैं जहां से कम मात्रा में निर्यात किया जाता है। मुझे उम्मीद नहीं है कि इतनी कम मात्रा में निर्यात की अनुमति दी जाएगी और इससे एपीएमसी में थोक कीमतों में सुधार करने में मदद मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के लिए क्या किया इंतजाम?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के लिए एक इंतजाम कर दिया है! ईवीएम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 100 फीसदी वीवीपैट पर्चियों की गिनती की मांग को लेकर दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इसमें अतिरिक्त सुरक्षा उपाय का आदेश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता शामिल थे, उन्होंने ये आदेश सुनाया। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स Vs भारतीय चुनाव आयोग और अन्य से जुड़े ‘ईवीएम केस’ में कोर्ट ने अहम फैसला दिया। दो जजों की बेंच ने एडीआर की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से मतदान की वैधता को बरकरार रखा, इसके साथ ही दो अतिरिक्त सुरक्षा उपाय करने का भी आदेश दिया। ईवीएम-वीवीपैट से जुड़े मामले में एक गैर सरकारी संगठन एडीआर याचिकाकर्ता थी। उन्होंने कहा कि या तो ईवीएम से वोटिंग प्रक्रिया को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाना चाहिए या इसमें काफी बदलाव किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अगर ईवीएम से वोटिंग को जारी रखना है तो मतदाता को वीवीपैट पर्ची दी जानी चाहिए। जिससे वह इसे मतपेटी में डाल सकें या फिर देश में सभी वीवीपैट पर्चियों की ईवीएम टैली के साथ गिनती की जानी चाहिए। वर्तमान में, प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच रैंडमली सेलेक्ट ईवीएम से दी गई इलेक्ट्रॉनिक टैली को VVPAT पर्चियों से मिलाकर वेरिफिकेशन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ताओं ने उस नियम को चुनौती दी, जिसके अनुसार मतदाता को केवल तभी फिजिकल वेरीफिकेशन के लिए अपील की अनुमति है, जब उसे लगता है कि उसकी ओर से डाले गए वोट और VVPAT पर्ची में कोई विसंगति है। उन्होंने ये भी याचिका में कहा कि केवल एक मतदाता नहीं कोई भी इलेक्टोरल रीकाउंट का अनुरोध करने में सक्षम होना चाहिए।

जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि मतदाताओं को अपने वोट दर्ज करवाने और उनकी गिनती करवाने का मौलिक अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार को सुरक्षित करने के विभिन्न तरीके हैं और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ताओं ने जो तरीके सुझाए हैं वही सही प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि मतदान के अधिकार की प्रकृति ऐसी है कि इसका सार्थक प्रयोग तभी किया जा सकता है, जब पूरी चुनावी प्रक्रिया सही हो। उन्होंने इस संभावना का जिक्र किया कि याचिकाकर्ताओं के कुछ सुझाव वास्तव में VVPAT पर्चियों के दुरुपयोग की संभावना और देश में बैलट पेपर के इतिहास को देखते हुए चुनावों की अखंडता को कम कर सकते हैं। उन्होंने यह भी माना कि इस अधिकार को सुरक्षित करने के लिए 100 फीसदी VVPAT पर्चियों की गिनती करना अनावश्यक है। ऐसा इसलिए क्योंकि मतदाता को पहले से ही ट्रांसपैरेंट विंडो में पर्ची देखने और उसके डाले गए वोट से अंतर होने पर तुरंत इसे चुनौती देने की अनुमति है। इसके साथ कोर्ट ने किसी भी मतदाता की ओर से भौतिक सत्यापन के लिए पूछने की संभावना को भी खारिज कर दिया गया, ऐसा करने से ‘भ्रम और देरी’ होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वर्तमान चुनावी प्रक्रिया पर संदेह का कोई संकेत नहीं है। हालांकि, अदालत ने ‘चुनाव प्रक्रिया की अखंडता को और मजबूत करने’ के लिए दो अतिरिक्त उपाय करने का आदेश दिया। पहला, VVPAT की सिंबल लोडिंग यूनिट्स (एसएलयू), जो यह सुनिश्चित करती हैं कि VVPAT पर्ची पर छपा वोट मतदाता की ओर से दबाए गए बटन के अनुरूप है, इस्तेमाल के बाद सील कर दी जाएंगी। फिर रिजल्ट की घोषणा के बाद 45 दिनों के लिए ईवीएम के साथ एक स्ट्रांगरूम में इन्हे रखा जाएगा। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट ने किसी निर्वाचन क्षेत्र में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार के लिखित अनुरोध पर ईवीएम के सत्यापन की मांग का अधिकार दिया है। यह भी पहली बार हुआ है। दूसरे या तीसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवार प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के किसी भी विधानसभा क्षेत्र में 5 फीसदी ईवीएम में मेमोरी सेमीकंट्रोलर के सत्यापन की मांग कर सकते हैं। यह सत्यापन उम्मीदवार की ओर से लिखित अपील के बाद होगा। ऐसा ईवीएम बनाने वाले इंजीनियरों की एक टीम के जरिए किया जाएगा। उम्मीदवारों और उनके प्रतिनिधियों को जांच के लिए उपस्थित होने का अधिकार होगा। उम्मीदवार को इस कदम के लिए खर्च उठाना होगा, लेकिन अगर छेड़छाड़ पाई जाती है, तो उसका खर्च वापस कर दिया जाएगा।

जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता, दोनों ने चुनावों के संचालन पर संदेह करने वालों के लिए कड़े शब्द कहे। ईवीएम की अखंडता सुनिश्चित करने के लिए पहले से ही उठाए गए उपायों की विस्तृत समीक्षा के बाद जस्टिस खन्ना ने ‘निराधार चुनौतियों’ को लेकर चेतावनी दी। जस्टिस दत्ता ने और भी कठोर तर्क देते हुए सिस्टम पर ‘अंधाधुंध अविश्वास’ पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पेपर बैलेट पर वापस लौटने के लिए याचिकाकर्ताओं की अपील उनकी ‘सच्चाई की कमी’ को दर्शाती है। कुल मिलाकर, कोर्ट ने मतदाता के वोट को दर्ज करने और उसे गिनने के साधन के तौर पर ईवीएम की त्रुटिहीन अखंडता पर ध्यान केंद्रित किया।

जब ED ने की ड्रग गिरोह पर छापेमारी!

हाल ही में ED ने ड्रग गिरोह पर छापेमारी की है! इस समय एक एजेंसी ऐसी है जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा है, नाम है- ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय। हेमंत सोरेन और सीएम केजरीवाल जैसे हाई प्रोफाइल लोगों पर शिकंजा कसने के बाद से यह विपक्ष के और निशाने पर आ चुकी है। इसे मोदी सरकार की कठपुतली बताया जाता है। एक बार फिर ईडी का नाम सुर्खियों में है, लेकिन किसी और वजह से। ईडी ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ मिलकर उत्तराखंड के हल्द्वानी में छापेमारी की है। आपका सवाल होगा कि ईडी को आखिर अमेरिकी अधिकारियों की जरूरत क्यों पड़ गई? दरअसल, ईडी को यह पता चला है कि दो भारतीयों के अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी गैंग के साथ संबंध हैं। इसके लिए ईडी ने अमेरिकी अधिकारियों की मदद ली है। मामले से जुड़े लोगों ने ईटी को बताया कि ईडी ने पिछले साल अगस्त में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था। उसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने जांच एजेंसी से संपर्क किया और ड्रग रैकेट में कथित रूप से शामिल दो भारतीयों के बारे में जानकारी साझा की थी। अमेरिकी अधिकारी हल्द्वानी के रहने वाले परविंदर सिंह और बनमीत सिंह की कथित संलिप्तता की जांच कर रहे थे।

मामले से जुड़े लोगों ने बताया कि जांच ‘द सिंह ऑर्गनाइजेशन’ के नाम से मशहूर एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी समूह के संचालन में उनकी कथित संलिप्तता पर केंद्रित है। नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समूह ने ड्रग्स की बिक्री को सुविधाजनक बनाने के लिए डार्क वेब पर विक्रेता मार्केटिंग साइट्स के साथ-साथ क्लियर वेब पर कई मुफ्त विज्ञापनों का इस्तेमाल किया। अद्वितीय प्रावधान लागू करते हुए पीएमएलए के तहत मामला दर्ज किया है। ईडी ने हल्द्वानी में परविंदर के आवास पर तलाशी अभियान चलाया। ईडी ने हल्द्वानी में परविंदर के आवास पर तलाशी अभियान चलाया। यह तब हुआ जब अमेरिका ने कथित अपराधों को अंजाम देने के लिए उनके ओर से इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन के बारे में जानकारी मांगी।यह तब हुआ जब अमेरिका ने कथित अपराधों को अंजाम देने के लिए उनके ओर से इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन के बारे में जानकारी मांगी।इसके अलावा, उन्होंने नशीले पदार्थों और नियंत्रित पदार्थों के वितरकों और वितरण सेल का एक नेटवर्क स्थापित किया था।

उनके लेन-देन में मुख्य रूप से ड्रग्स के बदले क्रिप्टोकरेंसी के रूप में पेमेंट लेना शामिल था, जिसे बाद में क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट के माध्यम से लॉन्डर किया जाता था। अमेरिकी अधिकारियों की जांच से पता चला कि बनमीत और परविंदर दोनों ने ‘सिल्क रोड 1, अल्फाबे और हंसा’ जैसे कई डार्क वेब मार्केट पर समान उपनामों का इस्तेमाल किया था।

जून 2019 में ब्रिटेन में बनमीत की गिरफ़्तारी के ठीक एक महीने बाद, मादक पदार्थों की अवैध बिक्री के जरिए प्राप्त क्रिप्टोकरेंसी फंड को पील चेन तकनीक का उपयोग करके स्थानांतरित किया गया था। बता दें कि ईडी को आखिर अमेरिकी अधिकारियों की जरूरत क्यों पड़ गई? दरअसल, ईडी को यह पता चला है कि दो भारतीयों के अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी गैंग के साथ संबंध हैं। इसके लिए ईडी ने अमेरिकी अधिकारियों की मदद ली है। मामले से जुड़े लोगों ने ईटी को बताया कि ईडी ने पिछले साल अगस्त में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था। उसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने जांच एजेंसी से संपर्क किया यह खुलासा अमेरिकी जांच में हुआ। इन फंडों को वासाबी वॉलेट से जुड़े पतों पर पुनर्निर्देशित किया गया था। यह एक वर्चुअल करेंसी मिक्सिंग सर्विस है जिसे ब्लॉकचेन पर फंड के प्रवाह को अस्पष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसके बाद, बनमीत को 2023 में यू.एस. में प्रत्यर्पित किया गया। उसे अवैध ड्रग्स बेचने के अपराधों के लिए यू.एस. में आठ साल के लिए दोषी ठहराया गया था।

एक और गौर करने वाली बात यह कि ईडी ने एक अन्य अभियोजन एजेंसी की ओर से दर्ज की गई मौजूदा एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की है। हालांकि, इस मामले में ईडी ने अमेरिकी अधिकारियों की ओर से साझा की गई जानकारी के आधार पर एक अद्वितीय प्रावधान लागू करते हुए पीएमएलए के तहत मामला दर्ज किया है। ईडी ने हल्द्वानी में परविंदर के आवास पर तलाशी अभियान चलाया। यह तब हुआ जब अमेरिका ने कथित अपराधों को अंजाम देने के लिए उनके ओर से इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन के बारे में जानकारी मांगी।

भारतीय राजनीतिक पार्टियों के बारे में क्या बोले सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों के बारे में एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के बीच ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग पर फिर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 70 सालों से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग की सराहना की और इस बात पर दुख जताया कि ‘निहित स्वार्थी समूह’ देश की उपलब्धियों को कमजोर कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि ईवीएम पर 8 बार परीक्षण किया गया और ये हर बार बेदाग निकली, इसके बाद भी एडीआर अपना एजेंडा चलाता रहा। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने एडीआर पर बरसते हुए कहा सिस्टम के किसी भी पहलू पर आंख मूंदकर भरोसा न करना बेवजह संदेह पैदा कर सकता है और प्रगति में बाधा डाल सकता है। जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि ईवीएम का प्रदर्शन बेदाग रहा है और इसे लागू किए जाने के बाद से 118 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं ने अपने वोट डाले हैं और 4 करोड़ से ज्यादा VVPAT पर्चियों का ईवीएम के साथ मिलान किया गया। इस पूरे प्रोसेस में केवल एक ही विसंगति का मामला सामने आया है। जस्टिस दत्ता ने अपने अलग फैसले में कहा, ‘भारत में चुनाव कराना एक बड़ा टास्क है। इसके सामने कई चुनौतियां होती हैं, जो दुनियाभर में कहीं और नहीं देखी जाती। भारत में 140 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं और 2024 के आम चुनावों के लिए 97 करोड़ पात्र मतदाता हैं, जो विश्व की आबादी का 10% से अधिक है।

जस्टिस दत्ता ने कहा कि गौर करने वाली बात ये है कि हाल के वर्षों में कुछ निहित स्वार्थी समूह द्वारा एक प्रवृत्ति तेजी से विकसित हो रही है, जो राष्ट्र की उपलब्धियों को कम करने की कोशिश कर रही है। ऐसा लगता है कि हर संभव मोर्चे पर इस महान राष्ट्र की प्रगति को बदनाम करने, कम करने और कमजोर करने का एक ठोस प्रयास किया जा रहा है। इस तरह के किसी भी प्रयास को शुरुआत में ही खत्म कर दिया जाना चाहिए। कोई भी संवैधानिक अदालत तो बिल्कुल भी इस तरह के प्रयास को तब तक सफल नहीं होने देगी, जब तक कि मामले में उसकी (अदालत की) बात मानी जाती है।

जस्टिस दत्ता ने एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) जो कि याचिकाकर्ताओं में से एक है की ‘पेपर बैलेट’ प्रणाली की वापसी की मांग करने की मंशा पर संदेह व्यक्त किया। उन्होंने कहा, चुनाव आयोग ने पिछले 70 सालों से निष्पक्ष चुनाव कराए हैं, जिस पर गर्व होना चाहिए। इसका श्रेय मुख्य रूप से चुनाव आयोग और जनता द्वारा उस पर जताए गए भरोसे को दिया जा सकता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में इस तरह के संदेह करना ठीक नहीं है, यह अदालत चल रहे आम चुनावों की पूरी प्रक्रिया को सवालों के घेरे में लाने और याचिकाकर्ताओं की आशंकाओं और अटकलों के आधार पर उलटफेर करने की अनुमति नहीं दे सकती। याचिकाकर्ता न तो यह साबित कर पाए हैं कि चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल कैसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के सिद्धांत का उल्लंघन करता है और न ही वे 100% वीवीपैट पर्चियों का डाले गए वोटों के साथ मिलान करने के मौलिक अधिकार को स्थापित कर पाए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम की बजाय फिर से बैलेट पेपर के इस्तेमाल से भी इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बैलेट पेपर सिस्टम पर वापस लौटना और चुनाव आयोग पर 100% VVPAT पर्चियों के मिलान का बोझ डालना एक मूर्खता होगी, जबकि चुनाव कराने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पिछले 10 सालों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आठ दौर की जांच के बावजूद ईवीएम भरोसेमंद साबित हुई है, क्योंकि संदेह जताने वाले लोग जनादेश में हस्तक्षेप करने के लिए इनमें छेड़छाड़ की संभावना के बारे में सबूत देने में विफल रहे हैं। एडीआर की याचिका पर सीनियर वकील प्रशांत भूषण ने अदालत में तर्क दिए। जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने शुक्रवार को ईवीएम को बंद करने और पेपर बैलेट पर वापस लौटने की अर्जी को खारिज कर दिया और अतीत में होने वाली बड़े पैमाने पर धांधली को याद किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ईवीएम सरल, सुरक्षित और उपयोगकर्ता के अनुकूल हैं। VVPAT सिस्टम को शामिल करने से वोट सत्यापन का सिद्धांत मजबूत होता है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की जवाबदेही बढ़ जाती है। बेंच ने एनजीओ की आलोचना करते हुए कहा कि वह ‘ईवीएम के माध्यम से मतदान की प्रणाली को बदनाम करने और इस तरह चल रही चुनावी प्रक्रिया को पटरी से उतारने’ का प्रयास कर रहा है।