Saturday, March 7, 2026
Home Blog Page 663

आखिर क्या है उत्तर प्रदेश की आठ सीटों का समीकरण?

आज हम आपको उत्तर प्रदेश की आठ सीटों का समीकरण बताने जा रहे हैं! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग शुरू हो गई है। भीषण गर्मी के बीच मथुरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बागपत, अमरोहा, बुलंदशहर और मेरठ में चुनावी माहौल भी गरमाता जा रहा है। दूसरे चरण की वोटिंग के दौरान मतदाता आठ लोकसभा सीटों के 91 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला कर रहे हैं। उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो रही है। आठ लोकसभा सीटों पर चुनावी माहौल गरमाया रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी प्रचार मैदान में पूरी ताकत जो कि वही विपक्ष की ओर से कोई बड़े स्तर पर चुनावी अभियान इन सीटों पर नहीं चल पाया। मायावती और अखिलेश यादव को छोड़कर किसी भी बड़े चेहरे ने इन सीटों पर प्रचार नहीं किया। दूसरे चरण के मतदान के दौरान भारतीय जनता पार्टी को अपने गढ़ को बचाने में खासी मशक्कत की है। पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ तक लोकसभा सीटों को मथते दिखे। लोकसभा चुनाव 2019 में इन आठ में से 7 लोकसभा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। केवल अमरोहा लोकसभा सीट बहुजन समाज पार्टी के खाते में गई थी। इन आठ लोकसभा सीटों पर भाजपा और राष्ट्रीय लोक दल गठबंधन का असर दिख रहा है। गठबंधन के तहत भाजपा ने राष्ट्रीय लोक दल को बागपत सीट दी है। इस हिसाब से 7 सीटों पर एक बार फिर भाजपा को जीत का गणित तैयार करती दिखी है। मतदाता अब इन सीटों के दावेदारों के भाग्य का फैसला कर रहे हैं। बुलंदशहर में पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुत्व के नायक रहे कल्याण सिंह का प्रभाव अब भी दिख रहा है। इस सीट पर भाजपा 1991 के बाद से लगातार मजबूत होती दिखी है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर डॉ. भोला सिंह लगातार तीसरी बार चुनावी मैदान में हैं। वे हैट्रिक लगाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। बसपा ने नगीना के सांसद गिरीश चंद्र को बुलंदशहर में प्रत्याशी बनाया है। उनके सामने जीत का पहाड़ चढ़ने की बड़ी चुनौती है।

वहीं, कांग्रेस-सपा गठबंधन के तहत यह सीट कांग्रेस के खाते में आई है। बुलंदशहर से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव शिवराम वाल्मीकि को चुनावी में मैदान में उतारा गया है। कांग्रेस उम्मीदवार मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस-सपा गठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में किसी भी बड़े चेहरे ने प्रचार नहीं किया।

यमुना नदी के तट पर बसी मथुरा नगरी में लोकसभा चुनाव की नई रणनीति तैयार करने की कोशिश की जा रही है। धार्मिक वातावरण के बीच भाजपा ने सांसद हेमा मालिनी को तीसरी बार टिकट देकर चुनावी पंडितों को चौंका दिया है। 2019 में हेमा मालिनी 2.93 लाख के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। भाजपा और रालोद के भारी अंतर विरोध के बाद भी हेमा के लिए यहां बड़ी चुनौती नहीं दिख रही है। हेमा मालिनी और जयंत चौधरी के मंच पर राष्ट्रीय लोक दल के प्रदेश उपाध्यक्ष और पार्टी का क्षत्रिय चेहरा नरेंद्र सिंह को स्थान नहीं मिला। इसको लेकर बड़ी चर्चा देखी गई।

मथुरा सीट से लोकसभा चुनाव 2019 में 2.93 लाख से अधिक वोटों से जीत हासिल करने में सफल हुई थी। मथुरा से कांग्रेस ने मुकेश धनगर और बसपा ने जाट कैंडिडेट एवं पूर्व आईएएस अधिकारी सुरेश सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। सीएम योगी ने मथुरा में संबोधन के दौरान ‘भगवान कृष्ण भी प्रतीक्षा कर रहे हैं’ का संदेश दिया। इसने चुनावी माहौल को अगल रंग दे दिया।

गाजियाबाद में लोकसभा चुनाव को लेकर अतुल गर्ग को चुनावी मैदान में उतारा गया है। भारतीय जनता पार्टी ने जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह का टिकट काटकर अतुल गर्ग को चुनावी मैदान में उतारा है। गाजियाबाद सीट पर भाजपा केंद्रीय इकाई की सीधी नजर होती है। ऐसे में 29.38 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर चुनावी हलचल तेज है। जनरल वीके सिंह का टिकट कटने के बाद क्षत्रिय मतदाताओं में नाराजगी दिखी। योगी सरकार में मंत्री रहे अतुल गर्ग के चुनावी मैदान में उतरने से कई समीकरणों के बनने- बिगड़ने का खतरा दिखा। गाजियाबाद सीट पर क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, गुर्जर वोटों की संख्या काफी ज्यादा है। बीजेपी इन वोट बैंक पर अपना अधिकार मानती रही है। पीएम नरेंद्र मोदी ने जनरल वीके सिंह को अपने रथ पर सवार कर गाजियाबाद में रोड शो किया। इसके जरिए क्षत्रियों की नाराजगी को दूर करने की कोशिश की गई। वहीं, कांग्रेस ने 2019 के बाद फिर डोली शर्मा को टिकट देकर अलग रणनीति बनाने की कोशिश की है। बसपा ने नंद किशोर पुंडीड के जरिए क्षत्रिय वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की है।

बागपत को जाट राजनीति का गढ़ कहा जाता रहा है। चौधरी चरण सिंह के काल से यह समाजवादी चिंतकों और इस विचारधारा से प्रभावित नेताओं के लिए राजनीति की काशी कही जाती रही है। पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह की विरासत संभाल रहे जयंत चौधरी का इस सीट पर प्रभाव दिखता है। हालांकि, चार दशकों में पहली बार इस सीट पर चौधरी परिवार का कोई उम्मीदवार नहीं है। 16.46 लाख मतदाता वाली बागपत सीट पर रालोद के कर्मयोगी चेहरा रहे डॉ. राजकुमार सांगवान को प्रत्याशी बनाकर बड़ा संदेश दिया है। इस पर 2014 और 2019 में भाजपा के डॉ. सत्यपाल सिंह ने जीत दर्ज की थी। भाजपा से गठबंधन के बाद यह सीट रालोद के खाते में गई। बागपत में सपा ने पहले मनोज चौधरी को उम्मीदवार घोषित किया। बाद में साहिबाबाद के पूर्व विधायक अमरपाल शर्मा को टिकट दे दिया। बसपा में दिल्ली हाई कोर्ट के वकील प्रवीण बंसल पर दांव लगाया है। इस सीट पर जयंत चौधरी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है।

अमरोहा लोकसभा सीट सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस के पाले में गई है। इस सीट से कांग्रेस ने बसपा के निवर्तमान सांसद कुंवर दानिश अली को चुनाव मैदान में उतारा है। यह सीट पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के तेवर भरे संबोधनों से चर्चा में आ गया है। अमरोहा की धरती पर राजनीतिक पारा गरमाया हुआ है। 17.13 लाख वोटों वाली इस सीट पर वर्ष 1984 के बाद किसी प्रत्याशी को लगातार दो बार जीत नहीं मिल सकी है। दानिश अली के सामने इस तिलिस्म को तोड़ने की चुनौती है। दानिश से नाराज पूर्व सीएम मायावती उन्हें बिना नाम लिए विश्वासघाती बता चुकी हैं। बसपा ने इस सीट पर मुस्लिम चेहरा मुजाहिद को खड़ा कर सपा-कांग्रेस उम्मीदवार को घेर लिया है। 6.5 लाख से अधिक मुस्लिम वोटों के बंटवारे के बीच भाजपा 2014 की तरह कमल खिलाने की कोशिश में जुट गई है।

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के लिए क्या लिया फैसला?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के लिए एक फैसला ले लिया है! लोकसभा चुनाव में दूसरे फेज की वोटिंग संपन्न हो चुकी है। अभी पांच चरणों का चुनाव बाकी है, 4 जून को रिजल्ट आएगा। इस चुनावी घमासान के बीच ईवीएम को लेकर भी काफी चर्चा रही। सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम-वीवीपैट के 100 फीसदी मिलान की मांग को लेकर याचिका दायर की गई थी। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को VVPAT से हर वोट के वेरिफिकेशन की मांग वाली अर्जियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से ही वोटिंग होगी। इस फैसले से मतदाताओं के लिए कुछ भी नहीं बदला। हालांकि, उम्मीदवारों को चुनाव के बाद 5 फीसदी ईवीएम के सत्यापन की अनुमति होगी। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ जरूरी परिवर्तन के भी आदेश दिए हैं। हम बताते हैं कि जजमेंट में क्या बदला है और क्या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम की गिनती के साथ वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) पर्चियों के 100 फीसदी सत्यापन की याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने कहा कि तीन दलीलें पेश की गई। इसमें एक दलील थी कि पेपर बैलेट प्रणाली पर फिर लौटना चाहिए। वीवीपैट मशीन पर्चियों को सत्यापन के लिए मतदाताओं को दिया जाना चाहिए, इसे गिनती के लिए मतपेटी में डाला जाना चाहिए। इसके अलावा ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों का 100 फीसदी मिलान होना चाहिए। हमने मौजूदा प्रोटोकॉल, तकनीकी पहलुओं और रिकॉर्ड में मौजूद आंकड़ों का हवाला देते हुए उन सभी दलीलों को खारिज कर दिया है।

वोटर्स यानी मतदाताओं के लिए, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कोई बदलाव नहीं आया है। ईवीएम के जरिए वोटिंग की प्रक्रिया चलती रहेगी। इसमें 100 फीसदी मशीनें वीवीपैट यूनिट से जुड़ी होंगी। इसके अलावा, मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, ईवीएम के साथ वोटों के वेरिफिकेशन के लिए पांच रैंडम सेलेक्ट विधानसभा क्षेत्रों या सेगमेंट की VVPAT पर्चियों की गिनती की जाएगी। याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने वीवीपैट पर्चियों के 100% मिलान की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

चुनाव आयोग यानी इलेक्शन कमीशन के लिए वोटिंग प्रक्रिया के तरीके में खास बदलाव नहीं आया है, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को इलेक्शन के बाद कुछ नई प्रक्रियाएं अपनाने का निर्देश दिया है। पहली बार कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह चुनाव चिन्ह लोडिंग यूनिट (SLU) को परिणामों की घोषणा के बाद 45 दिनों तक सील करके रखें। एसएलयू मेमोरी यूनिट हैं जिन्हें पहले कंप्यूटर से जोड़कर चुनाव चिन्ह लोड किया जाता है और फिर वीवीपीएटी मशीनों पर उम्मीदवारों के सिंबल दर्ज किए जाते हैं। इन एसएलयू को ईवीएम की तरह ही खोला, जांचा जाना चाहिए। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार, प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में वीवीपैट पर चुनाव चिन्ह लोड करने के लिए एक से दो एसएलयू का इस्तेमाल किया जाता है। सूत्रों ने बताया कि अब इन्हें 45 दिनों तक स्टोर किया जाएगा, ताकि इनसे जुड़ी कोई भी चुनाव याचिका आने पर इन्हें सुरक्षित रखा जा सके।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों को ईवीएम के सत्यापन की मांग करने का अधिकार दिया है। यह भी पहली बार हुआ है। दूसरे या तीसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवार प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के हर विधानसभा क्षेत्र में 5 फीसदी ईवीएम में मेमोरी सेमीकंट्रोलर के सत्यापन की मांग कर सकते हैं। यह सत्यापन उम्मीदवार की ओर से लिखित अपील किए जाने के बाद होगा। ऐसा ईवीएम बनाने वाले इंजीनियरों की एक टीम के जरिए किया जाएगा। फैसले के अनुसार, उम्मीदवार या प्रतिनिधि मतदान केंद्र या क्रम संख्या से ईवीएम की पहचान कर सकते हैं।

अदालत ने कहा कि सत्यापन के लिए अनुशंसा चुनाव नतीजों की घोषणा के सात दिनों के भीतर किया जाना चाहिए और उम्मीदवारों को इसका खर्च उठाना होगा। उनकी शिकायत के बाद अगर ईवीएम से छेड़छाड़ पाया जाता है तो उनका पूरा खर्च वापस कर दिया जाएगा। इन दो निर्देशों के अलावा, कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग इस सुझाव पर विचार कर सकता है कि वीवीपैट पर्चियों की गिनती मनुष्यों के बजाय काउंटिंग मशीन का इस्तेमाल करके की जा सकती है। सुनवाई के दौरान सुझाव दिया गया कि वीवीपैट पर्चियों पर बारकोड छपा हो सकता है, जिससे मशीन के जरिए गिनती करना आसान हो जाएगा। अदालत ने कहा कि चूंकि यह एक तकनीकी पहलू है, जिसका मूल्यांकन आवश्यक है। ऐसे में उसने इस पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया।

आखिर क्या है अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती?

आज हम आपको अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव 2024 के लिए उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन में सीटों को बंटवारे को लेकर रस्साकशी जारी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस को 11 सीटें देने के एकतरफा ऐलान के बाद स्थितियां और कठिन हो चली हैं। उधर राष्ट्रीय लोकदल भी 7 सीटों से ज्यादा की उम्मीद सपा से कर रहा है। इस बीच समाजवादी पार्टी भी संभावित प्रत्याशियों को लेकर रणनीति बनाने में जुटी है। जिलों-जिलों से फीडबैक प्रॉसेस चल रहा है। खुद अखिलेश यादव के इस बार कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसी तरह डिंपल यादव मैनपुरी और शिवपाल यादव आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की चर्चाएं हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अखिलेश यादव कन्नौज की अपनी पुरानी सीट से दावेदारी करते हैं तो भाजपा के लिए मुकाबला कठिन होना तय है। बता दें अखिलेश यादव लगातार कन्नौज का दौरा कर रहे हैं। अभी तक आधिकारिक तौर पर कुछ ऐलान नहीं हुआ है लेकिन क्षेत्र में चर्चाएं तेज हैं कि अखिलेश यादव यहीं से मैदान में उतरेंगे। अखिलेश यादव यहां से तीन बार सांसद चुने जा चुके हैं। कन्नौज के बारे में कभी कहा जाता था कि यहां से यादव परिवार को चुनाव जीतने के लिए कैंपेन करने की भी जरूरत नहीं है। 1998 से 2019 तक इस सीट पर यादव परिवार का दबदबा रहा। कन्नौज लोकसभा सीट पर भाजपा के चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू ने 1996 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की छोटी सिंह यादव को मात देकर सीट अपने नाम की थी। लेकिन इसके बाद 1998 में समाजवादी पाटीं ने प्रदीप कुमार यादव की अगुवाई में इस सीट पर अपना कब्जा बना लिया। इसके बाद 1999 में ये सीट यादव परिवार की हो गई। 1999 में मुलायम सिंह यादव यहां से जीते, फिर 2000 में उनकी जगह उपचुनाव में अखिलेश यादव ने ली। अखिलेश ने इसके बाद 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावा आसानी से जीत लिए। लेकिन 2012 में अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री हो गए और उन्होंने ये सीट अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए खाली कर दी। डिंपल ने 2012 का उपचुनाव निविर्रोध जीत लिया। फिर 2014 में मोदी लहर के बीच भी डिंपल यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब रहीं। लेकिन 2019 तक स्थिति बदल चुकी थी। लगातार प्रयास के बाद आखिरकार 23 साल बाद भाजपा यहां भगवा फहराने में सफल रही। भाजपा से सुब्रत पाठक ने सपा ही नहीं पूरे यादव कुनबे को चौंकाते हुए 12353 वोटों से मात दे दी।

जातिगत समीकरण की बात करें तो इस सीट पर हमेशा से मुस्लिम और यादव वोटबैंक का दबदबा रहा है। दोनों का वोट प्रतिशत 16-16 फीसदी के करीब है। वहीं उसके बाद ब्राह्मण मतदाता हैं, जिनकी 15 फीसदी हिस्सेदारी है। राजपूत यहां 10 फीसदी के करीब हैं और अन्य जातियां कुल मिलाकर 39 फीसदी हैं, जिनमें गैर यादव पिछड़ी जातियां और दलित शामिल हैं। वैसे तो मुस्लिम यादव वोटबैंक हर चुनाव में अपना असर डालता रहा। लेकिन 2019 के लाेकसभा चुनाव में भाजपा ने अन्य जातियों के वोटबैंक में तगड़ी सेंध लगा दी। सुब्रत पाठक की जीत में इसी अन्य फैक्टर ने विशेष योगदान दिया। अब सवाल ये है कि क्या इस बार भी ऐसा होगा? हालांकि टिकट अभी फाइनल नहीं हुआ है।

जानकारों के अनुसार कन्नौज सीट पर अखिलेश यादव ने पिछले काफी समय से ध्यान लगाया है। यहां वह वोटरों से सीधे संपर्क के साथ ही अपनी पीडीए रणनीति के तहत वोटरों को जोड़ने के प्रयास में हैं। वह सांसद सुब्रत पाठक पर भी लगातार हमलावर रहे हैं। दोनों तरफ से तल्ख बयानबाजियों के कई दौर चल चुके हैं। यहां भाजपा मजबूत जरूर है लेकिन अखिलेश यादव की छवि बड़ी चुनौती साबित होगी। डिंपल यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब रहीं। लेकिन 2019 तक स्थिति बदल चुकी थी। लगातार प्रयास के बाद आखिरकार 23 साल बाद भाजपा यहां भगवा फहराने में सफल रही। भाजपा से सुब्रत पाठक ने सपा ही नहीं पूरे यादव कुनबे को चौंकाते हुए 12353 वोटों से मात दे दी।जानकार ये भी कहते हैं कि रणनीति के लिहाज से हो सकता है भाजपा यहां से टिकट बदल भी सकती है।

वैसे भाजपा के लिए इस सीट पर एक अन्य बड़ा पहलू भी पक्ष में दिख रहा है। दरअसल कन्नौज लोकसभा के तहत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों मे भी भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। कन्नौज लोकसभाा क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें छिबरामऊ से अर्चना पांडेय, तिर्वा से कैलाश राजपूत, सदर सुरक्षत सीट से असीम अरुण हैं। एक सीट कानपुर देहात की रसूलाबाद एससी भी है, जहां से भाजपा की पूनम संखवार विधायक हैं। वहीं एक सीट औरैया की बिधूना है, जहां से रेखा वर्मा सपा विधायक हैं।

आखिर सबसे रणनीतिक नेता क्यों कहे जाते हैं अखिलेश यादव?

आज हम आपको बताएंगे कि अखिलेश यादव सबसे रणनीतिक नेता क्यों कहे जाते हैं! लोकसभा चुनाव 2024 के चुनाव में पहले चरण का मतदान हो गया है। दूसरे चरण का मतदान होने को है। चुनाव धीरे-धीरे अपनी रंग पकड़ता दिख रहा है। लेकिन समाजवादी पार्टी अलग ही चुनौती से जूझ रही है। वैसे तो समाजवादी पार्टी ने चुनाव की तैयारी काफी पहले से शुरू कर दी थी। संभावित प्रत्याशियों को लेकर फीडबैक आदि भी चल रहा था। लेकिन चुनाव आते-आते ये सारी रणनीति कहीं गुम सी हो गई दिखती है। स्थिति ये है कि सपा मुखिया अखिलेश यादव खुद अपने चुनाव लड़ने का फैसला आखिरी समय पर ले सके। उन्होंने अपने भतीजे तेज प्रताप यादव का टिकट काटकर कन्नौज से अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। इस बार चुनाव पर नजर डाल लें तो समाजवादी पार्टी के खेमे में प्रत्याशी चयन को लेकर कन्फ्यूजन ही कन्फ्यूजन दिखता है। पता नहीं चुनाव से पहले प्रत्याशियों को लेकर कैसा फीडबैक लिया गया कि नामांकन के आखिरी समय तक टिकट को लेकर असमंजस ही दिख रहा है। अभी तक के चुनाव में गौतमबुद्धनगर, मिश्रिख, मेरठ, बदायूं, मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, बागपत, सुल्तानपुर और अब कन्नौज तक प्रत्याशी बदल चुके हैं। बस एक संभल की सीट ऐसी थी, जहां सपा के प्रत्याशी शफीकुर्रहमान बर्क के देहांत के कारण उनके पोते और कुंदरकी से विधायक जियाउर्रहमान बर्क को टिकट दिया गया। इसी असमंजस ने कहीं न कहीं अखिलेश के रणनीतिक कौशल पर सवाल उठ रहे हैं। अपने नामांकन के बाद अखिलेश यादव ने सफाई दी कि पार्टी, नेता, कार्यकर्ता और सभी की भावनाएं यह थी कि समाजवादी पार्टी की तरफ से मुझे यहां से चुनाव लड़ाया जाए। मुझे उम्मीद है कि मुझे यहां से आशीर्वाद मिलेगा। अब सवाल ये उठता है कि क्या पार्टी, नेता, कार्यकर्ता की भावनाओं की जानकारी अखिलेश यादव को उस समय नहीं थी, जब उन्होंने अपने भतीजे तेज प्रताप यादव का नाम प्रत्याशी के रूप में घोषित किया था? ये सवाल इसलिए क्योंकि कन्नौज सीट से वो अनजान नहीं रहे हैं। चौबीस साल पहले यहीं से उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद वह 2012 तक यहां से लगातार सांसद रहे। उनकी पत्नी डिंपल यादव यहां से निर्विरोध चुनाव जीतीं। हालांकि 2019 में उनकी हार हुई। लेकिन ये सीट हमेशा से यादव परिवार का गढ़ मानी जाती रही।

गौतमबुद्ध नगर लोकसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस के साथ गठबंधन के तहत ये सीट समाजवादी पार्टी के हिस्से में आई थी। अखिलेश ने यहां से महेंद्र नागर को चुनाव मैदान में उतारा। महेंद्र दो साल पहले ही कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल हुए थे। इसके बाद लोकल सपा नेताओं की तरफ से महेंद्र नागर के विरोध की बात सामने आई। आखिरकार हफ्ते भर के अंदर महेंद्र नागर का टिकट काट दिया गया और उनकी जगह राहुल अवाना को सपा प्रत्याशी बनाया गया। लेकिन यहां भी राहुल आवाना के नाम पर विरोध खड़ा हो गया। उनकी उम्र और गुर्जर समाज के वोट नहीं मिलने के तर्क दिए जाने लगे। नोएडा से लेकर लखनऊ तक प्रत्याशी को लेकर कशमकश जारी रही आखिरकार सपा ने राहुल आवाना का टिकट काट दिया और वापस डॉ महेंद्र नागर को उम्मीदवार घोषित कर दिया।

सीतापुर जिले की मिश्रिख लोकसभा सीट पर तो गजब ही हाल देखने को मिला। यहां पहले रामपाल राजवंशी को टिकट दिया गया। उनके बाद उनके बेटे मनोज राजवंशी को सपा ने टिकट दिया। फिर मनोज का भी टिकट काटकर उनकी पत्नी संगीता राजवंशी को प्रत्याशी बना दिया गया। दिलचस्प बात ये रही कि आखिरकार संगीता का भी टिकट काट दिया गया और पूर्व सांसद राम शंकर भार्गव अब सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। अब राजवंशी परिवार की तरफ से निर्दलीय चुनौती देने की बात सामने आ रही है।

मुरादाबाद लोकसभा सीट पर भी इस बार असमंजस देखा गया। ये वो सीट थी, जिस पर 2019 के लोकसभा चुनाव में एसटी हसन ने समाजवादी पार्टी की लाज बचाई थी। यूपी में सपा सिर्फ 5 सीटें ही जीत सकी थी। इस बार भी एसटी हसन की ही दावेदारी मजबूत थी, उन्हें टिकट भी दे दिया गया। लेकिन इसके बाद नामांकन के आखिरी दिन एसटी हसन का टिकट काटकर रुचि वीरा को टिकट दे दिया गया। इसके पीछे आजम खान को कारण माना गया। एसटी हसन अखिलेश के इस फैसले के बाद मायूस दिखे।

बदायूं लोकसभा सीट की भी कुछ ऐसी ही कहानी रही। पहले अखिलेश यादव ने यहां अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को टिकट दिया। धर्मेंद्र यहां से एक बार सांसद रह चुके हैं। लेकिन अचानक अखिलेश ने फैसला बदल लिया और धर्मेंद्र का टिकट काटकर उन्हें कन्नौज और आजमगढ़ का चुनाव प्रभारी बना दिया। इधर बदायूं सीट पर चाचा शिवपाल यादव को प्रत्याशी बना दिया गया। कुछ समय बाद धर्मेंद्र यादव को आजमगढ़ से टिकट दे दिया गया। शिवपाल ने यहां रोड शो से लेकर चुनाव प्रचार किया। लेकिन ऐन वक्त उनके बेटे आदित्य यादव टिकट दे दिया गया। इस फैसले के पीछे कहीं न कहीं शिवपाल यादव की ‘इच्छा’ को कारण माना गया।

इसी तरह बागपत में समाजवादी पार्टी ने पहले मनोज चौधरी को टिकट दिया। लेकिन कुछ समय बाद उनका टिकट काट दिया गया और अमर पाल शर्मा को प्रत्याशी बना दिया गया। बिजनौर में भी यही हुआ। यहां पहले पूर्व सांसद यशवीर सिंह को समाजवादी पार्टी ने टिकट दिया। इसके बाद नूरपुर से सपा विधायक राम अवतार सैनी के पुत्र दीपक सैनी को टिकट दे दिया। सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर भी यहां पहले अखिलेश यादव ने भीम निषाद को टिकट दिया फिर काट दिया। अब राम भुआल निषाद को उम्मीदवार बनाया है।

आखिर पहली बार कैसे शूट हुई थी रामानंद सागर की रामायण?

आज हम आपको बताएंगे कि रामानंद सागर की रामायण आखिर पहली बार कैसे शूट हुई थी! साल 1987-88 में रामानंद सागर ने ऐसी ‘रामायण’ टीवी पर दिखाई कि आज भी उसके बारे में बातें होती हैं। उनके काम की तारीफ होती है और किरदारों को आज भी भगवान समझा जाता है। मौजूदा समय में तो तकनीकि ने बहुत ही विकास कर लिया है। VFX का दौर आ गया है। मन में सोची हुई चीज चुटकियों में पर्दे पर उतार दी जाती है। लेकिन उस वक्त ऐसा नहीं था। रामानंद सागर ने उस दौर में काफी दिक्कतें झेलीं लेकिन दर्शकों को इसका इल्म भी नहीं होने दिया। उन्होंने अगरबत्ती और रुई का ऐसी-ऐसी जगहों पर इस्तेमाल किया, जिसका अंदाजा आप 1000 बार उस सीरीज को देखकर भी नहीं लगा सकते। रामायण’ बनी और आज तक की सबसे पॉप्युलर टीवी सीरीज साबित हुई। मगर क्या आप जानते हैं, इसको बनाने का ख्याल कहां से आया। दरअसल, रामानंद सागर की बॉयग्राफी ‘फ्रॉम बरसात टू रामायण’ में उनके बेटे प्रेम सागर ने बताया था कि जब 1976 में फ्रांस में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी स्टारर फिल्म ‘चरस’ की शूटिंग चल रही थी, तो रामानंद सागर एक कैफे में गए थे। वहां टीवी पर रंगीन फिल्म को देख उन्होंने तय किया कि अब वह टीवी की दुनिया मे कदम रखेंगे और भगवान पर आधारित सीरियल्स बनाएंगे। भारत आकर उन्होंने काम शुरू कया और 10 साल की मेहनत के बाद ‘रामायण’ लेकर आए। जिसकी शूटिंग 550 दिनों तक चली और हर एक एपिसोड के पीछे करीब 9 लाख रुपये का खर्चा होता था।

रामायण’ में कई सारे सीन्स हैं, जिनके पीछे अपनी एक अलग ही कहानी है। पहला सीन वो जहां पर हनुमान बने दारा सिंह ने लक्ष्मण का किरदार निभा रहे सुनील लहरी को अपने कंधे पर बिठाया था। News18 से बात करते हुए, सुनील लहरी ने बताया था कि उस वक्त दारा सिंह की उम्र 62 थी। और उन्होंने उस अवस्था में 70 किलो के सुनील लहरी को कंधे पर बिठाया था। ‘रामायण में एक सीन था जिसमें दारा सिंह को मुझे अपने कंधों पर उठाना था। उस वक्त मैं 70 किलो का था। मैंने उनसे पूछा कि हम सीन के लिए एक स्टूल का इस्तेमाल कर सकते हैं और बाद में हम इसे काट सकते हैं। लेकिन उन्होंने मना कर दिया।’ प्रेम सागर ने ही एक बार एक इंटरव्यू में इस धारावाहिक की शूटिंग से जुड़े कुछ और तथ्यों का जिक्र किया था। उन्होंने बताया था कि कैसे उनके पिता रामानंद सागर ‘रामायण’ की शूटिंग के वक्त कोहरे के लिए अगरबत्ती के धुएं का इस्तेमाल करते थे। उनके मुताबिक, जब सुबह का सीन दिखाना होता था तो अगरबत्ती के धुएं से कोहरा दिखाया जाता था। और रात के सीन के लिए रुई से बादल बनाकर टांगे जाते थे। क्योंकि उस वक्त VFX की सुविधा नहीं होती थी।प्रेम सागर ने बताया था कि रात की शूटिंग के वक्त शीशे पर रुई लगा दी जाती थी। फिर उसको कैमरे पर फिट कर देते थे। इतना ही नहीं, इफेक्ट्स के लिए स्लाइड प्रोजेक्टर में इस तरह की स्लाइड भी इस्तेमाल की गई थीं। वहीं, हिमालय पर भगवान शिव के तांडव वाले सीन के लिए भी ब्रैकग्राउंड में एक स्क्रीन का इस्तेमाल किया गया था। उसके बाद प्रोजेक्टर की मदद से वहां ग्रहों को दिखाया गया था।

धारावाहिक में युद्ध के दौरान तीरों के चलने पर सुनाई देने वाली आवाजें, बादल का गजरना, समंदर की लहरों में उफान की आवाजें, सभी के लिए सोनी का स्पेशल इफेक्ट जेनरेटर SEG 2000 का इस्तेमाल किया गया था। उस वक्त ये नया-नया आया था, बता दे कि उस वक्त ऐसा नहीं था। रामानंद सागर ने उस दौर में काफी दिक्कतें झेलीं लेकिन दर्शकों को इसका इल्म भी नहीं होने दिया। उन्होंने अगरबत्ती और रुई का ऐसी-ऐसी जगहों पर इस्तेमाल किया, जिसका अंदाजा आप 1000 बार उस सीरीज को देखकर भी नहीं लगा सकते। रामायण’ बनी और आज तक की सबसे पॉप्युलर टीवी सीरीज साबित हुई। मगर क्या आप जानते हैं, इसको बनाने का ख्याल कहां से आया। दरअसल, रामानंद सागर की बॉयग्राफी ‘फ्रॉम बरसात टू रामायण’ में उनके बेटे प्रेम सागर ने बताया था कि जब 1976 में फ्रांस में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी स्टारर फिल्म ‘चरस’ की शूटिंग चल रही थी, तो रामानंद सागर एक कैफे में गए थे। जिसके बारे में लोग जानते नहीं थे। इसके अलावा ग्साल मैटिंग का भी सहारा इफेक्ट्स के लिए किया गया था।

क्या अपनी चुनावी रैली में पीएम मोदी कर चुके हैं बड़ा वादा?

हाल ही में पीएम मोदी ने अपनी चुनावी रैली में एक बड़ा वादा कर दिया है! 2024 के चुनावी रण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरा फोकस ‘मिशन 400 पार’ को हासिल करने पर है। यही वजह है कि पीएम मोदी लगातार पार्टी के लिए प्रचार अभियान की कमान संभाले हुए हैं। इसी कड़ी में उन्होंने उत्तर प्रदेश के आगरा में एक चुनावी रैली को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने जहां विपक्षी कांग्रेस समेत इंडी अलायंस को टारगेट किया। वहीं इस रैली में उन्होंने एक ऐसी बात का जिक्र किया जिसे लेकर नई चर्चा शुरू हो गई। पीएम मोदी ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी लड़ाई जारी है। जिन्होंने लूटा है, उसे लौटाना होगा। प्रधानमंत्री ने इसी दौरान कहा कि सोच रहा हूं कि जब्त धन जनता में बांट दूं। जानिए पीएम मोदी के इस कमेंट की वजह क्या है? पीएम मोदी ने आगरा की रैली में कहा कि हमारा लक्ष्य यही है कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सबको मिले और पूरा फायदा मिले। बिना बिचौलियों के मिले, बिना रिश्वत के मिले और हकदार को अवश्य मिले। ये बीजेपी का सैचुरेशन मॉडल है। हमारा संकल्प है, जो भ्रष्टाचारी है, उनकी जांच होगी। जिन्होंने गरीबों को लूटा है, वो लूट का पैसा गरीबों को मिलेगा। मैं इस बारे में सोच रहा हूं। पीएम मोदी ने जैसे ही कहा कि मैं सोच रहा हूं भ्रष्टाचारियों से जब्त धन जनता को लौटा दूं। उनकी इस टिप्पणी के बाद 15 लाख वाली चर्चा फिर शुरू हो गई।

दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने कई चुनावी रैलियों में कुछ ऐसा ही कमेंट किया था। उस समय कहा गया था कि जब विदेशों से काला धन वापस आएगा तो हर भारतीय के बैंक खातों में 15 लाख रुपये आएंगे।अगर वे जब्त किए गए धन से जुड़े दस्तावेज को पेश करने में विफल रहते हैं, तो जांच एजेंसी इन पैसों जब्त कर सकती है। हालांकि, सरकार या एजेंसी उसका इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। ये गवर्नमेंट ट्रेजरी में जमा होता है। जब तक ट्रायल चलता है, पूरा पैसा जमा रहता है। अगर दोष साबित हुआ तो पूरा पैसा सरकारी खजाने में चला जाता है। हालांकि, बाद में बीजेपी ने इसे जुमला करार दिया था। पार्टी के दिग्गज नेता अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि नरेंद्र मोदी का बयान एक ‘मुहावरा’ था और इसका शाब्दिक अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने इसे जुमला बताया था।

हालांकि, 2014 के चुनाव जिस तरह से 15 लाख रुपये वाली बात कही गई और फिर उसे अमित शाह ने जुमला बताया, उसका विपक्ष अब तक खिल्ली उड़ाता है। ऐसे में पीएम मोदी ने एक बार फिर कुछ-कुछ वैसी ही बात कहकर नई चर्चा छेड़ दी है। प्रधानमंत्री की आगरा रैली में की गई टिप्पणी इस ओर भी इशारा कर रही कि हो सकता है वह पहले ही किसी प्लान पर काम कर रहे हों। हो सकता है गरीबों के लिए कोई प्लान हो या फिर यूनिवर्सल इनकम स्कीम टाइप किसी योजना की बात हो।वहीं इस रैली में उन्होंने एक ऐसी बात का जिक्र किया जिसे लेकर नई चर्चा शुरू हो गई। पीएम मोदी ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी लड़ाई जारी है। जिन्होंने लूटा है, उसे लौटाना होगा। प्रधानमंत्री ने इसी दौरान कहा कि सोच रहा हूं कि जब्त धन जनता में बांट दूं। जानिए पीएम मोदी के इस कमेंट की वजह क्या है? पीएम मोदी ने आगरा की रैली में कहा कि हमारा लक्ष्य यही है कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सबको मिले और पूरा फायदा मिले। बिना बिचौलियों के मिले, बिना रिश्वत के मिले और हकदार को अवश्य मिले। ये बीजेपी का सैचुरेशन मॉडल है। सरकार ये प्रचारित करे कि ये योजना भ्रष्टाचारियों से जब्त धन से चल रही है।

जांच एजेंसी पैसे जब्त करने के लिए अधिकृत है, लेकिन वह बरामद किए पैसों को अपने पास नहीं रख सकती। प्रोटोकॉल के मुताबिक, जब एजेंसी नकदी बरामद करती है, तो आरोपी को जब्त किए गए पैसों का स्रोत बताने का मौका दिया जाता है। अगर वे जब्त किए गए धन से जुड़े दस्तावेज को पेश करने में विफल रहते हैं, तो जांच एजेंसी इन पैसों जब्त कर सकती है। हालांकि, सरकार या एजेंसी उसका इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। ये गवर्नमेंट ट्रेजरी में जमा होता है। जब तक ट्रायल चलता है, पूरा पैसा जमा रहता है। अगर दोष साबित हुआ तो पूरा पैसा सरकारी खजाने में चला जाता है। अगर आरोपी बरी हुआ आरोपी तो पूरा पैसा उसे लौटा दिया जाता है।

क्या कांग्रेस साध रही है मुस्लिम कोटा पर निशाना?

वर्तमान में कांग्रेस मुस्लिम कोटा पर निशाना साध रही है! 2024 लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा बीजेपी के कांग्रेस पर हमले तेज होते जा रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोर्चा संभाले हुए हैं। उन्होंने दूसरे चरण की वोटिंग से पहले विपक्षी पार्टी पर कई तगड़े वार किए। सबसे पहले एक चुनावी सभा में उन्होंने कांग्रेस के घोषणा-पत्र पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि इसमें मुस्लिम लीग की झलक है। इसके बाद ओबीसी आरक्षण में कटौती, विरासत टैक्स, भाई-भतीजावाद, संपत्ति का बंटवारा, मंगलसूत्र जैसे कई मुद्दों का जिक्र कर कांग्रेस को मानो बैकफुट पर ही धकेल दिया। बीजेपी की ओर से किए जा रहे बैक टू बैक अटैक से कांग्रेस संभल ही नहीं पा रही। वो लगातार सफाई ही दे रही। हालांकि, कांग्रेस ने पीएम मोदी के मुस्लिमों वाले कमेंट पर चुनाव आयोग से शिकायत भी दर्ज कराई। बावजूद इसके न तो प्रधानमंत्री और न ही बीजेपी अटैक का कोई मौका छोड़ रही। वहीं कांग्रेस ने मुस्लिम कोटा पर अब तक क्या-क्या किया, इस मुद्दे पर पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कई बातों का जिक्र किया। सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस को ओबीसी का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया। उन्होंने कहा कि बीजेपी सिर्फ आरोप नहीं लगा रही है, अपितु प्रमाण दे रही है। कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान का बचाव करने की कोशिश करती है। लेकिन उनके कथनानुसार कांग्रेस देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों को देने का काम पहले ही कर चुकी है। भारत सरकार के किसी भी विभाग के बाद वक्फ बोर्ड एक ऐसा गैर-सरकारी संस्थान है, जिसके पास सबसे ज्यादा जमीन है।

सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा कि वक्फ बोर्ड को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह ने जब काफी दृढता से स्थापित किया है, तो कांग्रेस देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों को देने की बात का बचाव नहीं कर सकती, क्योंकि कांग्रेस यह काम पहले ही कर चुकी है। ऐसी राष्ट्र विरोधी शक्तियों को देश की वास्तविक शक्ति ने कभी उभरने नहीं दी। पीएम मोदी के नेतृत्व में आज जब भारत अपनी वास्तविक शक्ति का अहसास कर रहा है, तब इन राष्ट्रविरोधी शक्तियों की नजर अब आम जनता की संपत्ति और विरासत पर टिकी है। देश की जनता आगामी चुनाव में इन सभी शक्तियों को करारा जवाब देगी, क्योंकि कांग्रेस के पास अब बचाव की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

आंध्र-कर्नाटक में मुसलमानों को 10 फीसदी आरक्षण के मुद्दे का भी जिक्र बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने एसी-एसटी, ओबीसी को आरक्षण जामिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में खत्म कर दिया और इसे सीधा 50 फीसदी मुस्लिमों को दे दिया। आंध्र प्रदेश में दस फीसदी आरक्षण दिया गया हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे रोक दिया। कर्नाटक में आरक्षण दिया जिसे अभी हमारे ओबीसी कमीशन ने रोका।

सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा कि बंगाल में अभी 90 से अधिक जातियों को ओबीसी में जोड़ा उसमें 90 फीसदी मुस्लिम हैं। हकीकत तो यही है कि ये दे चुके हैं, ऐसा नहीं है कि देंगे। उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2012 के घोषणा पत्र में कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का वादा किया था। आर्टिकल 370 दिया- जम्मू-कश्मीर में एससी-एसटी, ओबीसी को आरक्षण नहीं दिया। एएमयू, जामिया में एससी-एसटी, ओबीसी आरक्षण खत्म करके मुसलमानों को दिया। अभी मेनिफेस्टो में लिखा कि एससी-एसटी, ओबीसी के रिजर्वेशन को इसलिए बढ़ाया जाए ताकि विशेष समुदाय को दिया जाएगा। हालांकि, रंगनाथ मिश्रा कमीशन भी कहता है कि ओबीसी के ही रिजर्वेशन में से 10 फीसदी आरक्षण मुसलमानों को दिया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को एक बयान में कहा कि विपक्षी पार्टी कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक की नजर ‘लोगों की कमाई और संपत्ति पर है’। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की सरकार आई तो देश की संपत्ति को ‘घुसपैठियों’ और ‘अधिक बच्चे पैदा करने वालों’ में बांट देगी। कांग्रेस के शहजादे कहते हैं कि वे जांच करवाएंगे कि कौन कितना कमाता है। आपके पास कितनी संपत्ति है, आपके पास कितना पैसा है, आपके पास कितने घर हैं। सरकार इस संपत्ति पर कब्जा करेगी और इसे सभी को बांटेगी। पीएम मोदी ने आगे कहा था कि हमारी माताओं और बहनों के पास सोना है। यह स्त्रीधन है, इसे पवित्र माना जाता है। कानून भी इसकी रक्षा करता है। उनकी नजर आपके मंगलसूत्र पर है। जैसे ही पीएम मोदी ने ये टिप्पणी की, कांग्रेस तुरंत पलटवार के मूड में आ गई। उन्होंने चुनाव आयोग में इस टिप्पणी को लेकर शिकायत भी दर्ज कराई।

दूसरे चरण में किन-किन राज्यों में पड़े वोट?

आज हम आपको बताएंगे कि दूसरे चरण में किन-किन राज्यों में वोट पड़े हैं! लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में आज 13 राज्यों की 88 सीटों पर मतदान होगा। दूसरे फेज में केरल की वायनाड लोकसभा सीट भी शामिल है, जहां से कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार दूसरी बार चुनाव मैदान में हैं। केरल की सभी 20 सीट के अलावा कर्नाटक की 28 में से 14 सीट, राजस्थान की 13 सीट, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की आठ-आठ सीट पर मतदान होगा। इसके अलावा मध्य प्रदेश की छह सीट, असम और बिहार की पांच-पांच सीट, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की तीन-तीन सीट और मणिपुर, त्रिपुरा, जम्मू-कश्मीर में एक-एक सीट पर आज वोटर्स अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। वैसे तो दूसरे चरण में 89 सीट पर मतदान होना था लेकिन मध्य प्रदेश की बैतुल सीट पर बहुजन समाज पार्टी के एक प्रत्याशी के निधन के बाद अब तीसरे चरण में मतदान होगा। चुनाव आयोग ने बताया कि इस फेज में 1.67 लाख वोटिंग सेंटर्स पर 16 लाख से अधिक मतदान अधिकारियों को तैनात किया गया है। इस चरण में 15.88 करोड़ से अधिक मतदाता हैं जिनमें 8.08 करोड़ पुरूष, 7.8 करोड़ महिलाएं और 5929 थर्ड जेंडर हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, इस फेज में 34.8 लाख मतदाता पहली बार अपने वोटिंग राइट्स का इस्तेमाल करेंगे। 20-29 वर्ष की उम्र के 3.28 करोड़ मतदाता हैं।

गर्मी और लू को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयोग ने बिहार के चार लोकसभा क्षेत्रों में कई मतदान केंद्रों पर वोटिंग का समय बढ़ा दिया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अगले पांच दिनों के दौरान पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में तेज लू चलने की भी चेतावनी जारी की है। विभाग ने कहा कि त्रिपुरा, केरल, तटीय कर्नाटक और असम में अधिक उमस से लोगों को परेशानी हो सकती है। दूसरे चरण में 1202 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं जिनमें 1098 पुरुष और 102 महिलाएं हैं। दूसरे फेज के लिए प्रचार अभियान बुधवार शाम को समाप्त हो गया। मतदान और सुरक्षाकर्मियों की आवाजाही के वास्ते कम से कम तीन हेलीकॉप्टरों, चार विशेष ट्रेनों और 80 हजार गाड़ियों को लगाया गया है। कांग्रेस नेता शशि थरूर, केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर, अभिनय से राजनीति में आए अरुण गोविल, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के भाई डीके सुरेश (कांग्रेस), कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी (जनता दल-सेक्युलर) प्रमुख उम्मीदवारों की सूची में शामिल हैं। वहीं बीजेपी उम्मीदवार हेमा मालिनी, ओम बिरला और गजेंद्र सिंह शेखावत अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों से लगातार तीसरी जीत की उम्मीद लगाए हुए हैं।

कुल 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 102 सीट पर पिछले शुक्रवार को हुए पहले चरण के मतदान में लगभग 65.5 फीसदी मतदान हुआ। शुक्रवार को दूसरे चरण के बाद केरल, राजस्थान और त्रिपुरा में चुनाव संपन्न हो जाएंगे। वहीं 19 अप्रैल को पहले फेज में तमिलनाडु (39), उत्तराखंड (5), अरुणाचल प्रदेश (2), मेघालय (2) सीट पर चुनाव संपन्न हो गए। इसके अलावा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, मिजोरम, नगालैंड, पुडुचेरी, सिक्किम और लक्षद्वीप की एक-एक सीट पर चुनाव संपन्न हो चुका है।

लोकसभा चुनाव 2019 में सत्ताधारी एनडीए ने इन 89 सीट में से 56 और यूपीए ने 24 सीट पर जीत हासिल की थी। इनमें से छह सीट परिसीमन के बाद सामने आई हैं। केरल में, 2,77,49,159 मतदाताओं में पांच लाख से अधिक मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। राहुल गांधी, वायनाड से मौजूदा सांसद हैं और उनका मुकाबला भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की एनी राजा और बीजेपी के के. सुरेंद्रन से है। शशि थरूर, चौथी बार तिरुवनंतपुरम सीट से चुनाव मैदान में हैं और उनका मुकाबला बीजेपी के चंद्रशेखर और सीपीएम के पन्नियन रवींद्रन से है। मथुरा लोकसभा सीट पर 2014 से बीजेपी का पताका फहरा रहीं हेमा मालिनी का मुकाबला कांग्रेस के मुकेश धनगर से है। कोटा से दो बार के सांसद ओम बिरला को कांग्रेस के प्रह्लाद गुंजल चुनौती दे रहे हैं। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जोधपुर सीट से लगातार तीसरी बार चुनाव मैदान में हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार करण सिंह उचियारदा से है। बेंगलुरू दक्षिण से मौजूदा सांसद और भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या का मुकाबला कांग्रेस की सौम्या रेड्डी से होगा।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल 30 साल से अधिक समय से बीजेपी का गढ़ रहे राजनांदगांव से चुनाव लड़ रहे हैं। टीवी सीरियल ‘रामायण’ में भगवान राम का चरित्र निभाने वाले अरुण गोविल का मेरठ लोकसभा सीट पर मुकाबला बीएसपी के देवव्रत कुमार त्यागी और समाजवादी पार्टी की सुनीता वर्मा से है।

अगर मोदी जीते तो भारत में क्या आएगा परिवर्तन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर मोदी जीते तो भारत में परिवर्तन क्या आएगा! बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2024 के लिए अपना संकल्प पत्र रविवार को जारी कर दिया है। संकल्प पत्र जारी करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके बारे में बताते हुए कहा कि मोदी की गारंटी है कि मुफ्त राशन की योजना आने वाले पांच साल तक जारी रहेगी। हम सुनिश्चित करेंगे कि गरीब के भोजन की थाली पोषण युक्त, उसके मन को संतोष देने वाली हो। पेट भी भरे, मन भी भरे और जेब भी भरी रहे। संकल्प पत्र की टैग लाइन है- मोदी की गारंटी। मोदी ने कहा कि 10 सालों में बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र के हर बिंदु को गारंटी के रूप में जमीन पर उतारा है। मैनिफेस्टो की शुचिता को फिर से स्थापित किया है। हमारा संकल्प पत्र युवा, नारी, गरीब, किसान सभी को सशक्त करता है। हमारे फोकस डिग्निटी ऑफ लाइफ, क्वॉलिटी ऑफ लाइफ पर है। मौकों की संख्या और क्वॉलिटी पर बहुत जोर दिया गया है। इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण से रोजगार बढ़ाने की बात है साथ ही हाई वैल्यू सर्विसेज पर भी ध्यान देने जा रहे हैं। बीजेपी के संकल्प पत्र में युवा भारत की युवा आकांक्षाओं को प्रतिबिंब है।

मोदी ने संकल्प पत्र के बारे में बताते हुए कहा कि जन औषधि केंद्र में अस्सी पर्सेंट डिस्काउंट के साथ दवाई मिलती रहेगी। इसका विस्तार भी करेंगे। आयुष्मान भारत के तहत पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलता रहेगा। 70 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को आयुष्मान योजना के दायरे में लाया जाएगा। चाहे वह किसी भी वर्ग के हों। हम राष्ट्रीय सहकारिता नीति लेकर आएंगे। सुपर फूड पर बहुत ध्यान दिया जाएगा। श्री अन्न पैदा करने वाले 2 करोड़ किसानों को लाभ होगा। दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता के लिए किसानों को हर तरह की मदद की जाएगी। नैनो यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल पर जोर रहेगा।

उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार ने 4 करोड़ लोगों को मुफ्त घर बनाकर दिए हैं। हम तीन करोड़ और घर बनाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ेंगे। अभी तक सस्ते सिलेंडर घर घर पहुंचाएं हैं अब हम पाइप से सस्ती रसोई गैस घर घर पहुंचाने के लिए काम करेंगे। अब तक मुद्रा योजना के तहत लोन की सीमा 10 लाख रुपये हुआ करती थी अब हमने इसे बढ़ाकर 20 लाख रुपये करने का इरादा किया है। बिजली बिल जीरो कर बिजली से कमाई का अवसर बनाएंगे। दिव्यांगों को पीएम आवास योजना में प्राथमिकता दी जाएगी। ट्रांसजेंडर साथियों को भी आयुष्मान योजना के दायरे में लाया जाएगा। 10 करोड़ बहनों के सहायता समूहों को आईटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, टूरिजम जैसी सेवाओं के लिए ट्रेनिंग देंगे। अब तक एक करोड़ लखपति दीदी बन गई है। तीन करोड़ बहनों को लखपति दीदी बनाया जाएगा। महिला खिलाड़ियों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए विशेष सुविधाएं दी जाएंगी। सर्वाइकल कैंसर से मुक्ति के लिए अभियान चलाएंगे।

मोदी ने कहा कि 2025 में भगवान बिरसा मुंडा की जयंती राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाएगा। बीजेपी जनजातीय विरासत पर अनुसंधान को प्रोत्साहित करेगी। 700 से ज्यादा एकलव्य स्कूल बनेंगे। संत तिरुवल्लुवर कल्चर सेंटर का निर्माण करेंगे। सबसे पुरानी भाषा तमिल इस देश का, हमारा गौरव है। तमिल भाषा की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए हर तरह से कोशिश होगी। बीजेपी इको टूरिजम के नए सेंटर बनाएगी। होम स्टे के लिए महिलाओं का खास तौर पर आर्थिक मदद दी जाएगी। किसानों को आर्थिक सहायता जारी रहेगी। पीएम फसल बीमा योजना को और मजबूत किया जाएगा। एविएशन सेक्टर का भी विस्तार किया जाएगा। वंदे भारत ट्रेनों का भी विस्तार होगा। इसके तीन मॉडल चलेंगे- वंदे भारत स्लीपर, वंदे भारत चेयरकार, वंदे भारत मेट्रो। उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम चारों तरफ बुलेट ट्रेन के लिए काम करेंगे।

मोदी ने कहा कि विश्व में युद्ध के बादल छाए हैं। तनाव में है पूरा विश्व। ऐसी जगह रह रहे भारतीयों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। ऐसे में भारत में एक मजबूत, पूर्ण बहुमत वाली सरकार की जरूरत कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि बीजेपी देश हित में बड़े और कड़े निर्णय लेने से पीछे नहीं हटती। उन्होंने कहा कि हम वन नेशन वन इलेक्शन को साकार करेंगे। यूनिफॉर्म सिविल कोड को भी बीजेपी देशहित में जरूरी समझती है। भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई होती रहेगी। संकल्प पत्र जारी करने के कार्यक्रम में केंद्र सरकार की अलग अलग स्कीम के चार लाभार्थियों को भी बुलाया और मोदी ने उन्हें बीजेपी का संकल्प पत्र सौंपा।

संकल्प पत्र समिति के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि समिति के पास अलग अलग जरिए से 15 लाख से अधिक सुझाव आया जिन पर चर्चा की गई। मोदी की गारंटी 24 कैरेट सोने जितनी खरी मानी जाती है। हमारा संकल्प पत्र मोदी की गारंटी के साथ है। राजनाथ सिंह ने और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बताया कि किस तरह बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र की बातें पूरी की है। चाहे वह जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का वादा हो या फिर राम मंदिर का, बीजेपी ने हर वादा पूरा किया है। 10 साल के कामकाज का लेखा जोखा भी बताया। कोविड मैनेजमेंट से लेकर मुफ्त राशन तक का जिक्र किया।

आखिर कैसे पूरी होगी भारत में मोदी की गारंटी?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर मोदी की गारंटी भारत में कैसे पूरी होगी! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के नेता अपने चुनाव प्रचार के दौरान ‘मोदी की गारंटी’ के बारे में देश की जनता को बता रहे हैं। पीएम मोदी लगातार चुनावी मंचों से कह रहे कि पिछले 10 साल में जो काम हुए वह तो केवल ट्रेलर है, पूरी फिल्म तो अभी बाकी है। ऐसे में बीजेपी ने अपने 2024 के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में जो वादा किया है, उससे मोदी सरकार के अगले 5 साल के पिक्चर का विजन क्लियर दिखता है। बीजेपी की तरफ से चुनाव प्रचार में दावा किया जाता है कि पिछले 10 सालों में 34 करोड़ लोगों को आयुष्मान भारत योजना के तहत 5 लाख रुपए के मुफ्त इलाज की सुविधा दी गई है। बीजेपी के घोषणा पत्र में अब लोगों से वादा किया गया है कि अगर मोदी सरकार को जनता तीसरे कार्यकाल के लिए चुनती है तो आयुष्मान भारत योजना के तहत 70 वर्ष से अधिक आयु के देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को इसमें शामिल किया जाएगा।सालों में भारत मोबाइल के उत्पादन में दुनिया के दूसरे नंबर के देश में शुमार हो गया है। अब भाजपा के घोषणापत्र में वादा किया गया है कि भारत को 2030 तक ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का लक्ष्य है। देश भर में मोटे अनाज को लेकर एक तरह की क्रांति का संचार मोदी सरकार में किया गया। इसके साथ ही सभी पात्र ट्रांसजेंडर को भी आयुष्मान भारत के अंतर्गत कवर मिलेगा। मोदी सरकार के दौरान 500 साल के लंबे इंतजार के बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम लौटे, राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम संपन्न हुआ। रामलला के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दिन पूरी दुनिया ने इसे सेलिब्रेट किया।

मोदी सरकार में आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार किया गया। आतंकी हमले के खिलाफ 2016 और 2019 में देश की सीमा से बाहर जाकर भारतीय सेना के जवानों ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसे वीरता पूर्ण कारनामे किए। बीजेपी दावा करती रही है कि पीएम मोदी की सरकार की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का यह नतीजा रहा है। मोदी सरकार की तरफ से देशभर में कोविड के काल से ही 80 करोड़ भारतीयों को पीएम गरीब कल्याण योजना के तहत अनाज दिया जा रहा है। 2020 से ही सरकार ने सबके लिए अन्न की सोच के साथ इसे शुरू किया था। वहीं, घोषणा पत्र में बीजेपी का वादा है कि गरीब की थाली में अनाज हो इसके लिए अगले 5 साल तक पीएम गरीब कल्याण योजना का और विस्तार किया जाएगा। मोदी सरकार के 10 सालों में देश के 20 शहरों में मेट्रो कनेक्टिविटी और इसका विस्तार किया गया। उससे मोदी सरकार के अगले 5 साल के पिक्चर का विजन क्लियर दिखता है। बीजेपी की तरफ से चुनाव प्रचार में दावा किया जाता है कि पिछले 10 सालों में 34 करोड़ लोगों को आयुष्मान भारत योजना के तहत 5 लाख रुपए के मुफ्त इलाज की सुविधा दी गई है। बीजेपी के घोषणा पत्र में अब लोगों से वादा किया गया है कि अगर मोदी सरकार को जनता तीसरे कार्यकाल के लिए चुनती है तो आयुष्मान भारत योजना के तहत 70 वर्ष से अधिक आयु के देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को इसमें शामिल किया जाएगा।सरकार की योजना है कि मेट्रो नेटवर्क का विस्तार और ज्यादा तेजी से किया जाएगा।

मोदी सरकार ने अपने दस साल के कार्यकाल में 15 एम्स की स्थापना की और अब इसके और विस्तार के साथ इसके मजबूत ढांचे की रूपरेखा आगे के लिए तैयार की गई है। पिछले 10 सालों में भारत मोबाइल के उत्पादन में दुनिया के दूसरे नंबर के देश में शुमार हो गया है। अब भाजपा के घोषणापत्र में वादा किया गया है कि भारत को 2030 तक ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का लक्ष्य है। देश भर में मोटे अनाज को लेकर एक तरह की क्रांति का संचार मोदी सरकार में किया गया।

2023 में भारत ने इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिल्लेट्स समारोह का प्रतिनिधित्व किया। अब सरकार का अगले पांच साल में भारत को विश्व के न्यूट्री हब के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य है। सरकार ने नवंबर के महीने को जनजातीय गर्व दिवस के रूप में घोषित किया। वहीं, 2025 को जनजातीय गर्व वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की गई है। जब भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जन्म जयंती मनाई जाएगी। देशभर में पिछले 10 सालों में 31,000 हजार किलोमीटर रेलवे ट्रैक बिछाए गए हैं। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि अगले पांच साल में हर वर्ष 5,000 किमी प्रति वर्ष के हिसाब से रेलवे ट्र्रैक बिछाए जाएंगे।