Friday, March 6, 2026
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EC ने पश्चिम बंगाल के चार जिलों में कोई केंद्रीय बल नहीं रखा है.

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राज्य के चार जिलों में कोई केंद्रीय बल नहीं, कानून-व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए पुलिस के भरोसे है आयोग के सूत्रों के मुताबिक, पहले चरण से पहले पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, बांकुरा और पुरुलिया इन चार जिलों में कोई केंद्रीय बल नहीं रखा जा रहा है. मतदान का चरण. चुनाव आयोग फिलहाल राज्य के चार जिलों में कोई केंद्रीय बल नहीं रख रहा है. वे उन जिलों में कानून व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए राज्य पुलिस पर भरोसा कर रहे हैं।

आयोग के सूत्रों के अनुसार, पहले चरण के मतदान से पहले इन चार जिलों – पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, बांकुरा और पुरुलिया – में कोई केंद्रीय बल नहीं रखा जा रहा है। जो सेनाएं वहां थीं, उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया गया है। पर्याप्त बलों की कमी के कारण उन जिलों को फिलहाल ‘बल-मुक्त’ रखा जा रहा है. हालांकि आयोग के मुताबिक उन जिलों में कानून व्यवस्था की स्थिति सामान्य है. केंद्रीय बल पहले ही वहां रूट मार्च कर चुके हैं. मतदाताओं का विश्वास बढ़ाने का काम फोर्स ने पूरा कर लिया है। इसलिए उन्हें दूसरी जगहों पर ले जाया जा रहा है. 25 मई को मेदिनीपुर, पुरुलिया, बांकुरा, झाड़ग्राम में मतदान।

फिलहाल राज्य में केंद्रीय बल की कुल 299 कंपनियां हैं. पहले चरण के मतदान के लिए 263 कंपनी फोर्स तैनात की गई है. 19 अप्रैल को पहले चरण का मतदान खत्म होने के बाद आयोग दूसरे चरण के निर्वाचन क्षेत्रों में बलों को स्थानांतरित कर रहा है। उन्होंने कहा कि दूसरे चरण के लिए 272 कंपनी बलों को तैनात किया जा रहा है, जिसमें कूच बिहार, अलीपुरद्वार, दार्जिलिंग के तीन लोकसभा क्षेत्रों में 6 कंपनी बल रह जाएंगे। बाकी 21 कंपनियों को राज्य के विभिन्न जिलों में रखा जा रहा है. वे कानून व्यवस्था की स्थिति पर नियंत्रण सहित रूट मार्च का काम करेंगे. केवल उन्हीं चार जिलों को आयोग की गणना से बाहर रखा गया है।

“अगर नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह लोकसभा चुनाव देश का आखिरी लोकसभा चुनाव होगा।” स्पीकर का नाम अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर है। निर्मला सीतारमण मोदी सरकार की वित्त मंत्री के पति हैं.

संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की जयंती की सुबह जब नरेंद्र मोदी बीजेपी दफ्तर में पार्टी का लोकसभा चुनाव घोषणापत्र जारी कर रहे थे तो कांग्रेस ने एक बार फिर मोदी सरकार पर संविधान बदलने की योजना बनाने का आरोप लगाया. इस्तेमाल किया गया टूल अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर का नया बयान है। प्रभाकर पहले भी कई बार मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था और प्रदर्शन की आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने चुनावी बांड को सबसे बड़ा घोटाला होने का दावा किया. इस बार के लोकसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर परकला प्रभाकर ने कई इंटरव्यू में दावा किया, ”अगर नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने तो यह आखिरी चुनाव होगा.” देश का संविधान, देश का नक्शा पूरी तरह बदल जाएगा।” नरेंद्र मोदी को ‘तानाशाह’ कहने पर मोदी सरकार की वित्त मंत्री के पति का बयान, जो अभी फुसफुसाहट में सुनाई दे रहा है, वही लाल किले से सुनाई देगा. जो अभी मणिपुर, लद्दाख में हो रहा है वही पूरे देश में होगा। आज बीजेपी के घोषणापत्र जारी होने के दिन कांग्रेस ने प्रभाकर के बयान को उजागर किया और याद दिलाया कि वह केंद्रीय वित्त मंत्री के पति हैं.

प्रभाकर ने कहा कि मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को 20-25 साल पीछे धकेल दिया है। उन्होंने स्वतंत्रता-पूर्व युग में भारत को एक राजव्यवस्था के रूप में लिया। सामाजिक एकता, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक मूल्यों की दृष्टि से भारत को मध्य युग में वापस भेज दिया गया है। इस ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ के साथ, मोदी की सत्ता में वापसी विनाशकारी होगी। हालाँकि, प्रभाकर ने भविष्यवाणी की कि भाजपा 220-230 से अधिक सीटें नहीं जीत पाएगी। क्योंकि, उत्तर भारत से 50-60 सीटें और दक्षिण भारत से 10-12 सीटें कम हो जाएंगी. अगर बीजेपी 230 पर अटक गई तो मोदी के लिए गठबंधन सरकार बनाना संभव नहीं होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार के मंत्रियों, कांग्रेस की सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ आज पार्लियामेंट स्क्वायर पर अंबेडकर की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। हाल ही में उन्होंने चुनाव प्रचार में जाकर कहा था कि बीजेपी पर संविधान खत्म करने के चाहे कितने भी आरोप लगा लें, चाहे अंबेडकर खुद भी आ जाएं, लेकिन संविधान खत्म नहीं कर पाएंगे. लेकिन कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता जयराम रमेश ने आज आरोप लगाया कि मोदी जो भी कहते हैं, उनकी पार्टी के नेताओं ने भाजपा के असली इरादों को स्पष्ट कर दिया है।

अयोध्या में बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह, हरियाणा में बीजेपी प्रत्याशी ज्योति मिर्धा, कर्नाटक से सांसद अनंतकुमार हेगड़े ने कहा कि बीजेपी संविधान बदलने के लिए लोकसभा में चार सौ से ज्यादा सांसदों के साथ सरकार बनाने का लक्ष्य बना रही है. आज प्रियंका गांधी वाद्रा ने कहा, ”बीजेपी का घोषणापत्र या संकल्प पत्र असल में एक दिखावा है. उनका मूल घोषणापत्र संविधान संशोधन विधेयक है. सड़क-दर-गली, राज्य-दर-राज्य, भाजपा नेता, उम्मीदवार घूम-घूमकर संविधान बदलने की मांग कर रहे हैं।”

आज अंबेडकर के जन्मदिन पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने नागपुर में बौद्ध स्तूप दीक्षाभूमि का दौरा किया. अम्बेडकर और उनके अनुयायियों ने यहीं बौद्ध धर्म अपनाया। आरएसएस मुख्यालय नागपुर में. वहां खड़गे ने मोदी सरकार की दलित और आदिवासी विरोधी नीतियों पर हमला बोला. उन्होंने कहा, ”मोदी सरकार ने दलित, आदिवासी राष्ट्रपतियों का अपमान किया है. उन्हें नए संसद भवन के शिलान्यास, उद्घाटन या राम मंदिर के उद्घाटन में जाने की इजाजत नहीं दी गई.

जब जेल के अंदर मुख्तार अंसारी का चलता था राज!

एक ऐसा समय था जब मुख्तार अंसारी का जेल के अंदर राज चलता था! माफिया से माननीय बने मुख्तार अंसारी का इंतकाल हुए कई दिन बीत चुके हैं। लेकिन अभी भी उनके मौत की गुत्थी सुलझ नहीं पाई है। 28 मार्च को भी मुख्तार अंसारी बांदा जेल में बंद थे तबियत बिगड़ने के बाद बांदा के रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। आरोप है कि मुख्तार को खाने में धीमा जहर दिया जा रहा था। हालांकि डॉक्टरों की माने तो उसकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है। फिलहाल इस मामले में जांच जारी है। वहीं जानकारों की माने तो माफिया मुख्तार अंसारी का जेल में पूरा दरबार लगता था। उनसे मिलने के लिए जेल मैन्युअल फॉलो करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। जेल अधीक्षक आरके तिवारी की हत्या के बाद जेल के अधिकारियों में खौफ हो गया था। इस हत्या में मुख्तार अंसारी का भी नाम था। माफिया व मऊ सदर सीट से 5 बार के विधायक रहे मुख्तार अंसारी ने अपनी जिंदगी के करीब 19-20 साल जेलों में काटी है। साल 1999 में मुख्तार अंसारी लखनऊ जेल में बंद थे। उस समय जेल अधीक्षक आरके तिवारी की हत्या कर दी गई थी। उस हत्या में मुख्तार अंसारी का नाम भी आया था लेकिन उस हत्या की साजिश जेल में बंद एक कैदी ने रची थी। जेल अधीक्षक के पीछे की वजह जेल में सख्ती बढ़ना बताया जा रहा है। जिसके चलते हत्या कर दी गई थी। मुख्तार अंसारी ने कई बार जेल के भीतर से ही विधायक बन गए थे। और ना जाने कितने लोगों को जेल के भीतर से चुनाव लड़वाया व हरवाया है।

मुख्तार ने एक ट्रेंड सेट किया कि जेल में पैसा, हनक और व्यवहार होना चाहिए। जब इन सबका कॉम्बो बनेगा तब जेल में कोई दिक्कत नहीं होगी। आम आदमी को छह महीने छोड़िए, एक महीने में आंसू निकल आएंगे। लेकिन मुख्तार ने अपनी जिंदगी का एक लंबा समय यूपी की जेलों में काटा है। मुख्तार ने जिस अंदाज और जलवे से जेल काटी है, उसकी सबसे अहम वजह पैसा था। जेल अधीक्षक हत्यकांड में भी दो दर्जन के करीब आरोपी बनाए गए थे। उसमें एक सज्जन सुरेंद्र कालिया थे। सुरेंद्र कालिया के बारे में बताते हैं कि उन्होंने इतनी बार जेल काटी है कि उनके सूटकेस पैक रहते थे और पहले उनके सूटकेस जेल पहुंच जाते थे उसके बाद सुरेंद्र कालिया जेल जाते थे।

बताया जाता है कि मुख्तार अंसारी को जेल में रहते हुए भी यह कभी महसूस नहीं होता था कि मैं जेल न्यायिक अभिरक्षा में हूं। क्योंकि ना ही रहने बैठने में और ना ही किसी से मुलाकात करने में कोई दिक्कत होती थी। एक आम आदमी को जेल में मुलाकात करने के लिए हफ्ते में एक या बड़ी मुश्किल से दो बार मुलाकात कर सकता है। जानकार बताते हैं कि मुख्तार अंसारी से जेल में मिलने के लिए कोई भी जेल का मैनुअल फॉलो करने की जरूरत नहीं थी। जब जब चाहते तब मुख्तार अंसारी से मुलाकात हो जाती। बशर्तें माफिया मुख्तार अंसारी आपसे मिलना चाहते हो। मुख्तार जिससे मुलाकात करना चाहते थे जेल गेट पर नाम बताते ही एंट्री हो जाती थी।

एक बार जिला प्रशासन को जानकारी मिली कि माफिया मुख्तार अंसारी जेल के अंदर दरबार लगाते हैं। इसको लेकर डीएम और सपा ने जेल में छापा भी मारा था। तब 100 से ज्यादा लोग मुख्तार की दरबार में शामिल थे जिसमें एक वरिष्ठ पत्रकार भी मौजूद थे। आश्चर्य की बात यह है कि उन सैकड़ो लोगों की गेट एंट्री में नाम नहीं दर्ज था सभी बिना नाम दर्ज कराए ही मुख्तार की दरबार में शामिल हुए थे। ऐसे ना जाने कितने लोग कितनी बार मुख्तार से जेल में मिलने गए। जिनकी गेट में एंट्री नहीं होती थी।

मुख्तार अंसारी लगातार जेल में दरबार लगाते थे। जानकारों की माने तो यूपी की जेल में माफियाओं का एक दरबार चलता था पूरी सरकार जेल के भीतर से चलती थी। उन्हें जो खाने में पसंद होता था वह उन्हें बाहर से खाना बनवाकर उनके लिए अंदर जेल भेजवाया जाता था। गाजीपुर में जिले के बड़े अधिकारी जेल के भीतर मुख्तार के साथ बैडमिंटन खेलते थे।

जानकारों की माने तो मुख्तार अमरमणि जैसे तमाम माफिया जिन जी जेल में रहते थे वहां अधिकतर अधिकारी जाना नहीं पसंद करते थे कई अधिकारी उन जेल से अपना ट्रांसफर कर लेते थे। ऐसे ही जब पंजाब जेल से मुख्तार अंसारी को बांदा जेल लाया गया था तब तब एक जेलर ड्यूटी ज्वाइन करने के बाद लंबी छुट्टी पर चला गया था जबकि दूसरे जेलर ने ज्वाइन करने से ही मना कर दिया था। इसके पीछे मुख्य कारण यह भी था कि यह जेल में रहकर अपनी पूरी सल्तनत चलाते थे। लखनऊ जेल अधीक्षक आरके तिवारी की हत्या के बाद जेल के सभी अधिकारी खौफ खाने लगे थे। जेल अधीक्षक की लखनऊ के हजरतगंज इलाके में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

आखिर क्या था विधायक महेंद्र सिंह भाटी की हत्या का राज?

आज हम आपको विधायक महेंद्र सिंह भाटी की हत्या का राज बताने जा रहे हैं! 13 सितंबर 1992 की शाम के करीब छह बजे होंगे। दादरी के विधायक महेंद्र सिंह भाटी घर में थे। तभी एक फोन आया और बात होते ही उन्होंने साथी उदय प्रकाश आर्य से तुरंत नोएडा चलने को कहा। कुछ ही देर में विधायक महेंद्र भाटी, उदय और सुरक्षाकर्मी कौशिक कार से निकले। गाड़ी देवेंद्र चला रहा था। रास्ते में भंगेल रोड पर रेलवे क्रॉसिंग बंद होने से कार रुकी। क्रॉसिंग खुलने पर दूसरी तरफ दो कारें खड़ी थीं, जिनके गेट खुले हुए थे। गाड़ियों के गेट खुले देख विधायक को कुछ गड़बड़ लगी, लेकिन संभलने का मौका नहीं मिला। सामने वाली कारों से उतरे हमलावरों ने विधायक की गाड़ी को निशाना बना फायरिंग शुरू कर दी। अचानक हुए हमले में विधायक महेंद्र के साथ ही उदय की मौके पर ही मौत हो गई। गनर कौशिक गोली लगने से घायल हो गया। हालांकि, चालक देवेंद्र किसी तरह जान बचाकर भाग निकला। हमले में एके 47 का इस्तेमाल किया गया था। तीन बार के विधायक महेंद्र सिंह भाटी का नाम 80-90 के दशक में पश्चिमी यूपी के बड़े नेताओं में शुमार था। यह वही दौर था, जब नोएडा का विकास हो रहा था। किसानों में महेंद्र भाटी काफी लोकप्रिय थे। भूमि अधिग्रहण आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका रही थी। इसी आंदोलन के दम पर महेंद्र ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा में लगने वाली फैक्ट्रियों में हजारों युवाओं को नौकरी दिलवाई थी। उस दौरान यूपी में दो बड़े गुर्जर नेता थे। एक थे राजेश पायलट और दूसरे महेंद्र सिंह भाटी। राजेश पायलट कांग्रेस में दिल्ली की राजनीति करते थे और महेंद्र सिंह भाटी यूपी में किसानों और राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति में सक्रिय थे।

चौधरी अजित सिंह के खास होने के साथ ही विश्वनाथ प्रताप सिंह, शरद यादव और रामविलास पासवान का भी करीबी माना जाता था। विधायक महेंद्र भाटी की हत्या में बुलंदशहर के विधायक धर्मपाल यादव उर्फ डीपी यादव, कुख्यात अपराधी पाल सिंह उर्फ लक्कड़पाला, करण यादव, गाजियाबाद के भाजपा जिलाध्यक्ष प्रवीण भाटी के पिता तेजपाल भाटी और प्रवीण के भाई प्रणीत भाटी सहित तीन अन्य को आरोपित बनाया गया।

पूर्व डीजीपी बृजलाल बताते हैं कि नोएडा के सर्फाबाद गांव का निवासी धर्मपाल यादव उर्फ डीपी यादव शुरुआती दौर में दूध का काम करना था। धीरे-धीरे शराब के कारोबार में उतारा। इसी बीच गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद में जहरीली शराब कांड हुआ, जिसमें डीपी यादव का नाम आया। पैसा बढ़ने के साथ ही डीपी को राजनीतिक संरक्षण की जरूरत थी। ऐसे में क्षेत्र के सबसे मजबूत नेता और दादरी के विधायक महेंद्र सिंह भाटी से मिलने लगा। जल्द दोनों में गहरी दोस्ती हो गई। दोस्ती इस कदर बढ़ी कि 1988 में भाटी ने डीपी यादव को बिसरख ब्लॉक का प्रमुख बनवा दिया। इसके बाद महेंद्र को डीपी यादव अपना राजनीतिक गुरु कहने लगा। 1989 के विधानसभा चुनाव में महेंद्र ने डीपी यादव को बुलंदशहर सीट से जनता दल से टिकट दिलवाकर विधायक बनवा दिया और खुद दादरी सीट से चुनाव जीतकर दूसरी बार विधानसभा पहुंचे।

यह वह दौर था, जब देश की राजनीति तेजी से बदल रही थी। लोकसभा और यूपी विधानसभा के चुनाव आस-पास ही हुए थे। जनता दल के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) दो दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री बने। ठीक तीन दिन बाद पांच दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव पहली बार यूपी के सीएम चुने गए। हालांकि, वीपी सिंह चाहते थे कि मुख्यमंत्री चौधरी अजित सिंह बने। एक साल भी नहीं हुआ और नवंबर 1990 में केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिर गई। हालांकि यूपी में मुलायम की सरकार सुरक्षित रही। वजह, मुलायम ने पैंतरा बदला और चंद्रशेखर के साथ चले गए।

दिल्ली में समाजवादी जनता पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। यूपी में कांग्रेस के समर्थन से मुलायम सीएम बने रहे। इसके बाद मुलायम और अजित सिंह में लाइन खिंच गई। इसके साथ ही महेंद्र सिंह भाटी और डीपी यादव के रास्ते भी अलग हो गए। महेंद्र ने अजित सिंह का साथ नहीं छोड़ा, जबकि डीपी यादव पाला बदलकर मुलायम के साथ चले गए।

यह वही समय था, जब पश्चिमी यूपी खासकर नोएडा और गाजियाबाद क्षेत्र में महेंद्र फौजी और सतवीर गुर्जर की गैंगवार चल रही थी। सीनियर पत्रकार देवेंद्र देवा के मुताबिक महेंद्र भाटी से अलग होने के बाद डीपी यादव ने महेंद्र फौजी से करीबी रिश्ते बना लिए। वहीं, सतवीर गुर्जर ने विधायक महेंद्र भाटी का दामन थाम लिया। मुलायम का साथ पकड़ने से डीपी यादव का रसूख बढ़ता गया। मुलायम के मंत्रिमंडल में मंत्री का पद मिल गया। हालांकि, दादरी में अब भी महेंद्र की चलती थी। जबकि, डीपी यादव पूरे इलाके पर कब्जा चाहता था। इसका अहसास महेंद्र को भी था।

1991 के विधानसभा चुनाव में महेंद्र ने बुलंदशहर से डीपी यादव के सामने पतवाड़ी गांव के प्रकाश पहलवान को जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़वाया। इस चुनाव में खूब खूनखराबा हुआ, लेकिन डीपी यादव की जीत हुई। जबकि, महेंद्र तीसरी बाद दादरी से विधायक चुने गए। चुनाव के तुरंत बाद अप्रैल 1991 में महेंद्र के छोटे भाई राजवीर सिंह भाटी की दादरी रेलवे रोड पर हत्या कर दी गई।

हत्या में महेंद्र फौजी और डीपी यादव के साले परमानंद यादव का नाम आया। इसके बाद फरवरी 1992 को गाजियाबाद के भाजपा जिलाध्यक्ष प्रवीण भाटी की बरौला में सड़क हादसे में मौत हुई। परिवार को शक था कि महेंद्र ने हादसे का रूप देकर प्रवीण की हत्या करवाई है। इसके साथ ही प्रवीण का परिवार डीपी यादव के करीब हो गया।

विधायक महेंद्र की हत्या पर वापस आते हैं। हत्याकांड की जांच अगस्त 1993 में तत्कालीन राज्य सरकार की सिफारिश पर सीबीआई को दी गई। सीबीआई ने डीपी यादव सहित आठों आरोपितों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया और मामले की सुनवाई शुरू हो गई। वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केस सीबीआई कोर्ट देहरादून ट्रांसफर कर दिया गया। क्योंकि, आरोप लग रहा था कि अगर यूपी में ट्रायल होंगे तो डीपी यादव अपने रसूख का इस्तेमाल कर बच जाएगा। सुनवाई के दौरान चार आरोपितों की मौत हो गई। फरवरी 2015 को सीबीआई की विशेष अदालत ने डीपी यादव सहित चार को उम्रकैद की सजा सुनाई। मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो देहरादून हाई कोर्ट ने नवंबर 2021 में डीपी यादव, करन यादव और लक्कड़पाला को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। दिसंबर 2021 में कोर्ट ने चौथे आरोपित प्रणीत भाटी को भी बरी कर दिया।

आखिर कैसे परवान चढ़ी दो गैंगस्टर की प्रेम कहानी?

आज हम आपको बताएंगे कि दो गैंगस्टर की प्रेम कहानी कैसे परवान चढ़ी है! अनुराधा और संदीप को पहली नजर में ही प्यार हो गया था। दोनों की मुलाकात 2020 के वसंत ऋतु में हुई थी, जब कोरोना वायरस से कोविड-19 महामारी शुरू ही हुई थी। हालांकि, उनकी सिर्फ इतनी चिंता नहीं थी। दोनों दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा पुलिस बलों की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में थे। पुलिस की फाइलों में अनुराधा, मैडम मिंज थीं और संदीप, गैंगस्टर काला जठेड़ी जिसके सिर पर उस समय 7 लाख रुपये का इनाम था। दोनों 2021 में पुलिस के हत्थे चढ़ चुके थे और तब जठेड़ी जेल में है। हालांकि, अनुराधा को जमानत मिल गई और दोनों ने नियमित मुलाकातों से अपने दिलों में एक-दूसरे के प्रति प्यार को संजोए रखा। सोमवार को द्वारका कोर्ट ने जठेड़ी को 12 मार्च को अनुराधा से शादी करने के लिए छह घंटे की कस्टडी पैरोल की अनुमति दे दी। इसके साथ ही बीते पांच वर्षों की उनकी चाहत के परवान चढ़ने का रास्ता साफ हो गया। जानकारी के अनुसार, फरार रहने के दौरान वैली ऑफ फ्लावर की यात्रा के दौरान उनका प्यार परवान चढ़ा। अगले नौ महीनों तक दोनों ने मसूरी से देहरादून से रानीखेत और अन्य जगहों पर जाते हुए पुलिस के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खूब खेला। आखिरकार वो जुलाई 2021 में सहारनपुर के पास पुलिस के हाथ लगे और न्यायिक हिरासत में भेज दिए गए।

लेकिन अलग-अलग जेलों की दीवारें उनके प्यार के परवान चढ़ने से रोक नहीं पाईं। बताया जाता है कि लॉरेंस बिश्नोई जेल में जठेड़ी को बहुत सपोर्ट किया। कई महीनों बाद अनुराधा को जमानत मिल गई और वो लगातार मिलते रहे। उनकी प्रेम कहानी से परिचित लोग कहते हैं कि अनुराधा जिस आसानी से फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है और वैसे ही उसके हाथ से क्लासनिकोव भी धुआंधार गोलियां उगलता है। जठेड़ी अनुराधा की इसी शख्सियत पर दिल हार बैठा। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, ‘2017 की गर्मियों में खूंखार गैंगस्टर आनंदपाल की पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के बाद अनुराधा की जिंदगी भी जैसे खत्म हो गई थी। आनंदपाल और अनुराधा बहुत करीब थे। अनुराधा तब आनंदपाल के प्रतिद्वंद्वी राजू बसौदी के रेडार पर आ गई थी। तभी उसे गैंगस्टर बलबीर बनूडा का साथ मिला। अनुराधा 2019 तक बिश्नोई के संपर्क में आ गई थी और अंततः जठेड़ी से दोस्ती कर ली।’ इसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की टीम ने 2021 में जठेड़ी और अनुराधा को ट्रैक किया था।

अनुराधा राजस्थान के सीकर जिले के अलफसर गांव के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखती है। अधिकारी ने बताया, ‘अनुराधा के बचपन में ही उसकी मां चल बसी थीं। उसके पिता सरकार नौकरी में थे और उन्होंने ही अनुराधा का पालन-पोषण किया। उसका पुकारू नाम मिंटू था। संभवतः इसी वजह से उसे मैडम मिंज कहा जाने लगा।’ सूत्रों ने कहा कि अनुराधा एक पढ़ी-लिखी लेडी है जिसके पास कंप्यूटर एप्लीकेशन में बैचलर डिग्री है। बाद में उसने शेयर बाजार में हाथ आजमाया लेकिन उसका व्यवसाय तब चौपट हो गया जब उसके साथी ने उसे धोखा दिया। अनुराधा पर एक करोड़ का कर्ज था। उसने पुलिस को बताया कि उसने यह कर्ज चुकाने के लिए स्थानीय पुलिस से मदद लेने की कोशिश की थी, लेकिन आखिरकार गैंगस्टर आनंदपाल तक पहुंच गई।

उसने पुलिस के सामने और अदालत में कहा था कि उसे दोबारा अपराध की दुनिया में लौटने की कोई मंशा नहीं है। पिछले कुछ महीनों से वह जठेड़ी के बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहकर उनकी देखभाल कर रही है। उनके परिचितों का कहना है कि इसी व्यवहार से प्रभावित होकर जठेड़ी ने अनुराधा को शादी का प्रस्ताव दिया। वह अब कानून की पढ़ाई भी कर रही है ताकि वह अदालत में अपने पति की मदद कर सके।

सोमवार की सुनवाई में जठेड़ी के वकील रोहित दलाल ने दलील दी कि विवाह करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है और संदीप को शादी करने का अवसर न देना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। जठेड़ी की लीगल टीम की दलीलों और पुलिस की प्रतिक्रिया सुनने के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दीपक वासन ने सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक पैरोल का आदेश दिया और दिल्ली पुलिस को सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। अदालत के आदेश के मुताबिक, संदीप को 13 मार्च को उसके गांव जठेड़ी में ‘गृह प्रवेश’ समारोह में शामिल होने ले जाया जाएगा। वहां वह सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक रहेगा। एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि जठेड़ी की सुरक्षा में पुलिस अपने सबसे भरोसेमंद जवानों को तैनात करेगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह हिरासत से भागने की कोशिश न करे।

अब देश की सुरक्षा पर भारी पड़ रहा है मेथ का नशा?

वर्तमान में मेथ का नशा देश की सुरक्षा पर भारी पड़ रहा है! मेथामफेटामाइन ड्रग्स की एक नई तरह की किस्म। नशा बेहद खतरनाक। इतना कि लेने वाला कुछ ही दिनों में दिमागी बीमारी का शिकार बन जाता है। तस्करी ऐसी खुफिया है कि दिग्गज जांच एजेंसियों को भी पकड़ने में पसीने छूट जाएं। ड्रग्स का काला धंधा करने वालों की जुबान में जिसे मेथ कहा जाता है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका जैसे बड़े देशों तक फैला जाल। लेकिन, जरा ठहरिए। इस ड्रग्स की पहचान केवल इतनी ही नहीं है। इसके तार जुड़े हैं आतंकवाद से। जी हां, आपने सही सुना। जांच एजेंसियों ने मेथ के नशे और आतंकवादियों के कनेक्शन से पर्दा हटाया है। धीरे-धीरे दुनिया के कई देशों को अपनी गिरफ्त में ले रहा मेथ का ये नशा, भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक खतरा बनता हुआ नजर आ रहा है। सबसे पहले आपको बताते हैं कि ये मेथ आखिर क्या है। अफगानिस्तान और ईरान के ऊंचे इलाकों में एक पौधा उगता है- इफेड्रा। झाड़ियों के बीच उगने वाला एक मामूली सा पौधा। कुछ साल पहले तक इसपर किसी की नजर नहीं थी। फिर पता चला कि इफेड्रा नाम के इस पौधे से इफेड्रिन का उत्पादन किया जा सकता है। वही इफेड्रिन, जो मेथामफेटामाइन बनाने के लिए सबसे जरूरी है। और देखते ही देखते, इफेड्रा नाम का ये पौधा ड्रग्स कार्टेल की नजरों में चढ़ गया। फिर क्या था, चीन सहित कई नार्को-टेरर संगठनों ने अफगानिस्तान और ईरान की तरफ अपने काले कदम बढ़ा दिए। वो संगठन, जो ड्रग्स के जरिए आतंकवादियों की फंडिंग करते हैं।

भारत की जांच एजेंसियों के सामने साल 2022 में एक खुफिया रिपोर्ट आई। ये रिपोर्ट बेहद डराने वाली थी। रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा था कि आतंकवाद की फंडिंग के मामले में मेथ बहुत तेजी से हेरोइन की जगह ले रही है। रिपोर्ट में आगे और भी खतरनाक बातें थी। इसमें बताया गया कि मेथ को बनाने के लिए अफगानिस्तान और ईरान में प्रोडक्शन के दो स्तर के इंतजाम हैं। पहले इफेड्रा पौधों से इफेड्रिन निकालते हैं। और फिर, मेथामफेटामाइन बनाने के लिए इफेड्रिन को अलग-अलग लैब में भेजा जाता है। इसके बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने अफगानिस्तान के एक मेथ कार्टेल के खिलाफ यूएपीए के तहत एफआईआर दर्ज की। ये कार्टेल सिलिका में छिपाकर इस मेथ की तस्करी कर रहा था। स्पेशल ब्रांच ने ऑपरेशन चलाया और 300 किलो से भी ज्यादा मेथ की एक बड़ी खेप को पकड़ लिया।

यहां ये जानना भी जरूरी है कि पहले मेथ को सिंथेटिक स्यूडोएफेड्रिन का इस्तेमाल कर तैयार किया जाता था। स्यूडोएफेड्रिन खांसी-जुकाम की दवाइयों में मिलता है। लेकिन, इस तरीके से मेथ को बनाने में दो दिक्कतें थी। पहली- जितनी मात्रा में मेथ तैयार करनी है, उतनी मात्रा में स्यूडोएफेड्रिन का तेजी से मिलना मुश्किल था। दूसरी- ये काफी महंगा भी पड़ता था। इसलिए, दूसरे जरिए से मेथ बनाने के तरीके तलाशे जाने लगे। सूत्र बताते हैं कि साल 2014-15 में ड्रग्स कार्टेल ने इफेड्रा पौधे से इफेड्रिन निकालना शुरू किया। महज तीन सालों के भीतर ही कार्टेल के लिए ये पौधा पहली पसंद बन गया। नतीजा ये हुआ कि मेथामफेटामाइन के प्रोडक्शन ने बहुत तेजी से स्पीड पकड़ ली।

वहीं, मेथामफेटामाइन का प्रोडक्शन बढ़ा, तो स्यूडोएफेड्रिन और दूसरे केमिकल की तस्करी भी बढ़ी। घरेलू स्तर पर भी इन केमिकल को बनाया जाने लगा। बीते फरवरी के महीने में ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने दिल्ली में 50 किलो स्यूडोएफेड्रिन जब्त की थी। कार्टेल के साथ इस नेटवर्क का सरगना था तमिल फिल्मों का एक निर्माता- जाफर सादिक। सादिक ने भारत और ऑस्ट्रेलिया में करीब 2000 करोड़ रुपए का अपना नेटवर्क फैलाया हुआ था। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने मार्च के महीने में ही जाफर सादिक को गिरफ्तार कर लिया।

सूत्रों से एक बात और पता चली है। स्यूडोएफेड्रिन के अलावा प्रोपियोनील क्लोराइड जैसे रसायनों का भी मेथ के निर्माण में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रोपियोनील क्लोराइड ऐसा रसायन है, जिसकी पहचान बहुत कम है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (आईएनसीबी) ने जिन रसायनों को मेथ के निर्माण में जरूरी माना है, उस लिस्ट में भी इसका नाम नहीं है। यहां एक बात और हैरान करने वाली है। मेथ को तैयार करने के लिए चीन की कई फर्म बडे़ पैमाने पर प्रोपियोनील क्लोराइड का निर्यात कर रही हैं। जांच एजेंसियों के मुताबिक, अफगानिस्तान और ईरान अपने घरेलू पौधों से ड्रग्स तैयार करते हैं। जबकि, म्यांमार और मैक्सिको जैसे देशों में प्रोपियोनील क्लोराइड जैसे रसायन पहुंचाए जा रहे हैं।

नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी के मुताबिक, हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली से मैक्सिको और अफगानी ‘कुक’ (मेथ को तैयार करने वाले एक्सपर्ट) की गिरफ्तारी उसी बड़े खतरे की तरफ एक संकेत है, जिसका जिक्र खबर की शुरुआत में किया गया है। ये कुक बंदरगाहों से लाई गई मेथ को ग्राहकों के लिए फाइनल प्रोडक्ट के तौर पर तैयार करते हैं। इसके बाद तस्करों का नेटवर्क मेथ की सप्लाई में जुट जाता है। लोकल स्तर पर सारी पेमेंट चुकाने के बाद मेथ की बिक्री से आई रकम को हवाला नेटवर्क के जरिए भेजा जाता है। अलग-अलग देशों से होते हुए ये रकम अंतिम ठिकाने पर पहुंचती है और फिर आतंकवादियों के फंडिंग के लिए इसका इस्तेमाल होता है। यही वो कनेक्शन है, जिसमें ड्रग्स और आतंकवाद बहुत तेजी से आपस में जुड़ रहे हैं।

क्या लोकसभा चुनाव में धमाल मचा पाएंगे फिल्मी स्टार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में फिल्मी स्टार धमाल मचा पाएंगे या नहीं! उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिल्मी सितारों की धमक से लोकतंत्र को नई ऊंचाई मिलने लगी है। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, हर पार्टी में सिने अभिनेता और अभिनेत्री अपने अपने भाग्य आजमाते रहे हैं और कुछ तो अभी आजमा भी रहे हैं। राजनीति में इनके पदार्पण ने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की है। अभिनेता से नेता बने कलाकारों में हिंदी और भोजपुरी दोनों क्षेत्र के कलाकार हैं। भोजपुरी के दिग्गज कलाकार रवि किशन शुक्ला हों या आजमगढ़ से सांसद दिनेश लाल निरहुआ, या फिर हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियां हेमा मालनी और काजल निषाद और अभिनेता से नेता बने कांग्रेस के दिग्गज अब नेता राजबब्बर, सबने खूब भीड़ जुटाई है। इस लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने यूपी से दो दिग्गज भोजपुरी स्टार रवि किशन को गोरखपुर से और आजमगढ़ से दिनेश लाल निरहुआ को उम्मीदवार बनाया है। बॉलीवुड में बड़ा नाम हेमा मालिनी का मथुरा लोकसभा सीट से लगातार कई चुनावों से उम्मीदावार होना भी इसका जीता जागता उदाहरण है। इतना ही नहीं, रामानंद सागर के रामायण’ में श्रीराम का किरदार अदा करने वाले अरुण गोविल भी चुनावी समर में उतर चुके हैं और मेरठ लोकसभा क्षेत्र से चुनावी योद्धा बनकर न सिर्फ राजनीति में पदार्पण कर चुके हैं। बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और स्वस्थ राजनीति के गवाह बनने की ओर कदम बढ़ा चुके हैं।भोजपुरी अभिनेता रवि किशन गोरखपुर से पहले ही अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर चुके हैं। वर्ष 2014 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले रवि किशन शुक्ला ने वर्ष 2014 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जनपद जौनपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि उनकी राजनीतिक इच्छा और बलवती हुई और वर्ष 2017 में भाजपा का दामन थामा फिर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में संसद तक का सफर तय किया।

भोजपुरी फिल्मी दुनिया के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले रवि किशन शुक्ला पर भाजपा ने एक बार फिर दांव लगाया है। इधर, इंडिया गठबंधन ने शुक्ला के खिलाफ टीवी कलाकार काजल निषाद को चुनाव मैदान में उतारा है। भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव ने 2019 में भाजपा के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। भाजपा के टिकट पर उन्होंने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा, तब वह हार गए थे। 2022 के चुनाव में अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव लड़ा और लोकसभा सीट छोड़ दी, उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर उपचुनाव हुआ और निरहुआ ने अखिलेश के भाई और सपा प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव को हरा दिया। 2024 में उनका सामना एक बार फिर सपा मुखिया अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव से ही है।

वरिष्ठ अभिनेत्री हेमा मालिनी उत्तर प्रदेश की मथुरा लोकसभा चुनाव से तीसरी बार मैदान में हैं। वह लगातार दो बार यहां से सांसद रह चुकी हैं। हेमा मालिनी भले ही फिल्मी दुनिया में अब न दिख रही हों, लेकिन वह राजनीति में काफी सक्रिय हैं। अभिनेत्री के रूप में हेमा मालिनी को दर्शकों ने पसंद किया है। रामानंद सागर के दूरदर्शन पर प्रसारित हुए शो ‘रामायण’ में श्रीराम का किरदार अदा कर अरुण गोविल ने घर-घर में अपनी पहचान बनाई। सालों तक इसी किरदार के साथ जीने वाले अरुण गोविल ने अपना राजनीतिक करियर भाजपा से शुरू किया है।

भाजपा ने उन्हें मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल का टिकट काट कर अपना उम्मीदवार बनाया है। शुरुआती दौर में उन्होंने कई फिल्मों में साइड हीरो का किरदार निभाया और फिर राजश्री प्रोडक्शन ने अरुण गोविल को फिल्म ‘सावन को आने दो’ में ब्रेक दिया। धारावाहिक ‘रामायण’ में राम की भूमिका में लोगों ने अभिनेता को काफी पसंद किया। आलम ये था कि लोग उन्हें असल में भगवान राम मानने लगे।

भाजपा की वरिष्ठ नेता और मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ धारावाहिक में ‘तुलसी’ का किरदार निभाकर हर घर में लोकप्रिय हो गईं। वे उन चंद कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी स्क्रीन लोकप्रियता को राजनैतिक सफलता में बदल दिया। हालांकि अब वो टीवी की दुनिया से अलग एक बड़ी राजनेता के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने 2019 के चुनाव में अमेठी से कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को हरा कर सबको चौंका दिया था। वह अपने क्षेत्र अमेठी में लगातर सक्रिय हैं। भाजपा ने उन्हें एक बार फिर अमेठी से ही अपना प्रत्याशी बनाया है।

पिछले कुछ सालों से देखने को मिला है कि फिल्मी कलाकार अपनी राजनीतिक राय खुलेआम देने से हिचकते नहीं है। इसके पहले उनकी लोकप्रियता के आधार पर टिकट दिया जाता था। चाहे विनोद खन्ना हों, धर्मेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा हों, लेकिन उसके बाद देखने को मिला कि जिस प्रकार से पॉलिटिकल फिल्में बनने का चलन शुरू हुआ, जो लोग उन फिल्मों में रहते हैं वो लोग राजनीति से प्रेरित बयान ऑफ द स्क्रीन भी देते हैं। चाहे वो विवेक अग्निहोत्री हों, कंगना रनौत हों या फिर अनुपम खेर। इनकी फिल्मी अपील और राजनीतिक झुकाव उनको एक आईडियल उम्मीदवार बनाता है।

क्या प्रत्याशियों के सिलेक्शन में अखिलेश यादव को हो रही है समस्या ?

वर्तमान में अखिलेश यादव को प्रत्याशियों के सिलेक्शन में समस्या हो रही है! लोकसभा चुनाव के लिए सत्तारूढ़ बीजेपी ने पूरा जोर लगा दिया है। पहले चरण के मतदान में महज कुछ दिन ही बचे रह गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ की तरफ से ताबड़तोड़ जनसभाएं की जा रही हैं। वहीं सियासी लिहाज से सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की स्थिति कन्फ्यूजन की बनी हुई है। राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा है कि सपा और कांग्रेस का विपक्षी गठबंधन अभी तक उधेड़बुन में ही हैं। अखिलेश यादव ने आठ से नौ जगहों पर प्रत्याशी बदल दिए। उनके कन्फ्यूजन की स्थिति पर सत्तारूढ़ भाजपा भी निशाना साधने और मौज लेने से पीछे नहीं रह रही है। इंडिया गठबंधन के तहत शीट शेयरिंग में कांग्रेस 17 और समाजवादी पार्टी 63 सीटों पर उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस की तरफ से अभी भी कई सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया जाना बाकी है। इनमें अमेठी और रायबरेली जैसी गांधी परिवार का गढ़ मानी जाने वाली सीटें भी शामिल हैं। लेकिन सपा ने उम्मीदवारों में लगातार बदलाव करते हुए असमंजस की स्थिति बना दी है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में चुनाव से ऐन पहले कुछ सीटों पर कैंडिडेट्स का नाम बदल रही है। पार्टी यहां 8 सीटों पर कई बार अपने उम्मीदवारों की ही अदला बदली में फंसी हुई है। राजनीतिक विश्लेषक अखिलेश के इस कदम को सोची समझी रणनीति का हिस्सा बताते हैं। वहीं कई लोग इसे सपा की कन्फ्यूज पॉलिटिक्स का हिस्सा करार देते हैं।

समाजवादी पार्टी की तरफ से मेरठ, नोएडा, बागपत, बदायूं, मुरादाबाद, रामपुर, मिश्रिख के बाद अब लखनऊ में भी सपा के कैंडिडेट पर रार मची है। अखिलेश ने चुनाव के लिए पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का जो फॉर्म्युला सेट किया, उसी में पलीता लगता नजर आ रहा है। कई सीटों पर सपा अपने ही चक्रव्यूह में फंसी नजर आ रही है। एक बार जिस प्रत्याशी को टिकट दिया जाता है, फिर उसको लेकर पार्टी में विद्रोह की स्थिति के मद्देनजर दूसरे को टिकट दे दिया जाता है। मेरठ लोकसभा सीट में सबसे पहले अखिलेश ने सीनियर वकील भानु प्रताप सिंह को टिकट दिया। फिर विधायक अतुल प्रधान को प्रत्याशी बनाया गया। अतुल ने नामांकन कर दिया। लेकिन 24 घंटे बाद फिर टिकट बदलकर सुनीता वर्मा को दिया गया। ऐसे ही गौतमबुद्धनगर सीट से 16 मार्च को महेंद्र नागर प्रत्याशी बने। फिर 20 मार्च को उनकी जगह राहुल अवाना को टिकट दिया गया। 28 मार्च को एक बार फिर महेंद्र नागर प्रत्याशी बना दिए गए। कुछ ऐसा ही हाल बागपत में भी हुआ। यहां पहले जाट बिरादरी के मनोज चौधरी को सपा का टिकट मिला। फिर गुरुवार को प्रत्याशी बदलकर अमरपाल शर्मा को मैदान में उतारा गया। मुरादाबाद में भी 24 मार्च को वर्तमान सांसद एसटी हसन को टिकट मिला। 26 को उन्होंने पर्चा भरा। फिर 27 को विधायक रुचि वीरा को सिंबल देकर नामांकन करवा दिया गया। लखनऊ में भी रविदास मेहरोत्रा की जगह दूसरे प्रत्याशी को टिकट दिए जाने की चर्चा उठने लगी है।

उधर बदायूं में शिवपाल यादव भी अपने बेटे को विरासत सौंपने की जुगत में लगे हुए हैं। यहां पहले धर्मेंद्र यादव को प्रत्याशी बनाया गया था। फिर धर्मेंद्र को आजमगढ़ भेजकर यहां से शिवपाल यादव को प्रत्याशी बनाया गया। अब शिवपाल अपनी जगह बेटे आदित्य यादव के लिए मैदान बनाने में जुटे हैं। ऐसे ही मिश्रिख सीट के लिए 19 फरवरी को रामपाल राजवंशी को टिकट मिला। 16 मार्च को उनके बेटे मनोज राजवंशी उम्मीदवार बने। अब मनोज की पत्नी संगीता उम्मीदवार हैं। बिजनौर सीट पर भी प्रत्याशी को लेकर असमंजस की स्थिति रही। यहां 15 मार्च को यशवीर सिंह को टिकट दिया गया। लेकिन फिर 24 मार्च को बदलकर दीपक सैनी को प्रत्याशी बना दिया गया। आजम खान के गढ़ रामपुर में भी सपा को असमंजस की स्थिति का सामना करना पड़ा। दिल्ली के मौलाना मोहीबुल्लाह नदवी को उम्मीदवार बनाया गया है। हालांकि यहां आजम कैम्प की तरफ से विरोध दर्ज कराया गया। आसिम रजा ने भी नामांकन कर दिया।

दो साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में भी टिकटों को लेकर सपा में अनिर्णय की स्थिति देखने को मिली थी। अवध, पूर्वांचल से लेकर पश्चिम तक उम्मीदवार घोषित होते रहे, टिकट कटते रहे और फिर नए नाम जुड़ते रहे। इलाहाबाद, आगरा, लखनऊ, अमरोहा, मथुरा, गोंडा, अमेठी, उरई, कालपी, संत कबीरनगर, देवरिया, भदोही आदि जिलों की सीटों पर नामों की उठापटक खूब चली, 2022 में हाल यह रहा कि अधिकतर सीटों पर सपा को हार का सामना करना पड़ा। स्थिति यह रही कि बाद में सपा ने प्रत्याशियों की आधिकारिक सूची जारी करना ही बंद कर दी। सीधे उम्मीदवार को फार्म ए और बी जारी किए जाने लगे। कुछ ऐसी ही रस्साकशी इस बार लोकसभा में भी देखने को मिल रही है।

आखिर क्यों बढ़ रहा है लगातार सोने का भाव?

आज हम आपको बताएंगे कि लगातार सोने का भाव क्यों बढ़ रहा है !सोना भारतीय बाजारों में फिलहाल 7000 रुपया प्रति ग्राम से भी ज्यादा महंगा बिक रहा है। ध्यान रहे, डॉलर और सोने के भाव के बीच उलटा अनुपात काम करता है। दुनिया में इन दोनों को सबसे ज्यादा भरोसेमंद समझा जाता है। वित्तीय संस्थाएं और अमीर संपत्ति सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों शक्लों में जोड़ते हैं। पिछले दो साल में, खासकर इधर के छह महीनों में सोने की कीमतों का तेजी से बढ़ना समझ में आता है। दुनिया में दो लड़ाइयां चल रही हैं, जिनके फैलने का डर बना हुआ है। विश्व अर्थव्यवस्था में जब भी डर बढ़ता है, सोने की खरीद बढ़ जाती है। फिर भी महीने भर के अंदर सोने का 60 हजार रुपया प्रति तोले से सीधा 20% चढ़कर 72 हजार रुपया तोले पर पहुंच जाना समझ से परे है। कोई बड़ी हलचल सतह के नीचे चल रही है, जिस पर ज्यादा खबरें नहीं आ रही हैं। अलबत्ता, अमेरिकी वित्त सचिव जेनेट येलेन का बिना किसी गर्जन-तर्जन के तीन दिन चीन में जाकर बैठना कुछ संकेत जरूर दे रहा है। इधर, एक आंकड़ा चर्चा में है कि ब्रिक्स देशों के सरकारी खजाने में 2008 की मंदी के समय 1,500 टन सोना था, जो अभी 6,600 टन के आसपास पहुंच गया है।

ध्यान रहे, यह आंकड़ा इस साल की शुरुआत में ब्रिक्स में आए पांच नए देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, इजिप्ट और इथियोपिया को जोड़कर नहीं निकाला गया है। पांचों पुराने ब्रिक्स देशों- भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का ही यह आंकड़ा है। 238 टन सोना तो चीन ने सरकारी इस्तेमाल के लिए अभी, जनवरी 2024 के सिर्फ एक महीने में खरीदा है। ब्रिक्स के खजाने में सोना बढ़ने की वजह यह बताई जा रही है कि आपसी कारोबार में डॉलर का इस्तेमाल अब वे बिल्कुल ही बंद कर देंगे। यह सही है कि ब्रिक्स की समानांतर मुद्रा खड़ी करके डॉलर को सीधी टक्कर देने की बात अभी सिर्फ रूसी कर रहे हैं, जबकि बाकी ब्रिक्स देश ऐसे किसी अतिरेक से बचना चाहते! कुछ तो इसलिए कि दुनिया की नंबर 1 अर्थव्यवस्था से पंगा लेने में समझदारी नहीं है। कुछ इसलिए भी क्योंकि उनकी राष्ट्रीय संपदा का 10-20% हिस्सा डॉलर या अमेरिकी बॉन्ड की शक्ल में ही है। उनकी किसी हरकत से डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक कमजोर होता है तो यह अपनी रकम अपने हाथ से जला देने जैसा होगा। लेकिन एक बात तय है कि इस तरह की एक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिसके नतीजे देर-सबेर आने ही आने हैं।

ब्रिक्स के अलावा कई और देश भी अभी गैर-डॉलर कारोबार में जाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनैंशल टेलिकम्युनिकेशन (स्विफ्ट) देशों के आर-पार मुद्रा की आवाजाही की एक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली है। इसका नियंत्रण अमेरिका के हाथ में है, लेकिन इसका इस्तेमाल उसे दंड के औजार या दबदबे के हथियार के रूप में नहीं करना चाहिए था।यह काम 2014 में रूस के खिलाफ बराक ओबामा ने किया। फिर डॉनल्ड ट्रंप ने इसे चीन के खिलाफ आजमाने की धमकी दी और अभी जो बाइडन ने रूस को इससे बाहर ही कर दिया। इसका जवाब रूसियों ने SPFS और चीनियों ने CIPS के रूप में खोजा, जिसका इस्तेमाल कई देशों से व्यापार में हो रहा है।

रही बात ब्रिक्स मुद्रा की तो यह उतनी आसान नहीं है। ब्रिक्स की अध्यक्षता अभी रूस के पास है और उसका प्रस्ताव बिटकॉइन आदि जैसी ब्रिक्स की एक डिजिटल मुद्रा लॉन्च करने का है। ध्यान रहे, अभी ब्रिक्स के दस देश मिलाकर दुनिया के 42% तेल का उत्पादन करते हैं। साढ़े तीन अरब, यानी दुनिया की लगभग आधी आबादी उनके पास है, जो तकरीबन 29% ग्लोबल GDP का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिक्स में भीतरी तनाव भी हैं। चीन के स्वाभाविक प्रभुत्व वाले इस खेमे का अभिन्न अंग बनकर रहना भारत के लिए संभव नहीं है, न ही ईरान से नजदीकी बनाए रखना सऊदी अरब और UAE के लिए बहुत आसान होने वाला है। फिर भी मामला यह है कि ब्रिक्स का, और उसके पीछे दुनिया के कई देशों का एक अलग वित्तीय ढांचा समय की मांग है। एक ग्लोबल मुद्रा के रूप में डॉलर को ‘फिएट मनी’ यानी सिर्फ हुकुम पर चलने वाली मुद्रा कहा जाता है, जिसके पीछे अमेरिकी चमक-दमक की खबरों के अलावा स्थायी मूल्य वाला कोई ठोस आधार नहीं है।

इस बैठक में तय किया गया था कि डॉलर की कीमत सोने के साथ 35 डॉलर प्रति औंस के हिसाब से बंधी रहेगी और सम्मेलन में शामिल 44 देशों की मुद्राएं डॉलर के साथ इस तरह जुड़ी रहेंगी कि उनकी सापेक्ष कीमतों में 1% से ज्यादा उतार-चढ़ाव न आने पाए। वियतनाम युद्ध के चलते यह व्यवस्था 1971 में ध्वस्तप्राय दिखने लगी और 1976 में इसे समाप्त कर दिया गया। उसके बाद से दुनिया की सारी मुद्राएं आगे-पीछे ‘फ्री-फ्लोट’ कर रही हैं। यह व्यवस्था वैश्विक आम सहमति से ही चल सकती थी, जो काफी पहले भंग हो चुकी है। हालत यह है कि अमेरिका और उसके करीबी मुल्कों के प्रतिबंधों से कई देश परेशान हैं। ब्रिक्स के रूप में इन देशों को इस दबदबे से मुक्त होने की गुंजाइश नजर आ रही है। चुनौती यही है कि ब्रिक्स की विनिमय प्रणाली बनाते हुए विश्व अर्थव्यवस्था को कोई बड़ा झटका न लगने पाए।

आखिर कैसे हुई गॉड पार्टिकल की खोज?

आज हम आपको बताएंगे कि गॉड पार्टिकल की खोज कैसे हुई थी ! वैज्ञानिकों ने हमेशा ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की कोशिश की है। इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण खोज हुई है, जिसे ‘गॉड पार्टिकल’ या हिग्स बोसॉन के नाम से जाना जाता है। गॉड पार्टिकल का असली नाम ‘हिग्स बोसोन’ है। यह ब्रह्मांड के निर्माण में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला मूल कण है। इसकी खोज 2012 में स्विटजरलैंड के जिनेवा स्थित यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च नाम की संस्था के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नामक विशाल मशीन में हुई थी। 1964 में सबसे पहले इस कण के अस्तित्व की भविष्यवाणी करने वाले वैज्ञानिक पीटर हिग्स का सोमवार को 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्हीं के नाम पर गॉड पार्टिकल को हिग्स बोसोन नाम दिया गया। दुनिया की हर चीज, चाहे वो इंसान हो या पेंसिल, किसी न किसी मात्रा में द्रव्यमान रखती है। यानी हर चीज का एक वजन होता है। लेकिन आखिर चीजों को ये वजन मिलता कहां से है? यही वो सवाल है जिसका जवाब गॉड पार्टिकल देता है। दरअसल, गॉड पार्टिकल एक खास तरह का कण है जिसे ‘बोसोन’ कहते हैं। ब्रह्मांड में हर जगह एक तरह का ऊर्जा का क्षेत्र मौजूद है, जिसे ‘हिग्स फील्ड’ कहा जाता है। गॉड पार्टिकल इसी हिग्स फील्ड के साथ मिलकर काम करता है। जब कोई दूसरा कण इस फील्ड से होकर गुजरता है, तो गॉड पार्टिकल के साथ उसकी टक्कर होती है। यही टक्कर बाकी कणों को उनका जाना-पहचाना वजन देती है। कुछ लोग इसे ब्रह्मांड के निर्माण में अहम भूमिका निभाने की वजह से इसे इसी नाम से पुकारने लगे। ये नाम किसी धार्मिक अर्थ में नहीं दिया गया है, बल्कि ब्रह्मांड के नियमों को समझने में इसकी अहमियत को दर्शाता है। वैज्ञानिकों ने तो इसे ‘हिग्स बोसोन’ नाम ही देना पसंद किया।अगर इन्हें गॉड पार्टिकल से वजन न मिले तो ये कण प्रकाश की रफ्तार से चलते रहें!

गॉड पार्टिकल की खोज विज्ञान के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह ‘स्टैंडर्ड मॉडल ऑफ पार्टिकल फिजिक्स’ (SM) का एक अहम हिस्सा है। एसएम ब्रह्मांड के मूलभूत कणों और उनको चलाने वाले बलों को समझाने वाला सिद्धांत है। गॉड पार्टिकल की खोज ने एसएम को सही साबित करने में मदद की है। इससे हमें ये समझने में भी मदद मिली है कि आखिर ब्रह्मांड बना कैसे होगा और उसका विकास कैसा हुआ। इस खोज का मतलब ये भी है कि भविष्य में विज्ञान के नए दरवाजे खुल सकते हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि गॉड पार्टिकल के बारे में और ज्यादा जानने से भौतिकी के नए सिद्धांत सामने आ सकते हैं और ब्रह्मांड के और भी रहस्य खुल सकते हैं! गॉड पार्टिकल’ नाम थोड़ा अजीब जरूर लगता है, लेकिन कुछ लोग इसे ब्रह्मांड के निर्माण में अहम भूमिका निभाने की वजह से इसे इसी नाम से पुकारने लगे। ये नाम किसी धार्मिक अर्थ में नहीं दिया गया है, बल्कि ब्रह्मांड के नियमों को समझने में इसकी अहमियत को दर्शाता है। वैज्ञानिकों ने तो इसे ‘हिग्स बोसोन’ नाम ही देना पसंद किया।

नहीं, गॉड पार्टिकल इतना छोटा कण है कि उसे नंगी आंखों से तो क्या, किसी भी माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता। ये कण सिर्फ विशाल प्रयोगों की मदद से ही पता लगाए जा सकते हैं। लेकिन गॉड पार्टिकल के बारे में सीखना और इसे समझना हर किसी के लिए फायदेमंद हो सकता है। इससे हमें इस ब्रह्मांड को बनाने वाले नियमों को जानने में मदद मिलती है। साथ ही यह जिज्ञासा जगाता है कि आखिर ब्रह्मांड कैसे बना और इसमें हमारी जगह क्या है! गॉड पार्टिकल के बारे में वैज्ञानिकों को अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। वे इसके द्रव्यमान, स्पिन जैसी खूबियों का अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही ये भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ये दूसरे कणों और ब्रह्मांड के नियमों के साथ कैसे जुड़ा हुआ है। गॉड पार्टिकल इसी हिग्स फील्ड के साथ मिलकर काम करता है। जब कोई दूसरा कण इस फील्ड से होकर गुजरता है, तो गॉड पार्टिकल के साथ उसकी टक्कर होती है। यही टक्कर बाकी कणों को उनका जाना-पहचाना वजन देती है। अगर इन्हें गॉड पार्टिकल से वजन न मिले तो ये कण प्रकाश की रफ्तार से चलते रहें!दरअसल, गॉड पार्टिकल की खोज एक बड़ी उपलब्धि जरूर थी, लेकिन ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की ये बस एक शुरुआत है। वैज्ञानिक अभी भी कई सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं। उदाहरण के लिए, क्या गॉड पार्टिकल जैसा कोई और कण भी मौजूद है?

नरेंद्र मोदी ने गेमिंग समुदाय के कुछ लोकप्रिय चेहरों के साथ समय बिताया.

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नई दिल्ली, 13 अप्रैल: लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मतदाताओं के साथ-साथ ऑनलाइन गेमर्स का दिल जीतने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने शुक्रवार को कई गेमर्स से मुलाकात की. उनका वीडियो शनिवार को एक्स-हैंडल पर प्रकाशित हुआ था। ‘गेम ऑन’ विद मोदी’ शीर्षक से हुई चर्चा में गेमिंग जगत के बारे में कई नई जानकारियां सामने आईं। मोदी ने कहा कि वह गेमिंग इंडस्ट्री को बेहतर बनाने के लिए काम करेंगे, ताकि क्रिएटर्स बेहतर हो सकें
कर सकता है

पिछले कुछ वर्षों में, मैदान पर खेलने की तरह ही घर पर मोबाइल या कंप्यूटर पर गेम खेलना बेहद लोकप्रिय हो गया है। खासकर कोरोना काल में युवा समाज का एक बड़ा हिस्सा इसकी लोकप्रियता से आकर्षित हुआ है. कई लोग इस गेम के आदी भी हो गए हैं. जिसका असर उनकी शिक्षा पर पड़ता है. जैसे-जैसे गेम खेलने से पैसे कमाने के नए रास्ते खुले हैं, हिंसा और हत्या जैसी घटनाएं भी बढ़ी हैं। कई माता-पिता इसे लेकर चिंतित हैं। लोकसभा चुनाव के लिए जहां सभी पार्टियों के नेता प्रचार में जुटे हैं, वहीं मोदी ने इन गेमर्स का हौसला बढ़ाया. उन्होंने कहा, ”आज अनगिनत बच्चों और युवाओं ने इस पेशे को चुना है. आप उन्हें रोक नहीं सकते. लेकिन आप उन्हें हमेशा बेहतर दिशा में मार्गदर्शन कर सकते हैं।” लोकसभा चुनाव का पहला चरण शुक्रवार को होगा। उससे चार दिन पहले बीजेपी ने अपना घोषणापत्र जारी किया था. उनका ‘संकल्पपत्र’ ‘मोदी की गारंटी’ पर जोर देता है. वहीं बताया गया है कि मोदी ने पार्टी के घोषणापत्र में महिलाओं, युवा समुदाय, किसानों और गरीब लोगों को विशेष महत्व दिया है। हिन्दी में इन चारों वर्गों के प्रथमाक्षरों को मिलाकर ‘ज्ञान’ बनता है। पार्टी घोषणापत्र जारी होने के बाद बोलने के लिए खड़े हुए मोदी ने कहा, ”मोदी की गारंटी है कि मुफ्त राशन वितरण की योजना अगले 5 साल तक जारी रहेगी.” उन्होंने यह भी कहा कि अगर बीजेपी सत्ता में लौटी तो पाइपलाइन के जरिए घरों तक गैस पहुंचेगी.

इसके अलावा मोदी ने बीजेपी के घोषणापत्र में किए गए वादे का हवाला देते हुए कहा कि अगर पार्टी केंद्र में तीसरी बार सत्ता में आई तो 70 साल से ऊपर के सभी लोगों को ‘आयुष्मान भारत’ योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिलेगा. उन्होंने यह भी बताया कि ‘प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ परियोजना मुफ्त बिजली सेवाओं के साथ-साथ बिजली बेचने का अवसर भी प्रदान करेगी। मोदी ने मुद्रा योजना के तहत कर्ज की सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये करने का वादा किया है. प्रधानमंत्री ने कहा कि इस प्रोजेक्ट में करोड़ों देशवासियों ने पहल की है.

मोदी ने बंदे भारत को लेकर भी बड़ा ऐलान किया. कहा, ”बीजेपी वंदे भारत स्लीपर, वंदे भारत चेयरकार और वंदे भारत मेट्रो को देश के कोने-कोने में फैलाएगी.” उन्होंने कहा, अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन का काम भी पूरे उत्साह से चल रहा है। रविवार को देशवासियों को मोदी की ‘गारंटी’, उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में चलेगी एक-एक बुलेट ट्रेन. उन्होंने कहा कि उनका सर्वे का काम भी शुरू हो गया है.

बीजेपी के वादों में महिलाओं और किसानों को खास अहमियत दी गई है. उन्होंने किसानों को उनकी 100 दिन की कार्य योजना सहित उचित समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी सुरक्षा देने का वादा किया। उन्होंने आवास योजना के तहत देश में तीन करोड़ और घर बनाने का भी वादा किया है.

बीजेपी के ‘संकल्पपत्र’ में एक देश, एक वोट, समान नागरिक संहिता, 2036 में ओलंपिक की मेजबानी के लिए टेंडर मंगाने की बात की गई है, लेकिन मोदी के भाषण में जनोन्मुखी परियोजनाओं से जुड़े शोध को महत्व दिया गया. वर्ष 2025 को ‘जनजाति गौरव वर्ष’ के रूप में मनाने का वादा किया गया है। माना जा रहा है कि यह फैसला देश के पॉपुलर वोट को ध्यान में रखकर लिया गया है। भाषण के अंत में मोदी ने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का वादा किया. बीजेपी के घोषणापत्र में प्रधानमंत्री के अलावा देश में भर्ती भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सख्त कानून लाने का वादा किया गया है, साथ ही बीजेपी के अखिल भारतीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, घोषणापत्र समिति के प्रमुख और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री भी शामिल हैं. रविवार सुबह घोषणापत्र जारी करने के समारोह में मंत्री निर्मला सीतारमण और अन्य शीर्ष भाजपा नेता मौजूद थे।