Thursday, March 5, 2026
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अगर मोदी दोबारा बने प्रधानमंत्री तो क्या होगा?

आज हम आपको बताएंगे कि अगर मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने तो क्या परिवर्तन होंगे और उनका फोकस किसी और है! लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी लगातार कह रहे हैं कि उन्हें तीसरा कार्यकाल मिलना निश्चित है। पीएम मोदी के अनुसार वह जमीनी स्तर पर काम करना चाहते हैं। ऐसे में शीर्ष सरकारी अधिकारी नई व्यवस्था के लिए एक कार्य योजना तैयार कर रहे हैं। इसमें बुजुर्गों के पेंशन का दायरा बढ़ाने, मंत्रालयों की संख्या में कटौती, भारतीय मिशन की संख्या में बढ़ोतरी, ई-वाहनों की बिक्री बढ़ाने समेत अन्य बातों पर फोकस रहेगा। कार्ययोजना के अनुसार अगले छह वर्षों में भारतीय मिशनों की संख्या को 20% बढ़ाकर 150 करना, बुनियादी ढांचे में अधिक निजी निवेश और प्राथमिकता वाली परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए एक तंत्र विकसित करना शामिल है। इस महीने कैबिनेट सचिव द्वारा बुलाई गई बैठकों के दौरान चर्चा किए जाने वाले एक मसौदा पत्र में 2030 तक पेंशन लाभ वाले वरिष्ठ नागरिकों की हिस्सेदारी को 22% से दोगुना से अधिक बढ़ाकर 50% करने का प्रस्ताव है। महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी को 37% से बढ़ाकर 50% करना है, जो वर्तमान वैश्विक औसत 47% से अधिक है। ई-वाहनों पर जोर वाहन बिक्री में उनकी हिस्सेदारी को 7% से बढ़ाकर 30% से अधिक करने के लक्ष्य से स्पष्ट है।, दुनियाभर में भारतीय मिशनों की संख्या को 20% बढ़ाकर 150 करना, वर्तमान में 54 मंत्रालयों की संख्या में कमी पर विचार, बुनियादी ढांचे में अधिक निजी निवेश और प्राथमिकता वाली परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए एक तंत्र विकसित करना

2030 तक पेंशन लाभ वाले वरिष्ठ नागरिकों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 50% करना, ई-वाहनों की हिस्सेदारी 7% से बढ़ाकर 30% से अधिक करने का लक्ष्य, 2030 तक अदालतों में लंबित मामलों को 5 करोड़ से घटाकर 1 करोड़ से कम करना,बढ़ाकर 3% करने पर भी चर्चा चल रही है। विजन दस्तावेज़ में इस अवधि के दौरान विश्वव्यापी हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी को आधा करने की परिकल्पना की गई है। इससे पता चलता है कि सरकार रक्षा उपकरणों के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के अपने प्रयासों को दोगुना करने का इरादा रखती है। निचली न्यायिक प्रणाली में मामलों के निपटान के समय को 2,184 दिनों से घटाकर 1,000 दिन करना, अगले छह वर्षों में न्यायपालिका में रिक्तियों को, 22% से घटाकर 10% करने की योजना

रक्षा बजट की हिस्सेदारी को 2% से बढ़ाकर 3% करने पर भी चर्चा, 2030 तक औद्योगिक क्षेत्र का जीडीपी में योगदान को 28% से बढ़ाकर 32.5% करने का लक्ष्य

वर्तमान में 5 करोड़ से 2030 तक अदालतों में लंबित मामलों को घटाकर 1 करोड़ से कम करने और निचली न्यायिक प्रणाली में मामलों के निपटान के समय को 2,184 दिनों से घटाकर 1,000 दिन करने के लिए चर्चा चल रही है। उच्च न्यायालयों के मामले में, 2030 तक वर्तमान 1,128 दिनों से निपटान समय को घटाकर 500 दिनों से कम करने का लक्ष्य है, जिसके लिए अदालतों में अधिक न्यायाधीशों की आवश्यकता होगी। अगले छह वर्षों में न्यायपालिका में रिक्तियों को 22% से घटाकर 10% करने की योजना है। लक्ष्य बताते हैं कि ये नीति निर्माताओं के लिए फोकस क्षेत्र होंगे, जिनमें मंत्रालय मतदान समाप्त होने से पहले बारीकियों को भरेंगे। ध्यान 2030 के लिए मध्यम अवधि के लक्ष्य और 2047 के लिए दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित करने पर है। वर्तमान में, जीडीपी के 2.4% से 3% तक रक्षा खर्च बढ़ाने और अनुसंधान एवं विकास के लिए रक्षा बजट की हिस्सेदारी को 2% से बढ़ाकर 3% करने पर भी चर्चा चल रही है। विजन दस्तावेज़ में इस अवधि के दौरान विश्वव्यापी हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी को आधा करने की परिकल्पना की गई है। इससे पता चलता है कि सरकार रक्षा उपकरणों के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के अपने प्रयासों को दोगुना करने का इरादा रखती है।

आर्थिक मोर्चे पर, लक्ष्य ऑटोमोबाइल, कपड़ा, फार्मा, पर्यटन और सेवाओं जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने और विनिर्माण और निर्यात की हिस्सेदारी बढ़ाने की ओर इशारा करते हैं। वर्तमान वैश्विक औसत 47% से अधिक है। ई-वाहनों पर जोर वाहन बिक्री में उनकी हिस्सेदारी को 7% से बढ़ाकर 30% से अधिक करने के लक्ष्य से स्पष्ट है।, दुनियाभर में भारतीय मिशनों की संख्या को 20% बढ़ाकर 150 करना, वर्तमान में 54 मंत्रालयों की संख्या में कमी पर विचार, बुनियादी ढांचे में अधिक निजी निवेश और प्राथमिकता वाली परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए एक तंत्र विकसित करना2030 तक औद्योगिक क्षेत्र का जीडीपी में योगदान को 28% से बढ़ाकर 32.5% करने का लक्ष्य है। हालांकि इनमें से कई मुद्दों पर अतीत में भी चर्चा की गई है, चुनाव घोषणा से पहले पीएम के साथ चर्चा ने उन्हें फिर से एजेंडे में डाल दिया है। उदाहरण के लिए, सचिवों और मंत्रालयों के साथ अपनी बैठक के दौरान, सिविल सेवकों ने परिवहन क्षेत्र के मंत्रालयों के बीच एकीकरण का आह्वान किया था।

क्लाइमेट चेंज पर क्या विचार है युवाओं के?

आज हम आपको बताएंगे कि क्लाइमेट चेंज पर युवाओं के विचार क्या है! चुनावों के वक्त हर राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर अपने मेनिफेस्टो को अपने वादों की पिटारी की तरह दिखाने की कोशिश करता है। दूसरे मुद्दों की ही तरह अब पर्यावरण और क्लाइमेट चेंज का मुद्दा ऐसा मामला है, जो राजनीतिक पार्टियों के मेनिफेस्टो में पिछले लोकसभा चुनाव से ही एंट्री मार चुका है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से अपने घोषणापत्रों में इन मुद्दों के इर्द-गिर्द वादे किए। यहां तक कि 2019 के चुनाव के बाद जो लोकसभा सामने आई, उसमें क्लाइमेट चेंज का मुद्दा कई बार ज़ोर-शोर से गूंजा भी। कई नेताओं ने पार्टी लाइन से इतर रिन्यूएबल एनर्जी और पर्यावरण में बदलाव से उनके क्षेत्रों में हो रही दिक्कतों और उपायों के बारे में बहसें भी कीं और सवाल भी पूछे। पिछले दिनों 7 शहरों के फर्स्ट टाइम वोटर्स के एक सर्वे में पर्यावरण का मुद्दा तीसरे ऐसे बड़े मुद्दे की तरह सामने आया, जिसके आधार पर पहली बार वोटर बने युवा वोट डालने जाएंगे। एनवायरमेंट थिंक टैंक ASAR और क्लाइमेट एजुकेटर्स नेटवर्क के इस साझा सर्वे में 87 फीसदी युवाओं ने बेरोजगारी को पहले, आर्थिक दिक्कतों को दूसरे तो क्लाइमेट चेंज की चुनौती को तीसरे नबंर पर रखा। यानी भारतीय वोटरों का सबसे बड़ा तबका, यानी युवा वर्ग के लिए ये प्राथमिकताओं वाला मुद्दा है।

173 साल के इतिहास में 2023 अब तक का सबसे बड़ा गर्म साल रहा है। साल 2021 में जलवायु से जुड़ी आपदाओं की वजह से भारत में 4.9 मिलियन लोग आंतरिक विस्थापन का भी शिकार हुए, ये आंकड़ा महज फिलीपींस और चीन से ही पीछे है। ऐसे में दुनिया भर के राजनीतिक डिस्कोर्स में क्लाइमेट चेंज एक अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन अब 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जबकि राजनीतिक दल अपने मेनिफेस्टो लेकर नहीं आए हैं, मेनिफेस्टो सामने आने ही वाले हैं।

ऐसे में सवाल ये है कि इस बार क्लाइमेट चेंज और पर्यावरण को लेकर राजनीतिक दल किस तरह के वादे करने वाले हैं। क्या पार्टियां जलवायु परिवर्तन की चुनौती से पार पाने के लिए नई नीतियों पर बात करेंगी? हैदराबाद में रहने वाली ग्रीन पॉलिटिकल एक्टिविस्ट मधुबंती सेन कहती हैं, ‘पॉलिटिकल पार्टियों के लिए ये जरूरी है कि वो क्लाइमेट चेंज और पर्यावरण मेनिफेस्टो का हिस्सा बनाएं। कई नेताओं ने पार्टी लाइन से इतर रिन्यूएबल एनर्जी और पर्यावरण में बदलाव से उनके क्षेत्रों में हो रही दिक्कतों और उपायों के बारे में बहसें भी कीं और सवाल भी पूछे। पिछले दिनों 7 शहरों के फर्स्ट टाइम वोटर्स के एक सर्वे में पर्यावरण का मुद्दा तीसरे ऐसे बड़े मुद्दे की तरह सामने आया, जिसके आधार पर पहली बार वोटर बने युवा वोट डालने जाएंगे।ये ऐसी चिंताएं हैं, जो भारत ही नहीं पूरी दुनिया पर असर डाल रही हैं। इस तरह के मुद्दों को संबोधित करना प्रभावशाली गवर्नेंस के लिए जरूरी है।’

बीजेपी ने साल 2019 के घोषणापत्र में 2024 के लक्ष्य के साथ गांवों तक बिजली लाने, जल सरंक्षण और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना के भीतर 102 प्रदूषित शहरों पर जोर देने का वादा किया था। सरकार का कहना है कि ‘जल जीवन मिशन’ के तहत ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन से जोड़ा गया है। इसके साथ ही, इस साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ग्रीन इकॉनमी के तहत कई ऐलान किए, जिसमें 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लक्ष्य की घोषणा के साथ-साथ दूसरी घोषणाएं भी शामिल थीं। लेकिन पार्टी ने इस बजट में भी ग्रीन बोनस का जिक्र नहीं किया। लंबे अरसे से चली आ रही हिमालय क्षेत्र की ये मांग पूरी करने का वादा पार्टी के पिछले मेनिफेस्टो में शामिल था।

साल 2019 में कांग्रेस ने अपने क्लाइमेट चेंज की चुनौती से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय जलवायु आयोग के साथ साथ राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की बात की थी।पार्टियां जलवायु परिवर्तन की चुनौती से पार पाने के लिए नई नीतियों पर बात करेंगी? हैदराबाद में रहने वाली ग्रीन पॉलिटिकल एक्टिविस्ट मधुबंती सेन कहती हैं, ‘पॉलिटिकल पार्टियों के लिए ये जरूरी है कि वो क्लाइमेट चेंज और पर्यावरण मेनिफेस्टो का हिस्सा बनाएं। कई नेताओं ने पार्टी लाइन से इतर रिन्यूएबल एनर्जी और पर्यावरण में बदलाव से उनके क्षेत्रों में हो रही दिक्कतों और उपायों के बारे में बहसें भी कीं और सवाल भी पूछे। इसके अलावा मिट्टी की क्वॉलिटी बेहतर करने की जरूरत पर भी बल दिया था।

बीजेपी के स्थापना दिवस पर क्या बोले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के स्थापना दिवस पर एक बयान दिया है! केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी का आज 45वां स्थापना दिवस है। 6 अप्रैल 1980 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी का गठन हुआ था। बीजेपी के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को बधाई दी। उन्होंने बीजेपी के 44 सालों का जिक्र भी किया। पीएम मोदी ने एक्स पर पोस्ट करते लिखा, भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस पर देशभर के मेरे कर्मठ और परिश्रमी कार्यकर्ताओं को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। आज बीजेपी की उन सभी महान विभूतियों को नमन करने का दिन है, जिन्होंने वर्षों की अपनी कड़ी मेहनत, संघर्ष और त्याग से पार्टी को सींचकर इस ऊंचाई तक पहुंचाया है। मैं आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भाजपा देश की सबसे पसंदीदा पार्टी है, जो ‘राष्ट्र प्रथम’ के मंत्र के साथ जन-जन की सेवा में जुटी है।राजनीति से मुक्त करने के लिए संकल्पबद्ध है। दशकों तक शासन करने वाली पार्टियों ने इसी राजनीतिक संस्कृति को देश की पहचान बना दी थी। नए भारत में स्वच्छ और पारदर्शी शासन होने से विकास का लाभ आज बिना किसी भेदभाव के अंतिम पायदान पर खड़े गरीबों तक पहुंच रहा है।’ प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, ‘यह हम सभी के लिए गौरव की बात है कि बीजेपी अपने विकासवादी विजन, सुशासन और राष्ट्रवादी मूल्यों के प्रति हमेशा समर्पित रही है। भाजपा की सबसे बड़ी शक्ति इसके कार्यकर्ता हैं, जो 140 करोड़ देशवासियों की आकांक्षाओं को पूरा करने में दिन-रात जुटे रहते हैं। देश की युवाशक्ति भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में देखती है, जो उनके सपनों को साकार करने के साथ ही 21वीं सदी में भारत को मजबूत नेतृत्व देने में सक्षम है।’

पीएम ने कहा, ‘केंद्र हो या राज्य, हमारी पार्टी ने सुशासन को नए सिरे से परिभाषित किया है। हमारी योजनाओं और नीतियों ने देश के गरीब और वंचित भाई-बहनों को एक नई ताकत दी है। जो लोग दशकों तक हाशिए पर रहे थे, उन्हें अपने लिए भाजपा में उम्मीद की बड़ी किरण दिखी। भाजपा उनकी सशक्त आवाज बनकर सामने आई। संघर्ष और त्याग से पार्टी को सींचकर इस ऊंचाई तक पहुंचाया है। मैं आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भाजपा देश की सबसे पसंदीदा पार्टी है, जो ‘राष्ट्र प्रथम’ के मंत्र के साथ जन-जन की सेवा में जुटी है।हमने हमेशा समग्र विकास के लिए काम किया है, जिससे हर देशवासी का जीवन आसान बना है।’ मोदी ने कहा, ‘हमारी पार्टी देश को भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और वोट बैंक की राजनीति से मुक्त करने के लिए संकल्पबद्ध है। दशकों तक शासन करने वाली पार्टियों ने इसी राजनीतिक संस्कृति को देश की पहचान बना दी थी। नए भारत में स्वच्छ और पारदर्शी शासन होने से विकास का लाभ आज बिना किसी भेदभाव के अंतिम पायदान पर खड़े गरीबों तक पहुंच रहा है।’

पीएम मोदी ने NDA का जिक्र करते हुए कहा, ‘हमें NDA का अभिन्न अंग होने पर भी गर्व है, क्योंकि यह गठबंधन देश की प्रगति और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को साथ लेकर भारत को आगे ले जाने में विश्वास रखता है। NDA एक ऐसा गठबंधन है, जो देश की विविधता के खूबसूरत रंगों से सजा है। हमारी यह साझेदारी बहुत महत्वपूर्ण है और मुझे पक्का विश्वास है कि आने वाले समय में हमारा यह गठबंधन और भी मजबूत होगा।’ ‘प्रधानमंत्री मोदी ने कहा,आज बीजेपी की उन सभी महान विभूतियों को नमन करने का दिन है, जिन्होंने वर्षों की अपनी कड़ी मेहनत, संघर्ष और त्याग से पार्टी को सींचकर इस ऊंचाई तक पहुंचाया है। मैं आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भाजपा देश की सबसे पसंदीदा पार्टी है, जो ‘राष्ट्र प्रथम’ के मंत्र के साथ जन-जन की सेवा में जुटी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, ‘यह हम सभी के लिए गौरव की बात है कि बीजेपी अपने विकासवादी विजन, सुशासन और राष्ट्रवादी मूल्यों के प्रति हमेशा समर्पित रही है। ‘देश की जनता-जनार्दन एक नई लोकसभा चुनने को पूरी तरह से तैयार है। मैं आश्वस्त हूं कि देशभर के मेरे परिवारजन हमें एक और कार्यकाल का आशीर्वाद देने जा रहे हैं, ताकि बीते एक दशक में विकसित भारत के लिए जो नींव तैयार की गई है, उसे नई मजबूती दी जा सके। मैं एक बार फिर भाजपा और एनडीए के अपने सभी कार्यकर्ताओं को शुभकामनाएं देता हूं, जो सरकार और जनता के बीच विकास की सबसे मजबूत कड़ी हैं।’

जब इंटरनेट के लिए तोड़ दी पिता की नाक!

हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है जहां एक इंटरनेट के लिए एक बेटे ने पिता की नाक तोड़ दी! इन दिनों ऑनलाइन गेमिंग का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया है। ऑनलाइन गेमिंग की नशा बच्चों पर सबसे ज्यादा चढ़ रहा है। दिल्ली से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 14 साल के एक लड़का ऑनलाइन गेम खेलने का इतना आदी था कि जब उसके पिता ने वाईफाई बंद करने की कोशिश की तो उसने उनकी नाक तोड़ दी। इसके अलावा एक 16 साल की लड़की ने ऑनलाइन बुलिंग से परेशान होकर खुद को चोट पहुंचा ली। एक 12 साल का लड़का ऑनलाइन गेम छोड़ना नहीं चाहता था, इसलिए वो स्कूल जाने से ही इनकार कर गया और पढ़ाई छोड़ दी। एक 28 साल का आदमी ऑनलाइन जुआ खेलने और गलत चीजों वाली वेबसाइट्स देखने में इतना डूब गया कि उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपने घर का सामान बेचकर और अपने माता-पिता के बैंक खाते से चोरी करके भी अपनी लत को पूरा करने लगा। ये सारे मामले एम्स लत संबंधी क्लिनिक के हैं, जो बताते हैं इंटरनेट की लत उतनी ही असली और खतरनाक है जितनी शराब, तंबाकू या ड्रग्स की लत होती है। स्टडी बताते हैं कि 15-16 साल के बच्चे इंटरनेट की लत के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं, इसलिए एम्स का ये क्लिनिक नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग के साथ मिलकर अगले महीने सीबीएसई स्कूलों में साइबर जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है। एम्स द्वारा बनाया गया ये कार्यक्रम साइबर सुरक्षा और डिजिटल सेहत पर ध्यान देगा। इसका मकसद शिक्षकों को यह सिखाना है कि वे कैसे बच्चों को सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करने में मदद कर सकते हैं।

एम्स के नेशनल ड्रग डिडेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर के प्रोफेसर ऑफ साइकियाट्री यतन पाल सिंह बलहारा ने टाइम्स ऑफ इंडिया को इलाज के बारे में बताया कि ‘मरीज और उनकी देखभाल करने वालों का पूरा एनालिसिस किया जाता है। इसके बाद बीमारी का पता लगाया जाता है। कुछ मामलों में ये मानसिक बीमारी मानी जाती है, तो कुछ में शराब या घबराहट जैसी दूसरी मानसिक समस्याएं भी हो सकती हैं। इलाज में आमतौर पर दवाइयां और थैरेपी दोनों शामिल होते हैं। दवाइयों से इस चीज की तलब को कम किया जाता है और दवा बंद करने के बाद होने वाली परेशानियों को दूर किया जाता है, वहीं थैरेपी से घबराहट जैसी समस्याओं और मुश्किलों से लड़ने के तरीकों को सिखाया जाता है।’

इंटरनेट की लत के शरीर पर भी कई बुरे असर होते हैं, जैसे आंखों में सूखापन, माइग्रेन, कमर दर्द, बेवक्त खाना, नींद न आना, साफ-सफाई में कमी और हाथ की कलाई में दर्द (कार्पल टनल सिंड्रोम)। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी ये लत परिवार में रिश्तों को खराब करती है। घर में लड़ाई-झगड़े होना आम हो जाता है। बच्चे गुस्से में माता-पिता से बदतमीजी करते हैं और कभी-कभी अपने कमरे में बंद भी हो जाते हैं।

ऑनलाइन जुआ खेलना 18 से 30 साल के लोगों में इंटरनेट की लत का सबसे आम रूप बन गया है। इनके पास थोड़े बहुत पैसे होते हैं और ऑनलाइन जुए के लिए आसानी से वेबसाइट मिल जाती हैं, जिसकी वजह से ये लोग इसी में उलझकर आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि नशे की लत छुड़ाने के तरीके सीधे तौर पर इंटरनेट की लत छुड़ाने में कारगर नहीं होते। बच्चों का फोन या इंटरनेट छीन लेने के बजाय उन्हें सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करना सिखाना ज़्यादा जरूरी है। उनका कहना था कि हमारा लक्ष्य टेक्नोलॉजी से दूर भागना नहीं है, बल्कि उसके साथ रहना और सीखना है। हमें डिजिटल दुनिया के साथ संतुलित और टिकाऊ रिश्ता बनाना चाहिए।

बच्चों का इंटरनेट चलाना गलत नहीं है, लेकिन इस पर ज्यादा निर्भरता खतरनाक हो सकती है। आईटीएल पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल सुधा आचार्य बताती हैं कि बच्चे अक्सर माता-पिता से झूठ बोलते हैं कि वो फोन पढ़ाई के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि सीबीएसई ने सभी स्कूलों को स्कूल परिसर और स्कूल बसों में स्मार्टफोन इस्तेमाल पर रोक लगाने का निर्देश दिया है। उन्होंने यूनेस्को की 2023 की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें बताया गया है कि टेक्नोलॉजी पढ़ाई के दायरे को तो बढ़ाती है, लेकिन स्मार्टफोन के इस्तेमाल से बच्चों पर बुरा असर भी पड़ता है, जिससे उनका ध्यान भटकता है, चीजों को सीखने और समझने की शक्ति कमजोर होती है और मानसिक सेहत भी खराब होती है, जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई भी बिगड़ सकती है।

बच्चों के इलाज में माहिर मनोचिकित्सक जितेंद्र नागपाल का कहना है कि माता-पिता और शिक्षकों को साथ मिलकर कई तरह की गतिविधियां करनी चाहिए, ताकि बच्चों की इंटरनेट की लत को कम किया जा सके। जितेंद्र नागपाल किशोरों और छोटे बच्चों की मानसिक बीमारियों के एक्सपर्ट हैं। उन्होंने बताया कि कोविड महामारी के कारण बच्चों की इंटरनेट की लत और बढ़ गई है। उन्होंने यह भी कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए, उनकी तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए। उन्हें बच्चों के साथ अच्छा समय बिताना चाहिए, ताकि बच्चे खुद को अकेला न समझें।’

आखिर कहां उपयोग होता है सबसे ज्यादा नोटा?

यह सवाल उठना लाजिमी है की सबसे ज्यादा नोटा बटन कहां उपयोग होता है! 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अरकू ने पूरी तरह से अलग नाम कमाया। इसे नोटा की धरती कहा गया। वैसे भी देश में आम चुनाव के बाद कहीं इसी नोटा पर सबसे अधिक मत पड़ते हैं तो कहीं कम।  2019 के आम चुनावों में, अराकू लोकसभा क्षेत्र ने देश में दूसरी सबसे ज्यादा NOTA वोट पड़े थे। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर लगभग 48,000 मतदाताओं ने इस विकल्प को चुना। बिहार का गोपालगंज 51,660 वोट के साथ नोटा वोट में सबसे ऊपर रहा। हालांकि NOTA वोट अराकु में चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं कर सके, क्योंकि YSRCP की गोड्डे माधवी 2 लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से जीती थीं, लेकिन नोटा वोट कुल वोटों में दूसरे स्थान पर रहा। यह मतदाताओं के असंतोष की महत्वपूर्ण उपस्थिति और प्रभाव को दर्शाता है। 2014 के आम चुनावों में भी, अराकु लोकसभा क्षेत्र, जो पूर्व गोदावरी, विशाखापत्तनम, विजयनगरम और श्रीकाकुलम के आदिवासी इलाकों में फैला है, ने आंध्र प्रदेश में किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए सबसे अधिक 16,532 नोटा वोट दर्ज किए थे।

तो भारत की प्रीमियम कॉफी की इस धरती में असंतोष क्यों उबल रहा है? हालांकि अराकु कॉफी दुनिया भर के चुनिंदा कॉफी प्रेमियों के कप तक पहुंच गई है, लेकिन यह अपने ही इलाके के आदिवासी किसानों का भाग्य नहीं बदल पाई है। साथ ही, स्थानीय लोगों का कहना है कि कई गांवों में सड़क, बिजली, स्कूल, स्वच्छ पेयजल और चिकित्सा सुविधाओं जैसी बुनियादी जरूरतों के अभाव से जूझने की दैनिक मुश्किलों का इजहार NOTA के जरिए हुआ है। पिछले साल, एक गर्भवती महिला के. रोजा की मौत हो गई। उसे अस्पताल ले जाने के लिए एक डोली पर ले जाया जा रहा था। बता दें कि डोली कपड़े से ढंकी लकड़ियों से बना एक अस्थायी स्ट्रेचर होता है, और दूर के अस्पतालों में मरीजों को ले जाने के लिए ग्रामीणों के पास यही एक रास्ता बचता है। छह साल पहले, बललगारुवु, दयूर्थी और तुनिसिबु गांवों को जोड़ने वाली 7 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए 2 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था। लेकिन निर्माण अधूरा रह गया। इसी तरह, चार साल पहले रचाकिलाम गांव के लिए एक पानी की परियोजना को मंजूरी दी गई थी। एक मोटर तो लगा दी गई, लेकिन जरूरी पाइपलाइनें अधूरी रह गईं।

करिगुडा बस्ती की स्थिति और भी बेतुकी है। एक सड़क मौजूद है लेकिन केवल कागज पर। ग्रामीणों को राशन प्राप्त करने के लिए 15 किमी की यात्रा करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बोनुरू को एक अधूरी सड़क के साथ इसी तरह के भाग्य का सामना करना पड़ता है। वंक्यापलेम में, बच्चों को स्कूल जाने के लिए 8 किलोमीटर की पैदल यात्रा की दैनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। दर्जनों गांवों में अभी भी बिजली की कमी है और सूर्यास्त के समय अंधेरे में डूब जाते हैं। इसने कई बच्चों को स्कूल छोड़ने और अपने माता-पिता के साथ काम करने के लिए मजबूर किया है।

आंध्र प्रदेश राज्य सचिवालय के सदस्य किल्लो सुरेन्द्र, जिन्होंने 2019 में अराकू से विधानसभा चुनाव लड़ा था, मानते हैं कि लगातार सरकारों की उपेक्षा के कारण मतदाताओं में असंतोष और मोहभंग पैदा हो गया है। वह कहते हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, वन भूमि अधिकार, आवास, बिजली और आजीविका के अवसरों के लिए उनके संघर्ष ने कुछ लोगों को NOTA के माध्यम से अपने अधिकारों का प्रयोग करने के लिए मजबूर किया है। आदिवासियों में कम साक्षरता दर के साथ-साथ EVM उपयोग के बारे में जागरूकता की कमी भी इसका एक कारण हो सकती है।

मतदान करने जाना भी अपने आप में एक चुनौती है। गांवों में सड़क या परिवहन की सुविधा न होने के कारण, ज्यादातर ग्रामीणों को सुबह तड़के ही घर से निकलना पड़ता है और जंगलों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए कई घंटे – कभी-कभी 10-20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है ताकि वे निकटतम मतदान केंद्र तक पहुंच सकें। इस परेशानी से बचने के लिए, कई लोग मतदान से एक रात पहले रिश्तेदारों या दोस्तों के घरों पर मतदान केंद्रों के पास ही रुक जाते हैं। कुछ लोग तो पेड़ों के नीचे, खुले आसमान में भी सो जाते हैं, ताकि मतदान केंद्र के करीब रह सकें। इन चुनौतियों के बावजूद, 2019 के आम चुनावों में 74% से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।

आंध्र प्रदेश आदिवासी गिरिजन संगम के मानद अध्यक्ष के गोविंदा राव का कहना है कि सरकार का आदिवासियों के साथ सौतेला व्यवहार चुनावों में भी दिखाई दे रहा है। वो कहते हैं, ‘नोटा वोटों का बढ़ा हुआ प्रतिशत लोगों के गुस्से को दर्शाता है।’ नक्सलियों की ओर से चुनाव बहिष्कार का आह्वान भी एक कारण है, जो खासकर उन बुजुर्गों को मतदान करने से हतोत्साहित करता है जो कठिन यात्रा नहीं कर सकते और मतदान के दिन घर पर ही रहते हैं। अपने कर्तव्य को निभाते हुए, चुनाव अधिकारी मतदान बढ़ाने के लिए गांवों के पास अस्थाई मतदान केंद्र बना रहे हैं, लेकिन इससे मतदाताओं को NOTA (नोटा) का बटन दबाने से रोका नहीं जा सका। आंध्र विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के फैकल्टी सदस्य डॉ. वी. हरि बाबू का कहना है कि हालांकि नोटा चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं कर सकता है, यह अक्सर मतदाताओं के विरोध और असहमति को व्यक्त करने का एक प्रतीकात्मक तरीका होता है। वह बताते हैं कि नोटा वोटों की संख्या को गंभीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि यह कई अंतर्निहित कारकों को इंगित कर सकता है, जैसे कि सार्वजनिक असंतोष जिनके मुद्दों का समाधान नहीं हो रहा को छिपाना।

आंध्र प्रदेश में 2019 के विधानसभा चुनाव में, अराकू लोकसभा क्षेत्र का अराकू विधानसभा क्षेत्र लोकतांत्रिक असंतोष का गढ़ बनकर उभरा था। यह इकलौता ऐसा विधानसभा क्षेत्र था जहां 10,000 से ज्यादा NOTA वोट पड़े थे। अराकू लोकसभा क्षेत्र का ही एक दूसरा आदिवासी बहुल विधानसभा क्षेत्र पडेरू 7,808 NOTA वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहा। 2019 में आंध्र प्रदेश के सबसे ज्यादा नोटा वोट वाले 10 विधानसभा क्षेत्रों में से 9 विशाखापत्तनम और विजयनगरम जिलों के थे, खासकर आदिवासी इलाकों से। 2014 के चुनावों में जहां आंध्र प्रदेश में कुल 1.55 लाख नोटा वोट पड़े थे, वहीं 2019 में यह संख्या तीन गुना बढ़कर 4.1 लाख हो गई।

क्या कांग्रेस के घोषणा पत्र ने लोगों को कर दिया है हैरान?

वर्तमान में कांग्रेस के घोषणा पत्र ने लोगों को हैरान कर दिया है! कांग्रेस ने शुक्रवार को अपना 2024 घोषणापत्र जारी किया। इस घोषणापत्र को न्यायपत्र का नाम दिया गया है। इसमें महिलाओं, युवाओं, श्रमिकों और पिछड़े वर्गों जैसे जनसांख्यिकी के लिए ’25 गारंटी’ पर केंद्रित है। साथ ही कांग्रेस ने घोषणा की कि वह कार्यालय में ‘नव’ संकल्प आर्थिक नीति’ ‘कार्य, धन, कल्याण’ की दृष्टि से अपनाएगी। ‘न्याय पत्र’ कहे जाने वाले कांग्रेस ने आरक्षण पर 50% की सीमा हटाने, जाति जनगणना, गैर-एससी/एसटी/ओबीसी तक सीमित करने की वर्तमान योजना के विपरीत सभी जातियों के लिए 10% ईडब्ल्यूएस कोटा का विस्तार करने, कानून का विस्तार करने का वादा किया है। प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यू में जाति कोटा, ‘सार्वजनिक और निजी रोजगार और शिक्षा में विविधता को मापने, निगरानी और बढ़ावा देने’ के लिए एक ‘विविधता आयोग’ और दलबदलुओं की स्वचालित अयोग्यता सुनिश्चित करने के लिए कानून में बदलाव। इसने गरीब परिवारों को प्रति वर्ष 1 लाख रुपये, एमएसपी पर एक कानून और अग्निपथ रक्षा भर्ती योजना को समाप्त करने की कसम खाई है। यह घोषणापत्र ‘कल्याणवाद बनाम ध्रुवीकरण’ की पिच तैयार करता दिख रहा है। कांग्रेस ने 2025 से विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू करने और 2029 में संसद में महिलाओं के लिए 50% नौकरियां आरक्षित करने की बात कही है। इसके अलावा संविदा नियुक्तियों को समाप्त करने और अनुबंध पर सभी लोगों को नियमित करने और केंद्र में 30 लाख रिक्तियों पर भर्ती करने का भी वादा किया है। सरकार न्यूनतम दैनिक वेतन को बढ़ाकर 400 रुपये करेगी। पार्टी ने कहा कि वह रोजगार को पुनर्जीवित करने के लिए “नौकरियां, नौकरियां, नौकरियां” के दर्शन का पालन करेगी। बीजेपी सरकार के तहत नौकरियां सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। इससे जगी अपेक्षाओं के विपरीत, घोषणापत्र में पुरानी पेंशन योजना की वापसी का वादा नहीं किया गया है। भविष्यवाणी कि भाजपा सरकार भय और नफरत, बेरोजगार युवा, स्थिर वेतन, व्यापार और औद्योगिक गिरावट, और कमजोर वर्गों और एससी/एसटी/ओबीसी का उत्पीड़न पैदा करेगी, सच हो गई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का दृष्टिकोण एक नए शुरुआत का वादा करता है।घोषणापत्र में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम जैसे कानूनों के ‘दुरुपयोग’ को रोकने के उपायों को सूचीबद्ध करने से भी परहेज किया गया है। कांग्रेस लगातार कहती रही है कि इस कानून का राजनीतिक विरोधियों, असंतुष्टों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ दुरुपयोग किया गया है।

इस बात पर जोर देते हुए कि कांग्रेस ने हिमाचल, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान में अपनी ‘गारंटी’ लागू कर दी है, खरगे ने तर्क दिया कि स्वतंत्रता के बाद यथार्थवादी वादे करने पर कांग्रेस की विश्वसनीयता 2014 के बाद से मोदी के दावे से अलग है। उनकी प्रतिबद्धता पर चुटकी लेते हुए, खरगे ने तर्क दिया। उन्होंने अलंकारिक रूप से पूछा कि अपने आडंबरपूर्ण दावों के बावजूद, प्रधानमंत्री ने पिछले एक साल में जातीय संघर्ष प्रभावित मणिपुर का दौरा क्यों नहीं किया। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी डरे हुए हैं और जो व्यक्ति डरता है वह देश का भला नहीं कर सकता। चिदंबरम ने अफसोस जताया कि कांग्रेस की 2019 की भविष्यवाणी कि भाजपा सरकार भय और नफरत, बेरोजगार युवा, स्थिर वेतन, व्यापार और औद्योगिक गिरावट, और कमजोर वर्गों और एससी/एसटी/ओबीसी का उत्पीड़न पैदा करेगी, सच हो गई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का दृष्टिकोण एक नए शुरुआत का वादा करता है।

चिदंबरम ने ‘मोदी की गारंटी’ को ‘खोखले वादे के रूप में खारिज कर दिया। उन्होंने पूछा कि पीएम के पहले के दो करोड़ नौकरियों/वर्ष, प्रत्येक बैंक खाते में 15 लाख रुपये, किसानों की आय दोगुनी करने आदि के वादों का क्या हुआ। चिंता जताते हुए, चिदंबरम ने कहा कि 30% आईआईटी पासआउट बिना नौकरी के हैं। खरगे ने मजाक उड़ाया कि मोदी कांग्रेस और विपक्षी नेताओं को बीजेपी में शामिल होने के लिए डरा रहे हैं। सरकार न्यूनतम दैनिक वेतन को बढ़ाकर 400 रुपये करेगी। पार्टी ने कहा कि वह रोजगार को पुनर्जीवित करने के लिए “नौकरियां, नौकरियां, नौकरियां” के दर्शन का पालन करेगी। बीजेपी सरकार के तहत नौकरियां सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। इससे जगी अपेक्षाओं के विपरीत, घोषणापत्र में पुरानी पेंशन योजना की वापसी का वादा नहीं किया गया है।खरगे ने कहा कि जिन्होंने कुछ गलत किया है वे डर जाते हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी को कोई डर नहीं है। हम अपने सिद्धांतों पर दृढ़ हैं। खरगे ने कांग्रेस के घोषणापत्र को ‘भविष्य के भारत की नई तस्वीर’ करार दिया। उन्होंने कहा कि मोदी के दरवाजे गरीबों, महिलाओं और युवाओं के लिए बंद हैं, लेकिन कांग्रेस सरकार इन द्वारों को वंचितों के लिए खोलेगी। उनकी प्रगति में मदद करेगी।

आखिर कैसी होती है दुनिया भर में परेड की सलामी?

आज हम आपको बताएंगे कि दुनिया भर में परेड की सलामी कैसी होती है! आपने भारत-पाकिस्तान के वाघा बॉर्डर पर होने वाली परेड यानी बीटिंग द रिट्रीट जरूर देखी होगी। बॉर्डर के गेट खुलते हैं, दोनों देशों के सैनिक जोश के साथ सलामी देते हैं और गेट बंद हो जाते हैं। इस समारोह को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं और देशभक्ति नारेबाजी की आवाज दूर-दूर तक गूंजती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के अलावा दुनिया के अलग-अलग देशों में अनोखे अंदाज में परेड होती है। कहीं स्लो मोशन में सैनिक परेड करते हैं तो कहीं खास यूनिफॉर्म पहनकर परेड में शामिल हुआ जाता है। आज हम आपको दुनिया के कुछ ऐसी ही परेड के बारे में बताने जा रहे हैं। ​भारत के बाघा बॉर्डर पर जो परेड होती है, उसे ‘बीटिंग द रिट्रीट’ समारोह या ‘लोअरिंग ऑफ द फ्लैग्स’ समारोह के नाम से जाना जाता है। यह एक सैन्य समारोह है जो भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित बाघा बॉर्डर पर हर शाम को आयोजित किया जाता है। इस समारोह में दोनों देशों के सैनिक अपनी-अपनी सीमाओं पर विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए परेड के दौरान दिखावटी और ऊर्जावान प्रदर्शन करते हैं। समारोह की शुरुआत में सैनिक दोनों देशों के झंडे को सावधानीपूर्वक उतारते हैं और उसके बाद वे उच्च ऊर्जा और समन्वित कदमों के साथ परेड करते हैं। इस प्रक्रिया में तेज कदम चाल, लंबे कदमों का प्रदर्शन, और दोनों तरफ के सैनिकों द्वारा जोरदार नारे लगाए जाते हैं। यह समारोह अंतरराष्ट्रीय समझौते और दोनों देशों के बीच सम्मान का प्रतीक है।

पाकिस्तान में बाघा बॉर्डर के समानांतर, वाघा-अटारी बॉर्डर पर जो परेड होती है, वह भी भारतीय पक्ष की परेड के समान ही होती है। पाकिस्तानी रेंजर्स और भारतीय बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) के बीच संचालित, यह परेड दोनों देशों की सैन्य शक्ति और समन्वय का प्रदर्शन करती है। परेड में पाकिस्तानी रेंजर्स विशेष वर्दी पहनते हैं और ऊँचे कदमों के साथ मार्च करते हैं, जिसे ‘गूस स्टेप’ के रूप में जाना जाता है। परेड के दौरान, दोनों पक्षों के सैनिक एक-दूसरे की ओर मुखातिब होकर अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वजों को सम्मान के साथ नीचे उतारते हैं और फिर ध्वजारोहण करते हैं। समारोह में दोनों देशों के सैनिक न केवल अपने-अपने ध्वजों को नीचे उतारने की क्रिया में भाग लेते हैं, बल्कि वे ऊर्जावान और समन्वित ढंग से परेड करते हुए, दृढ़ता और सम्मान के साथ अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन भी करते हैं।लहराते हुए दो कदम पीछे जाते हैं। इसके बाद धीमी गति में लंबे कदमों से आगे बढ़ना शुरू करते हैं। अगर बात उनकी शाही पोशाक की करें, तो गार्ड्स ने सफेद रंग की स्कर्ट और लेंगिंग्स को पहना है। इस समारोह का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच शांति और सद्भावना को बढ़ावा देना है, और यह समारोह दोनों तरफ के नागरिकों और पर्यटकों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण बन गया है।

भारत और पाकिस्तान में जहां जोशीले अंदाज में परेड होती है, वहीं ग्रीस में रॉयल गार्ड्स की परेड अपने स्लो मोशन स्टाइल के लिए काफी चर्चित है। इंटरनेट पर ग्रीस के रॉयल गार्ड्स के मार्च का एक वीडियो वायरल हो रहा है। ग्रीस के सैनिक शाही पोशाक और जूते पहनते हैं और खास अंदाज में हाथ-पैर हिलाकर परेड करते हैं। रॉयल गार्ड्स हवा में पैर लहराते हुए दो कदम पीछे जाते हैं। इसके बाद धीमी गति में लंबे कदमों से आगे बढ़ना शुरू करते हैं। अगर बात उनकी शाही पोशाक की करें, तो गार्ड्स ने सफेद रंग की स्कर्ट और लेंगिंग्स को पहना है।

वेटिकन सिटी में, पोंटिफिकल स्विस गार्ड नामक एक छोटी सेना सैनिक परेड करती है। यह परेड स्विस गार्ड की रक्षा बदलने, विशेष अवसरों का जश्न मनाने और पर्यटकों का मनोरंजन करने के लिए आयोजित की जाती है।इस समारोह में दोनों देशों के सैनिक अपनी-अपनी सीमाओं पर विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए परेड के दौरान दिखावटी और ऊर्जावान प्रदर्शन करते हैं। समारोह की शुरुआत में सैनिक दोनों देशों के झंडे को सावधानीपूर्वक उतारते हैं और उसके बाद वे उच्च ऊर्जा और समन्वित कदमों के साथ परेड करते हैं। इस प्रक्रिया में तेज कदम चाल, लंबे कदमों का प्रदर्शन, और दोनों तरफ के सैनिकों द्वारा जोरदार नारे लगाए जाते हैं। यह समारोह अंतरराष्ट्रीय समझौते और दोनों देशों के बीच सम्मान का प्रतीक है। सबसे खास होती है इन सैनिकों की यूनिफॉर्म। परेड करने वाले गार्ड्स आम सैनिकों से अलग चमकीली पोशाक पहनते हैं। वहीं ये गार्ड्स सिर पर भी ऐतिहासिक कवच पहनते हैं, जो सदियों से प्रचलन में है।

EC ने CBDT से राजीव चंद्रशेखर के चुनावी हलफनामे की पुष्टि करने को कहा.

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बीजेपी ने तिरुअनंतपुरम में कांग्रेस के शशि थरूर के खिलाफ केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर को मैदान में उतारा है. कांग्रेस ने उनके हलफनामे में संपत्ति को लेकर विसंगतियों का आरोप लगाया था. इस बार चुनाव आयोग ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को राजीव की संपत्ति की जांच करने का निर्देश दिया। कथित तौर पर राजीव की घोषित संपत्ति और वास्तविक संपत्ति में भारी अंतर है. कांग्रेस के साथ-साथ सीपीएम ने भी चंद्रशेखर के खिलाफ शिकायत की.

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, नामांकन के समय हलफनामे में किसी भी विसंगति पर उम्मीदवारी अयोग्य घोषित की जा सकती है और छह महीने की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। हलफनामे में राजीव ने दिखाया है कि वित्तीय वर्ष 2021-22 में उनकी आय केवल 680 टका है। 2020 और 2023 में राजीव की आय क्रमशः 17.5 लाख Tk और 5.5 लाख Tk थी। चंद्रशेखर ने बताया कि उनकी कुल संपत्ति 28 करोड़ Tk है। इसमें नकदी, बैंकों में जमा राशि, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां शामिल हैं। कई मामलों में निवेश भी दिखाया गया है.

उनकी चल संपत्ति में एक पुरानी मोटरसाइकिल और अन्य सामान शामिल हैं। जिसकी कुल कीमत 3 करोड़ 25 लाख है. इसके अलावा अचल संपत्ति में बेंगलुरु की एक गैर-कृषि भूमि भी शामिल है। जिसकी कीमत करीब 14.5 मिलियन टका है। विरोधियों का आरोप था कि चन्द्रशेखर ने अपने कंस्ट्रक्शन कारोबार से जुड़ी जानकारी छिपाई. केरल के सत्तारूढ़ गठबंधन एलडीएफ का दावा है कि केंद्रीय मंत्री ने हलफनामे में ‘ज्यूपिटर कैपिटल’ नामक कंपनी के संस्थापक के रूप में चंद्रशेखर का नाम हटा दिया है। हालांकि, चंद्रशेखर ने आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि उन्होंने कानून के मुताबिक जानकारी सौंपी है.

हालाँकि, 2018 में राज्यसभा के लिए नामांकन के समय चन्द्रशेखर ने कहा था कि उनकी वार्षिक आय 28 करोड़ टका है। पारिवारिक संपत्ति 65 करोड़ आसनसोल लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार सुरिंदर सिंह अहलूवालिया हैं. बीजेपी ने बुधवार को इसकी घोषणा की. ‘भूमिपुत्र’ सुरेंद्र आसनसोल के सांसद और तृणमूल उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ लड़ेंगे।

उम्मीदवार के रूप में अपने नाम की घोषणा पर अपनी प्रारंभिक प्रतिक्रिया में अहलूवालिया ने कहा, “अभी पता चला। मैंने उम्मीदवारों की सूची देखी. मैं गुरुवार को आसनसोल जा रहा हूं।” संयोग से आनंदबाजार ऑनलाइन ने खबर दी कि आसनसोल के नाम पर विचार चल रहा है और वह रेस में सबसे आगे हैं. सुरेंद्र के मामले में यह भी गौरतलब है कि वह 2019 में दार्जिलिंग में अपने दम पर उम्मीदवार नहीं बनना चाहते थे. बीजेपी ने सभी उम्मीदवारों के नामों की घोषणा के बाद कहा कि वह बर्दवान-दुर्गापुर सीट से उम्मीदवार होंगे. उन्हें प्रचार के लिए बारह दिन और पंद्रह दिन मिले. इस बार भी नाम की घोषणा के आखिरी दिन और नामांकन जमा करने के बीच ठीक 15 दिन का समय है. इस बार बर्धमान-दुर्गापुर सीट पर दिलीप घोष को मैदान में उतारने के बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा. हालांकि, ‘आत्मविश्वासी’ सुरेंद्र ने कहा कि पार्टी उन्हें उम्मीदवार बनाएगी और वे जीतेंगे. आसनसोल में सुरेंद्र के नाम की घोषणा के बाद, भाजपा को राज्य में केवल एक सीट डायमंड हार्बर पर अपना उम्मीदवार घोषित करना बाकी रह गया है। फिलहाल इस बात को लेकर उत्सुकता बढ़ रही है कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बीजेपी किसे मैदान में उतारेगी.

संयोग से, सुरेंद्र को लगातार तीन लोकसभा चुनावों में राज्य के तीन निर्वाचन क्षेत्रों से टिकट दिया गया था। पहली बार उन्होंने दार्जिलिंग सीट से जीत हासिल की. वह उस समय केंद्रीय मंत्री बने। दूसरी बार सुरेंद्र को बर्दवान-दुर्गापुर सीट से टिकट दिया गया. उस बार भी उन्होंने जीत हासिल की. हालांकि, उन्हें दूसरी बार मंत्री नहीं बनाया गया. उन्होंने तीसरी बार भी अपनी सीट बदली. उन्हें आसनसोल से टिकट दिया गया.

सुरेंद्र की ‘सब्सिडी’ उतनी ही गैर-बंगाली है जितनी वह आसनसोल के ‘भूमिपुत्र’ हैं। लेकिन बांग्ला भी अच्छी बोल सकती हैं. बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि आसनसोल उपचुनाव में रिकॉर्ड अंतर से जीतने वाले सुरेंद्र शत्रुघ्न का मुकाबला कर सकते हैं. संयोग से, आसनसोल सीट पर उम्मीदवार को लेकर भाजपा शुरू से ही परेशानी में थी। सबसे पहले भोजपुरी गायक-अभिनेता पवन सिंह की घोषणा की गई। लेकिन तृणमूल की आईटी सेल के जबरदस्त हमलों के सामने उन्होंने 24 घंटे के भीतर ही खुद को मैदान से बाहर कर लिया. उसके बाद उस सीट से इलाके के ‘दपूते’ नेता और पांडवेश्वर के पूर्व विधायक जीतेंद्र तिवारी को उम्मीदवार बनाया जाना तय माना जा रहा था. लेकिन कुछ दिन पहले तृणमूल ने एनआईए के एक शीर्ष अधिकारी की उनसे हुई मुलाकात की घटना को ‘दस्तावेजों’ के साथ सार्वजनिक कर दिया. इसके बाद दिल्ली ने अधिकारी को तलब किया. उनकी जगह पर पटना में कार्यरत एक अधिकारी को नियुक्त किया गया. साथ ही, आसनसोल सीट पर जीतेंद्र की संभावनाएं कम होती जा रही हैं। क्योंकि, सत्तारूढ़ तृणमूल ने शिकायत की, जितेंद्र एक ‘सफेद पैकेट’ के साथ बैठक में दाखिल हुए। जब वह गया तो वह खाली हाथ था। इशारा बिल्कुल साफ़ था. वह आक्षेप या आरोप सच है या झूठ, यह बहस का मुद्दा है। लेकिन बीजेपी के प्रदेश नेता भी इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि जीतेंद्र की संभावनाएं खत्म हो रही हैं. इसका असर कार्यक्षेत्र में भी देखने को मिला. आसनसोल में जीतेंद्र नहीं, सुरेंद्र को उम्मीदवार बनाया गया.

दिल्ली उच्च न्यायालय का कहना है कि महुआ मोइत्रा को सार्वजनिक रूप से अपना बचाव करने से नहीं रोक सकता.

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लोकसभा से निष्कासित तृणमूल सांसद महुआ मैत्रा सार्वजनिक रूप से अपनी बेगुनाही का दावा कर सकती हैं। यह एक मामले के मद्देनजर दिल्ली हाई कोर्ट की मौखिक टिप्पणी है. पैसे के लिए सवाल उठाने के आरोप में महुआ को लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था. इस मामले में उनके पूर्व मित्र जयनंत देहाद्राई का नाम भी शामिल है। देहाद्राई ने इस दलील के साथ दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया कि महुआ को सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ ‘अपमानजनक’ टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। इस संबंध में उन्होंने हाई कोर्ट से अंतरिम आदेश की भी मांग की. उस मामले में, न्यायमूर्ति प्रतीक जालान ने कहा, “यदि आप (देहादराय) सार्वजनिक रूप से उन पर (महुआ मैत्रा) आरोप लगाते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से खुद को निर्दोष घोषित करने का पूरा अधिकार है।” और आत्मरक्षा. लेकिन वह कभी भी झूठ नहीं बोल सकता.” साथ ही, अदालत ने याद दिलाया, यह दूसरी बात है कि अगर महुआ और देहाद्राई सोचते हैं कि वे सार्वजनिक रूप से आरोप लगाना बंद कर देंगे. लेकिन महुआ सार्वजनिक रूप से अपनी बेगुनाही का दावा कर सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव में उनके खिलाफ पूर्व फुटबॉलर कल्याण चौबे बीजेपी के उम्मीदवार थे. कृष्णानगर केंद्र में तृणमूल की महुआ मैत्रा की जीत का अंतर 65 हजार था. इस बार उनके खिलाफ बीजेपी उम्मीदवार कृष्णानगर राजबाड़ी की ‘रणिमा’ अमृता रॉय हैं. क्या बढ़ेगा गैप? महुआ ने आनंदबाजार ऑनलाइन के साक्षात्कार आधारित कार्यक्रम ‘दिलीबारी बाजवा: समाधान’ में कहा, ”यह मिलना चाहिए, यह समझा जाता है, लेकिन क्या यह बढ़ेगा?” महुआ ने कहा, यह बढ़ेगा. कितना मैत्रा ने जवाब दिया, ”मैं एक लाख करने की कोशिश करूंगी.” यानी, महुआ ने बताया, कृष्णानगर में उनकी लड़ाई वोटों का अंतर बढ़ाने के लिए थी. वह लाखों का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं. हालांकि, उम्मीदवार के तौर पर महुआ अब भी पिछली बार के प्रतिद्वंद्वी कल्याण से आगे हैं. उनके मुताबिक पिछली लोकसभा में कल्याण जिस तरह इधर-उधर पहुंच रहे थे, वैसा ‘रणिमा’ के मामले में देखने को नहीं मिला.

लोकसभा में ‘प्रश्न रिश्वतखोरी’ का आरोप लगने के बाद महुआ को उनके कार्यकाल की समाप्ति से पहले एक सांसद के रूप में बर्खास्त कर दिया गया था। तृणमूल सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उद्योगपति गौतम अडाणी को लेकर सवाल उठाए. कई लोगों ने कहा कि महुआ का राजनीतिक करियर खत्म होने वाला है. मोदी ने ही उन्हें ‘नया जीवन’ दिया। टिकट न मिलने से लेकर मोदी विरोधी ‘पोस्टर गर्ल’ बनने तक का सफर क्या उसमें खुद मोदी शामिल नहीं हैं? महुआ का जवाब, ”मीडिया के कई सम्राटों ने मुझे ऐसी बातें बताई हैं. लेकिन बात बिल्कुल भी ऐसी नहीं है. जिस तरह से मैंने काम किया, उससे मेरे राजनीतिक करियर के खत्म होने की कोई संभावना नहीं थी.” और मैं संसद में जितना कह सकता हूं, कहने दीजिए. आप मुझे क्षेत्र के बाहर कहीं और नहीं पाएंगे। यहां तक ​​कि कलकत्ता की राजनीति में भी मुझे उस तरह से नहीं देखा जाता.” उस आधार पर उसे जो करना होता है वह करता है।

महुआ के वोट से युवा अपना ‘वॉर रूम’ संभालते हैं. शत-प्रतिशत काम करने पर ‘दीदी’ महुआ उनकी पीठ थपथपाती हैं। लेकिन गठबंधन में 99 फीसदी सिर्फ बड़बड़ाते हैं. क्यों? महुआ का स्पष्ट जवाब था, ”जब मैं जेपी मॉर्गन में काम करती थी, तो बॉस ने एक्सेल शीट को ठीक से न मोड़ने के कारण बाहर फेंक दिया था। तब से मैं भी उसी तरीके से काम सिखाता हूं. मेरे साथ काम कर चुके कई लोगों ने अब अपनी खुद की कंसल्टेंसी फर्म खोल ली हैं।” कृष्णानगर से तृणमूल उम्मीदवार ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैं प्रशांत किशोर से बहुत पहले से ऐसा कर रहा हूं।”

वह प्रबंधकीय शैली में चुनाव संचालित करता है। उससे कई विधायक और स्थानीय स्तर के नेता नाराज थे. तो क्या हुआ? महुआ ने कहा कि वह पूरी प्रक्रिया एक ऐसी टीम के साथ करना चाहते हैं जिसका नजरिया निष्पक्ष हो. स्थानीय नेताओं के लिए यह संभव नहीं है. उनके लिए दिन-ब-दिन ‘वॉर रूम’ संभालना संभव नहीं है. क्योंकि उनके पास भी काम है. उनको अपना सेन्टर वा एरिया सम्भालना है। महुआ के शब्दों में, ”बूथ के कार्यकर्ता वोट देंगे. लेकिन एक टीम उसे मजबूत करेगी।” लोकसभा से निष्कासित तृणमूल सांसद महुआ मैत्रा सार्वजनिक रूप से अपनी बेगुनाही का दावा कर सकती हैं। यह एक मामले के मद्देनजर.

उत्तराखंड में मतदाताओं को होटलों में खाने के बिल में 20 प्रतिशत की छूट मिलेगी.

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वोट देने पर रेस्टोरेंट में खाने के बिल पर मिलेगी 20 फीसदी की छूट, किस राज्य में मिलेगा ये ‘तोहफा‘? अभी तक चुनाव आयोग ने सिर्फ एक राज्य के मतदाताओं के लिए इस खास तोहफे की घोषणा की है. चुनाव आयोग द्वारा राज्य के सभी होटल और रेस्तरां एसोसिएशन के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किये गये हैं. लोकसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के लिए विशेष घोषणा। वोट देने के बाद अगर आप किसी होटल या रेस्टोरेंट में खाना खाने जाएंगे तो आपको खाने के बिल पर 20 फीसदी की छूट मिलेगी. लेकिन यह छूट सीमित अवधि के लिए उपलब्ध है। अभी तक चुनाव आयोग ने सिर्फ एक राज्य के मतदाताओं के लिए इस खास तोहफे की घोषणा की है. चुनाव आयोग द्वारा उत्तराखंड के सभी होटल एवं रेस्टोरेंट संगठनों के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किये गये हैं।

आगामी लोकसभा चुनाव में सात चरणों में मतदान होगा. 19 अप्रैल से वोटिंग शुरू हो रही है. वोटों की गिनती 4 जून को. उत्तराखंड में पहले चरण में मतदान होगा. उत्तराखंड में 19 अप्रैल को चुनाव है. चुनाव आयोग के मुताबिक, अगर कोई मतदाता 19 अप्रैल को मतदान के बाद किसी होटल या रेस्तरां में खाना खाने जाता है तो उसे खाने के बिल पर 20 फीसदी की छूट मिलेगी. मतदाता 20 अप्रैल को भी इस सेवा का आनंद ले सकते हैं. लेकिन इसके बाद वोटर्स को वोट देने पर खाने के बिल पर यह अतिरिक्त छूट नहीं मिलेगी.

इस संबंध में उत्तराखंड के सभी होटल और रेस्तरां एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि वे खाने के बिल पर छूट देने से पहले अपनी उंगलियों पर स्याही के निशान की जांच करेंगे कि उन्होंने सही तरीके से मतदान किया है या नहीं. चुनाव आयोग ने उत्तराखंड के अधिकांश मतदाताओं के बीच मतदान के प्रति उत्साह बढ़ाने के लिए यह विशेष घोषणा की है। तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के उम्मीदवार द्वारा आयोजित बैठक में भाग लेने के कारण 106 सरकारी अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया। उस उम्मीदवार का नाम है पी वेंकटराम रेड्डी. वह एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं. बीआरएस ने उन्हें तेलंगाना के मेडक लोकसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा है। लेकिन यह छूट सीमित अवधि के लिए उपलब्ध है। अभी तक चुनाव आयोग ने सिर्फ एक राज्य के मतदाताओं के लिए इस खास तोहफे की घोषणा की है. चुनाव आयोग द्वारा उत्तराखंड के सभी होटल एवं रेस्टोरेंट संगठनों के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किये गये हैं।

आयोग के मुताबिक, वेंकटराम ने पिछले रविवार को अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक पार्टी बैठक आयोजित की थी. बैठक में कई सरकारी अधिकारियों ने भाग लिया, जो कि अव्यवस्थित थी। इसके अलावा, आयोग ने यह भी कहा कि बीआरएस उम्मीदवार ने उस बैठक के लिए सिद्दीपेट के सहायक रिटर्निंग अधिकारी से अनुमति नहीं ली थी। यह मामला तब सामने आया जब मेडक से भाजपा उम्मीदवार एम रघुनंदन राव ने वेंकटराम के खिलाफ सहायक रिटर्निंग अधिकारी और राजस्व मंडल अधिकारी से शिकायत की। आयोग ने एक बयान जारी कर कहा, “पूरी बैठक सीसी कैमरों द्वारा वीडियो में कैद की गई। जिससे साफ है कि आचार संहिता का उल्लंघन किया गया है.”

वेंकटराम और अन्य बीआरएस नेताओं के खिलाफ ‘अनधिकृत’ बैठकें आयोजित करने के लिए पहले ही शिकायत दर्ज की जा चुकी है। आयोग ने 106 सरकारी कर्मचारियों को भी बर्खास्त कर दिया है. आयोग द्वारा निलंबित किए गए सरकारी अधिकारियों में बड़ी संख्या में सिद्दीपेट में जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए) के कर्मचारी हैं। गौरतलब है कि तेलंगाना में एक चरण में 13 मई को लोकसभा चुनाव होंगे. रिजल्ट 4 जून को जारी किया जाएगा. भगवानपुर के बीजेपी विधायक रवींद्रनाथ मैती ने भूपतिनगर थाने के ओसी के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की. विधायक ने आयोग से शिकायत की कि पुलिस अधिकारी एक राजनीतिक व्यक्ति की तरह व्यवहार कर रहे हैं. किसी विशेष राजनीतिक दल के प्रति पक्षपाती होना। पुलिस की ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

ओसी के साथ विधायक की तकरार का एक वीडियो सोमवार रात सामने आया (आनंदबाजार ऑनलाइन ने इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की है)। वहां बीजेपी विधायक ने शिकायत की कि पुलिस बिना ‘सर्च वारंट’ के उनके कार्यालय में घुसकर एक बीजेपी नेता को गिरफ्तार करना चाहती है. हालांकि, पुलिस ने आरोपों को खारिज कर दिया. मंगलवार को एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट में भी यह मुद्दा उठा. गिरफ्तार बीजेपी नेता के वकील ने आरोप लगाया कि सोमवार को कोर्ट के आदेश के बाद भूपतिनगर थाने के ओसी ने बीजेपी के पार्टी कार्यालय पर धमकी दी. राज्य ने तर्क दिया कि अस्पताल के ऊपर भाजपा कार्यालय है। ओसी वहां गये.