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क्या वर्तमान में धोखे से बना रहे हैं कई आईएएस?

वर्तमान में कई आईएएस धोखे से बन रहे हैं! प्रोबेशनर पूजा खेडकर के ओबीसी और दिव्यांगता प्रमाणपत्रों को लेकर विवाद ने एक बड़े घोटाले की आशंका जगा दी है। सोशल मीडिया पर कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की ओर से फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र इस्तेमाल करने के आरोप तेजी से फैल रहे हैं। यही नहीं कार्यकर्ताओं की करफ से विशेष श्रेणी (ओबीसी-नॉन क्रीमी लेयर या EWS) के तहत चुने गए कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की लिस्ट के स्क्रीनशॉट भी सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया मुहिम और तेजी से फैल रही कथित भ्रष्टाचारियों की लिस्ट के जवाब में, कई अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी अब इन दावों की व्यापक जांच की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रवेश स्तर पर प्रमाणपत्रों में हेरफेर के इन आरोपों से भारत के नौकरशाही ढांचे की ईमानदारी में गिरावट का पता चलता है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों पोस्ट वायरल हो रही हैं जिनमें यूजर्स कथित तौर पर दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा करने वाले अधिकारियों की तस्वीरें, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक पृष्ठभूमि पोस्ट कर रहे हैं। ओबीसी और ईडब्ल्यूएस कोटे और दिव्यांगता आरक्षण के लिए वेरिफिकेशन सिस्टम पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस बीच, कई वास्तविक OBC और EWS उम्मीदवारों को अच्छी रैंक हासिल करने के बावजूद अखिल भारतीय सेवाओं से बाहर निकाले जाने के भी आरोप सामने आए हैं। ये फर्जीवाड़े न केवल आरक्षण प्रणाली की ईमानदारी को कमजोर करते हैं, बल्कि योग्य उम्मीदवारों को उनके उचित अवसरों से भी वंचित करते हैं।

पूजा खेडकर की उम्मीदवारी को लेकर सामने आई घटनाओं और खुलासों की वजह से, भारत की सबसे सम्मानित और प्रतिष्ठित चयन प्रक्रिया, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा देश का ‘स्टील फ्रेम’ बनाने वाली प्रक्रिया पर एक व्यापक बहस छिड़ गई है। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बताया कि सरकार सोशल मीडिया पर पोस्ट और इंटरनेट अभियान पर कड़ी निगरानी रख रही है। उन्होने कहा कि अगर किसी भी अधिकारी की उम्मीदवारी के खिलाफ औपचारिक शिकायत मिलती है तो सरकार जानकारी को वैरिफाई कर सकती है और जांच शुरू कर सकती है। लगभग एक दर्जन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर सवाल उठाए गए हैं। उनमें से कई अब अपने करियर के मध्य में हैं, जबकि कुछ अभी भी जूनियर स्तर पर हैं।

आरक्षण हमेशा से देश में शिक्षा और रोजगार क्षेत्रों में एक विवादास्पद और बहस का विषय रहा है। आरक्षण प्रणाली को ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) शामिल हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था। 1980 में, मंडल आयोग ने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की, जिसे 1992 में लागू किया गया था। इसके बाद, भारतीय नौकरशाही में ओबीसी के लिए आरक्षण लाया गया। 1990 के दशक से पहले, आरक्षण केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए था।

हालांकि, बाद में सरकार ने अत्यधिक प्रतिस्पर्धी अखिल भारतीय सेवाओं (AIS) के लिए ओबीसी आरक्षण नीति को परिष्कृत कर दिया। यूपीएससी के नियमों में कहा गया है कि सरकार की ओर से निर्धारित रिक्तियों के संबंध में ओबीसी श्रेणी से संबंधित उम्मीदवारों के लिए आरक्षण किया जाता है। क्रीमी लेयर से संबंधित ओबीसी उम्मीदवारों को कोई आरक्षण/छूट नहीं दी जाती है। आगे स्पष्ट किया कि ‘ओबीसी’ शब्द का अर्थ ‘गैर-सरकारी ओबीसी’ के रूप में किया गया है। यूपीएससी यह भी कहता है कि ओबीसी श्रेणी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार को एक ओबीसी प्रमाणपत्र जमा करना अनिवार्य है। यह प्रमाणपत्र केवल जिला मजिस्ट्रेट, कलेक्टर, अतिरिक्त या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट जैसे प्राधिकारियों द्वारा ही जारी किया जा सकता है।

एक अन्य वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बताया कि प्रमाण पत्र जारी करने वाले अधिकारियों की इस सूची में आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं। सोशल मीडिया पर कई पोस्टों में, कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संदिग्ध उम्मीदवारी वाले अधिकारी पूरी तरह से नौकरशाह परिवारों से भी आते हैं। इस प्रणाली में खामियां हैं। अगर किसी उम्मीदवार के परिवार में कोई नौकरशाह है, तो वह आसानी से ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करवा सकता है। यूपीएससी को एक मजबूत सत्यापन प्रणाली की जरूरत है, जो कि ऐसा लगता है कि उनके पास नहीं है।।

यूपीएससी की विकलांगता नीति के अनुसार, आयोग विभिन्न श्रेणियों में से कुल रिक्तियों का 4% विकलांग व्यक्तियों के लिए आवंटित करता है और इन श्रेणियों में लोकोमोटर विकलांगता, अंधापन और कम दृष्टि, श्रवण बाधा और बहु-विकलांगता शामिल हैं। कुछ आरोपों में, कुछ अधिकारियों पर ‘लोकोमोटर विकलांगता’ का फर्जी दावा करने का आरोप लगाया गया है। लोकोमोटर विकलांगता से मतलब ऐसी चिकित्सीय स्थिति से है जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से चलने फिरने की क्षमता को सीमित करती है। यह स्थिति पोलियो के दौरे, मांसपेशियों के कमजोर होने (मस्कुलर डिस्ट्रॉफी), रीढ़ की हड्डी में चोट या किसी अंग के कटने के कारण हो सकती है।

पूरे देश में सेवानिवृत्त और कार्यरत नौकरशाहों ने ऐसे प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए एक मजबूत व्यवस्था की मांग की है। उत्तरी राज्य में कार्यरत एक वरिष्ठ वन सेवा (इंडियन फॉरेस्ट सर्विस – IFoS) अधिकारी ने कहा कि भले ही सरकार ने नियमित ऑडिट के साथ ओबीसी और विकलांगता प्रमाणपत्रों की सत्यता की जांच के लिए सत्यापन तंत्र स्थापित किया है, फिर भी यह प्रणाली अभी तक फुलप्रूफ नहीं है। इसीलिए चूक होती रहती है। उन्होंने आगे कहा कि यूपीएससी को कड़े सत्यापन प्रक्रियाओं को लागू करने और दस्तावेजों को जालसाजी करने के दोषी पाए जाने वालों पर कठोर दंड लगाने की जरूरत है। आयोग वेरिफिकेशन प्रोसेस को बेहतर बनाने और धोखाधड़ी को कम करने के लिए डिजिटल प्रमाणपत्रों और डेटाबेस जैसी तकनीक का उपयोग कर सकता है।

हाथरस के भोले बाबा, जो अफसर को भी देता था आशीर्वाद!

आज हम आपको हाथरस के भोले बाबा की कहानी सुनाने जा रहे हैं जो अफसर को भी आशीर्वाद देता था! हाथरस के फुलरई मुगलगढ़ी गांव में 2 जुलाई की दोपहर जो भयावह हादसा हुआ, उसने हर किसी को हैरानी में डाल दिया। प्रवचन के दौरान मचे भगदड़ में 121 लोगों की मौत हो गई। हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था कि आखिर यह भोले बाबा हैं कौन, जिसे सुनने के लिए और चरणों की धूल लेने के लिए लोगों ने अपनी जान तक दे दी। सोशल मीडिया पर नाममात्र की मौजूदगी रखने वाले नारायण साकार हरि की प्रॉपर्टी के बारे में जानकर अथॉरिटी के होश उड़ गए। कभी दान नहीं लेने का दावा करने वाले भोले बाबा के पास 100 करोड़ से अधिक कीमत की संपत्ति है, जिसमें 24 लग्जरी आश्रम हैं। हाथरस भगदड़ कांड के बाद से सूरजपाल सिंह जाटव उर्फ भोले बाबा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मैनपुरी में बाबा के लग्जरी आश्रम के बाहर करीब 50 पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया गया है। पिछले 2 साल से बाबा यहां 21 बीघे में फैले फाइव स्टार आश्रम में रह रहा है।सत्संग में आने वाले अनुयायियों से किसी तरह का दान नहीं लिया जाता है। उनके अनुयायियों में गरीब और सामान्य लोगों के साथ ही बड़े प्रशासनिक अधिकारी तक शामिल हैं। यूपी और पड़ोसी राज्यों से भी लोग आया करते थे। इसमें बाबा और पत्नी के लिए 6 बड़े कमरे बने हुए हैं। इसमें बिना इजाजत के कोई नहीं आ सकता है। यहां मुख्य गेट पर 200 उन लोगों के नाम की लिस्ट है, जिन्होंने इस आश्रम के निर्माण के लिए दान किया है। इसमें ढाई लाख से लेकर 10 हजार रुपये तक शामिल हैं।

जमीन के सहित मैनपुरी के इस आश्रम की कीमत 5 करोड़ आंकी गई है। आश्रम को ट्रस्ट की तरफ से मैनेज किया जाता है। बाबा से जुड़े लोगों के अनुसार उनके 24 आश्रम हैं और 100 करोड़ कीमत की प्रॉपर्टी है। थ्री-पीस सूट और स्टाइलिश चश्मे पहनकर चलने वाले बाबा के काफिले में करीब 20 लग्जरी एसयूवी शामिल रहती हैं। आगे-आगे रॉयल इनफील्ड बुलेट पर 15 से 20 कमांडो भी चलते हैं। इसके साथ ही गुलाबी और सफेद कपड़े पहने सेवादारों की फौज भी कार्यक्रम स्थल से लेकर आश्रम तक रहती है। मैनपुरी, कासगंज, कानपुर, इटावा सहित कई जगहों पर बाबा के आश्रम हैं। सूरजपाल के पैतृक गांव कासगंज के बहादुरनगर में 60 बीघे और मैनपुरी में 21 बीघे में फाइव स्टार आश्रम बने हुए हैं। वहीं इटावा में सराय भूपत स्टेशन के पास 15 बीघे में और कानपुर के कसुई गांव में 14 बीघे में आलीशान आश्रम बने हुए हैं। ग्रामीणों का ऐसा भी दावा है कि कानपुर आश्रम में स्थानीय पुलिस को भोजन भी कराया जाता था, जिससे जमीन को लेकर किसी तरह के विवाद की स्थिति में बाबा के पक्ष में खाकी खड़ी रहे।

भोले बाबा के आश्रम से लेकर सत्संग स्थल तक कहीं भी मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर सख्त पाबंदी रहती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई खास मौजूदगी नहीं नजर आती है। सत्संग में आने वाले अनुयायियों से किसी तरह का दान नहीं लिया जाता है। उनके अनुयायियों में गरीब और सामान्य लोगों के साथ ही बड़े प्रशासनिक अधिकारी तक शामिल हैं। यूपी और पड़ोसी राज्यों से भी लोग आया करते थे।

सूरजपाल का बयान हाथरस कांड के 5 दिनों के बाद आया है। 2 जुलाई को घटना के बाद से वह गायब हो गया था। सूरजपाल उर्फ भोले बाबा को भी इस भगदड़ के मामले में आरोपी माना जा रहा है। हालांकि, प्रारंभिक एफआईआर में उसका नाम नहीं शामिल किया गया है। कार्यक्रम के आयोजन देवप्रकाश मधुकर को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। शनिवार की सुबह जारी वीडियो में भोले बाबा का बयान सामने आया है। बता दें कि हाथरस भगदड़ कांड के बाद से सूरजपाल सिंह जाटव उर्फ भोले बाबा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मैनपुरी में बाबा के लग्जरी आश्रम के बाहर करीब 50 पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया गया है। पिछले 2 साल से बाबा यहां 21 बीघे में फैले फाइव स्टार आश्रम में रह रहा है।वहीं इटावा में सराय भूपत स्टेशन के पास 15 बीघे में और कानपुर के कसुई गांव में 14 बीघे में आलीशान आश्रम बने हुए हैं। ग्रामीणों का ऐसा भी दावा है कि कानपुर आश्रम में स्थानीय पुलिस को भोजन भी कराया जाता था, जिससे जमीन को लेकर किसी तरह के विवाद की स्थिति में बाबा के पक्ष में खाकी खड़ी रहे। इसमें भोले बाबा साजिश की बात करता दिख रहा है। अपने बयान में भोले बाबा ने कहा कि पुलिस और प्रशासन हर पहलू की जांच कर रही है। घटना के जिम्मेदारों को बख्शा नहीं जाएगा, इसका भरोसा रखिए।

आखिर कितनी जायदाद के मालिक है हाथरस के भोले बाबा?

आज हम आपको बताएंगे कि हाथरस के भोले बाबा कितनी जायदाद के मालिक है! उत्तर प्रदेश के हाथरस में भोले बाबा की संपत्ति पर बड़ी जानकारी सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स और भोले बाबा के आश्रमों के आधार पर संपत्ति का आकलन किया गया है। इसके आधार पर दावा किया जा रहा है कि नारायण साकार हरि उर्फ भोले बाबा 100 करोड़ से अधिक संपत्ति का मालिक है। हाथरस कांड में भोले बाबा पर गंभीर आरोप लगे हैं। 80 हजार की अनुमति लेकर लाखों लोग जुटाने वाले भोले बाबा के सेवादारों ने कार्यक्रम स्थल पर व्यवस्था बनाए रखने में कामयाबी नहीं हासिल की। इस कारण 121 लोगों की मौत हो गई। भगदड़ के बाद भोले बाबा को लेकर कई खुलासे हुए हैं। भोले बाबा को लेकर मामला सामने आया है कि वह लग्जरी गाड़ियों के काफिले में चलता था। उसके पश्चिमी यूपी में 24 आश्रम हैं। वहीं, वह 80 सेवादारों की फौज रखे हुए है। भोले बाबा के आश्रम आलीशान हैं। बाबा का दावा है कि वह दान में एक पैसे नहीं लेता है। इसके बाद भी उसकी शानो-शौकत हैरान करने वाली है। भोले बाबा उर्फ सूरज पाल की कहानी फिल्मी है। 1999 में यूपी पुलिस के सिपाही के पद से इस्तीफा दिया था। लोकल इंटेलिजेंस यूनिट से इस्तीफा दिए जाने के बाद उसने पटियाली गांव आकर छोटा सा आश्रम बनाया। बाबा ने दावा किया था कि विश्व हरि भगवान विष्णु ने उसे एक अलग शक्ति दी। इसके बाद वह क्षेत्र में साकार बाबा के रूप में पहचाना जाने लगा। बाद में उसने अपना नाम साकार विश्व हरि रख लिया। समय बीतने के साथ वह नारायण साकार विश्व हरि के तौर पर अपनी पहचान बना लिया। हालांकि, भगवान विष्णु का अवतार घोषित किए जाने के बाद उसे फायदा अधिक नहीं मिला तो उसने नाम के आगे भोले बाबा भी जोड़ लिया।

भक्तों के बीच वह भोले बाबा के नाम से प्रसिद्धि हासिल की। पश्चिमी यूपी के इलाके में सांप काटने वालों का जड़ी-बूटी से इलाज के जरिए वह प्रसिद्ध होने लगा। बाद के समय में कुछ बीमारियों का इलाज भी शुरू कर दिया। इससे वह महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्धि हासिल करने लगा। सूरजपाल उर्फ भोले बाबा ने खुद को दान लेने से अलग रखा। लेकिन, सामान्य परिवार से आने वाले इस सिपाही ने ट्रस्ट बना दिए। सूरजपाल की छवि ट्रस्ट के जरिए भोले बाबा के रूप में प्रसिद्ध होने लगी। इसके बाद वह अपने प्रभाव को मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैलाया।

मैनपुरी में भोले बाबा का आलीशान आश्रम है। यहां पर 6 कमरे भोले बाबा और उसकी पत्नी के लिए रिजर्व हैं। इस आश्रम में 80 सेवादारों की फौज लगाई है। वह आश्रम की सुरक्षा में लगते हैं। बाबा का आश्रम करीब 21 बीघा इलाके में फैले हुए हैं। वहीं, बाबा के काफिले में 24 से 30 लग्जरी कारें रहती हैं। बाबा खुद फॉर्च्यूनर से चलते हैं। मैनपुरी का बिछुआ आश्रम तीन साल पहले बना था। यूपी में कहीं भी कार्यक्रम हो तो वह इसी आश्रम से आता-जाता है। 21 बीघे में बने आश्रम को करीब चार करोड़ की लागत से तैयार कराया गया है।

मैनपुरी आश्रम सीधे बाबा के नाम पर नहीं है। राम कुटीर चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से इसका निर्माण कराया गया है। यहां पर 200 लोगों के दान देने की बात है। बाबा के इस आश्रम में सबसे अधिक ढाई लाख और सबसे कम 10 हजार रुपये दानदाता का नाम अंकित है। इस प्रकार बाबा खुद दान न लेकर ट्रस्ट के जरिए दान लेने की बात पुख्ता होती है।

भोले बाबा का आश्रम प्रदेश के कई स्थानों पर है। कानपुर के बिधनू इलाके के कसुई गांव में तीन बीघे जमीन पर आश्रम बना हुआ है। वहीं, इटावा में 15 बीघा में आश्रम बना हुआ है। सराय भूपत के कटे खेड़ा गांव में बाबा का आश्रम बना हुआ था। नोएडा के सेक्टर-87 इलाबांस गांव में बाबा का आलीशान आश्रम है। वर्ष 2022 में ग्रेटर नोएडा वेस्ट के सेक्टर 16बी रोज याकूबपुर में समागम का आयोजन हुआ था। कासगंज के बहादुरनगर स्थित पटियाली गांव में बाबा का भव्य आश्रम है। यह बाबा का पैतृक गांव है। यहीं से बाबा के साम्राज्य की शुरुआत हुई थी।

पश्चिमी यूपी समेत प्रदेश के 24 आश्रम हैं। हर जिले में बाबा ने ट्रस्ट बना रखा है। ट्रस्ट की ओर से हम कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी के जरिए सत्संग का आयोजन किया जाता रहा है। आगरा में भी कार्यक्रम के आयोजन की तैयारी थी। मैनपुरी आश्रम से ही बाबा को इस कार्यक्रम में शामिल होने जाना था।

जानिए तीसरी आंख वाले निर्मल बाबा की कहानी!

आज हम आपको तीसरी आंख वाले निर्मल बाबा की कहानी सुनाने जा रहे हैं! बातें करीब 12 साल पहले की हैं। बाबा अपने भक्तों को किसी देवता या लक्ष्मी जी के कारण कृपा रुकी होने का हवाला देकर काल भैरव को शराब चढ़ाने से लेकर छोले भठूरे, समोसे और गोलगप्पे को पानी विशेष के साथ खाने की सलाह दे रहे थे। आस्था में डूबे भक्त बाबा के सभी आदेशों का पालन कर रहे थे। बाबा के फोटो की डिमांड बढ़ गई थी। लोग नए-नए पर्स और बेल्ट ले रहे थे। कोई भी भक्त यह सोचने को तैयार नहीं था कि फोटो नई बेल्ट, नए पर्स से लेकर समोसे को हरे चटनी खाने से कोई धनवान बन सकता है या उसके रुके हुए काम बन सकते हैं। यूपी के हाथरस में खुद को भगवान बताने वाले स्वयंभू भोले बाबा के कार्यक्रम में मची भगदड़ में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद से एक बार फिर बाबा और उनमें भक्तों की आस्था को लेकर चर्चा तेज हो गई है। आस्था के नाम पर खिलवाड़ करने वाले बाबाओं की फेहरिस्त में एक नाम निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा का भी है। साल 2012 में निर्मल बाबा सुर्खियों में आए थे। निर्मल बाबा के क्रेज को इस बात से समझा जा सकता है कि निर्मल दरबार में शामिल होने के लिए 3 हजार तो टीवी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए 5 हजार रुपये फीस देनी होती थी। वो पूरी तरह से सेलिब्रिटी बन गए थे। ये रजिस्ट्रेशन वेबसाइट के जरिये होते थे। वर्ष 1976 में उनकी शादी डाल्टनगंज के ही रहने वाले दलीप सिंह बग्गा की बेटी सुषमा नरूला से हुई।भव्य ऑडिटोरियम में निर्मल दरबार लगता था। करीब 36 टीवी चैनल से लेकर न्यूज चैनल पर निर्मल बाबा का तीसरी आंख कार्यक्रम का प्रसारण होता था।

जुलाई 2012 के बाद निर्मल दरबार की गतिविधियां एक्साइज विभाग की जांच के दायरे में आईं। उस समय ‘सेवा’ के तहत अधिक क्षेत्रों को शामिल करने के लिए एक नेगेटिव सूची बनाई गई। जुलाई 2012 से दसवंद के संग्रह पर निर्मल बाबा के खिलाफ लगभग 3.58 करोड़ रुपये सर्विस टैक्स लगाया गया। निर्मल बाबा पर देश के अलग-अलग हिस्सों लखनऊ, भोपाल, रायपुर और फतेहपुर में धोखधड़ी से लेकर वित्तीय अनियमितताओं के केस दर्ज हुए। वित्तीय अनियमितताओं के आरोप पर निर्मल बाबा ने इंटरव्यू में कहा था कि मेरे यहां किसी तरह की गड़बड़ नहीं है। मैं चुनौती देता हूं कि किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से मेरे दावों की जांच करवाई जाए। निर्मल बाबा के अनुसार उनका टर्नओवर 235-238 करोड़ का था।

निर्मलजीत सिंह नरुला का जन्म 1952 में पंजाब के पटियाला में हुआ था। निर्मल बाबा की स्कूली शिक्षा समाना, दिल्ली और लुधियाना से हुई। उन्होंने लुधियाना के सरकारी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की। स्नातक करने के बाद उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. की पढ़ाई की, लेकिन दो महीने बाद ही टाइफाइड हो जाने के कारण वे आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने बिजनेस में हाथ आजमाने का फैसला किया। 22 साल की उम्र में जब उन्होंने व्यवसाय करने का फैसला किया, तो उन्हें अपनी मां से 90,000 रुपये मिले। वर्ष 1974 में वे ईंट भट्टा व्यवसाय करने के लिए डाल्टनगंज चले गए। वर्ष 1976 में उनकी शादी डाल्टनगंज के ही रहने वाले दलीप सिंह बग्गा की बेटी सुषमा नरूला से हुई।

इसके बाद उन्होंने कपड़ों का कारोबार किया। बाद में रांची जाकर उन्होंने चूना पत्थर और कोयले का बिजनेस शुरू किया। बाद में एक दुर्घटना के बाद उन्हें एक साल से अधिक समय तक बेड पर ही रहना पड़ा। ऐसे में रांची में उनका बिजनेस ठप हो गया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ 1983 में अपने दो बच्चों के साथ दिल्ली आकर नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया। दिल्ली में उन्होंने समागम करना शुरू कर दिया।निर्मल दरबार में शामिल होने के लिए 3 हजार तो टीवी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए 5 हजार रुपये फीस देनी होती थी। वो पूरी तरह से सेलिब्रिटी बन गए थे। ये रजिस्ट्रेशन वेबसाइट के जरिये होते थे। भव्य ऑडिटोरियम में निर्मल दरबार लगता था। करीब 36 टीवी चैनल से लेकर न्यूज चैनल पर निर्मल बाबा का तीसरी आंख कार्यक्रम का प्रसारण होता था। इसके बाद उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। उनके भक्त निर्मलजीत सिंह नरूला को निर्मल बाबा के नाम से पुकारने लगे थे। वर्ष 2006 में उन्होंने टेलीविजन चैनलों पर आना शुरू किया। विभिन्न चैनलों पर आने के बाद बहुत ही कम समय में उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी थी।

कुंवारी लड़कियों पर गंदी नजर रखते हैं स्वयंभू ढोंगी बाबा!

कई स्वयंभू ढोंगी बाबा ऐसे हैं जो कुंवारी लड़कियों पर गंदी नजर लगते हैं! एक शहर में दरबार लगा है। यह दरबार किसी राजा-महाराजा का नहीं, बल्कि एक स्वयंभू बाबा का है, जो खुद को ईश्वर का अवतार बताता है। एक व्यक्ति भरे दरबार में खड़ा होता है और कहता है कि बाबा मुझे नौकरी नहीं लगी है। इस पर बाबा कहते हैं कि तुमने पिछली बार समोसा कब खाया था? वह व्यक्ति कहता है कि मैंने पिछले संडे को समोसा खाया था। तब बाबा पूछते हैं कि यह जो समोसा तुमने खाया, वो लाल चटनी के साथ खाई थी या हरी चटनी के साथ? तब वह आदमी कहता है कि लाल चटनी के साथ। इस पर बाबा फौरन कहते हैं कि बस यही कृपा रुकी हुई है। अबकी बार जब भी समोसा खाना तो हरी चटनी के साथ खाना। कृपा दौड़ती हुई आएगी। यह तो एक बाबा की कहानी है। अब जरा एक और बाबा की कहानी जान लीजिए। इससे पहले इसी साल फरवरी में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दो नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म करने वाले एक पाखंडी बाबा को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। आरोप है कि बाबा लोगों को दैवीय शक्तियों से पैसों की बारिश होने का झांसा देता था। वह कहता था कि बेटियों को अनुष्ठान में भेजो तो पैसों की बारिश कराऊंगा। दरअसल, पीड़िता के परिवार को यह जानकारी मिली थी कि बाबा कहे जाने वाला कुलेश्वर सिंह राजपूत कुंवारी लड़कियों की पूजा करवाता है, जिसके बाद काफी पैसा बरसता है। इस झांसे में आकर घरवालों ने घर की दोनों नाबालिग बेटियों को पाखंडी बाबा के पास रतनपुर भेजा।

आप किसी भी शहर में चले जाएं या आप ट्रेन से कहीं गुजर रहे हों तो अक्सर शहर आते ही दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में वशीकरण, सौतन और दुश्मन से छुटकारा पाएं, प्यार में चोट खाए प्रेमी यहां संपर्क करें जैसे विज्ञापनों की बाढ़ देखने को मिलती है। ज्यादातर विज्ञापन बाबा बंगाली के नाम से छपे हुए दिखते हैं, जो शर्तिया समस्या का समाधान करने की बात कहते हैं। भारत सच्चे साधु-संतों के साथ-साथ ऐसे फर्जी और ढोंगी बाबाओं का भी गढ़ रहा है, जिनके पास हमराज चूर्ण की तरह हर समस्या का समाधान है। उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक सत्‍संग के दौरान भगदड़ मच गई। हाथरस के सिकंदराराऊ थाना क्षेत्र के गांव फुलरई में आयोजित भोले बाबा के सत्संग में मची भगदड़ में 100 से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी। मरने वालों में ज्‍यादातर महिलाएं और बच्‍चे हैं। बताया जा रहा है कि भोले बाबा मूल रूप से कांशीराम नगर (कासगंज) में पटियाली गांव के रहने वाले हैं।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने 2017 में 14 ऐसे फर्जी बाबाओं की लिस्ट तैयार की थी, जो मनी लॉन्ड्रिंग, रेप और हत्या के कई मामलों में आरोपी रहे थे। इनमें डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम, आसाराम, नारायण साई, राधे मां, रामपाल, स्वामी असीमानंद, स्वामी सच्चिदानंद, ओम स्वामी, निर्मल बाबा, इच्छाधारी भीमानंद, आचार्य कुशमुनि, बृहस्पति गिरि और मलखान सिंह शामिल थे।

राम रहीम पर रेप और हत्या के मामले चल रहे हैं। आसाराम बापू पर हत्या और रेप का मुकदमा दर्ज है और वह 2013 से जेल में बंद है। आसराम के बेटे नारायण साई पर शिष्या से रेप के आरोप हैं। राधे मां पर दहेज उत्पीड़न को बढ़ावा देने का आरोप है। संत रामपाल पर हत्या का आरोप है। स्वामी असीमानंद पर 4 आतंकी हमलों की साजिश रचने के आरोप हैं। स्वामी सच्चिदानंद को डिस्को बाबा या बिल्डर बाबा भी कहा जाता है, जिस पर शराब के कारोबार के आरोप हैं। वहीं, बिग बॉस सीजन 10 में रहे ओम स्वामी पर महिला पर यौन शोषण का आरोप है। निर्मल बाबा पर टैक्स चोरी करने और अंध विश्वास फैलाने के आरोप हैं। इच्छाधारी भीमानंद पर एक सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है। आचार्य कुशमनि, बृहस्पति गिरि और मलखान सिंह पर भी ऐसे ही आरोप हैं। हालांकि, इन सभी ने अखाड़ा परिषद की इस लिस्ट को नकार दिया था।

बाबाओं के बारे में एक बड़ी थ्योरी अमेरिकन सोशियोलॉजिस्ट जॉर्ज रिजर ने दी है। उन्होंने 2011 में अपनी किताब सोशियोलॉजिकल थ्योरी में बताया है कि जितने भी धार्मिक नेता होते हैं, उनमें ज्यादातर चमत्कार का सहारा लेते हैं। ऐसे लोग एक समूह बनाते हैं, जो उनमें आस्था रखते हैं और दूसरे लोगों को बाबा की खूबियों और उनके चमत्कार को बताते हैं। इससे ज्यादा से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। स्टडी में कहा गया है कि ज्यादातर बाबा लोगों को उनकी समस्याओं को लेकर टार्गेट करते हैं और उनसे मुक्ति दिलाने के नाम पर पैसे बनाते हैं या गलत काम करते हैं। उन्होंने इसके लिए एक सर्वे किया, जिसमें यह पता लगा कि ऐसे धार्मिक सत्संगों में सबसे ज्यादा जाने वाली महिलाएं होती हैं। पुरुष भी जाते हैं। सत्संग में सबसे ज्यादा 40 से 50 साल के बीच की महिलाएं और पुरुष जाते हैं। सबसे कम संख्या 20 से 30 साल वालों की होती है। सर्वे में यह निकलकर आया कि 20 से 30 साल वाले अपनी सामाजिक जिंदगी से संतुष्ट होते हैं और वह हर तरह से खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। वहीं, 40-50 के बीच वालों में ज्यादातर सामाजिक असुरक्षा और अंसतोष का भाव होता है।

जानिए राधे मां की स्टाइलिश कहानी!

आज हम आपको राधे मां की स्टाइलिश कहानी बताने जा रहे हैं! हाथरस में पिछले दिनों जिस तरह से नारायण साकार हरि उर्फ भोले बाबा के कार्यक्रम में भगदड़ मची और 121 लोगों की जान चली गई, उसे लेकर घमासान जारी है। इस घटना के बाद से लगातार भोले बाबा सुर्खियों में हैं। उनको लेकर अपडेट भी सामने आ रहे हैं। इसी बीच देश के उन स्वयंभू बाबाओं का भी जिक्र तेज हो गया, जो अलग-अलग वजहों से विवादों में रहे। इनमें एक नाम ‘राधे मां’ का भी है। खुद को गॉडवुमन कहने वाली राधे मां काफी मशहूर रही हैं। वो न केवल खुद को देवी का अवतार बताती बल्कि कई दैवीय शक्ति होने का दावा भी करती हैं। एक समय उनकी लोकप्रियता काफी ज्यादा थीं। हालांकि, अपनी जीवन शैली, ड्रेस, मेकअप, भक्तों से गले मिलने और उन्हें फूल देकर आई लव यू कहने जैसी कई चीजों के चलते वो विवादों में आ गईं। यही नहीं साल 2017 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने फर्जी संतों की एक लिस्ट जारी की, जिसमें राधे मां का नाम भी शामिल था। जानिए राधे मां की पूरी कहानी। राधे मां का असली नाम सुखविंदर कौर है। उनका जन्‍म 4 अप्रैल 1965 को पंजाब के गुरदासपुर में दोरांगला गांव में हुआ। सुखविंदर कौर के बारे में बताया जाता है कि वह 10वीं कक्षा तक पढ़ी हैं। महज 17 साल की उम्र में उनकी शादी मुकेरिया के मनमोहन सिंह से हुई थी। मनमोहन सिंह एक मिठाई की दुकान पर काम करते थे। उनकी शुरुआती कमाई बेहद कम थी। इस दौरान एक साधारण गृहिणी के तौर पर सुखविंदर कौर सिलाई काम करती थीं। मुंबई मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, जल्द ही उनके पति अधिक पैसा कमाने के लिए खाड़ी देश चले गए थे। पति के जाने पर सुखविंदर कौर स्थानीय परमहंस डेरा से जुड़ गईं। इसी के बाद सुखविंदर कौर का झुकाव आध्यात्म की ओर हो गया और जल्द ही वो राधे मां बनकर चर्चित हो गईं।

राधे मां के जानने वाले बताते हैं कि 21 साल की उम्र में सुखविंदर कौर महंत रामदीन दास के शरण में जा पहुंचीं। उन्‍होंने सुखविंदर को छह महीने तक दीक्षा दी। आध्यात्म की दीक्षा के बाद रामदीन दास ने ही सुखविंदर को नया नाम राधे मां दिया। इसी के बाद वो राधे मां के नाम से जानी जाने लगीं। पंजाब के मुकेरियां में साधारण गृहिणी रहीं सुखविंदर कौर फिर राधे मां बनकर मुंबई आईं और सत्संगों के माध्यम से प्रसिद्ध हुईं।

मुंबई आने के बाद राधे मां लगातार माता की चौकी, सत्संग और जागरण करतीं। इससे धीरे-धीरे हजारों की संख्या में उनके फॉलोअर्स जुड़ने लगे। राधे मां के भक्‍तों में कई बॉलि‍वुड सेलीब्रिटीज भी हैं। कई सिलेब्रिटीज की तस्वीरें राधे मां के साथ सामने आ चुकी हैं। राधे मां, आम तौर पर माता की चौकी और जागरण में जाती रहती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके यहां एक रेट कार्ड होता। राधे मां की चौकी का खर्चा करीब 5 लाख से 35 लाख रुपये तक होता।

राधे मां अपनी ड्रेस, अपने श्रद्धालुओं से मिलने की स्टाइल को लेकर सुर्खियों में रही हैं। साल 2015 में सोशल मीडिया पर राधे मां की कुछ तस्‍वीरें वायरल हुईं। आम तौर पर राधे मां हाथ में त्रिशुल लिए हुए माता के अवतार में नजर आती थी। इसी बीच उनकी एक तस्वीर सामने आई जिसमें वो लाल रंग की मिनी स्कर्ट और लाल रंग के बूट्स में नजर आईं थीं। उनकी इन तस्वीरों को लेकर विवाद भी हुआ था। कुछ लोगों ने उनके ख‍िलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी थी।

राधे मां को लेकर कई और विवाद भी सामने आए थे। इनमें किसी भक्त को राधे मां किस करते नजर आईं थीं, उस पर भी हंगामा मचा था। राधे मां अपने किसी भक्त को गले लगाते हुए नजर आ चुकी हैं। कुछ भक्‍त उनकी गोद में लेटे हुए भी नजर आए। राधे मां का इन मामलों में यही कहना था कि वह अपने भक्‍तों में प्‍यार बांटती हैं और ऐसे ही आशीर्वाद देती हैं। जल्द ही उनके पति अधिक पैसा कमाने के लिए खाड़ी देश चले गए थे। पति के जाने पर सुखविंदर कौर स्थानीय परमहंस डेरा से जुड़ गईं। इसी के बाद सुखविंदर कौर का झुकाव आध्यात्म की ओर हो गया और जल्द ही वो राधे मां बनकर चर्चित हो गईं।राधे मां के ख‍िलाफ कई केस दर्ज हुए हैं। उन पर एक बिजनेसमैन ने अपना बंगला कब्जाने का भी आरोप लगाया था।

जब अशांति के साथ हुई नई संसद की पहली शुरुआत!

हाल ही में नई संसद की पहली शुरुआत अशांति के साथ हुई है! प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरी मेहताब ने लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला के चयन की घोषणा की तो राहुल गांधी बधाई देने पहुंच गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राहुल को आते देख इशारे से कहा- आइए। राहुल पहुंचे तो पहले बिरला और फिर मोदी से हाथ मिलाया। तब तक संसदीय कार्य मंत्री की हैसियत से किरेन रिजिजू भी आए और तीनों ने मिलकर ओम बिरला को अध्यक्ष के आसन तक पहुंचाया। वहां भर्तृहरि मेहताब ने उनका स्वागत किया और उनके लिए आसन छोड़ दिया। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और आखिर में किरेन रिजिजू ने अध्यक्ष का अभिवादन किया। तब ऐसा लगा जैसे अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बीच बातचीत टूटने के बाद राहुल गांधी का पीएम मोदी का नाम ले-लेकर हमले से सत्ता पक्ष और विपक्ष में जो खाई पैदा हुई, वो पट चुकी है। लेकिन कुछ ही समय बाद ऐसी स्थिति बन गई जिससे लगा कि क्या संसद में शांति की उम्मीद की भी जा सकती है? हुआ ये कि आसन पर विराजमान होते ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सदन में विपक्ष के नेता राहुल गांधी एवं विभिन्न दलों के प्रमुख सांसदों का आह्वान किया। प्रधानमंत्री के 10 मिनट से ज्यादा के बधाई भाषण के बाद राहुल गांधी, अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी सांसदों ने संक्षेप में अध्यक्ष को बधाई दी। राहुल गांधी ने पहले वाक्य में बिरला को बधाई तो दी, लेकिन तुरंत यह भी कहने लगे कि अध्यक्ष महोदय को विपक्ष को भारतीयों की आवाज सदन में पहुंचाने का पर्याप्त मौका देना चाहिए। अखिलेश यादव ने भी ‘बहुत-बहुत बधाई’ देकर राहुल गांधी की अपील का ही समर्थन किया। बल्कि अखिलेश ने तो यहां तक कहा कि आपका अंकुश विपक्ष पर तो रहता ही है, सत्ता पक्ष पर भी रहे। बधाई की औपचारिकता पूरी होने के बाद अध्यक्ष ओम बिरला ने अपना एक वक्तव्य दिया और सदन का माहौल तुरंत बदल गया।

दरअसल, लोकसभा अध्यक्ष ने अपने पहले वक्तव्य में 50 साल पहले तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल की जोरदार निंदा की। उन्होंने लंबे-चौड़े वक्तव्य में कई बार ‘कांग्रेस’ और ‘काला दिन’ का जिक्र किया। इस पर कांग्रेस पार्टी के सांसद खड़े हो गए और शोर करने लगे। हालांकि, उन्हें अपने गठबंधन साथियों से ही समर्थन नहीं मिला। सपा, टीडीपी और टीएमसी संसद ने आपातकाल पर अध्यक्ष के वक्तव्य का समर्थन किया और अपनी सीट पर बैठे रहे। शोर-शराबे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ने अपना वक्तव्य पूरा किया और तुरंत अगले दिन गुरुवार के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित करने की घोषणा कर दी। थोड़ी देर पहले जिस सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ‘सब चंगा सी’ जैसा माहौल दिखा था, वह तुरंत बदल गया और शोर-शराबे और हंगामे से सदन गूंज उठा।

सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद सत्ता पक्ष के सांसदों ने संसद के मकर द्वार पर तख्ती-पट्टी लेकर आपातकाल के खिलाफ नारेबाजी की। उन्होंने आपातकाल के लिए कांग्रेस पार्टी से माफी की मांग की। बैनरों में तरह-तरह के नारे लिखे थे। एक नारा था- आपातकाल को न हम भूलेंगे, न माफ करेंगे और ना फिर कभी ऐसा होने देंगे। मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों समेत सत्ता पक्ष के सांसदों ने जो बैनर थाम रखे थे, उनमें ‘कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं’, ‘तानाशाही की मानसिकता कांग्रेस की असलियत है’ जैसे नारे लिखे हुए थे। सभी ने नारे लगाए, ‘माफी मांगो, माफी मांगो, इमर्जेंसी के लिए माफी मांगो।’

दरअसल, संपूर्ण विपक्ष और खासकर कांग्रेस पार्टी ने चुनावों में ‘संविधान बचाओ’ का खूब नारा लगाया। विपक्ष ने मतदाताओं के मन में भय पैदा करने की कोशिश की कि अगर मोदी सरकार सत्ता में लौटी तो संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देगी। इसका खासकर उत्तर प्रदेश में खासा असर हुआ और बीजेपी की सीटें आधी हो गईं। इससे उत्साहित विपक्ष और खासकर राहुल गांधी संवाददाता सम्मेलनों से लेकर संसद तक संविधान की प्रतियां लहराने लगे। राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी सासंदों ने पद की शपथ लेते वक्त संविधान की प्रति हाथ में थामे रखी। इस पर सत्ता पक्ष को जवाब देना था। फिर 25 जून की तारीख भी आई। यह वही तारीख थी जब 50 वर्ष पहले इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया था। बीजेपी ने ‘संविधान की रट’ के जवाब में कांग्रेस को आपातकाल से घेरा। सवाल है कि क्या अब विपक्ष संविधान पर सरकार को घेरना छोड़ेगी? अगर नहीं तो क्या संसद में शांति की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए?

क्या इस बार विपक्ष करके बैठा है पूरी तैयारी?

इस बार विपक्ष पूरी तैयारी करके बैठा है! लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटों में भारी गिरावट का असर मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में दिखाई दे सकता है। दरअसल विपक्षी दल पहले से ज्यादा ताकतवर हैं और कांग्रेस की सीटों में उम्मीद से ज्यादा इजाफा हुआ है। ऐसे में विपक्षी दलों का इंडिया एलायंस संसद के अंदर खुद को मजबूत स्थिति में देख रहा है। 99 सीटों के साथ कांग्रेस का भी जोश हाई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद कांग्रेस और इंडिया एलायंस की नजरें अब स्थायी समितियों की अध्यक्षता पर है। लोकसभा चुनाव में 236 सीटें जीतने के बाद, विपक्षी दलों के इंडिया गुट को उम्मीद है कि उन्हें पिछले सदन में विपक्ष को मिलीं विभागों से जुड़ी स्थायी समितियों की तुलना में ज्यादा समितियों की अध्यक्षता मिलेगी। इन समितियों की घोषणा आगामी मॉनसून सत्र के दौरान होने की उम्मीद है। खबर के मुताबिक, लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों ने पार्टियों को चिट्ठी लिखी है। इन चिट्ठियों में पार्टियों से उनके सांसदों को 24 अलग-अलग समितियों (पैनल) के लिए नामित करने के लिए कहा गया है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा, ‘लोकसभा सचिवालय ने मुझे चिट्ठी लिखकर विभिन्न समितियों के लिए सांसदों के नाम मांगे हैं।’ कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के दफ्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी पुष्टि की है कि उन्हें राज्यसभा सचिवालय से भी इसी तरह का अनुरोध मिला है। लोकसभा के लिए 16 और राज्यसभा के लिए 8 विभागों से जुड़ी स्थायी समितियां हैं। दरअसल इन समितियों के अध्यक्षों पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इन अध्यक्षों को चुनने का फैसला राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला करेंगे।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ रणनीतिकार ने बताया कि इंडिया गुट को स्थायी समितियों में कम से कम तीन अतिरिक्त अध्यक्ष पद मिलने की उम्मीद है।उन्होंने बताया, ‘कांग्रेस को एक और समिति मिलनी चाहिए। समाजवादी पार्टी को भी एक समिति मिलनी चाहिए, क्योंकि अभी उनकी अगुवाई में कोई समिति नहीं है। वहीं तृणमूल कांग्रेस को भी एक अध्यक्ष पद मिलना चाहिए।’ इसके अलावा, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के संसद की लेखा परीक्षा समिति पब्लिक अकाउंट्स कमेटी का अध्यक्ष बनने की संभावना है और कुछ अन्य विपक्षी नेताओं को भी कुछ समितियों की जिम्मेदारी मिल सकती है।

मई 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले, कांग्रेस पार्टी ने तीन स्थायी समितियों की अगुवाई की थी। इसमें वाणिज्य, पर्यावरण और रसायन एवं उर्वरक शामिल है। तृणमूल, संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद, उसे कोई अध्यक्ष पद नहीं मिला। समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव ने शुरुआत में स्वास्थ्य समिति की अध्यक्षता की थी, लेकिन कुछ समय बाद यह भाजपा को वापस मिल गई। द्रमुक की कनिमोई ने ग्रामीण विकास पैनल का नेतृत्व किया। इस बार समाजवादी पार्टी (दोनों सदनों में 41 सांसद) और टीएमसी (दोनों सदनों में 42 सांसद) को कम से कम एक-एक अध्यक्ष पद मिलने का हक बनता है। विपक्ष (कांग्रेस के अलावा) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘लेकिन अंतिम फैसला धनखड़ या बिरला लेंगे।’

विपक्ष के एक पदाधिकारी ने तर्क दिया कि ‘55% सांसद सत्ता पक्ष के साथ हैं जबकि 45% विपक्ष में हैं। यदि अध्यक्ष पदों का वितरण इसी अनुपात में किया जाता है, तो सत्तारूढ़ पक्ष को विभाग-संबंधी स्थायी समितियों के 13 अध्यक्ष मिलने चाहिए, जो विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की देखरेख करती हैं, और अन्य को 11 मिलने चाहिए।’ विभागों से जुड़ी 24 स्थायी समितियों के अलावा, संसद में और भी कई समितियां होती हैं। ये समितियां देश की सबसे ऊंची कानून बनाने वाली संस्था के कामकाज के अलग-अलग पहलुओं को संभालती हैं। इनमें वित्त से जुड़ी समितियां, कुछ समय के लिए बनाई जाने वाली अस्थायी समितियां और अन्य स्थायी समितियां शामिल हैं।

सत्र चलने के दौरान, लोकसभा और राज्यसभा कभी-कभी विशेष समितियां या संयुक्त संसदीय समितियां भी बनाती हैं। ये समितियां किसी खास कानून या महत्वपूर्ण मुद्दे की समीक्षा करने के लिए बनाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, शेयर बाजार घोटाले की जांच के लिए या शीतल पेय और पेय पदार्थों में कीटनाशक होने की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समितियां बनाई जा सकती हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के संसद की लेखा परीक्षा समिति पब्लिक अकाउंट्स कमेटी का अध्यक्ष बनने की संभावना है और कुछ अन्य विपक्षी नेताओं को भी कुछ समितियों की जिम्मेदारी मिल सकती है।दो नेताओं के अनुसार, सचिवालयों ने पार्टियों से मानसून सत्र 22 जुलाई से शुरू होने से पहले अपने नामांकन जमा करने का अनुरोध किया है।

क्या दोबारा से शुरू हो सकता है किसान आंदोलन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या किसान आंदोलन दोबारा से शुरू हो सकता है या नहीं! पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा शंभू बॉर्डर को खोलने का आदेश दिए जाने के बाद अब किसानों ने अपनी अगली रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। किसान संगठन 14 जुलाई को शंभू व खनौरी बार्डर के किसानों के साथ एक मीटिंग करेंगे, इसमें आगामी रणनीति पर चर्चा की जाएगी। दरअसल, शंभू बार्डर खुलने के आदेश के बाद किसान संगठनों द्वारा एमएसपी सहित कई मांगों को लेकर दिल्ली कूच करने का निर्णय लिया जा सकता है। एमएसपी खरीद गारंटी कानून मोर्चा के हरियाणा संयोजक व भाकियू लोकशक्ति के प्रदेशाध्यक्ष जगबीर घसोला ने हाईकोर्ट के फैसले को किसानों की जीत बताया है। जगबीर घसोला ने कहा कि हरियाणा सरकार की तानाशाही के चलते पंजाब के किसानों को शंभू बॉर्डर पर करीब 6 माह पहले रोक दिया गया। इस वजह से किसान अपनी मांगों को लेकर शंभू बॉर्डर पर ही डटे रहे। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉर्डर खोलने का फैसला सुनाया है। शंभू बॉर्डर के खुलने से आमजन को भी आने-जाने में कोई परेशानी नहीं होगी।

किसान नेता ने कहा कि 14 जुलाई को शंभू व खनौरी बॉर्डर के किसानों के साथ किसान संगठनों की मीटिंग होगी और इसमें एमएसपी सहित कई मांगों को लेकर दिल्ली कूच करने का भी निर्णय लिया जा सकता है। किसान संगठनों ने कोर्ट के फैसले को किसानों की जीत बताते हुए कहा कि मीटिंग में आगामी आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार की जाएगी। अगर जरूरी होगा तो देश भर के किसान आंदोलन में शामिल होंगे और मांगों को पूरा कराकर ही दम लेंगे।उन्होंने कहा कि हरियाणा के किसान संगठनों के नेता पंजाब और अन्य राज्यों के किसान नेताओं से कोआर्डिनेट करेंगे। साथ ही किसान आंदोलन के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाकर अपनी मांगों को पूरा करने की मांग करेंगे।

संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने आज ऐलान किया कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी और कृषि ऋण माफी सहित अन्य लंबित मांगों को लेकर फिर से आंदोलन शुरू करेगा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को एक ज्ञापन सौंपेगा। वर्ष 2020-21 के किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले एसकेएम ने अपनी आम सभा की बैठक के एक दिन बाद यह घोषणा की। इस बार शायद संगठन दिल्ली कूच नहीं करेगा। एसकेएम में अलग-अलग किसान संगठन शामिल हैं। संगठन के नेताओं ने कहा कि प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और राज्यसभा तथा लोकसभा के सदस्यों से मुलाकात करने तथा उन्हें किसानों की मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपने के लिए 16 से 18 जुलाई के बीच का समय मांगा जाएगा। बता दें कि करीब पांच महीने से शंभू बार्डर पर बैठे किसानों के कारण अब आम लोग और आसपास के ग्रामीण प्रभावित हो रहे हैं। इस चलते पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट वासु रंजन शांडिल्य ने शनिवार को हाई कोर्ट में शंभू बॉर्डर खुलवाने को लेकर जनहित याचिका दायर की है। याचिका में बताया गया है कि आंदोलन के कारण पांच महीने से नैशनल हाइवे 44 बंद पड़ा है। इससे अंबाला के दुकानदार, व्यापारी, छोटे-बड़े रेहड़ी फड़ी वाले भुखमरी के कगार पर आ गए हैं। याचिका में मांग की गई है कि शंभू बॉर्डर को तुरंत प्रभाव से खोलने के आदेश दिए जाएं। इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई होने की उम्मीद है।

वासु रंजन शांडिल्य ने याचिका में पंजाब और हरियाणा सरकार सहित किसान नेता स्वर्ण सिंह पंढेर और जगजीत सिंह डल्लेवाल को भी पार्टी बनाया है। याचिका में बताया गया है कि शंभू बॉर्डर बंद होने के कारण सरकारी बसों का रूट डायवर्ट किया हुआ है, जिससे तेल का खर्च बढ़ रहा है। अंबाला और शंभू के आसपास के मरीज बॉर्डर बंद होने के कारण दिक्कत में हैं। एंबुलेंस के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा-पंजाब के वकीलों को भी अंबाला से पटियाला और पटियाला वालों को अंबाला की अदालतों में आने में भारी दिक्कतें हो रही है। एडवोकेट वासु रंजन ने बताया कि फरवरी 2024 से गैर कानूनी तरीके से संविधान का उल्लंघन कर राष्ट्रीय हाइवे को बंद किया हुआ है और शंभू बॉर्डर के आसपास किसानों ने अस्थायी घर बना लिए हैं, ऐसा लगता है कि जैसे अब शंभू बॉर्डर कभी खुलेगा ही नहीं। यह अनिश्चितकाल के लिए बंद हो गया है। हाई कोर्ट केंद्र और दोनों राज्य सरकारों को रास्ता खोलने के आदेश दें।

वासु रंजन ने कहा कि रास्ता किसके कारण और क्यों बंद है, इस पर निर्णय हाई कोर्ट करेगा। रोड को बंद करना जनता के मौलिक अधिकारों का हनन है। रोड बंद होने से अंबाला और पटियाला जिले का छोटा-बड़ा काम बंद हो चुका है। यह हाइवे पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर को जोड़ता है। इसके बंद होने से न केवल सरकारों को नुकसान हो रहा है, बल्कि आम आदमी भी परेशान है।

गार्ज़ा में चार मिलियन टन कंक्रीट, स्टील का मलबा, हटाने में 15 साल! संयुक्त राष्ट्र ने कहा, क्या है कीमत?

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संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि गाजा के अलग-अलग हिस्सों में जमा हुआ मलबा खासकर आम फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए ”घातक” हो सकता है. इजरायली सेना के बम-गोले-मिसाइलों के कारण गाजा में 40 लाख टन कंक्रीट और स्टील का मलबा जमा हो गया है. अगर अभी हमला रोक दिया गया तो इसे हटाने में लगभग 15 साल लग जाएंगे! संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

7 अक्टूबर को आजादी समर्थक फिलिस्तीनी सशस्त्र समूह हमास के हमले के बाद से इजरायली सेना गाजा पट्टी पर लगातार हमले कर रही है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और फिलिस्तीन शरणार्थी राहत और रोजगार एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) ने नौ महीने के युद्ध की स्थिति की समीक्षा की और कहा कि चार मिलियन टन के मलबे के नीचे बिना फटे बम और विभिन्न हानिकारक पदार्थ जमा हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि गाजा के विभिन्न हिस्सों में जमा हुआ मलबा खासकर आम फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए “घातक” हो सकता है. इसके अलावा कई शव मलबे के नीचे दबे हुए हैं और उनके सड़ने का भी खतरा है. रिपोर्ट के मुताबिक, मलबे को सुरक्षित हटाने के लिए कम से कम 500 मिलियन डॉलर (करीब 4200 मिलियन टका) की जरूरत है। संयोग से, 2014 में गाजा पर इजरायली हमले के बाद करीब 24 लाख टन मलबा हटाना पड़ा था.

दक्षिणी गाजा के अल मवासी में जमीन पर अभी भी ताजा इजरायली टैंक के पहिये के निशान हैं। हवा में बारूद की गंध. फ़िलिस्तीनी किसान नेदाल अबू जाहेर एक मृत टमाटर का पौधा उठाए हुए हैं। उन्होंने थकी हुई आवाज में कहा, यह विनाश का नमूना है. हम साधारण किसान हैं, अचानक एक दिन टैंक आए और गोलाबारी शुरू कर दी, मिसाइलें दागने लगीं।” अबू जाहेर के पीछे उसके ग्रीनहाउस के खंडहर हैं। जाहेर ने मीडिया को बताया कि इजराइल ने इस क्षेत्र की पहचान मानवीय क्षेत्र के रूप में की है.

अबू जाहेर अकेले नहीं हैं. 7 अक्टूबर, 2023 को, इज़राइल-हमास संघर्ष शुरू हुआ, जिसमें पूरे पूर्वी गाजा पट्टी में लगभग 57 प्रतिशत कृषि भूमि नष्ट हो गई। इसका खुलासा हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (खाद्य एवं कृषि संगठन) और कृत्रिम उपग्रह संगठन यूएनओएसएटी द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित एक रिपोर्ट में हुआ है। एफएओ के मैथ्यू हेनरी ने स्पष्ट किया कि फिलिस्तीन की 30 प्रतिशत खाद्य आपूर्ति कृषि से आती है। वे नष्ट हो गए हैं. 2022 में गाजा ने इजराइल, वेस्ट बैंक और दुनिया के अन्य हिस्सों में लगभग 4 करोड़ 46 लाख रुपये के कृषि उत्पादों का निर्यात किया। स्ट्रॉबेरी और टमाटर उनमें से एक हैं. संघर्ष की शुरुआत के बाद से, निर्यात की मात्रा शून्य हो गई है। खेत में गोलाबारी चल रही है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, गाजा में चल रहे खाद्य संकट के लिए यह विनाश काफी हद तक जिम्मेदार है।

हालाँकि, इज़रायली सेना का दावा है कि कृषि भूमि और बगीचों पर जानबूझकर हमला नहीं किया गया था। हमास सशस्त्र बल ज्यादातर इन्हीं इलाकों से हमले करते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक समूह का दावा है कि इज़राइल वास्तव में हमास को भूखा रखकर गाजा को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है। गाजा लगभग नष्ट हो चुका है, फिर भी इज़रायली हमले जारी हैं।

दक्षिणी गाजा के अल मवासी में जमीन पर अभी भी ताजा इजरायली टैंक के पहिये के निशान हैं। हवा में बारूद की गंध. फ़िलिस्तीनी किसान नेदाल अबू जाहेर एक मृत टमाटर का पौधा उठाए हुए हैं। उन्होंने थकी हुई आवाज में कहा, यह विनाश का नमूना है. हम साधारण किसान हैं, अचानक एक दिन टैंक आए और गोलाबारी शुरू कर दी, मिसाइलें दागने लगीं।” अबू जाहेर के पीछे उसके ग्रीनहाउस के खंडहर हैं। जाहेर ने मीडिया को बताया कि इजराइल ने इस क्षेत्र की पहचान मानवीय क्षेत्र के रूप में की है.

अबू जाहेर अकेले नहीं हैं. 7 अक्टूबर, 2023 को, इज़राइल-हमास संघर्ष शुरू हुआ, जिसमें पूरे पूर्वी गाजा पट्टी में लगभग 57 प्रतिशत कृषि भूमि नष्ट हो गई। इसका खुलासा हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (खाद्य एवं कृषि संगठन) और कृत्रिम उपग्रह संगठन यूएनओएसएटी द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित एक रिपोर्ट में हुआ है। एफएओ के मैथ्यू हेनरी ने स्पष्ट किया कि फिलिस्तीन की 30 प्रतिशत खाद्य आपूर्ति कृषि से आती है। वे नष्ट हो गए हैं. 2022 में, गाजा ने इज़राइल, वेस्ट बैंक और दुनिया के अन्य हिस्सों में लगभग 4.46 मिलियन टका के कृषि उत्पादों का निर्यात किया। स्ट्रॉबेरी और टमाटर उनमें से एक हैं. संघर्ष की शुरुआत के बाद से, वे निर्यात शून्य हो गए हैं। खेत में गोलाबारी चल रही है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, गाजा में चल रहे खाद्य संकट के लिए यह विनाश काफी हद तक जिम्मेदार है।

हालाँकि, इज़रायली सेना का दावा है कि कृषि भूमि और बगीचों पर जानबूझकर हमला नहीं किया गया था। हमास सशस्त्र बल ज्यादातर इन्हीं इलाकों से हमले करते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक समूह का दावा है कि इज़राइल वास्तव में हमास को भूखा रखकर गाजा को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है। गाजा लगभग नष्ट हो चुका है, फिर भी इज़रायली हमले जारी हैं।