Thursday, March 5, 2026
Home Blog Page 683

जब राजनीतिक मैदान में उतरे रामायण और महाभारत के किरदार!

हाल ही में रामायण और महाभारत के किरदार राजनीतिक मैदान में उतर चुके हैं! 1987 में दूरदर्शन पर आए टीवी सीरियल रामायण और 1988 में प्रसारित हुए महाभारत के किरदार आज भी घर-घर में पहचाने जाते हैं। उनमें से कई किरदारों ने राजनीति में सफल पारियां भी खेलीं। रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी हों या सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका चिखलिया या हनुमान की भूमिका में दिखे दारा सिंह, सभी ने राजनीति में हाथ आजमाया। इन सभी को बीजेपी ने राजनीति के मैदान में उतारा था। भगवान राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल 2024 के लोकसभा चुनाव में मैदान में है। BJP ने उन्हें मेरठ लोकसभा सीट से टिकट दिया है। 2021 में BJP में शामिल हुए अरुण गोविल का जन्म मेरठ में हुआ था। उन्होंने BJP के मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल की जगह ली है। महाभारत में श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज, द्रौपदी बन लोगों को अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली रूपा गांगुली, भीम का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार, युधिष्ठिर बने गजेंद्र चौहान भी राजनीति में किस्मत आजमा चुके हैं और ज्यादातर कलाकारों ने BJP को ही चुना है।

1991 के लोकसभा चुनाव में रामायण के दो बड़े कलाकार संसद पहुंचे थे। सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका चिखलिया और रावण के किरदार से हर किसी को प्रभावित करने वाले अरविंद त्रिवेदी गुजरात के चुनावी मैदान में उतरे। दोनों ही कलाकारों को BJP ने लोकसभा का टिकट दिया था। राजनीतिक दलों ने रामायण और महाभारत धारावाहिक के कलाकारों की लोकप्रियता को भांप लिया था और यही कारण था कि कई कलाकारों को चुनावी मैदान में उतारने के लिए कोशिशें शुरू हुई थीं। दीपिका चिखलिया को वडोदरा (बड़ौदा) से चुनावी मैदान में उतारा गया था। वह तब 26 साल की थीं। उन्होंने चुनाव में जीत भी हासिल की। रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी ने 1991 में गुजरात के साबरकांठा से जीत हासिल की थी। अरविंद त्रिवेदी अब हमारे बीच नहीं है। 6 अक्टूबर 2021 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया था। BJP ने अरुण गोविल को उत्तर प्रदेश के मेरठ लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है। सवाल यह है कि 1990 के समय जब रामायण के कलाकारों की लोकप्रियता आसमान छू रही थी तो गोविल को किसी दल ने चुनावी मैदान में क्यों नहीं उतारा? कहा जाता है कि कांग्रेस उन्हें चुनावी मैदान में उतारना चाहती थी, लेकिन अरुण गोविल इसके लिए तैयार नहीं हुए। हालांकि, अब बीजेपी ने उन्हें टिकट दिया है। देखना होगा कि क्या अरुण गोविल अपने साथी कलाकारों अरविंद त्रिवेदी और दीपिका चिखलिया की तरह ही चुनावी राजनीति की शुरुआत जीत से कर पाते हैं या नहीं?

अरविंद त्रिवेदी की तरह दारा सिंह भी अब हमारे बीच नहीं हैं। रामायण में हनुमान का किरदार निभाने वाले दारा सिंह को कौन भूल सकता है। दारा सिंह को BJP ने 2003 में राज्यसभा भेजा था। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय वह राज्यसभा सांसद बने थे। दारा सिंह ने कुश्ती, एक्टिंग, राइटिंग और राजनीति हर जगह अपना प्रभाव छोड़ा। पर्दे पर श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज भी BJP में रह चुके हैं। उन्होंने BJP के टिकट से जमशेदपुर से 1996 में चुनाव लड़ा था। उन्होंने जीत भी हासिल की थी। 1996 के चुनाव में अनुभवी इंदर सिंह नामधारी को हराकर जमशेदपुर से संसद सदस्य के रूप में लोक, महाभारत में द्रौपदी की भूमिका निभाने वाली रूपा गांगुली भी राज्यसभा की मनोनीत सदस्य रह चुकी हैं। BJP ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्हें हावड़ा नॉर्थ से चुनाव लड़ाया था लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली थी। युधिष्ठिर का किरदार निभाने वाले गजेंद्र चौहान भी BJP का हिस्सा रह चुके हैं। उन्होंने साल 2004 में पार्टी की सदस्यता ली थी। पार्टी ने उन्हें 2015 में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया का चेयरमैन बनाया था। भीम का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार को भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। उन्होंने BJP के मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल की जगह ली है। महाभारत में श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज, द्रौपदी बन लोगों को अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली रूपा गांगुली, भीम का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार, युधिष्ठिर बने गजेंद्र चौहान भी राजनीति में किस्मत आजमा चुके हैं और ज्यादातर कलाकारों ने BJP को ही चुना है।प्रवीण एक जाने-माने रेसलर थे। 2014 में प्रवीण को आम आदमी पार्टी की ओर से टिकट मिला। वह दिल्ली के वजीरपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े लेकिन वह हार गए। इसके बाद वह BJP में शामिल हो गए। प्रवीण कुमार का फरवरी 2022 में निधन हो गया।

भ्रामक विज्ञापन के लिए रामदेव बाबा से क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में भ्रामक विज्ञापन के लिए रामदेव बाबा को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है! पंतजलि आयुर्वेद के भ्रामक विज्ञापन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि को फटकार लगाई है। अदालत ने कहा है कि वो पंतजलि के जवाब से संतुष्ट नहीं है। योगगुरु बाबा रामदेव सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए हैं। उनके साथ आचार्य बालकृष्ण भी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बाबा रामदेव को अदालत में पेश होने का समन जारी किया था। अदालत ने पतंजलि और आचार्य बालकृष्ण को अदालत के नोटिस का जवाब नहीं देने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में बाबा रामदेव की ओर से सीनियर वकील बलवीर सिंह पेश हुए। अदालत ने कहा कि आपके खिलाफ दो मामले हैं, जिनका जवाब देना होगा। पंतजलि विज्ञापन मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने सुनवाई की। जस्टिस कोहली ने पूछा कि बाबा रामदेव और दूसरे अवमाननाकर्ता का हलफनामा कहां है? पतंजलि के वकील ने जवाब दिया कि वे कोर्ट के अंदर हैं, भीड़ के कारण हम उन्हें यहां नहीं लाए। जस्टिस कोहली ने पूछा कि बाबा रामदेव के जवाब के बारे में क्या कहना है? वकील ने जवाब दिया कि प्रतिवादी 5 कंपनी है और प्रतिवादी 6 प्रबंध निदेशक है। जस्टिस कोहली ने कहा हम 27 फरवरी के आदेश के पैरा 9 को देख रहे हैं और यह इस बारे में था कि कंपनी और प्रबंधन के खिलाफ अवमानना क्यों नहीं होनी चाहिए और फिर उस हलफनामे को दाखिल न करने का आदेश दिया जाए।

जस्टिस अमानतुल्लाह ने कहा आपको पहले हमें दिखाना होगा कि दोनों जवाब कहां हैं। इसके बाद बाबा रामदेव के वकील ने आचार्य बालकृष्ण का हलफनामा पढ़ा। न्यायमूर्ति कोहली ने कहा एक बार जब यह अदालती कार्यवाही है और निर्देश हैं तो इसकी जानकारी देने के लिए कौन जिम्मेदार है। यदि यह बचाव योग्य नहीं है तो आपकी माफी काम नहीं करेगी। यह सुप्रीम कोर्ट को दिए गए वचन का घोर उल्लंघन है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके वचन का पालन किया जाना चाहिए जो कि गंभीर है। न्यायमूर्ति कोहली ने आगे कहा जो बात हमें प्रभावित करती है वह यह है कि आपने उसके बाद क्या किया। आपने अदालत के नोटिस का उल्लंघन किया। हम इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

जस्टिस कोहली ने कहा आपकी माफी स्वीकार करने का क्या कारण है? आपको मंत्रालय को सूचित करना चाहिए था। आपको यह सब सरकार को बताना चाहिए था। सीनियर वकील सांघी ने कहा कि ये यह व्यावसायिक नहीं है। 24 घंटे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करना दिखाता है कि आपको कार्यवाही के बारे में पता था और फिर भी आपने इसका उल्लंघन किया।इसके जवाब में जस्टिस कोहली बोले कि यह एक व्यावसायिक संगठन है। जस्टिस अमानतुल्लाह ने कहा कि यह मत कहिए कि आप सार्वजनिक हित या सार्वजनिक भलाई की सेवा कर रहे हैं।

इसके बाद बाबा रामदेव के वकील ने अदालत में गलती मानते हुए कहा, ‘चूक हो गई’। जस्टिस कोहली ने कहा कि तो यह अंत है। अगर ये आपसे चूक है तो बस इतना ही। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। सीनियर वकील सिंह ने कहा कि हम बिना शर्त माफी मांग रहे हैं। वह माफी मांगने के लिए यहां व्यक्तिगत रूप से मौजूद हैं।’जस्टिस कोहली ने कहा हमें एक हलफनामे की जरूरत है। इस अवमानना को गंभीरता से लें। कोर्ट को लग रहा है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो इस अदालत को दिए गए वचन पत्र के अनुरूप है। आपका एक कदम आगे बढ़ना और 24 घंटे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करना दिखाता है कि आपको कार्यवाही के बारे में पता था और फिर भी आपने इसका उल्लंघन किया।

अदालत की सख्ती के बाद बाबा रामदेव के वकील ने फिर से गलती मानने की बात दोहराई। वकील ने जवाब दिया कि प्रतिवादी 5 कंपनी है और प्रतिवादी 6 प्रबंध निदेशक है। जस्टिस कोहली ने कहा हम 27 फरवरी के आदेश के पैरा 9 को देख रहे हैं और यह इस बारे में था कि कंपनी और प्रबंधन के खिलाफ अवमानना क्यों नहीं होनी चाहिए और फिर उस हलफनामे को दाखिल न करने का आदेश दिया जाए।जस्टिस कोहली ने कहा 24 घंटे के अंदर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई.. क्या आपको जानकारी है? सिंह ने जवाब दिया यह एक गलती है और अदालत की महिमा का अनादर नहीं किया जा सकता, यह एक सीख है। जस्टिस कोहली ने कहा कि तो फिर सबक को तार्किक अंत तक ले जाना चाहिए था।

आखिर बीजेपी के घोषणा पत्र में इस बार क्या-क्या होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस बार बीजेपी के घोषणा पत्र में क्या-क्या होगा! लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। इस बार चुनावी रण में एनडीए को टक्कर देने के लिए नया विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ है। पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए 400 पार का टार्गेट सेट कर चुका है वहीं, विपक्ष का कहना है कि सत्ताधारी दल को 200 सीटें भी नसीब नहीं हो रही हैं। दोनों के अपने-अपने दावे हैं जिसका फैसला 4 जून को आएगा। उससे पहले भारतीय जनता पार्टी ने सोमवार रात खूब मंथन किया। मंथन चुनावी घोषणापत्र को लेकर हुआ। इस बार के मेनिफेस्टो में बीजेपी का ध्यान गरीबों और किसानों के कल्याण वाले वादों और महिलाओं-युवाओं के लिए नौकरियों पर ध्यान केंद्रित करने पर है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली 27 सदस्यीय चुनाव घोषणापत्र समिति की बैठक में लोगों से ली गई राय के आधार पर चर्चा हुई।भाजपा की चुनाव घोषणापत्र समिति की पहली बैठक में सरकार के ‘विकसित भारत’ एजेंडे के लिए रोडमैप ने केंद्र में जगह बनाई है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने संकेत दिया कि घोषणापत्र ‘मोदी की गारंटी’ और ‘विकसित भारत’ के इर्द-गिर्द हो सकता है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भाजपा को अपनी मिस्ड कॉल सेवा के माध्यम से 3.75 लाख से अधिक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐप पर लगभग 1.70 लाख सुझाव प्राप्त हुए हैं।भाजपा ने 30 मार्च को 27 सदस्यों वाली समिति की घोषणा की थी, जिसमें एक-एक मुस्लिम, सिख और ईसाई नेता भी शामिल थे। बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी संयोजक हैं और इसके अलावा कई अघोषणा पत्र के लिए लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी, प्रधानमंत्री पर उनके विश्वास और उनसे उनकी उम्मीदों को दर्शाती है। गोयल ने बताया कि 35 दिन के अभियान के दौरान जानकारी इकट्ठी की गई। 300 से ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में 916 वीडियो वैन भेजी गईं। उन्होंने बताया कि व्यापार और उद्योग संघों से भी सुझाव मिले।न्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं। कई दशकों में शायद यह पहली बार है जब इसके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य वैचारिक वादों का उल्लेख नहीं किया गया है।

बीजेपी ने देशभर से आए लोगों के सुझाव को ध्यान में रखते हुए रात में करीब दो घंटे तक मंथन किया। लोगों ने मिलकर सरकार को जनकल्याण के सुझाव दिए हैं। दिल्ली में सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीयूष गोयल ने बताया कि समिति की बैठक में 2047 तक विकसित भारत के लिए रोडमैप पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि हमारे घोषणा पत्र के लिए लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी, प्रधानमंत्री पर उनके विश्वास और उनसे उनकी उम्मीदों को दर्शाती है। गोयल ने बताया कि 35 दिन के अभियान के दौरान जानकारी इकट्ठी की गई। 300 से ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में 916 वीडियो वैन भेजी गईं। उन्होंने बताया कि व्यापार और उद्योग संघों से भी सुझाव मिले।

भाजपा ने 30 मार्च को 27 सदस्यों वाली समिति की घोषणा की थी, जिसमें एक-एक मुस्लिम, सिख और ईसाई नेता भी शामिल थे। बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी संयोजक हैं और इसके अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं। कई दशकों में शायद यह पहली बार है जब इसके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य वैचारिक वादों का उल्लेख नहीं किया गया है। 27 सदस्यों वाली समिति की घोषणा की थी, जिसमें एक-एक मुस्लिम, सिख और ईसाई नेता भी शामिल थे। बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी संयोजक हैं और इसके अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं।इसने इस बारे में आम जिज्ञासा को बढ़ा दिया है व्यापार और उद्योग संघों से भी सुझाव मिले।न्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं। कई दशकों में शायद यह पहली बार है जब इसके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य वैचारिक वादों का उल्लेख नहीं किया गया है।कि इस बार सत्तारूढ़ दल की चुनावी प्रतिज्ञाओं के मुख्य आकर्षण क्या होंगे। घोषणा पत्र समिति की अगली बैठक 4 अप्रैल को होने की संभावना है। लोकसभा चुनाव 19 अप्रैल से 1 जून के बीच होने हैं।

आखिर अमेठी से कौन सा बड़ा राजनेता लड़ेगा चुनाव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अमेठी से कौन सा बड़ा राजनेता चुनाव लड़ने जा रहा है! इस बार BJP सबसे अधिक दांव तमिलनाडु पर लगा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के समय में सबसे अधिक चुनावी रैलियां भी वहीं की हैं। दिलचस्प है कि चुनावी सीजन में नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु के टीवी चैनल को ही अपना सबसे पहला डीटेल्ड इंटरव्यू दिया। हालांकि वहां पार्टी से AIADMK के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन न हो पाना जरूर झटका माना गया। जानकारों के अनुसार, खुद पीएम मोदी भी चाहते थे कि AIADMK के साथ गठबंधन हो। उनकी यह मंशा इंटरव्यू में भी दिखी, जब उन्होंने जयललिता की खूब तारीफ की। उन्होंने यहां तक कहां कि 2002 में गुजरात दंगे के बाद देश के तमाम दूसरे नेताओं ने उनसे दूरी बना ली थी, तब सिर्फ जयललिता थीं जो गुजरात आईं। कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी जयललिता की विरासत से खुद को जोड़कर तमिलनाडु में AIADMK वोटरों को भी टारगेट कर रहे हैं। BJP ने पार्टी के नेताओं से भी कहा है कि वे जयललिता पर कोई नकारात्मक कमेंट न करें। BJP का आकलन है कि अगर जयललिता से जुड़ी विरासत का वोट BJP को मिला, तो पार्टी इस बार सभी को चौंका सकती है। उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट पर इस बार कांग्रेस को लेकर एक बड़ा सस्पेंस बना हुआ है। सियासी गलियारों में चर्चा चल रही है कि इस बार अमेठी से राहुल गांधी कांग्रेस उम्मीदवार होंगे या नहीं। रायबरेली से सोनिया गांधी के नहीं लड़ने के एलान के बाद वहां से प्रियंका गांधी के चुनावी मैदान में उतरने की अटकलें भी लग रही हैं। लेकिन कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की संभावना कम ही है। ऐसे में अब फोकस अमेठी पर शिफ्ट हो गया है। कांग्रेस के अंदर अधिकतर नेताओं की आम राय है कि अगर राहुल गांधी वहां से खुद नहीं लड़ेंगे, तो इसका बहुत नकारात्मक संदेश जाएगा। ऐसे में कांग्रेस के अधिकतर नेताओं की ओर से राहुल गांधी पर एक तरह का दबाव भी है। लेकिन सभी जानते हैं कि वहां से चुनाव लड़ना है या नहीं लड़ना, यह फैसला खुद राहुल गांधी ही करेंगे। यही वजह है कि पार्टी की ओर से वहां उम्मीदवार तय करने में लगातार देरी हो रही है, और सस्पेंस खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।

BJP ने इस बार आम चुनाव में टिकट देने को लेकर कई प्रयोग किए हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से पार्टी ने कई नामों को मैदान में उतारा है। इसी कड़ी में सिने-कला जगत से जुड़े दो चर्चित नामों को टिकट दिया गया। दोनों टिकट मिलने के बाद उत्साहित हैं और अपने-अपने संसदीय क्षेत्र में सियासी मुकाबले के लिए उतर चुके है। लेकिन BJP को एक चिंता भी है। दोनों अपने हिसाब से कई बार बेबाक बोलने के लिए जाने जाते हैं। ऐसा भी बोल देते हैं, जिससे राजनीतिक रूप से नुकसान हो सकता है। इस मामले में खासकर एक नाम पर अधिक चिंता है। उन्हें टिकट देने से पहले कई स्तर पर मंथन भी हुआ। पार्टी के अंदर उन्हें टिकट देने पर पूरी तरह एक राय नहीं थी। उनके ट्रैक रेकॉर्ड को देखते हुए BJP अब टिकट देने के बाद कवर भी अपने स्तर से दे रही है। दोनों उम्मीदवारों के लिए मुद्दों की तलाश से लेकर कब कहां किससे क्या बोलना है, उसका होमवर्क पार्टी की टीम ही कर रही है। पार्टी की ओर से दोनों उम्मीदवारों को कम्युनिकेशन टीम भी उपलब्ध कराई गई है। सोशल मीडिया अकाउंट पर भी नजर रखी जा रही है। दरअसल, BJP की मंशा है कि इस बार चुनाव में ऐसा कोई विवाद न हो, जिससे उनका कैंपेन किसी तरह प्रभावित हो।

बिहार में इस बार दो छोटे दलों के नेताओं के लिए ‘दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम’ वाली हालत हो गई है। एक हैं पशुपति कुमार पारस, और दूसरे हैं मुकेश सहनी। दोनों नेताओं की कोशिश रही कि बारगेन कर अधिक से अधिक सीटें लें, पर इस कोशिश में दोनों कहीं के नहीं रहे। चिराग पासवान से समझौता करने के बाद BJP ने पारस को एक पैकेज ऑफर दिया, लेकिन वह RJD के साथ बारगेन करने लगे और वहां अधिक सीटों की मांग करने लगे। इसी कोशिश में वक्त बीत गया और उन्हें कहीं कुछ नहीं मिला। अब पारस एकतरफा NDA को समर्थन देने की बात कर रहे हैं ताकि चुनाव के बाद कुछ मिल सके। वहीं मुकेश सहनी के बारे में कहा गया कि वह एक ही दिन अलग-अलग समय दोनों गठबंधन से बात कर रहे थे। इसका पता दोनों गठबंधनों को चल गया तो उनसे सबने नमस्ते कर ली।

अभी सबसे अधिक सियासी उत्सुकता उस वजह का पता लगाने की है, जिसके तहत ओडिशा में BJP और BJD का चुनाव पूर्व गठबंधन होते-होते रुक गया। वह भी तब, जब BJP में नरेंद्र मोदी और BJD में खुद नवीन पटनायक की सहमति से गठबंधन की बात शुरू हुई थी। चर्चा है कि BJD की ओर से नवीन पटनायक के करीबी ब्यूरोक्रेट ने गठबंधन की बात शुरू की थी। इस पूर्व ब्यूरोक्रेट को नवीन पटनायक के उत्तराधिकारी के रूप में भी देखा जा रहा है। वहीं BJP में भी ब्यूरोक्रेट से नेता बने एक मंत्री ने कमान संभाली थी। लेकिन BJP के अंदर एक बड़ा वर्ग BJD विरोधी भी है। वैसे ही BJD के अंदर एक वर्ग BJP विरोधी है। इन दोनों ने अपनी-अपनी पार्टियों पर दबाव बनाया। लेकिन दोनों पार्टियों को लगा कि इससे न सिर्फ उनकी पार्टी में टूट हो सकती है, बल्कि उसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है, जो राज्य में तीसरे नंबर पर कमजोर स्थिति में है। लेकिन गठबंधन न हो पाने के बाद अब दोनों दल चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ किस तरह उतरेंगे, इसे लेकर संशय है। BJP को लगता है कि अगर वह BJD पर नरम पड़ी, तो कहीं विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव में भी नुकसान न हो जाए। इसका ठीक उलटा संशय BJD को भी सता रहा है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव प्रचार के दौरान दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ कितना टफ या सॉफ्ट रुख अपनाते हैं।

सुष्मिता सेन ने शादी की योजना पर तोड़ी चुप्पी.

0

महज 18 साल की उम्र में जगतजोरा दुनिया भर में प्रसिद्धि का मालिक है। इसके ठीक दो साल बाद सुष्मिता सेन ने बॉलीवुड में डेब्यू किया। 1996 में फिल्म ‘दस्तक’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया। इसके बाद उन्होंने ‘बीबी नंबर वन’, ‘सिर्फ तुम’, ‘फिजा’, ‘आंखे’, ‘मे हू ना’ जैसी कई फिल्मों में काम किया। जितना उनकी चर्चा उनकी पर्सनैलिटी के लिए हुई है, उतना ही उनकी पर्सनल लाइफ के लिए भी हुई है। यह कहना अच्छा है कि उनके प्रेम जीवन की प्रथा का कोई अंत नहीं है। हालांकि, एक्ट्रेस कभी भी कुछ भी छिपाने में विश्वास नहीं रखती हैं। कभी रणदीप हुडा, कभी मुंबई के रेस्टोरेंट मालिक रितिक भसीन, कभी डायरेक्टर विक्रम भट्ट तो कभी ललित मोदी, उनका नाम अपने से काफी छोटे रोहमन शाल के साथ जुड़ा। उनकी उम्र पचास के पार है. लेकिन, घर नहीं बना. फिलहाल, उनके परिवार में दो बेटियां रेने और अलीशा शामिल हैं। एक्स-बॉयफ्रेंड रोहमन भी हैं साथ में. इस बार सुष्मिता ने कहा कि वह शादी करेंगी। उन्होंने अपने एक्स के बारे में अपना मुंह खोला। जैसे ही रोहमन उनकी जिंदगी में वापस आए तो कई लोगों ने सवाल उठाए, लेकिन क्या एक्ट्रेस अपने एक्स-बॉयफ्रेंड के साथ समझौता करेंगी? उस वक्त उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि उन्हें शादी से कोई हिचक नहीं है. लेकिन इस बार सुष्मिता ने कहा, वह शादी करेंगी.

कुछ वर्ष पहले वे हृदय रोग से पीड़ित हो गये। इलाज के बाद पूर्व ब्रह्माण्डसुंदरी की जान वापस आ गई। तभी उनकी जिंदगी में उनका पुराना प्यार भी वापस आ गया. वह रोहमन हैं. वे इस वक्त साथ हैं. हालांकि, इस बात को लेकर असमंजस है कि वे रिलेशनशिप में हैं या नहीं। हालांकि सुष्मिता ने कहा, उनके अपने एक्स के साथ बहुत अच्छे रिश्ते हैं। इतना ही नहीं, वह अपनी जिंदगी में ऐसे दोस्तों के लिए आभारी हैं। लेकिन सुष्मिता मानती हैं कि किसी भी रिश्ते के टूटने के बाद भी दोस्ती कायम रह सकती है। लेकिन उसकी भी कुछ सीमाएं हैं. जैसे ही रोहमन उनकी जिंदगी में वापस आए तो कई लोगों ने सवाल उठाए, लेकिन क्या एक्ट्रेस अपने एक्स-बॉयफ्रेंड के साथ समझौता करेंगी? उस वक्त उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि उन्हें शादी से कोई हिचक नहीं है. लेकिन इस बार सुष्मिता ने कहा, वह शादी करेंगी.

हाल ही में एक इंटरव्यू में एक्ट्रेस ने कहा, ”मैं शादी के लिए कभी भी सामाजिक दबाव या उम्र की परवाह नहीं करती। लेकिन मैं शादी करना चाहता हूं. लेकिन उस सही इंसान को जिंदगी में आना ही होगा. मैं ऐसा उस दिन करूंगी जब कोई ऐसा आदमी आएगा जिसे देखकर ऐसा लगेगा कि वह शादी करने वाला है। या फिर मैं तभी शादी करूंगी जब मेरी ज़रूरतों की सूची पूरी हो जाएगी। उससे पहले मैं बिल्कुल ठीक थी.” पिछले साल के मध्य में पूर्व ब्यूटी क्वीन सुष्मिता सेन अचानक बीमार पड़ गईं थीं. सुष्मिता दिल की बीमारी से पीड़ित थीं। एंजियोप्लास्टी की गई है. स्टेंट भी बैठता है. सुष्मिता ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट कर शारीरिक बीमारी की जानकारी दी। इसके बाद वह बहुत जल्दी ठीक हो गये. सुष्मिता ने जिम जाना शुरू कर दिया। वह हेवी एक्सरसाइज भी करते हैं. सुष्मिता को दिल की समस्याओं से जूझते देख कई लोग हैरान रह गए। सुष्मिता की हिम्मत से कई लोग डर गए थे. लेकिन सर्जरी के दौरान सुष्मिता ने उतनी ही हिम्मत दिखाई. हाल ही में एक इंटरव्यू में सुष्मिता ने बताया कि एंजियोप्लास्टी के दौरान वह मुस्कुरा रही थीं।

सुष्मिता का परिवार दो बेटियों से भरा हुआ है। जीवन में कई रिश्तों में शामिल। हालाँकि, उन्होंने किसी से शादी नहीं की। उनका जीवन उनकी बेटियों रेने और अलीशा के इर्द-गिर्द घूमता है। हालांकि, उनके पार्टनर रहमान उनके साथ हैं. कुछ दिनों पहले सुष्मिता ने साफ किया था कि वह अभी शादी के बारे में नहीं सोच रही हैं। सुष्मिता ने कहा कि उनके पास जीवन को अच्छे से जीने के लिए कई संसाधन हैं। शारीरिक बीमारी उन पर मानसिक रूप से हावी नहीं हो सकी। वह हमेशा दिल से अच्छा बनने की कोशिश करता है। सुष्मिता पहले भी कई बार कह चुकी हैं कि वह हर पल को सेलिब्रेट करके सहेजने में यकीन रखती हैं।

रास्ते में कई समस्याएं आएंगी. लेकिन सुष्मिता सिर्फ उन्हीं तक सीमित रहने की पक्षधर नहीं हैं। बल्कि वह अपनी जिंदगी हंसी-मजाक और मौज-मस्ती में बिताना पसंद करते हैं। दिल की सर्जरी के दौरान भी वह मुस्कुरा रहे थे। इस बारे में सुष्मिता ने कहा, ”एंजियोप्लास्टी के दौरान मुझे बिल्कुल भी डर नहीं लगा. इसके बजाय, वह मुस्कुरा रहा था. डॉक्टर मुझे देखकर आश्चर्यचकित रह गये.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने पीएम मोदी का किया विरोध.

0

नया भारत घर में प्रवेश कर शत्रुओं का नाश करता है! मोदी ने दावा किया कि इसके उलट जब प्रधानमंत्री के विदेश मंत्रालय सीमा पार से हमले की बात कर रहे हैं, रक्षा मंत्री पाकिस्तान में घुसकर मारने की बात कर रहे हैं तो ऐसे गुप्त दुश्मन निकेश को विदेश मंत्रालय आधिकारिक तौर पर स्वीकार क्यों नहीं कर रहा है संचालन? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल बिहार के जमुई में एक सभा में देश में आतंकी हमला होने पर पड़ोसी देश में घुसने की धमकी दी थी. यही धमकी उन्होंने आज राजस्थान के चुरू में एक सभा से दी. लोकसभा चुनाव से पहले भले ही मोदी बार-बार राष्ट्रवाद भड़काने के लिए सीमा पार से हमले की बात करते रहे हों, लेकिन देश के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि विदेशी धरती पर कोई गुप्त हमला या हत्या करना भारत की नीति नहीं है।

मोदी के नेतृत्व में पिछले दस वर्षों में उरी और पुलवामा में आतंकवादी हमलों के बाद, भारत ने पाकिस्तान पर सीमा पार हमले शुरू किए। लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रवाद को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए कल बिहार और आज राजस्थान में सर्जिकल स्ट्राइक को याद करते हुए मोदी ने कहा, ”सीमा पर सेना की जवाबी कार्रवाई के सवाल पर इस सरकार ने पूरी छूट दे दी है. आज दुश्मन भी जान गए हैं, ये भारत नया भारत है, जो घर में घुसकर दुश्मनों को तबाह कर देता है.” केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी आज एक इंटरव्यू में दावा किया कि अगर कोई उग्रवादी भारत की शांति भंग करने की कोशिश करेगा. सरकार मुंहतोड़ जवाब देगी. उनके शब्दों में, “अगर वह (आतंकवादी) पाकिस्तान भाग जाता है, तो हम उसका पीछा करेंगे और पाकिस्तानी धरती पर उसे मार डालेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सही कहा है कि पाकिस्तान भी समझने लगा है कि भारत में वो ताकत है.” भले ही मोदी-राजनाथ ने वोटरों में राष्ट्रवाद भड़काने के लिए दुश्मन देशों की सीमा पार जाकर हमला करने की बात कही, लेकिन देश के विदेश मंत्रालय ने इससे इनकार कर दिया. ऐसी मांगों को स्वीकार करें. बल्कि उन्होंने आधिकारिक तौर पर ऐसे दावे को खारिज कर दिया है. कल एक विदेशी अखबार ने दावा किया कि इजराइल की जासूसी एजेंसी मोसाद और रूस की एफएसबी की तरह भारतीय एजेंसी ‘रॉ’ (रिसर्च एंड एनालिटिकल विंग) लगातार पाकिस्तान समेत दूसरे देशों में छुपी भारत विरोधी ताकतों का पर्दाफाश कर रही है. अखबार का दावा है कि 2020 के बाद से पड़ोसी देशों की धरती पर भारत विरोधी उग्रवादियों की हत्याएं शुरू हो गई हैं. पिछले साल ही 15 आतंकवादी मारे गए हैं, जो भारत में तोड़फोड़ की विभिन्न कार्रवाइयों से जुड़े थे। मरने वालों में अधिकतर लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादी समूहों के नेता थे। मारे गए लोगों में से कई कश्मीर में आतंकवादियों के आका थे। अखबार ने दावा किया कि उस काम में पाकिस्तानी युवाओं, स्थानीय अपराधियों या अफगान खुफिया नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन उन्हें पीछे से ‘रॉ’ या परोक्ष रूप से नई दिल्ली द्वारा नियंत्रित किया गया था। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने विदेशी अखबार के दावे का खंडन किया और कहा कि यह रिपोर्ट पूरी तरह से झूठी है और भारत विरोधी प्रचार का हिस्सा है। विदेशी धरती पर चुन-चुनकर हत्या करना भारत सरकार का कदापि काम नहीं है
नीति नहीं.

सवाल यह उठ रहा है कि एक तरफ जब प्रधानमंत्री सीमा पार से हमले की बात कर रहे हैं और रक्षा मंत्री पाकिस्तान के अंदर घुसकर मारने की बात कर रहे हैं तो विदेश मंत्रालय आधिकारिक तौर पर ऐसे गुप्त दुश्मन के हमले को स्वीकार क्यों नहीं कर रहा है? राजनीतिक खेमे के मुताबिक चुनाव प्रचार में वोट आकर्षित करने के लिए इस तरह के खून-खराबे वाले भाषण दिए जा सकते हैं. लेकिन विदेश नीति के कुछ दायित्व होते हैं। इसके अलावा कोई भी संप्रभु देश दूसरे संप्रभु देश में घुसकर उसके नागरिकों की हत्या नहीं कर सकता। ऐसे में यह युद्ध का नाम है. इसलिए भारत के लिए मामला कितना भी सकारात्मक क्यों न हो, ऐसे गुप्त अभियानों को कभी भी अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के तहत मान्यता नहीं दी जाती है। सभी देश कमोबेश उस नीति का पालन करते हैं। ऐसे छापों में पकड़े गए किसी भी देश के एजेंटों को नागरिक के रूप में मान्यता देने से भी इनकार कर दिया जाता है। नरेंद्र मोदी के दूसरे चरण में पाकिस्तान में कई भारत विरोधी उग्रवादियों की ‘रहस्यमय मौत’ की खबरें आई हैं. खालिस्तानी आतंकी निज्जर की ‘हत्या’ पर कनाडा ने सीधे तौर पर भारत पर उंगली उठाई है. ऐसे में विदेशी अखबार की रिपोर्ट को देखते हुए कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना ​​है कि भारत भी सीआईए, मोसाद या केजीबी की शैली में दुश्मन राज्य की छत्रछाया में रहने वाले आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। मोदी ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश दिया है. उनकी सरकार उसी नीति पर चल रही है.

सौरभ भारद्वाज का कहना है कि AAP को एकजुट रखने के लिए सुनीता केजरीवाल सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं.

0

छुपा था। पति की गिरफ्तारी के बाद से अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता लगातार उनकी आवाज बनकर सामने आ रही हैं. इस बार आप मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि मौजूदा हालात में आप को एकजुट रखने के लिए सुनीता ही सही व्यक्ति हैं।

एक्साइज भ्रष्टाचार मामले में फंसे केजरीवाल जेल में रहते हुए भी मुख्यमंत्री पद संभाल रहे हैं. सुनीता टीम और अपने पति के बीच संपर्क सूत्र का काम कर रही हैं। केजरीवाल भीड़ के लिए दिए गए विभिन्न संदेशों को कैमरे के सामने खुद पढ़ रहे हैं, साथ ही आप संयोजक का संदेश भी पार्टी कार्यकर्ताओं तक पहुंचा रहे हैं. हालांकि, विपक्ष केजरीवाल के इस्तीफे की मांग कर रहा है। और आप ये भी समझते हैं कि इस तरह ज्यादा देर तक दौड़ना नामुमकिन है. भविष्य में किसी को तो केजरी का उत्तराधिकारी चुनना ही होगा.

बीजेपी नेताओं के मुताबिक नए मुख्यमंत्री के चुनाव के आसपास आप में फूट पड़ने की प्रबल संभावना है. दरअसल, लड़ाई शुरू हो चुकी है और सांसद संजय सिंह के जेल से रिहा होने के बाद प्रतिद्वंद्विता और तेज हो गई है. आज सौरव ने कहा, ”इस समय पार्टी को संभालने के लिए सुनीता केजरीवाल सही व्यक्ति हैं.” बीजेपी के एक वर्ग के मुताबिक, यह टिप्पणी मुख्य रूप से संजय को रोकने के लिए है. सौरव ने तर्क दिया, ”केजरीवाल के भाषण को पार्टी कार्यकर्ताओं तक पहुंचाकर सुनीता एक राजदूत के रूप में काम कर रही हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. हम इस मुद्दे पर प्रचार करना चाहते हैं.” केजरी गए जेल आम आदमी पार्टी का एक धड़ा भी सुनीता के साथ वोट के लिए प्रचार करने के पक्ष में है. पार्टी में कोई दरार नहीं होने का दावा करते हुए सौरव ने आगे कहा, ‘जमानत पर रिहा होने के बाद संजय मुख्यमंत्री आवास गए और सुनीता केजरीवाल के पैर छूकर झुके.’ संजय अरविंद का बड़े दादा की तरह सम्मान करते हैं। बीजेपी का प्रचार बेबुनियाद है.” इस संबंध में संजय ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शिकायत की कि केजरीवाल को एक्साइज भ्रष्टाचार में फंसाया गया है. उन्होंने दावा किया कि राघव मगुंटा नाम के एक कारोबारी को भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया गया था. राघव ने पिछले साल फरवरी से जुलाई तक सात बयान दिए। छह में उन्होंने केजरीवाल का नाम नहीं लिया, लेकिन सातवें बयान में उन्होंने केजरीवाल के खिलाफ बोला. संजय ने दावा किया कि उस व्यक्ति ने पांच महीने तक यातना सहने के बाद केजरीवाल के खिलाफ बयान दिया। उधर, बीजेपी नेता गौरव भाटियार ने दावा किया कि संजय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक्साइज भ्रष्टाचार की बात कहकर जमानत की शर्त तोड़ी है.

कल, जब सुनीता अपने पति का बयान पढ़ रही थीं, तो पीछे की दीवार के दोनों ओर भगत सिंह और बीआर अंबेडकर की तस्वीरों के बीच अरविंद केजरीवाल की तस्वीर लटकी हुई देखी जा सकती थी। उस चित्र के सामने गारद था। भगत सिंह के परिवार के सदस्य जदविंदर संधू ने इसका विरोध करते हुए कहा, ”केजरीवाल की तुलना मनीषी से करने की कोशिश की गई है. मैं आप नेतृत्व को सलाह देना चाहूंगा कि ऐसा न करें।’ केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल ने गुरुवार को एक संवाददाता सम्मेलन में संदेश वाला पत्र पढ़ा। पत्र में केजरीवाल ने पार्टी विधायकों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा करने का निर्देश दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि लोगों को परेशानी नहीं हो.

सुनीता ने कहा, ”अरविंद केजरीवाल ने सभी विधायकों को एक संदेश भेजा है।” इसके बाद उन्होंने पत्र पढ़ा. पत्र में आप प्रधान ने लिखा, ”मेरे जेल में होने से दिल्ली के लोगों को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. प्रत्येक विधायक को प्रतिदिन अपने क्षेत्र में जाना चाहिए, लोगों की समस्याओं पर चर्चा करनी चाहिए और उनका समाधान करना चाहिए।” दिल्ली उत्पाद शुल्क भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किये गये आप सांसद बुधवार को जमानत पर तिहाड़ जेल से बाहर आये। जेल से बाहर आने के बाद संजय सुनीता से मिलने गए। एक समय आईआरएस अधिकारी के रूप में काम करने वाली सुनीता का राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं था। हालाँकि, उनके पति को उत्पाद शुल्क भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद, वह राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गईं। उन्होंने पिछले रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन ‘भारत’ की ‘लोकतंत्र बचाओ’ रैली को भी संबोधित किया था. पढ़ें कि देश में सत्ता में आने पर विपक्षी गठबंधन के सहयोगी कौन से छह वादे लागू करेंगे।

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले अलीगढ़ का हाल.

अखलाक-शाया का डर अभी भी अलीगढ़-मुरादाबाद-रामपुर-बिजनौर-मुजफ्फरनगर से होते हुए सहारनपुर में है – पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्र जहां जाट और मुस्लिम समुदाय लंबे समय से सह-अस्तित्व में हैं। दस साल पहले का अखलाक कांड आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक अलिखित चेतावनी है.

बिसारा गांव के मोहम्मद अखलाक की महज गोमांस के शक में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. उस डर के निशान आज भी मौजूद हैं. इसलिए अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्र बशीर अली, जुनेद खनेरा ट्रेन में पका हुआ खाना ले जाने की हिम्मत नहीं करते। उनका डर यह है कि कहीं कोई खाने पर उंगली न उठा दे. संदेह की उंगली जो मौत लाती है! अलीगढ़-मुरादाबाद-रामपुर-बिजनौर-मुजफ्फरनगर वाया सहारनपुर – पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्र लंबे समय से जथ और मुस्लिम समुदायों के साथ सह-अस्तित्व में हैं। लेकिन दस साल पहले के संघर्ष ने कई समीकरण बदल दिये. वोटों के मूवमेंट को समझने के लिए इन इलाकों का दौरा- यूनिवर्सिटी के रिटायर प्रोफेसर से लेकर आम फल विक्रेता, छात्र से लेकर सरकारी कर्मचारी, ऊपर से नीचे तक मुस्लिम समाज, सबके मन में डर, कब क्या हो जाए! यह डर इस हद तक है कि स्थानीय निवासी जब भी किसी अजनबी को देखते हैं तो एक या दो वाक्यों के बाद अपना मुंह बंद कर लेते हैं। वोटिंग, तीन तलाक, राम मंदिर, जन्म नियंत्रण कानून विदेशी मामले लगते हैं।

रोज़ा खोलने के बाद छात्रों की भीड़ अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने की दुकान पर थी, इसका पता मुझे अलीगढ़ पहुँचने पर चला। शाम को मुरादाबाद बाईपास पर अलीगढ़ विश्वविद्यालय के भाषा विभाग के गेट के सामने सैकड़ों छात्र एकत्र होते हैं। वहां चाय की दुकान पर बशीर खान से बात करें. मुरादाबाद के बशीर म्यूजियोलॉजी में एमएससी कर रहे हैं। इस मामले को पढ़ने के बाद संग्रहालय में क्यूरेटर के रूप में सरकारी नौकरी मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। क्योंकि, देश के पांच अन्य छात्रों की तरह, बशीर भी जानते हैं कि सरकारी नौकरी बाजार कितना उदास है। चाय की दुकान के मालिक बशीर ने इरफान से बात करते हुए कहा, इरफान अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का छात्र है. नौकरी नहीं मिलने पर उन्होंने चाय की दुकान खोल ली. हालांकि उनकी खुद की इच्छा विदेश जाकर पढ़ाई करने की है. इस उम्मीद में कि नौकरी फट जायेगी.

बशीर ने देखा कि कैसे उसके वरिष्ठ सहपाठी को ट्रेन में चिकन के मांस से पीटा गया था। बशीर के शब्दों में, ”वह दादा घर से यूनिवर्सिटी लौट रहे थे. साथ में खाना भी था. जब सहयात्रियों ने चिकन बाउल खोला तो उन्हें संदेह हुआ। मुर्गी कहे जाने के बावजूद कोई बच नहीं पाया. उसे इस बात के लिए थप्पड़ मारना चाहिए कि वह मांस लेकर ट्रेन में क्यों चढ़ा. सौभाग्य से, कमरे में मौजूद कुछ अन्य यात्रियों ने उसे बचा लिया।” उस घटना के बाद से, परिवार ने बशीर को पका हुआ खाना देना भी बंद कर दिया है।

दोस्त जुनेद बशीर के पास बैठा चाय पी रहा था। करीब आधे घंटे तक बातचीत के बाद वह थोड़ा खुल गया। उन्होंने कहा, ”हम घुटन की स्थिति में हैं. अब छात्र सड़कों पर उतरकर विरोध करने से डर रहे हैं. गिरफ्तारियां तो होनी ही हैं, साथ ही घर पर बुलडोजर चलने का खतरा भी है. मुसीबत कौन चाहता है! हम कड़ी निगरानी में हैं. राज्य दूसरे पक्ष को यह समझाना चाहता है कि हम दूसरे दर्जे के नागरिक हैं।

यूनिवर्सिटी के सेवानिवृत्त प्रोफेसर मुस्तफा जैदी भी इस बात से सहमत हैं, ”पहले हालात ऐसे नहीं थे. लेकिन अब विभाजन स्पष्ट हो गया है।” फलों के जूस विक्रेता अख्तर भी कहते हैं, ”यहां तक ​​कि एक समय के दबे हुए हिंदू ग्राहक भी इन दिनों फलों के जूस के लिए मेरी दुकान पर नहीं आते हैं। वे हिंदू फल विक्रेताओं के पास जा रहे हैं।”

अलीगढ ताल और तालीम (शिक्षा) के शहर के रूप में प्रसिद्ध है। मुसलमानों की आधुनिक शिक्षा के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाया गया था। हालांकि, सवाल ये है कि क्या आने वाले दिनों में यूनिवर्सिटी में मुस्लिमों के लिए आरक्षण होगा या नहीं. प्रोफ़ेसर ज़ैदी के शब्दों में, हालाँकि यह शैक्षणिक संस्थान मूल रूप से मुसलमानों को पढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन इसने कभी भी अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं लिया। कई लोगों के अनुसार, यही समस्या का कारण है। सवाल उठाया गया है कि देश के पांच अन्य संस्थानों की तरह उस शैक्षणिक संस्थान में भी आरक्षण नीति क्यों नहीं लागू की जाएगी. मामला अभी लंबित है।

स्थानीय होटल कर्मी सुजाता कश्यप संरक्षण की मांग करेंगी। उन्होंने तर्क दिया, “मेरे बेटे को अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद उस विश्वविद्यालय में जगह नहीं मिली। पूरे देश के मुस्लिम छात्रों को जगह देने के बाद पांचवीं लिस्ट में मेरे बेटे का नंबर आया. हालाँकि, मेरे बेटे को उसके अंकों के साथ दूसरी सूची में होना चाहिए था। लेकिन विश्वविद्यालय की अपनी आरक्षण नीति मेधावी लोगों को रोकती है।”

बीजेपी के सतीश गौतम तीसरी बार अलीगढ़ से उम्मीदवार हैं. तमाम अलीगढ को इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह हैट्रिक बनाने जा रहे हैं। यह सच है कि आरोप लगाए गए हैं कि सतीश ने दो हाथों से जमीन खरीदी है क्योंकि ‘उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर’ अलीगढ़ के ऊपर से गुजरता है, लेकिन चुनाव प्रचार की कमान संभाल रहे प्रदीप पांडे ने बीजेपी में रहते हुए भ्रष्टाचार के सभी आरोपों को खारिज कर दिया. अलीगढ़ में गांधी चौक पर कार्यालय। उन्होंने कहा, ”अगर आप राजनीति में हैं तो विपक्ष ऐसी एक-दो शिकायतें करेगा.”

राहुल गांधी लोकसभा चुनाव 2024 में कड़ी टक्कर देने की बात करते हैं.

0

अभी कोई ‘हवा’ नहीं, राहुल के बीजेपी खेमे की कड़ी टक्कर की मांग, राहुल का दावा बेबुनियाद राम मंदिर को लेकर देश के हिंदुओं में भावनाएं पैदा हो गई हैं. मोदी सरकार के काम से हर कोई खुश है. आख़िरकार, विपक्षी खेमे में नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है. और ठीक दो हफ्ते बाद लोकसभा चुनाव का पहला चरण. भाजपा और विपक्ष, दोनों खेमों को लगता है कि चुनाव अभी तक ‘हवा’ नहीं हुआ है। यह सच है कि विपक्षी खेमे को भारी जनसमर्थन नहीं मिला। लेकिन बीजेपी के पक्ष में जो प्रचंड लहर उठी है वो वैसी नहीं है. ऐसे में विपक्षी खेमे की उम्मीद यही है कि मौजूदा हालात में लोकसभा चुनाव एकतरफा नहीं होगा.

राहुल गांधी ने आज कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र जारी करते समय दावा किया, ”मैं दूरदर्शी नहीं हूं।” लेकिन मेरा मानना ​​है कि जितना प्रचार किया जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा आमने-सामने की लड़ाई होगी.” 10 साल पहले नरेंद्र मोदी के ‘अच्छे दिन’ के सपने के साथ-साथ यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. देश। 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, पुलवामा में सीआरपी काफिले पर आतंकवादी हमला और जवाब में बालाकोट में वायु सेना के हमले ने पूरे देश में राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़का दिया। ऐसी हवा अभी नहीं बनी है. हालांकि, मोदी पहले ही कह चुके हैं कि बीजेपी 370 सीटें जीतने जा रही है और 543 सीटों वाली लोकसभा में एनडीए की सीटों की संख्या 400 के पार हो जाएगी. उधर, राहुल ने रामलीला मैदान की जनसभा में दावा किया कि अगर ‘मैच फिक्सिंग’ नहीं हुई तो बीजेपी 180 पर आ जाएगी.

बीजेपी खेमे का तर्क है कि राहुल का दावा बेबुनियाद है. राम मंदिर को लेकर देश के हिंदुओं में भावनाएं पैदा हो गई हैं. मोदी सरकार के काम से हर कोई खुश है. आख़िरकार, विपक्षी खेमे में नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है. इसीलिए बीजेपी 2019 से भी ज्यादा सीटें जीतने जा रही है. आज राहुल ने पलटवार करते हुए कहा, ”अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी ऐसा ही माहौल बन रहा था. इंडिया शाइनिंग का प्रचार किया जा रहा था. इस बार इसमें अंतरराष्ट्रीय आयाम भी जुड़ गया है. लेकिन याद रखें उस बार चुनाव कौन जीता था.

‘इंडिया’ के एक नेता का दावा है, ”राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर हिंदू भावना पैदा की गई.” तब से अब तक ढाई महीने बीत चुके हैं. बीजेपी को लगा कि वह राम मंदिर की भावना के भरोसे चुनाव जीत जाएगी. ऐसा लगता है कि बीजेपी ने गलती कर दी है.” और इसीलिए विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है, किसी भी विपक्षी नेता को भाजपा में खींचकर उम्मीदवार बनाया जा रहा है। भाजपा नेतृत्व हताश है. क्योंकि पिछले चुनाव में बीजेपी ने उत्तर भारत में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था. सीटें बढ़ने का कोई मौका नहीं है. बीजेपी या एनडीए के लिए कर्नाटक, बिहार, महाराष्ट्र में पिछली बार की तरह अच्छा प्रदर्शन करना मुश्किल है और अगर वहां सीटें घटीं तो दक्षिण के अन्य राज्यों से इसे भरना भी मुश्किल है.

कांग्रेस नेतृत्व को सिर्फ यही डर है कि मोदी अगले 14 दिनों में नए मुद्दे लाकर बीजेपी के पक्ष में लहर पैदा कर सकते हैं. फिर ‘बराबर की लड़ाई’ नहीं होगी, जैसा कि राहुल ने कहा. बीजेपी नेताओं की भी उस पर नजर है. राहुल गांधी केरल की वेनाड सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं. उन्होंने बुधवार को नामांकन पत्र दाखिल किया. शपथ पत्र प्रस्तुत किया। देखा गया है कि कांग्रेस सांसद के पास सिर्फ 55 हजार रुपये ही कैश हैं. लेकिन उन्होंने शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में करोड़ों रुपये से ज्यादा का निवेश किया है. शेयरों में 4 करोड़ 30 लाख रुपये का निवेश. म्यूचुअल फंड में 3 करोड़ 81 लाख रुपये का निवेश. उनके बैंक खाते में 26 लाख 25 हजार रुपये हैं.

हलफनामे के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2022-23 में 53 वर्षीय कांग्रेस नेता की आय 1 करोड़ 2 लाख 78 हजार 680 रुपये है। राहुल ने राष्ट्रीय बचत योजना, डाकघर बचत योजना, बीमा क्षेत्र में 61 लाख 52 हजार रुपये लगाए हैं. उन्होंने 15 लाख 20 हजार टका का ‘गोल्डन बॉन्ड’ खरीदा है. वायनार के निवर्तमान सांसद के पास 4 लाख 20 हजार रुपये का सोना है. राहुल के कंधों पर कर्ज का बोझ भी है. उन पर 49 लाख 70 हजार रुपये का कर्ज है. हालांकि, मोदी पहले ही कह चुके हैं कि बीजेपी 370 सीटें जीतने जा रही है और 543 सीटों वाली लोकसभा में एनडीए की सीटों की संख्या 400 के पार हो जाएगी. उधर, राहुल ने रामलीला मैदान की जनसभा में दावा किया कि अगर ‘मैच फिक्सिंग’ नहीं हुई तो बीजेपी 180 पर आ जाएगी.

क्या जेल से भी चलाई जा सकती है सरकार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जेल से भी सरकार चलाई जा सकती है या नहीं! जेल में रहते नेताओं और बाहुबलियों के चुनाव लड़ने की परंपरा पुरानी है। ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त है। बिहार में इसकी शुरुआत समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस से मानी जाती है। देश से आपातकाल खत्म होने के बाद जब 1977 में लोकसभा चुनाव हुए तो जॉर्ज फर्नांडीस को जनता पार्टी ने मुजफ्फरपुर से उम्मीदवार बनाया था। उस वक्त वे जेल में थे। बाहुबली काली प्रसाद पांडेय ने भी 1985 में जेल में रहते ही निर्दलीय चुनाव लड़ा और गोपालगंज में कांग्रेस के अभेद्य किले को ध्वस्त किया। उसके बाद तो यह सिलसिला चल ही निकला। फर्क यही रहा कि ज्यादातर बाहुबली ही उसके बाद जेल से चुनाव लड़ते या अपने परिजनों को लड़ाते-जीतते रहे। प्रखर समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस को डायनामाइट कांड में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। उन पर आरोप था कि इमर्जेंसी के खिलाफ उन्होंने सरकारी संस्‍थानों और रेल ट्रैक उड़ाने के लिए डायनामाइट की तस्‍करी की। इंदिरा सरकार को अपदस्थ करने के लिए विद्रोह करने का आरोप उन पर लगा। उन्हें 1976 में गिरफ्तार किया गया। वे दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में बंद थे। वर्ष 1977 में जब विपक्षी दलों ने जनता पार्टी बनाई तो जॉर्ज फर्नांडीस को बिहार के मुजफ्फरपुर से उम्मीदवार घोषित किया गया। जेल में रहते ही उन्होंने चुनाव लड़ा और तीन लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की।

बिहार में जेल से चुनाव लड़ने वालों की फेहरिस्त छोटी नहीं है। बिहार के एक बाहुबली काली प्रसाद पांडेय ने गोपालगंज सीट से चुनाव लड़ कर भारी मतों से बहैसियत निर्दलीय उम्मीदवार जीत दर्ज की थी। गोपालगंज को तब कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। वर्ष 1984 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में काली प्रसाद पांडेय ने कांग्रेस के दिग्गज और कई बार के सांसद रहे नगीना राय (अब स्वर्गीय) को हराया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर का लाभ भी कांग्रेस उम्मीदवार नगीना राय को नहीं मिला। हालांकि बाद में काली प्रसाद पांडेय ने अलग-अलग कई दलों के टिकट पर चुनाव लड़ा, पर उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई।

जय प्रकाश नारायण (जेपी) का छात्र आंदोलन 1974 में जब उफान पर था, तब छात्र नेता होने के नाते शरद यादव को जेल भेज दिया गया था। उसी वक्त जबलपुर सीट पर उपचुनाव हुआ। जबलपुर लोकसभा सीट से सेठ गोविंद दास 1952 से ही लगातार चुनाव जीतते रहे थे। उनके निधन से यह सीट खाली हुई थी। जबलपुर यूनिवर्सिटी में छात्र संघ के अध्यक्ष के नाते जेपी ने शरद यादव को ही वहां से चुनाव लड़ने को कहा। वे जेल में रह कर पहली बार चुनाव लड़े और जीत गए। उनके खिलाफ गोविंद दास के बेटे मैदान में थे। शरद को छात्र आंदोलन के कारण सभी विपक्षी दलों का समर्थन मिला। बाद में शरद यादव बिहार की मधेपुरा सीट से भी सांसद बने। इंदिरा गांधी ने जब संसद का कार्यकाल पांच साल की बजाय छह साल किया तो शरद ने जबलपुर सीट इस्तीफा दे दिया था।

बिहार में बाहुबली से राजनेता तक का सफर तय करने वाले अनंत सिंह ने 2020 में जेल में रहते ही विधानसभा का चुनाव लड़ा और पांचवीं बार विधायक बने। आरजेडी के टिकट पर उन्होंने मोकामा से जीत दर्ज की। उन्होंने जेडीयू उम्मीदवार राजीव लोचन को हराया था। अनंत सिंह पर 38 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनके घर से 2019 में एके-47 और बम बरामद हुए थे। कुछ दिनों तक वे फरार रहे। बाद में सरेंडर कर दिया। सजा हो जाने के कारण उनकी सदस्यता खत्म हो गई तो उनकी पत्नी नीलम देवी ने उपचुनाव में मोकामा से जीत दर्ज की। हालांकि अब वे आरजेडी छोड़ कर एनडीए कैंप में आ गई हैं।

सिवान में आतंक का पर्याय रहे शहाबुद्दीन का राजनीतिक जीवन तो 1990 में ही शुरू हो गया था, जब वे जीरादेई सीट से पहली बार 1990 में विधायक चुने गए। लालू प्रसाद यादव जब जनता दल में थे तो उन्होंने शहाबुद्दीन को 1995 में टिकट दिया और वे दोबारा विधायक चुन लिए गए। हालांकि अपराध की दुनिया में रहने के बावजूद वे राजनीति में रुचि लेते रहे। आरजेडी के टिकट पर वे 1996 से 2004 तक लगातार चार बार सिवान के सांसद चुने गए। आखिरी लोकसभा का चुनाव उन्होंने जेल में रहते लड़ा। छोटपुर निवासी मुन्ना चौधरी मामले में 13 अगस्त 2003 को उन्होंने कोर्ट में सरेंडर किया था और जेल चले गए थे। जेल में रहते ही उन्होंने 2004 का लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत गए।

उत्तर प्रदेश में तो जेल से चुनाव लड़ने वाले बाहुबली नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। मुख्तार अंसारी, राजा भैया, हरिशंकर तिवारी, आजम खान, नाहिद अंसारी जैसे कई नाम दिखते हैं, जिन्होंने जेल में रहते चुनाव लड़ा और जीतते भी रहे। जेल में रहते ही राजा भैया ने 2002 में चुनाव लड़ा था। जीतने पर मुलायम सिंह यादव ने अपने मंत्रिमंडल में उन्हें मंत्री भी बना दिया था। मुख्तार अंसारी ने जेल से ही 2017 में यूपी विधानसभा का चुनाव मऊ से लड़ा और जीत हासिल की। हरिशंकर तिवारी ने 1985 में जेल से ही गोरखपुर से चुनाव लड़ा। वे भी जीत गए थे। माफिया डॉन ओम प्रकाश श्रीवास्तव ‘बबलू’ ने भी 2004 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था। हालांकि सीतापुर से बबलू चुनाव हार गया था।

झारखंड के सीएम रहे हेमंत सोरेन फिलवक्त मनी लांड्रिंग मामले में रांची की होटवार जेल में बंद है। सूचना है कि उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा जेएमएम ने उन्हें दुमका लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है। हेमंत के पिता और जेएमएम के संस्थापक शिबू सोरेन पिछली बार दुमका से चुनाव हार गए थे। दुमका सीट अभी भाजपा के कब्जे में है। वहां से सुनील सोरेन सांसद हैं। हेमंत सोरेन के उम्मीदवार बनने पर दुमका सीट पर मुकाबला इस बार काफी दिलचस्प रहने वाला है। इसलिए कि हाल ही में जेएमएम छोड़ कर भाजपा के साथ गईं उनकी भाभी सीता सोरेन को पार्टी ने सुनील सोरेन की जगह अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। पिछली बार वहां जीत-हार का अंतर तकरीबन 50 हजार वोटों का था। दुमका सीट पर देवर-भाभी के मुकाबले पर सबकी निगाहें टिकी हैं।