Thursday, March 5, 2026
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आखिर क्या है सुप्रिया श्रीनेत और कंगना रनौत का विवाद?

आज हम आपको बताएंगे कि सुप्रिया श्रीनेत और कंगना रनौत का आखिर क्या विवाद है! पिछले हफ्ते का एंथम ‘मंडी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए…’ पूरे भारत में गूंजा जब कंगना रनौत एक बार फिर क्वीन साइज विवाद में घिर गईं। मामला तब सामने आया जब पूर्व पत्रकार और कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के सोशल मीडिया अकाउंट से एक पोस्ट जिसे बाद में हटा दिया गया किया गया। इसमें उन्होंने कंगना रनौत के नाम का जिक्र किया। बॉलीवुड एक्ट्रेस को हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार बनाए जाने पर सुप्रिया श्रीनेत के सोशल मीडिया हैंडल से ये पोस्ट हुआ। हालांकि जब उनके इस भद्दे, आपत्तिजनक और सेक्सिस्ट पोस्ट पर सवाल उठाए गए तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि ‘कई लोग मेरा फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट एक्सेस करते हैं।’ यह विवाद दो कारणों से दिलचस्प है। पहला, यह पहली बार हो सकता है कि किसी छोटे शहर के नाराज निवासी एक अपमानजनक पोस्ट के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें। ऐसा इसलिए क्योंकि पोस्ट में मंडी और रेट के बारे में स्पष्ट जिक्र था। श्याम बेनेगल की उसी नाम की पुरस्कार विजेता फिल्म याद है, जिसमें एक दयालु वेश्यालय मालकिन रुक्मिणी बाई अपने प्रतिष्ठान को बचाने के लिए लड़ती है? आक्रोश समझ में आता है और उचित है। फिर सुप्रिया श्रीनेत की अचानक एंट्री हुई जिसमें कहा गया कि जो कोई भी मुझे जानता है, वह अच्छी तरह जानता है कि मैं किसी भी महिला के प्रति कभी भी व्यक्तिगत और अभद्र टिप्पणी नहीं कर सकती। खैर, मैडम, वे टिप्पणियां आपके आधिकारिक हैंडल और अकाउंट पर पोस्ट की गई थीं। जिम्मेदारी से बचने का ये कोई अच्छा तरीका नहीं है। वास्तव में, यह एक और बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाता है कि क्या आपके नाम से पोस्ट की जाने वाली चीजों पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है? क्या यह आपकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है कि आप अपने ‘पोस्ट’ की निगरानी करें और उन्हें क्लीयर करें? अब, यह दावा करना कि मूल ट्वीट एक ‘पैरोडी अकाउंट’ से पोस्ट किया गया था, बेहद खोखला लगता है। हालांकि, यह मामला अब चुनाव आयोग के पास है, जो पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का मजाक उड़ाने वाले बीजेपी नेता दिलीप घोष की टिप्पणी की भी जांच कर रहा है।

दूसरा, राजनीति में रूढ़िवादी महिलाओं के सवाल के बारे में है। ये टिप्पणियां दिखाती हैं कि आज भी, महिलाओं को ‘उनकी जगह दिखाने’ की कोशिश की जाती है, खासकर अगर वे फिल्मी बैकग्राउंड से हों। वे यह भूल जाते हैं कि राजनीतिक क्षेत्र में कद्दावर महिलाओं की लंबी लिस्ट है, जिन्होंने अपने शोबिज क्रिडेंशियल का मजाक उड़ाने के कई प्रयासों के बावजूद खुद को साबित किया। सार्वजनिक जीवन में कुछ नाम लिया जाए तो इसमें स्मृति ईरानी, जया बच्चन, हेमा मालिनी, किरण खेर, नगमा, गुल पनाग, जया प्रदा, राम्या… और ये लिस्ट यहीं खत्म होती नजर नहीं आ रही।

स्मृति ईरानी ने इस मामले में पलटवार का नेतृत्व किया जब वह कंगना रनौत के बचाव में आगे आईं। उन्हें और अन्य लोगों की तरह ‘वुमेन ऑफ स्टील’ के तौर पर पेश किया। कंगना ने इस विवाद में खुद को एक संयमित प्रतिक्रिया तक सीमित रखा, उन्होंने कहा कि अपने 20 साल के करियर में, मैंने कई भूमिकाएं निभाई। फिल्म ‘रज्जो’ में एक वेश्या से लेकर ‘थलाइवी’ में एक क्रांतिकारी नेता का रोल निभाया। हमें अपनी बेटियों को पूर्वाग्रह की बेड़ियों से मुक्त करना चाहिए। हर महिला अपनी गरिमा की हकदार है। सुनो! सुनो!

अगर कोई इन हमलों और जवाबी अटैक की स्पष्ट राजनीति से परे देख सकता है, तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। महिलाएं अक्सर ऐसी जगह फंसी रहती हैं जहां उनकी बहुत अधिक क्षमता और रचनात्मक ऊर्जा एक अत्यधिक संदेहपूर्ण समाज की ओर से लगाए गए लेबल से लड़ने में खत्म हो जाती है, जिसने उन्हें कठोरता से पहले से आंक लिया है। कंगना के मामले में देखें तो उन्हें पुरुष प्रधान फिल्म उद्योग में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) जैसे मुद्दों को उजागर करने के लिए एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। करन जौहर के साथ इंटरव्यू के बाद से, उन्हें सहकर्मियों की ओर से लगभग बहिष्कृत कर दिया गया। उन्हें ‘मुसीबत पैदा करने वाली’ करार दिया गया है। इससे उन्हें कई भूमिकाएं और आकर्षक सपोर्ट गंवाना पड़ा। कोई बात नहीं। शक्तिशाली लोगों से भिड़ने का यह निर्णय उनका व्यक्तिगत विशेषाधिकार है और वह इसके रिजल्ट को पहचानने में काफी बुद्धिमान हैं।

2024 के चुनाव में कई मल्टी-स्टारर कास्ट उम्मीदवार के तौर पर नजर आ रहे हैं। रवि किशन गोरखपुर से अपनी सीट बचाने के लिए उतरे हैं। ‘ड्रीम गर्ल’ हेमा मालिनी तीसरी बार मथुरा सीट से चुनाव लड़ रही हैं। उनके सहयोगी, तीन बार के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को आसनसोल के लिए टीएमसी ने उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में हम कुछ दिलचस्प, कठिन जीत वाली लड़ाइयों के लिए तैयार हैं। इस बीच, कंगना रनौत के लिए आखिरी बात कहते हैं, ‘अगर किसी युवक को टिकट मिलता है, तो उसकी विचारधारा पर हमला किया जाता है। अगर किसी युवती को टिकट मिलता है, तो उसकी सेक्सुअलिटी पर हमला किया जाता है।’ इस प्रैक्टिस को रोकने का समय आ गया है क्योंकि पोल शो शुरू होने जा रहा।

क्या वर्तमान में बढ़ रहा है दागी राजनेताओं का चलन?

वर्तमान में दागी राजनेताओं का चलन बढ़ता ही जा रहा है! यूपी के बांदा जेल में माफिया से नेता बने मुख्तार अंसारी की हार्ट अटैक से मौत हो गई। मुख्तार की मौत के बहाने सोशल मीडिया पर राजनीति और अपराध को लेकर बहस देखने को मिल रही है। देश की राजनीति को अपराध मुक्त करने को लेकर न्यायपालिका से लेकर सरकार, राजनीतिक दलों से लेकर राजनेताओं तक बातें खूब होती हैं। राजनीति में अपराधियों पर नकेल कसने के लिए कानून भी बने हैं लेकिन राजनीति में प्रवेश को लेकर कोई बैरियर नहीं दिखता है। देश की राजनीति में अपराधिक प्रवृति वाले लोगों का आना जारी है। ये पहले अपराध की दुनिया में सिक्का जमाते हैं फिर पार्षद, विधायक लेकर सांसद तक निर्वाचित हो जाते हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर राजनीति में अपराधियों की हिस्सेदारी कहां तक पहुंच चुकी है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की तरफ से पिछले साल विश्लेषण में दावा किया गया था कि भारत भर में राज्य विधानसभाओं में लगभग 44 प्रतिशत विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच एनईडब्ल्यू की तरफ से किए गए विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों के स्व-शपथ पत्रों की जांच की गई थी। यह डेटा विधायकों की तरफ से उनके हालिया चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए हलफनामों से निकाला गया था। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में सेवारत 4,033 व्यक्तियों में से कुल 4,001 विधायकों को शामिल किया गया था। विश्लेषण किए गए विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे। इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध, सहित अन्य अपराध शामिल थे।

केरल में, 135 में से 95 विधायकों, यानी 70 प्रतिशत, ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए थे। इसी तरह बिहार में 242 विधायकों में से 161, 67 फीसदी, दिल्ली में 70 में से 44 विधायक 63 फीसदी, महाराष्ट्र में 284 में से 175 विधायक 62 फीसदी, तेलंगाना में 118 विधायकों में से 72 विधायक, 61 प्रतिशत और तमिलनाडु में 224 विधायकों में से 134, 60 प्रतिशत ने अपने हलफनामों में स्वयं घोषित आपराधिक मामले दर्ज की जानकारी दी थी। इसके अलावा, एडीआर ने बताया कि दिल्ली के 70 में से 37 विधायकों 53 प्रतिशत पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार में 242 में से 122 विधायक 50 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 284 में से 114 विधायक 40 प्रतिशत, झारखंड में 79 में से 31 विधायक 39 प्रतिशत, तेलंगाना में 118 में से 46 विधायक 39 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 403 विधायकों में से 155, 38 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे।

एडीआर के आंकड़ों के अनुसार, भारत में संसद के लिए चुने गए आपराधिक आरोपों वाले उम्मीदवारों की संख्या 2004 के बाद से बढ़ रही है। 2004 में, 24% सांसदों पर आपराधिक मामले लंबित थे, जो 2019 में बढ़कर 43% हो गए। एक याचिका में फरवरी 2023 में दायर इस याचिका में दावा किया गया था कि 2009 के बाद से घोषित आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या में 44% की वृद्धि हुई है। 2019 के लोकसभा चुनावों में, 159 सांसदों ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे।इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और अन्य अपराध भी शामिल थे।

राजनीति का अपराधिकरण होने के पीछे एक नहीं कई कारण हैं। इसमें वोट बैंक की राजनीति, भ्रष्टाचार, निहित हित, बाहुबल के साथ ही पैसा प्रमुख कारण है। इसके अलावा सरकार चलान में असफलता भी एक वजह है। कोई भी दल हो वे वोट बैंक की राजनीति को सबसे अधिक तव्वजो देते हैं। भले ही वे बात विकास और साफ सुथरी राजनीति की करें लेकिन जब बात टिकट देने की आते हैं तो वो खास वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए ही चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारते हैं। ऐसे में वह अपराधियों को भी टिकट देने से गुरेज नहीं करते हैं। राजनीतिक अपराध की यह संस्कृति अक्सर राजनेताओं और उनके निर्वाचन क्षेत्रों के बीच घनिष्ठ संबंधों के कारण बनी रहती है। राजनेता अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्ता और संसाधनों के दुरुपयोग का वातावरण भी तैयार करते हैं। इससे भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। चुनाव लड़ने वाले अधिकांश उम्मीदवारों को पैसा, फंड और डोनेशन की आवश्यकता होती है। ऐसे में उनकी मदद करने वाले फिर चाहे वह बिजनेसमैन हो, मदद के बदले अपना हित भी साधता है। लोग आम तौर पर सामुदायिक हितों के संकीर्ण चश्मे से वोट करते हैं। ऐसे में वे राजनेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि की उपेक्षा करते हैं। काला धन और माफिया फंड राजनीति के अपराधीकरण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। धन के इन अवैध स्रोतों का उपयोग वोट खरीदने और चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। इस वजह से राजनीति के अपराधीकरण में वृद्धि होती है।

आखिर किसने की कार सेवा प्रमुख बाबा तरसेम सिंह की हत्या?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि कार सेवा प्रमुख बाबा तरसेम सिंह की हत्या आखिर किसने की थी!नानकमत्ता गुरुद्वारा के कार सेवा डेरा प्रमुख बाबा तरसेम सिंह हत्याकांड में पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया है। इस हत्याकांड में पुलिस ने सरबजीत सिंह निवासी ग्राम मिवां भिंड जिला तरनतारन पंजाब और बाइक पर पीछे बैठे अमरजीत सिंह उर्फ बिट्टा निवासी सिरोही बिलासपुर उत्तर प्रदेश को मुख्य आरोपी बनाया है। वहीं संदेह के आधार पर तीन और लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है, जिसमें एक पूर्व आईएएस भी बताया जा रहा है। हालांकि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। गुरुवार को नानकमत्ता कार सेवा डेरा प्रमुख बाबा तरसेम सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जांच के दौरान पुलिस को आरोपियों के कमरे से एक आईडी कार्ड मिला था, जो तरनतारन पंजाब निवासी का था। इसके बाद पुलिस की टीमें उत्तर प्रदेश और पंजाब के लिए रवाना हो गई थी। बाबा तरसेम सिंह के हत्यारे 19 मार्च से गुरुद्वारा सराय में ठहरे हुए थे। इन लोगों ने चंपावत स्थित रीठा साहिब जाने की बात कह कर कमरा बुक कराया था। गुरुद्वारा सराय में कातिल 19 मार्च से ठहरे हुए थे। हत्यारों ने सराय का कमरा नंबर 23 को बुक कराया था। दो दिन के बाद वे दोनों कहां चले गए, किसके यहां रुके, इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं। वे दोनों गुरुवार सुबह ही कमरे पर पहुंचे थे। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि हत्यारे पंजाब के रहने वाले हैं तो वह नानकमत्ता कैसे पहुंचे। कार, बाइक या ट्रेन से वे दोनों नानकमत्ता आए थे। पंजाब से नानकमत्ता की दूरी 418 किलोमीटर के लगभग है तो ऐसे में पंजाब से बाइक पर आना मुश्किल है। बिना नंबर की बाइक उन दोनों को किसने उपलब्ध कराई यह भी जांच का विषय है।

इन दोनों के इस कमरे में ठहरने और गुरुवार को बाबा तरसेम सिंह की हत्या के मामले में संदेह है कि इन दोनों ने इतने दिनों तक यहां रेकी करी और गुरुवार सुबह बाबा तरसेम सिंह जब डेरे में कमरे के बाहर बाहर अकेले बैठे दिखे तो गोलियां चलाकर उनकी हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार जल्द ही मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले का खुलासा कर दिया जाएगा। पुलिस ने गुरुवार को ही इस मामले में एसआईटी गठित कर दी थी। पुलिस को दी गई तहरीर के अनुसार दोनों हत्यारोपी सराय में बिना किसी निजी वाहन के आए थे। इस दौरान उनके पास कोई हथियार भी नहीं देखा गया था।

घटना के दौरान प्रयुक्त की गई मोटरसाइकिल और हथियार किसी स्थानीय व्यक्ति ने ही उनको उपलब्ध कराई हैं। तहरीर में यह भी कहा गया है कि वारदात को अंजाम देने वाला दूसरा व्यक्ति जो मोटरसाइकिल में पीछे बैठा हुआ था, उसका नाम अमरजीत सिंह उर्फ बिट्टू उर्फ पुत्र सुरेंद्र सिंह ग्राम सिरोही थाना बिलासपुर जिला रामपुर है। बाबा तरसेम सिंह डेरा कर सेवा गुरुद्वारा साहिब की संपत्ति को खुर्द होने से रोकते थे, इसीलिए कुछ और लोग भी इस हत्याकांड में शामिल हो सकते हैं। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट की गई थी, जिसके बाद से बाबा तरसेम सिंह की हत्या का संदेह जताया जा रहा था।

पुलिस ने हत्याकांड में दो मुख्य आरोपियों के साथ ही गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी श्री नानकमत्ता साहिब के प्रधान और पूर्व आईएएस हरबंस सिंह चुघ, तराई महासभा के उपाध्यक्ष प्रीतम सिंह संधू निवासी खेमपुर गदरपुर और गुरुद्वारा श्री हरगोविंद सिंह रतनपुर नवाबगंज के मुख्य जत्थेदार अनूप सिंह को भी आरोपी बनाया गया है। इन सभी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर किया गया है। बता दें कि बाबा तरसेम सिंह की गुरुवार की सुबह 6:30 बजे के लगभग डेरे के बाहर उस समय हत्या कर दी गई थी जब वे अकेले बैठे हुए थे। डेरा प्रमुख बाबा तरसेम सिंह की हत्या के बाद नानकमत्ता कार सेवा डेरा परिसर में अर्ध सैनिक बल तैनात कर दिया गया है।

शुक्रवार को फेसबुक में सरबजीत पुत्र स्वरूप सिंह निवासी तरनतारन पंजाब ने एक पोस्ट डाली। इस पोस्ट में लिखा है ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह। नानकमत्ता में प्रधान सेवक तरसेम सिंह से बदला ले लिया गया। मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि तरसेम सिंह ने उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी के स्वागत के लिए गुरुघर में लड़कियों को नचाया था। यह सिखों की भावना को आहत करने वाली बात थी। कई सिख संगठनों ने विरोध किया, लेकिन वह साधु सरकारी साहब के दम पर गुंडागर्दी करता था।

सेवादार देवेंद्र के अनुसार बाबा तरसेम सिंह कभी कभार ही बाहर बैठा करते थे। ऐसे में इसकी जानकारी हत्यारों को कैसे मिली और वह इतने बेखौफ थे कि बिना नकाब के ही घटना को अंजाम दे दिया, जबकि बाइक पर नंबर प्लेट भी नहीं है। सीसीटीवी फुटेज में नजर आ रहे हत्यारे ने पैरों में चप्पल पहने हुए थे। वहीं उनके जूते कमरे से बरामद हुए हैं। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि उन्हें सुबह बाबा तरसेम के डेरे में बाहर अकेले बैठे होने की सूचना मिली होगी, जिस कारण वह जल्दबाजी में चप्पल पहनकर वारदात को अंजाम देने पहुंच गए। वे दोनों एक तरफ से आए और चलती बाइक से ही फिल्मी अंदाज में बाबा तरसेम सिंह को गोली मारकर दूसरे गेट से निकल गए। इससे यह प्रतीत होता है कि वे दोनों पेशेवर शूटर हैं और डेरे की उन्होंने अच्छी तरह से रेकी की हुई थी।

उधर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि विभिन्न एंगल से हत्याकांड की जांच की जा रही है। शीघ्र ही हत्याकांड का खुलासा कर दिया जाएगा। बाबा तरसेम सिंह की हत्या को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। हत्या के पीछे तीन कारण बताये जा रहे हैं। जिसमें से एक कारण रंजिश बताई जा रही है। हत्या की वजह रंजिश हो सकती है, लेकिन यह रंजिश किससे और किस मामले में थी इसके जवाब किसी के पास नहीं है। पुलिस इस एंगल से भी जांच कर रही है।

जमीन के विवाद को लेकर भी हत्या करने की चर्चा है जबकि हत्यारों में से एक का आईडी कार्ड पंजाब का होने के कारण हत्या को आतंकवाद से जोड़कर भी देखा जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि कड़ी सुरक्षा के बीच हत्यारे बंदूक पूनिया लेकर डेरा तक कैसे पहुंचे और उनके पास बाइक कहां से आई। बाबा के डेरे में अकेले बैठे होने की खबर हत्यारों को किसने दी।

क्या अब सभी माफियाओं की साफ सफाई करेगी योगी सरकार ?

योगी सरकार अब सभी माफियाओं की साफ सफाई में लगी हुई है! उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में सूबे में पनप रहे माफिया राज पर अंकुश लगा है। एक ओर माफिया और बाहुबलियों की अवैध रूप से अर्जित की गई अकूत संपत्ति पर बाबा का बुलडोजर गरजा है या फिर उसे जब्त कर लिया गया है। साथ ही 192 के करीब अपराधी पिछले कुछ सालों में मुठभेड़ में मार गिराए गए हैं। इसके अलावा आतंक का पर्याय बने मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे कई माफियाओं को उनके पुराने कर्मों की सजा कोर्ट से दिलाने में सफलता हासिल की है। योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस ने चिह्नित माफियाओं में से अब तक कुल 54 मुकदमों में 25 माफिया और 44 उनके सहयोगियों यानी कुल 69 को सजा मिली है। इनमें से 2 माफियाओं को फांसी की सजा सुनाई गई है। दरअसल, साल 2017 से योगी सरकार अपराध करने वाले अपराधी-माफियाओं के लिए काल बन चुकी है। सीएम योगी के सख्त निर्देश पर यूपी पुलिस और एसटीएफ एक के बाद एक बड़ी कार्रवाई कर रही है। पुलिस ने अतीक, मुख्तार जैसे माफियाओं के आतंक से बनाए गए पूरे साम्राज्य को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया है। योगी सरकार में शासन और डीजीपी मुख्यालय की ओर से 2020 में 68 कुख्यात माफिया-अपराधियों की लिस्ट तैयार की गई थी। इन माफियाओं के मुकदमों में पैरवी लगातार की जा रही है। इसमें से 25 माफियाओं और 44 गैंग से सदस्यों सहित कुल 69 अपराधियों को सजा मिल चुकी है। इसमें से 2 आरोपियों को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है। बाकी सभी को उम्रकैद अन्य सजाए मिली है।

डीजीपी मुख्यालय स्तर से तैयार 68 माफिया-अपराधियों की लिस्ट में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे कई खूंखार अपराधी शामिल थे। अतीक के बाद अब बीते गुरुवार को मुख्तार अंसारी की भी मौत हो गई है। इसके अलावा कोर्ट से सजा मिलने वालों में मुलायम यादव, ध्रुव कुमार सिंह उर्फ कुन्टू सिंह, अमित कसाना, एजाज, अनिल दुजाना, याकूब कुरैशी, बच्चू यादव, धर्मेन्द्र कीठल, रणदीप भाटी, संजय सिंह सिंघला, अनुपम दूबे, विक्रान्त उर्फ विक्की और ऊधम सिंह का नाम भी शामिल है। साथ ही योगेश भदौड़ा, मुनीर, सलीम, रुस्तम, सोहराब, अजीत सिंह उर्फ हप्पू, आकाश जाट, सिंहराज भाटी, सुन्दर भाटी को भी कोर्ट से सजा दिलाई जा चुकी है।

माफिया मुख्तार अंसारी को करीब डेढ़ साल के भीतर 8 मुकदमों में कोर्ट ने सजा सुनाई है। इसके साथ ही उनके गैंग के 3 सहयोगियों को भी सजा सुनाई जा चुकी है। इसी तरह विजय मिश्रा को 3 केस में सजा सुनाई जा चुकी है। विजय मिश्रा जेल में बंद है। माफिया अतीक अहमद और उसके 2 सहयोगियों को 1 केस में सजा सुनाई दी गई है। शुक्रवार को बीएसपी नेता राजू पाल हत्याकांड मामले में सीबीआई कोर्ट ने अतीक अहद समेत सभी 9 आरोपियों को दोषी करार देते हुए 6 को उम्र कैद और एक को 4 साल सजा सुनाई है। अतीक और अशरफ की पुलिस हिरासत में मौत हो चुकी है। वहीं बिजनौर के चिह्नित माफिया अपराधी मुनीर और उसके सहयोगी रेयान को 2 मामलों में जेल और फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। इसके अलावा आजमगढ़ के माफिया ध्रुव कुमार सिंह उर्फ कुन्टु सिंह और उसके 14 सहयोगियों और सह-अपराधियों को 2 केसों में उम्र कैद व 10-10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है।

इसी तरह मेरठ के जिले कुख्यात योगेश भदौड़ा और उसके 5 सहयोगियों और सह-अपराधियों को 3 प्रकरणों में उम्रकैद हो चुकी है। बागपत के माफिया अजीत सिंह उर्फ हप्पू को 3 मुकदमों में जेल और जुर्माना की सजा सुनाई जा चुकी है। पीलीभीत के एजाज को 3 केस में कठोर कारावास और जुर्माना से दंडित किया गया है। ऐसे ही गौतमबुद्धनगर के चिह्नित माफिया अपराधी रणदीप भाटी और उसके 3 सहयोगियों को एक मामले में आजीवन जेल और जुर्माना लगाया गया है। फतेहगढ़ के अनुपम दुबे को 1 मामले में उम्रकैद और जुर्माना लगाया गया है।

चिह्नित माफिया अपराधियों से अब तक 3,864 करोड़ से अधिक की संपत्ति का जब्तीकरण और ध्वस्तीकरण और अवैध कब्जे से अवमुक्त कराने की कार्यवाही की जा चुकी है। इतना ही नहीं एक जानकारी के मुताबिक, नवंबर 2019 से नवंबर 2023 के बीच प्रदेश के कुल 68 चिह्नित माफिया अपराधी और गैंग के सदस्यों के अवैध कृत्यों से अर्जित 3,723 करोड़ से अधिक की संपत्तियों का जब्तीकरण और ध्वस्तीकरण किया गया है। इसके साथ ही अन्य विभिन्न माफिया की जनवरी 2021 से अक्टूबर 2023 तक गैंगस्टर अधिनियम के अंतर्गत 4,268 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति के जब्तीकरण की कार्रवाई सुनिश्चित की गई है।

गैंगस्टर अधिनियम के अंतर्गत मार्च 2017 से नवंबर 2023 तक कुल 22,301 केस दर्ज किए गए हैं। वहीं 70,879 आरोपी गिरफ्तार किए गए। इसके साथ ही 120 अरब रुपए से अधिक की संपत्ति जब्त की गई है। इस दौरान 192 अपराधी मुठभेड़ में मारे गए हैं, जबकि 5,800 घायल हुए हैं।

यूपी में अपराध की बात करें तो 2016 की तुलना में साल 2023 में अपराधों में बड़ी कमी आई है। जहां डकैती में 87 प्रतिशत से ज्यादा, लूट में 72 प्रतिशत से ज्यादा और हत्या के मामलों में 40 प्रतिशत के करीब कमी दर्ज की गई है। वहीं फिरौती के लिए अपहरण के मामलों में 68 प्रतिशत और बलात्कार के मामलों में 24 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। इसी तरह 2016 की तुलना में 2023 तक में व्यापक पैमाने पर निरोधात्मक कार्रवाई की गई है। शस्त्र अधिनियम के तहत 4 प्रतिशत अधिक, एनडीपीएस अधिनियम में 26 प्रतिशत अधिक, गैंगस्टर अधिनियम में 23 प्रतिशत, गुंडा एक्ट में 31 प्रतिशत और आबकारी एक्ट में 32 प्रतिशत अधिक कार्रवाई की गई है।

क्या चुनावी नारे भी बदलते हैं चुनावी तकदीर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या चुनावी नारे भी चुनावी तकदीर बदल सकते हैं या नहीं! चुनावों में राजनीतिक नारों की अपनी ही कहानी रही है। देश में चुनावों को लेकर पार्टियों की ओर से कई तरह के नारे गढ़े गए। नारों का अपना मनोविज्ञान होता है। उनके जरिए उस वक्त की कहानी कुछ शब्दों में जनता के दिल तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है। 70 के दशक में गरीबी हटाओ, देश बचाओ…से लेकर अबकी बार मोदी सरकार तक हर चुनावी मौसम में राजनीतिक दल नारे गढ़ते हैं। कई बार उसमें बड़े-बड़े दिग्गज चुनावी नैया पार कर जाते हैं तो कई बार नहीं भी। 1977 में जनता पार्टी ने नारा दिया था- इंदिरा हटाओ, देश बचाओ। इमरजेंसी के बाद हुए इस चुनाव में इंदिरा गांधी को रायबरेली में हार का सामना करना पड़ा था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में एक नारा बहुत गूंजा था- जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा। सहानुभूति की लहर में कांग्रेस भारी जीत से सत्ता में लौटी। बात अगर हालिया दौर की करें तो साल 2014 में BJP ने अपनी चुनावी रणनीति के केंद्र में नरेंद्र मोदी को रखा। उनकी लोकप्रियता को भुनाने को लेकर बीजेपी ने नारा दिया था- अबकी बार, मोदी सरकार। ये नारा चल निकला। सोशल मीडिया के बढ़ते फैलाव के बीच इससे मिलते-जुलते दूसरे नारे भी सामने दिखे। ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार, अबकी बार मोदी सरकार। अब आएगी जिंदगी में बहार, अबकी बार मोदी सरकार जैसे नारे भी गूंजे। विपक्षी पार्टी कांग्रेस की ओर से चुनावी आबोहवा में दो नारे सुनाई पड़ते थे- हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की और कट्टर सोच नहीं…युवा जोश।

राजनीतिक विश्लेषक जयंत घोषाल कहते हैं कि पार्टियां अपने लीडर की लोकप्रियता को चुनाव में भुनाने की लिए रणनीति और नारे को व्यक्ति विशेष के केंद्र में रखती हैं। घोषाल कहते हैं, ‘ये हर समय, हर देश, हर चुनाव में होता है। पार्टी के मैनिफेस्टो को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए पार्टी के पॉपुलर लीडर का का इस्तेमाल किया जाता है। एक समय अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे लीडर थे, आज के वक्त में पीएम मोदी ऐसे ही लीडर हैं। 2009 के चुनाव में डॉ. मनमोहन सिंह को भी लेकर भी कांग्रेस ने ऐसी ही रणनीति का इस्तेमाल किया, खासतौर से न्यूक्लियर डील के मामले पर। हालांकि, उन्हें लेकर परसेप्शन स्ट्रॉन्ग मैन का नहीं था, लेकिन वह रणनीति UPA के लिए काम कर गई। आज के वक्त में नरेंद्र मोदी की इमेज के इर्द-गिर्द चुनाव बुना जाता है, क्योंकि वे एक लोकप्रिय नेता हैं। यही वजह है कि मोदी की गारंटी अब एक स्लोगन बन गया है। इसी तरह ममता बनर्जी और स्टालिन के इर्द-गिर्द चुनाव की रणनीति गढ़ी जाती है, क्योंकि वे अपनी-अपनी पार्टी में सबसे मजबूत नेता हैं।

चुनावी नारों में राजनेता विशेष के व्यक्तित्व को दिखाने और भुनाने का चलन नया नहीं है। 80 के दशक में साहित्यकार श्रीकांत वर्मा ने इंदिरा गांधी को केंद्र में रखकर एक नारा गढ़ा था- जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर… मुहर लगेगी हाथ पर। 1980 के चुनाव में चिकमंगलूर का उपचुनाव जीतने के बाद एक और नारा सामने आया था- एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर। 1996 और 1997 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने नारा दिया था- जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। इस नारे का समाजवादी पार्टी को काफी फायदा हुआ था। साल 1989 के आम चुनाव में वी. पी. सिंह को लेकर नारा बहुत मशहूर हुआ था- राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है। BJP के भीतर वाजपेयी की इमेज को चुनाव के लिए इस्तेमाल करने के लिए अबकी बारी अटल बिहारी के नारे का सहारा लिया गया था। साल 1996 में लखनऊ में रैली के दौरान पहली बार ये नारा सामने आया था। उन्हीं चुनावों में BJP चाहे 13 दिनों के लिए सही लेकिन पहली बार केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। लोगों ने वाजपेयी के चेहरे पर भरोसा जताया था।

हालांकि उनके पीएम रहते ही 2004 में BJP का इंडिया शाइनिंग नारा और चुनाव प्रचार भारतीय चुनावों में अब तक की सबसे विफल रणनीति मानी जाती है। करोड़ों रुपये खर्च करने और प्रोफेशनल पीआर फर्म्स की सेवाएं लेने के बाद भी इसको सफलता नहीं मिली थी। इस नारे की आलोचना में यह कहा गया कि प्रचार रणनीति गढ़ने का काम बाहरी लोगों के हाथ काम चला गया, जिससे कि नारे और प्रचार दोनों का जमीनी सच्चाई से नाता टूट गया और लोग इससे न तो कनेक्ट हो पाए ना भरोसा कर पाए। उन चुनावों में कांग्रेस का नारा था- कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। कांग्रेस के इस नारे पर पर लोगों ने भरोसा भी जताया।

बिल गेट्स के सवालों पर क्या बोले पीएम मोदी ?

आज हम आपको बताएंगे कि बिल गेट्स के सवालों पर पीएम मोदी ने क्या कहा है! माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी को दुनिया के सबसे मेहनती नेताओं में से एक बताया। यही नहीं उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि लगभग चौबीस घंटे काम करने के बाद भी आप इतनी ऊर्जा का स्तर कैसे बनाए रखते हैं? आराम के लिए वो क्या करते हैं, इस पर पीएम मोदी ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि उनके लिए आराम ‘ऑटोपायलट मोड’ में रहता है। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मुझे अपने शिक्षकों की ओर से सिखाए गए आध्यात्मिक अभ्यास के माध्यम से आंतरिक शांति मिलती है। यही मुझे ऊर्जावान बनाती है। यह ऊर्जा शारीरिक शक्ति से नहीं बल्कि मेरे समर्पण और काम करने की भावना से उत्पन्न होती है।’ बिल गेट्स से बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि मेरा शरीर कम आराम करने का आदी हो गया है। मैं कम घंटे सोता हूं, देर रात तक काम करता हूं, फिर भी जल्दी उठता हूं, तरोताजा महसूस करता हूं। यह आंशिक रूप से हिमालय में बिताए समय से आया है, जहां मैंने सुबह-सुबह नहाना शुरू किया था। पीएम मोदी ने कहा कि अपने मिशन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें आगे बढ़ाती रहती है। यह ऊर्जा शारीरिक शक्ति से नहीं आती, बल्कि मेरे समर्पण और मौजूदा मिशन के प्रति मेरे भावनात्मक जुड़ाव से आती है। 

यही नहीं प्रधानमंत्री ने बताया कि मुझे आराम करने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता। यह ऑटोपायलट मोड ये कोई पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी फिटनेस और रूटीन को लेकर बात की है। उन्होंने पहले भी कई मौकों पर बताया है कि अपने दिन की शुरुआत योग से करते हैं। इससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है। मांसपेशियों की ताकत बढ़ाने से लेकर तनाव और अनिद्रा को कम करने में फायदा मिलता है। पीएम मोदी आयुर्वेद में भरोसा करते हैं। प्रधानमंत्री एडवेंचर्स के शौकीन हैं। उन्हें पैदल चलना बहुत पसंद है। अकसर अपनी यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री वॉक करते नजर आते हैं। पीएम मोदी ने एक बार बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार के साथ इंटरव्यू में दिनचर्या को लेकर चर्चा की थी। उन्होंने बताया था कि आंख खुलते ही मेरे पैर जमीन पर आ जाते हैं। मुझे 3 घंटे से ज्यादा नींद नहीं आती। मैं तड़के सुबह उठता हूं और दिन की शुरुआत 30-45 मिनट योग और ध्यान से करता हूं।पर होता है।

पीएम मोदी ने इस दौरान हिमालय में बिताए अपने दिनों को याद किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि वह ‘ब्रह्म मुहूर्त’ में स्नान करने की परंपरा का पालन करते थे। उन्होंने बताया कि हिमालय में मैं सुबह 3.20 बजे से 3.40 के बीच स्नान कर लेता था। इन चीजों ने समय के साथ मेरे शरीर को अनुकूलित किया। मुझे अब आराम करने के लिए पारंपरिक तरीकों की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, इसका मतलब ये भी नहीं है कि मुझे अपने काम के अलावा अन्य गतिविधियों में व्यस्तता की कमी है। इस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल गेट्स के साथ बातचीत में उन्हें बिजी शेड्यूल में आंतरिक शांति पाते हुए स्वस्थ रहने के बारे में कुछ जरूरी सुझाव भी दिए।

पीएम मोदी ने इस दौरान माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक संग एआई, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवा और डिजिटल समावेशन पर भी चर्चा की। जब बिल गेट्स ने पीएम मोदी से पूछा कि बाजरा वैश्विक स्तर पर शाकाहारी भोजन को देखने के तरीके को कैसे बदल रहा है, तो प्रधानमंत्री ने कहा कि बाजरा को बढ़ावा देना आगे बढ़ने का एक बड़ा तरीका हो सकता है। इसे अपनाने से कई फायदे हो सकते हैं। पीएम मोदी ने कहा कि मैंने बाजरा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। कई प्रतिष्ठित कंपनियां अब बाजरा-आधारित उत्पादों की पेशकश कर रही हैं, इसके मूल्य को बढ़ा रही हैं और इसे ट्रेंडी बना रही हैं। यहां तक ​​कि पांच सितारा होटलों ने भी विशेष बाजरा मेनू पेश किए हैं। और यह आजीविका में सुधार कर रहा है। आंख खुलते ही मेरे पैर जमीन पर आ जाते हैं। मुझे 3 घंटे से ज्यादा नींद नहीं आती। मैं तड़के सुबह उठता हूं और दिन की शुरुआत 30-45 मिनट योग और ध्यान से करता हूं।पर होता है।प्रधानमंत्री ने आगे बताया कि बाजरा एक सुपरफूड है। मैंने संयुक्त राष्ट्र के साथ 2023 को बाजरा वर्ष के रूप में मनाया। बाजरा के बहुत फायदे हैं। यह बंजर भूमि में उगता है। इसे न्यूनतम पानी की आवश्यकता होती है और किसी भी उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है।

क्या खत्म हो चुका है मुख्तार अंसारी का आतंक?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मुख्तार अंसारी का आतंक खत्म हो चुका है या नहीं! कभी पूर्वांचल में अपने नाम से खौफ पैदा करने वाले बाहुबली और गैंगस्टर मुख्तार अंसारी का अंत हो गया। दो दिन पहले बांदा के अस्पताल में 9 डॉक्टरों ने उसका गंभीर हालत में इलाज किया लेकिन बचाया नहीं जा सका। 2005 और उसके पहले जिसने भी उसकी धमक सुनी या देखी है, वह यह बखूबी जानता है कि मुख्तार हाल के दिनों में क्या से क्या हो गया था। मरने से पहले अपने परिवार वालों से उसकी आखिरी कॉल सब बयां कर रही थी। एक वक्त ऐसा था जब दिल्ली पुलिस के साथ उसने चूहे-बिल्ली जैसा खेल खेला था। 2009 की सर्दियों का मौसम आने ही वाला था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को यूपी के माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के अपराध साम्राज्य को खत्म करने का आदेश दिया गया था। पुलिस ने बड़ा कदम उठाते हुए दिल्ली पुलिस ने अंसारी और उसके साथियों पर कड़े कानून MCOCA के तहत दर्ज किया। सूत्रों के अनुसार उस समय दिल्ली पुलिस के इस कदम से कई लोग हैरान थे। लेकिन ऐसा लगता है कि कार्रवाई के पीछे एक दिलचस्प तर्क था। एक खुफिया एजेंसी ने उस समय यूपी अदालतों के रिकॉर्ड रूम से मुख्तार अंसारी से जुड़े मूल प्राथमिकी रिपोर्ट सहित मामले से संबंधित दस्तावेजों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना दी थी। जिससे यह शंका पैदा हुई थी कि उस समय न्यायिक हिरासत में बंद अंसारी जल्द ही जेल से बाहर आ जाएगा।

उस वक्त मुख्तार अंसारी 2005 में बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के मामले में जेल में बंद था। अंसारी के गुर्गों, जिनमें मुन्ना बजरंगी भी शामिल था, ने राय पर 400 से ज्यादा गोलियां चलाई थीं और यहां तक कि अपनी ताकत दिखाने के लिए मुन्मा बजरंगी ने कृष्णानंद राय के सिर के बालों का एक हिस्सा भी काट दिया था। शायद यह पक्का करने के लिए कि अंसारी जेल में ही रहे। इसलिए भी दिल्ली पुलिस को इस मामले में शामिल किया गया था। MCOCA के तहत जमानत मिलना मुश्किल था। उस समय यूपी के मऊ से विधायक अंसारी पर संगठित अपराध गिरोह चलाने का आरोप था जो सुपारी हत्या और जबरन वसूली में शामिल था। एक जांचकर्ता ने याद करते हुए बताया कि हमने देश के विभिन्न हिस्सों में उसके खिलाफ दर्ज 45 मामलों की भी लिस्टिंग की थी।लेकिन नवंबर 2009 में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी, दिल्ली पुलिस को गैंगस्टर को पकड़ने में लगभग छह महीने लग गए। एक अधिकारी ने बताया कि मई 2010 में ही अंसारी को पूछताछ के लिए 14 दिन की रिमांड पर लिया गया था।

पांच महीने बाद, स्पेशल सेल ने अक्टूबर 2010 में अंसारी के दाहिने हाथ मुन्ना बजरंगी को दक्षिण दिल्ली के एक व्यापारी अशोक टेबरीवाल से पैसा वसूलने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। एक अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी। नवंबर 2010 में, दिल्ली पुलिस ने अंसारी के खिलाफ जांच शुरू करने के एक साल बाद उस पर आरोपपत्र दायर किया। उस समय यूपी के मऊ से विधायक अंसारी पर संगठित अपराध गिरोह चलाने का आरोप था जो सुपारी हत्या और जबरन वसूली में शामिल था। एक जांचकर्ता ने याद करते हुए बताया कि हमने देश के विभिन्न हिस्सों में उसके खिलाफ दर्ज 45 मामलों की भी लिस्टिंग की थी।

मई 2012 में अंसारी, बजरंगी और उनके साथियों के खिलाफ आरोप तय किए गए और मुकदमा शुरू हुआ। करीब एक साल बाद सब कुछ बदल गया।पुलिस ने बड़ा कदम उठाते हुए दिल्ली पुलिस ने अंसारी और उसके साथियों पर कड़े कानून MCOCA के तहत दर्ज किया। सूत्रों के अनुसार उस समय दिल्ली पुलिस के इस कदम से कई लोग हैरान थे। लेकिन ऐसा लगता है कि कार्रवाई के पीछे एक दिलचस्प तर्क था। एक खुफिया एजेंसी ने उस समय यूपी अदालतों के रिकॉर्ड रूम से मुख्तार अंसारी से जुड़े मूल प्राथमिकी रिपोर्ट सहित मामले से संबंधित दस्तावेजों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना दी थी। फरवरी 2013 में यूपी के एक दूसरे बड़े गैंगस्टर और अंसारी के दुश्मन बृजेश सिंह को स्पेशल सेल ने गैंगस्टर के खास कानून के तहत पकड़ा। इसके बाद क्या हुआ ये साफ नहीं है, लेकिन फरवरी 2014 में कोर्ट ने बृजेश सिंह के खिलाफ लगे MCOCA के आरोप हटा दिए। फरवरी 2016 में कोर्ट ने अंसारी को भी MCOCA के आरोपों से बरी कर दिया, जिससे बहुत से लोग हैरान रह गए।

जब पाकिस्तान पर गलती से चल गई थी ब्रह्मोस मिसाइल!

एक ऐसा समय था जब पाकिस्तान पर गलती से ब्रह्मोस मिसाइल चल गई थी! भारतीय वायुसेना ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर जवाब में पहली बार बताया कि कैसे मार्च 2022 में पाकिस्ताव में जाकर गिरी ब्रह्मोस मिसाइल गलती से दागी गई थी। वायुसेना ने बताया है कि ब्रह्मोस मिसाइल के युद्ध के लिए इस्तेमाल होने वाले कनेक्टर ‘जंक्शन बॉक्स’ से जुड़े रह गए थे, जिसकी वजह से गलती से मिसाइल दागी गई। वायुसेना ने मार्च 2022 में हुई जांच के नतीजे भी बताए हैं। जांच में पता चला कि सड़क पर चलने वाले ट्रकों के दल का कमांडर यह सुनिश्चित करने में असफल रहा कि सभी मिसाइलों के युद्ध वाले कनेक्टरों को हटा दिया जाए। ये कनेक्टर ट्रक को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने से पहले हटाए जाते हैं।वायुसेना ने माना है कि इस घटना से भारत और पाकिस्तान के रिश्ते प्रभावित हुए। उन्होंने हाईकोर्ट को बताया कि तीन अधिकारियों को सेवा से निकालने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति का इस्तेमाल किया गया था। ये एक सोच समझकर लिया गया फैसला था। डिप्टी जज एडवोकेट जनरल विंग कमांडर यूएन पाठक ने कोर्ट को बताया कि ऐसा फैसला वायुसेना में 23 साल बाद लिया गया हैसाथ ही इससे भारत की वायुसेना और पूरे देश की छवि को भी नुकसान हुआ और सरकारी खजाने को भी करोड़ों रुपए का घाटा हुआ। वायुसेना का ये जवाब विंग कमांडर अभिनव शर्मा की याचिका के जवाब में दिया गया है। शर्मा का आरोप है कि एयर कमोडोर और स्क्वाड्रन लीडर ने सुरक्षा चेतावनियों को नजरअंदाज किया और सीधे मिसाइल दाग दी। क्योंकि इस मामले के तथ्य और हालात इतनी सख्त कार्रवाई की मांग करते थे।

वायुसेना ने अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया है। इसमें बताया गया है कि मिसाइल गलती से दागने के मामले में कोर्ट मार्शल की कार्यवाही या सर्विस से निकालने का नोटिस देने से इनकार क्यों किया गया। वायुसेना का कहना है कि चूंकि इस मामले में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी जानकारी चाहिए थी, इसलिए उन्होंने फैसला किया कि तीनों अधिकारियों पर कोर्ट मार्शल चलाना ठीक नहीं होगा। साथ ही, सर्विस से निकालने का नोटिस देना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि इससे वो गुप्त जानकारी सामने आ सकती थी जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकती है।

जांच कमिशन ने पाया कि ये तीनों अधिकारी अपनी गलती के लिए जिम्मेदार हैं। उन्हें पता था कि मिसाइल लॉन्चर से जुड़े हुए हैं, फिर भी उन्होंने लॉन्च को रोकने की कोशिश नहीं की। इससे मिसाइल दूसरे देश में जाकर गिरी, जिससे वहां के लोगों या चीजों को नुकसान हो सकता था। साथ ही इससे भारत की वायुसेना और पूरे देश की छवि को भी नुकसान हुआ और सरकारी खजाने को भी करोड़ों रुपए का घाटा हुआ। वायुसेना का ये जवाब विंग कमांडर अभिनव शर्मा की याचिका के जवाब में दिया गया है। शर्मा का आरोप है कि एयर कमोडोर और स्क्वाड्रन लीडर ने सुरक्षा चेतावनियों को नजरअंदाज किया और सीधे मिसाइल दाग दी।

वायुसेना ने इन आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि एयर कमोडोर जेटी कुरियन का उस ऑपरेशन से कोई लेना-देना नहीं था, जैसा कि शर्मा ने आरोप लगाया है। साथ ही शर्मा के इस दावे को भी गलत बताया गया है कि वो मिसाइल दागने को रोक नहीं सके। वायुसेना का कहना है कि वो पूरी कार्रवाई के दौरान मौजूद थे और उन्होंने ऑपरेशन अफसर को देख रहे थे। वायुसेना ने जवाब में ये भी बताया है कि उन्होंने “राष्ट्रपति की अनुमति” का इस्तेमाल क्यों किया। वायुसेना ने माना है कि इस घटना से भारत और पाकिस्तान के रिश्ते प्रभावित हुए। उन्होंने हाईकोर्ट को बताया कि तीन अधिकारियों को सेवा से निकालने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति का इस्तेमाल किया गया था। ये एक सोच समझकर लिया गया फैसला था। डिप्टी जज एडवोकेट जनरल विंग कमांडर यूएन पाठक ने कोर्ट को बताया कि ऐसा फैसला वायुसेना में 23 साल बाद लिया गया है, शर्मा का कहना था कि ऐसा नियमों को तोड़ने के लिए किया गया था।सर्विस से निकालने का नोटिस देना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि इससे वो गुप्त जानकारी सामने आ सकती थी जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकती है। जांच कमिशन जिसमें 16 गवाहों से पूछताछ हुई ने ग्रुप कैप्टन सौरभ गुप्ता, स्क्वाड्रन लीडर प्रणजल सिंह और विंग कमांडर अभिनव शर्मा को इस घटना के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है। इन तीनों को गलती और लापरवाही के लिए दोषी माना गया है।

समुद्र में हुए युद्ध में कैसे मदद लेती है सेना?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि समुद्र में हुए युद्ध से सेना मदद कैसे लेती है! पिछले कुछ महीनों में भारतीय नौसेना ने समुद्री हमलों से कई देशों के नागरिकों को बचाया है। शुक्रवार को भारतीय नौसेना ने अरब सागर में लुटेरों के चंगुल से ईरानी मछली पकड़ने वाली नाव अल-कंबर और उसके 23 पाकिस्तानी चालक दल के सदस्यों को बचाया। इससे पहले भी इस तरह के कई ऑपरेशन को भारतीय नौसेना अंजाम दे चुकी है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि समुद्र के भीतर जब किसी देश के जहाज पर हमला होता है, तो वे दूसरे देशों की नौसेना से कैसे मदद मांगते हैं? आखिर भारतीय नौसेना पाकिस्तानी, कतर या किसी अन्य देशों के जहाजों के क्रू को समुद्र में कैसे बचाती है? आइए बताते हैं। दरअसल, समुद्र में अलग-अलग देशों की नौसेना अपनी पनडुब्बियों के साथ तैनात रहती है। भारतीय नौसेना भी अरब सागर और हिंद महासागर में तैनात रहती है। यहां से भारतीय नौसेनिक दुश्मनों पर नजर तो रखते ही हैं, साथ ही किसी इमरजेंसी में मदद भी पहुंचाते हैं। अगर किसी कारोबारी जहाज या किसी अन्य जहाज पर समुद्री लुटेरे या कोई अन्य दुश्मन हमला करता है, तो ऐसे में जानकारी मिलते ही नौसेना मदद भेजती है। जहाजों में खास तरह का कम्युनिकेशन सिस्टम लगा होता है, जिससे आपात स्थिति में आसपास के जहाजों को मदद के लिए सिग्नल भेजा जा सकता है। इन सिग्नलों के माध्यम से एक देश की नौसेना दूसरे देश के जहाजों को बचाने के लिए पहुंच जाती है।

अगर बात भारतीय नौसेना की करें तो हमारी नौसेना भी अपने युद्धपोतों के माध्यम से समुद्री क्षेत्र में दूसरे देश के जहाजों को बचाने के लिए कई तरीकों का उपयोग करती है। भारतीय नौसेना ने अरब सागर में समुद्री हमलों के खतरों का सामना करने के लिए कई गाइडेड मिसाइल लॉन्चर तैनात किए हैं। इसके अलावा नौसेना ड्रोन और एयरक्राफ्ट की मदद से समुद्री क्षेत्र में जहाजों की निगरानी करती है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बचाने के लिए कार्रवाई करती है। वहीं भारतीय नौसेना के पास ताकतवर पनडुब्बियां हैं, जो समुद्र के नीचे से दाग सकती हैं। सदस्यीय दल को बचाने के लिए चलाए गए 40 घंटे के अभियान के बाद 35 सोमाली लुटेरों को कानूनी कार्रवाई के लिए मुंबई ले आई थी। इस अभियान में भारतीय तट से करीब 2,600 किलोमीटर दूर समुद्री कमांडो को C-17 विमान से गिराया गया था और गोलीबारी भी हुई थी।भारतीय नौसेना ने अपनी ताकत को समुद्री क्षेत्र में बढ़ावा दिया है और विभिन्न तरीकों से दूसरे देश के जहाजों की सुरक्षा करती है।

गौरतलब है कि हिन्द महासागर क्षेत्र में समुद्री लूटेरों और हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के चलते जहाजों के आने-जाने में दिक्कत हो रही थी। इस समस्या से निपटने के लिए भारतीय नौसेना ने “ऑपरेशन संकल्प” के तहत 23 मार्च को 100 दिन का अभियान पूरा किया। इस अभियान में अदन की खाड़ी, अरब सागर और सोमालिया के पूर्वी तट पर गश्त लगाई गई।

भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने कहा है कि हिन्द महासागर क्षेत्र में सबसे बड़ी नौसेना शक्ति के रूप में, भारत इस इलाके को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने के लिए समुद्री लूटेरों और ड्रोन हमलों के खतरे से निपटने की कार्रवाई जारी रखेगा। बता दें कि नौसेना ने माल्टा के झंडे वाले व्यापारी जहाज “रुएन” और उसके 17 सदस्यीय दल को बचाने के लिए चलाए गए 40 घंटे के अभियान के बाद 35 सोमाली लुटेरों को कानूनी कार्रवाई के लिए मुंबई ले आई थी। इस अभियान में भारतीय तट से करीब 2,600 किलोमीटर दूर समुद्री कमांडो को C-17 विमान से गिराया गया था और गोलीबारी भी हुई थी।

अधिकारियों के मुताबिक, दिसंबर के मध्य से शुरू हुए इस अभियान में 5,000 से ज्यादा जवान, 21 युद्धपोतों के साथ 450 से ज्यादा “जहाज के दिन” और समुद्री निगरानी विमानों द्वारा 900 घंटे से ज्यादा उड़ान भरकर क्षेत्र में खतरों से निपटा गया।यहां से भारतीय नौसेनिक दुश्मनों पर नजर तो रखते ही हैं, साथ ही किसी इमरजेंसी में मदद भी पहुंचाते हैं। अगर किसी कारोबारी जहाज या किसी अन्य जहाज पर समुद्री लुटेरे या कोई अन्य दुश्मन हमला करता है, तो ऐसे में जानकारी मिलते ही नौसेना मदद भेजती है। जहाजों में खास तरह का कम्युनिकेशन सिस्टम लगा होता है, जिससे आपात स्थिति में आसपास के जहाजों को मदद के लिए सिग्नल भेजा जा सकता है। इस दौरान, नौसेना ने लगभग 20 घटनाओं का जवाब दिया और हिन्द महासागर क्षेत्र में सबसे पहले मदद पहुचाने वाला और पसंदीदा सुरक्षा सहयोगी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को मैदान से बाहर करने को कहा.

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पहले कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का आह्वान किया गया. इस बार ‘चूं चूं के साफ कर दो’ में यह और भी तीखा हो गया। प्रधानमंत्री ने मंगलवार को उत्तराखंड के रुद्रपुर में रुद्र तेज कांग्रेस की एक सभा से लगभग बॉलीवुड अंदाज में संवाद करते हुए कहा, ”चूं चूं के साफ कर दो, इसबार इनको मैदान में मत रहने दो!” यानी चुन-चुन कर साफ! उन्हें मैदान में मत रहने दो!

उनका मतलब कांग्रेस से है. राहुल गांधी ने रविवार को रामलीला मैदान में एक सभा में दावा किया, “अगर बीजेपी ‘मैच फिक्सिंग’ के जरिए यह चुनाव जीतने और संविधान बदलने में कामयाब हो जाती है, तो देश में आग लग जाएगी।” अब देश नहीं बचेगा.” राहुल का ये भाषण आज नरेंद्र मोदी ने दिया. उन्होंने कहा, ”कांग्रेस के शहजादा ने चेतावनी दी है कि अगर मोदी सत्ता में लौटे तो देश जल जाएगा!” वे 60 वर्षों तक सत्ता में रहे। सिर्फ 10 साल में ही इतने हताश हो गए हैं कि आग जलाने की बात कर रहे हैं! क्या आप इसकी अनुमति देंगे? क्या आप उन्हें सज़ा नहीं देंगे?” इसके बाद उन्होंने हर जगह से कांग्रेस का सफाया करने का आह्वान किया. मोदी का दावा है कि कांग्रेस ‘आपातकाल’ की भावना से चल रही है. लोकतंत्र में विश्वास नहीं है.

प्रधानमंत्री ने रविवार को मेरठ की सभा में कही गई बात दोहराई. फ़ेरी का सपना दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का है। और फिर दावा किया, ”यह चुनाव दो खेमों के बीच की लड़ाई है. हम ईमानदारी और पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रहे हैं, दूसरी तरफ भ्रष्ट परिवार के लोग गठबंधन कर रहे हैं. उन्होंने मोदी पर हमला बोला. हम कह रहे हैं, भ्रष्टाचार व्याप्त है. वे कह रहे हैं, भ्रष्टाचार बचाओ! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव में 400 सीटें पार करने का लक्ष्य लेकर प्रचार शुरू कर दिया है. वह सोमवार को मुंबई में रिज़र्व बैंक की 90वीं वर्षगांठ के अवसर पर अपने स्मारक भाषण में भी आश्वस्त दिखे। सरकारी अधिकारियों को उनका संदेश है कि नई सरकार के शपथ लेने के बाद ही उन्हें काम का बोझ झेलना होगा.

इस दिन मोदी ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, ”मैं अगले 100 दिनों तक चुनाव में व्यस्त रहूंगा. आपके पास बहुत समय है. इसके बारे में सोचो। क्योंकि, शपथ ग्रहण के अगले दिन से ही काफी काम मिलना शुरू हो जाएगा। इन शब्दों पर सभी हँसे और तालियाँ बजाईं। इस संदर्भ में कई लोग याद दिला रहे हैं कि पहले मोदी ने नौकरशाहों से कहा था, अब मेरा काम आपकी छुट्टी है. इसलिए मैं होम टास्क दे रहा हूं. कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकारी कार्यक्रमों में भी वोट के लिए प्रचार करना नहीं छोड़ रहे हैं. भ्रष्टाचार बचाओ! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव में 400 सीटें पार करने का लक्ष्य लेकर प्रचार शुरू कर दिया है. वह सोमवार को मुंबई में रिज़र्व बैंक की 90वीं वर्षगांठ के अवसर पर अपने स्मारक भाषण में भी आश्वस्त दिखे। सरकारी अधिकारियों को उनका संदेश है कि नई सरकार के शपथ लेने के बाद ही उन्हें काम का बोझ झेलना होगा.

प्रधानमंत्री ने कहा कि रिजर्व बैंक को बदलते समय की मांग को ध्यान में रखते हुए बैंकिंग प्रणाली का ढांचा तैयार करना होगा. देश की वित्तीय वृद्धि के लिए पूंजी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए सभी को सोचना होगा। संबंधित हलकों के मुताबिक भले ही प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर कॉरपोरेट कंपनियों को बैंक खोलने का लाइसेंस नहीं दिया, लेकिन उद्योगपतियों की मौजूदगी में उनका यह बयान अहम है. जो लोग इस सिद्धांत के पक्ष में हैं उनका कहना है कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लिए सभी क्षेत्रों में भारी पूंजी की जरूरत होगी. जिसका एक हिस्सा ऋण के माध्यम से आएगा। उस पूंजी को कम ब्याज पर उपलब्ध कराने के लिए कॉरपोरेट बॉडी को बैंकिंग क्षेत्र में आने के अलावा कोई गति नहीं है। हालांकि, पिछले दिनों आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस संबंध में हितों के टकराव की आशंका जताई थी। प्रधानमंत्री ने शीर्ष बैंक अधिकारियों से यह भी कहा कि अगले दशक में वित्तीय वृद्धि को अत्यधिक महत्व दिया जाना चाहिए। रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी बैठक शुरू होने से ठीक पहले आए इस बयान को विशेषज्ञ अहम मान रहे हैं. जबकि गवर्नर शक्तिकांत दास महंगाई पर काबू पाने के लिए विहंगम दृष्टि अपनाने की बात कर रहे हैं.