Thursday, March 5, 2026
Home Blog Page 691

क्या कांग्रेस के लिए इंडिया गठबंधन मजबूरी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इंडिया गठबंधन कांग्रेस के लिए मजबूरी है या नहीं! राजनीति में कब कौन दोस्त बन जाए और कब कौन दुश्मन कोई नहीं जानता। इस समय दिल्ली का सियासी हाल भी कुछ ऐसा ही है। कभी एक-दूसरे पर जमकर अटैक करने वाले दो दल 2024 के चुनावी रण से ठीक पहले एक साथ आ गए हैं। वो सिर्फ साथ ही नहीं आए हैं बल्कि इंडिया गठबंधन का हिस्सा होने की वजह से एक-दूसरे को सपोर्ट करते भी दिख रहे। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के मुद्दे पर AAP तो केंद्र पर आक्रोशित है ही, कांग्रेस भी इस मुद्दे पर एकजुट होकर आवाज बुलंद कर रही है। अब इसे कांग्रेस की मजबूरी कहें या गठबंधन धर्म का पालन, जिस शराब घोटाला मामले में अरविंद केजरीवाल अभी ईडी की कस्टडी में हैं, उसी मुद्दे को लेकर कभी अजय माकन समेत कांग्रेस नेताओं ने उन पर अटैक किए था। हालांकि, अब लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के सीएम पर ईडी ने कार्रवाई की तो कांग्रेस नेता ही केंद्र सरकार और बीजेपी पर हमलावर हो गए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के खिलाफ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने रविवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली और लेफ्ट नेताओं ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर अपना विरोध जताया। गोपाल राय ने कहा कि 31 मार्च की रैली रामलीला मैदान में आयोजित की जाएगी। इसके लिए पुलिस और प्रशासन से अनुमति ली जाएगी। यह रैली रविवार 31 मार्च सुबह 10 बजे बुलाई गई है। गोपाल राय ने कहा कि जिस कथित शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया है उसमें आज तक कोई मनी ट्रेल सीबीआई या ईडी नहीं ढूंढ पाई है। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी के खाते सीज कर दिए गए। आज कांग्रेस पार्टी चुनाव प्रचार के लिए अपने ही खातों के पैसों का इस्तेमाल नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि अगर इतनी पुरानी पार्टी का खाता सीज हो सकता है तो इनको चंदा देने वाले व्यापारियों का खाता भी सीज किया जा सकता है। लोगों की स्वतंत्रता का हनन हो रहा है।

इस मौके पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि हम देश में लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई में अपने गठबंधन के सभी साथियों के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव में सभी को समान अवसर नहीं मिल रहे। चुनाव जीतने के लिए चुने हुए मुख्यमंत्रियों, चाहे वह हेमंत सोरेन हों या अरविंद केजरीवाल, उनको गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने सत्ता पक्ष से प्रश्न करते हुए कहा कि आप किस तरह का लोकतंत्र देश में स्थापित करना चाहते हैं।

लवली ने कहा कि 31 तारीख को होने वाली रैली में गठबंधन के सभी शीर्ष नेता होंगे। यह रैली कोई राजनीतिक रैली नहीं होगी, बल्कि यह देश में लोकतंत्र को बचाने का एक कदम है। उन्होंने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के अलावा सभी सामाजिक संगठनों, आरडब्लूए और सिविल सोसाइटी के लोगों से इस रैली में पहुंचने का अनुरोध किया। वहीं लेफ्ट ने भी अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए आम आदमी पार्टी को अपना पूरा समर्थन देने का ऐलान किया है। इसी के साथ ‘इंडिया’ गठबंधन ने ऐलान किया कि ‘लोकतंत्र को बचाने’ के लिए 31 मार्च को दिल्ली में महारैली की जाएगी।

फिलहाल जिस तरह से कांग्रेस के नेता दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के मुद्दे को उठा रहे हैं, उससे पार्टी कार्यकर्ताओं में एक भ्रम की स्थिति बन रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि आम आदमी पार्टी भले ही आगामी लोकसभा चुनाव दिल्ली के अंदर कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़े। लेकिन पार्टी के कार्यकर्ता ये नहीं भूलेंगे कि ये वही पार्टी है जिसने कांग्रेस की सत्ता से हटाने में अहम रोल निभाया था। यही वो पार्टी है जिनके नेताओं ने दिल्ली में कांग्रेस पर जमकर अटैक किए थे। खुद आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कई बार ईडी और सीबीआई को ललकारा था और कहा था कि सोनिया गांधी को गिरफ्तार करो। उनके खिलाफ सभी भ्रष्टाचार के सबूत मिल जाएंगे। केजरीवाल की इन बयानबाजी के बाद भी सवाल यही उठ रहे कि आखिर ऐसा क्या बदल गया, ऐसी कौन सी मजबूरी है जो कांग्रेस ने AAP से न केवल हाथ मिलाया बल्कि अब समर्थन को भी लाचार हैं।

दिल्ली के अलावा आम आदमी पार्टी की सरकार पंजाब में भी है। हालांकि, दिल्ली में AAP-कांग्रेस गठबंधन में हैं तो पंजाब में दोनों ही दल अकेले-अकेले जोर-आजमाइश कर रहे हैं। यही नहीं पंजाब कांग्रेस ने केजरीवाल की गिरफ्तारी पर तंज कसा। कांग्रेस विधायक सुखपाल खैरा ने AAP के ‘कट्टर ईमानदार’ दावे पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि आप जो बोएंगे, वही कांटेंगे। कुल मिलाकर दिल्ली में भले ही आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के नेता एक साथ मंच साझा कर रहे हों लेकिन पंजाब में दोनों ही पार्टियां आमने-सामने नजर आ रही हैं। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की मजबूरी है कि वो INDI अलायंस को मजबूत बनाए रखे। अगर अभी गठबंधन में जरा भी टूट नजर आई तो आगामी चुनाव में पार्टी की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि कांग्रेस की चाहे मजबूरी कह लीजिए या फिर अंदरूनी घमासान, अभी वो 2024 के रण में मजबूत उपस्थिति को लेकर AAP को पूरा सपोर्ट करती नजर आ रही।

सिंगापुर में जाकर जम्मू कश्मीर के लिए क्या बोले विदेश मंत्री?

हाल ही में विदेश मंत्री ने सिंगापुर में जाकर जम्मू कश्मीर के लिए एक बयान दिया है! विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद आए बदलाव पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि ये एक अस्थायी प्रावधान था, इसने कई प्रगतिशील कानूनों को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में लागू होने से रोक रखा था। इससे एक देश के रूप में हमें नुकसान हुआ। सिंगापुर में भारतीय समुदाय के सदस्यों को संबोधित करते हुए एस. जयशंकर ने कहा कि आर्टिकल 370 हटने के बाद जो बदलाव हुए, उसके फायदे भी अब दिखने लगे हैं। उन्होंने कहा कि अब जम्मू-कश्मीर में जो बदलाव हुए हैं उसका फायदा आप देख सकते हैं। तीन दिवसीय दौरे पर सिंगापुर पहुंचे विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आर्टिकल 370 को हटाए जाने के पीछे दो अहम बातों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 की वजह से जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद, हिंसा और आतंकवाद को बढ़ावा मिला। इससे पूरे देश की सुरक्षा के लिए समस्या उत्पन्न हुई। दूसरा, इसने बहुत प्रगतिशील कानूनों को उस समय जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तक विस्तारित होने से रोक दिया। कुल मिलाकर आर्टिकल 370 से एक देश के रूप में हमें नुकसान हुआ।

अगस्त 2019 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करते हुए जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द कर दिया। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया। विदेश मंत्री ने एक सवाल पर कहा कि जो बदलाव हुआ है उसका लाभ आप देख सकते हैं। जयशंकर शनिवार से तीन दिवसीय दौरे पर सिंगापुर में हैं। उन्होंने कहा कि आज, आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में आए परिवर्तन के फायदे को देख सकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, आर्टिकल 370 हटने के बाद करीब डेढ़ करोड़ टूरिस्ट कश्मीर आ चुके हैं। इनमें लगभग 25 हजार विदेशी सैलानी हैं। 29,813 युवाओं को आर्टिकल-370 हटने के बाद से सरकारी नौकरी दी गई। 2022-2023 में 92,560 प्रोजेक्ट पूरे किए गए। 2018 में केवल 9,229 प्रोजेक्ट हर साल पूरे होते थे। 2022-23 में लगभग 2,200 करोड़ निवेश हुआ। 2018-19 में महज 220 करोड़ का निवेश था। चार साल में लगभग 40 लाख डोमिसाइल सर्टिफिकेट बांटे गए। 50 से ज्यादा नए कॉलेज खोले गए।

बता दे कि पाकिस्तान को उम्मीद थी कि धारा 370 खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर के लोग सरकार के खिलाफ उबल पड़ेंगे। पाकिस्तान ने तो इसके लिए खूब भड़काने की कोशिश की लेकिन 5 साल बीत जाने के बाद भी ऐसा नहीं हुआ। बल्कि, इसके उलट कश्मीर के लोगों का रिश्ता नई दिल्ली के साथ और मजबूत हुआ है। ये संभव हुआ है मोदी सरकार की नीति के चलते, जिसके चलते नई दिल्ली ने कश्मीरियों का दिल जीतने को प्रमुख लक्ष्य बनाया है। ऐसा मानना है पाकिस्तान के एक्सपर्ट का, जो जम्मू-कश्मीर में पहली फॉर्मूला 4 कार रेस को देखकर हैरान है। पाकिस्तान के रक्षा एक्सपर्ट कमर चीमा ने यूट्यूब पर अपने एक व्लॉग में इस कार रेस के बहाने कश्मीर में तरक्की की चर्चा की है।

कमर चीमा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में खाड़ी देशों से खूब पैसा भारत में आ रहा है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात की बड़ी रियल एस्टेट कंपनी एम्मार ग्रुप ने 6 करोड़ डॉलर के शॉपिंग कॉम्लेक्स बनाएं। क्या ये सब दुबई के शासक मोहम्मद बिन जाएद की मर्जी के बिना हुआ है। क्या पाकिस्तान के हुक्मरान मोहम्मद बिन जाएद से पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों कर रहे हैं, वो भी तब भारत ने कश्मीर से धारा 370 हटा दिया है? कमर चीमा ने कहा कि पाकिस्तान को अब कश्मीर के मुद्दे से आगे बढ़ने की जरूरत है। कमर चीमा पाकिस्तान को कश्मीर का मुद्दा छोड़ने की वजह भी बताते हैं। उन्होंने कहा, “कश्मीर पर पाकिस्तान का एक दृष्टिकोण है, एक नजरिया कश्मीरियों और एक भारत का भी है। मुझे लगता है कि भारत का नजरिए और कश्मीरियों का नजरिया काफी करीब आता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय दुनिया इस मामले पर चुप है। पाकिस्तान के दोस्त भी कहते हैं कि छोड़ो कश्मीर को और आगे की बात करो। बता दें कि 2018 में केवल 9,229 प्रोजेक्ट हर साल पूरे होते थे। 2022-23 में लगभग 2,200 करोड़ निवेश हुआ। 2018-19 में महज 220 करोड़ का निवेश था। चार साल में लगभग 40 लाख डोमिसाइल सर्टिफिकेट बांटे गए। 50 से ज्यादा नए कॉलेज खोले गए। इसलिए ये समझने की जरूरत है कि अब आगे बढ़ने का समय आ गया है।” उन्होंने कहा, बंद कमरे के अंदर हमारे हुक्मरान मानते हैं कि अब ये मुद्दा कमजोर पड़ गया है लेकिन सामने आकर कहने में डरने लगते हैं।

अखिल बीजेपी ने क्यों हटाया वरुण गांधी का नाम?

वर्तमान में बीजेपी ने वरुण गांधी का नाम हटा दिया है! लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने उम्मीदवारों की पांचवीं लिस्ट जारी कर दी है। इस लिस्ट में कई चौंकाने वाले नाम सामने आए हैं। बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को मंडी से टिकट दिया गया है। वरुण गांधी का टिकट कट गया है। मेनका गांधी का नाम लिस्ट में है, यूपी के सुल्तानपुर से वो दावेदारी करेंगी। इस लिस्ट में यूपी की बाकी बची सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित किए गए हैं। इससे पहले बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 51 लोकसभा सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा की थी। बीजेपी की नई लिस्ट में 111 कैंडिडेट्स के नाम सामने आए हैं। लोकसभा उम्मीदवारों की पांचवीं लिस्ट में मंडी से अभिनेत्री कंगना रनौत चुनाव लड़ेंगी। कुरुक्षेत्र से नवीन जिंदल का टिकट कंफर्म हो गया है। उन्होंने रविवार को ही कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा है। नई लिस्ट में अरुण गोविल को मेरठ से बीजेपी ने चुनाव मैदान में उतारा है। इसके साथ ही बीजेपी ने बिहार की 17 सीटों पर भी उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया। इस लिस्ट में बक्सर से अश्विनी चौबे का टिकट कट गया है। झारखंड के पूर्व सीएम हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन को भी बीजेपी ने टिकट दिया है। वो दुमका से दावेदारी करती नजर आएंगी।

वरुण गांधी का नाम लिस्ट में नहीं है, वो पीलीभीत से सांसद थे। उनकी जगह इस बार जितिन प्रसाद को पीलीभीत से चुनाव मैदान में उतारा गया है। वहीं उनकी मां मेनका गांधी को सुल्तानपुर सीट से टिकट दिया गया है। बीजेपी की पांचवीं सूची के आने से पहले कानपुर के मौजूदा सांसद बीजेपी नेता सत्यदेव पचौरी ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को भेजी गई चिट्ठी सार्वजनिक की। इसमें उन्होंने लिखा कि मेरी उम्मीदवारी पर विचार नहीं किया जाए। गाजियाबाद से सांसद वीके सिंह ने भी चुनाव लड़ने से इनकार किया था। उनकी जगह अतुल गर्ग को बीजेपी ने चुनावी रण में उतारा है। यूपी में पार्टी ने जिन नौ सांसदों का टिकट काटा है उनमें गाजियाबाद के सांसद और केंद्रीय मंत्री वीके सिंह, पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी, बरेली से संतोष गंगवार का नाम शामिल है। इनके अलावा कानपुर के सत्‍यदेव पचौरी, बदायूं से पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की पुत्री डॉक्टर संघमित्रा मौर्य, बाराबंकी के उपेंद्र सिंह रावत, हाथरस के सांसद राजवीर सिंह दिलेर, मंडी से अभिनेत्री कंगना रनौत चुनाव लड़ेंगी। कुरुक्षेत्र से नवीन जिंदल का टिकट कंफर्म हो गया है।बहराइच से अक्षयवर लाल गौड़ और मेरठ के सांसद राजेंद्र अग्रवाल शामिल हैं।

इस बार नौ लोकसभा क्षेत्रों के लिए नये चेहरों को मौका दिया गया है, जिनमें गाजियाबाद, पीलीभीत, बरेली, कानपुर, बदायूं, बाराबंकी, हाथरस, बहराइच और मेरठ की सीट के उम्मीदवार शामिल हैं। इस बार 13 सीट में दो सीट पर महिला उम्मीदवारों को उतारा गया है। बता दें कि यूपी से 13 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है। सहारनपुर से राघव लखनपाल को, मुरादाबाद से सर्वेश सिंह को, मेरठ से मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल की जगह टीवी एक्टर अरुण गोविल को, गाजियाबाद से मौजूदा सांसद वी के सिंह की जगह अतुल गर्ग को, अलीगढ़ से मौजूदा सांसद सतीश गौतम, हाथरस से मौजूदा सांसद की जगह अनूप बाल्मीकि, बदांयू से मौजूदा सांसद संघमित्रा मौर्या की जगह दुर्विजय सिंह शाक्य, बरेली से छत्रपाल सिंह गंगवार, पीलीभीत से मौजूदा सांसद वरुण गांधी की जगह जितिन प्रसाद को, सुल्तानपुर से मौजूदा सांसद मेनका गांधी, लोकसभा उम्मीदवारों की पांचवीं लिस्ट में मंडी से अभिनेत्री कंगना रनौत चुनाव लड़ेंगी। कुरुक्षेत्र से नवीन जिंदल का टिकट कंफर्म हो गया है।

उन्होंने रविवार को ही कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा है। नई लिस्ट में अरुण गोविल को मेरठ से बीजेपी ने चुनाव मैदान में उतारा है। झारखंड से तीन सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है। दुमका सीट से शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन को टिकट दिया है। वह कुछ ही दिन पहले बीजेपी में शामिल हुई थी। यहां सुनील सोरेन का टिकट काटा गया है। चतरा से मौजूदा सांसद सुनील कुमार सिंह का टिकट काटकर कालीचरण सिंह को, धनबाद से पशुपति नाथ सिंह का टिकट काटकर ढुलू महतो को टिकट दिया है।कर्नाटक में बेलगाम से मौजूदा सांसद मंगल सुरेश की जगह जगदीश शेट्टार को उम्मीदवार बनाया है। से मौजूदा सांसद सत्यदेव पचौरी की जगह रमेश अवस्थी, बाराबंकी से मौजूदा सांसद उपेंद्र रावत की जगह राजारानी रावत, बहराइच से मौजूदा सांसद अक्षयबार लाल की जगह अरविंद गौड़ को टिकट दिया है।

आखिर कैसी है बीजेपी की 111 उम्मीदवारों की लिस्ट?

आज हम आपको बताएंगे कि बीजेपी की 111 उम्मीदवारों की लिस्ट आखिर कैसी है! बीजेपी ने लोकसभा उम्मीदवारों की पांचवीं लिस्ट में पीलीभीत से वरुण गांधी और गाजियाबाद से वीके सिंह सहित 23 सांसदों के टिकट काटे। पश्चिम बंगाल से दो सांसदों के टिकट बदले। अभिनेत्री कंगना रनौत को हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से और अरुण गोविल को मेरठ से उम्मीदवार बनाया है। वरुण गांधी का टिकट कटा लेकिन उनकी मां मेनका गांधी को सुल्तानपुर से फिर से उम्मीदवार बनाया है। पांचवीं लिस्ट में ओडिशा की संबलपुर से केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और पुरी से बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा का भी नाम है। इस लिस्ट में 111 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया गया। यूपी से 13 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है। सहारनपुर से राघव लखनपाल को, मुरादाबाद से सर्वेश सिंह को, मेरठ से मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल की जगह टीवी एक्टर अरुण गोविल को, गाजियाबाद से मौजूदा सांसद वी के सिंह की जगह अतुल गर्ग को, अलीगढ़ से मौजूदा सांसद सतीश गौतम, हाथरस से मौजूदा सांसद की जगह अनूप बाल्मीकि, बदांयू से मौजूदा सांसद संघमित्रा मौर्या की जगह दुर्विजय सिंह शाक्य, बरेली से छत्रपाल सिंह गंगवार, पीलीभीत से मौजूदा सांसद वरुण गांधी की जगह जितिन प्रसाद को, सुल्तानपुर से मौजूदा सांसद मेनका गांधी, कानपुर से मौजूदा सांसद सत्यदेव पचौरी की जगह रमेश अवस्थी, बाराबंकी से मौजूदा सांसद उपेंद्र रावत की जगह राजारानी रावत, बहराइच से मौजूदा सांसद अक्षयबार लाल की जगह अरविंद गौड़ को टिकट दिया है।

हरियाणा से चार सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है। यहां बीजेपी ने एक सांसद का टिकट काटा है। वैसे कुल तीन सांसद बदले हैँ। एक का टिकट कटा, एक को सीएम बना दिया और एक ने बीजेपी छोड़ दी थी। कुरुक्षेत्र से नवीन जिंदल को उम्मीदवार बनाया गया है। उम्मीदवारी का ऐलान होने से करीब आधे घंटे पहले ही जिंदल कांग्रेस से इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हुए। कुरुक्षेत्र से मौजूदा सांसद नायब सिंह को कुछ दिनों पहले ही बीजेपी ने हरियाणा का नया मुख्यमंत्री बनाया है। हिसार से मौजूदा सांसद बृजेंद्र सिंह की जगह रणजीत चौटाला को टिकट दिया है। बृजेंद्र सिंह ने कुछ दिनों पहले ही बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। चौटाला अभी हरियाणा सरकार में मंत्री हैं और निर्दलीय विधायक थे। उन्होंने भी कुछ घंटों पहले ही बीजेपी जॉइन की। सोनीपत से मौजूदा सांसद रमेश चंद्र कौशिक की जगह पर मोहन लाल बडोली को, रोहतक से मौजूदा सांसद अरविंद कुमार शर्मा को टिकट दिया है। हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा सीट से राजीव भारद्वाज को टिकट दिया गया है। यहां मौजूदा सांसद किशन कपूर का टिकट काटा गया है। मंडी से अभिनेत्री कंगना रनौत को उम्मीदवार बनाया गया है।

बिहार की 17 सीटों पर बीजेपी ने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। यहां से तीन सांसदों के टिकट काटे गए हैं बाकी सभी को रिपीट किया गया है। मुजफ्फरपुर से मौजूदा सांसद अजय निषाद की जगह राज भूषण निषाद को, सासाराम से मौजूदा सांसद छेदी पासवान की जगह पर शिवेश राम को, बक्सर से मौजूदा सांसद अश्विनी कुमार चौबे की जगह मिथिलेश तिवारी को टिकट दिया गया है। बिहार की पश्चिम चंपारण से मौजूदा सांसद संजय जायसवाल को टिकट दिया है। पूर्वी चंपारण से भी मौजूदा सांसद राधा मोहन सिंह को, मधुबनी से मौजूदा सांसद अशोक कुमार यादव, अररिया से मौजूदा सांसद प्रदीप कुमार सिंह, दरभंगा से मौजूदा सांसद गोपाल जी ठाकुर, महाराजगंज से मौजूदा सांसद जर्नादन सिंह को, सारण से मौजूदा सांसद राजीव प्रताप रूड़ी, उजियारपुर से मौजूदा सांसद नित्यानंद राय, बेगूसराय से मौजूदा सांसद गिरिराज सिंह, पटना साहिब से मौजूदा सांसद रवि शंकर प्रसाद, पाटलिपुत्र से मौजूदा सांसद रामकृपाल यादव, आरा से मौजूदा सांसद आर के सिंह, औरंगाबाद से मौजूदा सांसद सुशील कुमार सिंह को, नवादा से विवेक ठाकुर को टिकट दिया गया है।

गुजरात से 6 और सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया गया है। इनमें से पांच सीट पर सांसद बदले गए हैं। मेहसाणा से मौजूदा सांसद शारदाबेन पटेल की जगह हरिभाई पटेल को टिकट दिया गया है। साबरकांठा से मौजूदा सांसद दीपसिंह राठौर की जगह शोभनाबेन बरैया को, सुरेंद्रनगर से मौजूदा सांसद मुंजापारा महेंद्रभाई की जगह चंदूभाई शिहोरा को, जूनागढ़ से मौजूदा सांसद राजेश चुडासमा को, अमरेली से नारनभाई कचाडिया की जगह भरतभाई सुतारिया को, वडोदरा से रंजनबेन भट्ट की जगह हेमंग जोशी को उम्मीदवार बनाया है।

झारखंड से तीन सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान किया है। दुमका सीट से शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन को टिकट दिया है। वह कुछ ही दिन पहले बीजेपी में शामिल हुई थी। यहां सुनील सोरेन का टिकट काटा गया है। चतरा से मौजूदा सांसद सुनील कुमार सिंह का टिकट काटकर कालीचरण सिंह को, धनबाद से पशुपति नाथ सिंह का टिकट काटकर ढुलू महतो को टिकट दिया है।कर्नाटक में बेलगाम से मौजूदा सांसद मंगल सुरेश की जगह जगदीश शेट्टार को उम्मीदवार बनाया है। रायचूर से मौजूदा सांसद राजा अमरेश्वर नायक को, उत्तर कन्नड़ से मौजूदा सांसद अनंत कुमार हेगड़े का टिकट काटकर विश्वेश्वर हेगड़े कगेरी को, चिक्कबल्लापुर से मौजूदा सांसद बीएन गौड़ा की जगह के. सुधाकर को टिकट दिया गया है। महाराष्ट्र में भंडार-गोदिया से मौजूदा सांसद सुनील बाबूराव को, गढ़चिरौली से मौजूदा सांसद अशोक महादेव राव, सोलापुर से मौजूदा सांसद जयसिद्धेश्वर स्वामी की जगह राम सातपुते को उम्मीदवार बनाया है। राजस्थान की गंगानगर सीट से मौजूदा सांसद निहाल चंद की जगह प्रियंका बालन को, झूंझुनू से मौजूदा सांसद नरेंद्र कुमार की जगह शुभकरण चौधरी, जयपुर ग्रामीण से राव राजेंद्र सिंह, जयपुर से मौजूदा सांसद रामचरण बोहरा की जगह मंजू शर्मा, टोंक-सवाई माधोपुर से मौजूदा सांसद सुखबीर सिंह, अजमेर से मौजूदा सांसद भागीरथ चौधरी, राजसमंद से महिमा विश्वेश्वर सिंह को उम्मीदवार बनाया है। बीजेपी ने आंध्र प्रदेश से 6 उम्मीदवार घोषित किए है। राजमुंदरी से डी परंदरेश्वरी को उम्मीदवार बनाया है। रविवार को ही बीजेपी में शामिल वरप्रसाद राव को तिरुपति से टिकट दिया है। दक्षिण गोवा से पल्लवी श्रीनिवास डेम्पो को टिकट दिया है। केरल में चार सीट पर उम्मीदवार घोषित किए हैं। वायनाड से के. सुरेंद्रन को टिकट दिया है।

जानिए वर्तमान में कौन है बिहार के सबसे बड़े बाहुबली?

आज हम आपको बिहार के सबसे बड़े बाहुबली के बारे में जानकारी देने वाले हैं! बिहार में एक दो नहीं, बहुत ‘बाहुबली’ हुए। कुछ अभी भी हैं, भले ही उन लोगों ने रास्ते बदल लिए। हालांकि आज भी उनके नाम से पहले बाहुबली शब्द का प्रयोग किया जाता है। कई बार तो ये कह भी देते हैं कि हम बाहुबली नहीं हैं। ये तो जनता का प्यार है और मीडिया की देन है कि लोग बाहुबली कहने लगते हैं। आज हम बिहार के दो ऐसे बाहुबली की बात करेंगे, जो कभी सियासी धार और गोलियों की बौछार के लिए जाने गए। एक दूसरे से लड़ते-लड़ते नेता बन गए। विधानसभा से लोकसभा तक पहुंच गए। दोनों कब दोस्त और कब दुश्मन बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता है। हम बात कर रहे हैं कोसी के दो ‘दोस्त’ की। कभी दोनों की दुश्मनी से पूरा कोसी कांपता था। दोनों आपस में लड़ते-लड़ते बड़े नेता बन गए। इतना ही नहीं, जेल और बेल का भी खेल दोनों ने खूब खेला। दोनों लंबी जेल यात्रा भी कर चुके हैं। एक बार फिर दोनों आमने सामने हैं। सियासी तौर पर एक दूसरे पर वार करेंगे। जुबानी हमला बोलेंगे। दोनों का वार देख लोगों को 90 की दशक की लड़ाई याद आ जाएगी। एक खुद के लिए हमला करेगा तो दूसरा पत्नी के लिए, लेकिन ये सच्चाई है कि हमला होगा, आरोप-प्रत्यारोप का खेल भी होगा। संभव है कि गड़े मुर्दे भी उखाड़े जाएंगे। बस फर्क इतना होगा कि अब गोलियों की बौछार नहीं होगा। सिर्फ और सिर्फ जुबानी हमले होंगे।दरअसल, लोकसभा चुनाव 2024 में दो बाहुबली आमने-सामने होंगे। कोसी के पूर्णिया से पप्पू यादव चुनावी मैदान में उतरने को तैयार हैं। पप्पू यादव कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। दूसरी ओर शेर-ए-बिहार के नाम से मशहूर आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद शिवहर से चुनाव लड़ेंगी। लवली आनंद जेडीयू से चुनाव लड़ेंगी। बता दें कि यादव बनाम राजपूत की लड़ाई पप्पू यादव और आनंद मोहन बाहुबली की तरह रहे हैं। और इस बार के चुनाव में दोनों सियासी बहुबाली की तरह एक दूसरे पर राजनीतिक हमले करेंगे। इंडिया गठबंधन से पप्पू यादव तो एनडीए की ओर आनंद मोहन एक दूसरे पर वार करेंगे।

आनंद मोहन और पप्पू यादव में कई समानताएं हैं। दोनों 1990 में पहली बार विधायक बने थे। दोनों की राजनीति का आधार बाहुबल था। एक राजपूत समाज का नेता था तो दूसरा यादव समाज का। 1990-91 में जब मंडलवाद की लहर चल रही थी, तब दोनों की बंदूकें बैकवार्ड-फॉरवार्ड की लड़ाई में गरज रही थीं। पप्पू यादव अजीत सरकार हत्याकांड के लिए जेल गए थे, जबकि आनंद मोहन डीएम कृष्णैया हत्याकांड के लिए जेल गए थे। जेल जाने के बाद दोनों साहित्यकार बन गए। पप्पू यादव ने जेल में ‘द्रोहकाल का पथिक’ लिखा, जबकि आनंद मोहन ने ‘कैद में आजाद कलम’ नामक काव्य संग्रह और महात्मा गांधी पर तीन किताबें लिखीं। पप्पू यादव को अजीत सरकार हत्याकांड में उम्रकैद की सजा मिली लेकिन बाद में वे बरी हो गए, जबकि आनंद मोहन को शुरू में कृष्णैया हत्याकांड में फांसी की सजा मिली थी लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे उम्रकैद में बदल दिया। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 1990 में लालू यादव ने बीजेपी और निर्दलीय विधायकों की मदद से मुख्यमंत्री पद संभाला था। आनंद मोहन को महिषी सीट से जनता दल के टिकट चुनाव लड़ा था और विधायक चुने गए थे। हालांकि पप्पू यादव को किसी पार्टी ने टिकट नहीं दिया था। कहा जाता है कि पप्पू यादव भी जनता दल से टिकट चाहते थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद पप्पू यादव ने सिंहेश्वर सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। सहरसा की महिषी और मधेपुरा की सिंहेश्वर सीट भौगोलिक दृष्टि से एक दूसरे के नजदीक हैं। दोनों मात्र 53 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आरक्षण लागू करने की घोषणा की। इसके बाद बिहार सहित देशभर में अगड़ों और पिछड़ों के बीच संघर्ष छिड़ गया। आरक्षण का विरोध करते हुए कई जगह प्रदर्शन हुए। बिहार में तनाव चरम पर था। कहा जाता है कि लालू यादव ने इस संघर्ष में पिछड़े वर्ग के हितों की रक्षा के लिए पप्पू को सामने कर दिया। पप्पू ने अपने समर्थकों के साथ मोर्चा संभाला। वहीं, अगड़ी जातियों की रक्षा के लिए आनंद मोहन ने हथियार उठा लिया। बिहार में दो बाहुबलियों के बीच वार जारी था, तभी चंद्रशेखर सरकार का पतन हो गया। 1991 में मध्यावधि चुनाव हुए। मई-जून में चुनाव संपन्न हुए। मधेपुरा लोकसभा सीट की निर्दलीय उम्मीदवार राज कुमारी देवी के निधन के कारण इस सीट पर चुनाव रद्द कर दिए गए। चुनाव के बाद कांग्रेस के नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार बनी। मधेपुरा लोकसभा सीट पर नवंबर 1991 में उपचुनाव कराए जाने की घोषणा की गई। मंडल आरक्षण लागू करवाने में शरद यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। लेकिन 1991 में वे उत्तर प्रदेश की बदायूं सीट पर लोकसभा चुनाव हार गए थे। शरद यादव ने इस हार का दोष मुलायम सिंह यादव पर मढ़ा था।मंडल राजनीति का प्रमुख चेहरा होने के बावजूद शरद यादव की हार से जनता दल के अंदर कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था। इसके बाद लालू यादव सहित अन्य नेताओं ने शरद यादव को मधेपुरा से उपचुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा। शरद चुनाव लड़ने के लिए मधेपुरा पहुंचे। उस वक्त जनता दल में आंतरिक विभाजन भी हो चुका था। इस चुनावी लड़ाई में आनंद मोहन शरद यादव के विरोध में थे। यूं कहें तो शरद के बहाने आनंद मोहन लालू यादव का खुलकर विरोध कर रहे थे।

गोलीबारी की घटना के बाद कोसी में बुलेट वार शुरू हो गया। 7 नवंबर 1991 को आनंद मोहन अपने समर्थकों के साथ मुरलीगंज मधेपुरा से चुनावी सभा करके लौट रहे थे। आनंद मोहन का काफिला जब जानकीनगर के पास पहुंचा, तभी अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। दोनों ओर से सैकड़ों राउंड गोलियां चलीं। इस अंधाधुंध गोलीबारी में आनंद मोहन के दो समर्थक मारे गए। एक घायल समर्थक के बयान के आधार पर पप्पू यादव और उनके 11 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया था। इस मामले की पूर्णिया कोर्ट में सुनवाई हुई। साल 2017 आनंद मोहन ने इस केस में पप्पू यादव के खिलाफ गवाही दी थी। उस वक्त आनंद मोहन जेल में बंद थे। भारी सुरक्षा के बीच उन्हें जेल से कोर्ट लाया गया था।आनंद मोहन ने 17 सितंबर 2017 को पप्पू यादव के खिलाफ गवाही दी। गवाही के पांच दिन बाद ही पप्पू यादव पूर्णिया की सेंट्रल जेल में आनंद मोहन से मिलने पहुंच गए थे। बाद में पप्पू यादव ने इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया था। दूसरी ओर जानकार कहते हैं कि पप्पू यादव ने रिश्तों में नए रंग भरने के लिए यह मुलाकात की थी। जिसका असर आज भी दिखता है। पप्पू यादव आज भी कहते हैं कि हम दोनों में वैचारिक मतभेद थे। हम कभी एक दूसरे के दुश्मन नहीं थे।

क्या उत्तर प्रदेश में मायावती का जादू खत्म हो गया है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उत्तर प्रदेश में मायावती का जादू खत्म हो गया है या नहीं! कभी यूपी की सियासत का अहम केंद्र रही बसपा और उसकी सुप्रीमो मायावती। लेकिन अब बसपा का सियासी दायरा सिमटता जा रहा है। खुद मायावती बीते आठ साल से किसी सदन की सदस्य नहीं हैं। सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा को उठाते हुए उन्होंने 18 जुलाई 2017 में राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। उसके बाद 2019 लोकसभा, 2022 के विधानसभा, अन्य एमएलसी और राज्यसभा के चुनाव रहे हो या फिर अब अगले महीने होने जा रहे लोकसभा चुनाव वह किसी चुनाव में मैदान में नहीं उतरीं।गौतमबुद्ध नगर जिले के गांव बादलपुर में जन्मी मायावती ने नाम सियासत में कई रिकॉर्ड बनाए हैं। इनमें यूपी की सबसे युवा, पहली दलित मुख्यमंत्री के अलावा सबसे अधिक चार बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम है। दरअसल, 14 अप्रैल 1984 को बसपा का गठन हुआ। लेकिन मायावती के सियासी सफर की शुरुआत वेस्ट यूपी से हुई। उन्होंने अपना पहला चुनाव 1984 में कैराना सीट से लड़ा और हार गईं।1985 में बिजनौर लोकसभा सीट उपचुनाव लड़कर भी हारी। 1987 में हरिद्वार से उपचुनाव लड़कर भी हारी। मायावती को पहली जीत 1989 के लोकसभा चुनाव में बिजनौर से मिली। वह सांसद बनी। 1996 और 2002 में वह सहारनपुर की हरौड़ा अब सहारनपुर देहात विधानसभा सीट से विधायक बनी और मुख्यमंत्री बनी। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ सालों में बसपा का जनाधार लगातार घटता जा रहा है। मायावती भले ही यह कहें कि गठबंधन से उनकी पार्टी को नुकसान होता है लेकिन हक़ीक़त तो ये है कि पिछले लोकसभा चुनाव में गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा बसपा को ही हुआ था।1996 में बसपा 6 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। तब बसपा को 20.6% फीसदी वोट मिला था। 1998 में बसपा को चार सीटें मिली। वोट प्रतिशत बढ़कर 20.9% हो गया। 1999 में बसपा को 14 सीटें मिली। वोट 22.08% हो गया। 12.88 प्रतिशत वोट मिले और 15 जनवरी 1956 को गौतमबुद्ध नगर के गांव बादलपुर में जन्म, 1977 दिल्ली में शिक्षिका के रूप में करियर की शुरुआत2004 में 19 सीटें हो गई। 24.67% वोट मिला। बसपा ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2009 में रहा। पार्टी को 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई और 27.42% वोट मिला। लेकिन 2014 से पार्टी की स्थिति बदलती चली गई।

बीस सांसदों वाली बसपा 2014 में एक भी सांसद नहीं जिता सकी। वोट प्रतिशत भी आठ फीसदी गिरकर 19.77% फीसदी रह गया। 1996 के बाद बसपा का ये सबसे बुरा प्रदर्शन था। साल 2019 में बसपा ने सपा से गठबंधन किया, जिससे उसे फायदा हुआ। ज़ीरो सीटों वाली बसपा ने यूपी में दस सीट जीत ली। इस चुनाव में बसपा को सपा के साथ गठबंधन कर 19.43% ही वोट मिला।इन दस में वेस्ट यूपी की चार सीट सहारनपुर, नगीना, अमरोहा और बिजनौर जीती थी। मेरठ, गौतमबुद्धनगर और बुलंदशहर में दूसरे नंबर पर रही। बता दें कि मायावती को पहली जीत 1989 के लोकसभा चुनाव में बिजनौर से मिली। वह सांसद बनी। 1996 और 2002 में वह सहारनपुर की हरौड़ा अब सहारनपुर देहात विधानसभा सीट से विधायक बनी और मुख्यमंत्री बनी। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ सालों में बसपा का जनाधार लगातार घटता जा रहा है। मायावती भले ही यह कहें कि गठबंधन से उनकी पार्टी को नुकसान होता है लेकिन हक़ीक़त तो ये है कि पिछले लोकसभा चुनाव में गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा बसपा को ही हुआ था।1996 में बसपा 6 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। तब बसपा को 20.6% फीसदी वोट मिला था। 1998 में बसपा को चार सीटें मिली। वोट प्रतिशत बढ़कर 20.9% हो गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा अकेले मैदान में उतरी और उसे सिर्फ 12.88 प्रतिशत वोट मिले और 15 जनवरी 1956 को गौतमबुद्ध नगर के गांव बादलपुर में जन्म, 1977 दिल्ली में शिक्षिका के रूप में करियर की शुरुआत

14 अप्रैल 1984 में बसपा की स्थापना के साथ शिक्षिका की नौकरी छोड़कर राजनीतिक सफर की शुरुआत, अप्रैल 1984 में कैराना से लड़ा पहला विधानसभा चुनाव, 1989 में बसपा ने चुनाव में बीस सांसदों वाली बसपा 2014 में एक भी सांसद नहीं जिता सकी। वोट प्रतिशत भी आठ फीसदी गिरकर 19.77% फीसदी रह गया। 1996 के बाद बसपा का ये सबसे बुरा प्रदर्शन था। साल 2019 में बसपा ने सपा से गठबंधन किया, जिससे उसे फायदा हुआ। ज़ीरो सीटों वाली बसपा ने यूपी में दस सीट जीत ली। इस चुनाव में बसपा को सपा के साथ गठबंधन कर 19.43% ही वोट मिला। 13 सीटें, बिजनौर से जीत कर बनी सांसद 1995 में भाजपा के समर्थन से प्रदेश की पहली बार मुख्यमंत्री बनीवह एक सीट पर ही जीत दर्ज कर सकी।

क्या विकास के रास्ते से भटक रहा है बिहार?

वर्तमान में बिहार विकास के रास्ते से भटकता ही जा रहा है! बिहार की इकॉनमी पिछले दो दशकों में नैशनल इकॉनमी की तुलना में तेजी से बढ़ी है। 2000 के दशक में इसकी एनुअल ग्रोथ रेट औसतन 7% रही। तब नैशनल इकॉनमी 6.3% की औसत दर से बढ़ रही थी। इसी तरह 2010 के दशक में साल 2019-2020 तक बिहार ने 7.5% की औसत वार्षिक वृद्धि दर को हासिल किया। वहीं, इसी दौरान राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था सालाना औसतन 6.6% की दर से आगे बढ़ी। बिहार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के अंतर को पाटने में भी प्रगति की है। Gross enrolment ratio, जन्म के समय लिंग अनुपात, Life expectancy, शिशु मृत्यु दर, बिजली और पेयजल की उपलब्धता में सुधार हुआ है। इनमें बिहार अब राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही नीचे है। उत्तर और पश्चिम भारत में अधिकतर राज्य ऐसे हैं जहां बीजेपी बिल्कुल दमदार नजर आ रही है। इनमें गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, दिल्ली और यूपी शामिल हैं। यहां बीजेपी अपना पुराना प्रदर्शन दोहराती दिख रही है।

यह नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है, इसलिए बीजेपी को उम्मीद है कि वह तीसरी बार बड़े वोट शेयर और बढ़त के साथ सभी 26 सीटें जीत जाएंगी। इस बीच, कांग्रेस दलबदल की गिनती कर रही है। साथ ही आम आदमी पार्टी (आप) के साथ सीटों पर सौदेबाजी कर रही है। भाजपा का वोट शेयर 2014 में 59.1% से बढ़कर 2019 में 63.1% हो गया था। उसके सभी उम्मीदवार एक लाख से अधिक अंतर से जीते थे। इनमें भारत के पांच सबसे अधिक मार्जिन वाले तीन में से तीन शामिल हैं – नवसारी से सीआर पाटिल 6.9 लाख, रंजन भट्ट वडोदरा से 5.9 लाख और अमित शाह गांधीनगर से 5.6 लाख। इस बार वह सभी 26 सीटें पांच लाख से अधिक अंतर से जीतना चाहती है।

राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों पर जीत की हैट्रिक बीजेपी के लिए आसान नहीं होगी। अगर उसके 10-12 मौजूदा सांसदों का खराब प्रदर्शन और राजस्थान की उपेक्षा के कांग्रेस के आरोपों ने मतदाताओं को प्रभावित किया तो असर दिख जाएगा। पिछले साल विधानसभा चुनाव लड़ने वाले तीन मौजूदा भाजपा सांसद हार गए थे। इसलिए पार्टी गहन जांच के बाद उम्मीदवारों का चयन कर रही है। कांग्रेस राज्य में भजन लाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर कथित अनिर्णय और केंद्र के नियंत्रण को लेकर निशाना साध रही है। उसे उम्मीद है कि उबलता असंतोष और युवाओं का समर्थन उसे इस बार सीटें जीतने में मदद करेगा। लोकसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के नए नेतृत्व की क्षमता की परीक्षा लेंगे। जबकि बीजेपी ने पिछले साल विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी, सीएम मोहन यादव को 18 साल पुराने शिवराज सिंह चौहान की जगह लेनी होगी। कांग्रेस में, जीतू पटवारी ने राज्य प्रमुख के रूप में अनुभवी कमल नाथ की जगह ली है। कांग्रेस अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उसे नाथ के गढ़ छिंदवाड़ा पर कब्जा बनाए रखना होगा और एक या दो सीटें और जीतनी होंगी। लेकिन बीजेपी अपनी 28/29 की संख्या को बेहतर करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें राम मंदिर का उत्साह है और इसके लिए कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन बेरोजगारी गति में बाधा बन सकती है।

बीजेपी को उम्मीद है कि वह इस बार दिल्ली में 7-0 की हैट्रिक हासिल कर सकती है। हालांकि, मुकाबला अब त्रिकोणीय नहीं रहेगा क्योंकि आप और कांग्रेस के बीच 4-3 सीटों के समझौते पर सहमति बनी है। 2019 में, दिल्ली में बीजेपी का कुल वोट शेयर 57% था। सभी सात सीटों पर जीत हासिल करने के लिए इसे 2019 के प्रदर्शन को दोहराना होगा – या उससे भी आगे निकलना होगा। बीजेपी का लक्ष्य आप को भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसाना है, जबकि आप आक्रामक रुख का मुकाबला करने के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर अपने काम पर भरोसा कर रही है।

हालांकि समाजवादी पार्टी हाल ही में बीजेपी से एक राज्यसभा सीट हार गई, लेकिन उत्तर प्रदेश मुकाबला एकतरफा नहीं है। राजनीति जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव त्रिकोणीय मुकाबला होगा क्योंकि पुराने सहयोगी सपा और कांग्रेस फिर एक साथ आ गए हैं। वहीं,बसपा अब भी अपने जाटव वोटों से किसी का भी खेल खराब कर सकती है। मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ना कांग्रेस और सपा दोनों को महंगा पड़ा। इसलिए इस बार वे वोटों के बंटवारे को रोकने की कोशिश करेंगे। चूंकि वे बीजेपी के सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी हैं, इसलिए वे मुस्लिम समर्थन की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन बीजेपी अपने पक्ष में मुस्लिम-यादव एकजुटता को रोकने के लिए एमपी के सीएम मोहन यादव पर भरोसा कर रही है। इंडिया ब्लॉक पार्टी आरएलडी के अब अपने पाले में आने से बीजेपी को पश्चिमी यूपी में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद होगी। बीजेपी और सहयोगियों ने 2019 में पूरे यूपी में 64 सीटें जीती थीं और इस बार उनका लक्ष्य अपनी बीजेपी को बेहतर बनाना है।

छत्तीसगढ़ की नई बीजेपी सरकार लोकसभा चुनाव के समय ‘मोदी गारंटी’ को पूरा करने की होड़ में है, क्योंकि उसे सभी 11 सीटें जीतने की उम्मीद है। हालांकि, पिछले साल विधानसभा में हार के बाद कांग्रेस बस्तर और कोरबा लोकसभा सीटें बरकरार रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। बीजेपी राम मंदिर, पीएम के करिश्मे और ‘गारंटी’ जैसे ‘महतारी योजना’ पर भरोसा कर रही है। इसके तहत विवाहित महिलाओं को 1,000 रुपये प्रति माह और धान की बेहतर कीमतें मिलेंगी। भाजपा भी माओवादियों के प्रति अधिक आक्रामक रुख अपना रही है और कथित घोटालों की केंद्रीय जांच के जरिए कांग्रेस को घेर रही है। बिहार की राजनीति को लोकसभा चुनाव में प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले कई नेता हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नजरें जिस शख्स पर टिकी होंगी वो हैं लालू प्रसाद यादव। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रह चुके लालू प्रसाद यादव देश के सबसे चर्चित नेताओं में एक हैं। उनकी रैलियों में आज भी लोग उन्हें सुनने के लिए जुटते हैं। अपने अलग अंदाज और भाषण शैली से वोटरों को लुभाने की कला में लालू यादव को माहिर माना जाता है। हालांकि लालू यादव को अब सेहत की समस्या रहती है, लेकिन चुनावी समर में न उतरकर भी लालू यादव अपने अनुभव से बिहार में इंडिया गठबंधन को फायदा पहुंचा सकते हैं।

1972 में जेएनयू में क्या बोले बलराज साहनी?

आज हम आपको बताएंगे कि 1972 में बलराज साहनी ने जेएनयू में क्या बोला था! लगभग 20 साल पहले कलकत्ता फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने दो बीघा जमीन के निर्माता स्वर्गीय बिमल रॉय और हमें, उनके सहयोगियों को सम्मानित करने का निर्णय लिया। यह एक साधारण लेकिन दिलचस्प समारोह था। कई अच्छे भाषण हुए, लेकिन श्रोता बिमल रॉय को सुनने के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे। हम सब फर्श पर बैठे थे और मैं बिमल दा के बगल में था। मैं देख सकता था कि जैसे-जैसे उसकी बारी करीब आती गई, वो और अधिक घबराते और बेचैन होते गए। और जब उनकी बारी आई तो वो उठे और हाथ जोड़कर बोले, ‘मुझे जो भी कहना होता है, अपनी फिल्मों में कह देता हूं। मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं है।’ और बैठ गए। बिमल दा ने जो किया उसमें बहुत कुछ है और इस समय मेरा सबसे बड़ा प्रलोभन उनके उदाहरण का अनुसरण करना है। तथ्य यह है कि मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं, यह पूरी तरह से इस प्रतिष्ठित संस्थान के नाम के प्रति मेरे मन में गहरा सम्मान है; और एक अन्य व्यक्ति श्री पी.सी. जोशी, जो आपके विश्वविद्यालय से जुड़े हैं, के प्रति मेरे मन में आदर है। मैं अपने जीवन के कुछ महानतम क्षणों के लिए उनका ऋणी हूं, ऐसा ऋण जिसे मैं कभी नहीं चुका सकता। इसीलिए जब मुझे इस अवसर पर बोलने का निमंत्रण मिला तो मेरे लिए इनकार करना असंभव था।यदि आपने मुझे अपने दरवाजे पर झाड़ू लगाने के लिए बुलाया होता, तो मुझे भी उतनी ही खुशी और सम्मान का अहसास होता। शायद वह सेवा मेरी योग्यता के बराबर होती। कृपया मुझे गलत न समझें। मैं विनम्र बनने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। मैंने जो कुछ भी कहा, दिल से कहा और आगे जो कुछ भी कहूंगा वह भी दिल से ही निकलेगा, चाहे वह आपको स्वीकार्य लगे, ऐसे अवसरों की परंपरा और भावना के अनुरूप लगे या नहीं। जैसा कि आप जानते होंगे, मैं पिछली एक चौथाई सदी से भी अधिक समय से अकादमिक जगत के संपर्क से बाहर हूं। मैंने पहले कभी किसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित नहीं किया है। यह उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि आपकी दुनिया से मेरा संपर्क विच्छेद स्वैच्छिक नहीं है। ऐसा हमारे देश में फिल्म निर्माण की विशेष परिस्थितियों के कारण हुआ है। हमारा छोटा सा फिल्मी संसार अभिनेता को या तो बहुत कम काम देता है, जिस कारण वो तंद्रा में कुंठित रहता है; या उसे बहुत अधिक दे देता है, इतना अधिक कि वह जीवन की अन्य सभी धाराओं से कट जाता है। उसे न केवल सामान्य पारिवारिक जीवन के सुखों का त्याग करना पड़ता है बल्कि उसे अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की भी उपेक्षा करनी पड़ती है।पिछले पच्चीस सालों में मैंने 125 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। उसी अवधि में एक समकालीन यूरोपीय या अमेरिकी अभिनेता ने 30 या 35 फिल्में की होंगी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरी जिंदगी का कितना बड़ा हिस्सा सेल्युलाइड की पट्टियों में दबा पड़ा है। बड़ी संख्या में किताबें जो मुझे पढ़नी चाहिए थीं, मैं नहीं पढ़ पाया हूं। इतने सारे आयोजन जिनमें मुझे भाग लेना चाहिए था, वे मुझसे अनछुए गुजर चुके हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं बुरी तरह पीछे छूट गया हूं। और निराशा तब और बढ़ जाती है जब मैं खुद से पूछता हूं कि इन 125 फिल्मों में से कितनी फिल्मों में कुछ भी महत्वपूर्ण था? कितनों को याद किए जाने का दावा है? शायद कुछ। उन्हें हाथ की उंगलियों पर गिना जा सकता था। और यहां तक कि उन्हें या तो भुलाया जा चुका है या बहुत जल्द ही भुला दिया जाएगा। इसीलिए मैंने कहा कि मैं विनम्र नहीं हो रहा हूं। मैं तो केवल चेतावनी दे रहा था ताकि अगर मैं आपको निराश करूं तो आप मुझे क्षमा कर सकें।

कलाकार का क्षेत्र उसका काम है। इसलिए, चूंकि मुझे बोलना ही है, मुझे अपने आप को अपने अनुभव तक ही सीमित रखना चाहिए, जो मैंने देखा और महसूस किया है, और जिस पर मैं बात करना चाहता हूं। उससे बाहर जाना आडंबरपूर्ण और मूर्खतापूर्ण होगा। मैं आपको एक ऐसी घटना के बारे में बताना चाहता हूं जो मेरे कॉलेज के दिनों में घटी थी और जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। इसने मेरे मन पर एक स्थायी छाप छोड़ी है। मैं गर्मियों की छुट्टियों का आनंद लेने के लिए अपने परिवार के साथ बस से रावलपिंडी से कश्मीर जा रहा था। आधे रास्ते में हम रुक गए क्योंकि पिछली रात बारिश के कारण हुए भूस्खलन से सड़क का एक बड़ा हिस्सा बह गया था। हम भूस्खलन के दोनों ओर बसों और कारों की लंबी कतारों में शामिल हो गए। हम बेसब्री से रास्ता साफ होने का इंतजार करने लगे। यह लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के लिए एक कठिन काम था और रास्ता साफ करने में उन्हें कुछ दिन लग गए।

इस दौरान यात्रियों और वाहन चालकों ने अपनी अधीरता और लगातार प्रदर्शन से हालात और मुश्किल बना दिए। यहां तक कि आस-पास के गांववाले भी शहरवालों के मनमाने व्यवहार से तंग आ गए।एक सुबह, ओवरसियर ने सड़क खुली होने की घोषणा की। चालकों को हरी झंडी दिखाई गई, लेकिन हमने एक अजीब नजारा देखा। कोई भी ड्राइवर सबसे पहले पार करने को तैयार नहीं था। वे बस खड़े रहे और दोनों ओर से एक-दूसरे को देखते रहे। इसमें कोई शक नहीं कि सड़क कामचलाऊ थी और खतरनाक भी। एक तरफ पहाड़ और नीचे गहरी खाई और नदी। दोनों इनकार कर रहे थे। ओवरसियर ने सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया था और जिम्मेदारी की पूरी भावना के साथ सड़क खोल दी थी। लेकिन कोई भी उनके फैसले पर भरोसा करने को तैयार नहीं था, हालांकि यही लोग कल तक उन पर और उनके विभाग पर आलस्य और अक्षमता का आरोप लगा रहे थे। आधा घंटा मूक सन्नाटे में बीत गया। कोई नहीं हिला।अचानक हमने एक छोटी हरी स्पोर्ट्स कार को आते देखा। उसे एक अंग्रेज चला रहा था, बिल्कुल अकेला बैठा हुआ। इतनी सारी खड़ी गाड़ियां और वहां भीड़ देखकर वह थोड़ा आश्चर्यचकित हुआ। मैं अपनी स्मार्ट जैकेट और पतलून में काफी विशिष्ट दिख रहा था। ‘क्या हुआ?’, उसने मुझसे पूछा।

मैंने उसे पूरी कहानी बताई। वह जोर से हंसा, हॉर्न बजाया और बिना किसी हिचकिचाहट के खतरनाक हिस्से को पार करते हुए सीधे आगे बढ़ गया। और अब पेंडुलम दूसरी ओर घूम गया। हर कोई पार करने को इतना उतावला था कि एक-दूसरे के रास्ते में आ गया और कुछ देर के लिए नई-नई उलझन पैदा कर दी। सैकड़ों इंजनों और सैकड़ों हॉर्न का शोर असहनीय था। उस दिन मैंने अपनी आंखों से देखा कि आजाद देश में पले-बढ़े आदमी और गुलामी में पले-बढ़े आदमी के बीच के रवैये में कितना अंतर होता है। एक स्वतंत्र व्यक्ति के पास स्वयं सोचने, निर्णय लेने और कार्य करने की शक्ति होती है। परंतु दास वह शक्ति खो देता है। वह हमेशा अपनी सोच दूसरों से उधार लेता है, अपने निर्णयों में डगमगाता है और अक्सर घिसे-पिटे रास्ते पर चलता है।

जिस साहित्य जगत में मेरी काफी रुचि है, वहां भी मैं यही तस्वीर देखता हूं। हमारे उपन्यासकार, कहानीकार और कवि यूरोप में फैशन की लहरों से बड़ी आसानी से प्रभावित हो जाते है जबकि यूरोप, शायद सोवियत संघ को छोड़कर, अभी तक भारतीय लेखन के बारे में जागरूक भी नहीं है। उदाहरण के लिए, मेरे अपने प्रांत पंजाब में युवा कवियों के बीच मौजूदा सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विरोध की लहर है। उनकी कविता लोगों को इसके खिलाफ विद्रोह करने, इसे तोड़ने और भ्रष्टाचार, अन्याय एवं शोषण से मुक्त एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। कोई भी पूरे दिल से उस भावना का समर्थन नहीं कर सकता क्योंकि बिना किसी सवाल के वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बदलने की जरूरत है।इस काव्य की विषयवस्तु अत्यंत प्रशंसनीय है, परंतु रूप देशज नहीं है। यह पश्चिम से उधार लिया गया है। पश्चिम ने छंद और पद को त्याग दिया है, तो हमारे पंजाबी कवि को भी इसे त्याग देना चाहिए। उसे सम्मिलित और अति-कट्टरपंथी कल्पना का भी उपयोग करना चाहिए। नतीजा यह है कि यह शोर और रोष सिर्फ कागजों पर ही सिमट कर रह गया है, छोटे-छोटे, परस्पर प्रशंसनीय साहित्यिक हलकों तक ही सीमित है। जिन लोगों, मजदूरों और किसानों को क्रांति के लिए उकसाया जा रहा है, वे इस तरह की कविता से कुछ प्रेरणा ले पाएंगे। यह बस उन्हें शांत और भ्रमित कर देता है। अगर मैं कहता हूं कि अन्य भारतीय भाषाएं भी ‘नई लहर’ कविता की चपेट में हैं तो मुझे नहीं लगता कि मैं गलत हूं।मैं पेंटिंग के बारे में कुछ भी नहीं जानता।

मैं अच्छे और बुरे का आकलन नहीं कर सकता। लेकिन मैंने देखा है कि इस क्षेत्र में भी हमारे चित्रकार विदेशों में चल रहे फैशन की नकल ही करते हैं। धारा के विपरीत तैरने का साहस बहुत कम लोगों में होता है।और अकादमिक जगत के बारे में क्या? मैं आपको आईने में देखने के लिए आमंत्रित करता हूं। अगर आप हिंदी फिल्मों पर हंसते हैं, तो हो सकता है कि आपको खुद पर हंसने का भी मन हो। इस वर्ष मेरे अपने प्रांत ने मुझे गुरु नानक विश्वविद्यालय की सीनेट के लिए नामांकित करके सम्मानित किया। जब पहली बैठक में भाग लेने का निमंत्रण आया तो मैं पंजाब में था। हमारे महान लेखक गुरबख्श सिंह द्वारा स्थापित सांस्कृतिक केंद्र प्रीत नगर के पास कुछ गांवों में घूम रहा था। शाम की गपशप के दौरान मैंने अपने ग्रामीण दोस्तों से कहा कि मुझे इस बैठक में भाग लेने के लिए अमृतसर जाना है और अगर कोई मेरी कार में लिफ्ट चाहता है तो उसका स्वागत है। इस पर एक साथी ने कहा, ‘यहां हमारे बीच आप तहमत-कुर्ता, किसान फैशन पहने हुए घूमते हैं; लेकिन कल आप अपना सूट पहनेंगे और फिर से साहब बहादुर बन जाएंगे।’ ‘क्यों?’ मैंने हँसते हुए पूछा, ‘अगर तुम चाहो तो मैं ऐसे ही तैयार होकर जाऊंगा।’ ‘तुम कभी हिम्मत नहीं करोगे’, दूसरे ने कहा।

क्या आम आदमी पार्टी कर रही है जनता से सहानुभूति की आशा?

वर्तमान में आम आदमी पार्टी जनता से सहानुभूति की आशा कर रही है! किसी भी हाई-प्रोफाइल राजनेता की गिरफ्तारी पर वोटरों का ध्यान जरूर जाता है। मीडिया में इसकी काफी सराहना भी की जाती है। कथित शराब घोटाले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का लोकसभा चुनाव पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है। केजरीवाल की गिरफ्तारी चुनाव की तारीखों की घोषणा के बमुश्किल कुछ दिनों बाद हुई है। केजरीवाल ने गिरफ्तार होने से पहले नौ बार ईडी के समन का जवाब देने से इनकार कर दिया था। हो सकता है कि ऐसा न हो उनके और उनकी पार्टी के लिए भी अच्छा है, लेकिन केंद्र में शासन कर रही और दिल्ली में सत्ता के कई समीकरणों को कंट्रोल करने वाली बीजेपी के लिए हालात खराब दिख रहे हैं। पिछले कई साल से मीडिया अटकलों के साथ ही विपक्ष का आरोप है कि ईडी का इस्तेमाल केवल बीजेपी के राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में जब वोटर वोट देने के लिए मतदान केंद्र पर पहुंचेगा तो उस पर इस गिरफ्तारी का कितना असर रहेगा। हालांकि, पहले विचार करने के लिए कुछ बिंदु हैं। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कि इस तरह की गिरफ्तारियां जिनमें थोड़े या लंबे समय के लिए जेल भेजे गए लोगों के प्रति कुछ सहानुभूति के बावजूद निश्चित रूप से मतदान पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगी।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को पेश किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान ईडी ने अरविंद केजरीवाल को शराब घोटाले का सरगना बताया। ईडी ने कहा कि दिल्ली शराब नीति भ्रष्टाचार के लिए ही बनाई गई थी। ईडी ने कोर्ट में दलील दी कि शराब घोटाले के पैसे का इस्तेमाल गोवा चुनाव में किया गया। ईडी ने विजय नायर को इस मामले में मिडिल मैन बताया। केंद्रीय जांच एजेंसी का कहना था कि नायर ने इस मामले में बिचौलिए की भूमिक अदा की। ईडी ने अदालत से कहा कि इस मामले में केजरीवाल की तरफ से घूस मांगने के सबूत हैं। ईडी की तरफ से दलीले पेश करने के बाद 10 दिन की रिमांड की मांग की गई। ईडी ने कहा कि के. कविता ने केजरीवाल को 300 करोड़ रुपये दिए थे। दिल्ली शराब नीति भ्रष्टाचार के लिए बनाई गई। रिश्वत के बदले दिल्ली में शराब के ठेके मिले। ये 100 नहीं 600 करोड़ रुपये का घोटाला है। दिल्ली के सीएम शराब घोटाले के सरगना हैं।मनीष सिसोदिया केजरीवाल के संपर्क में थे।

विजय नायर ने घोटाले में बिचौलिए की भूमिका निभाई। के . कविता ने केजरीवाल को 300 करोड़ रुपये दिए। भ्रष्टाचार के पैसे का इस्तेमाल गोवा चुनाव में किया गया। विजय नायर केजरीवाल का बहुत करीबी था। नायर सीएम हाउस में बिना रोकटोक जाता था।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी को लेकर आप कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया गया। दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को मंत्री सौरभ भारद्वाज, आतिशी सहित आम आदमी पार्टी (आप) के कई कार्यकर्ताओं और नेताओं को आईटीओ पर हिरासत में ले लिया। विरोध प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ता, ‘मैं भी केजरीवाल’ की तख्तियां लेकर और भाजपा के खिलाफ नारे लगाते हुए महिलाओं सहित कई आप कार्यकर्ता आईटीओ पर इकट्ठा हुए थे। बीजेपी मुख्यालय की ओर जाने वाली सड़कों पर पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। साथ ही मल्टी-लेयर बैरिकेडिंग लगाई गई थी। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और बसों में पास के पुलिस स्टेशनों में ले जाया गया। इस बीच, ट्रैफिक पुलिस ने आप समर्थकों की बड़ी भीड़ के कारण यात्रियों को सेंट्रल दिल्ली की ओर जाने वाले मार्गों से दूर रहने की सलाह दी है।

आबकारी नीति घोटाले के मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने आम आदमी पार्टी नेता को इस तरह की नीति बनाने से बचने की सलाह देते हुए आगाह किया था। अन्ना ने कहा कि मैंने उनसे कहा था कि हमारा काम आबकारी नीति बनाने का नहीं है। छोटा बच्चा भी जानता है कि शराब खराब चीज है। मैंने उनसे इससे बचने को कहा था। लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी और नीति बनाई। उन्होंने सोचा कि वह ज्यादा पैसा कमाएंगे और इसलिए नीति बनाई। मुझे दुख हुआ और मैंने दो बार उन्हें पत्र लिखा। मुझे दुख हुआ कि केजरीवाल जैसा व्यक्ति आबकारी नीति बना रहा है जिसने एक वक्त मेरे साथ काम किया था और अल्कोहल के खिलाफ आवाज उठाई थी। दूसरी तरफ बीजेपी ने कहा कि भ्रष्टाचार करने वालों को जेल जाना पड़ेगा।

अरविंद केजरीवाल की तरफ से सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापिस ले ली गई। केजरीवाल ने निचली अदालत में सुनवाई का हवाला देते हुए याचिका को वापस लिया। ईडी की तरफ से गिरफ्तारी के खिलाफ आम आदमी पार्टी अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंची थी। इससे पहले गिरफ्तारी की आशंका के बीच आम आदमी पार्टी की तरफ से रात में सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया गया था। ऐसे में इस मामले की आज सुनवाई होगी। इससे पहले केजरीवाल को गिरफ्तार करने के बाद रात को ईडी हिरासत में रखा था। ईडी की तरफ से आज केजरीवाल को पीएमएलए कोर्ट में पेश किया गया। आम आदमी पार्टी ने केजरीवाल की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। आतिशी ने ट्वीट में लिखा देश में पहली बार एक सिटिंग चीफ मिनिस्टर को गिरफ्तार किया गया है। अरविंद केजरीवाल के पास Z+ सिक्योरिटी होता है। अब वो केंद्र सरकार की ED की कस्टडी में हैं। हमें उनके सेफ्टी और सिक्योरिटी की चिंता है। आम आदमी पार्टी की तरफ से केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाएगी। दिल्ली सरकार में मंत्री आतिशी की तरफ से सीएम की गिरफ्तारी के बाद आगे के कदम पर फैसला लिया जाएगा। इससे पहले मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के बाद आतिशी ने कहा था कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल फिलहाल अपने पद से इस्तीफा नहीं देंगे। शिक्षा मंत्री आतिशी का कहना था कि गिरफ्तारी के बाद वह जेल से ही दिल्ली की सरकार चलाएंगे। उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और आगे भी वही मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

क्या देश की जनता अरविंद केजरीवाल के साथ है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या देश की जनता अरविंद केजरीवाल के साथ है या नहीं! क्या अरविंद केजरीवाल जैसे मौजूदा मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करना गलत है? नहीं, मुख्यमंत्रियों को कोई छूट नहीं होनी चाहिए। लेकिन आरोप विश्वसनीय होने चाहिए। प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश होने से लगातार इनकार करने के बाद क्या केजरीवाल की गिरफ्तारी उचित है? हां। किसी को भी कानूनी समन को अनिश्चित काल तक नहीं टालना चाहिए। क्या केजरीवाल दिल्ली शराब घोटाले को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में जिनका उन्हें जवाब देने हैं और जिनके कारण पहले उनके उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार किया गया था? हां। विश्वसनीय गवाहों से मिली गवाही है। राजनीति के लिए पैसे की जरूरत होती है और शराब लाइसेंस राज्य सरकारों के लिए धन प्राप्त करने का एक लंबे समय से स्थापित माध्यम है।क्या केजरीवाल ने ऐसा कुछ किया है जो दूसरों ने नहीं किया? करीब-करीब निश्चित रूप से नहीं। लेकिन राजनीति में एक शर्त है- बचके रहना रे बाबा, बचके रहना रे। यह शर्त तोड़ने वाले को परिणाम भुगतने होंगे। क्या उनकी गिरफ्तारी आम चुनाव से पहले शीर्ष विपक्षी राजनेताओं की छवि खराब करने और उन्हें पंगु बनाने के प्रयासों का हिस्सा है? ईडी और इनकम टैक्स अधिकारियों ने जिन नेताओं को गिरफ्तार किए, वो सभी प्रमुख राजनेता विपक्ष के हैं, एक भी भाजपा का नहीं है। यह संयोग नहीं हो सकता। कथित मनी लॉन्ड्रिंग के लिए कांग्रेस पार्टी के फंड को फ्रीज करने की टाइमिंग से भी सवाल पैदा होता है। केजरीवाल, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने भाजपा की आलोचना की है। राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘डरा हुआ तानाशाह एक मरा हुआ लोकतंत्र बनाना चाहता है।’ आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा का कहना है कि एक अघोषित आपातकाल है। क्या इससे मतदाताओं में विद्रोह भड़केगा? बिल्कुल नहीं। वे इसे हमेशा की तरह राजनीति के रूप में देखते हैं। दशकों से गिरफ्तारियां राजनीति से प्रेरित रही हैं। वे शायद ही कभी दोषसिद्धि की ओर ले जाती हैं, इसलिए जनता उन्हें केवल प्रतिशोध के रूप में देखती है। मनी लॉन्ड्रिंग, राजद्रोह, गैरकानूनी गतिविधियों और समुदायों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने पर कानून इतने धुंधले हैं कि लगभग किसी को भी मामूली आरोपों में गिरफ्तार किया जा सकता है। किसी भी स्वाभिमानी लोकतंत्र में जिस आलोचना की अनुमति होनी चाहिए, वह भारत में गिरफ्तारी का कारण बन सकती है। कुछ लोगों को केवल मीम और फेसबुक पोस्ट शेयर करने के लिए गिरफ्तार किया गया है। राहुल गांधी पर आरोप लगाया गया और उन्हें उन टिप्पणियों के लिए दोषी ठहराया गया जिन्हें अन्य लोकतंत्रों में अचूक कहा जाता। क्या ऐतिहासिक रूप से, कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों ने विरोधियों को परेशान करने और अपने लोगों की रक्षा करने के लिए कानूनों और कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग किया है? हां। हालांकि, भाजपा पर इसे शुरू करने आरोप नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन उसने इसे नए स्तर पर जरूर पहुंचा दिया है। गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओज), स्वतंत्र संस्थानों और असहमति के अन्य माध्यमों पर कार्रवाई से भारत लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों को मापने वाले वैश्विक सूचकांकों में फिसल गया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल से लेकर गार्जियन तक के समाचार पत्रों ने इस गिरावट पर शोक व्यक्त किया है। न्याय मिलने में देरी ने समस्याओं को और बढ़ा दिया है। किसी भी स्वाभिमानी लोकतंत्र में गलत तरीके से गिरफ्तार किए गए लोगों को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए और त्वरित परीक्षण के बाद ‘निर्दोष’ घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन भारत में कई लोगों को गिरफ्तार किया जाता है और जमानत से वंचित कर दिया जाता है, जबकि चार्जशीट दाखिल करने से पहले ही पुलिस जांच सालों तक चलती रहती है। बाद के ट्रायल में दशकों तक का समय लगता है, जिससे अंतहीन उत्पीड़न होता है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट कहता है, ‘प्रक्रिया ही सजा बन गई है।’

कन्विक्शन रेट बेहद कम है, जिससे पुष्टि होती है कि अधिकांश गिरफ्तारियां निराधार हैं। लेकिन आरोपी दशकों तक उत्पीड़न, कारावास और नफरत का शिकार होते हैं। जनता की नजर में राजनेता भ्रष्ट और बदमाश होते हैं, बेहद कम अपवादों को छोड़कर। दशकों से पार्टियों ने भ्रष्टाचार के लिए एक-दूसरे की आलोचना की है। फिर भी, सत्ता में आने पर पार्टियों ने अपने आरोपों पर शायद ही कभी कार्रवाई की है। चूंकि सभी पार्टियां हमाम में नंगे हैं, इसलिए उन्होंने आपस में मूक समझौता कर रखा है।

लेकिन भाजपा ने अब उस सांचे को बिल्कुल तोड़ दिया तो दिलचस्प सवाल यह बनता है कि आखिर गैर-भाजपा राज्य सरकारों ने इसी तरह के प्रतिशोध के साथ जवाबी कार्रवाई क्यों नहीं की है? केंद्र प्रवर्तन और आयकर अधिकारियों को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन राज्य सरकारें अपनी पुलिस को नियंत्रित करती हैं और इसलिए भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों को गिरफ्तार करने और परेशान करने की व्यापक शक्तियां हैं। उनकी निष्क्रियता का एक कारण विपक्षी दलों में एकता की कमी है। इसके अलावा, राज्य सरकारों में यह डर है कि केंद्र उसकी फंडिंग रोकने के साथ-साथ उनके जरूरी काम-काज में कई तरह के अड़ंगे लगा सकता है, इसलिए नई दिल्ली से टकराने वाले किसी भी राज्य को गंभीर परिणाम भुगतने का जोखिम है। यही वजह है कि भले ही केंद्रीय एजेंसियां अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन जैसे विपक्षी सीएम को गिरफ्तार करती हैं, लेकिन कोई भी राज्य सरकार केंद्रीय मंत्रियों को गिरफ्तार नहीं करती है। यदि सैकड़ों भ्रष्ट राजनेताओं को जमानत दिए जाने के बाद तुरंत ट्रायल में सजा हो तो भारत वास्तव में शानदार लोकतंत्र का उदाहरण बनेगा। क्या कोई मानता है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी इसी वांछनीय लक्ष्य की दिशा में बढ़ा एक कदम है? अफसोस से कहा जा सकता है- नहीं।