Wednesday, March 4, 2026
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मोदी सरकार की गारंटी पर क्या बोले मल्लिकार्जुन खड़गे?

हाल ही में मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी सरकार की गारंटी पर एक बयान दिया है! कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मंगलवार को कहा कि देश बदलाव चाहता है तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की गारंटी का वही हश्र होने जा रहा है जो 2004 में ‘इंडिया शाइनिंग’ भारत उदय नारे का हुआ था। उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में यह भी कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के घोषणा पत्र को घर-घर तक ले जाना होगा। कार्य समिति की बैठक घोषणा पत्र को अंतिम रूप देने के लिए बुलाई गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी इस लोकसभा चुनाव में जो वादे करने जा रही है, उन्हें वह पूरा करेगी। उन्होंने कहा, “हम वादे करने के पहले गहराई से यह पड़ताल कर लेते हैं कि उनको पूरा कर पाएंगे या नहीं।खरगे ने कहा कि ये यात्राएं सिर्फ़ राजनीतिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि हमारे राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे प्रयास के रूप में दर्ज हो गई हैं जो जन संपर्क का सबसे बड़ा प्रयास है। इतनी लंबी पदयात्रा लम्बे समय से किसी राजनेता ने नहीं की है, जिसे कोई चाहे तो भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस की पांच गारंटी का उल्लेख करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आह्वान किया, “आप सभी वरिष्ठ नेताओं की बहुत अहम भूमिका होगी। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि इसके सभी प्रमुख मुद्दों को पूरे देश में, गांव-मुहल्ला और घर-घर तक पहुंचाने में प्रेरक की भूमिका निभाएं।” खरगे ने कहा कि देश बदलाव चाहता है। मौजूदा सरकार की गारंटी का वही हश्र होने जा रहा है जो 2004 में ‘इंडिया शाइनिंग’ नारे का हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि इसीलिए कांग्रेस का घोषणापत्र 1926 से देश के राजनीतिक इतिहास में ‘भरोसे का दस्तावेज’ बना हुआ है। कांग्रेस का घोषणा पत्र पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम की अध्यक्षता वाली समिति ने तैयार किया है। खरगे के अनुसार, ”समिति ने प्रयास किया कि हमारा घोषणा पत्र सिर्फ अकादमिक कवायद न रहे, बल्कि उसमें व्यापक जन भागीदारी हो। इसके लिए संपर्क और संवाद किया गया। वेबसाइट “आवाज भारत की” के जरिये लोगों से सुझाव आमंत्रित किए गए थे।

उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस यात्रा से जुड़े मुद्दों की देश विदेश में बहुत चर्चा हुई है। इससे हम देश का ध्यान जनता के असली मुद्दों पर खींच पाए। इस यात्रा का समापन 16 मार्च को मुंबई में हुआ। खरगे ने कहा, “मुंबई हमारे लिए ख़ास तौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी पार्टी की स्थापना मुंबई में ही हुई थी। हमारे स्वाधीनता आंदोलन को ताक़त भी 1942 में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान मुम्बई से ही मिली थी। बड़ी ख़ुशी की बात है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का समापन भी मुंबई में ही हुआ।

खरगे ने कहा कि ये यात्राएं सिर्फ़ राजनीतिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि हमारे राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे प्रयास के रूप में दर्ज हो गई हैं जो जन संपर्क का सबसे बड़ा प्रयास है।उनको पूरा कर पाएंगे या नहीं।खरगे ने कहा कि ये यात्राएं सिर्फ़ राजनीतिक रूप से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि हमारे राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे प्रयास के रूप में दर्ज हो गई हैं जो जन संपर्क का सबसे बड़ा प्रयास है। इतनी लंबी पदयात्रा लम्बे समय से किसी राजनेता ने नहीं की है, जिसे कोई चाहे तो भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस की पांच गारंटी का उल्लेख करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आह्वान किया, “आप सभी वरिष्ठ नेताओं की बहुत अहम भूमिका होगी। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि इसके सभी प्रमुख मुद्दों को पूरे देश में, गांव-मुहल्ला और घर-घर तक पहुंचाने में प्रेरक की भूमिका निभाएं।” इतनी लंबी पदयात्रा लम्बे समय से किसी राजनेता ने नहीं की है, जिसे कोई चाहे तो भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। उन्होंने कांग्रेस की मुंबई हमारे लिए ख़ास तौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी पार्टी की स्थापना मुंबई में ही हुई थी। हमारे स्वाधीनता आंदोलन को ताक़त भी 1942 में ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन के दौरान मुम्बई से ही मिली थी। बड़ी ख़ुशी की बात है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ का समापन भी मुंबई में ही हुआ।उल्लेख करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आह्वान किया, “आप सभी वरिष्ठ नेताओं की बहुत अहम भूमिका होगी। आप सभी से मेरा अनुरोध है कि इसके सभी प्रमुख मुद्दों को पूरे देश में, गांव-मुहल्ला और घर-घर तक पहुंचाने में प्रेरक की भूमिका निभाएं।”

आखिर कैसे किया जाता है लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल?

आज हम आपको बताएंगे कि लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कैसे किया जाता है! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बज गई है। यूपी की 80 सीटों समेत देश की 543 लोकसभा सीटों पर चुनाव का शंखनाद हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से तारीखों का ऐलान होते ही जिला स्तर पर चुनावी तैयारियां शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन की ओर से तमाम चुनाव तैयारियां को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस क्रम में चुनाव आयोग के निर्देश पर निर्वाचन शाखा का निर्माण पहले ही किया जा चुका है। जिलों के डीएम लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्य निर्वाचन अधिकारी की भूमिका में रहेंगे। उनके स्तर पर ही लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार अपने नामांकन पत्रों को जमा कराएंगे। नामांकन पत्रों को जमा करना लोकसभा चुनाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इसके तहत उम्मीदवार अपने नाम को चुनाव आयोग के समक्ष रजिस्टर करते हैं। वे दावा करते हैं कि लोकसभा चुनाव के मैदान वे जनता का वोट हासिल करने के लिए सही दावेदार हैं। देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद 20 मार्च से नामांकन फॉर्म भरे जाने की तैयारी भी शुरू कर दी गई है। पहले चरण की वोटिंग 19 अप्रैल को होगी। वहीं, 1 जून को आखिरी चरण का मतदान और 4 जून को मतगणना के बाद रिजल्ट का प्रकाशन किया जाएगा। प्रत्याशियों की ओर से जमा कराए गए तमाम प्रमाण पत्रों की जांच के बाद चुनाव आयोग उनकी लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी तय करती है। चुनाव आयोग की ओर से प्रत्याशियों को उम्मीदवार के रूप में रजिस्टर्ड घोषित किया जाता है। उम्मीदवारी फाइनल होने के बाद ही प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतर कर अपना प्रचार अभियान तेज कर अपने पक्ष में वोट मांग सकते हैं। उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला आखिरकार जनता अपनी वोट की ताकत के जरिए करती है। इस प्रक्रिया में नॉमिनेशन को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

लोकसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद जिला स्तर पर चुनाव की घोषणा होगी। चुनाव आयोग के निर्देश पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी सह जिलाधिकारी की ओर से चुनाव कार्यक्रम का प्रेस नोट जारी किया जाएगा। अमूमन सभी चरणों के लिए यह प्रक्रिया जिलों में एक साथ पूरी कराई जा सकती है। साथ ही, चुनाव का नामांकन शुरू होने से पहले से भी डीएम की तरफ से इस संबंध में मीडिया के जरिए लोगों को प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी जाती है। इसके बाद योग्य उम्मीदवार जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष पहुंच कर अपना नामांकन पेपर दाखिल करते हैं।

लोकसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कोई भी भारतीय नागरिक किसी भी लोकसभा सीट के लिए नामांकन कर सकते हैं। इसके लिए उनका वोटर लिस्ट में नाम होना अनिवार्य होता है। जब किसी उम्मीदवार को किसी राजनैतिक पार्टी की ओर से प्रत्याशी बनाया जाता है, तो सामान्य तौर पर इसे पार्टी का टिकट मिलना शब्द से संबोधित किया जाता है। सिंबल के साथ प्रत्याशी अपना नामांकन दाखिल करते हैं। ऐसे में उन्हें चुनाव आयोग की ओर से संबंधित पार्टी सिंबल का आवंटन किया जाता है। इसके अलावा देश का कोई भी नागरिक सांसद बनने के लिए नामांकन कर सकता है।

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने सात चरणों में चुनावी प्रक्रिया पूरी करने का ऐलान किया है। अलग- अलग लोकसभा सीटों के लिए निर्वाची पदाधिकारी और ऑर्ब्जवर्स की नियुक्ति की गई है। उम्मीदवार जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में पहुंच कर नामांकन फॉर्म जमा कर सकते हैं। नामांकन पत्र के साथ उम्मीदवारों को जमानत राशि के रूप में निर्धारित रकम भी जमा करानी होती है। चुनाव अधिकारी के मुताबिक उम्मीदवार नामाकंन के दौरान सीमित संख्या में गाड़ी का इस्तेमाल करना होता है। इसके अलावा वाहनों को निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से 100 मीटर पहले खड़ा किया जाता है। नामाकंन के दौरान निर्वाचन अधिकारी की स्वीकृति के बिना कोई उम्मीदवार ढोल-नगाड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।

उम्मीदवर को नामांकन पेपर के साथ शपथ पत्र भी देना होता है। नोटरी के स्तर पर इस शपथ पत्र को तैयार कराया जाता है। इसमें प्रत्याशी अपनी आय- व्यय के ब्यौरा से लेकर पूरी जानकारी भरता है। लोकसभा सीट पर उम्मीदवार बनने से पहले नामांकन पत्र भरना होता है। जरूरी कागजों में प्रत्याशी को अपने पासपोर्ट साइज फोटो, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मूल निवास, जाति प्रमाण पत्र की फोटोकॉपी जैसे कागजों की जरूरत होती है। विधायक बनने से पहले नामांकन पत्र में अपनी चल- अचल संपत्ति का ब्यौरा, पत्नी और आश्रित बच्चों की भी आय- व्यय एवं लोन की पूरी जानकारी देनी पड़ती है। इसके अलावा उम्मीदवारों के कितने हथियार हैं, कितने जेवर हैं और शैक्षणिक जानकारी भी देनी होती है। आय के साधन को भी यहां अंकित करना होता है। इसके अलावा प्रत्याशी पर कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं? कितने मामले कोर्ट में चल रहे हैं? क्या किसी मामले में सजा हुई है? इन सभी का विवरण एफिडेविट के माध्यम से सही- सही देना होता है।

नामांकन फॉर्म भरने के बाद भारत निर्वाचन आयोग की ओर से नामांकन फॉर्म की जांच और नाम वापसी जैसी प्रक्रियाओं को पूरा कराया जाता है। लोकसभा चुनाव 2024 के उम्मीदवारों को चुनाव आयोग ने साफ किया है कि अपने नामांकन पत्र को भरते समय उम्मीदवार पूरी सावधानी बरतें और नामांकन पत्र का कोई भी कॉलम खाली न छोड़ें। ऐसा करने वालों पर नामांकन पत्र अवैध माना जाएगा। ऐसे नामांकन फॉर्म खारिज कर दिए जाएंगे। आयोग की ओर से कहा गया है कि राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अपने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों, रिटर्निंग आफिसर को इस संबंध में निर्देश जारी करें। प्रत्याशियों की ओर से दाखिल किए जाने वाले नामांकन पत्र और उसके साथ संलग्न किए जाने वाले शपथ पत्र की बारीकी से जांच की जाए। सूचना के अधिकार कानून के अनुच्छेद- 33ए का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उम्मीदवार को नामांकन पत्र में केस के संबंध में स्पष्ट उल्लेख करना होगा। बताना होगा कि वह किसी आपराधिक मामले में दो साल या इससे अधिक की सजा पा चुका है या फिर उसे किसी मामले में एक साल या इससे अधिक की सजा मिल चुकी है?

नामांकन करने और स्क्रूटनी में सही पाए जाने वाले उम्मीदवारों को अपना नाम वापस लेने की सुविधा होगी। भारत निर्वाचन आयोग की ओर से इसके लिए समय सीम का निर्धारण किया गया। उस समय अवधि में प्रत्याशी अपनी मर्जी से नाम वापस ले सकता है। इसके लिए एक एफिडेविट पर घोषणा पत्र देना होता है। इसमें नाम वापसी करने की डिटेल लिखी होती है। वेरिफाई करने के बाद प्रत्याशी का नाम वापस कर दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश की किन सीटों पर उतरेंगे बीजेपी के महारथी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि उत्तर प्रदेश की किन सीटों पर बीजेपी के महारथी उतरेंगे! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीति गरमाने लगी है। विपक्षी गठबंधन की ओर से सीट शेयरिंग फार्मूला तय कर लिया गया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन का ऐलान करते हुए सीटों का निर्धारण कर लिया है। अब भारतीय जनता पार्टी भी अपने सहयोगियों के साथ सीटों के बंटवारे की प्रक्रिया पर आगे बढ़ती दिख रही है। देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का ऐलान कर सकती है। माना जा रहा है कि शुक्रवार को प्रदेश में एनडीए का फाइनल पिक्चर सामने आ सकता है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर भाजपा प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) के साथ चुनावी मैदान में उतार रही है। भाजपा इस चुनाव में सहयोगी दलों को गठबंधन के तहत 6 सीटें देने की योजना तैयार की है। वहीं, पार्टी खुद 74 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर सकती है। एनडीए के सहयोगियों में राष्ट्रीय लोक दल और अपना दल एस को दो-दो सीटें दी जा सकती है। वहीं, निषाद पार्टी और सुभासपा को एक- एक सीट मिल सकती है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के रालोद को चार से छह सीटें दिए जाने की चर्चा चल रही थी। अखिलेश यादव की ओर से गठबंधन का ऐलान भी किया गया था। लेकिन, पूर्व प्रधानमंत्री और महान किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा के बाद रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी पलट गए। वे एनडीए के पाले में चले गए। वहीं, पिछले दिनों सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर की ओर से तीन सीटों पर दावा किया गया था।

पिछले दो लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तहत दो- दो लोकसभा सीटों पर संतोष करने वाली अपना दल एस की भी कोशिश इस बार सीट बढ़ाने की थी। इसको लेकर दबाव बनाया गया, लेकिन अब कोई दबाव काम आता नहीं दिख रहा है। सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के एनडीए और ओबीसी नेता दारा सिंह चौहान के भाजपा में वापसी के बाद दावा किया जा रहा था कि पार्टी बहुत मजबूत हुई है। हालांकि, घोसी विधानसभा उप चुनाव परिणाम के बाद सुभासपा की स्थिति कमजोर हुई है। घोसी से दारा सिंह चौहान हारे थे। ऐसे में उनकी बारगेनिंग कैपेसिटी कम हुई है।

यूपी की घोसी लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में सपा- बसपा गठबंधन के उम्मीदवार अतुल राय को जीत मिली थी। इसे सपा और बसपा के गढ़ के रूप में देखा जाता है। बसपा को पिछली बार जीत मिली। ऐसे में लोकसभा चुनाव 2024 में पार्टी घोसी सीट पर सहयोगी दल निषाद पार्टी को दे सकती है। निषाद पार्टी की ओर से लगातार दो सीटों की मांग की जा रही है। हालांकि, भाजपा उन्हें इस सीट के जरिए मना सकती है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को भाजपा ने सांसद बनाया हुआ है।

गाजीपुर लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में सपा- बसपा गठबंधन के उम्मीदवार और बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को उतारा गया था। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को मात दी थी। सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर इस सीट पर लगातार दावा कर रहे हैं। ऐसे एनडीए इस सीट पर सुभासपा के कैंडिडेट दे सकती है। वहीं, सुभासपा अध्यक्ष के योगी सरकार में मंत्री बनाए जाने की चर्चा तेज हो गई है। इस प्रकार पार्टी इस सीट के सहारे उन्हें साध सकती है।

अपना दल एस अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से चुनावी मैदान में उतर सकती हैं। पिछले दो लोकसभा चुनाव से वह मिर्जापुर से चुनावी मैदान में उतरती रही हैं। ऐसे में मिर्जापुर पर उनकी दावेदारी स्वाभाविक है। भाजपा भी इसमें छेड़छाड़ नहीं करना चाहेगी। अपना दल एस अध्यक्ष एक बार फिर बड़ी जीत दर्ज करती दिख सकती है।

अपना दल एस ने रॉबर्ट्सगंज लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में जीत दर्ज की थी। यहां से पकौड़ी लाल सांसद बने थे। हालांकि, पिछले दिनों उनका निधन हो गया। माना जा रहा है कि भाजपा यहां से अपना उम्मीदवार उतार सकती है। दरअसल, पिछले दिनों पार्टी के सर्वे में यहां अपना दल एस की स्थिति कमजोर आंकी गई थी। इस प्रकार की स्थिति में गठबंधन के तहत पार्टी अपना दल एस को प्रतापगढ़ सीट ऑफर कर सकती है। प्रतापगढ़ पर अभी भाजपा सांसद हैं। बागपत लोकसभा सीट को राष्ट्रीय लोक दल के गढ़ के रूप में माना जाता रहा है। हालांकि, यहां से पार्टी पिछले वर्षों में चुनाव हारती रही है। 2019 में भी रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को भाजपा के डॉ. सत्यपाल सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। माना जा रहा है कि इस बार गठबंधन के तहत यह सीट रालोद के पाले में जा सकती है। हालांकि, मथुरा और मुरादाबाद को लेकर भी इस प्रकार के दावे किए जा रहे हैं।

राजनीतिक पार्टियों का चुनाव आयोग कैसे जोड़ता है सारा व्यय?

आज हम आपको बताएंगे कि राजनीतिक पार्टियों का चुनाव आयोग सारा व्यय कैसे जोड़ता है! साल 2024 की लोकसभा चुनाव की तारीख और फेज का ऐलान हो चुका है। किसी भी चुनाव में साम-दाम-दंड-भेद के तरीके की बात की जाती है। लेकिन इनमें दाम की भूमिका सबसे प्रभावी होती है। चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग ने पारदर्शिता के कई पैमाने तय किए हैं, जिनमें खर्च पर नियंत्रण भी शामिल है। चुनाव में एक प्रत्याशी के खर्चे की लिमिट कितनी है, इसका पूरा हिसाब-किताब बना हुआ है। इसमें चाय-बिस्किट से लेकर गुब्बारे और गाड़ी तक का हर ब्योरा शामिल करना होता है। किसी चुनाव में निर्वाचन आयोग की तरफ से प्रदेश की आबादी और मतदाताओं की संख्या के हिसाब से राज्यवार चुनाव खर्च की सीमा फिक्स की जाती है। इसमें प्रत्याशी की सार्वजनिक बैठक, रैली, विज्ञापन, पोस्टर, बैनर, वाहनों सहित अन्य खर्च शामिल होता है। सभी उम्मीदवारों को रोजाना के खर्चे के लिए एक डायरी मेनटेन करनी होती है, जिसमें हर एक खर्चे का ब्यौरा होता है। इसमें चुनावी प्रचार के लिए किया गया छोटे से छोटा खर्चा भी शामिल होता है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में किराए के कार्यालयों के लिए मासिक किराया 5 हजार और 10 हजार रुपये तय किया गया है।

यहां तक कि इसमें गुब्बारों, झाड़ू, सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन कैमरों की कीमत भी तय की जाती है।प्रत्याशी चुनाव के दौरान निर्धारित सीमा से अधिक राशि खर्च नहीं कर सकते हैं। लोकसभा चुनाव में होने वाले चुनावी खर्च की लिमिट बीते दो दशक के दौरान करीब-करीब चार गुना तक बढ़ गई है। वहीं विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशी पांच से छह गुना तक खर्च कर रहे हैं। अब इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशियों को 95 लाख रुपये तक खर्च करने की छूट दी गई है। हालांकि राजनीतिक दलों को इस सीमा से छूट है।

आयोग की ओर से नियम 90 में बदलाव किया गया था, जिसके बाद विधानसभा और लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार के चुनावी खर्चे की सीमा में बढ़ोतरी की गई थी। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार उम्मीदवार को चुनावी खर्च करने के लिए एक अकाउंट खुलवाना होता है, जिसके माध्यम से ही उम्मीदवारों को खर्चा भी करना होता है। वहीं, 20 हजार से ज्यादा के खर्च का भुगतान चेक आदि के माध्यम से करना होगा। सभी उम्मीदवारों को रोजाना के खर्चे के लिए एक डायरी मेनटेन करनी होती है, जिसमें हर एक खर्चे का ब्यौरा होता है। इसमें चुनावी प्रचार के लिए किया गया छोटे से छोटा खर्चा भी शामिल होता है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में किराए के कार्यालयों के लिए मासिक किराया 5 हजार और 10 हजार रुपये तय किया गया है। यहां तक कि इसमें गुब्बारों, झाड़ू, सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन कैमरों की कीमत भी तय की जाती है।

चाय-समोसे के खर्च को भी इसमें जोड़ा जाता है। अब सोशल मीडिया पर विज्ञापनों पर खर्च को चुनावी खर्च का हिस्सा माना जाता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एक कप चाय की कीमत 8 रुपये और समोसे की कीमत 10 रुपये तक की गई है। बर्फी 200 रुपये प्रति किलो, बिस्कुट 150 रुपये प्रति किलो, एक ब्रेड पकौड़ा 10 रुपये का, एक सैंडविच 15 रुपये और जलेबी 140 रुपये प्रति किलो का रेट तय किया गया है। चुनाव में एक प्रत्याशी के खर्चे की लिमिट कितनी है, इसका पूरा हिसाब-किताब बना हुआ है। इसमें चाय-बिस्किट से लेकर गुब्बारे और गाड़ी तक का हर ब्योरा शामिल करना होता है। किसी चुनाव में निर्वाचन आयोग की तरफ से प्रदेश की आबादी और मतदाताओं की संख्या के हिसाब से राज्यवार चुनाव खर्च की सीमा फिक्स की जाती है। इसमें प्रत्याशी की सार्वजनिक बैठक, रैली, विज्ञापन, पोस्टर, बैनर, वाहनों सहित अन्य खर्च शामिल होता है। बता दें कि एक डायरी मेनटेन करनी होती है, जिसमें हर एक खर्चे का ब्यौरा होता है। इसमें चुनावी प्रचार के लिए किया गया छोटे से छोटा खर्चा भी शामिल होता है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में किराए के कार्यालयों के लिए मासिक किराया 5 हजार और 10 हजार रुपये तय किया गया है। यहां तक कि इसमें गुब्बारों, झाड़ू, सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन कैमरों की कीमत भी तय की जाती है। इसके साथ ही कार, बस और ऑटो जैसे वाहनों को किराये पर लेने का रेट प्रति दिन 750 और 3000 रुपये के बीच होनी चाहिए। मशहूर गायकों के लिए फीस 2 लाख रुपये या फिर असली बिल तय किया गया है। वहीं लोकल गायकों के लिए इसे 30 हजार या फिर असली बिल तय है।

आखिर अब क्या होगा एलविश यादव का?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब एलविश यादव का क्या होगा! रेव पार्टी और पार्टियों में सांप का जहर सप्लाई करने के मामले में एल्विश यादव बुरी तरह फंस गए हैं। नोएडा कमिश्नरेट पुलिस ने उन्‍हें अरेस्‍ट कर 14 दिनों की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। बताया जा रहा है कि 25 साल के एल्विश यादव ने पुलिस पूछताछ में उसने रेव पार्टी में सांप के जहर की सप्‍लाई की बात स्‍वीकार कर ली है। उसने माना कि वह विभिन्न रेव पार्टियों में आरोपियों से मिला था और उनके संपर्क में था। अगर उसके ऊपर आरोप साबित हो जाते हैं तो उसे 20 साल तक की जेल हो सकती है। वहीं दूसरी और एल्विश की जमानत के लिए उसके वकीलों ने तैयारी शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि आज यानी सोमवार या मंगलवार को उसकी जमानत का आवेदन कोर्ट में भेजा जाएगा। उधर, यूट्यूबर और बिग बॉस ओटीटी-2 विनर एल्विश यादव के खिलाफ नोएडा कमिश्नरेट पुलिस पहले ही गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर चुकी है। लेकिन पेच यह है कि गौतमबुद्ध नगर जिला न्यायालय के वकील आज यानी सोमवार को हड़ताल पर है। इसलिए आज एल्विश यादव की जमानत अर्जी पर सुनवाई होने भी मुश्किल है। नोएडा कमिश्नरेट पुलिस ने एल्विश के ऊपर जांच के दौरान एनडीपीएस एक्ट की धाराओं में बढ़ोतरी की गई है। थाना सेक्टर-20 पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट के तहत धारा-8/20/27/27ए/29/30/32 शामिल किया है। अगर उसके ऊपर इन धाराओं के तहत आरोप साबित हो जाते हैं तो उसे कितने साल की सजा हो सकती है? आरोप सिद्ध होने के बाद उसे कितनों दिनों तक जेल काटनी पड़ी सकती है?

आरोप साबित होने के बाद 20 साल तक की जेल हो सकती है। साथ ही इस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा-27ए में 10 से 20 साल, धारा-20 में 10 से 20 साल तक की सजा का प्रावधान है। चूंकि एनडीपीएस की वो धाराएं भी लगी हैं जिसमें 20 साल तक की सजा है।एनडीपीएस की धारा-27ए एल्विश यादव को सबसे अधिक मुसीबत में डाल सकती है। एनडीपीएस एक्ट लगने के बाद उसे जेल भेजना पुलिस के लिए आसान हो गया। एनडीपीएस एक्ट का मतलब होता है नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट अधिनियम 1985, जिसे आम तौर पर एनडीपीएस एक्ट के रुप में जाना जाता है। भारतीय संसद का एक अधिनियम है जो किसी भी व्यक्ति को उत्पादन, विनिर्माण, खेती, कब्जा, ब्रिकी, खरीद या किसी भी नशीली दवाई का सेवन करता है। उस पर ये एक्ट लगाया जाता है।इसलिए अभी कुछ महीनों तक जमानत मिलना मुश्किल है। कम से कम तब तक, जब तक पुलिस चार्जशीट फाइल नहीं कर लेती है। प्राथमिक तौर पर वह डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ही बेल लगायेंगे, उसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाएंगे पर यह तय है कि अगले कुछ महीनों तक जेल में रहेंगे।

वाइल्ड लाइफ की जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज था उसमें अधिकतम सजा तीन वर्ष की थी। इसी वजह से पुलिस एल्विश को गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार स्टेट ऑफ बिहार में यह कहा है कि सात साल से कम की सजा वाले अभियुक्त की सीधे तौर पर गिरफ्तारी नहीं हो सकती। अब चूंकि जिन मामलों में वह अभियुक्त है उसमें 20 वर्ष तक की सजा है। इसलिए पुलिस के पास उसे गिरफ्तार करने का भी अधिकार था और अब कम से कम जब तक चार्जशीट फाइल नहीं हो जाती, उसे जमानत मिलना भी मुश्किल है। अमूमन जिला अदालतें ऐसे मामलों में चार्जशीट फाइल होने के बावजूद भी जमानत देने से बचती हैं। जिला अदालत से खारिज होने के अगले दिन भी हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं, कोई टाइम लिमिट नहीं है।

एनडीपीएस की धारा-27ए एल्विश यादव को सबसे अधिक मुसीबत में डाल सकती है। एनडीपीएस एक्ट लगने के बाद उसे जेल भेजना पुलिस के लिए आसान हो गया। एनडीपीएस एक्ट का मतलब होता है नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट अधिनियम 1985, जिसे आम तौर पर एनडीपीएस एक्ट के रुप में जाना जाता है। बता दें कि नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट अधिनियम 1985, जिसे आम तौर पर एनडीपीएस एक्ट के रुप में जाना जाता है। भारतीय संसद का एक अधिनियम है जो किसी भी व्यक्ति को उत्पादन, विनिर्माण, खेती, कब्जा, ब्रिकी, खरीद या किसी भी नशीली दवाई का सेवन करता है। उस पर ये एक्ट लगाया जाता है।इसलिए अभी कुछ महीनों तक जमानत मिलना मुश्किल है। भारतीय संसद का एक अधिनियम है जो किसी भी व्यक्ति को उत्पादन, विनिर्माण, खेती, कब्जा, ब्रिकी, खरीद या किसी भी नशीली दवाई का सेवन करता है। उस पर ये एक्ट लगाया जाता है।

आखिर क्या है गैस लाइटिंग?

आज हम आपको गैस लाइटिंग के संदर्भ में जानकारी देने वाले हैं! 1944 में एक साइकॉलजिकल थ्रिलर आई थी ‘Gaslight’। फिल्म की कहानी कुछ यूं है। Gregory और Paula शादीशुदा हैं। Gregory को कोशिश Paula को मेंटल हॉस्पिटल भेजने की है ताकि वह पत्नी के जेवरात पर कब्जा कर सके। वह इसके लिए कई हथकंडे आजमाता है। एक बार वह Paula के पर्स से एक जेवर चुरा लेता है और उसके मन में संदेह बिठाने की कोशिश करता है कि उसने जेवर पर्स में रखा ही नहीं था। एक दफा वह घड़ी छुपा देता है और Paula पर उसे चुराने का इल्जाम लगाता है। फिर उसे ढूंढ निकालने का दिखावा करता है। इन घटनाओं में वह खुद को सही और Paula को झूठा साबित करने की कोशिश करता है। इसलिए ताकि वह Paula को यकीन दिला सके कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। फिल्म में Paula की भूमिका Ingrid Bergman और Gregory का रोल Charles Boyer ने निभाया था। Gregory फिल्म में Paula को उसकी खराब मानसिक स्थिति का यकीन दिलाने के लिए जो करतूतें करता है, उसे ‘Gaslighting’ कहते हैं। डिक्शनरी में यह शब्द इस फिल्म से ही आया। इसी विषय पर Kate Abramson की किताब आई है, जिसका नाम है ‘On Gaslighting’। वह लिखती हैं कि 1980 के दशक में इस शब्द ने मेडिकल की दुनिया में जगह बनाई और उसके बाद से इसका इस्तेमाल बढ़ता ही गया है।

gaslighters का व्यवहार कैसा होता है। वे अक्सर अपने टारगेट से कहते हैं कि इतनी भावुकता की जरूरत नहीं है या तुम ओवररिएक्ट कर रहे हो या तुम्हें तो दिन में भी सपने आ रहे हैं। Kate इस चलन से सावधान करते हुए कहती हैं कि लोगों को थेरेपी की शब्दावली का इस्तेमाल यूं ही नहीं करना चाहिए। वह बताती हैं कि अक्सर झूठ बोलने, बरगलाने की कोशिश करने और अपराधबोध को मिलाया जा रहा है। Kate लिखती हैं कि बेशक ये सारी बातें बुरी हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि जो ऐसा कर रहा है, वह आपको ‘Gaslight’ कर रहा हो। वह सलाह देती हैं कि इस शब्द का प्रयोग बिल्कुल खास मामलों में होना चाहिए. जहां साजिशन ऐसा हो रहा हो।

Kate लिखती हैं कि Gaslighting के कई आयाम होते हैं। कई पहलू और बारीकियां होती हैं। इसलिए किसी भी घटना को Gaslighting कहना मुनासिब नहीं होगा। वह इसे और स्पष्ट करते हुए लिखती हैं कि gaslighter वह शख्स है, जो इसलिए झूठ बोलता है ताकि वह अपने टारगेट को अहसास दिला सके कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। साथ ही, वह उसे पागल बनाने की कोशिश भी कर रहा होता है। इस किताब में फ्रांस की मशहूर लेखिका सिमोन द बोउवा और उनके प्रेमी ज्यां पॉल सार्त्र का भी जिक्र आता है। सिमोन की सार्त्र के साथ बातचीत का जिक्र इस किताब में हुआ है। सिमोन उस बारे में बताती हैं कि वह उनके नजरिये को न सिर्फ खारिज करते थे, बल्कि उसे तार-तार कर देते थे। इससे सिमोन को लगने लगा कि उनकी सोच सही नहीं है। एक दौर आया जब सिमोन को लगने लगा, ‘मुझे नहीं पता मैं क्या सोचती हूं या मेरे अंदर सोचने की क्षमता रह भी गई है?’

Kate लिखती हैं कि यह बात सही है कि gaslighters किसी के प्रेम और भरोसे को हथियार बनाकर उसे मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन gaslighters को अक्सर पता नहीं होता कि वे ऐसा कर रहे हैं। वह यह भी लिखती हैं कि यह घटना लंबी अवधि में घटती है। लेखिका ने यह भी बताया है कि आमतौर पर ऐसा कपल्स के बीच होता है, लेकिन माता-पिता भी यह गलती कर सकते हैं। ऑफिस के अंदर भी ऐसा हो सकता है। यहां इसका शिकार ऐसे व्यक्ति को बनाया जाता है, जो पहले से हाशिये पर है और छोटे ग्रुप का हिस्सा है। अगर किसी कर्मचारी के साथ ऑफिस में बहुत बुरा बर्ताव होता है और बॉस उसे छोटी घटना के तौर पर दिखाने की कोशिश करता है तो वह Gaslighting है। वह आपको ‘Gaslight’ कर रहा हो। वह सलाह देती हैं कि इस शब्द का प्रयोग बिल्कुल खास मामलों में होना चाहिए. जहां साजिशन ऐसा हो रहा हो।यह किताब बताती है कि कई बार नस्लवाद और मर्दवादी सोच को सही ठहराने के लिए भी इसका एक औजार के तौर पर प्रयोग होता है। इसलिए वह गुजारिश करती हैं कि अगर ऑफिस जैसे संस्थानों में ऐसा हो रहा हो तो उसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है।

आखिर कौन है आरएसएस के दत्तात्रेय होसबाले?

आज हम आपको आरएसएस के दत्तात्रेय होसबाले के बारे में बताने जा रहे हैं!  दत्तात्रेय होसबाले को फिर संघ का सरकार्यवाह चुना गया है। होसबाले को 2021 में चार बार से संघ के नंबर दो का पद संभाल रहे भैय्या जी जोशी की जगह पर नया सरकार्यवाह बनाया गया था। सरकार्यवाह संघ में नंबर दो पोजिशन है लेकिन यह पद सबसे अहम माना जाता है क्योंकि यह नीतियों को जमीन पर उतारने के लिहाज से सबसे बड़ा है। यानी कहें तो व्यवहारिक स्तर पर सरकार्यवाह आरएसएस का सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होता है। सरसंघचालक यानी संघ प्रमुख मूलतः राजनीतिक और वैचारिक दिशा-निर्देश देने तक सीमित रहते हैं जबकि रोजमर्रा के काम की निगरानी सरकार्यवाह ही करते हैं। सरकार्यवाह की एक बड़ी भूमिका उसकी राजनीतिक संस्था भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी के साथ तालमेल बिठाने की भी होती है। ऐसे में दत्तात्रेय होसबाले को फिर से तीन साल के लिए सरकार्यवाह का दायित्व देना अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। दोनों के बीच अच्छा तालमेल है। होसबाले संघ में ‘शाखा तंत्र’ से बाहर के पहले सरकार्यवाह हैं। दत्तात्रेय होसबाले शुरू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी में रहे हैं। आरएसएस की विचारधारा को बीजेपी में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को आरएसएस के मूल्यों और सिद्धांतों से अवगत कराते हैं। सरकार्यवाह आरएसएस और बीजेपी के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे दोनों संगठनों के बीच विचारों और नीतियों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।वो कर्नाटक के रहने वाले हैं। आरएसएस और बीजेपी के बीच तालमेल बिठाने में सरकार्यवाह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे दोनों संगठनों के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करते हैं, विचारों और नीतियों का आदान-प्रदान करते हैं और समन्वय स्थापित करते हैं।

सरकार्यवाह RSS के विचारों और नीतियों को बीजेपी तक पहुंचाते हैं। वे बीजेपी के नेताओं को आरएसएस के दृष्टिकोण से अवगत कराते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। सरकार्यवाह चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बीजेपी के नेतृत्व के साथ मिलकर काम करते हैं और चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए योजनाएं बनाते हैं। सरकार्यवाह आरएसएस और बीजेपी के बीच संगठनात्मक तालमेल को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे दोनों संगठनों के बीच बैठकों और कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, और सदस्यों के बीच समन्वय को बढ़ावा देते हैं।

सरकार्यवाह आरएसएस की विचारधारा को बीजेपी में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को आरएसएस के मूल्यों और सिद्धांतों से अवगत कराते हैं। सरकार्यवाह आरएसएस और बीजेपी के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे दोनों संगठनों के बीच विचारों और नीतियों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे संगठनात्मक तालमेल को बनाए रखने और विचारधारा को प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए अगला साल बेहद अहम होने वाला है। 2025 में संगठन के 100 साल पूरा होने वाले हैं। संघ इस मौके पर पूरे साल की स्तर पर जनसंवाद और जनसंपर्क अभियान चलाने वाली है। संघ में मौजूदा बदलाव को उस प्रिज्म से देखा जा रहा है। पिछले कुछ सालों से संघ ने अपनी शाखाओं में काफी वृद्धि की है। शताब्दी वर्ष में आएरएसएस गांव-गांव में अपनी शाखाओं का विस्तार करने के मिशन पर है।फिर से तीन साल के लिए सरकार्यवाह का दायित्व देना अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। दोनों के बीच अच्छा तालमेल है। होसबाले संघ में ‘शाखा तंत्र’ से बाहर के पहले सरकार्यवाह हैं। दत्तात्रेय होसबाले शुरू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी में रहे हैं। वो कर्नाटक के रहने वाले हैं। आरएसएस और बीजेपी के बीच तालमेल बिठाने में सरकार्यवाह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे संगठनात्मक तालमेल को बनाए रखने और विचारधारा को प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी उद्देश्य से बदली जरूरत को देखते हुए संघ भी अपनी टीम में बदलाव और विस्तार करने की कोशिश में है और अगले कुछ दिनों में कई और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

आखिर क्या है राहुल गांधी का शक्ति वाला बयान?

आज हम आपको राहुल गांधी का शक्ति वाला बयान बताने जा रहे हैं! कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी के एक और बयान पर बीजेपी ने घोर आपत्ति जताते हुए हमलावर हो गई है। राहुल गांधी ने हिंदू धर्म के ‘शक्ति’ शब्द का जिक्र करते हुए कहा कि वो शक्ति से लड़ रहे हैं तो बीजेपी ने इसे सनातन धर्म का एक और अपमान बता दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राहुल गांधी के इस बयान पर तमतमाए चेहरे से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, मैं इस चुनौती को स्वीकार करता हूं और मैं इन शक्ति स्वरूपा माताओं-बहनों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दूंगा। बता दें कि राहुल गांधी ने शक्ति के खिलाफ लड़ने का बयान दिया। राहुल के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने निंदा करनी शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सनातन धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का स्वभाव बन गया है। इंडी गठबंधन ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी लड़ाई शक्ति के खिलाफ है। मेरे लिए हर मां शक्ति का रूप है, हर बेटी शक्ति का रूप है। मांताओं-बहनों, आपको मैं शक्ति के रूप में पूजा करता हूं।उन्होंने कहा, ‘हिंदू धर्म में शक्ति शब्द होता है। हम शक्ति से लड़ रहे हैं, एक शक्ति से लड़ रहे हैं।’ राहुल बोले, ‘अब सवाल उठता है, वो शक्ति क्या है? जैसे किसी ने यहां कहा- राजा की आत्मा ईवीएम में है। सही है, सही है। राजा की आत्मा ईवीएम में है। हिंदुस्तान की हर संस्था में है। ईडी में है, सीबीआई में है, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में है।’ प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी के बयान का जवाब तेलंगाना के जगतियाल स्थित एक सभा को संबोधित करते हुए दिया। सभा में भारी संख्या में मौजूद महिलाओं को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, ‘इंडी गठबंधन ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी लड़ाई शक्ति के खिलाफ है। मेरे लिए हर मां शक्ति का रूप है, हर बेटी शक्ति का रूप है। मांताओं-बहनों, आपको मैं शक्ति के रूप में पूजा करता हूं। मैं भारत मां का पुजारी हूं।

मैं आप शक्ति स्वरूपा माता, बहन, बेटियों का भी पुजारी हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘इंडी अलायंस ने कल शिवाजी पार्क से जारी अपने घोषणा पत्र में शक्ति को खत्म करने का ऐलान किया है। मैं इस चुनौती को स्वीकार करता हूं और मैं इन शक्ति स्वरूपा माताओं-बहनों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दूंगा। जीवन खपा दूंगा।’राहुल के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने निंदा करनी शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सनातन धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का स्वभाव बन गया है। पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि राहुल गांधी ने डीएमके नेता उदयनिधि स्टालीन की तरह ही सनातन के खिलाफ बोल रहे हैं।

एक ओर शक्ति के विनाश की बात करने वाले लोग हैं, दूसरी ओर शक्ति की पूजा करने वाले लोग हैं। मुकाबला 4 जून को हो जाएगा कि कौन शक्ति का विनाश कर सकता है और कौन शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। दरअसल, विपक्षी गठबंधन ने मुंबई के शिवाजी पार्क से रविवार को अपना घोषणा पत्र जारी किया। उसी मौके पर राहुल गांधी ने शक्ति के खिलाफ लड़ने का बयान दिया। उन्होंने कहा, ‘हिंदू धर्म में शक्ति शब्द होता है। हम शक्ति से लड़ रहे हैं, एक शक्ति से लड़ रहे हैं।’ राहुल बोले, ‘अब सवाल उठता है, वो शक्ति क्या है? जैसे किसी ने यहां कहा- राजा की आत्मा ईवीएम में है। सही है, सही है। राजा की आत्मा ईवीएम में है। हिंदुस्तान की हर संस्था में है। ईडी में है, सीबीआई में है, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में है।’

राहुल के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने निंदा करनी शुरू कर दी। बीजेपी नेताओं ने कहा कि सनातन धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का स्वभाव बन गया है। इंडी गठबंधन ने अपना घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी लड़ाई शक्ति के खिलाफ है। मेरे लिए हर मां शक्ति का रूप है, हर बेटी शक्ति का रूप है। मांताओं-बहनों, आपको मैं शक्ति के रूप में पूजा करता हूं। मैं भारत मां का पुजारी हूं। मैं आप शक्ति स्वरूपा माता, बहन, बेटियों का भी पुजारी हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘इंडी अलायंस ने कल शिवाजी पार्क से जारी अपने घोषणा पत्र में शक्ति को खत्म करने का ऐलान किया है।पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि राहुल गांधी ने डीएमके नेता उदयनिधि स्टालीन की तरह ही सनातन के खिलाफ बोल रहे हैं।

वर्तमान में लोग लड़का या लड़की में किसको ले रहे हैं सबसे ज्यादा गोद?

आज हम आपको बताएंगे कि वर्तमान में लोग लड़का या लड़की में से किसे सबसे ज्यादा गोद ले रहे हैं! मरने के बाद हमारा का अंतिम संस्कार कौन करेगा? हिंदू समाज में नि:संतान बुजुर्ग आदमी या औरत बेटे के हाथों अंतिम संस्कार से स्वर्ग पाने की लालसा मन में पाले रहते हैं। हिंदू धर्म में बेटे के हाथों अंतिम संस्कार के महत्व वर्णन भी पढ़ने-सुनने को मिलता है। अंतिम संस्कार के अलावा और कई कारणों से नि:संतान दंपती बड़े चाव से बच्चे को गोद लेते हैं। हालांकि, पिछले कुछ समय से लड़कों को गोद लेने की पारंपरिक लालसा में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पिछले दो साल में हिंदू अडॉप्शन और मेंटिनेंस एक्ट के तहत बच्चा गोद लेने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही देश में लड़कियों को गोद लेने की प्राथमिकता में उल्लेखनीय झुकाव देखा गया है। इसमें सबसे हैरानी की बात यह है कि पंजाब इस ट्रेंड लड़कियों को गोद में सबसे आगे दिख रहा है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से केंद्र सरकार की तरफ से पेश आंकड़े इस ट्रेंड को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं जो वैदिक युग जितनी पुरानी है। जबकि 10 राज्यों ने पिछले साल 20 नवंबर को हाई कोर्ट की तरफ निर्देशित एचएएमए के तहत गोद लेने से संबंधित डेटा प्रस्तुत नहीं किया था। एएसजी ने 11 राज्यों द्वारा रिकॉर्ड पर रखा गया डेटा प्रस्तुत किया। इसमें 2021-2023 की अवधि में कुल 15,486 गोद लेने की बात दर्ज की गई थी। एचएएमए के तहत दर्ज किए गए कुल गोद लेने में से, गोद लेने वाले माता-पिता ने 6,012 लड़कों मुकाबले 9,474 लड़कियों को घर ले जाना पसंद किया।

हालांकि, गोद लिए गए बच्चों की पसंदीदा उम्र छह साल से कम रही, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो। सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी टेबल से पता चलता है कि 69.4% रजिस्टर्ड भावी दत्तक माता-पिता 0 से 2 वर्ष की आयु के बच्चों को चुनते हैं। 2 से 4 वर्ष के आयु वर्ग में 10.3% और 4 से 6 वर्ष के आयु वर्ग में 14.8% भावी माता-पिता ने रुचि दिखाई। पंजाब और चंडीगढ़ भारत में लैंगिक समानता की दिशा में आगे बढ़ने में अग्रणी बनकर उभरे हैं। आंकड़ों से ऐसा लगता होता है कि गोद लेने में इन दोनों पर जोर दिया जा रहा है। राज्य में एचएएमए के तहत पंजीकृत कुल 7,496 गोद लेने वालों में से 4,966 लड़कियां और 2,530 लड़के थे। केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में गोद लिए गए कुल 167 बच्चों में से 114 लड़कियां थीं।

हिमाचल प्रदेश के दंपतियों ने 2,107 बच्चों 1,278 लड़कियों को गोद लिया। तमिलनाडु 1,671, 985 लड़कियां; दिल्ली में 1,056, 558 लड़कियां; उत्तराखंड में 685 472 लड़कियां; आंध्र प्रदेश में 1,415, 835 लड़कियां बच्चों को गोद लिया गया। इसके अलावा ओडिशा में 291 165 लड़कियां बच्चों को गोद लिया गया। वहीं, तेलंगाना के हिंदू जोड़ों ने लड़कों को गोद लेना अधिक पसंद किया। यहां कुल 242 बच्चों को गोद लिया गया जिनमें से महज 48 लड़कियां थीं। पश्चिम बंगाल में कपल ने कुल 228 बच्चों को गोद लिया, जिनमें से 112 लड़कियां थीं। उत्तर प्रदेश के नोएडा में सेक्टर-39 थाना एरिया से संदिग्ध परिस्थितियों में पिछले 19 दिन से लापता कारोबारी का बेटा मिल गया है। यह बच्चा सीडब्ल्यूसी के ऑफिस में मिला। वहां पर एक दंपती इसे आधिकारिक रूप से गोद लेने के लिए पहुंचे हुए थे। एक मंदिर के पास भटकते मिले बच्चे ने इस दंपती को बताया था कि उसका कोई नहीं है और वह अनाथ है। इसलिए पति-पत्नी गोद लेने ने की प्रक्रिया के लिए उसे लेकर गए थे। इतने में भटकते हुए कारोबारी का परिवार भी वहां पहुंच गया।

फिर पुलिस पहुंची और इस हाईप्रोफाइल गुमशुदगी का खुलासा हो गया। थाना प्रभारी सेक्टर-39 ने बताया कि बच्चे को सेक्टर 12 स्थित सांईं कृपा संस्थान में रखा गया है। आगे सीडब्ल्यूसी में पेश किया जाएगा। बाल कल्याण समिति का जब आदेश होगा, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। जांच के दौरान पुलिस को पता चला है कि बच्चा घर से नाराज होकर चला गया था। 20 नवंबर को हाई कोर्ट की तरफ निर्देशित एचएएमए के तहत गोद लेने से संबंधित डेटा प्रस्तुत नहीं किया था। एएसजी ने 11 राज्यों द्वारा रिकॉर्ड पर रखा गया डेटा प्रस्तुत किया। इसमें 2021-2023 की अवधि में कुल 15,486 गोद लेने की बात दर्ज की गई थी। एचएएमए के तहत दर्ज किए गए कुल गोद लेने में से, गोद लेने वाले माता-पिता ने 6,012 लड़कों मुकाबले 9,474 लड़कियों को घर ले जाना पसंद किया।मालूम हो कि बच्चे की यह गुमशुदगी पूरे कमिश्नरेट पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी। व्यापारी कई पुलिस अधिकारियों से मिले थे। पुलिस की सेक्टर-39 थाना समेत अन्य टीमें भी लगी हुई थीं। परिवारीजन के मन में कई तरह की आशंकाएं आ रहीं थीं। अपहरण की आशंका भी जताई जा रही थी।

ऑस्ट्रेलियाई स्पिनर एडम ज़म्पा की जगह घरेलू खिलाड़ी तनुश कोटियन को दी गई है.

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आईपीएल ने दिया रणजी जीतने का इनाम, प्रतियोगिता के पहले दिन करोड़पति लीग बनने का मौका! मुंबई के लिए रणजी विजेता युवा स्पिनर ने टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई. तनुष को राजस्थान रॉयल्स ने चुना। तनुष ऑस्ट्रेलिया के एडम जंपर की जगह टीम में आए थे. तनुष कोटियन कुछ दिन पहले रणजी ट्रॉफी खेल रहे थे. उन्होंने मुंबई के लिए रणजी जीता। टीम की जीत में इस युवा स्पिनर ने अहम भूमिका निभाई. तनुष को राजस्थान रॉयल्स ने चुना। तनुष ऑस्ट्रेलिया के एडम जंपर की जगह टीम में आए थे.

भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने बार-बार घरेलू क्रिकेट खेलने के लिए कहा है। कई क्रिकेटरों ने इसे स्वीकार नहीं किया. लेकिन राजस्थान रॉयल्स ने अपने विदेशी स्पिनर की जगह घरेलू क्रिकेटर को टीम में शामिल कर लिया और साफ कर दिया कि आईपीएल में मौका पाने के लिए रणजी जरूरी है. तनुष ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 26 मैचों में 75 विकेट लिए हैं। उन्होंने 23 टी20I में 24 विकेट लिए हैं. तनुष बल्ले से भी पारंगत हैं। इसीलिए राजस्थान ने युवा स्पिनर को टीम में लिया है.

जाम्पा ने गुरुवार को ऐलान किया कि वह आईपीएल में नहीं खेल पाएंगे. वह निजी कारणों से आईपीएल नहीं खेलेंगे. उस स्थान पर तनुष को राजस्थान ने चुना। जंपा ने वनडे वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया के लिए बड़ी भूमिका निभाई थी. उनकी जगह टीम में शामिल किए गए तनुष को राजस्थान ने 20 लाख रुपए में अपनी टीम में शामिल किया। राजस्थान के रॉबिन मेंज भी नहीं खेल पाएंगे. वह एक कार दुर्घटना में घायल हो गये थे. उनकी जगह बीआर शरथ को टीम में लिया गया है. कर्नाटक के इस क्रिकेटर ने इस बार रणजी नहीं खेला. लेकिन इस विकेटकीपर-बल्लेबाज ने 28 टी20I में 328 रन बनाए. स्ट्राइक रेट 118.84.

कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के पास एक से बढ़कर एक ओपनर हैं। हालाँकि, पिछली बार एक समस्या थी। इंग्लैंड के फिल साल्ट इस बार रहमानुल्लाह गुरबाज, बेंकटेश एयर्स के साथ जुड़ गए हैं। जिन्होंने वॉर्मअप मैच में धमाकेदार पारी खेलकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. नमक पहले ग्यारह में होगा? वह अभी भी नहीं जानता.

सनराइजर्स हैदराबाद और कोलकाता नाइट राइडर्स के बीच शनिवार को कोलकाता में मुकाबला होगा। आईपीएल शुरू होने से पहले एक और इंग्लिश क्रिकेटर जेसन रॉय ने कहा था कि वह नहीं खेलेंगे. उसके स्थान पर नमक ले लिया गया। एक मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ”केकेआर से जुड़कर बहुत अच्छा लग रहा है. बहुत अच्छी टीम. मेंटर गौतम गंभीर और कोच चंद्रकांत पंडित ने हमें अच्छे से समझाया कि कैसे खेलना है। एक मेंटर के तौर पर गंभीर सभी को अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से समझाते हैं. वह बहुत जिम्मेदार है. काम के साथ रहना पसंद है. साथ ही टीम में सभी के साथ खूब मस्ती भी की।”

हालांकि धोनी ने भूमिका के बारे में तो साफ किया, लेकिन उन्होंने ये साफ नहीं किया कि साल्ट को टीम की पहली एकादश में मौका मिलेगा या नहीं. साल्ट ने कहा, “मुझे अभी भी नहीं पता कि मुझे शनिवार को खेलने का मौका मिलेगा या नहीं।” साल्ट की अभी तक केकेआर के मालिकों में से एक शाहरुख खान से मुलाकात नहीं हुई है. लेकिन इंग्लिश ओपनर ने उनकी कई फिल्में देखी हैं। सॉल्ट ने कहा, ”मैंने शाहरुख के बारे में पहले ही सुन रखा है. वह एक बड़े स्टार हैं. मैंने शाहरुख की कई फिल्में भी देखी हैं।” सॉल्ट को फिल्में देखने के अलावा गोल्फ खेलना पसंद है। जब उन्हें क्रिकेट से फुर्सत मिली तो वह गोल्फ खेलने चले गए।

आईपीएल के बाद इस बार टी20 वर्ल्ड कप. साल्ट का मानना ​​है कि इससे क्रिकेटरों को अतिरिक्त फायदा मिलेगा. उन्होंने कहा, ”आईपीएल दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टी20 लीगों में से एक है। टी20 वर्ल्ड कप से पहले इस लीग में खेलने से क्रिकेटरों को तैयारी में मदद जरूर मिलेगी. हमारे पास पाकिस्तान के खिलाफ भी कुछ मैच हैं।’ वहां भी तैयारी की जा सकती है।” उन्होंने दिवाली की रात अहमदाबाद की सड़कों पर सो रहे लोगों की आर्थिक मदद की. वह वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया था. वह स्वयं एक गरीब परिवार से थे। प्रैक्टिस पर जाने के लिए मेरी जेब में 10 रुपये भी नहीं थे. शायद वह इतने बड़े दिल वाले इंसान हैं क्योंकि वह विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकले हैं. वह रहमानुल्लाह गुरबाज हैं।

अफगानिस्तान के विकेटकीपर-बल्लेबाज ने पिछली बार कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए 11 मैचों में 227 रन बनाए थे। दो अर्द्धशतक लगे. औसत 20.63. लेकिन इस बार फिल साल्ट उन्हें परखने के लिए टीम में आए हैं. जिनकी आईसीसी रैंकिंग टी20 में दो है. वह इंग्लैंड के मौजूदा ओपनर हैं. व्यवहार में नमक का महत्व कुछ अधिक है। दोनों अभ्यास मैचों में पचास रन बनाये। वह भी रखता है. ऐसे में गुरबाज़ की संभावना सवालों के घेरे में है।

हालाँकि, अफगान स्टार साल्ट को प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं देखता है। आनंदबाजार को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में गुरबाज ने कहा, ‘नमक मेरा प्रतिद्वंद्वी नहीं है। पहली एकादश के बारे में सोचना मेरा काम नहीं है। किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहें. ताकि मैं मौके का फायदा उठा सकूं.” इस बार भी अगर शुरू से मौका मिला तो मैं खुद को बर्बाद कर लूंगा.

गुरबाज का मानना ​​है कि केकेआर के मेंटर के रूप में गौतम गंभीर के जुड़ने से उनकी बल्लेबाजी में सुधार होगा। वह कह रहे थे, ”सर गंभीर बहुत मददगार हैं. कोई भी सवाल हो तो वह बड़ी आसानी से समझा देते हैं। उनकी ट्रेनिंग में बल्लेबाजी में सुधार होना तय है।