Sunday, February 8, 2026
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आखिर कैसे होती है दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम की ताजपोशी?

आज हम आपको बताएंगे कि दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम की ताजपोसी कैसे की जाती है! दिल्ली की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद एक बार फिर बड़े बदलाव की गवाह बनने जा रही है। 25 फरवरी को जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी यहां के नायब इमाम और अपने बेटे सैयद उसामा शाबान बुखारी के नाम का ऐलान अपने जानशीन (उत्तराधिकारी) के रूप में घोषित करने वाले हैं। जामा मस्जिद के शाही इमाम ने इस बारे में ऐलान करते हुए बताया कि यह परंपरा रही है कि शाही इमाम अपने जीवनकाल में ही अपने उत्तराधिकारी का ऐलान करते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 25 फरवरी को नायब शाही इमाम शाबान बुखारी का नाम शाही इमाम के तौर पर घोषित करेंगे और इस मौके पर उनकी शाही इमाम के रूप में दस्तारबंदी की जाएगी। दस्तारबंदी की इस रस्म के बाद शाबान बुखारी शाही इमाम के पद को संभालने के लिए तैयार हो जाएंगे। हालांकि इस रस्म के बाद भी सैयद अहमद बुखारी ही शाही इमाम के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे लेकिन अगर आने वाले समय में उनको अपनी सेहत के चलते या किसी और वजह से इस जिम्मेदारी को निभाने में मुश्किलात आती हैं तो शाबान बुखारी सीधे तौर पर शाही इमाम की जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे आएंगे। दस्तारबंदी की इस रस्म में शाही इमाम खुद अपने हाथों से नायब इमाम को शाही इमाम की पगड़ी बांधते हैं। इस तरह से आगे आने वाली वक्त में शाबान बुखारी के लिए जामा मस्जिद के चौदहवें शाही इमाम बनने का रास्ता बना दिया गया है। जामा मस्जिद के जुड़े सूत्रों ने बताया कि इससे पहले शाबान बुखारी को साल 2014 में नायब इमाम बनाया गया था। नायब इमाम के तौर पर उनकी दस्तारबंदी के बाद से ही उनकी धर्म से जुड़े तमाम मामलों में देश और विदेश में ट्रेनिंग चल रही है। शाही इमाम बनने के सफर में जो नॉलेज जुटाने की जरूरत होती है उसको वो पूरी शिद्दत के साथ निभा रहे हैं।

भारत में शाही इमाम जैसा कोई पद नहीं है। यह ऐसा उपाधि है जिसपर बुखारी परिवार अपना हक जताता आया है। तबसे यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आ रही है। 1650 के दशक में, जब मुगल बादशाह शाहजहां ने दिल्ली में जामा मस्जिद बनवाई थी, तब उन्होंने बुखारा उज़्बेकिस्तान के शासकों को एक इमाम की जरूरत बताई। इस तरह मौलाना अब्दुल गफूर शाह बुखारी को भेजा गया। शाहजहां ने उन्हें शाही इमाम का खिताब दिया। आसान भाषा में शाही इमाम शब्द का मतलब भी समझ लीजिए। शाही का मतलब होता है राजा और इमाम वो होते हैं जो मस्जिद में नमाज पढ़ाते हैं। इसलिए शाही इमाम का मतलब है राजा की ओर से नियुक्त किया गया इमाम। उस समय से, मौलाना अब्दुल गफूर शाह बुखारी की संतान जामा मस्जिद के शाही इमाम के रूप में वंशानुगत तरीके से चलते आए हैं। मुगल शासन के खत्म होने के बाद, उन्होंने अपने आप को ही यह उपाधि दे दी है। भारत सरकार ने कभी भी इस पद को न तो बनाया है और न ही इसे स्वीकृति दी है। वर्तमान इमाम बुखारी खुद को शाही इमाम कहते हैं क्योंकि वो खुद को उसी रूप में देखते हैं, किसी कानूनी मान्यता के आधार पर नहीं। अब यह पद सैयद अहमद बुखारी अपने बेटे को 25 फरवरी को सौंप देंगे।

शाही इमाम को मुस्लिम समुदाय में बहुत सम्मान दिया जाता है। जैसा कि पहले बताया कि शाही इमाम का पद वंशानुगत होता है, यानी पिता के बाद पुत्र यह पद संभालता है। इसलिए सैयद अहमद बुखारी अपने जीते जी इस पद को अपने बेटे सैयद उसामा शाबान बुखारी को सौंपेंगे। शाही इमाम का पद सौंपते वक्त नियम है कि पिता जिंदा रहते ही अपने बेटे को यह पद का उत्तराधिकारी बना सकता है। शाही इमाम ने राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी आवाज उठाई है। यह पद भारतीय मुस्लिम समुदाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जामा मस्जिद के शाही इमाम बनते ही पिछले 400 सालों से अबतक इस पद पर सिर्फ और सिर्फ बुखारी परिवार की ही हुकुमूत चली है। इस इमामत को किसी ने चुनौती नहीं दी। यही वजह रही कि इस पद का कोई आधिकारिक आधार न हो लेकिन देश की राजनीति में बुखारी परिवार भी हिस्सा लेता है। सैयद अहमद बुखारी के पिता अब्दुल्ला बुखारी अलग-अलग मुस्लिम दलों को अपना समर्थन दे चुके हैं। सैयग अहमद बुखारी के पिता ने 1977 में जनता पार्टी और 1980 में कांग्रेस को भी समर्थन दिया था। दिखाया था कि सियासत में हम भी पैठ बना सकते हैं। उसके बाद से देश की अलग-अलग पार्टियां शाही इमाम का समर्थन लेने जामा मास्जिद के दर पर आने लगीं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ ही सोनिया गांधी का भी नाम शामिल है। 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को भी शाही इमाम के समर्थन की जरूरत पड़ी थी। तब बुखारी ने मुसलमानों से भाजपा को समर्थन देने की अपील की थी।

दस्तारबंदी कुछ मुस्लिम समुदायों, खासकर दक्षिण एशिया के मुसलमानों जैसे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक समारोह है। शब्द “दस्तारबंदी” फारसी भाषा से आया है, जहां दस्तार का अर्थ पगड़ी और बंदी का अर्थ बांधना होता है। इसलिए, दस्तारबंदी का सीधा अर्थ पगड़ी बांधने का कार्य होता है। यह समारोह आमतौर पर एक युवा लड़के के वयस्क होने में प्रवेश का प्रतीक होता है या किसी ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए किया जाता है जिसने धार्मिक या शैक्षणिक अध्ययन में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की हो। दस्तारबंदी के सबसे आम अवसरों में से एक है जब कोई छात्र कुरान को पूरा याद कर लेता है, जिसे हिफ्ज़ के नाम से जाना जाता है। यह इस्लामी धर्म में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, और दस्तारबंदी समारोह सार्वजनिक रूप से इस उपलब्धि को स्वीकार करने और उसका जश्न मनाने का एक तरीका है।

दस्तारबंदी समारोह के दौरान, एक सम्मानित बुजुर्ग या धार्मिक विद्वान आम तौर पर व्यक्ति के सिर पर पगड़ी बांधते हैं, साथ ही साथ प्रार्थनाएं करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पगड़ी अक्सर बढ़िया कपड़े से बनी होती है और इस पर जटिल डिजाइन या कढ़ाई हो सकती है। पगड़ी बांधने का कार्य प्रतीकात्मक है, यह व्यक्ति को सम्मान, गरिमा और जिम्मेदारी देने का प्रतिनिधित्व करता है। इस समारोह के बाद आम तौर पर परिवार, दोस्तों और समुदाय के सदस्यों का जमावड़ा होता है जो भोज और उत्सव के साथ इस अवसर को मनाने के लिए एक साथ आते हैं। यह परिवार के लिए खुशी और गर्व का समय होता है और यह व्यक्ति की उपलब्धियों और समुदाय में अधिक जिम्मेदारियां लेने के लिए उनकी तत्परता की सार्वजनिक स्वीकृति के रूप में कार्य करता है।

जब बुजुर्ग को गंदे कपड़ों के कारण मेट्रो में नहीं घुसने दिया गया!

हाल ही में एक घटना देखने को मिली जब बुजुर्ग को गंदे कपड़ों के कारण मेट्रो में नहीं घुसने दिया गया! गांधी के देश में एक किसान को कपड़े देखकर मेट्रो में चढ़ने से रोक दिया जाता है। 131 साल पहले महात्मा गांधी को भी दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसे ही अनुभव से गुजरना पड़ा था। 7 जून 1893 को उन्हें दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन की फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट से बाहर निकाल दिया गया क्योंकि अश्वेतों को फर्स्ट क्लास में सफर करने की इजाजत नहीं थी। उस समय भारत और दक्षिण अफ्रीका दोनों ही ब्रिटिश उपनिवेश थे। भेदभाव खासकर रंगभेद की उस अपमानजनक घटना ने गांधी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसके खिलाफ मुहिम छेड़ दी। बाद में वह भारत लौटे और ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया। आखिरकार दशकों के संघर्ष के बाद देश को आजादी भी दिलाई। गांधी के साथ दक्षिण अफ्रीका में भेदभाव तो तब हुआ जब वहां अंग्रेजों का शासन था। लेकिन आजादी के करीब 8 दशक बाद भी अगर अपने ही देश में किसी नागरिक को इस आधार पर ट्रेन, मेट्रो या पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सवार होने से रोका जाता है तो ये बेहद शर्मनाक है। घटना बेंगलुरु मेट्रो की है। वीडियो वायरल होने और सोशल मीडिया पर काफी लानत मलानत के बाद बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड बीएमआरसीएल को खेद जताना पड़ा। बुजुर्ग किसान के साथ बदसलूकी करने वाले सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को बर्खास्त कर दिया गया है। पहनावे को लेकर भेदभाव से जुड़ीं खबरें जबतब आती ही रहती हैं। दो-ढाई साल पहले दक्षिण दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में एक महिला को सिर्फ इसलिए एंट्री नहीं दी गई कि वह विशुद्ध भारतीय परिधान साड़ी पहनी हुई थी। तब उस मामले ने बहुत तूल पकड़ा था। जांच हुई तो पता चला कि रेस्टोरेंट बिना वैध लाइसेंस के चल रहा था और आखिरकार उस पर ताला लग गया। लेकिन बेंगलुरु मेट्रो में बुजुर्ग से भेदभाव का मामला तो और भी ज्यादा गंभीर है। यह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ा मसला था। आम जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली मेट्रो में आम जनता को इसलिए नो एंट्री कि उसका ड्रेस सही नहीं है? बेंगलुरु मेट्रो की घटना 18 फरवरी की थी लेकिन भला हो हर हाथ में कैमरे वाले युग का जो राष्ट्रीय स्तर पर उस घटना की चर्चा हुई और बीएमआरसी को गलती माननी पड़ी। घटना का वीडियो वायरल होने और सोशल मीडिया पर लोगों के आक्रोश के बाद बीएमआरसी को संबंधित सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को नौकरी से निकालने का ऐलान करना पड़ा। नौकरी से निकालना सही सजा है या नहीं, ये कहना मुश्किल है लेकिन बीएमआरसी को अपने सभी स्टाफ चाहे वे नियमित हों या संविदा पर, उन्हें जागरूक करने की जरूरत है ताकि इस तरह की घटना का दोहराव न हो सके।

बुजुर्ग को मेट्रो में चढ़ने से रोके जाने की ये घटना 18 फरवरी को राजाजीनगर मेट्रो स्टेशन पर हुई थी। इससे जुड़े वायरल वीडियो में दिख रहा है कि सिक्यॉरिटी स्टाफ एक बुजुर्ग को इसलिए एंट्री से रोक रहा है कि उसके कपड़े ‘ठीक’ नहीं है। वीडियो में दिख रहा है कि लगेज स्कैनर के पास सफेद शर्ट और धोती में एक बुजुर्ग दिख रहा है। सिर पर गठरी है जिसमें संभवतः कपड़े हैं। सोशल मीडिया पर किसान बताए जा रहे उस बुजुर्ग के पास यात्रा के लिए जरूरी टिकट भी था। इसके बाद भी सुरक्षाकर्मी उसे एंट्री नहीं दे रहे क्योंकि उसके कपड़े ‘ठीक’ नहीं हैं, ‘गंदे’ हैं। कार्तिक सी. एरानी नाम के एक यात्री ने बुजुर्ग को रोके जाने का विरोध किया। वीडियो में वह सिक्यॉरिटी स्टाफ के फैसले पर सवाल उठाते दिख रहे हैं। उनके साथ एक और यात्री भी सिक्यॉरिटी स्टाफ से बहस करते दिख रहे हैं कि किसान से सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। वह तो सिर्फ कपड़े लेकर जा रहे हैं, उन्होंने बीएमआरसी के किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है। वह सवाल करते हैं कि क्या ये वीआईपी ट्रांसपोर्ट है? क्या मेट्रो आम जनता के चलने के लिए नहीं है? क्या मेट्रो में चलने के लिए ड्रेस कोड लागू है? इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बेचारा बुजुर्ग चुपचाप शांत एक दूसरे का मुंह ताकता रहता है। हिंदी बोलने वाले उस बुजुर्ग को समझ ही नहीं आता कि क्या करें। वीडियो के आखिर में दिख रहा है कि सिक्यॉरिटी स्टाफ से बहस करने वाले युवक ने बुजुर्ग को साथ में लेकर स्टेशन में उनकी एंट्री कराई। वीडियो में उन्हें यह कहते सुना जा सकता है, ‘चलो भैया…कौन क्या बोलेगा?’ बुजुर्ग ने राजाजीनगर से मैजेस्टिक मेट्रो स्टेशन तक सफर किया।

घटना के करीब एक हफ्ते बाद 24 फरवरी को उसका वीडियो एक्स पर वायरल हो गया। लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई। लोगों ने कार्तिक नाम के शख्स की जमकर तारीफ की और बीएमआरसी को खूब खरीखोटी सुनाई। लोगों के आक्रोश के मद्देनजर बीएमआरसी ने घटना की जांच कराई और दोषी सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को बर्खास्त कर दिया। पूरी घटना बेहद शर्मनाक है। गांधी के देश में एक बुजुर्ग को मेट्रो में ये कहकर चढ़ने से रोकने की कोशिश होती है कि उसके कपड़े ‘ठीक नहीं’ हैं। एक आजाद मुल्क में कपड़े, चमड़ी के रंग, भाषा, रंग-रूप वगैरह के आधार पर भेदभाव की घटना की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अफसोस कि आजादी के करीब 8 दशक बाद भी इस तरह के भेदभाव की घटना हो रही है।

क्या महाराष्ट्र की तरह हिमाचल प्रदेश में भी होगा खेला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या महाराष्ट्र की तरह हिमाचल प्रदेश में भी खेला होगा या नहीं! देश की राजनीति थोड़ी-थोड़ी टी20 मैच की तरह हो चली है। बाजी किस वक्त किधर पलट जाए कहा नहीं जा सकता। अब देखिए न, पूरे दिन हिमाचल प्रदेश की जिस राज्यसभा सीट पर कांग्रेस और सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू जीत का दंभ भर रहे थे वह तो बीजेपी के खाते में चली गई। 40-25 से शुरू हुआ मुकाबला देर शाम नतीजे आने के बाद 34-34 में तब्दील हो गया। इसके बाद टाई ब्रेकर और लकी ड्रॉ की मदद से विजेता भाजपा ही हुई। मुकाबला कांग्रेस के प्रवक्ता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और बीजेपी के हर्ष महाजन के बीच था। क्रॉस वोटिंग का भी खेल हार-जीत का अंतर पैदा कर गया। कांग्रेस और सीएम सुक्खू के लिए यह किसी शॉक से कम नहीं था। अब कयास यह लगाए जा रहे हैं कि हिमाचल की सरकार भी बहुत दिनों की मेहमान नहीं है। विजेता सांसद हर्ष महाजन का भी यही दावा है। हालांकि अभी ऐसा होता नहीं दिख रहा है, इसलिए सिर्फ कयासों का बाजार गर्म है। लेकिन इस घटना ने 2 साल पहले जून 2022 में महाराष्ट्र की तत्कालीन उद्धव सरकार के गिरने की याद दिला दी। तब भी राज्यसभा चुनाव थे और नतीजे आने के बाद एकनाथ शिंदे ने अपने विधायकों संग पाला बदलकर बीजेपी के साथ सरकार बना ली थी। तब बीजेपी ने महाविकास अघाड़ी को सत्ता से बेदखल कर गहरी चोट पहुंचाई थी। महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम की चर्चा करने से पहले आज हिमाचल प्रदेश में क्या कुछ हुआ उस बारे में बात कर लेते हैं। मंगलवार को 3 राज्यों की 15 सीटों के लिए चुनाव हुए। वैसे तो राज्यसभा की 56 सीटों पर चुनाव होने थे लेकिन 41 सीटों पर निर्विरोध सांसद चुने जाने के बाद बची 15 सीटों पर वोटिंग कराई गई। सबसे तगड़ा मुकाबला पहाड़ी इलाके हिमाचल प्रदेश में हुआ। ठंड और बर्फबारी के बाद भी वहां सियासी गर्माहट साफ दिखी। कांग्रेस और भाजपा के दो उम्मीदवारों के बीच आसान दिख रहा मुकाबला कब कांटे का हो गया खुद सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू भी नहीं समझ पाए। वह तो यह भी नहीं समझ पाए कि कब उनके नाक के नीचे से कांग्रेस के 6 विधायक खिसक गए और बीजेपी को वोट कर आए। 3 निर्दलीय विधायक मिलाकर कुल 9 वोट बीजेपी को पड़ गए। 40-25 का मुकाबला 34-34 का हो गया। बाद में टाई ब्रेकर के बाद अभिषेक मनु सिंघवी बीजेपी को हर्ष महाजन के हाथों हार मिली और हारी बाजी बीजेपी ने जीत ली। हार के बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने उन 9 विधायकों का धन्यवाद किया और इशारों में बीजेपी को बता दिया कि वह फिर वापसी करेंगे। तो क्या इस हार से हिमाचल सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं? बीजेपी के हर्ष महाजन की मानें तो सुक्खू सरकार ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है। हालांकि ऐसा तुरंत कोई संकट इस सरकार पर नहीं दिखता। बीजेपी द्वारा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की अटकलों के बारे में पूछे जाने पर सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि जब विधानसभा सत्र चलेगा तो हम देखेंगे। जो लोग गए हैं उनके परिवार के लोग उनसे पूछ रहे हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? तो अगर परिवार के लोग खुद ही सवाल कर रहे हैं तो शायद उनमें से कुछ लोग ‘घर वापसी’ के बारे में सोचेंगे।

साल 2022 और जून का महीना चल रहा था। बढ़ती तपिश ने महाराष्ट्र के सियासी पारे को भी बढ़ा दिया था। प्रदेश की कमान शिवसेना के सर्वेसर्वा उद्धव ठाकरे के हाथों में थी। गठबंधन के साथी एनसीपी और कांग्रेस भी थे। सबकुछ सही चल रहा था। सीएम पद की जिद के बाद बीजेपी का साथ छोड़कर सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे अपनी सरकार सही चला रहे थे। कोरोना का भी कहर साथ था। जून के महीने में ही यानी 2022 में राज्यसभा का चुनाव हुआ। 6 सीटों के लिए बीजेपी और महाविकास अघाड़ी के बीच मुकाबला था। भाजपा ने बाजी मारते हुए 6 में से 3 सीटें जीत लीं। नतीजों से सत्तारूढ़ शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन को बड़ा झटका लगा। एमवीए (महाराष्ट्र विकास अघाड़ी) ने वोटों की गिनती में 8 घंटे की देरी पर सवाल उठाया। भाजपा के जीतने वालों में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, पूर्व राज्य मंत्री अनिल बोंडे और धनंजय महाडिक शामिल थे। महाविकास अघाड़ी से शिवसेना के संजय राउत, राकांपा के प्रफुल्ल पटेल और कांग्रेस के इमरान प्रतापगढ़ी ने चुनाव जीता था। कुल 284 वैध मतों में से गोयल को 48, बोंडे को 48, महाडिक को 41.56, राउत को 41, प्रतापगढ़ी को 44 और पटेल को 43 मत मिले थे। यह तो हो गई नतीजों की बात। लेकिन असली खेला 6वीं सीट से शुरू हुआ।

छठी सीट के लिए बीजेपी के धनंजय महाडिक और शिवसेना के संजय पवार थे। संजय पवार को अंतिम में हार मिली और यहीं से सियासी उथल-पुथल भी मची। महाडिक और पवार पश्चिमी महाराष्ट्र के कोल्हापुर से आते हैं। छठी सीट के लिए हुए चुनाव बहुत ही रोमांचक रहा। कांग्रेस और बीजेपी ने एक दूसरे पर आरोप लगाए और चुनाव आयोग तक भी गए। बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस ने तब ट्वीट किया था कि चुनाव सिर्फ लड़ने के लिए नहीं, बल्कि जीतने के लिए लड़े जाते हैं। जय महाराष्ट्र। यहां से ही जैसे उद्धव सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। राज्यसभा चुनाव में वोटों की गिनती 8 घंटे देरी से शुरू हुई। इसकी वजह भाजपा और सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा एक-दूसरे पर क्रॉस वोटिंग और नियम तोड़ने का आरोप लगाना था। दोनों ही पक्षों ने चुनाव आयोग से शिकायत की और वोट रद्द करने की मांग की। चुनाव आयोग ने शिवसेना विधायक सुहास कांडे के वोट को खारिज करने का आदेश दिया, जिसके बाद रात 1 बजे के बाद मतगणना शुरू हुई। पहला परिणाम दो घंटे में सामने आ गया।

18 महीने और 18 दिनों के बाद शिंदे गुट के 16 विधायकों पर 2024 की जनवरी को फैसला भी आ गया। महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर ने मुख्यमंत्री शिंदे समेत उनके गुट के 16 विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी। स्पीकर ने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना बताया था। अभी के समीकरण की बात करें तो महाराष्ट्र में बीजेपी की महायुति सरकार है। भाजपा के पास 106 विधायक, शिवसेना(शिंदे गुट) के 39, एनसीपी(अजित पवार गुट) के 41 विधायक हैं। वहीं महाविकास अघाड़ी के पास कांग्रेस के पास 44, शिवसेना उद्धव गुट के पास 13 और एनसीपी(शरद पवार गुट) क पास 13 विधायक हैं। बता दें कि पिछले साल अजित पवार अपने 41 विधायकों के साथ बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था।

आखिर क्या है मोनिका यादव मर्डर की मिस्ट्री?

आज हम आपको मोनिका यादव मर्डर की मिस्ट्री की कहानी सुनाने जा रहे हैं! 8 सितंबर 2021, वो तारीख जब दिल्ली पुलिस की 28 साल की पूर्व कांस्टेबल मोनिका यादव की हत्या हुई। वजह थी हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह राणा से शादी करने से मना कर देना। मोनिका यादव मर्डर केस को भले ही दो साल पूरे हो गए हैं, लेकिन ये अभी भी दिल्ली के बड़े अपराधों को जिक्र होता है, तो ये केस जरूर ध्यान में आता है। इस वारदात से पूरी दिल्ली सहम गई थी। हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह राणा पहले मोनिका को दिल्ली के मुखमेलपुर के सुनसान इलाके में ले गया और उसे कई थप्पड़ मारे। सनकी पुलिसकर्मी का इतने पर भी मन नहीं भरा और उसने मोनिका को 25-30 मीटर की ऊंचाई से नाले में फेंक दिया। मोनिका बुरी तरह जख्मी हो गई, लेकिन उसकी जान बच गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सनकी हेड कांस्टेबल तब तक नहीं माना, जब तक उसने मोनिका की जान नहीं ले ली। जानकारी के अनुसार, नाले में फेंकने पर मोनिका बच गई। उसने बचने के लिए राणा को धमकी दी कि वो पुलिस को सबकुछ बता देगी। फिर क्या था, राणा के दिमाग पर पहले से खून सवार था। वो खुद भी नाले में उतर गया और मोनिका का गला घोंट दिया। इसके बाद मोनिका के शव को छिपाने के लिए उसे नाले के अंदर धकेल दिया। शव ऊपर न आए इसके लिए उसे पत्थरों से ढक दिया। पिछले साल जब इस मर्डर केस का खुलासा हुआ, तो हर कोई हैरान रह गया। मोनिका मर्डर केस की पूरी कहानी 30 पेज की चार्जशीट में लिखी हुई है। इसे मोनिका की हत्या के तीन महीने बाद पिछले साल 26 दिसंबर को दिल्ली की अदालत में दाखिल किया गया।

दिल्ली पुलिस का हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह राणा मोनिका की हत्या के बाद उसके परिवार को गुमराह करता रहा। उसने मोनिका के परिवार को ये भरोसा दिलाया कि वो अरविंद नाम के शख्स के साथ भाग गई और उसी से शादी कर ली। राणा मोनिका के मर्डर का राज दो साल तक छिपाता रहा। मोनिका के घरवालों को शक हुआ और उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2021 में वो मोनिका के पीजी में गई थीं, लेकिन वो वहां नहीं मिलीं। पुलिस जांच में पता चला कि मोनिका दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम में काम करते हुए राणा से मिली थी। मोनिका दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर तैनात थी। वो सितंबर 2021 में UPSC की तैयारी करने के लिए दिल्ली आई थी। यहां उसकी मुलाकात राणा से हुई। राणा पहले से शादीशुदा था। वो मोनिका को पसंद करने लगा। उसने मोनिका के रहने का इंतजाम किया और कोचिंग सेंटर में भी एडमिशन करवाया। राणा मोनिका पर शादी के लिए दवाब बना रहा था, लेकिन वो अपनी तैयारी पर फोकस करना चाहती थी।

वारदात वाले दिन राणा ने मोनिका को उसके पीजी से पिक किया और उसे दिल्ली के मुखर्जी नगर के एक मॉल में ले गया। वो लगातार उसपर शादी के लिए दवाब बना रहा था, लेकिन मोनिका अपने फैसले पर अडिग थी। मोनिका के बार-बार इनकार से राणा को गुस्सा आ गया। फिर वो उसे सनसान रास्ते पर ले गया और मारपीट करने लगा। इसके बाद उसने मोनिका को नाले में फेंक दिया और जब वो वहां भी बच गई तो गला घोटकर उसकी हत्या कर दी। राणा ने चालाकी से मोनिका का शव भी नाले में एक पत्थर से छिपा दिया। दो साल तक इस हत्याकांड की किसी को कानोकान खबर नहीं हुई। राणा मोनिका के परिवार से झूठ बोलता रहा कि वो अरविंद नाम के लड़के के साथ भाग गई है। लेकिन जब परिवार को शक हुआ तो पुलिस ने जांच शुरू की। दो साल बाद मोनिका के अवशेष नाले में मिले। पुलिस ने उन अवशेषों के डीएनए को मोनिका की मां के DNA से मिलाया, जिससे इस बात का खुलासा हुआ कि मोनिका की हत्या हुई है।

मोनिका का हत्यारा हेड कांस्टेबल राणा दो साल तक उसके परिवार को गुमराह करता रहा। उसने मोनिका के परिवार को फर्जी कॉल किए और खुद को अरविंद बताया। उसने कहा कि मोनिका ने अरविंद से शादी कर ली है। लेकिन परिवार को शक हुआ, जब उन्हें केवल अरविंद के नाम से फोन और मैसेज आए, लेकिन बेटी का कभी कॉल नहीं आया। परिवार ने पुलिस से इस मामले में मदद मांगी। पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड खंगाले और राणा के साले रोविन तक पहुंची। रोविन ने कबूल किया उसने राणा के कहने पर मोनिका के परिवार को कॉल किए। इसके बाद पुलिस ने राणा को गिरफ्तार किया।

जब उत्तर प्रदेश की शिक्षामित्र ही बन गई हत्यारी!

एक ऐसी घटना है जब उत्तर प्रदेश की शिक्षामित्र ही हत्यारी बन गई! 2008 में अप्रैल का महीना था। गर्मी धीरे-धीरे बढ़ रही थी। 14/15 अप्रैल की रात करीब एक बजे अमरोहा जिले की हसनपुर कोतवाली का फोन अचानक बजने लगा। नाइट ड्यूटी पर तैनात मुंशी ने फोन उठाया। फोन करने वाले ने बताया कि बावनखेड़ी गांव से बोल रहा है। पड़ोस में रहने वाले शौकत मास्टर साहब के घर कोई बड़ा हादसा हो गया है। घर से उनकी बेटी के रोने की आवाज आ रही है। इसके साथ ही फोन कट गया। मुंशी ने तत्काल कोतवाल को जानकारी देने के साथ ही गश्त पर निकले सिपाहियों को मौके पर भेजा। करीब आधे घंटे बाद सिपाहियों ने बताया कि शौकत के साथ ही परिवार के सात लोगों की हत्या हो गई है। कोतवाल ने उच्चाधिकारियों को सूचना दी और दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। घर का मंजर देखकर सबकी रूह कांप गई। घर के चार अलग-अलग कमरों ने शौकत, पत्नी हाशमी, बड़े बेटे अनीस, बहू अंजुम, छोटे बेटे राशिद, भांजी राबिया और 11 महीने के पौत्र की लाशें पड़ी थीं। कमरों में चारों तरफ खून फैला था। मासूम को छोड़ बाकी सबकी धारदार हथियार से गला काटकर हत्या की गई थी। सिर्फ शौकत की बेटी शबनम बची थी, जो दहाड़े मार-मार कर रो रही थी। यूपी के अमरोहा जिले में एक छोटा का गांव है बावनखेड़ी। इसी गांव के 50 वर्षीय शौकत इंटर कॉलेज में प्रवक्ता थे। बड़ा बेटा अनीस एमबीए और छोटा बेटा राशिद इंजिनियर था। इंग्लिश और भूगोल में एमए बड़ी बेटी शबनम पड़ोसी गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र थी। शौकत का पूरा घर पढ़ा लिखा था, ऐसे में गांव में काफी इज्जत थी। साथ ही परिवार संपन्न भी था। भांजी राबिया भी शौकत के घर पर रहकर पढ़ कर रही थी। घटना के दो साल पहले ही शौकत ने अपने बड़े बेटे की शादी की थी।

प्राथमिक छानबीन के बाद पुलिस ने सातों शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा। साथ ही शबनम से पूछताछ शुरू की। उसने बताया कि रात में खाने के बाद छत पर सोने चली गई थी। देर रात कुछ बदमाश छत से जीने के रास्ते नीचे पहुंचे और परिवारीजनों की हत्या के बाद दरवाजा खोलकर फरार हो गए। परिवार के सात लोगों की हत्या हुई थी, सो जिले के आला अफसरों के साथ मुरादाबाद रेंज के डीआईजी और बरेली जोन के आईजी भी मौके पर पहुंच गए। फिंगरप्रिंट टीम के साथ ही खोजी कुत्तों को भी बुलाया गया। काफी छानबीन के बाद भी पुलिस को छत पर या दीवार पर किसी का कोई निशान नहीं मिला। छत पर सीढ़ी लगाने के भी निशान नहीं थे। छत से पानी का एक पाइप नीचे उतरा था, उस पर भी फिंगर प्रिंट वालों को कोई निशान नहीं मिले।

उस समय मायावती यूपी की मुख्यमंत्री थीं। अमरोहा में एक ही परिवार के सात लोगों की हत्या की सूचना पाकर खुद बावनखेड़ी गांव पहुंच गईं। मुख्यमंत्री ने परिवार में अकेली जीवित बची शबनम को सांत्वना देने के साथ ही पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की। साथ ही जल्द से जल्द घटना का पर्दाफाश करवाने का आश्वासन दिया। सामूहिक हत्या से पुलिस पहले से दबाव में थी। सीएम के पहुंचने से दबाव और बढ़ गया। मुरादाबाद के सीनियर क्राइम रिपोर्टर रहे पंकज त्रिपाठी बताते हैं कि प्राथमिक छानबीन और पूछताछ के बाद शक की सुई शबनम के आस-पास ही घूम रही थी। हालांकि सीएम मायावती के मौके पर पहुंचने और आर्थिक मदद देने के बाद पुलिस बिना साक्ष्य जुटाए कुछ भी बोलने से कतरा रही थी।

शक के आधार पर पुलिस ने शबनम के मोबाइल का कॉल रेकॉर्ड खंगालना शुरू किया। पता चला कि उसके नंबर से पिछले तीन महीने में एक ही नंबर पर नौ सौ से अधिक कॉल हुए थे। सीडीआर से पता चला कि घटना की रात उन दोनों के नंबर पर 52 कॉल हुईं थीं। मोबाइल नंबर गांव में रहने वाले सलीम का था, जिसकी गांव में ही आरा मशीन थी। पूछताछ करने पर गांव वालों से पता चला कि सलीम का शबनम से प्रेम-प्रसंग है। लगभग रोज सलीम ही बाइक से शबनम को स्कूल छोड़ने जाता है। इतनी जानकारी के बाद पुलिस ने सलीम की तलाश शुरू की और 17 अप्रैल को धर दबोचवा। कोतवाली में पूछताछ के दौरान पहले तो सलीम ने इधर-उधर की कहानी सुनाई। लेकिन, सख्ती करने पर टूट गया और सामूहिक हत्याकांड की पूरी कहानी सुना डाली।

सलीम ने पुलिस को बताया कि हत्याएं शबनम के साथ मिलकर की हैं। वह और शबनम कई सालों से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन, शबनम का परिवार तैयार नहीं था। इसकी दो वजहें थीं, एक सलीम सिर्फ सातवीं तक पढ़ा था और दूसरी वजह थी सलीम का परिवार संपन्नता में शौकत के परिवार से काफी कम था। रिटायर्ड आईपीएस राजेश पांडेय बताते हैं कि दोनों प्‍यार में इतने अंधे हो गए कि पूरे परिवार को रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली। हत्याकांड की मुख्य सूत्रधार शबनम ही थी। सलीम ने पूछताछ में बताया कि शबनम ने रात को खीर भी बनाई और उसमें बेहोशी की दवा मिला दी थी। दवा सलीम ने ही दी थी। शबनम को छोड़कर घर के सभी सदस्य खीर खाकर बेहोश हो गए, तब शबनम ने फोन से उसे बुलाया। दोनों ने मिलकर कुल्‍हाड़ी से परिवार के छह लोगों की काटकर हत्या कर दी। छह लोगों की हत्या के बाद सलीम चला गया और कुल्हाड़ी रास्ते में पड़ने वाले तालाब में फेंक दी थी। उसके जाने के कुछ देर बाद शबनम ने फिर फोन किया और कहा कि भतीजा रो रहा है, उसे भी मारना है। लेकिन, उसने मना कर दिया था। ऐसे में शबनम से मासूम भतीजे को गला दबाकर मार डाला। पुलिस ने तालाब से घटना में प्रयुक्त कुल्हाड़ी बरामद की और 18 अप्रैल को शबनम को गिरफ्तार कर सामूहिक हत्याकांड का पर्दाफाश कर दिया।

क्या वर्तमान में एमबीबीएस की सीटों में हो रही है गड़बड़ी?

वर्तमान में एमबीबीएस की सीटों में गड़बड़ी होती जा रही है! दिल्ली में MBBS की सीटों में गड़बड़ी कि शिकायत मिली है। इस धांधली में बड़े-बड़े अफसर रेजडार पर आ गए हैं। मामले में दिल्ली पुलिस ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग में तैनात उप सचिव रैंक के दो अधिकारियों के कंप्यूटर जब्त कर लिए हैं। यही नहीं पुलिस कुछ मेडिकल कॉलेजों के 6-7 वरिष्ठ अधिकारियों से पूछताछ भी की है। अब इस खबर को दिल्ली पुलिस के अदिकारियों ने भी सही बताया है। दिल्ली पुलिस ने बताया कि राष्ट्रीय साइबर फोरेंसिक प्रयोगशाला की जांच और तकनीकी टीमों ने द्वारका में एनएमसी के कार्यालय का निरीक्षण भी किया है।

दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने शनिवार को बताया कि हमने एनएमसी के एमएआरबी के कार्यालय में लगे कैमरों की सीसीटीवी फुटेज और गेट पर बनाए गए आगंतुक रजिस्टर का विवरण भी मांगा है। इससे पुलिस को उन दिनों एनएमसी के परिसर में किसी भी तरह के अनधिकृत प्रवेश को रोकने में मदद मिलेगी, जब मेडिकल कॉलेजों को सीटें बढ़ाने की अनुमति देने वाले पत्र भेजे गए थे। द्वारका में पुलिस ने समीर सिन्हा तत्कालीन उप सचिव, एमएआरबी-एनएमसी और प्रभात कुमार (तत्कालीन अवर सचिव) द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंप्यूटरों को जब्त कर लिया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि कंप्यूटरों को फोरेंसिक विश्लेषण के लिए और किसी भी छेड़छाड़ और अनधिकृत पहुंच को खारिज करने के लिए जब्त किया गया था। दोनों अधिकारियों से पूछताछ की गई, जिसके दौरान उन्होंने ईमेल भेजने से इनकार कर दिया। यह माना जाता है कि फुटेज के अलावा, दिल्ली पुलिस ने एनएमसी को उनके ओर से जारी किए गए सार्वजनिक नोटिस और अनुमति पत्रों की मूल और प्रमाणित प्रतियों को प्रदान करने के लिए भी कहा है। इसकी तुलना कॉलेजों को जारी किए गए लोगों से की जाएगी।

पुलिस एनएमसी के कई वरिष्ठ अधिकारियों और 4-5 मेडिकल कॉलेजों की संलिप्तता की जांच कर रही है। एक अधिकारी ने बताया कि सीटों में वृद्धि एमबीबीएस, एमडी और एमएस जैसे पाठ्यक्रमों के लिए की गई थी। एक कॉलेज को नेत्र विज्ञान में एमएस सीटों को पांच से बढ़ाकर 10 करने, सामान्य चिकित्सा में एमडी सीटों को 7 से बढ़ाकर 24 करने और ईएनटी में एमएस सीटों को एक से बढ़ाकर 4 करने की अनुमति दी गई थी। पुलिस ने अभी तक विभिन्न कॉलेजों में धोखाधड़ी से बढ़ाई गई सीटों की संख्या का खुलासा नहीं किया है। पिछले अगस्त महीने में अनुमति पत्रों में गड़बड़ी का पता चला था, जिसके बाद एनएमसी ने जांच की और पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई। आईपीसी के तहत आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के लिए और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66सी के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्राथमिकी एमएआरबी-एनएमसी के उप सचिव, ए.के. सिंह द्वारा दर्ज कराई गई थी। अपनी शिकायत में सिंह ने कहा कि आयोग के आधिकारिक ईमेल आईडी के माध्यम से विभिन्न मेडिकल कॉलेजों को जाली अनुमति पत्र जारी किए गए थे।

जिस ईमेल आईडी “ds.marb@nmc.org.in” से जाली अनुमति पत्र भेजे गए थे, वह पहले एमएआरबी के मामलों को देखने वाले उप सचिव पद के एक अधिकारी की थी। आंतरिक जांच में, एक अधिकारी ने कोई ईमेल भेजने या ऐसे किसी अनुमति पत्र को जारी करने से इनकार कर दिया। यह भी बताया गया है कि एक अन्य अधिकारी ने कथित रूप से एनएमसी की वेबसाइट पर कई कॉलेजों की सीटों को बढ़ा दिया था। पिछले साल अगस्त में एनएमसी ने अपनी वेबसाइट पर एक नोटिस जारी किया था, जिसमें कॉलेजों को इन अनुमति पत्रों को वैध नहीं मानने के लिए कहा गया था। नोटिस में कहा गया है कि यह स्पष्ट किया जाता है कि उक्त पत्र सदस्य/अध्यक्ष, एमएआरबी द्वारा जारी नहीं किए गए हैं।यह माना जाता है कि फुटेज के अलावा, दिल्ली पुलिस ने एनएमसी को उनके ओर से जारी किए गए सार्वजनिक नोटिस और अनुमति पत्रों की मूल और प्रमाणित प्रतियों को प्रदान करने के लिए भी कहा है। इसकी तुलना कॉलेजों को जारी किए गए लोगों से की जाएगी। ये पत्र जाली/नकली हैं अपनी शिकायत में सिंह ने कहा कि आयोग के आधिकारिक ईमेल आईडी के माध्यम से विभिन्न मेडिकल कॉलेजों को जाली अनुमति पत्र जारी किए गए थे।और इन्हें राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के चिकित्सा मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड से वैध अनुमति नहीं माना जा सकता है। पुलिस ने कहा कि वे जांच के अंतिम चरण में हैं और जल्द ही गिरफ्तारियां होने की संभावना है। पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा इस मामले की निगरानी कर रहे हैं।

आखिर वर्तमान में क्यों आत्महत्या कर रहे हैं डॉक्टर?

वर्तमान में कई डॉक्टर आत्महत्या करते जा रहे हैं! राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग एनएमसी के अनुसार, भारत में बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र मानसिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं, जिसमें आत्महत्या और ड्रॉपआउट की दर अधिक है। पिछले पांच वर्षों में 64 एमबीबीएस और 58 विभिन्न पोस्ट-ग्रैजुएट पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले 122 मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या कर ली। इसके अतिरिक्त, इसी अवधि के दौरान देशभर के मेडिकल कॉलेजों से 1,270 छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी। एनएमसी ने सूचना के अधिकार आरटीआई के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में ये आंकड़े दिए। रिपोर्ट बताती है कि आत्महत्या करने वाले 64 एमबीबीएस छात्रों में से एक और आत्महत्या करने वाले 58 स्नातकोत्तर मेडिकल छात्रों में से चार दिल्ली से थे। आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. विवेक पांडे ने एनएमसी से यह जानकारी प्राप्त की। उन्होंने बताया कि जिन छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी, उनमें से तीन एमबीबीएस कर रहे थे और 155 पीजी कोर्स में थे। ये सभी 2018 और 2022 के बीच के बैच के और दिल्ली से थे। फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (FORDA) के अध्यक्ष डॉ. अविरल माथुर ने जोर देकर कहा कि ये आंकड़े गवाही हैं कि मेडिकल छात्रों को कितनी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। मेडिकल एजुकेशन की कठोर शर्तें छात्रों में तनाव पैदा करती हैं और उसे बढ़ाती हैं। ऐसे में पहचानना महत्वपूर्ण है कि इन आत्महत्याओं के अंतर्निहित कारण बहुआयामी हैं।

डॉ. माथुर के अनुसार, असीमित ड्यूटी आवर, आराम करने के पर्याप्त वक्त का अभाव, घटिए सीनियर्स के कारण बना दमघोंटू वातावरण और पीजी स्टूडेंट्स के लिए समय की कमी जैसे कारक शारीरिक थकान और मानसिक समस्याओं के आधार बनते हैं। उन्होंने कई संस्थानों में जोखिम वाले छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए उचित तंत्र और काउंसलिंग सर्विस के अभाव की भी चर्चा की। डॉ. माथुर ने आगे बताया कि परिवार की उम्मीदों से पैदा हुआ तनाव, पढ़ाई का बहुत ज्यादा बोझ और मरीजों के इलाज की जिम्मेदारियां छात्रों का जीवन बहुत कठिन बना देती हैं। अलग-अलग भाषा की पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए भाषा की बाधाएं, मेडिकल एजुकेशन के शैक्षणिक और सामाजिक पहलुओं के अनुकूल होने में उनकी कठिनाइयों को और बढ़ा देती हैं। FAIMA डॉक्टर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रोहन कृष्णन ने मेडिकल छात्रों के बीच खतरनाक आत्महत्या दर के मुख्य कारणों में से एक के रूप में दंडात्मक प्रणाली की पहचान की। उन्होंने कहा कि छात्रों को पढ़ाई छोड़ने के डर से मनोवैज्ञानिक दबाव का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ऐसा करने पर सख्त दंड का प्रावधान है। कुछ कॉलेजों में, जो छात्र प्रवेश के बाद छोड़ना चाहते हैं, उन्हें 50 लाख रुपये का जुर्माना भरना पड़ता है और अगले तीन साल तक परीक्षा नहीं दे सकते।

दिल्ली में केंद्र सरकार के मेडिकल कॉलेजों- लेडी हार्डिंग्स, सफदरजंग और आरएमएल और दिल्ली सरकार के मेडिकल कॉलेजों- मौलाना आजाद और यूसीएमएस यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइसेंज में छात्रों को एडमिशन के वक्त कोई बॉन्ड नहीं भरना पड़ता है, लेकिन आर्मी और ईएसआई के मेडिकल कॉलेजों में ऐसा प्रावधान है। डॉ. कृष्णन ने कहा कि सरकार और आयोग की यह नीतिगत विफलता उन छात्रों के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ती जो डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे छात्रों के लिए बिना जुर्माना पढ़ाई छोड़ने का विकल्प देने की वकालत की, जिसके लिए मेडिकल एजुकेशन पॉलिसी में सुधार की वाकई सख्त दरकार है।

चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने पढ़ाई के तनावपूर्ण माहौल और आरटीआई से मिले आंकड़ों में झलकी मेडिकल स्टूडेंट्स की हालत पर चिंता जाहिर की। डॉ. द्विवेदी ने कहा कि इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों, क्लिनिकों-अस्पतालों, नीति निर्माताओं और छात्र संगठनों सहित सभी हितधारकों को सहयोग की भावना से आगे आना होगा। मेडिकल छात्रों को कितनी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। मेडिकल एजुकेशन की कठोर शर्तें छात्रों में तनाव पैदा करती हैं और उसे बढ़ाती हैं। सरकार और आयोग की यह नीतिगत विफलता उन छात्रों के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ती जो डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे छात्रों के लिए बिना जुर्माना पढ़ाई छोड़ने का विकल्प देने की वकालत की, जिसके लिए मेडिकल एजुकेशन पॉलिसी में सुधार की वाकई सख्त दरकार है।ऐसे में पहचानना महत्वपूर्ण है कि इन आत्महत्याओं के अंतर्निहित कारण बहुआयामी हैं।डॉ. माथुर ने भी ऐसा अनुकूल माहौल बनाने पर जोर दिया जिसमें मेडिकल स्टूडेंट्स घुटन महसूस करने की जगह उत्साह से लबरेज हों। उन्होंने चौतरफा कदम उठाने का आह्वान किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी छात्र मेडिकल एजुकेशन में अच्छा प्रदर्शन करने की यात्रा में खुद को अकेला महसूस नहीं करे।

क्या वर्तमान के इंसान बनते जा रहे हैं जानवर?

वर्तमान के इंसान जानवर बनते जा रहे हैं! हाल ही में रिलीज हुई एनिमल मूवी का यह गीत इतने खून-खराबे के साथ पर्दे पर फिल्माया गया है, शायद ही कमजोर दिल के लोग इसे देख पाएं। हद तो तब हो जाती है जब फिल्म का हीरो विलेन की गर्दन को ISIS के आतंकी की तरह लहुलूहान कर देता है। यहां मसला एक फिल्म का नहीं है, बल्कि मिर्जापुर जैसी तमाम वेब सीरीज और पंजाबी एल्बम सॉन्ग में खुलेआम परोसी जा रही हिंसा का है। दरअसल अब पर्दे पर फिल्माए जा रहे क्राइम सीन आम जीवन में भी देखने को मिल रहे हैं। मामला अब गंभीर होता जा रहा है। ताजा उदाहरण आज ही देखने मिला है। दिल्ली में बेखौफ शूटर ने सैलून में घुसकर एक शख्स की खोपड़ी खोल दी है। इससे पहले फेसबुक लाइव के दौरान एक नेता की गोली मारकर हत्या का मामला सामने आया है। महाराष्ट्र में बीजेपी विधायक ने शिवसेना नेता को पुलिस स्टेशन के भीतर गोलियों से भून डाला। यह घटना डरा रही है।

आखिर फिल्मी अंदाज में हो रहीं हत्याओं का जिम्मेदार कौन है? यह सवाल अब उठने लगा है। इस सवाल के जवाब में जितनी देरी होगी, उतनी ही जघन्य हत्याओं के मामलों में इजाफा होगा। समाज के अधिकांश बुद्धिजीवी मानते हैं कि इन हत्याओं के पीछे फिल्में और क्राइम वेब सीरीज हैं। उनका तर्क है कि फिल्मों में हीरो को सरेआम मर्डर करते हुए दिखाया जाता है। यह फिल्में और वेब सीरीज अपराध का महिमामंडन करती है। अपराध को ग्लैमर की तरह पेश करती हैं। जिसका सीधा असर लोगों के दिमाग पर पड़ता है। खासतौर पर युवाओं के दिमाग पर। उन्हें लगता है कि हत्या का मॉर्डन स्टाइल कूल है। लेकिन वह इस बात को भूल जाते हैं कि रील और रियल लाइफ में जमीन और आसमान का फर्क है, और अपराध की दुनिया में फंस जाते हैं। सोशल मीडिया साइट्स भी बढ़ते अपराध के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि सोशल साइट्स पर भी हिंसा को बढ़ावा देने वाली रील दिनभर वायरल होती हैं। हाल ही में पब्लिक प्लेस में हुए मर्डर के कुछ वीडियो तो रोंगटे खड़े करने वाले हैं। मुंबई में कैमरे पर दनादन फायरिंग और शिवसेना उद्धव गुट के एक नेता की लाइव हत्या का मंजर दहला देने वाला है। फेसबुक पर जिस किसी ने यह खौफनाक वीडियो देखा वह दंग रह गया। लाइव मर्डर की तस्वीरों को देखकर हर कोई दहल गया। मुंबई में हुए इस मर्डर में शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के पूर्व नगर सेवक अभिषेक घोषालकर को गोली मारी गई और वो भी फेसबुक लाइव के दौरान।ऐसा मर्डर शायद ही इससे पहले कभी देखा गया हो। वहीं हाल ही में महाराष्ट्र के उल्हासनगर में हिल लाइन पुलिस स्टेशन के अंदर बीजेपी विधायक गणेश गायकवाड़ ने कथित तौर पर शिवसेना नेता महेश गायकवाड़ को गोली मार दी। दोनों नेताओं के बीच कथित तौर पर जमीन को लेकर विवाद चल रहा था।

श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की बीते साल 5 दिसंबर को जयपुर में गोली मार कर हत्या कर दी गई। सुखदेव सिंह को जयपुर के श्यामनगर इलाके में गोली मारी गई। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ था। वीडियो में बदमाश फिल्मी स्टाइल में फायरिंग करते हुए सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को मौत के घाट उतार देते हैं। सुखदेव सिंह का राजनीति में काफी अच्छा वर्चस्व था। गोगामेड़ी की हत्या की जिम्मेदारी लॉरेंस बिश्नोई गैंग के साथी रोहित गोदारा ने ली।

दिल्ली में बीते साल हत्या की एक घटना को कुछ तरह से अंजाम दिया गया जिसे देखकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए। हत्या की यह घटना तब सुर्खियों में आई जब इसका सीसीटीवी फुटेज वायरल हुआ। दिल्ली के वेलकम इलाके की मजदूर कॉलोनी में घटी हत्या की इस घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीसीटीवी फुटेज में एक लड़का गली के अंदर से कुछ घसीटकर लाते हुए दिखाई देता है। पहले तो वह कोई भारी सामान जैसा दिखता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वह किसी व्यक्ति की लाश को घसीट कर ला रहा है। इसके बाद लड़का उस शख्स के ऊपर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला करता है। सीसीटीवी फुटेज में वह करीब 100 बार चाकुओं से हमला करता दिखाई देता है। जब शख्स के जिस्म में कोई हरकत नहीं होती है तो उसे मरा समझकर लड़का डांस करता है। दिल्ली में सरेराह इस तरह की हत्या ने लोगों को झकझोर के रख दिया।

रियल दुनिया के अपराध से पहले फिल्मों और बेव सीरीज में दिखाई जा रही हिंसा पर रोक लगाना बेहद जरूरी हो गया है। लेकिन सवाल खड़ा होता है कि सेंसर बोर्ड के होते हुए फिल्मों और वेब सीरीज में इतनी हिंसा कैसे दिखाई जा रही है। यहां सरकार की भूमिका पर भी सवालियां निशान लगता है। उधर समाजिक संगठन का भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हैं। समाज और सरकार के सुस्त रवैये की वजह से फिल्मों में जघन्य अपराध के सीन खुलेआम परोसे जा रहे हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि लोग इन फिल्मों को खूब सराहा भी रहे हैं। ऐसी फिल्मों का कारोबार भी 500-600 करोड़ से ज्यादा का हैं। लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि हम हिंसा को ग्लैमर की तरह परोसने वाली जिन फिल्मों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं समाज में भयानक रूप धारण करके वापस आ रही हैं।

जानिए लॉरेंस बिश्नोई की पूरी जिंदगी की कहानी!

आज हम आपको लॉरेंस बिश्नोई की जिंदगी की कहानी सुनाने जा रहे हैं! जब सलमान खान को मारेंगे तो पता चल ही जाएगा, यहीं उसे जोधपुर में मारेंगे। साल 2018 जून महीने का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें खुले तौर पर बॉलीवुड के दबंग खान को जान से मारने की बात करने वाले इस शख्स के बारे में लोगों को पहली बार पता चला। नाम था लॉरेंस बिश्नोई। जी हां वही लॉरेंस बिश्नोई जिसने पिछले साल मशहूर पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला को जान से मरवाया था। हाल ही में हरियाणा के इनलो चीफ नफे सिंह राठी की भी हत्या करवाने का इल्जाम इसके सिर पर है। कहते हैं कि साल 2018 के इस वीडियो के बाद से ही सबको पता चला कि वह है कौन। शुरू से ही लॉरेंस के अंदर खुद की धाक और नाम बनाने की धुन सवार थी। आज के समय में जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह बना बैठा लॉरेंस बिश्नोई के नाम से लोग खौफ खाते हैं। इसका खुद के नाम से एक गैंग चलता है। नाम है लॉरेंस बिश्नोई गैंग। जेल की चाहरदीवारी से यह गैंग के साथियों की मदद से न जाने कितने क्राइम रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुका है। लॉरेंस बिश्नोई या उसके गैंग से किसी को भी दुश्मनी भारी ही पड़ी है। फिर वह चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो, उसका अंत तय है। आज हम लॉरेंस बिश्नोई गैंग की क्राइम कुंडली निकालेंगे। पता लगाएंगे कि आखिर कैसे एक पुलिस कॉन्सटेबल का बेटा जुर्म से लड़ने के बजाया जुर्म का आका बन गया। पंजाब के फिरोजपुर के अबोहार में पुलिस कॉन्सटेबल लविंदर सिंह के घर एक लड़के ने जन्म लिया। आज से करीब 31 साल पहले यानी साल 1993। पिता पुलिस में थे और घर में पढ़ाई लिखाई का माहौल था। स्कूली शिक्षा के बाद कॉलेजी पढ़ाई करने राजधानी चंडीगढ़ भेज दिया गया। वहां डीएवी कॉलेज से बीए की डिग्री भी ले ली। वहां छात्र संघ के चुनाव में भी खड़ा हुआ लेकिन हार गया। चुनाव में हार के बाद से ही जैसे उसकी दूसरी दुनिया शुरू होने वाली थी। हार की टीस के बाद जिसकी जीत हुई, उससे इसके झगड़े शुरू हो गए। दोनों के बीच चंडीगढ़ में गोलीबारी हो गई। इसके बाद एक और कारण था। कारण था उसकी गर्लफ्रेंड। लॉरेंस बिश्नोई अपनी गर्लफ्रेंड से बेहद प्यार करता था। स्कूल का साथ चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज तक आ गया। वहां जब चुनाव जीतने वाली टीम से उसकी लड़ाई चल रही थी तभी उसके गर्लफ्रेंड की मौत हो गई। किसी ने कहा कि लड़की की चलती कार में आग लगने से मौत हो गई तो किसी ने कहा कि लॉरेंस के दुश्मन गैंग ने जानबूझकर उसे मार दिया। यहीं से लॉरेंस बिश्नोई ने जुर्म की दुनिया में एंट्री ली। रंगदारी और वसूली से शुरुआत हुई और बाद में वह इसमें रमता चला गया। मानो उसके बचपन का सपना पूरा हो रहा था। उसे तो अपराध की काली दुनिया में अपना नाम बनाना था।

लॉरेंस बिश्नोई 2018 से पहले एक मामूली अपराधी था। उसने अपना एक गैंग बनाना शुरू किया। नाम रखा 007। यह नाम जासूस जेम्स बॉन्ड के फेमस 007 से लिया गया था। इसके बाद साल 2018 में उसने राजस्थान के दो बिजनेसमेन से फिरौती-रंगदारी मांगी। एक ने बिना डरे लॉरेंस को मना कर दिया। उसने पुलिस को शिकायत कर दी। लॉरेंस बिश्नोई गैंग गिरफ्तार हो गया। इसके बाद उसे अजमेर जेल में डाला गया। तब तक भी उसे कोई नहीं जानता था। फिर उसने जेल से सोशल मीडिया पर एक्टिव होना शुरू हुआ। कई पोस्ट करने लगा। इससे पहले गैंगस्टर आनंदपाल से नजदीकी बना ली थी। लॉरेंस ने अपने गुर्गे संपत नेहरा को काम सौंपा कि तुम्हें मुंबई में सलमान खान को जान से मारना है।

संपत ने गैलेक्सी अपार्टमेंट की रेकी की लेकिन बैंगलोर में वह किसी और मामले में पकड़ा गया। पुलिस को उसने सब सच बता दिया। इसके बाद लॉरेंस बिश्नोई पर सलमान खान मामले में अलग से मुकदमा चला। तभी उसने कहा था कि अभी तो किया नहीं है… जब सलमान खान को मारेंगे तो पता चल ही जाएगा। सलमान के पहले वह यूथ कांग्रेस के जिलाध्यक्ष व गोलेवाला जोन से जिला परिषद सदस्य गुरलाल सिंह पहलवान की हत्या करवा चुका था। उसने सोशल मीडिया पर इसे कबूला भी था। असल में सलमान खान पर काले हिरण को मारने का आरोप था। लॉरेंस बिश्नोई समाज से आता था और उस समाज के लोग काले हिरण को पूजते हैं। यहीं से लोगों को पता चला कि यह लॉरेंस बिश्नोई है।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम हाई प्रोफाइल किलिंग में ही जुड़ा है। पहले मशहूर पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला फिर राजपूत करणी सेना के नेता सुखदेव सिंह गोगामेड़ी और अब नफे सिंह राठी। सिद्धू मूसेवाला की साल 2022 में हत्या की गई थी। सिद्धू अपनी गाड़ी से रोजाना की तरह बाहर निकला था। उस दिन गलती से सिक्योरिटी नहीं ली थी। बस इसी का फायदा उठाकर उसकी गाड़ी को निशाना बनाया गया और ताबड़तोड़ गोलियों से भून दिया गया। यह लॉरेंस के के लिए पहला हाई प्रोफाइल मर्डर था। इसके बाद पिछले साल 2023 दिसंबर में लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने राजस्थान करणी सेना के प्रमुख सुखदेव सिंह गोगामेड़ी को ऑफिस में घुसकर कई राउंड गोलियों से मार डाला। अब नफे सिंह राठी पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर मर्डर कर दिया गया। हालांकि उसे नफे सिंह राठी की मौत का जिम्मेदार बताया जा रहा है। अभी इसपर हत्या की जिम्मेदारी नहीं ली गई है।

लॉरेंस बिश्नोई को देश ही नहीं विदेश से भी मदद मिलती है। इस गैंग के लोग विदेश से भी धंधा चला रहे हैं। लॉरेंस बिश्नोई गैंग में इस समय संदीप उर्फ काला जठेड़ी, अनिल छिप्पी, राजू बसौदी जैसे कई गैंगस्टर हैं। विदेश से गोल्डी बराड़, लिपिन नेहरा और रोहित गोदारा का नाम भी है। इस गैंग की एक बाक और है कि इसके लोग जुर्म भी तत्काल कुबूल कर लेते हैं। यह सोशल मीडिया पोस्ट से यह बताने और जताो की कोशिश करते हैं कि लोग उनसे डर के रहें नहीं तो अंजाम ऐसा ही होगा।

आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे राहुल गांधी?

यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर राहुल गांधी कहां से चुनाव लड़ेंगे! लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी इस बार केरल को अलविदा कह सकते हैं। केरल में एलडीएफ ने राहुल गांधी की वायनाड सीट के साथ ही शशि थरूर की तिरुवनंतपुरम सीट से उम्मीदवार की घोषणा कर दी है। ऐसे में माना जा रहा है कि राहुल गांधी इस बार वायनाड सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे। हालांकि, राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव नहीं लड़ने की खबरें पहले भी आई थीं। एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राहुल गांधी इस बार तेलंगाना के साथ ही यूपी की रायबरेली या अमेठी से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। हालांकि, कांग्रेस की तरफ से इस संबंध में अभी तक स्थिति साफ नहीं की गई है। राहुल गांधी ने भी अपनी तरफ से अमेठी में स्मृति ईरानी के खिलाफ चुनाव लड़ने के मुद्दे पर कुछ नहीं कहा है। इंडिया गठबंधन में शामिल सीपीआई एम ने केरल की चार सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। खास बात है कि चार में राहुल गांधी की वायनाड और पार्टी नेता शशि थरूर की तिरुवनंतपुरम सीट भी शामिल है। सीपीआई ने पार्टी महासचिव डी राजा की पत्नी और वरिष्ठ सीपीआई नेता एनी राजा को वायनाड निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा गया है। हालांकि, इंडिया गठबंधन की तरफ से अभी केरल में सीटों की शेयरिंग को लेकर अभी कोई समझौता सामने नहीं आया है। इस बीच एक घटक की तरफ से उम्मीदवारों की घोषणा को इंडिया गठबंधन में दरार की तरफ भी देखा जा रहा है। वहीं, राजनीतिक के जानकार इसे वाम दलों की तरफ से कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति बताया जा रहा है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग आईयूएमएल की तरफ से मौजूदा दो के बजाय तीन सीटें आवंटित करने के दबाव के बीच गांधी वायनाड निर्वाचन क्षेत्र छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। राहुल गांधी साल 2019 में यूपी की अमेठी के साथ ही केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़े थे। अमेठी में स्मृति ईरानी के हाथों राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। वहीं, वायनाड में राहुल को जीत मिली थी। अब एलडीएफ के उम्मीदवार उतारने के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि राहुल गांधी वायनाड से नहीं लड़ेंगे। सीपीआई ने पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद पन्नियन रवींद्रन को भी तिरुवनंतपुरम से टिकट देने की घोषणा कर दी है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अभी सांसद हैं। में अपने पर्याप्त मुस्लिम मतदाता आधार को देखते हुए, IUML वायनाड से अपना उम्मीदवार खड़ा करना चाहता है।

माना जा रहा है कि राहुल गांधी तेलंगाना के अलावा यूपी की अमेठी या रायबरेली सीट में से किसी एक सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। सोनिया गांधी ने इस बार रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। ऐसे में माना जा रहा है कि राहुल अपने परिवार की पारंपरिक सीट से चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। अमेठी को लेकर खबर है कि राहुल गांधी यहां से चुनाव लड़ने को लेकर उतने उत्साहित नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ चुनाव हारने के बाद राहुल अमेठी में कम दिलचस्पी दिखाई दिखाई है। वहीं, एक चर्चा यह भी है कि यहां से वरुण गांधी भी चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौते में यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है। ऐसे में अगर सहमति बनती है तो आखिरी समय में वरुण गांधी यहां समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं।

राहुल गांधी साल 2019 में यूपी की अमेठी के साथ ही केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़े थे। अमेठी में स्मृति ईरानी के हाथों राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था। वहीं, वायनाड में राहुल को जीत मिली थी। अब एलडीएफ के उम्मीदवार उतारने के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि राहुल गांधी वायनाड से नहीं लड़ेंगे। सीपीआई ने पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद पन्नियन रवींद्रन को भी तिरुवनंतपुरम से टिकट देने की घोषणा कर दी है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अभी सांसद हैं। में अपने पर्याप्त मुस्लिम मतदाता आधार को देखते हुए, IUML वायनाड से अपना उम्मीदवार खड़ा करना चाहता है।सीपीआई ने पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद पन्नियन रवींद्रन को भी तिरुवनंतपुरम से टिकट देने की घोषणा कर दी है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अभी सांसद हैं।