Friday, March 6, 2026
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सांसदों के घूस लेने के बारे में क्या बोला सुप्रीम कोर्ट ?

हाल ही में सांसदों के घूस लेने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने एक बयान दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने वोट के बदले नोट मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में 5 जजों की संविधान पीठ के 1998 वाले फैसले को पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस संबंध में सांसदों को राहत देने पर सहमत नहीं है। शीर्ष अदालत ने कानून के संरक्षण में सांसदों को छूट देने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को घूस की छूट नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सात जजों की संवैधानिक बेंच इस मामले में सुनवाई की। पीठ ने कहा कि वोट के लिए नोट लेने वालों पर केस चलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने सोमवार को 1998 के फैसले को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई के बाद पांच अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने सुनाया फैसला। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 105 या 194 के तहत रिश्वतखोरी को छूट नहीं दी गई है क्योंकि रिश्वतखोरी में लिप्त सदस्य एक आपराधिक कृत्य में लिप्त होता है। पीठ ने कहा कि हम पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले से असहमत हैं। पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले, जो विधायक को वोट देने या भाषण देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से छूट प्रदान करता है, के व्यापक प्रभाव हैं और इसे खारिज कर दिया है। पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने उस मामले में फैसला सुनाया जिसमें सांसदों और विधायकों को सदन में वोट व भाषण के बदले नोट के मामले में केस से छूट है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इस मुद्दे को डील करेंगे कि क्या सांसदों को मिली छूट तब भी जारी रहेगी जब मामला आपराधिक हो? सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिए अपने फैसले में कहा था कि एमपी और एमएलए को सदन में वोट और बयान के बदले कैश के मामले में मुकदमा चलाने से छूट है। सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिए अपने फैसले में कहा था कि एमपी और एमएलए को सदन में वोट और बयान के बदले कैश के मामले में मुकदमा चलाने से छूट थी। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि 1998 का फैसला सांसदों और विधायकों को वोट के बदले नोट और बयान के बदले नोट के मामले में इम्युनिटी प्रदान करता था। लेकिन इसका पब्लिक लाइफ, संसदीय लोकतंत्र और लोकहित पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा था। उक्त फैसले पर दोबारा विचार न किया जाना गंभीर खतरे की ओर ले जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने 1998 के मामले में दिए गए फैसले पर दोबारा विचार किया और फिर फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 2019 में इस मामले को पांच जज को रेफर किया था और कहा था कि यह मामला सार्वजनिक महत्ता और व्यापक प्रभाव का है। इसके बाद मामले को सात जजों की बेंच को रेफर किया गया था। सीता सोरेन की अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा 1998 के फैसले पर विचार करने का फैसला किया था।

सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने कहा था कि वह इस मुद्दे को डील करेंगे कि सांसदों व विधायकों को मिली छूट तब भी जारी रहेगी जब मामला आपराधिक हो? हम पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले से असहमत हैं। पीवी नरसिम्हा मामले में फैसले, जो विधायक को वोट देने या भाषण देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से छूट प्रदान करता है, के व्यापक प्रभाव हैं और इसे खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में सुनवाई के बाद पांच अक्टूबर 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने सुनाया फैसला।पीठ ने कहा कि विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को नष्ट कर देती है।सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण व वोट के बदले नोट के मामले में मुकदमा चलाने से मिली छूट के मामले को दोबारा सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने परीक्षण किया।

क्या राजनीति में आयेंगे कोलकाता के जस्टिस अभिजीत गांगुली?

आज हम आपको बताएंगे कि क्या कोलकाता के जस्टिस अभिजीत गांगुली राजनीति में आएंगे या नहीं! कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस अभिजीत गांगुली ने अपनी न्यायपालिका की नौकरी को अलविदा कह दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में कुछ भी ठीक नहीं है। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के शासन में प. बंगाल अव्यवस्था और अराजकता के भयंकर दौर से गुजर रहा है। हालात ये हो गए हैं कि जज सरकार से संबंधित मामलों की सुनवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं और जो सुनवाई की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर फैसले देते हैं उनके खिलाफ सरकार प्रायोजित हमले होते हैं। जस्टिस गांगुली का कहना है कि टीएमसी नेता टीवी चैनलों पर जाकर उन्हें चुनौते दे रहे थे कि हिम्मत है तो चुनाव अखाड़े में आ जाएं तो उनकी चुनौती स्वीकार है। जस्टिस गांगुली ने ऐलान किया है कि वो राजनीतिक का रुख कर रहे हैं और किसी पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया तो वौ शौक से अपनी किस्मत आजमाएंगे। जस्टिस गांगुली के राजनीति में आने के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं और दावा किया जा रहा है कि आज के दौर में न्यायपालिका का भी राजनीतिकरण हो गया है। तो क्या कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस अभिजीत गांगुली के राजनीति में आने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाएगी? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या अभिजीत गांगुली पहले जज हैं जिन्होंने राजनीति का रुख किया है? वह तारीख 5 सितंबर, 2013 थी जब राज्यसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता अरुण जेटली ने जजों के राजनीति में आने को लेकर ऐसी बातें कही थीं जिनकी नजीर आज भी दी जाती है। उन्होंने कहा था कि जज जो फैसले देते हैं, वो उनकी रिटायरमेंट के बाद नौकरियां पाने की इच्छा के कारण प्रभावित होते हैं। यह न्यायपालिका के स्वतंत्रता के लिए खतरा है। जेटली ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की तरफ से जजों की रिटायरमेंट की उम्र सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लिया था। उन्होंने राज्यसभा में कहा था, ‘मुझे लगता है कि अब हम रिटायरमेंट के बाद जजों को नौकरी देने के मामले में थोड़ा ज्यादा ही आगे चल गए हैं।’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर जबर्दस्त तंज कसा था। उन्होंने कहा कि एक तो सरकारें रिटायर्ड जजों को नौकरी देने का भरपूर प्रयास करती है और अगर सरकारें नहीं करें तो वो खुद अपने लिए व्यवस्था कर लेते हैं। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि केंद्रीय सूचना आयोग के सारे सदस्य रिटायर्ड जज ही होंगे।

अरुण जेटली कानून के जानकार थे और केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके थे। उनके राज्यसभा में दिए इस बयान से स्पष्ट है कि कम-से-कम रिटायरमेंट के बाद तो जजों को अलग-अलग पद ऑफर करने की लंबी परंपरा रही है। जहां तक बात जजों के राजनीति में आने की है तो ऐसे राज्यपालों की लिस्ट अच्छी-खासी है जो पूर्व में जज रह चुके हैं। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस रंजन गोगोई रिटायर हुए तो मौजूदा सरकार ने उन्हें सीधे राज्यसभा के लिए नॉमिनेट कर दिया। इतिहास में न्यायपालिका और राजनीति के बीच सांठगांठ का सिलसिला देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार के दौर से ही शुरू हो गया था। इतिहास में ऐसे वाकये भरे पड़े हैं। आइए एक नजर डालते हैं, नेहरू सरकार ने जस्टिस फजल अली के सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए ही राज्यपाल के रूप में नियुक्ती की घोषणा कर दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के कहने पर जस्टिस फजल अली ने 30 मई, 1952 को जज का पद त्याग दिया और सिर्फ आठ दिन के अंदर 7 जून, 1952 को उड़ीसा के राज्यपाल बन गए।

नेहरू सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमसी चागला को पहले अमेरिका में राजदूत बनाया, फिर यूके का उच्चायुक्त। उसके बाद नेहरू सरकार में वो पहले शिक्षा मंत्री और फिर विदेश मंत्री बनाए गए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बा राव ने 1967 में राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार बनने के लिए पद छोड़ दिया। उन्होंने जज पद से इस्तीफा देने के तीन महीने बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जाकिर हुसैन के खिलाफ ताल ठोंकी थी।अप्रैल, 1962 से 10 साल तक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे थे। फिर उन्हें इंदिरा गांधी सरकार ने दिसंबर, 1980 में सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्त कर दिया। फिर उनके रिटायरमेंट में छह सप्ताह बाकी ही थे कि उन्हें इस्तीफा दिलवा दिया गया और असम चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी उतार दिया गया। इस्लाम ने 13 जनवरी, 1983 को सुप्रीम कोर्ट जज पद से इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन कांग्रेस ने असम के बारपेटा लोकसभा सीट से उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। मजे की बात है कि रिटायरमेंट के चार सप्ताह पहले ही उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को धोखाधड़ी और आपराधिक दुराचार के आरोपों से मुक्त किया था। शिवनंदन पासवान बनाम स्टेट ऑफ बिहार का वह मामला काफी चर्चित रहा। जस्टिस बहारुल इस्लाम से पहले जस्टिस एस हेगड़े भी राज्यसभा सदस्य हुआ करते थे। उन्होंने 1957 में मैसूर हाई कोर्ट का जज बनने के लिए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्ला 1970 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए थे। बाद में वो देश के उप-राष्ट्रपति चुने गए।

बहरहाल, उपर के उदाहरणों से कम-से-कम यह तो कहा ही जा सकता है कि जजों और राजनीति में लाने और यहां तक कि राजनीति से न्यायपालिका में भेजे जाने की पुरानी परंपरा रही है। जस्टिस अभिजीत गांगुली ने अगर रिटायरमेंट ने राजनीति में जाने के लिए पद छोड़ने की घोषणा की तो पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जस्टिस फजल अली को पद पर रहते हुए ही राज्यपाल नियुक्त कर दिया था। इसलिए जहां तक बात जस्टिस गांगुली के जज पद त्यागकर राजनीति में जाने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता घटने का सवाल है तो इसका जवाब आप खुद ढूंढ सकते हैं। हैरानी की बात है कि जब कोई व्यक्ति जज पद पर होते हैं तो उनके पास नेताओं को अदालत में अपने सामने खड़े करने की शक्ति होती है लेकिन राजनीति में जाकर वो खुद उन्हीं नेताओं के मातहत हो जाते हैं। अगर कोई अपनी हैसियत में गिरावट स्वीकार करने को तैयार होता है तो निश्चित रूप से उसके बदले उसे बहुत कुछ हासिल होता होगा। विकसित देशों के मुकाबले भारत में जजों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं बहुत कम हैं। इस कारण जज अपने पद पर होते ही रिटायरमेंट के बाद का भविष्य संजोने में जुट जाते हैं। कुछ का राजनीतिक दलों से सांठगांठ हो जाता है और जो कुछ ऐसा नहीं करना चाहते या चाहकर भी सफल नहीं होते, वो उद्योग जगत में बड़े-बड़े पद पाते हैं। कॉर्पोरेट वर्ल्ड में पूर्व जजों की बड़ी पूछ होती है और वो मोटी तनख्वाह पर कंपनियों को अपनी सेवा देते हैं।

क्या पीएम मोदी के ऊपर परिवार का हमला करके गलत कर बैठे लालू?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी के ऊपर परिवार का हमला करके लालू यादव ने गलती की है या नहीं! आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपने अनोखे अंदाज और बयान के लिए मशहूर रहे हैं। लोगों को रिझाने वाले लटके-झटके तो पहले उनकी साधारण बोलचाल में भी शामिल रहते थे। लंबे समय तक जेल में रहने और स्वास्थ्य बाधा के कारण वे थोड़ा कमजोर पड़े हैं, लेकिन अंदाज वही पुराना है। आरजेडी की जन विश्वास महारैली में लालू प्रसाद यादव ने लागल-लागल झुलनिया के धक्का, बलम कलकत्ता निकल गए सुनाया तो लोग वाह-वाह कर उठे। रैली में शामिल होने आए लोगों का मनोरंजन करने के लिए विधायक आवासों में नर्तक-नर्तकियों का इंतजाम तो था ही। लालू ने नरेंद्र मोदी को मां के निधन पर सिर नहीं मुड़ाने की बात कह उनके हिन्दू न होने का नरेटिव भी दे दिया। देश भर में यह चर्चा का विषय बन गया है। लालू ने यह भी कह दिया कि नरेंद्र मोदी का तो कोई परिवार ही नहीं है। उनके इस बयान को बीजेपी ने भुना लिया है।लालू के इस नरेटिव को नरेंद्र मोदी ने ठीक उसी अंदाज में भुना लिया, जैसा राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ नारे को भुना लिया था। मोदी ने कहा कि लालू ने मेरे परिवार को लेकर मुझ पर निशाना साधा है। पर, अब पूरा देश बोल रहा है- मैं हूं मोदी का परिवार। पीएम मोदी के नारे के बाद तो भाजपा के बड़े नेताओं ने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल में बदलाव करते हुए लिखा- ‘मोदी का परिवार।’ अमित शाह, जेपी नड्डा, नितिन गडकरी जैसे बड़े नेताओं ने सोशल मीडिया के अपने प्रोफाइल में ‘मोदी का परिवार’ लिख कर अपना परिचय संशोधित कर लिया है। भाजपा ने लालू के बयान को भुनाने का अभियान छेड़ दिया है।

लालू यादव ने जन विश्वास रैली में भाषण करते हुए दो तरह की टिप्पणी की थी। पहली यह कि नरेंद्र मोदी हिन्दू नहीं हैं। अपनी मां के निधन पर उन्होंने मुंडन नहीं कराया। ऐसा कहते समय लालू भूल गए कि भौगिलक सीमा बदलते ही हिन्दुओं की कई परंपराएं बदलती रही हैं। बिहार और यूपी जैसे इलाके में परिजन के निधन पर सिर मुंड़ाने की परंपरा है, लेकिन गुजरात में यह परंपरा नहीं है। दक्षिण भारत में भांजी के साथ मामा के ब्याह को शुभ माना जाता है, पर हिन्दी पट्टी में ननिहाल के कुल-गोत्र तक का ख्याल रखा जाता है। लालू ने दूसरी बात यह कही- ‘मोदी क्या है ? मोदी कोई चीज नहीं है। मोदी के पास तो परिवार ही नहीं है। अरे भाई तुम बताओ न कि तुम्हारे परिवार में कोई संतान क्यों नहीं हुआ। ज्यादा संतान होने वाले लोगों को बोलता है कि परिवारवाद है।’ लालू के पहले बयान पर तो भाजपा नेताओं ने न कोई सफाई दी और न इस पर प्रतिक्रिया देना ही उचित समझा। पर, परिवार वाले बयान पर भाजपा नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है।

अब से पांच साल पहले राहुल गांधी ने भी नरेंद्र मोदी के बारे में ‘चौकीदार चोर है’ कह कर नरेटिव गढ़ने की कोशिश की थी। उसके बाद मोदी ने उसे अपने पक्ष में कैसे भुना लिया, यह किसी से छिपा नहीं है। सोशल मीडिया पर ‘मैं भी चौकीदार’ का कैंपेन लोगों ने जबरदस्त ढंग से चलाया था। तब कांग्रेस लोकसभा में दहाई अंकों में सिमट गई थी। लालू के इस बयान का कितना असर होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन मोदी ने इसे अपने पक्ष में भुनाने का अभियान चला कर गोलबंदी का मंच तो खड़ा कर ही दिया है।

लालू ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ बयान देकर 2015 जैसे परिणाम की उम्मीद लोकसभा चुनाव में कर रहे हैं। अगर सच में वे ऐसा सोचते होंगे तो यह उनकी भूल साबित होगी। इसलिए कि यह विधानसभा का चुनाव नहीं है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा या एनडीए को वोट मिलते हैं। लालू ने 2014 और 2019 में यह देखा है। ज्यादा संतान होने वाले लोगों को बोलता है कि परिवारवाद है।’ लालू के पहले बयान पर तो भाजपा नेताओं ने न कोई सफाई दी और न इस पर प्रतिक्रिया देना ही उचित समझा। पर, परिवार वाले बयान पर भाजपा नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है।2015 के विधानसभा चुनाव में लालू ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान को लेकर भ्रम फैला दिया और महागठबंधन की सरकार बन गई थी। नीतीश तब महागठबंधन के साथ नहीं होते तो यह बयान भी शायद कारगर नहीं हो पाता। अगर 2015 जैसा नरेटिव सोच कर लालू ने मोदी के बारे में अपनी बातें कही हैं तो यह उनकी भूल है।

आखिर कैसी चल रही है बड़े मियां छोटे मियां फिल्म की शूटिंग?

आज हम आपके बड़े मियां छोटे मियां फिल्म की शूटिंग के बारे में कुछ जानकारी देने वाले हैं! बॉलिवुड के खिलाड़ी अक्षय कुमार और युवा पीढ़ी के ऐक्शन स्टार टाइगर श्रॉफ इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म के दो गाने टाइटल ट्रैक और डांस नंबर ‘मस्त मलंग झूम’ जारी हो चुका है, जिसमें अक्षय और टाइगर ताल से ताल मिलाते नजर आ रहे हैं। खास बात ये है कि इन गानों को आकर्षक अंदाज देने के लिए अरबी देश जॉर्डन के अलग-अलग शहरों में फिल्माया गया है। जानकारी के मुताबिक, अली अब्बास जफर निर्देशित इस फिल्म के चारों गाने जॉर्डन में फिल्माए गए हैं। इनमें टाइटल ट्रैक अबू धाबी के अलावा जॉर्डन के जेराश शहर में शूट हुआ है। जबकि बाकी गाने अम्मान, अकाबा, वादी रम जैसे शहरों में जनवरी के महीने में शूट हुए। इस दौरान वहां का तापमान दो से तीन डिग्री था। इसके बावजूद अपने ऐक्शन और डांस के लिए मशहूर टाइगर श्रॉफ और अक्षय कुमार ने कोरियोग्राफर जोड़ी बॉस्को-मार्टिस के निर्देशन में ठुमके लगाते दिख रहे हैं। प्रॉडक्शन से जुड़े लोगों ने बताया कि इन गानों की शूटिंग के लिए भारत से समेत 250 लोगों की टीम, जिसमें 100 से ज्यादा डांसर थे, जॉर्डन गई थी। इन गानों का कुछ हिस्सा अम्मान के प्रतिष्ठित रोमन थिएटर में भी फिल्माया गया है। यहां पहली बार कोई शूटिंग हुई, जो वहां के स्थानीय लोगों के लिए भी एक नया अनुभव था। असल में जॉर्डन की राजधानी अम्मान में स्थित यह ओपन थिएटर रोमन काल का बना हुआ है, जहां 6 हजार लोगों के बैठने के लिए सीटें हैं। हालांकि, जॉर्डन में फिल्म निर्माण सीमित होने के चलते वहां लोकल फिल्मों की शूटिंग ना के बराबर होती है, मगर अब वहां का रॉयल फिल्म कमीशन न केवल लोकल कॉन्टेंट क्रिएशन पर जोर दे रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मेकर्स को लुभाने की भी पूरी कोशिश कर रहा है। जॉर्डन सरकार ने अपनी फिल्म इंडस्ट्री ओलिववुड भी स्थापित की है। ऑलिववुड फिल्म स्टूडियो के चेयरमैन रजा गरगौर कहते हैं, ‘बेशक हमारे देश में अभी ज्यादा फिल्में नहीं बन रही हैं, लेकिन हमारे पास इससे जुड़े इक्विपमेंट और प्रशिक्षित तकनीशियन की कोई कमी नहीं है, जिससे यहां शूटिंग करने वालों को सहूलियत होती है।’

हाल के दिनों में हॉलिवुड और बॉलिवुड फिल्ममेकर्स को जॉर्डन शूटिंग के लिए काफी पसंद आ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह वहां जंगल से लेकर ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और समंदर (रेड सी और डेड सी) से लेकर दूर तक फैले रेगिस्तान तक की विविधतापूर्ण लोकेशन का आस-पास होना है।ऑस्कर विनर हॉलिवुड फिल्म ड्यून, अलादीन, स्टार वार्स, मिशन टू मार्स, जॉन विक जैसी चर्चित फिल्में जॉर्डन में शूट की गई हैं। वहीं, भारतीय फिल्मों की बात करें तो बड़े मियां छोटे मियां के अलावा, साउथ के स्टार पृथ्वीराज सुकुमारन की पिछली फिल्म द गोट लाइफ की शूटिंग भी जॉर्डन में हुई थी। इसके अलावा, ओटीटी की कुछ वेब सीरीज में भी इस देश के नजारे दिखाई देंगे। जॉर्डन रॉयल फिल्म कमीशन के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहम्मद अल बाकरी कहते हैं, ‘जॉर्डन की इतनी विविधता वाले लोकेशन हैं, एक तरफ अफ्रीका जैसे दिखने वाले रेगिस्तान तो दूसरी तरफ दूर तक फैले जंगल, फिर यहां एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए फ्लाइट की जरूरत नहीं है। आप कुछ घंटों में एक लोकेशन से दूसरी लोकेशन तक पहुंच सकते हैं। साथ ही यहां हेलिकॉप्टर से लेकर मिलिट्री टैंक और हर तरह के हथियार किराए पर मिल जाते हैं। इसके लिए हमारी मिलिट्री हमें सपोर्ट करती है। वहीं, जॉर्डन की ओर फिल्ममेकर्स की बढ़ती रुचि की एक और वजह यहां मिलने वाली सब्सिडी भी है। यहां शूटिंग करने वाले मेकर्स को टैक्स पर 10 पर्सेंट छूट दी जाती है। साथ ही 16 पर्सेंट वैट भी तुरंत माफ किया जाता है। इसके अलावा, शूटिंग की लागत के हिसाब से कैशबैक की सहूलियत भी है। मेकर्स की सहूलियत के लिए वन विंडो क्लीयरेंस की सुविधा भी है। इन वजहों से हाल के दिनों में हॉलिवुड और बॉलिवुड की फिल्मों और सीरीज की शूटिंग यहां बढ़ी है।’

ऑस्कर विनर हॉलिवुड फिल्म ड्यून, अलादीन, स्टार वार्स, मिशन टू मार्स, जॉन विक जैसी चर्चित फिल्में जॉर्डन में शूट की गई हैं। वहीं, भारतीय फिल्मों की बात करें तो बड़े मियां छोटे मियां के अलावा, साउथ के स्टार पृथ्वीराज सुकुमारन की पिछली फिल्म द गोट लाइफ की शूटिंग भी जॉर्डन में हुई थी। इसके अलावा, ओटीटी की कुछ वेब सीरीज में भी इस देश के नजारे दिखाई देंगे।

क्या एमएसपी जरूरी है या गैर जरूरी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एमएसपी जरूरी है या गैर जरूरी! MSP का मतलब न्यूनतम समर्थन मूल्य है। यह किसानों के हित के लिए सरकार की ओर से बनाई गई व्यवस्था है। इसके तहत सरकार फसल की एक न्यूनतम कीमत तय करती है। अगर बाज़ार में फसलों के दाम कम भी हो जाएं, तो किसान आश्वस्त रहता है कि उसकी फसल सरकार कम से कम इस कीमत पर ज़रूर खरीद लेगी। कुल मिलाकर MSP कृषि उत्पादन को सुरक्षित करने और किसानों के जीवन को सुधारने के लिए कृषि व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। बात 1930 के दशक की है। उस दौरान अमेरिका में मंदी के हालात थे। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट ने किसानों को सहारा देने के लिए प्राइस सपोर्ट पॉलिसी बनाई। उस समय पूरी अर्थव्यवस्था को मंदी की स्थिति से बाहर लाने के लिए जो नीति बनी थी, उसका नाम था न्यू डील पॉलिसी और प्राइस सपोर्ट पॉलिसी उसका ही एक हिस्सा था। प्राइस सपोर्ट पॉलिसी की अमेरिका को उस दौर में मंदी से उबारने में बड़ी भूमिका रही। उसके बाद दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों ने इसे अपनाया है। चीन में यह काफी कारगर भी साबित हुई।

भारत जब आज़ाद हुआ तो खाद्यान्न का संकट भी उतना ही बड़ा था, जितना बड़ा संकट बंटवारे के बाद जनसंख्या के अदल-बदल का। उस दौर में 1951 से लेकर 1965 तक भारत अमेरिका से खाद्यान्न के आयात पर निर्भर रहा। 1965 में जब भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ तो अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा था और भारत के संबंध रूस के साथ थे। यह बात अमेरिका को नागवार गुज़री और नाराज़गी में उसने भारत को राशन की सप्लाई बंद कर दी। उस दौरान खाद्यान्न का भयंकर संकट आया, जिसे देश में 1965 का अकाल कहा जाता है। संयोग से उस साल मॉनसून ने भी भारत का साथ नहीं दिया। उसी दौर में बाबा नार्गाजुन ने कविता लिखी थी कि ‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास’….। स्थिति ऐसी बनी कि खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन गया। तब तक जापान और फिलिपींस आदि देशों से धान-गेहूं के फसल की बोनी किस्में आ चुकी थीं। इसी स्थिति में भारत में पहली बार MSP का कांसेप्ट साल 1965-1966 में सामने आया। उस समय इसका मकसद उत्पादन बढ़ाना और उसका भंडारण कर जन वितरण प्रणाली के तहत गरीबों तक राशन पहुंचाना था। इसी दौरान FCI भारतीय खाद्य निगम भी बना और यही हरित क्रांति का भी दौर कहा जाता है। हरित क्रांति के लिए हाल ही में भारत सरकार ने एम.एस.स्वामीनाथन को भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

फिलहाल सरकार 23 फसलों के लिए MSP तय करती है। इनमें अनाज और दलहन शामिल हैं। लेकिन MSP पर कानून नहीं होने की वजह से यह पूरे देश में सही ढंग से लागू नहीं हो पाता है। सरकार रवि और खरीफ की फसलों की बुआई से पहले, जिन फसलों पर MSP दी जानी है, उसकी पूरी लिस्ट जारी करती है। पहली लिस्ट जून-जुलाई और दूसरी लिस्ट नवम्बर दिसम्बर में जारी की जाती है। केंद्र सरकार फसलों पर MSP लागू करती है और राज्य सरकारों के पास भी MSP लागू करने का अधिकार है। केंद्र सरकार ने किसानों की फसलों को सही कीमत दिए जाने के लिए साल 1965 में कृषि लागत और मूल्य आयोग यानी CACP का गठन किया था। यह हर साल रबी और खरीफ फसलों के लिए MSP तय करती है। पहली बार 1966-67 में MSP की दर लागू की गई थी। CACP की ओर से की जाने वाली सिफारिशों के आधार पर ही सरकार हर साल 23 फसलों के लिए MSP का ऐलान करती है। हालांकि CACP को कृषि मंत्रालय का ही एक हिस्सा माना जाता है। केंद्र और राज्य सरकार ही सरकारें फसल की जब भी खरीद करती हैं तो उन्हें MSP देना ही पड़ता है।

जब पहली बार MSP का कांसेप्ट आया था तो उस दौरान सिर्फ धान और गेहूं ही MSP के दायरे में आते थे। बाद में गन्ना और कपास पर भी MSP में शामिल किया गया। 1986 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त मंत्री थे तो उस दौरान 22 फसलों पर MSP की घोषणा की गई थी। उस नीति का नाम था ‘दीर्घकालीन कृषि मूल्य नीति’। लेकिन गेहूं, धान, कपास और गन्ना पर किसानों को MSP कुछ राज्यों में ही मिलता रहा है। पंजाब और हरियाणा में ही MSP प्रभावी ढंग से लागू हो पाया। लेकिन MSP के आने के बाद से ही इसे प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग उठती रही।

क्या है स्वामी स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश? जिसे लोग आज स्वामीनाथन आयोग के नाम से जानते हैं, उसका नाम है राष्ट्रीय किसान आयोग। इसके पहले अध्यक्ष थे BJP सरकार के पूर्व कृषि राज्य मंत्री सोमपाल शास्त्री। लेकिन 2004 में जब BJP लोकसभा का चुनाव हार गई तो जून में इसका पुनर्गठन किया गया और इसके अध्यक्ष बने एम. एस. स्वामीनाथन। इस आयोग ने सैकड़ों सिफारिशें की, जिसमें दो ही अहम सिफारिशें थीं। पहला था किसानों को अल्पकालीन लोन दिया जाना और दूसरा संपूर्ण लागत जिसमें किसानों की फैमिली लेबर और ज़मीन का किराया भी शामिल है से 50 फीसदी ज़्यादा MSP तय की जाए। इसके बाद से ही किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार MSP दिए जाने की मांग करने लगे! यह जानना बहुत ज़रूरी है कि अगर MSP है तो किसान मांग किस चीज़ की कर रहे हैं क्योंकि MSP तो कोई नई चीज़ है नहीं। फिलहाल MSP कृषि मंत्रालय की एक व्यवस्था है, किसान इसकी लीगल गारंटी मांग रहे हैं। इसके तहत MSP एक कानून बन जाए। जैसे भारत में मनरेगा कानून है लेकिन MSP कानून नहीं है। किसानों की मांग है कि अगर MSP कानून बन जाता है और उसके बाद MSP से कम कीमत पर कोई फसल खरीदता है तो उसके ऊपर FIR दर्ज हो और वह अपराधी माना जाए। दूसरी सबसे बड़ी मांग है कि स्वामीनाथन आयोग के सिफारिशों के अनुसार ही MSP लागू की जाए।

किसानों की पूरी उपज सरकार MSP पर खरीदे तो उसे सालाना करीब 10 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अभी तक यह खर्च 2 लाख 28 करोड़ का है। ऐसा अनुमान बताया जा रहा है। इसकी वजह से देश के राजकीय कोष पर बड़ा दबाव बनेगा।

अगर MSP पर खरीद का कानून बनता है तो अचानक देश में महंगाई बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर आम लोगों को पड़ेगा।

देश अब खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है। इसलिए इसकी भूमिका खत्म हो चुकी है। ये व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं चल सकती । उस दौर में देश की परिस्थितियां अलग थीं।

देश में ज़रूरत से ज़्यादा अनाज का भंडार है और रखने की जगह की कमी होने की वजह से बड़ी मात्रा में अनाज खराब हो जाता है। इसकी वजह से भंडारण की व्यवस्था किए बगैर MSP की कानूनी गारंटी देना मुश्किल है।

उस वक्त सरकार ने किसानों को ज्यादा फसल पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के कदम के तौर MSP की व्यवस्था लागू की थी। अब ‘फूड सरप्लस’ का दौर है और MSP की ज़रूरत खत्म हो गई है।

इसकी वजह से बाजार की स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ सकता है। यह बाजार को असंतुलन की दिशा में ले जा सकता है और बाजार की दरों प्रभावित करेगा। 7- MSP किसानों को लगातार निरंतर एक ही फसल की खेती के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इससे भूमि का उपयोग असंतुलित हो सकता है और पर्यावरणीय प्रभाव पैदा हो सकता है।

क्या बीजेपी की जारी की गई लिस्ट से बदलेगा चुनावी समीकरण?

यह सवाल उसने लाजमी है कि क्या बीजेपी की जारी की गई लिस्ट से चुनावी समीकरण बदलेगा या नहीं! लोकसभा चुनाव 2024 के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों के नाम पर फैसला लेना शुरू कर दिया है। पार्टी ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है। 16 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेशों की 195 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी गई है। इसमें सबसे अधिक उत्तर प्रदेश की 51 सीटें शामिल हैं। यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं। इसमें से 51 पर उम्मीदवार के नाम तय कर दिए गए हैं। पार्टी के शीर्ष नेता पीएम नरेंद्र मोदी यूपी की वाराणसी लोकसभा सीट से तीसरी बार चुनावी मैदान में उतरेंगे। पार्टी बची 29 सीटों पर गठबंधन के फाइनल होने के बाद नामों का ऐलान कर सकती है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल सोनेलाल और निषाद पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन है। माना जा रहा है कि गठबंधन के तहत भाजपा 5 से 6 सीटों पर सहयोगी दल को उतार सकती है। इसमें राष्ट्रीय लोक दल को दो, अपना दल एस को दो और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को एक सीट देने की तैयारी है। भाजपा की पहली लिस्ट में निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को टिकट दिया जा चुका है। साथ ही, इस सूची में उन 9 सीटों पर भी उम्मीदवार दिए गए हैं, जहां पिछली बार भाजपा को हार झेलनी पड़ी थी। भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव को लेकर मिशन- 80 लक्ष्य तय किया है। पार्टी लोकसभा चुनाव में हर सीट के लिए अलग समीकरण के साथ चुनावी मैदान में उतर रही है। पार्टी के रणनीतिकारों ने जीत का गणित तैयार किया है। इसके लिए तमाम सीटों पर गुणा- गणित कर उम्मीदवारों को निर्धारित किया गया है। बीजेपी यूपी में क्लीन स्वीप का टारगेट लेकर चल रही है। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि पार्टी ने जिन उम्मीदवारों के नाम तय किए गए हैं, उसमें अधिकतर पुराने चेहरे हैं। पार्टी ने 2019 में हरी लोकसभा सीटों को एक बार फिर जीतने के लिए बड़ा दांव खेल है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर पिछले चुनाव में हारी 16 में से 9 सीटों पर भाजपा ने प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया है। इसमें रामपुर और आजमगढ़ की सीट भी शामिल है, जो उप चुनाव में बीजेपी के पाले में आ गई थी।

अमरोहा लोकसभा सीट पर 2014 में सांसद रहे कंवर सिंह तंवर पर भाजपा ने फिर भरोसा जताया है। अमरोहा से 2019 में बसपा के टिकट पर दानिश अली जीते। उन्हें सपा- बसपा समीकरण का लाभ मिला था। इस बार अमरोहा सीट कांग्रेस के पाले में गई है। ऐसे में गुर्जर वोटों के समीकरण को देखते हुए भाजपा ने कंवर सिंह तंवर पर भरोसा जताया है। संभल लोकसभा सीट पर भाजपा ने जीत का गणित बनाना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों सपा सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क के निधन के बाद सपा उनके ही परिवार को टिकट दे सकती है। पहले ही पार्टी ने डॉ. बर्क को उम्मीदवार घोषित कर दिया था। वहीं, भाजपा ने यहां से परमेश्वर सैनी को चुनावी मैदान में उतार दिया है. 2014 में मुस्लिम बहुल सीट से सत्यपाल सैनी जीतने में सफल रहे थे। एक बार फिर समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा सैनी पर दांव खेल रही है। हालांकि, उम्मीदवार का चेहरा बदल दिया गया है।

जौनपुर सीट से भारतीय जनता पार्टी ने कृपा शंकर सिंह को प्रत्याशी बनाया है। लोकसभा चुनाव में सपा- बसपा गठबंधन के तहत यह सीट बसपा के पास गई थी। बसपा के श्याम सिंह यादव जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। इस बार श्याम सिंह यादव का टिकट कटना तय है। श्याम सिंह यादव पिछले दिनों कांग्रेस के संपर्क में थे। लेकिन, सपा- कांग्रेस गठबंधन के तहत यह सीट सपा के पास चली गई है। ऐसे में सपा को उम्मीदवार तय करना है। भाजपा ने अपना पत्ता खोल दिया है। कृपा शंकर सिंह जौनपुर के रहने वाले हैं, लेकिन मुंबई में अभी तक राजनीति करते रहे हैं। कांग्रेस की सरकार में महाराष्ट्र के गृह मंत्री रह चुके हैं। 2019 के बाद भाजपा में शामिल हुए। अब भाजपा ने उनके गृह जिले से प्रत्याशी घोषित कर दिया है।

लोकसभा चुनाव 2019 में श्रावस्ती सीट भाजपा के हाथों से चली गई थी। बसपा के शिरोमणि वर्मा ने यहां से जीत दर्ज की थी। इस बार सपा- बसपा गठबंधन नहीं है। ऐसे में भाजपा ने यहां से नृपेंद्र मिश्रा के बेटे साकेत मिश्रा को चुनावी मैदान में उतारा है। नृपेंद्र मिश्रा प्रधानमंत्री के सचिव रह चुके हैं और राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। साकेत मिश्रा काफी समय से श्रावस्ती क्षेत्र में सक्रिय थे, इसको देखते हुए बीजेपी ने दांव खेल दिया है। लालगंज सुरक्षित लोकसभा सीट पर अभी बहुजन समाज पार्टी का कब्जा है। सपा- बसपा गठबंधन के कारण राजनीतिक समीकरण बसपा की संगीता आजाद के पक्ष में चला गया है। उनके बीजेपी में जाने की चर्चा चल रही थी। हालांकि, पार्टी ने नीलम सोनकर पर दांव खेला है। नीलम सोनकर दलित समाज के बीच अपनी पकड़ को बढ़ाकर इस सीट पर जीत का समीकरण तलाश सकती हैं।

रामपुर लोकसभा सीट पर लोकसभा चुनाव 2019 में सपा के मोहम्मद आजम खान ने जीत दर्ज की थी। यूपी चुनाव 2022 में रामपुर से विधायकी जीतने के बाद आजम खान ने संसद सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया। लोकसभा उप चुनाव 2022 में भाजपा के घनश्याम लोधी ने मुस्लिम बहुल सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। इस प्रकार आजम खान और सपा के गढ़ पर भगवा झंडा फहरा दिया गया। एक बार फिर भाजपा ने घनश्याम लोधी पर अपना भरोसा जताया है। उन्होंने अपनी चुनावी तैयारी भी शुरू कर दी है। लोकसभा चुनाव में 16 सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। इसमें से 9 पर तो उम्मीदवार घोषित कर दिए गए हैं। लेकिन, सात सीटों पर घोषणा होनी बाकी है। इसमें मैनपुरी, सहारनपुर, गाजीपुर, मुरादाबाद, रायबरेली, बिजनौर और घोसी लोकसभा सीट शामिल है। माना जा रहा है कि घोसी सीट भाजपा अपने सहयोगी ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और बिजनौर सीट आरएलडी को दे सकती है। 2019 में सपा- बसपा के गठबंधन के कारण बदले सामाजिक समीकरण का लाभ महागठबंधन के उम्मीदवारों को हो गया था। इस बार भाजपा ने अलग रणनीति के साथ चुनाव में उम्मीदवारों का ऐलान कर पहले से ही माहौल को बेहतर बनाने की योजना तैयार की है। पार्टी के रणनीतिकार इसका फायदा चुनावों में मिलने की बात कर रहे हैं।

जब जन्मो जन्मो तक पंकज उदास को किया जाएगा याद!

मशहूर संगीतकार पंकज उदास को जन्मो जन्मो तक याद किया जाएगा! सात समुंदर पार गया तू, हमको ज़िंदा मार गया तू, दिल के रिश्ते तोड़ गया तू, आंख में आंसू छोड़ गया तू, ‘, कभी अपने सुपरहिट गाने चिट्ठी आई है… के इन बोलों से लोगों की आंखें नम करने वाले गजल गायिकी के सरताज पंकज उधास ने सोमवार को अपने चाहने वालों को यही पंक्तियां दोहराने पर मजबूर कर दिया। संगीत की दुनिया को अपनी आवाज से ‘धनवान’ बनाने वाले पद्मश्री पंकज उधास सोमवार को दुनिया को अलविदा कह गए और पीछे छोड़ गए अपनी सदाबहार ग़ज़लों की सुरीली विरासत। अभी पिछले साल की तो बात थी। अपनी आवाज से वक्त को थाम देने वाले पंकज उधास राजधानी के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में जनता की मांग पर गा रहे थे- चिट्ठी आई है… और जैसे-जैसे वे आगे ‘बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद, वतन की मिट्टी आई है’, ‘ऊपर मेरा नाम लिखा है, अंदर ये पैगाम लिखा है’, ‘ओ परदेस को जाने वाले, लौट के फिर ना आने वाले…’ की ओर बढ़े, ऑडिटोरियम में सन्नाटा छा गया। कहीं सिसकियां भी सुनाई देने लगीं। ये जादू था, ग़ज़ल गायिकी को नया मुकाम देने वाले जादुई आवाज के मालिक पंकज उधास का। फिर, ये कोई एक गाने या एक कॉन्सर्ट की बात नहीं थी, उनके हर परफॉर्मेंस के बाद उनकी आवाज का नशा लोगों पर यूं ही देर तक रहता। हर कोई उनके गाने गुनगुनाता हुआ ही बाहर आता लेकिन सोमवार को यह मखमली आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई।

ग़ज़ल गायिकी के सरताज कहे जाने वाले पद्मश्री पंकज उधास सोमवार को 72 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए और अपने चाहने वालों को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि ‘जिए तो जिए कैसे बिन आपके’। वह लंबे समय से बीमार थे और मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थे। बताया जा रहा है कि कुछ महीने पहले उन्हें कैंसर डिटेक्ट हुआ था। उनकी बेटी नायाब ने ट्वीट करके उनके निधन की जानकारी दी। उन्होंने लिखा, ‘बहुत भारी मन से, हम आपको लंबी बीमारी के कारण 26 फरवरी, 2024 को पद्मश्री पंकज उधास के दुखद निधन के बारे में सूचित करते हुए दुखी हैं।’

पंकज उधास का जन्म 17 मई 1951 को गुजरात के जेतपुर में हुआ था। संगीत का शौक उन्हें विरासत में मिला था, क्योंकि उनके पिता को संगीत में रुचि थी और उन्होंने शास्त्रीय वाद्ययंत्र दिलरुबा/इसराज सीखा था। इसी के चलते उन्होंने अपने तीनों बेटों मनहर, निर्मल और पंकज उधास को राजकोट संगीत अकादमी में दाखिल करवा दिया था। यहीं तबला सीखने गए पंकज उधास ने शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। कहा जाता है कि पंकज उधास ने अपनी पहली स्टेज परफॉर्मेंस भारत-चीन युद्ध के दौरान दी थी। तब उन्होंने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाया था, जिसके लिए ऑडियंस में से किसी ने उन्हें 51 रुपये का इनाम दिया था। जबकि फिल्मी गायिकी की शुरुआत उन्होंने 1970 में आई फिल्म ‘तुम हसीन मैं जवान’ के गाने ‘मुन्ने की अम्मा ये तो बता’ से की थी। खास बात ये थे कि अपना पहला ही गाना उन्होंने लेजेंडरी किशोर कुमार के साथ गाया था। लेकिन इसके बाद उन्होंने सोलो शुरुआत 1980 में अपनी गज़ल ‘अलबम’ आहट जारी करके की। इसके बाद 1981 में ‘मुकर्रर’, 1982 में ‘तरन्नुम’, 1983 में ‘महफिल’ जैसी ग़ज़लों की एलबम ने उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली। लेकिन 1986 में आई महेश भट्ट की फिल्म नाम के लोकप्रिय गाने चिट्ठी आई है से तो उन्होंने जो नाम कमाया कि फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

संगीत के प्रति अपने अद्भुत योगदान के लिए पद्मश्री समेत कई सम्मान से नवाजे जा चुके पंकज उधास अपनी बीमारी के कुछ महीने पहले तक मंच पर सक्रिय थे। पिछले साल भी वह दिल्ली, मुंबई, पुणे, चेन्नै जैसे कई शहरों में कॉन्सर्ट करते हुए नजर आए। ऐसे में, उनके अचानक निधन से पूरा फिल्म और संगीत जगत सन्न है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ समेत अनूप जलोटा, सोनू निगम आदि ने भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

उनके निधन पर बॉलीवुड और संगीत जगत के सितारे श्रद्धांजलि देते हुए उनके लिए दर्द भी जता रहे हैं। सोनू निगम ने कहा, ‘मेरे बचपन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आज खो गया है। श्री पंकज उधास जी, मैं आपको हमेशा याद करूंगा। यह जानकर मेरा दिल रो रहा है कि आप नहीं रहे। वहां होने के लिए आपका शुक्रिया। ओम शांति।’ अनूप जलोटा ने लिखा है, ‘स्तब्ध करने वाला… संगीत जगत के दिग्गज और मेरे मित्र पंकज उधास का निधन। हम इस कठिन समय में उनके परिवार और प्रियजनों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं।’

क्या अंतिम संस्कार के समय भी सेल्फी ले लेते हैं लोग? कैसी है मर्मता?

वर्तमान में अंतिम संस्कार के समय भी लोग सेल्फी ले लेते हैं! पता नहीं यह कैसी मर्मता है! अपने ही अंतिम संस्कार से डर रहीं हूं। मैं जानती हूं कि मैं कुछ भी नहीं हूं लेकिन आजकल तो किसी को भी नहीं बख्शा जाता। यदि कोई उनके अंतिम संस्कार में कोई शामिल होता है तो ऐसा ही होता है। उस समय जब अलग-अलग शोक मनाने वालों के साथ अंतिम संस्कार का जत्था श्मशान की ओर जा रहा हो, तो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के साथ सेल्फी लेने का महत्वपूर्ण अवसर कोई क्यों चूकें? हमारे पास पहले से ही किसी भी सेलिब्रिटी को देखने और मौके की ताक में बैठे भूखे पैपराजी की पूरी सेना है। जल्द ही, विभिन्न शमशान घाटों पर विशेष ‘अंतिम दर्शन’ फोटोग्राफरों की एक टीम तैनात की जाएगी। ऐसे डिजाइनर/स्टाइलिस्ट जो ‘एयरपोर्ट लुक’ और रेड-कार्पेट पर जाने से पहले मेकअप करते हैं, उन्हें फैशन परस्त लोगों के लिए ‘अंतिम संस्कार लुक’ शामिल करने के लिए सर्विस देनी पड़ेगी। अब लोग हाई प्रोफाइल अंतिम संस्कार के आखिरी मिनट में अधिक दिखावा करने के लिए ब्लो ड्राई और मैनीक्योर करवाने के लिए दौड़ते हैं। मनहूस विचार मेरे मन में तब उठे जब मैंने मशहूर गजल गायक पंकज उधास के शव की पहली तस्वीर खींचने के लिए अनियंत्रित फोटोग्राफरों की अति-उत्साही भीड़ को देखा। उस समय एम्बुलेंस के दरवाजे खुले और शोक संतप्त रिश्तेदार हाथापाई में एक तरफ खिसक गए। इसके बाद गजल उस्ताद के दोस्तों और सहकर्मियों के इंटरव्यू हुए। वो भी उसस समय जब वे उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए इकट्ठा हुए थे। राजकीय अंत्येष्टि के साथ राजसी विदाई में गायक के झंडे में लिपटे शरीर के चारों ओर मंडराने वाले और अक्सर उसके चेहरे पर बंद होने वाले कैमरों ने खलल डाला। वहां अन्य, समान रूप से आक्रामक क्लिप थे जिसमें उनकी शोकाकुल पत्नी की यात्रा के पीछे अस्थिर रूप से चल रही थी। कवरेज बेदम और बेहूदा था क्योंकि करीबी दोस्तों को घेर लिया गया। उन्होंने बिल्कुल साधारण सा सवाल पूछा: अभी आप कैसा महसूस कर रहे हैं? आपके क्या विचार हैं? आप उन्हें कितने करीब से जानते थे? अधिकांश को सरेंडर करने के लिए मजबूर किया गया। उनके शब्दों को दबाते हुए जवाब देने के लिए मजबूर किया गया। एक मिनट भी बर्बाद नहीं हुआ क्योंकि प्रशंसकों ने मशहूर हस्तियों के ताजा अपडेट और पोस्ट देखे। इसमें हम सब सहभागी थे!

हाल ही में तीन हाई-प्रोफाइल मौतें हुईं – प्रख्यात न्यायविद् फली नरीमन, ‘रेडियो सम्राट’ अमीन सयानी और पंकज उधास। इन तीनों को देश भर में बहुत प्यार मिला। इन लोगों के हजारों लोग प्रशंसक थे। उनका जीवन जनता की नजरों में बीता। उनका निधन एक बहुत बड़ा खालीपन छोड़ गया। हालांकि, वे मृत्यु में गोपनीयता के हकदार थे। पीड़ित परिवार के सदस्यों के लिए यह सबसे दुखद घड़ी थी लेकिन सार्वजनिक जांच का स्तर इतना अतिरंजित है कि यह किसी को भी नहीं बख्शता। औचित्य को नुकसान पहुंचता है। हम गोपनीयता के इस घोर उल्लंघन के इतने आदी हो गए हैं कि हम अब इस पर रिएक्ट नहीं करते हैं कि ऐसा आचरण कितना घृणित है। खासकर प्रार्थना में लीन परिवार के सदस्यों के प्रति। कोई यह तर्क दे सकता है कि यह एक मानक अंतरराष्ट्रीय खतरा है – जहां एक सेलेब की लाश है, वहां फोटोग्राफर फीड लेने के लिए पागल होगा। ऐसे में एक अंतिम दर्शन का अंतिम सर्कस में बदलना सबसे खराब मजाक है!

अक्सर, लोगों को मृत व्यक्ति की महानता के बारे में पता भी नहीं होता है। वे केवल अंतिम संस्कार से जुड़ी हर सूक्ष्म जानकारी को रिकॉर्ड करने के लिए मौजूद हैं – कौन आया, कौन नहीं आया, महिलाओं ने क्या पहना था। हे भगवान, मृतकों को कोई राहत नहीं। शायद, मीडिया वालों को यह याद दिलाने के लिए एक बुनियादी नियम पुस्तिका की आवश्यकता है कि वे दाह-संस्कार जैसे दुखद, बेहद व्यक्तिगत क्षणों में अपना काम करते समय थोड़ा संयम और विवेक बरतें। ऐसे समय में जहां परिवार केवल एक चीज चाहता है, वह है कुछ एकांत स्थान जो उसके लिए बहुत जरूरी है। किसी प्रिय सदस्य के शोक में शांति चाहता है। किसी सार्वजनिक श्रद्धांजलि समारोह में कंबल ओढ़ाना ठीक है। यह आम तौर पर सभी के लिए होता है। इसे अंतिम अलविदा कहने का एक औपचारिक अवसर माना जाता है। ऐसी कई वेबसाइटें हैं जो बढ़ती अंतर-सांस्कृतिक दुनिया में अंत्येष्टि पर सम्मान देने के तरीके के बारे में सुझाव देती हैं। वे हमें सहानुभूति और समझ का प्रदर्शन करते हुए संवेदनशील और अक्सर विदेशी रीति-रिवाजों से निपटना सिखाते हैं।

अधिकांश पश्चिमी संस्कृतियों में शोक का रंग काला है, जबकि भारत और चीन में सफेद रंग प्रमुख है। हम अपने साथ उपहार नहीं, बल्कि माला-फूल लेकर आते हैं। मतभेद चाहे कितने भी हों, एक बात समान है वो है सम्मान। लेकिन ऐसे कठिन दौर में जो बात अक्सर भुला दी जाती है वह है निजता का अधिकार। खासकर जब बात तस्वीरें या वीडियो क्लिक करने और उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर करने की आती हो। एक सार्वजनिक हस्ती जो अब नहीं है, इस तरह के कवरेज के बारे में कुछ नहीं कर सकता है, सिवाय इसके कि उसने अपने उत्तराधिकारियों को विशेष रूप से इसे पूरी तरह से निजी रखने और मीडिया की पहुंच को प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया हो। एक बार गोपनीयता का बांध टूट गया तो बाढ़ को कोई नहीं रोक सकता। लेकिन क्या हम कृपया अंतिम दर्शन को तमाशा कम और गरिमापूर्ण विदाई अधिक बना सकते हैं!

क्या भारत में बदल चुकी है मुसलमान की पॉलिटिक्स?

वर्तमान में भारत में मुसलमान की पॉलिटिक्स बदल चुकी है! देश में लोकसभा चुनाव को लेकर माहौल गर्म है। बीजेपी, कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारी तेज कर दी है। दिग्गज नेताओं ने चुनावी सभाओं के जरिए जनता से सीधा संवाद भी शुरू कर दिया है। लेकिन इस बार मुस्लिम वोटरों को लेकर कुछ अलग माहौल देखने को मिल रहा है। मुस्लिम वोटर किसी उलेमा या मुस्लिम धर्मगुरु के कहने पर वोट देने के मूड में नहीं लग रहा है। मुस्लिम युवा, महिला और बुजुर्ग वोटर सियासत की राह पर अपनी अलग-अलग सोच के साथ आगे बढ़ रहा है। यहां उस दौर का जिक्र करना बेहद जरूरी है, जब मुस्लिम मतदाता किसी उलेमा या धार्मिक गुरु के कहने पर थोक में मतदान करता था। 1980 के आम चुनाव से पहले, सत्ता से हटाई गईं इंदिरा गांधी काफी परेशान थीं। एक मौलाना ने उन्हें 350 से ज्यादा सीटों की जीत का भरोसा दिलाया, लेकिन इसके लिए एक शर्त थी। उन्हें जीत के बाद तुरंत मौलाना को बुलाना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ महीनों बाद, उनके बेटे संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। बाद में, डिप्रेशन में चली गईं इंदिरा गांधी ने मौलाना को वापस बुलाया। मौलाना ने उनसे पूछा कि उन्होंने कमरे में लगाए गए ताबीज को हटाने के लिए उन्हें क्यों नहीं बुलाया। उन्होंने इंदिरा गांधी को चेतावनी दी कि उन्हें तुरंत नमाज पढ़कर गलती सुधारनी होगी। डरी हुई इंदिरा गांधी ने ऐसा ही किया। यह कहानी उलेमाओं (मुस्लिम धर्मगुरुओं) के बीच प्रचलित है और वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई की किताब ‘लीडर्स, पॉलिटिशियन्स, सिटिजंस’ में विस्तार से बताई गई है। यह कहानी इस बात को दर्शाती है कि आजादी के बाद से दशकों तक भारत के मुख्यधारा के राजनेताओं और उलेमाओं के बीच कैसा जटिल रिश्ता रहा है। आमतौर पर, उलेमा द्वारा जारी किए जाने वाले फतवों के आधार पर इस रिश्ते को समझने की कोशिश की जाती है।

1980 के दशक से, दिल्ली के शाही इमाम के प्रसिद्ध फतवों ने लोगों के मन में यह छवि बनाई है कि उलेमा मुसलमानों को किसी खास पार्टी को वोट देने के लिए उकसाते हैं। लेकिन, असलियत में उलेमाओं का राजनीतिज्ञों और राजनीतिक दलों के साथ संबंध और भारत के लगभग 20 करोड़ मुस्लिम समुदाय के वोटों पर उनके प्रभाव की कहानी, राजनीतिक फतवों से कहीं ज्यादा जटिल है। राजनीति विज्ञान के जानकार हिलाल अहमद का कहना है कि भारत के मुस्लिम समुदाय के बारे में सबसे बड़ा मिथक यह है कि हर चुनाव में उनके वोट को फतवों और उलेमाओं के आह्वान से प्रभावित किया जाता है। लेकिन यह सिर्फ एक मिथक है। चुनाव दर चुनाव, ‘मुस्लिम वोट बैंक’ के मिथक को बढ़ावा दिया गया है, जिसके अनुसार पूरे देश में मुसलमान एकजुट होकर एक ही समुदाय के रूप में वोट करते हैं। उलेमा, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से अपने स्वयं के राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए, विभिन्न मतों के बीच प्रतिद्वंद्विता के लिए, या सिर्फ राजनीतिक संरक्षण के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन किया है, उन्हें इस ‘मुस्लिम वोटबैंक’ का मुख्य संचालक माना जाता था। लेकिन पिछले 10 वर्षों के मोदी शासन में मुस्लिम राजनीति में मूलभूत रूप से बदलाव आया है और उलेमाओं की भूमिका में भी बदलाव देखने को मिल रहा है।

कुछ साल पहले तक, उलेमा सम्मानित लोग हुआ करते थे। हर नेता – प्रधानमंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों और स्थानीय विधायकों तक, चुनाव से पहले उनके साथ दिखना चाहता था। उम्मीद थी कि ये धर्मगुरु अपने अनुयायियों के सामने पार्टी या उम्मीदवार के बारे में कुछ अच्छा कहेंगे। अब भी राजनीतिक दल चाहते हैं कि मुस्लिम धर्मगुरु उनके लिए चुपके से प्रचार करें, लेकिन उनके साथ सार्वजनिक रूप से दिखना नहीं चाहते। जैसा कि लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फरंगी महल कहते हैं, ‘पार्टियां अब भी हमसे संपर्क करती हैं, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहतीं।’

1970 के दशक तक आते-आते भारतीय राजनीति काफी बदल गई थी। आजादी के बाद पहले दो दशकों में कांग्रेस को जो वर्चस्व प्राप्त था, वह कम हो गया था और ‘वोटबैंक’ की राजनीति पर आधारित गठबंधन सरकारें बनने लगी थीं। ‘वोटबैंक’ शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 1950 के दशक में समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास ने किया था। इसका मतलब है कि स्थानीय रूप से प्रभावशाली लोगों से राजनेता संपर्क करते हैं ताकि वे अपने जाति या समुदाय के मतदाताओं को जुटा सकें। श्रीनिवास ने ऐसे स्थानीय रूप से प्रभावशाली लोगों को ‘वोटबैंक’ कहा था। अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट द प्रिंट के मुताबिक, 1960 के दशक से, गैर-कांग्रेसी दलों ने अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों का समर्थन लेकर जीतने लायक सामाजिक गठबंधन बनाने के लिए मुसलमानों को लामबंद करना शुरू कर दिया। देश में लगातार हुए दंगों के कारण उन्हें सफलता मिलने लगी। दूसरी ओर, इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने अपने पक्ष में काम करने वाले मुस्लिम धर्मगुरुओं को अपने ‘वोटबैंक’ के रूप में देखना शुरू कर दिया। दिल्ली के शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी, इस राजनीति का चेहरा बन गए।

दशकों से राजनेताओं और मीडिया में यह धारणा बनी हुई है कि मुस्लिम धर्मगुरु मुस्लिम वोटों को प्रभावित कर सकते हैं। हर चुनाव से पहले, राजनीतिक दल और नेता मुस्लिम धर्मगुरुओं का समर्थन चाहते हैं, जिनके बारे में उनका मानना है कि वे उन्हें उनके समुदाय के वोट दिला सकते हैं। कुछ उलेमा जो सीधे राजनीति में आते हैं, इस धारणा को और मजबूत करते हैं। हिलाल अहमद कहते हैं कि 1953 से 2014 के बीच राज्यसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के अध्ययन से पता चलता है कि सभी राजनीतिक दलों, खासकर कांग्रेस और जनता दल (जद) ने अक्सर संसद में प्रमुख उलेमाओं को शामिल करने के लिए राज्यसभा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने जमीयत उलमा-ए-हिंद के पूर्व अध्यक्ष मौलाना असद मदनी का उदाहरण दिया, जो कांग्रेस टिकट पर उत्तर प्रदेश से तीन बार 1968-74; 1980-86; 1988-94 तक राज्यसभा सदस्य रहे।

कई मुसलमानों के लिए, मोदी के 10 साल के शासन ने केवल यह स्पष्ट किया है कि भारत में मुसलमान नेतृत्वविहीन हैं। 2017 में मुस्लिम महिलाओं द्वारा तीन तलाक के खिलाफ लड़ी गई कानूनी लड़ाई से लेकर 2019 में सीएए विरोधी प्रदर्शनों तक, जिनका नेतृत्व दिल्ली के शाहिन बाग़ में आम मुस्लिम महिलाओं और युवा मुस्लिम छात्रों ने किया था, यह तथ्य स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय अब पहले की तरह राजनीतिक मार्गदर्शन के लिए उलेमा की तरफ नहीं देखता है।

क्या अब भारत में नहीं है गरीबी? क्या कहते हैं आंकड़े?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत में गरीबी है या नहीं और आंकड़े क्या कहते हैं! कुछ गैर-भरोसेमंद आंकड़ों में भारत अमीर हो गया है। इसका अच्छा उदाहरण हाल में जारी हाउसहोल्‍ड कंजम्पशन एक्‍सपेंडिचर सर्वे 2022-23 है। बेशक, इसमें आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है। फिर भी यह विश्लेषण डेटा की तरह ही त्रुटिपूर्ण है। अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने डेटा का इस्‍तेमाल यह कैलकुलेट करने के लिए किया है कि अत्यधिक गरीबी एक्‍सट्रीम पावर्टी 2011-12 में 12.2% से घटकर सिर्फ 2% रह गई है। उन्होंने यह भी कैलकुलेट किया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता 28.7 से कम होकर 27 और शहरी क्षेत्रों में 36.7 से 31.9 पर आ गई है। इन आंकड़ों पर किसी को वाकई खुश होना चाहिए या हंसी उड़ानी चाहिए?समस्‍या यह है कि जिन्‍हें सर्वे में शामिल किया जाता है उनके पास सच बोलने के लिए कोई इंसेंटिव नहीं होता है। यही कारण है कि चुनावी ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल बुरी तरह से गलत साबित होते हैं। यह और बात है कि स्‍टैटिस्टिक्‍स की तकनीकों पर भारी-भरकम खर्च किया जाता है। सर्वे में वोटर सच बोलने के लिए बाध्‍य नहीं होते हैं। अपने बचाव के लिए वह झूठ भी बोल देते हैं। मेरे एक करीबी रूरल एनजीओ के साथ काम करते थे। मैंने उनसे पूछा कि क्‍या अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में गांव के लोग सच बताते हैं। उन्‍होंने जवाब दिया कि अगर कोई साथ का गांव वाला उनसे पूछता है तो वे अपनी समृद्ध‍ि को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। वहीं, कोई बाहरी ऐसा करता है तो वे गहरे संकट में होने का दावा करते हैं। फ्रीबीज रेवड़‍ी का दायरा बढ़ने के साथ गलत बताने में फायदा है। हमारा पूरा स्‍टैटिस्टिकल सिस्‍टम सेल्‍फ रिपोर्टेड डेटा पर निर्भर है। अन्‍य प्रमुख अर्थव्‍यवस्‍थाओं में इस गलत मैथडोलॉजी की ओवरहॉलिंग हो रही है। भारत को भी इसी तर्ज पर चलना चाहिए।

ताजा सर्वे के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अमीर 5 फीसदी लोग हर महीने सिर्फ 10,501 रुपये खर्च करते हैं। अमीर किसानों की जीवनशैली से परिचित कोई भी व्‍यक्ति इस पर हंसेगा। खासतौर से उनकी फैंसी कारों और आलीशान बंगलों को देखकर। इससे भी अजीब यह है कि शहरों में 5 फीसदी सबसे अमीर लोगों के लिए माना गया है कि वे हर महीने सिर्फ 20,821 रुपये खर्च करते हैं। इनमें अंबानी और अडानी जैसी शख्सियतें शामिल हैं। यह आंकड़ा अटपटा लगता है। शहरी अमीर लंदन में वीकेंड शॉपिंग और स्विट्जरलैंड में स्‍कींग के लिए जाते हैं। आर्ट ऑक्‍शन में वे लाखों करोड़ों खर्च करते हैं। ऐसे खर्च कैप्‍चर करने के लिए सर्वे के सवाल डिजाइन नहीं किए जाते हैं। ज्‍यादातर रईस इंटरव्‍यू देने से मना कर देते हैं। वहीं, दूसरे सच बोलने में बहुत ‘किफायती’ हो जाते हैं। सर्वे दावा करता है कि ग्रामीण खर्च में किराये की हिस्‍सेदारी सिर्फ 0.78 फीसदी है। शहरी खर्च में इसकी हिस्‍सेदारी 6.56 फीसदी है। यह आंकड़ा ऐसे हर किसी को चौंका देगा जो अपनी आधी इनकम किराये पर खर्च करता है। चूंकि अमीरों के खर्च के बारे में पुख्‍ता आंकड़े नहीं मिलते हैं। ऐसे में भारतीय सांख्यिकीविद इस बात को मान लेते हैं कि जो अमीर नहीं है वे सच बोलते हैं। हालांकि, ऐसा मान लेना सही नहीं है। यही कारण है कि तस्‍वीर बहुत साफ नहीं आती है।

2017 में हुए एक अध्‍ययन में फॉक्‍स, हेजेनेस, पकास और स्‍टीवेंस ने पाया था कि चार अमेरिकी राज्‍यों में कम से कम 40 फीसदी फूड स्‍टैंप के लाभार्थियों ने इस बात से इनकार किया कि उन्‍हें कोई लाभ मिलता है। मेयर, मॉक और सुलिवन ने अपनी स्‍टडी में इसे बड़ा खुलकर ‘हाउसहोल्‍ड सर्वे इन क्राइसिस’ शीर्षक दिया। उन्होंने पाया कि सर्वे में शामिल लाभार्थियों में से सिर्फ आधे लोगों ने माना कि फूड स्‍टैंप, कैश ट्रांसफर और वर्कर्स कंपन्‍सेशन से उन्‍हें मदद मिली। यह सब देखते हुए दोबारा उसी सवाल पर आने की जरूरत है। अपनी समृद्ध‍ि को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। वहीं, कोई बाहरी ऐसा करता है तो वे गहरे संकट में होने का दावा करते हैं। फ्रीबीज रेवड़‍ी का दायरा बढ़ने के साथ गलत बताने में फायदा है। हमारा पूरा स्‍टैटिस्टिकल सिस्‍टम सेल्‍फ रिपोर्टेड डेटा पर निर्भर है। अन्‍य प्रमुख अर्थव्‍यवस्‍थाओं में इस गलत मैथडोलॉजी की ओवरहॉलिंग हो रही है। भारत को भी इसी तर्ज पर चलना चाहिए।क्‍या अत्‍यधिक गरीबी वाकई घटकर 2 फीसदी रह गई है? क्‍या असमानता में वास्‍तव में कम हुई है? क्‍या भल्‍ला के निष्‍कर्ष खुश या हंसी उड़ाने वाले हैं? जवाब यह है कि जब अमीरों और गरीबों के अनुमान में इतनी गड़बड़ी है तो भल्‍ला ने जो ट्रेंड जाहिर किए हैं उन पर न तो हंसा जा सकता है न मखौल उड़ाया जा सकता है।