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क्या इस बार बीजेपी का प्रदर्शन खराब रहा है?

इस बार बीजेपी का प्रदर्शन बिल्कुल खराब रहा है!बीजेपी एनडीए के सहयोगी दलों की मदद से सरकार बनाने जा रही है। पीएम मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। उसके बावजूद बीजेपी की सीटों में आई गिरावट को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने शानदार जीत हासिल करते हुए 303 सीटें जीती थीं, जिनमें से 224 सीटों पर उसे 50% से ज्यादा वोट मिले थे। इस बार न सिर्फ बीजेपी बहुमत का आंकड़ा पार करने में नाकाम रही और सिर्फ 240 सीटें जीत पाई, बल्कि सिर्फ 156 सीटों पर ही उसे 50% से ज्यादा वोट मिले। 2019 में 224 सीटों पर बीजेपी को 50% से ज्यादा वोट मिले थे, उनमें से 7 सीटों पर 70% से ज्यादा, 77 सीटों पर 60% से 70% के बीच और 140 सीटों पर 50% से 60% के बीच वोट मिले थे।  2024 में बीजेपी को फिर से 7 सीटों पर 70% से ज्यादा वोट मिले, लेकिन 2019 के मुकाबले आधी ही सीटें यानी 39 सीटें 60% से 70% वोट शेयर के साथ जीतीं। 50% से 60% वोट वाली सीटों की संख्या भी 140 से घटकर 110 हो गई। इसके अलावा, पार्टी ने 78 सीटें 40% से 50% वोट शेयर के साथ और 5 सीटें 30% से 40% वोट शेयर के साथ जीतीं। सूरत में बीजेपी उम्मीदवार अकेला होने के कारण वहां मतदान नहीं हुआ।2019 में 50% से ज्यादा वोट वाली 224 सीटों में से इस बार बीजेपी 176 सीटें बचा पाई और 45 हार गई। इनमें से 29 सीटें कांग्रेस को और 8 सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) को गईं। इस बार बीजेपी ने 224 सीटों में से 3 सीटें अपने सहयोगी दलों जदयू, जेडीएस और राष्ट्रीय लोक दल के लिए छोड़ी थीं और तीनों जीत गईं। जिन 176 सीटों पर बीजेपी ने 2019 से 50% से ज्यादा वोट लेकर जीत हासिल की थी, उनमें से 132 सीटों पर इस बार बीजेपी का वोट कम हुआ और सिर्फ 12 सीटों पर 5% या उससे ज्यादा बढ़ा। अगर उन सीटों को छोड़ दें, जो बीजेपी ने सहयोगी दलों को दीं और सूरत की सीट, जहां बीजेपी बिना किसी मुकाबले जीत गई, तो बाकी 224 सीटों पर बीजेपी का औसत वोट शेयर 5.31% कम हुआ।

राजस्थान के बाड़मेर में, बीजेपी का वोट 2019 के 59.52% से घटकर इस बार सिर्फ 17% रह गया, और इस सीट पर कांग्रेस जीत गई। इस बार बीजेपी ने जिन 156 सीटों पर 50% से ज़्यादा वोट लेकर जीत हासिल की, उनमें से सिर्फ 10 सीटें ऐसी हैं, जो बीजेपी 2019 में नहीं जीत पाई थी, जबकि 5 सीटें ऐसी हैं, जिन्हें बीजेपी ने 2019 में 50% से कम वोट लेकर जीती थी। मध्य प्रदेश में बीजेपी ने सभी 25 सीटें 50% से ज्यादा वोट लेकर जीतीं, ये किसी एक राज्य से सबसे ज्यादा सीटें हैं, जहां बीजेपी को 50% से ज्यादा वोट मिले हैं। ऐसा बीजेपी ने 2019 में भी किया था। गुजरात की 26 सीटों में से 23 और कर्नाटक की 28 सीटों में से 17 सीटें बीजेपी ने आधे से ज्यादा वोट लेकर जीतीं। चार अन्य राज्यों- दिल्ली (7), उत्तराखंड (5), हिमाचल प्रदेश (4) और त्रिपुरा (2) में जहां बीजेपी ने सभी सीटें जीतीं, वहां भी सभी जीत 50% से ज्यादा वोट लेकर हासिल हुईं। बीजेपी ने 2019 में भी इसी तरह से दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में सभी सीटें जीती थीं।

विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन ने आधे से ज्यादा वोट पाकर 68 सीटें जीतीं, लेकिन इनमें से किसी में भी 70% से ज्यादा वोट नहीं मिले। 8 सीटों पर 60% से 70% के बीच वोट मिले, और बाकी 60 सीटों पर 50% से 60% के बीच। सबसे ज्यादा 50% से ज्यादा वोट पाने वाली सीटें तमिलनाडु से आईं, जहां द्रमुक (DMK) ने 8 सीटें जीतीं। इसके बाद कांग्रेस ने 2 और सीपीआई (एम) (CPI(M)) ने 1 सीट जीती।ममहाराष्ट्र में, इंडिया एलायंस ने 9 सीटें आधे से ज्यादा वोट के साथ जीतीं। कांग्रेस ने 5, राकांपा और शिवसेना (यूबीटी) ने 2-2 सीटें जीतीं। राजस्थान में, कांग्रेस ने 6 सीटें आधे से ज्यादा वोट के साथ जीतीं, सीपीआई (एम) और भारत आदिवासी पार्टी ने 1-1 सीट जीती। इसी तरह से इंडिया एलायंस ने दूसरे राज्यों में भी सीटें जीतीं, जिनमें शामिल हैं-पश्चिम बंगाल (7), उत्तर प्रदेश (6), कर्नाटक और केरल (5-5), असम, झारखंड और तेलंगाना (3-3), हरियाणा और जम्मू और कश्मीर (2-2), और लक्षद्वीप, मेघालय, नागालैंड और पुदुचेरी (1-1)। इंडिया एलायंस के दलों ने अपनी कुल 233 सीटों में से 68 पर 50% से ज़्यादा वोट हासिल किए. 2019 में ये संख्या 120 सीटों में से सिर्फ 54 थी, उस समय शिवसेना और राकांप एक साथ थे। कांग्रेस ने अपनी 99 सीटों में से 37 पर 50% से ज्यादा वोट हासिल किए। इसके बाद द्रमुक (DMK) 8 सीटों और तृणमूल कांग्रेस (TMC) 7 सीटों के साथ रहीं।

बीजेपी के अलावा एनडीए में शामिल अन्य दलों ने इस बार कुल 53 सीटें जीतीं, जिनमें से 30 सीटों पर उन्हें 50% से ज्यादा वोट मिले। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) की 16 जीतों में से 13 में वोट शेयर 50% से ज्यादा रहा। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने बिहार में जीती गईं अपनी 5 में से 4 सीटों पर 50% से ज्यादा वोट हासिल किए। जदयू ने अपनी 12 जीतों में से 3 में ये कारनामा किया। एनडीए के दूसरे सदस्यों में JD(S), शिवसेना और जनसेना पार्टी ने दो-दो सीटों पर 50% से ज़्यादा वोट हासिल किए। असम गण परिषद (AGP), हिंदुस्तान आवामी मोर्चा (सेक्युलर), राकांप (NCP) और राष्ट्रीय लोकदल (RLD) ने एक-एक सीट पर ये उपलब्धि हासिल की।

आखिर क्या है सेंट्रल हॉल की अद्भुत कहानी ?

आज हम आपको संसद के सेंट्रल हॉल की अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनावों के नतीजों में फिर एनडीए को बहुमत हासिल हुआ है। शुक्रवार को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में एनडीए की बैठक हुई। इस संसदीय दल की बैठक में नरेंद्र मोदी को संसदीय दल का नेता चुन लिया गया। इसी के साथ नई सरकार के गठन की कवायद शुरू हो गई। राष्ट्रपति ने मोदी को नई सरकार बनाने के लिए न्योता भी दे दिया। संसदीय दल की बैठक संसद भवन के जिस सेंट्रल हॉल में हुई थी, उसका बेहद रोचक और पुराना इतिहास रहा है। इसी सदन में कभी भारत का संविधान बना और पंडित नेहरू से लेकर तमाम नेताओं ने यहां बैठकर भारत की रणनीतियां बनाई। सेंट्रल हॉल की बिल्डिंग गोलाकार है। इसके ऊपर 98 फुट व्यास का गुंबद है। 1927 में स्थापित होने के बाद सेंट्रल हॉल ने कई ऐतिहासिक घटनाओं को देखा है। आज हम आपको इसी ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल के बारे में बता रहे हैं।

राजधानी दिल्ली के बीचोंबीच स्थित संसद भवन परिसर में कई इमारतें हैं। पिछले साल खोला गया नया संसद भवन, पुराना संसद भवन, जो अब संविधान भवन के नाम से जाना जाता है, जो एक प्रतीकात्मक गोलाकार इमारत है, संसद भवन परिसर और संसद पुस्तकालय भवन। लोकसभा अध्यक्ष संसद भवन परिसर का संरक्षक होता है। परिसर के अंदर राजनीतिक दलों और समूहों को कार्यालय स्थान आवंटित किया जाता है। वे परिसर में ही अपने सदस्यों के साथ बैठकें कर सकते हैं।राष्ट्राध्यक्षों के संबोधन के लिए भी किया जाता था। आखिरी संबोधन मार्च 2021 में इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) के अध्यक्ष डुआर्टे पाचेको द्वारा दिया गया था और उनसे पहले नवंबर 2010 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संबोधन किया था। पहले भी राजनीतिक दलों ने परिसर के भीतर मौजूद स्थानों, जैसे कि संसद पुस्तकालय भवन में बालयोगी ऑडिटोरियम में अपनी संसदीय दल की बैठकें की हैं। मई 2014 में, उस वर्ष के लोकसभा चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद, मोदी को सेंट्रल हॉल में आयोजित बैठक में भाजपा संसदीय दल का नेता चुना गया था।

सेंट्रल हॉल को मूल रूप से विधायिका के सदस्यों के लिए पुस्तकालय के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। 1946 में, जब संविधान सभा को स्वतंत्र भारत के संविधान पर विचार-विमर्श करने के लिए एक जगह की आवश्यकता थी, तब सेंट्रल हॉल का नवीनीकरण किया गया और बेंच जोड़े गए। इसके बाद इसका नाम बदलकर संविधान सभा भवन कर दिया गया। संविधान सभा की बैठकें 1946 और 1949 के बीच लगभग तीन वर्षों तक इसी स्थान पर हुई थी।

इसे मुख्य रूप से औपचारिक अवसरों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, जैसे लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के साथ हर साल होने वाला राष्ट्रपति का अभिभाषण और राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह। यह राष्ट्रपति की विदाई समारोह और उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार समारोह जैसे संसदीय कार्यक्रमों का स्थान भी था। सेंट्रल हॉल का इस्तेमाल दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के संबोधन के लिए भी किया जाता था। आखिरी संबोधन मार्च 2021 में इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) के अध्यक्ष डुआर्टे पाचेको द्वारा दिया गया था और उनसे पहले नवंबर 2010 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संबोधन किया था।

संसद सत्रों के दौरान, दोनों सदनों के सदस्य दिन के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए चाय और कॉफी पीने के लिए वहीं इकट्ठा होते थे। हाल ही में, इस स्थान का उपयोग राष्ट्रीय महिला विधायिका सम्मेलन (मार्च 2016 में), लोक लेखा समिति के शताब्दी समारोह (2021) और संसद सचिवालय द्वारा आयोजित छात्र कार्यक्रमों के लिए किया गया था। जहां सेंट्रल हॉल है, वहां पुराने संसद भवन के कक्षों का इस्तेमाल फिलहाल सत्र चलाने के लिए नहीं किया जा रहा है। बता दें कि उसका बेहद रोचक और पुराना इतिहास रहा है। इसी सदन में कभी भारत का संविधान बना और पंडित नेहरू से लेकर तमाम नेताओं ने यहां बैठकर भारत की रणनीतियां बनाई। सेंट्रल हॉल की बिल्डिंग गोलाकार है। इसके ऊपर 98 फुट व्यास का गुंबद है।ऑडिटोरियम में अपनी संसदीय दल की बैठकें की हैं। मई 2014 में, उस वर्ष के लोकसभा चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद, मोदी को सेंट्रल हॉल में आयोजित बैठक में भाजपा संसदीय दल का नेता चुना गया था। 1927 में स्थापित होने के बाद सेंट्रल हॉल ने कई ऐतिहासिक घटनाओं को देखा है। आज हम आपको इसी ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल के बारे में बता रहे हैं। लोकसभा और राज्यसभा के सत्र अब नई इमारत में होते हैं। हालांकि, संसद सचिवालय के कुछ कार्यालय हैं जो पुराने भवन में ही चल रहे हैं।

आखिर किस सीट को चुनेंगे राहुल गांधी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि राहुल गांधी आखिर किस सीट को चुनेंगे! लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों के बाद राहुल गांधी कांग्रेस के हीरो बनकर उभरे हैं। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने वायनाड और रायबरेली दोनों सीटों पर बड़ी जीत हासिल की है। उन्होंने रायबरेली सीट 3.9 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से और वायनाड सीट 3.6 लाख से ज्यादा वोटों से जीती है। गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली में ऐसी चर्चा हैं कि राहुल गांधी को रायबरेली सीट को चुनना चाहिए क्योंकि इस निर्वाचन क्षेत्र से उनके परिवार का 100 साल पुराना नाता है। स्थानीय व्यवसायी आशु साहू ने कहा, ‘उन्हें रायबरेली का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।’ वहीं हाउस वाइफ कृष्णा श्रीवास्तव ने कहा, ‘उन्होंने एक बार वायनाड का प्रतिनिधित्व किया है। अब उन्हें इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।’ एक अन्य स्थानीय निवासी प्रीति शुक्ला ने कहा, ‘राहुल और रायबरेली इस चुनाव में एक दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इस नए समीकरण को बनाए रखना चाहिए।’ रायबरेली में कांग्रेस कैडर भी यही चाहता है कि राहुल गांधी रायबरेली को ही तरजीह दें। एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा, ‘2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस को स्पष्ट बढ़त दी है और यूपी में कांग्रेस के आधार को मजबूत करने में मदद की है। इसे और मजबूत करने का समय आ गया है।’स्थानीय लोगों का मानना है कि रायबरेली से उनका ही उम्मीदवार होना चाहिए क्योंकि उनके परिवार का इस क्षेत्र से पुराना नाता है। राहुल गांधी रायबरेली और वायनाड दोनों जगहों से विजयी हुए हैं, लेकिन व्यापक अटकलों के बीच उन्हें अभी भी इस बात पर अनिश्चितता है कि वे किस सीट से चुनाव लड़ेंगे। कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने रायबरेली के महत्व पर जोर देते हुए कहा, ‘मुझे यकीन है कि राहुल भैया दक्षिण की सीट छोड़ देंगे और इस जगह से अपना रिश्ता नहीं तोड़ेंगे जो अधिक मायने रखता है।’

राजनीतिक विश्लेषक भी राहुल के रायबरेली को बरकरार रखने की संभावना देखते हैं। लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के राजनीतिक एक्सपर्ट प्रोफेसर सुशील पांडे ने कहा, ‘यूपी का राजनीतिक महत्व और 2024 का अनुकूल जनादेश केरल या वायनाड से संभावित राजनीतिक लाभ से कहीं ज़्यादा है। और फिर पारिवारिक विरासत भी है। इसलिए, रायबरेली एक स्वाभाविक विकल्प है।’ रायबरेली स्थित राजनीतिक विचारक विजय विद्रोही ने टिप्पणी की कि राहुल को उस बंधन का सम्मान करना चाहिए जिसके लिए लोगों ने उन्हें वोट दिया था। इस बीच कासरगोड से कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन ने सुझाव दिया कि अगर राहुल रायबरेली को बरकरार रखना चाहते हैं तो वायनाड में प्रियंका गांधी वाड्रा को उनकी जगह लिया जा सकता है। एक समाचार चैनल से बात करते हुए उन्नीथन ने स्पष्ट किया कि यह उनकी निजी राय है।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी इस समय इस बात पर विचार कर रहे हैं कि रायबरेली और वायनाड में से किस सीट को बरकरार रखा जाए। उन्होंने दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जीत हासिल की है। स्थानीय लोगों का मानना है कि रायबरेली से उनका ही उम्मीदवार होना चाहिए क्योंकि उनके परिवार का इस क्षेत्र से पुराना नाता है। राहुल गांधी रायबरेली और वायनाड दोनों जगहों से विजयी हुए हैं, लेकिन व्यापक अटकलों के बीच उन्हें अभी भी इस बात पर अनिश्चितता है कि वे किस सीट से चुनाव लड़ेंगे।

संवैधानिक विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी ने कानून के साथ-साथ संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए शुक्रवार को कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में जीती गई दो सीट में से एक से दो सप्ताह के भीतर इस्तीफा देना होगा। बता दें कि हाउस वाइफ कृष्णा श्रीवास्तव ने कहा, ‘उन्होंने एक बार वायनाड का प्रतिनिधित्व किया है। अब उन्हें इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।’ एक अन्य स्थानीय निवासी प्रीति शुक्ला ने कहा, ‘राहुल और रायबरेली इस चुनाव में एक दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इस नए समीकरण को बनाए रखना चाहिए।’ रायबरेली में कांग्रेस कैडर भी यही चाहता है कि राहुल गांधी रायबरेली को ही तरजीह दें। अचारी ने कहा कि जो भी उम्मीदवार दो सीट से जीतता है उसे चुनाव परिणाम के 14 दिन के भीतर एक सीट छोड़नी होती है। राहुल गांधी 17वीं लोकसभा के भंग होने के बाद भी वर्तमान अध्यक्ष ओम बिरला को अपना इस्तीफा भेज सकते हैं क्योंकि 18वीं लोकसभा के लिए अस्थायी अध्यक्ष नियुक्त होने तक वह पद पर बने रहेंगे।

आखिर कौन बनेगा नेता प्रतिपक्ष?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नेता प्रतिपक्ष कौन बनेगा! नेता प्रतिपक्ष के लिए कितनी सीटों की जरूरत है, यह सवाल बेहद अहम रहा है? इस बार कांग्रेस को करीब 100 सीटें मिली हैं। इस बार नेता प्रतिपक्ष का पद लोकसभा में कांग्रेस के संसदीय दल के नेता को मिलेगा। पिछली दो लोकसभा में कांग्रेस 55 सीटों से पीछे रह गई थी और इस कारण उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिल पाया था। नेता प्रतिपक्ष के लिए कुल सीटों की संख्या का 10 फीसदी नंबर का नियम कहां से आया और इसको लेकर कानूनी पेचीदगियां क्या है इस पर भी बहस है। नेता प्रतिपक्ष को लेकर कानूनी जानकार और लोकसभा में पूर्व सेक्रेटरी जनरल पीडीटी अचारी की राय अलग है। उनका कहना है कि सरकार के विरोधी दलों में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को विरोधी दल के नेता का दर्जा मिलता है। हालांकि यह बात चलन में है कि नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए सबसे बड़े विरोधी दल को कम से कम कुल सीटों का 10% यानी 55 सीटें चाहिए। लेकिन लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल अचारी इसकी अनिवार्यता नहीं मानते है। उनके मुताबिक संसदीय ऐक्ट 1977 में नेता प्रतिपक्ष के वेतन भत्ते आदि को परिभाषित किया गया है। एक्ट की धारा-2 में नेता प्रतिपक्ष को परिभाषित किया गया है। इसके तहत कहा गया है कि नेता प्रतिपक्ष विरोधी दल का नेता होता है और लोकसभा में जिस विपक्षी दल की संख्या सबसे ज्यादा होती है उसके नेता को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर लोकसभा के स्पीकर मान्यता देते हैं। इस एक्ट में कहीं नहीं लिखा हुआ है कि नेता प्रतिपक्ष के लिए कुल सीटों की संख्या का 10% यानी 55 सीटें होनी चाहिए।

नेता प्रतिपक्ष का मामला बेहद पुराना है। 1952 में पहले आम चुनाव के बाद लोकसभा का गठन हुआ और तब 10% सीटें मिलने के बाद नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिए जाने का नियम आया था। इसके लिए तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर ने नियम तय किया था कि नेता प्रतिपक्ष के लिए 10% सीटें होना चाहिए। लेकिन इसके बाद 1977 में नेता प्रतिपक्ष वेतन भत्ता कानून बनाया गया। इसमें कहा गया कि सरकार के विरोधी दल का नेता उसे माना जाएगा जिसकी संख्या सबसे ज्यादा होगी।

16वीं लोकसभा में कांग्रेस को जब 44 सीटें आईं तब लोकसभा की तत्कालीन स्पीकर सुमित्रा महाजन ने लोकसभा में कांग्रेस के नेता को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देने से इनकार कर दिया था। इसके लिए स्पीकर ने अटॉर्नी जनरल से सलाह ली थी। अटॉर्नी जनरल ने 1977 के कानून का परीक्षण किया और कहा कि नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देने का मामला 1977 के दायरे में नहीं आता है और उसका फैसला स्पीकर को लेना है और यह उनका अधिकार है। इसके बाद लोकसभा में कांग्रेस के नेता को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं मिला था। कांग्रेस ने 17वीं लोकसभा में भी 52 सीटें लाई और उसने नेता प्रतिपक्ष का दावा पेश नहीं किया।

वैसे कानून की व्याख्या अपनी जगह है लेकिन इस बार उस बहस का मतलब इसलिए नहीं रह गया क्योंकि कांग्रेस का आंकड़ा 55 सीटों से काफी आगे निकल चुका है। लेकिन इस बार कांग्रेस 100 के आसपास पहुंच चुकी है, ऐसे में उनके नेता को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद भी मिलेगा और उसके बाद वह मजबूती से सदन में अपनी बात रख भी पाएंगे। साथ ही तमाम कमिटी जिसमें नेता प्रतिपक्ष मेंबर होते हैं उसमें उनके नेता रहेंगे और रचनात्मक भूमिका ठोस तरीके से निभा पाएंगे। सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्त के लिए बनाए गए कॉलिजियम हो या फिर चुनाव आयुक्त, उनकी नियुक्ति के लिए के लिए बनाई गई हाई पावर कमिटी में विपक्ष की आवाज मुखर होगी क्योंकि इन तमाम कमियों में पीएम के साथ नेता प्रतिपक्ष भी होंगे और नेता प्रतिपक्ष की वोटिंग अहम साबित होगी।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है और उसका प्रतिनिधित्व नेता प्रतिपक्ष करता है। साथ ही कई व्यावहारिकताएं हैं जिनमें नेता प्रतिपक्ष की अहम भूमिका है। सीबीआई डायरेक्टर, सीवीसी, लोकपाल और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए बनी कमिटी में पीएम के साथ नेता प्रतिपक्ष भी होते हैं। 2019 में मार्च में जब लोकपाल की नियुक्ति हुई थी तब कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को सिलेक्शन कमिटी की बैठक में विशेष आमंत्रित अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। खरगे ने इस बैठक का बहिष्कार किया था और कहा था कि उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं है और उन्हें नेता प्रतिपक्ष की मान्यता नहीं है ऐसे में वह बैठक में नहीं जाएंगे। लेकिन इस तरह के तमाम विवादों पर अब विराम होगा और कांग्रेस के संसदीय दल के नेता, नेता प्रतिपक्ष की अहम भूमिका में होंगे और लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यवहारिक अनिवार्यताएं पूरी करेगा।

क्या देश में बढ़ते जा रहे हैं हीट स्ट्रोक के मामले?

वर्तमान में देश में हीट स्ट्रोक के मामले बढ़ते ही जा रहे है! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों के साथ भीषण गर्मी की स्थिति से जुड़ी तैयारियों को लेकर वर्चुअल समीक्षा बैठक की। देश भर के अस्पतालों में अपनाए गए आग और विद्युत सुरक्षा उपायों का आकलन भी इस बैठक में किया गया। पिछले महीने 27 मई मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, जून में उत्तर-पश्चिम भारत के अधिकांश क्षेत्रों और मध्य भारत के आसपास के क्षेत्रों में सामान्य से अधिक गर्मी पड़ने की संभावना है। मंत्रालय ने राज्यों को हीट स्ट्रोक रूम, ओआरएस कॉर्नर बनाने के साथ- साथ सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। देश में हीट स्ट्रोक से लोगों की मौत भी हो रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने गर्मी से संबंधित बीमारियों (एचआरआई) के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों की तैयारी को मजबूत करने पर दिशा-निर्देश दिए हैं। कुछ दिन पहले केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अपूर्व चंद्रा ने भी सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर कहा था कि बढ़ते तापमान के साथ अस्पतालों में आग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है और आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए तुरंत प्रभाव से सभी जरूरी कदम उठाए जाएं।

मंत्रालय ने गर्मी से जुड़ी बीमारियों को लेकर इमरजेंसी कूलिंग के लिए भी गाइडलाइंस जारी की है। मरीजों को अस्पतालों में कोई परेशानी न हो और उनको बेड मिलने में कोई दिक्कत नहीं हो, यह निर्देश भी जारी किया गया है। देश भर के सभी एम्स और मेडिकल कॉलेजों में गर्मी से हुई मौतों में शव परीक्षण निष्कर्षों पर भी गाइडलाइंस दी गई है। राज्यों में एंबुलेंस की कमी नहीं हो। हीट हेल्थ एक्शन प्लान के मुताबिक राज्यों को काम करना होगा ताकि लू लगने से बीमार व्यक्ति का प्राथमिकता के आधार पर इलाज हो और हर अस्पताल में इसके लिए पर्याप्त तैयारी हो। हर मेडिकल कॉलेज, अस्पताल में हीट स्ट्रोक रूम होना चाहिए।

समीक्षा बैठक में राज्यों की ओर से बताया गया है कि उच्च अधिकारी स्थिति की कड़ी निगरानी कर रहे हैं। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में आग से बचाव को लेकर मॉक- ड्रिल की है। ओडिशा में पूरे राज्य में हीट वेव कंट्रोल रूम स्थापित किए गए हैं। उत्तर प्रदेश में लोगों की जागरूकता बढ़ाने के लिए दस्तक घर-घर जाकर अभियान चलाया जा रहा है। हरियाणा ने सभी स्वास्थ्य देखभाल सुविधा केन्द्रों में आवश्यक दवाओं और लॉजिस्टिक्स सुनिश्चित करने के लिए वित्तीय आवंटन किया है। राजस्थान में 104 और 108 से जुड़ी एंबुलेंस सेवाओं में कूलिंग उपकरण लगाए गए हैं। पश्चिम बंगाल में अग्निशमन विभाग से अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र सुनिश्चित किए जा रहे हैं और मॉक ड्रिल आयोजित की जा रही है।

बता दे कि राष्ट्रीय राजधानी में इस बार भीषण गर्मी पड़ रही है। पारा लगातार 50 डिग्री के करीब पहुंचता दिख रहा। मौसम विभाग के मुताबिक, इस बार अधिकतम तापमान ने पिछले 80 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। तपती गर्मी के बीच हीट स्ट्रोक का कहर भी दिखने लगा है। दिल्ली में लू लगने से एक फैक्ट्री वर्कर की मौत हो गई। 40 वर्षीय ये शख्स बिहार के दरभंगा का रहने वाला था। सोमवार रात उसे तबीयत बिगड़ने पर राम मनोहर लोहिया आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक शख्स पाइपलाइन फिटिंग की एक फैक्ट्री में काम करता था।

डॉक्टरों ने बताया कि 40 वर्षीय फैक्ट्री वर्कर को उसके साथी और फैक्ट्री के दूसरे कर्मचारी सोमवार आधी रात को अस्पताल लेकर आए थे। उनका इलाज कर रहे एक डॉक्टर ने बताया कि मृतक शख्स बिना कूलर या पंखे वाले एक कमरे में अपने साथियों के साथ रहता था। उसे जब अस्पताल लाया गया तो बहुत तेज बुखार था। उसके शरीर का तापमान 107 डिग्री फॉरेनहाइट से ऊपर चला गया। 40 वर्षीय यह शख्स पिछले पांच सालों से दिल्ली में काम कर रहा था। डॉक्टरों ने बताया कि अस्पताल पहुंचने के बाद उसे तुरंत हीट स्ट्रोक यूनिट में भर्ती कराया गया। यह एक विशेष यूनिट है जिसे 8 मई को दिल्ली में बढ़ते तापमान के मद्देनजर पहली बार स्थापित किया गया है। डॉक्टरों ने बताया कि दरभंगा के इस मरीज को मंगलवार शाम तक यूनिट में रखा गया। बुधवार सुबह उसे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। इसी दौरान उसकी हालत अचानक बिगड़ गई। दोपहर करीब 3 बजे उसकी मौत हो गई।

पिछले हफ्ते हीट स्ट्रोक यूनिट में 6-7 मरीज भर्ती हुए थे। डॉक्टर अजय चौहान इस यूनिट के प्रमुख भी हैं। उन्होंने बताया कि जो मरीज अस्पताल में आए थे उनमें दो मरीज अभी भी अस्पताल में ही हैं। उनमें से एक हीट एग्जॉशन का मामला है। डॉक्टर चौहान ने बताया कि ये मरीज मुख्य रूप से निम्न आय वर्ग से आते हैं। उनमें से एक प्लास्टिक पेलेट बनाने वाली कंपनी में काम करता है, और दूसरा बिना एसी या कूलर वाले घर की सबसे ऊपरी मंजिल पर रहता है। उन्होंने बताया कि दूसरे मरीज को तेज बुखार था, उसका शरीर बहुत तप रहा था। जब वह अस्पताल पहुंचा, तो उसकी हालत बिगड़ चुकी थी।

आखिर क्या कहता है चुनाव का मुस्लिम फैक्टर?

आज हम आपको बताएंगे कि चुनाव का मुस्लिम फैक्टर आखिर क्या कहता है! इस बार के चुनाव में महिला वोटरों का इजाफा देखने को मिला, लेकिन संसद में महिलाओं की संख्या कम ही हुई है। मंगलवार को आए 18वीं लोकसभा चुनाव के नतीजों से साफ है कि इस बार पिछली लोकसभा के मुकाबले कम महिला सांसद बैठेंगी। पिछली बार 78 फीसदी महिलाएं लोकसभा के लिए चुनी गई थी, जबकि इस बार महज 74 महिलाओं को लोकसभा में चुनकर भेजा गया है। यहां ममता बनर्जी का जिक्र करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि उसके 29 सांसदों में 11 महिला सांसद जीत कर आई हैं। यूं तो टीएमसी उन पार्टियों में से हैं, जिसकी पार्टी महिला सांसदों के प्रतिनिधित्व की लिस्ट में पहले भी अव्वल रही हैं।

साल 2019 में भी जिन दलों में 10 फीसदी से ज्यादा लोकसभा सांसद थे, उनमें बीजेडी की 42%, टीएमसी की 39% सांसद महिलाएं शामिल थी। टीएमसी ने टिकट बंटवारे में विवादों में रही सांसद महुआ मोइत्रा को कृष्णानगर से लेकर जादवपुर से एक्ट्रेस और चुनावी राजनीति में पहली बार एंट्री कर रही सयानी घोष और मेदिनीपुर से जून मालिया को टिकट दिया था।देखें तो सबसे ज्यादा 35 उम्मीदवार बीएसपी ने खड़े किए हैं। इसके बाद 19 उम्मीदवारों के साथ कांग्रेस 19 उम्मीदवार वाली टीएमसी तीसरे नंबर पर आती है। यूपी की ही बात है, तो इस बार समाजवादी पार्टी की ओर से खड़े किए सभी 4 उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई, जबकि बीएसपी की ओर खड़े किए गए 20 उम्मीदवारों में से कोई जीत नहीं पाया।हालांकि नतीजे आने के बाद अपनी इस रणनीति पर बैकफुट लेते हुए कहा था कि मुस्लिम समुदाय सही तादाद में टिकट दिए जाने के बाद भी बीएसपी को समझ नहीं पाया, इसलिए आगे से पार्टी सोच समझकर टिकट देगी। इसके अलावा राजनीति में अनुभवी माला रॉय पर भी भरोसा जताया गया, जो कि सही साबित हुआ। हालांकि पिछली बार 11 महिला सांसद चुनकर भेजने वाले यूपी से इस बार आठ महिलाएं ही निचले सदन पहुंच पाई हैं, जिनमें से 5 समाजवादी पार्टी से हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार बीजेपी की 30 महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है। टीएमसी की 11 तो कांग्रेस की 14, वहीं समाजवादी पार्टी की पांच तो डीएमके की तीन महिला सांसद पार्लियामेंट पहुंची हैं।

चुनावी रिजल्ट बताते हैं कि इस बार 24 मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत मिली है, हालांकि ये पिछली बार के 26 के आंकड़े से थोड़ा कम है। वहीं साल 2014 में ये आंकड़ा 24 था। चुनाव में इस बार कुल 78 मुस्लिम उम्मीदवार ही मैदान में थे, जबकि पिछली बार 115 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावों में टिकट मिला था। इस बार टिकट बांटे जाने को लेकर देखें तो सबसे ज्यादा 35 उम्मीदवार बीएसपी ने खड़े किए हैं। इसके बाद 19 उम्मीदवारों के साथ कांग्रेस 19 उम्मीदवार वाली टीएमसी तीसरे नंबर पर आती है। हालांकि नतीजे आने के बाद अपनी इस रणनीति पर बैकफुट लेते हुए कहा था कि मुस्लिम समुदाय सही तादाद में टिकट दिए जाने के बाद भी बीएसपी को समझ नहीं पाया, इसलिए आगे से पार्टी सोच समझकर टिकट देगी।

जहां तक यूपी की ही बात है, तो इस बार समाजवादी पार्टी की ओर से खड़े किए सभी 4 उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई, जबकि बीएसपी की ओर खड़े किए गए 20 उम्मीदवारों में से कोई जीत नहीं पाया। एक विश्लेषण के मुताबिक 2014 के बाद हिंदुत्वादी नीतियों की वजह से हिंदू वोटर कंसोलिडेट हुआ है और यही पैटर्न आगे बढ़ा। बता दें कि ममता बनर्जी का जिक्र करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि उसके 29 सांसदों में 11 महिला सांसद जीत कर आई हैं। यूं तो टीएमसी उन पार्टियों में से हैं, जिसकी पार्टी महिला सांसदों के प्रतिनिधित्व की लिस्ट में पहले भी अव्वल रही हैं।

साल 2019 में भी जिन दलों में 10 फीसदी से ज्यादा लोकसभा सांसद थे, उनमें बीजेडी की 42%, टीएमसी की 39% सांसद महिलाएं शामिल थी।टीएमसी ने टिकट बंटवारे में विवादों में रही सांसद महुआ मोइत्रा को कृष्णानगर से लेकर जादवपुर से एक्ट्रेस और चुनावी राजनीति में पहली बार एंट्री कर रही सयानी घोष और मेदिनीपुर से जून मालिया को टिकट दिया था।देखें तो सबसे ज्यादा 35 उम्मीदवार बीएसपी ने खड़े किए हैं। इसके बाद 19 उम्मीदवारों के साथ कांग्रेस 19 उम्मीदवार वाली टीएमसी तीसरे नंबर पर आती है। 2019 में 40 फीसदी से ज्यादा हिंदू वोटर्स ने बीजेपी को वोट किया था, वहीं मुस्लिम वोटर का सेक्युलर वोट कई जगह बंट गया था। हालांकि इस बार ये पैटर्न बदल गया और नतीजों से लगता है कि इस बार समुदाय के वोटों में विभाजन नहीं हुआ।

क्या जंगलों की आग से नहीं निपट पाई है सरकार?

वर्तमान में सरकार जंगलों की आग से अब तक नहीं निपट पाई है! कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (NCMC) की बैठक हुई, जिसमें भीषण गर्मी और जंगल की आग से निपटने के लिए राज्य सरकारों, केंद्रीय मंत्रालयों व विभागों की तैयारियों की समीक्षा की गई। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और पर्यावरण मंत्रालय ने देश भर में भीषण गर्मी और जंगल की आग की वर्तमान स्थिति पर विस्तार में रिपोर्ट पेश की और इनसे निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी गई। कैबिनेट सचिव ने मुख्य सचिवों से कहा कि वे लू से निपटने की तैयारियां बढ़ाने के लिए अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक उपायों की नियमित समीक्षा और निगरानी करें। उन्होंने जोर दिया कि जलापूर्ति के स्रोत बनाए रखने और बढ़ाने के प्रयासों में तेजी लाई जानी चाहिए और सभी संस्थानों में फायर सेफ्टी ऑडिट किया जाना जरूरी है। कैबिनेट सचिव ने कहा कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लू चलने और जंगल की आग से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार रहने की जरूरत है ताकि जानमाल की हानि न हो और इनसे होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके। कैबिनेट सचिव ने राज्यों को आश्वासन दिया कि केंद्रीय मंत्रालय व विभाग उनकी सभी जरूरी मदद करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने बताया कि अप्रैल से जून 2024 के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्मी वाले 10-22 दिन देखे गए। जून महीने के पूर्वानुमान के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत के अधिकांश क्षेत्रों और उत्तर मध्य भारत के आस-पास के क्षेत्रों में सामान्य से अधिक तापमान वाले दिन रहने की संभावना है। इस वर्ष देश के अधिकांश भागों में मानसून सामान्य या सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। आईएमडी द्वारा भीषण गर्मी के बारे में नियमित रूप से राज्यों को अलर्ट भेजे जा रहे हैं।

बैठक के दौरान NDMA ने बताया कि राज्यों के साथ गर्मी और लू के हालात को लेकर लगातार बातचीत की जा रही है। राज्यों को नियंत्रण कक्ष को सक्रिय करने, भीषण गर्मी के लिए एसओपी लागू करने, पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की तैयारी और बिना किसी रूकावट के बिजली आपूर्ति करने की सलाह दी गई है। इसके साथ-साथ आवश्यक दवाओं और ओआरएस की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी एडवाइजरी दी गई है। राज्यों को स्कूलों, अस्पतालों और अन्य संस्थानों की नियमित रूप से फायर सेफ्टी ऑडिट करने तथा आग की घटनाओं को लेकर जवाबी कार्रवाई के समय में कमी लाने की भी सलाह दी गई है। राज्य सरकारों ने बताया कि संबंधित विभागों और जिला कलेक्टरों के साथ स्थिति की बारीकी से समीक्षा और निगरानी की जा रही है।

पर्यावरण मंत्रालय ने बताया कि जंगल की आग के बारे में मोबाइल एसएमएस और ईमेल के जरिए नियमित सतर्कता बरतने की चेतावनी दी जा रही है। जंगल की आग के खतरे में बारे में राज्‍यों और अन्‍य एजेंसियों की सहायता के लिए वन अग्नि नाम से चेतावनी देने वाली पोर्टल प्रणाली भी भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) द्वारा विकसित की गई है, जो आग लगने से पहले और जंगल की आग के लगभग वास्तविक समय की चेतावनी देती है।इस वर्ष देश के अधिकांश भागों में मानसून सामान्य या सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। आईएमडी द्वारा भीषण गर्मी के बारे में नियमित रूप से राज्यों को अलर्ट भेजे जा रहे हैं। कैबिनेट सचिव ने दोहराया कि 2 जून, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक के दौरान इस बात पर जोर दिया गया था कि जंगल की आग के मुद्दे पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। वनों की आग से निपटने के लिए तैयारी उपायों और वार्षिक अभ्यासों की एक नियमित व्‍यवस्‍था लागू की जानी चाहिए, जैसा कि बाढ़ के मामले में किया जाता है।

समीक्षा बैठक में केंद्रीय गृह सचिव, पर्यावरण मंत्रालय के सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग, एनडीएमए के सदस्य और विभागाध्यक्ष, सीआईएससी मुख्यालय (आईडीएस), बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तराखंड के मुख्य सचिव तथा आंध्र प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारी भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में शामिल हुए।

आखिर कैसा था पीएम मोदी का चुनावी अभियान?

आज हम आपको पीएम मोदी का चुनावी अभियान के बारे में बताने जा रहे हैं! इस बार का लोकसभा चुनाव सात चरणों में संपन्न हो रहा है और चुनाव का नतीजा 4 जून को घोषित होगा। 16 मार्च को चुनाव आयोग की तरफ से लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लागू हो गई थी। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव आचार संहिता लागू होने के पहले से ही देश भर के लगभग सभी राज्यों का मैराथन दौरा कर रहे थे।चुनावी कार्यक्रम के साथ पश्चिम बंगाल में 20 रैलियों को संबोधित किया। इसके साथ ही पीएम ने ओडिशा और मध्य प्रदेश में 10 चुनावी कार्यक्रम किए। वहीं, पीएम का फोकस झारखंड पर भी रहा, जहां उन्होंने 7 कार्यक्रम किए। पीएम मोदी के 2019 के चुनावी रैलियों की संख्या देखें तो आपको पता चलेगा कि उन्होंने उस चुनाव में 142 जनसभाएं की थी। लेकिन, चुनाव की तारीख की घोषणा के साथ देश के दक्षिण छोर से शुरू हुआ उनका प्रचार अभियान उत्तर में स्थित पंजाब के होशियारपुर में आकर समाप्त हुआ। जहां पीएम मोदी ने गुरुवार को एक चुनावी रैली को संबोधित किया। इस चुनाव में पार्टी के पक्ष में पीएम मोदी की मेहनत साफ नजर आई। विपक्ष के फायर ब्रांड नेताओं राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता एक तरफ और पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी एक तरफ सबको अपनी ऊर्जा से टक्कर देते नजर आए। लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान समाप्त करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी 30 मई से 1 जून तक तमिलनाडु के कन्याकुमारी का दौरा करेंगे, जहां वे प्रसिद्ध विवेकानंद रॉक मेमोरियल का दौरा करेंगे।आंध्र प्रदेश के पालनाडु से चुनाव प्रचार की शुरुआत कर पीएम मोदी ने इस अभियान का समापन 30 मई को पंजाब के होशियारपुर में किया। यानी 75 दिन की इस अवधि में पीएम मोदी ने 180 रैलियां और रोड शो किए हैं।

पीएम मोदी की रैलियों के साथ उनके रोड शो और अन्य कार्यक्रमों में शामिल होने का आंकड़ा देखें तो यह संख्या 206 है। इसके साथ ही उन्होंने इस दौरान 80 से ज्यादा मीडिया चैनलों, अखबारों, यूट्यूबरों, ऑनलाइन मीडिया माध्यमों को अपना साक्षात्कार दिया। मतलब औसतन हर दिन पीएम मोदी ने दो से ज्यादा रैलियां और रोड शो के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। वहीं, पीएम मोदी मार्च में चुनाव की घोषणा से पहले फरवरी और मार्च की 15 तारीख तक 15 रैलियां कर चुके थे।

पीएम मोदी ने सबसे ज्यादा 22 जनसभाएं और कुल 31 चुनावी कार्यक्रम यूपी में किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कर्नाटक में 11, तेलंगाना में 11, तमिलनाडु में 7, आंध्र प्रदेश में 5 और केरल में 3 रैलियां की हैं। पीएम मोदी ने बिहार में 20 चुनावी कार्यक्रम और महाराष्ट्र में 19 चुनावी कार्यक्रम के साथ पश्चिम बंगाल में 20 रैलियों को संबोधित किया। इसके साथ ही पीएम ने ओडिशा और मध्य प्रदेश में 10 चुनावी कार्यक्रम किए। वहीं, पीएम का फोकस झारखंड पर भी रहा, जहां उन्होंने 7 कार्यक्रम किए। पीएम मोदी के 2019 के चुनावी रैलियों की संख्या देखें तो आपको पता चलेगा कि उन्होंने उस चुनाव में 142 जनसभाएं की थी।

लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान समाप्त करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी 30 मई से 1 जून तक तमिलनाडु के कन्याकुमारी का दौरा करेंगे, जहां वे प्रसिद्ध विवेकानंद रॉक मेमोरियल का दौरा करेंगे। प्रधानमंत्री ने 30 मई की शाम से 1 जून की शाम तक ध्यान मंडपम में ध्यान लगाने की योजना बनाई है; यह वही स्थान है जहां स्वामी विवेकानंद ने कभी ध्यान किया था। यह भारत का सबसे दक्षिणी छोर है। इसके अलावा, यह वह स्थान है जहां भारत की पूर्वी और पश्चिमी तट रेखाएं मिलती हैं। यह हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का मिलन बिंदु भी है। कन्याकुमारी जाकर पीएम मोदी राष्ट्रीय एकता का संकेत दे रहे हैं। प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार के अंत में आध्यात्मिक यात्रा करने के लिए जाने जाते हैं। इसी क्रम में वे 30 मई को कन्याकुमारी पहुंचेंगे और 1 जून तक वहीं रहेंगे।चुनाव की तारीख की घोषणा के साथ देश के दक्षिण छोर से शुरू हुआ उनका प्रचार अभियान उत्तर में स्थित पंजाब के होशियारपुर में आकर समाप्त हुआ। जहां पीएम मोदी ने गुरुवार को एक चुनावी रैली को संबोधित किया। इस चुनाव में पार्टी के पक्ष में पीएम मोदी की मेहनत साफ नजर आई। 2019 में उन्होंने केदारनाथ और 2014 में शिवाजी के प्रतापगढ़ का दौरा किया था। प्रधानमंत्री ने इस साल 16 मार्च को कन्याकुमारी में चल रहे लोकसभा चुनाव के लिए अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की थी।

पीएम मोदी के चुनाव प्रचार में कौन-कौन से नाम उछले?

आज हम आपको बताएंगे कि पीएम मोदी के चुनाव प्रचार में कौन-कौन से नाम उछले हैं! लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण के लिए चुनाव प्रचार आज थम चुका है। एक मई को सातवें चरण के लिए वोटिंग होगी और 4 मई को चुनाव के नतीजे जारी होंगे। इस बीच कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि देश की जनता चार जून को वैकल्पिक सरकार का जनादेश देगी और I.N.D.I.A गठबंधन पूर्ण बहुमत हासिल करते हुए देश को एक समावेशी और राष्ट्रवादी सरकार देगा। खरगे ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, प्रधानमंत्री ने पिछले 15 दिनों में अपनी जनसभाओं में 232 बार कांग्रेस का नाम लिया, 758 बार अपना नाम लिया, 573 बार I.N.D.I.A गठबंधन और विपक्ष का नाम लिया, लेकिन बेरोजगारी के बारे में एक बार भी बात नहीं की। कांग्रेस प्रमुख ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सभाओं में एक बार भी बेरोजगारी की बात नहीं की। उन्होंने पिछले 15 दिनों में 232 बार कांग्रेस का, 758 बार अपना, 573 बार I.N.D.I.A गठबंधन और विपक्ष का नाम लिया। खरगे ने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान 421 बार मंदिर-मस्जिद और समाज को बांटने की बात की।खरगे ने कहा कि जनता ने विपक्ष एवं कांग्रेस की इस बात पर मुहर लगा दी है कि अगर मोदी सरकार फिर से आई, तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस चुनाव में भाजपा ने बांटने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने असली मुद्दों को चुना। उन्होंने 224 बार मुस्लिम, अल्पसंख्यक जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया। लेकिन चुनाव आयोग ने इसपर कोई कार्रवाई नहीं की।

खरगे ने कहा, ‘कांग्रेस हमेशा जनता की समस्याओं को ध्यान में रखकर काम करती है। जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी यूपीए की प्रमुख थीं, तब हम गरीबों के लिए ऐसी योजनाएं लेकर आए, जिनसे गरीबों का फायदा हुआ। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक असमानता, संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग जैसे मुद्दों को बढ़ावा दिया।’ उन्होंने कहा, ‘हमने इन्हीं मुद्दों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जिसमें जनता का पूरा समर्थन मिला। इसलिए मैं अपने सभी साथियों को बधाई देता हूं, जो निडर होकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए खड़े हैं।’

खरगे ने आरोप लगाया, ‘संसद में विपक्ष को नहीं बोलने देना, विपक्षी सांसदों को निलंबित करना, बिना चर्चा के विधेयक पारित करना, ये सब पिछली सरकार के लिए काले अक्षरों में लिखा जाएगा।’ उन्होंने आरोप लगाया कि इस सरकार ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खत्म कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा, ‘प्रधानमंत्री खुद को भगवान का अवतार मानते हैं। भाजपा के नेता भी उन्हें भगवान का स्वरूप बता रहे हैं।’ खरगे ने गुरुवार को कहा कि देश की जनता 4 जून को I.N.D.I.A गठबंधन की सरकार बनाने जा रही है। उन्होंने कहा, I.N.D.I.A गठबंधन की जीत के बाद घटक दलों से बातचीत के आधार पर प्रधानमंत्री का फैसला होगा। खरगे ने कहा कि जनता ने विपक्ष एवं कांग्रेस की इस बात पर मुहर लगा दी है कि अगर मोदी सरकार फिर से आई, तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस चुनाव में भाजपा ने बांटने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने असली मुद्दों को चुना।

खरगे ने ‘दलित प्रधानमंत्री’ से जुड़े सवाल पर कहा, ‘मैंने कभी भी यह नहीं कहा कि मैं दलित हूं, इसलिए दो। सबकुछ पार्टी ने दिया है। सोनिया गांधी की देन है। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष बनाया और एआईसीसी (अध्यक्ष) भी बनाया। हमारी पार्टी में जो भी निर्णय लिया जाता है, उसी के हिसाब से काम करेंगे। ऐसा नहीं है कि सिर्फ दलित हूं, इसलिए मांगने वाला हूं। अब तक भी नहीं मांगा।’

खरगे ने महात्मा गांधी के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टिप्पणी को लेकर उन पर निशाना साधा और कहा कि या तो प्रधानमंत्री अनजान हैं या फिर उन्होंने पढ़ा नहीं है। उन्होंने कहा, ‘सारी दुनिया महात्मा गांधी को जानती है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के सामने उनकी प्रतिमा लगी है। दुनिया के बहुत सारे देशों में महात्मा गांधी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। उन्होंने पिछले 15 दिनों में 232 बार कांग्रेस का, 758 बार अपना, 573 बार I.N.D.I.A गठबंधन और विपक्ष का नाम लिया। खरगे ने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान 421 बार मंदिर-मस्जिद और समाज को बांटने की बात की। उन्होंने 224 बार मुस्लिम, अल्पसंख्यक जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया। लेकिन चुनाव आयोग ने इसपर कोई कार्रवाई नहीं की।’उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि महात्मा गांधी, उनके काम के बारे में पता नहीं है, तो शायद संविधान के बारे में भी पता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि चार जून के बाद खाली समय में प्रधानमंत्री को महात्मा गांधी की जीवनी ‘माई एक्सपेरीमेंट्स विथ ट्रूथ’ पढ़नी चाहिए।

आखिर संसद से क्यों हटाई गई गांधी और अंबेडकर की प्रतिमा?

हाल ही में संसद से गांधी और अंबेडकर की प्रतिमा को हटा दिया गया है! संसद भवन परिसर में महापुरुषों की मूर्तियां हटाए जाने को लेकर जो विवाद उठा, उस पर लोकसभा सचिवालय की सफाई आई है। सचिवालय की ओर से कहा गया कि सेंट्रल विस्टा के तहत सौंदर्यीकरण के चलते यह मूर्तियां हटाई गई हैं। काम खत्म होने के बाद उन्हें उचित तरीके से प्रदर्शित किया जाएगा। कहा गया कि संसद भवन परिसर से किसी भी महापुरुष की प्रतिमा को हटाया नहीं गया है, बल्कि उन्‍हें संसद भवन परिसर के अंदर ही व्‍यवस्थित और सम्मानजनक रूप से स्थापित किया जा रहा है। बता दें कि इस प्रेरणा स्थल’ को इस प्रकार विकसित किया जा रहा है कि संसद परिसर में भ्रमण के लिए आने वाले आगंतुक इन महापुरूषों की प्रतिमाओं का सुगमता से दर्शन कर सकें और उनके जीवन दर्शन से प्रेरणा ले सकें। इस ‘प्रेरणा स्थल’ में हमारे महापुरुषों एवं स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन व उनके योगदान के बारे में आगंतुकों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की जा रही है। यही नहीं इन महापुरुषों और स्वतंत्रतता सेनानी महानायकों ने अपने जीवन दर्शन और अपने कृतित्व से देश के जनजातीय गौरव को स्थापित किया, शोषित-वंचित समाज के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया है। वे हमारे राष्ट्र की वर्तमान एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए शाश्वत प्रेरणा के स्रोत हैं। उल्लेखनीय है कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत चल रहे काम के चलते संसद परिसर में लगी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर और छत्रपति शिवाजी की प्रतिमाओं को उनकी जगह से हटाया गया है। जिसे लेकर कांग्रेस ने गुरुवार को सवाल भी उठाया। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाते हुए निशाना साधा कि संसद भवन के सामने छत्रपति शिवाजी महाराज, महात्मा गांधी और बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्तियों को उनके विशिष्ट स्थानों से हटा दिया गया है। यह बेहद अपमानजनक हरकत है।

इसके बाद लोकसभा सचिवालय की ओर से कहा गया कि संसद के नए भवन के निर्माण के पश्चात संसद परिसर में लैंडस्केपिंग और सौंदर्यीकरण की कार्य योजना बनायी गई है, ताकि इस परिसर को संसद की उच्च गरिमा और मर्यादा के अनुरूप भव्य और आकर्षक बनाया जा सके। संसद परिसर में देश के महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाएं कैंपस के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग स्थानों पर स्थापित की गई थीं। इन महापुरुषों और स्वतंत्रतता सेनानी महानायकों ने अपने जीवन दर्शन और अपने कृतित्व से देश के जनजातीय गौरव को स्थापित किया, शोषित-वंचित समाज के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया है। वे हमारे राष्ट्र की वर्तमान एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए शाश्वत प्रेरणा के स्रोत हैं।

संसद परिसर में अलग अलग स्थानों पर स्थित होने की वजह आगंतुक इन प्रतिमाओं को सुविधाजनक रूप से नहीं देख पाते थे। इसलिए इन सभी प्रतिमाओं को संसद भवन परिसर में ही सम्मानजनक रूप से एक भव्य ‘प्रेरणा स्थल’ में स्थापित किया जा रहा है। इस प्रेरणा स्थल’ को इस प्रकार विकसित किया जा रहा है कि संसद परिसर में भ्रमण के लिए आने वाले आगंतुक इन महापुरूषों की प्रतिमाओं का सुगमता से दर्शन कर सकें और उनके जीवन दर्शन से प्रेरणा ले सकें। इस ‘प्रेरणा स्थल’ में हमारे महापुरुषों एवं स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन व उनके योगदान के बारे में आगंतुकों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की जा रही है।

जिसे लेकर कांग्रेस ने गुरुवार को सवाल भी उठाया। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाते हुए निशाना साधा कि संसद भवन के सामने छत्रपति शिवाजी महाराज, इसके बाद लोकसभा सचिवालय की ओर से कहा गया कि संसद के नए भवन के निर्माण के पश्चात संसद परिसर में लैंडस्केपिंग और सौंदर्यीकरण की कार्य योजना बनायी गई है,काम खत्म होने के बाद उन्हें उचित तरीके से प्रदर्शित किया जाएगा। कहा गया कि संसद भवन परिसर से किसी भी महापुरुष की प्रतिमा को हटाया नहीं गया है, बल्कि उन्‍हें संसद भवन परिसर के अंदर ही व्‍यवस्थित और सम्मानजनक रूप से स्थापित किया जा रहा है। ताकि इस परिसर को संसद की उच्च गरिमा और मर्यादा के अनुरूप भव्य और आकर्षक बनाया जा सके। संसद परिसर में देश के महापुरुषों और स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाएं कैंपस के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग स्थानों पर स्थापित की गई थीं।महात्मा गांधी और बाबासाहेब अंबेडकर की मूर्तियों को उनके विशिष्ट स्थानों से हटा दिया गया है। यह बेहद अपमानजनक हरकत है। जिससे विज़िटर्स उनके जीवन और विचारों से प्रेरणा ले सकें।