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क्या अब भारत को फिर से बचने के लिए तैयार है विदेश मंत्री एस जयशंकर?

विदेश मंत्री एस जयशंकर भारत को फिर से बचने के लिए तैयार है! मोदी 2.0 में भारत की विदेश नीति में कई आयाम अलग दिखे। G 20 की अध्यक्षता के दौरान यूक्रेन युद्ध के बीच बंटी दुनिया में पश्चिमी और रूसी ब्लॉक दोनों को एक मंच पर ले आने में कामयाबी से लेकर खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज़ की तरह दिखाने की कवायद। हालांकि इस दौरान कनाडा की ओर से लगे आरोप और धार्मिक आजादी के मामले पर अमेरिका की टिप्पणियां चुनौती बनकर भारतीय डिप्लोमेसी की राह को चुनौती पूर्ण बनाती। ऐसे में बदलते वर्ल्ड ऑर्डर और क्षेत्रीय संघर्षों की मौजूदगी ने भारत की चुनौतियों को और बढ़ाया ही है।इस सच्चाई से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता कि पिछले साल से लगातार भारत नेबरहुड फर्स्ट की पॉलिसी पर लौटता आ रहा है, जिसमें नेपाल और श्रीलंका समेत दूसरे देशों को आर्थिक मदद और दूसरी कोशिशों के जरिए संबंध और बेहतर किए जाने की कवायद की जा रही है। लेकिन मालदीव समेत कई पड़ोसी देशों की नीति चीन के प्रभाव में हैं । ORF के फेलो कबीर तनीजा कुछ ऐसा ही मानते हैं, वो कहते हैं कि जयशंकर की प्राथमिकताएं उन मुद्दों को लेकर वहां से शुरू होती हैं, जो उन्होंने चुनाव से पहले अधूरी छोड़ी थी।

रोज बदलती दुनिया कि जटिलताएं कम नहीं हो रही है,बल्कि बढ़ ही रही हैं। यूक्रेन, गाज़ा में हो रहे संघर्षों का स्वरूप बदला नहीं है। ऐसे में जैसा कि बीते सालों से वो करते आ रहे हैं, उसी के तरह वो भारत की प्राथमिकताओं की ही सुरक्षा करने का काम करने की कोशिश करेंगे, उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में ये होगा कि जिओ पॉलिटिकल घटनाओं का बुरा प्रभाव इकोनमी पर ना पड़े। ऐसे में माना जा रहा है कि जयशंकर भारत नरेटिव और ग्लोबल साउथ के एजेंडे पर विदेश नीति को गढ़ना जारी रखेंगे।

हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि फॉरेन पॉलिसी के मूल ढांचे में चाहे बदलाव ना दिखे, लेकिन डिप्लोमेसी में कुछ स्थूल बदलाव दिख सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और जेएनयू में पढ़ाने वाले अमिताभ सिंह कहते हैं कि ” इजरायल हमास संघर्ष के मद्देनज़र पिछले साल 7 अक्टूबर के हमले के बाद भारत का रुख आतंकवाद को लेकर एक मजबूत संदेश लिए हुआ था, उसमें कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है।

इसके साथ ही दुनिया भर में संघर्षों को लेकर जिस तरह राइटविंग सरकारें रुख रखती हैं, उसे रखना अब भारत के लिए मुश्किल होगा, हालांकि मिडिल ईस्ट के मुद्दे पर वो पिछली सरकार में देखने को मिला था। इसके साथ ही विदेशी मंचों में मोदीमय माहौल में कमी आने की संभावना है, जो कि पिछली साफ बार साफ तौर से दिखाई पड़ी थी। ”

जानकार मानते हैं कि पड़ोसी देशों को लेकर चीन की आक्रामकता एक चुनौती बनी रहेगी। इस सच्चाई से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता कि पिछले साल से लगातार भारत नेबरहुड फर्स्ट की पॉलिसी पर लौटता आ रहा है, जिसमें नेपाल और श्रीलंका समेत दूसरे देशों को आर्थिक मदद और दूसरी कोशिशों के जरिए संबंध और बेहतर किए जाने की कवायद की जा रही है। लेकिन मालदीव समेत कई पड़ोसी देशों की नीति चीन के प्रभाव में हैं ।

ऐसे में शपथ ग्रहण में मुइज्जू का शामिल होना सकारात्मक संकेत तो है, लेकिन अपनी मूल नीति चीन परस्ती से वो पीछे हटेगा ऐसा लगता नहीं। वहीं श्रीलंका में इस साल राष्ट्रपति चुनाव होने हैं तो ऐसे में रानिल विक्रमासिंघे शायद जियो पॉलिटिकल समीकरणों के लिहाज से समर्थन तलाश रहे हैं। बता दें कि इस दौरान कनाडा की ओर से लगे आरोप और धार्मिक आजादी के मामले पर अमेरिका की टिप्पणियां चुनौती बनकर भारतीय डिप्लोमेसी की राह को चुनौती पूर्ण बनाती। ऐसे में बदलते वर्ल्ड ऑर्डर और क्षेत्रीय संघर्षों की मौजूदगी ने भारत की चुनौतियों को और बढ़ाया ही है।उसी के तरह वो भारत की प्राथमिकताओं की ही सुरक्षा करने का काम करने की कोशिश करेंगे, उनकी बड़ी प्राथमिकताओं में ये होगा कि जिओ पॉलिटिकल घटनाओं का बुरा प्रभाव इकोनमी पर ना पड़े। ऐसे में माना जा रहा है कि जयशंकर भारत नरेटिव और ग्लोबल साउथ के एजेंडे पर विदेश नीति को गढ़ना जारी रखेंगे। ORF के फेलो कबीर तनीजा कुछ ऐसा ही मानते हैं, वो कहते हैं कि जयशंकर की प्राथमिकताएं उन मुद्दों को लेकर वहां से शुरू होती हैं, जो उन्होंने चुनाव से पहले अधूरी छोड़ी थी। लेकिन बावजूद इसके पड़ोसियों की विदेश नीति को लेकर भारत को लगातार काम करना होगा।

क्या मालदीव के राष्ट्रपति खेल रहे हैं दोगला खेल?

वर्तमान में मालदीव के राष्ट्रपति दोगला खेल खेल रहे मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत में मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने के लिए आए और नए कार्यकाल में भारत और मालदीव के साथ रिश्ते सुधरने की उम्मीद जता रहे थे। पीएम मोदी से भी उनकी बातचीत हुई और सोमवार केंद्रीय मंत्री एस जयशंकर ने मुइज्जू के साथ मीटिंग की। जब मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत में थे और घनिष्ठ और ऐतिहासिक संबंधों को बढ़ाने की बात कर रहे थे उसी समय उनके देश में एक संसदीय समिति ने तीन समझौतों की समीक्षा की घोषणा कर दी।मोदी सरकार के नए कार्यकाल में भारत और मालदीव के बीच रिश्ते सुधरने की उम्मीद है। एक ओर रिश्ते सुधरने की बात कही जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर मालदीव के सरकारी प्रसारक पब्लिक सर्विस मीडिया ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का लाइव प्रसारण आखिरी वक्त में रद्द कर दिया। इस समझौते पर मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और भारत समर्थक नेता इब्राहिम सोलिह ने भारत के साथ हस्ताक्षर किए थे। अब इस समीक्षा के पीछे यह कहा जा रहा है कि इनमें कथित तौर पर मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन किया गया था। इतना ही नहीं मोदी के शपथ ग्रहण का लाइव प्रसारण भी वहां रोक दिया गया। मालदीव की स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सांसद अहमद अजान ने कहा कि संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा सेवा समिति ने सोलिह के प्रशासन द्वारा मालदीव की संप्रभुता और स्वतंत्रता को कमजोर करने वाली कार्रवाइयों की जांच के लिए एक संसदीय जांच करने का फैसला किया है। अजान ने संसदीय जांच शुरू करने का प्रस्ताव रखा और आरोप लगाया कि पिछली सरकार के कार्यों ने देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता को प्रभावित किया है। मुइज्जू की सरकार ने पिछले साल घोषणा की थी कि वह मालदीव के जलक्षेत्र में संयुक्त हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए भारतीय नौसेना के साथ समझौते को रिन्यू नहीं करने जा रही है।

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भले ही भारत में थे लेकिन मालदीव में वहां की सरकार की नफरत भारत के खिलाफ कम होती नहीं दिख रही है। मुइज्जू भारत मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने के लिए भारत आए थे। शपथ ग्रहण में आने से पहले मुइज्जू की ओर से कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होना उनके लिए सम्मान की बात होगी। मोदी सरकार के नए कार्यकाल में भारत और मालदीव के बीच रिश्ते सुधरने की उम्मीद है। एक ओर रिश्ते सुधरने की बात कही जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर मालदीव के सरकारी प्रसारक पब्लिक सर्विस मीडिया ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का लाइव प्रसारण आखिरी वक्त में रद्द कर दिया।

पिछले साल 17 नवंबर को मालदीव का राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू की यह पहली भारत यात्रा थी। मुइज्जु का रुख चीन समर्थक है। उनके मालदीव के राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद से भारत और मालदीव के संबंधों में भारी तनाव पैदा हो गया था। उन्होंने शपथ लेने के कुछ ही घंटों बाद अपने देश से भारतीय सैन्यकर्मियों को वापस बुलाए जाने की मांग की थी। इस महीने की शुरुआत में भारतीय सैन्यकर्मियों की जगह आम नागरिकों को तैनात किया गया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और भारत समर्थक नेता इब्राहिम सोलिह ने भारत के साथ हस्ताक्षर किए थे।

अब इस समीक्षा के पीछे यह कहा जा रहा है कि इनमें कथित तौर पर मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन किया गया था। इतना ही नहीं मोदी के शपथ ग्रहण का लाइव प्रसारण भी वहां रोक दिया गया।मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भले ही भारत में थे लेकिन मालदीव में वहां की सरकार की नफरत भारत के खिलाफ कम होती नहीं दिख रही है। मुइज्जू भारत मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने के लिए भारत आए थे। शपथ ग्रहण में आने से पहले मुइज्जू की ओर से कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होना उनके लिए सम्मान की बात होगी।मुइज्जू की सरकार ने पिछले साल घोषणा की थी कि वह मालदीव के जलक्षेत्र में संयुक्त हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए भारतीय नौसेना के साथ समझौते को रिन्यू नहीं करने जा रही है।शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए मुइज्जू को दिया गया निमंत्रण और फिर दिल्ली आना भारत और मालदीव के बीच हाल के तनावपूर्ण संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन ऐसा लगता है कि तनावपूर्ण संबंध जल्द पूरी तरह ठीक नहीं होंगे।

देश का कारोबारी समुदाय मोदी सरकार का समर्थन क्यों कर रहा है? बीजेपी-राज उन्हें क्या उम्मीद दे रही है?

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भारतीय कारोबारी डर के मारे तो नहीं करते मोदी सरकार की आलोचना? भाजपा सरकार के पीछे व्यापारियों का समर्थन किस मानसिकता से आ रहा है? भारतीय व्यापार जगत इस समय संघर्ष की स्थिति में है। एक ओर, आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत की गूंज ने शेयर बाजार में सकारात्मक धारणा ला दी है। दूसरी ओर, कई व्यापारी दिल्ली में बीजेपी सरकार को लेकर आशंकित हैं. उद्योगपति राहुल बजाज (दिवंगत) ने चार साल पहले अमित शाह से कहा था कि उद्योगपति सरकार की आलोचना करने से डरते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार ऐसी आलोचना बर्दाश्त नहीं करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक जगत में उनका कोई भी मित्र इस मामले को इतनी स्पष्टता से स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही उन्होंने मनमोहन सिंह युग की तुलना बीजेपी युग से की और कहा कि पहले सरकार की खुलकर आलोचना करना संभव था.

जवाब में, शाह ने बजाज से कहा कि उनकी सरकार को संसद में और संसद के बाहर किसी भी अन्य सरकार की तुलना में अधिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचना के कारण सरकार के निशाने पर आने का कोई अच्छा कारण नहीं है। शाह ने यह भी कहा कि सरकार का इरादा किसी को डराना नहीं है. लेकिन हकीकत में व्यापारियों-उद्योगपतियों में सरकार और उसकी ‘एजेंसियों’ को लेकर एक तरह की सतर्कता है. व्यावसायिक ‘लॉबी समूह’ या ‘प्रभावशाली समूह’ भी सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना न करने की सलाह देते हैं। लेकिन शेयर बाजार में विदेशी कंपनियों या घरेलू निवेशकों के उत्साह को देखकर ऐसा लगता है कि उनमें से कोई भी उस अर्थ से डरता नहीं है, बल्कि वे काफी आशावादी हैं।

कारोबारी हलकों में लगातार यह चर्चा है कि नरेंद्र मोदी सरकार अगली गर्मियों में चुनाव में वापसी करेगी। लेकिन एकल वर्चस्व नहीं मिलेगा. परिणामस्वरूप, उन्हें सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की तलाश करनी होगी। वे पार्टनर उन पर कोई भी शर्त लगा सकते हैं। फिलहाल, ऐसी कहानियां प्रचलित हैं कि किस तरह सरकार के ‘पसंदीदा’ व्यवसायियों द्वारा विभिन्न कंपनियों पर नजर रखी जा रही है और उनके मालिकों को विभाग द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। अगर ऐसी कोई कंपनी शिकार बन जाती है और उसका विनिवेश हो जाता है, तो कर अराजकता की ज्यादा चर्चा नहीं होती है। कंपनियों को दिवालिया घोषित कर नीलाम किया जा रहा है और वे व्यापारी नीलामी में आखिरी बोली लगाने वाले हैं, जिन पर सरकार की नजर है।

इसके बाद भी व्यापारी मोदी सरकार को चुन रहे हैं. क्योंकि, इस सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो उनके बिजनेस के लिए मददगार हैं। उदाहरण के लिए, कॉर्पोरेट कर के स्तर को कम करना, घरेलू उत्पादकों को विदेशी आयात द्वारा निगले जाने से बचाने के लिए टैरिफ और गैर-टैरिफ सुरक्षा प्रदान करना (याद रखें, अधिकांश भारतीय व्यवसायी, यहां तक ​​​​कि राहुल बजाज ने भी वैश्वीकरण के पक्ष में बात नहीं की है)। इसके अलावा, अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में भी सुधार किये गये हैं। निवेश के लिए सब्सिडी का प्रस्ताव है और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जाता है। और इसने भौतिक बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता में सुधार के लिए अभूतपूर्व सरकारी निवेश को भी सक्षम बनाया है। तो आलोचना वास्तव में कहां है?
व्यापारियों का ध्यान इस बात पर है कि मोदी सरकार स्थिरता और निरंतरता का वादा कर रही है। कोई भी पिछली गठबंधन सरकार की दुर्गति को दोहराना नहीं चाहता (चुनाव के बाद गैर-भाजपा सरकार बनने की सबसे कम संभावना भी नहीं)। कोई भी नीति निर्माण को लेकर उस तरह का भ्रम नहीं चाहता जैसा मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी वर्षों में हुआ था। अगर बात ‘राजस्व आतंकवाद’ की हो रही है तो अगर यह सवाल उठे कि क्या मोदी काल में इसका स्तर कांग्रेस काल की तुलना में कम है, तो हमें अपना ध्यान दूसरे मुद्दे की ओर मोड़ना होगा. कांग्रेस द्वारा दिया जा रहा हालिया संदेश मुख्य रूप से लोक कल्याण उन्मुख और मुफ्त वस्तुओं के वादों से भरा है। इससे साफ पता चलता है कि ऐसे मामलों में सरकारी खजाना जिम्मेदारी नहीं उठाएगा। कांग्रेस ने अभी तक उस लिहाज से कोई व्यापारोन्मुखी संदेश नहीं दिया है.

यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें दूर की समानता मिलती है। जैसा कि आर्थिक इतिहासकार तीर्थंकर रॉय ने अपनी पुस्तक ए बिजनेस हिस्ट्री ऑफ इंडिया में दिखाया है, मुगल साम्राज्य के विस्तार ने वस्तुतः एक आर्थिक माहौल तैयार किया जिसमें व्यापारी (मुख्य रूप से पंजाबी क्षत्रिय और मारवाड़ी व्यापारी) पूर्वी भारत की ओर बढ़ने लगे। जब ‘पैक्स मुगलियाना’ (मुगल साम्राज्य का सीधा शासन) बंगाल तक फैल गया, तो उन्होंने अपने व्यवसायों को भी इस संघर्ष में फँसा दिया। तीर्थंकर बताते हैं कि जब मुगल साम्राज्य पतन के कगार पर था, उस उथल-पुथल के दौर में, व्यापारियों ने कम सामंती संघर्ष वाले स्थानों और अपेक्षाकृत राजनीतिक रूप से स्थिर क्षेत्रों को चुनना शुरू कर दिया। यही कारण है कि बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता जैसे ब्रिटिश शासित बंदरगाह शहर उन व्यापारियों का अड्डा बन गए। कम से कम उस समय के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी परिवार जगत सेठ का इतिहास तो इसकी पुष्टि करता है। 1857 के महान विद्रोह के दौरान भारतीय व्यापारियों ने अंग्रेजों का समर्थन किया। लेकिन जैसा कि तीर्थंकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समर्थक इतिहासकार क्रिस्टोफर बेली के विचारों का हवाला देते हैं, भारतीय पूंजी और ब्रिटिश शक्ति की परस्पर निर्भरता सुखद नहीं थी।

 

सवाल यह उठता है कि वेतन चोरी क्यों?

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एक नज़र डालने से पता चलता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में श्रम बल से अनुपस्थित महिलाओं की संख्या चिंताजनक रूप से बड़ी है। ‘कमाई’ शब्द एक दिशा सूचक यंत्र की तरह काम करता है जो यह समझ पैदा करता है कि कौन सा काम ‘काम’ है और कौन सा काम बिल्कुल भी ‘काम’ नहीं है। सवाल यह है कि काम का मतलब क्या है, कौन काम करता है या नहीं करता है और कौन कमाता है या नहीं कमाता है?

2017-18 से देश में ‘आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण’ (पीएलएफएस) नामक एक सर्वेक्षण शुरू किया गया है, जिसमें ‘श्रम बल’ को संपूर्ण कार्यबल के रूप में परिभाषित किया गया है, यानी जो कार्यरत हैं (रोजगार), और जो कार्यरत नहीं हैं भले ही वे काम की तलाश में हों या काम करने के लिए तैयार हों (बेरोजगार)। इसके बाहर की आबादी श्रम से बाहर की शक्ति है – जो काम में संलग्न नहीं हैं, काम की तलाश में नहीं हैं, और काम के लिए तैयार नहीं हैं। सर्वेक्षण की परिभाषा में ‘कार्य’ का अर्थ ‘आर्थिक गतिविधि’ है।

श्रम बल में तीन प्रकार के श्रमिक होते हैं- 1) स्व-रोज़गार, 2) आकस्मिक श्रमिक, 3) नियमित वेतन या वेतनभोगी श्रमिक। ‘स्व-रोज़गार’ श्रेणी की दो उप-श्रेणियाँ हैं। स्व-स्वामित्व वाले वित्तीय उद्यमों में शामिल कर्मचारी, और पारिवारिक वित्तीय उद्यमों में गैर-कमाऊ सहायक। इस दूसरी उप-श्रेणी के कर्मचारी पारिवारिक वित्तीय उद्यमों के संबंध में पूर्ण या अंशकालिक काम करते हैं, लेकिन उन्हें उस काम के लिए वेतन या मजदूरी नहीं मिलती है। 2022-23 में, ‘श्रम बल’ में शामिल होने की दर 83.2% (पुरुष) और 39.8% (महिला) थी, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 87% (पुरुष) और 36.9% (महिला) थी। इस श्रम शक्ति में देश का औसत कार्यबल अनुपात 80.2% (पुरुष) और 38.5% (महिला) है, पश्चिम बंगाल में – 84.8% (पुरुष) और 36.1% (महिला) है।

एक नज़र डालने से पता चलता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में श्रम बल से अनुपस्थित महिलाओं की संख्या चिंताजनक रूप से बड़ी है। लेकिन जो महिलाएं कार्यबल में हैं, उनकी खतनी और खतनी की मजदूरी कैसी है, इसे देखकर एक आश्चर्यजनक वेतन-अंतर की कहानी सामने आती है। यह देखा जा सकता है कि कार्यबल में स्व-रोजगार की दूसरी उप-श्रेणी में, बड़ी संख्या में महिला श्रमिक आय या उत्पादन के लिए पारिवारिक उद्यमों में गैर-कमाई वाले सहायक कार्यों में लगी हुई हैं। 2017-18 में वे देश की कुल महिला कार्यबल का 31.7%, 2018-19 में 30.9%, 2019-20 में 35%, 2020-21 में 36.6%, 2021-22 में 36.7% और 2022 में 37.5% थीं -23. पश्चिम बंगाल के लिए: 2017-18 में 13.8%, 2018-19 में 15.6%, 2019-20 में 17.3%, 2020-21 में 18.1%, 2021-22 में 20.2% और 2022- 23 वर्षों में 23.3%। पिछले 6 वर्षों में, यह स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में महिलाएँ ‘बेरोजगार’ हैं, भले ही वे सीधे श्रमिक के रूप में देश के उत्पादन या वित्तीय गतिविधियों में शामिल हों। भले ही वे पारिवारिक उद्यमों में स्व-रोज़गार श्रमिक हैं, वे ‘मालिक’ नहीं हैं, क्योंकि उनके नाम पर स्वामित्व नहीं है, इन उद्यमों की आय बिल्कुल भी उनकी नहीं है, और चूंकि वे पारिवारिक उद्यमों से जुड़े श्रमिक हैं, वे ‘मजदूर’ नहीं हैं, इसलिए कोई मजदूरी या वेतन नहीं है। यदि कोई बाहरी श्रमिक उनका काम करता था, तो उस श्रमिक को मजदूरी देनी पड़ती थी।

सामान्य ज्ञान दो प्रश्न उठाता है। एक, यदि कोई आय नहीं है तो उन्हें ‘रोज़गार’ क्यों दिया जाता है? दो, यदि वे ‘रोज़गार’ हैं, तो कोई आय क्यों नहीं है? पहले प्रश्न का उत्तर खोजते समय देखने में आता है कि यदि इन बेरोजगार महिला श्रमिकों की गिनती की जाए तो बेरोजगारी दर काफी कम दिखाई देती है। दूसरा उत्तर लैंगिक राजनीति के साथ वर्ग शोषण के पारंपरिक संबंध में पाया जाना है।

गंजना को पहले ही शाप दिया जा चुका है। कुछ दिन पहले कामकाजी महिलाओं की आंखें तरेरती थीं, ‘घर से बाहर घूमती लड़कियां’! और आज पितृसत्तात्मक समाज के सामने उसके रोजगार का सवाल खड़ा हो गया है! महिलाओं को सीधे पैसा देने की योजना के बारे में समाज का एक वर्ग प्राप्तकर्ताओं पर जो विभिन्न लांछन लगाता है, उनमें से दो सबसे शक्तिशाली अपशब्द हैं ‘मुफ्त का पैसा’ और ‘भीख मांगना’। दिलचस्प बात यह है कि इस गरीब समाज ने घटिया खट्टन के बदले में घरेलू आय से संबंधित कार्यों में शामिल बड़ी संख्या में महिलाओं की ‘उचित मजदूरी’ से बचने में दशकों का समय बिताया है।

लेकिन जब बात इस पर आती है तो चर्चा खुली होनी चाहिए। बड़ी संख्या में महिला श्रमिक जिन्होंने अपनी श्रम शक्ति परिवार के कमाई वाले काम और उत्पादन कार्यों में खर्च की है, लेकिन बदले में उन्हें ‘शून्य’ वेतन मिला है, उन्हें अपना वेतन कब और क्या मिलेगा, इस बारे में स्पष्ट रूप से अपना मुंह खोलना चाहिए। और जो समाज दशकों से कल्याणकारी राज्य की जटिल अर्थव्यवस्था में ‘भीख’ किसे कहते हैं, लेकिन ‘बिना वेतन के कम वेतन’ का मतलब भी नहीं समझ पाता, उसे भी इस बार समझदारी दिखानी होगी. यह सुनिश्चित करने के लिए कि बड़ी संख्या में महिलाएं मजदूरी कमाने वाले कार्यबल से बाहर न रह जाएं।

श्रम बाजार में महिलाओं के लिए श्रम के अवसर, न्यूनतम आय की गारंटी, और सब्सिडी तक महिलाओं की सीधी पहुंच को अधिकार के रूप में कानूनी मान्यता देना आवश्यक है, ताकि इन भत्तों की निरंतरता किसी शासक की सनक और तिरस्कार पर निर्भर न हो, या इस बात पर विवाद न हो कि कहां पैसा कहाँ से आ रहा है। नहीं, आख़िरकार, कोई भी बजट के इन सभी हिस्सों की ज़िम्मेदारी प्राप्तकर्ता महिलाओं के कंधों पर नहीं डाल सकता है।

 

शनिवार को कनाडा के खिलाफ ग्रुप के आखिरी मैच में रोहित की पहली ग्यारह जोड़ी में बदलाव?

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भारतीय खेमा टी20 वर्ल्ड कप के सुपर आठ चरण से पहले दो क्रिकेटरों पर नजर डालना चाहता है. इसलिए योजना कनाडा के खिलाफ पहली एकादश में बदलाव करने की है। रोहित शर्मा शनिवार को टी20 वर्ल्ड कप में ग्रुप का आखिरी मैच खेलेंगे. फ्लोरिडा में भारत का प्रतिद्वंद्वी कनाडा है, जो ग्रुप अंक तालिका में चौथे स्थान पर है। पहले ही अंतिम आठ में जगह बना चुकी भारतीय टीम कनाडा के खिलाफ शुरुआती एकादश में दो बदलाव कर सकती है। मूल रूप से, जो क्रिकेटर पहली ग्यारह में नहीं हैं, उन्हें सुपर आठ चरण से पहले मैच खेलने का मौका देने के लिए बदलाव किया जाएगा।

कनाडा के खिलाफ ओपनिंग जोड़ी में कोई बदलाव नहीं होगा. रोहित के साथ विराट कोहली करेंगे शुरुआत. कोहली टी20 वर्ल्ड कप फॉर्म में नहीं हैं. सुपर आठ से पहले ट्रैक पर वापस आना उनके लिए जरूरी है। तीसरे नंबर पर विकेटकीपर बल्लेबाज ऋषभ पंत होंगे. सूर्यकुमार यादव बल्लेबाजी क्रम में चौथे नंबर पर होंगे. पांचवें नंबर पर उपकप्तान हार्दिक पंड्या आएंगे. यानी कनाडा के खिलाफ भारतीय टीम के बल्लेबाजी क्रम में पहले पांच स्थान अपरिवर्तित रहेंगे.

बल्लेबाजी क्रम में छठे नंबर पर बदलाव हो सकता है. इन-फॉर्म आईपीएल विकेटकीपर-बल्लेबाज संजू सैमसन की जगह शिवम दुबे लेंगे। पिछले मैच में रन बनाने के बावजूद मुंबई के ऑलराउंडर को कनाडा के खिलाफ आराम दिया जाएगा। रवींद्र जड़ेजा सातवें नंबर पर उतरेंगे. टी20 वर्ल्ड कप में अभी तक जडेजा कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं. सुपर आठ में भी उनकी भूमिका अहम होगी. कनाडा के खिलाफ उन्हें अपना आत्मविश्वास बढ़ाने का मौका मिलेगा. बल्लेबाजी क्रम में आठवें नंबर पर कोई बदलाव नहीं होगा. अक्षर पटेल खेलेंगे.

फ्लोरिडा की बल्लेबाजी मददगार विकेटों और स्पिनरों के सामने कनाडा के बल्लेबाजों की कमजोरी को भारतीय खेमा ध्यान में रख रहा है. तो कुलदीप यादव पहली एकादश में आएंगे. सफेद गेंद क्रिकेट में कुलदीप कोच राहुल द्रविड़ के पसंदीदा क्रिकेटरों में से एक हैं। वह खेला जाएगा. वह नौवें नंबर पर बल्लेबाजी करेंगे. इसके अलावा कुलदीप को सुपर आठ से पहले मैचों का अभ्यास करने का मौका भी दिया जा सकता है. वह टीम में मोहम्मद सिराज की जगह लेंगे. बल्लेबाजी क्रम में अंतिम दो स्थानों पर दो तेज गेंदबाज, जसप्रीत बुमराह और अर्शदीप सिंह का कब्जा होगा। टी20 वर्ल्ड कप में दोनों फॉर्म में हैं. नियमित रूप से विकेट लेना. इसलिए रोहित-द्रविड़ उन्हें बिठाकर लय खराब नहीं करना चाहते.

भारतीय टीम पहले ही सुपर आठ में जगह पक्की कर चुकी है. कनाडा के खिलाफ मैच आवश्यक परीक्षण पूरा करने का सबसे अच्छा मौका है। इसलिए भारतीय टीम ने शनिवार को फ्लोरिडा में पहली एकादश में दो बदलाव की योजना बनाई है।

जब 19वें ओवर में सोमपाल कामी ने एनरिक नोखिया को 103 मीटर लंबा छक्का लगाकर आउट किया तो यह साफ हो गया कि नेपाल को क्रिकेट के मैदान पर जल्दी आउट नहीं किया जा सकता। साउथ अफ्रीका ने शनिवार को आखिरी गेंद पर सिर्फ 1 रन से टी20 वर्ल्ड कप जीत लिया. नेपाल के गुलशन झा महज दो इंच की दूरी पर रन आउट हो गये.

नेपाल की जीत विश्व क्रिकेट में अब तक की सबसे महान घटनाओं में से एक होती। उन्होंने बताया कि अमेरिका की तरह नेपाल भी अब क्रिकेट में एक नया आश्चर्य है।

शनिवार को नेपाल ने टॉस जीतकर दक्षिण अफ्रीका को पहले बल्लेबाजी के लिए भेजा. दक्षिण अफ्रीका ने 20 ओवर में 7 विकेट पर 115 रन बनाए. नेपाल 20 ओवर में 7 विकेट पर 114 रन पर रुका.

बाएं हाथ के स्पिनर तबरेज शम्सी के बिना दक्षिण अफ्रीका यह मैच नहीं जीत पाता. वह चार ओवर में 19 रन देकर 4 विकेट लेकर मैन ऑफ द मैच रहे। जब नेपाल के कुशल भुर्टेल, आशिफ शेख, अनिल शाहेरा बल्लेबाजी कर रहे थे तो दक्षिण अफ्रीका के गेंदबाज काफी औसत दर्जे के नजर आ रहे थे.

इनमें आशिफ शेख सर्वश्रेष्ठ थे. उन्होंने 49 गेंदों पर 42 रन बनाए. तेरहवें ओवर में कैगिसो ने रबाडा को मैदान से बाहर भेजकर दिखा दिया कि उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता. शाह ने 24 गेंदों पर 27 रन बनाए. आशिफ के साथ ओपनिंग करने उतरे भुर्टेल ने 21 गेंदों पर 13 रन बनाए.

दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज भुर्टेल की गेंदबाजी का फायदा नहीं उठा सके. इस लेग स्पिनर ने चार ओवर में 19 रन देकर 4 विकेट लिए. दीपेंद्र सिंह ऐरी ने 3 विकेट लिए। दक्षिण अफ्रीका के रिजा हेंड्रिक्स (43) और ट्रिस्टन स्टब्स (27) के अलावा कोई भी अच्छा रन नहीं बना सका।

‘नीतीश ने मोदी के पैर पकड़कर बिहार को शर्मसार किया’, जेडीयू प्रमुख ने कसा तंज

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नीतीश ने सत्ता पर काबिज होने के लिए मोदी के पैर पकड़े, बिहार को शर्मसार किया’, जेडीयू प्रमुख ने किया कटाक्ष पीके ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी जेडीयू के लिए चुनावी रणनीति तैयार की थी. हालांकि, फिलहाल जेडीयू और पिक के बीच दूरियां बढ़ गई हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूकर नीतीश कुमार ने बिहार को किया शर्मसार! प्रशांत किशोर (पीके) ने शुक्रवार को भागलपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ऐसी टिप्पणी की. पीक का दावा है कि सत्ता में बने रहने के लिए नीतीश को मोदी के पैरों पर गिरना पड़ा.

तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले मोदी ने एनडीए सहयोगियों के साथ संसदीय दल की बैठक की। वहां नीतीश उनके पैर छूकर झुकते नजर आ रहे हैं. इसी सिलसिले में इस बार पीके ने बिहार के मुख्यमंत्री को निशाने पर लिया है. भोटाकुश्ली के शब्दों में, “किसी भी राज्य का प्रशासनिक प्रमुख जनता का गौरव होता है। लेकिन जब नीतीश कुमार ने मोदी के पैर छुए तो उन्होंने पूरे बिहार को शर्मसार कर दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री अपने पद का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं? अब नीतीश चाहें तो अपनी ताकत का इस्तेमाल कर राज्य के लिए कई सुविधाएं सुनिश्चित कर सकते हैं. लेकिन वह ऐसा नहीं करता. वह यह सुनिश्चित करने के लिए मोदी के पैर पकड़ रहे हैं कि 2025 के विधानसभा चुनाव में भी वह सत्ता में बने रहें।

बता दें कि पीके ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी जेडीयू के लिए चुनावी रणनीति तैयार की थी. हालांकि, फिलहाल जेडीयू और पिक के बीच दूरियां बढ़ गई हैं. नीतीश से भी दूरियां बढ़ी हैं. भोटाकुशली ने कहा, “लोग मुझसे पूछते हैं कि अतीत में साथ काम करने के बाद मैं नीतीश कुमार की आलोचना क्यों कर रहा हूं।” लेकिन तब वह एक अलग व्यक्ति थे। फिर भी उनका ज़मीर नहीं बिका.” लोकसभा में बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने के बाद से जेडीयू अब एनडीए के सबसे अहम सहयोगियों में से एक है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई बीजेपी और सहयोगी दल के नेता मौजूद रहे. लेकिन इसका अपवाद बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू है. बुधवार को विजयवाड़ा में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें नहीं देखा गया।

गुरुवार को चंद्रबाबू के शपथ ग्रहण में नीतीश की गैरमौजूदगी पर विपक्ष ने सवाल उठाए. उन्होंने बताया कि मोदी के मंत्रिमंडल में नीतीश की पार्टी को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, इसलिए नीतीश ने चंद्रबाबू की शपथ लेने से परहेज किया। राजद प्रवक्ता इजाज अहमद ने गुरुवार को कहा, ”हमारे नेता तेजस्वी यादव ने चुनाव से पहले एनडीए के भीतर दरार की भविष्यवाणी की थी. उनकी साझेदारी को लेकर तनाव अब स्पष्ट है।” लेकिन मोदी कैबिनेट में जेडीयू के एकमात्र पूर्णकालिक मंत्री राजीवरंजन उर्फ ​​लल्लन सिंह को कम महत्वपूर्ण विभाग पंचायती राज और मत्स्य पालन एवं पशुपालन विभाग मिले. और कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री एकमात्र रामनाथ टैगोर हैं।

ऐसे में कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि बीजेपी नेतृत्व पर दबाव बढ़ाने के लिए नीतीश बुधवार को विजयवाड़ा में अनुपस्थित थे. बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता ज्ञान रंजन ने गुरुवार को कहा, ”नीतीश केंद्रीय मंत्रिमंडल में पदों के आवंटन से असंतुष्ट होने के कारण मोदी से मिलने आंध्र प्रदेश नहीं गए.”

चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी ने केंद्र में अध्यक्ष पद या प्रमुख मंत्रालयों के बदले आंध्र प्रदेश को वित्तीय सहायता देने का वादा किया। मुख्यमंत्री का वादा है कि अगर 2025 में भाजपा-जदयू गठबंधन सत्ता में आता है तो नीतीश कुमार को अध्यक्ष पद या एक महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जाएगा। मूल रूप से इसी रणनीति के तहत भाजपा ने एनडीए सरकार के दो प्रमुख सहयोगियों, तेलुगु देशम पार्टी और जेडीयू को एक पूर्ण मंत्री पद और तीन ‘कम महत्वपूर्ण’ मंत्रालयों से संतुष्ट किया है।

तेलुगु देशम सूत्रों के मुताबिक चंद्रबाबू अभी एनडीए गठबंधन छोड़कर भारत के मंच पर नहीं आना चाहते हैं. क्योंकि उन्हें इस बात पर संदेह है कि भारत मंच कब तक बरकरार रहेगा. इसके अलावा, आंध्र विधानसभा चुनाव में तेलुगु देशम, बीजेपी और जन सेना पार्टियां गठबंधन में लड़ीं। अब गठबंधन टूटा तो चंद्रबाबू की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे। इसके बजाय, वह आंध्र तेलुगु देशम को मजबूत करना चाहते हैं और राजनीतिक विरासत अपने बेटे नारा लोकेश को सौंपना चाहते हैं। तेलुगु देशम के राममोहन नायडू से बीजेपी ने उड्डयन मंत्रालय छोड़ दिया है. आज उड्डयन मंत्री का कार्यभार संभालने वाले राममोहन ने कहा कि तेलुगू देशम पर असर नहीं पड़ रहा है. वायु मंत्रालय में नौकरी के पर्याप्त अवसर हैं।

मोदी सरकार की कैबिनेट में जेडीयू को सिर्फ पंचायती राज और मत्स्य-पशुपालन-डेयरी मंत्रालय मिला है. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के साथ बातचीत चल रही थी कि 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद छोड़ देना चाहिए. लेकिन लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने बिहार में बीजेपी की तरह 12 सीटें जीत लीं. यह साबित हो गया है कि बार-बार दगाबाजी के बावजूद नीतीश की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. उनका कुर्मी वोट बैंक नहीं टूटा. बदले हुए हालात में बीजेपी ने कहा है कि अगर बीजेपी-जेडीयू गठबंधन सत्ता में आता है तो उसे विधानसभा चुनाव से पहले नहीं, बल्कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद देने में कोई आपत्ति नहीं है. जेडीयू सूत्रों के मुताबिक, नीतीश की दिलचस्पी केंद्र में किसी मंत्रालय के बजाय मुख्यमंत्री पद और टॉप-अप के तौर पर बिहार के लिए वित्तीय पैकेज में भी ज्यादा है.

आखिर नई सरकार कैसे करेगी काम जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि नई सरकार काम कैसे करेगी! एनडीए संसदीय दल के नेता नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर नई सरकार बनाने का दावा पेश किया। अगली एनडीए सरकार बनाने का दावा पेश करने के तुरंत बाद, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने नई सरकार को लेकर अपनी बात रखी। मोदी ने बताया कि शपथ ग्रहण समारोह 9 जून की शाम को होगा।5 वर्ष वैश्विक परिवेश में भी भारत के लिए बहुत उपयोगी होने वाले हैं। विश्व अनेक संकटों, अनेक तनावों, आपदाओं से गुजर रहा है… हम भारतीय भाग्यशाली हैं कि इतने बड़े संकटों के बावजूद भी आज हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में जाने जाते हैं। विकास के लिए दुनिया में हमारी प्रशंसा भी हो रही है। राष्ट्रपति भवन के सामने बोलते हुए, पीएम मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति ने मुझे अभी फोन किया और मुझे पीएम के रूप में काम करने के लिए कहा और उन्होंने मुझे शपथ समारोह के बारे में सूचित किया है।पीएम मोदी ने कहा कि एनडीए को तीसरी बार सेवा देने के लिए लोगों को धन्यवाद देते हुए, पीएम मोदी ने सभी को आश्वासन दिया कि 18वीं लोकसभा में, “हम उसी गति और समर्पण के साथ देश की आकांक्षाओं को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। पीएम मोदी ने कहा कि 18वीं लोकसभा एक तरह से नई ऊर्जा, युवा ऊर्जा से भरी है… यह 18वीं लोकसभा उन सपनों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जब देश 2047 में आजादी के 100 साल मना रहा होगा। मोदी ने कहा कि मैंने राष्ट्रपति जी से कहा है कि 9 जून की शाम को हम सहज हो जाएंगे। अब राष्ट्रपति भवन बाकी विवरण तैयार करेगा और तब तक हम मंत्रिपरिषद की सूची राष्ट्रपति जी को सौंप देंगे।एनडीए सरकार को लोगों ने देश की सेवा करने का मौका दिया है पीएम मोदी ने कहा कि 18वीं लोकसभा एक तरह से नई ऊर्जा, युवा ऊर्जा से भरी है… यह 18वीं लोकसभा उन सपनों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जब देश 2047 में आजादी के 100 साल मना रहा होगा। उसके बाद शपथ ग्रहण समारोह होगा। मोदी ने यह उल्लेख करते हुए कि आजादी के अमृत महोत्सव के बाद यह पहला चुनाव था। पीएम मोदी ने कहा कि तीसरी बार, एनडीए सरकार को लोगों ने देश की सेवा करने का मौका दिया है … मैं देश के लोगों को आश्वस्त करता हूं कि पिछले दो कार्यकालों में जिस गति से देश आगे बढ़ा है, हर क्षेत्र में बदलाव दिखाई दे रहा है और 25 करोड़ लोगों का गरीबी से बाहर निकलना हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण है।

उन्होंने कहा कि 10 वर्षों के इस कार्यकाल में भारत विश्व के लिए विश्वबंधु बनकर उभरा है। इसका अधिकतम लाभ अब मिलना शुरू हो रहा है। और मुझे विश्वास है कि अगले 5 वर्ष वैश्विक परिवेश में भी भारत के लिए बहुत उपयोगी होने वाले हैं। विश्व अनेक संकटों, अनेक तनावों, आपदाओं से गुजर रहा है… हम भारतीय भाग्यशाली हैं कि इतने बड़े संकटों के बावजूद भी आज हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में जाने जाते हैं। विकास के लिए दुनिया में हमारी प्रशंसा भी हो रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि एनडीए को तीसरी बार सेवा देने के लिए लोगों को धन्यवाद देते हुए, पीएम मोदी ने सभी को आश्वासन दिया कि 18वीं लोकसभा में, “हम उसी गति और समर्पण के साथ देश की आकांक्षाओं को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। बता दें कि पीएम के रूप में काम करने के लिए कहा और उन्होंने मुझे शपथ समारोह के बारे में सूचित किया है।पीएम मोदी ने कहा कि एनडीए को तीसरी बार सेवा देने के लिए लोगों को धन्यवाद देते हुए, पीएम मोदी ने सभी को आश्वासन दिया कि 18वीं लोकसभा में, “हम उसी गति और समर्पण के साथ देश की आकांक्षाओं को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

राष्ट्रपति भवन बाकी विवरण तैयार करेगा और तब तक हम मंत्रिपरिषद की सूची राष्ट्रपति जी को सौंप देंगे। उसके बाद शपथ ग्रहण समारोह होगा। मोदी ने यह उल्लेख करते हुए कि आजादी के अमृत महोत्सव के बाद यह पहला चुनाव था। पीएम मोदी ने कहा कि तीसरी बार, एनडीए सरकार को लोगों ने देश की सेवा करने का मौका दिया है पीएम मोदी ने कहा कि 18वीं लोकसभा एक तरह से नई ऊर्जा, युवा ऊर्जा से भरी है… यह 18वीं लोकसभा उन सपनों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जब देश 2047 में आजादी के 100 साल मना रहा होगा।

क्या मुस्लिम, ईसाइयों ने इंडिया गठबंधन को सहारा दिया है?

हाल ही में मुस्लिम, ईसाइयों ने इंडिया गठबंधन को सहारा दिया है! लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने सबको हैरान कर दिया। इस चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका लगा। बीजेपी अपने दमपर बहुमत के आंकड़े को भी नहीं छू पाई। हालांकि एनडीए को बहुमत मिला और अब बीजेपी ने नई सरकार के गठन की तैयारी भी कर ली है। लेकिन विपक्षी गठबंधन हार कर भी खुश दिखाई दे रहा है। INDI गठबंधन ने यूपी जैसे राज्यों में बेहतरीन प्रदर्शन किया। INDI गठबंधन की सफलता का एक बड़ा हिस्सा मुसलमानों पर टिका है, जिन्होंने बीजेपी के खिलाफ निर्णायक रूप से वोट दिया और पिछड़ी जातियों और दलितों के साथ गठबंधन बनाया। इसने बीजेपी को स्पष्ट बहुमत पाने से रोक दिया, जबकि यूपी में समाजवादी पार्टी और पश्चिम बंगाल में टीएमसी को स्पष्ट बढ़त मिली। मुसलमानों के अलावा अन्य अल्पसंख्यकों ने भी चुनावी नतीजों को बदलने में भूमिका निभाई। तमिलनाडु में, मुसलमान और ईसाई, जो जनसंख्या का 12% हैं, INDI गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण वोट बैंक बने रहे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह बीजेपी द्वारा पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने में विफल रहने और चुनाव अभियान के दौरान मुस्लिम विरोधी बयानबाजी के कारण हुआ है। हालांकि, पिछड़े-मुस्लिम गठबंधन को सक्षम करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक बीजेपी का ये ऐलान था कि ओबीसी कोटे के भीतर मुस्लिम आरक्षण को हटा दिया जाएगा। भाजपा ने अपने अभियान की शुरुआत ‘विकसित भारत’ या विकास के एजेंडे के साथ की थी, लेकिन पहले चरण के बाद ही चर्चा बिगड़ गई। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री प्रोफेसर खालिद अनीस अंसारी ने प्रधानमंत्री मोदी के पसमांदा लोगों तक पहुंचने को ‘दोहराव’ बताते हुए कहा, ‘एक भाषण में वे पसमांदाओं के बारे में बोलते हैं और फिर दूसरे भाषण में मुसलमानों को घुसपैठिया कहते हैं।’ मोदी ने टीएमसी पर ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने का आरोप लगाया और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वे हिंदुओं की संपत्ति जब्त कर उसे मुसलमानों में बांट देंगे। उन्होंने उन पर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करने का आरोप लगाया। भाजपा ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह कहने का भी आरोप लगाया कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है।

अगर सीधे मुकाबलों की बात करें तो रामपुर में सपा के मोहिबुल्लाह ने भाजपा के घनश्याम सिंह लोधी को हराया, जबकि कैराना से इकरा चौधरी और गाजीपुर से अफजाल अंसारी ने भी जीत दर्ज की। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के यूसुफ पठान ने कांग्रेस के दिग्गज और पांच बार के सांसद अधीर रंजन चौधरी को हराया। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट वामपंथियों और कांग्रेस की तरफ और यूपी में बीएसपी की तरफ नहीं बंटा, जैसा कि कुछ लोगों ने उम्मीद की थी। यह ध्यान देने की बात ये भी है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में कमी आई है। भाजपा ने केरल के मलप्पुरम से एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार अब्दुस सलाम को मैदान में उतारा है, जबकि बिहार में उसकी सहयोगी जेडीयू ने दो उम्मीदवारों को टिकट दिया। विपक्षी दलों में भी समुदाय का प्रतिनिधित्व कम हुआ है।

हालांकि AIADMK ने बीजेपी से रिश्ता तोड़ लिया और एसडीपीआई, एआईएमआईएम, आईएनएलपी और यूएमएमके जैसी छोटी मुस्लिम पार्टियों का समर्थन हासिल किया। लेकिन अधिक प्रभावशाली आईयूएमएल और एमएमके ने डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के साथ हाथ मिलाया और उन्हें बड़ी जीत दिलाने में मदद की। इंडिया ब्लॉक पार्टियों की प्रभावी रणनीति, मुस्लिम धर्मगुरुओं की संस्था तमिलनाडु जमात-उल-उलमा सबाई और तमिलनाडु बिशप्स’ काउंसिल के समर्थन के साथ मिलकर, अल्पसंख्यक वोटों को अपने पक्ष में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कन्याकुमारी, तिरुनेलवेली, तूतीकोरिन, रामनाथपुरम, नीलगिरी, सेंट्रल चेन्नई, त्रिची, तंजावुर, डिंडीगुल, वेल्लोर, कोयंबटूर, पोलाची, नागपट्टिनम, मयिलादुथुराई और अरकोनम जैसी 15 सीटों पर इंडिया ब्लॉक को जीत दिलाने में अल्पसंख्यक वोटों का बड़ा योगदान रहा। यहां जीत का अंतर 1.1 लाख से 4.4 लाख वोटों के बीच रहा। यहां गौर करने वाली बात ये है कि बीजेपी और उसके सहयोगी इनमें से सात सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे।

एमजेके अध्यक्ष तमीमुन अंसारी ने कहा, ‘अल्पसंख्यकों के लिए, लक्ष्य यह नहीं है कि कौन जीतना चाहिए, बल्कि यह है कि कौन सत्ता में वापस नहीं आना चाहिए। केंद्र में जो कुछ हो रहा है, उसे लेकर डर बढ़ रहा है।’ यह डर तब स्पष्ट हो गया जब राज्य भर में बड़ी संख्या में महिलाओं ने मतदान किया, जिससे उनके समुदाय के लोग हैरान रह गए। ‘सिस्टम’ से बाहर किए जाने के डर और केंद्र की एनडीए सरकार के ‘विवादास्पद’ फैसलों ने अल्पसंख्यकों में काफी अशांति पैदा की है। हाल के वर्षों में न्यायिक फैसलों को लेकर भी चिंताएं जताई गई हैं। अल्पसंख्यकों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए INDI गठबंधन की पार्टियों के लगातार प्रयास रंग लाए। INDI गठबंधन की पार्टियों ने सीएए के पारित होने में एआईएडीएमके की ‘भूमिका’ के लिए कड़ी आलोचना की। सीएए नियमों की भाजपा सरकार की अधिसूचना की एआईएडीएमके द्वारा अंतिम समय में की गई निंदा को ‘चुनावी चाल’ के रूप में देखा गया।

अल्पसंख्यकों ने संसद में डीएमके सांसद तिरुचि एन शिवा के उस प्रस्ताव को याद किया जिसमें श्रीलंकाई मूल के तमिलों और मुसलमानों को भी शामिल करने का प्रस्ताव था, जिसका एआईएडीएमके ने समर्थन किया था। बीजेपी से नाता तोड़ने के बाद मुस्लिम समर्थन वापस पाने की एआईएडीएमके की कोशिशें नाकाम रहीं। एआईएडीएमके ने 12 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि सहयोगी डीएमडीके और एसडीपीआई ने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। किसी भी पार्टी को अल्पसंख्यक मतदाताओं का भरोसा नहीं मिल पाया। कन्याकुमारी में एआईएडीएमके उम्मीदवार पासिलियन नाज़ेराथ 41,393 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे और एनटीके की मारिया जेनिफर क्लारा माइकल से पीछे रहे। जहां उलेमाओं ने कांग्रेस को भाजपा का मुख्य विकल्प बताया, वहीं टीएन बिशप काउंसिल ने अपने समुदाय से सांप्रदायिक राजनीति के बजाय धर्मनिरपेक्षता को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।

नाराज किसानों ने बीजेपी से कैसे निकाली नाराजगी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नाराज किसानों ने बीजेपी से नाराजगी कैसे निकाली! लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे बीजेपी के लिए काफी चौंकाने वाले रहे हैं। चुनाव के नतीजों से बीजेपी को सबसे बड़ा झटका लगा है। बीजेपी ‘अबकी बार 400 पार’ का स्लोगन लेकर चुनाव प्रचार कर रही थी। लेकिन जनता ने बीजेपी को 240 सीटों पर ही रोक दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले 303 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार बीजेपी को 63 सीटों का बड़ा नुकसान हुआ है। हालांकि बीजेपी एनडीए के अन्य घटक दलों के सहयोग से सरकार बनाने जा रही है, लेकिन ‘खिचड़ी’ सरकार में बीजेपी की ताकत और फैसले लेने की क्षमता पहले की तरह नहीं होगी। बीजेपी को भारी सीटों के नुकसान के पीछे के कारणों को लेकर पार्टी ने मंथन शुरू कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में भी बीजेपी की कमजोर हुई स्थिति को लेकर चर्चा तेज है। बीजेपी को हुए भारी नुकसान के पीछे किसानों की मोदी सरकार से नाराजगी को सबसे बड़ी वजह के तौर पर देखा जा रहा है। कृषि कानूनों को लेकर बीजेपी के खिलाफ देश में बड़ा आंदोलन हुआ था। कई दिनों तक दिल्ली में किसान धरने पर बैठ गए थे। हालांकि मोदी सरकार ने किसानों के गुस्से को देखते हुए कृषि कानून वापस ले लिए थे। लेकिन किसानों का गुस्सा शांत कराने में मोदी सरकार काफी हद तक असफल रही। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी का वोट शेयर 2019 में 39.5% से गिरकर अब 35% हो गया है। इसके अलावा किसानों के विरोध के चलते बीजेपी को 40 सीटों के नुकसान का अनुमान भी लगाया जा रहा है।

2019 में बीजेपी ने ग्रामीण वोट का 39.5% हासिल किया। इस बार इसने 35% हासिल किया। उन्हीं पांच वर्षों में इसका शहरी वोट शेयर 33.6% से बढ़कर 40.1% हो गया। लेकिन जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, ‘भारत अपने गांवों में बसता है।’ शहरी क्षेत्रों में 6.5 प्रतिशत अंकों की यह बढ़त ग्रामीण क्षेत्रों में 4.5 प्रतिशत अंकों के नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस 4.5 प्रतिशत अंकों के अंतर ने बीजेपी को सरकार बनाने के आंकड़े से दूर कर दिया और बीजेपी आप एनडीए के सहयोगियों के दम पर बैसाखी वाली सरकार बनाने जा रही है।

अमृतसर लोकसभा सीट इस बात का अच्छा उदाहरण है। इस सीट में शहर और गांव दोनों शामिल हैं। बीजेपी ने विकास के वादों के जरिए शहर के लोगों को रिझाने की कोशिश की। नतीजों ने दिखाया कि ये रणनीति कुछ हद तक कामयाब रही। बीजेपी उम्मीदवार तरनजीत सिंह संधू शहर वाले अमृतसर उत्तर क्षेत्र में सबसे आगे रहे। उन्होंने ये कारनामा पहली बार चुनाव लड़ने के बावजूद किया, वो भी उस पार्टी की तरफ से जिसे गांवों में घुसने तक नहीं दिया गया। अमृतसर उत्तर में डाले गए 1 लाख 10 हजार से ज्यादा वोटों में से संधू को 47 हजार से ज्यादा वोट मिले। ये कांग्रेस के गुरजीत सिंह औजला से बहुत ज्यादा था। अमृतसर मध्य में भी, जो एक शहरी क्षेत्र है, संधू को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले। लेकिन अमृतसर पूर्व में, जहां ज्यादातर लोग निम्न-मध्यम वर्ग के हैं, संधू कांग्रेस के उम्मीदवार को थोड़े से वोटों से ही हरा पाए। पर फिर भी, संधू पूरी सीट हार गए क्योंकि ग्रामीण इलाकों ने बीजेपी को नकार दिया। वो कुल मिलाकर तीसरे नंबर पर रहे। बीजेपी ग्रामीण क्षेत्रों में चौथे स्थान पर रही। उदाहरण के लिए, मजीठा क्षेत्र में संधू को सिर्फ 8 हजार वोट मिले, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार को 16 हजार से ज्यादा वोट मिले। यहां शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिले।

बीजेपी की मजबूत उपस्थिति खासतौर पर शहरी केंद्रों में स्पष्ट थी। यह दिल्ली में स्पष्ट रूप से देखा गया, जहां पार्टी ने एक बार फिर बड़े अंतर से सभी 7 सीटें हासिल कीं। दूसरी ओर विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन ग्रामीण क्षेत्रों में दबदबा बनाते दिखा। लेकिन किसानों का गुस्सा शांत कराने में मोदी सरकार काफी हद तक असफल रही। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी का वोट शेयर 2019 में 39.5% से गिरकर अब 35% हो गया है। इसके अलावा किसानों के विरोध के चलते बीजेपी को 40 सीटों के नुकसान का अनुमान भी लगाया जा रहा है।गठबंधन के अहम दल कांग्रेस ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपने वोट शेयर को 2019 में 17.1% से थोड़ा बढ़ाकर 17.6% देखा। वहीं समाजवादी पार्टी को ग्रामीण क्षेत्रों से 62.7% समर्थन मिला, जिसने मोदी और योगी के नेतृत्व के ‘डबल इंजन’ प्रभाव के बावजूद उत्तर प्रदेश में डंका बजा दिया।

परिणाम के बारे में क्या बोले प्रशांत किशोर?

हाल ही में प्रशांत किशोर ने परिणाम के बारे में एक बयान दे दिया है! लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद पहली बार चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अपनी गलती मानी है। एक इंटरव्यू में पीके ने कहा कि बीजेपी की सीटों के अनुमान को लेकर हम जैसे लोगों से गलती हो गई। लोकसभा चुनाव के परिणाम को हैरानी होने से जुड़े सवाल लेकर प्रशांत किशोर ने कहा कि उन्हें हैरानी हुई ये कहना सही नहीं होगा। प्रशांत किशोर ने कहा कि भले ही बीजेपी के प्रदर्शन को लेकर हम लोग गलत साबित हुए हों लेकिन बीजेपी नेता और पीएम नरेन्द्र मोदी की भारतीय राजनीति में प्रमुख शक्ति बने हुए हैं। प्रशांत किशोर ने कहा कि मेरे जैसे लोग बीजेपी की तरफ से जीती गई सीटों का अनुमान लगाने के मामले में गलत साबित हुए हैं। लेकिन अगर आप सुनें कि हम क्या कह रहे हैं तो यह है कि इस चुनाव में मोदी के पक्ष में कोई अखिल भारतीय अंडरकरंट नहीं है। उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और ब्रांड मोदी के लिए समर्थन की तीव्रता में कमी आई है। किशोर ने कहा कि ग्रामीण संकट, बेरोजगारी और बढ़ती असमानता एक प्रमुख मुद्दा है जो बड़े पैमाने पर लोगों को चिंतित करता है।

बीजेपी के पिछले चुनाव की तुलना में कमजोर प्रदर्शन को लेकर प्रशांत किशोर ने कहा कि बीजेपी का 400 पार का नारा आधा अधूरा था। उन्होंने कहा कि इससे बीजेपी को नुकसान हुआ। अबकी बार 400 पार नारा एक खुला नारा था। जैसे 400 पार तो किसके लिए। प्रशांत ने कहा कि साल 2013 में जो स्लोगन था उसमें उसका उद्देश्य साफ था, जैसे बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार। प्रशांत किशोर ने कहा कि लेकिन हमने यह भी कहा कि इन बातों के बावजूद मोदी के खिलाफ कोई व्यापक गुस्सा नहीं दिखा।प्रशांत किशोर ने कहा कि यह इस तथ्य के साथ है कि कोई संगठित विपक्ष नहीं है जैसा कि कोई देखना चाहेगा, कमोबेश यथास्थिति बनी रहेगी।विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन ने आधे से ज्यादा वोट पाकर 68 सीटें जीतीं, लेकिन इनमें से किसी में भी 70% से ज्यादा वोट नहीं मिले। 8 सीटों पर 60% से 70% के बीच वोट मिले, और बाकी 60 सीटों पर 50% से 60% के बीच। सबसे ज्यादा 50% से ज्यादा वोट पाने वाली सीटें तमिलनाडु से आईं, जहां द्रमुक ने 8 सीटें जीतीं। इसके बाद कांग्रेस ने 2 और सीपीआई एम ने 1 सीट जीती। पीके ने स्वीकार किया कि वह और अन्य सर्वेक्षणकर्ता अपने अनुमान में “बहुत गलत” थे, लेकिन उन्होंने बताया कि “राजस्थान के बाड़मेर में, बीजेपी का वोट 2019 के 59.52% से घटकर इस बार सिर्फ 17% रह गया, और इस सीट पर कांग्रेस जीत गई।

इस बार बीजेपी ने जिन 156 सीटों पर 50% से ज़्यादा वोट लेकर जीत हासिल की, उनमें से सिर्फ 10 सीटें ऐसी हैं, जो बीजेपी 2019 में नहीं जीत पाई थी, जबकि 5 सीटें ऐसी हैं, जिन्हें बीजेपी ने 2019 में 50% से कम वोट लेकर जीती थी। वोट शेयर के मामले में भाजपा को लगभग पिछली बार के बराबर ही वोट मिले हैं। जदयू ने अपनी 12 जीतों में से 3 में ये कारनामा किया। एनडीए के दूसरे सदस्यों में JD(S), शिवसेना और जनसेना पार्टी ने दो-दो सीटों पर 50% से ज़्यादा वोट हासिल किए। असम गण परिषद , हिंदुस्तान आवामी मोर्चा सेक्युलर, राकांप और राष्ट्रीय लोकदल ने एक-एक सीट पर ये उपलब्धि हासिल की।

मध्य प्रदेश में बीजेपी ने सभी 25 सीटें 50% से ज्यादा वोट लेकर जीतीं, ये किसी एक राज्य से सबसे ज्यादा सीटें हैं, जहां बीजेपी को 50% से ज्यादा वोट मिले हैं।

ऐसा बीजेपी ने 2019 में भी किया था। गुजरात की 26 सीटों में से 23 और कर्नाटक की 28 सीटों में से 17 सीटें बीजेपी ने आधे से ज्यादा वोट लेकर जीतीं। चार अन्य राज्यों- दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में जहां बीजेपी ने सभी सीटें जीतीं, वहां भी सभी जीत 50% से ज्यादा वोट लेकर हासिल हुईं। बता दें कि बीजेपी के अलावा एनडीए में शामिल अन्य दलों ने इस बार कुल 53 सीटें जीतीं, जिनमें से 30 सीटों पर उन्हें 50% से ज्यादा वोट मिले। तेलुगु देशम पार्टी की 16 जीतों में से 13 में वोट शेयर 50% से ज्यादा रहा। लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास ने बिहार में जीती गईं अपनी 5 में से 4 सीटों पर 50% से ज्यादा वोट हासिल किए। बीजेपी ने 2019 में भी इसी तरह से दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में सभी सीटें जीती थीं।प्रशांत किशोर ने कहा कि हां, हमने वोट शेयर के साथ-साथ सीटों में भी यथास्थिति को महसूस करने में गलती की।