Friday, March 6, 2026
Home Blog Page 717

आखिर तीसरी बार किस तरीके के फैसले लेंगे पीएम मोदी?

आज हम आपको बताएंगे की तीसरी बार आखिर पीएम मोदी किस तरीके के फैसले लेंगे! पिछले कुछ वर्षों में सभी चुनाव एकसाथ कराना पीएम नरेंद्र मोदी का एक बड़ा अजेंडा रहा है। दूसरे टर्म में आने के तुरंत बाद पीएम ने खुद इस पर बहस छेड़ी, जिसके बाद चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों से इस पर चर्चा की। कांग्रेस सहित अधिकतर विपक्षी दल इसके खिलाफ रहे। इसे लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ सकता है। अगर, लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली तो पीएम मोदी 2029 से पहले इसे लागू करने की दिशा में पहल कर सकते हैं। इसे किस तरह लागू करना है इसके लिए सरकार ने पहले ही पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में एक कमिटी बनाई थी। कमिटी की रिपोर्ट चुनाव के तुरंत बाद आ सकती है। कमिटी इस बारे में तमाम राजनीतिक दलों और कानून के जानकारों से मंथन भी कर चुकी है। तीसरे टर्म में सबसे बड़ी चुनौती होगी देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन करना। पीएम अपने तीसरे टर्म में इसे सफलतापूर्वक करना चाहेंगे। परिसीमन लागू होने के बाद लोकसभा में एक-तिहाई सीट महिलाओं के लिए रिजर्व हो जाएगी। इन दोनों के लागू होने के बाद देश के सियासत की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। नए परिसीमन के बाद देश में लगभग 900 नए सांसद हो सकते हैं। माना जा रहा है कि 543 सीट से 900 सीटें जो बढ़ेगी उसमें 80 फीसदी से अधिक बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में बढ़ेंगे। इसे लेकर दक्षिण के राज्यों ने अभी से सियासत शुरू कर दी है। अगर पीएम मोदी इसे अपने तीसरे टर्म में लागू करवा देते हैं तो इसका बहुआयामी असर होगा। नया संसद भवन भी उसी जरूरत को पूरा करने के हिसाब से बनाया गया है।

पीएम नरेंद्र मोदी के दो टर्म की सबसे बड़ी अधूरी हसरत रही कृषि सुधार की। 2014 में सत्ता में आने के बाद पहले टर्म में उन्होंने जमीन अधिग्रहण बिल के साथ एक कोशिश की लेकिन तब उन्हें अपने पैर खींचने पड़े थे। 2019 के बाद दूसरे टर्म में भी कृषि के तीन कानूनों को उन्होंने लागू करने की कोशिश की लेकिन विरोध के कारण उसे वापस लेना पड़ा। जानकारों के अनुसार, आर्थिक सुधारों में भी पीएम मोदी ने पिछले 10 वर्षों में कई बड़े फैसले लिए लेकिन कृषि सुधार मामले में वह अपने हिसाब से फैसला नहीं ले सके। ऐसे में वह तीसरे टर्म में वह इस दिशा में निर्णायक पहल कर सकते हैं। मुमकिन है इसे लागू करने से पहले अधिक संवाद करें और तब कोई बड़ा फैसला लें।

पिछले साल जुलाई में पीएम ने एक जनसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर साफ संदेश दिया कि यह सरकार और BJP के अजेंडे में है। उनकी सरकार इसके लिए निर्णायक रूप से पहल कर सकती है। यह सभी के लिए वह पूरी तरह चौंकाने वाला सियासी दांव था। इसके बाद उत्तराखंड में BJP सरकार ने इसे अपने राज्य में लागू करने की पहल की। आने वाले समय में और ‌BJP शासित राज्य इसे लागू कर सकते हैं। इसके बाद पीएम मोदी के लिए अपने तीसरे टर्म में देश स्तर पर इसे लागू करने का रास्ता साफ हो जाएगा। तीसरा टर्म मिलने पर अगर वह इसे लागू करते हैं तो धारा 370, राम मंदिर के बाद यह अजेंडा भी BJP का पूरा हो जाएगा। इसे लेकर पार्टी ने अपनी यात्रा शुरू की थी। इन तीनों का श्रेय पीएम मोदी को जाएगा। माना जा रहा है कि 2025 में जब RSS के 100 साल पूरे होंगे तब वह पूरे देश में इसे लागू करने की पहल कर सकते हैं।

अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद अब सबकी नजर मथुरा और वाराणसी पर टिक गई है। माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी अपने तीसरे टर्म में सहमति से कुछ निर्णायक पहल कर सकते हैं। 543 सीट से 900 सीटें जो बढ़ेगी उसमें 80 फीसदी से अधिक बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में बढ़ेंगे। इसे लेकर दक्षिण के राज्यों ने अभी से सियासत शुरू कर दी है। अगर पीएम मोदी इसे अपने तीसरे टर्म में लागू करवा देते हैं तो इसका बहुआयामी असर होगा। नया संसद भवन भी उसी जरूरत को पूरा करने के हिसाब से बनाया गया है।अगर ऐसा होता है, तो तीसरे टर्म का यह सबसे बड़ा दांव हो सकता है। पीएम मोदी ने पहले ही संकेत दे दिया है कि ऐसे मामलों को वह सहमति से ही आगे बढ़ाएंगे। साथ ही विकास के साथ विरासत के साथ आगे बढ़ने के उनके दावे में यह सबसे बड़ा दांव हो सकता है अगर तीसरे टर्म में मथुरा, वाराणसी में कोई सर्वमान्य हल खोजने में वह सफल रहे।

आखिर कैसा है विपक्ष के INDIA गठबंधन का जोश?

आज हम आपको बताएंगे कि विपक्ष के INDIA गठबंधन का जोश इस समय कैसा है! राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में अब एक पखवाड़ा और बचा है। इस यात्रा के समय और इसके पीछे मौजूद राजनीतिक समझ को लेकर सवाल उठते रहे हैं। जब सारी राजनीतिक पार्टियां चुनाव के लिए अपने उम्मीदवार तय करने में जुटी हैं, महीन ढंग से एक-एक संसदीय सीट के लिए रणनीति तय कर रही हैं, तब बिना किसी बड़ी अनुगूंज वाली यात्रा में जुटे रहने का क्या मतलब है? लेकिन इसे दूसरी तरह भी देखा जा सकता है। आज जब पूरा विपक्ष रक्षात्मक हुआ पड़ा है, हर विपक्षी नेता अपना गढ़, अपनी निजी छवि बचाने में जुटा है, तब कोई तो है जो जरूरी मुद्दों पर सरकार को कठघरे में लाने की राष्ट्रीय राजनीति कर रहा है। वैसे भी राहुल गांधी की इस यात्रा का पिछले साल की शुरुआत में कन्याकुमारी से कश्मीर तक चली उनकी यात्रा से अलग होना तय था। इसकी शुरुआत मणिपुर से होनी थी, जहां लंबे समय से सामुदायिक हिंसा जारी है। बीच में परिस्थितियों का एक निर्णायक बदलाव नीतीश कुमार के पाला बदलकर UPA से NDA में चले जाने के रूप में देखने को मिला। पिछले छह महीने से राहुल गांधी राज्य मशीनरी में पिछड़े तबकों की कम भागीदारी को मुद्दा बनाते आ रहे हैं। यात्रा के नाम में ‘न्याय’ शब्द का जुड़ना कांग्रेस पार्टी की इस बदली हुई समझ को ही जाहिर करता है।

बहरहाल, इस प्रस्थापना की बुनियाद में नीतीश कुमार द्वारा बिहार में कराई गई जाति जनगणना थी, जिसका मोमेंटम संभालना नीतीश के दूसरी तरफ चले जाने के बाद विपक्ष के लिए बहुत मुश्किल हो गया है। ज्यादातर राजनीतिक पर्यवेक्षकों को इससे राहुल गांधी पर हंसने का एक और मौका मिल गया। पिछड़ा आरक्षण के सक्रिय समर्थक दल के रूप में कांग्रेस पार्टी की पहचान कभी नहीं रही। दूसरे का उभारा मुद्दा पकड़कर लंबी छलांग लगाने की यह कोशिश किसी दिन मुंह के बल गिरेगी, इसका अंदाजा कांग्रेस के रणनीतिकारों को पहले ही हो जाना चाहिए था। खासकर तब, जब राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पिछड़ा पृष्ठभूमि के मुख्यमंत्री होने के बावजूद इनके विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी हो।

यह सही है कि 2024 के आम चुनाव में जाने से ठीक पहले सत्तापक्ष ऊपरी तौर पर बहुत ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। BJP ने अपने दम पर 370 सीट और सहयोगियों के साथ मिलकर 400 के पार जाने का दावा किया है। लेकिन आक्रामकता बता रही है कि जमीनी स्थिति को लेकर सरकारी खेमे में उतनी आश्वस्ति नहीं है, अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है, लेकिन यह हकीकत अपनी जगह है कि काम-धंधे के नाम पर बहुत सारे लोगों के पास आज कुछ भी नहीं है। नौजवानों में बेरोजगारी 25 फीसदी होने की बात चर्चा में नहीं आ पा रही है। मध्यवर्ग को एक अर्से से नई पीढ़ी के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की अच्छी पगार का भरोसा रहा है, लेकिन यह सेक्टर भी सुस्ती के दौर से गुजर रहा है। चुनावी माहौल के हिसाब से देखें तो भारत के आधे हिस्से में, यानी पांचों दक्षिण भारतीय राज्यों के अलावा महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में आम चुनाव से ठीक पहले विपक्ष का पलड़ा या तो भारी है या मामला बराबरी का जान पड़ता है।

बाकी राज्यों में सत्तापक्ष यकीनन मजबूत है और सबसे बड़ी बात है कि पॉलिटिकल मोमेंटम उसके साथ है। यह मतदान के दिन तक ऐसा ही बना रहा तो विपक्ष के मजबूत राज्यों में भी बहुत सारी सीटें उसके हाथ से निकल जाएंगी। लेकिन अगले एक महीने के अंदर विपक्ष अपने साझा राजनीतिक अभियान से कुछ जमीनी मुद्दे उठा सका तो ऐन मौके पर चुनाव में ठीकठाक जान पड़ सकती है।

सत्तापक्ष की खासियत यह है कि पिछले छह महीने में उसने विपक्षी नेताओं को एक दिन भी चैन की सांस नहीं लेने दी है। कांग्रेस पार्टी और क्षेत्रीय विपक्षी दलों की असुरक्षित, महत्वाकांक्षी दूसरी-तीसरी कतारों की ओर से उसे इसके लिए भरपूर मौका भी मिला है। आरोप लगते रहे हैं कि विपक्ष के इस भुरभुरेपन के लिए इन पार्टियों की अति केंद्रित परिवारवादी राजनीति जिम्मेदार है। लेकिन किसी सांसद, विधायक या पूर्व मंत्री को अगर अपना आगे का रास्ता अवरुद्ध दिखा, तो उसकी पार्टी और आइडियॉलजी कितनी भी अच्छी क्यों न हो, इतने लंबे इंतजार के बाद पहला बुलावा मिलते ही वह दूसरे पाले में चला जाएगा। इस स्थिति के लिए कुछ हद तक भारतीय राजनीति में व्याप्त वैचारिक अवसरवाद भी जिम्मेदार है। धर्मनिरपेक्षता और अपनी शक्ति भर कमजोर तबकों के साथ खड़े रहना मुख्यधारा के ज्यादातर राजनेताओं के लिए जुबानी जमाखर्च तक ही सीमित रहा है। पूरी जिंदगी जिसने राजनीति से कुछ पाना ही सीखा हो, इसके लिए कुछ खोना, कोई कष्ट बर्दाश्त करना जिसकी कल्पना से भी परे हो, वह सत्ताधारी राजनीति के सामने दस साल टिक गया, यह बहुत बड़ी बात है। आगे टिकट लेकर भी वह पाला बदल सकता है।

भारत जैसे उभरते हुए लोकतंत्र के लिए निश्चित रूप से यह परीक्षा की घड़ी है। विपक्ष की अनुपस्थिति में लोग एक सम्मोहन जैसी स्थिति में जी रहे हैं। एक समय था जब सांख्यिकी के मामले में भारत इतना मजबूत था कि सारे नव-स्वतंत्र देश इसके गुर सीखने के लिए यहां अपने विशेषज्ञ भेजते थे। चीनी प्रधानमंत्री चाओ एनलाई ने 1955 के आसपास ‘ऐक्शनेबल स्टैटिस्टिक्स’ जुटाने के तरीके समझने के लिए कोलकाता में एक हफ्ता लगाया था। लेकिन आज हालत यह है कि भारत का कोई सरकारी आंकड़ा भरोसेमंद नहीं है। नीति आयोग को उसके गठन के समय योजना आयोग से इस मामले में अलग बताया गया था कि गरीबी के आंकड़े जुटाना और गरीबी रेखा तय करना उसका काम नहीं है। लेकिन ‘भारत में गरीबी लगभग समाप्त हो चुकी है’, यह ज्ञान दुनिया को उसी से प्राप्त हुआ।

हैदराबाद का एक भारतीय व्यक्ति रूस के लिए लड़ते हुए मारा गया.

0

वह विदेश जाकर काम करने की सोच कर रूस की रणभूमि में पहुँचे। वहां एक भारतीय युवक की मौत हो गई. मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास ने बुधवार को यह खबर दी. युवक के परिवार का दावा है कि युवक को धोखा देकर रूस-यूक्रेन युद्ध में जाने के लिए मजबूर किया गया था.

उम्र 30. हैदराबाद में घर. युवक का नाम मोहम्मद अफसान है. उनके परिवार ने हैदराबाद के सांसद एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन वैसी से संपर्क किया और उन्हें ढूंढने और रूस से वापस लाने में मदद मांगी। वाईसी ने मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि अफसान की पहले ही मौत हो चुकी है।

अफसान की पत्नी और दो बच्चे हैदराबाद में हैं। उनके परिवार के अनुसार, अफ़सान को विदेश में नौकरी का वादा करके रूस ले जाया गया था। वहां उन्हें रूसी सेना के ‘सहायक’ या सहायक के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया गया।

बता दें कि इस घटना से ठीक एक हफ्ते पहले रूस-यूक्रेन युद्ध क्षेत्र में गुजरात के एक युवक की मौत की खबर आई थी. कथित तौर पर युवक को यूक्रेन में रूस के खिलाफ युद्ध में ‘मददगार’ के तौर पर काम करने के लिए भी मजबूर किया गया था. 23 साल का युवक गुजरात के सूरत का रहने वाला है। नाम हामिल मंगुकिया. ऑनलाइन एक विज्ञापन देखने के बाद हैमिल ने रूस में नौकरी के लिए आवेदन किया। उस आवेदन के बाद उन्हें पहले सूरत से चेन्नई और फिर मॉस्को ले जाया गया. इसके बाद उन्हें रूसी सेना के सहयोगी के रूप में नियुक्त किया गया। 21 फरवरी को रूस-यूक्रेन सीमा पर डोनेट्स्क क्षेत्र में यूक्रेनी हवाई हमले में हामिल की भी मौत हो गई।

इस घटना के बाद विभिन्न स्रोतों से पता चला है कि भारत से कई युवाओं को विदेश में नौकरी का झांसा देकर धोखाधड़ी से रूस ले जाया गया है. उन्हें वहां रूसी सेना में काम करने के लिए भी मजबूर किया गया है. सूत्रों का यहां तक ​​कहना है कि कईयों को सीमा पर लड़ने के लिए मजबूर किया गया है. ऐसी खबरें सामने आने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि वे रूसी सेना में काम कर रहे भारतीयों को तेजी से छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसी बीच रूस में एक और भारतीय की मौत हो गई. इस बार पंजाब के कुछ युवाओं ने दावा किया कि उन्हें ‘धोखाधड़ी’ के जरिए यूक्रेन में रूस के लिए लड़ने के लिए भेजा गया था. होशियारपुर के सात युवाओं ने भारत सरकार से मदद की गुहार लगाई है. वह वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया है. आनंदबाजार ऑनलाइन ने इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की है।

105 सेकंड का वीडियो एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया गया। इसमें शीतकालीन जैकेट और टोपी पहने सात लोगों को एक छोटे से गंदे कमरे में खड़े दिखाया गया है। घर के दरवाजे और खिड़कियां बंद हैं. छह पीछे खड़े हैं. सामने मोबाइल फोन लेकर खड़ा युवक उसका नाम गगनदीप सिंह है।

गगनदीप ने बताया कि वे 27 दिसंबर को रूस गए थे। इरादा वहीं नया साल मनाने का था. उनके पास 90 दिन का वीज़ा था. इसके बाद उन्हें पड़ोसी देश बेलारूस ले जाया गया. गगनदीप का दावा है, ”एक एजेंट ने हमें बेलारूस ले जाने की पेशकश की। हमें नहीं पता था, हमें वहां जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है.’ बेलारूस पहुंचने पर एजेंट ने और पैसे की मांग की. तो फिर हमें वहीं छोड़ दो. इसके बाद पुलिस ने हमें गिरफ्तार कर लिया और रूसी अधिकारियों को सौंप दिया. एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।” गगनदीप ने आरोप लगाया कि उसके बाद उन्हें झगड़े के लिए मजबूर किया जा रहा है।

गगनदीप के परिवार ने भारतीय विदेश मंत्रालय से संपर्क किया. उनके भाई अमृत सिंह ने एक मीडिया को बताया कि वे सात लोगों द्वारा हस्ताक्षरित समझौते की शर्तों को नहीं समझते हैं। रूसी भाषा में लिखा था, 10 साल जेल, नहीं तो रूसी सेना में शामिल हो जाओ। कथित तौर पर उन्हें 15 दिन की ट्रेनिंग के बाद युद्ध के मैदान में भेज दिया गया. संयोग से, यूक्रेन युद्ध में रूस का सहयोगी बेलारूस है।

पिछले हफ्ते विदेश मंत्रालय ने माना था कि रूस में कई भारतीय फंसे हुए हैं. कथित तौर पर, उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध यूक्रेन में लड़ने के लिए भेजा गया था। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि दिल्ली में फंसे लोगों को निकालने की कोशिश की जा रही है. इस पर रूस से चर्चा की जा रही है. विदेश मंत्रालय ने भी इस युद्ध से दूर रहने की सलाह दी. इससे पहले सोशल मीडिया पर कुछ और वीडियो प्रसारित हुए थे, जिनमें कुछ भारतीयों ने कहा था कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध यूक्रेन में लड़ने के लिए भेजा गया था. उन्हें एजेंटों के माध्यम से नौकरी देने के नाम पर युद्ध के मैदान में भेजा गया है.

पीएम नरेंद्र मोदी की नजर वोट बैंक में महिला कोड को तोड़ने पर है.

0

वोट बैंक में महिला संहिता तोड़ने पर पीएम नरेंद्र मोदी की नजर एकतरफ भावुकता है. दूसरी ओर जानकारी. वोट बैंक के लिए महिलाओं का दिल जीतने की कोशिश नहीं कर रहे नरेंद्र मोदी! खासकर, ममता बनर्जी की बांग्ला. जब से वह विपक्षी नेता थीं तब से महिलाओं का समर्थन वोट-युद्ध में तृणमूल नेता का सबसे बड़ा हथियार रहा है। अब सरकार की ओर से ‘कन्याश्री’, ‘लक्ष्मी भंडारे’ के सहयोग से वह बंधन और मजबूत हो गया है। इस बार बीजेपी सत्ताधारी पार्टी के महिला वोट बैंक को तोड़ने की कोशिश में है. वे संदेशखाली कांड के साथ-साथ मोदी सरकार की महिला कल्याण की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. खुद प्रधानमंत्री ने बुधवार को बारासात में ‘नारी शक्ति सम्मान रैली’ में आकर बीजेपी को उस लक्ष्य की ओर धकेलने की कोशिश की.

केंद्रीय परियोजनाओं के संदिग्ध तथ्यों या आंकड़ों पर जाने से पहले मोदी ने इस दिन अपने जीवन की पुरानी कहानी बताई. उनके शब्दों में, ”आम तौर पर मैं नहीं कहता. लेकिन यहां बहुत सारी माताएं और बहनें हैं जो कहना चाहती हैं।” इसीलिए वह पितृसत्ता के बारे में इतनी बात करते हैं। बीजेपी ने ‘मोदी का परिवार’ नाम से अपना जवाबी अभियान शुरू किया. इसी आधार पर मोदी ने इस दिन कहा था, ”कुछ लोग सोचते हैं कि मैं आप सभी को अपना परिवार इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ‘इंडिया’ गठबंधन के भ्रष्ट नेताओं ने मेरे परिवार पर हमला किया है. ज़रूरी नहीं। इसके पीछे एक पुरानी कहानी है.” प्रधानमंत्री ने भाषण में कहा, ”मैं छोटी उम्र में बैग लेकर घर से निकला था. जेब में एक पैसा न था। फिर मुझे कोई नहीं जानता. जेब में कुछ न होने पर मैं थैला लेकर घूमता था। लेकिन मैं एक भी दिन भूखा नहीं रहा. कुछ माताएं-बहनें पूछती थीं कि आपने कुछ खाया क्या?” मोदी ने दावा किया, ”ये माताएं-बहनें, आप ही मेरा परिवार हैं. देश की 140 करोड़ जनता मेरा परिवार है!

तृणमूल, कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दलों ने किया पलटवार, अपराधी, बलात्कारी या बदमाश कारोबारी हैं मोदी के ‘अपने परिवार के सदस्य’! हालाँकि, मोदी ने अपनी सरकार के कामकाज पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है। लोकसभा और विधानसभा में सीटों के आरक्षण की नीति पर बात करते हुए एम ने महिलाओं को तीन तलाक देने का मुद्दा उठाकर मुस्लिम महिलाओं को आकर्षित करने की कोशिश की है. साथ ही उन्होंने कहा कि ‘जनधन’ परियोजना के तहत करोड़ों महिलाओं ने खाते खोले हैं. इनमें तीन करोड़ महिलाएं बंगाल की हैं. स्वयं सहायता समूहों की 10 करोड़ महिलाओं में से 1 करोड़ 25 लाख से अधिक महिलाएं बंगाल से हैं। मोदी सरकार के 10 साल में महिलाओं के स्वरोजगार के लिए 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा दिए गए हैं. वहीं बंगाल के स्वयं सहायता समूहों को 90 हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं. देश की 3 करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य लिया गया है, 1 करोड़ महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं. इनमें बंगाल की “लखपति दीदी” 16 लाख से भी ज्यादा हैं। पश्चिम बंगाल की महिलाओं को ‘मुद्रा योजना’ के बिना गारंटी वाले ऋण में 1 लाख 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा मिले हैं। इन आंकड़ों को पेश करने के साथ ही मोदी ने आरोप लगाया कि बंगाल में तृणमूल के ‘कब्जा’ के कारण लोग केंद्रीय योजनाओं के अधिक लाभ से वंचित हो रहे हैं.

तृणमूल की ओर से सुष्मिता देव, शशि पंजारा ने मोदी के ‘नारी शक्ति बंदना’ को ‘दोहरापन’ बताया. हालांकि, बारासात रैली में भाजपा की महिला मोर्चा की अखिल भारतीय अध्यक्ष वनथी श्रीनिवासन, महासचिव विजया रहाटकर, प्रदेश अध्यक्ष फाल्गुनी पात्रा, सांसद लॉकेट चट्टोपाध्याय, विधायक अग्निमित्रा पलेरा ने मोदी को ‘विश्वास का केंद्र’ बताया। और मोदी की तोप, ”केंद्र में एनडीए की निश्चित जीत देखकर ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं का दिमाग खराब हो गया है. वे पूरी गति से मोदी को गाली दे रहे हैं।’ भ्रष्ट लोग मेरे परिवार पर सवाल उठा रहे हैं.” वे संदेशखाली कांड के साथ-साथ मोदी सरकार की महिला कल्याण की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. खुद प्रधानमंत्री ने बुधवार को बारासात में ‘नारी शक्ति सम्मान रैली’ में आकर बीजेपी को उस लक्ष्य की ओर धकेलने की कोशिश की. ‘इंडिया’ गठबंधन के भ्रष्ट नेताओं ने मेरे परिवार पर हमला किया है. ज़रूरी नहीं। इसके पीछे एक पुरानी कहानी है.” प्रधानमंत्री ने भाषण में कहा, ”मैं छोटी उम्र में बैग लेकर घर से निकला था. जेब में एक पैसा न था। फिर मुझे कोई नहीं जानता.

महाराष्ट्र में सीट बंटवारे को लेकर एनडीए में पेच फंसा हुआ है.

0

अमित शाह की मुलाकात के बाद भी महाराष्ट्र में एनडीए में सीट बंटवारे का कोई हल नहीं निकल सका. आज शाह ने दो सह-नेताओं ,शिवसेना के एकनाथ शिंदे और एनसीपी के अजीत पवार के साथ बैठक की। वहीं, विपक्षी गठबंधन ने आज छत्रपति शिवाजी के वंशज को मैदान में उतारकर विपक्षी खेमे को चौंका दिया है. ये शख्स कांग्रेस के टिकट पर कोल्हापुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे.

केंद्रीय गृह मंत्री शाह कल महाराष्ट्र में दो दिवसीय अभियान पर निकले. कल रात और आज उन्होंने सहयोगी दलों के साथ लोकसभा सीटों के बंटवारे पर चर्चा की. बीजेपी राज्य की 48 में से 45 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है. प्रमुख साझेदार बीजेपी ने 32 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा किया है. लेकिन मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे ने मांग की कि जिस तरह बीजेपी पांच साल पहले 25 सीटों पर लड़ी थी, इस बार भी उतनी ही सीटों पर लड़नी चाहिए. सूत्रों के मुताबिक, कल और आज की बैठक में बीजेपी ने बताया है कि वह महाराष्ट्र में कम से कम 30 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है. शेष 18 सीटों में से पद्म शिबिर 12 सीटें शिवसेना और छह सीटें अजित पवार की पार्टी के लिए छोड़ने पर सहमत हो गईं। लेकिन शिवसेना को कुछ सीटों पर चुनाव लड़ने पर अड़ा देख पद्मा नेताओं ने शिंदर की पार्टी के उम्मीदवारों को बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने की पेशकश की. सूत्रों के मुताबिक, शाहेरा कल तक इस मामले को अंतिम रूप देना चाहते हैं। क्योंकि बीजेपी 8 मार्च को दिल्ली में पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में महाराष्ट्र में सीट बंटवारे के मुद्दे को सुलझाना चाहती है.

महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन उलझ गया है तो विपक्षी ‘महाविकास अगाड़ी’ खेमा गठबंधन बनाकर लड़ने में जुट गया है. सीट बंटवारे पर चर्चा के लिए आज नेता प्रतिपक्ष शरद पवार, उद्धव ठाकरे, जयंत पाटिल, जीतेंद्र अवाद, प्रकाश अंबेडकर जैसे नेता बैठे. बैठक के अंत में, उद्धव के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने कहा, “गठबंधन के नेता गठबंधन के रूप में भाजपा से लड़ने के लिए सहमत हुए हैं। सीट आवंटन में कोई दिक्कत नहीं है. कहीं भी सीटों को लेकर कोई दिक्कत नहीं है.”

सूत्रों के मुताबिक, हालांकि संजय का दावा है कि सीट बंटवारे के मुद्दे पर साझेदारों के बीच कोई असहमति नहीं है, लेकिन प्रकाश अंबेडकर पहले ही सांगली और वर्धा सीटों के लिए उम्मीदवार के नाम की एकतरफा घोषणा कर चुके हैं. उन दोनों केंद्रों को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है. कांग्रेस ने शुरू में कहा है कि वे उन दो सीटों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस दोनों ही कोल्हापुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने पर अड़े हुए हैं। लेकिन जब कांग्रेस ने उस सीट पर शिवाजी महाराज के वंशज छत्रपति शाहू महाराज को उम्मीदवार बनाया तो उद्धव गुट कुछ हद तक लड़ाई से पीछे हट गया। लेकिन उधेरा ने घरेलू स्तर पर राहुल गांधी से कहा कि दक्षिण-पश्चिम मुंबई केंद्र के आसपास कांग्रेस की मांगें नहीं मानी जाएंगी. पश्चिम बंगाल में कितनी लोकसभा सीटें जीतनी हैं, अमित शाह ने राज्य के बीजेपी नेतृत्व के लिए लक्ष्य तय किया. केंद्रीय गृह मंत्री ने 2023 में बीरभूम के सिउरी में कहा, ”हम 35 सीटों पर जीत चाहते हैं.” पिछले नवंबर में उन्होंने कोलकाता के धर्मतला सभा से कहा था कि 35 सीटों पर जीत होनी चाहिए. और हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने बंगाल दौरे पर कहा था, ”सभी 42 सीटों पर कमल खिलना चाहिए.” लेकिन पार्टी का ”आंतरिक गणित” क्या कहता है? पद्म शिबीर कितनी सीटें जीत सकती हैं? शाह ने खुद उस नंबर का खुलासा किया. उन्होंने गुरुवार को एक प्रेस इंटरव्यू में ये नंबर बताया.

शाह ने कहा कि वह पहले ही देश और पश्चिम बंगाल के 163 निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, ”देश के हर कोने में लोग नरेंद्र मोदी के समर्थन का इंतजार कर रहे हैं. उसके आधार पर हम 370 सीटों पर जीत हासिल करेंगे. एनडीए 400 पार करेगा. ये लक्ष्य यथार्थवादी है और साथ ही मैं देशवासियों से कहूंगा कि आपके दिल में कितना प्यार है, वोट करके दिखाइए। जल्द ही यह 400 के पार हो जाएगा.

इंटरव्यू में भले ही देश के कई मुद्दे उठे, लेकिन शाह ने बंगाल पर काफी वक्त बिताया. संदेशखाली के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ”मैं पूरे देश से कहूंगा कि हमें बंगाल के साथ खड़े होने की जरूरत है. बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्य पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. इस बार मैं 25 सीटें पार करके आगे बढ़ूंगा.’ हमारे दो विधायक थे. अब यह 77 है. हम सशक्त विपक्ष की भूमिका में हैं. पश्चिम बंगाल में भ्रष्ट सरकार है. पश्चिम बंगाल में तोशान की सरकार धर्म के आधार पर चल रही है. देश की सुरक्षा के लिए पश्चिम बंगाल में परिवर्तन जरूरी है.

भारतीय गेंदबाज कुलदीप यादव ने रविचंद्रन अश्विन को मैच बॉल शेयर की.

0

100वें टेस्ट में 5 विकेट लेने वाले कुलदीप या 4 विकेट लेने वाले अश्विन, किसे मिली मैच बॉल? इंग्लैंड की पारी को जल्दी खत्म करने के पीछे रविचंद्रन अश्विन और कुलदीप यादव। इन दोनों ने मिलकर 9 विकेट लिए. मैदान से बाहर निकलते वक्त देखा गया कि अश्विन और कुलदीप उस पारी की गेंद एक-दूसरे को देना चाहते थे. धर्मशाला में भारत ने इंग्लैंड की पहली पारी 218 रनों पर समाप्त कर दी. इसके पीछे निश्चित तौर पर रविचंद्रन अश्विन और कुलदीप यादव का हाथ है. इन दोनों ने मिलकर 9 विकेट लिए. मैदान से बाहर निकलते वक्त देखा गया कि अश्विन और कुलदीप उस पारी की गेंद एक-दूसरे को देना चाहते थे.

अश्विन ने खेला अपना 100वां टेस्ट. उन्होंने उस मैच में 4 विकेट लिए थे. लेकिन कुलदीप ने 5 विकेट झटके. इसलिए गेंद पहले उन्हें सौंपी गई. कुलदीप ने गेंद अश्विन की ओर फेंकी. उससे कहो कि गेंद अपने पास रखे। लेकिन अश्विन ने गेंद वापस कुलदीप को दे दी. दोनों के चेहरे पर चौड़ी मुस्कान है. दोनों एक दूसरे को गेंद को याद के तौर पर रखने के लिए कहते हैं। कुलदीप ने गेंद वापस अश्विन की ओर फेंकी. लेकिन मोहम्मद सिराज ने गेंद को अश्विन तक पहुंचने से पहले ही स्कूप कर दिया. वह अश्विन से गेंद अपने पास रखने के लिए कहते हैं। लेकिन अश्विन बिल्कुल भी गेंद अपने पास रखने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने जबरदस्ती गेंद कुलदीप के हाथों में थमा दी. वह वही था जो अंततः गेंद लेकर मैदान से बाहर चला गया। बाकियों ने तालियां बजाईं.

दिन के अंत में, कुलदीप ने कहा, “अश्विन ने मुझे बताया कि उन्होंने 35 टेस्ट मैचों में 5 विकेट लिए हैं। उन्होंने 35 गेंदें रखी हैं. उन्होंने मुझे यह गेंद अपने पास रखने दी।” कुलदीप ने टेस्ट में चौथी बार 5 विकेट लिए। धर्मशाला में कुलदीप ने डेब्यू किया. उन्होंने 2017 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उस मैदान पर अपना टेस्ट डेब्यू किया था। उस धर्मशाला में कुलदीप ने 100 साल पुरानी मिसाल कायम की. उन्होंने जैक क्रॉली, बेन डकेट, ओली पोप, जॉनी बेयरस्टो और बेन स्टोक्स को आउट किया। उन्होंने टेस्ट में 51 विकेट लिए. कुलदीप 100 साल में सबसे कम गेंदों पर 50 टेस्ट विकेट लेने वाले पहले स्पिनर बन गए। कुलदीप ने 1871वीं गेंद पर 50वां टेस्ट विकेट लिया.

भोजनावकाश से पहले और बाद का दृश्य बिल्कुल उलट गया। पहले जहां इंग्लैंड के बल्लेबाज धुआंधार बल्लेबाजी कर रहे थे, वहीं बाद में वे ढीले पड़ गए. उनके पास कुलदीप यादव की फिरकी का कोई जवाब नहीं था. टी ब्रेक से पहले कुलदीप ने 5 विकेट लिए. कुलदीप के साथ रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जड़ेजा भी थे। अश्विन ने 4 विकेट लिए. जड़ेजा को 1 विकेट मिला. इंग्लैंड की बल्लेबाजी उनकी ताकत के आगे हार गई. भारत के पास चाय के विश्राम से पहले इंग्लैंड को आउट करने का मौका था. लेकिन बेन फोक्स और शोएब बशीर ने इसे रोके रखा। हालांकि चाय के विश्राम के बाद इंग्लैंड 218 रन पर ऑलआउट हो गई.

चाय के विश्राम से ठीक पहले कुलदीप ने ओली पोप को आउट किया. ब्रेक के बाद दूसरी गेंद पर उन्हें विकेट मिल सकता था. उनकी गेंद जैक क्रॉली के बल्ले के किनारे से टकराकर हवा में उठ गई. सरफराज खान ने छलांग लगाकर पकड़ लिया. अंपायर ने आउट नहीं दिया. हालांकि सरफराज ने काफी अपील की लेकिन रोहित ने रिव्यू नहीं लिया. बाद में पता चला कि क्रॉली आउट हो गए हैं.

हालांकि, क्राउले को आउट करने के लिए कुलदीप को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। उनकी गेंद ऑफ स्टंप के बाहर थी और फिर क्राउले के बल्ले और पैड के बीच से विकेट पर जा लगी. क्रॉली 79 रन बनाकर आउट हुए. अपना 100वां टेस्ट खेल रहे जॉनी बेयरस्टो ने शुरू से ही बड़े शॉट लगाने की मानसिकता के साथ शुरुआत की। उन्होंने दो छक्के भी लगाए. लेकिन ज्यादा देर तक टिक नहीं सका. कुलदीप 29 रन बनाकर आउट हुए. विकेटकीपर ध्रुव जुरेल ने अच्छा कैच पकड़ा. अगले ओवर में रवींद्र जड़ेजा ने जो रूट को आउट किया. रूट को लगा कि गेंद लुढ़केगी. लेकिन गेंद सीधे पैड पर जा लगी. रूट ने 26 रन बनाये. इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स मौजूदा सीरीज में एक बार फिर फेल रहे. वह कुलदीप की बातों को समझ नहीं पाया. बिना किसी रन के बैकफुट पर एलबीडब्ल्यू। इंग्लैंड ने 175 रन पर तीन विकेट गंवा दिये.

कुलदीप, जड़ेजा के बाद अश्विन ने भी लिए विकेट. उन्होंने अपने 100वें टेस्ट में टॉम हार्टले को आउट किया। देवदत्त पडिक्कल का अच्छा कैच। उस ओवर में मार्क वुड आउट हो गए. चाय के विश्राम से पहले इंग्लैंड के पास ऑल आउट होने का मौका था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि दो कैच छूट गए.

चाय के विश्राम के बाद दो ओवर में लोगों ने आक्रामक बल्लेबाजी की. लेकिन वह ज्यादा देर तक नहीं खेल सके. इंग्लैंड के बाकी दो विकेट अश्विन ने झटके. स्टोक्स की पारी 218 रन पर समाप्त हुई. अश्विन ने 100वें टेस्ट की पहली पारी में 4 विकेट लिए.

लेकिन इंग्लैंड की शुरुआत अच्छी रही. जसप्रीत बुमराह की गेंद शुरुआत में थोड़ी स्विंग हो रही थी. लेकिन क्रीज पर कम उछाल होने के कारण इंग्लिश बल्लेबाजों को उछाल झेलने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी। वे फाउल बॉल का इंतजार कर रहे थे. जब कोई गेंद बल्ले के आधार से टकराती थी तो बेन डकेट और क्रॉली बड़े शॉट खेलने से नहीं डरते थे। नतीजा ये हुआ कि रन बढ़ते जा रहे थे.

दोनों तेज गेंदबाजों के पहले स्पैल के बाद रोहित ने गेंद स्पिनरों को दी. पहला अश्विन. बाद में कुलदीप. अश्विन की गेंद को इंग्लैंड के दोनों ओपनरों ने संभलकर खेला. जोखिम नहीं उठाया. लेकिन कुलदीप के पहले ही ओवर में डकेट बड़ा शॉट खेलने गए. बल्ले पर नहीं. थोड़ा पीछे दौड़कर शुभमन गिल ने कैच पकड़ लिया. डकेट 27 रन बनाकर लौटे. क्रॉली अच्छा खेल रहे थे. उनके साथ ओली पोप भी थे. हाथ जमने के बाद क्रॉली ने रनों की गति बढ़ा दी. अश्विन ने सामने मारा जोरदार छक्का. लंच से पहले क्रॉली ने अर्धशतक लगाया. ब्रेक से ठीक पहले कुलदीप ने इंग्लैंड को दूसरा झटका दिया. पोप 11 रन बनाने के बाद क्रीज छोड़कर खेलने लगे तो स्टंप आउट हो गए।

अमित शाह ने साफ किया कि लोकसभा चुनाव 2024 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी कितनी सीटें जीतेगी.

0

बंगाल में बीजेपी कितनी सीटें जीतेगी? शाह ने दिया संगठनात्मक हिसाब-किताब, अमित शाह ने सबसे पहले संदेशखाली को लेकर राज्य के नेताओं को दिया नया संदेश, 35 सीटें जीतने का लक्ष्य बाद में नरेंद्र मोदी ने 42 सीटें मांगीं. लेकिन बीजेपी का अंदरूनी लेखा-जोखा क्या कहता है? शाह ने किया खुलासा. पश्चिम बंगाल में कितनी लोकसभा सीटें जीतनी हैं, अमित शाह ने राज्य के बीजेपी नेतृत्व के लिए लक्ष्य तय किया. केंद्रीय गृह मंत्री ने 2023 में बीरभूम के सिउरी में कहा, ”हम 35 सीटों पर जीत चाहते हैं.” पिछले नवंबर में उन्होंने कोलकाता के धर्मतला सभा से कहा था कि 35 सीटों पर जीत होनी चाहिए. और हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने बंगाल दौरे पर कहा था, ”सभी 42 सीटों पर कमल खिलना चाहिए.” लेकिन पार्टी का ”आंतरिक गणित” क्या कहता है? पद्म शिबीर कितनी सीटें जीत सकती हैं? शाह ने खुद उस नंबर का खुलासा किया. उन्होंने गुरुवार को एक प्रेस इंटरव्यू में ये नंबर बताया.

शाह ने कहा कि वह पहले ही देश और पश्चिम बंगाल के 163 निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, ”देश के हर कोने में लोग नरेंद्र मोदी के समर्थन का इंतजार कर रहे हैं. उसके आधार पर हम 370 सीटों पर जीत हासिल करेंगे. एनडीए 400 पार करेगा. ये लक्ष्य यथार्थवादी है और साथ ही मैं देशवासियों से कहूंगा कि आपके दिल में कितना प्यार है, वोट करके दिखाइए। जल्द ही यह 400 के पार हो जाएगा.

इंटरव्यू में भले ही देश के कई मुद्दे उठे, लेकिन शाह ने बंगाल पर काफी वक्त बिताया. संदेशखाली के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ”मैं पूरे देश से कहूंगा कि हमें बंगाल के साथ खड़े होने की जरूरत है. बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्य पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. इस बार मैं 25 सीटें पार करके आगे बढ़ूंगा.’ हमारे दो विधायक थे. अब यह 77 है. हम सशक्त विपक्ष की भूमिका में हैं. पश्चिम बंगाल में भ्रष्ट सरकार है. पश्चिम बंगाल में तोशान की सरकार धर्म के आधार पर चल रही है. देश की सुरक्षा के लिए पश्चिम बंगाल में बदलाव की जरूरत है. बंगाल की सुरक्षा में गड़बड़ी क्यों है, यह बताते हुए शाह ने कहा, ”बांग्ला एक सीमावर्ती राज्य है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि घुसपैठ की समस्या अब देश के एक राज्य तक ही सीमित रह गई है। मैं पूरे विश्वास और जानकारी के साथ कह रहा हूं कि बंगाल में सरकार प्रायोजित घुसपैठ चल रही है। इस बारे में कोई मतभेद नहीं है. अपने वोट बैंक को मजबूत रखने के लिए, वोट बैंक बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की परवाह नहीं की जा रही है। ये बहुत बड़ी समस्या है. ये बंगाल के लोग भी जानते हैं.

शाह ने संदेशखाली में ईडी पर हुए हमले को लेकर भी राज्य सरकार की निंदा की. उन्होंने कहा, ”आपका मुखौटा खुल गया है! आप कानून के साथ नहीं रह रहे हैं, अगर किसी को कुछ कहना है तो कोर्ट जाएं और सुरक्षा लाएं। जांच में सहयोग करें.”

बंगाल समेत देशभर में विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी राजनीतिक कारणों से ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शाह ने गुरुवार को कहा, ”लोग सब देख रहे हैं. बंगाल में किसी के घर से मिले 52 करोड़ रुपये, झारखंड में किसी के घर से मिले 355 करोड़ कैश! पैसे गिनते समय 25 मशीनें गर्म हो गईं. उसके बाद भी कहते हैं हमारे खिलाफ कार्रवाई मत करो!”

शाह संदेशखाली मुद्दे पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर हमला करने से नहीं चूके. उन्होंने कहा, ”संदेशखाली की घटना ने बंगाल सरकार का मुखौटा 100 फीसदी खोल दिया है. एक महिला मुख्यमंत्री के राज में धर्म के आधार पर महिलाओं का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. हम लड़ेंगे, बंगाल में परिवर्तन लाएंगे और चले जाएंगे.” हम सोनार बांग्ला बनाएंगे.”

शाह ने कहा कि वह पहले ही देश और पश्चिम बंगाल के 163 निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, ”देश के हर कोने में लोग नरेंद्र मोदी के समर्थन का इंतजार कर रहे हैं. उसके आधार पर हम 370 सीटों पर जीत हासिल करेंगे. एनडीए 400 पार करेगा. ये लक्ष्य यथार्थवादी है और साथ ही मैं देशवासियों से कहूंगा कि आपके दिल में कितना प्यार है, वोट करके दिखाइए। जल्द ही यह 400 के पार हो जाएगा.

क्या भारत का विरोध करना थाईलैंड पर भारी पड़ चुका है?

भारत का विरोध करना थाईलैंड पर अब भारी पड़ चुका है! विश्व व्यापार संगठन में भारत की चावल खरीद लेकर टिप्पणी करने वाली थाईलैंड की राजदूत पिमचानोक वॉनकोर्पोन पिटफील्ड को आखिरकार भारी पड़ गया। थाईलैंड ने पिटफील्ड को विश्व व्यापार संगठन डब्ल्यूटीओ 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन एमसी-13 से हटाकर वापस थाईलैंड आने के लिए कहा है। अब इस बैठक में थाईलैंड के विदेश सचिव ने उनका स्थान लिया है। विश्व व्यापार सगंठन की यह मंत्रिस्तरीय वार्ता पांचवें दिन प्रवेश कर गई। थाईलैंड की राजदूत ने कहा था कि भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी पर चावल खरीद का कार्यक्रम लोगों के लिए नहीं, बल्कि निर्यात बाजार पर कब्जा करने के लिए है। भारत ने इस मुद्दे पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था। इसके बाद ही पिटफील्ड को वापस बुलाया गया। इस पूरे मामले में भारतीय अधिकारियों ने थाई प्रतिनिधि की मौजूदगी वाली मंत्रिस्तरीय बैठक का बहिष्कार किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा मामला कुछ विकसित देशों के साथ मिलकर रचा गया है। जिनेवा में डब्ल्यूटीओ की बैठकों के दौरान कुछ देशों ने इसी तरह का शोर मचाया था, सरकार ने भी इसे एक कहानी बनाने के प्रयास के रूप में देखा।साथ ही सरकार ने इस मामले को थाईलैंड के साथ भी उठाया था। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अपने अमेरिकी और यूरोपीय संघ के समकक्षों के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात के व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जायौदी और डब्ल्यूटीओ प्रमुख न्गोजी ओकोन्जो-इवेला के साथ मीटिंग के दौरान इस मुद्दे पर बात की थी। भारतीय प्रतिनिधिमंडल कृषि व्यापार में सुधार, विशेष रूप से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए खाद्यान्न की खरीद के लिए सरकार को लचीलापन प्रदान करने पर एक बंद दरवाजे की बैठक की। सरकारी अधिकारी के अनुसार हकीकत यह है कि उनके तथ्य गलत थे, क्योंकि सरकार खाद्य सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए धान की उपज का केवल 40 प्रतिशत ही खरीदती है।

उन्होंने बताया कि बाकी हिस्से को सरकारी स्वामित्व वाली एजेंसियां नहीं खरीदती हैं। इसे भारत से बाजार कीमतों पर निर्यात किया जाता है।इस मीटिंग के दौरान भारत पिटफील्ड के हस्तक्षेप वाले आक्रामक स्वर से नाराज था। इसके अलावा, अमीर देशों के कुछ प्रतिनिधियों ने थाई राजदूत के बयान की सराहना की। भारत ने इसे अधिकारियों ने तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। एक अधिकारी ने बताया कि उन्होंने सरकार पर पीडीएस के लिए खरीदे गए चावल का 40% निर्यात करने का आरोप लगाया था।

एक अन्य अधिकारी ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा मामला कुछ विकसित देशों के साथ मिलकर रचा गया है। जिनेवा में डब्ल्यूटीओ की बैठकों के दौरान कुछ देशों ने इसी तरह का शोर मचाया था, सरकार ने भी इसे एक कहानी बनाने के प्रयास के रूप में देखा। इसके अनुसार भारत की तरफ से वैश्विक बाजारों में सब्सिडी वाले चावल की बाढ़ ला दी गई है, जो वैश्विक व्यापार नियमों के अनुरूप नहीं है। सरकारी अधिकारी के अनुसार हकीकत यह है कि उनके तथ्य गलत थे, क्योंकि सरकार खाद्य सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए धान की उपज का केवल 40 प्रतिशत ही खरीदती है। उन्होंने बताया कि बाकी हिस्से को सरकारी स्वामित्व वाली एजेंसियां नहीं खरीदती हैं। इसे भारत से बाजार कीमतों पर निर्यात किया जाता है।

सरकार ने हाल ही में घरेलू कीमतों को कम करने के लिए गैर-बासमती चावल के निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया है। भारत सब्सिडी सीमा के मुद्दे का समाधान तलाश रहा है, जिसकी गणना 1986-88 के स्तर पर तय कीमतों पर की गई है। इसमें 10% की सीमा का उल्लंघन किया है। भारत की तरह थाईलैंड भी एक प्रमुख चावल एक्सपोर्ट करने वाला देश है। बता दें कि भारत ने इस मुद्दे पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था। इसके बाद ही पिटफील्ड को वापस बुलाया गया। इस पूरे मामले में भारतीय अधिकारियों ने थाई प्रतिनिधि की मौजूदगी वाली मंत्रिस्तरीय बैठक का बहिष्कार किया था। साथ ही सरकार ने इस मामले को थाईलैंड के साथ भी उठाया था। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अपने अमेरिकी और यूरोपीय संघ के समकक्षों के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात के व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जायौदी और डब्ल्यूटीओ प्रमुख न्गोजी ओकोन्जो-इवेला के साथ मीटिंग के दौरान इस मुद्दे पर बात की थी। विभिन्न मंचों पर कुछ विकसित और विकासशील देशों ने आरोप लगाया है कि भारत की तरफ से चावल जैसी जिंसों का सार्वजनिक भंडारण वैश्विक बाजार में रेट खराब कर देता है। भारत 2018 से 2022 तक दुनिया का सबसे बड़ा चावल एक्सपोर्ट करने वाला देश था। उसके बाद थाईलैंड और वियतनाम का स्थान था।

क्या कमजोरी सीटों पर भी जीत हासिल कर पाएगी बीजेपी?

वर्तमान में भाजपा कमजोर सीटों पर भी जीत हासिल कर सकती है! अब की बार 400 पार, बीजेपी इस स्लोगन के साथ चुनावी मैदान में उतर गई है। पीएम मोदी खुद चुनावी रैलियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। बीजेपी जल्द ही लोकसभा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर सकती है। उम्मीदवारों के नाम पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की एक लंबी बैठक में तय किए गए। एक बीजेपी नेता ने कहा, ‘यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कितने उम्मीदवारों की घोषणा की जाएगी, लेकिन सूची काफी बड़ी होने की उम्मीद है।’ पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, उम्मीदवारों की लिस्ट में कुछ बड़े नाम, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और वो क्षेत्र भी शामिल हो सकते हैं जहां पिछली बार पार्टी हार गई थी। सत्तारूढ़ पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि पिछली बार हारी हुई सीटों के लिए उसके उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार करने और मतदाताओं तक पहुंचने के लिए पर्याप्त समय मिले। उत्तर प्रदेश में, एक नेता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया, ‘मैंने सुना है कि कुछ सीटों पर जहां पार्टी को पिछली बार हार मिली थी, वहां बीजेपी ने अनौपचारिक रूप से कुछ प्रभारियों को तैनात किया है। पार्टी के महासचिव सुनील बंसल उन सीटों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। पार्टी को उम्मीद है कि वो इन सीटों को जीत लेगी। पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश की 78 लोकसभा सीटों में से 62 सीटें बीजेपी ने जीती थीं। इस बार अयोध्या राम मंदिर के उद्घाटन, राष्ट्रीय लोक दल रालोद के एनडीए में शामिल होने और कमजोर विपक्ष को देखते हुए पार्टी को इन सीटों को जीतने की उम्मीद है।

एक बीजेपी नेता ने कहा कि ‘कांग्रेस अगर अपने उम्मीदवारों को चुनने से पहले हमारे बीजेपी उम्मीदवारों को भी जान ले, तब भी उनके लिए फायदा नहीं होगा, पीएम मोदी की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि बीजेपी आसानी से चुनाव जीत लेगी।’ एक और बीजेपी नेता ने कहा कि पार्टी ने चुनाव की तारीखों से पहले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी। लोकसभा उम्मीदवारों के जल्दी ऐलान से यह संदेश जाएगा कि बीजेपी एक अनुशासित पार्टी है जिसका ‘दृढ़ नेतृत्व’ है।

यूपी में, जहां सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें हैं, सूत्रों के मुताबिक, पहली लिस्ट में करीब 20 उम्मीदवारों के नाम हो सकते हैं। पार्टी राष्ट्रीय लोकदल रालोद के लिए भी दो सीटें छोड़ सकती है, जो पिछले महीने एनडीए में शामिल हुई थी। जयंत चौधरी की अगुवाई वाली रालोद ने 27 फरवरी के राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के आठवें उम्मीदवार को भी वोट दिया था, जिससे उसे समाजवादी पार्टी के तीसरे उम्मीदवार को हराने में मदद मिली थी। माना जा रहा है कि बीजेपी अपना दल एस के लिए एक या दो सीटें, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी एसबीएसपी के लिए एक सीट और निषाद पार्टी के लिए एक सीट भी छोड़ सकती है। हरियाणा में 10 लोकसभा सीटों के लिए संभावित उम्मीदवारों की लिस्ट बीजेपी नेतृत्व को मिल गई है। इससे हरियाणा में एनडीए के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं। दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी एनडीए की सहयोगी पार्टी है और राज्य की सत्ता में भी शामिल है। हरियाणा के एक बीजेपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘हमने सभी 10 सीटों के लिए नामों की लिस्ट दे दी है, लेकिन ये केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वो जेजेपी के लिए कोई सीट छोड़ना चाहते हैं या नहीं. ये फैसला हम नहीं ले सकते।’ पिछले चुनाव में बीजेपी ने हरियाणा की सभी 10 सीटें जीत ली थीं।

बीजेपी के सूत्रों ने खुलासा किया है कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विदिशा से चुनाव लड़ सकते हैं। पार्टी के महासचिव सुनील बंसल उन सीटों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। पार्टी को उम्मीद है कि वो इन सीटों को जीत लेगी। पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश की 78 लोकसभा सीटों में से 62 सीटें बीजेपी ने जीती थीं। इस बार अयोध्या राम मंदिर के उद्घाटन, राष्ट्रीय लोक दल रालोद के एनडीए में शामिल होने और कमजोर विपक्ष को देखते हुए पार्टी को इन सीटों को जीतने की उम्मीद है।बीजेपी की पहली सूची में 29 में से 10 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों की घोषणा होने की उम्मीद है। छत्तीसगढ़ में, पहली सूची में सरगुजा और बस्तर, दो आदिवासी क्षेत्रों की सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम शामिल होने की संभावना है।

आखिर किस राज्य में खाई जाती है सबसे ज्यादा मछली?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर किस राज्य में सबसे ज्यादा मछली खाई जाती है! क्या आप जानते हैं कि देश में मछली की सबसे ज्यादा खपत किस राज्य में है? इसका जवाब है त्रिपुरा। एक स्टडी में यह बात सामने आई है। ‘भारत में मछली खपत: पैटर्न और रुझान’ नाम की इस स्टडी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और वर्ल्डफिश द्वारा कई सरकारी संस्थानों और संगठनों के सहयोग से आयोजित किया गया था। इसके मुताबिक भारत में 96.69 करोड़ लोग मछली खाते हैं। यह देश की आबादी का 72.1% है। हरियाणा में मछली खाने वाली आबादी सबसे कम है। इस राज्य में केवल 20.55% लोग मछली खाते हैं। रोज मछली खाने के मामले में केरल पहले नंबर पर है। इस दक्षिणी राज्य में 53.5% लोग रोजाना मछली खाते हैं। आईसीएआर में उप महानिदेशक मत्स्य विज्ञान डॉ. ने कहा कि मछली की खपत की खपत को समझने के लिए व्यापक शोध जरूरी है। देश की खाद्य खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और कुपोषण का मुकाबला करने में मछली की अहम भूमिका है। भारत के लिए वर्ल्डफिश कंट्री लीड डॉ. ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण रणनीतियों में मछली की खपत को इंटिग्रेट करने का आह्वान किया। उन्होंने वैल्यू चेन को बढ़ाने और जलीय खाद्य प्रणालियों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए समग्र और अनुकूलनीय नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया। अध्ययन ने मछली की खपत में अस्थायी रुझानों और क्षेत्रीय और लैंगिक अंतरों का भी विश्लेषण किया। अध्ययन में मछली की खपत में लैंगिक अंतर भी नोट किया गया। कम समग्र खपत दर वाले राज्यों में, पुरुषों और महिलाओं के बीच मछली की खपत में व्यापक अंतर है। इसकी वजह यह हो सकती है कि पुरुष अपने घरों के बाहर मछली का सेवन करते हैं।इसमें पाया गया कि त्रिपुरा में मछली उपभोक्ताओं का अनुपात सबसे अधिक है। राज्य में 99.35% आबादी अपने आहार में मछली को शामिल करती है। दूसरी ओर, हरियाणा में मछली उपभोक्ताओं का अनुपात सबसे कम है। राज्य में केवल 20.55% आबादी मछली का सेवन करती है।

अध्ययन से पता चला कि पूर्वोत्तर और पूर्वी राज्यों, तमिलनाडु, केरल और गोवा में मछली की खपत के प्रति एक मजबूत सांस्कृतिक झुकाव है।इन राज्यों में 90% से अधिक आबादी मछली का सेवन करती है। इसके विपरीत, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे उत्तरी राज्यों में मछली उपभोक्ताओं का प्रतिशत कम है, जो आहार संबंधी प्राथमिकताओं और संभवतः मछली की उपलब्धता और सांस्कृतिक स्वीकृति को दर्शाता है।केरल रोजाना मछली की खपत के मामले में पहले नंबर पर है। इस राज्य में 53.5% आबादी हर दिन मछली का सेवन करती है। इसके बाद गोवा (36.2%), पश्चिम बंगाल (21.9%), मणिपुर (19.7%), असम (13.1%) और त्रिपुरा (11.5%) है। असम और त्रिपुरा साप्ताहिक मछली की खपत में भी अग्रणी हैं। इनमें 69% आबादी साप्ताहिक आधार पर मछली का सबसे ज्यादा सेवन करती है।

स्टडी के मुताबिक जम्मू और कश्मीर में बढ़ती मछली की खपत बढ़ रही है। पिछले 15 वर्षों में वहां इसमें 20.9 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। दूसरी ओर, पंजाब में मछली उपभोक्ताओं में 3.9 प्रतिशत अंकों की कमी आई। अध्ययन में मछली की खपत में लैंगिक अंतर भी नोट किया गया। कम समग्र खपत दर वाले राज्यों में, पुरुषों और महिलाओं के बीच मछली की खपत में व्यापक अंतर है। इसकी वजह यह हो सकती है कि पुरुष अपने घरों के बाहर मछली का सेवन करते हैं।

भारत ने मांस के खपत के पैटर्न में भी एक उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। मछली को अपने आहार में शामिल करने वाली आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत विश्व स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है। वैश्विक मछली उत्पादन में इसका लगभग 8% योगदान है।देश की खाद्य खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और कुपोषण का मुकाबला करने में मछली की अहम भूमिका है। भारत के लिए वर्ल्डफिश कंट्री लीड डॉ. ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण रणनीतियों में मछली की खपत को इंटिग्रेट करने का आह्वान किया। उन्होंने वैल्यू चेन को बढ़ाने और जलीय खाद्य प्रणालियों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए समग्र और अनुकूलनीय नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया। अध्ययन ने मछली की खपत में अस्थायी रुझानों और क्षेत्रीय और लैंगिक अंतरों का भी विश्लेषण किया। हालांकि, प्रति व्यक्ति मछली खाद्य आपूर्ति के मामले में, भारत 183 देशों में 129वें स्थान पर है। अध्ययन का अनुमान है कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे, तो भारत में मछली की खपत दोगुनी होने का अनुमान है। इसके भारत की स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047-2048 में 26.50 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें प्रति व्यक्ति वार्षिक मछली की खपत 16.07 किलोग्राम तक पहुंचने की उम्मीद है।