Thursday, March 5, 2026
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आखिर लोकसभा चुनाव में किन-किन दिग्गजों को उतारेगी बीजेपी ?

यह सवाल उसने लाजमी है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी किन-किन दिग्गजों को उतारेगी! उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीति गरमाने लगी है। विपक्षी गठबंधन की ओर से सीट शेयरिंग फार्मूला तय कर लिया गया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन का ऐलान करते हुए सीटों का निर्धारण कर लिया है। अब भारतीय जनता पार्टी भी अपने सहयोगियों के साथ सीटों के बंटवारे की प्रक्रिया पर आगे बढ़ती दिख रही है। देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का ऐलान कर सकती है। माना जा रहा है कि शुक्रवार को प्रदेश में एनडीए का फाइनल पिक्चर सामने आ सकता है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर भाजपा प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) के साथ चुनावी मैदान में उतार रही है। भाजपा इस चुनाव में सहयोगी दलों को गठबंधन के तहत 6 सीटें देने की योजना तैयार की है। वहीं, पार्टी खुद 74 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर सकती है। एनडीए के सहयोगियों में राष्ट्रीय लोक दल और अपना दल एस को दो-दो सीटें दी जा सकती है। वहीं, निषाद पार्टी और सुभासपा को एक- एक सीट मिल सकती है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के रालोद को चार से छह सीटें दिए जाने की चर्चा चल रही थी। अखिलेश यादव की ओर से गठबंधन का ऐलान भी किया गया था। लेकिन, पूर्व प्रधानमंत्री और महान किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा के बाद रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी पलट गए। वे एनडीए के पाले में चले गए। वहीं, पिछले दिनों सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर की ओर से तीन सीटों पर दावा किया गया था।

पिछले दो लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तहत दो- दो लोकसभा सीटों पर संतोष करने वाली अपना दल एस की भी कोशिश इस बार सीट बढ़ाने की थी। इसको लेकर दबाव बनाया गया, लेकिन अब कोई दबाव काम आता नहीं दिख रहा है। सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के एनडीए और ओबीसी नेता दारा सिंह चौहान के भाजपा में वापसी के बाद दावा किया जा रहा था कि पार्टी बहुत मजबूत हुई है। हालांकि, घोसी विधानसभा उप चुनाव परिणाम के बाद सुभासपा की स्थिति कमजोर हुई है। घोसी से दारा सिंह चौहान हारे थे। यूपी की घोसी लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में सपा- बसपा गठबंधन के उम्मीदवार अतुल राय को जीत मिली थी। इसे सपा और बसपा के गढ़ के रूप में देखा जाता है। बसपा को पिछली बार जीत मिली। ऐसे में लोकसभा चुनाव 2024 में पार्टी घोसी सीट पर सहयोगी दल निषाद पार्टी को दे सकती है। निषाद पार्टी की ओर से लगातार दो सीटों की मांग की जा रही है। हालांकि, भाजपा उन्हें इस सीट के जरिए मना सकती है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को भाजपा ने सांसद बनाया हुआ है।

गाजीपुर लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में सपा- बसपा गठबंधन के उम्मीदवार और बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को उतारा गया था। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को मात दी थी। सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर इस सीट पर लगातार दावा कर रहे हैं। ऐसे एनडीए इस सीट पर सुभासपा के कैंडिडेट दे सकती है। वहीं, सुभासपा अध्यक्ष के योगी सरकार में मंत्री बनाए जाने की चर्चा तेज हो गई है। इस प्रकार पार्टी इस सीट के सहारे उन्हें साध सकती है। अपना दल एस अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से चुनावी मैदान में उतर सकती हैं। पिछले दो लोकसभा चुनाव से वह मिर्जापुर से चुनावी मैदान में उतरती रही हैं। ऐसे में मिर्जापुर पर उनकी दावेदारी स्वाभाविक है। भाजपा भी इसमें छेड़छाड़ नहीं करना चाहेगी। अपना दल एस अध्यक्ष एक बार फिर बड़ी जीत दर्ज करती दिख सकती है।

अपना दल एस ने रॉबर्ट्सगंज लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में जीत दर्ज की थी। यहां से पकौड़ी लाल सांसद बने थे। हालांकि, पिछले दिनों उनका निधन हो गया। माना जा रहा है कि भाजपा यहां से अपना उम्मीदवार उतार सकती है। दरअसल, पिछले दिनों पार्टी के सर्वे में यहां अपना दल एस की स्थिति कमजोर आंकी गई थी। इस प्रकार की स्थिति में गठबंधन के तहत पार्टी अपना दल एस को प्रतापगढ़ सीट ऑफर कर सकती है। प्रतापगढ़ पर अभी भाजपा सांसद हैं। संभल लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी का गढ़ रहा है। यहां से डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क वर्ष 2019 में सांसद बने थे। पिछले दिनों उनका निधन हो गया। सपा ने उन्हें लोकसभा चुनाव 2024 का उम्मीदवार घोषित किया हुआ था। मुस्लिम बहुल इस सीट को भाजपा गठबंधन के तहत रालोद को दे सकती है। यहां से जयंत चौधरी एक जिताऊ उम्मीदवार खड़ी कर सपा को कड़ी टक्कर देने की कोशिश में है।

बागपत लोकसभा सीट को राष्ट्रीय लोक दल के गढ़ के रूप में माना जाता रहा है। हालांकि, यहां से पार्टी पिछले वर्षों में चुनाव हारती रही है। 2019 में भी रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को भाजपा के डॉ. सत्यपाल सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। माना जा रहा है कि इस बार गठबंधन के तहत यह सीट रालोद के पाले में जा सकती है। हालांकि, मथुरा और मुरादाबाद को लेकर भी इस प्रकार के दावे किए जा रहे हैं।

क्या है भारत की जीडीपी का वर्तमान डाटा?

आज हम आपको भारत की जीडीपी का वर्तमान डाटा बताने जा रहे हैं! यह उन लोगों के लिए काफी खुशी की बात है जिनके पास वास्तविक अनुभव के बजाय आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर आर्थिक विकास दर जानने की सुविधा है कि भारत की आर्थिक विस्तार की गति तेज हो रही है, जबकि बाकी दुनिया मंदी से बचने के लिए संघर्ष कर रही है। इस महीने के अंत तक समाप्त होने वाला चालू वित्तीय वर्ष के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.6% होने का अनुमान लगाकर, जो पिछले वित्तीय वर्ष में हासिल की गई 7% की तुलना में तेज है, सीएसओ ने कई काम पूरे किए हैं। एक, यह अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रबंधक के रूप में भारत सरकार की विश्वसनीयता को बढ़ावा देता है। दो, यह निजी उद्योग को प्रोत्साहित करता है, जिसका नए निवेश और पूंजी निर्माण में योगदान अब तक काफी कम रहा है। अब वह क्षमता विस्तार और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। इस कारम, अब विकास एक लुभावनी संभावना के बजाय एक जमीनी सच्चाई है। और तीन, यह आरबीआई को रुपये को स्थिर करने के लिए कुछ अतिरिक्त छूट देता है, भले ही तेज विकास से मिलने वाले रिटर्न के लालच में विदेशी पूंजी की बाढ़ आ जाए।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है- महंगाई दर में गिरावट। अर्थव्यवस्थाव्यापी मुद्रास्फीति का माप जीडीपी डिफ्लेटर है। यह नाम उन तकनीकी प्रक्रियाओं से लिया गया है जिनके माध्यम से सांख्यिकीविद (स्टेटीशियंस) कुल आर्थिक उत्पादन को शामिल करने वाली वस्तुओं और सेवाओं के वर्गीकरण के लिए कीमतों के वर्गीकरण में परिवर्तन का प्रबंधन करते हैं। हम सामान्य इंसानों के लिए यह समझना पर्याप्त है कि मौजूदा कीमतों में वृद्धि दर और स्थिर कीमतों में वृद्धि दर के बीच का अंतर जीडीपी डिफ्लेटर का बहुत करीबी अनुमान है। संशोधित आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) डिफ्लेटर 7.3% था। चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद की नाममात्र वृद्धि दर 9.1% और वास्तविक वृद्धि दर 7.6% रहने का अनुमान लगाया गया है। इसका मतलब है कि जीडीपी डिफ्लेटर उल्लेखनीय 1.5% तक गिर गया है। यदि अर्थव्यवस्थाव्यापी मुद्रास्फीति उच्च स्तर पर चिह्नित की गई होती, तो इससे वास्तविक विकास दर कम हो जाती।

हाल ही में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय के लिए जारी आंकड़ों से पता चला है कि समाज के लगभग सभी वर्गों की कंजम्पशन बास्केट में भोजन की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। इससे सांख्यिकीविदों को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में भोजन का भार कम करने की छूट मिल जाती है। चूंकि भोजन, मूल्य सूचकांक के सबसे अस्थिर घटकों में से एक रहा है, इसलिए इसके भार को कम करने से महंगाई को कम करने का समग्र प्रभाव पड़ेगा, जिससे वास्तविक विकास दर में वृद्धि होगी। जीडीपी खास अवधि में जोड़ा गया सकल मूल्य है, साथ ही उत्पाद करों के अलावा सब्सिडी भी शामिल है। यदि शुद्ध करों का हिस्सा बढ़ता है तो इसका असर सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि पर पड़ेगा। अच्छी बात है कि शुद्ध करों का हिस्सा भी चालू वित्त वर्ष में बढ़ा है। शुद्ध कर 2022-23 में ₹22.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2023-24 में अपेक्षित ₹27.1 लाख करोड़ हो गया है।

जीडीपी डेटा में सबसे महत्वपूर्ण आइटम जीडीपी में निश्चित पूंजी निर्माण की हिस्सेदारी है। कुल निवेश में निश्चित पूंजी निर्माण, स्टॉक में बदलाव, कीमती वस्तुओं में बदलाव और त्रुटियां और चूक शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण है स्थिर पूंजी निर्माण। 2014 से पहले के दशक में सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी में निवेश का हिस्सा 38% तक पहुंच गया था, और स्थिर पूंजी निर्माण बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद का 35% हो गया था। 2014 के बाद यह मौजूदा कीमतों के आधार पर 30% से नीचे गिर गया था और अब तक वहीं बना हुआ है। स्थिर पूंजी निर्माण का 30% से ऊपर बढ़ना एक संकेत है कि निवेश बढ़ रहा है और जो आर्थिक विकास हासिल किया गया है वह गायब होने के बजाय कायम रहेगा।

स्टेटिस्टिकल मशीनरी कितना प्रभावी होगी, यह डेटा की उपलब्धता पर निर्भर करता है। जीएसटी लागू होने से कॉरपोरेट वैल्यू ऐडेड के आंकड़े पहले के मुकाबले बहुत तेजी से उपलब्ध होने लगे हैं। किसी कंपनी द्वारा जोड़ा गया मूल्य उसके द्वारा भुगतान किया गया जीएसटी है, जिसे उस पर लगने वाले जीएसटी की दर से विभाजित किया जाता है।पूरी अर्थव्यवस्था और सरकार में कम्प्यूटरीकरण में वृद्धि से आंकड़े तेजी से संग्रह होते हैं और उनका मिलान एवं विश्लेषण भी तेजी से हो पाता है। उसी अनुरूप, भारत सरकार ने अब निर्णय लिया है कि जीडीपी को अंतिम रूप देने के लिए अब तीसरे संशोधन की आवश्यकता नहीं है। जीडीपी अनुमान का दूसरा संशोधन ही अब अंतिम अनुमान होता है। साल 2021-22 के आंकड़ों से ऐसा हुआ है। यदि भारत सरकार के स्टेटीशियन सही हैं तो भारत की अर्थव्यवस्था सच में बहुत शानदार स्थित में है।

जानिए शिवाजी महाराज के वीर सैनिक कान्होजी आंग्रे की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको शिवाजी महाराज के वीर सैनिक कान्होजी आंग्रे की अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में व्यापार शुरू करने के लिए पुर्तगालियों से टक्कर लेनी पड़ी। सन 1612 में दोनों शक्तियों के बीच सुवाली का युद्ध हुआ। इसके पहले मुगल बादशाह जहांगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में व्यापार की अनुमति नहीं दी थी। लेकिन, सुवाली युद्ध के बाद हालात बदल गए। ब्रिटिश कंपनी को बादशाह की इजाजत मिल गई। अंग्रेजों और पुर्तगालियों के बीच भारत में रिश्तों की शुरुआत भले लड़ाई से हुई, लेकिन आगे जाकर दोनों को दोस्ती करनी पड़ी। यह दोस्ती थी मजबूरी वाली। इतिहास का यह कमाल हुआ था केवल एक शख्स के कारण। वह थे मराठा नेवी के चीफ कान्होजी आंग्रे। उन्होंने अकेले दम कई बरसों तक ब्रिटिश, डच और पुर्तगालियों को छकाया और भारत के पश्चिमी तट से दूर रखा। वह एक बार भी समुद्र की लड़ाई नहीं हारे।

उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नाईक बताते हैं, ‘भारतीय-स्वदेशी नौसेना का इतिहास शिवाजी महाराज से आरंभ होता है। इसी क्रम में आगे कान्होजी आंग्रे ‘स्वराज्य’ के पहले ‘सरखेल’ बने। आज की भाषा में इसे ‘एडमिरल’ कहते हैं।’ समुद्र में कान्होजी का उदय हुआ था 1698 में। सतारा के प्रमुख ने उन्हें सरखेल नियुक्त किया था। आज की मुंबई से लेकर वेंगुर्ला तक का इलाका उनके अधीन आता था।

यह वह समय था, जब मुगल और मराठा साम्राज्य कमजोर पड़ रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के साथ अपना प्रभुत्व भी तेजी से फैला रही थी। सुवाली की लड़ाई के बाद कंपनी ने अपनी एक नौसेना बना ली थी। उसका काम था मसाला रूट पर कंपनी या सीधे कहें तो ब्रिटिश हितों की रक्षा करना। उनके अलावा डच और पुर्तगाली भी थे। यूरोप से जहाज आते और भारत से मसाले, सिल्क वगैरह ले जाते। कहने के लिए यह सब व्यापार का हिस्सा था, लेकिन इसके साथ भारत को लूटने और गुलाम बनाने की साजिश भी चल रही थी। पश्चिम में इस पर लगाम लगाई कान्होजी ने। उन्होंने समुद्र के किनारे एक ऐसी अभेद्य दीवार खड़ी कर दी, जिसे पारकर कोई विदेशी उनकी अनुमति के बगैर नहीं आ सकता था। देवगढ़, अलीबाग, पूर्णागढ़ में उन्होंने निर्माण कराए। अपनी करंसी भी चलाई, जिसे अलीबागी रुपैया कहते थे। उन्होंने पहले विजयदुर्ग, फिर अलीबाग के कुलाबा में बेस बनाया। बंदरगाह पर आने वाले हर व्यापारिक जहाज को टैक्स देना पड़ता। राम नाईक बताते हैं, ‘कान्होजी के बेड़े में लगभग 80 युद्ध-नौकाएं थीं। उन्होंने उस समय विदेशी आक्रमणकारियों को पश्चिमी तट पर घुसने ही नहीं दिया। वह सागर योद्धा थे।’

कान्होजी का जन्म पुणे के पास अंगारवाड़ी गांव में सन 1669 में हुआ था। इसी जगह से उनके नाम के साथ जुड़ा आंग्रे। उनके पिता छत्रपति शिवाजी के लिए काम करते थे। बाद में कान्होजी ने शिवाजी के वंशज छत्रपति साहूजी की नौसेना की कमान संभाली। सुरेंद्र नाथ सेन ने ‘द मिलिट्री सिस्टम ऑफ मराठा’ में लिखा है कि छत्रपति शिवाजी ने मराठा हितों की रक्षा के लिए नौसेना बनाई थी। उनकी मौत के बाद इस साम्राज्य के बिखरने का खतरा पैदा हो गया। तब कई जोशीले मराठा सामने आए। कान्होजी उनमें से एक थे।

कान्होजी ने कई ब्रिटिश और पुर्तगाली जहाजों को निशाना बनाया। अगले एक दशक में उनकी ताकत इतनी बढ़ गई थी कि कोई चुनौती देने वाला नहीं रहा। यहां तक कि 1712 में उन्होंने बॉम्बे के ब्रिटिश प्रेसिडेंट विलियम एस्लाबी की हथियारबंद नौका को पकड़ लिया। आखिरकार अंग्रेजों और पुर्तगालियों को पुरानी दुश्मनी भुलाकर हाथ मिलाना पड़ा। 29 नवंबर, 1721 को दोनों ने संयुक्त अभियान छेड़ा, लेकिन नाकाम रहे। ऐसी एक कोशिश तब की तीसरी बड़ी यूरोपीय ताकत नीदरलैंड ने भी की थी। 1724 में उसने अपने सबसे मजबूत बेड़े के साथ विजयदुर्ग पर चढ़ाई की और नाकाम लौटा।

वह जब मराठा नेवी के प्रमुख बने, तब बेड़े में बमुश्किल आठ-दस छोटी नौकाएं होंगी और उनके सामने चुनौतियां थीं कई। उन्हें जंजीरा रियासत के सिदी से मराठा साम्राज्य बचाना था। मालाबार पर उत्पात मचा रहे लुटेरों से देसी व्यापारियों की रक्षा करनी थी। बता दें कि उन्होंने पहले विजयदुर्ग, फिर अलीबाग के कुलाबा में बेस बनाया। बंदरगाह पर आने वाले हर व्यापारिक जहाज को टैक्स देना पड़ता। राम नाईक बताते हैं, ‘कान्होजी के बेड़े में लगभग 80 युद्ध-नौकाएं थीं। उन्होंने उस समय विदेशी आक्रमणकारियों को पश्चिमी तट पर घुसने ही नहीं दिया। वह सागर योद्धा थे।’ इनके बीच बॉम्बे में अंग्रेज, गोवा में पुर्तगालियों और वेंगुर्ला में डचों से निपटना था। कान्होजी ने अपने आदर्श शिवाजी महाराज की तरह इन सभी का सामना किया। उनकी छापामार शैली का जवाब किसी के पास नहीं था।

आखिर कैसे बनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन? जानिए पूरी कहानी!

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का निर्माण कैसे हुआ था! लोकसभा चुनाव में जब पहला मतदाता मत डालने के लिए वोटिंग बटन दबाएगा तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन 2004 के बाद से पांच संसदीय चुनावों में इस्तेमाल किए जाने के महत्वपूर्ण मील के पत्थर तक पहुंच जाएगी। ईवीएम की यात्रा विभिन्न घटनाक्रमों से परिपूर्ण रही है क्योंकि समय-समय पर कुछ राजनीतिक दलों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं तो वहीं अन्य ने हेराफेरी की बहुत कम गुंजाइश के साथ जल्द परिणाम घोषित किए जाने के लिए इसकी सराहना भी की है। EVM की कल्पना पहली बार 1977 में की गई थी। इसका प्रोटोटाइप हैदराबाद स्थित इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ईसीआईएल द्वारा 1979 में विकसित की गई थी। यह परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम था। छह अगस्त 1980 को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने निर्वाचन आयोग द्वारा मशीन का प्रदर्शन किया गया था। ईवीएम को लेकर व्यापक सहमति पर पहुंचने के बाद, निर्वाचन आयोग ने उनके उपयोग के लिए संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्देश जारी किए। केरल में परूर विधानसभा सीट के चुनाव के दौरान 19 मई 1982 को 50 मतदान केंद्रों पर प्रायोगिक आधार पर मशीनों का इस्तेमाल किया गया था। कानून में स्पष्ट प्रावधान के बिना ईवीएम के इस्तेमाल को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत ने ईवीएम में खामियों या इसके फायदों पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया लेकिन कहा कि मशीनों से मत डालने का निर्वाचन आयोग का आदेश उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। बाद में परूर निर्वाचन क्षेत्र से जीतने वाले उम्मीदवार के चुनाव को रद्द कर दिया गया था।

दिसंबर 1988 में जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किया गया और कानून में एक नई धारा 61ए शामिल की गई, जो आयोग को ईवीएम के इस्तेमाल का अधिकार देती है। संशोधन 15 मार्च, 1989 को लागू हुआ। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड बीईएल, बेंगलुरु ने ईवीएम का प्रोटोटाइप प्रदर्शित करने के बाद ईवीएम के निर्माण के लिए ईसीआईएल के साथ साझेदारी की गई। केंद्र सरकार ने 1990 में दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में चुनाव सुधार समिति का गठन किया जिसमें कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दलों के प्रतिनिधि शामिल थे। समिति ने तकनीकी विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा ईवीएम की जांच की सिफारिश की। विशेषज्ञ समिति ने सर्वसम्मति से बिना किसी देरी के ईवीएम के उपयोग की सिफारिश की और इसे तकनीकी रूप से मजबूत, सुरक्षित और पारदर्शी बताया।

भारतीय चुनाव आयोजित करने के लिए ईवीएम के उपयोग पर साल 1998 में एक आम सहमति बनी थी और उनका उपयोग मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के 16 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया था। ईवीएम का उपयोग 1999 में 46 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों तक बढ़ाया गया और फरवरी 2000 में हरियाणा चुनावों में 45 विधानसभा सीटों पर मशीनों का उपयोग किया गया। इसके बाद सभी विधानसभा चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया। साल 2004 के लोकसभा चुनावों में सभी 543 निर्वाचन क्षेत्रों में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था। वर्ष 2001 में ईवीएम में कई तकनीकी परिवर्तन किए गए और वर्ष 2006 में मशीनों को और उन्नत किया गया। साल 2006 से पहले के समय वाली ईवीएम को ‘एम1 ईवीएम’ के रूप में जाना जाता है जबकि 2006 से 2010 के बीच निर्मित ईवीएम को ‘एम2 ईवीएम’ कहा जाता है। वर्ष 2013 से निर्मित नवीनतम पीढ़ी के ईवीएम को ‘एम3 ईवीएम’ के नाम से जाना जाता है।

चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और सत्यापन में सुधार के लिए, वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल वीवीपीएटी मशीनों के उपयोग को शुरू करने के लिए 2013 में चुनाव नियम, 1961 में संशोधन किया गया था। इनका इस्तेमाल पहली बार नगालैंड की नोकसेन विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में किया गया था। एक ईवीएम में कम से कम एक बैलेट यूनिट, एक कंट्रोल यूनिट और एक वीवीपैट होता है। ईवीएम की संभावित लागत 7,900 रुपये प्रति बैलेट यूनिट, 9,800 रुपये प्रति कंट्रोल यूनिट और 16,000 रुपये प्रति वीवीपैट शामिल है।

साल 2019 के बाद से, प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में बगैर किसी नियत क्रम में चुने गए पांच मतदान केंद्रों से वीवीपीएटी पर्चियों का मिलान अधिक पारदर्शिता के लिए ईवीएम गणना के साथ किया जाता है। चुनाव आयोग के अनुसार, अब तक कोई गलत मिलान नहीं हुआ है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में शामिल दलों सहित कई विपक्षी दलों ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और मांग की है कि अधिक पारदर्शिता के लिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में पर्चियों का मिलान ईवीएम गिनती के साथ किया जाना चाहिए।

ईवीएम को लेकर विपक्षी दलों द्वारा जताई गई चिंताओं पर मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने हाल में कहा था कि राजनीतिक दलों को राजी करने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्षों से ईवीएम ने उन सभी के पक्ष में परिणाम दिए हैं जिन्होंने इसकी विश्वसनीयता पर चिंता जताई है। पिछले संसदीय चुनाव के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे सुनील अरोड़ा ने अफसोस जताया है कि चुनावी हार झेल रहे दलों द्वारा ईवीएम को ‘फुटबॉल’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव नहीं है। जहां तक षडयंत्र और हेराफेरी की आशंकाओं का संबंध है, वे निश्चित रूप से त्रुटिरहित हैं। लेकिन तकनीकी खामी संभव है, जैसा कि किसी अन्य उपकरण के मामले में होता है। उन्होंने कहा कि उन्हें तुरंत ठीक कर लिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि ईवीएम प्रत्यक्ष चुनावों में वोटों के ‘एग्रीगेटर’ समूहक के रूप में काम करती है। राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनावों जैसी आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में इसका उपयोग नहीं होता है।

आखिर पहाड़ों को खोद कर कैसे बनाई जाती है सुरंग? जानिए पूरी प्रक्रिया!

आज हम आपको बताएंगे कि पहाड़ों को खोद कर सुरंग कैसे बनाई जाती है! हमारे देश ने इंसानों के लिए सबसे मुश्किल जगहों पर पहाड़ों की सीना चीरकर सुरंगें बनाई हैं। ये सुरंगें ऊंचे हिमालय से लेकर अरब सागर की गहराइयों तक जाती हैं। बीते साल उत्तराखंड के सिलक्यारा में एक भयानक सुरंग हादसा हुआ था। इस हादसे में 41 मजदूर 17 दिन तक एक सुरंग में फंसे रहे, राहत की बात यह है कि सभी मजदूरों को कड़ी मशक्कत के बाद सुरंग से बाहर निकाल लिया गया था। इस हादसे के बाद सुरंगों के निर्माण को लेकर हर किसी के मन में जिज्ञासा बढ़ी है। किस तकनीक से सुरंग बनती है? सुरंग बनाने में कितना बजट खर्च होता है? एक सुरंग को बनने में कितना समय लगता है? ऐसे कई सवाल हर किसी के मन में आते हैं। जान लीजिए इन सभी सवालों का जवाब। ऊंचे-ऊचे पहाड़ों पर सुरंग बनाने के लिए ड्रिल और ब्लास्ट विधि का इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक काफी रिस्की होती है। कभी-कभी ब्लास्ट के दौरान चट्टान का बड़ा हिस्सा खिसक जाता है और आसपास के घरों में दरार भी आ जाती है। इसके अलावा सुरंग-बोरिंग मशीन से भी सुरंग बनाई जाती है। DBM में चट्टान में छेद कर विस्फोटक भरा जाता है और फिर विस्फोट से चट्टान तोड़ी जाती है। जबकि TBM में मशीनों के जरिए चट्टान में छेद किया जाता है। ये DBM की तुलना में मंहगी, लेकिन काफी सुरक्षित होती है। वहीं, न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मैथड सुरंग खोदने का पारंपरिक तरीका है। इसका इस्तेमाल सबसे पहले 1962 में ऑस्ट्रिया के रैजबिज ने किया था। एनएटीएम का इस्तेमाल आम तौर पर उन इलाकों में किया जाता है, जहां पर टर्नल बोरिंग मशीन से सुरंग बनाना संभव होता है।

एक्सपर्ट बताते हैं कि TBM का उपयोग ऊंचे पहाड़ों में सुरंग बनाने के लिए किया जा सकता है, क्योंकि इससे पहाड़ में खाली जगह बनने पर चट्टान फट जाती है और उसका हिस्सा गिर जाता है। TBM तकनीक 400 मीटर तक ऊंची चट्टानों में इस्तेमाल की जाती है। दिल्ली मेट्रो के लिए सुरंगों का निर्माण TBM के जरिए किया गया है। वहीं जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड सहित हिमालय जैसी जगहों पर DBM तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। रोहतांग सुरंग या अटल सुरंग वर्तमान में भारत की सबसे लंबी ऊंचाई वाली सुरंग है, जो हिमालय पर्वत में स्थित है। अक्टूबर 2020 में उद्घाटन किया गया, यह 9.02 किमी लंबी सुरंग लेह और मनाली को जोड़ती है और इसे सीमा सड़क संगठन बीआरओ द्वारा बनाया गया था। यह हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रा के नीचे और 3,878 मीटर की ऊंचाई पर बनाई गई है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर, अटल सड़क सुरंग लेह और मनाली के बीच यात्रा के समय को 4 घंटे कम कर देती है।

भारत की सबसे लंबी सुरंग मानी जाने वाली श्यामा प्रसाद मुखर्जी रोड सुरंग 9.34 किमी लंबी है। यह चेनानी से शुरू होती है और नशरी पर समाप्त होती है। ये सुरंग जम्मू कश्मीर के उधमपुर में चेनानी कस्बे को रामबन जिले के नशरी कस्बे से जोड़ती है। समुद्र तल से लगभग 4000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह सुरंग जम्मू और श्रीनगर के बीच यात्रा के समय को दो घंटे कम कर देती है। ये सुरंग जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय राजमार्ग पर शिवालिक की पहाड़ियों पर बनी है। इसे चेनानी नारी सुरंग भी कहते हैं। कुथिरन रोड सुरंग वर्तमान में भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंगों की सूची में शुमार है और यह केरल के त्रिशूर में स्थित है। इसकी लंबाई 8.7 किमी है और यह त्रिशूर और पलक्कड़ के बीच यात्रा के समय को दो घंटे कम कर देती है। अप्रैल 2019 में उद्घाटन किया गया, कुथिरन रोड सुरंग का निर्माण भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा किया गया था। हालांकि, अटल रोड सुरंग के विपरीत, कुथिरन सड़क सुरंग में चार लेन हैं।  बनिहाल काजीगुंड रोड सुरंग का उद्घाटन वर्ष 2021 में किया गया था, और इस इंजीनियरिंग चमत्कार को बनाने में 10 साल लग गए। समुद्र तल से 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सुरंग की कुल लंबाई 8.5 किमी है। दो ट्यूब वाली सुरंग 124 जेट पंखे, 234 सीसीटीवी आधुनिक कैमरे, एक अग्निशमन प्रणाली और एक निकास प्रणाली से लैस है।

जोजी ला सुरंग अभी निर्माणाधीन है। इसके बनने के बाद जोजी-ला दरें को पार करने में अभी लगने वाले 3.5 घंटों की तुलना में 15 मिनट में पार करना संभव हो जाएगा। जोजी ला सुरंग भी कारगिल और श्रीनगर के बीच उचित संपर्क स्थापित करेगी। इसके साथ ही, रक्षा कर्मियों को भोजन और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और क्षेत्र में व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देना सुरंग के प्रमुख उद्देश्य है।

क्या तेजी से आगे बढ़ रहा है भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है या नहीं! अधिकांश वैश्विक निवेशक दुनिया के सबसे शक्तिशाली बाजार अमेरिका में शेयर की कीमतों में बढ़ोतरी से परेशान हैं। लेकिन भारत का चढ़ता बाजार बुल मार्केट और भी अधिक गतिशील और मजबूत है। अमेरिका और भारत हाल ही में डॉलर के संदर्भ में सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। सिर्फ ये ही दो प्रमुख शेयर बाजार हैं जो बाकी सभी बाजारों से आगे हैं। उनके बाजार अपेक्षाकृत मजबूत अर्थव्यवस्थाओं और आशावादी घरेलू निवेशकों के एक बड़े आधार से संचालित होते हैं। हालांकि, दोनों देखने में एक ही लगें, लेकिन वाकई में दोनों की मजबूती का राज अलग-अलग है। अमेरिका एक ऐतिहासिक विसंगति है। इसकी विकास गाथा सिर्फ एक बड़े सेक्टर पर लिखी गई है। वह है टेक सेक्टर। इसके अंदर भी बहुत हद तक मुट्ठीभर की विशालकाय कंपनियों के कंधों पर ही दारोमदार है। टेक सेक्टर की उन विशाकाय अमेरिकी कंपनियों को हाल में शानदार सात (मेग्निफिशेंट सेवन) उपमा दी गई। ये कंपनियां पुरानी पड़ रही हैं, लेकिन बड़ी से बड़ी हो रही हैं। इस कारण बाकी सभी शेयरों का खून चूस रही हैं। पिछले वर्ष मैग्निफिसेंट सेवन में औसतन 80% की वृद्धि हुई है और उस दौरान अमेरिकी शेयर बाजार की कुल बढ़त में आधे से अधिक का योगदान है। इस बीच, अमेरिका में सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाले 4,700 में से औसत स्टॉक में गिरावट आई है। यह हद से ज्यादा केंद्रित रिटर्न की कहानी है, जो एआई से जुड़े किसी भी स्टॉक के लिए बढ़ते उन्माद पर केंद्रित है और जिसे मुख्य रूप से सबसे बड़ी कंपनियों के लिए एक वरदान के रूप में देखा जाता है।

यह कितना असामान्य है, इसका अंदाजा लगाने के लिए गौर करना होगा कि अतीत में बढ़ते अमेरिकी बाजारों के दौर में बड़े शेयर बमबम बोल रहे थे लेकिन छोटे शेयरों को नुकसान नहीं हुआ था। 1970 के दशक की शुरुआत में, फिर 90 के दशक के अंत में छोटे शेयरों ने दोहरे अंकों में वार्षिक रिटर्न दिया और बाकी उभरते बाजारों के साथ उनकी किस्मत भी चमक गई।अब, छोटे शेयर निचले पायदान पर और रेस से बाहर हैं। आमतौर पर संस्थागत निवेशकों की तुलना में खुदरा निवेशक बहुत ज्यादा जोखिम लेते हैं और बिल्कुल अलग पोर्टफोलियो रखते हैं। ठीक तीन साल पहले महामारी के चरम पर होने के वक्त खुदरा निवेशकों ने खुला विद्रोह कर दिया था। वो हेज फंड किंगपिन की पॉजिशन के खिलाफ दांव लगाकर उन्हें गलत साबित करने की कोशिश कर रहे थे। आज हेज फंड और रॉबिनहुड पर डे ट्रेडर्स दोनों के लिए टॉप 10 होल्डिंग्स में मैग्निफिसेंट सेवन का दबदबा है।

इसके विपरीत भारत का तेजी से बढ़ता बाजार बहुआयामी मजबूती पर आधारित है। शेयर बाजार में लाभ सभी क्षेत्रों में समान रूप से वितरित किया जाता है और किसी भी क्षेत्र ने पिछले वर्ष की तुलना में कुल रिटर्न का एक चौथाई भी नहीं दिया। ऐपल जैसी विशाल टेक कंपनियों ने अकेले अमेरिकी शेयर बाजार के लाभ का उतना हिस्सा अपने नाम कर लिया है जितना भारत में कोई एक इंडस्ट्री नहीं कर पाई।जबकि भारत में लार्ज कैप स्टॉक्स में बढ़त हो रही है, मध्यम और छोटे शेयरों में और भी अधिक बढ़त हुई है। 2023 की शुरुआत से जमीन खोने के बजाय औसत स्टॉक 40% से अधिक बढ़ गया है। उभरते बाजारों में अब मूल्य के हिसाब से सभी स्मॉल कैप शेयरों में भारत की हिस्सेदारी 25% है, जो ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन सहित किसी भी अन्य देश से अधिक है। ऐसी धारणा है कि चीन से पैसा निकलने से भारत को फायदा हो रहा है। दरअसल, विदेशी धन आ रहा है, लेकिन घरेलू धन जितनी मात्रा में नहीं। इस कारण, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के पास अब पब्लिक ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध 40% से भी कम स्टॉक हैं, जो एक दशक पहले के 60% से कम थे।

ब्लूमबर्ग डेटा के मुताबिक, पिछले दो दशकों में भारत में शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों की संख्या लगभग पांच गुना बढ़कर 2,800 हो गई है जिनमें एक करोड़ डॉलर से कम मूल्य वाले माइक्रो कैप शामिल नहीं हैं। इस बीच, अमेरिका में यह संख्या एक चौथाई घटकर 4,700 रह गई, जहां कुलीनतंत्र ने केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि अधिकांश उद्योगों पर मजबूत पकड़ बनानी शुरू कर दी।दूसरी तरफ, भारत में लगभग 180 कंपनियां इस दशक में कम से कम तीन गुना हो गई हैं और अब उनका मूल्य 1 अरब डॉलर या उससे अधिक है। यह किसी भी अन्य देश से काफी आगे है, जिसमें 160 से कम के साथ अमेरिका और 80 से कम के साथ चीन शामिल है।ज्यादातर शेयर बाजारों में समय की धारा से इतर वृद्धि देखी जाती है, लेकिन भारत में बढ़ते खुदरा निवेशकों से आ रहे धन का प्रवाह बाजार को मजबूती दे रहा है। पिछले साल, भारतीयों ने 85 अरब से ज्यादा ऑप्शंस खरीदे जो अमेरिका के मुकाबले लगभग आठ गुना अधिक रहे। भारतीयों ने वो ऑप्शंस अगले आधे घंटे में ही बेच भी दिए। उन्माद के बीच नियामकों ने ट्रेडिंग प्लैटफॉर्मों को इस चेतावनी के साथ खोलने का आदेश दिया कि 90% खुदरा निवेशक इन ट्रेडों पर पैसे गंवा रहे हैं।

4.6 ट्रिलियन डॉलर के कुल मूल्य के साथ, भारत का बाजार अमेरिका के 62 ट्रिलियन डॉलर के मुकाबले बौना है। फिर भी यह उतना ही विविध, अधिक प्रतिस्पर्धी और अधिक विकास क्षमता वाला है। बेशक भारतीय बाजार में निवेश के अपने जोखिम भी हैं। यह अब अमेरिकी बाजार से भी अधिक महंगा है और कम अस्थिर भी है, जो निवेशकों के बीच बहुत मजबूत विश्वास का संकेत देता है कि अच्छे दिन आएंगे।ऐसे देश के लिए जिसने लंबे समय से आशावादियों और निराशावादियों, दोनों को निराश किया है, उम्मीदों का स्तर अब बहुत ऊंचा है। फिर भी, ऐसे समय में जब निवेश जगत की नजरें केवल अमेरिका में एआई केंद्रित उछाल पर हैं, एक और प्रमुख बाजार को अपनी तेजी लेकिन क्लासिक धुन पर आगे बढ़ते देखना आश्चर्यजनक है।

क्या लद्दाख में पिघल रहे हैं ग्लेशियर?

वर्तमान में लद्दाख में ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं! पिछले महीने की शुरुआत से ही लद्दाख में लोग पूर्ण राज्‍य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने जैसी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठन अपेक्स बॉडी लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के नेतृत्व में उनके प्रतिनिधियों की पहले 19 फरवरी को और फिर 24 फरवरी को केंद्र सरकार से बातचीत हुई। बातचीत नाकाम रही और अब लद्दाख फिर से आंदोलन की राह पर है। सरकार की तरफ से कहा गया था कि 24 फरवरी की बैठक में लीगल एक्सपर्ट्स भी होंगे और हमारी उम्मीद के मुताबिक कुछ घोषणा होगी। मगर उस बैठक में न तो गृह सचिव थे, न गृह राज्य मंत्री और न ही लीगल एक्सपर्ट्स। छोटी-मोटी बातों पर चर्चा के बाद अगली बैठक 1-2 मार्च को रखने की बात होने लगी। यह व्यावहारिक नहीं था, क्योंकि तब तक चुनावी आचार संहिता लागू हो जाती। लिहाजा 27-28 फरवरी तक बैठक का आश्वासन दिया गया। लेकिन वह समय गुजर चुका है। अब लद्दाख की जनता फिर से बड़े स्तर पर आंदोलन करेगी। हम आमरण आंदोलन पर उतरेंगे।

यूं तो छठी अनुसूची केवल पर्यावरण के लिए नहीं है। जनजातीय संस्कृति, जमीन आदि के संरक्षण के लिए भारत के संविधान में यह प्रावधान रखा गया है। जहां तक लद्दाख की आबोहवा और पहाड़ों को बचाने की बात है, तो सिक्स्थ शेड्यूल कहता है कि यहां जिला स्तर पर एक ऑटोनोमस काउंसिल होगी, जिसमें चुने हुए प्रतिनिधि होंगे। ये प्रतिनिधि निर्णय करेंगे कि इलाके का कैसा विकास हो। इस काउंसिल को नियम बनाने की पावर होगी। वह तय करेगी कि कितना विकास हो ताकि यहां की आबोहवा, पहाड़ों पर कोई असर न हो। अभी लेह-लद्दाख में जो दो काउंसिल हैं, उनके पास कोई पावर नहीं है। अभी कहा जाता है कि सिक्स्थ शिड्यूल में लद्दाख को लाया जाता है, तो आप विकास पर रोक लगा देंगे। लेकिन ऐसी बात नहीं है। स्थानीय जनता के तालमेल से विकास का कोई भी काम हो सकता है। उद्योग लग सकते हैं।

दुनिया भर के लोगों की जो जीवनशैली है, उससे बड़े स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसेस का उत्सर्जन होता है। उसकी वजह से पूरी दुनिया का तापमान बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय में और तेजी से उसका असर देखा जा रहा है। वैसे भी हमारे ग्लेशियर्स बहुत जल्द खत्म होने वाले हैं। हमारी अपील है कि बड़े शहरों में लोग सादा जीवन बिताएं ताकि पहाड़ों में हम आसानी से जी पाएं। जहां तक स्थानीय स्तर की बात है, तो यहां जो भी उद्योग हैं, यहां तक कि घरों को गर्म करने के लिए जो आग जलाई जाती है और डीजल की गाड़ियों से जो धुआं निकलता है- ये सब ब्लैक कार्बन हैं। हवा के साथ वे particulate matter उड़ते हुए ग्लेशियर पर बैठ जाते हैं जिससे ग्लेशियर पर काली परत जम जाती है। काला रंग सूरज की किरणों को सोख लेता है और ग्लेशियर को गर्म करता है। इमिशन और ग्लोबल वॉर्मिंग से ज्यादा ये कारण ग्लेशियर्स को पिघला रहे हैं।

आप समझ सकते हैं कि घरों के धुएं से और पर्यटकों की टैक्सी से इतना नुकसान हो रहा है, तो बड़े स्तर पर उद्योग आने से क्या होगा। अभी हाल ही में कश्मीर यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च बहुत चर्चा में आई। द्रास और कारगिल के इलाके में जो ग्लेशियर्स हैं, वे और ग्लेशियर्स से ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। इसका कारण हाइवे पर चलने वाली गाड़ियां और अन्य मानवीय गतिविधियां हैं। टूरिज्म इंडस्ट्री यहां डिवेलप हो गई तो इसका फायदा कुछ लोगों को होगा, मगर बाकी लोगों को लेने के देने पड़ जाएंगे। उस रोजगार का क्या फायदा जो भविष्य को बर्बाद कर दे? इसलिए संतुलन होना चाहिए कि किस स्तर तक हम रोजगार लें और कब उस प्रक्रिया पर विराम लगा दें।

आइस स्तूप अभी पूरी शक्ल में नहीं आया है। अभी इस पर बहुत अधिक शोध की जरूरत है। हम लद्दाख के बाहर हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में भी देख रहे हैं। जिन जगहों पर ठंड होती है और पानी की कमी है, वहां यह प्रॉजेक्ट कारगर हो सकता है। कुछ तरीकों पर भी हम विचार कर रहे हैं जिससे बर्फ के बांध बनाकर पानी को रोका जा सके ताकि ग्राउंड वॉटर रिचार्ज भी हो पाए। हाल ही में जल शक्ति मंत्रालय से हमारी बात चली थी कि कैसे ऐसे तरीकों से हिमालय के और इलाकों में भी ग्राउंड वॉटर रिचार्ज किया जा सकता है। इन पर काम करने के लिए हमने लेह के पास हिमालयन इंस्टिट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव लद्दाख नाम से एक वैकल्पिक विश्वविद्यालय बनाया है। इसमें मैं अभी कार्यरत हूं। यहां पर शोध किया जाता है और गांवों में, वादियों में उसका इस्तेमाल किया जाता है। उसके साथ विद्यार्थियों को भी जोड़ा जा रहा है ताकि ट्रेनिंग पाकर वे अपने इलाके में इस प्रयोग को आगे बढ़ाएं। सरकार से ही उम्मीद लगाए बैठा हूं कि उसने लद्दाख की जनता को जो भरोसा दिलाया है, जरूर पूरा करेगी। ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।’ जो सरकार राम में इतनी आस्था रखती है, वह अपना वचन निभाएगी और लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल कर यहां के संवेदनशील पर्यावरण को बचाने की दिशा में सशक्त कदम उठाएगी, ऐसा हमारा मानना है।

क्या भारत दुनिया को दिखा रहा है अपनी सॉफ्ट पावर?

वर्तमान में भारत दुनिया को अपनी सॉफ्ट पावर दिखा रहा है! दुनिया के नक्शे पर अपनी मजबूत पहचान बनाने के लिए भारत इन दोनों कूटनीति के साथ-साथ अपनी सॉफ्ट पावर पर भी जोर दे रहा है। इसी दिशा में भारत सरकार का अगला कदम है- बिग कैट डिप्लोमेसी। दुनिया भर में बिग कैट परिवार को लेकर सामने आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए पीएम मोदी ने शेर व बाघ की तमाम प्रजातियों को बचाने के लिए दुनिया के सामने इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस आईबीसीए नामक मंच की परिकल्पना रखी थी। इसी दिशा में हाल ही में केंद्र सरकार ने आईबीसीए को मंजूरी देते हुए इसके लिए अगले पांच सालों में डेढ़ सौ करोड रुपए का बजट रखा है। गौरतलब है कि दुनिया के 96 देशों में बिग कैट परिवार की प्रजातियां पाई जाती हैं। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव का कहना था कि टाइगर संरक्षण की दिशा में भारत हुए कामों को आज दुनिया ने पहचाना और सराहा है। उसी की तर्ज पर अब भारत आईबीसीए के लिए काम करेगा, जिसका हेड क्वार्टर भारत में बनेगा। यह पहल बिग कैट परिवार की प्रजातियों के संरक्षण से जुड़े बेहतर प्रयासों को दुनिया के सामने रखेगा। उल्लेखनीय है कि दुनिया के 16 देशों ने इस गठबंधन में शामिल होने के लिए अपनी सहमति दे दी है, इनमें बांग्लादेश, आर्मेनिया, भूटान, ब्राजील, कंबोडिया, मिस्र, इथियोपिया, इक्वाडोर, केन्या, मलेशिया, मंगोलिया, नेपाल, नाइजीरिया और पेरु जैसे देश शामिल हैं। इनके अलावा, पर्यावरण व जैव विविधता से जुड़े 10 संगठनों ने भी इस मंच से जुड़ने के प्रति अपनी दिलचस्पी दिखाई है। इनमें स्विजरलैंड से इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर-आईयूसीएन, किर्गिस्तान का विज्ञान और संरक्षण अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ ट्रस्ट, रूस का अमूर टाइगर सेंटर जैसे संगठन शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि बिग कैट परिवार में टाइगर, शेर, चीते, जगुआर, प्यूमा, तेंदुआ और हिम तेंदुआ आता है। इनमें से पांच प्रजातियां तेंदुआ, प्यूमा, जगुआर, टाइगर, शेर और चीता भारत में पाई जाती हैं। इन पांच प्रजातियों को लेकर पिछले कई सालों में भारत में काफी काम हुआ है। हाल ही में भारत सरकार ने ऐसी तमाम प्रजातियों की आबादी की गिनती कराई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जहां अपने यहां टाइगरों की आबादी 3167 है तो वहीं तेंदुओं की संख्या 13,874 और हिम तेंदुओं की आबादी 800 है। गौरतलब है कि शेर केवल भारत में ही हैं और इनकी आबादी भी 800 से ज्यादा है, जबकि देश से लुप्त हो चुके चीतों को फिर से भारत में बसाने की कोशिश हुई है, जिसके तहत 21 चीतें फिलहाल देश में मौजूद हैं।

आईबीसीए के जरिए भारत सिर्फ दुनिया में बिग कैट परिवार की प्रजातियां को लेकर सिर्फ जागरूकता और कैपेसिटी बिल्डिंग के काम तक ही सीमित नहीं रहना, बल्कि वह दुनिया के कुछ उन देशों में बिग कैट परिवार की प्रजाति को भी देना चाहता है, जहां से फिलहाल उनका अस्तित्व खत्म हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक, भारत कजाकिस्तान और कंबोडिया जैसे देशों को इस प्रजाति के कुछ जीव दे सकता है। इतना ही नहीं, भारत अपने यहां हुए टाइगर संरक्षण की सफलता को अब दुनिया के देशों के साथ साझा करेगा। इस मामले में कंबोडिया के साथ करार को लेकर बातचीत काफी आगे तक बढ़ चुकी है। भारत कंबोडिया को बाघ संरक्षण का पाठ पढ़ाएगा। यहां आखिरी बाघ 2007 में देखा गया था, जिसकी तस्वीरें भी उतारी गई थीं। अगर सब कुछ ठीक रहा तो भविष्य में भारत कंबोडिया में फिर से बाघ को बसाने के लिए हर तरह की मदद कर सकता है। जिससे वह अपने देश में बाघों को फिर से बसा सके। बताया जाता है कि इन देशों में इन प्रजातियों को भारत द्वारा कुछ इस तरह से दिया जाएगा, जैसे अफ्रीकी देशों से चीते अपने यहां आए थे। भारत इन प्रजातियों को देने के साथ-साथ लेने वाले देशों में कैपेसिटी बिल्डिंग से लेकर जागरूकता और इन जीवों के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करने में भी मदद करेगा।

गौरतलब है कि आईबीसीए के रूप में पहली बार होगा कि जब देशों की सीमाओं से परे बाघ और उनकी प्रजाति के अन्य जीवों का संरक्षण एक संगठित प्रयास के तहत किया जाएगा। इसका मकसद बिग कैट परिवार की प्रजातियां की आबादी को बढ़ाने के साथ, इनके अवैध शिकार को रोकना, इनके संरक्षण की श्रेष्ठ प्रथाओं को साझा करना, सदस्य देशों के साथ मिलकर दुनिया के 96 देशों के पारिस्थितिक तंत्र को भी बचाना है। आईबीसीए की मदद से भारत दुनिया के देशों को नेतृत्व करते हुए बिग कैट रेंज देशों और बिग कैट संरक्षण में रुचि रखने वाले गैर-रेंज देशों को एक साथ ला सकेगा। इससे इन देशों के बीच इको-पर्यटन के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़ेगा। दरअसल, अधिकांश देशों में इस प्रजाति के सभी जीवों को, चाहे वह बाघ, शेर या फिर तेंदुआ हों, अपने घरों को छिनने के साथ तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रियंका गांधी वाड्रा मई फाइट फ्रॉम दमन एंड दिउ.

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क्या दमन-दीव से उम्मीदवार होंगी प्रियंका 1999 से 2009 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा था लेकिन पिछले 15 साल से इस लोकसभा सीट पर बीजेपी का कब्जा था. बीजेपी पहले ही मौजूदा सांसद लालूभाई पटेल को अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी है. क्या प्रियंका गांधी वाड्रा दमन और दीव से लोकसभा उम्मीदवार होंगी और क्या इससे गुजरात में कांग्रेस को फायदा होगा, इस अटकलों के बीच, दिग्गज कांग्रेस नेता अर्जुन मोढवाडिया ने आज पार्टी से इस्तीफा दे दिया।

महात्मा गांधी की जन्मस्थली पोरबंदर से विधायक अर्जुन पूर्व में गुजरात के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आज मोढवाडिया राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में कांग्रेस के शामिल नहीं होने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए इस्तीफा पत्र भेजा। कांग्रेस कार्यकर्ता और भारत के नागरिक इस बात से भी नाराज हैं कि राहुल गांधी ने उस दिन असम में अराजकता पैदा करने की कोशिश की. मोढवाडिया से पहले गुजरात प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष अंबलिश डेर ने इस्तीफा दे दिया था. माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले ये दोनों बीजेपी में शामिल हो जाएंगे.

इस बीच, दमन और दीव प्रांत कांग्रेस के अध्यक्ष केतन पटेल ने सोमवार सुबह कहा कि प्रियंका गांधी वाड्रा उस केंद्र शासित प्रदेश से उम्मीदवार हो सकती हैं। केतन ने यह भी कहा कि कांग्रेस आलाकमान ने उनसे वास्तविक स्थिति पर गौर करने और बूथवार आंकड़े जुटाने को कहा है. उन्होंने दावा किया कि अगर प्रियंका दमन और दीव से चुनाव लड़ती हैं तो बीजेपी को दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र क्षेत्र में फायदा होगा. 1987 में दमन और दीव लोकसभा क्षेत्रों के निर्माण के बाद इन क्षेत्रों में कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा ने जीत हासिल की।

1999 से 2009 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा था, लेकिन पिछले 15 साल से इस लोकसभा सीट पर बीजेपी का कब्जा है. बीजेपी पहले ही मौजूदा सांसद लालूभाई पटेल को अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी है. पिछले दो लोकसभा चुनावों में केतन पटेल खुद कांग्रेस के लिए बीजेपी से हार गए थे. लेकिन उन्होंने दावा किया कि अगर प्रियंका उम्मीदवार होंगी तो कांग्रेस यह सीट भारी मतों से जीतेगी.

हालांकि, कांग्रेस के भीतर इस बात को लेकर सवाल उठे हैं कि जब गांधी परिवार के पास रायबरेली जैसा गढ़ है तो प्रियंका को दमन और दीव क्यों माना जा रहा है। प्रियंका आज कांग्रेस अध्यक्ष खड़ग के घर पर लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार और रणनीति पर एक बैठक में मौजूद थीं. हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के खतरे को लेकर उन्होंने आज राज्य के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, मंत्री अनिरुद्ध सिंह के साथ दस दिवसीय बैठक भी की.

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, उम्मीदवारों की सूची को लेकर कांग्रेस केंद्रीय चुनाव समिति की पहली बैठक 7 मार्च को होगी. पहले चरण में दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के नाराज मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने दिल्ली में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ बैठक की. इंडिया टुडे में छपी खबर के मुताबिक, रविवार रात डेढ़ घंटे तक बैठक हुई. एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल भी वहां मौजूद थे.

भाजपा शासित हरियाणा के पंचकुला में छह बागी कांग्रेस विधायकों से मुलाकात के बाद विक्रमादित्य शुक्रवार रात दिल्ली के लिए रवाना हो गए। इससे पहले उन्होंने कहा, ”उनमें से कई लोग अपनी गलती का एहसास होने के बाद कांग्रेस में लौटना चाहते हैं. मैं इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत केंद्रीय नेतृत्व से बात करूंगा.” सिन्हा पठानिया ने छह बागी विधायकों के पद खारिज कर दिए. इससे पहले 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव के दौरान उन छह कांग्रेस विधायकों ने बीजेपी उम्मीदवार हर्ष महाजन के समर्थन में ‘क्रॉस वोटिंग’ की थी. नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी हार गए. 68 सदस्यीय विधानसभा में दोनों पार्टियों को 34-34 वोट मिले और विजेता और हारे का फैसला लॉटरी से हुआ। संयोग से, उनमें से अधिकांश विधायक विक्रमादित्य और उनकी मां, हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के ‘करीबी’ माने जाते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आज मोढवाडिया राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में कांग्रेस के शामिल नहीं होने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए इस्तीफा पत्र भेजा। कांग्रेस कार्यकर्ता और भारत के नागरिक इस बात से भी नाराज हैं कि राहुल गांधी ने उस दिन असम में अराजकता पैदा करने की कोशिश की. मोढवाडिया से पहले गुजरात प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष अंबलिश डेर ने इस्तीफा दे दिया था. माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले ये दोनों बीजेपी में शामिल हो जाएंगे.

सीमा हैदर के पहले पति ने नोटिस भेजकर 3 करोड़ रुपये की मांग की है.

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तीन करोड़ देने होंगे! सीमा ने पाकिस्तान से भेजा नोटिस वकील अली मोमिन ने पूर्व पति गुलाम गुलाम की ओर से मीना दंपत्ति को नोटिस भेजा है. गुलाम ने चारों बच्चों की कस्टडी पाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया। अवैध रूप से भारत में घुसने वाली ‘पाक बधू’ की सीमा हैदर के फैमिली पेज की कहानी बहुत से लोग जानते हैं। ग्रेटर नोएडा के सचिन मीना से प्यार होने के बाद सीमा पिछले साल मई में पाकिस्तान से नेपाल के रास्ते भारत आ गई। इसके बाद सीमा सचिन के साथ खुशी-खुशी रह रही है। सीमा के पूर्व पति गुलाम हैदर इस बार चले गए। उन्होंने इस आशय का नोटिस भेजा है कि मीना दंपत्ति को मुआवजे के तौर पर तीन करोड़ रुपये देने होंगे. नोटिस में कहा गया है कि सचिन और सीमा को एक महीने के अंदर ‘माफी’ मांगनी होगी. इसके साथ ही भारतीय मुद्रा में तीन करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा. ऐसा न करने पर गुलाम ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है.

मीडिया सूत्रों के मुताबिक, गुलाम की ओर से वकील अली मोमिन ने मीना दंपत्ति को नोटिस भेजा है. सीमा पाकिस्तान से अपने चार बच्चों के साथ भारत आई थीं. गुलाम ने बच्चों की कस्टडी पाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया। पाकिस्तानी वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बरनी से संपर्क किया. अंसार ने मोमिन को भारत में सभी कानूनी कार्यवाही संचालित करने का काम सौंपा। उन्होंने फिर से मीना दंपत्ति को नोटिस भेजा.

सीमा के साथ सचिन की प्रेम कहानी 2019 में शुरू हुई। ऑनलाइन गेम खेलते समय दोनों के बीच बातचीत हुई। दोस्ती से आगे बढ़कर दोनों के बीच प्यार का रिश्ता बन गया। उन्होंने लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन प्यार किया। बाद में, उन्होंने एक साथ परिवार शुरू करने का फैसला किया। दोनों नेपाल चले गये. वे पशुपतिनाथ मंदिर गए और बंधन में बंध गए. इसके बाद वह पिछले साल 13 मई को अवैध रूप से भारत में दाखिल हुआ. ग्रेटर नोएडा में सचिन के घर में रहने लगे। सूचना मिलने पर पुलिस ने 4 जुलाई को सीमा को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने सचिन और उसके पिता को भी हिरासत में लिया और पूछताछ की। सीमा पर अवैध प्रवेश के अलावा जासूसी का भी आरोप लगाया गया था. फर्जी नाम की कहानी भी सामने आई। पुलिस जांच में पता चला कि सीमारा ने नेपाल में गुमनाम रूप से एक होटल बुक किया था। इस बात पर भी सवाल उठे कि उन्होंने अपना नाम क्यों बदला. आख़िरकार सीमा को जेल से रिहा कर दिया गया। बाद में फिर से उनकी प्रेग्नेंसी की खबर सामने आई। पता चला कि वह सचिन के बच्चे की मां बनने वाली हैं. उस खुशहाल दुनिया में एक नया ख़तरा आ गया।

कुछ महीनों से मीडिया में छाई रहीं सीमा हैदर ने हाल ही में अपनी पांचवीं गर्भावस्था की घोषणा की है। सीमा ने एक मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि वह सचिन मीना के बच्चे की मां बनने वाली हैं।

सीमा अब अपने पति सचिन के साथ ग्रेटर नोएडा में रहती हैं। 2024- उनकी जिंदगी में नया सदस्य आने वाला है, सीमा ने मीडिया को बताया। सीमा ने कहा, ”2024 मेरे लिए नई खुशियां लेकर आया है। वर्ष 2023 भी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था। उस साल ने मुझे बहुत कुछ दिया. मुझे भी थोड़ा दुख हुआ.”नए सदस्य कब आ रहे हैं? जवाब में सीमा ने कहा, ”अच्छी खबर के लिए हमें कुछ समय इंतजार करना होगा.” अगर हां, तो क्या झूले से पहले खुशखबरी मिलेगी? पत्रकार के सवाल के जवाब में सीमा ने कहा, ”कोई खैरात नहीं, लेकिन मैं आपको जल्द ही खुशखबरी दूंगी.” सचिन के पिता ने भी इस खबर की पुष्टि की. उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “मुझे उम्मीद है कि लड़का मेरे घर आएगा।”

संयोग से, सीमर की मुलाकात भारतीय युवा सचिन से 2019 में ऑनलाइन गेम PUBG खेलते समय हुई थी। प्यार वहीं से. 30 साल की सीमा एक 22 साल के आदमी से प्यार करने के लिए करीब 1,300 किलोमीटर दूर से दौड़कर आई। बस अकेले नहीं. उनके चार बच्चे थे, सभी सात साल से कम उम्र के थे। सीमा को बिना वीजा के नेपाल के रास्ते भारत में अवैध रूप से प्रवेश करने के आरोप में 4 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। उसे शरण देकर सचिन और उसके पिता नेत्रपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्हें जमानत मिल गई. सीमा के भारत में घुसपैठ को लेकर रहस्य धीरे-धीरे गहराता गया. कई लोग सीमा को पाकिस्तानी जासूस मानते थे। उत्तर प्रदेश एटीएस और भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए जांच शुरू कर दी है। सीमा कौन है? खुफिया अधिकारी अभी भी यह पता लगाने के लिए जांच कर रहे हैं कि क्या वह एक साधारण पाकिस्तानी दुल्हन है जो भारतीय प्रेमी के साथ सीमा पार कर गई है, या एक पाकिस्तानी जासूस है।