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एनडीए या इंडिया में किसका हुआ असली में राजतिलक?

आज हम आपको बताएंगे की असली में इंडिया और एनडीए गठबंधन में से किसका राजतिलक हुआ है! लोकसभा चुनाव के नतीजों को घोषित हुए 24 घंटों का वक्त भी नहीं बीता है और केंद्र में सरकार को लेकर उठा-पटक के लक्षण नजर आने लगे हैं। 240 सीटें हासिल कर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर है। सरकार बनाने के लिए बीजेपी को अब टीडीपी और जेडीयू सहित सहयोगी दलों का सहारा है। बुधवार सुबह जैसे ही आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और बिहार के सीएम नीतीश कुमार एक ही प्लेन में आगे-पीछे बैठे हुए नजर आए, केंद्र में सरकार गठन को लेकर सियासी कयास भी शुरू हो गए। दरअसल, विपक्षी गठबंधन इंडिया को 234 सीटें मिली हैं। ऐसे में एक सवाल हर किसी के मन में है कि आखिर किसका राजतिलक होगा? केंद्र में सरकार कौन बना सकता है? सबसे पहले बात एनडीए की, जिसे लोकसभा चुनाव में 292 सीटें मिली हैं। केंद्र में सरकार बनाने के लिए 272 सीटों की जरूरत है। एनडीए की 292 सीटों में बीजेपी की 240, टीडीपी की 16, जेडीयू की 12, शिवसेना (शिंदे) की 7, एलजेपी (रामविलास) की 5, जेडीएस की 2, आरएलडी की 2, जेएसपी की 2, एजीपी की 1, यूपीपीएल की 1 एजेएसयूपी की 1, एनसीपी की 1, हम की 1 और अपना दल की 1 सीट शामिल है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि विपक्षी गठबंधन इंडिया अब जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार को अपने पाले में जेकेएनसी की 2, वीसीके की 2, सीपीआई की 2, सीपीआई (एमएल) की 2 और केसी, आरएलटीपी, बीएडीवीपी, एमडीएमके और आरएसपी की 1 सीट शामिल है। इस तरह विपक्षी गठबंधन सरकार बनाने के संख्या बल से 38 सीटें पीछे है।लाने की कोशिश कर सकता है। चूंकि नीतीश कुमार इससे पहले भी कई बार पाला बदल चुके हैं, इसलिए ऐसे में ये चर्चा और ज्यादा हलचल मचा रही है।

अब अगर मान लें कि नीतीश कुमार एक बार फिर एनडीए छोड़कर इंडिया में शामिल होते हैं तो उनके 12 सांसदों के हटने से एनडीए की संख्या घटकर 280 हो जाएगी। यानी, एनडीए के पास उस स्थिति में भी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल रहेगा। सोशल मीडिया पर एक और कयासबाजी चल रही है कि चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को भी विपक्ष अपने साथ लाने की कोशिश कर सकता है। अब अगर ये भी मान लें कि नीतीश कुमार के बाद चंद्रबाबू नायडू एनडीए छोड़ सकते हैं, तो उनके 16 सासंदों को हटाने के बाद एनडीए की सीटों की संख्या घटकर 264 हो जाएगी। यानी, मैजिक नंबर से एनडीए 8 सीट पीछे हो जाएगी। इस स्थिति में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी के 4 सांसदों और 7 निर्दलीयों की मदद से एनडीए के सरकार गठन की संभावना बनी रहेगी। क्योंकि, टीडीपी अगर एनडीए से अलग होती तो वाईएसआरसीपी के साथ आने की गुंजाइश बन सकती है।

अब विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ पर आते हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों में ‘इंडिया’ को 234 सीटें मिली हैं। इनमें कांग्रेस की 99, समाजवादी पार्टी की 37, तृणमूल कांग्रेस की 29, डीएमके की 22, शिवसेना (यूबीटी) की 9, एनसीपी (शरद पवार) की 8, आरजेडी की 4, सीपीएम की 4, आईयूएमएल की 3, आम आदमी पार्टी की 3, जेएमएम की 3, जेकेएनसी की 2, वीसीके की 2, सीपीआई की 2, सीपीआई (एमएल) की 2 और केसी, आरएलटीपी, बीएडीवीपी, एमडीएमके और आरएसपी की 1 सीट शामिल है। इस तरह विपक्षी गठबंधन सरकार बनाने के संख्या बल से 38 सीटें पीछे है।

अब अगर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ केंद्र में सरकार बनाने की तरफ कदम बढ़ाता है, तो सबसे पहले उसे इन 38 सीटों का इंतजाम करना होगा। मान लीजिए कि पप्पू यादव को छोड़कर 6 निर्दलीय और आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर का समर्थन विपक्ष को मिलता है, तो उसकी संख्या 234 से बढ़कर 241 हो जाएगी। यानी अभी भी बहुमत के आंकड़े से 31 सीट दूर। यहां आकर अगर ऊपर लिखे समीकरण के हिसाब से गिनती बिठाएं और नीतीश के साथ चंद्रबाबू नायडू को भी जोड़ें तो दोनों के सांसदों की संख्या मिलने के बाद विपक्ष के पास 269 सीटें हो जाएंगी।सियासी गलियारों में चर्चा है कि विपक्षी गठबंधन इंडिया अब जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकता है। चूंकि नीतीश कुमार इससे पहले भी कई बार पाला बदल चुके हैं, इसलिए ऐसे में ये चर्चा और ज्यादा हलचल मचा रही है। ये संख्या 272 के आंकड़े से अभी भी 3 सीट कम है। अब इन तीनों सीटों के लिए विपक्ष को अपना दल (1) और आरएलडी (2) को साथ लेना होगा, जिसके बाद उसके पास बहुमत का आंकड़ा बन जाएगा। लेकिन, इस स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि जोड़-तोड़ की सरकार में प्रधानमंत्री का पद किसे मिलेगा?

मोदी मंत्रिमंडल से क्या-क्या मांग सकते हैं नीतीश कुमार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि नीतीश कुमार मोदी मंत्रिमंडल से क्या-क्या मांग सकते हैं! केंद्र में एनडीए की नई सरकार बनने से ज्यादा, सियासी माहौल इन दिनों बिहार के सीएम और जेडीयू मुखिया नीतीश कुमार को लेकर गर्माया हुआ है। लोकसभा चुनाव के नतीजों में जेडीयू को 12 सीटें मिली हैं। एनडीए के घटक दलों में नीतीश कुमार की पार्टी तीसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है। ऐसे में केंद्र की नई सरकार में नीतीश कुमार की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सियासी अनुमान लगाए जा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के सामने नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्रिमंडल में अहम मंत्रालयों सहित बिहार के लिए आर्थिक और दूसरी राहत संबंधी मांगें रख सकते हैं। हालांकि, अपनी मांगों को लेकर नीतीश कुमार ने अभी तक चुप्पी साध रखी है। आइए समझते हैं कि नीतीश कुमार की इस खामोशी का राज क्या है? नीतीश कुमार बुधवार को दिल्ली पहुंचे और एनडीए की बैठक में हिस्सा लिया। इसके बाद मीडिया में खबरें आईं कि नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी के लिए चार मंत्री पदों की मांग की है। हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर जेडीयू के किसी नेता ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है। ईटी की खबर के मुताबिक, नीतीश कुमार से जुड़े एक बेहद करीबी नेता ने बताया कि सही समय आने पर, वो भाजपा नेताओं के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपनी पार्टी की हिस्सेदारी पर बातचीत करेंगे। एक सहयोगी के तौर पर भाजपा के साथ नीतीश कुमार का लंबा रिश्ता रहा है और यही वजह है कि वह अभी तक शांत हैं।

वहीं, जेडीयू के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि वैसे तो नीतीश कुमार के मन की बात पढ़ना मुश्किल है, लेकिन माना जा रहा है कि वो अपने हर तीसरे सांसद के लिए एक मंत्री पद की मांग रख सकते हैं। जेडीयू से जुड़े एक और सूत्र ने बताया कि अगर नीतीश कुमार की इस मांग को पूरा किया जाता है, तो उनकी पार्टी के पास केंद्र में चार मंत्री पद होंगे। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश के बहुत ही मधुर संबंध हैं और ऐसे में इस बात की कतई संभावना नहीं कि वो केंद्र के साथ कोई बहुत मुश्किल सौदेबाजी करेंगे या कठिन डिमांड रखेंगे। दूसरी तरफ बिहार में नीतीश की सरकार भी भाजपा के सहारे टिकी है, जिससे उनकी सौदेबाजी की ताकत खुद ही कम हो जाती है।

संकेत इस बात के भी हैं कि जेडीयू ऐसे मंत्रालयों को प्राथमिकता दे सकती है जो नीतीश कुमार के विकास मॉडल को आगे बढ़ाने में मदद कर सकें। बेहद चौंकाने वाले कदम के तहत नीतीश कुमार इथेनॉल इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए केंद्र से पेट्रोलियम मंत्रालय की भी मांग कर सकते हैं। इसके अलावा कृषि मंत्रालय पर भी नीतीश कुमार की निगाहें होंगी। केंद्रीय कृषि मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान, नीतीश कुमार पूर्वी राज्यों के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद सहित कई परियोजनाओं को बिहार लेकर आए थे। इस दौरान बिहार में उन्होंने कई कृषि कॉलेज और कृषि विज्ञान केंद्र भी खोले।

जेडीयू से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कृषि क्षेत्र में नीतीश कुमार की गहरी दिलचस्पी है। वे हमेशा कृषि पर आधारित इंडस्ट्री स्थापित करने के लिए नए तरीकों की तलाश में रहते हैं। साथ ही नीतीश कुमार उन परियोजनाओं को भी पूरा करना चाहेंगे, जो केंद्र से मंजूरी के इंतजार में अटकी हैं। बिहार के सीएम लंबे समय से एनटीपीसी और दूसरी केंद्रीय यूनिट से रियायती दरों पर बिजली की मांग करते रहे हैं। जेडीयू के एक सीनियर नेता ने बताया कि बिहार बहुत ज्यादा कीमत पर बिजली खरीदता है। इसके अलावा, राज्य सरकार उपभोक्ताओं को सब्सिडी भी देती है। ऐसे में नीतीश कुमार बिजली के लिए ‘एक राष्ट्र, एक टैरिफ’ की मांग कर सकते हैं।

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की बातचीत में जो अहम बिंदु होगा, वो है 2025 में होने वाला बिहार विधानसभा चुनाव। सीएम के तौर पर नीतीश ने अपने लंबे कार्यकाल के दौरान बिजली के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है। जेडीयू नेता के मुताबिक अगर नीतीश कुमार केंद्र सरकार को बिजली के लिए एक समान शुल्क पर राजी करने में सफल होते हैं, तो राज्य में बिजली के दाम कम हो जाएंगे और भाजपा को भी 2025 के विधानसभा चुनावों में इसका राजनीतिक फायदा मिलेगा। जेडीयू के एक और सीनियर नेता ने बताया कि बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा सबसे अहम है। टीडीपी भी आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जा चाहती है और ऐसे में जेडीयू और टीडीपी संयुक्त रूप से आर्थिक सहायता की मांग कर सकते हैं। इसके अलावा कोशी नदी में बाढ़ बिहार की बारहमासी समस्या है। जेडीयू नेता ने कहा कि बाढ़ का मुद्दा हमारे लिए काफी गंभीर है। इसे सुलझाने के लिए केंद्र और नेपाल के बीच बातचीत की जरूरत है। सरकार गठन में नीतीश कुमार केंद्र से इस बारे में भी बात करेंगे।

क्या लोकसभा चुनाव में बीजेपी के तीन नए मुख्यमंत्री दिखा पाए जादू?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में बीजेपी के तीन नए मुख्यमंत्री जादू दिखा पाए या नहीं! लोकसभा चुनाव के नतीजों में बीजेपी ने गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड में बेहतर प्रदर्शन किया है। वहीं, राजस्थान में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के अनुसार नहीं रहा है। ऐसे में बीजेपी के प्रदर्शन में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की अहम भूमिका रही है। इस भूमिका में मध्यप्रदेश के नए सीएम डॉ. मोहन यादव उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। पार्टी ने राज्य की 29 सीटों पर क्लीन स्वीप किया है। इसमें कांग्रेस की परंपरागत छिंदवाड़ा सीट भी शामिल है। छत्तीसगढ़ के नए सीएम विष्णु देव साय के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य में 11 में से 10 सीट पर जीत हासिल की है। वहीं, गुजरात में पार्टी 26 में 25 सीट जीतने में कामयाब रही। उत्तराखंड में भी पार्टी ने सभी 5 सीटें जीत ली। सीएम पुष्कर सिंह धामी ने बेहतर प्रदर्शन किया। यूपी में पार्टी को सबसे अधिक झटका लगा। भाजपा ने मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा समेत राज्य की सभी 29 लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की। जांजगीर-चांपा अनुसूचित जाति वर्ग के लिए सुरक्षित है। बीजेपी ने राज्य में 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में 11 में से 10 सीटें जीती थीं। 2019 में कांग्रेस 11 में से दो सीटें जीतने में सफल रही थी। उनमें से एक एसटी आरक्षित सीट बस्तर थी। बीजेपी साल 2000 में राज्य के गठन के बाद से लोकसभा चुनावों में पारंपरिक रूप से आरक्षित सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करती रही है।मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राज्य में 180 से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया। इसके साथ ही करीब 58 रोड शो किए। नवंबर 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान के स्थान डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री चुना था। मोहन यादव पर विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा में पार्टी के प्रदर्शन को दोहराने का दबाव था। मोहन यादव ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया। मध्यप्रदेश पिछले तीन लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए मजबूत किला रहा है। 2014 में बीजेपी ने 29 में से 27 सीट जीती थी। वहीं, पिछले चुनाव में भी मध्य प्रदेश में बीजेपी ने 28 सीटें जीती थीं।

छत्तीसगढ़ में बीजेपी का शानदार प्रदर्शन जारी रहा। पार्टी ने यहां 2019 के अपने प्रदर्शन में सुधार किया। पार्टी ने इस बार राज्य की 11 में से 10 सीटों पर जीत हासिल की। पार्टी की जीत में राज्य के सीएम विष्णु देव साय की अहम भूमिका रही है। साय के नेतृत्व में पार्टी ने यहां कांग्रेस से बस्तर सीट छीनते हुए राज्य की सभी पांच आरक्षित लोकसभा सीट पर जीत हासिल की। राज्य की कुल 11 लोकसभा सीट में से बस्तर, कांकेर, रायगढ़ और सरगुजा अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए तथा जांजगीर-चांपा अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के लिए सुरक्षित है। बीजेपी ने राज्य में 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में 11 में से 10 सीटें जीती थीं। 2019 में कांग्रेस 11 में से दो सीटें जीतने में सफल रही थी। उनमें से एक एसटी आरक्षित सीट बस्तर थी। बीजेपी साल 2000 में राज्य के गठन के बाद से लोकसभा चुनावों में पारंपरिक रूप से आरक्षित सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करती रही है।

राजस्थान में लोकसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा। पार्टी ने यहां कुल 25 में 14 सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी यहां पिछले साल नवंबर में हुए विधानसभा के प्रदर्शन को नहीं दोहरा सकी। राजस्थान में बीजेपी का पिछले दो आम चुनाव में बेहतर प्रदर्शन रहा था। पार्टी ने साल 2014 में राज्य की सभी 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी। बता दें कि पार्टी ने राज्य की 29 सीटों पर क्लीन स्वीप किया है। इसमें कांग्रेस की परंपरागत छिंदवाड़ा सीट भी शामिल है। छत्तीसगढ़ के नए सीएम विष्णु देव साय के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य में 11 में से 10 सीट पर जीत हासिल की है। वहीं, गुजरात में पार्टी 26 में 25 सीट जीतने में कामयाब रही। उत्तराखंड में भी पार्टी ने सभी 5 सीटें जीत ली।मध्यप्रदेश पिछले तीन लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए मजबूत किला रहा है। 2014 में बीजेपी ने 29 में से 27 सीट जीती थी। वहीं, पिछले चुनाव में भी मध्य प्रदेश में बीजेपी ने 28 सीटें जीती थीं। सीएम पुष्कर सिंह धामी ने बेहतर प्रदर्शन किया। वहीं, पिछले आम चुनाव में पार्टी ने 24 सीट जीतने में सफलता हासिल की थी। इस बार कांग्रेस ने बीजेपी से 8 सीटें छीन लीं। वहीं, तीन सीटों पर इंडिया दल के अन्य घटक जीतने में सफल रहे। ऐसे में सीएम भजन लाल शर्मा पार्टी के बेहतर प्रदर्शन में फेल दिखे।

आखिर किसे अपनाएंगे राहुल वायानाड या रायबरेली?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि राहुल गांधी वायनाड या रायबरेली में से किसे अपनाएंगे! कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार दो संसदीय क्षेत्रों से चुने गए हैं। राहुल गांधी के पास अभी केरल की वायनाड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट भी आ गई है। जनप्रतिनिधित्व कानून कहता है कि कोई उम्मीदवार ज्यादा से ज्यादा दो निर्वाचन क्षेत्रों से ही चुनाव लड़ सकता है। इसी कानून में कहा गया है कि यदि उम्मीदवार दोनों निर्वाचन क्षेत्रों से जीत जाता है तो उसे 14 दिनों के भीतर एक सीट खाली करनी होगी, जिसके बाद उस सीट पर उपचुनाव कराया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि राहुल गांधी वायनाड और रायबरेली में कौन सी सीट अपने पास रखेंगे और कौन सी छोड़ेंगे? आइए इसकी पड़ताल करते हैं कि राहुल गांधी किसी एक सीट को रखने और दूसरे को छोड़ने का फैसला किन अहम मुद्दों पर ध्यान रखकर करेंगे। ध्यान रहे कि राहुल गांधी अभी केरल के वायनाड से ही सांसद हैं। वो 2019 का लोकसभा चुनाव भी दो निर्वाचन क्षेत्रों से लड़े थे। लेकिन तब उन्हें उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट पर बीजेपी उम्मीदवार स्मृति इरानी से पराजित होना पड़ा था। इस बार उन्होंने अमेठी की जगह रायबरेली से चुनाव मैदान में ताल ठोंकी थी। इसकी चर्चा बाद में, पहले यह जान लेते हैं कि वायनाड में उनका प्रदर्शन कैसा रहा। राहुल गांधी को केरल की वायनाड सीट से इस बार 59.69% वोट मिले और 26.09% वोट पाने वाले सीपीआई कैंडिडेट को उनसे मात खानी पड़ी। दोनों के बीच 3,64,422 वोटों का अंतर रहा। वोट प्रतिशत के लिहाज से देखें तो राहुल ने 33.6% के अंतर से जीत दर्ज की है।

जहां तक बात उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट की है तो यहां से राहुल गांधी को इस चुनाव में 66.17% वोट मिले। वहां उनसे मात खाए बीजेपी कैंडिडेट के खाते में सिर्फ 28.64% वोट गए। इस तरह, राहुल ने कुल 3,90,030 वोटों (37.53%) से जीत दर्ज की। साफ है कि राहुल के लिए वायनाड के मुकाबले रायबरेली की जीत ज्यादा बड़ी है। दशकों से लोकसभा में रायबरेली का प्रतिनिधित्व कर रहीं सोनिया गांधी ने राहुल गांधी के लिए बहुत भावुक अपील की थीं। उन्होंने इस लोकसभा चुनाव में एक ही चुनावी सभा को संबोधित किया था। रायबरेली की उस रैली में सोनिया ने मतदाताओं से बहुत भावुक अपील की थी। सोनिया ने कहा था, ‘मैं आपको अपना बेटा सौंप रही हूं। मुझे पूरी उम्मीद है कि आपने अब तक जैसा ख्याल रखा, वैसी ही देखभाल राहुल की भी करेंगे।’ सोनिया की इस अपील का रायबरेली की जनता ने मान रखा तो क्या राहुल के लिए रायबरेली छोड़ना सोनिया की अपील का अपमान नहीं होगा?

केरल में लोकसभा की सिर्फ 20 सीटें हैं जबकि उत्तर प्रदेश में उसकी चार गुना यानी कुल 80 सीटें। रायबरेली, मध्य यूपी का इलाके में आता है। सेंट्रल यूपी में कुल 20 लोकसभा सीटें आती हैं जो पूरे केरल प्रदेश के बराबर है। केरल में वैसे भी कांग्रेस मजबूत है, उत्तर प्रदेश में इसी हालत जर्जर हो गई है। गांधी परिवार की परंपरागत सीटों होने की वजह से रायबरेली और अमेठी का किला ही बचा हुआ है। 2019 के चुनाव में तो अमेठी भी हाथ से निकल गई थी। इस बार कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन में छह सीटें जीत लीं। प्रदेश में पार्टी का वोट प्रतिशत भी बढ़कर दोहरे अंकों के आसपास 9.46% तक पहुंच गया है। ऐसे में राहुल की जरूरत उत्तर प्रदेश को ज्यादा है जहां कांग्रेस पार्टी को मोमेंटम देते रहने की दरकार रहेगी। दूसरी तरफ केरल में कांग्रेस ने 2019 में 20 में से 15 और इस बार 14 सीटें जीती हैं। इसका मतलब है कि राहुल के बिना भी केरल कांग्रेस के लिए ठीक परिणाम देता रहेगा।

केरल में इस बार बीजेपी ने कमल खिलाने का इतिहास रच दिया है। लेकिन उसने कांग्रेस को नहीं बल्कि वाम दलों के वोट लिए हैं। बीजेपी को वहां जड़ जमाने और कांग्रेस को झटका देने की स्थित में आने में अच्छा-खासा वक्त लग सकता है। बीजेपी अगर केरल में बढ़ी तो पूरी गुंजाइश है कि वह वाम दलों की कीमत पर बढ़ेगी ना कि कांग्रेस को झटका देकर। ऐसे में राहुल को रायबरेली छोड़कर वायनाड में बने रहने की मजबूरी नहीं है।

राहुल के केरल से दूर रहने का दबाव भी है। इस बार वाम दलों ने राहुल के वायनाड से चुनाव लड़ने पर घोर आपत्ति जताई थी। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तक ने सार्वजनिक बयान दिए थे कि कांग्रेस पार्टी हमारी गठबंधन साथी है तो फिर राहुल यहां से चुनाव क्यों लड़ रहे हैं, उन्हें तो बीजेपी से मुकाबला करना चाहिए। अगर राहुल वायनाड छोड़कर रायबरेली में रहते हैं तो वाम दल की भी शिकायत दूर हो जाएगी और आपसी रिश्ते मजबूत होंगे। वायनाड में राहुल को इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग आईयूएमएल का सहारा लेना पड़ता है। इससे बीजेपी को देशभर में कांग्रेस की छवि धूमिल करने का मौका मिल जाता है। बीजेपी आरोप लगाती है कि कांग्रेस मूलतः मुस्लिम पार्टी है और वो कट्टरपंथी मुसलमानों के साथ है। अगर राहुल वायनाड से चले आते हैं तो उन्हें आईयूएमएल से नजदीकी रिश्ते रखने की मजबूरी भी नहीं रहेगी और बीजेपी के हाथ से एक बड़ा हथियार छिन सकता है।

क्या विदेश में बैठकर भारतीयों के साथ हो रहा है धोखा?

विदेश में बैठकर भारतीयों के साथ धोखा किया जा रहा है! इन दिनों साइबर ठगी के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। इंटरनेट के जरिए जालसाज ठगी के नए-नए तरीके अपना कर लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। वैसे तो साइबर ठगी के केस दुनियाभर में आ रहे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में भारतीय इसके शिकार हो रहे हैं। आरोप है कि साइबर अपराध मुख्य रूप से तीन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों म्यांमार, लाओस और कंबोडिया में बैठे अपराधियों द्वारा किए जा रहे हैं। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के अनुसार, जनवरी से अप्रैल तक हुए साइबर क्राइम के कुल मामलों में से 46% इन्हीं तीन देशों से शुरू हुए थे। इन मामलों में करीब 1,776 करोड़ रुपये की ठगी हुई। I4C केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत देश में साइबर अपराध की रोकथाम, जांच और पड़ताल के लिए काम करता है। इस तरह के घोटाले करने वाले सोशल मीडिया पर फ्री ट्रेडिंग टिप्स देने वाले विज्ञापन देते हैं, जिसमें अक्सर मशहूर शेयर मार्केट एक्सपर्ट्स की तस्वीरों और फर्जी न्यूज आर्किटल का इस्तेमाल किया जाता था। पीड़ितों को व्हाट्सएप ग्रुप या टेलीग्राम चैनल से जुड़ने के लिए कहा जाता था, जहां उन्हें शेयरों में निवेश करके पैसा कमाने के टिप्स दिए जाते हैं। कुछ दिनों के बाद, पीड़ितों को भारी मुनाफा कमाने के लिए और गाइड करने के लिए कुछ खास ट्रेडिंग एप्लिकेशन इंस्टॉल करने और खुद को रजिस्टर करने के लिए कहा जाएगा। पीड़ित साइबर अपराधियों द्वारा की गई सिफारिशों के बाद ऐप्स पर निवेश करना शुरू कर देते हैं। इनमें से कोई भी ऐप SEBI के साथ रजिस्टर नहीं होगा, लेकिन पीड़ित आमतौर पर इसकी जांच करने में लापरवाही करते हैं।

कई पीड़ितों ने शेयर खरीदने के लिए खास बैंक खातों में पैसा जमा किया, और उन्हें उनके डिजिटल वॉलेट में कुछ फर्जी मुनाफा दिखाया गया। लेकिन जब उन्होंने इस पैसे को निकालने की कोशिश की, तो उन्हें एक संदेश दिखाया गया कि वे इसे तभी निकाल सकते हैं जब उनके वॉलेट में एक निश्चित राशि, मान लीजिए 30-50 लाख रुपये जमा हो जाए। इसका मतलब था कि पीड़ित को निवेश करते रहना था, और कभी-कभी, उन्हें अपने कथित तौर पर अर्जित किए गए मुनाफे पर टैक्स का भुगतान भी करना पड़ता था। I4C के CEO राजेश कुमार ने कहा, ‘इस साल के पहले चार महीनों के आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद, हमने पाया कि भारतीयों को ट्रेडिंग घोटाले में 1420.48 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।’ साइबर फ्रॉड का दूसरा और नया तरीका साइबर फ्रॉड है। इसमें जालसाज पीड़ित को कॉल करते हैं और बताते हैं कि उन्हें किसी ने अवैध सामान, ड्रग्स, फर्जी पासपोर्ट या अन्य बैन वस्तुओं से भरा पार्सल भेजा है। कुछ मामलों में, टारगेट व्यक्ति के रिश्तेदारों या दोस्तों को बताया जाएगा कि उनका अपना किसी गंभीर अपराध में शामिल पाया गया है।

एक बार जब उन्हें अपना शिकार (जिसे सावधानी से चुना जाता था) मिल जाता था, तो अपराधी उनके साथ स्काइप या किसी अन्य वीडियो कॉलिंग प्लेटफॉर्म पर संपर्क करते थे। वे खुद को कानून प्रवर्तन अधिकारियों के रूप में पेश करते हैं। जालसाज अक्सर वर्दी पहनते हैं और पुलिस स्टेशनों या सरकारी कार्यालयों जैसे स्थानों से फोन करने का नाटक करते। इसके बाद वो कुछ रिश्वत के बदले केस बंद करने की बात करते। राजेश कुमार ने बताया कि कुछ मामलों में, पीड़ितों को डिजिटल अरेस्ट कर लिया गया था, जिसका मतलब था कि उन्हें तब तक अपराधियों के सामने दिखने के लिए मजबूर किया जाता था जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं। जनवरी-अप्रैल की अवधि में इस तरह के घोटाले में भारतीयों को कुल 120.30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

इस तरह के फ्रॉड में पीड़ितों को आम तौर पर विदेशी नंबर से एक व्हाट्सएप संदेश मिलता है, जो कथित तौर पर किसी कंपनी के प्रतिनिधि का होता था, जिसमें घर से बैठे-बैठे 30,000 रुपये जैसी बड़ी रकम कमाने का ऑफर दिया जाता है। लोगों को बताया जाता है कि उन्हें फाइव स्टार रेटिंग देकर कुछ संस्थाओं की सोशल मीडिया रेटिंग बढ़ाने में मदद करनी होगी। काम पूरा होने के बाद, पीड़ितों को एक कोड मिलता है, जिसे उन्हें टेलीग्राम पर अपने मैनेजर के साथ शेयर करने के लिए कहा जाता है। मैनेजर पीड़ितों से पूछता है कि वे अपना पैसा कैसे प्राप्त करना चाहते हैं। कई बार पीड़ितों को यबट्यूब या गूगल पर रेटिंग देने के लिए 500 रुपये जैसी छोटी रकम ट्रांसफर भी कर दी जाती है।

केंद्र सरकार का प्रतिनिधिमंडल पश्चिम बंगाल का दौरा शुरू करने जा रहा हैl

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बंगाल में फिर केंद्रीय दल, शाह के मंत्रालय के प्रतिनिधि जंगलमहल की सुरक्षा के लिए आवंटन का हिसाब-किताब पूरा करेंगे. वे इस बात का ब्योरा जानना चाहेंगे कि जंगलमहल के जिलों में सुरक्षा के लिए आवंटित धन कैसे खर्च किया गया है. नए सूत्रों से ऐसी खबर आ रही है. लोकसभा चुनाव खत्म होते ही केंद्र सरकार का प्रतिनिधिमंडल पश्चिम बंगाल का दौरा शुरू करने जा रहा है. सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो 23 जून को केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक प्रतिनिधिमंडल कोलकाता आ रहा है. पार्टी यह ब्योरा जानना चाहेगी कि जंगलमहल जिलों में सुरक्षा के लिए आवंटित धन कैसे खर्च किया गया है। नवान्न सूत्रों से ऐसी खबर है.

वाम मोर्चा युग के अंत में जंगलमहल में माओवादियों को दबाने के लिए ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट‘ शुरू किया गया था। तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने उस अभियान के लिए धन आवंटित करना शुरू किया। वाम मोर्चे में फेरबदल के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राज्य की कमान संभालने के बाद से पश्चिम बंगाल के जंगलमहल जिलों में माओवादी उपद्रव पूरी तरह से कम हो गया है। इसके बावजूद, संयुक्त बलों का एक हिस्सा जंगलमहल के विभिन्न जिलों में बना रहा। जिसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अभी तक धन आवंटित नहीं किया है। शुरुआत में इस क्षेत्र के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा आवंटित राशि अब बहुत कम हो गई है। इस बार अमित शाह का मंत्रालय यह पता लगाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेज रहा है कि आवंटन किस तरह और कैसे खर्च किया गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय का प्रतिनिधिमंडल 23 से 28 जून तक पश्चिम बंगाल में काम करेगा. हालाँकि, नवान्न को इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है कि उनकी कार्यशैली क्या होगी। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्रालय आवंटित राशि के खर्च का अध्ययन करने के लिए प्रतिनिधिमंडल भेज रहा है. हालांकि राज्य प्रशासन के एक हिस्से का दावा है कि आवंटित धनराशि के खर्च की जानकारी, सभी दस्तावेज और ‘उपयोगिता प्रमाणपत्र’ समय पर गृह मंत्रालय को भेजे जाते हैं. हालांकि, राज्य प्रशासन के अधिकारियों को समझ नहीं आ रहा है कि प्रतिनिधिमंडल क्यों आ रहा है. इसलिए अटकलें शुरू हो गई हैं कि क्या राज्य में पहले की तरह ‘दबाव’ की ‘राजनीति’ चल रही है.

लोकसभा चुनाव में अकेले बहुमत खोने के बाद कई लोगों का मानना ​​था कि बीजेपी पिछले 10 साल से चली आ रही राजनीति की ‘शैली’ को बदल देगी. लेकिन कैबिनेट के शपथ ग्रहण के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक प्रतिनिधिमंडल बंगाल भेजे जाने की अफवाहें शुरू हो गईं. अगर हां, तो क्या फिर पुरानी राह पर चलते हुए केंद्र-राज्य ‘टकराव’ की स्थिति बनी रहेगी? ऐसे सवाल राज्य प्रशासन और सत्ताधारी खेमे में उठने लगे हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2021 में ममता सरकार के तीसरी बार सत्ता में आने के बाद से राज्य में केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे का ‘रुझान’ बढ़ गया है. उस साल चुनाव के बाद 5 मई को ममता ने तीसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद चुनाव बाद ‘आतंकवाद’ के आरोपों की जांच के लिए केंद्रीय बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा राज्य में आए. जून में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रतिनिधि प्रदेश आये। बाद में आयोग ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की. वहां कहा गया, ”बंगाल में कानून का नहीं बल्कि शासक का शासन चल रहा है.” इससे पहले, 13 मई 2021 को राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग, 10 जून को राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग और 15 जून को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने इसी शिकायत की जांच के लिए राज्य में प्रतिनिधिमंडल भेजा था। उन रिपोर्टों का इस्तेमाल करते हुए कुछ मामलों में सीबीआई, कुछ मामलों में एनआईए ने राज्य की सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के खिलाफ जांच शुरू की. वे जाँचें अभी भी जारी हैं। सत्तारूढ़ दल के नेताओं, सांसदों या विधायकों को अक्सर पूछताछ का सामना करना पड़ता है। पिछले तीन वर्षों में केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधिमंडल भी राज्य में आते रहे हैं।सत्ता पक्ष में कई लोगों का मानना ​​है कि बड़ी संख्या में केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल के पश्चिम बंगाल आने के पीछे विपक्षी नेता शुभेंदु अधिकारी की बड़ी भूमिका है. उन्होंने ही प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का नाम बदलकर ग्रामीण आवास योजना करने और लाभार्थियों की सूची में पात्र लोगों के न होने की शिकायत केंद्र से की थी. शुवेंदु ने छुपकर नहीं, बार-बार शिकायत की बात कही, कभी सार्वजनिक तौर पर तो कभी ट्वीट करके. विपक्षी नेता ने केंद्र को लिखे पत्र में यह भी मांग की कि ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का नाम बदलकर ‘बांग्ला आवास योजना’ किया जाए. शिकायत केंद्र की ‘जलजीवन मिशन’ परियोजना का नाम बदलने को लेकर भी थी. सुभेंदु ने आरोप लगाया कि राज्य में यह योजना ‘जलस्वप्न’ के नाम से चलाई जा रही है. उन्होंने फिर पत्र लिखकर आरोप लगाया कि 100 दिन के काम में ‘बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार’ हुआ है. जिसके कारण अभी तक राज्य को 100 दिन के काम का पैसा नहीं मिल पाया है. तृणमूल के शीर्ष नेताओं में से एक अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली जाकर विरोध प्रदर्शन किया है. तृणमूल नेतृत्व ने दावा किया कि भाजपा ने राज्य को 100 दिनों के काम का बकाया नहीं देकर लोकसभा चुनाव में बंगाल को ”हतोत्साहित” किया है। गृह मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल के बंगाल में फिर से प्रवास शुरू होने के बाद सत्ता पक्ष की क्या प्रतिक्रिया होती है, यह देखना होगा.

मोदी के शपथ ग्रहण के बाद मानसिक शांति पाने के लिए इस बार कहां गईं कंगना?

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हाल ही में चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर नवविजेता बीजेपी उम्मीदवार कंगना रनौत को थप्पड़ मारने पर करण जौहर ने क्या कहा? सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जब बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद का विवाद छठे चरण में पहुंच गया तो कंगना रनौत ने डायरेक्टर के खिलाफ जमकर बोला। बॉलीवुड की ‘क्वीन’ ने सीधे तौर पर करण को ‘मूवी माफिया’ करार दिया। इसके बाद से ही दोनों के बीच रिश्ते खराब हो गए हैं. यह लगभग छह वर्षों तक चला। कभी कंगना ने करण की आलोचना की तो कभी करण ने भी जवाब दिया. हाल ही में लोकसभा चुनाव जीतने वाली बीजेपी उम्मीदवार कंगना रनौत को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर थप्पड़ मारे जाने से नेट जगत में हड़कंप मच गया है. घटना में आरोपी सिक्योरिटी गार्ड कुलविंदर कौर को गिरफ्तार कर लिया गया है. नेटिज़न्स का एक वर्ग इस कदम के लिए कुलविंदर की सराहना कर रहा है। इस बार करण जौहर ने खोला अपना मुंह.

कर्ण-कंगना का रिश्ता बिल्कुल परफेक्ट है. कंगना की शिकायत है कि करण जौहर हर किसी को टैलेंट के आधार पर मौका देने की बजाय बालीपारा के स्टार किड्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। हालांकि, एक्ट्रेस सार्वजनिक तौर पर थप्पड़ मारने को कतई बर्दाश्त नहीं करतीं। कर्ण ने कहा, ”मैं इस तरह के अतिवाद का समर्थन नहीं करता. किसी पर हाथ उठाना या मौखिक रूप से अपमान करना स्वीकार्य नहीं है।”

शबाना आजमी ने भी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर उन लोगों के लिए पोस्ट किया जो कंगना की पिटाई की घटना का ‘जश्न’ मना रहे हैं। हालांकि उनका कंगना से कोई निजी लगाव नहीं है, लेकिन एक्ट्रेस ने कहा कि वह थप्पड़ मारने की घटना का समर्थन नहीं करतीं. उन्होंने लिखा, ”कंगना रनौत से मेरा कोई निजी लगाव नहीं है. लेकिन, मैं खुद को उन लोगों में नहीं पाता जो सामूहिक रूप से इस चरकांड का जश्न मना रहे हैं।” 4 जून को चुनाव नतीजे घोषित हुए, कंगना रनौत हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा क्षेत्र से चुनी गईं। 5 जून को दिल्ली जाते समय चंडीगढ़ हवाईअड्डे पर सीआईएसएफ सुरक्षाकर्मियों ने भाजपा सांसद को थप्पड़ मार दिया था। इसके बाद सिक्योरिटी गार्ड कुलविंदर कौर को गिरफ्तार कर लिया गया, उसे सस्पेंड कर दिया गया.

इसके बाद से देशभर में एक के बाद एक चर्चाएं चल रही हैं। पूरा देश पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है. अभिनेत्री 9 जून को राष्ट्रपति भवन में मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुई थीं। इसके बाद कंगना मन की शांति की तलाश में निकल गईं। फिलहाल वह दक्षिण भारत में हैं.

अभिनेत्री ने चुनाव प्रचार से लेकर नतीजों की घोषणा तक लगभग तीन महीने तक अथक परिश्रम किया। इस बार एक्ट्रेस शांति की तलाश में कोयंबटूर गईं. कंगना वहां सद्गुरु ‘ईशा फाउंडेशन’ में कुछ दिन बिताएंगी। गुलाबी रंग की साड़ी, छोटी सी नोक पहनकर वह सद्गुरु के चरणों में बैठी हैं। कंगना के सिर पर सद्गुरु का आशीर्वाद हाथ। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर के साथ लिखा, ”मेरा शांति पता.”

सिर्फ कंगना ही नहीं एक्ट्रेस सामंथा रुथ प्रभु भी इस वक्त वहां हैं। वहां सामंथा आश्रम के निवासियों के साथ ध्यान करती नजर आईं. सिर्फ बॉलीवुड या साउथ इंडस्ट्री ही नहीं बल्कि टॉलीवुड की भी कई अभिनेत्रियां सद्गुरु के प्रशंसकों की लिस्ट में हैं। उन्हीं में से एक है अपराजिता आध्या।

अभिनेत्री कंगना रनौत को थप्पड़ मारने के आरोप में सुरक्षा गार्ड कुलविंदर कौर को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, म्यूजिक डायरेक्टर विशाल ददलानी सुरक्षा गार्ड के साथ खड़े रहे। उस ने आश्वासन दिया कि अगर कुलविंदर की नौकरी चली गई तो वह नई नौकरी का इंतजाम कर देगा. इसी कमेंट के चलते सिंगर सोना महापात्रा ने इस बार विशाल के खिलाफ सुर बुलंद कर दिए.

सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में दावा किया गया है, विशाल एक ऐसे गायक हैं जो हर समय अपना सिर सीधा रखना जानते हैं। इसमें लिखा है, ”प्रसिद्ध गायक और संगीत निर्देशक विशाल ददलानी ने सुरक्षा गार्ड कुलविंदर कौर को नौकरी की पेशकश की है। कुलबिंदर ने दिखा दिया है कि कंगना रनौत की असली जगह कहां है. सचमुच एक बहुत बड़ा बॉलीवुड रत्न। मैंने उसे कभी सिर हिलाते नहीं देखा। मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है.

सोना ने इस पोस्ट में अपनी राय जाहिर की है. विशाल का विरोध करते हुए सोना ने लिखा, ‘हां, अनु मलिकास जैसे यौन शोषण करने वालों के साथ जज की सीट साझा करना वाकई जिद्दीपन है। जब मेरे जैसे सहकर्मी विरोध करने के लिए कहते हैं तो वह कहते हैं, पैसा कमाओ और देश छोड़ दो। सचमुच, वह एक रत्न हैं!” 2018 में ‘मीटू’ आंदोलन के दौरान, अनु मलिक पर गायिका सोना महापात्रा और श्वेता पंडित सहित कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। हालांकि अनु मलिक ने सभी आरोपों से इनकार किया है. इसके बाद विशाल ने एक रियलिटी शो में अनु मलिक के साथ जज की सीट शेयर की. सोना ने उस विषय को आज अपनी पोस्ट में लाया।

हमास युद्ध विराम समझौते पर सहमत! संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल को तुरंत निरस्त्रीकरण का आदेश दिया

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हमास मंगलवार को गाजा में युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से सुरक्षा परिषद द्वारा पिछले सप्ताह पारित एक प्रस्ताव पर सहमत हो गया। संगठन ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि वह प्रस्ताव को लागू करने में मध्यस्थों की सहायता करने पर सहमत है। स्वतंत्रता-समर्थक सशस्त्र समूह हमास से चार इजरायली बंधकों को मुक्त कराने के लिए एक ऑपरेशन में इजरायली बलों ने पिछले सप्ताह गाजा में 500 से अधिक फिलिस्तीनियों को मार डाला है। घायलों की संख्या इससे भी ज्यादा है. ऐसे में हमास ने मंगलवार को युद्धविराम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.

हमास मंगलवार को गाजा में युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से सुरक्षा परिषद द्वारा पिछले सप्ताह पारित एक प्रस्ताव पर सहमत हो गया। संगठन ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि वह प्रस्ताव को लागू करने में मध्यस्थों की सहायता करने पर सहमत है। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इजराइल को युद्धविराम सक्रिय करने का संदेश भेजा. लेकिन तेल अवीव अभी तक इस पर सहमत नहीं हुआ है. लंबाई 30 किमी. औसत चौड़ाई केवल 5 कि.मी. है। भूमध्य सागर के किनारे 23 लाख फ़िलिस्तीनियों की ज़मीन पिछले एक हफ़्ते में एक तरह से बूचड़खाना बन गई है। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि 7 अक्टूबर के हमले में हमास ने 1,200 लोगों को मार डाला. 250 लोगों को जेल में डाल दिया गया. जवाब में इजराइल ने 37,000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को मार डाला. भांग का लगभग सफाया हो जाएगा। इसी माहौल में अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने युद्धविराम और बंधकों की रिहाई पर चर्चा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से आठवीं बार पश्चिम एशिया का दौरा किया। 245 दिन कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ है, कैसा है, जीवित है या नहीं। पिछले साल 7 अक्टूबर को फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास द्वारा दक्षिणी इज़राइल में नोवा म्यूजिक फेस्टिवल से उनका अपहरण कर लिया गया था। आठ महीने बाद, इज़राइल रक्षा बलों (आईडीएफ) ने मध्य गाजा के नुसरत शिविर में हमास शिविर से 26 वर्षीय नोआ अरघमनी को बचाया। अपने परिवार के पास लौट आये.

नोआ को आखिरी बार एक वीडियो फुटेज में देखा गया था जो वायरल हो गया था। नूह और उसके प्रेमी, अविनाटल ओर, दोनों को हमास ने कैद कर लिया था। वीडियो में नोहा को जबरन मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले जाया जा रहा है. जीवित रहने के लिए बेताब, युवती अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही थी। चीखना, रोना. कोई लाभ नहीं। उन्हें अगले 245 दिनों तक गाजा में कैद रखा गया। आईडीएफ ने शनिवार को नुसेरात शिविर पर छापा मारा। नूह को वहां से बचाया गया। उनके साथ, तीन अन्य कैदियों को रिहा कर दिया गया – एंड्री कोज़लोव, अल्मोग मेर जान और श्लोमी ज़िव।

बचाव के बाद, नूह को तेल अवीव के एक अस्पताल में ले जाया गया। नोरा की मां लियोरा वहां भर्ती हैं. वह कैंसर से पीड़ित हैं. जिंदगी के किनारे पर खड़ा हूं. नूर के अपहरण के बाद उसकी शारीरिक स्थिति और भी खराब हो गई। बहुत दिनों के बाद माँ-बेटी का पुनः मिलन हुआ।

बंधकों की रिहाई की खबर सुनने के लिए आज हजारों इजरायली मध्य तेल अवीव के बंधक चौक पर एकत्र हुए। वे उत्सव मनाते हैं। उन्होंने बाकी कैदियों की रिहाई की मांग की. गाजा में अब भी 116 कैदी हैं. हालाँकि, सेना को संदेह है कि उनमें से 41 अब जीवित नहीं हैं।

इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने फोन पर नूह को बधाई दी। नेतन्याहू ने कहा, “हमने एक पल के लिए भी उम्मीद नहीं छोड़ी है।” मुझे नहीं पता कि आप इस पर विश्वास करते हैं या नहीं, लेकिन हमें विश्वास था कि आप जीवित थे। यह सच है। हम बहुत खुश थे।”

आईडीएफ ने कल से सेंट्रल गाजा के नुसेरात कैंप में ऑपरेशन शुरू कर दिया है. हमले आज भी जारी हैं. मरने वालों की संख्या 274 से ज्यादा हो गई है. कम से कम 698 घायल हुए। अल-अक्सा अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है, ”रक्त वाहिकाएं सूख गई हैं. अस्पताल में प्रवेश करना बूचड़खाने जैसा लगता है.” घायलों को इलाज के लिए ले जाने की कोई जगह नहीं है. कुछ लोग बेहद संकट में हैं. लाशों और घायल मरीजों के बोझ से डॉक्टर दहशत में हैं. स्थानीय पत्रकार बता रहे हैं कि मरने वालों की संख्या बढ़ेगी. नुसेरात शिविर अब ईंट-लकड़ी-पत्थर के मलबे का ढेर बन गया है। कंक्रीट स्लैब के नीचे कई और लोगों के दबे होने की आशंका है. स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्ता मलबे को हटाने और शवों और घायलों, यदि कोई हो, को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच, रेड अलर्ट प्रभावी है, इजरायली वायु सेना नुसरा पर फिर से हवाई हमला कर सकती है।

दुनिया के लगभग सभी देश इजराइल की निंदा करते हैं. यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच भी विरोध कर रहे हैं. पोप फ्रांसिस ने तत्काल शांति समझौते का आह्वान किया है। हालाँकि, इज़राइल अपनी स्थिति पर अड़ा हुआ है। उनके शब्दों में, जब तक हमास ख़त्म नहीं हो जाता, युद्ध नहीं रुकेगा.
‘अस्पताल या बूचड़खाना?’ डेर अल-बाला में अल-अक्सा अस्पताल के आपातकालीन विभाग के सामने खड़े होकर एक डॉक्टर को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा। उसके चारों ओर खून से लथपथ शव पड़े थे। चाहने वाले इस आस में तलाश कर रहे हैं कि शायद कहीं कोई जिंदा हो.

बंगाल में महिलाओं के वोटों का नतीजा क्या आया ?

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शायद लक्ष्मी भंडार प्रशासन की किताबों में एक और सरकारी परियोजना है। जिन नेताओं ने इसे डिज़ाइन किया था, उन्होंने संभवतः इसे मतपेटी में अतिरिक्त लाभ की उम्मीद से बनाया था। पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद एक दुर्लभ दृश्य देखने को मिला- सभी दलों की सहमति! भाजपा राज्य समिति के सदस्य सुनील दास, बिष्णुपुर के भाजपा उम्मीदवार सौमित्र खान, सीपीएम राज्य समिति के सदस्य तुषार घोष सहित कई विपक्षी नेता इस बात से सहमत हैं कि लक्ष्मी भंडार के कारण तृणमूल के खिलाफ वोट खींचना मुश्किल हो गया है। राज्य की महिलाओं का वोट तृणमूल के खजाने में गया है, जो इस बात का संकेत है- झाड़ग्राम लोकसभा चुनाव की प्रारंभिक समीक्षा से पता चलता है कि 92 प्रतिशत महिलाओं का वोट तृणमूल को गया है। कई जमीनी स्तर के नेता सोचते हैं कि यही कारण है। उससे यह भी स्पष्ट है कि इस बार राज्य के आम चुनाव नतीजों की निर्णायक महिलाएं हैं। लड़कियां ‘वोट बैंक’ होती हैं, यह कहावत काफी समय से सुनी जा रही है। लेकिन ‘बैंक’ शब्द में सुरक्षा का भाव अंतर्निहित है। हालाँकि, राज्य के पंचायत, विधानसभा और लोकसभा चुनावों के नतीजों पर नज़र डालने से निश्चितता की झलक नहीं मिलती है – वोटालक्ष्मी लगातार अस्थिर हैं, महिलाएँ भी निर्विवाद रूप से उसी पार्टी का समर्थन कर रही हैं। लेकिन 2024 के आम चुनावों के बाद, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि महिलाएं राज्य में एक प्रमुख मतदाता बन गई हैं। अपने निर्णय के आधार पर, वे निर्णय ले रहे हैं कि किस मुद्दे को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने धर्म, समुदाय, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक नेताओं के पूर्वाग्रह और धोखे, महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे विभिन्न चुनावी मुद्दों के बीच लक्ष्मी भंडार परियोजना को ‘पक्षी की आंख’ करार दिया है। कुछ पैसे प्राप्त करने को महत्व देना लड़कियों की ओर से राजनीतिक चेतना की कमी नहीं है – यह लड़कियों की एक सचेत पसंद है, उनकी जीवन भर की राजनीतिक समझ की अभिव्यक्ति है।

राजनीति का लक्ष्य शक्ति संतुलन है। महिलाओं की शक्ति की कमी शाश्वत है, लेकिन आज उन पर जिम्मेदारी का बोझ बढ़ता जा रहा है। एक तरफ परिवार को संभालने और बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी तो दूसरी तरफ ज्यादातर लड़कियों को लैंगिक असमानता वाली बुरी बाजार व्यवस्था का सामना करते हुए जीविकोपार्जन की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। जैसे-जैसे पुरुषों के शहरों और गांवों को छोड़कर विदेश में काम करने की दर बढ़ी है, दैनिक घरेलू खर्च प्रदान करने की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ गई है। इसके अलावा, खराब सरकारी सेवाओं के कारण, ऊनी ईंधन से लेकर बच्चे के इलाज तक सब कुछ लड़की को अपने श्रम या खर्च से जुटाना पड़ता है। अवैतनिक घरेलू काम, वेतन की कमी और लंबे कार्य दिवस, परिवार के पैसे को इच्छानुसार खर्च करने में असमर्थता – कुल मिलाकर, लड़कियों का जीवन दयनीय है। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल के साथ-साथ भारत में भी, महिलाएँ सभ्य वेतन और सभ्य कामकाजी परिस्थितियों की माँग करने वाले सभी आंदोलनों की अगुआ रही हैं। आशा, आंगनवाड़ी, मध्याह्न भोजन कार्यकर्ता, सफाई कर्मचारी, चाय बागान श्रमिक सहित कई व्यवसायों में महिलाएं सामने आई हैं और लड़कियों की आजीविका की दुर्दशा के प्रति सरकार और समाज की उदासीनता पर जमकर हमला बोला है। महिलाओं के श्रम को मान्यता देने की मांग पर लंबी, निरंतर बहस ने कई लड़कियों को आजीविका के सवाल को प्राथमिकता देने की ताकत दी होगी, भले ही इसका राजनीतिक मुख्यधारा पर ज्यादा प्रभाव न पड़ा हो।

शायद लक्ष्मी भंडार प्रशासन की किताबों में एक और सरकारी परियोजना है। जिन नेताओं ने इसे डिज़ाइन किया था, उन्होंने संभवतः इसे मतपेटी में अतिरिक्त लाभ की उम्मीद से बनाया था। लेकिन राज्य में लड़कियां भी पैसा कमा रही हैं। एक हजार रुपये या बारह सौ रुपये महीना महज कोई आर्थिक सहायता नहीं है (हालाँकि इसका मूल्य एक गरीब लड़की के लिए कम नहीं है), यह वास्तव में लड़कियों के खिलाफ सामूहिक अन्याय की पहचान है, और इसे ठीक करने का एक प्रयास है। इस सत्य को जय-पराजय से ऊपर उठकर देखने की जरूरत है। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल के साथ-साथ भारत में भी, महिलाएँ सभ्य वेतन और सभ्य कामकाजी परिस्थितियों की माँग करने वाले सभी आंदोलनों की अगुआ रही हैं। आशा, आंगनवाड़ी, मध्याह्न भोजन कार्यकर्ता, सफाई कर्मचारी, चाय बागान श्रमिक सहित कई व्यवसायों में महिलाएं सामने आई हैं और लड़कियों की आजीविका की दुर्दशा के प्रति सरकार और समाज की उदासीनता पर जमकर हमला बोला है। महिलाओं के श्रम को मान्यता देने की मांग पर लंबी, निरंतर बहस ने कई लड़कियों को आजीविका के सवाल को प्राथमिकता देने की ताकत दी होगी, भले ही इसका राजनीतिक मुख्यधारा पर ज्यादा प्रभाव न पड़ा हो।

आखिर क्या रहा इस बार का वोटिंग पैटर्न?

आज हम आपको बताएंगे कि इस बार का वोटिंग पैटर्न कैसा और क्या-क्या था! लोकसभा चुनाव की रैलियों और भाषणों में एक शब्द जो सबसे ज्यादा गूंज रहा है वह है मुस्लिम और अल्पसंख्यक। पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से राजस्थान में 21 अप्रैल को अल्पसंख्यकों को लेकर दिए गए बयान ने चुनावी प्रचार की धारा में बदलाव कर दिया। इसके बाद आरोप और प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ा। कांग्रेस ने पीएम पर अपने घोषणापत्र को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। हालांकि, बाद में पीएम ने कहा कि वह हिंदू मुसलमान की राजनीति नहीं करते हैं। चुनाव में मुस्लिम समुदाय पर सबकी नजरें लगी हुई हैं कि इस बार क्या उसका चुनावी पैटर्न क्या होगा? क्या मुसलमान एक यूनिफाइड सेकुलर पैटर्न पर वोटिंग करेंगे? माना जाता है कि 543 सीटों में से 86 सीटों पर अल्पसंख्यकों का प्रभाव है। ऐसी सीटें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में ज्यादा हैं। लोकनीति प्रोग्राम फॉर कंपरेटिव डेमोक्रेसी का डेटा बताता है कि अल्पसंखयकों की अच्छी आबादी वाले पश्चिम बंगाल में साल 2021 के विधानसभा चुनाव में 75 फीसदी मुस्लिमों ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया था। उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनावों में 79 फीसदी मुसलमानों ने महागठबंधन के लिए वोट किया और बिहार विधानसभा चुनाव में 77 फीसदी मुसलमानों ने महागठबंधन के लिए वोट किया था। ऐसे में कई जानकार यह मान रहे हैं कि 2019 के बाद हुए विधानसभा चुनावों के मद्देनजर देश की 14 फीसदी आबादी के इस वोटिंग पैटर्न में बदलाव शायद ही दिखे। यानी कम्युनिटी अपनी वोटिंग की इस अप्रोच को कायम रखेगी। हालांकि, टिकट बंटवारे में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व पहले से कम हुआ है। इस बार I.N.D.I.A. के कुल 78 मुस्लिम उम्मीदवार ही मैदान में हैं, जबकि पिछली बार यह संख्या 115 थी। उनमें से 26 जीतकर लोकसभा भी पहुंचे थे।

मुस्लिम समुदाय को टिकट बंटवारे को देखें तो सबसे ज्यादा 35 उम्मीदवार BSP ने खड़े किए हैं। इसके बाद 19 उम्मीदवारों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर है। तीसरे नंबर पर TMC आती है। BSP ने 35 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट भले ही दिया हो, लेकिन इस रणनीति ने अतीत में सेकुलर वोट ही काटे हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में BSP में 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इससे मुस्लिम वोट बंट गया था। उस वक्त 403 विधानसभा सीटों में से 313 पर BJP ने जीत हासिल की थी। UP की राजनीति में में यादव-मुस्लिम गणित पर चुनाव लड़ने वाली समाजवादी पार्टी ने भी इस बार OBC और दलित समीकरण को साधने के लिहाज से महज 4 मुसलमानों को टिकट दिया है। बंगाल की राजनीति पर विश्लेषक जयंत घोषाल का कहना है कि फिलहाल 30% मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस, CPM और मुस्लिम सेकुलर फ्रंट जैसे दलों में बिखरा है। जिस तरह से TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी CAA के मुद्दे पर BJP के खिलाफ प्रचार कर रही हैं ऐसे में यह समुदाय तृणमूल के खाते में चला गया तो BJP को दिक्कत हो सकती है।

राजनीतिक दल भले ही मुस्लिम उम्मीदवारों को खुले हाथ से टिकट देने में हिचकते हों, लेकिन मुस्लिम वोटों की दरकार सबको है। BJP समुदाय के 15 फीसदी वोट को लक्ष्य बना कर चल रही है और इसके लिए बीते कुछ समय में पसमांदा मुसलमानों को लेकर पार्टी का खास फोकस रहा है। मुस्लिम तबके में 57 फीसदी पसमांदा मुसलमान हैं। BJP की ओर से आक्रामक तौर पर चलाई गई मोदी मित्र योजना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी रही है। इसके तहत पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे ने लगातार मुस्लिम समाज के साथ संवाद की रणनीति बनाई। बता दें कि 543 सीटों में से 86 सीटों पर अल्पसंख्यकों का प्रभाव है। ऐसी सीटें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में ज्यादा हैं। लोकनीति प्रोग्राम फॉर कंपरेटिव डेमोक्रेसी का डेटा बताता है कि अल्पसंखयकों की अच्छी आबादी वाले पश्चिम बंगाल में साल 2021 के विधानसभा चुनाव में 75 फीसदी मुस्लिमों ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया था।जिस तरह से TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी CAA के मुद्दे पर BJP के खिलाफ प्रचार कर रही हैं ऐसे में यह समुदाय तृणमूल के खाते में चला गया तो BJP को दिक्कत हो सकती है। उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनावों में 79 फीसदी मुसलमानों ने महागठबंधन के लिए वोट किया और बिहार विधानसभा चुनाव में 77 फीसदी मुसलमानों ने महागठबंधन के लिए वोट किया था। हालांकि कई जानकार यह भी कहते हैं कि 2014 के बाद हिंदुत्वादी नीतियों की वजह से हिंदू वोटर एकजुट हुआ है और यही पैटर्न आगे बढ़ा और 2019 में 40 फीसदी से ज्यादा हिंदू वोटर्स ने BJP को वोट दिया था। मुस्लिम वोट कई जगह बंट गया था।