Monday, January 12, 2026
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जानिए एक खतरनाक कातिल दोस्त की कहानी!

आज हम आपको एक खतरनाक कातिल दोस्त की कहानी सुनाने जा रहे हैं! दोस्त से दगाबाजी और शातिराना प्लानिंग की कहानी चेन्नई के दक्षिण में बसे चेंगलपेट के अल्लानूर गांव से शुरू हुई। गांव की आबादी ज्यादा नहीं है, इसलिए घर भी एक-दूसरे से दूर बने हैं। ऐसी ही एक झोपड़ी में फिजिकल ट्रेनर सुरेश आर. भी रहता था। 38 साल का सुरेश आर. कुछ दिन पहले ही चेन्नई से गांव अल्लानूर लौटा था। 16 सितंबर 2023 को उसकी झोपड़ी में आग लग गई। पुलिस ने जली हुई झोपड़ी से एक पुरुष के जली हुई बॉडी बरामद की। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की। पुलिस ने भी इस आग लगने की घटना मानकर फाइल बंद कर दी। ओराथी पुलिस स्टेशन के अफसरों ने मान लिया था कि झोपड़ी में लगी आग में अपनी मां से अलग रहने वाले सुरेश की मौत हो चुकी है। करीब तीन महीने बाद दिसंबर में इस कहानी में नया मोड़ आया। तमिलनाडु में एन्नोर थाने की पुलिस 39 साल के दिल्ली बाबू की गुमशुदगी की जांच रही थी। दिल्ली बाबू सुरेश की कथित मौत से एक सप्ताह पहले संदिग्ध हालात में गायब हो गया था। 23 सितंबर को एन्नौर थाने में परिजनों ने दिल्ली बाबू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद भी जब दिल्ली बाबू का अता-पता नहीं चला तो उसके परिजन शिकायत लेकर पुलिस कमिश्नरेट पहुंचे और कोर्ट में वाद भी दायर कर दिया। इसके बाद एन्नौर पुलिस ने तफ्तीश शुरू की। पुलिस दिल्ली बाबू के बड़े भाई पलानी से पूछताछ की। पलानी ने पुलिस को बताया कि उसके भाई की दोस्ती अल्लानूर में रहने वाले सुरेश आर. से थी। गायब होने से पहले वह अक्सर सुरेश के साथ घूमता था। चेंगलपेट में अचारपक्कम पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर आर शिवकुमार ने बताया कि पलानी के बयान के बाद जांच सुरेश की ओर मुड़ी, जिसकी कथित तौर से झोपड़ी में आग लगने मौत हो गई थी। पुलिस को सबसे बड़ा क्लू उस समय हाथ लगा, जब दिल्ली बाबू के मोबाइल फोन की लास्ट लोकेशन सुरेश की झोपड़ी के पासअल्लानूर गांव में मिली।

इसके बाद से पुलिस सुरेश आर और दिल्ली बाबू के रिश्तों को खंगालने लगी। कई लोगों से पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान यह सामने आया कि झोपड़ी वाले हादसे के दौरान सुरेश को तीन लोगों के साथ दिखा था। उनमें एक की पहचान हरिकृष्णन के तौर पर हुई। अब पुलिस हरिकृष्ण के पीछे पड़ी। पुलिस की टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर पहुंची। वेल्लोर में हरिकृष्ण के पिता ने बताया कि वह कई हफ्तों से नहीं घर आया है। पुलिस ने उनसे हरिकृष्ण का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया और फिर उसे ट्रेस करती रही। इंस्पेक्टर शिवकुमार ने बताया कि फोन नंबर को ट्रेस करते हुए पुलिस टीम हरिकृष्णन की तलाश में वेल्लोर के पास अराकोणम के एक घर में पहुंची। वहां जब पुलिस ने हरिकृष्णन को दबोचने के लिए दरवाजा खुलवाया तो हैरान रह गई। वहां सुरेश आर. भी जिंदा मिला, जिसकी कथित मौत झोपड़ी वाले हादसे में हो चुकी थी। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।

अब बारी दोनों से पूछताछ की थी। जब पुलिस ने सुरेश आर. का मुंह खुलवाया तो दिल्ली बाबू की गुमशुदगी से भी पर्दा उठ गया। झोपड़ी में जलकर मरने वाला दिल्ली बाबू ही था, जिसे सुरेश अपनी लंबी प्लानिंग के बाद अपने साथ ले गया था। सुरेश ने अपने दो दोस्तों हरिकृष्णन और कीर्ती राजन के साथ उसकी हत्या की थी। कीर्ती राजन वेल्लोर में टैक्सी चलाता था। सुरेश ने पुलिस को बताया कि उसने एक करोड़ का जीवन बीमा कराया था। अपने लाइफ इंश्योरेंस के प्रीमियम के तौर पर पिछले दो साल में 50 हजार रुपये जमा किए थे। वह इंश्योरेंस कंपनी से मोटी रकम हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने अपनी मौत की स्क्रिप्ट लिखी। इंश्योरेंस कंपनी की तसल्ली के एक लाश की जरूरत थी। इसके लिए उसने पहले लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले संस्थाओं से बातचीत की, मगर काम नहीं बना। इस बीच उसकी मुलाकात अपने पुराने दोस्त दिल्ली बाबू से हुई। बाबू दस साल पहले अपने परिवार के साथ सुरेश के मकान में बतौर किरायेदार रहता था।

सुरेश को वह शख्स मिल गया, जिसकी हत्या के बाद पुलिस और इंश्योरेंस कंपनी को गुमराह किया जा सकता था। सुरेश ने प्लानिंग के तहत फिर से बाबू से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया। दोनों एक दशक बाद फिर एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। फिर उसने हत्या की साजिश रची। अपनी प्लानिंग में उसने हरिकृष्णन और टैक्सी ड्राइवर कीर्ती राजन को शामिल किया। 9 सितंबर को तीनों ने मिलकर हत्या की स्क्रिप्ट लिखी। प्लानिंग के तहत 15 सितंबर 2023 की शाम को तीनों पार्टी करने के नाम पर दिल्ली बाबू को धोखे से अपनी झोपड़ी में लाए। वहां उन्होंने बाबू को जमकर शराब पिलाई। जब बाबू नशे में मदहोश हो गया तो तीनों ने मिलकर जेनरेटर के तार से उसका गला घोंट दिया। बाबू की मौत के बाद सुरेश ने अपनी झोपड़ी में पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी और तीनों वहां से चलते बने। सुरेश की मां ने शव की पहचान अपने बेटे के तौर पर की तो उन्हें लगा कि प्लान सक्सेस हो गया है। मगर नियति को कुछ और मंजूर था। पुलिस ने टैक्सी ड्राइवर राजन, हरिकृष्णन और सुरेश आर को गिरफ्तार कर लिया है।

क्या राम मंदिर से पीएम मोदी की बदलेगी सियासी फिजा?

अब राम मंदिर से पीएम मोदी की सियासी फिजा भी बदल सकती है! अयोध्या राम मंदिर में 22 जनवरी को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल अभी तक इसी उधेड़बुन में फंसे है कि राम मंदिर के उद्घाटन में जाना है या नहीं। देश की पूरी राजनीति राम मंदिर के आसपास आकर ठहर सी गई है। राम मंदिर को लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्षी दलों को डर सता रहा है कि राम मंदिर बीजेपी को बड़ा चुनावी फायदा ना दे दे। वहीं बीजेपी भी राम मंदिर के जरिए हिंदू वोटर्स पर फोकस करने की रणनीति बना सकती है। राम मंदिर पर सियासत के बीच आज पीएम मोदी का अयोध्या दौरा भी काफी अहम है। दरअसल पीएम मोदी का यह दौरा अयोध्यावासियों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीएम मोदी के इस दौरे से भी बीजेपी लोकसभा चुनावों में फायदा मिल सकता है, क्योंकि पीएम मोदी 15,700 करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। श्रीराम की नगरी से देश के विभिन्न शहरों के लिए भी सौगातों का पिटारा खुलेगा। पीएम मोदी देश के अलग अलग स्टेशनों से संचालित होने वाली छह वंदे भारत और दो अमृत भारत ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इससे पहले पीएम मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। प्रशासन की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुनर्विकसित अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन राष्ट्र को समर्पित करेंगे। पीएम मोदी श्री माता वैष्णो देवी कटरा-नई दिल्ली, अमृतसर-नई दिल्ली, कोयम्बटूर-बेंगलुरु, मंगलूरु-मडगांव, जालना-मुंबई एवं अयोध्या-आनंद विहार टर्मिनल के बीच छह वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों के साथ ही अयोध्या-दरभंगा और मालदा टाउन-बेंगलुरु के बीच दो अमृत भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे। इसके अलावा पीएम मोदी महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करेंगे।

राम की नगरी अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। अयोध्या एयरपोर्ट की शुरुआत होते ही यूपी में एयरपोर्ट्स की संख्या 9 से बढ़कर 10 पहुंच जाएगी। वहीं यूपी को रफ्तार देने के लिए अगले दो महीनों में पांच और नए एयरपोर्ट की सौगात मिल जाएगी। इस तरह सालभर में एयरपोर्ट की संख्या 19 करने का लक्ष्य रखा गया है। यूपी को जल्द मिलने वाले एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी के अयोध्या का दौरे से पहले शहर को ‘दिव्य रूप’ देने के लिए फूलों से सजाया जा रहा है। पुनर्विकसित मार्ग ‘राम पथ’ के मध्य में स्थापित बिजली के खंभों के चारों ओर नारंगी और पीले रंग के गेंदे के फूलों की माला लपेटी जा रही हैं। इन खंभों के शीर्ष पर बने डिजाइन धार्मिक प्रतीकों को दर्शाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई श्रमिक राम कथा पार्क में फूलों से कलात्मक आकार बना रहे हैं। सजावट के लिए भगवान राम, उनके धनुष एवं तीर, भगवान हनुमान, धार्मिक तिलक आदि की छवियों से प्रेरणा ली गई है। अयोध्या में फूलों से कई सजावटी डिजाइन बनाए गए हैं, जिनमें धनुष और तीर पकड़े हुए भगवान राम की पुष्प छवि भी शामिल है। इन सजावटी संरचनाओं का उपयोग राम पथ, धर्म पथ, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन सहित अन्य स्थानों पर सजावट के लिए किया जाएगा। सैकड़ों कर्मचारी सजावट के काम में जुटे हैं और लगभग 300 क्विंटल फूल कोलकाता, दिल्ली, गाजीपुर और अन्य स्थानों से लाए गए हैं।

आज पीएम मोदी अयोध्या पहुंच रहे है। वह एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन तक करीब 8 किलोमीटर लंबा रोड शो निकालेंगे। रोड शो के दौरान 51 जगहों पर पीएम नरेंद्र मोदी का स्वागत होगा। इसमें 12 जगहों पर संत-महंत उनका स्वागत करेंगे।एयरपोर्ट्स की सौगात का एलान मोदी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिया है। ये यूपी के विकास में बड़ी मील का पत्थर साबित होगा। इससे प्रदेशवासियों में भी खुशी है। यूपी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें है। यूपी में विकास की तेज गति का मुद्दा बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में भुना सकता है। 21 संस्कृत विद्यालयों के 500 वैदिक छात्र वेद मंत्र और शंख ध्वनि से स्वागत करेंगे। इन रोड शो वाले मार्गों को फूलों से सजाया गया है। इसमें थाईलैंड, मलेशिया, कोलकाता, बेंगलुरु, देहरादून, उत्तराखंड और दिल्ली से फूल और आगरा के पत्ते मंगाए गए हैं।

क्या मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा या नहीं! मैरिटल रेप के मामले में अलग-अलग हाई कोर्ट का अलग-अलग फैसला आया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुनवाई होने वाली है। ऐसे में पिक्चर सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई के बाद ही साफ हो जाएगी। गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते कहा कि बलात्कार तो बलात्कार है और भले ही किसी महिला के पति ने उसके साथ किया हो। भारत में महिलाओं के खिलाफ जो सेक्सुअल अपराध होता है, उस पर मौन तोड़ने की जरूरत है। वहीं इस महीने की शुरुआत में ही एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मैरिटल रेप में बड़ा फैसला देते हुए कहा कि पत्नी की उम्र अगर 18 साल से ज्यादा हो तो IPC के तहत वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना जा सकता है। मैरिटल रेप मामले में अलग-अलग हाई कोर्ट का फैसला भी अलग-अलग है। वैसे मैरिटल रेप का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है और इस पर सुनवाई होनी है जिसके बाद ही इस मामले में पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी। IPC की धारा-375 या फिर भारतीय न्याय संहिता की धारा-63 में रेप को परिभाषित किया गया है। कानून कहता है कि अगर कोई शख्स किसी भी महिला के साथ उनकी मर्जी के खिलाफ संबंध बनाता है तो वह रेप होगा। साथ ही बालिग पत्नी के साथ जबरन संबंध रेप का अपवाद होगा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अक्टूबर में एक मामले में फैसला दिया था कि पति के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाने का केस नहीं चल सकता है, क्योंकि रेप के मामले में पति को अपवाद में रखा गया है और रेप कानून की नई परिभाषा ज्यादा व्यापक है और अप्राकृतिक संबंध भी रेप के दायरे में है। ऐसे में पति के खिलाफ जबरन अप्राकृतिक संबंध का केस नहीं चलेगा क्योंकि मैरिटल रेप अपराध नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की उम्र अगर 18 साल से ज्यादा हो तो IPC तहत पति के खिलाफ मैरिटल रेप का केस नहीं बनेगा। आरोपी को अप्राकृतिक अपराध के मामले में बरी करते हुए यह टिप्पणी की गई। कोर्ट ने कहा कि धारा-377 के तहत जो अपराध है वह रेप की परिभाषा में शामिल है और मैरिटल रेप के मामले में पति को अपवाद में रखा गया है। गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि रेप तो रेप होता है, भले ही रेप करने वाला पति ही क्यों न हो। अदालत ने कहा कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की वास्तविक घटनाएं संभवतया आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। महिलाओं को ऐसे वातावरण में रहना पड़ता है जहां वह हिंसा को झेलती हैं। केरल हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी की मर्जी के खिलाफ जाकर अगर पति संबंध बनाता है यानी मैरिटल रेप करता है तो यह तलाक का मजबूत आधार होगा। कोर्ट ने कहा कि यह मानसिक और शारीरिक क्रूरता के दायरे में है और यह तलाक का आधार है।

दिल्ली हाई कोर्ट में मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने के लिए अर्जी दाखिल की गई थी। वहीं, केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाई कोर्ट को बताया था चूंकि इस मामले का सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए केंद्र परामर्श प्रक्रिया के बाद ही अपना पक्ष रखेगा। दिल्ली हाई कोर्ट ने 11 मई को इस मामले में जो फैसला दिया वह बंटा हुआ था। दो जजों की बेंच में एक जज ने इसे अपराध की श्रेणी में लाने की बात कही तो दूसरे ने इसके विपरीत आशय जाहिर किया। जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है।

बता दे कि बार एंड बेच की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस दिव्येश जोशी ने अपने 8 दिसंबर को आदेश में अमेरिकी राज्यों, तीन ऑस्ट्रेलियाई राज्यों, न्यूजीलैंड, कनाडा, इज़राइल, फ्रांस, स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे, सोवियत संघ, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया का जिक्र करते हुए कि करीब 50 देशों में मैरिटल रेप अपराध है। कई देश इसे अपराध घोषित करने की जा रहे हैं। जस्टिस दिव्येश जोशी ने टिप्पणी की कि ‘लड़के ही लड़के रहेंगे’ के सामाजिक रवैये को बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो पीछा करने और छेड़छाड़ के अपराधों को सामान्य बनाता है। जोशी ने कहा कि भारीय दंड संहिता काफी तरह तक यूके से प्रेरित है। उसने भी पति को रेप से छूट देने को हटा दिया है।

जस्टिस दिव्येश जोशी ने आदेश में कहा गया है कि अगर कोई पुरुष किसी महिला का यौन उत्पीड़न करता है या उसे टेप करता है, तो आईपीसी की धारा 376 के तहत सजा दी जा सकती है। जस्टिस ने काफी मामलों में ऐसा देखा गया है कि एक पति जब दूसरे व्यक्ति की तरफ इस तरह का कृत्य करता है तो उसे छूट दे दी जाती है। मेरी अपनी राय है कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बलात्कार बलात्कार है, चाहे वह किसी भी पुरुष द्वारा किया गसा हो। चाहे पति हो और महिला पत्नी हो। जोशी ने कहा कि इस बारे में सामाजिक रवैया बदले की जरूरत है।

जस्टिस दिव्येश जाेशी ने ये कड़ी टिप्पणियों राजकोट के उस मामले कीं जिसमें एक महिला ने अपने पति-सास और ससुर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें कहा था कि उन्हें न सिर्फ नग्न वीडियो रिकॉर्ड किए बल्कि उन्हें अश्लील साइट पर अपलोड किया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीड़िता की तरफ दलील दी गई कि पति ये सब हरकतें अपने माता-पिता की शह पर कर रहा था। पीड़ित की ओर से कहा गया है कि इस सब के पीछे का मकसद पैसा कमाना और अपने होटल को बेचने से बचना था क्योंकि वे आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। ऐसा उन्होंने अधिक रुपये कमाने के लिए किया। कोर्ट ने इस मामले में तमाम आरोपियों की जमानत खारिज कर दी।

नागपुर रैली में बीजेपी के लिए क्या बोले राहुल गांधी?

हाल ही में राहुल गांधी ने नागपुर रैली में बीजेपी के लिए एक बयान दिया है! कांग्रेस के 139वें स्थापना दिवस पर आयोजित ‘हैं तैयार हम’ रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने बीजेपी पर बड़ा हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि देश में दो विचारधाराओं की लड़ाई की चल रही है। राहुल गांधी ने कहा कि यह लड़ाई नागपुर से शुरू हुई थी। इसलिए हम यहां आए हैं। राहुल गांधी ने बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि केंद्र की सत्ता में आने पर कांग्रेस पार्टी देश में जाति जनगणना कराएगी। राहुल गांधी ने कहा कि देखने में कह सकते हैं कि लड़ाई राजनैतिक है सत्ता के लिए है, लेकिन सही में यह लड़ाई दो विचारधाराओं की है। राहुल गांधी ने कांग्रेस से बीजेपी में गए नेता जो सांसद है से बातचीत की बातचीत का हवाला देकर निशाना साधा। राहुल गांधी ने कहा कि कहा उन्होंने मुझसे छुपकर और डरकर मुलाकात की और कहा कि मैं बीजेपी का सांसद हूं लेकिन मेरा दिल कांग्रेस में है। राहुल गांधी ने कहा कि उस सांसद ने बताया कि बीजेपी में गुलामी चलती है। ऊपर से जो आर्डर आता है उसे करना पड़ता है। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस में सभी सुनी जाती है। नीचे से आवाज आती है, लेकिन बीजेपी में ऐसा नहीं है। राहुल गांधी ने कहा वे सभी की बात सुनते हैं। कई बार असहमति भी व्यक्त करते हैं। राहुल गांधी ने कहा आजादी से पहले राजाओं और अंग्रेजों का शासन था। गन सलूट दिए जाते थे। वे जो चीज अच्छी लगती थी उसे ले लेते थे। राहुल गांधी ने कहा कि लोगों के अधिकारों की रक्षा अंबेडकर और गांधी जी ने की। संविधान बनाया। राहुल गांधी ने आज आरएसएस के लोग झंडे के सामने खड़े हो जाते हैं और सैल्यूट मारते हैं। सालों तक उन्होंने ऐसा नहीं किया है। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई के बाद लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित किया था। संविधान के जरिए बराबर अधिकार दिया। एक वोट का बराबर अधिकार दिया।

राहुल गांधी ने कांग्रेस की कार्यकाल में हुए कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि आज चार दशक में सर्वाधिक बेरोजगारी है। उन्होंने पूछा कि आप बताइए कि मोदी सरकार ने कितने लोगों के रोजगार दिया। उन्होंने बेरोजगारी के चलते आज कई-कई घंटे तक युवा सिर्फ मोबाइल देखते हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 1 लाख 50 हजार युवाओं को हिंदुस्तान की सेना और एयरफोर्स एक्सेप्ट कर लिया था। फिजिकल परीक्षा पास कर ली थी। मोदी सरकार ने अग्निवीर योजना लागू की और 1.50 युवाओं को उन्होंने आर्मी में नहीं आने दिया। राहुल गांधी इनमें से कुछ युवा मिले। वो रो रहे थे। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इससे देश का फायदा नहीं होने वाला है। राहुल गांधी ने एक बार फिर कहा कि केंद्र सरकर कुछ चुने हुए लोगों को देश का धन दे रही है।

राहुल गांधी नागपुर की रैली में एक बार फिर भागीदारी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा सरकार से लेकर देश की शीर्ष 100 से 200 कंपनियों में ओबीसी, दलित और आदिवासियों की उपस्थिति नगण्य है। राहुल गांधी ने कहा कि मैं जब जाति जनगणना की मांग उठाई तो पीएम मोदी ने अपना भाषण बदल दिया। वे अब कहते हैं कि सिर्फ एक जाति है गरीब। राहुल गांधी ने कहा कि दिल्ली में जैसे ही सरकार आएगी हम जाति जनगणना कराएंगे। इसे करके दिखा देंगे। राहुल गांधी ने कहा कि मैं फिर से कहता हूं कि यह विचारधारा की लड़ाई है। राहुल गांधी ने कहा कि हमें दो हिंदुस्तान नहीं चाहिए। हमें एक ही हिंदुस्तान चाहिए। एक हिन्दुस्तान सपने का है। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। हिंदुस्तान के युवाओं को रोजगार की जरूरत है। राहुल गांधी ने कहा कि यह काम सिर्फ I.N.D.I.A अलायंस कर सकता है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नागपुर की धरती नमन किया है। उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर और महात्मा गांधी को याद किया। इसके बाद उन्होंने कहा कि आरएसएस का जन्म भी नागपुर से हुआ। उन्होंने कहा कि अंबेडकर और गांधी की भूमि है। खरगे ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस ने पिछले 10 सालों में तंग करके रख दिया है। खरगे ने कहा देश का संविधान भी खत्म हो जाएगा। खरगे ने कहा जिस देश में वोटिंग का अधिकार नहीं था। वह अधिकार संविधान से मिला। खरगे ने बाकी लोग अपनी संपत्ति को बचाने और बढ़ाने में लगे हैं। खरगे ने कहा कि जब हम अंग्रेजों से नहीं डरे तो बीजेपी और आरएसएस से क्या डरेंगे? उन्होंने कहा कि हम पीएम मोदी से नहीं डरेंगे। खरगे ने पूछा कि क्या देश के आजादी 2014 में मिली है? खरगे के कहा देश को आजादी मिलने के बाद गद्दी पर बैठे हैं। खरगे ने रैली में कुछ देर मराठी में संबाेधन दिया।

क्या नए साल में कोरोंना का करना पड़ सकता है सामना?

नए साल के मौके में कोरोंना का सामना करना पड़ सकता है! कोरोना वायरस के नये ओमिक्रॉन सब-वैरिएंट जेएन1 के मामले भारत समेत विश्व स्तर पर बढ़ रहे हैं। इसलिए कई लोगों के बीच 2024 की शुरुआत में संभावित कोविड लहर का डर है जो एक बार फिर जिंदगी को पटरी से उतार सकता है। भारत में शनिवार को कोविड-19 के 743 नये मामले दर्ज किए गए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इसी के साथ देश में कुल एक्टिव मरीजों की संख्या बढ़कर 3,997 हो गई। भारत में अब तक जेएन1 के कुल 178 मामले सामने आए हैं। जिसमें केरल में सबसे अधिक 83 मामले दर्ज किए गए हैं। इसी के साथ जनवरी 2020 से अब तक भारत में कोरोना वायरस के मामलों की कुल संख्या 4,50,12,484 हो गई है। जबकि बीते 24 घंटे में 7 लोगों की मौत के बाद कुल मरने वालों संख्या 5,33,358 हो गई है। विश्व स्तर पर अमेरिका, कुछ यूरोपीय देश, सिंगापुर और चीन से जेएन1 के मामले सामने आए हैं। डब्ल्यूएचओ में कोविड-19 तकनीकी प्रमुख मारिया वैन केरखोव ने शनिवार को कहा, ”सीमित संख्या में रिपोर्ट करने वाले देशों से, पिछले महीने में कोविड-19 अस्पताल में भर्ती होने और आईसीयू में मरीजों के प्रवेश में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने आगे कहा कि सीएआरएस-सीओवी-2, इन्फ्लूएंजा और अन्य श्वसन रोगी लगातार बढ़ रहे हैं। खुद को संक्रमण से बचाने के उपाय करने चाहिए। मारिया वैन केरखोव ने कहा कि जेएन1 की पहचान में बढ़ोतरी जारी है। लेकिन जो बात मायने रखती है वह यह है कि कोविड-19 के मामले सभी देशों में बढ़ रहे हैं।

उन्होंने अपने एक्स अकाउंट से पोस्ट किया कि आप खुद को संक्रमण और गंभीर बीमारी से बचा सकते हैं। जोखिम के आधार पर हर 6-12 महीनों में मास्क, वेंटिलेट, टेस्ट, इलाज, वैक्सीन की डोज को बढ़ावा दें। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद आईसीएमआर की पूर्व महानिदेशक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन के अनुसार, जेएन1 कोविड-19 वैरिएंट अन्य वैरिएंट की तुलना में अधिक संक्रामक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ ने जेएन1 को इसके तेजी से बढ़ते प्रसार को देखते हुए एक अलग रूप में बांटा है। लेकिन कहा है कि यह कम वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है। मुंबई में संक्रामक रोग यूनिसन मेडिकेयर एंड रिसर्च सेंटर के सलाहकार डॉ. ईश्वर गिलाडा के अनुसार, जब तक जेएन1 ‘चिंता का विषय’ नहीं बन जाता। तब तक इससे आम आदमी को परेशान नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत ने कई शक्तिशाली देशों की तुलना में कोविड-19 महामारी का बेहतर प्रबंधन किया है। भारत में कोविड-19 के खिलाफ सबसे ज्यादा वैक्सीनेशन किया गया है। जिसमें 75 प्रतिशत आबादी को पूरी तरह से वैक्सीन की डोज दी है और 35 प्रतिशत आबादी को बूस्टर तीसरी डोज मिली है। ओमिक्रॉन वैरिएंट द्वारा मुख्य रूप से बीए.2 सब-वैरिएंट के साथ संचालित तीसरी लहर ने अधिकांश आबादी को कम से कम रुग्णता और मृत्यु दर से संक्रमित किया। उन्होंने आगे कहा कि वास्तव में बीए.2, बीए.4 और बीए.5 के साथ-साथ बीए.2.86 पिरोला जैसे बीए.2 के वंश के संक्रमण से भारत के लिए एक रक्षक था। अब हम पहले से कहीं अधिक बेहतर तैयार हैं। इतना ही नहीं, भारत अफ्रीका और अन्य जगहों पर 50 से अधिक देशों को तैयारियों, दवाओं और टीकों से सहायता प्रदान करता है। हालांकि, जेएन1 अगस्त 2023 में लक्ज़मबर्ग में पहचाना गया। यह वर्तमान में 40 से अधिक देशों में मौजूद है और इससे अधिक संख्या में लोग संक्रमित नहीं हुए हैं और न ही मरीजों की मौत हुई है।

जेएन1 की मौजूदगी से ऑक्सीजन, बेड, आईसीयू बेड या वेंटिलेटर की मांग नहीं बढ़ी है। विशेषज्ञ वरिष्ठ नागरिकों और गंभीर मरीजों वाले लोगों के साथ-साथ भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने वाले लोगों से मास्क पहनने का अनुरोध करते हैं।सीएआरएस-सीओवी-2, इन्फ्लूएंजा और अन्य श्वसन रोगी लगातार बढ़ रहे हैं। खुद को संक्रमण से बचाने के उपाय करने चाहिए। मारिया वैन केरखोव ने कहा कि जेएन1 की पहचान में बढ़ोतरी जारी है। लेकिन जो बात मायने रखती है वह यह है कि कोविड-19 के मामले सभी देशों में बढ़ रहे हैं। प्राइमस सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विकास चोपड़ा ने बताया कि कुछ मरीजों को गंभीर परिणामों और कोविड से मृत्यु दर में वृद्धि का खतरा बढ़ जाता है। उच्च मृत्यु जोखिम से जुड़े सामान्य मरीजों में हृदय संबंधी रोग जैसे- हाई ब्लडप्रेशर, कोरोनरी धमनी रोग, पुरानी श्वसन स्थितियां जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज सीओपीडी, मधुमेह, मोटापा और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली शामिल हैं।

क्या ममता बनर्जी विपक्ष के INDIA को दिखाएगी ठेंगा?

ममता बनर्जी विपक्ष के INDIA को ठेंगा दिखा सकती है! लोकसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को तगड़ा झटका दिया है। ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि 2024 में टीएमसी बंगाल में किसी पार्टी से चुनावी समझौता नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन पूरे देश में भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ेगा, मगर बंगाल में टीएमसी अकेले बीजेपी के खिलाफ लड़ेगी। वह कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के साथ समझौता नहीं करेगी। ममता बनर्जी के इस तेवर से इंडिया ब्लॉक में घमासान होना तय है। दूसरी ओर, शिवसेना उद्धव गुट ने महाराष्ट्र में सीट बंटवारे को लेकर पहली चाल दी है। पार्टी के नेता संजय राउत ने कांग्रेस को बता दिया है कि वह महाराष्ट्र की 23 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसा ही पेच पंजाब और दिल्ली में फंस रहा है, जहां आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग के लिए राजी नहीं है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सपा के साथ किए गए व्यवहार को बदला चुकाने को तैयार बैठे हैं। जब राहुल गांधी नागपुर में कांग्रेस की रैली को संबोधित कर रहे थे, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी उत्तर 24 परगना जिले के चकला में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद रैली में बोल रही थीं। रैसीट शेयरिंग पर चर्चा भी अधर में लटक गई। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस ने गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों का मूड भांपते हुए एकला चलो रे का रास्ता अपना लिया। राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन से अलग महाराष्ट्र के नागपुर से अपने प्रचार अभियान की शुरुआत कर दी, जहां एनसीपी और शिवसेना गठबंधन की पार्टनर है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सपा के साथ किए गए व्यवहार को बदला चुकाने को तैयार बैठे हैं।ली में ममता बनर्जी ने साफ तौर से ऐलान किया कि बीजेपी के खिलाफ इंडिया ब्लॉक पूरे देश में चुनाव लड़ेगा, मगर पश्चिम बंगाल में टीएमसी कांग्रेस या लेफ्ट पार्टियों से समझौता नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी अकेले बीजेपी का मुकाबला करेगी। इस रैली में ममता बनर्जी ने कांग्रेस और सीपीआई M पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप भी मढ़ दिया। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन में आने के बाद भी कांग्रेस और सीपीआई M के नेता बंगाल में टीएमसी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। अपने भाषण में ममता बनर्जी ने बीजेपी पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सीएए के तहत अगर एक समुदाय को नागरिकता मिल रही है तो दूसरे समुदाय को भी हक मिलना चाहिए। बता दें कि अमित शाह ने कोलकाता में घोषणा की थी कि सीएए देश का कानून है और बीजेपी इसे लागू करेगी।

पिछले दिनों दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक में नीतीश कुमार के भारत वाले बयान और अंग्रेजी को लेकर नाराजगी की खासी चर्चा हुई। चौथी मीटिंग में सभी दलों के बीच सीट शेयरिंग पर चर्चा भी अधर में लटक गई। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस ने गैर कांग्रेसी विपक्षी दलों का मूड भांपते हुए एकला चलो रे का रास्ता अपना लिया। राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन से अलग महाराष्ट्र के नागपुर से अपने प्रचार अभियान की शुरुआत कर दी, जहां एनसीपी और शिवसेना गठबंधन की पार्टनर है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सपा के साथ किए गए व्यवहार को बदला चुकाने को तैयार बैठे हैं।

जब राहुल गांधी नागपुर में कांग्रेस की रैली को संबोधित कर रहे थे, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी उत्तर 24 परगना जिले के चकला में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद रैली में बोल रही थीं। रैली में ममता बनर्जी ने साफ तौर से ऐलान किया कि बीजेपी के खिलाफ इंडिया ब्लॉक पूरे देश में चुनाव लड़ेगा, मगर पश्चिम बंगाल में टीएमसी कांग्रेस या लेफ्ट पार्टियों से समझौता नहीं करेगी।नागपुर में कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री कैंडिडेट घोषित कर दिया। इस रैली में ममता बनर्जी ने कांग्रेस और सीपीआई M पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप भी मढ़ दिया। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन में आने के बाद भी कांग्रेस और सीपीआई M के नेता बंगाल में टीएमसी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। अपने भाषण में ममता बनर्जी ने बीजेपी पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया।इसके बाद शिवसेना सांसद संजय राउत ने खुले तौर पर महाराष्ट्र की 23 लोकसभा सीटों पर दावा ठोंक दिया। महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं। यहां कांग्रेस, शिवसेना यूटीबी और एनसीपी शरद गुट के बीच सीटों का समझौता होना है। एनसीपी के महाराष्ट्र में चार सांसद हैं।

क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन में पड़ सकती है दरार?

विपक्ष के INDIA गठबंधन में अब दरार पड़ सकती है! तीन महीने बाद एक बार फिर दिल्ली के अशोका होटल में I.N.D.I.A. गठबंधन के नेताओं का जमावड़ा लगा है। 28 दलों के नेता सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर चर्चा करेंगे। तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस बैकफुट पर नजर आ रही है। बैठक से पहले इंडिया के पार्टनर जेडी यू ने नेतृत्व का सवाल उठाया है तो शिवसेना ने अपने अखबार सामना में विधानसभा चुनाव में अन्य दलों को सीट नहीं देने के लिए कांग्रेस की आलोचना की है। आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को सीट देने के मूड में नहीं हैं। ममता बनर्जी ने भी कांग्रेस को याद दिला दिया है कि सीटों के बंटवारे पर चर्चा करते समय बंगाल में अपनी हैसियत को नहीं भूलें। कांग्रेस की मुसीबत यह है कि देश के जिन राज्यों में वह अकेले दम पर चुनावी दम दिखा सकती है, वहां उसने सहयोगियों को भाव नहीं दिया है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में उसने किसी पार्टी के साथ समझौता नहीं किया। अब इंडिया की बैठक कांग्रेस को सहयोगियों के किले में अपने लिए लोकसभा सीटों के लिए मोलतोल करना है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ 52 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने पंजाब में 8, तमिलनाडु में 8 और केरल में 15 सीटें जीती थीं। तेलंगाना और असम में पार्टी को 3-3 सीटें मिली थीं। इसके बाद वह अन्य राज्यों में एक या दो सीट जीतने में ही सफल रही। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और आंध्रप्रदेश में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सिर्फ एक-एक सीट ही मिली थी। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दो सीटें मिली थी, जिसके बार में इंडिया की बैठक से पहले ममता बनर्जी ने चर्चा की। फिर सीटों के बंटवारे के लिए फार्मूला क्या होगा? सबसे बड़ा सवाल है कि मोदी लहर में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के क्षत्रप कांग्रेस को कितनी सीट देंगे। कांग्रेस 370 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि सहयोगियों को 173 सीटों पर समर्थन देगी। 373 सीटों के दावे को मान लें तो कांग्रेस कर्नाटक, असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में सीट बांटने के मूड में नहीं है। पार्टी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ना चाहती है।

पंजाब में लोकसभा की 13 और दिल्ली में 7 सीटें हैं। 2019 में कांग्रेस को 8 और आम आदमी पार्टी को दो सीटें मिली थीं। बीजेपी और अकाली दल के खाते में 2-2 सीटें आईं थीं। मगर विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दोनों राज्यों में कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया। 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 सीटों में से 62 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। आम आदमी पार्टी को 54.3 फीसदी और कांग्रेस को महज 9.7 फीसदी वोट मिले थे। 2022 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भारी जीत दर्ज की। 117 सदस्यों वाली विधानसभा में आप के 92 विधायक हैं। उसका वोट प्रतिशत 42.01 है। दूसरी ओर करारी हार के बाद कांग्रेस पंजाब में 18 सीटों पर सिमट गई। उसे 22.98 प्रतिशत वोट ही मिले थे। वोट शेयर के आधार पर इन दोनों राज्यों में आम आदमी का पलड़ा भारी है। इंडिया गठबंधन की बैठक में यह तय करना है कि अरविंद केजरीवाल दोनों राज्यों की कुल 20 में से कुल कितनी सीट कांग्रेस को देंगे। इस बार आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है। अगर सहमति नहीं बनी तो इन राज्यों में इंडिया को झटका लग सकता है।

विपक्षी गठबंधन इंडिया में पहली बार कलह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में सीट शेयरिंग नहीं करने के लिए कांग्रेस पर हमला बोला था। उत्तरप्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। बीजेपी को रोकने के लिए अखिलेश यादव ने सीट शेयरिंग में नरमी बरतने के संकेत दिए हैं, मगर यूपी में कांग्रेस की हालत पतली है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ सोनिया गांधी की सीट रायबरेली ही जीत सकी थी। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 2.33 ही रहा। इसके उलट समाजवादी पार्टी ने लोकसभा में पांच और विधानसभा में 111 सीटें जीती हैं। राज्य में 32.06 प्रतिशत वोट सपा के खाते में आई थीं। कांग्रेस 2009 के फार्मूले के आधार पर 21 लोकसभा सीट की मांग कर रही है।

बिहार में सीटों को लेकर भी बड़ा पेंच फंसा है। राज्य की कुल 40 लोकसभा सीटों में से 16 जेडी-यू के खाते में है। बाकी बची 24 सीटों में 17 पर राष्ट्रीय जनता दल की दावेदारी है। बिहार के महागठबंधन में सीपीआई भी है। उसने भी 6 सीटों की डिमांड की है। कांग्रेस के पास अभी राज्य से सिर्फ एक लोकसभा सांसद है। सूत्र बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस की किस्मत लालू यादव के हाथ में है। नीतीश कुमार की जेडी यू और लालू यादव की आरजेडी 16-16 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। बाकी बची 8 सीटों में से पांच कांग्रेस को मिल सकती है। लालू यादव और नीतीश कुमार इस फार्मूले के साथ दिल्ली पहुंचे हैं, जिसमें कांग्रेस नेताओं से इस पर चर्चा की जाएगी। हालांकि इससे पहले जेडी यू संयोजक के मुद्दे को साफ करना चाहती है।

बड़े राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन की अग्निपरीक्षा होगी। पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 22 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस पूरी तरह बंगाल से साफ हो गई। उसे सिर्फ 2.19 प्रतिशत वोट मिले थे। टीएमसी ने 215 सीटों के साथ 48 फीसदी वोट हासिल किए थे। हालांकि ममता बनर्जी ने संकेत दिए हैं कि वह सीट बंटवारे में उदारता बरतेंगी, मगर उन्होंने साफ किया है कि कांग्रेस पिछले चुनाव में सिर्फ दो सीटें ही जीत सकी है। दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस के लिए खास समस्या नहीं है। कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना में उसके पास कोई गठबंधन पार्टनर नहीं है। तमिलनाडु और केरल में सीट शेयरिंग का फार्मूला पहले से ही तय है। हिंदी भाषी राज्यों में सीट बंटवारे में उसे यह साफ करना होगा कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा में वह इंडिया के सहयोगी दलों को कितनी सीटें ऑफर करती हैं। अगर बात नहीं बनी तो यूपी और दिल्ली में गठबंधन का टूटना तय है।

क्या लोकसभा चुनाव का विपक्ष में फंसा है पेंच?

आने वाले लोकसभा चुनाव का विपक्ष में पेंच फंस चुका है! 2024 लोकसभा चुनाव में अब बस कुछ ही महीने शेष हैं। मोदी सरकार से मुकाबले के लिए विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. भी पूरा जोर लगा रहा है। सभी विपक्षी दल 4 बार मीटिंग कर चुके हैं। लेकिन अभी सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं बन पा रही है। दिल्ली के अशोका होटल में दिग्गज नेताओं की बैठक तो हुई लेकिन सीट शेयरिंग पर बात आकर फंस रही है। सीट शेयरिंग का मसला कांग्रेस के लिए ज्यादा मुश्किल लग रहा है। तीन राज्य ऐसे हैं जहां एक में कांग्रेस गठबंधन में है तो वहीं बाकी दो राज्यों में वह विपक्ष में है लेकिन मोदी सरकार को हराने के लिए एक मंच पर आई है। ये तीन राज्य हैं पंजाब, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल। पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने एलान किया है कि वो अकेले चुनाव लड़ेगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी तृणमूल कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने का इरादा जताया है। और महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) ने 23 सीटों की मांग की है, जिससे सीटों का बंटवारा और पेचीदा हो गया है। आइए, देखते हैं कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब में इंडिया ब्लॉक के साथी दल कांग्रेस की सीट बंटवारे की योजना को कैसे रोक रहे हैं। ममता बनर्जी ने आज ऐलान कर दिया कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस अकेले लड़ेगी। उन्होंने देश भर में ‘इंडिया ब्लॉक’ गठबंधन का हिस्सा बने रहने की बात ज़रूर कही है, मगर बंगाल में सीट का बंटवारा या कांग्रेस या वामपंथी मोर्चा से गठबंधन नहीं होगा। ममता ने ये साफ कर दिया कि बंगाल में सिर्फ तृणमूल ही भाजपा को हरा सकती है। बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस अकेले लड़ी थी और सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी, जबकि तृणमूल ने 22 सीटें जीती थीं। उस समय भी कई कांग्रेस नेताओं ने माकपा के साथ मिलकर लड़ने की मांग की थी, मगर पार्टी ने अकेले लड़ने का फैसला किया था। इस बार ममता का अकेले लड़ने का ऐलान बंगाल की राजनीति को नया दिशा दे सकता है।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने विपक्ष से 23 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग की है लेकिन कांग्रेस को ये मंजूर नहीं है। महाराष्ट्र में कांग्रेस, शरद पवार का एनसीपी गुट और उद्धव गुट वाली शिवसेना गठबंधन में है। शिवसेना यूबीटी ने लोकसभा सीटों का एक बड़ा हिस्सा मांगा है। पार्टी ने 23 सीटों की मांग की, लेकिन कांग्रेस ने इस मांग को खारिज कर दिया। वरिष्ठ महाराष्ट्र कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने मांग को अत्यधिक करार देते हुए कहा कि पार्टियों के बीच समझौता होना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘जबकि हर पार्टी ज्यादा सीटें चाहती है, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए शिवसेना की 23 सीटों की मांग अत्यधिक थी।’ ध्यान देने वाली बात यह है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और एनसीपी साथ लड़े थे। 48 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 1 सीट जीत पाई थी जबकि एनसीपी ने 4 सीटें जीती थीं। शिवसेना और बीजेपी ने भी 2019 का चुनाव साथ लड़ा था। बीजेपी ने 23 सीटें जीतीं और शिवसेना ने 18 सीटें जीत के रूप में मिली थीं।

पंजाब कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी आलाकमान को साफ बता दिया है कि वो 2024 के लोकसभा चुनावों में अकेले लड़ना चाहते हैं। 26 दिसंबर को हुई एक अहम बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं और पंजाब के दिग्गजों के बीच यही राय सामने आई। बैठक में सीटों के बंटवारे पर मंथन हुआ, जिसमें कांग्रेस के 30 से ज्यादा नेता मौजूद थे। बैठक के बाद विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि आलाकमान ने उन्हें सुन लिया है और पार्टी के हितों का ख्याल रखा जाएगा! 

उधर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 17 दिसंबर को पंजाब के बठिंडा में एक रैली की थी। केजरीवाल ने लोगों से पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को वोट देने की अपील की थी, जिससे ये संकेत मिले कि भारत गठबंधन में सहयोगी कांग्रेस के साथ सीट-बंटवारा होने की उम्मीद कम है। और सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी, जबकि तृणमूल ने 22 सीटें जीती थीं। उस समय भी कई कांग्रेस नेताओं ने माकपा के साथ मिलकर लड़ने की मांग की थी, मगर पार्टी ने अकेले लड़ने का फैसला किया था। इस बार ममता का अकेले लड़ने का ऐलान बंगाल की राजनीति को नया दिशा दे सकता है।तो अब देखना ये है कि कांग्रेस पंजाब में क्या रणनीति बनाती है और आम आदमी पार्टी अकेले लड़कर क्या कमाल दिखाती है। बता दें कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी का किसी से गठबंधन नहीं है। वह सिर्फ इंडी गठबंधन का हिस्सा है।

क्या 2024 में रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल कर पाएगी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी 2024 में रिकॉर्ड तोड़ जीत हासिल कर पाएगी या नहीं! अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में बड़ा सवाल यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी वापस आएंगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह धमाकेदार वापसी करेंगे। बीजेपी लोकसभा की 272 से अधिक जीतेगी या उससे कम। 272 से कम सीट आने की स्थिति में उसे अगले पांच वर्षों तक केंद्र में शासन करने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता हो सकती है। चुनाव परिणाम से ही यह तय होगा कि क्या बीजेपी 1991 के बाद नरसिम्हा राव की तरह शासन कर पाएंगी या 2014-24 की तर्ज पर मोदी की तरह। इंडिया गठबंधन का मानना है कि यदि वह 400-450 सीटों पर बीजेपी के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ें तो तस्वीर बदल सकती है। इंडिया गठबंधन में कांग्रेस और अलग-अलग क्षेत्रीय सहयोगी साथ आए हैं। विपक्षी गठबंधन का मानना है कि वन टू वन की लड़ाई में उनके पास मोदी को पद से हटाने का मौका है। वे वही करने की उम्मीद कर रही है जो उन्होंने 2004 में किया था। उस समय हर कोई सोचता था कि वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी फिर सत्ता में आएगी लेकिन वह हार गई। हालांकि, मोदी वाजपेयी नहीं हैं, और 2024, 2004 नहीं है। 2004 के विपरीत, अब बीजेपी, सबसे अच्छी स्थिति में है। तब बीजेपी 180 सीटों जीतने वाली पार्टी थी। उसे हमेशा सहयोगियों की आवश्यकता होती थी। अब मोदी की बीजेपी बहुत मजबूत है। उसने हिंदीभाषी राज्यों में अपनी जड़े बहुत गहरी जमा ली हैं। पार्टी न केवल संगठनात्मक रूप से बढ़ी है, बल्कि गरीब-समर्थक योजनाओं, विशेषकर महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं की गहरी पैठ के कारण लोकप्रियता के मामले में भी बढ़ी है। यह बीजेपी को निचले स्तर पर 220-240 से अधिक सीटों वाली राष्ट्रीय पार्टी बनाता है, न कि 180 सीटों वाली। यह याद रखने योग्य है कि 2019 में, अधिकांश प्रमुख राज्यों सहित 16 राज्यों ने बीजेपी को 50% से अधिक लोकप्रिय वोट दिए थे। कुछ ने इसे 60% से भी अधिक वोट दिया था। इसमें गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश भी शामिल हैं। 50% से अधिक वाले लोगों में यूपी, दिल्ली, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सहयोगियों के साथ अंतिम दो राज्य थे। इसके अलावा झारखंड, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे मध्यम आकार के राज्य और त्रिपुरा, गोवा और अरुणाचल जैसे छोटे राज्य भी शामिल थे।

2019 और 2024 के बीच जो बदलाव आया है वह यह है कि कम से कम दो प्रमुख राज्य, महाराष्ट्र और बिहार, युद्ध के मैदान बन गए हैं। यहां सहयोगियों के साथ भी बीजेपी की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर है। इसके अलावा, तीन अन्य राज्यों, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तेलंगाना में, भाजपा पहले की तुलना में थोड़ी कमजोर दिख रही है। हालांकि कर्नाटक में बीजेपी अभी भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। अगर हम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार श्रेणियों में विभाजित करते हैं। वो कैटेगरी जिसमें बीजेपी को 75 से 100 प्रतिशत सीट मिल सकती है। वे कैटेगरी जहां उन्हें 50% से अधिक हिस्सेदारी मिल सकती है। इसके अलावा वे हैं जहां वो 20-25% सीट जीत सकती है। इसके अलावा वे प्रदेश जहां बीजेपी को कुछ भी नहीं मिल सकता है या बस एक या दो सीट जरूर मिल सकती है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड बीजेपी के लिए अधिक सीटें देने वाले राज्य रहे हैं। 2019 में बीजेपी ने इन राज्यों की कुल 239 में से 214 सीटें जीती थीं। बीजेपी यहां इस बार भी 200-207 के आसपास जीत सकती है। अगली श्रेणी के राज्यों, महाराष्ट्र, बिहार और असम हैं। यहां बीजेपी ने 102 सीटों में से 89 सीटें जीती थीं। इस बार यह संख्या 59 या उससे नीचे तक गिर सकती है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और गोवा के लिए कम सीट वाले राज्य हैं। यहां बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 2019 में 88 में से 34 सीटें जीतीं। इस बार यह संख्या गिरकर 32-28 हो सकती है।

विपक्ष के पास एक नेता, मोदी-विरोधी बयानबाजी से परे एक स्पष्ट आख्यान और अपने आंतरिक हितों के टकराव को दूर करने के लिए एक गेमप्लान की कमी है। किसी को आश्चर्य होता है कि द्रमुक को समय-समय पर हिंदी भाषियों या सनातन धर्म को क्यों चुनना पड़ता है, यह अच्छी तरह से जानते हुए कि इससे उसके सहयोगियों को मदद नहीं मिलती है। हाल ही में भारत की बैठक में नीतीश कुमार को हिंदी बोलने को मुद्दा क्यों बनाना चाहिए, जबकि तमिलनाडु में यह अच्छा नहीं हो रहा है। चुनाव जीतने के बाद आम आदमी पार्टी या वामपंथी या तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस के समान स्तर पर बने देखना भी मुश्किल है। इससे पता चलता है कि ज्यादातर सट्टेबाज मोदी के नेतृत्व में भाजपा की वापसी के अलावा किसी नतीजे की उम्मीद क्यों नहीं कर रहे हैं। लेकिन हाल ही में भाजपा और विपक्ष के बीच तीव्र कटुता को देखते हुए सुरक्षा उल्लंघन और विपक्षी सांसदों के निलंबन पर संसद में हंगामे पर विचार करें, और साथ ही मई 2024 के बाद की चुनौतियां जो जनगणना, महिला आरक्षण को लागू करने के मामले में सामने हैं। निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद, मोदी को खुद को एक अधिक सर्वसम्मत नेता के रूप में फिर से स्थापित करना होगा। 2019-24 में भी, मोदी का बहुमत कृषि सुधार नहीं कर सका या नागरिकता संशोधन अधिनियम लागू नहीं कर सका। हालांकि अनुच्छेद 370 को सफलतापूर्वक हटा दिया गया।

जानिए असम के उल्फा के इतिहास के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको असम के उल्फा के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं! असम का जिक्र हो और उल्फा का नाम ना लिया जाए ऐसा संभव नहीं है। यूनाइटेट लिब्रेरशन फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फा ऐसा शब्द है जो पूर्वोत्तर हिंसा का पर्याय बना रहा है। इस अलगवादी संगठन का अपना ही काला इतिहास है। इसका गठन अप्रैल 1979 में बांग्लादेश तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए बिना दस्तावेज वाले अप्रवासियों के खिलाफ आंदोलन के बाद हुआ था। फरवरी 2011 में यह दो समूहों में विभाजित हो गया। अरबिंद राजखोवा के नेतृत्व वाले गुट ने हिंसा छोड़ दी। इसके साथ ही वे सरकार के साथ बिना शर्त बातचीत के लिए सहमत हो गए। दूसरे पुनर्ब्रांडेड उल्फा-स्वतंत्र गुट का नेतृत्व करने वाले परेश बरुआ बातचीत के खिलाफ हैं। 1990 में उल्फा ने चाय कंपनी के मालिक सुरेंद्र पॉल की हत्या कर दी। सुरेंद्र पाल, ब्रिटेन स्थित लॉर्ड स्वराज पॉल के भाई थे। तिनसुकिया जिले में उनकी हत्या एक कुख्यात मील का पत्थर थी। इसके कारण केंद्र ने उल्फा को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। केंद्र की तत्कालीन सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। उस समय उल्फा के खिलाफ सेना का ऑपरेशन बजरंग शुरू किया गया था। 1 जुलाई 1991 को उल्फा ने राज्य के विभिन्न हिस्सों से तत्कालीन यूएसएसआर के एक इंजीनियर सहित 14 लोगों का अपहरण कर लिया था। यह सेना के ऑपरेशन राइनो की शुरुआत का ट्रिगर था। अपहृत रूसी इंजीनियर सर्गेई ग्रेटचेंको का शव कभी नहीं मिला।

छह साल बाद, सामाजिक कार्यकर्ता संजय घोष का माजुली से अपहरण कर लिया गया और मान लिया गया कि उनकी हत्या कर दी गई। उसका शव भी नहीं मिला। उल्फा के सशस्त्र विद्रोह का सबसे चौंकाने वाला क्षण 2004 के स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान धेमाजी परेड मैदान में एक आईईडी विस्फोट में 13 स्कूली बच्चों की हत्या थी। वार्ता समर्थक गुट की तरफ से 2011 में बातचीत शुरू करने की इच्छा व्यक्त करने के बाद, संगठन ने इन हत्याओं के लिए माफी मांगी। जून, 1979: सदस्यों ने संगठन के नाम, प्रतीक, ध्वज और संविधान पर चर्चा करने के लिए मोरन में बैठक की। 1980: कांग्रेस के राजनीतिज्ञों, राज्य के बाहर के व्यापारिक घरानों, चाय बागानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, विशेषकर तेल और गैस क्षेत्र को निशाना बनाकर अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की। 1985-1990: प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व वाली असम गण परिषद अगप सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान असम में अशांति की स्थिति पैदा हो गई और उल्फा ने रूसी इंजीनियर सर्गेई को अगवा किये जाने सहित जबरन वसूली और हत्याओं की कई घटनाओं को अंजाम दिया।

28 नवंबर, 1990: उल्फा के खिलाफ सेना द्वारा ऑपरेशन ‘बजरंग’ शुरू किया गया। इस अभियान का नेतृत्व जीओसी 4 कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने किया, जो बाद में असम के राज्यपाल बने। 29 नवंबर, 1990: महंत के नेतृत्व वाली अगप सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया। नवंबर 1990: असम को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया और सशस्त्र बल विशेष शक्तियां कानून लागू किया गया। उल्फा को अलगाववादी और गैर-कानूनी संगठन घोषित किया गया।

31 जनवरी, 1991: ऑपरेशन ‘बजरंग’ बंद किया गया। जनवरी, 1991: तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने राज्यसभा को सूचित किया कि यदि उल्फा राजनीतिक वार्ता की इच्छा व्यक्त करता है तो केंद्र सरकार आवश्यक कदम उठाएगी।

उल्फा ने जवाब दिया कि जब तक सैन्य अभियान और राष्ट्रपति शासन जारी रहेगा, कोई बातचीत संभव नहीं है और असम की ‘संप्रभुता’ की उनकी मांग पर कोई समझौता नहीं होगा। जून, 1991: हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभाली। सितंबर, 1991: उल्फा के खिलाफ ऑपरेशन ‘राइनो’ शुरू किया गया। मार्च 1992: उल्फा दो गुटों में विभाजित हो गया और एक वर्ग ने आत्मसमर्पण कर दिया और खुद को आत्मसमर्पित उल्फा सल्फा के रूप में संगठित किया। 1996: अगप सत्ता में लौटी और प्रफुल्ल कुमार महंत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। जनवरी 1997: उल्फा के खिलाफ समन्वित रणनीति और संचालन के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सेना, राज्य पुलिस और अर्धसैन्य बलों से युक्त एकीकृत कमान का गठन किया गया। 1997-2000: कथित तौर पर सल्फा द्वारा उल्फा उग्रवादियों के परिवार के सदस्यों की हत्याएं की गई। 2001: तरूण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। दिसंबर 2003: पड़ोसी देश में उल्फा और अन्य पूर्वोत्तर उग्रवादियों के शिविरों को बंद करने के लिए रॉयल भूटान सेना द्वारा ‘ऑपरेशन ऑल क्लियर’ शुरू किया गया। 2004: उल्फा सरकार से बातचीत के लिए राजी हुआ। सितंबर 2005: उल्फा ने 11-सदस्यीय ‘पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप’ पीसीजी का गठन किया। प्रख्यात ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखिका इंदिरा मामोनी रायसोम गोस्वामी के नेतृत्व में केंद्र के साथ तीन दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई प्रगति नहीं हो पाई। जून, 2008: उल्फा की 28वीं बटालियन के नेताओं ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की। दिसंबर, 2009: अरबिंद राजखोवा सहित उल्फा के शीर्ष नेताओं को बांग्लादेश में गिरफ्तार किया गया, भारत निर्वासित किया गया और गुवाहाटी की जेल में बंद कर दिया गया। दिसंबर 2010: जेल में बंद उल्फा नेता ने सरकार से बातचीत का आग्रह करने के लिए ‘सिटीजन फोरम’ बनाया, जिसमें बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों और पेशेवरों को शामिल किया गया। 2011: राजखोवा और जेल में बंद अन्य नेता रिहा। उल्फा दो गुटों में विभाजित हो गया: राजखोवा के नेतृत्व वाला उल्फा समर्थक वार्ता और परेश बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा स्वतंत्र। उल्फा ने सरकार को 12-सूत्रीय मांगपत्र सौंपा।