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क्या आने वाले समय में सभी से लड़ने वाला है चीन?

चीन अब आने वाले समय में सभी देशों से लड़ने वाला है! चीन की सेना इन दिनों ताइवान को चौतरफा घेरकर सैन्‍य अभ्‍यास के नाम पर बारूद बरसा रही है। चीन की कोशिश है कि ताइवान के नए राष्‍ट्रपत‍ि के डराया जाए जिन्‍होंने हाल ही में कमान संभाली है। वहीं ताइवानी राष्‍ट्रपत‍ि ने भी अपने इरादे साफ कर दिए हैं और ड्रैगन के आगे झुकने से इंकार कर दिया है। ताइवान की सेना ने भी मिसाइलों से लेकर फाइटर जेट तक की तैनाती करके चीन को कड़ा संदेश दिया है। चीन ने पिछले दो दशक में भारत से लेकर दक्षिण चीन सागर तक विभिन्‍न क्षेत्रों में अप्रत्‍याशित तरीके से आक्रामक दावे करने शुरू कर दिए हैं जिससे तनाव भड़कने लगा है। दुनिया की फैक्‍ट्री बन चुके चीन ने खरबों डॉलर खर्च करके अपनी सेना को हाइपरसोनिक मिसाइलों से लेकर पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट से लैस किया है। ड्रैगन का इरादा दुनिया के 6 देशों से युद्ध लड़ने का है। दरअसल, चीन अपने एक ‘सपने’ को पूरे करने की अभियान में है और इसका साल 1840-42 तक लड़े गए अफीम युद्ध से गहरा कनेक्‍शन है।  अपने सपने को पूरा करने के लिए चीन के पूर्व राष्‍ट्रपति हू जिंताओं ने देश की अर्थव्‍यवस्‍था के साथ साथ अपनी सेना को मजबूत करना शुरू किया। साल 2012 में सत्‍ता में आए वर्तमान राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग ने इस ‘चीनी सपने’ को पूरी तरह से शक्‍ल दिया और अपने देश के खो चुके ऐतिहासिक गौरव को लौटाने का प्रण किया। खुद चीन की सरकारी न्‍यूज एजेंसी चाइना न्‍यूज सर्विस ने साल 2013 में अपने एक लेख में खुलासा किया था कि अगले 50 साल में चीन को 6 युद्ध लड़ने होंगे। चाइना न्‍यूज सर्विस का इशारा चीन के उन इलाकों को वापस हासिल करने की ओर था जिसे उसने साल 1840-42 के अफीम युद्ध के दौरान खो दिया था। इससे चीन की काफी बेइज्‍जती हुई थी। अब आर्थिक और सैन्‍य महाशक्ति बन चुका चीन इन इलाकों को वापस लेना चाहता है। इस लेख के मुताबिक चीन का इरादा इन देशों के साथ युद्ध लड़ने का है!

चीन का इरादा साल 2025 तक ताइवान का मुख्‍य भूमि से एकीकरण करने का है। वहीं अमेरिकी विश्‍लेषक इस तिथि को साल 2027 तक भी देते हैं। ताइवान में नए राष्‍ट्रपति के आने के बाद चीनी सेना ने बहुत बड़े पैमाने पर सैन्‍य ड्रिल शुरू की है। विश्‍लेषकों का कहना है कि यह ताइवानी राष्‍ट्रपति को डराने की कोशिश है जो खुलकर चीन का विरोध कर रहे हैं। चीन की पहले कोशिश थी कि शांतिपूर्ण तरीके से एकीकरण हो जाए लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिख रहा है। ताइवान की रणनीति है कि अमेरिका की मदद से यथास्थिति को बहाल रखा जाए। वहीं चीन अमेरिका से लेकर ताइवान तक को आंखें दिखा रहा है और बड़े पैमाने पर हथियार बना रहा है।

साल 1914 में ब्रिटिश सरकार और चीन के बीच बातचीत के बाद श‍िमला समझौते के तहत मैकमोहन लाइन बनी थी। यह भारत और चीन के बीच एक कानूनी सीमा है। इस संधि से तिब्‍बत दो भागों में बंट गया ‘इनर’ और ‘ आउटर’ तिब्‍बत। चीन के विरोध के बाद भी यह साल 1962 के युद्ध तक भारत और चीन के बीच सीमा रखा बनी रही। इस युद्ध के बाद नॉर्थ ईस्‍ट फ्रंटियर एजेंसी को अरुणाचल प्रदेश नाम दिया गया। इसको लेकर भारत और चीन के बीच विवाद बना हुआ है। चीन का इरादा है कि वह साल 2035 से 2040 तक ताकत के बल पर भारत से अरुणाचल प्रदेश को छीन ले। चीन इसे दक्षिण तिब्‍बत कहता है और हाल ही में इसके कई इलाकों के चीनी नाम रख दिए हैं।

चीन की रणनीति है कि वह इसके लिए चीन अपने गुलाम बन चुके पाकिस्‍तान की मदद लेगा। भारतीय राज्‍यों में मतभेद पैदा करेगा और पाकिस्‍तान को कश्‍मीर पर कब्‍जे में सहयोग करेगा। इसके बाद चीन अरुणाचल प्रदेश में बड़ा हमला बोलेगा और उस पर कब्‍जा कर लेगा। चीनी विश्‍लेषकों का कहना है कि इससे चीन अपनी ताकत का प्रदर्शन करेगा और अमेरिका, यूरोप तथा रूस के खिलाफ अपने स्‍टेटस को और मजबूत करेगा। चीन के इसी खतरे को देखते हुए भारत लगातार अरुणाचल प्रदेश और पूरे पूर्वोत्‍तर में सैन्‍य पकड़ मजबूत कर रहा है। यही नहीं भारत बांग्‍लादेश के साथ भी अपने रिश्‍ते को मजबूत कर रहा है ताकि चीनी आक्रामकता का करारा जवाब दिया जा सके।

रूस चीन का भविष्‍य में निशाना हो सकता है। चीन और रूस इन दिनों यूक्रेन युद्ध के बीच जमकर एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। चीन को उम्‍मीद है कि जब वह ताइवान का एकीकरण करेगा तब रूस उसे समर्थन देगा। इससे पहले शीत युद्ध के समय सोवियत संघ और चीन के बीच रिश्‍ते काफी तनावपूर्ण हो गए थे। चीनी विश्‍लेषकों का मानना है कि रूस ने उसके 16 लाख वर्ग किमी इलाके पर कब्‍जा कर रखा है। यह जमीन किंग राजवंश के समय से ही ऐतिहासिक रूप से चीन की थी। चीनी विश्‍लेषक का कहना है कि साल 2045 तक रूस की ताकत में बहुत ज्‍यादा गिरावट आ जाएगी। ऐसे में चीन के पास मौका होगा कि वह अपनी जमीन को वापस ले सके। चीनी विश्‍लेषक ने तो भीषण परमाणु हमला करने की भी सलाह दी है।

क्या चीन का ही विरोध करेगी चीनी कंपनियां?

वर्तमान में चीनी कंपनियां चीन का ही विरोध कर रही है! गलवान हिंसा के बाद भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव अपने चरम पर है। भारत और चीन दोनों ने लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक 50-50 हजार से ज्‍यादा सैनिक तैनात हैं। चीन ने भारतीय सीमा पर तोप से लेकर फाइटर जेट तक तैनात किए हैं। चीन की मिसाइलें भी भारत की ओर मुंह करके तैनात हैं। वहीं भारत ने भी चीन के किसी दुस्‍साहस का करारा जवाब देने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रखी है। इस तनावपूर्ण माहौल के बाद भी चीन की कंपनियां भारत का मोह छोड़ नहीं पा रही हैं। यही नहीं चीन की सरकार को डर लग रहा है कि भारत उसका विकल्‍प बन रहा है, इस आशंका के बाद भी चीनी कंपनियां भारत में न केवल बनी हुई हैं, बल्कि निवेश को बढ़ा रही हैं। विश्‍लेषकों का कहना है कि भारत का इतना बड़ा उभरता हुआ बाजार है जिसका विकल्‍प अब चीन के पास नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन को इस बात का डर सता रहा है कि चीनी कंपनियां भारतीय बाजार की खातिर तेजी से मेक इन इंडिया को अपना रही हैं। इससे चीनी कंपनियां भारत के चीन का स्‍थान लेने की मुह‍िम को ही आगे बढ़ा रही हैं। चीन दुनिया की फैक्‍ट्री कहा जाता है और अब पश्चिमी देशों की कंपनियां भारत की ओर रुख कर रही हैं। चीन और भारत के बीच साल 2020 में गलवान हिंसा के बाद से तनाव बना हुआ है। कई दौर की बातचीत के बाद भी सीमा विवाद अभी तक नहीं सुलझा है। इसका असर अब चीनी कंपनियों पर भी देखा जा रहा है। कई चीनी कंपनियों की जांच चल रही है।

इन सबके बाद भी चीनी कंपनियां भारत का मोह नहीं छोड़ पा रही हैं। भारत के एफडीआई पर सख्‍ती के बाद चीनी कंपनियां तीसरे देश के रास्‍ते भारत में निवेश कर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चीनी कंपनियों की भारत में बाढ़ आने के पीछे 3 प्रमुख कारण हैं। पहला- चीन के पास इस समय व‍िनिर्माण की क्षमता जरूरत से ज्‍यादा हो गई है। वहीं उसका घरेलू बाजार सिकुड़ रहा है। चीन के बाजार में प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ती जा रही है और कई कंपनियों के लिए अपना अस्तित्‍व बचाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में उनके पास केवल अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कूदने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं बचता है।

दूसरा- भारतीय बाजार का आकार इतना बड़ा हो गया है कि अब चीन की कंपनियों उसे अनदेखा नहीं कर पा रही हैं। चीनी कंपनियों के पास भारत जैसे बाजार का कोई विकल्‍प नहीं है। भारत का ऐसा तंत्र है कि यहां आना और यहां के बाजार से निकलना दोनों बहुत आसान है। तीसरा कारण यह है कि चीनी प्रॉडक्‍ट ऐसे हैं कि वे पश्चिमी देशों की बजाय भारतीय बाजार को सूट करते हैं। यही वजह है कि चीनी कंपनियों को लगता है कि उनके लिए भारतीय बाजार में ज्‍यादा अच्‍छा भविष्‍य है। चीनी विश्‍लेषकों का कहना है कि भारत के ‘लक्ष्‍य करके लगाए गए प्रतिबंध’ ने चीनी बिजनस को बहुत ज्‍यादा नुकसान पहुंचाया है। इससे बौखलाई चीनी सरकारी मीडिया ने भारत के खिलाफ अभियान चलाना शुरू कर दिया और भारत को ‘विदेशी निवेश का कब्रिस्‍तान’ बताना शुरू कर दिया है। चीनी मीडिया का कहना है कि भारत चीनी कंपनियों पर कब्‍जा कर रहा है या चीनी कंपनियों को राष्‍ट्रीयकरण कर रहा है। हालांकि चीन सरकार ने अभी इस पर कुछ नहीं कहा है। चीन ने भारत के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है। इसकी वजह यह है कि चीन को पता है कि वह अर्थव्‍यवस्‍था और व्‍यापार में भारत पर बढ़त रखता है। चीन आज भारत का सबसे बड़ा व्‍यापारिक साझीदार देश बन गया है।

चीन को यह पता है कि भारत के तमाम प्रतिबंधों के बाद भी भारतीय बाजार चीनी कंपनियों के विकास के लिए बहुत जरूरी है। इसके विपरीत चीन चाहता है कि भारत सीमा विवाद को द्विपक्षीय आर्थिक और व्‍यापार संबंधों से अलग रखे। चीन लगातार कह रहा है कि भारत साल 2020 के पहले के आर्थिक आदान प्रदान को फिर से बहाल करे। चीनी विश्‍लेषकों को लगता है कि भारत का मेक इन इंडिया मुहिम रंग ला रहा है और स्‍थानीयकरण बढ़ रहा है। यह ऊर्जा, वाहन, बैट्री, केमिकल और दवाओं में हो रहा है। भारत आज चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता देश है। चीन में इस बात का विरोध हो रहा है कि चीनी कंपनियां भारत में निवेश क्‍यों कर रही हैं।

आखिर कहां है दुनिया का सबसे बड़ा विमान कब्रिस्तान?

आज हम आपको बताएंगे कि दुनिया का सबसे बड़ा विमान कब्रिस्तान आखिर कहां है! आपने हवाई जहाज में सफर तो किया ही होगा। इसमें यात्रा करना काफी मजेदार होता है। पर क्‍या आप जानते हैं कि हवाई जहाज की भी शेल्‍फ लाइफ होती है। जिस तरह कार, बस, ऑटो, स्‍कूटर और ट्रेन कुछ समय में पुराने हो जाते हैं, उसी तरह एक समय आता है कि जब प्‍लेन एक्सपायर हो जाते हैं और फिर इन्‍हीं किसी खास जगह पर रखा जाता है। इस जगह को हवाई जहाज का कब्रिस्‍तान कहते हैं। वैसे तो आपने अब तक कब्रिस्‍तान में इंसान की बॉडी को दफन होते देखा होगा, लेकिन दुनिया में एक ऐसी जगह है जहां हजारों की संख्या में कबाड़ हो चुके विमानों को लाकर छोड़ दिया जाता है। फिर चाहे वह छोटे एयरलाइन के प्‍लेन हो या बड़ी एयरलाइन के। कई सालों से हवाई जहाज के यहां जमा होने से अब यह जगह हवाई जहाज का कब्रिस्‍तान बन चुकी है।

अमेरिका के एरिजोना के डेविस मोंथान एयरफोर्स बेस का दुनिया का सबसे बड़ा ग्रेवयार्ड माना जाता है। यह जगह “बोनयार्ड” के नाम से भी फेमस है।विमान को अमेरिकी नौसेना ने साल 2006 में अपने बेड़े से हटा दिया था। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद यहां खराब हवाई जहाजों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था। हालांकि, कुछ हवाई जहाजों का इस्‍तेमाल नासा में भी किया गया है। दिलचस्‍प बात तो यह है कि पहले यह जगह एक टूरिस्‍ट स्‍पॉट हुआ करती थी। लोग इस आश्‍चर्य को देखने आते थे। लेकिन अब यहां एंट्री बंद कर‍ दी गई है। यहां लगभग 4000 खराब एरोप्लेन खड़े हुए हैं। जिसमें सुधार की गुंजाइश होती है , उसे सुधार दिया जाता है। बाकी के विमानों के अंदर के पार्ट्स को कम कीमत में बेचकर दूसरे विमानों के निर्माण में काम में लाया जाता है। खराब होने के बाद हवाई जहाज की बॉडी किस काम की नहीं रहती, इसलिए इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने दूसरे देशों को यहां से पुराने कल-पुर्जे और विमान खरीदने की छूट दे रखी है। जिस तरह एक इंसान की लाइफ होती है, ठीक उसी तरह एयरप्लेन की भी लाइफ होती है। आसान शब्‍दों में कहें तो एक हवाई जहाज की लाइफ 10 से 20 साल होती है। इसके बाद इन हवाई जहाजों को ग्रेवयार्ड में लेकर आया जाता है। जरूरी पुर्जे निकाल लिए जाते हैं, बाकी बाहर की बॉडी को खुले आसमान के नीचे यूं ही छोड़ दिया जाता है।

यहां हवाई जहाजों को खड़ा देख कोई भी हैरान हो सकता है। इस ग्रेवयार्ड में हवाई जहाज से लेकर अंतरिक्ष यान तक मौजूद हैं। शीत युद्ध के समय का बमवर्षक विमान बी-52 भी इस कब्रिस्तान का हिस्‍सा है।फिर चाहे वह छोटे एयरलाइन के प्‍लेन हो या बड़ी एयरलाइन के। कई सालों से हवाई जहाज के यहां जमा होने से अब यह जगह हवाई जहाज का कब्रिस्‍तान बन चुकी है। हालांकि, बाहर का कोई भी व्‍यक्ति यहां झांकने तक नहीं आता। इसके अलावा यहां एफ-14 विमान भी रखे हुए हैं, इसे आपने हॉलीवुड की मशहूर फिल्म ‘टॉप गन’ में देखा होगा। बता दें कि इस विमान को अमेरिकी नौसेना ने साल 2006 में अपने बेड़े से हटा दिया था। द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद यहां खराब हवाई जहाजों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था। हालांकि, कुछ हवाई जहाजों का इस्‍तेमाल नासा में भी किया गया है। दिलचस्‍प बात तो यह है कि पहले यह जगह एक टूरिस्‍ट स्‍पॉट हुआ करती थी। लोग इस आश्‍चर्य को देखने आते थे। लेकिन अब यहां एंट्री बंद कर‍ दी गई है।

अमेरिका का 309 वां एयरोस्पेस मेंटेनेंस एंड रीजनरेशन ग्रुप विमानों के सबसे बड़े ग्रेवयार्ड की देखभाल करता है। इतना ही नहीं, यहां आने वाले विमानों की मरम्मत भी यही करता है। इस ग्रेवयार्ड में आज भी 500 से ज्‍यादा कर्मचारी इन हवाई जहाजों की देखरेख में लगे हुए हैं। बता दें कि वैसे तो आपने अब तक कब्रिस्‍तान में इंसान की बॉडी को दफन होते देखा होगा, लेकिन दुनिया में एक ऐसी जगह है जहां हजारों की संख्या में कबाड़ हो चुके विमानों को लाकर छोड़ दिया जाता है। फिर चाहे वह छोटे एयरलाइन के प्‍लेन हो या बड़ी एयरलाइन के। कई सालों से हवाई जहाज के यहां जमा होने से अब यह जगह हवाई जहाज का कब्रिस्‍तान बन चुकी है। हालांकि, बाहर का कोई भी व्‍यक्ति यहां झांकने तक नहीं आता। दिन ब दिन हवाई जहाजों की संख्‍या बढ़ रही है और कोई नहीं जानता कि आखिर कबाड़ की तरह पड़े इन हवाई जहाजों का क्या होगा।

आखिर क्या होता है राष्ट्रीय शोक?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर राष्ट्रीय शोक क्या होता है और यह क्यों मनाया जाता है! जानकारी के लिए बता दे कि राष्ट्रीय शोक, जब पूरा देश शोक मनाता है! यह एक ऐसी प्रथा है जो बहुत सालों से चली आ रही है! लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर यह राष्ट्रीय शोक क्यों मनाया जाता है और अब तक हमारे देश में किन-किन लोगों के लिए राष्ट्रीय शोक रखा गया है? तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने वाले हैं!

आपको बता दे कि हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के निधन पर भारत में एक दिन का राष्ट्रीय शोक रखा गया है। इसी के मद्देनजर राष्ट्रपति भवन पर लगे राष्ट्रीय ध्वज को भी आधा झुकाया गया है। राष्ट्रीय शोक के दौरान मनोरंजन वाला कोई आधिकारिक कार्यक्रम नहीं होगा। बता दें कि शुरुआत में ‘राष्ट्रीय शोक’ सिर्फ वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के लिए आरक्षित था, हालांकि, कुछ समय बाद इसमें कई बदलाव किए गए। अब अन्य गणमान्य व्यक्तियों के मामले में केंद्र सरकार के विशेष निर्देश पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया जा सकता है। अगर देश में किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा आए तो ऐसे वक्त भी ‘राष्ट्रीय शोक’ घोषित किया जा सकता है। हेलीकॉप्टर दुर्घटना में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री होसैन अमीरबदोल्लाहियान का निधन हो गया था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने ईरान के राष्ट्रपति सैय्यद इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री होसैन अमीरबदोल्लाहियान के निधन पर शोक व्यक्त किया है। आइए आपको बताते हैं कि राष्ट्रीय शोक क्या होता है..इससे पहले 14 मई 2022 को संयुक्त अरब अमीरात के शेख खलीफा बिन जायद के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। इससे पहले मॉरिशस के प्रधानमंत्री भारतीय मूल के अनिरूद्ध जगन्नाथ के निधन पर 5 जून 2021 को राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। तो यह थी वह तारीख के जब राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया!. बता दें कि भारत में ‘राष्ट्रीय शोक’ पूरे देश के दुःख को व्यक्त करने का एक प्रतीकात्मक तरीका है। ‘राष्ट्रीय शोक’ किसी ‘व्यक्ति’ विशेष के निधन या पुण्य तिथि पर मनाया जाता है। फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के अनुसार, राष्ट्रीय शोक के दौरान, पूरे भारत में और विदेश स्थित भारतीय संस्थानों जैसे एंबेसी आदि पर लगे राष्ट्रीय ध्वज आधे झुके रहते हैं। कोई औपचारिक और सरकारी कार्यक्रम नहीं किया जाता। 

इस अवधि के दौरान कोई आधिकारिक कार्य भी नहीं होता। भारत में पहला राष्ट्रीय शोक महात्मा गांधी की हत्या के बाद घोषित किया गया था। राष्ट्रीय शोक की अवधि के दौरान सरकारी समारोहों और आधिकारिक मनोरंजन कार्यक्रम पर भी प्रतिबंध रहता है। शुरुआत में ‘राष्ट्रीय शोक’ सिर्फ वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के लिए आरक्षित था, हालांकि, कुछ समय बाद इसमें कई बदलाव किए गए। अब अन्य गणमान्य व्यक्तियों के मामले में केंद्र सरकार के विशेष निर्देश पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया जा सकता है। अगर देश में किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा आए तो ऐसे वक्त भी ‘राष्ट्रीय शोक’ घोषित किया जा सकता है। इसके साथ ही दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष के अचानक निधन पर भी केंद्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित कर सकती है।

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से पहले जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की मौत पर भारत सरकार ने एक दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी। शिंजो आबे की मौत 8 जुलाई 2022 को उस समय हुई थी जब चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें एक हमलावर ने गोली मार दी थी। पीएम मोदी ने उनके निधन पर दुख जताया और 9 जुलाई 2022 को राष्ट्रीय शोक घोषित किया था।भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने ईरान के राष्ट्रपति सैय्यद इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री होसैन अमीरबदोल्लाहियान के निधन पर शोक व्यक्त किया है। आइए आपको बताते हैं कि राष्ट्रीय शोक क्या होता है… बता दें कि भारत में ‘राष्ट्रीय शोक’ पूरे देश के दुःख को व्यक्त करने का एक प्रतीकात्मक तरीका है। ‘ इससे पहले 14 मई 2022 को संयुक्त अरब अमीरात के शेख खलीफा बिन जायद के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। इससे पहले मॉरिशस के प्रधानमंत्री भारतीय मूल के अनिरूद्ध जगन्नाथ के निधन पर 5 जून 2021 को राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। तो यह थी वह तारीख के जब राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया! यानी सीधी सी बात यह है कि राष्ट्रीय शोक बेहद ही महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर आधारित होता है! 

जब पहली बार गठबंधन पर निर्भर रह सरकार चलाएंगे मोदी!

आने वाले समय में अब नरेंद्र मोदी गठबंधन पर निर्भर रहकर सरकार चलाएंगे! लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। देश की जनता ने एक बार फिर एनडीए को सरकार बनाने का जनादेश दिया है। हालांकि, चुनाव नतीजे बीजेपी के अनुमानों के बिल्कुल उलट आए हैं। स्थिति यह है कि पिछली बार अपने दम पर 300 से अधिक सीट जीतने वाली बीजेपी बहुमत के जादुई आकंड़े से दूर है। रात 8 बजे तक के नतीजों और रुझानों के अनुसार बीजेपी को अपने बूते 240 सीट मिलती दिख रही है। हालांकि, सहयोगी दलों के साथ एनडीए बहुमत के पार पहुंच गया है। ऐसे में 10 साल बाद एक बार फिर से केंद्र में क्षेत्रीय दलों पर निर्भर सरकार बनेगी। ऐसे में पीएम मोदी पहली बार खिचड़ी सरकार चलाने पर मजबूर होंगे। नजर डालते हैं कि क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता का नई मोदी सरकार पर क्या असर हो सकता है। चुनाव परिणाम में इस बार क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। एनडीए के साथ ही इंडिया गठबंधन में क्षेत्रीय दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। एनडीए में टीडीपी और जदयू सबसे अहम सहयोगी बनकर उभरे हैं। टीडीपी ने आंध्रप्रदेश में विधानसभा चुनाव में भी शानदार जीत दर्ज की है। वहीं, जेडीयू ने बिहार में बीजेपी से कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी उससे अधिक सीटों पर जीत हासिल की है।ऐसे में इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर फैसला करने से पहले बीजेपी की मजबूरी होगी कि वह सहयोगी दलों के साथ सहमति बनाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो बीजेपी को सहयोगी दलों के अलग होने का खतरा भी बना रहेगा। टीडीपी के खाते में 16 सीट आती दिख रही हैं। वहीं, जेडीयू के 12 सीट पर जीत दर्ज करती नजर आ रही है। ऐसे में केंद्र में बनने वाली नई सरकार में इन दोनों दलों की भूमिका काफी अहम होगी।

बीजेपी के अपने दम पर बहुमत हासिल करने का असर इस बार मंत्रिमंडल के बंटवारे पर साफ दिखेगा। इस बार क्षेत्रीय दल बीजेपी नीत एनडीए सरकार में अधिक मोलभाव करने की स्थिति में होंगे। ऐसे में अहम मंत्रालयों में अगर जेडीयू और टीडीपी कोटे से मंत्री बने तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पिछली सरकार में बीजेपी अपने दम पर 300 से अधिक सीट जीती थी। ऐसे में एनडीए में शामिल सहयोगी दल पूरी तरह से बीजेपी की मर्जी पर निर्भर थे। बीजेपी नेतृत्व अपने मर्जी के आधार पर छोटे दलों को मंत्री पद मिला था। पिछले कार्यकाल में यह आरोप भी लगता रहा था कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों का सम्मान नहीं करती।

मोदी सरकार के तीसरे कार्यकला में अहम मुद्दों पर निर्णय लेने से पहले सहयोगी दलों से विचार विमर्श अधिक जरूरी हो जाएगा। बीजेपी ने तीसरी बार सत्ता में आने पर एक देश, एक चुनाव और समान नागरिक कानून जैसे अहम मुद्दों को लागू करने की बात कही थी। ऐसे में इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर फैसला करने से पहले बीजेपी की मजबूरी होगी कि वह सहयोगी दलों के साथ सहमति बनाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो बीजेपी को सहयोगी दलों के अलग होने का खतरा भी बना रहेगा।

एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल में नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायूडू अहम किरदार बनकर उभरेंगे। हालांकि, बीजेपी के साथ एक प्लस प्वाइंट यह भी है कि नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू पहले भी बीजेपी के साथ मिलकर काम कर चुके हैं। हालांकि, इस बार दोनों नेता अपनी मर्जी से हां और ना कहने की मजबूत स्थिति में होंगे। बता दें कि ऐसे में पीएम मोदी पहली बार खिचड़ी सरकार चलाने पर मजबूर होंगे। नजर डालते हैं कि क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता का नई मोदी सरकार पर क्या असर हो सकता है। चुनाव परिणाम में इस बार क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन बेहतरीन रहा है। एनडीए के साथ ही इंडिया गठबंधन में क्षेत्रीय दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। एनडीए में टीडीपी और जदयू सबसे अहम सहयोगी बनकर उभरे हैं। ऐसे में स्थिर सरकार के लिए बीजेपी इन नेताओं की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहेगी।बीजेपी नेतृत्व अपने मर्जी के आधार पर छोटे दलों को मंत्री पद मिला था। पिछले कार्यकाल में यह आरोप भी लगता रहा था कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों का सम्मान नहीं करती। चंद्रबाबू नायडू तो एनडीए के संयोजक भी रह चुके हैं। दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश में भी चंद्रबाबू नायडू सत्ता में आ गए हैं। ऐसे में वे केंद्र से आंध्र प्रदेश के लिए अतिरिक्त केंद्रीय सहायता से लेकर प्रोजेक्ट लाने में सफल हो सकते हैं।

परिणाम के बाद क्या बोले प्रधानमंत्री मोदी?

हाल ही में परिणाम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। देश की जनता का जनादेश एक बार फिर से एनडीए के पक्ष में है। हालांकि, यूपी, बंगाल समेत कई राज्यों में बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। बीजेपी अपने बूते बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर है। पार्टी के प्रदर्शन का असर पीएम मोदी के जीत के भाषण पर देखने को मिला। पीएम मोदी चुनाव परिणाम के बाद जब भाषण देने आए तो उनके आवाज में ना तो पहले जैसा जोश दिखा और ना ही चेहरे पर वो चमक थी। वो चमक जो मोदी की पहचान है। शब्दों में वो जोश जिसके लिए मोदी जाने जाते हैं।पीएम मोदी ने कहा कि 1962 के बाद पहली बार कोई सरकार अपने दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीसरी बार वापस आई है। राज्यों में जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए, वहां पर NDA को भव्य विजय मिली है, चाहे वो अरुणाचल प्रदेश हो, आंध्र प्रदेश हो, ओडिशा हो या फिर सिक्किम। पीएम मोदी की बॉडी लैंग्वेज 2019 में मिली जीत के बाद जब वो पार्टी मुख्यालय पहुंचे थे उस समय के बिल्कुल उलट थी।एनडीए के भले ही सरकार बनाने लायक बहुमत मिला हो लेकिन पीएम के भाषण के दौरान माहौल बिल्कुल अलग था। 2014 और 2019 में मिली जीत के बाद कार्यकर्ताओं का जोश सातवें आसमान पर था। इस बार माहौल बिल्कुल जुदा था। कार्यकर्ताओं के चेहरे भी अधिकतर बुझे ही दिख रहे थे। पीएम के भाषण के बीच कार्यकर्ताओं की जोश में निकलने वाली आवाज और मोदी-मोदी की गूंज में पहले वाला जोश नहीं दिख रहा था। मोदी ने अपने भाषण में लोकसभा में भाजपा सदस्यों की कम हो रही संख्या का जिक्र नहीं किया।

 पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा कि आज की ये विजय… दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत है। ये भारत के संविधान पर अटूट निष्ठा की जीत है,ये विकसित भारत के प्रण की जीत है, ये सबका साथ-सबका विकास के मंत्र की जीत है। उन्होंने कहा कि ये 140 करोड़ भारतीयों की जीत है। पीएम मोदी ने कहा कि तीसरे कार्यकाल में देश बड़े फैसलों का एक नया अध्याय लिखेगा। पीएम ने कहा कि आज तीसरी बार जो आशीर्वाद NDA को मिला है, मैं उसके सामने विनय भाव से नतमस्तक हूं। पीएम मोदी ने कहा कि 1962 के बाद पहली बार कोई सरकार अपने दो कार्यकाल पूरे करने के बाद तीसरी बार वापस आई है। राज्यों में जहां भी विधानसभा के चुनाव हुए, वहां पर NDA को भव्य विजय मिली है, चाहे वो अरुणाचल प्रदेश हो, आंध्र प्रदेश हो, ओडिशा हो या फिर सिक्किम। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस स्नेह के लिए मैं जनता-जनार्दन को नमन करता हूं, हम उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पिछले दशक में किये गए अच्छे कार्यों को जारी रखेंगे।

इससे पहले नतीजों के बाद पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संदेश पोस्ट किया। उन्होंने लिखा कि देश की जनता-जनार्दन ने एनडीए पर लगातार तीसरी बार अपना विश्वास जताया है। भारत के इतिहास में ये एक अभूतपूर्व पल है। मैं इस स्नेह और आशीर्वाद के लिए अपने परिवारजनों को नमन करता हूं।शब्दों में वो जोश जिसके लिए मोदी जाने जाते हैं। पीएम मोदी की बॉडी लैंग्वेज 2019 में मिली जीत के बाद जब वो पार्टी मुख्यालय पहुंचे थे उस समय के बिल्कुल उलट थी।एनडीए के भले ही सरकार बनाने लायक बहुमत मिला हो लेकिन पीएम के भाषण के दौरान माहौल बिल्कुल अलग था। 2014 और 2019 में मिली जीत के बाद कार्यकर्ताओं का जोश सातवें आसमान पर था। उन्होंने लिखा कि मैं देशवासियों को विश्वास दिलाता हूं कि उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हम नई ऊर्जा, नई उमंग, नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ेंगे।पीएम के भाषण के बीच कार्यकर्ताओं की जोश में निकलने वाली आवाज और मोदी-मोदी की गूंज में पहले वाला जोश नहीं दिख रहा था। मोदी ने अपने भाषण में लोकसभा में भाजपा सदस्यों की कम हो रही संख्या का जिक्र नहीं किया। पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा कि आज की ये विजय… दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत है। ये भारत के संविधान पर अटूट निष्ठा की जीत है,ये विकसित भारत के प्रण की जीत हैसभी कार्यकर्ताओं ने जिस समर्पण भाव से अथक मेहनत की है, मैं इसके लिए उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूं, अभिनंदन करता हूं।

क्या विपक्ष ने याद दिला दिया है 2004 का चुनाव?

हाल ही में विपक्ष ने 2004 का चुनाव भी याद दिला दिया है! एग्जिट पोल में बीजेपी और उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को बड़ी बढ़त का इशारा मिलते ही विपक्ष लाल हो गया। कांग्रेस, सपा, आरजेडी से लेकर कई विपक्षी दलों ने कहा कि यह दरअसल बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के इशारे पर पेश किया गया अनुमान है। उनका दावा है कि असली रिजल्ट एग्जिट पोल के विपरीत आएगा और विपक्ष 295 सीटें जीतकर सरकार बनाएगा। वहीं, ऐसे बीजेपी और मोदी विरोधी भी भरे पड़े हैं जो बीजेपी की तरफ से ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा आने के बाद से ही याद दिला रहे हैं कि 2004 में भी कुछ हुआ था। वो बता रहे हैं कि कैसे 2004 में भी सत्ता पक्ष को लेकर बड़े रोजी पिक्चर बनाए जा रहे थे, सारे एग्जिट पोल भी सरकार की वापसी की घोषणा कर रहे थे, लेकिन असली परिणाम आया तो सारे अनुमान और दावे हवा-हवाई हो गए। तो क्या, सच में इस बार भी 2004 जैसे परिणाम आ सकते हैं? क्या 2004 में अटल सरकार की तरह ही इस बार भी मोदी सरकार की विदाई हो सकती है? सबसे बड़ा सवाल कि क्या सच में 2004 में कांग्रेस ने बीजेपी को बुरी तरह परास्त किया था? आइए इन सवालों के जवाब ढूंढते हुए यह जानने की कोशिश करते हैं कि इस बार का माहौल भी 2004 जैसा ही है! 1999 में बीजेपी ने 182 सीटें जीतकर केंद्र में सरकार बनाई थी। दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 1998 में ही बन गई थी, लेकिन तमिलनाडु के सहयोगी दल एआईएडीएमके के हाथ खींचने से मात्र एक वोट से सिर्फ 13 महीनों में ही सरकार ने विश्वास मत खो दिया था। तब विपक्षी दल मिलकर सरकार नहीं बना पाए थे, इसलिए चुनाव हुआ था। 1999 के उस चुनाव में बीजेपी 182 सीटें लेकर दोबारा सरकार में आ गई। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। उससे पहले वो दो बार प्रधानमंत्री बन चुके थे, लेकिन पहली बार तो सिर्फ 13 दिन में सरकार गिर गई थी। 1999 में दूसरी बार बनी सरकार का हश्र ऊपर बताया जा चुका है।

तीसरी बार अटल बिहारी की सरकार ने पांच साल पूरा किया तो उसके कई योजनाओं की बड़ी तारीफ हुई। अटल सरकार ने स्वर्णिम चतुर्भज योजना, नई टेलिकॉम पॉलिसी, सर्व शिक्षा अभियान, पोखरण में परमाणु परीक्षण, चंद्रयान-1 मिशन, केंद्रीय मंत्रालय में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए नए विभाग का गठन जैसे कई क्रांतिकारी काम किए। अटल सरकार ने विनिवेश मंत्रालय बनाकर निजीकरण को बढ़ावा दिया और घाटे में जा रही कई सरकारी कंपनियों से किनारा कर लिया। 2004 में बीजेपी ने ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ मतदाताओं से अटल सरकार की वापसी का मौका देने की अपील की। ऐसा लग रहा था मानो जनता अटल सरकार की उपलब्धियों से बहुत खुश है और उसे एक और मौका देने का मन बना चुकी है। एग्जिट पोल्स में भी अटल सरकार की वापसी बताई गई, लेकिन जब मतगणना शुरू हुई तो रिजल्ट पलट गए।

बीजेपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में 364 कैंडिडेट उतारे थे। पार्टी को 37.91% की स्ट्राइक रेट से 138 सीटों पर जीत हासिल हुई। वहीं, कांग्रेस पार्टी की स्ट्राइक रेट 34.77% रही और उसके कुल 417 उम्मीदवारों में 145 चुनकर संसद पहुंचे। यानी, बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस को सिर्फ सात सीटें ज्यादा आईं। जहां तक वोटों की बात है तो बीजेपी को कुल 8 करोड़, 63 लाख, 71 हजार, 561 यानी कुल 22.61% वोट मिले। वहीं, कांग्रेस को 10 करोड़, 34 लाख, 8 हजार, 949 यानी 26.53% वोट मिले थे। इस लिहाज से देखें तो बीजेपी को प्रति कैंडिडेट औसतन 2,37,284 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा 247,983 रहा था। इस चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश से बहुत बड़ा झटका मिला था। पांच साल पहले जिस उत्तर प्रदेश ने बीजेपी को 29 सांसद दिए थे, वहां वो 10 सीटों पर सिमट गई थी। एक प्रदेश में ही 19 सीटों का घाटा। कांग्रेस ने तब यूपी में नौ सीटें हासिल कर ली थी। कांग्रेस को 2004 के चुनाव में सबसे अधिक आंध्र प्रदेश से 29 सीटें मिल गई थीं। वहीं बीजेपी को सबसे ज्यादा 25 सीटें मध्य प्रदेश से मिली थीं।

मजे की बात है कि इस चुनाव में भी कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले ज्यादा वोट मिले थे। तब कांग्रेस को 10,31,20,330 यानी 28.30% जबकि बीजेपी को 8,65,62,209 यानी 23.75% वोट मिले थे। बीजेपी को 1999 में 53.69% के स्ट्राइक रेट से 182 सीटों पर जीत मिली थीं। उसने कुल 339 कैंडिडेट चुनाव मैदान में उतारे थे। उस चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 29-29 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस को यूपी में क्रमशः 10 और 11 सीटें मिली थीं। उसे सबसे ज्यादा 18 सीटें कर्नाटक से मिली थीं जबकि आंध्र प्रदेश से उसे सिर्फ 5 सीटें मिली थीं। साफ है कि 2004 के चुनाव में जिस तरह उत्तर प्रदेश ने बीजेपी को तगड़ा झटका दिया, उसके उलट आंध्र प्रदेश ने कांग्रेस को बड़ी बढ़त दिला दी।

EVM तोड़ने वाले विधायक के लिए क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने EVM तोड़ने वाले विधायक के लिए एक बयान दिया है! सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी वाईएसआरसीपी के विधायक पिन्नेली रामकृष्णा रेड्डी को फटकार लगाते हुए उनके मतगणना केंद्र पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। एक मतदान केंद्र पर ईवीएम पटकने का विधायक का वीडियो कैमरे में कैद हो गया था। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने घटना का वीडियो देखने के बाद कहा कि ईवीएम को जमीन पर पटकने का आरोप ‘सिस्टम की खिल्ली उड़ाने’ जैसा है। अदालत ने कहा कि यदि अंतरिम सुरक्षा देने के उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई तो यह भी पूरी न्याय प्रणाली का उपहास उड़ाने जैसा होगा। पीठ में जस्टिस संदीप कुमार भी शामिल थे। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में मचेरला विधायक के वकील विकास सिंह द्वारा वाईएसआरसीपी नेता की ओर से दायर उस हलफनामे पर भी विचार किया जिसमें कहा गया था कि वह मंगलवार को मतगणना केंद्र या उसके आसपास नहीं जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से अंतरिम सुरक्षा देने के अपने पूर्व के फैसले से प्रभावित हुए बिना, मामले में अग्रिम जमानत की याचिका पर गुण-दोष के आधार विचार करने के लिए कहा। हाई कोर्ट ने 23 मई को अपने अंतरिम आदेश में मतदान के दौरान ईवीएम पटकने के मामले में 5 जून तक आरोपी विधायक की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ टीडीपी के एक पोलिंग एजेंट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि रामकृष्णा रेड्डी के रसूख के दबाव में वीआरओ ने अपनी रिपोर्ट में मतदान केंद्र में ईवीएम को नुकसान पहुंचाने का आरोप अज्ञात लोगों पर लगाया था।

रामकृष्णा रेड्डी वाईएसआरसीपी उम्मीदवार के रूप में पांचवीं बार विधायकी के लिए मचेरला से चुनाव मैदान में हैं। पुलिस ने ईवीएम पटकने का उनका वीडियो वायरल होने के बाद आईपीसी; जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951; और लोक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम (पीडीपीपी) अधिनियम, 1984 की संबंधित धाराओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है। घटना माचेर्ला में 13 मई को मतदान के दिन एक मतदान केंद्र की है। ईवीएम पटकने का वीडियो वायरल होने के बाद चुनाव आयोग ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया था। बाद में विधायक के खिलाफ मतदान के दिन हिंसा की साजिश के तीन नए मामले दर्ज किए गए थे।

पीठ ने रेड्डी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह से कहा, ‘जब आप वीडियो देखेंगे तो पाएंगे कि यह पूरी तरह से गलत आदेश है। यह न्याय प्रणाली का भद्दा मजाक है।’ पीठ ने रेड्डी को चार जून को माचेर्ला विधानसभा क्षेत्र के मतगणना केंद्र में प्रवेश नहीं करने और उसके आसपास भी न रहने का निर्देश दिया। आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ हुए थे। न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से कहा कि अदालत रेड्डी के खिलाफ छह जून को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामलों से संबंधित याचिका पर बिना किसी संकोच के निर्णय ले। रेड्डी को 28 मई को अंतरिम राहत दी गई थी। माचेर्ला विधानसभा क्षेत्र से वाईएसआरसीपी के उम्मीदवार रेड्डी अपने समर्थकों के साथ 13 मई को मतदान वाले दिन कथित तौर पर मतदान केंद्र में घुसे और वीवीपैट और ईवीएम मशीनों को तोड़ दिया।

शीर्ष अदालत तेलुगू देशम पार्टी (TDP) के पोलिंग एजेंट शेषगिरी राव नंबूरी की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विधायक को गिरफ्तारी से दी गई अंतरिम सुरक्षा को रद्द करने की मांग की गई थी। नंबूरी ने दावा किया कि वीडियो साक्ष्य होने के बावजूद पुलिस ने विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज न कर, कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। सिंह ने कहा कि वह इन घटनाओं को नहीं बल्कि कथित तौर पर जब ये घटनाएं हुईं तो बूथ पर विधायक की मौजूदगी को चुनौती दे रहे हैं।न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय से कहा कि अदालत रेड्डी के खिलाफ छह जून को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामलों से संबंधित याचिका पर बिना किसी संकोच के निर्णय ले। रेड्डी को 28 मई को अंतरिम राहत दी गई थी। पीठ ने कहा कि घटना के वीडियो को देखने पर आरोप प्रथम दृष्टया सच प्रतीत होते हैं और इन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘शिकायत में बताया गया कि आठ लोग बूथ के अंदर घुसे और वीवीपैट व ईवीएम ले गए और उन्हें नष्ट कर दिया। अब, अगर हम अग्रिम जमानत आदेश पर रोक नहीं लगाते हैं, तो यह न्यायिक प्रणाली का मजाक होगा।’

क्या पाकिस्तान के हैकर्स भी हो चुके हैं वर्तमान में एक्टिव?

वर्तमान में पाकिस्तान के हैकर्स भी एक्टिव हो चुके हैं! इंटरनेट के बिना अब जिंदगी जीना नामुमकिन सा हो गया है। अगर मोबाइल और लैपटॉप में इंटरनेट न हो तो उसे हम डिब्बा समझने लगते हैं। हमारे इंटरनेट से बढ़ते इस लगाव का फायदा साइबर ठग खूब उठा रहे हैं। खास कर पाकिस्तानी हैकर्स हमारे देश के लोगों को खूब निशाना बना रहे रहे हैं। दरअसल पाकिस्तान बेस्ड हैकर्स के एक ग्रुप को ट्रांसपेरेंट ट्राइब के नाम से जाना जाता है। जो भारत सरकार और सैन्य संस्थानों को निशाना बना रहा है। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ये धमकाने वाले एक्टर्स प्रोग्रामिंग भाषाओं जैसे पायथन, गोलांग और रस्ट का उपयोग कर रहे हैं, साथ ही टेलीग्राम, डिस्कॉर्ड, स्लैक और गूगल ड्राइव का भी दुरुपयोग कर रहे हैं। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम के अनुसार ट्रांसपेरेंट ट्राइब दिसंबर 2023 के अंत से अप्रैल 2024 तक सक्रिय रहा था और संभावना है कि यह आगे भी जारी रहेगा। ग्लोबल साइबरसिक्योरिटी सॉल्यूशंस प्रोवाइडर क्विक हील टेक्नोलॉजीज लिमिटेड की ब्रांच सेक्राइट द्वारा किए गए एक रिसर्च में एक अन्य पाकिस्तान स्थित APT समूह, साइडकॉपी द्वारा सरकार को निशाना बनाने वाले तीन अलग-अलग अभियानों का पता चला। लोकसभा चुनावों के बीच साइबर हमले के ये अभियान तेज हो गए हैं।

ट्रांसपेरेंट ट्राइब जिसे APT36, ProjectM, Mythic Leopard या Earth Karkaddan के नाम से जाना जाता है, 2013 से सक्रिय है। यह एक साइबर निगरानी समूह है जो पाकिस्तान से काम करता है। इसने पहले भारत के शिक्षा और रक्षा क्षेत्रों के खिलाफ साइबर जासूसी अभियान चलाए हैं। इसके अलावा भारत की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी, डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी और एशिया के दूसरी सबसे बड़ी अर्थ मूविंग इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनी को भी ऐसे ईमेल भेजे गए. ये कंपनियां भारत के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से जुड़ी हुई हैं. ये सभी ग्राउंड सपोर्ट व्हीकल्स प्रदान कर रही हैं. ट्रांसपेरेंट ट्राइब मुख्य रूप से फिशिंग ईमेल का इस्तेमाल करता है, जिसमें खास तौर पर जिप आर्काइव या लिंक का इस्तेमाल किया जाता है। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम ने पाया कि ये ग्रुप पिछले अभियानों में इस्तेमाल किए गए टूल्स के साथ-साथ उनके नए अपडेट वर्जन का भी इस्तेमाल कर रहा है। रिसर्च में सामने आया कि पाकिस्तान स्थित एक मोबाइल डेटा नेटवर्क ऑपरेटर से जुड़े एक रिमोट आईपी पते का भी पता चला है, जो एक फिशिंग ईमेल में छिपा हुआ था। जिसमें इस ग्रुप से भेजी गई एक फाइल में टाइम ज़ोन (टीजेड) वेरिएबल को एशिया/कराची पर सेट किया गया था, जो पाकिस्तान का मानक समय है।

अपने जाने-माने तरीकों के साथ-साथ ट्रांसपेरेंट ट्राइब नए तरीके भी अपना रहा है। अक्टूबर 2023 में, उन्होंने हमले के तरीके के रूप में आईएसओ इमेज का इस्तेमाल किया था। ब्लैकबेरी ने समूह द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक नए गोलांग कम्पाइलड ऑल-इन-वन जासूसी टूल का भी पता लगाया है, बता दे कि ट्रांसपेरेंट ट्राइब के नाम से जाना जाता है। जो भारत सरकार और सैन्य संस्थानों को निशाना बना रहा है। बता दें कि रक्षा संबंधी यंत्र बनाने वाली तीन कंपनियां और भारतीय फोर्सेस भी पाकिस्तानी हैकिंग समूहों द्वारा लगातार निशाने पर रह रही हैं.  डिफेंस मिनिस्ट्री के तहत आने वाली रक्षा संस्थाओं, कंपनियों और सेना से जुड़े अधिकारियों को लगातार टारगेट किया जा रहा है. ये काम ट्रांसपैरेंट ट्राइब नाम का समूह कर रहा है. साइबरसिक्योरिटी से जुड़े प्रोफेशनल इसे एडवांस्ड परसिसटेंट थ्रेट (APT) 36 कहते भारतीय फोर्सेस और डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स लगातार सितंबर 2023 से अप्रैल 2024 तक ट्रांसपैरेंट ट्राइब के निशाने पर रहे हैं. ये दावा किया है ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम ने अपनी रिपोर्ट में. फिशिंग ईमेल भेजे जाते हैं. इसमें मालवेयर होता है. ऐसे ही ईमेल एशिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनियों को भेजा गया. 

 ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ये धमकाने वाले एक्टर्स प्रोग्रामिंग भाषाओं जैसे पायथन, गोलांग और रस्ट का उपयोग कर रहे हैं, ट्रांसपेरेंट ट्राइब मुख्य रूप से फिशिंग ईमेल का इस्तेमाल करता है, जिसमें खास तौर पर जिप आर्काइव या लिंक का इस्तेमाल किया जाता है। ब्लैकबेरी रिसर्च एंड इंटेलिजेंस टीम ने पाया कि ये ग्रुप पिछले अभियानों में इस्तेमाल किए गए टूल्स के साथ-साथ उनके नए अपडेट वर्जन का भी इस्तेमाल कर रहा है।साथ ही टेलीग्राम, डिस्कॉर्ड, स्लैक और गूगल ड्राइव का भी दुरुपयोग कर रहे हैं। जिसमें लोकप्रिय फाइल एक्सटेंशन वाली फाइलों को ढूंढने और उन्हें बाहर निकालने, स्क्रीनशॉट लेने, फाइलों को अपलोड और डाउनलोड करने और कमांड चलाने की क्षमता है।

क्या बीजेपी के मोदी मय का तोड़ निकाल पाएगी कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस बीजेपी के मोदी मय का तोड़ निकाल पाएगी या नहीं! कांग्रेस ने राहुल गांधी को फोकस करते हुए बीजेपी के MR फेक्टर माहौल का काउंटर नैरेटिव तैयार करने के लिए अब 14 जनवरी से भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकालने का फैसला किया है। बीजेपी का MR समीकरण मतलब है M= मोदी मय R=राम मय। ‘राम मय’ और ‘मोदी मय’ के काउंटर नरैटिव को कांग्रेस ने भले ही इसे चुनावी यात्रा करार नहीं देते हुए सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक मुद्दों पर न्याय यात्रा कहा है। लेकिन, विश्लेषक स्पष्ट रूप से इसे भारत जोड़ो यात्रा .2 के रूप में लोकसभा इलेक्शन कैंपेन ही निरूपित कर रहे हैं। अभी भी तालमेल की तलाश कर रहे इंडिया गठबंधन को कांग्रेस इस यात्रा के बहाने यह मैसेज भी देना चाह रही है कि विपक्ष का प्राइम मिनिस्टर मैंटेरियल राहुल गांधी ही है। दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस देशभर में फिर एक यात्रा निकाल रही है। पार्टी ने मणिपुर के इंफाल से मुंबई तक भारत जोड़ो यात्रा.2 का रोड मैप जरूर जारी कर दिया है। लेकिन जिन मुद्दों को लेकर वह यात्रा के लिए निकल रही है उसका रोड मैप फिलहाल बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है। विभिन्न जांच एजेंसियों के घेरे में आए गांधी परिवार, कमजोर पड़ रही कांग्रेस और केंद्र सरकार के विरोध के लिए भारत जोड़ो यात्रा निकाली गई थी। मध्य प्रदेश के संदर्भ में बात करें तो जिन क्षेत्रों से राहुल गांधी निकले थे, वहां चुनावी सफलता या विशेष छाप नहीं छोड़ पाए।वहीं कमजोर संसाधनों वाली कांग्रेस के पास मुद्दों लेकर जनता तक पहुंचने के लिए समय नहीं बचेगा। समाजवादी पार्टी के नेता आईपी सिंह ने चुनाव के मुहाने पर आयोजित हो रही इस यात्रा पर टिप्पणी की ‘द्वारे आई बारात तो समधन चली स्नान’. दूसरे, इसमें इंडिया गठबंधन के नेताओं के समावेश नहीं होने से यह कांग्रेस और राहुल गांधी की ही यात्रा मानी जाएगी। लेकिन, हताश व निराश कांग्रेस में एक नई जान जरूर फूंकने में सफल हुए थे। उनकी यात्रा के बाद पूरे देश की बात करें तो मिला जुला असर देखने को मिला। लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने उन्हें स्पष्ट रूप से नकार दिया। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस 66 सीटों पर ही सिमट गई।

ज्यादातर बस के माध्यम से होने वाली यह यात्रा मध्य प्रदेश में 7 दिन के दौरान मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, अशोक नगर, गुना, राजगढ़, आगर मालवा उज्जैन और रतलाम की 698 किलोमीटर यात्रा तय कर राजस्थान में प्रवेश करेगी।

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता आशीष अग्रवाल ने तंज कसते हुए कहा कि यात्रा का नाम बदलने से कुछ नहीं होने वाला। कांग्रेस ने वर्षों से जनता के साथ अन्याय किया है। उसके लिए तो उसे क्षमा यात्रा निकालना चाहिए। प्रतिपक्ष के उप नेता हेमंत कटारे ने कहा कि यह यात्रा जनता से सीधे जोड़ने का माध्यम है। जनता के मन की बात सुनकर उसके अनुरूप चलेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक कदम बढ़ कर टिप्पणी की है कि राहुल गांधी की यात्रा लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा के दौरान 67 दिनों तक कांग्रेस अपने बचे खुचे संसाधनों को झोंक देगी। यात्रा की समाप्ति के ठीक बाद लोकसभा चुनाव रहेंगे। जहां अभी से चुनाव के एक्टिव मोड पर आ चुकी भाजपा मध्य प्रदेश जीतने से बेहद उत्साहित है, और वह इस यात्रा के दौरान ही बूथ लेवल तक पहुंच चुकी होगी। वहीं कमजोर संसाधनों वाली कांग्रेस के पास मुद्दों लेकर जनता तक पहुंचने के लिए समय नहीं बचेगा। समाजवादी पार्टी के नेता आईपी सिंह ने चुनाव के मुहाने पर आयोजित हो रही इस यात्रा पर टिप्पणी की ‘द्वारे आई बारात तो समधन चली स्नान’. दूसरे, इसमें इंडिया गठबंधन के नेताओं के समावेश नहीं होने से यह कांग्रेस और राहुल गांधी की ही यात्रा मानी जाएगी। हालांकि मध्य प्रदेश में सपा को छोड़ इंडिया गठबंधन से जुड़ी ज्यादा पार्टियां नहीं है।

इस तरह से यात्रा और राहुल गांधी को मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद टूट चुकी कांग्रेस का मनोबल बढ़ाने की बड़ी चुनौती होगी। यहां 29 में से 28 सीटों पर भाजपा काबिज है। लेकिन, हताश व निराश कांग्रेस में एक नई जान जरूर फूंकने में सफल हुए थे। उनकी यात्रा के बाद पूरे देश की बात करें तो मिला जुला असर देखने को मिला। लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने उन्हें स्पष्ट रूप से नकार दिया। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस 66 सीटों पर ही सिमट गई।इस तरह की यात्राओं से लाभ तो होता है, लेकिन कितना ,यह समय बताएगा।