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क्या कभी कांग्रेस पार्टी भी हुई है 400 पार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कभी कांग्रेस पार्टी भी 400 पार हुई है या नहीं! अब से कुछ ही घंटों में 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हो जाएंगे। अगर एग्जिट पोल सही साबित होते हैं तो बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए आसानी से 350-400 सीटें हासिल करते हुए बहुमत का आंकड़ा पार कर जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने जोरदार चुनाव प्रचार किया था, को ऐतिहासिक तीसरा कार्यकाल मिलने की संभावना है। इसके साथ ही वोदेश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेंगे। लेकिन यह एकमात्र रिकॉर्ड नहीं है जिसे बीजेपी हासिल करना चाहती है। 4 जून को सुबह 8 बजे से नतीजे आने शुरू हो जाएंगे, सभी की निगाहें एनडीए की अंतिम सीटों की संख्या पर होंगी। लोग यह देखेंगे कि बीजेपी क्या वह वास्तव में ‘400 पार’ (400 से ज़्यादा सीटें) हासिल कर पाती है। एकमात्र बार किसी पार्टी ने यह लक्ष्य 1984 के आम चुनावों में हासिल किया था। उस समय राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 414 सीटें जीती थीं। तब 541 सीटों के लिए वोट डाले गए थे। 2014 में जब एनडीए ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा की, तो उसने अपने लोकसभा चुनाव अभियान को एक नया मोड़ दिया। यह बीजेपी के लिए मोदी-केंद्रित चुनाव अभियान की शुरुआत थी। गुजरात के विकास मॉडल पर ध्यान केंद्रित करते हुए, बीजेपी ने कांग्रेस को केंद्र से बाहर करने के लिए वोट मांगे। उस समय बीजेपी ने ‘घर-घर मोदी’ और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जैसे नारे दिए। 2019 में, जब पीएम मोदी ने दूसरा कार्यकाल चाहा, तो भाजपा ने ‘अबकी बार’ नारे को आगे बढ़ाया और ‘फिर एक बार मोदी सरकार’ के नारे के साथ आई। पीएम मोदी के विकास कार्यों की तरह यह नारा भी मतदाताओं के दिलों में उतर गया। एनडीए ने 2019 के लोकसभा चुनावों में लगातार जीत दर्ज की। गठबंधन ने अपनी सीटों की संख्या 336 से बढ़ाकर 353 कर ली। इस वर्ष, जैसा कि पीएम मोदी ने तीसरे कार्यकाल के लिए जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करने का लक्ष्य रखा। उन्होंने एनडीए के लिए 400 सीटों का लक्ष्य निर्धारित करते हुए ‘अबकी बार, 400 पार’ का नारा दिया। जैसा कि उन्होंने देश भर में प्रचार किया, 200 से अधिक रैलियां, रोड शो और अन्य सार्वजनिक आउटरीच कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने मतदाताओं से कहा कि वे ‘400 पार’ को वास्तविकता में बदल दें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कांग्रेस और विपक्षी भारत ब्लॉक अयोध्या में मंदिर पर ‘बाबरी ताला’ लगाने या जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को वापस लाने की अपनी योजना में सफल न हो।

अब से कुछ ही घंटों में हमें पता चल जाएगा कि एनडीए 400 सीटों का अपना लक्ष्य हासिल कर पाएगा या नहीं। भारतीय चुनावी इतिहास में यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य सिर्फ एक बार ही हासिल किया जा सका है, वह भी 1984 के लोकसभा चुनाव में। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को कुल 541 सीटों में से 414 सीटें मिली थीं। सबसे ज्यादा सीटों के साथ-साथ कांग्रेस को किसी एक पार्टी के लिए अब तक का सबसे ज़्यादा वोट शेयर भी मिला। उस वक्त कांग्रेस का वोट शेयर 48.12 प्रतिशत था। दूसरे स्थान पर सीपीआई (एम) रही थी। उसे 22 सीटें और 5.71 प्रतिशत वोट शेयर मिले थे। बीजेपी को तब 7.4 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सिर्फ 2 सीटें मिली थीं।

शनिवार को किए गए एग्जिट पोल के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पद पर लगातार तीसरी बार जीत मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को लोकसभा चुनावों में महत्वपूर्ण बहुमत मिलने का अनुमान है। एक्सिस माई इंडिया का अनुमान है कि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन 361 से 401 सीटों के बीच सुरक्षित रहेगा। वहीं, विपक्षी इंडिया ब्लॉक को 543 सदस्यीय लोकसभा में 131-166 सीटें जीतने की उम्मीद है। एबीपी-सी वोटर ने सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए 353-383 सीटों और इंडिया ब्लॉक के लिए 152-182 सीटों का अनुमान लगाया है। चाणक्य के एग्जिट पोल ने 2019 के चुनावों की तुलना में भाजपा और उसके गठबंधन के लिए और भी अधिक सीटों का अनुमान लगाया है। इससे बीजेपी के लिए 335 सीटों और एनडीए के लिए 400 सीटों की भविष्यवाणी की गई है। दोनों तरफ 15 सीटों का अंतर है। विपक्षी गठबंधन को 107 सीटें जीतने का अनुमान है। टाइम्स नाउ-ईटीजी रिसर्च के एग्जिट पोल में एनडीए को 358 सीटें और इंडिया ब्लॉक को 152 सीटें दी गई हैं।

एनडीए 2019 की 353 सीटों की संख्या को पार कर सकता है, जबकि पिछले चुनाव में भाजपा ने 303 सीटें जीती थीं। कांग्रेस ने 53 सीटें हासिल की थीं, जबकि उसके सहयोगियों ने 38 सीटें जीती थीं। एनडीए तमिलनाडु और केरल में अपना खाता खोल सकता है। गठबंधन को कर्नाटक में जीत मिल सकती है लेकिन बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में नुकसान हो सकता है। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उत्तर प्रदेश भाजपा का गढ़ बना रहेगा। एक्सिस माई इंडिया ने बीजेपी को 322-340 सीटें, कांग्रेस को 60-76 सीटें और कांग्रेस के सहयोगियों को 71-90 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। पी मार्क पोल के अनुसार सत्तारूढ़ गठबंधन को 359 सीटें मिलेंगी, जबकि विपक्षी दल इंडिया को 154 सीटें मिलेंगी। मैट्रिज पोल के अनुसार एनडीए को 353-368 सीटें और विपक्ष को 118-133 सीटें मिलेंगी। जन की बात पोल के अनुसार सत्तारूढ़ एनडीए को 362-392 सीटें और विपक्षी गठबंधन को 141-161 सीटें मिलने का अनुमान है। इंडिया टीवी-सीएनएक्स ने एनडीए को 371-401 सीटें और विपक्ष को 109-139 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। वहीं, न्यूज नेशन ने एनडीए को 342-378 सीटें और विपक्ष को 153-169 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है।

क्या चुनावी नतीजे से असंतुष्ट होने पर जांच की जा सकती है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या चुनावी नतीजे से असंतुष्ट होकर जांच की जा सकती है या नहीं! लोकसभा चुनाव के बाद अब वोटों की गिनती शुरू होने में कुछ ही घंटे बाकी है। चुनाव आयोग की तरफ से वोटों की गिनती के बाद रिजल्ट की घोषणा की जाती है। ऐसे में जो उम्मीदवार चुनाव परिणाम से असंतुष्ट होंगे वे ईवीएम वेरिफिकेशन के लिए आवेदन कर सकते हैं। चुनाव आयोग की तरफ से इस संबंध में एक प्रोटोकॉल जारी किया है। इसके तहत रिजल्ट की घोषणा के बाद पहले दो हारने वाले उम्मीदवार 4 जून के परिणाम के बाद ईवीएम माइक्रोकंट्रोलर में जली हुई मेमोरी का सत्यापन/ऑडिट कराने की अनुमति दे सकते हैं। चुनाव आयोग ने 1 जून को सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में पहले दो उपविजेता उम्मीदवार कथित छेड़छाड़ या संशोधन के लिए ईवीएम माइक्रोकंट्रोलर के सत्यापन की मांग कर सकेंगे। यह विंडो परिणाम घोषित होने के सात दिनों तक खुली रहेगी। इस मानक संचालन प्रक्रिया को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ भी साझा किया गया है। 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बादअनुरोध विवरण ईवीएम-वीवीपीएटी निर्माताओं को भेज देंगे। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र के मामले में जहां परिणाम को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका अदालत में दायर की गई हो, वहां जली हुई मेमोरी का सत्यापन केवल तभी किया जाएगा जब संबंधित उम्मीदवार याचिका के लंबित रहने के दौरान ऐसा करने की अनुमति देने वाला अदालती आदेश प्राप्त कर लेगा। जारी एसओपी के अनुसार, उम्मीदवार मतगणना के दिन से सात दिनों के भीतर प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र/संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लगभग 5% ईवीएम में सत्यापन की मांग कर सकेंगे। यह 10 जून तक होगा।

ईवीएम निर्माताओं (ईसीआईएल और बीईएल) के इंजीनियरों के साथ उम्मीदवारों की मौजूदगी में जांच और सत्यापन किया जाएगा। चुनाव याचिकाओं के मामले को छोड़कर, यह प्रक्रिया नतीजों की घोषणा के दो महीने के भीतर पूरी होने की संभावना है। 2024-25 के चुनाव चक्र के लिए, प्रत्येक ईवीएम इकाई (जिसमें नियंत्रण इकाई, बैलट इकाई और वीवीपीएटी शामिल है) की जांच और सत्यापन के लिए प्रक्रिया पर ₹40,000 प्लस 18% जीएसटी खर्च होगा। भारतीय चुनाव आयोग ने यह फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि वेरिफिकेशन प्रक्रिया में मशीन यूनिट के साथ छेड़छाड़ साबित होने पर यह राशि वापस कर दी जाएगी।

सत्यापन पर 5% की सीमा के संबंध में, ईसीआई ने कहा कि एक विधानसभा क्षेत्र/खंड जिसने, मान लीजिए, 400 मतपत्र इकाइयों, 200 नियंत्रण इकाइयों और 200 वीवीपीएटी का उपयोग किया है। ऐसे में 20 बैलेट यूनिट, 10 कंट्रोलिंग यूनिट और 10 वीवीपीएटी बर्न मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर का यूज इस उद्देश्य के लिए किया जाएगा। पहले और दूसरे स्थान पर आने वाले को मतदान केंद्र संख्या या बीयू, सीयू और वीवीपीएटी (मतदान से पहले उम्मीदवारों के पास उपलब्ध) की विशिष्ट क्रम संख्या के अनुसार इकाइयों का एक सेट चुनने की अनुमति होगी।

एसओपी में जिला निर्वाचन अधिकारी को पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार बनाया गया है। जिला निर्वाचन अधिकारी वेरिफिकेशन आवेदनों की जानकारी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजेंगे, जो परिणामों की घोषणा के 30 दिनों के भीतर सत्यापन अनुरोध विवरण ईवीएम-वीवीपीएटी निर्माताओं को भेज देंगे। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र के मामले में जहां परिणाम को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका अदालत में दायर की गई हो, वहां जली हुई मेमोरी का सत्यापन केवल तभी किया जाएगा जब संबंधित उम्मीदवार याचिका के लंबित रहने के दौरान ऐसा करने की अनुमति देने वाला अदालती आदेश प्राप्त कर लेगा।

दो सप्ताह के भीतर, ईसीआईएल और बीईएल सीईओ के परामर्श से और अपने ऑथोराइज्ड इंजीनियरों के विवरण के साथ राज्यवार और जिलावार जांच और सत्यापन कार्यक्रम तैयार करेंगे। बता दें कि चुनाव आयोग ने 1 जून को सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में पहले दो उपविजेता उम्मीदवार कथित छेड़छाड़ या संशोधन के लिए ईवीएम माइक्रोकंट्रोलर के सत्यापन की मांग कर सकेंगे। यह विंडो परिणाम घोषित होने के सात दिनों तक खुली रहेगी। यही नहीं सत्यापन पर 5% की सीमा के संबंध में, ईसीआई ने कहा कि एक विधानसभा क्षेत्र/खंड जिसने, मान लीजिए, 400 मतपत्र इकाइयों, 200 नियंत्रण इकाइयों और 200 वीवीपीएटी का उपयोग किया है। ऐसे में 20 बैलेट यूनिट, 10 कंट्रोलिंग यूनिट और 10 वीवीपीएटी बर्न मेमोरी/माइक्रोकंट्रोलर का यूज इस उद्देश्य के लिए किया जाएगा। कुल मिलाकर, यह प्रक्रिया परिणामों की घोषणा के दो महीने के भीतर पूरी होने की उम्मीद है। इस उद्देश्य के लिए ईवीएम इकाइयों के स्टोरेज के लिए स्ट्रांग रूम के साथ एक सुरक्षित हॉल बनाया जाएगा। इसे वीडियोग्राफी के तहत उम्मीदवारों की उपस्थिति में खोला और बंद किया जाएगा।

जिला कलेक्टरों से क्या बोले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे?

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जिला कलेक्टरों से एक विनती की है! मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सभी सिविल सेवकों और अधिकारियों से एक अपील की है। उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिकारियों से आग्रह करती है कि वे संविधान का पालन करें, किसी से न डरें और मतगणना दिवस पर योग्यता के आधार पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। हम भावी पीढ़ियों के लिए आधुनिक भारत के निर्माताओं द्वारा रचित जीवंत लोकतंत्र और दीर्घकालिक संविधान के ऋणी हैं। खड़गे ने अधिकारियों के नाम लिखे अपने पत्र में कहा कि अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करें और बिना किसी भय, पक्षपात या द्वेष के राष्ट्र की सेवा करें। किसी से डरें नहीं। किसी असंवैधानिक तरीके के आगे न झुकें। अपने खुले पत्र में उन्होंने लिखा कि मैं आपको विपक्ष के नेता राज्यसभा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से लिख रहा हूँ। 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव संपन्न होतानाशाही शक्ति, धमकी, बलपूर्वक तंत्र और एजेंसियों के दुरुपयोग के साथ, सत्ता के आगे झुकने की यह प्रवृत्ति उनके अल्पकालिक अस्तित्व का एक तरीका बन गई है। हालांकि, इस अपमान में भारत का संविधान और लोकतंत्र हताहत हुए हैं। चुके हैं, 4 जून, 2024 को मतगणना होगी। मैं भारत के चुनाव आयोग, केंद्रीय सशस्त्र बलों, विभिन्न राज्यों की पुलिस, सिविल सेवकों, जिला कलेक्टरों, स्वयंसेवकों और आप में से हर एक को बधाई देना चाहता हूंं, जो इस विशाल और ऐतिहासिक कार्य के क्रियान्वयन में शामिल थे।

खरगे ने कहा, हमारे प्रेरणास्रोत और भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सिविल सेवकों को ‘भारत का स्टील फ्रेम’ कहा था। भारत के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही है जिसने भारत के संविधान के आधार पर कई संस्थाओं की स्थापना की, उनकी ठोस नींव रखी और उनकी स्वतंत्रता के लिए तंत्र तैयार किए। संस्थाओं की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, क्योंकि प्रत्येक सिविल सेवक संविधान की शपथ लेता है कि वह अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक और कर्तव्यनिष्ठा से निर्वहन करेगा तथा संविधान और कानून के अनुसार सभी प्रकार के लोगों के साथ बिना किसी भय या पक्षपात, स्नेह या द्वेष के सही व्यवहार करेगा”। इस भावना से हम प्रत्येक ब्यूरोक्रेट और अधिकारी से संविधान की भावना के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की अपेक्षा करते हैं, जो बिना किसी दबाव व धमकी के हो। उन्होंने कहा कि इस तथ्य को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस पार्टी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और हमारे अनगिनत प्रेरणादायी संस्थापक सदस्यों द्वारा तैयार संविधान के माध्यम से न केवल मजबूत शासन का ढांचा तैयार किया, बल्कि ब्यूरोक्रेसी और नागरिक समाज में हाशिए पर पड़े लोगों को हमारे स्वायत्त संस्थानों में प्रतिनिधित्व देकर सकारात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित की।

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि पिछले दशक में सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा हमारे स्वायत्त संस्थानों पर हमला करने, उन्हें कमजोर करने और दबाने का एक व्यवस्थित पैटर्न देखा गया है। परिणामस्वरूप भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंच रहा है। भारत को एक तानाशाही शासन में बदलने की व्यापक प्रवृत्ति है। हम तेजी से देख रहे हैं कि कुछ संस्थाएं अपनी स्वतंत्रता को त्याग रही हैं और बेशर्मी से सत्ताधारी पार्टी के हुक्मों का पालन कर रही हैं। कुछ ने पूरी तरह से उनकी संवाद शैली, उनके कामकाज के तरीके और कुछ मामलों में तो उनकी राजनीतिक बयानबाजी को भी अपना लिया है। यह उनकी गलती नहीं है। तानाशाही शक्ति, धमकी, बलपूर्वक तंत्र और एजेंसियों के दुरुपयोग के साथ, सत्ता के आगे झुकने की यह प्रवृत्ति उनके अल्पकालिक अस्तित्व का एक तरीका बन गई है। हालांकि, इस अपमान में भारत का संविधान और लोकतंत्र हताहत हुए हैं।

उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि ‘जनता की इच्छा’ सर्वोच्च है, और लोग चाहते हैं कि भारतीय ब्यूरोक्रेसी सरदार पटेल द्वारा परिकल्पित उसी ‘भारत के स्टील फ्रेम’ पर वापस लौट आए, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।जो बिना किसी दबाव व धमकी के हो। उन्होंने कहा कि इस तथ्य को रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस पार्टी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. बी.आर. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और हमारे अनगिनत प्रेरणादायी संस्थापक सदस्यों द्वारा तैयार संविधान के माध्यम से न केवल मजबूत शासन का ढांचा तैयार किया इस आशा के साथ कि भारत का स्वरूप वास्तव में लोकतांत्रिक बना रहे, मैं आप सभी को शुभकामनाएं देता हूंं और उम्मीद करता हूं कि संविधान के हमारे शाश्वत आदर्श बेदाग रहेंगे।

2019 के चुनावी परिणाम से कितना अलग है 2024 का परिणाम?

2024 का परिणाम 2019 के परिणाम से कितना अलग है आज हम आपको बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव, 2024 के नतीजे जल्द ही आने लगेंगे। सबसे पहले पोस्टल बैलेट की ही गिनती की जाएगी। उसके 30 मिनट बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) में दर्ज वोटों की ही गिनती शुरू होगी। ये पोस्टल बैलेट चुनाव नतीजों में अहम भूमिका निभाएंगे। माना जा रहा है कि इस बार देश में बड़ी संख्या में पोस्टल बैलेट से मतदान हुआ है। ऐसे में पोस्टल बैलेट की गिनती पर सबकी निगाहें रहेंगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में 8 राज्यों की 9 लोकसभा सीटों पर पोस्टल बैलेट के सहारे ही प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई थी।विपक्ष की यह भी मांग थी कि ईवीएम की ‘कंट्रोल यूनिट’ को सीसीटीवी निगरानी वाले कॉरीडोर से होकर ले जाया जाना चाहिए।मतदान केंद्रों के वीवीपैट पर्ची की रैंडम गिनती भी जरूरी होने से समय लगने लगा तो इस प्रक्रिया में बदलाव कर दिया गया। हाल ही में विपक्ष ने चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 54-A के मुताबिक वोटों की गिनती कराई जाए, जिसमें कहा गया है कि रिटर्निंग अधिकारी पहले पोस्टल बैलेट गिनेंगे। इससे पहले कांग्रेस नेता अजय माकन ने ‘एक्स’ पर आरोप लगाया कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के मतगणना एजेंटों को सहायक रिटर्निंग अधिकारी की टेबल पर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही। इन सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे।पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान 14 लोकसभा क्षेत्रों की जिन 9 सीटों पर जीत का अंतर 5000 वोट से ज्यादा था, वहां पर यह जीत हासिल हुई थी। ऐसे में यहां पर पोस्टल बैलेट गेमचेंजर साबित हुए थे।

2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में सबसे दिलचस्प वाकया उत्तर प्रदेश की मछली शहर सीट पर देखने को मिला था। जहां भाजपा प्रत्याशी ने बसपा के उम्मीदवार को बेहद कम मार्जिन 181 वोटों से हराया था। वहां पर कुल 2,814 पोस्टल बैलेट से वोट डाले गए थे।  2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की आरामबाग सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा प्रत्याशी को 1,142 वोटों से हराया था। यहां पर कुल 1,549 पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे।

चुनाव आयोग ने 18 मई, 2019 को नई गाइडलाइन जारी कर दी। इसमें कहा गया था कि पोस्टल बैलेट की गिनती के दौरान ही ईवीएम की भी गिनती हो सकती है। ईवीएम की गिनती पूरी होने के बाद ही वीवीपैट पर्चियों की गिनती पूरी की जा सकती है। आयोग का यह तर्क था कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलेट सिस्टम के जरिये पोस्टल बैलेट की संख्या काफी बढ़ गई थी। इसके अलावा, 5 मतदान केंद्रों के वीवीपैट पर्ची की रैंडम गिनती भी जरूरी होने से समय लगने लगा तो इस प्रक्रिया में बदलाव कर दिया गया। हाल ही में विपक्ष ने चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 54-A के मुताबिक वोटों की गिनती कराई जाए, जिसमें कहा गया है कि रिटर्निंग अधिकारी पहले पोस्टल बैलेट गिनेंगे। विपक्ष की यह भी मांग थी कि ईवीएम की ‘कंट्रोल यूनिट’ को सीसीटीवी निगरानी वाले कॉरीडोर से होकर ले जाया जाना चाहिए। इससे पहले कांग्रेस नेता अजय माकन ने ‘एक्स’ पर आरोप लगाया कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के मतगणना एजेंटों को सहायक रिटर्निंग अधिकारी की टेबल पर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही। आयोग ने इसका फौरन खंडन करते हुए कहा कि काउंटिंग एजेंटों को रिटर्निंग ऑफिसर या सहायक रिटर्निंग ऑफिसर की टेबल पर जाने की अनुमति दी गई है।

मतों की गिनती सुबह 8 बजे शुरू होती है। सबसे पहले पोस्टल बैलेट और इलेक्ट्रॉनिक पोस्टल बैलट की गिनती होती है। बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 8 राज्यों की 9 लोकसभा सीटों पर पोस्टल बैलेट के सहारे ही प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई थी। इन सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे। यही नहीं जहां भाजपा प्रत्याशी ने बसपा के उम्मीदवार को बेहद कम मार्जिन 181 वोटों से हराया था। वहां पर कुल 2,814 पोस्टल बैलेट से वोट डाले गए थे।  2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की आरामबाग सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा प्रत्याशी को 1,142 वोटों से हराया था। यहां पर कुल 1,549 पोस्टल बैलेट से वोट पड़े थे। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान 14 लोकसभा क्षेत्रों की जिन 9 सीटों पर जीत का अंतर 5000 वोट से ज्यादा था, वहां पर यह जीत हासिल हुई थी। ऐसे में यहां पर पोस्टल बैलेट गेमचेंजर साबित हुए थे। इसके तुरंत बाद ईवीएम के वोटों की गिनती शुरू होती है। करीब 1 घंटे बाद रुझान आने शुरू हो जाते हैं।

जब एयर इंडिया ने यात्रियों को दिए 350 डॉलर के वाउचर!

हाल ही में एयर इंडिया ने यात्रियों को 350 डॉलर के वाउचर दे दिए हैं! दिल्ली-सैन फ्रांसिस्को की फ्लाइट में 30 घंटे की देरी के कारण यात्रियों की खासी परेशानी का सामना करना पड़ा। इससे आहत एअर इंडिया ने शनिवार को उनसे ‘माफी’ मांगी, यही नहीं उन यात्रियों को 350 डॉलर का वाउचर भी दिया है। ये वाउचर सभी ट्रैवल क्लास में एक समान रूप से दिया गया, जिन्होंने इस फ्लाइट को पकड़ने के लिए इतना लंबा इंतजार किया। सूत्रों का कहना है कि बॉम्बे हाउस में टाटा के शीर्ष नेतृत्व ने उस एयरलाइन के प्रबंधन से भी बात की, जिसका अधिग्रहण उन्होंने करीब 2.5 साल पहले किया था। इसके बदलाव का यात्रियों को अभी भी इंतजार है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन एयरलाइन पर कड़ी नजर रख रहे हैं। शनिवार को दिल्ली-वैंकूवर नॉनस्टॉप फ्लाइट 20 घंटे से ज्यादा की देरी से चली, वहीं पिछले 10 दिनों में कैलिफोर्निया की दो नॉनस्टॉप उड़ानें 18 से 30 घंटे की देरी से चल रहीं। एअर इंडिया प्रबंधन ने वैंकूवर की फ्लाइट में देरी को रिएक्ट किया। उन्होंने कहा, ‘1 जून को AI185 नंबर की फ्लाइट को (सुबह 5.20 बजे) दिल्ली वैंकूवर के लिए उड़ान भरनी थी। हालांकि, तकनीकी समस्याओं और उसके बाद चालक दल के अनिवार्य उड़ान ड्यूटी की समय सीमा के तहत आने के कारण इसमें देरी हुई।

एअर इंडिया की ओर से इस दौरान मेहमानों को होटल में ठहरने की सुविधा दी गई और उन्हें पूरा रिफंड और किसी अन्य डेट पर कॉम्प्लिमेंट्री रीशिड्यूलिंग के साथ कैंसिलेशन का विकल्प दिया गया। परिचालन व्यवधान के कारण यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद है। 30 मई की AI-183 (दिल्ली-सैन फ्रांसिस्को) फ्लाइट में 237 यात्रियों ने बुकिंग किया था, इन यात्रियों एक नवजात मासूम भी था। हालांकि जब ये फ्लाइट 31 मई को निर्धारित डिपार्चर टाइम से 30 घंटे बाद रात 10 बजे के आसपास उड़ान भरी तो केवल 199 यात्रियों ने उड़ान भरने का विकल्प चुना। इस फ्लाइट के इंतजार में कुछ यात्री कथित तौर पर गुरुवार शाम को उड़ान भरने से पहले गर्म बोइंग 777 पर बेहोश हो गए। एअर इंडिया के मुख्य परिचालन अधिकारी क्लॉस गोएर्श ने शनिवार को इन यात्रियों को असुविधा के लिए माफी मांगी। उन्होंने लिखा कि कृपया यात्रियों को सैन फ्रांसिस्को लाने में हुई देरी के लिए एअर इंडिया की तरफ से मैं ईमानदारी से माफी मांगता हूं। ये देरी जो कई तकनीकी वजहों और अन्य परिचालन बाधाओं के कारण हुई थी। हमने तकनीकी मुद्दों को ठीक करने का प्रयास किया है, लेकिन स्पष्ट रूप से, देरी की अवधि लंबी थी और अनुभव वह नहीं था जो हम पेश करना चाहते थे। हालांकि, आपकी सुरक्षा पूरी तरह से सर्वोच्च प्राथमिकता थी।

एअर इंडिया के मुख्य परिचालन अधिकारी क्लॉस गोएर्श ने बताया कि माफी के तौर पर, हम आपको एयर इंडिया पर भविष्य की यात्रा के लिए 350 डॉलर का ट्रैवल वाउचर देना चाहते हैं। वैकल्पिक रूप से, हम आपके पेमेंट सोर्स या बैंक विवरण के माध्यम से यह राशि आपके खाते में जमा कर सकते हैं। हालांकि हम अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन मुझे विश्वास है कि यह अपील उनको हुई असुविधा और यात्रा में हुए व्यवधान में सच्चे दुख को दर्शाता है।

गोएर्श ने कहा, ‘एक बार फिर, हम अपनी सेवा में हुई इस चूक और आपको हुई असुविधा के लिए खेद व्यक्त करते हैं। मुझे उम्मीद है कि आप हमें भविष्य में बेहतर मानक के साथ फिर से सेवा देने की अनुमति देंगे।’ एअरलाइन को डीजीसीए के कारण बताओ नोटिस का जवाब देना है, जिसमें उससे पूछा गया है कि ‘यात्रियों को बार-बार असुविधा होने’ और ‘बार-बार यात्रियों की उचित देखभाल करने में विफल रहने’ के लिए उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। शुक्रवार को जारी डीजीसीए के नोटिस में कहा गया है, ’24/5 को AI179 और 30/5 की AI183 में अत्यधिक देरी हुई। केबिन में अपर्याप्त कूलिंग के कारण यात्रियों को असुविधा हुई।

डीजीसीए के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन करके एअर इंडिया की ओर से यात्रियों को असुविधा हुई। इसके कई उदाहरण सामने आए हैं। एआई ने ‘बोर्डिंग से इनकार, उड़ानों को रद्द करने और उड़ानों में देरी के कारण एयरलाइनों की ओर से यात्रियों को प्रदान की जाने वाली सुविधाओं’ के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। एआई बार-बार यात्रियों की उचित देखभाल करने और (उन नियमों) का पालन करने में विफल रहा है। एआई को तीन दिनों के भीतर यह बताने के लिए कहा गया है कि ‘उसके खिलाफ प्रवर्तन कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए’। पिछले शुक्रवार को मुंबई से एसएफओ जाने वाली AI179 18 घंटे देरी से चली।

क्या विपक्ष ने हल्के में ले लिया है मोदी जी को?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी जी को विपक्ष ने हल्के में ले लिया है या नहीं! एग्जिट पोल के आए नतीजों और 4 जून को आने वाले असली नतीजों में कोई बड़ा फर्क नहीं हुआ तो विपक्ष के सामने कोई एक दो सवाल नहीं होंगे। सवाल ऐसे कि शायद ही अगले कुछ महीनों, वर्षों में विपक्ष उसका जवाब खोज पाए। विपक्षी दल खासकर कांग्रेस के लिए मुश्किल घड़ी होगी। जैसा एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं उसके मुताबिक विपक्ष के लिए यह चुभने वाली हार होगी। कांग्रेस समेत दूसरे दलों की ओर से चुनाव में तमाम बड़े वादे किए गए लेकिन लगता है कि पब्लिक को उस पर यकीन नहीं हुआ। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी जिनकी बातों पर जनता को अब भी काफी भरोसा है। जो गारंटी की बात कही उस पर विश्वास है। बीजेपी की जीत और विपक्ष की हार के बाद विश्लेषण भी होगा लेकिन एक बात तो तय है कि विपक्ष एक बार फिर पीएम मोदी को पढ़ने में भूल कर गया। चुनाव में टकाटक, फटाफट और चुनाव खत्म होने से कुछ दिन पहले बिहार की धरती से सफाचट की बात कही गई। अब यह उल्टा पड़ता दिख रहा है। एक ओर एनडीए गठबंधन जिसकी अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे थे। तो वहीं दूसरी ओर विपक्ष जिसकी अगुवाई कौन कर रहा किसी को पता नहीं। एनडीए की ओर से सिर्फ मोदी की गारंटी थी तो वहीं विपक्ष की ओर से कांग्रेस, सपा, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, डीएमके के अपने-अपने वादे। कोई टकाटक अकाउंट में पैसे देने की बात कर रहा था तो कोई CAA खत्म करने की बात। कोई पीडीए की बात कर रहा था तो कोई पूरे देश में फ्री बिजली देने की बात कर रहा था। कई दल और कई सारे वादे। इन दलों की ओर से कहा जा रहा था कि बहुमत मिला तो हम अपने वादे पूरे कराने के लिए दबाव डालेंगे। कुल मिलाकर कहें कि जितने मुंह उतनी बातें। सभी दलों ने अपने-अपने राज्यों और वोटर्स के हिसाब से वादे किए। वहीं दूसरी ओर सिर्फ मोदी की गारंटी। अब एग्जिट पोल के नतीजों के हिसाब से यह गारंटी सब पर भारी पड़ रही है।

विपक्षी दलों की ओर से मेहनत नहीं की गई या उनकी रैलियों में भीड़ नहीं हुई, ऐसा नहीं कहा जा सकता। तेजस्वी, ममता बनर्जी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव समेत और दूसरे दलों के नेताओं की ओर से कई रैलियां की गईं। फिर ऐसा क्या हुआ कि नतीजे पूरी तरह तो क्या थोड़े बहुत भी फेवर में जाते नहीं दिख रहे। विपक्ष को लेकर जनता के मन में शुरू से सवाल था और यह सवाल पता नहीं कब से है। आखिर कौन विपक्ष की अगुवाई कर रहा है। इन दलों को यह समझना होगा कि सिर्फ यह कह देने से काम नहीं चलेगा कि नतीजों के बाद तय कर लिया जाएगा। यह कहना ही कई बार जनता के मन में संदेह पैदा करता है। कांग्रेस की ओर से महिलाओं को एक खास रकम देने की बात कही गई और भी कई वादे किए गए लेकिन उस पर जनता को यकीन नहीं हुआ। वहीं मोदी अपनी जीत को लेकर शुरू से ही आश्वस्त दिख रहे हैं। फ्री राशन, आवास, जल ऐसी कई योजनाएं थीं जिसका पब्लिक को सीधा लाभ मिल रहा है। यह बात मोदी के फेवर में जाती दिख रही हैं।

2014, 2019 और अब एग्जिट पोल नतीजों के हिसाब से 2024 में जीत के बाद मोदी हैट्रिक बनाने जा रहे हैं। 4 जून को नतीजे उलट नहीं हुए तो विपक्ष चाहें जो दलील दे लेकिन एक बात तय है कि पब्लिक के मन में चुनाव की शुरुआत से ही कोई शंका नहीं थी। पब्लिक किसी किंतु परंतु के मूड में शुरू से नहीं है। विपक्ष भले ही जनता और मोदी को भांपने में चूक कर रही थी लेकिन पब्लिक का मत एकदम क्लियर था। लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटना कोई आसान काम नहीं। मोदी ऐसा करते हुए दिख रहे हैं। सिर्फ केंद्र ही नहीं हाल के कई राज्यों के चुनाव में भी जनता अपना मत स्पष्ट तौर पर दे रही है। जिस दल को सत्ता सौंपनी है उसे पूरी मजबूती के साथ कुर्सी पर बिठाना है। कोई एक या दो बात मोदी के फेवर में गई है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। विपक्षी दलों ने मिलकर इंडिया गठबंधन तो बना लिया लेकिन पब्लिक को उस पर पूरी तरह यकीन नहीं हो रहा था। जो साथ आ भी रहे थे वह कंडीशन के साथ। ऐसे में लगता है कि जनता को नियम और शर्तें लागू वाली बात पसंद नहीं आई।

आखिर कौन सी पार्टी है पैन इंडिया पार्टी, कांग्रेस या बीजेपी?

आज हम आपको बताएंगे कि कौन सी पार्टी पैन इंडिया पार्टी है कांग्रेस या बीजेपी! क्या बीजेपी वाकई उत्तर भारत या हिंदी बेल्ट की पार्टी है? क्या भाजपा दक्षिण भारत में कांग्रेस के मुकाबले बहुत कमजोर है? कम-से-कम धारणा तो यही है कि बीजेपी सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी है, पैन इंडिया पार्टी तो कांग्रेस ही है। लंबे समय से यह नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा है कि कांग्रेस का पूरे भारत में जनाधार है, लेकिन बीजेपी उत्तर भारत तक सीमित है। नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लोकसभा चुनाव लड़ने से 2014 में बीजेपी के दबदबे वाले राज्यों की लिस्ट बढ़ी और पश्चिमी भारत के प्रदेश भी जुड़ गए लेकिन दक्षिण का किला तो फिर भी अजेय रहा। ऐसा बताने वाले कर्नाटक को अपवाद बताते हैं और कहते हैं कि तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में तो बीजेपी का खाता भी नहीं खुलता है। लेकिन सच्चाई यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण के राज्यों से बीजेपी को 30 सीटें आई थीं जबकि कांग्रेस को 29 सीटें। इस बार के लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल्स के नतीजे जिस ओर इशारा कर रहे हैं, उससे तो यह साफ संकेत मिल रहा है कि बीजेपी का दक्षिण के सभी राज्यों में खाता खुल सकता है। अब आइए पैन इंडिया वाले नैरेटिव की पड़ताल करते हैं। इसके लिए हमने देश के सभी राज्यों को चारों दिशाओं के आधार पर बांटा है। पूरब में कुल 13 राज्य और 153 लोकसभा सीटें हैं। पश्चिम के चार राज्यों में लोकसभा के 101 निर्वाचन क्षेत्र हैं। वहीं, उत्तर भारत के 10 राज्यों में 155 जबकि दक्षिण के नौ प्रदेशों में कुल 134 लोकसभा सीटें हैं। चारों दिशाओं की कुल सीटों को जोड़ें तो लोकसभा की कुल 543 सीटें हो जाती हैं। अब 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में इलाका दर इलाका बीजेपी और कांग्रेस को मिलीं सीटों का आकलन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि बीजेपी हर दिशा में कांग्रेस से आगे रही। दक्षिण का इलाका छोड़ दें तो बीजेपी अन्य दिशाओं में कांग्रेस से कई गुना आगे है। मजे की बात है कि जिस कांग्रेस को दक्षिण के राज्यों के आधार पर ही पैन इंडिया पार्टी बताया जाता है, वहां भी उसे बीजेपी के मुकाबले एक सीट कम ही आई थी।

अगर कोई कहे कि दक्षिण भारत में भले ही कांग्रेस से एक सीट ज्यादा लाई हो, लेकिन उसे तो कर्नाटक से ही एकमुश्त सीटें आईं, बाकी प्रदेशों में उसकी मौजूदगी नहीं है। तो यह भी सच है कि कांग्रेस को भी एकमुश्त केरल से ही सीटें आई हैं, उसका भी दक्षिण के अन्य राज्यों में कोई मजबूत मौजूदगी नहीं है। हमने दक्षिण के राज्यों में कुल 10 प्रदेशों को रखा है- कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल, आंध्र प्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, दादर एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव, लक्षद्वीप और पुदुचेरी को रखा है। इन 10 में से कांग्रेस ने छह प्रदेशों मे खाता खोला था तो बीजेपी को तीन प्रदेशों से सीटें आई थीं। बीजेपी ने कर्नाट के साथ-साथ तेलंगाना और दादर एवं नगर हवेली से सीटें मिली थीं। वहीं, कांग्रेस कर्नाटक में एक सीट से सिर्फ खाता खोल पाई थी जबकि तेलंगाना में उस बीजेपी से एक सीट कम मिली थी।

इस तरह उसे सिर्फ केरल और तमिलनाडु में बढ़त मिली जहां बीजेपी का खाता नहीं खुल पाया था। आंध्र प्रदेश में बीजेपी शून्य रही तो कांग्रेस भी जीरो पर ही आउट हुई थी। उसके खाते में दक्षिण का एक अतिरिक्त प्रदेश पुदुचेरी के रूप में जुड़ा जहां लोकसभा की महज एक सीट है। इस तरह सैद्धांतिक तौर पर तो दक्षिण में बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस की मौजूदगी दोगुने राज्यों में है, लेकिन हकीकत में सिर्फ दो राज्य केरल और तमिलनाडु ही हैं जहां कांग्रेस को सीटें मिलीं और बीजेपी ऑल आउट रही। तो ये है दक्षिण में कांग्रेस की मौजूदगी और बीजेपी के नदारद रहने के नैरेटिव की सच्चाई। अब अगर एग्जिट पोल के नतीजे 4 जून को असली रिजल्ट्स में तब्दील हो गए तो इस बार केरल, तमिलनाडु से बीजेपी की गैर-मौजूदगी का सिलसिला भी थम जाएगा। लगभग सभी एग्जिट पोल्स बता रहे हैं कि दक्षिण के इन दोनों राज्यों में इस बार बीजेपी का खाता खुल रहा है। कुछ एग्जिट पोल्स तो तमिलनाडु में 5 से 8 जबकि केरल में 2 से 4 सीटें तक दे रहे हैं। ऐसा हुआ तो इन दोनों राज्यों में बीजेपी का खाता खुलना नहीं कहलाएगा बल्कि दमदार मौजूदगी होगी।

अब अगर दक्षिणी राज्यों की बात कर लें तो कांग्रेस आंध्र प्रदेश (25), दादर नागर हवेली और दमन एवं दीव (2) और लक्षद्वीप (1) यानी कुल तीन ऐसे प्रदेशों से नदारद रही जहां कुल 28 सीटें हैं जबकि बीजेपी के लिए यह आंकड़ा क्रमशः 7 और 87 (तमिलनाडु – 39, केरल – 20, आंध्र प्रदेश – 25, अंडमान निकोबार द्वीप समूह – 1, दादर एवं नगर हवेली – 1, लक्षद्वीप और पुदुचेरी -1) हैं। अब पूरे देश की बात करें तो कांग्रेस कुल 120 सीटों वाले 18 प्रदेशों से गायब रही जबकि बीजेपी कुल 11 ऐसे प्रदेशों से गायब रही जहां से कुल मिलाकर 93 सीटे हैं। मतलब, प्रदेशों और लोकसभा सीटों की संख्या, दोनों पैमानों पर बीजेपी की मौजूदगी कांग्रेस से कहीं अधिक है। तो क्या यह नैरेटिव सही है कि कांग्रेस तो पैन इंडिया पार्टी है, लेकिन कांग्रेस नहीं?

ऊपर के आंकड़ों से आप समझ गए होंगे कि कांग्रेस के असल में राष्ट्रीय दल और बीजेपी के उत्तर-पश्चिम तक सीमित रहने की धारणा कितनी गलत है। जहां तक बात 2024 के लोकसभा चुनावों की है तो अधिकतर पोल्स बता रहे हैं कि बीजेपी का भौगोलिक विस्तार और भी बड़ा हो रहा है।

आखिर कौन है भारतीय मूल की रुचिरा कंबोज?

आज हम आपको भारतीय मूल की रुचिरा कंबोज के बारे में बताने जा रहे हैं! संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहली महिला स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज रिटायर हुईं। रुचिरा 2 अगस्त, 2022 को न्यूयॉर्क में भारत की स्थायी प्रतिनिधि/राजदूत बनीं थी। वे 35 साल की सेवा के बाद रिटायर हुई हैं। इस दौरान उन्होंने भूटान, दक्षिण अफ्रीका और यूनेस्को में भारतीय राजदूत के रूप में काम किया। कंबोज 1987 बैच की आईएफएस अधिकारी हैं। उन्होंने शनिवार को सोशल मीडिया पर लिखा, ‘भारत को असाधारण वर्षों और अविस्मरणीय अनुभवों के लिए धन्यवाद।ट पिछले दो सालों में, रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्ध के दौरान, कंबोज ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में चर्चाओं में भारत का नेतृत्व किया। मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग में फर्स्ट सेक्रेटरी, और भारतीय विदेश सेवा कार्मिक एवं कैडर विभाग में उप सचिव और निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया है और उन्हें उनके ओजस्वी भाषणों और भारत की बात को दमदार तरीके से रखने के लिए जाना जाता है।रुचिरा कंबोज 1987 की सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिलाओं में अव्वल रहीं और उसी साल की विदेश सेवा परीक्षा में भी टॉप रहीं। 2 अगस्त 2022 को वह न्यूयॉर्क में भारत की स्थायी प्रतिनिधि/राजदूत बनीं। कंबोज हिंदी, अंग्रेजी और फ्रेंच तीन भाषाओं की जानकार हैं। उन्होंने 1989 से 1991 तक फ्रांस में भारतीय दूतावास में तीसरे सचिव के रूप में अपने कूटनीतिक कैरियर की शुरुआत की। इंडियन मिशन की वेबसाइट के अनुसार, 2002 से 2005 तक वह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में काउंसलर रहीं, जहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार, मध्य पूर्व संकट आदि जैसे कई राजनीतिक मुद्दों को देखा।

रूचिरा कंबोज का शानदार करियर यहीं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय में महासचिव कार्यालय की उप प्रमुख के रूप में भी काम किया है। 2011 से 2014 तक, वह भारत की चीफ ऑफ प्रोटोकॉल रहीं, जो इस पद को संभालने वाली सरकार में अब तक की पहली और इकलौती महिला हैं। पेरिस में यूनेस्को में अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान, उनके नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं। कंबोज भारतीय विदेश मंत्रालय में यूरोप वेस्ट डिवीजन में अंडर सेक्रेटरी, मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग में फर्स्ट सेक्रेटरी, और भारतीय विदेश सेवा कार्मिक एवं कैडर विभाग में उप सचिव और निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं।रुचिरा कंबोज 1987 की सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिलाओं में अव्वल रहीं और उसी साल की विदेश सेवा परीक्षा में भी टॉप रहीं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य किया है और उन्हें उनके ओजस्वी भाषणों और भारत की बात को दमदार तरीके से रखने के लिए जाना जाता है।

मई 2014 में, विदेश मंत्रालय ने उन्हें एक खास कार्य के लिए दिल्ली बुलाया, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का संचालन किया जा सके। फरवरी 2019 में वह भारतीय राजदूत के रूप में भूटान गईं और अपने कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण पहल कीं। वह जुलाई 2017 से 2019 की शुरुआत तक दक्षिण अफ्रीका में भारत की उच्चायुक्त भी रहीं, साथ ही लेसोथो साम्राज्य में भी मान्यता प्राप्त थीं। उनकी निजी जिंदगी के बारे में बताएं तो, उनकी शादी दिवाकर कंबोज से हुई है और उनकी एक बेटी है। बता दें कि भारत को असाधारण वर्षों और अविस्मरणीय अनुभवों के लिए धन्यवाद।ट पिछले दो सालों में, रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्ध के दौरान, कंबोज ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में चर्चाओं में भारत का नेतृत्व किया। रुचिरा कंबोज 1987 की सिविल सेवा परीक्षा में पूरे भारत में महिलाओं में अव्वल रहीं और उसी साल की विदेश सेवा परीक्षा में भी टॉप रहीं।

2 अगस्त 2022 को वह न्यूयॉर्क में भारत की स्थायी प्रतिनिधि/राजदूत बनीं। उनके दिवंगत पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे और उनकी मां दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत की प्रोफेसर रही हैं।यहि नहीं पेरिस में यूनेस्को में अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान, उनके नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं। कंबोज भारतीय विदेश मंत्रालय में यूरोप वेस्ट डिवीजन में अंडर सेक्रेटरी, मॉरीशस में भारतीय उच्चायोग में फर्स्ट सेक्रेटरी, और भारतीय विदेश सेवा कार्मिक एवं कैडर विभाग में उप सचिव और निदेशक के रूप में काम कर चुकी हैं। रुचिरा कंबोज ने हाल ही में अपने चार दशक के शानदार करियर के बाद रिटायरमेंट ली है। उनके योगदान और उनकी सेवाओं को भारतीय विदेश सेवा में बहुत सराहा गया है।

आखिर 2024 में भी कैसे बनी एनडीए की सरकार?

आज हम आपको बताएंगे कि 2024 में भी एनडीए की सरकार कैसे बनी! लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद एग्जिट पोल के नतीजों में एनडीए एक बार फिर से सत्ता में वापसी करती दिख रही है। लगभग सभी एग्जिट पोल में बीजेपी नीत एनडीए को 350 से 400 सीट मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है। यदि 4 जून के नतीजे एग्जिट पोल के नतीजों की तर्ज पर ही होते हैं तो एनडीए के साथ ही पीएम मोदी भी सत्ता में हैट्रिक लगाने में कामयाब होंगे। अब सवाल है कि आखिर एनडीए की इस कामयाबी के पीछे की वजह क्या है। राजनीतिक विश्लेषक अक्सर मोदी सरकार की नीतियों का जिक्र करते हैं। दूसरी तरफ एनडीए की कामयाबी को लेकर चुनावी पंडित या एग्जिट पोल करने वाले विश्लेषक क्या सोचते हैं। इस बारे में जानने की कोशिश करते हैं। लोकसभा चुनाव को लेकर एग्जिट पोल में एनडीए की सत्ता में वापसी को लेकर CVOTER के संस्थापक, यशवंत देशमुख कहते हैं, NDA मुख्य रूप से इसलिए जीत रहा है क्योंकि पीएम मोदी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा वे जहां भी जीत रहे हैं, वहां अलग-अल राज्यों में वोट शेयर का बहुत बड़ा अंतर है। देशमुख ने कहा कि पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र अच्छा मुकाबला देखने को मिल रहा है।तेलंगाना विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल आए, तो उस समय सीएम पद के लिए प्रस्तावित नेता ने टीवी चैनलों पर आकर इंटरव्यू दिए कि पार्टी इन एग्जिट पोल को देखने के लिए उत्साहित है। उस समय सभी एग्जिट पोल ने कहा था कि कांग्रेस तेलंगाना में सरकार बनाएगी। इन दोनों राज्यों में प्रत्येक सीट पर मुकाबला है। इन राज्यों से परे, लगभग सभी राज्य एकतरफा बीजेपी और एनडीए के पक्ष में दिख रहे हैं। एग्जिट पोल को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरफ से ‘मोदी फैंटेसी पोल को लेकर भी देशमुख ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि राजनेता जो चाहें कहने के लिए स्वतंत्र हैं। वे कह सकते हैं कि वे पीएम मोदी के फैंटेसी पोल हैं, लेकिन जब हमारे एग्जिट पोल दिखा रहे थे कि कांग्रेस कर्नाटक या तेलंगाना या पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब, केरल और तमिलनाडु में अन्य INDIA गठबंधन सहयोगियों में जीत रही है, जब भी हम कह रहे थे कि वे आगे चल रहे हैं और वे जीत रहे हैं, तो क्या हम राहुल गांधी या अरविंद केजरीवाल या ममता बनर्जी या स्टालिन के फैंटेसी पोल थे?

वहीं, एग्जिट पोल कर ने वाली एक अन्य एजेंसी जन की बात के संस्थापक प्रदीप भंडारी ने कहा कि हम लोगों ने जमीन पर लोगों से बातचीत की है। डेटा सर्वे और बातचीत के आधार पर यह सामने आ रहा है कि देश की जनता नरेंद्र मोदी को तीसरी बार जनादेश देना चाहती है। उन्होंने कहा कि हमारे जमीनी विश्लेषण के आधार पर देश की जनता नरेंद्र मोदी को बड़ा जनादेश दे रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इस बयान पर कि “यह एग्जिट पोल नहीं, मोदी मीडिया पोल है। यह उनका काल्पनिक पोल है। इस पर भंडारी ने कहा कि शायद राहुल गांधी राजनीतिक मजबूरियों के कारण सेलेक्टिव मेमरी लॉस से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि जब तेलंगाना विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल आए, तो उस समय सीएम पद के लिए प्रस्तावित नेता ने टीवी चैनलों पर आकर इंटरव्यू दिए कि पार्टी इन एग्जिट पोल को देखने के लिए उत्साहित है। उस समय सभी एग्जिट पोल ने कहा था कि कांग्रेस तेलंगाना में सरकार बनाएगी। दुख की बात है कि जब एग्जिट पोल आपके पक्ष में नहीं होते हैं – तो यह उन हजारों पेशेवरों का अपमान है जो इस भीषण गर्मी में जमीन पर कड़ी मेहनत करते हैं।

सी वोटर के एग्जिट पोल के मुताबिक, देश में एनडीए तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने जा रही है। एनडीए को 353-383 सीटें मिल सकती है। एग्जिट पोल के अनुसार एनडीए 2019 के लोकसभा चुनाव से बड़ी जीत दर्ज कर सकती है। बता दें कि NDA मुख्य रूप से इसलिए जीत रहा है क्योंकि पीएम मोदी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा वे जहां भी जीत रहे हैं, वहां अलग-अल राज्यों में वोट शेयर का बहुत बड़ा अंतर है। देशमुख ने कहा कि पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र अच्छा मुकाबला देखने को मिल रहा है। इन दोनों राज्यों में प्रत्येक सीट पर मुकाबला है। इन राज्यों से परे, लगभग सभी राज्य एकतरफा बीजेपी और एनडीए के पक्ष में दिख रहे हैं। वहीं, इंडिया गठबंधन को 152-182 और अन्य को 0-4 सीट मिलने का अनुमान है। वोट शेयर की बात करें तो , एनडीए का 45 प्रतिशत, इंडिया गठबंधन का 40 प्रतिशत और अन्य का 15 प्रतिशत वोट शेयर रह सकता है।

क्या लोकसभा चुनाव में काम आया मोदी जी का फैक्टर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में मोदी जी का फैक्टर काम आया या नहीं! लोकसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं। एग्जिट पोल के बाद अब देश को इंतजार है 4 जून का। इस दिन सात चरणों में चली कवायद का परिणाम देश के सामने होगा। एग्जिट पोल में बीजेपी की हैट्रिक की भविष्यवाणी की गई है। ऐसे में सवाल है कि आखिर क्या वजह है कि बीजेपी नीत एनडीए केंद्र में हैट्रिक लगा सकता है। इस बारे में देश के जाने माने चुनाव विश्लेषक और सर्वे एजेंसी एक्सिस माय इंडिया के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. प्रदीप गुप्ता ने बातचीत की। इस दौरान प्रदीप ने एग्जिट पोल, लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर का असर, राहुल गांधी के ‘खटाखट’ वाले बयान सहित कई मुद्दे पर अपनी खुलकर राय रखी। भाजपा के लिए ‘मोदी फैक्टर’ सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर काम आया है और हमने पाया ‘स्ट्रांग प्रो इनकंबेंसी’ मोदी सरकार के फेवर में है। राहुल गांधी या कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन के लिए चुनाव लड़ा है। क्षेत्रीय पार्टियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में चुनाव लड़ा है, जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड में चुनाव वहां की क्षेत्रीय पार्टियों ने लड़ा है। राहुल गांधी ब्रांड के तौर पर तो नजर नहीं आते, कांग्रेस की जहां सरकार है कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश में वहां पर कांग्रेस के मतदाता राहुल गांधी के नाम पर वोट नहीं देते हैं,तमिलनाडु और केरल में इसके बाद भी भाजपा 2-4 सीट ही ला रही है। लेकिन, शुरुआत किसी पार्टी के लिए इसी तरह की होती है। बल्कि वहां की कांग्रेस सरकार सुविधाओं और व्यवस्थाओं के आधार पर वोट मांगती है और स्थानीय लोग इसी पर वोट देते हैं।

चुनाव के दौरान ‘खटाखट-खटाखट’ जैसे कैंपेन और मुहावरे तब काम आते हैं, जब कंटेंट हो और प्रोडक्ट होना चाहिए, तभी उसकी मार्केटिंग की जा सकती है। पैकेजिंग और मार्केटिंग एक अभिन्न हिस्सा है, लेकिन आपके प्रोडेक्ट के बिना मार्केटिंग अमूमन काम नहीं आती है। अंगूर खट्टे वाली बात है, वो उनका अधिकार है, वो किसी भी रूप में सर्वे को ले सकते हैं, उनको खुद को पता है कि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना में इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में उनको भारी जीत मिली थी तब उनको बहुत अच्छा लग रहा था। ‘आज तक’ के सेट पर अंजना से कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे थे कि प्रदीप गुप्ता आज तो बहुत सुहावने लग रहे हैं। वह रिकॉर्ड निकालकर देख लें, उनको जवाब मिल जाएगा।

एक समय के बाद जनता परिवर्तन चाहती है, दक्षिण की जनता देख रही है पिछले 10 साल में देश के अन्य राज्यों में केंद्र सरकार की योजनाओं का लोगों को लाभ मिला है। भाजपा ने दक्षिण में काफी मेहनत की है। जहां पर वह कमजोर थी, उन्होंने वहां पर अपनी पूरी ताकत और रिसोर्स लगाए। तमिलनाडु और केरल में इसके बाद भी भाजपा 2-4 सीट ही ला रही है। लेकिन, शुरुआत किसी पार्टी के लिए इसी तरह की होती है।

अरविंद केजरीवाल की बात है, हमने 2014 और 2019 के चुनाव में देखा है कि विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी अच्छा करती है, इस बार एमसीडी में अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन, मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अलग प्रकार से वोट करते हैं, अलग पार्टियों को चुनते हैं और केंद्र में मोदी सरकार है। सभी यह जानते हैं कि जो आम आदमी पार्टी को वोट देंगे तो उससे उनकी सरकार नहीं बनेगी। आज की तारीख में जनता ‘क्लियर कट मेंडेट’ देने में विश्वास रखती है, फिर चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव।क्षेत्रीय पार्टियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में चुनाव ल9ड़ा है, जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड में चुनाव वहां की क्षेत्रीय पार्टियों ने लड़ा है। राहुल गांधी ब्रांड के तौर पर तो नजर नहीं आते, कांग्रेस की जहां सरकार है कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश में वहां पर कांग्रेस के मतदाता राहुल गांधी के नाम पर वोट नहीं देते हैं, बल्कि वहां की कांग्रेस सरकार सुविधाओं और व्यवस्थाओं के आधार पर वोट मांगती है और स्थानीय लोग इसी पर वोट देते हैं। हर व्यक्ति मजबूत सरकार चाहता है, किसी भी पार्टी का गठबंधन न होना यह दर्शाता है कि आपके आपसी मतभेद हैं तो फिर आप किस आधार पर वोट मांग रहे हैं। पश्चिम बंगाल में पिछली बार भाजपा की 18 सीटें आई थी। वहीं, टीएमसी 22 सीटों पर जीती थी। जनता इसी आधार पर वोट डाल रही है कि हम जिसे चुने, उसी की सरकार बननी चाहिए।