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क्या 2004 जैसे हालात 2024 में भी होंगे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 2024 में 2004 जैसे हालात होंगे या नहीं! एक तारीख को आए एग्जिट पोल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सभी ने प्री-पोल सर्वे में कहा था कि भारतीय जनता पार्टी आराम से चुनाव जीत रही है। मगर किसी ने उनकी सीटें इतनी बढ़कर आने की कल्पना शायद नहीं की थी। खास तौर से चुनाव के दौरान ढेर सारी ऐसी बातें उठीं कि कई जगह कांटे का मुकाबला हो गया है! यह कहा गया कि हो सकता है बीजेपी को आसानी से 272 भी ना मिले! उस लिहाज से ये चौंकाने वाले आंकड़े हैं। सवाल उठता है कि क्या 4 जून को जब असली नतीजे आएंगे, तो चीजें बदल जाएंगी? मेरा मानना है कि नहीं। ज्यादातर एग्जिट पोल में राष्ट्रीय स्तर पर जो संख्या दी गई है, लगभग एक जैसी है। सभी ने कहा है कि BJP आराम से 320 या उससे ऊपर जा सकती है और NDA 370-375 के ऊपर। वहीं कांग्रेस अपनी सीटों में मामूली सा ही इजाफा करेगी। चूंकि सारे पोल्स में एक समानता है तो नतीजे इसके उलट आने बहुत ही मुश्किल हैं। हद से हद 10-15 सीटें इधर-उधर हो सकती हैं, पर अब यह मान लिया जाए कि BJP पूर्ण बहुमत से, और 2019 के मुकाबले में ज्यादा सीटें और वोट लेकर सत्ता में आ रही है।

दूसरी बड़ी बात हमने एग्जिट पोल में यह देखी कि BJP अपने कोर स्टेट में 2014-2019 जैसा ही प्रदर्शन कर रही है। ये राज्य हैं- हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कनार्टक, गुजरात और मध्य प्रदेश। उसे थोड़ा-बहुत जो नुकसान हो सकता है, वह हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, झारखंड और बिहार में हो सकता है। इसी कड़ी में आप असम और नॉर्थ ईस्ट भी जोड़ सकते हैं। मगर ये नुकसान बहुत ही छोटे होंगे। BJP बंगाल की खाड़ी के किनारे लगभग सभी राज्यों में बड़ा फायदा पाने जा रही है। मेरे ख्याल से इतने लाभ की कल्पना शायद BJP ने भी नहीं की होगी। बंगाल में माना जा रहा था कि शायद दो-चार सीटें बढ़ेंगी, वहां पर वह बड़ी जीत हासिल कर सकती है। ओडिशा-तेलंगाना में भी यही हो रहा है। आंध्र में TDP के साथ गठबंधन में काफी सीटें जीत रही है। अगर एग्जिट पोल सही होता है तो यह पहली बार होगा जब देश के हर बड़े राज्य में BJP का कम से कम एक सांसद होगा।

एग्जिट पोल बताते हैं कि कांग्रेस ने केरल और पंजाब में अपना गढ़ बचाकर रखा है। थोड़ा-बहुत उसे लाभ है तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान में। पर मोटी बात यह है कि कांग्रेस के प्रदर्शन में खास सुधार नहीं हुआ है। सबसे बड़ा झटका लगता दिख रहा है आम आदमी पार्टी को, जिसके पास शायद कोई भी सीट ना हो, या एक-दो सीटें पंजाब से आएं। भारत राष्ट्र समिति को भी तेलंगाना में धक्का लग रहा है। बीजू जनता दल को ओडिशा में तो तृणमूल कांग्रेस को वेस्ट बंगाल में झटका लग रहा है।

यह स्थिति इस वजह से भी हुई कि शायद विपक्ष की जो रणनीति चुनाव के दौरान बन रही थी, वह सफल नहीं हुई। विपक्ष ने सितंबर 2023 से लेकर फरवरी 2024 तक अपना समय गठबंधन की इन बातों में गंवाया कि कौन बाहर जा रहा है, कौन कितनी सीटें लड़ेगा? अंतत: उसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। 1 जून को जो एग्जिट पोल में दिखा है अगर वह 4 जून को सच होता है तो यह भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा बदलाव होगा। पहला बदलाव 2014 से शुरू हुआ। जिसमें BJP जो पहले सिर्फ उत्तर-पश्चिम की पार्टी थी, वह 2019 में पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंच गई, और 2024 में उसने अपना दायरा बढ़ा लिया। वह बंगाल की खाड़ी से सटे राज्यों और साउथ में भी चली गई। दूसरी बात, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली BJP सरकार लगातार तीसरे टर्म में जब वापस आ रही है तो हर बार अपना वोट और सीट शेयर बढ़ाती जा रही है।

यह बहुत ही अनोखी चीज है। ऐसा पहले भारत में कभी नहीं हुआ। नेहरू जी भी तीन टर्म जीतकर आए थे पर उनकी पार्टी का फैलाव बढ़ नहीं रहा था। यही चीज इंदिरा जी के साथ भी हुई। तीसरी बात, अगर ये नतीजे सही हुए तो आने वाले समय में विपक्ष के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि विधानसभा चुनाव के स्तर पर मुकाबला टक्कर का नहीं होगा और BJP आसानी से जीत जाएगी। पर नैशनल लेवल पर BJP को चुनौती देने का विपक्ष का जो सपना है, अब वह पांच साल के लिए मुल्तवी हो चुका है।

आखिर मोदी और मुसलमान का कैसा है रिश्ता?

आज हम आपको बताएंगे कि मोदी और मुसलमान का रिश्ता आखिर कैसा है! उनकी गहरी राजनीतिक सूझबूझ को देखते हुए यह मानना सही होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंटरव्यू में अपने इस दावे के खिलाफ होने वाली प्रतिक्रिया का अनुमान लगाया होगा कि उन्होंने ‘हिंदू-मुस्लिम’ नहीं किया। पहली नजर में, यह एक साहसी दावा था, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के चुनाव अभियान में ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ राजनीतिक तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण पर हमले हावी रहे हैं, जिनमें से कुछ सबसे आक्रामक दावे उन्होंने खुद किए हैं।यह खास तौर पर दुस्साहसिक था, क्योंकि यह राजस्थान के बांसवाड़ा में 21 अप्रैल को दिए गए उनके विवादास्पद भाषण के महज कुछ हफ्ते बाद आया था, जिसमें उन्होंने कांग्रेस पर देश के संसाधनों को ‘अधिक बच्चे पैदा करने वालों’ और ‘घुसपैठियों’ को सौंपने का आरोप लगाया था। इसे व्यापक रूप से मुसलमानों के संदर्भ में समझा गया, जिन पर बीजेपी की तरफ से लगातार यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे जनसांख्यिकीय संतुलन को अपने पक्ष में करने के लिए कथित षड्यंत्र के तहत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं। उन्होंने यही कहा था, ‘पहले जब उनकी सरकार थी, उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब, ये संपत्ति इकट्ठी करके किसको बाटेंगे? जिनके ज्यादा बच्चे हैं उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे। क्या आपके मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा? आपको मंजूर है ये?’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘कांग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया है कि वे माताओं और बेटियों के सोने का जायजा लेंगे, और फिर वे उस धन को उन लोगों में बांट देंगे, जिनके बारे में मनमोहन सिंह सरकार ने कहा था ‘धन पर पहला अधिकार मुसलमानों का है।’ भाइयो और बहनो, यह शहरी नक्सली सोच मेरी माताओं और बहनों के मंगलसूत्र को भी नहीं छोड़ेगी।’

भले ही उन्होंने सीधे तौर पर मुसलमानों का जिक्र नहीं किया, लेकिन जब इसे ‘जिनके ज्यादा बच्चे हैं उनको बांटेंगे, घुसपैठियों को बांटेंगे’ के साथ पढ़ा जाए तो यह मुसलमानों की ओर एक छिपा हुआ इशारा था। एक प्रमुख मुस्लिम बुद्धिजीवी ने, जो खुलकर सामने नहीं आना चाहते थे, कहा: ‘भले ही बांसवाड़ा में उनके भाषण का कुछ हिस्सा अनुवाद में खो गया हो, लेकिन उससे सीधे-सीधे इनकार करना भी ठीक नहीं।’ हालांकि, अपने एक टीवी इंटरव्यू में मोदी ने जोर देकर कहा, ‘मैंने हिंदू या मुसलमान नहीं कहा। मैंने कहा है कि आपको उतने ही बच्चे पैदा करने चाहिए, जितने का आप पालन-पोषण कर सकते हैं। ऐसी स्थिति न बनाएं कि सरकार को मदद करनी पड़े।’ जब उनसे पूछा गया कि क्या मुसलमान उन्हें वोट देंगे, तो उन्होंने कहा, ‘मैं मानता हूं कि मेरे देश के लोग मुझे वोट देंगे। मैं जिस दिन हिंदू-मुसलमान करूंगा ना, उस दिन मैं सार्वजनिक जीवन में रहने योग्य नहीं रहूंगा। और मैं हिंदू-मुसलमान नहीं करूंगा। ये मेरा संकल्प है।’

फिर भी, जैसा कि कई लोगों ने खुशी-खुशी बताया, अपने इनकार के 24 घंटे के भीतर ही वे फिर से ‘हिंदू-मुस्लिम’ पर आ गए और कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए केंद्रीय बजट का 15% विशेष रूप से मुसलमानों पर खर्च करने की योजना बनाई थी, लेकिन उनकी पार्टी के विरोध के बाद इसे छोड़ दिया। खास बात ये है कि उनकी टिप्पणियों ने मुसलमानों की तुलना में उदार हिंदुओं में अधिक उत्साह पैदा किया है, जिन्होंने ऐसी बातों को सहजता से लेना सीख लिया है। अधिकांश ने व्यंग्यात्मक मुस्कान और जानबूझकर कंधे उचकाकर प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस बीच, इस लेखक के लिए, इंटरव्यू का सबसे दिलचस्प और रोचक हिस्सा यह था कि मोदी ने पड़ोसियों, दोस्तों और सहकर्मियों के रूप में मुसलमानों के साथ अपनी निकटता को साबित करने के लिए किस हद तक प्रयास किया। उन्होंने कहा कि वे उन मुसलमानों के बीच पले-बढ़े हैं जो हिंदुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रहते थे और उन्होंने अपने शुरुआती वर्ष मुसलमानों के साथ तकरीबन रोज मिलते-जुलते थे, बातें किया करते थे। उन्होंने कहा, ‘हमने सभी त्योहार एक साथ मनाए। ईद के दिन हमारे यहां खाना नहीं बनता था, इतना खाना आ जाता है हमारे मुसलमान पड़ोसियों से।’

उन्होंने याद किया कि मुहर्रम के दिन उन्हें और अन्य बच्चों को ताजिया जुलूसों में शामिल होने में बहुत मजा आता था। उन्होंने एक उत्साही मुस्लिम महिला पत्रकार रुबिका लियाकत से बातचीत में कहा, ‘मैं ऐसे माहौल में पला बढ़ा हूं।’ मोदी ने दावा किया कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मुसलमान नियमित रूप से उनकी सरकार की तरफ से उनके जीवन में सुधार के लिए किए जा रहे कार्यों के लिए उन्हें धन्यवाद देते थे।

गुजरात में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द और आलोचकों के ‘दुष्प्रचार’ के बावजूद मुस्लिम समुदाय के उनके प्रति स्नेह के उदाहरण के रूप में मोदी ने अहमदाबाद के प्रसिद्ध मानेक चौक का उदाहरण दिया, जो सुबह सब्जी बाजार, दोपहर में सर्राफा बाजार और रात में व्यस्त स्ट्रीट फूड बाजार में तब्दील हो जाता है।

उन्होंने कहा कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद उन्हें ‘बदनाम’ करने की कोशिशों के बाद, उन्होंने मानेक चौक में मुस्लिम मूड का सर्वे करने का आदेश दिया। उन्होंने इस क्षेत्र को इसके अनोखे मिश्रित चरित्र के कारण चुना। उन्होंने बताया, ‘वहां सारे व्यापारी मुसलमान हैं और सारे खरीदार हिंदू हैं। दिवाली में वो खचाखच भरा रहता है।’ उन्होंने कहा कि सर्वे में पता चला कि मुसलमानों में मोदी के प्रति गहरी आस्था है। जब शोधकर्ताओं ने उन्हें मोदी के खिलाफ कुछ कहने के लिए उकसाया तो उन्हें चुप रहने को कहा गया। पीएम ने सर्वे के नतीजों के बारे में बताया, ‘उन्होंने कहा मोदी के खिलाफ कुछ मत कहना, वरना बीवी रात को खाना नहीं देगी। वो इतने खुश हैं कि मोदी के कारण हमारे बच्चे स्कूल जा रहे हैं, उनका जीवन बन रहा है।’

क्या लोकसभा चुनाव में अभिनेता अभिनेत्री कर पाए कमाल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोकसभा चुनाव में अभिनेता और अभिनेत्री कमाल कर पाए या नहीं! उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिल्मी सितारों की धमक से लोकतंत्र को नई ऊंचाई मिलने लगी है। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, हर पार्टी में सिने अभिनेता और अभिनेत्री अपने अपने भाग्य आजमाते रहे हैं और कुछ तो अभी आजमा भी रहे हैं। राजनीति में इनके पदार्पण ने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की है। अभिनेता से नेता बने कलाकारों में हिंदी और भोजपुरी दोनों क्षेत्र के कलाकार हैं। भोजपुरी के दिग्गज कलाकार रवि किशन शुक्ला हों या आजमगढ़ से सांसद दिनेश लाल निरहुआ, या फिर हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियां हेमा मालनी और काजल निषाद और अभिनेता से नेता बने कांग्रेस के दिग्गज अब नेता राजबब्बर, सबने खूब भीड़ जुटाई है। इस लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने यूपी से दो दिग्गज भोजपुरी स्टार रवि किशन को गोरखपुर से और आजमगढ़ से दिनेश लाल निरहुआ को उम्मीदवार बनाया है। बॉलीवुड में बड़ा नाम हेमा मालिनी का मथुरा लोकसभा सीट से लगातार कई चुनावों से उम्मीदावार होना भी इसका जीता जागता उदाहरण है। इतना ही नहीं, रामानंद सागर के रामायण’ में श्रीराम का किरदार अदा करने वाले अरुण गोविल भी चुनावी समर में उतर चुके हैं और मेरठ लोकसभा क्षेत्र से चुनावी योद्धा बनकर न सिर्फ राजनीति में पदार्पण कर चुके हैं। बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और स्वस्थ राजनीति के गवाह बनने की ओर कदम बढ़ा चुके हैं।भोजपुरी अभिनेता रवि किशन गोरखपुर से पहले ही अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर चुके हैं। वर्ष 2014 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले रवि किशन शुक्ला ने वर्ष 2014 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जनपद जौनपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि उनकी राजनीतिक इच्छा और बलवती हुई और वर्ष 2017 में भाजपा का दामन थामा फिर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में संसद तक का सफर तय किया।

भोजपुरी फिल्मी दुनिया के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले रवि किशन शुक्ला पर भाजपा ने एक बार फिर दांव लगाया है। इधर, इंडिया गठबंधन ने शुक्ला के खिलाफ टीवी कलाकार काजल निषाद को चुनाव मैदान में उतारा है। भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव ने 2019 में भाजपा के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। भाजपा के टिकट पर उन्होंने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा, तब वह हार गए थे। 2022 के चुनाव में अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव लड़ा और लोकसभा सीट छोड़ दी, उनके इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर उपचुनाव हुआ और निरहुआ ने अखिलेश के भाई और सपा प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव को हरा दिया। 2024 में उनका सामना एक बार फिर सपा मुखिया अखिलेश यादव के भाई धर्मेंद्र यादव से ही है।

वरिष्ठ अभिनेत्री हेमा मालिनी उत्तर प्रदेश की मथुरा लोकसभा चुनाव से तीसरी बार मैदान में हैं। वह लगातार दो बार यहां से सांसद रह चुकी हैं। हेमा मालिनी भले ही फिल्मी दुनिया में अब न दिख रही हों, लेकिन वह राजनीति में काफी सक्रिय हैं। अभिनेत्री के रूप में हेमा मालिनी को दर्शकों ने पसंद किया है। रामानंद सागर के दूरदर्शन पर प्रसारित हुए शो ‘रामायण’ में श्रीराम का किरदार अदा कर अरुण गोविल ने घर-घर में अपनी पहचान बनाई। सालों तक इसी किरदार के साथ जीने वाले अरुण गोविल ने अपना राजनीतिक करियर भाजपा से शुरू किया है।

भाजपा ने उन्हें मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल का टिकट काट कर अपना उम्मीदवार बनाया है। शुरुआती दौर में उन्होंने कई फिल्मों में साइड हीरो का किरदार निभाया और फिर राजश्री प्रोडक्शन ने अरुण गोविल को फिल्म ‘सावन को आने दो’ में ब्रेक दिया। धारावाहिक ‘रामायण’ में राम की भूमिका में लोगों ने अभिनेता को काफी पसंद किया। आलम ये था कि लोग उन्हें असल में भगवान राम मानने लगे। भाजपा की वरिष्ठ नेता और मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ धारावाहिक में ‘तुलसी’ का किरदार निभाकर हर घर में लोकप्रिय हो गईं। वे उन चंद कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी स्क्रीन लोकप्रियता को राजनैतिक सफलता में बदल दिया। हालांकि अब वो टीवी की दुनिया से अलग एक बड़ी राजनेता के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने 2019 के चुनाव में अमेठी से कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को हरा कर सबको चौंका दिया था। वह अपने क्षेत्र अमेठी में लगातर सक्रिय हैं। भाजपा ने उन्हें एक बार फिर अमेठी से ही अपना प्रत्याशी बनाया है।

पिछले कुछ सालों से देखने को मिला है कि फिल्मी कलाकार अपनी राजनीतिक राय खुलेआम देने से हिचकते नहीं है। इसके पहले उनकी लोकप्रियता के आधार पर टिकट दिया जाता था। चाहे विनोद खन्ना हों, धर्मेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा हों, लेकिन उसके बाद देखने को मिला कि जिस प्रकार से पॉलिटिकल फिल्में बनने का चलन शुरू हुआ, जो लोग उन फिल्मों में रहते हैं वो लोग राजनीति से प्रेरित बयान ऑफ द स्क्रीन भी देते हैं। चाहे वो विवेक अग्निहोत्री हों, कंगना रनौत हों या फिर अनुपम खेर। इनकी फिल्मी अपील और राजनीतिक झुकाव उनको एक आईडियल उम्मीदवार बनाता है।

क्या वर्तमान के युवा जीवन से हो गए हैं परेशान?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वर्तमान के युवा जीवन से परेशान हो गए हैं! उत्‍तर प्रदेश के मथुरा में बिहार की नौंवी पास तीन किशोरी लड़कियों ने ट्रेन के आगे आकर अपना जीवन समाप्‍त कर लिया। वह घर में लिखकर निकली थीं कि बाबा ने बुलाया है। भक्ति के लिए हिमालय जा रहे हैं। किसी ने तलाश करने या वापस बुलाने की कोशिश की तो वह खुदकुशी कर लेंगी। अब सैकड़ों किलोमीटर दूर से आए उनके परि‍जनों ने शव के चीथड़ों से अपनी बच्चियोंं की शिनाख्‍त की। इसी तरह कन्‍नौज में 21 और 23 साल के दो युवकों ने जहर खाकर जान दे दी। बदहवास परिवारवाले अपने बच्‍चों को लेकर अस्‍पताल पहुंचे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। सुसाइड से पहले इनमें से एक युवक ने अपना स्‍टेटस लगाया था- मृत्यु ही सत्य है। अरे भई! कौन इनकार कर रहा है मृत्यु की सच्‍चाई से। लेकिन एक बार तो सोचिए जरा, जीवन इतना सस्ता है क्‍या? हताशा आ रही है तो जूझिए, रास्‍ता निकालिए, एक दिन सफलता जरूर जीत मिलेगी। नहीं भी मिली तो भी प्रयास जारी रखिए। जिन्‍होंने अभी तक दुनिया ही ठीक से नहीं देखी, वे किशोर, युवा अपनी जिंदगी खत्‍म कर ले रहे हैं। शायद इसलिए बड़े-बूढ़े हमेशा से कहते आए हैं कि अधकचरा ज्ञान जानलेवा होता है। अरे अगर आध्‍यात्‍म के मार्ग पर जाना है तो जाइए न, किसने मना किया है, फि‍र ये आत्‍महत्‍या क्‍यों? चाहे जो भी परिस्थिति आत्‍महत्‍या को तो कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। मथुरा के हाईवे थाना क्षेत्र में 24 मई दोपहर 1:20 बजे आगरा-दिल्ली रेलवे ट्रैक पर मालगाड़ी से कटकर तीन किशोरी लड़कियों की मौत हो गई। जिस मालगाड़ी से तीनों छात्राओं ने कटकर जान दी, उसका पायलट शिव कुमार घटना का चश्मदीद गवाह है। शिव कुमार ने पुलिस को बताया कि वह मथुरा-दिल्ली रोड पर ट्रेन ले जा रहा था। तभी तीनों छात्राएं एक दूसरे का हाथ पकड़ कर सामने आ गईं। ट्रेन करीब 90 मीटर की दूरी पर ही रही होगी। शिव कुमार ने ब्रेक लगाया, लेकिन ट्रेन वहां तक नहीं रुक सकी। तीनों ट्रेन से कट गई। ट्रेन रुकी तो गार्ड ने उतर कर देखा तो तीनों की मौत हो चुकी थी।

एक लड़की के कपड़ों पर मुजफ्फरपुर के टेलर की स्लिप मिलने पर मथुरा पुलिस ने बिहार के मुजफ्फरपुर पुलिस से संपर्क किया। मथुरा पहुंचे परिजनों ने बैग और कपड़ों से शिनाख्त कर ली। पता चला कि तीनों लड़कियां सहेलियां थींं। तीनों की पहचान माही, टाउन थाना के कंपनी बाग जोगिया मठ निवासी 14 वर्षीय गौरी और 13 वर्षीय माया के रूप में की गई। तीनों ने इसी साल नौवीं कक्षा पास की थी। तीनों 13 मई को एक साथ अपने घर से निकली थीं। माया की मां सोनी देवी ने 22 मई को गुमशुदगी दर्ज कराई थी।

परिजनों ने बताया कि घर से निकलने से पहले तीनों एक-एक पत्र छोड़कर आई थी। इसमें उन्होंने लिखा था, बाबा ने बुलाया है। भक्ति के लिए हिमालय जा रहे हैं। किसी ने तलाश करने या वापस बुलाने की कोशिश की तो वह खुदकुशी कर लेंगी। 3 महीने बाद 13 अगस्त को वह खुद वापस आ जाएंगी। जांच में पता चला कि माया और माही के पास मोबाइल था। लेकिन मथुरा में रेलवे ट्रैक के पास मोबाइल नहीं मिले, जबकि उनके बैग और अन्य सामान पास पाए गए। जांच में पता चला कि माही का मोबाइल कानपुर में बंद हुआ था। वहीं, माया का मोबाइल मुजफ्फरपुर से निकलते समय ही बंद हो गया था। मंगलवार शाम शिनाख्त और पोस्टमार्टम के बाद तीनों का अंतिम संस्कार मथुरा में ही कर दिया गया।

दूसरी घटना जालौन की है। यहां कालपी थाना क्षेत्र में 23 साल के अमन वर्मा और 21 वर्षीय बालेंद्र ने कर्बला के मैदान में सल्फास खाकर जान दे दी। अमन ने इसके बाद परिजनों को फोन करके सूचना दी। परिवारवाले भागे-भागे पहुंचे और दोनों को कालपी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, मगर दोनों की इलाज होने से पहले मौत हो गई। पुलिस ने जांच की तो पता चला कि‍ अमन और बालेंद्र में जिगरी दोस्त थे। अमन का मेडिकल स्टोर और वह शादी शुदा था, जबकि बालेंद्र की शादी नहीं हुई थी। दोनों मंगलवार को कब्रिस्तान गए जहां उन्होंने सल्फास खाकर जान दे दी।

पता चला कि दोनों मेडिकल स्टोर पर ही बैठते थे। दोनों ही ओशो के प्रवचन से काफी प्रभावित थे। अमन ने सुसाइड करने से पहले 3 स्टेटस लगाए थे। पहले स्टेटस में लिखा- तुम अपने रास्ते, मैं अपने रास्ते। इस वीडियो में कुछ लोग एक लाश ले जाते दिख रहे हैं। वहीं दूसरे स्टेटस में लिखा- जीवन में ऐसा काम चुनें, जो आपका आनंद हो, व्यवसाय नहीं। तीसरे स्टेटस में एक जलती हुई लाश का वीडियो लगाया। वहीं जहर खाने से पहले ही बालेंद्र ने फोन में स्टेटस लगाया था कि मृत्यु ही सत्य है, जिसके बाद दोनों ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। इस मामले में कालपी सीओ डॉक्टर देवेंद्र पचौरी का कहना है कि मामले की जांच कर रही है कि किन परिस्थितियों में दोनों ने आत्महत्या की है।

राजस्थान के भीलवाड़ा में हमीरगढ़ तहसील में तखतपुरा गांव है। यहां मोहन लाल अहीर नाम के शख्‍स की किसी ने हत्‍या कर दी। पता चला जमीनी विवाद था। घर में चीख-पुकार, मातम का माहौल के बीच मोहन लाल की बेटी लक्ष्मी पिता के गम में थी। उसका बोर्ड एग्‍जाम चल रहा था, चौबीस घंटे बाद उसकी अंग्रेजी की परीक्षा थी। ले‍किन लक्ष्‍मी ने अपने गम को जब्‍त किया और परीक्षा देने गई। रि‍जल्‍ट आया तो लक्ष्‍मी ने 12वीं में 90.80 फीसदी नंबर हासिल किए। लक्ष्मी कहती हैं, ‘परीक्षा के वक्त भले ही पापा साथ नहीं थे, लेकिन उनका आशीर्वाद हमेशा उनके पास रहा। और ये उनका आशीर्वाद ही है, जिसकी वजह से मैं आज कामयाब हो पाई।’

तमिलनाडु में वेल्लोर इलाके के विन्नमंगलम में रहने वाले के. जयगणेश का जीवन शुरुआत से ही कठिनाइयों से भरा था। अपने परिवार का गुजारा करने के लिए उनके पिता एक फैक्ट्री में बेहद कम सैलरी पर काम करते थे। घर के ऐसे आर्थिक हालत देखकर जयगणेश जल्द से जल्द अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी करना चाहते थे। गांव के ही स्कूल से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने करने के बाद उन्होंने एक पॉलिटेक्निक कॉलेज में एडमिशन ले लिया। जयगणेश को भरोसा था कि पॉलिटेक्निक करने के बाद ग्रेजुएशन पूरी होने तक उन्हें नौकरी मिल जाएगी।

रूस और ईरान के साथ अमेरिका को कैसे हाथ में ले रहा भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत रूस और ईरान के साथ अमेरिका को भी हाथ में कैसे ले रहा है! कोई देश अपना भूगोल या अपने पड़ोसियों और उनसे जुड़ी बाधाओं को नहीं चुन सकता। भारत की 15,200 किमी लंबी भूमि सीमा इसकी 7,500 किमी लंबी तटरेखा से दोगुनी है। भौगोलिक और भू-राजनीतिक कारक यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत का मात्रा के हिसाब से 90% और मूल्य के हिसाब से 70% व्यापार समुद्र के माध्यम से होता है। इसलिए, भारत के लिए व्यापार के समुद्री मार्ग एक प्रमुख चिंता का विषय रहे हैं। अफगानिस्तान और मध्य एशिया और उससे आगे यूरेशियाई भूभाग से जुड़ने में जमीनी व्यापार और आवाजाही की बाधाएं विशेष रूप से परेशानी वाली रही हैं। भारत ने इन बाधाओं को दूर करने के लिए अपने पूर्व और पश्चिम में मल्टी-मॉडल परिवहन गलियारों का समर्थन किया है। म्यांमार में सिटवे बंदरगाह और ईरान में चाबहार में निवेश इस रणनीति के दो उदाहरण हैं। सितवे कलादान मल्टी-मॉडल परियोजना का एक हिस्सा है जबकि चाबहार अफगानिस्तान में बने जरांज डेलाराम राजमार्ग से जुड़ा था। भारत अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कई यूरोपीय देशों के साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप (आईएमईसी) गलियारे पर भी काम कर रहा है। जबकि अमेरिका की वापसी के साथ अफगानिस्तान और मध्य एशिया में स्थिति बदल गई है। भारत के भूगोल की वास्तविकताएं सामने हैं। इसी संदर्भ में इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) और ईरान के पोर्ट एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (पीएमओ) के बीच समझौते को देखने की जरूरत है। हालांकि, चाबहार समझौते पर हस्ताक्षर होने के कुछ ही घंटों के भीतर, अमेरिका ने प्रतिबंधों के संभावित जोखिम का हवाला देते हुए ईरान के साथ व्यापार में शामिल होने के प्रति आगाह किया। इस बयान से अमेरिका-भारत संबंधों में तनाव की अटकलें शुरू हो गईं। इन बयानों को उचित परिप्रेक्ष्य में रखा जाना चाहिए।

पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका संबंध काफी परिपक्व हुए हैं। इस परिवर्तन को विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र में बढ़े हुए रणनीतिक सहयोग द्वारा चिह्नित किया गया है। फरवरी में एमक्यू-9बी सशस्त्र ड्रोन खरीदने के लिए 4 अरब डॉलर का समझौता इस श्रृंखला में बिल्कुल नया है। इसमें वर्ष 2000 के बाद से रक्षा व्यापार में 20 अरब डॉलर का उछाल देखा गया है। यह तब है जब दोनों के बीच रक्षा व्यापार ना के बराबर था। इस संबंध में कुछ प्रमुख विकासों में महत्वपूर्ण और उभरती टेक्नोलॉजी पर भारत-अमेरिका पहल (आईसीईटी), बाहरी अंतरिक्ष में आर्टेमिस समझौते में भारत का शामिल होना, सेमीकंडक्टर में सहयोग, लड़ाकू विमान इंजनों में सहयोग और हिंद महासागर में संचार की समुद्री लाइनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहयोग शामिल हैं। इसके अलावा, दोनों देशों ने जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद विरोधी जैसे वैश्विक मुद्दों पर एकजुट मोर्चा दिखाया है। उच्च-स्तरीय राजनयिक व्यस्तताओं ने इस साझेदारी को और मजबूत किया है, जिससे यह 21वीं सदी में सबसे परिणामी रिश्तों में से एक बन गया है।

भारत-अमेरिका संबंध कितने आगे बढ़ चुके हैं इसका एक उपाय भारत और अमेरिका को ‘विश्वसनीय टेक्नोलॉजी पार्टनर’ के रूप में स्थापित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप का अनावरण है। यह समझ नियामक बाधाओं और निर्यात नियंत्रणों को दूर करने के लिए एक रूपरेखा को संस्थागत बनाती है, विशेष रूप से अमेरिकी पक्ष पर। इस समझ की प्राप्ति को भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है जो लगभग 25 वर्षों से प्रगति पथ पर है। यह स्वाभाविक है कि कुछ मुद्दों पर दो देशों में असहमति होगी। लेकिन भारत और अमेरिका के एक-दूसरे से बात करने के दिन अब पीछे रह गए हैं। संबंधों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, जब चिड़चिड़ाहट पैदा होती है, तो दोनों पक्ष चर्चा करने और उन्हें हल करने के लिए बैठते हैं। उदाहरण के लिए, जब भारत ने वाशिंगटन की आपत्तियों के बावजूद मास्को से तेल आयात करने का निर्णय लिया, तो भारत वैश्विक तेल बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए इस निर्णय की आवश्यकता को समझाने में सक्षम था। इस व्यावहारिक दृष्टिकोण से अमेरिका को भारत की स्थिति समझने में मदद मिली। इसी तरह, चाबहार सौदा सिर्फ भारत के हितों के बारे में नहीं है बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और कनेक्टिविटी के बारे में भी है जिसे अमेरिका महत्व देता है।

चाबहार बंदरगाह के विकास में निवेश करके, भारत का लक्ष्य मध्य एशिया और अफगानिस्तान के साथ कनेक्टिविटी में सुधार करना है। इससे, बदले में, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) को लाभ होगा, जिसे यूक्रेन में संघर्ष के कारण असफलताओं का सामना करना पड़ा है। भारत की कार्रवाई 2015 में अमेरिका की कार्रवाई को प्रतिबिंबित करती है, जब पी5+1 ने ईरान के साथ संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं। चाबहार बंदरगाह समझौता और जेसीपीओए दोनों तेहरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने से रोकने और ईरान को वैश्विक आर्थिक प्रणाली में एकीकृत होने में सक्षम बनाने के दोहरे लक्ष्य साझा करते हैं। इसे देखते हुए, स्थिति की अधिक सूक्ष्म समझ की आवश्यकता है।

क्या भारत में जरूरी है विकसित चुनाव की प्रक्रिया?

आने वाले समय में भारत में विकसित चुनाव की प्रक्रिया बहुत जरूरी है! भारत सामूहिक राहत की सांस के साथ 2024 के लोकसभा चुनाव में शनिवार को मतदान के अंतिम दिन की तैयारी कर रहा है। लोकतंत्र जितना रोमांचक है, चुनाव प्रक्रिया की अवधि उतनी ही लंबी होती जा रही है। इसने उम्मीदवारों और प्रचारकों को और इससे भी अधिक, नागरिकों को थका दिया है। चुनाव का मौसम वास्तव में जनवरी में शुरू हुआ। जब तक नई सरकार और मंत्री नहीं बनेंगे, और लंबित प्रमुख सिविल सेवा नियुक्तियां नहीं होंगी, तब तक जून का अंत हो जाएगा। संक्षेप में, देश ने चुनाव के लिए छह महीने समर्पित कर दिए होंगे। हालांकि लोगों का जनादेश हमेशा अपवाद रहित होना चाहिए, यह लंबी अवधि कुछ सवालों को आमंत्रित करती है। चुनाव की वजह से नीति निर्धारण निलंबित है। अच्छे इरादों के साथ, सरकार में एक जड़ता विकसित होती है – चाहे नई दिल्ली में हो या राज्यों में। यहां तक कि नियमित निर्णय लेने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। व्यवसाय और निवेश की स्पष्टता, चाहे घरेलू या अंतरराष्ट्रीय हितधारकों के बीच हो, प्रभावित होती है। जैसे-जैसे मतदाताओं की संख्या बढ़ती जाएगी, ऐसी समय-सीमा तेजी से अव्यवहारिक होती जाएगी। यह पूछना वाजिब है कि क्या भारत चुनाव प्रक्रिया को और अधिक कुशल बनाकर इसके समय में कटौती कर सकते हैं। एक आधुनिकीकरण वाली अर्थव्यवस्था और एक ऐसी राजनीति जो समाज के आग्रहों के प्रति उत्तरदायी होनी चाहिए, उतनी ही योग्य है। जीवन में आसानी और व्यापार में आसानी को न केवल मतदान में आसानी, बल्कि चुनाव प्रचार में आसानी और चुनाव संचालन में आसानी से भी पूरक बनाने की आवश्यकता है।

हाल के वर्षों में चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को एडवांस बनाने करने के लिए अथक प्रयास किये हैं। 2004 से, ईवीएम आदर्श बन गया है। मतदाता सूची का तेजी से रिवाइज होना, सुचारू रूप से मतदाता पहचान पत्र जारी करना और मतदान केंद्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि सराहनीय उपलब्धियां हैं। हालांकि, 2030 के दशक के अंत में, अगला चुनाव वृद्धिशील परिवर्तन की नहीं, बल्कि एक आदर्श बदलाव की मांग करता है। अभूतपूर्व आंतरिक माइग्रेशन के साथ, पोस्टल बैलेट का यूज बढ़ेगा नहीं बल्कि बहुत अधिक हो जाएगा। घर से वोटिंग को फिलहाल 85 वर्ष से ऊपर या शारीरिक रूप से विकलांग लोगों तक सीमित है। इसमें भी वृद्धि देखी जाएगी। ऐसे में पोस्टल बैलेट की वर्तमान बैलेट पेपर से वोटिंग जरूरी उपायों के साथ डिजिटल या ऑनलाइन रूप ले सकती है। इसके अभाव में भी, मतदान केंद्र के अलावा अन्य मतदान की सुविधा को जनसांख्यिकीय के साथ मिलान करने की आवश्यकता होगी। नतीजतन, स्टाफिंग और अन्य सामान की आवश्यकताओं का अनुमान लगाया जाना चाहिए। यह लगातार जारी रहेगा। ऐसे में 2029 की तैयारी 2024 में ही शुरू होती है।

चुनाव कार्यक्रम में समाज की आंतरिक आदतों और जीवनशैली के विकास को ध्यान में रखना आवश्यक है। ब्रिटेन में, हमारे चुनाव नतीजे आने के ठीक एक महीने बाद मतदान होता है। मतदान केंद्र सुबह 7 बजे से खुले रहते हैं और रात 10 बजे बंद हो जाते हैं। भारत में, जिसने ब्रिटेन से कई चुनावी प्रथाएं उधार लीं, वे शाम 6 बजे बंद हो जाते हैं। यह हैरान करने वाली बात है। गर्मियों में, भारतीय सामाजिक और आर्थिक जीवन का अधिकांश हिस्सा – यहां तक कि किराने के सामान के लिए बाजार जाना भी – सूर्यास्त के बाद होता है। शायद 1950 के दशक में, अपर्याप्त बिजली, खराब पैसेंजर ट्रांसपोर्ट और सुरक्षा चिंताओं के कारण केवल दिन के उजाले में ही मतदान करना अनिवार्य था। आठ दशक बाद, इसमें संशोधन की आवश्यकता है।

सही है, चुनाव की तारीखें पारंपरिक छुट्टियों और त्योहारों से बचती हैं। क्या चुनाव आयोग को अन्य मापदंडों पर भी विचार नहीं करना चाहिए? इस साल दिल्ली में शनिवार को मतदान हुआ। इससे पहले गुरुवार को बुद्ध पूर्णिमा की छुट्टी थी। उस सप्ताह की शुरुआत में, स्कूल की गर्मी की छुट्टियां शुरू हो गईं। लंबे वीकेंड अवकाश की अवधारणा भारत में अपेक्षाकृत हाल ही में आई है। लेकिन, विशेष रूप से शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में, ऐसे संभावित क्लैश को मतदान कैलेंडर के साथ तालमेल करना जरूरी है। अन्यथा इससे मतदान प्रतिशत प्रभावित होगा।

चुनाव प्रचार समाप्त होने और मतदान के बीच की 48 घंटे की अवधि को समाप्त करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इससे मतदान चक्रों के बीच दो दिन का समय लगेगा। 48 घंटे का ‘साइलेंस’ सरल युग में तैयार किया गया एक आदर्शवादी नियम था। इसने मतदाताओं को उम्मीदवारों और पार्टियों के भाषणों, वादों और घोषणापत्रों पर विचार करने और एक शांत विकल्प चुनने का ‘एक शांत समय’ दिया। आज, स्थानीय स्तर पर कैंपने बंद हो जाता है, लेकिन मतदान जारी रहने के दौरान भी मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रचार जारी रहता है। अन्य राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों के भाषण – जहां मतदान बाद की तारीख में होता है – उस दिन के मतदाताओं को टारगेट बनाकर दिए जा रहे होते हैं। ऐसे में इस 48 घंटे के अंतराल से क्या हासिल होता है। कम अवधि का चुनाव केवल एक नागरिक सुविधा नहीं है। यह स्वच्छ राजनीति को प्रोत्साहित करता है। चुनाव प्रक्रिया जितनी लंबी होगी, पार्टियों को उतने ही अधिक धन की आवश्यकता होगी। अनिवार्य रूप से, यह अभियान धन की परिचित तौरतरीकों और विकृतियों को बढ़ावा देता है। साथ ही शासन और सार्वजनिक जीवन पर कई गुना प्रभाव डालता है। ऐसे में इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग और आने वाली सरकार पर है।

आखिर क्या था ऑपरेशन ब्लू स्टार?

आज हम आपको ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में जानकारी देने वाले हैं! खालिस्तानी आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सिखों के पावन तीर्थस्थल स्वर्णमंदिर से मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था। यह ऑपरेशन 1 जून से लेकर 10 जून, 1984 तक अंजाम दिया गया। ऑपरेशन ब्लूस्टार की नौबत कैसे आई, इसके लिए इतिहास में काफी पहले यानी 1971 तक जाना होगा। बात तब की है, जब भारत-पाकिस्तान के बीच जंग हुई और भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया। इसी जंग से एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसी जंग में पाकिस्तान को यह अहसास हो गया कि वह भारत को कभी आमने-सामने के युद्ध में नहीं हरा सकता है। डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, 1976 में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल जिया उल हक ने एक मिलिट्री डॉक्ट्रिन बनाई। इसका नाम था-ब्लीड इंडिया विद् अ थाऊजैंड कट्स। इसके तहत ये फैसला लिया गया कि हम भारत को सीधे युद्ध में नहीं हरा सकते, इसलिए भारत को अलग-अलग जगह से वार करेंगे और उसे गहरा घाव देंगे। इससे भारत की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति बिगड़ेगी। जनरल जिया ही बाद में तख्तापलट करके पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने।

लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, जनरल जिया ने 1980 में अपनी मिलिट्री डॉक्ट्रिन का इस्तेमाल भारत के पंजाब में किया। दरअसल, उस समय एक राजनीतिक पार्टी चुनाव हार चुकी थी, उसने एक अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले को समर्थन देना शुरू किया। उसकी हर सही-गलत बात को तूल देना शुरू किया। उसी वक्त से पंजाब में आतंकवाद का बोलबाला शुरू हुआ। इससे पहले से ही पंजाब में खालिस्तानी उग्रवादियों की मांगों को पाकिस्तान ने शह देना शुरू किया और उसे पैसे देने लगे। अपनी किताब ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार: द ट्रू स्टोरी’ में ऑपरेशन ब्लू स्टार के सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ ने लिखा है कि उन्हें यह जानकारी मिली थी कि कुछ ही दिनों में खालिस्तान की घोषणा होना जा रही थी और उसे रोकने के लिए ऑपरेशन को जल्द से जल्द अंजाम देना जरूरी था। उन्होंने ही स्वर्ण मंदिर से खालिस्तानी उग्रवादियों को निकाल बाहर किया था।

पंजाब की समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित मांगों को लेकर शुरु हुई थी। 1973 और 1978 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उन्होंने स्वायत्तता की मांग की थी। इन्हीं मांगों को लेकर अकालियों और निरंकारियों के बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को हिंसक झड़प हुई। इसमें 13 अकाली मारे गए। रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले ने हिस्सा लिया। उस समय कांग्रेस पर ये आरोप लगे कि अकालियों के जनाधार को कमतर करने के लिए कांग्रेस ने भिंडरावाले को समर्थन देना शुरू किया। यहीं से पंजाब में हिंसक घटनाओं की शुरुआत हुई।

डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी बताते हैं कि सितंबर 1981 में पंजाब केसरी अखबार समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हो गई। जालंधर, तरणतारण, अमृतसर, फरीदकोट और गुरदासपुर में हुई हिंसक घटनाओं में कई लोगों की जान गई। इन सभी में भिंडरावाले का नाम जुड़ा। यह भी कहा गया कि वह ये सब पाकिस्तान के इशारे और उसके पैसों पर कर रहा है। लोगों को भिंडरावाले के साथ जुड़ता देख अकाली दल ने भी भिंडरावाले का समर्थन करना शुरू कर दिया। 1982 में भिंडरावाले ने चौक महता गुरुद्वारा छोड़कर पहले स्वर्ण मंदिर परिसर में गुरु नानक निवास में जगह बनाई और इसके कुछ महीने बाद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त में जगह बना ली।

पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह पर 1982 में हमला हुआ। अप्रैल, 1983 में डीआईजी एएस अटवाल की हत्या दिनदहाड़े हरमंदिर साहिब परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद पंजाब रोडवेज की एक बस में घुसे बंदूकधारियों ने जालंधर के पास पहली बार कई हिंदुओं को मार डाला तो केंद्र की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया। पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। पानी सिर से गुजर चुका था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार का फैसला लिया।

किताब के अनुसार, स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस जरनैल सिंह भिंडरावाले, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के लड़ाकों ने चारों तरफ खासी मोर्चाबंदी कर रखी थी। पंजाब से गुजरने वाली ट्रेनों और बसों पर रोक लगा दी गई। उस समय सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ को उग्रवादियों को स्वर्ण मंदिर परिसर से बाहर निकालने की जिम्मेदारी दी गई। इसका जिक्र ऑपरेशन ब्लू स्टार के सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ की किताब में भी किया गया है। उन्हें बुलबुल बराड़ भी कहा जाता था।

1 जून से ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया गया। सेना के जवान स्वर्ण मंदिर की पवित्रता का सम्मान करते हुए अपने चमड़े के जूते, बेल्ट उतारकर परिसर में घुसे। सेना की इस कार्रवाई पर उग्रवादियों ने अंदर से हमले करने शुरू कर दिए। उससे पहले सेना ने 4 घंटे तक लाउडस्पीकर से उग्रवादियों से सरेंडर की अपील की। मगर, उग्रवादियों ने बदले में जबरदस्त गोलीबारी करनी शुरू कर दी। तब पांच जून को बख्तरबंद गाड़ियों और टैंकों का इस्तेमाल करना पड़ा। आखिरकार 6 जून को भिंडरावाले मारा गया। इस ऑपरेशन का सबसे खौफनाक नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर, 1984 को हत्या हो गई। इसके बाद देश में दंगे भड़क उठे थे।

जानिए क्या थे एग्जिट पोल के परिणाम?

आज हम आपको एग्जिट पोल के परिणाम बताने जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव के लिए मतदान एक जून को समाप्त हो गया। मतदान के बाद आए एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को भारी बहुमत मिलने का अनुमान है। लोकसभा की सभी 543 सीटों के लिए एग्जिट पोल आ गया है। अधिकतर एग्जिट पोल बीजेपी को पिछली बार के मुकाबले और अधिक मजबूत स्थिति में दिखा रहे हैं। वहीं कांग्रेस व उसके सहयोगियों का इंडिया गठबंधन बुरी तरह पिछड़ता नजर आ रहा है। एग्जिट पोल में जहां एनडीए को लगभग 350 से 380 सीटें मिलने का अनुमान है, वहीं इंडिया गठबंधन केवल 150 से 180 सीटों के आसपास सिमटता का नजर आ रहा है। आइए नजर डालते हैं किस एग्जिट पोल में किस दल को कितनी सीट मिलती दिख रही है। एग्जिट पोल पर नजर डाली जाए, तो पता चलता है कि बीजेपी और उसके नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन बंपर जीत हासिल कर सकता है। इस एग्जिट पोल में एनडीए को 353 से लेकर 383 लोकसभा सीटें मिलने का अनुमान है। गौरतलब है कि यह भाजपा के वर्ष 2019 और 2014 के प्रदर्शन से भी बेहतर है। इस एग्जिट पोल के मुताबिक यदि 353 से लेकर 383 एनडीए का औसत भी देंखे, तो एनडीए को 368 सीटें मिलती दिख रही हैं। एग्जिट पोल में इंडिया गठबंधन को 152 से 182 सीटों का अनुमान बताया गया है।

एग्जिट पोल में एनडीए गठबंधन का आंकड़ा 400 पार जाने की बात कह दी है। टुडे चाणक्य ने इंडिया गठबंधन को 107 सीटें मिलने का अनुमान जताया है। एग्जिट पोल के आंकड़ों से उत्साहित केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता हरदीप सिंह पुरी ने दावा किया है कि इस बार भाजपा दक्षिण भारत में सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनने जा रही है। कर्नाटक और केरल सहित दक्षिण भारत के राज्यों में भाजपा का मत प्रतिशत भी बढ़ने जा रहा है। एनडीए को 400 से अधिक सीट मिलने का अनुमान है। वहीं, इंडिया गठबंधन को 131 से 166 सीट मिलने की बात कही गई है। इसमें अन्य के खाते में 8 से 20 सीट मिल सकती है। इंडिया टुडे – एक्सिस माय इंडिया एग्जिट पोल के मुताबिक दिल्ली में बीजेपी को इस बार एक सीट का घाटा हो सकता है। एग्जिट पोल में अनुमान जताया गया है कि दिल्ली में बीजेपी को 54% वोट मिल सकता है। वहीं, विपक्षी गठबंधन को 44 प्रतिशत वोट मिलता दिख रहा है। एक्सिस माय इंडिया एग्जिट पोल के मुताबिक, प. बंगाल में एनडीए को 46% वोट मिलता दिख रहा है। वहीं, विपक्षी इंडिया गठबंधन को 40% वोट मिल रहा है। एनडीए को 26 से 31, टीएमसी को 11 से 14 जबकि अन्य को 0 से 2 सीटें मिल सकती हैं।

एग्जिट पोल ने एनडीए और इंडिया गठबंधन को क्रमश: 358 और 152 सीटें दी हैं। ‘इंडिया टीवी-सीएनएक्स’ ने अपने अनुमान में राजग को 371-401 और ‘इंडिया’ गठबंधन को 109-139 सीटें दीं। वहीं, ‘न्यूज नेशन’ द्वारा अनुमान जताया गया है कि एनडीए को 342-378 और ‘इंडिया’ गठबंधन को 153-169 सीट मिल सकती हैं। इंडिया न्यूज डी डायनामिक्स एनडीए गठबंधन को 371 से ज्यादा सीटें दे रहा है। वहीं, इंडिया गठबंधन को 125 सीट मिलने का अनुमान जताया है। इसके अलावा अन्य के खाते में 47 सीट मिलने का अनुमान है। ​इंडिया न्यूज- डी-डायनेमिक्स एग्जिट पोल ने भी बंगाल में बीजेपी को 21 और तृणमूल को 19 सीटें दी हैं।

सर्वे में भी एनडीए 400 पार जाता दिख रहा है। सर्वे में इंडिया गठबंधन को 109 से 139सीट मिलने का अनुमान है। इसके अलावा अन्य को 28 से 38 सीट मिल सकती हैं। इंडिया टीवी-सीएनएक्स एग्जिट पोल के नतीजों के मुताबिक, दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन फेल होता हुआ नजर आ रहा है। यहां सभी सात सीटों पर बीजेपी जीत हासिल कर सकती है। मैट्राइज ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए गठबंधन को 353 से 368 सीटें मिलने का दावा किया है। रिपब्लिक TV के Matrize एग्जिट पोल के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में एनडीए को 69 सीटें जबकि विपक्षी गठबंधन के खाते में इस बार 11 सीटें जा सकती हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को यूपी में 65 सीटें मिली थीं जबकि विपक्षी दलों बसपा को 10 और सपा को 5 सीटें मिली थीं। रिपब्लिक भारत और मैट्रिज के एग्जिट पोल में पश्चिम बंगाल में बीजेपी बंगाल की 21 से 25 लोकसभा सीटें जीत सकती हैं। वहीं ममता बनर्जी पार्टी को 16 से 20 सीटें मिलने का अनुमान है।

पोल ऑफ पोल में तीन एग्जिट पोल में एनडीए के 400 पार जाने का पूर्वानुमान है। वहीं सी वोटर के सर्वे में इंडिया गठबंधन को सबसे अधिक 182 सीट मिलने का अनुमान जताया गया है। अन्य को 4 से लेकर सबसे अधिक 38 सीट मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है। दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने एग्जिट पोल के नतीजों को खारिज किया है।

2019 के मुकाबले कैसा रहा 2024 का चुनाव?

आज हम आपको बताएंगे कि 2019 के मुकाबले 2024 का चुनाव कैसा रहा! तमाम एग्जिट पोल के अनुसार, BJP की अगुआई में NDA पूर्ण बहुमत के साथ वापसी कर सकता है। हालांकि, असल परिणाम 4 जून को आएंगे। शनिवार को सातवें चरण के चुनाव की समाप्ति के बाद आए एग्जिट पोल के अनुसार BJP अपने दम पर लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत हासिल करेगी। यूपी की 80 सीटों पर ज्यादातर एग्जिट पोल BJP को पिछले बार के मुकाबले ज्यादा सीटें दे रहे हैं। उसे पिछले चुनाव में 62 सीटें मिली थी। इंडिया न्यूज का एग्जिट पोल NDA को 69, INDIA को 11 सीटें दे रहा है। जन की बात के मुताबिक, NDA को 68-74 और INDIA को 6-12 सीटें मिल सकती हैं। रिपब्लिक भारत के एग्जिट पोल के मुताबिक, एनडीए को 69-74 और इंडी गठबंधन को 6-11 सीटें मिल सकती हैं।

उत्तराखंड में ज्यादातर एग्जिट पोल पिछले बार की तरह BJP को सभी पांच सीटें जीतने का अनुमान लगा रहे हैं। जन की बात, न्यूज नेशन, टाइम्स नाउ के मुताबिक BJP सभी सीटें जीत सकती है। बिहार में NDA को कुछ सीटों के नुकसान का अनुमान है। इंडिया टुडे एक्सिस माई इंडिया के मुताबिक ‌BJP 13-15, जेडीयू 9-11, एलजेपीआर 5, आरएलडी 6-7, कांग्रेस- 1-2 सीटें जीत सकती है। जन की बात ने एनडीए को 32-35 सीटों का और रिपब्लिक टीवी ने 32-37 सीटों का अनुमान लगाया है। गुजरात में ज्यादातर एग्जिट पोल ने BJP को सभी 26 सीटें जीतने का अनुमान लगाया है। कुछ एग्जिट पोल में कांग्रेस के 1-2 सीटें जीतने का अनुमान है। हिमाचल प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में BJP सभी चार सीटें जीती थी। जन की बात ने वही रिपीट होने का अनुमान लगाया है। टाउम्स नाउ ने एक सीट कांग्रेस के जीतने का अनुमान लगाया है। महाराष्ट्र में जन की बात ने एनडीए को 34-41 सीट, I.N.D.I.A. को 16 सीट, रिपब्लिक टीवी ने NDA को 29, I.N.D.I.A. को 19 सीटों का अनुमान लगाया है। अलग-अलग एग्जिट पोल के मुताबिक NDA को 22 से लेकर 41 तक की सीटों का अनुमान है।

राजस्थान में जन की बात ने बीजेपी को 21-23 सीट और I.N.D.I.A. को 2-4 सीट, टाइम्स नाउ ने BJP को 18, I.N.D.I.A. को 7 सीटों का अनुमान लगाया है। मध्य प्रदेश में BJP को पिछले बार की तरह ही लगभग सभी सीटें जीतने का अनुमान एग्जिट पोल लगा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी ज्यादातर एग्जिट पोल BJP को 10-11 सीटें दे रहे हैं। झारखंड में NDA को 11-13 सीटें मिलने का अनुमान है।

पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटों को लेकर ‌BJP और TMC के बीच दोतरफा कड़ा मुकाबला अब ‌BJP के पक्ष में दिख रहा है। ज्यादातर सर्वे BJP को टीएमसी के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलते दिखा रहे हैं। एबीपी सी-वोटर के एग्जिट पोल में BJP को 23-27 सीटें मिलने का अनुमान जताया जा रहा है, जबकि तृणमूल 13 से 17 सीटों पर सिमट सकती है, जबकि लेफ्ट कांग्रेस गठबंधन को महज 1-3 सीटें ही मिल सकती हैं। ऐसा ही कुछ दूसरे सर्वे भी दिखा रहे हैं, इंडिया न्यूज डायनैमिक्स BJP को 21 और टीएमसी को 17 सीटें तो इसी तरह का आकलन रिपब्लिक भारत Matrize का सर्वे दिखा रहा है। वहीं जन की बात के मुताबिक ‌BJP को 21-26 और TMC को 16-18 सीटें मिल सकती हैं। 2019 में TMC के खाते में 22 तो BJP के हाथ 18 सीटें आई थीं। नॉर्थ ईस्ट के आठ राज्यों (मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, नगालैंड, मणिपुर और सिक्किम ) की 25 सीटों को लेकर किए गए सर्वे में भी NDA का ही रुझान दिख रहा है। सी-वोटर के सर्वे के मुताबिक एनडीए को 16 से 21 सीटें मिलने का अनुमान है, विपक्षी गठबंधन को महज 3-7 सीटें, वहीं अन्य के खाते में 1-2 सीटें आ सकती हैं। इसमें असम की 14 सीटों में 10-12 सीटें BJP को जाने का अनुमान है। न्यूज 24, चाणक्य सर्वे का सर्वे भी असम में ‌BJP को 12 सीटें मिलती दिख रही हैं।

दिल्ली में बीजेपी एक बार फिर से अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा सकती है। हरियाणा में इस बार कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहेगा। पंजाब में चौतरफा मुकाबला होगा लेकिन पंजाब में बीजेपी की कुछ सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया है। एग्जिट पोल के ट्रेंड बताते हैं कि दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ आने का फायदा I.N.D.I.A. को होता नहीं दिख रहा है। हरियाणा में BJP का वोट शेयर घटने और पंजाब में बढ़ने की उम्मीद दिखाई गई है।

जिस तरह से 400 पार के लिए BJP और नरेंद्र मोदी मिशन साउथ पर काम करते दिख रहे थे, एग्जिट पोल्स के रुझानों में उनकी मेहनत कुछ रंग लाती दिख रही है। साउथ में NDA अपना दावा मजबूत करती दिख रही है तो सहयोगी दलों के साथ BJP को भी बढ़ दिख रही है। तमिलनाडु और केरल की जाए तो रुझानों के मुताबिक, यहां BJP काफी हद तक बढ़त बनाती दिख रही है। वह न सिर्फ वोट फीसदी में बढ़ोतरी करने में कामयाब दिख रही है, बल्कि कुछ हद तक सीटों में तब्दील करती दिखी। केरल और तमिलनाडु में पिछली बार उसका खाता तक नहीं खुला था। इसी तरह से महज एक साल पहले कर्नाटक असेंबली हारने वाली BJP एक बार फिर से लोकसभा में अपने प्रदर्शन को दोहराती दिख रही है। इस बार यहां वह JDS के साथ लड़ी है, जबकि कांग्रेस पिछली बार की अपेक्षा बेहतर सीटें लाती दिख रही है, लेकिन जितने फायदे की उम्मीद थी, रुझानों में I.N.D.I.A. को उतना बड़ा फायदा होता दिख नहीं रहा। तेलंगाना में ‌BRS की हार के बाद फायदा कांग्रेस और BJP दोनों को दिख रहा है। आंध्र प्रदेश में BJP, TDP और पवन कल्याण की जन सेना के गठबंधन को खासी बढ़त दिख रही है। वाईएस जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ एंटी इंनकंबेंसी रूझानों में YSR कांग्रेस को जबरदस्त तरीके से झटका देती दिख रही है। उसकी सीटें कम होने जा रही हैं। ओडिशा में उड़िया गौरव और अस्मिता के मुद्दे पर लड़ी गई इस लड़ाई में BJP रुझानों में खासी बढ़त लेती दिख रही है। वह कहीं न कहीं नवीन पटनायक के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को अपने लिए वोट प्रतिशत से लेकर सीटों तक भुनाने में कामयाब दिखी।

ब्रिटेन में विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, क्या ऋषि अपना गद्दा खोने जा रहे हैं।

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ब्रिटेन में विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, ऋषि को अपना गद्दा खोने जा रहा है। इतना ही नहीं, ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऋषि सुनक ने प्रधान मंत्री की पार्टी कंजर्वेटिव के समग्र परिणामों से तीन महीने पहले ही आकस्मिक चुनाव कराया। ब्रिटेन में आम चुनाव अक्टूबर की बजाय 4 जुलाई को होंगे. प्रधानमंत्री का गद्दा पहले ही हिल चुका था. सुनक की लोकप्रियता उनकी ही पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी में घट रही है। इसके अलावा, संसद में मुख्य विपक्षी दल लेबर पार्टी ने हाल ही में लगातार स्थानीय चुनावों में जीत हासिल की है। ऐसे में ऋषि सुनक और लेबर पार्टी के नेता और ब्रिटिश संसद में विपक्ष के नेता कीर स्टर्मर ने कल सैलफोर्ड में एक टीवी चैनल की बहस में हिस्सा लिया. चैनल के डिबेट सेशन में दोनों नेताओं के बीच तनाव कभी-कभी इस हद तक पहुंच जाता था कि शो के होस्ट को कई बार यह कहते हुए सुना जाता था, ‘अपनी आवाज नीचे रखो’।

ब्रिटेन में विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, ऋषि को अपना गद्दा खोने जा रहा है। इतना ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की पार्टी कंजर्वेटिव का पूरा नतीजा बेहद खराब रहने वाला है। इसके विपरीत, सर्वेक्षणों का दावा है कि लेबर पार्टी का उदय लगभग निश्चित है।

हालाँकि, संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में, सनक और स्टर्मर लगभग हर हफ्ते प्रधान मंत्री के सवालों के दौरान बहस में शामिल होते हैं। लेकिन टीवी चैनल का विवाद उससे अलग है. कल इन दोनों नेताओं को दर्शकों के सीधे सवालों का सामना करना पड़ा. बहस के दौरान टीवी स्क्रीन पर
सुनक और भी जोश में चिल्लाते नजर आ रहे हैं.

आयकर, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) और आव्रजन नीति। ये तीनों ही विवाद के मुख्य बिंदु थे. सुनक ने टिप्पणी की कि अगर लेबर पार्टी सत्ता में आती है, तो यह आम लोगों के कंधों पर भारी कर का बोझ डाल देगी। ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा, “आप नहीं जानते कि आपके साथ क्या होने वाला है। लेबर आएगी और आपका इनकम टैक्स बहुत बढ़ा देगी. यह उनके डीएनए में है. आपकी नौकरी, आपकी कार, आपकी पेंशन। वे कर बढ़ाएंगे।” वहीं, दर्शकों को यह याद दिलाते हुए कि सुनक बहुत अमीर हैं, उन्होंने कहा, ”वह एक अलग दुनिया में रहते हैं.” स्टर्मर ने यह भी शिकायत की कि आम लोगों की समस्याएं उनके कानों तक नहीं पहुंचती क्योंकि प्रधानमंत्री खुद बेहद अमीर हैं. उन्होंने कंजर्वेटिव पार्टी द्वारा पिछले आठ साल में पांच बार प्रधानमंत्री बदलने पर भी कटाक्ष किया।

सुनक ने कहा कि ब्रिटेन में रहने वाले 18 साल के युवाओं के लिए सामुदायिक सेवा अनिवार्य की जानी चाहिए। कई अन्य देशों की तरह इसने भी युवाओं के लिए सेना में शामिल होना अनिवार्य कर दिया है। हालाँकि, दर्शकों ने इस प्रस्ताव को बहुत अच्छी तरह से नहीं लिया। स्टार्मर ने भी उनका विरोध किया है.

स्टार्मर ने आरोप लगाया कि कंजर्वेटिवों की उदार आव्रजन नीति पूरे देश को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने कहा कि अगर वे सत्ता में आये तो अवैध रूप से लोगों की तस्करी करने वालों की पहचान कर उन्हें जेल में डाल दिया जायेगा. हालाँकि, इस सवाल के जवाब में कि क्या ब्रिटेन भविष्य में यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में होगा, सुनक ने कहा कि वह हमेशा अपने देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के बीच पहले को चुनेंगे।

‘यू गॉव’ नाम की सर्वे कंपनी के मुताबिक सुनक ने कल की बहस में सिर्फ 2 फीसदी वोटों से जीत हासिल की. अगली बहस कल है.

पार्टी में उनकी लोकप्रियता लगभग निचले स्तर पर है. ऐसे में वह ज्यादा तनाव में था
कंजर्वेटिव पार्टी के नेता और ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऋषि सुनक।

ब्रिटेन के विभिन्न हिस्सों में अब स्थानीय चुनाव चल रहे हैं। मतदान कल स्थानीय समयानुसार रात 10 बजे बंद हो गया। आज सुबह से गिनती शुरू हो गई है. शाम होते-होते तस्वीर साफ होने लगी. सुनक की पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी को कई क्षेत्रों में बड़ा झटका लगा है. दूसरी ओर, विपक्षी लेबर पार्टी का उदय उल्लेखनीय है। इस बार उन्हें 26 फीसदी ज्यादा वोट मिले. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है कि लेबर पार्टी को इतनी बड़ी सफलता मिली है।

आज रात तक, कंजर्वेटिव पार्टी कुल तीन परिषदें हार चुकी है। उन्होंने कम से कम 100 पार्षद भी खो दिए। हालाँकि, कई निर्वाचन क्षेत्रों में नतीजे अभी घोषित नहीं हुए हैं।

ब्लैकपूल साउथ संसदीय सीट इस बार लेबर पार्टी ने दोबारा हासिल कर ली है। परिणामस्वरूप सुनक की पार्टी को संसद में एक सीट का नुकसान हुआ। उस केंद्र के नए सांसद क्रिस वेब ने कंजर्वेटिव पार्टी के डेविड जोन्स को हराया। इसके अलावा रेडडिच, थुर्रॉक, हार्टलपूल, रशमूर जैसे केंद्रों में भी लेबर उम्मीदवारों ने स्थानीय चुनाव जीते। वे सिर्फ ओल्डम में ही नहीं जीते। वहां का मुस्लिम समुदाय गाजा पर लेबर पार्टी की स्थिति से बिल्कुल भी खुश नहीं है। उनका मानना ​​है कि लेबर पार्टी ने गाजा में संघर्ष विराम के बारे में नहीं सोचा. हालाँकि, लेबर पार्टी के नेता और ब्रिटिश संसद के विपक्षी नेता कीर स्टार्मर पार्टी की सफलता से उत्साहित हैं। स्टर्मर ने आज संवाददाताओं से कहा, ”मुझे उम्मीद है कि यह परिणाम ऋषि सुनक को एक बड़ा संदेश देगा। इस बार जाने की बारी उसकी है. ब्रिटेन की आम जनता जान चुकी है कि ये लेबर पार्टी बिल्कुल नए रूप में वापस आ गई है. तो इस बार हम अपना काम खुद करें.

ग्रीन पार्टी भी लेबर पार्टी जैसे कुछ क्षेत्रों में सफल रही है। ब्रेक्जिट के दौरान शुरू की गई निगेल फराज की ‘रिफॉर्म यूके’ पार्टी ने भी कई सीटें जीतीं।

लेकिन अब सभी की निगाहें लंदन मेयर चुनाव के नतीजों पर हैं। मजदूर नेता सादिक खान का पलड़ा भारी है. माना जा रहा है कि वह लंदन के मेयर के रूप में लगातार तीन बार जीत हासिल कर एक कीर्तिमान स्थापित करने की ओर अग्रसर हैं।

कुल मिलाकर, सुनक अक्टूबर चुनाव से पहले भारी दबाव में हैं। ऐसी खबरें हैं कि उनकी पार्टी के कुछ सांसद चुनाव से पहले उनसे इस्तीफा मांग सकते हैं. सुनक की जगह पेनी मोर्डेंट का नाम चल रहा है. हालाँकि, कल पेनी ने स्पष्ट कर दिया कि वह प्रतिस्थापन के रूप में 10 डाउनिंग स्ट्रीट में प्रवेश नहीं करना चाहता था।