Monday, January 12, 2026
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आखिर विपक्ष के INDIA का पीएम चेहरा कैसे होगा निश्चित?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि विपक्ष के INDIA का पीएम चेहरा कैसे निश्चित होगा! राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एनसीपी के प्रमुख शरद पवार का कहना है कि विपक्ष को 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बहुत जोर देकर यह बात कही है। बड़ी बात है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को गठबंधन के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का प्रस्ताव रख चुके हैं। दिल्ली में 19 दिसंबर को विपक्षी गठबंधन की बैठक के दौरान दोनों मुख्यमंत्रियों ने यह प्रस्ताव रखा। लेकिन गठबंधन के किसी अन्य सहयोगी तो छोड़ दीजिए, खुद कांग्रेस ने ही खरगे के नाम का समर्थन नहीं किया। दरअसल, चुनावों में चेहरे का बड़ा प्रभाव होता है। ताकतवर चेहरे की तरफ मतदाता आसानी से आकर्षित हो जाता है। यही कारण है कि बीजेपी कई बार विधानसभा चुनावों में भी अपने मुख्यमंत्रियों की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर देती है। अभी हाल ही में संपन्न हुए पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनावों की बात करें तो बीजेपी ने यह फॉर्मुला अपनाया। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार का लंबा शासन रहा था। चौहान ही चुनावों के वक्त भी एमपी के सीएम थे, बावजूद इसके बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी विपक्ष में थी। राजस्थान में वसुंधरा राजे तो छत्तीसगढ़ में रमन सिंह बीजेपी के मुख्यमंत्री रह चुके थे, वो भी लंबे समय तक। लेकिन इन दोनों प्रदेशों में भी बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा। तेलंगाना और मिजोरम में भी बीजेपी की तरफ से कोई सीएम कैंडिडेट नहीं घोषित किया गया। हालांकि, इन दोनों प्रदेशों में बीजेपी का बहुत बड़ा स्टेक नहीं था। लेकिन एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की चाल कामयाब रही। पार्टी ने न केवल एमपी की सत्ता अपने पास बरकरार रखी बल्कि राजस्थान और काफी हैरतअंगेज तरीके से छत्तीसगढ़ की सत्ता भी कांग्रेस से छीन ली।

अब राजनीतिक विश्लेषणकर्ताओं और खुद कांग्रेस ने भी माना कि कम से कम मध्य प्रदेश में कमलनाथ का चेहरा बतौर सीएम आगे करना एक चूक थी। राजस्थान के पिछले विधानसभा चुनाव में तो नारे लगे थे- मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ आम जनता में कुछ इस हद तक नाराजगी थी। बावजूद इसके बीजेपी ने उन्हें सीएम कैंडिडेट बनाया और पार्टी हार गई। इस बार छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को कांग्रेस का मजबूत चेहरा माना जा रहा था, लेकिन जमीनी हालात कुछ और थे। फिर नतीजों ने सच्चाई सबके सामने ला दी। चूंकि बीजेपी ने इस बार रणनीति ही बना ली थी कि किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करना है तो उसने राजस्थान में भी चुनावों से पहले वसुंधरा की जगह कोई नया नाम सामने नहीं लाया। इस तरह पीएम मोदी ने बीजेपी की चुनावी नैया तीनों प्रदेशों में पार कर दी।

शरद पवार विपक्षी दलों के गठबंधन में वरिष्ठतम नेताओं की कतार से हैं। उन्होंने पुणे में बोलते हुए इतिहास का हवाला दिया। पवार ने कहा, ‘मोर्चा इंडिया बिना प्रधानमंत्री के चुनाव में जा सकता है। 1977 में ऐसा ही हुआ था जब मोरारजी देसाई चुनाव से पहले कहीं नहीं थे और विपक्ष बिना प्रधानमंत्री चेहरा चुनाव लड़ा था। आम चुनाव के बाद एक नया दल बनाया गया और वह प्रधानमंत्री बने।’ उन्होंने कहा कि लोग विपक्ष के पास प्रधानमंत्री उम्मीदवार हो या न हो, अपना चुनाव करेंगे, खासकर अगर उन्होंने बदलाव का फैसला कर लिया है। जेडीयू सांसद केसी त्यागी ने इस विषय पर एक लेख भी लिखा है। बहरहाल, पवार की इस बात में बहुत हद तक दम है। अगर जनता किसी सरकार से ऊब जाती है तो वह उसका तख्ता पलट कर ही देती है, जैसा कि पिछली बार वसुंधरा के खिलाफ ऐलान करके बीजेपी को सत्ता से हटाया था। 2014 में केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ भी कुछ ऐसा ही माहौल बना था जब जन-जन में मनमोहन सिंह के नेृत्व वाले शासन को उखाड़ फेंकने की भावना गहरा गई थी। तो सवाल है कि क्या मौजूदा मोदी सरकार के खिलाफ भी ऐसा ही माहौल है?

इस सवाल का जवाब भी शरद पवार के बयान में ढूंढा जा सकता है। वो जिस तरह कह रहे हैं कि जनता ने अगर बदलाव का फैसला किया तो चुनाव में वह अपना निर्णय सुना ही देगी। इस बयान में पवार का विश्वास कहीं से नहीं झलक रहा कि जनता ने बदलाव का मन बना लिया है। यही वजह है कि वो इंडिया गठबंधन की तरफ से कोई चेहरा नहीं देना चाहते। मुश्किल यह भी है कि विपक्ष के पास मोदी के टक्कर का कोई चेहरा है भी नहीं। दूसरी मुश्किल यह है कि विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार भी हैं। राजनीति के मंझे खिलाड़ी पवार ने इन दोनों परेशानियों के मद्देनजर ही सुझाव दिया कि विपक्षी गठबंधन को पीएम का कोई चेहरा नहीं देना चाहिए। इससे गठबंधन में संभावित फूट को रोका जा सकेगा तो मतदाताओं को भी इस उलझन में रखा जा सकेगा कि चुनावों में जीत के बाद विपक्ष पीएम का शायद कोई असरदार चेहरा ढूंढ ले।

इसमें कोई शक नहीं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों या प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ही ले लीजिए, ये सभी मन ही मन में खुद को पीएम मैटिरियल ही मानते हैं। नीतीश कुमार के लिए तो उनकी पार्टी जेडीयू के कई नेता समय-समय पर बैटिंग करते ही रहते हैं। हालांकि, ममता और केजरीवाल की तरफ से कांग्रेस अध्यक्ष खरगे का नाम आगे किए जाने को लेकर पूछे गए सवाल पर नीतीश ने मीडिया के सामने अपनी उम्मीदवारी को नकार दिया। वो पहले भी ऐसा करते आए हैं, लेकिन हकीकत तो सबको पता है। जीवन का 83वां वसंत देख चुके शरद पवार राजनीति की भाषा समझने में जबर्दस्त माहिर हैं। वो जानते हैं कि खरगे हों या नीतीश या फिर ममता-केजरीवा, किसी में इतना दम नहीं कि वो मोदी के खिलाफ विपक्ष के लिए वोट जुटा लें। विपक्ष के एक बड़े चेहरे राहुल गांधी की तो ऐसी हालत है कि कांग्रेस उनका नाम आगे करने से भी कतराती है क्योंकि उसे डर है कि ऐसा करते ही कई दल गठबंधन से तौबा कर सकते हैं।

क्या प्रियंका की जगह प्रभावी बन पाएंगे अविनाश पांडे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अविनाश पांडे प्रियंका की जगह प्रभावी बन पाएंगे या नहीं! उत्तर प्रदेश कांग्रेस कुछ वर्षों के अंतराल में बड़े बदलावाें के दौर से गुजरती रही है। इसी क्रम में ताजा बदलाव प्रियंका गांधी की जगह अविनाश पांडेय को यूपी प्रभारी बनाए जाने से शुरू हुआ है। इससे पहले पार्टी ने अपने पुराने अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान सौंपी थी। माना जा रहा है कि बदलाव का ये सिलसिला अभी और आगे बढ़ेगा और संगठन में इसका असर देखने को मिलेगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि यूपी में कांग्रेस को क्या इससे कुछ फर्क पड़ेगा? जो काम प्रियंका गांधी न कर सकीं, अविनाश पांडेय कर पाएंगे? याद कीजिए 2018 आते-आते प्रियंका गांधी तेजी से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने लगी थीं। इससे पहले तक वह रायबरेली और अमेठी में ही सक्रिय रहती थीं। 2019 की शुरुआत में पार्टी नेतृत्व ने प्रियंका गांधी और ज्याेतिरादित्य सिंधिया को यूपी प्रभार सौंप दिया। ज्योतिरादित्य यूपी में न के बराबर ही आए और बाद में वह भाजपा में चले गए। इसके बाद प्रियंका गांधी को ही पूरे यूपी का प्रभारी बना दिया गया। प्रियंका लखनऊ में कैंप करने लगीं। उन्होंने सोनभद्र के उम्भा कांड के पीड़ितों के लिए धरना प्रदर्शन किया। लखीमपुर खीरी कांड के विरोध में प्रदर्शन, नजरबंदी झेली।प्रियंका गांधी ने आंदोलन के आक्रामक रुख से पार्टी में जान फूंकने की कोशिश की। वह योगी सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर मोर्चा लेती रहीं। यूपी में अजय कुमार लल्लू का प्रदेश अध्यक्ष पर चयन को भी प्रियंका की ही पसंद माना गया। लखनऊ में आए दिन कांग्रेस के धरना प्रदर्शन की खबरें आने लगीं।

इसके बाद प्रियंका गांधी ने 2022 विधानसभा चुनाव में ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ कांग्रेस प्रत्याशियों को मैदान में उतारा। महिलाओं के मुद्दे पर प्रियंका ने बड़ी लकीर खींचते हुए 155 टिकट महिलाओं को दिए। ये बड़ी छलांग थी क्योंकि पिछले 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 12 महिलाओं को टिकट दिया था। लेकिन प्रियंका का ये प्रयोग पूरी तरह फेल साबित हुआ और पार्टी से सिर्फ आराधना मिश्रा मोना ही अकेली महिला विधायक जीतीं। वह लगातार जीतती रही हैं। 2017 में अराधना मिश्रा के साथ अदिति सिंह ने भी कांग्रेस से जीत दर्ज की थी लेकिन अब अदिति भाजपाई हो चुकी हैं।

बहरहाल, यूपी में कुल 2 सीटों पर जीत के निराशाजनक प्रदर्शन का असर ये हुआ कि गांधी परिवार पर यूपी की सियासत को लेकर निराशा साफ दिखने लगी। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में इसकी साफ झलक मिली, जब दक्षिण से उत्तर तक पैदल यात्रा कर रहे राहुल गांधी यूपी के कुछ बॉर्डर जिलों से ही गुजरे। हाल ही में कांग्रेस की बैठक में यूपी के नेताओं से राहुल गांधी ने ये तक कह दिया कि यूपी के नेताओं में उत्साह की कमी है। यहां तीन ऐसे नेता नहीं हैं, जो मुख्यमंत्री बनना चाहते हों और उसके लिए कुछ भी करने का माद्दा रखते हों। फिर इस बैठक के बाद पार्टी हाईकमान की तरफ से ताजा फरमान आया और प्रियंका गांधी की जगह अविनाश पांडेय को यूपी प्रभारी बना दिया गया।

अपनी नियुक्ति के बाद अविनाश पांडे ने एक्स पर लिखा कि मुझ पर दिखाए गए विश्वास के लिए असीम कृतज्ञता के साथ कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, हमारे नेता राहुल गांधी जी, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल जी और उस विश्वास का सम्मान करने के दृढ़ संकल्प के साथ, मैं विनम्रतापूर्वक उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव के रूप में नियुक्ति स्वीकार करता हूं। नागपुर के रहने वाले अविनाश पांडे पेशे से वकील हैं। उन्होंने पार्टी की छात्रा शाखा से अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत की। 2008 में वह राज्यसभा चुनाव लड़े लेकिन एक वोट से हार गए। इसके बाद 2010 में उन्हें महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद चुनाव गया। अविनाश पांडे को राहुल गांधी कैंप का माना जाता है। अविनाश पांडे तीन साल पहले 2020 में राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रही कुर्सी की जंग के दौरान चर्चा में आए थे। दरअसल उस साल जुलाई में सचिन पायलट और उनके समर्थकों ने बगावत कर दी थी। बाद में प्रियंका गांधी ने दखल दी और दोनों में सुलह हुई, जिसके बाद मामला शांत हुआ। इसके बावजूद गहलोत सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करना पड़ा।

इस पूरे मामले में आखिरकार तत्कालीन राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडेय पर गाज गिरी थी। उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने 16 अगस्त 2020 में प्रदेश प्रभारी पद से हटा दिया गया। दरअसल अविनाश पांडे पर पायलट कैंप की तरफ से आरोप लगा था कि वह गहलोत गुट का समर्थन कर रहे हैं। पायलट गुट का कहना था कि अगर अविनाश पांडे उनकी बात कांग्रेस आलाकमान तक पहुंचा देते तो बगावत की नौबत नहीं आती। फिर जनवरी, 2022 में आखिरकार उनकी वापसी हुई और वह झारखंड के प्रभारी महासचिव नियुक्त किए गए।

वैसे उत्तर प्रदेश से अविनाश पांडे अनभिज्ञ नहीं हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मधुसूदन मिस्त्री जब यूपी प्रभारी हुआ करते थे तो उनके साथ वह सह प्रभारी थे। जाहिर है उत्तर प्रदेश की सियासत से वह अच्छी तरह वाकिफ हैं। लेकिन उनके सामने एक ऐसे संगठन को दोबारा खड़ा करने की चुनौती है, जो तमाम प्रयोगों, ओवरहालिंग के बाद भी प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर ही है। कई जगह स्थिति ये है कि पार्टी को प्रत्याशी तक नहीं मिल पाते। जमीनी स्तर पर संगठन कार्यकर्ताओं के मामले में कई जगह क्षेत्रीय दलों से भी पीछे है। अब लोकसभा चुनाव 2024 करीब है, ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ इंडिया गठबंधन का तालमेल भी उनके सामने बड़ी चुनौती होगा। यही नहीं राम मंदिर के माहौल में भाजपा की विकासवादी हिंदुत्व रणनीति की काट भी तलाशनी होगी। वैसे राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें यूपी से तीन नेता ऐसा नहीं मिलते, जिनका सीएम बनने का सपना हो और वह कुछ भी करने का माद्दा रखते हों। जाहिर है अविनाश पर ऐसे नेताओं को ढूंढ़ने का बड़ा दारोमदार है।

भारतीय न्याय सिस्टम के बारे में क्या बोले जस्टिस संजय किशन कौल?

हाल ही में जस्टिस संजय किशन कौल ने भारतीय न्याय सिस्टम पर एक बयान दिया है! जस्टिस संजय किशन कौल ने रिटायर होने के बाद संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों के चयन के लिए कॉलेजियम सिस्टम को सबसे अच्छा तरीका नहीं बताया। हालांकि, उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कॉलेजियम का हिस्सा रहते हुए कई नामों को आगे बढ़ाया था। शायद यही वजह है कि रिटायरमेंट के बाद व्यक्त उनके विचार पर किसी को हैरानी नहीं हुई। न्यायपालिका के सूत्रों का कहना है कि उनके मोहभंग का कारण शायद जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में एक वकील की नियुक्ति, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक जज को सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन और दिल्ली हाईकोर्ट के सबसे सीनियर जज की जगह सुप्रीम कोर्ट के जज या किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में नियुक्ति नहीं कर पाना हो सकता है। इन प्रस्तावों को कॉलेजियम के अन्य सभी सदस्यों के विरोध का सामना करना पड़ा था। विवाद से बचने के लिए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) 6 नवंबर के बाद से रणनीतिक रूप से कॉलेजियम की बैठकें आयोजित करने से बचते रहे। 6 नवंबर को सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति के लिए तीन नामों की सिफारिश की थी। जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस कौल भी कॉलेजियम मेंबर के रूप में तीनों नामों का चयन करने में शामिल थे।

जस्टिस एनवी रमण के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में आने वाले जस्टिस कौल को उम्मीदवारों के चयन के बारे में मजबूत राय रखने वाला व्यक्ति माना जाता था। वह चाहते थे कि जिन उम्मीदवारों का नाम वो सुझाते हैं और उनके नामों की सिफारिश करने के लिए जोर देते हैं, उन्हें ही नियुक्त किया जाए, भले ही कॉलेजियम के अन्य सदस्यों को आपत्ति हो। इस तरह के उम्मीदवारों को प्रशासनिक पक्ष पर जज के रूप में आगे बढ़ाने में सफल होने के बाद उन्होंने न्यायिक पक्ष पर कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से केंद्र सरकार को उन्हें जल्द से जल्द हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्त करने के लिए प्रेरित, बल्कि यह कहना उचित होगा कि मजबूर करते थे। वो रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले तक कई हाईकोर्ट जजों के ट्रांसफर प्रपोजल्स को भी आगे बढ़ाने में सफलता प्राप्त की थी।

जस्टिस कौल हाई कोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के नामों पर सहमति के लिए सीजेआई के नेतृत्व वाले कॉलेजियम और सरकार के बीच ‘गुप्त’ या ‘पिछले दरवाजे’ से बातचीत के खिलाफ थे। इस कारण कई मामलों में शासन के दो अंगों के बीच खींचतान हुई। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके बजाय कॉलेजियम की सिफारिशों के खिलाफ सरकार की तरफ से उठाई गई आपत्तियों पर दोनों के बीच पारदर्शी बातचीत होनी चाहिए। पारदर्शी संवाद’ के रास्ते से विशेष सिफारिशों के खिलाफ सरकार के आरोपों और आपत्तियों की प्रकृति उजागर हो सकती है। लेकिन जजों के रूप में नियुक्ति के लिए विचार किए जा रहे व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और गरिमा की रक्षा के लिए इस रास्ते से जानबूझकर तौबा कर लिया गया है। किसी व्यक्ति के खिलाफ सरकार की असत्यापित आपत्तियों को सार्वजनिक करना, चाहे वह वकील हो या न्यायिक अधिकारी, उनकी पेशेवर गतिविधि को खतरे में डाल सकता है, भले ही उन्हें अनुशंसित पद के लिए नियुक्त नहीं किया गया हो।

ऐसे उदाहरण हैं जहां सरकार ने कुछ मुद्दों को रेखांकित करते हुए कॉलेजियम को पुनर्विचार के लिए नाम वापस भेजे हैं। ऐसे अवसरों पर सीजेआई ने संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से पूछताछ करने के लिए कहा है। दूसरी जांच के निष्कर्षों ने सीजेआई को सरकार के साथ मामले को नए सिरे से उठाने में मदद की और ज्यादातर मामलों में सीजेआई नियुक्ति कराने में सफल रहे। सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने कहा कि अगर इन बातचीत को गोपनीय नहीं रखा जाता तो वे कई हाई कोर्ट जजों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते, जिनकी नियुक्तियों पर शुरू में सरकार ने आपत्ति जताई थी।

साथ ही, सीजेआई के नेतृत्व वाला कॉलेजियम कार्यपालिका की अप्रमाणित और आधारहीन आपत्तियों को स्वीकार नहीं करने पर अडिग रहा है और सरकार की तरफ से इन्हें वापस किए जाने के बाद भी उन्हीं नामों को दृढ़ता से दोहराया है। कॉलेजियम के सदस्यों ने सर्वसम्मति से कहा कि संवैधानिक अदालतों के जजों के चयन के लिए कॉलेजियम सिस्टम सबसे उपयुक्त है या नहीं, यह संसद को तय करना है और अगर इसे चुनौती दी जाती है तो सुप्रीम कोर्ट को कानून की वैधता का परीक्षण करना है। सुप्रीम कोर्ट के सूत्र भी अचानक न्यायिक नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम सिस्टम को लेकर गलत धारणा फैलाने की कोशिश से उलझन में दिख रहे थे।

क्या सत्ता पक्ष की काट ढूंढ पाएगी विपक्ष?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विपक्ष सत्ता पक्ष की काट ढूंढ पाएगी या नहीं! लोकसभा चुनाव के लिए अभी से माहौल बन चुका है। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. सीट शेयरिंग का पेच सुलझाना तो दूर अभी उस पर चर्चा तक नहीं शुरू कर पाया है। दूसरी तरफ, बीजेपी ने ‘फिर आएगा मोदी’ का हुंकार भर दिया है। पार्टी ने 2024 लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन सॉन्ग लॉन्च किया है जिसमें मोदी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा है। उससे पहले ही देशभर में राममंदिर को लेकर एक अलग ही जोश का माहौल है और बीजेपी उसे भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में लगातार तीसरी बार आने के लक्ष्य से उतरेंगे। लक्ष्य बड़ा है क्योंकि अबतक ये करिश्मा सिर्फ पंडित जवाहर लाल नेहरू ही कर पाए हैं। बीजेपी ने ‘फिर आएगा मोदी’ कैंपेन सॉन्ग के जरिए अभी से 2024 के लोकसभा चुनाव का अजेंडा सेट कर दिया है। पार्टी का पूरा फोकस प्रो-इन्कंबेंसी फैक्टर पर है। हसरत अपनी उपलब्धियों की बदौलत केंद्र की सत्ता में हैट्रिक लगाने की है। वीडियो सॉन्ग में बीजेपी ने मोदी सरकार की 2014 से अबतक की उपलब्धियों का बखान किया है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण को लेकर बने माहौल को बीजेपी जमकर भुना रही है। 30 दिसंबर को पीएम मोदी अयोध्या में महर्षि बाल्मीकि इंटरनैशल एयरपोर्ट अयोध्या धाम का उद्घाटन करने वाले हैं। 22 जनवरी को रामलला की मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रधानमंत्री मुख्य यजमान होंगे। इस मौके पर वह भाषण भी देंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बन रहे राम मंदिर का सेहरा भी बीजेपी के ही सिर बैठ रहा है। समारोह के लिए मिले न्योता को ठुकराकर विपक्ष उसका ही काम आसान कर रहा है। हालांकि, सोनिया गांधी ने न्योता स्वीकार कर लिया है। राम मंदिर के अलावा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल कॉरिडोर निर्माण जैसे कदमों से पार्टी अपने हिंदुत्व अजेंडे को और धार दे रही है।

प्रो-इन्कंबेंसी फैक्टर पर बीजेपी को यूं ही भरोसा नहीं है। मोदी सरकार की उपलब्धियों की झोली भी भरी पड़ी है। पीएम मोदी की अगुआई में सरकार ने कुछ ऐसे काम किए हैं जिनके बारे में कल्पना करना तक मुश्किल था। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करना वैसी ही उपलब्धि है। एक बार में तीन तलाक बोलकर किसी महिला से एकतरफा शादी खत्म करने की कुप्रथा तलाक-ए-बिद्दत को खत्म करना, डिजिटल पेमेंट क्रांति भी वैसी ही उपलब्धि है। बीजेपी ने अपने कैंपेन सॉन्ग में इन सभी उपलब्धियों का जिक्र किया है। बात चाहे अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बुलंद होते भारत की बुलंद तस्वीर की हो या वैश्विक मंचों पर देश की बढ़ती धाक की, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर शानदार ट्रैक रिकॉर्ड हो या आतंकवाद के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक जैसे साहसिक कदम, पार्टी ने इन सबको मोदी सरकार की उपलब्धि के तौर पर शोकेस किया है।

10 मिनट के वीडियो में पार्टी ने पिछले 10 साल में जिन वादों को पूरा किया गया है, उनको जिक्र किया है जिसमें राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 का खात्मा, तीन तलाक पर बैन, सड़कों के जाल, नए-नए एयरपोर्ट के निर्माण, रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्चर समेत बुनियादी विकास की परियोजनाएं शामिल हैं। इनके अलावा उज्जवला योजना, हर घर नल से जल, जनधन योजना, किसान सम्मान निधि, मुफ्त राशन योजना, पीएम आवास योजना, 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज से जुड़ी आयुष्मान भारत जैसी जनकल्याण की योजनाओं से बीजेपी को इस बार भी उम्मीद है। कोरोना महामारी से निपटने के लिए देसी वैक्सीन, देश के आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरने, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से बढ़ते कदम, आतंकवाद के खिलाफ निर्याण जंग, चंद्रयान जैसी वैज्ञानिक उपलब्धियों और जी-20 के सफल आयोजन को भी बीजेपी 2024 में भुनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। कैंपेन सॉन्ग में बीजेपी ने पीएम मोदी को 140 करोड़ भारतीयों की आशाओं के प्रतीक के तौर पर पेश किया है।

हाल ही में हिंदी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को मिली जबरदस्त जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह है। पार्टी के रणनीतिकारों को 2024 लोकसभा चुनाव में और भी बड़े अंतर से जीत हासिल करने का भरोसा जगा है। इन चुनावों में बीजेपी बिना किसी सीएम फेस के उतरी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा। तीनों राज्यों में बीजेपी ने नए चेहरों को सरकार की कमान देकर चौंकाया है। लोकसभा चुनाव में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने आप में एक बड़े फैक्टर होंगे और बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी फैक्टर निर्णायक साबित होगा। हाल में दिल्ली में हुए बीजेपी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक में पार्टी ने 50 प्रतिशत वोट शेयर का लक्ष्य रखा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 37.4 प्रतिशत वोट मिले थे।

पीएम मोदी की हैटट्रिक को रोकने के लिए विपक्ष एकजुटता के मंत्र पर भरोसा कर रहा है। बीजेपी के खिलाफ ज्यादातर सीटों पर विपक्ष की तरफ से साझा उम्मीदवार उतारने की रणनीति के तहत 28 दलों ने I.N.D.I.A. नाम से गठबंधन भी बना लिया है लेकिन वह जमीन पर अभी छाप छोड़ने में नाकाम रहा है। जुलाई में ही गठबंधन की बुनियाद पड़ गई लेकिन 5 महीने बाद अबतक गठबंधन की एक भी साझा रैली नहीं हो सकी है। सबसे बड़ा पेच विपक्ष की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार और सीट शेयरिंग को लेकर है। सीट शेयरिंग पर तो अभी चर्चा तक नहीं शुरू हो पाई है। पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, दिल्ली जैसे राज्यों में सीट शेयरिंग बहुत ही पेचीदा है। महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है। विपक्षी नेताओं के खिलाफ एजेंसियों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा भी विपक्ष उठा रहा है। इसके अलावा जातिगत जनगणना की मांग को भी विपक्षी दल धार दे रहे हैं। हालांकि, हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों से दिखता है कि विपक्ष का कास्ट सेंसस दांव फेल रहा है।

आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे मायावती के भतीजे?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि मायावती के भतीजे आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे! लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बहुजन समाज पार्टी नई रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी में उत्तराधिकार पर फैसला हो चुका है और अब मायावती के बाद आकाश आनंद नए सर्वेसर्वा बन चुके हैं। नई रणनीति के तहत फैसला किया गया है कि पार्टी के जो प्रमुख चेहरे हैं, वह सभी लोकसभा चुनाव में मैदान में उतरें। इसी क्रम में आकाश आनंद के लिए भी सेफ सीट की तलाश की जा रही है। मोटे तौर पर तीन सीटों पर चर्चाएं शुरू हुई हैं। एक अम्बेडकरनगर की सीट है, जहां से मायावती जीतती रही हैं। वहीं इसके अलावा सहारनपुर और बिजनौर लोकसभा सीट को लेकर भी चर्चाएं हैं। आकाश आनंद के लिए तीन सीटों पर सबसे ज्यादा चर्चाएं हैं। पहली बिजनौर सीट है। यहां दलित, मुस्लिम वोटबैंक निर्णायक भूमिका निभाता र हा है ऐसे में बसपा के लिए ये गठजोड़ पार्टी की राहें आसान कर सकता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा के गठबंधन हुआ था और इस सीट पर बसपा के मलूक नागर ने जीत दर्ज की थी। ये बसपा ही नहीं यूपी के सबसे अमीर सांसद माने जाते हैं। हालांकि मलूक नागर ने 2014 में भी इस सीट से चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली थी। इस सीट की खास बात ये है कि 34 साल पहले 1989 में मायावती ने यहीं से लोकसभा चुनाव में पहली जीत का स्वाद चखा था। उत्तराधिकारी के तौर पर आकाश आनंद के लिए ये सीट इसी लिए ज्यादा मुफीद मानी जा रही है।

बिजनौर लोकसभा सीट पर मुस्लिम वोटर ही यहां के प्रत्याशी का भविष्य तय करते आए है। इस सीट पर मुस्लिम मतदाता 45 प्रतिशत हैं। एससी वोटर करीब 22 फीसदी हैं। इस सीट पर पांच बार कांग्रेस तो तीन बार भाजपा ने जीत दर्ज की। इसी तरह बसपा के साथ रालोद भी यहां से दो बार जीती। सपा यहां से एक बार जीत पाई है। वैसे बसपा के लिए इस बार राहें इतनी आसान भी नहीं रहने वाली क्योंकि समाजवादी पार्टी भी यहां अपनी रणनीति पर काम कर रही है। 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा ने बिजनौर लोकसभा क्षेत्र में आने वाली पांच में से चार विधानसभा सीटें अपने नाम की थीं।

दूसरी सीट है सहारनपुर। यहां से हाल ही में बसपा ने अपने सिटिंग सांसद हाजी फजलुर्रमान का टिकट काट दिया है। पार्टी ने यहां से 2017 विधानसभा चुनाव में देवबंद से बसपा प्रत्याशी माजिद अली को लोकसभा प्रभारी घोषित किया गया है। खास बात ये है कि इस सीट पर पहले दावेदारी इमरान मसूद की मानी जा रही थी लेकिन बसपा उन्हें निष्कासित कर चुकी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार फजलुर्रहमान पर जो कार्रवाई हुई, उसमें उनकी सपा प्रमुख अखिलेश यादव से बढ़ती नजदीकी काे कारण माना गया। यहां से आकाश आनंद को उतारकर पार्टी अपनी रणनीति पर आगे बढ़ सकती है। लेकिन बसपा के सामने समाजवादी पार्टी की भी तगड़ी चुनौती रहेगी।

मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर 6 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। इनके अलावा 3 लाख एससी, डेढ़ लाख गुर्जर और साढ़े 3 लाख के करीब सवर्ण जातियां हैं। पिछले कुछ चुनावों पर गौर करें तो यूपी में समाजवादी पार्टी को कई जगह एकमुश्त मुस्लिम वोट मिलते दिख रहे हैं। ये सीट बसपा ने 2019 में जरूर जीती थी लेकिन उस समय सपा और बसपा का गठबंधन था। दूसरी तरफ भाजपा भी इस सीट पर कमजोर नहीं मानी जाती। फजलुर्रहमान करीब 20 हजार वोट से ही भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा को हरा पाए थे। तीसरी सीट अंबेडकरनगर है। पहले ये अकबरपुर नाम से जानी जाती थी। मायावती ने तीन बार इस सीट से चुनाव जीता। उन्होंने 1998, 1999 और 2004 में अकबरपुर से जीत दर्ज की और दिल्ली पहुंची। बाद में 2009 में भी यहां से बसपा ही जीती। लेकिन 2014 के बाद से बसपा यहां लगातार हार रही है। पूर्वांचल की ये सीट मायावती के दिल के करीब मानी जाती है। चुनावी राजनीति से दूरी बना चुकीं मायावती ने अंबेडकरनगर में एक रैली के दौरान कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो वह अंबेडकरनगर से ही चुनाव लड़ेंगीं। दिल्ली का रास्ता तो यहीं से जाता है। बता दें 1995 में मायावती ने ही फैजाबाद से अलग कर अंबेडकर नगर जिले की स्थापना की थी। अंबेडकरनगर में 25 फीसदी आबादी अनुसूचित की मानी जाती है। यहां 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।

यहां पांडे परिवार का भी अपना रसूख है। 2019 के लोकसभा चुनाव में रितेश पांडे बसपा से जीते थे। उनके पिता राकेश पांडे भी यहां से एक बार सांसद रह चुके हैं। लेकिन 2022 में वह बसपा छोड़ सपा में चले गए और इस समय राकेश पांडे जलालपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। पिता ने पार्टी छोड़ी तो खामियाजा बेटे को भुगतना पड़ा था और रितेश पांडे को बसपा के संसदीय दल नेता के पद से हाथा धोना पड़ा। उधर सपा भी यहां कमजोर नहीं है। कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे लालजी वर्मा और राम अचल राजभर आज अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में शुमार हैं। बेंगलुरू में इंडिया गठबंधन की बैठक में भी दोनों नेता दिखाई दिए थे।

एक तरफ तो आकाश आनंद के चुनाव लड़ने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी तरफ बसपा के सामने अपने ही सांसदों को बचाए रखने की चुनौती है। मायावती ने साफ ऐलान कर दिया है कि बसपा किसी गठबंधन में शामिल नहीं है। पिछले कुछ चुनावों को देखें तो उत्तर प्रदेश में बसपा की हालत काफी खराब है। 2019 लोकसभा चुनावों में भले ही उसने 10 सीटें जीती थीं लेकिन इस में भी सपा से गठजोड़ काे ज्यादा श्रेय मिला। क्योंकि 2014 में बसपा अकेले लड़ी और एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इसी तरह 2022 के विधानसभा चुनावों में भी अकेले लड़ने वाली बसपा के हाथ सिर्फ एक सीट ही लगी थी।

जाहिर है पार्टी की स्थिति को लेकर संशय के बादल गहराए हैं और कई नेता विरोधी पार्टियों के संपर्क में हैं। इनमें अमरोहा के सांसद दानिश अली भी कांग्रेस के ज्यादा करीब दिख रहे हैं। उन्हें इसी महीने 9 दिसंबर को मायावती निलंबित भी कर चुकी हैं। फजलुर्रहमान का टिकट काटा जा चुका है। अगर आकाश आनंद के लिए बिजनौर सीट का चयन होता है तो मलूक नागर को कहां एडजस्ट किया जाएगा? ये भी बड़ा सवाल है। इसी तरह अंबेडकरनगर के सांसद रितेश पांडे अपने पिता के सपा में चले जाने के कारण दुविधा में हैं। सवाल ये है कि क्या पार्टी उन्हें दोबारा टिकट देगी? इसी तरह लालगंज से सांसद संगीता आजाद और जाैनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव पर भी संशय के बादल गहराए हुए हैं।

क्या अब अयोध्या का लगातार हो रहा है विकास?

अब अयोध्या का लगातार विकास होता जा रहा है!उत्तर प्रदेश के राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा इन दिनों परवान पर है। 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्य यमजमान बनेंगे। इस दिन प्रभु रामलला को उनके मंदिर में विराजमान किया जाएगा। इसकी तैयारी जोड़ों पर है। हालांकि, इससे पहले अयोध्या में एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। इसे 22 जनवरी के रिहर्सल के तौर पर देखा जा रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या पहुंच रहे हैं। वह विकास योजनाओं की सौगात देंगे। अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट और वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी के हाथों से होगा। वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेनों को पीएम मोदी इस कार्यक्रम से हरी झंडी दिखाएंगे। इस कार्यक्रम से पहले दोनों नवनिर्मित स्थलों के नाम सामने आए हैं। अयोध्या एयरपोर्ट का नाम महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं, अयोध्या स्टेशन को अब अयोध्या धाम स्टेशन के नाम से जाना जाएगा। अयोध्या एयरपोर्ट के नाम को लेकर राजनीति की चर्चा होने लगी है। उत्तर प्रदेश के राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा इन दिनों परवान पर है। 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्य यमजमान बनेंगे। इस दिन प्रभु रामलला को उनके मंदिर में विराजमान किया जाएगा। इसकी तैयारी जोड़ों पर है। हालांकि, इससे पहले अयोध्या में एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। इसे 22 जनवरी के रिहर्सल के तौर पर देखा जा रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या पहुंच रहे हैं। वह विकास योजनाओं की सौगात देंगे। अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट और वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी के हाथों से होगा। वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेनों को पीएम मोदी इस कार्यक्रम से हरी झंडी दिखाएंगे। इस कार्यक्रम से पहले दोनों नवनिर्मित स्थलों के नाम सामने आए हैं। अयोध्या एयरपोर्ट का नाम महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं, अयोध्या स्टेशन को अब अयोध्या धाम स्टेशन के नाम से जाना जाएगा। अयोध्या एयरपोर्ट के नाम को लेकर राजनीति की चर्चा होने लगी है।

एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वाल्मीकि समाज की जनसंख्या करीब 2 करोड़ 19 लाख बताई जाती है। इसके अलावा देश के तमाम राज्यों में यह वर्ग बड़ी तादाद में रहता है। सनातन धर्म को मानने वाला दलित समाज का यह वर्ग राजनीतिक रूप से अन्य नेताओं पर निर्भर रहा है। मतलब राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ग की राजनीतिक आकांक्षाएं दबी रही हैं। यूपी में दलित समाज की राजनीति करने वाली मायावती हों या फिर बिहार में रामविलास पासवान, यह वर्ग इनसे जुड़ा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पिछले दिनों राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अपमान के मामले में अलग ही बयान दिया था। दरअसल, उप राष्ट्रपति के बयान को जाट समाज और ओबीसी तबके के अपमान से जोड़ा गया। इस पर खरगे ने कहा कि मैं दलित समाज से आता हूं, इसलिए भाजपा मुझे सदन में बोलने नहीं दे रही है।

मल्लिकार्जुन खरगे के बयान से साफ हुआ कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में उनके दलित समाज के होने को मुद्दा बना सकती है। पिछले दिनों I.N.D.I.A. की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष को लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व देने की चर्चा हुई। इस मसले के बाद अब अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नामकरण का मुद्दा सामने आया है। यह एक बड़े वर्ग को साधने और कांग्रेस के संभावित दलित पॉलिटिक्स के जवाब के रूप में देखी जा रही है। लोकसभा चुनाव से पहले महर्षि वाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के जरिए इस वर्ग की चर्चा शुरू हो गई है। पीएम नरेंद्र मोदी इस वर्ग को साधते दिख रहे हैं। पहली बार वाल्मीकि समाज को अलग रूप में पहचान देने की कोशिश की जा रही है। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। इससे दलित समाज का एक बड़ा वर्ग भारतीय जनता पार्टी से अपना जुड़ाव महसूस कर सकेगा। वहीं, दलित को सनातन विरोधी साबित करने की ओर में जुटे स्वामी प्रसाद मौर्य से लेकर चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं को भी इसे करारा जवाब दिया जा सकेगा।

दलित समाज के अंग के रूप में वाल्मीकि वर्ग की पहचान है। इस समाज का मुख्य कार्य साफ- सफाई होता है। इस जाति वर्ग में नायक, बेडार, बेडा, बोया, भंगी, महादेव कोली, मेहतर, नाइक आदि के रूप में इनकी पहचान है। देश के अलग- अलग राज्यों में इस जातिवर्ग को अलग- अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण भारत में वाल्मीकि समाज को क्षत्रिय और योद्धा जाति के रूप में पहचाना जाता है। महर्षि वाल्मीकि से यह वर्ग खुद को जोड़ता रहा है।

महर्षि वाल्मीकि नाम को चर्चा में लाकर भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है। पहले अयोध्या एयरपोर्ट को श्रीराम इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम से संबोधित किया जा रहा था। अब इसके नाम में बदलाव को अब चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। साफ है कि एयरपोर्ट के नाम पर राजनीति गरमाएगी। हालांकि, कोई इसका विरोध नहीं करेगा। विपक्षी दलों की ओर से इस मामले में भाजपा पर राजनीति करने का आरोप लगाए जाने को लेकर विशेष लगातार हमले किए जा रहे हैं। विरोघ की राजनीति विपक्षी दलों पर भारी पड़ सकती है। वहीं, इस पर बहस से भी भाजपा को ही फायदा होता दिख रहा है। यूपी में मिशन 80 और देश में तीसरी बार मोदी सरकार की मुहिम में यह सहायक हो सकता है।

क्या राम मंदिर ने बीजेपी को जनता के दिलों तक पहुंचा दिया है?

वर्तमान में राम मंदिर ने जनता के दिलों में बीजेपी को एक नया स्थान दे दिया है! 2024 लोकसभा चुनाव में पताका फहराने के लिए सभी राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे पर काम कर रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन 22 जनवरी को होने जा रहे हैं। इसको भव्य और दिव्य बनाने के लिये हर स्तर पर तैयारियां जोरों पर चल रही है। इस प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ट्रस्ट की ओर से सभी लोगों को इन्विटेशन भी भेजा रहा है। इन सबके बीच 30 दिसंबर को अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन होने जा रहा है। दोनों ही कार्यक्रमों में पीएम नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहने वाले हैं। उधर लोकसभा चुनाव से पहले प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या पर हो रहे निर्माण कार्यों का 2024 के नतीजों पर क्या असर पड़ेगा। राम मंदिर से सहारे बीजेपी ने फर्श से लेकर अर्श तक का सफर तय किया है। पहले बीजेपी के 2 सांसद थे लेकिन अब आधे से ज्यादा राज्यों और केंद्र में बीजेपी की सरकार है। इसमें मंदिर मुद्दा का बड़ा योगदान है। राम मंदिर के जरिये बीजेपी देश के 80% मतदाताओं को टच किया है। इसलिए निश्चित रूप से राम मंदिर निर्माण का 2024 लोकसभा चुनाव में फर्क पड़ेगा। बीजेपी की प्लानिंग बड़ी मजबूत और सटीक होती है। बीजेपी गांव-गांव, शहर-शहर हर जगह राम मंदिर निर्माण का प्रचार करेगी। देश की एक-एक जनता तक सीधे पहुंचकर बताएगी की राम मंदिर निर्माण को लेकर जो कहा था, वो हमने किया है। इसलिए राम मंदिर निर्माण का लाभ बीजेपी को निश्चित रूप से मिलेगा। वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि BJP हमेशा से धर्म की राजनीति करती आई है, मजहब के नाम पर फायदा उठाना बीजेपी का पुराना तरीका है। हिंदू-मुस्लिम, अजान, भजन, कीर्तन जैसे मुद्दों पर ही बीजेपी वोट मांगती है। सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हो रहा है।

इसलिए प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से बीजेपी का कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा है जैसे बीजेपी ने ही राम मंदिर को बनवाया है। बीजेपी इसका पूरा क्रेडिट लेना चाहती है। सपा प्रवक्ता ने कहा कि बीजेपी चाहे जितना लाभ लेने का प्रयास करें लेकिन जनता पूछ रही है कि 2014 में रोजगार देने, किसानों की आय दोगुनी करने और महंगाई कम करने का वादा किया था उन वादों का क्या हुआ। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने कहा कि जनता के हर मुद्दे पर मोदी सरकार विफल हो चुकी है। नौजवान को रोजगार नहीं मिल रहा, किसानों को उनकी फसल के दाम नहीं मिल रहे, आम आदमी महंगाई से परेशान है। यह सभी मुद्दे आगामी चुनाव में मोदी सरकार पर भारी पड़ने वाले हैं। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि जनता को छलने वाले जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए राम मंदिर का सहारा ले रहे हैं। लेकिन इस देश का नौजवान, किसान, आम आदमी 2024 चुनाव में अपने विकास के मूल मुद्दों पर मोदी सरकार से सवाल करते हुए वोट करने जा रहा है।

उधर बीजेपी का कहना है कि राम मंदिर निर्माण राजनीति का विषय नहीं है। यह एक स्वप्न के साकार होने जैसा है। 500 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा के बाद प्रभु रामलला अपने भव्य मंदिर में विराज रहे हैं। यह बहुत ही प्रसन्नता का विषय है। अगर इससे भी कोई राजनीतिक लाभ की बात करता है तो इस राजनीतिक लाभ को लेने के लिए कांग्रेस और सपा को भी पूरी स्वतंत्रता थी। लेकिन इन्हें हमेशा मजहबी तुष्टिकरण दिखाई देता था, 20 फ़ीसदी वोट दिखाई देता था। यह हिंदुओं के भीतर विभाजन करते थे तो आज इनको पीड़ा क्यों हो रही है। बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि बीजेपी का जो पहले स्टैंड था, आज भी उसी स्टैंड के साथ खड़े हैं।

बीजेपी सत्ता में वापसी करेगी या नहीं और सत्ता में आती है तो सीटें बढ़ेंगी या नहीं यह अभी कह पाना मुश्किल है। ऐसा इस लिए क्योंकि बीजेपी 30-35 % वोटर के साथ सरकार बनाती है बाकी 65% अन्य दलों में बंट जाता है। अगर इंडिया गठबंधन बन जाता है तो ये बीजेपी के लिए चिंता का विषय होगा। विपक्ष के बिखराव का लाभ बीजेपी हमेशा से उठाती रही है। इसबार भी उठाने की संभावना है। लेकिन आज की तारीख में बीजेपी को कोई चुनौती नहीं है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि विपक्ष के पास पीएम मोदी जैसा चेहरा नहीं है जिसकी पूरे देश में मांग हो।

यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम और भारत में क्या हुआ समझौता?

आज हम आपको बताएंगे कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम और भारत में क्या समझौता हुआ! भारत सरकार, असम सरकार और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम उल्फा के बीच दिल्ली में एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र के सबसे बड़े विद्रोही समूहों में से एक उल्फा के एक गुट की लंबी लड़ाई अब खत्म हो गई है। हालांकि, पारेष बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा स्वतंत्र गुट अभी भी बातचीत के खिलाफ है। दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र सरकार उल्फा की सभी जायज मांगों को समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी और उल्फा संगठन को भंग कर दिया जाएगा। असम के सबसे पुराने विद्रोही समूह के साथ हुए इस शांति समझौते का मकसद अवैध घुसपैठ, मूल निवासियों के लिए जमीन का अधिकार और असम के विकास के लिए एक वित्तीय पैकेज जैसे मुद्दों को सुलझाना है। उल्फा और भारत सरकार में समझौते के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि लंबे समय तक असम और पूरे उत्तर-पूर्व ने हिंसा झेली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में ही उग्रवाद, हिंसा और विवाद मुक्त उत्तर-पूर्व भारत की कल्पना लेकर गृह मंत्रालय चलता रहा है। भारत सरकार, असम सरकार और ULFA के बीच जो समझौता हुआ है, इससे असम के सभी हथियारी गुटों की बात को यहीं समाप्त करने में हमें सफलता मिल गई है। ये असम और उत्तर-पूर्वी राज्यों की शांति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अमित शाह ने आगे कहा कि हम उल्फा के नेतृत्व को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि शांति प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए उन्होंने केंद्र पर जो भरोसा जताया है, उसका सम्मान किया जाएगा।

अमित शाह के साथ शांति समझौते के लिए मौजूद असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने भी अपनी बात रखी। सरमा ने कहा कि आज असम के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल और गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में असम की शांति प्रक्रिया निरंतर जारी है। इस पूरे मामले में बहुत कम समय लगेगा। मेरे हिसाब से इसके कार्यान्वयन में 1 साल से अधिक समय नहीं लगेगा। खुद गृह मंत्री भी 2-2 महीनें में मॉनिटर करते हैं कि जिस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं उस पर काम हो रहा है या नहीं।

उल्फा या यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में सक्रिय एक प्रमुख आतंकवादी और उग्रवादी संगठन है। इसका गठन 1979 में परेश बरुआ, अरबिंद राजखोवा और अनूप चेतिया जैसे युवा नेताओं ने किया था। उल्फा का उद्देश्य असम को एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य बनाना है। शुरुआत में, उल्फा को गरीबों और लाचारों की मदद करने वाले एक समूह के रूप में देखा जाता था। लेकिन जल्द ही उनके तरीके बदल गए और वे भारतीय सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई करने लगे। ULFA को आतंकवादी संगठन घोषित करने का मुख्य कारण था चाय बागानों के एक मालिक सुरेंद्र पॉल की हत्या, वह लॉर्ड स्वराज पॉल के भाई थे। इसके बाद उल्फा ने दूसरे चाय बागान मालिकों को डरा-धमकाकर पैसे ऐंठने शुरू कर दिए। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सरकार पर दबाव डाला, जिसके चलते ULFA के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई। भारत सरकार ने उल्फा को एक आतंकवादी संगठन घोषित किया था।

सबसे पहले, हिंसा में बड़ी कमी आएगी। उल्फा ने असम में कई सालों तक हिंसा फैलाई है, जिससे कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और संपत्ति का भी नुकसान हुआ है। इस समझौते के बाद, उल्फा अपने हथियार डाल देगा और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को पूरा करने का प्रयास करेगा। दूसरा, विकास में तेजी आएगी। उल्फा के विद्रोह के कारण असम का विकास बाधित हुआ है। समझौते के बाद, असम सरकार को विकास के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। सरकार अवैध घुसपैठ, मूल निवासियों के लिए जमीन का अधिकार और असम के आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगी।

तीसरा, लोगों में शांति और स्थिरता की भावना बढ़ेगी। उल्फा के विद्रोह के कारण असम में लोगों में भय और अशांति का माहौल था। समझौते के बाद, लोगों को उम्मीद होगी कि असम में शांति और स्थिरता आएगी। चौथा इस समझौते के बाद से असम में लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों का ध्यान रखा जाएगा। यही नहीं स्वदेशी लोगों को सांस्कृतिक सुरक्षा और भूमि अधिकार भी मिल पाएगा।

न्याय यात्रा में आने वाले 14 राज्यों में क्या जीत पाएगी कांग्रेस?

आज हम आपको बताएंगे कि न्याय यात्रा में आने वाले 14 राज्यों में क्या कांग्रेस जीत पाएगी या नहीं! राहुल गांधी एक बार फिर पदयात्रा करने वाले हैं। भारत जोड़ो यात्रा पार्ट-2 को भारत न्याय यात्रा का नाम दिया गया है। 14 जनवरी से 20 मार्च के बीच राहुल गांधी मणिपुर से मुंबई के बीच लोकसभा चुनाव 2024 के लिए माहौल बनाएंगे। इस यात्रा में उनके साथ प्रियंका गांधी के शामिल होने की संभावना है। 6,200 किलोमीटर की यात्रा में कांग्रेस नेता 14 राज्यों के 85 जिलों से गुजरेंगे। 14 राज्यों में से 10 में अभी बीजेपी की सरकार है यानी राहुल सीधे तौर से नरेंद्र मोदी को चुनौती देंगे। अभी कांग्रेस की सरकार देश के सिर्फ तीन राज्यों कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में है। राहुल गांधी की भारत न्याय यात्रा उस समय शुरू होगी, जब अयोध्या के श्रीराम मंदिर में रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह होगा। 22 जनवरी को जब नरेंद्र मोदी अयोध्या में यजमान बनकर पूजा करेंगे, तब राहुल गांधी नॉर्थ-ईस्ट में पदयात्रा कर रहे होंगे। राहुल गांधी की भारत न्याय यात्रा मणिपुर से शुरू होगी। वह मेघालय, नगालैंड, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात तक पहुंचेंगे। इन 14 राज्यों में करीब 355 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से कांग्रेस के पास सिर्फ 14 सीटें हैं। बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में 236 सीटें जीती थीं। बाकी बची हुई सीटें बीजेडी, जेडी यू, टीएमसी और शिवसेना के खाते में गई थी। बीजेपी के लिए पूर्ण बहुमत का रास्ता इन्हीं राज्यों से बना था। 25 सीट वाले राजस्थान और 26 सीटों वाले गुजरात में कांग्रेस का खाता नहीं खुला था। मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड में पार्टी को सिर्फ एक-एक सीट ही मिली थी। 14 राज्यों में न्याय यात्रा के जरिये राहुल गांधी के पास चुनावी लाभ पाने के लिए बहुत कुछ है, जबकि खोने के लिए कांग्रेस के पास कुछ नहीं है।

राहुल गांधी की न्याय यात्रा इंडिया के सहयोगी दलों के शासित राज्यों पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार से गुजरेगी। अभी इन राज्यों में कांग्रेस के पास कुल चार सीटें हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी की टक्कर बीजेपी से मानी जाती है। पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 22 तृणमूल कांग्रेस के पास है। कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों पर 2019 के चुनाव में सफलता मिली थी। बंगाल में सीपीएम भी इंडिया गठबंधन की पार्टनर है। बिहार की 40 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीती थी। बिहार में इंडिया के तीन पार्टनर वामपंथी दल, जेडी यू और आरजेडी भी है। झारखंड में झामुमो, आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग होना है। राहुल गांधी की यात्रा के बावजूद ऐसी स्थिति मजबूत नहीं कर पाएंगे, जिससे उनके सहयोगी दल मनमाफिक सीटें दे दें। ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में है, जहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी के साथ सीटों का समझौता होना है। महाराष्ट्र में शिवसेना यूटीबी के अभी सात, एनसीपी के चार और कांग्रेस का एक लोकसभा सांसद है। यहां उद्धव गुट ने 23 लोकसभा सीटों पर दावा ठोक दिया है। इन राज्यों में सीट शेयरिंग को लेकर घमासान तय है। राहुल गांधी की पदयात्रा का असर सीट शेयरिंग पर पड़ेगा, इसकी उम्मीद कम है।

अभी तक हुए कई ओपिनियन पोल में बीजेपी को तीसरी बार पूर्ण बहुमत की उम्मीद जताई गई है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद हुए सी वोटर के ओपिनियन पोल में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन को 295 से 335 सीट मिलने की संभावना जताई गई है। इंडिया गठबंधन को 165 से 205 सीट मिलने का अनुमान जताया गया है। पोल के मुताबिक सबसे कड़ा मुकाबला बिहार में हो सकता है, जहां इंडिया गठबंधन को 21 से 23 मिलने की संभावना है। बिहार में चार दलों के बीच सीट शेयरिंग का पेंच फंसा है। कांग्रेस 8 सीटों पर दावा कर रही है, जबकि दूसरे पार्टनरों ने चार सीट देने की पेशकश की गई है। बंगाल में भी टीएमसी का पलड़ा भारी है। महाराष्ट्र में भी इंडिया गठबंधन और एनडीए में कांटे का मुकाबला होगा। मगर लोकसभा में बीजेपी को हराने के लिए उत्तर प्रदेश की 80, मध्यप्रदेश की 29, छत्तीसगढ़ की 11, राजस्थान की 25 और गुजरात की 26 सीटों पर कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन करना होगा। 22 जनवरी को राम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा होने वाली है। विहिप और अन्य संगठनों ने इस आयोजन को गांव-गांव तक पहुंचाने की प्लानिंग है। माना जा रहा है कि राम मंदिर का असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखेगा। राहुल गांधी की न्याय यात्रा राम मंदिर से उपजे माहौल में कारगर साबित होगी, इसकी गारंटी नहीं है।

क्या भारत जोड़ो यात्रा से अलग होगी भारत न्याय यात्रा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत न्याय यात्रा, भारत जोड़ो यात्रा से अलग होगी या नहीं! कांग्रेस ने जमीनी पकड़ मजबूत करने के लिए अपनी भारत यात्रा के चरण 2 का जो बुधवार को ऐलान किया, वह भारत जोड़ो यात्रा का अगला चरण होने के बावजूद कई मायनों में उससे अलग है। यह अंतर यात्रा के स्वरूप से लेकर उसकी थीम तक में है। जहां पहले चरण में भारत को जोड़ने की बात कही गई थी, वहीं दूसरे चरण में न्याय की बात कही गई है। अगर दोनों में अंतर की बात करें तो यह फर्क उल्लेखनीय हैं। पहली यात्रा दक्षिण से उत्तर की ओर निकाली गई थी, जो कन्याकुमारी से शुरू होकर कश्मीर में खत्म हुई थी। राहुल गांधी की यह यात्रा पूरी तरह से पैदल यात्रा थी, जिसमें वह लगभग रोज 25 किलोमीटर की दूरी तय करते थे। लगभग साढ़े चार महीने की यात्रा में कांग्रेस नेतृत्व ने तकरीबन 3600 किलोमीटर की दूरी तय की। यह यात्रा 12 राज्यों से होकर गुजरी। दूसरी ओर न्याय यात्रा पूरब के मणिपुर से शुरू होकर पश्चिम में मुंबई में खत्म होगी। यह यात्रा हाइब्रिड मोड में ज्यादातर बसों व कुछ हिस्सों में पैदल पूरी होगी। 6600 किमी की यात्रा दो महीने में पूरी होगी, जो 14 राज्यों व 85 जिलों से होकर गुजरेगी। कांग्रेस का कहना था कि भारत जोड़ो यात्रा का मुख्य मकसद देश में बढ़ रही नफरत, डर और कट्टरता के खिलाफ लड़ाई थी। कांग्रेस ने इसे समाज को तोड़ने व बांटने वाले कारक करार देते हुए देश को जोड़ने की बात कही थी। कांग्रेस का दावा है कि न्याय यात्रा के जरिए कांग्रेस देश में सामाजिक, आर्थिक व सामाजिक न्याय के हक की आवाज बुलंद करेगी। इसमें देश के लोगों के लिए आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक न्याय पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

दरअसल कांग्रेस को लगता है कि मोदी सरकार के दौर में देश में आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक स्तर पर लोगों के साथ न्याय नहीं हो रहा है। वहीं दूसरी ओर न्याय यात्रा का नाम देकर कांग्रेस कहीं न कहीं 2019 चुनावों के अपने मूल नारे न्याय योजना को रेखांकित करना चाहती है, जिसमें उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में हर गरीब परिवार हर साल 72 हजार रुपये देने का वादा किया था। हालांकि पार्टी को पिछली बार करारी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस को लगता है कि कांग्रेस अपनी उस योजना को जमीन पर ठीक तरह से उतार नहीं पाई।

भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस ने दो आम चुनावों के बीच में कुछ राज्यों के असेंबली चुनावों के मद्देनजर की थी, जबकि यह यात्रा आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर की जा रही है। भारत जोड़ो यात्रा का चुनावी असर कांग्रेस के लिए मिला जुला रहा। जहां वह उसके बाद हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक व तेलंगाना में अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही तो वहीं राजस्थान व छत्तीसगढ़ जैसे दो मजबूत प्रदेशों से उसकी सत्ता जाती रही। बता दें कि कांग्रेस नागपुर से लोकसभा चुनाव के प्रचार की शंखनाद करने जा रही है। पार्टी के स्थापना दिवस पर ‘हैं तैयार हम’ रैली से चुनाव प्रचार की शुरुआत की जाएगी। इसके साथ ही पार्टी ने भारत जोड़ो यात्रा का दूसरे चरण की भी घोषणा कर दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भारत न्याय यात्रा की शुरुआत करेंगे। यह यात्रा पूर्व से पश्चिम भारत के बीच होगी। भारत न्याय यात्रा की शुरुआत 14 जनवरी से होगी। यह यात्रा 20 मार्च को मुंबई में खत्म होगी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल की तरफ से यह जानकारी दी गई।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद अब राहुल गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ‘भारत न्याय यात्रा’ निकालने वाली है। मणिपुर से मुंबई तक करीब 6200 किलोमीटर की यह लंबी यात्रा 14 जनवरी से लेकर 20 मार्च तक निकाली जाएगी। जो कि 14 राज्यों से होकर निकलेगी। इसमें मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के 85 जिले शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने 3 मुद्दे उठाए थे- आर्थिक विषमता, सामाजिक ध्रुवीकरण औऱ राजनीतिक तानशाही। लेकिन भारत न्याय यात्रा का मुद्दा आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय और राजनीतिक न्याय है।

पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि 21 दिसंबर को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने राय दी कि राहुल गांधी जी को पूर्व से पश्चिम तक यात्रा शुरू करनी चाहिए। सीडब्ल्यूसी की राय के बाद राहुल गांधी भी इस इच्छा पूरी करने के लिए सहमत हो गए हैं। इसके बाद ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 14 जनवरी से 20 मार्च तक मणिपुर से मुंबई तक ‘भारत न्याय यात्रा’ आयोजित करने का निर्णय लिया है। केसी वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 14 जनवरी को इंफाल में इस यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे। उन्होंने कहा कि यह यात्रा पूर्व-पश्चिम की है, दक्षिण-उत्तर की यात्रा हम पहले ही कर चुके हैं। मणिपुर के बिना हम यात्रा कैसे कर सकते हैं? हमें मणिपुर के लोगों के दर्द पर मरहम लगाने का प्रयास करना होगा।