Thursday, March 5, 2026
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कौन है गगनयान मिशन पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर गगनयान मिशन पर कौन से अंतरिक्ष यात्री जा रहे हैं! 40 वर्षों में पहली बार, भारतीयों का एक छोटा समूह हमारे वायुमंडल से परे खतरनाक सफर पर जाने के लिए तैयार है। पीएम मोदी ने एक दिन पहले चार टेस्ट पायलटों – प्रशांत नायर, अजीत कृष्णन, अंगद प्रताप और शुभांशु शुक्ला को सम्मानित किया – जो 1984 में सोयुज टी-11 पर राकेश शर्मा की ऐतिहासिक यात्रा के बाद बाहरी अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बनने वाले हैं। कल का कार्यक्रम महत्वाकांक्षी गगनयान कार्यक्रम के लिए एक औपचारिक मील का पत्थर था, जिसका लक्ष्य भारत को उन चार देशों में से एक बनाना है जो स्वतंत्र रूप से मानव अंतरिक्ष उड़ान कर सकते हैं। गगनयान मिशन के बारे में सबसे पहले पीएम मोदी ने 2018 में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से ऐलान किया था। तब उन्होंने ‘अंतरिक्ष में तिरंगा फहराने’ के लिए 2022 की समयसीमा तय की थी जब भारतीय स्वतंत्रता के 75वें वर्ष को मनाया जा रहा होगा। योजना सरल थी। भारतीयों को लगभग तीन दिनों के लिए पृथ्वी की कक्षा में रखना और उन्हें सुरक्षित वापस लाना। हालांकि, इसे पूरा करने के लिए मानव-रेटेड लॉन्च वाहन से लेकर कक्षीय कैप्सूल तक कई जटिल नई क्षमताओं की जरूरत होगी।

गगनयान के लिए भारत के नए अंतरिक्ष यात्रियों के लिए उन्नत प्रशिक्षण की भी आवश्यकता होगी। 2019 में, 12 चुने हुए IAF टेस्ट पायलटों की प्रारंभिक रोस्टर को बेरहमी से घटाकर चार उम्मीदवारों तक सीमित कर दिया गया था। अगले वर्ष, चार पायलट उन्नत प्रशिक्षण के लिए रूस गए। हालांकि, जैसा कि नियति को मंजूर था, कोविड फैल गया, जिससे न केवल रूस में प्रशिक्षण में देरी हुई, बल्कि भारत में प्रमुख प्रणालियों के विकास और सत्यापन में भी देरी हुई। कोविड की वजह से 2022 की समय सीमा पहुंच से बाहर हो गई। आखिरकार चारों पायलटों ने अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया। इसरो भी लगातार प्रगति करता रहा। जनवरी में, अंतरिक्ष एजेंसी के अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने घोषणा की कि 2024 “गगनयान की तैयारी का वर्ष” होगा। यह त्वरित विकास का वादा और जटिल व जोखिम भरे प्रयास को आगे बढ़ाने में आने वाली कठिनाइयों को स्वीकार करने का वादा था।

गगनयान भले ही कितना भी साहसी क्यों न हो, यह मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए भारत की योजनाओं में केवल पहला कदम है। अगला कदम 2035 तक एक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को स्थापित करना और 2040 तक एक भारतीय को चंद्रमा पर भेजना है। साथ में, ये योजनाएं इसरो की प्राथमिकताओं में व्यावहारिक और मितव्ययी मिशनों से लेकर राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़े उच्च-प्रोफ़ाइल कार्यक्रमों में क्रमिक बदलाव का प्रमाण हैं। अन्य देशों में मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रमों की तरह, यह बदलाव कुछ निष्पक्ष आलोचना को आकर्षित कर सकता है। मानव अंतरिक्ष उड़ान के विरोधियों का कहना है कि आधुनिक प्रोसेसर, रोबोटिक्स और संचार द्वारा समर्थित मानवरहित मिशन चालक दल के मिशन के समान अधिकांश वैज्ञानिक कार्य कर सकते हैं, जिसकी लागत भी बहुत कम होगी। मानव अंतरिक्ष उड़ान के रक्षकों का तर्क है कि लोग अपूरणीय हैं, क्योंकि अप्रत्याशित परिस्थितियों में अनुकूलन और सुधार करने की मानवीय क्षमता को अभी तक मशीनों द्वारा दोहराया नहीं जा सकता है।

हालांकि यह बहस संभवत: अनसुलझी रहेगी, लेकिन यह मुद्दा चूक गया है। मानव अंतरिक्ष उड़ान का औचित्य वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से खतरनाक मिशन पर किसी देश के सर्वश्रेष्ठ और प्रतिभाशाली लोगों को भेजने का निर्णय इस बात का प्रमाण है कि वह अंतरिक्ष गतिविधि को कितनी गंभीरता से लेता है। ये दिखाता है कि राजनेता भविष्य के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को प्रेरित करने के लिए ऐसे मिशनों की शक्ति को सहजता से समझ लेते हैं। ऐसे मिशन किसी देश की तकनीकी क्षमता का स्पष्ट प्रदर्शन हैं। अंत में, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम ऐतिहासिक रूप से उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों के लिए लक्षित वित्तीय प्रोत्साहन के रूप में कार्य करते हैं, जिससे देशों को तकनीकी प्रगति करने और प्रतिभा को आकर्षित करने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, अपोलो कार्यक्रम ने न केवल अमेरिका में उभरते माइक्रोप्रोसेसर उद्योग को बढ़ावा दिया, बल्कि वेल्क्रो फास्टनरों जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं को भी जन्म दिया। दरअसल, भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान का सपना ऐसे कार्यक्रमों का समर्थन करने और रिमोट-सेंसिंग उपग्रह बनाने जैसी इसरो की अधिक नियमित अंतरिक्ष गतिविधियों को संभालने के लिए देश के निजी क्षेत्र की क्षमता पर एक अंतर्निहित दांव है।

भारत इस तस्वीर में कहां फिट बैठता है? गगनयान के साथ इसरो का एक लक्ष्य व्यावसायिक अवसरों की तलाश करना होगा, ताकि कार्यक्रम अंततः अपने लिए भुगतान करना शुरू कर दे। हालांकि यह अमेरिकी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा की उम्मीद कर सकता है, इसरो मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए विस्तारित बाजार में भी एक खिलाड़ी बन सकता है, जो वाणिज्यिक अंतरिक्ष स्टेशनों को विश्वसनीय परिवहन प्रदान करता है और अंतरिक्ष पर्यटकों को सीटें प्रदान करता है। मानव अंतरिक्ष उड़ान बाज़ार भी पृथ्वी पर वापस आने के अवसर प्रदान करता है। इसरो का मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र और आईएएफ का इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन भारत में एक अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र के लिए भ्रूण के रूप में काम कर सकता है जिसमें निजी क्षेत्र भारी मात्रा में शामिल है। कल सम्मानित किए गए चार टेस्ट पायलट अग्रणी हैं, लेकिन उनका अनुसरण कई अन्य लोगों द्वारा किया जाना चाहिए जो तिरंगे को कक्षा में और उससे आगे ले जाते हैं।

क्या चीन से पल्ला झाड़ना भारत के लिए भी नुकसानदायक है?

चीन से पल्ला झाड़ना भारत के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकता है! भारत और चीन के बीच बीते काफी समय से तनातनी है। इसके बावजूद दोनों ट्रेड डिप्‍लोमेसी से बंधे हैं। कारोबार ने इन्‍हें जकड़ कर रखा है। इस बीच भारत सरकार चीन से आयात पर सीमा शुल्क बढ़ाने के अपने फैसले के लिए आलोचनाओं का सामना कर रही है। सरकार के भीतर ही कुछ विभाग मानते हैं कि टैरिफ का इस्‍तेमाल कूटनीतिक हथियार के रूप में बहुत सोच-विचार कर होना चाहिए। वे इसके लिए किसी हड़बड़ी के पक्ष में नहीं हैं। इसकी वजह है। ऐसी चिंताएं हैं कि भारत की मैन्‍यूफैक्‍चरिंग-फोकस्‍ड स्‍कीमों जैसे प्रोडक्‍शन-लिंक्ड इंसेंटिव पीएलआई स्‍कीम पर इसका प्रत‍िकूल असर हो सकता है। चीन अभी भी भारत के 14 फीसदी आयात का प्रतिनिधित्व करता है। ड्रैगन न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्‍सटाइल्‍स और चमड़े सहित तमाम उद्योगों के लिए कच्‍चा माल मुहैया करता है। अलबत्‍ता, पूंजीगत सामान भी उपलब्‍ध कराता है। भारत में औसत टैरिफ 2014 में 13 फीसदी से बढ़कर 2022 में 18.1 फीसदी हो गया है। इससे भारत वियतनाम, थाईलैंड और मैक्सिको जैसे देशों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो गया है। सरकार को घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए ऊंचे टैरिफ का इस्‍तेमाल करती है। इसे लागू किए जाने के बाद उसे तमाम मंत्रालयों के विरोध का सामना करना पड़ा है। 2020 में गलवान में हुई झड़प के बाद चीनी आयात पर अंकुश का असर अब इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों पर दिखने लगा है। इसके कारण घरेलू उत्पादन में कमी आई है। भारतीय मैन्‍यूफैक्‍चर्ड वस्‍तुओं का प्रतिस्पर्धात्मक लाभ घटा है।  एप्पल इंक जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले लॉबी समूहों ने चिंता जाहिर की है कि भारत के ऊंचे टैरिफ चीन से सप्‍लाई चेन को हतोत्साहित करते हैं। वियतनाम, थाईलैंड और मैक्सिको जैसे देशों ने कम्‍पोनेंट पर कम टैरिफ रखा है। ये उन व्यवसायों को लुभा रहे हैं जो चीन से दूर जाना चाहते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ज्‍यादा टैरिफ के कारण ऊंची उत्पादन लागत के बारे में चिंता जताई है। सर्किट बोर्ड, चार्जर और पूरी तरह से एसेम्‍बल्‍ड फोन सहित पुर्जों पर शुल्क में कमी की गुहार लगाई है। कुछ कटौती पर सहमति बनी है। इसे देखते हुए सरकार ने कई आईटी वस्तुओं पर शुल्क कम कर दिया है।

चीन से निम्न-गुणवत्ता वाले आयात पर अंकुश लगाने के प्रयास में भारत ने क्‍वालिटी कंट्रोल ऑर्डर क्यूसीओ लागू किए हैं। ये एमएसएमई के लिए जरूरी कच्‍चे माल तक पहुंच को प्रतिबंधित करते हैं। टैरिफ वार्ता में शामिल एक सरकारी अधिकारी ने माना है कि भारत के आयात शुल्‍क अन्य देशों की तुलना में ज्‍यादा हैं। अधिकारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और वैश्विक बाजारों के साथ बेहतर एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए टैरिफ में धीरे-धीरे कमी की जरूरत पर बल दिया है। आयात पर अंकुश के नकारात्मक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया कि इससे एक्‍सपोर्ट ऑर्डर छूट जाते हैं। घरेलू उद्योगों के लिए यह किसी सजा जैसा होता है। इसे अर्थव्यवस्था के हित में नहीं माना जाता है। जहां घरेलू उद्योगों का समर्थन करना अहम है। वहीं, बहुत लंबे समय तक संरक्षण टिकाऊ नहीं है।

भारत का चीन के कुल व्यापार में न के बराबर हिस्सा है। लेकिन, वह फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में चीनी आयात पर बहुत ज्‍यादा निर्भर करता है। टैरिफ को धीरे-धीरे कम करना और ग्‍लोबल बाजारों के साथ बेहतर एकीकरण भारत के विकास और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए ज्‍यादा लाभकारी नजरिया हो सकता है।

इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन की स्‍टडी से पता चलता है कि इलेक्ट्रॉनिक सेगमेंट में चीन, थाईलैंड, वियतनाम और मैक्सिको की तुलना में भारत में कच्‍चे माल पर सबसे ज्‍यादा टैरिफ है। ऊंचे टैरिफ उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं। वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से बराबरी के लिए टैरिफ में कमी की मांग की गई है। एल्यूमीनियम, पॉलिमर और पेट्रोकेमिकल्स जैसे वस्तुओं पर आयात शुल्क लगाना उद्योग की ताकत को कम करता है। ऐसी वस्‍तुओं में भारत काफी संपन्‍न है। ज्‍यादा आयात शुल्क भारतीय निर्यात को भी कम प्रतिस्पर्धी बनाता है। इससे घरेलू मैन्‍यूफैक्‍चरिंग में खामियों को बढ़ावा मिलता है। एनडीए सरकार ने 2016 से आयात शुल्क में कई बढ़ोतरी लागू की है। यह आयात शुल्क को कम करने के पिछले ट्रेंड से अलग है। वाणिज्य मंत्रालय इस बात से इनकार करता है कि ये शुल्क बढ़ोतरी संरक्षणवादी है। उसका दावा है कि यह वैश्विक रुझानों के अनुरूप हैं। भारत ने हाल के वर्षों में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर करने में रुचि दिखाई है। हालांकि, विश्लेषकों ने आगाह किया है कि कुछ प्रस्तावित सीमा शुल्क बढ़ोतरी डब्ल्यूटीओ-अनिवार्यता के करीब है या उससे अधिक हो गई है।

क्या अपने ही लोगों से हार चुके हैं अखिलेश यादव?

वर्तमान में अखिलेश यादव अपने ही लोगों से पूरी तरह हार चुके हैं! राज्यसभा चुनाव में इस बार उत्तर प्रदेश में 10 सीटों के लिए हुए मतदान के दौरान समाजवादी पार्टी में जमकर उथल-पुथल मच गई। पीडीए पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक की राजनीति कर रहे अखिलेश यादव अपनी ही सियासत में फंसे नजर आए। टीम मैनेजेंट में भाजपा उनसे कहीं आगे निकल गई। स्थिति ये हुई कि कई करीबी साथी अखिलेश का हाथ छुड़ाकर एनडीए के साथ चले गए। एक विधायक तो ऐसी रहीं कि जिन्होंने भले ही सपा से किनारा न किया हो लेकिन अपने नेता अखिलेश की इच्छा की बजाए अपनी पसंद के नेता को वोट किया। इस चुनाव में भाजपा 8 सीटें जीतने में कामयाब रही, वहीं समाजवादी पार्टी को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा। पूरे चुनाव में अकेले हारने वाले नेता सपा प्रत्याशी रिटायर्ड ब्यूरोक्रैट आलोक रंजन रहे। दरअसल राज्यसभा के लिए प्रत्याशियों का ऐलान हुआ तो माना जा रहा था कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी आसानी से 3 सीटें अपने नाम कर लेगी। लेकिन इसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो भूचाल आया, वो अलग ही कहानी लिखता चला गया। पहले अखिलेश के करीबी पुराने साथी और इंडिया गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी ने किनारा कर लिया। उन्होंने एनडीए जाने का फैसला किया। इसके साथ ही अखिलेश की राज्यसभा चुनाव की गुणा-गणित उलझनी शुरू हो गई। दरअसल जयंत चौधरी की रालोद के पास 9 विधायक थे, इनका समर्थन मिलते ही भाजपा ने ऐन वक्त राज्यसभा के लिए आठवें प्रत्याशी के रूप में संजय सेठ का नाम आगे कर दिया। भाजपा ने पूरी रणनीति के साथ ये दांव खेला। दरअसल संजय सेठ पुराने समाजवादी रहे, उन्होंने सपा से राज्यसभा सदस्य रहते हुए भाजपा का दामन थामा था। भाजपा ने उस समय उन्हें फौरन राज्यसभा भेज दिया था लेकिन कार्यकाल खत्म होने के बाद से ही वह वेटिंग में चल रहे थे।

इधर अखिलेश यादव ने सपा के 3 प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया तो पार्टी के अंदर ही मोर्चा खुल गया। दरअसल अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए की राजनीति कर रहे हैं। प्रदेश में घूम-घूमकर पीडीए को न्याय दिलाने, उनका हक दिलाने की बात कर रहे हैं। लेकिन राज्यसभा प्रत्याशी के रूप में अपर कास्ट जया बच्चन, आलोक रंजन का नाम आगे आया। तीसरे नाम के रूप में जरूर उन्होंने दलित नेता रामजी लाल सुमन काे प्रत्याशी बनाया। लेकिन नाम का ऐलान होते ही सबसे ज्यादा विरोध अपना दल कमेरावादी की नेता और सपा से विधायक चुनी गईं पल्लवी पटेल की तरफ से आया। उन्होंने साफ कर दिया कि वह पीडीए प्रत्याशी को ही वोट करेंगीं।

आज वोटिंग के दिन तक पल्लवी पटेल के आने या न आने को लेकर संशय बना हुआ था। वोट डालने पहुंचे अखिलेश यादव से जब पूछा गया कि क्या पल्लवी सपा उम्मीदवार को वोट करेंगी तो उन्होंने अंतरात्मा की बात छेड़ दी। अखिलेश ने कहा कि वे अभी तक नहीं आई हैं तो वे जानें। मैं किसी की अंतरात्मा के बारे में नहीं जानता। लेकिन थोड़े समय के बाद पल्लवी पटेल वोट डालने आईं। उनसे जब मीडिया ने पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं ही पीडीए हूं, मेरे वजूद में धोखा नहीं है। मैं धोखा और गद्दारी नहीं कर सकती। मैंने पीडीए को वोट किया है। मैंने खुलकर और दिखा कर पीडीए उम्मीदवार रामजी लाल सुमन को वोट किया है।

वहीं दूसरी तरफ प्रत्याशी ऐलान के साथ ही बदायूं से पुराने कद्दावर नेता सलीम इकबाल शेरवानी भी अखिलेश यादव से खफा हो गए। उन्होंने इस्तीफा भेजकर सपा मुखिया अखिलेश यादव पर मुस्लिमों की उपेक्षा का आरोप लगा दिया। दरअसल बदायूं से पहले धर्मेंद्र यादव फिर शिवपाल यादव का लोकसभा टिकट फाइनल होने के बाद सलीम शेरवानी कैंप ये मानकर चल रहा था कि उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है। लेकिन राज्यसभा प्रत्याशियों का ऐलान हुआ और मुस्लिम प्रत्याशी नहीं होने के बाद आरोप सामने आ गया।

अगर सपा के बागी विधायकों की बात करें तो इनमें ज्यादातर की जाति को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा रही। इनमें मनोज पांडेय समाजवादी पार्टी का ब्राह्मण चेहरा माने जाते थे। वोटिंग से ऐन पहले उन्होंने चीफ व्हिप पद से इस्तीफा दे दिया। इसी तरह राकेश पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी ने भी क्रॉस वोटिंग की। लेकिन ये अकेले नहीं थे, इनके साथ गायत्री प्रजापति की पत्नी महाराजी देवी, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य भी एनडीए के पाले में खड़े नजर आए। जानकारों के अनुसार अखिलेश यादव की पीडीए पॉलिटिक्स, राम मंदिर मुद्दे पर उनकी बयानबाजी, स्वामी प्रसाद मौर्य के विवादित बयानबाजी आदि जैसे कई मुद्दे रहे, जिसके कारण पार्टी में असंतोष पनप रहा था। राज्यसभा चुनाव के दौरान इन नेताओं को मौका मिल गया।

जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव की इस पोस्ट की सियासी धार तेज तब होती, अगर वह इस मौके को बेहतर तरीके से हैंडल करते। वह ज्यादा बेहतर मैनेजमेंट के साथ भाजपा का मुकाबला कर सकते थे। एक राय ये भी आई कि अगर अखिलेश यादव तीनों प्रत्याशी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से उतारते तो भले ही भाजपा सेंध लगाती लेकिन लोकसभा चुनाव के लिए उनकी रणनीति को राजनीतिक धार मिल जाती। उनके पास अपने वोटराें को संदेश देने का मौका होता। और तब उनकी इस एक्स पोस्ट का भी मतलब निकलता। क्योंकि आज जो सपा के एकमात्र प्रत्याशी हारे हैं, वह आलोक रंजन हैं और अपर कास्ट से हैं। दिलचस्प ये भी है कि जिस तरह चुनाव में जया बच्चन और राम जी लाल सुमन को क्रमश: 41 और 40 वोट मिले, उससे साफ है कि अखिलेश यादव ने खुद इनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए आलोक रंजन के हिस्से के वोट भी ट्रांसफर कराए। और ये तो अखिलेश यादव की रणनीतिक चूक ही मानी जाएगी कि उनके इतने विधायक पाला बदलने की तैयारी में थे और उन्हें भनक तक नहीं लगी। मनोज पांडेय तो उन नेताओं में थे, जो अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में विधानसभा में मोर्चा संभालते थे। उन्हें पार्टी का चीफ व्हिप बनाया और ऐन वक्त वह भी गच्चा दे गए।

आखिर राज्यसभा चुनाव में कैसे जीत पाई बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि राज्यसभा चुनाव में बीजेपी कैसे जीत पाई! तीन राज्यों में 15 राज्यसभा सीटों पर आए नतीजों ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को तगड़ा झटका दिया है। भारतीय जनता पार्टी बीजेपी ने चुनाव जीतने के लिए ऐसा चक्रव्यूह बनाया जिसमें विपक्षी दल उलझकर रह गए। कुल 56 सीटों में से 41 सीटों पर कैंडिडेट निर्विरोध चुने गए थे। बीजेपी ने यूपी में एसपी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को चौंकाते हुए दो अतिरिक्त सीट जीत ली। दरअसल, इसके लिए बीजेपी ने बड़ी तैयारी की थी। ये एक दिन की घटना नहीं है। बीजेपी ने विपक्ष की कमजोर नस को भांपा और फिर चक्रव्यूह की रचना कर दी। यूपी में 10 सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव होना था। आंकड़ों के हिसाब से यहां बीजेपी 7 और एसपी 3 कैंडिडेट जिता सकती थी। लेकिन बीजेपी ने ऐन वक्त पर अपना आठवां कैंडिडेट उतार दिया। इससे मामला रोचक हो गया। बीजेपी के इस दांव से एसपी के लिए मुश्किल हो गई। बीजेपी ने आठवें कैंडिडेट की घोषणा के साथ ही मिशन में जुट गई। बीजेपी के आठवें कैंडिडेट संजय सेठ की जीत में राम मंदिर का मुद्दा काफी अहम रहा। पार्टी ने सबसे पहले वैसे विधायकों पर नजर टिकाई जो 22 जनवरी को राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का खुलकर समर्थन किया था। इनमें एसपी के विधायक राकेश सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी और मनोज पांडेय शामिल थे। राज्यसभा चुनाव रिजल्ट के बाद अभय सिंह ने एक्स पर लिखा, ‘वोटिंग पारदर्शी तरीके से हुई। हमने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिए। जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई और विधानसभा अध्यक्ष ने सभी विधायकों को रामलला के दर्शन के लिए बुलाया तब एसपी ने अपने विधायकों को वहां जाने से रोक दिया। ये सही नहीं था।

बीजेपी की तरफ से मोर्चा खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने संभाल रखा था। उनके अलावा वरिष्ठ मंत्री सुरेश खन्ना, जेपीएस राठौर, यूपी बीजेपी चीफ भूपेंद्र चौधरी और संगठन महासचिव धर्मपाल भी इस मिशन में शामिल थे। बीजेपी के एक नेता ने बताया कि वैसे विधायक जो अपनी पार्टी की चुप्पी के बाद भी राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का पुरजोर समर्थन किया, उनसे संपर्क साधा गया। इसके बाद ज्यादातर ने बीजेपी के आठवें कैंडिडेट को समर्थन करने का ऐलान किया। एसपी के सात विधायक अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह, राकेश पांडेय, विनोद चतुर्वेदी, मनोज पांडेय, आशुतोष मौर्य और पूजा पाल थे। महाराना प्रजापति तबीयत खराब होने की बात कहकर वोट देने नहीं पहुंचीं। एसपी विधायकों के वोट पक्की करने के बाद बीजेपी ने राजा भैया का रुख किया। सीएम योगी खुद राजा भैया से मिले और उसके कुछ देर बाद ही कुंडा के विधायक ने बीजेपी कैंडिडेट को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद बीजेपी ने बीएसपी के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह को साधा। सूत्रों ने बताया कि सिंह ने बीएसपी चीफ को बीजेपी को वोट देने के लिए मनाया और अंत में मायावती ने भी उमाशंकर सिंह को बीजेपी कैंडिडेट को वोट देने के लिए हरी झंडी दे दी। इस तरह बीजेपी ने यूपी में 8 सीटों पर जीत दर्ज कर ली।

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के पास 40 विधायक हैं जबकि बीजेपी के पास महज 25 विधायक थे। तकनीकी रूप से बीजेपी के पास राज्यसभा कैंडिडेट को जिताने के लिए पर्याप्त नंबर तक नहीं थे। राज्यसभा में जीत के लिए 35 विधायकों की संख्या चाहिए। ऐसे में कांग्रेस के पास जीत के लिए नंबर आसान था। लेकिन बताया जा रहा है कि बीजेपी को कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान की भनक थी। भगवा दल ने चुपचाप नाराज विधायकों से संपर्क साधना शुरू किया। संकेत मिलते ही बीजेपी ने हिमाचल से भी कैंडिडेट हर्ष महाजन का ऐलान कर दिया। कांग्रेस के 6 विधायकों और 3 निर्दलीय ने राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग कर दी और पूरा खेल ही बदल गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उसके 6 विधायकों का बीजेपी ने अपहरण कर लिया। हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने अंदरूनी मतभेद के कारण हारी है।

बीजेपी ने वैसी जगह ये जीत दर्ज की है जहां कुछ भी उसके फेवर में नहीं था। दरअसल, उसके कैंडिडेट हर्ष महाजन पहले कांग्रेस में ही हुआ करते थे। वो आजतक कोई चुनाव नहीं हारे हैं। बीजेपी ने कांग्रेस से आए ही नेता को खड़ा कर सत्तारूढ़ दल को सकपका दिया। इसके बाद पूर्व सीएम जयराम ठाकुर ने कांग्रेस में सेंध लगाने का मिशन शुरू किया। हर्ष ने भी इसके लिए पूरी ताकत झोंक दी। चुनाव वाले दिन तक कांग्रेस को अपने कैंडिडेट अभिषेक मनु सिंघवी के जीत का भरोसा था। लेकिन क्रॉस वोटिंग के खेल में कांग्रेस पिछड़ गई। बीजेपी ने कांग्रेस में नाराज चल रहे विधायकों को अपने कैंडिडेट हर्ष महाजन के पक्ष में वोटिंग करने के लिए मना लिया। इसके अलावा 3 निर्दलीय को भी भगवा दल ने साध लिया। इसके साथ ही बीजेपी को 9 अतिरिक्त वोट मिल गए। गिनती के आखिर में सिंघवी और हर्ष को 34-34 वोट मिले।

सब राज्य में मुकाबला टाइ हो गया तो परिणाम के लिए ड्रॉ की जरूरत आन पड़ी। लेकिन यहां किस्मत ने कांग्रेस के साथ खेल कर दिया। चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 75, 4 के तहत कैंडिडेट को बराबर वोट मिले की स्थिति में ड्रॉ का सहारा लिया जाता है। इसके लिए रिटर्निंग अफसर कैंडिडेट के नाम वाली पर्चियों को एक बॉक्स में रखता है। पर्ची निकालने से पहले उसे अच्छे तरह मिला दिया जाता है। लेकिन यहां ये जानकर आप चौंक जाएंगे कि जिस कैंडिडेट के नाम वाले की पर्ची बाहर निकलती है वो चुनाव हार जाता है और जिसके नाम की पर्ची पेटी में रह जाती है वो मुकाबला जीत जाता है। सिंघवी के साथ यही हुआ, पेटी से उनके नाम की पर्ची निकली और वो मुकाबला हार गए।

15 में से 10 सीटों पर जीत में बीजेपी की रणनीति काफी कारगर रही। उधर, एसपी कैंडिडेट आलोक रंजन और कांग्रेस कैंडिडेट सिंघवी की हार के पीछे पार्टी की अंदरूनी कलह भी जिम्मेदार रही है। एसपी अपने विधायकों को साध नहीं पाई वहीं कांग्रेस के विधायक हिमाचल के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू से नाराज चल रहे थे। नाराजगी इतनी थी कि उन्होंने बीजेपी को वोट किया।

क्या वर्तमान में कांग्रेस की टेंशन बढ़ चुकी है?

राज्यसभा चुनाव के बाद वर्तमान में कांग्रेस की टेंशन बढ़ चुकी है! लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी कांग्रेस की जमीन को मजबूत करने के लिए ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर हैं। लेकिन ज्यों ज्यों राहुल का कारवां आगे बढ़ रहा है, राहुल गांधी को एक के बाद एक बड़े-बड़े झटके लग रहे हैं। जहां एक तरफ कांग्रेस के कद्दावर नेताओं का मोह भंग हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन का जोश ठंडा होता जा रहा है। गठबंधन से दलों के छिटकने का सिलसिला जारी है। नीतीश कुमार और जयंत चौधरी एनडीए का दामन थाम छोड़ चुके हैं। कुछ और दलों के एनडीए में जाने की अटकलें भी तेज हैं। ऐसे में कांग्रेस और राहुल गांधी की टेंशन काफी बढ़ गई है। उधर बीजेपी लोकसभा चुनाव के रण में उतरने को तैयार है। बीजेपी ने इस बार 400 से ज्यादा का टारगेट सेट कर रखा है। पीएम मोदी की अगुवाई में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं का जोश हाई है। राहुल गांधी जहां एक तरफ ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर हैं। वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के कांग्रेस छोड़ने की चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं। ऐसी अटकलें हैं कि वह अपने सांसद बेटे नकुलनाथ के साथ बीजेपी ज्वाइन कर सकते हैं। इस बीच मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट से लोकसभा सांसद (MP) नकुलनाथ के अपने ‘एक्स’ हैंड के बायो से कांग्रेस का नाम और लोगो भी हट गया है। कमलनाथ के बीजेपी में शामिल होने की अटकलों के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी के भी कांग्रेस छोड़ने की चर्चा है। सूत्रों के हवाले से मिली खबर के अनुसार, मनीष तिवारी लगातार बीजेपी के संपर्क में हैं। अगर कयास सही हुए तो कांग्रेस को अशोक चव्हाण के बाद फिर बड़ा झटका लग सकता है।

कांग्रेस के दिग्गज नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी कुछ दिन पहले बीजेपी में शामिल हो गए हैं। वे कांग्रेस के नौवें मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पिछले 10 सालों में बीजेपी का रुख किया। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए 10 पूर्व मुख्यमंत्रियों में सिर्फ एक ही नेता पार्टी में घर वापसी की। बाकी नेता कांग्रेस में नहीं लौटे। महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के कांग्रेस छोड़ने को बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। दो बार खुद लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बन चुके अशोक चव्हाण को राज्य के मराठवाडा क्षेत्र का बड़ा नेता माना जाता था।

कांग्रेस के सामने पार्टी से छिटक रहे नेताओं को रोकने के अलावा इंडिया गठबंधन से अलग हो रहे राजनीतिक दलों को रोकने की भी चुनौती है। दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों के I.N.D.I.A गठबंधन को सबसे बड़ा झटका नीतीश कुमार ने दिया है।नीतीश ने हाल ही में एनडीए का दामन थाम लिया है। जेडीयू ने बिहार में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के टूटने के लिए कांग्रेस की हठ और अहंकार को जिम्मेदार ठहराया। जेडीयू ने कहा कि कांग्रेस नेता अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे थे, विपक्षी गठबंधन को नहीं। नीतीश कुमार ने कहा कि उन्हें ‘इंडिया’ और ‘महागठबंधन’ में चीजें ठीक नहीं लग रही थीं, इसलिए उन्होंने बीजेपी के साथ नया गठबंधन और नई सरकार बनाने का निर्णय लिया।

हाल ही में राष्ट्रीय लोकदल आरएलडी के मुखिया जयंत चौधरी भी एनडीए में शामिल हो गए। बीते कई दिनों से उनके बीजेपी के साथ जाने की अटकलें थीं। चौधरी चरण सिंह को केंद्र सरकार की ओर से भारत रत्न की घोषणा के बाद से ये तय माना जा रहा था कि जयंत चौधरी इंडिया गठबंधन का साथ छोड़ देंगे और एनडीए के साथ चले जाएंगे। जयंत चौधरी आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ खड़े दिखाई देंगे। इसे लेकर जयंत चौधरी ने कहा कि मैंने अपने सारे विधायकों से बात कर ली है। हमें अल्प समय में यह फैसला लेना पड़ा क्योंकि परिस्थितियां ऐसी थीं। उन्होंने कहा कि हमारे सभी विधायक और कार्यकर्ता इस फैसले में हमारे साथ हैं।

चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को बड़ा झटका देते हुए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ममता ने कहा है कि वह बंगाल में अकेली चुनाव लड़ेंगी। ममता बनर्जी ने पहले कांग्रेस को दो सीटें देने को कहा था लेकिन अब ममता ने साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस को एक भी सीट नहीं देंगी। पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटे हैं और ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर एकला चलो के साथ आगे बढ़ गई हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी के गढ़ बीरभूम जिले में ममता बनर्जी ने एक बंद कमरे में संगठनात्मक बैठक की। इस दौरान ममता बनर्जी ने पार्टी नेताओं से अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को कहा है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि वह बंगाल में सीटों के बंटवारे का मसला सुलझा लेगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद पंजाब के सीएम भगवंत मान ने भी पंजाब में लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया है। भगवंत मान ने कहा कि वो पंजाब की 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेंगे। वो किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। पंजाब में आप 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। हम समझौता नहीं करेंगे। ममता बनर्जी का अपना फैसला है और हमारा अपना। भगवंत मान ने कहा कि हमने 40 उम्मीदवारों की लिस्ट बना ली है। इन्हीं 40 में से 13 उम्मीदवारों को शार्ट लिस्ट किया जाएगा। भगवंत ने वहीं पंजाब की 13 जीतने का दावा किया। भगवंत मान ने कहा कि इस बार पंजाब में 13-0 से जीतेगी।

क्या बीजेपी में भी है कमलनाथ के कई विरोधी?

बीजेपी में भी कमलनाथ के कई विरोधी है! कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ बीजेपी ज्वाइन कर रहे हैं या नहीं? बीते 24 घंटे से यह सवाल सियासी गलियारों में छाया हुआ है। अब तक इस सस्पेंस से पर्दा नहीं उठा है। हालांकि ऐसी अटकलें हैं कि कमलनाथ का अपने सांसद बेटे नकुलनाथ के साथ बीजेपी में जाना लगभग तय है। कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ के साथ दिल्ली में मौजूद हैं। उनके समर्थक करीब आधा दर्जन विधायक भी दिल्ली पहुंच गए हैं। उधर बीजेपी में कमलनाथ की एंट्री से पहले ही बीजेपी में घमासान छिड़ गया है। कुछ बीजेपी नेताओं का कहना है कि 1984 के सिख दंगों के ‘आरोपी’ कमलनाथ को पार्टी में लेने से सिख समाज के बीच गलत संदेश जाएगा। इसका दिल्ली और पंजाब सहित अनेक राज्यों में नुकसान हो सकता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस बार बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में 370 का टारगेट रखा है। ऐसे में बीजेपी कमलनाथ के लिए दरवाजे खोलने से पहले पंजाब और मध्य प्रदेश के चुनावी गणित का आकलन करेगी। पूरे नफा नुकसान के विश्वेषण के बाद ही कमलनाथ को बीजेपी में एंट्री मिल सकती है। दिल्ली बीजेपी के नेता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा ने कमलनाथ के बीजेपी में शामिल होने की खबरों को निराधार बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, बहुत से मित्रों के फोन आ रहे है और वो कमलनाथ के बारे में पूछ रहे हैं। मैंने उनसे फोन पर भी कहा है और यहां भी कह रहा हूं कि सिखों के हत्यारे और हिन्द दी चादर गुरु तेग बहादुर जी के गुरुद्वारे रकाबगंज साहिब को जलाने वाले कमलनाथ के लिए बीजेपी के दरवाजे न खुले थे न खुले हैं। प्रधानमंत्री मोदी के होते हुए कभी ऐसा संभव नहीं हो पाएगा, ऐसा मैं आप सबको भरोसा दिलाता हूं।’

कमलनाथ पर बीजेपी खुद आरोप लगाती आई है कि जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के अलावा कमलनाथ भी उन कांग्रेस नेताओं में शामिल रहे हैं जो 1984 के सिख दंगों के दौरान दंगाइयों का समर्थन और नेतृत्व कर रहे थे। कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को इन्हीं दंगों में शामिल होने के मामले में सजा हो चुकी है तो जगदीश टाइटलर अदालती कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कमलनाथ की बीजेपी में एंट्री टेढ़ी खीर साबित हो सकती है, क्योंकि बीजेपी के सिख नेता अब तक सिख समुदाय के लोगों से यही कहकर वोट मांगते आए हैं कि बीजेपी उन्हें न्याय दिलवाएगी।

1 नवंबर, 1984 को भारत के इतिहास की सबसे भयानक घटना घटी थी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख विरोधी दंगा फैल गया था और हजारों सिखों को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया था। 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी के दो सिख बॉडीगार्ड ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी। उनकी हत्या के बदले का बहाना बनाकर निर्दोष सिखों को निशाना बना गया। उनको मौत के घाट उतारा गया, उनके दुकान और मकान को लूटा गया और महिलाओं का बलात्कर किया गया। सरकारी आकंड़ों के मुताबिक, दंगों में दिल्ली में लगभग 2,146 सिख मारे गए थे और देशभर में बाकी जगहों पर 586 सिख मारे गए थे। उधर दंगा पीड़ित कई परिवारों का दावा है कि दिल्ली में ही करीब 8 हजार और पूरे देश में 15 हजार से ज्यादा सिखों की हत्या की गई थी। बीते साल ही मध्य प्रदेश बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर बड़ा बयान दिया था। उन्होंने 1984 के सिख दंगों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सज्जन सिंह को जेल हो चुकी है। जगदीश टाइटलर के खिलाफ भी चार्जशीट दाखिल है। अब बारी कमलनाथ की है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद देश ने पहली बार इस तरह का विभत्स व झकझोर देने वाला घटनाक्रम देखा।इसमें एक दो नहीं, बल्कि हजारों बेकसूर लोगों की हत्या की गई।

बीजेपी नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कोर्ट से 1984 में पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में कमल नाथ के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एसआईटी को निर्देश दिए जाने की मांग की थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों से संबंधित एक मामले में कथित भूमिका के लिए कमल नाथ के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पर इसी साल 6 फरवरी को संज्ञान लिया और एसआईटी को अपनी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का और समय दे दिया। अब इस मामले को 23 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया गया है। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को सूचित किया गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित एसआईटी ने अभी तक बीजेपी के मनजिंदर सिंह सिरसा द्वारा दायर याचिका पर अपनी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल नहीं की है। यह मामला 1984 में दिल्ली शहर के गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब में दंगाइयों की भीड़ पर हमला करने से जुड़ा है।

बीते दिनों से मध्य प्रदेश की राजनीति में भूचाल मचा हुआ है। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ के कांग्रेस का साथ छोड़ बीजेपी में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। दोनों नेता दिल्ली में मौजूद हैं। माना यह भी जाना रहा है कि उनके साथ कांग्रेस के कई नेता भी बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। इसी बीच कमलनाथ ने दिल्ली स्थित अपने आवास पर श्रीराम का झंडा लगा दिया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि वह कांग्रेस का साथ छोड़ बीजेपी के साथ जा सकते हैं। हालांकि कमलनाथ और नकुलनाथ ने इसकी पुष्टि नहीं की है। वहीं उनके घर की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। इसके अलावा कमलनाथ खेमे के नेता माने जाने वाले सज्जन सिंह वर्मा ने भी सोशल मीडिया एक्स पर भगवान राम के साथ पोस्टर साझा किया है। पोस्टर में लिखा है,’तेरे राम मेरे राम, तुझमें भी राम, मुझमें भी राम, जय श्रीराम।’

आखिर कैसे होती है दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम की ताजपोशी?

आज हम आपको बताएंगे कि दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम की ताजपोसी कैसे की जाती है! दिल्ली की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद एक बार फिर बड़े बदलाव की गवाह बनने जा रही है। 25 फरवरी को जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी यहां के नायब इमाम और अपने बेटे सैयद उसामा शाबान बुखारी के नाम का ऐलान अपने जानशीन (उत्तराधिकारी) के रूप में घोषित करने वाले हैं। जामा मस्जिद के शाही इमाम ने इस बारे में ऐलान करते हुए बताया कि यह परंपरा रही है कि शाही इमाम अपने जीवनकाल में ही अपने उत्तराधिकारी का ऐलान करते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 25 फरवरी को नायब शाही इमाम शाबान बुखारी का नाम शाही इमाम के तौर पर घोषित करेंगे और इस मौके पर उनकी शाही इमाम के रूप में दस्तारबंदी की जाएगी। दस्तारबंदी की इस रस्म के बाद शाबान बुखारी शाही इमाम के पद को संभालने के लिए तैयार हो जाएंगे। हालांकि इस रस्म के बाद भी सैयद अहमद बुखारी ही शाही इमाम के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे लेकिन अगर आने वाले समय में उनको अपनी सेहत के चलते या किसी और वजह से इस जिम्मेदारी को निभाने में मुश्किलात आती हैं तो शाबान बुखारी सीधे तौर पर शाही इमाम की जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे आएंगे। दस्तारबंदी की इस रस्म में शाही इमाम खुद अपने हाथों से नायब इमाम को शाही इमाम की पगड़ी बांधते हैं। इस तरह से आगे आने वाली वक्त में शाबान बुखारी के लिए जामा मस्जिद के चौदहवें शाही इमाम बनने का रास्ता बना दिया गया है। जामा मस्जिद के जुड़े सूत्रों ने बताया कि इससे पहले शाबान बुखारी को साल 2014 में नायब इमाम बनाया गया था। नायब इमाम के तौर पर उनकी दस्तारबंदी के बाद से ही उनकी धर्म से जुड़े तमाम मामलों में देश और विदेश में ट्रेनिंग चल रही है। शाही इमाम बनने के सफर में जो नॉलेज जुटाने की जरूरत होती है उसको वो पूरी शिद्दत के साथ निभा रहे हैं।

भारत में शाही इमाम जैसा कोई पद नहीं है। यह ऐसा उपाधि है जिसपर बुखारी परिवार अपना हक जताता आया है। तबसे यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आ रही है। 1650 के दशक में, जब मुगल बादशाह शाहजहां ने दिल्ली में जामा मस्जिद बनवाई थी, तब उन्होंने बुखारा उज़्बेकिस्तान के शासकों को एक इमाम की जरूरत बताई। इस तरह मौलाना अब्दुल गफूर शाह बुखारी को भेजा गया। शाहजहां ने उन्हें शाही इमाम का खिताब दिया। आसान भाषा में शाही इमाम शब्द का मतलब भी समझ लीजिए। शाही का मतलब होता है राजा और इमाम वो होते हैं जो मस्जिद में नमाज पढ़ाते हैं। इसलिए शाही इमाम का मतलब है राजा की ओर से नियुक्त किया गया इमाम। उस समय से, मौलाना अब्दुल गफूर शाह बुखारी की संतान जामा मस्जिद के शाही इमाम के रूप में वंशानुगत तरीके से चलते आए हैं। मुगल शासन के खत्म होने के बाद, उन्होंने अपने आप को ही यह उपाधि दे दी है। भारत सरकार ने कभी भी इस पद को न तो बनाया है और न ही इसे स्वीकृति दी है। वर्तमान इमाम बुखारी खुद को शाही इमाम कहते हैं क्योंकि वो खुद को उसी रूप में देखते हैं, किसी कानूनी मान्यता के आधार पर नहीं। अब यह पद सैयद अहमद बुखारी अपने बेटे को 25 फरवरी को सौंप देंगे।

शाही इमाम को मुस्लिम समुदाय में बहुत सम्मान दिया जाता है। जैसा कि पहले बताया कि शाही इमाम का पद वंशानुगत होता है, यानी पिता के बाद पुत्र यह पद संभालता है। इसलिए सैयद अहमद बुखारी अपने जीते जी इस पद को अपने बेटे सैयद उसामा शाबान बुखारी को सौंपेंगे। शाही इमाम का पद सौंपते वक्त नियम है कि पिता जिंदा रहते ही अपने बेटे को यह पद का उत्तराधिकारी बना सकता है। शाही इमाम ने राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी आवाज उठाई है। यह पद भारतीय मुस्लिम समुदाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जामा मस्जिद के शाही इमाम बनते ही पिछले 400 सालों से अबतक इस पद पर सिर्फ और सिर्फ बुखारी परिवार की ही हुकुमूत चली है। इस इमामत को किसी ने चुनौती नहीं दी। यही वजह रही कि इस पद का कोई आधिकारिक आधार न हो लेकिन देश की राजनीति में बुखारी परिवार भी हिस्सा लेता है। सैयद अहमद बुखारी के पिता अब्दुल्ला बुखारी अलग-अलग मुस्लिम दलों को अपना समर्थन दे चुके हैं। सैयग अहमद बुखारी के पिता ने 1977 में जनता पार्टी और 1980 में कांग्रेस को भी समर्थन दिया था। दिखाया था कि सियासत में हम भी पैठ बना सकते हैं। उसके बाद से देश की अलग-अलग पार्टियां शाही इमाम का समर्थन लेने जामा मास्जिद के दर पर आने लगीं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ ही सोनिया गांधी का भी नाम शामिल है। 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को भी शाही इमाम के समर्थन की जरूरत पड़ी थी। तब बुखारी ने मुसलमानों से भाजपा को समर्थन देने की अपील की थी।

दस्तारबंदी कुछ मुस्लिम समुदायों, खासकर दक्षिण एशिया के मुसलमानों जैसे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक समारोह है। शब्द “दस्तारबंदी” फारसी भाषा से आया है, जहां दस्तार का अर्थ पगड़ी और बंदी का अर्थ बांधना होता है। इसलिए, दस्तारबंदी का सीधा अर्थ पगड़ी बांधने का कार्य होता है। यह समारोह आमतौर पर एक युवा लड़के के वयस्क होने में प्रवेश का प्रतीक होता है या किसी ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए किया जाता है जिसने धार्मिक या शैक्षणिक अध्ययन में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की हो। दस्तारबंदी के सबसे आम अवसरों में से एक है जब कोई छात्र कुरान को पूरा याद कर लेता है, जिसे हिफ्ज़ के नाम से जाना जाता है। यह इस्लामी धर्म में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, और दस्तारबंदी समारोह सार्वजनिक रूप से इस उपलब्धि को स्वीकार करने और उसका जश्न मनाने का एक तरीका है।

दस्तारबंदी समारोह के दौरान, एक सम्मानित बुजुर्ग या धार्मिक विद्वान आम तौर पर व्यक्ति के सिर पर पगड़ी बांधते हैं, साथ ही साथ प्रार्थनाएं करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पगड़ी अक्सर बढ़िया कपड़े से बनी होती है और इस पर जटिल डिजाइन या कढ़ाई हो सकती है। पगड़ी बांधने का कार्य प्रतीकात्मक है, यह व्यक्ति को सम्मान, गरिमा और जिम्मेदारी देने का प्रतिनिधित्व करता है। इस समारोह के बाद आम तौर पर परिवार, दोस्तों और समुदाय के सदस्यों का जमावड़ा होता है जो भोज और उत्सव के साथ इस अवसर को मनाने के लिए एक साथ आते हैं। यह परिवार के लिए खुशी और गर्व का समय होता है और यह व्यक्ति की उपलब्धियों और समुदाय में अधिक जिम्मेदारियां लेने के लिए उनकी तत्परता की सार्वजनिक स्वीकृति के रूप में कार्य करता है।

जब बुजुर्ग को गंदे कपड़ों के कारण मेट्रो में नहीं घुसने दिया गया!

हाल ही में एक घटना देखने को मिली जब बुजुर्ग को गंदे कपड़ों के कारण मेट्रो में नहीं घुसने दिया गया! गांधी के देश में एक किसान को कपड़े देखकर मेट्रो में चढ़ने से रोक दिया जाता है। 131 साल पहले महात्मा गांधी को भी दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसे ही अनुभव से गुजरना पड़ा था। 7 जून 1893 को उन्हें दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन की फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट से बाहर निकाल दिया गया क्योंकि अश्वेतों को फर्स्ट क्लास में सफर करने की इजाजत नहीं थी। उस समय भारत और दक्षिण अफ्रीका दोनों ही ब्रिटिश उपनिवेश थे। भेदभाव खासकर रंगभेद की उस अपमानजनक घटना ने गांधी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसके खिलाफ मुहिम छेड़ दी। बाद में वह भारत लौटे और ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया। आखिरकार दशकों के संघर्ष के बाद देश को आजादी भी दिलाई। गांधी के साथ दक्षिण अफ्रीका में भेदभाव तो तब हुआ जब वहां अंग्रेजों का शासन था। लेकिन आजादी के करीब 8 दशक बाद भी अगर अपने ही देश में किसी नागरिक को इस आधार पर ट्रेन, मेट्रो या पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सवार होने से रोका जाता है तो ये बेहद शर्मनाक है। घटना बेंगलुरु मेट्रो की है। वीडियो वायरल होने और सोशल मीडिया पर काफी लानत मलानत के बाद बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड बीएमआरसीएल को खेद जताना पड़ा। बुजुर्ग किसान के साथ बदसलूकी करने वाले सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को बर्खास्त कर दिया गया है। पहनावे को लेकर भेदभाव से जुड़ीं खबरें जबतब आती ही रहती हैं। दो-ढाई साल पहले दक्षिण दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में एक महिला को सिर्फ इसलिए एंट्री नहीं दी गई कि वह विशुद्ध भारतीय परिधान साड़ी पहनी हुई थी। तब उस मामले ने बहुत तूल पकड़ा था। जांच हुई तो पता चला कि रेस्टोरेंट बिना वैध लाइसेंस के चल रहा था और आखिरकार उस पर ताला लग गया। लेकिन बेंगलुरु मेट्रो में बुजुर्ग से भेदभाव का मामला तो और भी ज्यादा गंभीर है। यह पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ा मसला था। आम जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली मेट्रो में आम जनता को इसलिए नो एंट्री कि उसका ड्रेस सही नहीं है? बेंगलुरु मेट्रो की घटना 18 फरवरी की थी लेकिन भला हो हर हाथ में कैमरे वाले युग का जो राष्ट्रीय स्तर पर उस घटना की चर्चा हुई और बीएमआरसी को गलती माननी पड़ी। घटना का वीडियो वायरल होने और सोशल मीडिया पर लोगों के आक्रोश के बाद बीएमआरसी को संबंधित सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को नौकरी से निकालने का ऐलान करना पड़ा। नौकरी से निकालना सही सजा है या नहीं, ये कहना मुश्किल है लेकिन बीएमआरसी को अपने सभी स्टाफ चाहे वे नियमित हों या संविदा पर, उन्हें जागरूक करने की जरूरत है ताकि इस तरह की घटना का दोहराव न हो सके।

बुजुर्ग को मेट्रो में चढ़ने से रोके जाने की ये घटना 18 फरवरी को राजाजीनगर मेट्रो स्टेशन पर हुई थी। इससे जुड़े वायरल वीडियो में दिख रहा है कि सिक्यॉरिटी स्टाफ एक बुजुर्ग को इसलिए एंट्री से रोक रहा है कि उसके कपड़े ‘ठीक’ नहीं है। वीडियो में दिख रहा है कि लगेज स्कैनर के पास सफेद शर्ट और धोती में एक बुजुर्ग दिख रहा है। सिर पर गठरी है जिसमें संभवतः कपड़े हैं। सोशल मीडिया पर किसान बताए जा रहे उस बुजुर्ग के पास यात्रा के लिए जरूरी टिकट भी था। इसके बाद भी सुरक्षाकर्मी उसे एंट्री नहीं दे रहे क्योंकि उसके कपड़े ‘ठीक’ नहीं हैं, ‘गंदे’ हैं। कार्तिक सी. एरानी नाम के एक यात्री ने बुजुर्ग को रोके जाने का विरोध किया। वीडियो में वह सिक्यॉरिटी स्टाफ के फैसले पर सवाल उठाते दिख रहे हैं। उनके साथ एक और यात्री भी सिक्यॉरिटी स्टाफ से बहस करते दिख रहे हैं कि किसान से सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। वह तो सिर्फ कपड़े लेकर जा रहे हैं, उन्होंने बीएमआरसी के किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है। वह सवाल करते हैं कि क्या ये वीआईपी ट्रांसपोर्ट है? क्या मेट्रो आम जनता के चलने के लिए नहीं है? क्या मेट्रो में चलने के लिए ड्रेस कोड लागू है? इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बेचारा बुजुर्ग चुपचाप शांत एक दूसरे का मुंह ताकता रहता है। हिंदी बोलने वाले उस बुजुर्ग को समझ ही नहीं आता कि क्या करें। वीडियो के आखिर में दिख रहा है कि सिक्यॉरिटी स्टाफ से बहस करने वाले युवक ने बुजुर्ग को साथ में लेकर स्टेशन में उनकी एंट्री कराई। वीडियो में उन्हें यह कहते सुना जा सकता है, ‘चलो भैया…कौन क्या बोलेगा?’ बुजुर्ग ने राजाजीनगर से मैजेस्टिक मेट्रो स्टेशन तक सफर किया।

घटना के करीब एक हफ्ते बाद 24 फरवरी को उसका वीडियो एक्स पर वायरल हो गया। लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई। लोगों ने कार्तिक नाम के शख्स की जमकर तारीफ की और बीएमआरसी को खूब खरीखोटी सुनाई। लोगों के आक्रोश के मद्देनजर बीएमआरसी ने घटना की जांच कराई और दोषी सिक्यॉरिटी सुपरवाइजर को बर्खास्त कर दिया। पूरी घटना बेहद शर्मनाक है। गांधी के देश में एक बुजुर्ग को मेट्रो में ये कहकर चढ़ने से रोकने की कोशिश होती है कि उसके कपड़े ‘ठीक नहीं’ हैं। एक आजाद मुल्क में कपड़े, चमड़ी के रंग, भाषा, रंग-रूप वगैरह के आधार पर भेदभाव की घटना की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अफसोस कि आजादी के करीब 8 दशक बाद भी इस तरह के भेदभाव की घटना हो रही है।

क्या महाराष्ट्र की तरह हिमाचल प्रदेश में भी होगा खेला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या महाराष्ट्र की तरह हिमाचल प्रदेश में भी खेला होगा या नहीं! देश की राजनीति थोड़ी-थोड़ी टी20 मैच की तरह हो चली है। बाजी किस वक्त किधर पलट जाए कहा नहीं जा सकता। अब देखिए न, पूरे दिन हिमाचल प्रदेश की जिस राज्यसभा सीट पर कांग्रेस और सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू जीत का दंभ भर रहे थे वह तो बीजेपी के खाते में चली गई। 40-25 से शुरू हुआ मुकाबला देर शाम नतीजे आने के बाद 34-34 में तब्दील हो गया। इसके बाद टाई ब्रेकर और लकी ड्रॉ की मदद से विजेता भाजपा ही हुई। मुकाबला कांग्रेस के प्रवक्ता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और बीजेपी के हर्ष महाजन के बीच था। क्रॉस वोटिंग का भी खेल हार-जीत का अंतर पैदा कर गया। कांग्रेस और सीएम सुक्खू के लिए यह किसी शॉक से कम नहीं था। अब कयास यह लगाए जा रहे हैं कि हिमाचल की सरकार भी बहुत दिनों की मेहमान नहीं है। विजेता सांसद हर्ष महाजन का भी यही दावा है। हालांकि अभी ऐसा होता नहीं दिख रहा है, इसलिए सिर्फ कयासों का बाजार गर्म है। लेकिन इस घटना ने 2 साल पहले जून 2022 में महाराष्ट्र की तत्कालीन उद्धव सरकार के गिरने की याद दिला दी। तब भी राज्यसभा चुनाव थे और नतीजे आने के बाद एकनाथ शिंदे ने अपने विधायकों संग पाला बदलकर बीजेपी के साथ सरकार बना ली थी। तब बीजेपी ने महाविकास अघाड़ी को सत्ता से बेदखल कर गहरी चोट पहुंचाई थी। महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम की चर्चा करने से पहले आज हिमाचल प्रदेश में क्या कुछ हुआ उस बारे में बात कर लेते हैं। मंगलवार को 3 राज्यों की 15 सीटों के लिए चुनाव हुए। वैसे तो राज्यसभा की 56 सीटों पर चुनाव होने थे लेकिन 41 सीटों पर निर्विरोध सांसद चुने जाने के बाद बची 15 सीटों पर वोटिंग कराई गई। सबसे तगड़ा मुकाबला पहाड़ी इलाके हिमाचल प्रदेश में हुआ। ठंड और बर्फबारी के बाद भी वहां सियासी गर्माहट साफ दिखी। कांग्रेस और भाजपा के दो उम्मीदवारों के बीच आसान दिख रहा मुकाबला कब कांटे का हो गया खुद सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू भी नहीं समझ पाए। वह तो यह भी नहीं समझ पाए कि कब उनके नाक के नीचे से कांग्रेस के 6 विधायक खिसक गए और बीजेपी को वोट कर आए। 3 निर्दलीय विधायक मिलाकर कुल 9 वोट बीजेपी को पड़ गए। 40-25 का मुकाबला 34-34 का हो गया। बाद में टाई ब्रेकर के बाद अभिषेक मनु सिंघवी बीजेपी को हर्ष महाजन के हाथों हार मिली और हारी बाजी बीजेपी ने जीत ली। हार के बाद अभिषेक मनु सिंघवी ने उन 9 विधायकों का धन्यवाद किया और इशारों में बीजेपी को बता दिया कि वह फिर वापसी करेंगे। तो क्या इस हार से हिमाचल सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं? बीजेपी के हर्ष महाजन की मानें तो सुक्खू सरकार ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है। हालांकि ऐसा तुरंत कोई संकट इस सरकार पर नहीं दिखता। बीजेपी द्वारा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की अटकलों के बारे में पूछे जाने पर सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि जब विधानसभा सत्र चलेगा तो हम देखेंगे। जो लोग गए हैं उनके परिवार के लोग उनसे पूछ रहे हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? तो अगर परिवार के लोग खुद ही सवाल कर रहे हैं तो शायद उनमें से कुछ लोग ‘घर वापसी’ के बारे में सोचेंगे।

साल 2022 और जून का महीना चल रहा था। बढ़ती तपिश ने महाराष्ट्र के सियासी पारे को भी बढ़ा दिया था। प्रदेश की कमान शिवसेना के सर्वेसर्वा उद्धव ठाकरे के हाथों में थी। गठबंधन के साथी एनसीपी और कांग्रेस भी थे। सबकुछ सही चल रहा था। सीएम पद की जिद के बाद बीजेपी का साथ छोड़कर सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे अपनी सरकार सही चला रहे थे। कोरोना का भी कहर साथ था। जून के महीने में ही यानी 2022 में राज्यसभा का चुनाव हुआ। 6 सीटों के लिए बीजेपी और महाविकास अघाड़ी के बीच मुकाबला था। भाजपा ने बाजी मारते हुए 6 में से 3 सीटें जीत लीं। नतीजों से सत्तारूढ़ शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन को बड़ा झटका लगा। एमवीए (महाराष्ट्र विकास अघाड़ी) ने वोटों की गिनती में 8 घंटे की देरी पर सवाल उठाया। भाजपा के जीतने वालों में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, पूर्व राज्य मंत्री अनिल बोंडे और धनंजय महाडिक शामिल थे। महाविकास अघाड़ी से शिवसेना के संजय राउत, राकांपा के प्रफुल्ल पटेल और कांग्रेस के इमरान प्रतापगढ़ी ने चुनाव जीता था। कुल 284 वैध मतों में से गोयल को 48, बोंडे को 48, महाडिक को 41.56, राउत को 41, प्रतापगढ़ी को 44 और पटेल को 43 मत मिले थे। यह तो हो गई नतीजों की बात। लेकिन असली खेला 6वीं सीट से शुरू हुआ।

छठी सीट के लिए बीजेपी के धनंजय महाडिक और शिवसेना के संजय पवार थे। संजय पवार को अंतिम में हार मिली और यहीं से सियासी उथल-पुथल भी मची। महाडिक और पवार पश्चिमी महाराष्ट्र के कोल्हापुर से आते हैं। छठी सीट के लिए हुए चुनाव बहुत ही रोमांचक रहा। कांग्रेस और बीजेपी ने एक दूसरे पर आरोप लगाए और चुनाव आयोग तक भी गए। बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस ने तब ट्वीट किया था कि चुनाव सिर्फ लड़ने के लिए नहीं, बल्कि जीतने के लिए लड़े जाते हैं। जय महाराष्ट्र। यहां से ही जैसे उद्धव सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। राज्यसभा चुनाव में वोटों की गिनती 8 घंटे देरी से शुरू हुई। इसकी वजह भाजपा और सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा एक-दूसरे पर क्रॉस वोटिंग और नियम तोड़ने का आरोप लगाना था। दोनों ही पक्षों ने चुनाव आयोग से शिकायत की और वोट रद्द करने की मांग की। चुनाव आयोग ने शिवसेना विधायक सुहास कांडे के वोट को खारिज करने का आदेश दिया, जिसके बाद रात 1 बजे के बाद मतगणना शुरू हुई। पहला परिणाम दो घंटे में सामने आ गया।

18 महीने और 18 दिनों के बाद शिंदे गुट के 16 विधायकों पर 2024 की जनवरी को फैसला भी आ गया। महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर ने मुख्यमंत्री शिंदे समेत उनके गुट के 16 विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी। स्पीकर ने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना बताया था। अभी के समीकरण की बात करें तो महाराष्ट्र में बीजेपी की महायुति सरकार है। भाजपा के पास 106 विधायक, शिवसेना(शिंदे गुट) के 39, एनसीपी(अजित पवार गुट) के 41 विधायक हैं। वहीं महाविकास अघाड़ी के पास कांग्रेस के पास 44, शिवसेना उद्धव गुट के पास 13 और एनसीपी(शरद पवार गुट) क पास 13 विधायक हैं। बता दें कि पिछले साल अजित पवार अपने 41 विधायकों के साथ बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था।

आखिर क्या है मोनिका यादव मर्डर की मिस्ट्री?

आज हम आपको मोनिका यादव मर्डर की मिस्ट्री की कहानी सुनाने जा रहे हैं! 8 सितंबर 2021, वो तारीख जब दिल्ली पुलिस की 28 साल की पूर्व कांस्टेबल मोनिका यादव की हत्या हुई। वजह थी हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह राणा से शादी करने से मना कर देना। मोनिका यादव मर्डर केस को भले ही दो साल पूरे हो गए हैं, लेकिन ये अभी भी दिल्ली के बड़े अपराधों को जिक्र होता है, तो ये केस जरूर ध्यान में आता है। इस वारदात से पूरी दिल्ली सहम गई थी। हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह राणा पहले मोनिका को दिल्ली के मुखमेलपुर के सुनसान इलाके में ले गया और उसे कई थप्पड़ मारे। सनकी पुलिसकर्मी का इतने पर भी मन नहीं भरा और उसने मोनिका को 25-30 मीटर की ऊंचाई से नाले में फेंक दिया। मोनिका बुरी तरह जख्मी हो गई, लेकिन उसकी जान बच गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सनकी हेड कांस्टेबल तब तक नहीं माना, जब तक उसने मोनिका की जान नहीं ले ली। जानकारी के अनुसार, नाले में फेंकने पर मोनिका बच गई। उसने बचने के लिए राणा को धमकी दी कि वो पुलिस को सबकुछ बता देगी। फिर क्या था, राणा के दिमाग पर पहले से खून सवार था। वो खुद भी नाले में उतर गया और मोनिका का गला घोंट दिया। इसके बाद मोनिका के शव को छिपाने के लिए उसे नाले के अंदर धकेल दिया। शव ऊपर न आए इसके लिए उसे पत्थरों से ढक दिया। पिछले साल जब इस मर्डर केस का खुलासा हुआ, तो हर कोई हैरान रह गया। मोनिका मर्डर केस की पूरी कहानी 30 पेज की चार्जशीट में लिखी हुई है। इसे मोनिका की हत्या के तीन महीने बाद पिछले साल 26 दिसंबर को दिल्ली की अदालत में दाखिल किया गया।

दिल्ली पुलिस का हेड कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह राणा मोनिका की हत्या के बाद उसके परिवार को गुमराह करता रहा। उसने मोनिका के परिवार को ये भरोसा दिलाया कि वो अरविंद नाम के शख्स के साथ भाग गई और उसी से शादी कर ली। राणा मोनिका के मर्डर का राज दो साल तक छिपाता रहा। मोनिका के घरवालों को शक हुआ और उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2021 में वो मोनिका के पीजी में गई थीं, लेकिन वो वहां नहीं मिलीं। पुलिस जांच में पता चला कि मोनिका दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम में काम करते हुए राणा से मिली थी। मोनिका दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर तैनात थी। वो सितंबर 2021 में UPSC की तैयारी करने के लिए दिल्ली आई थी। यहां उसकी मुलाकात राणा से हुई। राणा पहले से शादीशुदा था। वो मोनिका को पसंद करने लगा। उसने मोनिका के रहने का इंतजाम किया और कोचिंग सेंटर में भी एडमिशन करवाया। राणा मोनिका पर शादी के लिए दवाब बना रहा था, लेकिन वो अपनी तैयारी पर फोकस करना चाहती थी।

वारदात वाले दिन राणा ने मोनिका को उसके पीजी से पिक किया और उसे दिल्ली के मुखर्जी नगर के एक मॉल में ले गया। वो लगातार उसपर शादी के लिए दवाब बना रहा था, लेकिन मोनिका अपने फैसले पर अडिग थी। मोनिका के बार-बार इनकार से राणा को गुस्सा आ गया। फिर वो उसे सनसान रास्ते पर ले गया और मारपीट करने लगा। इसके बाद उसने मोनिका को नाले में फेंक दिया और जब वो वहां भी बच गई तो गला घोटकर उसकी हत्या कर दी। राणा ने चालाकी से मोनिका का शव भी नाले में एक पत्थर से छिपा दिया। दो साल तक इस हत्याकांड की किसी को कानोकान खबर नहीं हुई। राणा मोनिका के परिवार से झूठ बोलता रहा कि वो अरविंद नाम के लड़के के साथ भाग गई है। लेकिन जब परिवार को शक हुआ तो पुलिस ने जांच शुरू की। दो साल बाद मोनिका के अवशेष नाले में मिले। पुलिस ने उन अवशेषों के डीएनए को मोनिका की मां के DNA से मिलाया, जिससे इस बात का खुलासा हुआ कि मोनिका की हत्या हुई है।

मोनिका का हत्यारा हेड कांस्टेबल राणा दो साल तक उसके परिवार को गुमराह करता रहा। उसने मोनिका के परिवार को फर्जी कॉल किए और खुद को अरविंद बताया। उसने कहा कि मोनिका ने अरविंद से शादी कर ली है। लेकिन परिवार को शक हुआ, जब उन्हें केवल अरविंद के नाम से फोन और मैसेज आए, लेकिन बेटी का कभी कॉल नहीं आया। परिवार ने पुलिस से इस मामले में मदद मांगी। पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड खंगाले और राणा के साले रोविन तक पहुंची। रोविन ने कबूल किया उसने राणा के कहने पर मोनिका के परिवार को कॉल किए। इसके बाद पुलिस ने राणा को गिरफ्तार किया।