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जानिए ट्रेडमिल का आविष्कार किसने और क्यों किया था?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर ट्रेडमिल का आविष्कार किसने और क्यों किया था! आज हर कोई जिम जाना चाहता है, बॉडी बनाना चाहता है! लेकिन जब भी कोई जिम जाता है तो ट्रेडमिल उसका सबसे बेहतरीन ऑप्शन होता है! लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस ट्रेडमिल का उपयोग आप दौड़ने के लिए करते हैं, वह एक समय मक्का पीसने के लिए बनाई गई थी! अगर नहीं, तो आज हम आपको ट्रेड मिल के इसी आविष्कार और इतिहास के बारे में जानकारी देने वाले हैं! आपको बता दे कि इन दिनों लोग अपनी फिटनेस को बनाए रखने के लिए कई तरीके अपना रहे हैं। डाइट से लेकर जिम में वर्कआउट तक, लोग फिट और हेल्दी रहने के लिए काफी कुछ करते हैं। बात जब भी जिम की आती है, तो ज्यादातर लोगों के मन में ट्रेडमिल का ख्याल आता है। यह जिम में इस्तेमाल होने वाले सबसे लोकप्रिय फिटनेस डिवाइस में से एक है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज आप जो ट्रेडमिल देखते हैं, उसका पहली बार आविष्कार कब हुआ था? आइए आपको बताते हैं….. जानकारी के लिए बता दे कि ट्रेडमिल के आविष्कार का श्रेय सर विलियम क्यूबिट (1785-1861) नामक एक सिविल इंजीनियर को जाता है, जिन्होंने सन् 1818 में ट्रेडमिल बनाया था, जिसे रनिंग व्हील के रूप में भी जाना जाता है। क्यूबिट, मिल श्रमिकों के परिवार में जन्मे और पले-बढ़े, इसलिए उन्होंने मक्का पीसने के लिए इस उपकरण का आविष्कार किया था। उस दौरान उन्होंने इसे ‘ट्रेडव्हील’ का नाम दिया था। बता दें कि ट्रेडव्हील के डिजाइन को क्यूबिट ने कई अलग-अलग रूप दिए, जिसमें एक ऐसा डिजाइन भी शामिल था,जिसमें ट्रेडव्हील में दो पहिये थे, जिन पर आप चल सकते थे और उनके कोग्स आपस में जुड़े हुए थे। हालांकि, उनका सबसे लोकप्रिय डिजाइन लंदन की ब्रिक्सटन जेल में स्थापित किया गया था। इसमें एक चौड़ा पहिया शामिल था और कैदी अपने पैरों को पहिये में लगे सीढ़ीनुमा खांचे पर दबाते थे, जिससे पहिया घूमता था। ब्रिक्सटन जेल में लगा ट्रेडव्हील एक अंडरग्राउंड मशीन से जुड़ा हुआ था, जिससे मकई यानी कॉर्न पीसती थी। इस तरह इससे अनाज भी पीसता रहता था और कैदियों को सजा भी मिलती रहती थी। इस मशीन की मदद से एक साथ 24 कैदियों को व्यस्त रखा जाता था। उनसे गर्मियों के दौरान प्रतिदिन 10 घंटे और सर्दियों में सात घंटे कड़ी मेहनत कराई जाती थी। बता दें कि 19वीं शताब्दी के अंत के आसपास, अंग्रेजों ने जेलों में सुधार करना और कैदियों को भोजन और कंबल जैसी जरूरी चीजें देना शुरू कर दिया था। ऐसे में लोगों को चिंता होने लगी कि गरीब लोग जेल जाने और मुफ्त का सामान पाने के लिए अपराध करेंगे। ऐसे में कैदियों को दी जाने वाली इन सुख-सुविधाओं की भरपाई उनकी मजदूरी से की जानी चाहिए।

सबसे पहले, इन ट्रेडमिलों का इस्तेमाल मकई पीसने या पानी पंप करने के लिए किया जाता था, लेकिन जल्द ही वे सिर्फ सजा देने का एक तरीका बन गए। इतिहासकार डेविड शेट के अनुसार, साल 1842 तक इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स की 200 में से लगभग 109 जेलें इनका उपयोग कर रही थीं, लेकिन जल्द ही इस के साइड इफेक्ट्स सामने आने लगे। इस पर चलने की वजह से कैदी गिरकर चोट खाने लगे और दिल के मरीजों की लगातार मौत होने लगी, जिसके बाद 1898 में इस पर रोक लगा दी गई।

हालांकि, बाद में ट्रेडमिल अमेरिका में फिर से उभर कर सामने आया, जब 1911 में क्लॉड लॉरेन हेगन नाम के एक व्यक्ति ने इसके लिए पेटेंट के लिए आवेदन किया था। यहां पर साल 1822 में जेल में इनका इस्तेमाल होने लगा , लेकिन यहां भी हालात ब्रिटेन की ही तरह रहे। ऐसे में कुछ समय बाद यह सामने आया कि सीमित समय में इस पर चलने से सेहत को कई फायदे मिलते हैं और इस तरह इसका इस्तेमाल फिटनेस के लिए होना शुरू हुआ। इसके बाद पहली बार स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए ट्रेडमिल को डिजाइन किया गया, जो हमारे आधुनिक ट्रेडमिल जैसा दिखता था। साल 1952 में, डॉ. रॉबर्ट ए. ब्रूस एक अमेरिकी हार्ट डिजीज स्पेशलिस्ट, जिन्हें ‘फादर ऑफ एक्सरसाइज कार्डियोलॉजी’ के रूप में भी जाना जाता है, ने वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में पहली मोटर से चलने वाली ट्रेडमिल का आविष्कार किया। इसके बाद अमेरिकी मैकेनिकल इंजीनियर विलियम स्टॉब ने 1960 के दशक में एक होम फिटनेस मशीन बनाई। उन्होंने इसे पेस मास्टर 600 का नाम दिया और न्यू जर्सी में घरेलू ट्रेडमिल का निर्माण किया, जिसका कोई भी घरों में इस्तेमाल कर सकता था और इसी तरह अनाज पीसने और कैदियों को सजा देने वाली यह मशीन घरों और जिमों का हिस्सा बन गई।

पहली बार किसे मिला था फिल्मी जगत का ऑस्कर अवार्ड?

आज हम आपको बताएंगे की फिल्मी जगत का ऑस्कर अवार्ड पहली बार किसे मिला था! आपने फ़िल्मी जगत के सबसे बड़े अवॉर्ड, ऑस्कर अवार्ड के बारे में तो जरुर सुना होगा! कहा जाता है कि जिस भी फिल्म या कलाकार को ऑस्कर अवार्ड मिल जाए, वह सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है! लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर पहली बार ऑस्कर अवार्ड किसे मिला था? तो आज हम आपको इसी इतिहास के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं! आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिल्मी जगत की बात करें, तो इससे जुड़े हर व्यक्ति का सपना होता है कि वह अपने जीवन में एक बार ऑस्कर से जरूर नवाजा जाए और इसके लिए वे दिन-रात मेहनत करते हैं और इसी का नतीजा है कि आज हमारे पास कई बेहतरीन फिल्में हैं, जो न केवल हमारा मनोरंजन करती हैं बल्कि, कई बार हमारे मन को टटोलने पर भी हमें मजबूर करती हैं। ऑस्कर अवॉर्ड, जिसे ‘एकेडमी अवॉर्ड ऑफ मेरिट’ या ‘अकादमी अवॉर्ड’ के नाम से भी जाना जाता है, सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों में से एक है। ऑस्कर अवॉर्ड का आयोजन हर साल किया जाता है, जिसमें फिल्मी जगत के दिग्गज निर्देशकों, निर्माताओं, फिल्मों और कलाकारों को सम्मान पुरस्कार से नवाजा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी। बता दें कि अभी के समय का ऑस्कर अवॉर्ड समारोह अगर आपने देखा हो, तो दुनियाभर के फिल्मी जगत के सितारों से चमकती रात सिर्फ डोलबी हॉल तक सीमित नहीं रहती बल्कि इसके बाहर मीडिया और फैन्स का तांता लगा रहता है। लेकिन पहला ऑस्कर अवॉर्ड सम्मारोह ऐसा बिल्कुल नहीं था। ऑस्कर अवॉर्ड्स सबसे पहली बार 16 मई 1929 में आयोजित किया गया था, इसमें दिए गए अवॉर्ड्स भी काफी कम संख्या में थे। इस समारोह में 12 अवॉर्ड्स दिए गए थे और हर अवॉर्ड केटेगरी के नॉमिनीज के सर्टिफिकेट दिए गए थे। इतना ही नहीं, इसकी एक खास बात यह भी थी, कि ऑस्कर के विजेताओं के नाम समारोह के आयोजन से तीन महीने पहले ही कर दिया गया था।जिसमें मात्र 270 लोग शरीक हुए थे। इसका आयोजन हॉलीवुड रूजवेल्ट होटल, के बलॉसम रूम में किया गया था और इसमें शामिल होने के लिए मात्र 5 डॉलर की टिकट लगी थी। इस समारोह को डगलस फेयरबैंक्स ने होस्ट किया था।

आज का ऑस्कर अवॉर्ड समारोह घंटों चलने वाला एक पब्लिक अफेयर है, जिसमें दुनियाभर के दिग्गज कलाकार और फिल्म निर्देशक आदि सम्मिलित होते हैं। लेकिन जब ऑस्कर अवॉर्ड्स का सबसे पहली बार आयोजन किया गया था, तब वह सिर्फ 15 मिनट का आयोजन था। इसमें दिए गए अवॉर्ड्स भी काफी कम संख्या में थे। इस समारोह में 12 अवॉर्ड्स दिए गए थे और हर अवॉर्ड केटेगरी के नॉमिनीज के सर्टिफिकेट दिए गए थे। इतना ही नहीं, इसकी एक खास बात यह भी थी, कि ऑस्कर के विजेताओं के नाम समारोह के आयोजन से तीन महीने पहले ही कर दिया गया था।

सबसे पहला ऑस्कर अवॉर्ड एमिल जैनिंग्स, एक जर्मन एक्टर, को, बेस्ट एक्टर के लिए मिला था। इन्हें इनकी फिल्में ‘द वे ऑफ ऑल फ्लेश’ और ‘द लास्ट कमांड’ के लिए अवॉर्ड मिला था। इनकी ये फिल्में हॉलीवुड की थीं, लेकिन इसके बाद उन्होंने फिर से जर्मन सिनेमा की ओर रुख कर लिया था। सबसे पहला ऑस्कर अवॉर्ड, बेस्ट एक्ट्रेस के लिए जेनेट गेनोर को मिला था। इन्हें इनकी फिल्में 7th हेवन, स्ट्रीट एंजल और सनराइज में उनके परफॉर्मेन्स के लिए सम्मानित किया गया था। बता दें कि वह अपने जीवन में एक बार ऑस्कर से जरूर नवाजा जाए और इसके लिए वे दिन-रात मेहनत करते हैं और इसी का नतीजा है कि आज हमारे पास कई बेहतरीन फिल्में हैं, जो न केवल हमारा मनोरंजन करती हैं बल्कि, कई बार हमारे मन को टटोलने पर भी हमें मजबूर करती हैं। साथ ही, बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड ‘विंग्स’ को मिला था। बता दें कि ऑस्कर अवॉर्ड, जिसे ‘एकेडमी अवॉर्ड ऑफ मेरिट’ या ‘अकादमी अवॉर्ड’ के नाम से भी जाना जाता है, सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों में से एक है। ऑस्कर अवॉर्ड का आयोजन हर साल किया जाता है, जिसमें फिल्मी जगत के दिग्गज निर्देशकों, निर्माताओं, फिल्मों और कलाकारों को सम्मान पुरस्कार से नवाजा जाता है। तो यह है फिल्मी जगत के सबसे बड़े अवॉर्ड, ऑस्कर अवार्ड की कहानी! आपको ऑस्कर अवार्ड की इस कहानी के बारे में जानकर कैसा लगा अपना जवाब जरूर दीजिएगा! ऑस्कर अवार्ड जो की फिल्मी जगत का एक सबसे बड़ा अवार्ड है, आज हमने आपको उसकी पूरी गाथा सुनाई! 

क्या विदेश नीति में हार चुका है पाकिस्तान?

पाकिस्तान अब विदेश नीति में पूरी तरह से हार चुका है! भारत की नफरत में पाकिस्तान ने जिस आतंकवाद को बनाया आज वही उसके गले की हड्डी बन गया है। यही वजह है कि पाकिस्तान के उसके सभी पड़ोसियों से संबंध खराब है। पाकिस्तान के वैसे तो तीन पड़ोसी हैं। लेकिन पीओके पर कब्जे से उसकी सीमा चीन से लगती है, जिससे उसके चार पड़ोसी हो जाते हैं। भारत से तनाव तो पाकिस्तान के बनने के बाद से ही है। लेकिन इतिहास में पहली बार पाकिस्तान के संबंध किसी भी पड़ोसी से अच्छे नहीं कहे जा सकते। संघर्ष और टकराव पाकिस्तान के लिए गंभीर चुनौती है। इसे लेकर हाल ही में सीनेट रक्षा समिति के अध्यक्ष मुशाहिद हुसैन ने द ट्रिब्यून एक्सप्रेस में एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने सभी पड़ोसियों के साथ खराब रिश्तों का जिक्र किया और सुधारने के तरीके बताए। इसके अलावा कहा कि रणनीतिक स्पष्टता की कमी और आंतरिक कलह और अंतहीन राजनीतिक अस्थिरता के साथ, 2017-2024 के दौरान पिछले 7 वर्षों में पाकिस्तान को 7 प्रधानमंत्री मिल चुके हैं। पड़ोसी देशों को लेकर आखिर पाकिस्तान की रूपरेखा क्या होगी? भारत के अफगानिस्तान और ईरान से बढ़ते संबंधों को लेकर उन्होंने चिंता जताई और कहा कि वह रणनीतिक पहुंच विकसित करने में पाकिस्तान से आगे निकल रहा है। बता दें किहुसैन ने कहा कि अब चीन और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चल रहा है। इसने और भी आक्रामक रूप ले लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि पाकिस्तान के साथ अमेरिका सुरक्षा सहयोग फिर से शुरू करना चाहता है।

वह ड्रोन बेस, खुफिया उपस्थिति बढ़ाने और एयर लाइन्स ऑफ कम्युनिकेशंस तक पहुंच की तलाश में है। अपने लेख में उन्होंने आगे कहा कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की ‘नकल’ के तौर पर जी-20 में भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर को बनाने की कोशिश हुई,चीन ने अफगान तालिबान शासन को मान्यता दे दी है और वह उसके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में लगा है। चीन अब अफगानिस्तान में निवेश भी कर रहा है। अकेले खनन में निवेश 4.5 अरब डॉलर होने जा रहा है। इसके विपरीत पाकिस्तान ने अफगान तालिबान से संबंध शत्रुतापूर्ण बनाए हुए हैं। यह पश्चिमी दृष्टिकोण को दिखाता है। जो अब शुक्र है कि गाजा के मलबे में दब गया। उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तान आज के समय अंदरूनी विद्रोहियों से भी परेशान है। भारत ने हाल ही में ईरान के चाहबार बंदरगाह को लेकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है, जो पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के करीब है। साथ ही तालिबान शासन ने चाबहार बंदरगाह में 35 मिलियन डॉलर का निवेश करके अपना पहला बड़ा विदेशी निवेश किया है।

हुसैन ने आगे कहा कि पाकिस्तान का पिछले पांच वर्षों में तीन पड़ोसियों से सैन्य झड़पें हुई हैं। भारत के अलावा अब अफगानिस्तान और ईरान के साथ भी सीमा पर झड़प हुई। यह झड़प तब हुई जब पाकिस्तान ने तीनों देशों की सीमा पर इलेक्ट्रिक बाड़ लगाई हुई है। तीसरे नंबर पर हुसैन ने बताया कि 50 वर्षों में पहली बार पाकिस्तान और चीन के बीच रणनीतिक क्षेत्रीय मुद्दे पर मतभेद देखा गया। चीन ने अफगान तालिबान शासन को मान्यता दे दी है और वह उसके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में लगा है। चीन अब अफगानिस्तान में निवेश भी कर रहा है। अकेले खनन में निवेश 4.5 अरब डॉलर होने जा रहा है। इसके विपरीत पाकिस्तान ने अफगान तालिबान से संबंध शत्रुतापूर्ण बनाए हुए हैं। यह पश्चिमी दृष्टिकोण को दिखाता है।

हुसैन ने कहा कि अब चीन और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चल रहा है। इसने और भी आक्रामक रूप ले लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि पाकिस्तान के साथ अमेरिका सुरक्षा सहयोग फिर से शुरू करना चाहता है। उन्होंने सभी पड़ोसियों के साथ खराब रिश्तों का जिक्र किया और सुधारने के तरीके बताए। इसके अलावा कहा कि रणनीतिक स्पष्टता की कमी और आंतरिक कलह और अंतहीन राजनीतिक अस्थिरता के साथ, 2017-2024 के दौरान पिछले 7 वर्षों में पाकिस्तान को 7 प्रधानमंत्री मिल चुके हैं।वह ड्रोन बेस, खुफिया उपस्थिति बढ़ाने और एयर लाइन्स ऑफ कम्युनिकेशंस तक पहुंच की तलाश में है। अपने लेख में उन्होंने आगे कहा कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की ‘नकल’ के तौर पर जी-20 में भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर को बनाने की कोशिश हुई, जो अब शुक्र है कि गाजा के मलबे में दब गया। उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तान आज के समय अंदरूनी विद्रोहियों से भी परेशान है।

क्या भारत और ईरान के संबंधों के बीच आया है अमेरिका?

हमेशा से अमेरिका भारत और ईरान के संबंधों के बीच आया ही है! ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का रविवार को हेलीकॉप्टर हादसे में निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुख प्रकट किया। इसके अलावा भारत में मंगलवार को एक दिनों का राजकीय शोक रहा। ये दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंधों को दिखाता है। लेकिन ईरान के साथ संबंध हमेशा से इतने अच्छे नहीं रहे हैं। दोनों देशों के बीच के संबंध कई बार पश्चिम के दवाब के कारण भी खराब होते रहे हैं। साल 1950 में भारत और ईरान के राजनयिक संबंध स्थापित हुए। दशकों से दोनों देशों ने तेल पर आधारित घनिष्ठ आर्थिक और राजनीतिक संबंध बनाए हैं, जो आतंकवाद और पाकिस्तान पर साझा दृष्टिकोण है। लेकिन यह समझने के लिए कि आखिर दोनों के संबंधों में गलत क्या हुआ, हमें 2003 में हुए घटनाक्रमों को समझना पड़ेगा। साल 2003 में भारत और ईरान ने राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी की भारत यात्रा के दौरान दिल्ली घोषणा पर हस्ताक्षर हुए। बता दें कि जिसके दौरान तेहरान ने भारत को तेल की बिक्री बंद करने की धमकी दी। साल 2012 में यह समस्या गंभीर हो गई। अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंध ईरान पर और भी सख्त हो गए। मई 2012 में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भारत की यात्रा के दौरान ईरान से तेल आयात में कटौती करने को कहा। 2013 में आयात में 15 फीसदी कटौती हुई। इसके मुताबिक दोनों पक्ष व्यापार को बढ़ावा देने के लिए चाबहार बंदरगाह का विकास करेंगे। रक्षा सहयोग करेंगे और ईरान में निवेश के जरिए ऊर्जा संबंध गहरे होने पर ध्यान दें। लेकिन यह प्लान पटरी से उतर गया। इसका कारण ईरान का परमाणु हथियार कार्यक्रम था, जो 1990 के दशक के अंत में शुरू हुआ था।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने पश्चिमी देशों और अमेरिका का ध्यान अपनी ओर खींचा, जो परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने में लगे थे। साल 2004 में ईरान ने परमाणु गतिविधि को कम करने और पश्चिम के साथ तनाव कम करने के लिए एक समझौता किया। हालांकि 2005 में पश्चिम की ओर से ही बातचीत को खत्म कर दी गई, क्योंकि ईरान को अपनी एक फैसिलिटी में यूरेनियम बनाते हुए पाया गया था। अमेरिका ने प्रतिबंध भी लगाए। इससे साफ था कि ईरान के साथ भारत के संबंध मुश्किल में पड़ गए।

भारत के लिए यह एक संकट का समय था। क्योंकि वह ईरान के साथ संबंधों को गहरा बनाने में लगा था। वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील पर भी बातचीत कर रहा था। सितंबर 2005 में विदेश मंत्री ईरान की यात्रा पर गए। अमेरिकी अधिकारियों ने भारत को चेतावनी दी कि सिविल न्यूक्लियर डील को कांग्रेस अस्वीकार कर सकती है। इसके बाद भारत ने 2005 और 2006 में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में ईरान के खिलाफ मदतान किया। भारत के लिए सिविल न्यूक्लियर डील ईरान की दोस्ती से ज्यादा महत्वपूर्ण थी। स्ट्रैटेजिक और रक्षा साझेदारी से जुड़ी समस्याओं के बावजूद भारत ने ईरान से अरबों डॉलर का तेल आयात किया।

अमेरिकी दबाव के बाद 2010 में ऊर्जा संबंधों पर असर पड़ा। ईरान को भारत तब तेल की पेमेंट नहीं कर पाया, जिसके दौरान तेहरान ने भारत को तेल की बिक्री बंद करने की धमकी दी। साल 2012 में यह समस्या गंभीर हो गई। अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंध ईरान पर और भी सख्त हो गए। मई 2012 में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भारत की यात्रा के दौरान ईरान से तेल आयात में कटौती करने को कहा। हथियारों के प्रसार को रोकने में लगे थे। साल 2004 में ईरान ने परमाणु गतिविधि को कम करने और पश्चिम के साथ तनाव कम करने के लिए एक समझौता किया। हालांकि 2005 में पश्चिम की ओर से ही बातचीत को खत्म कर दी गई, क्योंकि ईरान को अपनी एक फैसिलिटी में यूरेनियम बनाते हुए पाया गया था। अमेरिका ने प्रतिबंध भी लगाए।2013 में आयात में 15 फीसदी कटौती हुई। अगले कई वर्षों तक आई समस्याओं के बाद भी भारत ईरान के संबंध नहीं टूटे। साल 2023 में भारत ने एससीओ में ईरान की एंट्री को मंजूरी दी।इसके विपरीत, नई दिल्ली ने परंपरागत रूप से अपने गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण के माध्यम से अपनी स्वतंत्रता की रक्षा की है। दृष्टिकोण में यह अंतर खेल की गतिशीलता की अधिक परिष्कृत समझ की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत और अमेरिका इस बात पर सहमत हुए हैं कि उनका सहयोग ‘वैश्विक भलाई’ के लिए होगा। इतना ही नहीं हाल ही में चाबहार बंदरगाह को लेकर एक बड़ी डील भी की, जिसपर अमेरिका प्रतिबंधों की धमकी दे चुका है।

आखिर भारत अमेरिका के साथ दोस्ती कैसे बना पाएगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत अब अमेरिका के साथ दोस्ती कैसे बना पाएगा! कोई देश अपना भूगोल या अपने पड़ोसियों और उनसे जुड़ी बाधाओं को नहीं चुन सकता। भारत की 15,200 किमी लंबी भूमि सीमा इसकी 7,500 किमी लंबी तटरेखा से दोगुनी है। भौगोलिक और भू-राजनीतिक कारक यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत का मात्रा के हिसाब से 90% और मूल्य के हिसाब से 70% व्यापार समुद्र के माध्यम से होता है। इसलिए, भारत के लिए व्यापार के समुद्री मार्ग एक प्रमुख चिंता का विषय रहे हैं। अफगानिस्तान और मध्य एशिया और उससे आगे यूरेशियाई भूभाग से जुड़ने में जमीनी व्यापार और आवाजाही की बाधाएं विशेष रूप से परेशानी वाली रही हैं। भारत ने इन बाधाओं को दूर करने के लिए अपने पूर्व और पश्चिम में मल्टी-मॉडल परिवहन गलियारों का समर्थन किया है। म्यांमार में सिटवे बंदरगाह और ईरान में चाबहार में निवेश इस रणनीति के दो उदाहरण हैं। सितवे कलादान मल्टी-मॉडल परियोजना का एक हिस्सा है जबकि चाबहार अफगानिस्तान में बने जरांज डेलाराम राजमार्ग से जुड़ा था। भारत अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कई यूरोपीय देशों के साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आईएमईसी गलियारे पर भी काम कर रहा है। जबकि अमेरिका की वापसी के साथ अफगानिस्तान और मध्य एशिया में स्थिति बदल गई है। भारत के भूगोल की वास्तविकताएं सामने हैं। इसी संदर्भ में इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड आईपीजीएल और ईरान के पोर्ट एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन पीएमओ के बीच समझौते को देखने की जरूरत है। हालांकि, चाबहार समझौते पर हस्ताक्षर होने के कुछ ही घंटों के भीतर, अमेरिका ने प्रतिबंधों के संभावित जोखिम का हवाला देते हुए ईरान के साथ व्यापार में शामिल होने के प्रति आगाह किया। इस बयान से अमेरिका-भारत संबंधों में तनाव की अटकलें शुरू हो गईं। इन बयानों को उचित परिप्रेक्ष्य में रखा जाना चाहिए।

पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका संबंध काफी परिपक्व हुए हैं। इस परिवर्तन को विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र में बढ़े हुए रणनीतिक सहयोग द्वारा चिह्नित किया गया है। फरवरी में एमक्यू-9बी सशस्त्र ड्रोन खरीदने के लिए 4 अरब डॉलर का समझौता इस श्रृंखला में बिल्कुल नया है। इसमें वर्ष 2000 के बाद से रक्षा व्यापार में 20 अरब डॉलर का उछाल देखा गया है। यह तब है जब दोनों के बीच रक्षा व्यापार ना के बराबर था। इस संबंध में कुछ प्रमुख विकासों में महत्वपूर्ण और उभरती टेक्नोलॉजी पर भारत-अमेरिका पहल (आईसीईटी), बाहरी अंतरिक्ष में आर्टेमिस समझौते में भारत का शामिल होना, सेमीकंडक्टर में सहयोग, लड़ाकू विमान इंजनों में सहयोग और हिंद महासागर में संचार की समुद्री लाइनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहयोग शामिल हैं। इसके अलावा, दोनों देशों ने जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद विरोधी जैसे वैश्विक मुद्दों पर एकजुट मोर्चा दिखाया है। उच्च-स्तरीय राजनयिक व्यस्तताओं ने इस साझेदारी को और मजबूत किया है, जिससे यह 21वीं सदी में सबसे परिणामी रिश्तों में से एक बन गया है।

भारत-अमेरिका संबंध कितने आगे बढ़ चुके हैं इसका एक उपाय भारत और अमेरिका को ‘विश्वसनीय टेक्नोलॉजी पार्टनर’ के रूप में स्थापित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप का अनावरण है। यह समझ नियामक बाधाओं और निर्यात नियंत्रणों को दूर करने के लिए एक रूपरेखा को संस्थागत बनाती है, विशेष रूप से अमेरिकी पक्ष पर। इस समझ की प्राप्ति को भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है जो लगभग 25 वर्षों से प्रगति पथ पर है। यह स्वाभाविक है कि कुछ मुद्दों पर दो देशों में असहमति होगी। लेकिन भारत और अमेरिका के एक-दूसरे से बात करने के दिन अब पीछे रह गए हैं। संबंधों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, जब चिड़चिड़ाहट पैदा होती है, तो दोनों पक्ष चर्चा करने और उन्हें हल करने के लिए बैठते हैं। उदाहरण के लिए, जब भारत ने वाशिंगटन की आपत्तियों के बावजूद मास्को से तेल आयात करने का निर्णय लिया, तो भारत वैश्विक तेल बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए इस निर्णय की आवश्यकता को समझाने में सक्षम था। इस व्यावहारिक दृष्टिकोण से अमेरिका को भारत की स्थिति समझने में मदद मिली। इसी तरह, चाबहार सौदा सिर्फ भारत के हितों के बारे में नहीं है बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और कनेक्टिविटी के बारे में भी है जिसे अमेरिका महत्व देता है।

भारत और अमेरिका का इतिहास विशिष्ट रूप से अनोखा है और परिणामस्वरूप, अन्य देशों के साथ जुड़ने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। वाशिंगटन दशकों से संधि-आधारित गठबंधन भागीदारों के साथ व्यवहार करता रहा है। इसके विपरीत, नई दिल्ली ने परंपरागत रूप से अपने गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण के माध्यम से अपनी स्वतंत्रता की रक्षा की है। दृष्टिकोण में यह अंतर खेल की गतिशीलता की अधिक परिष्कृत समझ की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत और अमेरिका इस बात पर सहमत हुए हैं कि उनका सहयोग ‘वैश्विक भलाई’ के लिए होगा। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि अमेरिका यह समझे कि ईरान के साथ भारत का समझौता समृद्धि लाने के लिए एक कनेक्टिविटी प्रयास है। यह वाशिंगटन के नियम-आधारित विश्व व्यवस्था के दृष्टिकोण के अनुरूप, व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए फायदेमंद है। अमेरिका ने पहले भी भारत के साथ अपने व्यवहार में लचीलापन और परिपक्वता दिखाई है – नई दिल्ली को उम्मीद है कि इससे रिश्ते आगे बढ़ेंगे।

क्या अब बंद होने वाली है अग्निपथ स्कीम?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब अग्निपथ स्कीम बंद होने वाली है या नहीं! अग्निपथ स्कीम को लेकर विपक्षी पार्टियों की ओर से लगातार उठाए जा रहे सवाल पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने करारा जवाबदिया है। उन्होंने कहा, ‘मुझे पूरा विश्वास है कि अग्निपथ योजना सफल है और आगे भी सफल रहेगी। इस योजना को शुरू करने के पीछे एक कारण सशस्त्र बलों में बड़ी संख्या में युवाओं को लाना है। एनडीटीवी से खास बातचीत में राजनाथ सिंह ने कहा कि विपक्ष को अग्निवीरों के लिए अग्निपथ योजना पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने विपक्ष के इस आरोप को खारिज कर दिया कि अग्निपथ योजना उपयोगी नहीं है। इस पर राजनाथ सिंह ने कहा कि मैं युवाओं को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हम किसी को भी उनके भविष्य के साथ खेलने की इजाजत नहीं देंगे। अग्निवीर 18 वर्ष की आयु से इसके लिए योग्य हैं और चार वर्षों तक पात्र रहेंगे। वे नए कौशल सीखेंगे, और चार साल के अंत में उनके पास कुछ लाख रुपये होंगे।उन्होंने सरकार के इस रुख पर जोर दिया कि चार वर्षीय इस भर्ती कार्यक्रम से युवा, रोजगार योग्य आबादी के एक बड़े हिस्से को फायदा होगा। पूरा विश्वास है कि अग्निपथ योजना सफल है और आगे भी सफल रहेगी। अग्निपथ योजना के तहत, चुने हुए कैंडिडेट्स को चार साल के लिए अग्निवीर के रूप में नामांकित किया जाता है। सरकार के अनुसार, कार्यक्रम पूरा होने पर अग्निवीर अनुशासित, डायनामिक, प्रेरित और कुशल कार्यबल के रूप में समाज में लौटेंगे और अपनी पसंद की नौकरी में अपना करियर बनाने के लिए अन्य क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त करेंगे। राजनाथ सिंह ने आगे कहा, ‘इस योजना का दूसरा पहलू यह है कि हमें आबादी के एक हिस्से को अग्निवीर के रूप में अनुशासित करने का प्रयास करना चाहिए। जब जरूरत होगी, तो उनके पास फ्रंट लाइन पर मदद के लिए सही स्किल होगी। अग्निवीरों को अनुशासित करने के लिए तैयार करना कोई अपराध नहीं है।

विपक्ष के इस आरोप पर कि अग्निपथ योजना उन युवाओं के भविष्य को नुकसान पहुंचाएगी जो अभी वर्कफोर्स में एंट्री कर रहे हैं। हमारी सरकार किसी को भी हमारी युवा आबादी के भविष्य के साथ खेलने की अनुमति नहीं देगी। राजनाथ सिंह ने इसके साथ ही पर विपक्षी पार्टियों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष का केवल एक ही एजेंडा है- नागरिकों को भ्रमित करना। सरकार के इस रुख पर जोर दिया कि चार वर्षीय इस भर्ती कार्यक्रम से युवा, रोजगार योग्य आबादी के एक बड़े हिस्से को फायदा होगा। पूरा विश्वास है कि अग्निपथ योजना सफल है और आगे भी सफल रहेगी। अग्निपथ योजना के तहत, चुने हुए कैंडिडेट्स को चार साल के लिए अग्निवीर के रूप में नामांकित किया जाता है।उन्हें अग्निवीरों और सेना पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।इस पर राजनाथ सिंह ने कहा कि मैं युवाओं को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हम किसी को भी उनके भविष्य के साथ खेलने की इजाजत नहीं देंगे। अग्निवीर 18 वर्ष की आयु से इसके लिए योग्य हैं और चार वर्षों तक पात्र रहेंगे। वे नए कौशल सीखेंगे, और चार साल के अंत में उनके पास कुछ लाख रुपये होंगे।

राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर उनमें से कोई नौकरी पाना चाहता है, तो वह पा सकता है। अगर उनमें से कोई अर्धसैनिक बलों में शामिल होना चाहता है, तो वह जा सकता है। अगर वे सर्विस में जाना चाहते हैं, तो बेशक वे जा सकते हैं। हमने उनके लिए आरक्षण भी रखा है। ऐसा नहीं है कि कोई भी उन्हें अनदेखा कर सकता है। प्राइवेट सेक्टर भी अग्निवीरों को काम पर रखना चाहता है। बता दें कि आरोप को खारिज कर दिया कि अग्निपथ योजना उपयोगी नहीं है। उन्होंने सरकार के इस रुख पर जोर दिया कि चार वर्षीय इस भर्ती कार्यक्रम से युवा, रोजगार योग्य आबादी के एक बड़े हिस्से को फायदा होगा। पूरा विश्वास है कि अग्निपथ योजना सफल है और आगे भी सफल रहेगी। अग्निपथ योजना के तहत, चुने हुए कैंडिडेट्स को चार साल के लिए अग्निवीर के रूप में नामांकित किया जाता है। हमारी सरकार किसी को भी हमारी युवा आबादी के भविष्य के साथ खेलने की अनुमति नहीं देगी। राजनाथ सिंह ने इसके साथ ही पर विपक्षी पार्टियों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष का केवल एक ही एजेंडा है- नागरिकों को भ्रमित करना। उन्हें अग्निवीरों और सेना पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

आखिर कब लागू होगा UCC और वन नेशन वन इलेक्शन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर UCC और वन नेशन वन इलेक्शन कब लागू होगा! केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ और समान नागरिक संहिता यूसीसी पर बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि अगले टर्म में इसे लागू किया जाएगा। यही नहीं उन्होंने ये भी कहा कि मुस्लिम आरक्षण का विरोध और यूसीसी की बात करना धर्म आधारित प्रचार है तो हम करते रहेंगे। उन्होंने विपक्ष की ओर से निर्वाचन आयोग की आलोचना को अपनी होने वाली शिक्सत को छिपाने की चाल है। उन्होंने ये बातें एक इंटरव्यू में कही हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिल रहे ‘सकारात्मक जनादेश’ की बदौलत ही बीजेपी को विपक्ष शासित राज्यों में बड़ी जीत मिलेगी। अमित शाह ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि उनकी पार्टी ने किसी भी प्रकार का धर्म आधारित कोई प्रचार अभियान नहीं चलाया है। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुसलमानों के आरक्षण के खिलाफ प्रचार करना और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के लिए मतदाताओं तक पहुंचना अगर धर्म आधारित चुनाव अभियान है तो बीजेपी ने यह किया है और आगे भी करती रहेगी। इस दौरान अमित शाह ने दो टूक कहा कि अगले टर्न यानी पांच साल के अंदर देशभर में यूसीसी लागू होगा। ‘एक देश-एक चुनाव’ को लेकर भी ऐसा ही दावा किया।

अमित शाह ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और मतदान के आंकड़ों जैसे मुद्दों पर विपक्ष की ओर से निर्वाचन आयोग की आलोचना को खारिज किया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश सहित पिछले विधानसभा चुनावों में इसी तरह के प्रोटोकॉल और प्रैक्टिस का पालन किया गया था और इन चुनावों में बीजेपी हार गई थी। शाह ने कहा, ‘अगर वे चुनाव निष्पक्ष थे तो यह चुनाव भी निष्पक्ष हैं। जब आप हार देखते हैं तो आप पहले ही रोना शुरू कर देते हो और विदेश जाने के बहाने ढूंढते हो। यह और आगे नहीं चल सकता। इनको 6 तारीख को छुट्टी पर जाना है तो कुछ ना कुछ तो बोलना पड़ेगा।’

अमित शाह ने आगे कहा कि चुनाव प्रक्रिया के बारे में कांग्रेस के सवाल उठाने का उद्देश्य राहुल गांधी की विफलता को ढंकना है। चुनाव से पहले आयोग की ओर से बुलाई गई पारंपरिक सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दल ने ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया था। जब भी विपक्ष चुनाव हारता है तो ईवीएम पर सवाल उठाता है। ईवीएम में धांधली की जीरो संभावना है और वह ऐसा चुनाव चाहते हैं जिसमें धांधली हो सके। अबकी बार, 400 पार’ के नारे में कोई रणनीति होने के बारे में पूछे जाने पर बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार ने रिएक्ट किया। चुनाव के छह चरण पूरे होने के बाद कहा कि यह दावा महज चुनावी नारा नहीं है बल्कि एक सुविचारित लक्ष्य है। हम निश्चित रूप से 400 सीटों का आंकड़ा पार करेंगे। हम ओडिशा, आंध्र प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में भी सरकार बनाएंगे। इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव के साथ ही हुए हैं।

अमित शाह ने आगे कहा कि अब हमें 399 सीट आएं और आप कहो कि 400 तो नहीं हुआ तो यह आपकी समझ का सवाल है। मगर हमने 400 पार हिसाब किताब करके बोला है और यह सुविचारित राय से किया गया है। यह पूछे जाने पर कि क्या पार्टी मोदी पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है और क्या विपक्ष के अपेक्षाकृत कमजोर होने के कारण उसके गठबंधन को फायदा हो रहा है? इस पर पूर्व बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि यह नकारात्मक नहीं बल्कि सकारात्मक वोट है जो सत्तारूढ़ गठबंधन को मिल रहा है। पीएम मोदी ने बीजेपी की विचारधारा को जमीन पर उतारा। जैसे अंत्योदय, गरीब कल्याण। यह हमारी विचारधारा है।

अमित शाह ने कहा कि आर्टिकल 370 को समाप्त करना, देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करना, महिला आरक्षण या राम मंदिर निर्माण हमारी विचारधारा है। पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर हमारा है और इसका हमने संकल्प लिया है तो पीएम मोदी ने बीजेपी की विचारधारा को जमीन पर उतारा है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता स्वाभाविक रूप से बीजेपी मजबूत बनती है। पीएम मोदी हमारे सबसे बड़े नेता हैं और यह कोई नकारात्मक वोट नहीं है। यह बात मानकर चलिए यह सकारात्मक वोट है। जहां हम सरकार में है वहां भी हमें जनादेश मिलने वाला है और जहां नहीं है वहां बड़ा जनादेश मिलने जा रहा है। ये एक प्रकार से केंद्र सरकार के कामों का सकारात्मक जनादेश है।

मोदी के खिलाफ कांग्रेस के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आपने राहुल गांधी का एक्स-रे वाला भाषण सुना और समझा होगा। तो आप किसका एक्स-रे चाहते हैं? और अगर आप इसे समान रूप से वितरित करना चाहते हैं तो आप किसे वितरित करेंगे? मनमोहन सिंह ने कहा था कि अल्पसंख्यक उनकी प्राथमिकता हैं। क्या मतलब होता है इसका? गरीब परिवार की महिलाओं को एक लाख रुपये देने के कांग्रेस के वादे के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कांग्रेस का सत्ता में आने के लिए लोकलुभावन वादे करने का इतिहास रहा है। हालांकि उसने कभी भी वादों को पूरा नहीं किया।

बंगाल में आए रेमल चक्रवात का कितना होगा असर ?

आज हम आपको बताएंगे कि बंगाल में आए रेमल चक्रवात का कितना असर होगा! चक्रवाती तूफान ‘रेमल’ ने और प्रचंड रूप अख्तियार कर लिया है। इसके आज आधी रात तक बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल के समुद्री तटों से टकराने का अनुमान है। मौसम विभाग ने इस संबंध में अलर्ट जारी करते हुए कहा कि ‘रेमल’ के तटों पर पहुंचते ही 110 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलेंगी। उनकी रफ्तार 135 किलोमीटर प्रति घंटे तक होगी। चक्रवात के कारण पश्चिम बंगाल के तटीय जिलों में अत्यधिक भारी बारिश और कोलकाता समेत आसपास के क्षेत्रों में जोरदार बारिश का अनुमान है। वहीं चक्रवाती तूफान ‘रेमल’ को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उच्च स्तरीय बैठक की है। पीएम मोदी ने इस बैठक में अधिकारियों से चक्रवात ‘रेमल’ से निपटने को लेकर की जा रही तैयारियों और प्रयासों की समीक्षा की। मौसम विभाग के मुताबिक, ‘रेमल’ उत्तर दिशा की ओर बढ़ रहा है। ये रविवार आधी रात तक मोंगला बंदरगाह के दक्षिण-पश्चिम में सागर द्वीप (पश्चिम बंगाल) और खेपुपारा (बांग्लादेश) के बीच तटों से टकराएगा।पूर्व मेदिनीपुर जिलों में अत्यधिक भारी बारिश की आशंका के कारण इन क्षेत्रों के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया गया है। नादिया और मुर्शिदाबाद जिलों में भी 27-28 मई को भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। कोलकाता में मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वी क्षेत्र के प्रमुख सोमनाथ दत्ता ने कहा कि दक्षिण बंगाल के कई जिलों में आज 45 से 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलेंगी। इस साइक्लॉन से कोलकाता, हावड़ा, हुगली और पूर्व मेदिनीपुर प्रभावित होंगे।

सोमनाथ दत्ता ने कहा कि ‘रेमल’ बंगाल के कुछ हिस्सों में नुकसान पहुंचाएगा, लेकिन इसके 2020 में आए चक्रवात ‘अम्फान’ के मुकाबले कम विनाशकारी रहने की संभावना है। चक्रवात को देखते हुए पूर्वी और दक्षिण पूर्वी रेलवे ने एहतियात के तौर पर दक्षिण और उत्तर 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर जिले के तटीय जिलों में कई ट्रेन सेवाएं रद्द कर दी हैं। उधर, कोलकाता हवाई अड्डे के अधिकारियों ने चक्रवात ‘रेमल’ के संभावित प्रभाव की वजह से रविवार दोपहर से 21 घंटे के लिए उड़ान संचालन सस्पेंड करने का फैसला किया है। इंडियन एयरपोर्ट अथॉरिटी के एक प्रवक्ता ने कहा कि उड़ान निलंबन अवधि के दौरान अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों क्षेत्रों में आने-जाने वाली कुल 394 फ्लाइट का एयरपोर्ट से संचालन नहीं होगा। भारतीय तट रक्षक बल आईसीजी के अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए सभी एहतियाती कदम उठाए हैं कि समुद्र में जान-माल का कोई नुकसान न हो।

रेमल’ मॉनसून से पहले बंगाल की खाड़ी में आने वाला पहला चक्रवात है। मौसम विभाग ने इस बीच पश्चिम बंगाल और उत्तरी ओडिशा के तटीय जिलों में 26 और 27 मई को बहुत भारी वर्षा होने का अल्रट जारी किया है। असम और मेघालय में भी अत्यधिक भारी बारिश होने की आशंका है। मणिपुर, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में 27-28 मई को बहुत भारी बारिश के आसार हैं। चक्रवात के पश्चिम बंगाल के तटीय इलाकों में पहुंचने पर 1.5 मीटर ऊंची तूफानी लहरें उठने की आशंका है। इससे निचले इलाकों में पानी भरने की भी संभावना जताई गई है। मौसम कार्यालय ने मछुआरों को सोमवार सुबह तक उत्तरी बंगाल की खाड़ी में समुद्र में न जाने की सलाह दी है। उत्तर और दक्षिण 24 परगना, पूर्व मेदिनीपुर, कोलकाता, हावड़ा और हुगली जिलों में भारी से बहुत भारी बारिश होने का अनुमान जताया गया है। उत्तर और दक्षिण 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर जिलों में अत्यधिक भारी बारिश की आशंका के कारण इन क्षेत्रों के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया गया है। नादिया और मुर्शिदाबाद जिलों में भी 27-28 मई को भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है।

रेमल’ चक्रवात के मद्देनजर कोलकाता पुलिस मुख्यालय में एक नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है। कोलकाता पुलिस की 10 टीम शहर के 10 पुलिस प्रभागों में तैनात की गई हैं। एनडीआरएफ के दल भी उन जिलों में जा रहे हैं जिनके चक्रवाती तूफान से प्रभावित होने की आशंका है। उड़ान संचालन सस्पेंड करने का फैसला किया है। इंडियन एयरपोर्ट अथॉरिटी के एक प्रवक्ता ने कहा कि उड़ान निलंबन अवधि के दौरान अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों क्षेत्रों में आने-जाने वाली कुल 394 फ्लाइट का एयरपोर्ट से संचालन नहीं होगा।चक्रवात से सुंदरबन मैंग्रोव वन के भी प्रभावित होने की आशंका है। सुंदरबन दुनिया के सबसे बड़े वनों में से एक है और अपने विविध जीव-जंतुओं के लिए जाना जाता है जिनमें पक्षियों की 260 प्रजातियां, बंगाल टाइगर और एस्टुरीन, खारे पानी के मगरमच्छ एवं भारतीय अजगर जैसी अन्य संकटग्रस्त प्रजातियां शामिल हैं।

फुटबॉल के बाद क्रिकेट के मैदान में अजय, किससे खेलेंगे?

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‘मैदान’ में सुर्खियां बटोरने के बाद अजय देवगन एक बार फिर बायोपिक में वापसी कर रहे हैं। इस बार उनकी नजर क्रिकेट पर है. साफ है कि बॉक्स ऑफिस पर ‘मैदान’ का सफर ज्यादा लंबा नहीं रहा. हालांकि, इस फिल्म में अजय देवगन के अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा। शायद इसीलिए अजय एक बार फिर बायोपिक में वापसी कर रहे हैं। लेकिन इस बार वह फुटबॉल छोड़कर क्रिकेट के मैदान में उतरने जा रहे हैं.

लेकिन अजय का किरदार कौन निभाएगा? हाल ही में इस फिल्म के मेकर्स ने बताया कि अजय इसमें भारत के पहले दलित क्रिकेटर पलवंकर बालू का किरदार निभाएंगे. फिल्म का निर्देशन तिग्मांशु धूलिया करेंगे। फिल्म के निर्माताओं में से एक प्रीति सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हम राम गुहा द्वारा लिखी गई किताब ‘ए कॉर्नर ऑफ ए फॉरेन फील्ड’ पर आधारित फिल्म बना रहे हैं।” फिल्म के निर्माता.

बालू का जन्म 1876 में तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी में हुआ था। बाद में उन्होंने पुणे क्रिकेट क्लब में एक विकेटकीपर के रूप में अपना करियर शुरू किया। बाद में उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें 1896 में हिंदी जिमखाना क्लब में एक क्रिकेटर के रूप में मौका मिला। बालू ने 33 प्रथम श्रेणी मैचों में 753 रन और 179 विकेट लिए। यह फिल्म एक सीमांत समाज से आने के बावजूद एक क्रिकेटर के रूप में उनके संघर्ष को उजागर करेगी।

हाल ही में अजय ने कश्मीर में ‘सिंघम आएं’ की शूटिंग पूरी की है। इसके बाद दर्शकों को नीरज पांडे द्वारा निर्देशित फिल्म ‘औरो में कहां दम था’ देखने को मिलेगी। सुनने में आ रहा है कि अजय अभिनीत इस बायोपिक की शूटिंग इस साल के अंत से शुरू हो सकती है. फिल्म युवा की शूटिंग के दौरान अभिनेता विवेक ओबेरॉय को बड़े खतरे का सामना करना पड़ा। उन्होंने अभिषेक बच्चन और अजय देवगन के साथ मणिरत्नम की फिल्म में काम किया। एक्टर ने हाल ही में अपना शूटिंग एक्सपीरियंस शेयर किया है.

विवेक ने कहा कि इस फिल्म में अभिनय का अनुभव वह कभी नहीं भूलेंगे. उनके शब्दों में, ”यह मेरे जीवन के अनुभवों में से एक है. मोनी रत्नम के साथ यह मेरा दूसरा काम था। मुझे कभी भी दूसरी फिल्म के लिए सुबह चार बजे उठना नहीं पड़ा।”

लेकिन इस फिल्म के लिए वह लगभग मौत के मुंह से वापस आ गए थे। उस दिन एक खूबसूरत शाम लगभग एक दुःस्वप्न में बदल गई। एक्टर के मुताबिक, ”एक मजेदार शाम एक मोटरसाइकिल दुर्घटना के कारण दुखद हो गई.” दुर्घटना में विवेक गंभीर रूप से घायल हो गए. और इसलिए अभिनेता को कुछ भी याद नहीं था। विवेक कहते हैं, ”मुझे सिर्फ इतना याद है कि अजय और अभिषेक मुझे अस्पताल ले गए थे। हड्डियाँ टूट गईं और मेरी त्वचा से बाहर आ गईं। पूरा शरीर खून से लथपथ था.” लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. इस घटना को सुनने के बाद फिल्म के निर्देशक मणिरत्नम को खुद दिल का दौरा पड़ा।

इस घटना के बारे में एक्टर कहते हैं, ”मेरे एक्सीडेंट की खबर सुनने के बाद मुझे पता चला कि मणिरत्नम दिल की बीमारी से पीड़ित हैं. हम दोनों का अस्पताल में इलाज चल रहा था. अजय और अभिषेक दोनों आते थे और मजेदार बातें कहकर मुझे खुश करने की कोशिश करते थे। चार महीने बाद फिल्म की पूरी टीम एक जगह थी. विवेक के शब्दों में, “मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि मैं कैसे ठीक हो गया और फिर से काम करना शुरू कर दिया।”

अजय देवगन की फिल्म ‘मैदान’ गुरुवार को देशभर में रिलीज हो गई। फिल्म को पहले ही आलोचकों की सराहना मिल चुकी है. हालांकि, बॉक्स ऑफिस के मामले में यह फिल्म अक्षय कुमार-टाइगर श्रॉफ स्टारर बड़े मीना छोटे मीना से थोड़ी पीछे है। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गंगोपाध्याय ने इस तस्वीर को बार-बार देखा है। तस्वीर देखकर ‘दादा’ ने क्या की गुजारिश?

बॉलीवुड में पहले से ही बायोपिक्स या स्पोर्ट्स ड्रामा का चलन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन यह ज्यादातर क्रिकेट सितारों और उनके जीवन पर केंद्रित है। हालांकि, इस बार निर्देशक अमित शर्मा बड़े पर्दे पर भारतीय फुटबॉल के सुनहरे युग को वापस लेकर आए हैं। उस तस्वीर को देखकर सौरव काफी उत्साहित हैं. सभी से सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने का अनुरोध किया. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने एक्स हैंडल पर लिखा, ‘आपमें से कोई भी ‘मैदान’ के शानदार सिनेमाई अनुभव को मिस नहीं करेगा।’ भारत के सर्वकालिक फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम की दुखद कहानी सामने आई है। भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम युग पर कब्ज़ा हो चुका है. यह फिल्म भारतीय फुटबॉल सितारों की छवि को जीवंत कर देती है। यह एक अवश्य देखी जाने वाली भारतीय खेल फिल्म है।” सिर्फ सौरव ही नहीं, बॉलीवुड निर्माता कर्ण जौहर भी ‘मैदान’ से प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि यह अजय देवगन के जीवन का अब तक का सबसे अच्छा काम है। इस फिल्म को देखने के बाद शाहिद कपूर ने भी अपनी तारीफ जाहिर की.

क्या जेल की सजा होने पर भी डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव लड़ सकते हैं? क्या कहता है अमेरिकी कानून?

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अमेरिकी कानून के तहत, ट्रम्प को जेल या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। और इसके साथ ही 77 वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप के ‘राजनीतिक भविष्य’ को लेकर भी सवाल खड़ा हो गया है.
वह अमेरिकी इतिहास में आपराधिक आरोपों का सामना करने वाले पहले पूर्व राष्ट्रपति हैं। और इसके साथ ही 77 वर्षीय डोनाल्ड ट्रंप के ‘राजनीतिक भविष्य’ को लेकर भी सवाल खड़ा हो गया है. अमेरिका में इस बात को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं कि वह नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा ले पाएंगे या नहीं.

न्यूयॉर्क की 11 सदस्यीय जूरी ने ट्रम्प को जानकारी छुपाने के लिए व्यावसायिक दस्तावेजों में हेराफेरी करने का दोषी पाया। कोर्ट ने कहा कि उस मामले में ट्रंप पर लगाए गए सभी 34 आरोप साबित हो चुके हैं. ट्रंप की सजा का ऐलान 11 जुलाई को किया जाएगा. अमेरिकी कानून के तहत, ट्रम्प को जेल या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। जिस मामले में उन्हें ‘अपराधी’ घोषित किया गया था, उसमें अमेरिकी कानून के तहत अधिकतम चार साल की जेल की सजा का प्रावधान है। न्यूयॉर्क अदालत के जूरी बोर्ड की अध्यक्षता करने वाले न्यायाधीश जुआन मार्चन को ‘अपराधियों को कठोर सजा’ देने के लिए जाना जाता है। हालांकि, कुछ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में अदालत 77 वर्षीय रिपब्लिकन नेता को केवल जुर्माना देकर ही छूट दे सकती है। क्योंकि, एक तो उसकी उम्र, दूसरा अपराध का प्रकार ‘अहिंसक’ और तीसरा, यह उसका पहला अपराध है. इसके अलावा देश के पूर्व राष्ट्रपति होने के नाते यह भी माना जा रहा है कि जूरी इस मामले में ट्रंप के प्रति ‘अधिक सहानुभूति’ दिखा सकती है.

11 जुलाई को सजा सुनाए जाने से पहले ट्रंप को परिवार और परिचितों से अपने ‘चरित्र’ के प्रमाण पत्र अदालत में जमा कराने का भी मौका मिलेगा. अमेरिकी कानून के तहत, इस तरह के प्रमाणपत्र में कम सजा का प्रावधान है। जेल की सज़ा अब प्रभावी नहीं हो सकती. अमेरिकी कानून के मुताबिक, ट्रंप इस मामले में मैनहट्टन की राज्य अपील अदालत में आवेदन कर निलंबन पा सकते हैं. दरअसल, गुरुवार को फैसला सुनाए जाने के बाद ट्रंप ने ऊपरी अदालत में अपील भी दायर की. कुछ वकीलों के अनुसार, अपील अदालत को ट्रम्प की अपील पर फैसला देने में एक साल से अधिक समय लग सकता है। उस दिन राष्ट्रपति चुनाव होगा.
लेकिन अंत में जेल जाने पर भी ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने से नहीं रोका जा सकेगा. क्योंकि उस देश के कानून के अनुसार आपराधिक मामले का प्रतिवादी भी देश के सर्वोच्च पद के लिए चुनाव लड़ने के योग्य होता है। लेकिन अगर दोषी नेता चुना जाता है, तो मतदान के बाद कांग्रेस के दोनों सदनों में महाभियोग की कार्यवाही शुरू की जा सकती है। संयोग से, रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन ट्रम्प की सजा के कुछ ही दिनों बाद आया। उम्मीद है कि उस सम्मेलन में उन्हें आधिकारिक तौर पर पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया जायेगा. अगर रिपब्लिकन नेतृत्व ने सर्वसम्मति से उम्मीदवारों का विरोध किया तो ट्रंप की परेशानी बढ़ सकती है.

70 वर्षीय रिपब्लिकन पार्टी नेता अमेरिकी इतिहास में आपराधिक आरोपों में दोषी ठहराए जाने वाले पहले पूर्व राष्ट्रपति बने। ट्रंप ने कथित तौर पर पोर्न स्टार स्टॉर्मी डेनियल्स के साथ अफेयर के बाद 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपना मुंह बंद रखने के लिए 130,000 डॉलर की रिश्वत दी थी। ट्रम्प ने भुगतान छुपाने के लिए अपने व्यावसायिक दस्तावेजों में हेराफेरी की। हालाँकि, ट्रम्प शुरू से ही अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार करते रहे हैं। मैनहट्टन जिला अटॉर्नी एल्विन ब्रैग ने उस समय आरोपों की जांच की। वह डेमोक्रेट पार्टी के सदस्य हैं. जिसके चलते ट्रंप खेमे ने ‘राजनीतिक साजिश’ का आरोप लगाया है. इस साल नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव। ट्रंप को ‘रिपब्लिकन कॉकस’ में पहले ही ‘राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार’ के रूप में चुना जा चुका है. इसके अलावा, राष्ट्रपति कार्यकाल की समाप्ति के बाद गुप्त सरकारी दस्तावेजों पर अवैध कब्ज़ा, कैपिटल हिंसा सहित उनके खिलाफ तीन आपराधिक मामले अभी भी अदालत में लंबित हैं।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जानकारी छुपाने के लिए व्यापारिक दस्तावेजों में हेराफेरी करने का अदालत में दोषी पाया गया है। न्यूयॉर्क की एक अदालत ने गुरुवार को यह फैसला सुनाया। 12 सदस्यीय जूरी ने कहा कि उस मामले में ट्रंप के खिलाफ लगाए गए सभी 34 आरोप साबित हुए हैं.

ट्रंप की सजा का ऐलान 11 जुलाई को किया जाएगा. अमेरिकी कानून के तहत, ट्रम्प को जेल या जुर्माना या दोनों का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि, कुछ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत केवल 77 वर्षीय रिपब्लिकन नेता को ही बरी कर सकती है जो व्यावसायिक जानकारी छुपाने के दोषी हैं। 70 वर्षीय रिपब्लिकन पार्टी नेता अमेरिकी इतिहास में आपराधिक आरोपों में दोषी ठहराए जाने वाले पहले पूर्व राष्ट्रपति बने। ट्रंप ने कथित तौर पर पोर्न स्टार स्टॉर्मी डेनियल्स के साथ अफेयर के बाद 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपना मुंह बंद रखने के लिए 130,000 डॉलर की रिश्वत दी थी। ट्रम्प ने भुगतान छुपाने के लिए अपने व्यावसायिक दस्तावेजों में हेराफेरी की।