Thursday, March 5, 2026
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क्या बिहार के कैबिनेट में है जातीय आधार?

वर्तमान में बिहार के कैबिनेट में जातीय आधार है! आगामी राजनीति की सुध लेते बिहार में एनडीए की सरकार बनी। जातीय तुष्टिकरण के साथ-साथ राजद नेता तेजस्वी यादव के ए-टू-जेड समीकरण को भी ध्वस्त करने के सूत्र भी तलाश लिए गए। सीएम नीतीश कुमार के साथ शपथ लेने वालों में 8 मंत्रियों से ये स्पष्ट हो गया कि एनडीए आगामी चुनाव में किन ‘जातीय वीर’ के साथ चुनाव में उतरने जा रही है। हालांकि, आगे आने वाली मंत्रियों की सूची से बाकी बचे जातीय समीकरण को भी तुष्ट किए जाने के संकेत मिलने लगे हैं। रविवार की शाम सीएम समेत 9 मंत्रियों ने शपथ ली। इनमें नीतीश कुमार के साथ 2 उपमुख्यमंत्री और 6 कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। बीजेपी से सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा डिप्टी सीएम होंगे। इसके अलावा प्रेम कुमार शामिल हैं। जदयू से विजय चौधरी, विजेंद्र यादव और श्रवण कुमार ने शपथ ली। जबिक हम से जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन और निर्दलीय सुमित सिंह मंत्री बने।

एनडीए के मंत्रिपरिषद की जो पहली तस्वीर आई है, उसमें बिहार के प्रमुख और आक्रामक जातियों की झलक दिख गई। ऐसा लगा कि एनडीए के रणनीतिकार तेजस्वी के ए-टू-जेड फॉर्मूला को शिकस्त देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इस मंत्रिपरिषद पर ध्यान दें तो सबसे ज्यादा जोर लव-कुश समीकरण पर दिया गया है। सीएम नीतीश कुमार के साथ डिप्टी सी-एम सम्राट चौधरी और जदयू के श्रवण कुमार लव-कुश समीकरण को पुष्ट करते देख रहे हैं। ऐसे भी राज्य के सबसे बड़ी आबादी यादव के 14 प्रतिशत वोट के विरुद्ध लव-कुश समीकरण से ही एनडीए राजद को मात देते रही है।

अब यादव जाति को तटस्थ करने के लिए जदयू नेता विजेंद्र यादव को मंत्री बनाया गया। वोटिंग टेंडेंसी को लेकर बिहार की सबसे आक्रामक जाति को एनडीए से जोड़ने के लिए दो-दो भूमिहार को मंत्री बनाया है। भाजपा ने तो भूमिहार नेता विजय सिन्हा को डिप्टी सीएम बना दिया और जदयू की तरफ से विजय चौधरी को भी मंत्री बनाया गया। अतिपिछड़ा जाति के लिए भाजपा ने कहार जाति के प्रेम कुमार को भी मंत्री बनाया है। एनडीए के रणनीतिकार ने बड़ी चालाकी से सरकार के भविष्य का भी ख्याल रखा।बीजेपी नेतृत्व के फलसफे पर भाजपा की राजनीति के सुर बदलने आगे। अटल आडवाणी को सॉफ्ट नेताओं के विरुद्ध नरेंद्र मोदी के हाथ भाजपा और देश का नेतृत्व आया। इस धरातल पर नरेंद्र मोदी के प्राथमिकता वाले नेताओं में न नीतीश कुमार थे और न ही सुशील मोदी।

 ऐसा इसलिए कि राजद जिस मैजिक नंबर के पीछे भाग रही थी, उसके आंकड़ों में हम के चार विधायक और निर्दलीय विधायक सुमित कुमार को भी शामिल किया जा रहा था। एनडीए ने राजद नेतृत्व के उस मंसूबे को ध्वस्त किया और साथ ही दलित और राजपूत जाति को भी संतुष्ट करने में सफलता पाई। बता दें कि सम्राट चौधरी हार्ड कोर नेता माने जाते हैं। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनते ही सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार को मेमोरी लॉस सीएम बताया। नीतीश को हमेशा कहते रहे हैं कि वो बिहार संभालने लायक नहीं हैं। वे डरपोक नेता हैं। यहां तक कि 2023 में सिर पर भगवा रंग का मुरेठा बांधते यह कसम भी खाई कि नीतीश कुमार के पद से हटने के बाद ही वह मुरैठ खोलेंगे। उधर, भाजपा ने नीतीश कुमार का इंतज़ाम सदन के बाहर भी कर दिया है। नरेंद्र मोदी के हनुमान चिराग पासवान ने खुलेआम कहा कि नीतीश कुमार से मेरी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। पर नरेंद्र मोदी नीत नीतियों को वह फलीभूत होने नहीं देंगे तो उन्हें चिराग पासवान का विरोध झेलना होगा। 

 

बिहार मंत्रिपरिषद की ये अंतिम तस्वीर नहीं है। आने वाले मंत्रियों की सूची में ब्राह्मण, वैश्य, अन्य पिछड़ी जातियां, दलित और मुस्लिम कोटे को भी तुष्ट किया जाएगा। तेज तर्रार नेताओं को सीएम नीतीश कुमार के अगल-बगल खड़ा किया है। याद होगा विधान सभा अध्यक्ष रहते विजय सिन्हा ने सीएम नीतीश कुमार से टकराहट भरी भाषा के साथ सवाल जवाब किया था। मसला लखीसराय का था। एक गिरफ्तारी को लेकर तब वे दोनों आमने-सामने हो गए थे। ये वही विजय सिन्हा हैं जिन्होंने नीतीश को मेंटल, बंधुआ मजदूर तक कहा था।पिछली एनडीए सरकार के कई मंत्री अभी आगामी सूची के लिए इंतजाररत हैं। मिली जानकारी के अनुसार आने वाले मंत्रियों की सूची हर संभव जातीय तुष्टिकरण की पुष्ट तस्वीर भी परोसने जा रही है।

अब बिहार में किसका रहेगा दबदबा जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि बिहार में अब किसका दबदबा रहेगा! बिहार में डबल इंजन की सरकार चल पड़ी है, राज्य में फिर से नीतीशे सरकार है, पर इस बार डबल इंजन की सरकार में समान पावर के इंजन लगे हैं। एनडीए की यह सरकार न तो 2005 या कि 2010 या फिर साल 2017 वाली एनडीए सरकार कतई नहीं होने जा रही है। इस बार सीएम नीतीश कुमार के सारे दाव पेंच को दुरुस्त करने के इंतजाम बीजेपी ने एनडीए सरकार की नींव डालते ही कर दिया है। जानिए क्या है बीजेपी की रणनीति। इस बार हमेशा की तरह बीजेपी के रणनीतिकारों ने सॉफ्ट नेताओं को डेप्युटी सीएम की जिम्मेदारी नहीं दी। 2005 में राज्य के डेप्युटी सीएम बने सुशील मोदी। नीतीश कुमार की पसंदीदा नेताओं में से एक रहे। डबल इंजन की सरकार अपनी गति से चल रही थी। लेकिन बाद में बीजेपी के भीतर से ही सुशील मोदी का विरोध इसलिए शुरू हो गया कि उन्हें नीतीश कुमार की हितों का रक्षक नेता माना जाने लगा। वैसे भी नीतीश कुमार या सुशील मोदी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के पसंदीदा नेताओं में शुमार किए जाते रहे। लेकिन देश में बीजेपी नेतृत्व के फलसफे पर भाजपा की राजनीति के सुर बदलने आगे। अटल आडवाणी को सॉफ्ट नेताओं के विरुद्ध नरेंद्र मोदी के हाथ भाजपा और देश का नेतृत्व आया। इस धरातल पर नरेंद्र मोदी के प्राथमिकता वाले नेताओं में न नीतीश कुमार थे और न ही सुशील मोदी।

लेकिन 2017 में एनडीए की सरकार बनी तो रेणु देवी और तार किशोर प्रसाद को डेप्युटी सीएम बनाया गया। ये भी नीतीश कुमार के आगे प्रभावहीन ही रहे। इस बार भाजपा ने बड़ी सोच समझकर अनुभवी और तेज तर्रार नेताओं को सीएम नीतीश कुमार के अगल-बगल खड़ा किया है। याद होगा विधान सभा अध्यक्ष रहते विजय सिन्हा ने सीएम नीतीश कुमार से टकराहट भरी भाषा के साथ सवाल जवाब किया था। मसला लखीसराय का था। एक गिरफ्तारी को लेकर तब वे दोनों आमने-सामने हो गए थे। ये वही विजय सिन्हा हैं जिन्होंने नीतीश को मेंटल, बंधुआ मजदूर तक कहा था।

सम्राट चौधरी हार्ड कोर नेता माने जाते हैं। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनते ही सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार को मेमोरी लॉस सीएम बताया। नीतीश को हमेशा कहते रहे हैं कि वो बिहार संभालने लायक नहीं हैं। वे डरपोक नेता हैं। यहां तक कि 2023 में सिर पर भगवा रंग का मुरेठा बांधते यह कसम भी खाई कि नीतीश कुमार के पद से हटने के बाद ही वह मुरैठ खोलेंगे। उधर, भाजपा ने नीतीश कुमार का इंतज़ाम सदन के बाहर भी कर दिया है। नरेंद्र मोदी के हनुमान चिराग पासवान ने खुलेआम कहा कि नीतीश कुमार से मेरी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। पर नरेंद्र मोदी नीत नीतियों को वह फलीभूत होने नहीं देंगे तो उन्हें चिराग पासवान का विरोध झेलना होगा।

बता दे कि बिहार में महागठबंधन की सरकार का अंत हो गया है। नीतीश कुमार के शब्दों में उन्होंने पिछली सरकार को खत्म कर दिया है। उन्होंने ये भी कहा कि अब यहीं रहेंगे। सियासी जानकार मानते हैं कि बीजेपी इन दिनों अपना हर कदम फूंक-फूंक कर उठा रही है। जानकारों की मानें, तो पार्टी ने सबसे पहले दो नेताओं को नीतीश के आगे-पीछे डिप्टी सीएम के रूप में लगा दिया है। पहले नेता विजय कुमार सिन्हा हैं। ये भूमिहार समाज से आते हैं। दूसरे नेता सम्राट चौधरी, जो लव-कुश समीकरण को साधते हैं। अपनी आक्रामक बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। जाहिर है, बीजेपी ने ओबीसी और ऊंची जाति के संयोजन के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया है। बीजेपी को पता है कि लोकसभा चुनाव मुश्किल से कुछ महीने दूर हैं।

नीतीश के नेतृत्व वाले एनडीए ने 2020 का विधानसभा चुनाव भी एक साथ जीता था। जिसके बाद भाजपा ने ओबीसी वैश्य नेता तारकिशोर प्रसाद और ईबीसी नोनिया नेता रेनू देवी को डिप्टी सीएम नियुक्त किया था। वे अगस्त 2022 तक अपने पद पर बने रहे। उसके बाद 9 अगस्त, 2022 को नीतीश कुमार आरजेडी के पाले में चले गए। तब तक दोनों नेता डिप्टी सीएम बने रहे। बीजेपी का पिछला ओबीसी-ईबीसी प्रयोग असफल रहा था। पार्टी ने नीतीश पर लगातार हमला करने वाले सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा को डिप्टी सीएम बना दिया है। चौधरी अब काम में व्यस्त रहेंगे। पार्टी को उम्मीद है कि अपनी नई भूमिका में ये लोग नीतीश के प्रतिनिधि के रूप में काम करेंगे। अपनी आक्रामकता भी कम करेंगे। जरूरत पड़ने पर पार्टी का इशारा होते ही, जेडीयू प्रमुख यानी नीतीश कुमार को काबू में भी रखेंगे।

बीजेपी से जुड़े सूत्र कहते हैं कि चौधरी को आगे बढ़ाने का भाजपा का एक कारण उन्हें राज्य की राजनीति में आगे किए रहना है। सम्राट चौधरी को बीजेपी बहुत कुछ सोच समझकर आगे बढ़ा रही है। सम्राट को इस बार महत्वपूर्ण भूमिका देना जरूरी था। इससे कार्यकर्ताओं में एक अच्छा संदेश जाएगा। दूसरी बात की पार्टी नीतीश को अपने साथ लेकर लोकसभा चुनाव को साधने की कवायद में जुटी है। इसका ताजा प्रमाण है, जेपी नड्डा का बयान जो उन्होंने पटना में दिया। नड्डा ने कहा कि डबल इंजन की सरकार से बिहार के विकास को गति मिलेगी। अब बिहार विकास की ओर अग्रसर होगा। नड्डा ने कहा कि बिहार में जनता ने एनडीए को जनादेश दिया था और अब डबल इंजन की सरकार राज्य का विकास करेगी। उन्होंने प्रसन्नता जताते हुए कहा कि नीतीश कुमार फिर से एनडीए में आ गए हैं। उन्होंने कहा कि जब भी बिहार में एनडीए की सरकार बनी है स्थिरता आई है और डबल इंजन का बेहतर प्रभाव रहेगा। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि एनडीए लोकसभा चुनाव में स्वीप करेगी तथा विधानसभा चुनाव में भी एनडीए की सरकार बनेगी।

क्या अखिलेश यादव का कन्नौज से लड़ना बीजेपी के लिए खतरनाक है?

अगर अखिलेश यादव कन्नौज से चुनाव लड़ते हैं तो बीजेपी के लिए खतरा पैदा हो सकता है! लोकसभा चुनाव 2024 के लिए उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन में सीटों को बंटवारे को लेकर रस्साकशी जारी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस को 11 सीटें देने के एकतरफा ऐलान के बाद स्थितियां और कठिन हो चली हैं। उधर राष्ट्रीय लोकदल भी 7 सीटों से ज्यादा की उम्मीद सपा से कर रहा है। इस बीच समाजवादी पार्टी भी संभावित प्रत्याशियों को लेकर रणनीति बनाने में जुटी है। जिलों-जिलों से फीडबैक प्रॉसेस चल रहा है। खुद अखिलेश यादव के इस बार कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसी तरह डिंपल यादव मैनपुरी और शिवपाल यादव आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की चर्चाएं हैं। जानकार मानते हैं कि अगर अखिलेश यादव कन्नौज की अपनी पुरानी सीट से दावेदारी करते हैं तो भाजपा के लिए मुकाबला कठिन होना तय है। बता दें अखिलेश यादव लगातार कन्नौज का दौरा कर रहे हैं। अभी तक आधिकारिक तौर पर कुछ ऐलान नहीं हुआ है लेकिन क्षेत्र में चर्चाएं तेज हैं कि अखिलेश यादव यहीं से मैदान में उतरेंगे। अखिलेश यादव यहां से तीन बार सांसद चुने जा चुके हैं। कन्नौज के बारे में कभी कहा जाता था कि यहां से यादव परिवार को चुनाव जीतने के लिए कैंपेन करने की भी जरूरत नहीं है। 1998 से 2019 तक इस सीट पर यादव परिवार का दबदबा रहा। कन्नौज लोकसभा सीट पर भाजपा के चंद्रभूषण सिंह उर्फ मुन्नू बाबू ने 1996 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की छोटी सिंह यादव को मात देकर सीट अपने नाम की थी। लेकिन इसके बाद 1998 में समाजवादी पाटीं ने प्रदीप कुमार यादव की अगुवाई में इस सीट पर अपना कब्जा बना लिया। इसके बाद 1999 में ये सीट यादव परिवार की हो गई।

1999 में मुलायम सिंह यादव यहां से जीते, फिर 2000 में उनकी जगह उपचुनाव में अखिलेश यादव ने ली। अखिलेश ने इसके बाद 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावा आसानी से जीत लिए। लेकिन 2012 में अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री हो गए और उन्होंने ये सीट अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए खाली कर दी। डिंपल ने 2012 का उपचुनाव निविर्रोध जीत लिया। फिर 2014 में मोदी लहर के बीच भी डिंपल यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब रहीं। लेकिन 2019 तक स्थिति बदल चुकी थी। लगातार प्रयास के बाद आखिरकार 23 साल बाद भाजपा यहां भगवा फहराने में सफल रही। भाजपा से सुब्रत पाठक ने सपा ही नहीं पूरे यादव कुनबे को चौंकाते हुए 12353 वोटों से मात दे दी।

जातिगत समीकरण की बात करें तो इस सीट पर हमेशा से मुस्लिम और यादव वोटबैंक का दबदबा रहा है। दोनों का वोट प्रतिशत 16-16 फीसदी के करीब है। वहीं उसके बाद ब्राह्मण मतदाता हैं, जिनकी 15 फीसदी हिस्सेदारी है। राजपूत यहां 10 फीसदी के करीब हैं और अन्य जातियां कुल मिलाकर 39 फीसदी हैं, जिनमें गैर यादव पिछड़ी जातियां और दलित शामिल हैं। वैसे तो मुस्लिम यादव वोटबैंक हर चुनाव में अपना असर डालता रहा। लेकिन 2019 के लाेकसभा चुनाव में भाजपा ने अन्य जातियों के वोटबैंक में तगड़ी सेंध लगा दी। सुब्रत पाठक की जीत में इसी अन्य फैक्टर ने विशेष योगदान दिया। अब सवाल ये है कि क्या इस बार भी ऐसा होगा? हालांकि टिकट अभी फाइनल नहीं हुआ है।

जानकारों के अनुसार कन्नौज सीट पर अखिलेश यादव ने पिछले काफी समय से ध्यान लगाया है। यहां वह वोटरों से सीधे संपर्क के साथ ही अपनी पीडीए रणनीति के तहत वोटरों को जोड़ने के प्रयास में हैं। वह सांसद सुब्रत पाठक पर भी लगातार हमलावर रहे हैं। दोनों तरफ से तल्ख बयानबाजियों के कई दौर चल चुके हैं। यहां भाजपा मजबूत जरूर है लेकिन अखिलेश यादव की छवि बड़ी चुनौती साबित होगी। जानकार ये भी कहते हैं कि रणनीति के लिहाज से हो सकता है भाजपा यहां से टिकट बदल भी सकती है। वैसे भाजपा के लिए इस सीट पर एक अन्य बड़ा पहलू भी पक्ष में दिख रहा है। दरअसल कन्नौज लोकसभा के तहत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों मे भी भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। कन्नौज लोकसभाा क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें छिबरामऊ से अर्चना पांडेय, तिर्वा से कैलाश राजपूत, सदर सुरक्षित सीट से असीम अरुण हैं। एक सीट कानपुर देहात की रसूलाबाद एससी भी है, जहां से भाजपा की पूनम संखवार विधायक हैं। वहीं एक सीट औरैया की बिधूना है, जहां से रेखा वर्मा सपा विधायक हैं।

होने वाले राज्यसभा चुनाव में किस पार्टी को होने वाला है सबसे ज्यादा फायदा?

आज हम आपको बताएंगे कि होने वाले राज्यसभा चुनाव में किस पार्टी को सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है! 27 फरवरी को राज्यसभा की खाली हो रही 56 सीटों के लिए चुनाव होंगे। बिहार, महाराष्ट्र में सियासी उलटफेर और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद नए समीकरण बन गए हैं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत के बाद ऐसी संभावना जताई गई कि राज्यसभा में बीजेपी को ज्यादा फायदा होगा। मगर ऐसा नहीं है। 15 राज्यों में मौजूदा विधायकों के आधार पर बीजेपी के सांसदों की संख्या में बड़ा बदलाव नहीं होगा। अप्रैल में बीजेपी के 28 राज्यसभा सांसद रिटायर होंगे, मगर इस चुनाव में भी 28 सीटें ही जीतेगी। एनडीए के सहयोगियों को 4 सीटें मिलेंगी। ऐसा ही कांग्रेस का है, तेलंगाना और हिमाचल जीतने के बाद भी वह सिर्फ 8 सीटें हासिल कर पाएगी, जबकि उसके 10 सांसद रिटायर हो रहे हैं। इंडिया गठबंधन के सहयोगियों के खाते में 9 सीटें आएंगी। बाकी की 7 सीटों में से बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस के खाते में 3-3 सीट जाएगी। तेलंगाना में चुनाव हारने वाली बीआरएस को सिर्फ एक सीट से संतोष करना होगा। 238 सदस्यों वाली राज्यसभा में बीजेपी और एनडीए के पास पूर्ण बहुमत नहीं है। एनडीए के पास 109 और इंडिया गठबंधन के पास 89 सीटें हैं। बाकी बची सीटें बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, टीडीपी, सपा, आरएलडी और बीआरएस के पास है। राज्यसभा में अभी बीजेपी के 93 और कांग्रेस के 30 सांसद हैं। तृणमूल कांग्रेस के पास 13, आम आदमी पार्टी और डीएमके के पास 10-10 सीटें हैं। बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस के 9 राज्यसभा सांसद हैं। अभी आरजेडी के 6 और बीआरएस के 7 सांसद हैं। अप्रैल में 56 सीटें खाली होने वाली है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा, अनिल बलूनी, मनसुख मंडाविया, प्रकाश जावेडकर, अश्विनी वैष्णव, भूपेंद्र यादव, वी मुरली धरन, नारायण राणे जैसे दिग्गज समेत पार्टी के 28 सांसद की विदाई होगी। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, इस बार पार्टी नए चेहरों को राज्यसभा भेज सकती है। केंद्रीय मंत्री रहे नेताओं को लोकसभा चुनाव के मैदान में उतारा जाएगा। कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी रिटायर होने वाले हैं। यह उनकी राजनीति की आखिरी पारी हो सकती है। इसके अलावा सपा सांसद जया बच्चन भी अप्रैल में रिटायर हो जाएंगी।

कर्नाटक और तेलंगाना में जीत हासिल करने के बाद भी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को दो सीटों का नुकसान होगा, जबकि भाजपा सदस्यों की संख्या उतनी ही रहेगी। सबसे बड़ा नुकसान के.चंद्रशेखर राव की पार्टी बीआएस को होगी। तेलंगाना चुनाव हारने के बाद अब दो सीटें कांग्रेस के खाते में चली जाएगी। यूपी विधानसभा में बेहतर प्रदर्शन के बाद भी बीजेपी को दो सीटों का नुकसान होगा। विधानसभा में बीजेपी के 255 सदस्य हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 312 सीटें मिली थीं। 2022 में बीजेपी ने 55 सीटें गंवा दी, जबकि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने कुल 111 सीटें जीतीं। सपा ने नई 64 सीटों पर कब्जा किया। इसका फायदा उसे राज्यसभा चुनाव में मिलेगा। यूपी से खाली हुई 10 सीटों में से 3 सपा और 7 बीजेपी के खाते में जाएगी। उत्तराखंड, हरियाणा और छत्तीसगढ़ की एक-एक सीट बीजेपी के पास ही रहेगी।

नीतीश कुमार के पलटी मारने से बीजेपी को खास फायदा नहीं होगा। वहां खाली होने वाली 6 सीटों में से दो बीजेपी, दो आरजेडी, एक जेडी यू और एक कांग्रेस के खाते में ही जाएगा। महाराष्ट्र में भी 6 सीटें खाली हो रही हैं, जहां महायुति में शामिल अजित पवार और एकनाथ शिंदे भी अपने गुट के लिए राज्यसभा सीट चाहते हैं। संख्या बल के आधार पर महायुति को 5 और कांग्रेस को एक सीट मिल सकती है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी फिलहाल इस चुनाव में बीजेपी को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में खास फायदा नहीं होगा। मध्यप्रदेश में बीजेपी के चार सांसद रिटायर हो रहे हैं। इस चुनाव में वह चार लोगों को ही राज्यसभा भेज सकती है। एक सीट कांग्रेस के खाते में रहेगी। राजस्थान में भी दो बीजेपी और एक कांग्रेस सांसद रिटायर हो रहे हैं। यहां भी बीजेपी-कांग्रेस का रिजल्ट 2-1 ही रहेगा। पश्चिम बंगाल में खाली होने वाली पांच सीटों में चार पर टीएमसी और एक पर कांग्रेस काबिज थी। इस बार कांग्रेस को नुकसान होगा। पांचवीं सीट विधानसभा में विपक्षी दल बनी बीजेपी के पास ट्रांसफर हो गई है। विधानसभा चुनाव से पहले ओडिशा में बीजेडी को 3 राज्यसभा सीटों पर कब्जा करेगी। ऐसा ही आंध्र प्रदेश में होगा, जहां जगनमोहन रेड्डी अपने तीन समर्थकों को राज्यसभा भेजेंगे। हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस एक सांसद को चुनेगी।

क्या अखिलेश यादव भी छोड़ सकते हैं INDIA गठबंधन?

आने वाले समय में अखिलेश यादव भी INDIA गठबंधन छोड़ सकते हैं! इंडिया गठबंधन में सब ठीक नहीं है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में खुद को ‘अकेला’ कर चुकी हैं। अब नीतीश कुमार के भी एनडीए में जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस बड़े राजनीतिक उठा-पटक के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव पर सबकी नजरें हैं। उनके नीतीश कुमार पर दिए गए ताजा बयान के भी सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं। दरअसल अखिलेश यादव कई बार इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका पर अपनी निराशा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने साफ कह दिया कि नीतीश की पहल पर ये गठबंधन बना था लेकिन कांग्रेस ने इसे लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई। अगर नीतीश इंडिया गठबंधन में रहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं चाहता हूं कि वह इसका हिस्सा बने रहें। दरअसल इंडिया गठबंधन का जब ऐलान हुआ तो यूपी से राष्ट्रीय लोकदल के साथ समाजवादी पार्टी इसमें शामिल हुई। लेकिन समय बीतने के साथ कांग्रेस और अखिलेश यादव में रिश्ते बिगड़ते चले गए। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनावों में सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और सपा के बीच तनातनी सबने देखी। फिर कांग्रेस का बसपा की तरफ ‘सॉफ्ट’ अप्रोच ने संतुलन और कठिन कर दिया। अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया कि अगर बसपा को गठबंधन में लाने की कवायद हाेती है तो समाजवादी पार्टी के लिए भी ऑप्शन खुले हैं। ताजा स्थिति ये है कि लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी में इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग फार्मूला भी तय नहीं हो पा रहा है। दरअसल कांग्रेस चाहती है कि यूपी में 2009 के उसके प्रदर्शन के आधार पर उसे सीटें दी जाएं, जबकि अखिलेश इस पर राजी नहीं हैं। सपा की तरफ से पहले ही संदेश दिया जा चुका है कि यूपी में सपा ही प्रमुख पार्टी है और जो भी सीटें दी जाएंगीं, वह सपा ही अपने पास से देगी।

दूसरी तरफ यूपी कांग्रेस का रुख भी समाजवादी पार्टी से अलग अपनी राह बनाने का दिख रहा है। एक तरफ प्रदेश भर में यात्राएं कर जनाधार मजबूत करने की कवायद चल रही है। वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में सरयू स्नान भी कर संदेश देने की कोशिश हुई। वहीं सपा और कांग्रेस के बीच भी दोनों ही तरफ से तल्ख बयानबाजी सामने आ चुकी हैं। हालांकि अखिलेश यादव सीधे-सीधे कुछ भी कहने से बचते रहे हैं। ताजे घटनाक्रम पर नजर डालें तो इंडिया गठबंधन में सब ठीक नजर नहीं आ रहा। ममता बनर्जी पहले ही पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। आम आदमी पार्टी का रुख भी पंजाब को लेकर ऐसा ही नजर आ रहा है। अब नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की चर्चा है। ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश यादव भी अलग राह पकड़ेंगे?

दरअसल अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन की ताजा स्थिति का लेकर कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की पहल पर भी गठबंधन को बनाया गया था। लेकिन पहली बैठक में ही कांग्रेस ज्यादा तत्पर नहीं दिखी। गठबंधन में पीएम पद के लिए किसी का भी नंबर लग सकता है। नीतीश कुमार को बड़ा पद भी दिया जा सकता था, वह प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं अभी भी चाहता हूं कि वह गठबंधन का हिस्सा बने रहें। हालांकि अखिलेश यादव ने ये भी साफ कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं हैं। लेकिन यूपी में कांग्रेस के राहुल गांधी के साथ वह प्रचार करेंगे या नहीं इस पर उन्होंने बात समय पर छोड़ दी है।

पिछले कुछ वर्षों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि यूपी में इंडिया गठबंधन होता है तो अखिलेश के साथ आने से कांग्रेस को ही फायदा होगा। वर्तमान में सिर्फ रायबरेली ही उसके पास है। अमेठी भाजपा छीन चुकी है। समाजवादी पार्टी से सीट शेयरिंग होती है तो कहीं न कहीं कांग्रेस को उसके वोट बैंक का लाभ मिलेगा। वहीं अगर गठबंधन नहीं होता है तो कांग्रेस के लिए राहें आसान नहीं हैं। जमीन पर संगठन की उपस्थिति न के बराबर है। भाजपा का संगठन इस समय सबसे मजबूत स्थिति में है। रायबरेली में भी इस बार कांग्रेस के लिए आसान मुकाबला होने नहीं जा रहा। वहीं बसपा भी बेहद कमजोर स्थिति में है। सपा के साथ गठबंधन के चलते ही वह 2019 में 10 सीटें जीत सकी थी। बसपा का हाल ये है कि वह विधानसभा में सिर्फ एक विधायक लेकर खड़ी है। मुस्लिम मतदाता पिछले विधानसभा चुनावों में अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं कि वह सपा के ही साथ हैं। ऐसे में सीट शेयरिंग की कमान अखिलेश यादव के पास ही है।

क्या समाजवादी पार्टी की चुनावी लिस्ट में शामिल होंगे अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग?

समाजवादी पार्टी की चुनावी लिस्ट में अब अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग शामिल होने वाले हैं! समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी कर दी है। पार्टी ने इस लिस्ट में 16 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है। सपा ने अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को मैनपुरी से चुनावी मैदान में उतारा है। सपा की लिस्ट में परिवार के साथ अखिलेश यादव के बताए गए पीडीए की झलक साफ दिखायी दे रही है। लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी नए तरीके से कैडर को मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटी है। पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और दलित और अल्पसंख्यकों को साधने का फुल प्रूफ प्लान तैयार किया है। पिछले कुछ महीनों से अखिलेश यादव आए दिन अपनी रैलियों और सभाओं में इस बात का जिक्र करते नजर आते हैं कि पीडीए ही 2024 में बीजेपी को हराएंगे। वहीं जब सपा ने जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामों का एलान किया है तो उसमें पीडीए साफ नजर आ रहा है। 16 उम्मीदवारों की जो लिस्ट समाजवादी पार्टी ने जारी की है, उसमें 11 OBC, 1 मुस्लिम, 1 दलित, 1 ठाकुर, 1 टंडन और 1 खत्री। वहीं OBC उम्मीदवारों में देखें तो 4 कुर्मी, 3 यादव, 2 शाक्य, 1 निषाद और 1 पाल शामिल हैं। दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह यादव को सपा का वोट बैंक माना जाता है। इस समुदाय में भी बीजेपी ने सेंधमारी की है, जबकि, तीसरे बड़े जातीय वर्ग ब्राह्मणों का समर्थन मौजूदा दौर में बीजेपी के साथ रहा है। बाद में यह वोट बैंक बसपा और सपा का भी साथ दे चुका है।वहीं सपा ने अयोध्या लोकसभा सामान्य सीट पर दलित वर्ग के पासी प्रत्याशी को टिकट दिया।

अखिलेश यादव आए दिन अपनी रैलियों और सभाओं में इस बात का जिक्र करते नजर आते हैं कि पीडीए ही 2024 में बीजेपी को हराएंगे। हालांकि, वह अपनी सभाओं में अगड़े यानी बड़ी जाति, आधी आबादी यानि महिलाएं और आदिवासियों का भी जिक्र करते हैं। उनका खास फोकस पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों पर है। मुलायम सिंह के दौर में यादव-मुस्लिम समुदाय को समाजवादी पार्टी का कोर वोटर माना जाता था, लेकिन अब अखिलेश यादव इससे आगे बढ़कर पीडीए को साध रहे हैं। यूपी में सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनावों के लिए लिस्ट जारी की है 16 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया लेकिन इनमें से तीन उम्मीदवार तो अखिलेश के परिवार से ही हैं। इसमें डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव जैसे नाम शामिल हैं। मैनपुरी से डिंपल तो फिरोजाबाद से अक्षय, वहीं बदायूं से अक्षय को उतारा गया है। इसका मतलब यह है कि परिवार से तीन लोगों के नाम तो सपा की पहली ही लिस्ट में हैं।

राज्य की सबसे बड़ी हिन्दू आबादी जाटव को बसपा मायावती का कोर वोट बैंक समझा जाता रहा है। हाल के दो चुनावों में इसमें बड़े पैमाने पर सेंधमारी हुई है। हालांकि, दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह यादव को सपा का वोट बैंक माना जाता है। इस समुदाय में भी बीजेपी ने सेंधमारी की है, जबकि, तीसरे बड़े जातीय वर्ग ब्राह्मणों का समर्थन मौजूदा दौर में बीजेपी के साथ रहा है। बाद में यह वोट बैंक बसपा और सपा का भी साथ दे चुका है।

राज्य की सबसे बड़ी 19 फीसदी मुस्लिम आबादी का झुकाव सपा और बसपा के बीच घटता-बढ़ता रहा है। कभी यह कांग्रेस का कोर वोट बैंक हुआ करती थी लेकिन मुलायम सिंह यादव और मायावती ने अपने राजनीतिक पैंतरे से उसे तहस नहस कर दिया। सपा की लिस्ट में परिवार के साथ अखिलेश यादव के बताए गए पीडीए की झलक साफ दिखायी दे रही है। लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी नए तरीके से कैडर को मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटी है। पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और दलित और अल्पसंख्यकों को साधने का फुल प्रूफ प्लान तैयार किया है।अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि मौजूदा सियासी परिस्थितियों में इस समुदाय का झुकाव उनकी पार्टी की तरफ है। बता दें कि जब सपा ने जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामों का एलान किया है तो उसमें पीडीए साफ नजर आ रहा है। 16 उम्मीदवारों की जो लिस्ट समाजवादी पार्टी ने जारी की है, उसमें 11 OBC, 1 मुस्लिम, 1 दलित, 1 ठाकुर, 1 टंडन और 1 खत्री। वहीं OBC उम्मीदवारों में देखें तो 4 कुर्मी, 3 यादव, 2 शाक्य, 1 निषाद और 1 पाल शामिल हैं। वहीं सपा ने अयोध्या लोकसभा सामान्य सीट पर दलित वर्ग के पासी प्रत्याशी को टिकट दिया। सपा प्रमुख का यह भी मानना है कि यादवों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियां, जो 2014 और 2019 में बीजेपी की तरफ चली गई थीं, भी उनकी तरफ आ गई हैं।

आखिर कहां से चुनाव लड़ेंगे अखिलेश यादव?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि अखिलेश यादव कहां से चुनाव लड़ेंगे! लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारियों में जुटी हैं। मंगलवार को समाजवादी पार्टी ने 16 प्रत्याशियों के नामों की लिस्ट जारी कर दी है। सपा की पहली सूची में देवर-भाभी का टिकट क्लियर हो गया है। डिंपल यादव मैनपुरी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगी। वहीं, अक्षय यादव फिरोजाबाद से चुनाव लड़ेंगे। मैनपुरी और फिरोजाबाद में सपा कार्यकर्ताओं ने जश्न भी मनाना शुरू कर दिया है। लेकिन सपा मुखिया अखिलेश यादव के नाम पर अभी भी सस्पेंस बरकरार है। पार्टी सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव कन्नौज से चुनाव लड़ सकते हैं। बीते दिनों के आकड़ों पर नजर डाली जाए, तो अखिलेश कन्नौज के कई दौरे कर चुके हैं। दरअसल मैनपुरी लोकसभा सीट सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव का गढ़ मानी जाती थी। मुलायम सिंह के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेदारी अखिलेश यादव के कंधों पर है। नेताजी के निधन के बाद मैनपुरी में उपलोकसभा चुनाव हुए थे। पिता की विरासत को संभालने के लिए अखिलेश यादव ने अपनी पत्नी डिंपल यादव को चुनावी मैदान में उतारा था। उपचुनाव में डिंपल ने बीजेपी के रघुराज शाक्य को हराया था। मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज करने के साथ ही चाचा-भतीजे के बीच चल रहे विवाद का अंत हो गया था। पूरा परिवार एक बार फिर से एकजुट हो गया था। अखिलेश और डिंपल चाचा शिवपाल को मनाने पहुंचे थे। मैनपुरी में जीत दर्ज करने के बाद शिवपाल सिंह यादव नेताजी की समाधी पर नमन करने पहुंचे थे। इसके बाद शिवपाल ने प्रसपा का सपा में विलय कर दिया था।

मैनपुरी लोकसभा सीट में जसवंत नगर विधानसभा सीट आती हैं। जसवंत नगर सीट से शिवपाल सिंह यादव बीते कई दशकों से विधायक हैं। यह सीट मुलायम सिंह की परिवारिक सीट मानी जाती है। इस सीट में सबसे ज्यादा लोधी और शाक्य वोटरों की संख्या है। यदि मैनपुरी लोकसभा सीट के परिणामों के आकड़ों पर नजर डाली जाए, तो जब जसवंत नगर विधानसभ सीट की ईवीएम खुलते ही सपा बढ़त बना लेती है। शिवपाल सिंह यादव ने परिवारिक कलह के बाद प्रसपा का गठन किया था। उस वक्त पूर्व सांसद रघुराज शाक्य ने हनुमान की भूमिका निभाई थी। रघुशाक्य ने सपा का साथ छोड़कर शिवपाल से साथ खड़े थे। शिवपाल सिंह ने रघुराज शाक्य को प्रसपा में कानपुर-बुंदेलखंड का प्रभारी भी बनाया था। रघुराज शाक्य शिवपाल को अपना राजनीतिक गुरू भी मानते थे। लेकिन विधानसभा चुनाव 2022 में रघुराज शाक्य ने बीजेपी का दामन थाम लिया था। बीजेपी ने रघुराज शाक्य को मैनपुरी सीट से प्रत्याशी बनाकर बड़ा दांव खेला था। लेकिन चाचा-भतीजे के एक साथ आने से बीजेपी दांव उल्टा पड़ गया था।

इत्र नगरी कन्नौज को समाजवादी पार्टी का गढ़ माना है। लेकिन बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में कन्नौज में कमल खिलाया था। बीजेपी के सुब्रत पाठक ने डिंपल यादव को हराकर शानदार जीत दर्ज की थी। बीजेपी कन्नौज की तहर ही मैनपुरी में कमल खिलाकर सपा के गढ़ को भेदने की तैयारी कर रही है। वहीं, सपा ने भी कमर कस ली है। मैनपुरी लोकसभा सीट की कमान इस बार भी शिवपाल के हाथों में रहने वाली है। चुनावी रणनीति से लेकर प्रचार की भी जिम्मेदारी शिवपाल सिंह यादव के पास रहने वाली है।

सपा ने फिरोजाबाद लोकसभा सीट पर चचेरे भाई अक्षय यादव को मैदान में उतारा है। लोकसभा चुनाव 2019 में अक्षय यादव की लड़ाई बीजेपी के डॉ चंद्र सेन जादोन के साथ ही चाचा शिवपाल सिंह यादव से भी थी। शिवपाल सिंह फिरोजाबाद से लोकसभा सभा चुनाव लड़े थे। इस त्रिकोणीय लड़ाई में बीजेपी के डॉ चंद्र सेन जादोन ने जीत दर्ज की थी। लेकिन अक्षय यादव बहुत ही कम अंतराल से हारे थे। शिवपाल सिंह यादव ने परिवारिक कलह के बाद प्रसपा का गठन किया था। उस वक्त पूर्व सांसद रघुराज शाक्य ने हनुमान की भूमिका निभाई थी। रघुशाक्य ने सपा का साथ छोड़कर शिवपाल से साथ खड़े थे। शिवपाल सिंह ने रघुराज शाक्य को प्रसपा में कानपुर-बुंदेलखंड का प्रभारी भी बनाया था। रघुराज शाक्य शिवपाल को अपना राजनीतिक गुरू भी मानते थे।बीजेपी के डॉ चंद्र सेन जादोन को 4,95,819 वोट मिले थे। वहीं, अक्षय यादव को 4,67,038 वोट मिले थे। शिवपाल सिंह ने 91,869 मत हासिल किए थे। यदि शिवपाल सिंह चुनाव नहीं लड़ते, तो अक्षय यादव की जीत पक्की थी। लोकसभा चुनाव 2024 में सपा फिरोजाबाद सीट पर अपना दावा कर रही है।

जानिए पैका लिमिटेड के वाइस प्रेसिडेंट के बारे में सबकुछ!

आज हम आपको पैका लिमिटेड के वाइस प्रेसिडेंट के बारे में जानकारी देने वाले हैं! कभी-कभी आपका दिल कुछ और चाहता है, लेकिन घरवालों के दवाब में या फिर पिताजी की इच्छा को देखते हुए करते कुछ और हैं। ऐसा ही कुछ हुआ है अमेरिका में रहने वाले वेद कृष्ण के साथ। वेद कृष्ण अयोध्या में जन्मे, वहीं पले-बढ़े। देहरादून के वैलहम ब्वॉयज स्कूल से पढ़ाई की। फिर उच्च शिक्षा के लिए यूके के लंदन मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी चले गए। लेकिन जब घर से बुलावा आया तो वापस अयोध्या लौट कर बाबूजी का कारोबार संभाल लिया। आज उसी पुश्तैनी कारोबार को उन्होंने इतनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया कि उनका एक्सपोर्ट 40 से भी ज्यादा देशों में होता है। वह मैकडोनाल्ड जैसी एमएनसी को पैकिंग पेपर सप्लाई करते हैं। ग्वाटेमाला में एक फैक्ट्री लगाने वाले हैं। आज हम बात करते हैं पैका लिमिटेड के वाइस प्रेसिडेंट वेद कृष्ण के बारे में। वेद कृष्ण याद करते हैं 1990 का दशक, जब वह विदेश से भारत लौट आए थे। वजह थी बाबूजी का अनुरोध। दरअसल, उनके बाबूजी के.के. झुनझुनवाला ने साल 1981 के दौरान अयोध्या में एक छोटी सी फैक्ट्री लगाई थी। यह फैक्ट्री थी कागज की। उनकी फैक्ट्री में सामान्य कागज नहीं बनते थे बल्कि बादामी रंग के कागज बनते थे। उसका उपयोग लिफाफा या ढोंगा बनाने में होता था। कंपनी का नाम था यश पेपर्स। शुरू में तो कारोबार ठीक चला लेकिन 90 के दशक में यह टर्बोलेंट फेज में आ गई। तभी वेद अयोध्या लौटे थे। उसे संभालने की कोशिश की, पर नहीं संभला। इसके बाद कंपनी को बेचने की भी कोशिश की लेकिन यह बिकी भी नहीं।

जब उनकी कंपनी बिकी नहीं, तो उसी को चलाने की कोशिश होने लगी। इसी बीच 2005 में उनके पिताजी का निधन हो गया। फैक्ट्री में कभी कुछ ट्राई किया कभी कुछ ट्राई किया। प्रोडक्ट गलत चुना लिया, मशीन गलत चुन ली। इससे सफल नहीं हो पाते थे। वेद कृष्ण याद करते हैं कि उन्हें सदा से ही नेचर से जुड़ी चीजों में दिलचस्पी थी। क्लीनर अर्थ को लेकर वह सदैव प्रयासरत रहते थे। इसके बाद उन्होंने यश पेपर को फ्लेक्जिबल और सस्टेनेबल पैकेजिंग प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी में बदला। साल 2007-08 में फूड ग्रेड पेपर बनाना शुरू किया। इसके बाद कंपनी की एक नई पहचान बनी।

वेद कृष्ण ने इसके बाद एक कंपोस्टेबल टेबलवेयर बनाने का काम शुरू किया। इसका ब्रांड चक लॉन्च किया। इसके तहत गन्ने की खोई से खाने के प्लेट और पैकेजिंग प्रोडक्ट बनाना शुरू किया। यह प्रोडक्ट उपयोग के बाद कंपोस्ट बन जाता है जो धरती या पर्यावरण के लिए नुकसानदेह नहीं है। कुछ साल बाद सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया। लोगों में सिंगल यूज प्लास्टिक के बारे में जागरूकता भी बढ़ी। और फिर चक ब्रांड की तो निकल पड़ी। चक ब्रांड के छाने के पीछे एक वजह तो यह भी है कि टेबलवेयर को यदि गाय भी खा ले तो उसके लिए यह कोई हानिकारक नहीं है, क्योंकि यह गन्ने की खोई का बना है। इसी के साथ पैकेजिंग प्रोडक्ट का एक्सपोर्ट भी शुरू किया। कारोबार बदला तो वेद कृष्ण की कंपनी को शानदार सफलता हासिल हुई। वह बताते हैं कि दुनिया भर से अच्छी मशीनों की एक्विजिशन शुरू की। इंडस्ट्री में उपलब्ध बेस्ट टेलेंट को किसी भी कीमत पर हायर किया। और नए सिरे से काम शुरू किया। जब नया काम शुरू हुआ तो सफलता भी मिली। उसे मैकडोनाल्ड जैसी एमएनसी से पैकेजिंग मैटेरियल के आर्डर मिले। विदेशों में निर्यात होने लगा। इाज की तारीख में कंपनी का एक्सपोर्ट 40 से भी ज्यादा देशों में हो रहा है। यही नहीं कंपनी ने हाल ही में ग्वाटेमाला में फैक्ट्री लगाने की शुरुआत की है। कंपनी ने वहां जमीन भी खरीद ली है। इस कारोबार को और आगे बढ़ाने की तैयारी है।

इस बीच कंपनी में काफी कुछ बदला। वेद कृष्ण ने कंपनी के रेगुलर काम को अलविदा कह दिया। वह कंपनी के सीईओ के पद से हट गए। वहां एक प्रोफेशनल को बिठाया। वह बाहर से रणनीति बनाते और कंपनी को कोई प्रोफेशनल चलाने लगा। साल 2019 में यश पेपर्स का नाम बदल कर यश पैका लिमिटेड कर दिया गया। इसके बाद एक बाद फिर नाम बदला और अब इस कंपनी का नाम पैका लिमिटेड है। कंपनी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड है। सोमवार, 29 जनवरी 2024 को इस कंपनी का 10 रुपये का एक शेयर 357.75 रुपये पर बंद हुआ है। इसी के साथ कंपनी का मार्केट कैप भी 1401.63 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।

पैका लिमिटेड के शेयर साल 2014 में 17 जनवरी को 5 रुपये के स्तर पर कारोबार कर रहे थे। वहीं इस साल यानी 2024 में 29 जनवरी को शेयर 357 रुपये के लेवल पर पहुंच गए हैं। कंपनी के शेयरों ने इस दौरान करीब 7100 फीसदी का उछाल हासिल किया है। बीते 4 साल से कम समय में यह शेयर 1700 फीसदी से ज्यादा उछला है। कंपनी के शेयर साल 2020 में 3 अप्रैल को 20 रुपये के स्तर पर कारोबार कर रहे थे। वहीं पिछले एक साल की बात करें तो पैका लिमिटेड ने निवेशकों को करीब 300 फीसदी का छप्परफाड़ रिटर्न दिया है।

आखिर 2024 के लिए पीएम मोदी के क्या है दो बड़े काटे!

आज हम आपको पीएम मोदी के उन दो बड़े कांटों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो 2024 में उनकी राह में रोड़े पैदा कर सकते हैं!  नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के बीच में बिहार और महाराष्ट्र बीजेपी के लिए राजनीतिक मुसीबत बन गए थे। चुनाव से पहले साथी रहे नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे ने विपक्ष के साथ मिलकर बीजेपी को दोनों ही राज्यों की सत्ता से बाहर कर दिया। लेकिन बाद में बीजेपी ने जिस तरह इन दोनों ही राज्यों में वापसी की, उसी में 2024 के लिए उसकी रणनीति का मर्म छिपा हुआ है। ये रणनीति है RCE की यानी रीन्यूअल नवीनीकरम, कंसोलिडेशन एकीकरण और एक्सपांसन विस्तार। यूपी और पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बिहार और महाराष्ट्र लोकसभा में 40 या उससे ज्यादा सीटों के साथ ‘बिग 4’ राज्यों में आते हैं। संसद की 543 सीटों में से 210 सीटें इन्हीं राज्यों की हैं। बीजेपी ने 2019 में इनमें से अकेले 120 सीटें जीती थीं, और एनडीए सहयोगियों के साथ यह संख्या 162 थी। पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए कम से कम दो ‘बिग 4’ राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करना होगा। यूपी तो भाजपा के लिए सुरक्षित है, लेकिन बिहार और महाराष्ट्र में गठबंधन की राजनीति पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। हालांकि, राज्य इकाइयां जोर लगाकर कह रही थीं कि उन्हें अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, ताकि शिवसेना और जेडीयू के ‘विश्वासघात’ से हुए नुकसान को कम किया जा सके। लेकिन 2024 में बड़े बहुमत के लिए, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने सोचा कि उन्हें यह करना चाहिए, अपने 2019 के वोट बैंक को टूटने से बचाने के लिए पूरी कोशिश करें। इस आधार को बढ़ाने के लिए और रास्तों की तलाश करें। अपनी उपस्थिति का भौगोलिक दायरा बढ़ाएं ताकि अगर कुछ जगह झटके लगे भीं तो उसकी रिकवरी के लिए अधिक विकल्प मिल सकें। इन उद्देश्यों के लिए, बीजेपी की रणनीति दो व्यापक नीतियों पर आधारित लगती है, नई प्रतिभाओं को आकर्षित, समायोजित और बढ़ावा देना। विपक्ष को कमजोर करना ताकि उनका एक साथ आना मुश्किल हो। राज्यों को 3 श्रेणियों में बांटकर बीजेपी अपनी रणनीति बना रही है. 

उन राज्यों में जहां बीजेपी परंपरागत रूप से मजबूत है, पार्टी खुद को नए स्वरूप में पेश कर रही है। गुजरात इसका उदाहरण है। 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को मुश्किल हुई थी, लेकिन 2022 में जबरदस्त जीत हासिल की। एक बड़ा कारण था 40 में से 111 मौजूदा विधायकों को बदलना, जिसमें 5 मंत्री भी शामिल थे। इससे पार्टी ने खुद को नया बनाया। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी नए मुख्यमंत्रियों को लाकर बीजेपी ने पार्टी के अंदर प्रतिभाओं को मौका देने का संदेश दिया है।

जिन राज्यों में बीजेपी की मजबूत उपस्थिति है, वहां वह अपने सहयोगियों को साथ रखने और चुनावी गणित को मजबूत करने की रणनीति बना रही है। बिहार और महाराष्ट्र इस श्रेणी में आते हैं। कार्यकाल के पहले भाग में विपक्ष से पिछड़ने के बाद, बीजेपी ने विपक्ष के अंदर की दरारों का फायदा उठाकर वापसी की है। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद का त्याग भी इसी रणनीति का हिस्सा था। पार्टी ने शिवसेना और एनसीपी के टूटे हुए गुटों को जोड़कर अपने वोट बैंक को मजबूत किया है।

2019 में बीजेपी का फोकस पूर्व की ओर था। कम उपस्थिति वाले राज्यों में पार्टी ने दूसरे दलों के नेताओं को आकर्षित कर खुद को खड़ा किया। असम इस रणनीति की सफलता का उदाहरण है। 2024 में बीजेपी का ध्यान दक्षिण की ओर है। दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी या तो पहले से मजबूत है या फिर उसकी स्पष्ट मौजूदगी है। हालांकि कर्नाटक में राज्य चुनाव हारने के बावजूद, पार्टी को लगता है कि यह बोम्मई सरकार के खिलाफ नाराजगी का नतीजा था। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी के प्रचार से बीजेपी कर्नाटक में वापसी करेगी। दक्षिण के सभी राज्यों को एक समान नहीं समझना चाहिए। बीजेपी भी ऐसा नहीं करती। पार्टी अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग रणनीति बना रही है।

तेलंगाना में बीजेपी अभी एक छोटी पार्टी है। लेकिन हाल में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपने वोटशेयर को बढ़ाकर दोगुना करने में कामयाबी हासिल की है। उसे 14 प्रतिशत वोट मिले। भारत राष्ट्र समिति के खिलाफ हुए वोटों में कांग्रेस सबसे ज्यादा फायदेमंद रही। बीआरएस से छिटके वोटों में से करीब 6.5 से 7 प्रतिशत तक बीजेपी के साथ जुड़े जबकि सबसे ज्यादा 11 प्रतिशत कांग्रेस के साथ जुड़े। बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी तीसरे कार्यकाल के लिए प्रचार करते हुए कांग्रेस की तुलना में ज्यादा BRS विरोधी वोट हासिल करेंगे। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में बीजेपी को अपने गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन तय है। लेकिन आंध्र प्रदेश में स्थिति अनिश्चित है। वहां वाईएसआर कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी के बीच लड़ाई है। अभी तक भाजपा दोनों के साथ समान दूरी बनाए रख रही है। उसे पता है कि दोनों के साथ चुनावी फायदा हो सकता है लेकिन चुनाव नजदीक आने पर फैसला लेना ही होगा। केरल में पार्टी कमजोर है और सिर्फ कुछ इलाकों में ही सेंध लगाने की कोशिश करेगी। बीजेपी 2024 में ‘नंबरों से हटकर’ राजनीतिक रणनीति अपनाएगी, जिससे पूरे देश में उसे स्वीकार्यता मिले। मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है, सीमाओं पर और उत्तर-दक्षिण के बीच। इसे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े घटनाक्रमों और पंजाब पर मोदी की नजर में देखा जा सकता है।

राज्यों के हिसाब से अलग-अलग रणनीति बनाना, यानी नवीनीकरण, एकीकरण और विस्तार, बीजेपी की 2024 रणनीति का मुख्य हिस्सा है। महाराष्ट्र और अब बिहार में जो हुआ है, वह बीजेपी के चुनाव रथ के चलने का ही एक हिस्सा है।

महागठबंधन का साथ छोड़ क्या नीतीश कुमार ने सही किया?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि महागठबंधन का साथ छोड़ क्या नीतीश कुमार ने सही किया या नहीं! बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपने स्वभाव के अनुरूप पाला बदल लिया है। लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने एक बार फिर एनडीए का दामन थामा है। शाम 5 बजे नीतीश 9वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। उससे पहले बयानबाजियों का दौर जारी है। AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने तो इस पूरे घटनाक्रम पर बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि मैं तो शुरू से कहता था कि नीतीश कुमार भाजपा में जाएंगे। ओवैसी ने आगे कहा कि हम तो यह पूछना चाहते हैं कि तेजस्वी यादव को इसके बाद कैसा लग रहा है? ओवैसी ने आरोप लगाया कि तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी ने हमारे 4 विधायक तोड़े थे। जो खेल हमारे साथ हुआ था, अब वह आपके साथ हो गया। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन से खुद को अलग कर, बिहार में लालू की पार्टी से नाता तोड़कर एनडीए का दामन वापस थाम लिया है। लेकिन AIMIM के सर्वेसर्वा असदुद्दीन ओवैसी ने तेजस्वी यादव को ही निशाने पर ले लिया। ओवैसी ने बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम पर निशाना साधते हुए कहा कि आपने हमारी पार्टी के 4 विधायकों तो तोड़ा था। अब तेजस्वी यादव को कैसा लग रहा है? ओवैसी ने आगे कहा कि अब तेजस्वी यादव को समझ आ रहा होगा कि कैसा लगता है। जो खेल तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी ने हमारे साथ खेला, वही खेल उनके साथ हो गया। ओवैसी ने पूछा कि आपने नीतीश कुमार को दो-दो बार सीएम बनाया लेकिन आपको हासिल क्या हुआ?

असदुद्दीन ओवैसी यहीं नहीं रुके। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और साथ ही पीएम मोदी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बिहार में जो राजनीतिक फेरबदल हो रहा है, उसके लिए नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और पीएम मोदी को बिहार की जनता से माफी मांगनी चाहिए। इन सभी ने जनता को वादों और अपनी पार्टियों के सिद्धांतों से धोखा दिया है। इसमें सबसे बड़ा रोल नीतीश कुमार का है। कल तक तो नीतीश कुमार ओवैसी को बीजेपी की ‘बी’ टीम बोलते थे, लेकिन अब खुद उसी के साथ सरकार बना रहे हैं। बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार पलटी मारकर एक बार फिर एनडीए के खेमे में चले गए हैं। नीतीश कुमार की उलट पुलट की राजनीति से इंडिया गठबंधन के नेताओं में काफी नाराजगी है। वहीं इंडिया गठबंधन में जो राजनीतिक दल शामिल नहीं है, वह नीतीश की पलटी पर जमकर मजे ले रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को ठेंगा दिखाकर इंडिया गठबंधन की अबतक तैयारियों पर पानी फेर दिया है। नीतीश कुमार की इस हरकत से बेहद नाराज कांग्रेस ने उन्हें ‘आया राम-गया राम’ कहा है। साथ ही नीतीश की तुलना गिरगिट से की है। वहीं आरजेडी ने भी नीतीश को ‘थका हुआ नेता’ बोलकर अपने दिल की भड़ास निकाली है। आइए जानते हैं नीतीश को लेकर राजनीतिक दलों का क्या प्रतिक्रिया है।

तृणमूल कांग्रेस ने बार-बार पाला बदलने के लिए JDU के अध्यक्ष नीतीश कुमार की आलोचना की। TMC ने कहा कि लोग ऐसी अवसरवादिता का माकूल जवाब देंगे। पार्टी के सांसद सौगत रॉय ने कहा, ‘नीतीश कुमार नियमित अंतराल पर पाला बदलने के लिए जाने जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने विपक्षी गठबंधन को छोड़ने का फैसला किया है। यह गठबंधन के लिए कोई झटका नहीं है। एक अन्य TMC नेता ने नीतीश कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘पाला बदलने के उनके इतिहास के कारण ही तृणमूल हमेशा उनकी विश्वसनीयता को लेकर आशंकित रहती थी, लेकिन कांग्रेस ने कुमार को बहुत विश्वसनीय साझेदार माना।’ बंगाल सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम ने भरोसा जताया कि आगामी लोकसभा चुनावों में BJP को हराने में विपक्षी गठबंधन सफल होगा। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन के रचनाकारों में से एक हैं और यह गठबंधन संसदीय चुनावों में BJP को हरा देगा।

तमिलनाडु में सत्तासीन DMK ने कहा कि ‌नीतीश कुमार का I.N.D.I.A. से निकल जाना BJP के लिए नुकसानदेह और विपक्षी गठबंधन के लिए फायदेमंद है। DMK प्रवक्ता जे. कांस्टेडाइन रवींद्रन ने कहा, ‘लोग इस विश्वासघात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। लोग सही वक्त पर नीतीश कुमार को सबक सिखाएंगे। पार्टी के नेता टी. आर. बालू ने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि केवल हिंदी बोली जानी चाहिए और हमने I.N.D.I.A. के लिए इसे सहन किया। उधर झारखंड मुक्ति मोर्चा JMM के महासचिव और प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि नीतीश कुमार का इस्तीफा अपेक्षित था, क्योंकि विश्वासघात उनका राजनीतिक चरित्र रहा है।

कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बता दिया तो वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट तक कहा। खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बताते हुए यहां तक कह दिया, ‘देश में ‘आया राम-गया राम’ जैसे कई लोग हैं। पहले वो और हम मिलकर लड़ रहे थे। जब मैंने लालू यादव और तेजस्वी यादव से बात की तो उन्होंने भी कहा कि नीतीश जा रहे हैं। अगर वह रुकना चाहते तो रुक जाते लेकिन वह जाना चाहते हैं, इसलिए ये बात हमें पहले से ही पता थी, लेकिन इंडिया गठबंधन को बरकरार रखने के लिए हमने कुछ नहीं कहा।’ वहीं जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट बताते हुए एक्स पर पोस्ट कर कहा, ‘बार-बार राजनीतिक साझेदार बदलने वाले नीतीश कुमार रंग बदलने में गिरगिटों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इस विश्वासघात के विशेषज्ञ और उन्हें इशारों पर नचाने वालों को बिहार की जनता माफ़ नहीं करेगी। बिलकुल साफ़ है कि भारत जोड़ो न्याय यात्रा से प्रधानमंत्री और भाजपा घबराए हुए हैं और उससे ध्यान हटाने के लिए यह राजनीतिक ड्रामा रचा गया है।’