Thursday, March 5, 2026
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आखिर 2024 के लिए पीएम मोदी के क्या है दो बड़े काटे!

आज हम आपको पीएम मोदी के उन दो बड़े कांटों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो 2024 में उनकी राह में रोड़े पैदा कर सकते हैं!  नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के बीच में बिहार और महाराष्ट्र बीजेपी के लिए राजनीतिक मुसीबत बन गए थे। चुनाव से पहले साथी रहे नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे ने विपक्ष के साथ मिलकर बीजेपी को दोनों ही राज्यों की सत्ता से बाहर कर दिया। लेकिन बाद में बीजेपी ने जिस तरह इन दोनों ही राज्यों में वापसी की, उसी में 2024 के लिए उसकी रणनीति का मर्म छिपा हुआ है। ये रणनीति है RCE की यानी रीन्यूअल नवीनीकरम, कंसोलिडेशन एकीकरण और एक्सपांसन विस्तार। यूपी और पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बिहार और महाराष्ट्र लोकसभा में 40 या उससे ज्यादा सीटों के साथ ‘बिग 4’ राज्यों में आते हैं। संसद की 543 सीटों में से 210 सीटें इन्हीं राज्यों की हैं। बीजेपी ने 2019 में इनमें से अकेले 120 सीटें जीती थीं, और एनडीए सहयोगियों के साथ यह संख्या 162 थी। पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए कम से कम दो ‘बिग 4’ राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करना होगा। यूपी तो भाजपा के लिए सुरक्षित है, लेकिन बिहार और महाराष्ट्र में गठबंधन की राजनीति पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। हालांकि, राज्य इकाइयां जोर लगाकर कह रही थीं कि उन्हें अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, ताकि शिवसेना और जेडीयू के ‘विश्वासघात’ से हुए नुकसान को कम किया जा सके। लेकिन 2024 में बड़े बहुमत के लिए, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने सोचा कि उन्हें यह करना चाहिए, अपने 2019 के वोट बैंक को टूटने से बचाने के लिए पूरी कोशिश करें। इस आधार को बढ़ाने के लिए और रास्तों की तलाश करें। अपनी उपस्थिति का भौगोलिक दायरा बढ़ाएं ताकि अगर कुछ जगह झटके लगे भीं तो उसकी रिकवरी के लिए अधिक विकल्प मिल सकें। इन उद्देश्यों के लिए, बीजेपी की रणनीति दो व्यापक नीतियों पर आधारित लगती है, नई प्रतिभाओं को आकर्षित, समायोजित और बढ़ावा देना। विपक्ष को कमजोर करना ताकि उनका एक साथ आना मुश्किल हो। राज्यों को 3 श्रेणियों में बांटकर बीजेपी अपनी रणनीति बना रही है. 

उन राज्यों में जहां बीजेपी परंपरागत रूप से मजबूत है, पार्टी खुद को नए स्वरूप में पेश कर रही है। गुजरात इसका उदाहरण है। 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को मुश्किल हुई थी, लेकिन 2022 में जबरदस्त जीत हासिल की। एक बड़ा कारण था 40 में से 111 मौजूदा विधायकों को बदलना, जिसमें 5 मंत्री भी शामिल थे। इससे पार्टी ने खुद को नया बनाया। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी नए मुख्यमंत्रियों को लाकर बीजेपी ने पार्टी के अंदर प्रतिभाओं को मौका देने का संदेश दिया है।

जिन राज्यों में बीजेपी की मजबूत उपस्थिति है, वहां वह अपने सहयोगियों को साथ रखने और चुनावी गणित को मजबूत करने की रणनीति बना रही है। बिहार और महाराष्ट्र इस श्रेणी में आते हैं। कार्यकाल के पहले भाग में विपक्ष से पिछड़ने के बाद, बीजेपी ने विपक्ष के अंदर की दरारों का फायदा उठाकर वापसी की है। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद का त्याग भी इसी रणनीति का हिस्सा था। पार्टी ने शिवसेना और एनसीपी के टूटे हुए गुटों को जोड़कर अपने वोट बैंक को मजबूत किया है।

2019 में बीजेपी का फोकस पूर्व की ओर था। कम उपस्थिति वाले राज्यों में पार्टी ने दूसरे दलों के नेताओं को आकर्षित कर खुद को खड़ा किया। असम इस रणनीति की सफलता का उदाहरण है। 2024 में बीजेपी का ध्यान दक्षिण की ओर है। दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी या तो पहले से मजबूत है या फिर उसकी स्पष्ट मौजूदगी है। हालांकि कर्नाटक में राज्य चुनाव हारने के बावजूद, पार्टी को लगता है कि यह बोम्मई सरकार के खिलाफ नाराजगी का नतीजा था। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी के प्रचार से बीजेपी कर्नाटक में वापसी करेगी। दक्षिण के सभी राज्यों को एक समान नहीं समझना चाहिए। बीजेपी भी ऐसा नहीं करती। पार्टी अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग रणनीति बना रही है।

तेलंगाना में बीजेपी अभी एक छोटी पार्टी है। लेकिन हाल में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपने वोटशेयर को बढ़ाकर दोगुना करने में कामयाबी हासिल की है। उसे 14 प्रतिशत वोट मिले। भारत राष्ट्र समिति के खिलाफ हुए वोटों में कांग्रेस सबसे ज्यादा फायदेमंद रही। बीआरएस से छिटके वोटों में से करीब 6.5 से 7 प्रतिशत तक बीजेपी के साथ जुड़े जबकि सबसे ज्यादा 11 प्रतिशत कांग्रेस के साथ जुड़े। बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी तीसरे कार्यकाल के लिए प्रचार करते हुए कांग्रेस की तुलना में ज्यादा BRS विरोधी वोट हासिल करेंगे। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में बीजेपी को अपने गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन तय है। लेकिन आंध्र प्रदेश में स्थिति अनिश्चित है। वहां वाईएसआर कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी के बीच लड़ाई है। अभी तक भाजपा दोनों के साथ समान दूरी बनाए रख रही है। उसे पता है कि दोनों के साथ चुनावी फायदा हो सकता है लेकिन चुनाव नजदीक आने पर फैसला लेना ही होगा। केरल में पार्टी कमजोर है और सिर्फ कुछ इलाकों में ही सेंध लगाने की कोशिश करेगी। बीजेपी 2024 में ‘नंबरों से हटकर’ राजनीतिक रणनीति अपनाएगी, जिससे पूरे देश में उसे स्वीकार्यता मिले। मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है, सीमाओं पर और उत्तर-दक्षिण के बीच। इसे अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े घटनाक्रमों और पंजाब पर मोदी की नजर में देखा जा सकता है।

राज्यों के हिसाब से अलग-अलग रणनीति बनाना, यानी नवीनीकरण, एकीकरण और विस्तार, बीजेपी की 2024 रणनीति का मुख्य हिस्सा है। महाराष्ट्र और अब बिहार में जो हुआ है, वह बीजेपी के चुनाव रथ के चलने का ही एक हिस्सा है।

महागठबंधन का साथ छोड़ क्या नीतीश कुमार ने सही किया?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि महागठबंधन का साथ छोड़ क्या नीतीश कुमार ने सही किया या नहीं! बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपने स्वभाव के अनुरूप पाला बदल लिया है। लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने एक बार फिर एनडीए का दामन थामा है। शाम 5 बजे नीतीश 9वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। उससे पहले बयानबाजियों का दौर जारी है। AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने तो इस पूरे घटनाक्रम पर बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि मैं तो शुरू से कहता था कि नीतीश कुमार भाजपा में जाएंगे। ओवैसी ने आगे कहा कि हम तो यह पूछना चाहते हैं कि तेजस्वी यादव को इसके बाद कैसा लग रहा है? ओवैसी ने आरोप लगाया कि तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी ने हमारे 4 विधायक तोड़े थे। जो खेल हमारे साथ हुआ था, अब वह आपके साथ हो गया। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन से खुद को अलग कर, बिहार में लालू की पार्टी से नाता तोड़कर एनडीए का दामन वापस थाम लिया है। लेकिन AIMIM के सर्वेसर्वा असदुद्दीन ओवैसी ने तेजस्वी यादव को ही निशाने पर ले लिया। ओवैसी ने बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम पर निशाना साधते हुए कहा कि आपने हमारी पार्टी के 4 विधायकों तो तोड़ा था। अब तेजस्वी यादव को कैसा लग रहा है? ओवैसी ने आगे कहा कि अब तेजस्वी यादव को समझ आ रहा होगा कि कैसा लगता है। जो खेल तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी ने हमारे साथ खेला, वही खेल उनके साथ हो गया। ओवैसी ने पूछा कि आपने नीतीश कुमार को दो-दो बार सीएम बनाया लेकिन आपको हासिल क्या हुआ?

असदुद्दीन ओवैसी यहीं नहीं रुके। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और साथ ही पीएम मोदी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बिहार में जो राजनीतिक फेरबदल हो रहा है, उसके लिए नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और पीएम मोदी को बिहार की जनता से माफी मांगनी चाहिए। इन सभी ने जनता को वादों और अपनी पार्टियों के सिद्धांतों से धोखा दिया है। इसमें सबसे बड़ा रोल नीतीश कुमार का है। कल तक तो नीतीश कुमार ओवैसी को बीजेपी की ‘बी’ टीम बोलते थे, लेकिन अब खुद उसी के साथ सरकार बना रहे हैं। बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार पलटी मारकर एक बार फिर एनडीए के खेमे में चले गए हैं। नीतीश कुमार की उलट पुलट की राजनीति से इंडिया गठबंधन के नेताओं में काफी नाराजगी है। वहीं इंडिया गठबंधन में जो राजनीतिक दल शामिल नहीं है, वह नीतीश की पलटी पर जमकर मजे ले रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को ठेंगा दिखाकर इंडिया गठबंधन की अबतक तैयारियों पर पानी फेर दिया है। नीतीश कुमार की इस हरकत से बेहद नाराज कांग्रेस ने उन्हें ‘आया राम-गया राम’ कहा है। साथ ही नीतीश की तुलना गिरगिट से की है। वहीं आरजेडी ने भी नीतीश को ‘थका हुआ नेता’ बोलकर अपने दिल की भड़ास निकाली है। आइए जानते हैं नीतीश को लेकर राजनीतिक दलों का क्या प्रतिक्रिया है।

तृणमूल कांग्रेस ने बार-बार पाला बदलने के लिए JDU के अध्यक्ष नीतीश कुमार की आलोचना की। TMC ने कहा कि लोग ऐसी अवसरवादिता का माकूल जवाब देंगे। पार्टी के सांसद सौगत रॉय ने कहा, ‘नीतीश कुमार नियमित अंतराल पर पाला बदलने के लिए जाने जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने विपक्षी गठबंधन को छोड़ने का फैसला किया है। यह गठबंधन के लिए कोई झटका नहीं है। एक अन्य TMC नेता ने नीतीश कुमार की राजनीतिक विश्वसनीयता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘पाला बदलने के उनके इतिहास के कारण ही तृणमूल हमेशा उनकी विश्वसनीयता को लेकर आशंकित रहती थी, लेकिन कांग्रेस ने कुमार को बहुत विश्वसनीय साझेदार माना।’ बंगाल सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम ने भरोसा जताया कि आगामी लोकसभा चुनावों में BJP को हराने में विपक्षी गठबंधन सफल होगा। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी विपक्षी गठबंधन के रचनाकारों में से एक हैं और यह गठबंधन संसदीय चुनावों में BJP को हरा देगा।

तमिलनाडु में सत्तासीन DMK ने कहा कि ‌नीतीश कुमार का I.N.D.I.A. से निकल जाना BJP के लिए नुकसानदेह और विपक्षी गठबंधन के लिए फायदेमंद है। DMK प्रवक्ता जे. कांस्टेडाइन रवींद्रन ने कहा, ‘लोग इस विश्वासघात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। लोग सही वक्त पर नीतीश कुमार को सबक सिखाएंगे। पार्टी के नेता टी. आर. बालू ने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि केवल हिंदी बोली जानी चाहिए और हमने I.N.D.I.A. के लिए इसे सहन किया। उधर झारखंड मुक्ति मोर्चा JMM के महासचिव और प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि नीतीश कुमार का इस्तीफा अपेक्षित था, क्योंकि विश्वासघात उनका राजनीतिक चरित्र रहा है।

कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बता दिया तो वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट तक कहा। खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बताते हुए यहां तक कह दिया, ‘देश में ‘आया राम-गया राम’ जैसे कई लोग हैं। पहले वो और हम मिलकर लड़ रहे थे। जब मैंने लालू यादव और तेजस्वी यादव से बात की तो उन्होंने भी कहा कि नीतीश जा रहे हैं। अगर वह रुकना चाहते तो रुक जाते लेकिन वह जाना चाहते हैं, इसलिए ये बात हमें पहले से ही पता थी, लेकिन इंडिया गठबंधन को बरकरार रखने के लिए हमने कुछ नहीं कहा।’ वहीं जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट बताते हुए एक्स पर पोस्ट कर कहा, ‘बार-बार राजनीतिक साझेदार बदलने वाले नीतीश कुमार रंग बदलने में गिरगिटों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इस विश्वासघात के विशेषज्ञ और उन्हें इशारों पर नचाने वालों को बिहार की जनता माफ़ नहीं करेगी। बिलकुल साफ़ है कि भारत जोड़ो न्याय यात्रा से प्रधानमंत्री और भाजपा घबराए हुए हैं और उससे ध्यान हटाने के लिए यह राजनीतिक ड्रामा रचा गया है।’

जानिए ताजमहल की डायना बेंच के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको ताजमहल की डायना बेंच के बारे में जानकारी देने वाले हैं! दुनिया के 7 अजूबों में शामिल ताजमहल को देखने के लिए देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं। यहां आए लोगों के दो ही सपने होते हैं। एक तो ताजमहल की चोटी पकड़ते हुए फोटो क्लिक करवाना और दूसरा ताजमहल के सामने बनी बेंच पर बैठकर तस्वीर क्लिक करवाना। अगर आप भी कभी ताजमहल का दीदार करने गए होंगे तो इन दो पोज में तस्वीर जरूर क्लिक करवाई होगी। आज हम उसी बेंच की कहानी बताने वाले हैं कि एक बेंच टूरिस्ट की इतनी पसंदीदा क्यों हो गई। ताजमहल की तरह ये बेंच भी सफेद संगमरमर से बनी हुई है। ऐसे में हर कोई यही सोचता है कि इस बेंच को भी शाहजहां ने ताजमहल के साथ बनवाया होगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। इस डायना बेंच को 1902 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन आगरा आए थे। उन्होंने ही अपने कार्यकाल में इसे बनवाया था। दरअसल उन्होंने अपने कार्यकाल में ताजमहल में कई बदलाव किए थे। जिसमें लंबे- लंबे पेड़ों की कटाई की गई थी। उसी दौरान 1907-1908 में संगमरमर की चार बेंच लगाई गई थी। जिसमें से एक बेंच ये भी है।

अगर आप ताजमहल देखने गए होंगे तो आपने भी ये बेंच जरूर देखी होगी लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस बेंच का एक नाम भी है। आपके पल को यादगार बनाने वाली इस बेंच को ‘डायना बेंच’ कहते हैं। चलिए फिर आपको इस बेंच के नाम के पीछे की कहानी बताते हैं। दरअसल 1992 में प्रिंसेस डायना ताजमहल का दीदार करने भारत आई हुई थीं। उस दौरान उन्होंने इस बेंच पर बैठकर अकेले तस्वीर क्लिक करवाई। उनकी उस तस्वीर को पूरी दुनिया ने पसंद किया था। जिसके बाद से ही ताजमहल की ये बेंच डायना बेंच के नाम से फेमस हो गई।

ताजमहल का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने 1632 से 1648 के बीच करवाया था। बता दें कि ताजमहल को शाहजहां ने मुमताज की मृत्यु के बाद बेगम की याद में बनवाया था। ताजमहल एक मकबरा और प्यार की निशानी है। जिसे देखने के लिए विदेशों से लोग आते हैं। माना जा रहा है कि अब राम मंदिर की वजह से अयोध्या क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में पर्यटक आएंगे। बीते कुछ साल में लखनऊ में भी पर्यटक बढ़े हैं। यहां साल 2022 में करीब 57.55 लाख पर्यटक आए थे। इनमें 3401 विदेशी थे। वहीं, साल 2023 में सितंबर तक करीब 42.14 लाख पर्यटक आए। वाराणसी आने वाले पर्यटक बड़ी संख्या में लखनऊ भी आ रहे हैं।ब्रिटेन की प्रिंसेस डायना हो या अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप हो हर किसी ने इस बेंच पर बैठकर तस्वीर क्लिक कराई है। इसकी लोकप्रियता बढ़ने की एक बड़ी वजह तो ये भी है कि ये बेंच ताजमहल के बिल्कुल सीध में कुछ दूरी पर है। जिसके कारण इस बेंच पर बैठने के बाद पीछे फ्रेम में पूरा ताजमहल आ जाता है। जिसे कैमरे से क्लिक करके उस पल को हमेशा के लिए टूरिस्ट तस्वीर में कैद कर लेते हैं।

अमेरिकी कंपनी जेफ्फेरिज इक्विटी रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, मक्का में हर साल करीब दो करोड़ और वेटिकन सिटी में 90 लाख तीर्थयात्री आते हैं। इनके मुकाबले अयोध्या में हर साल पांच से दस लाख तीर्थयात्रियों के आने का अनुमान है। पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, यूपी में सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक ताजमहल के कारण आगरा रीजन में आते हैं। माना जा रहा है कि अब राम मंदिर की वजह से अयोध्या क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में पर्यटक आएंगे। बीते कुछ साल में लखनऊ में भी पर्यटक बढ़े हैं। यहां साल 2022 में करीब 57.55 लाख पर्यटक आए थे। इनमें 3401 विदेशी थे। वहीं, साल 2023 में सितंबर तक करीब 42.14 लाख पर्यटक आए। वाराणसी आने वाले पर्यटक बड़ी संख्या में लखनऊ भी आ रहे हैं।

यूपी के धार्मिक स्थलों के लिए पर्यटन विभाग जल्द ही टूर पैकेज लॉन्च करने की तैयारी में है। बता दें कि आपके पल को यादगार बनाने वाली इस बेंच को ‘डायना बेंच’ कहते हैं। चलिए फिर आपको इस बेंच के नाम के पीछे की कहानी बताते हैं। दरअसल 1992 में प्रिंसेस डायना ताजमहल का दीदार करने भारत आई हुई थीं। उस दौरान उन्होंने इस बेंच पर बैठकर अकेले तस्वीर क्लिक करवाई। उनकी उस तस्वीर को पूरी दुनिया ने पसंद किया था। जिसके बाद से ही ताजमहल की ये बेंच डायना बेंच के नाम से फेमस हो गई। इसी तरह आईआरसीटीसी भी नई योजना बना रहा है। आईआरसीटीसी दक्षिण भारत के कई धार्मिक टूर पैकेज लॉन्च कर चुका है। अब यूपी के कई धार्मिक शहरों का संयुक्त टूर पैकेज लॉन्च हो सकता है।

जानिए सुप्रीम कोर्ट के कुछ बड़े फैसलों के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको सुप्रीम कोर्ट के कुछ बड़े फैसलों के बारे में बताने जा रहे हैं! सुप्रीम कोर्ट ने हाल के दशकों में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं, जिनका असर कई साल तक रहेगा। सर्वोच्च कोर्ट ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद, आर्टिकल 370, ट्रिपल तलाक, अफजल गुरु को फांसी समेत कई अहम फैसले दिए। इसके साथ ही कोर्ट ने भारतीय मतदाताओं के लिए नोटा का विकल्प दिए जाने का भी अहम आदेश दिया था। इनके अलावा सेम सेक्स मैरिज समेत देश की सर्वोच्च अदालत के सुनाए गए कुछ ऐतिहासिक फैसलों की सारी डिटेल हम यहां दे रहे हैं। 9 नवंबर 2019 को राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर अंतिम फैसला हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ की विवादित जमीन असल में रामलला की जन्मभूमि है। कोर्ट ने जमीन को उस ट्रस्ट को सौंपने का फैसला सुनाया था, जिसे भारत सरकार ने बाद में बनाया। कोर्ट ने सरकार को 5 एकड़ जमीन मस्जिद के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को देने का निर्देश भी दिया था। अयोध्या मामले में 5 जजों की बेंच ने फैसला सुनाया था। इनमें प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के अलावा, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और पूर्व प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, पूर्व न्यायाधीश अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर शामिल थे। इन्होंने 9 नवंबर 2019 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। फैसले के बाद अब अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हुआ और 22 जनवरी को इसकी प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही श्रद्धालुओं की वर्षों पुरानी मनोकामना पूरी हो गई।

11 दिसंबर 2023 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 और 35A के निरस्तीकरण पर अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 370 हटाने को वैध करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा, जम्मू-कश्मीर को स्पेशल दर्जा देने वाला अनुच्छेद-370 अस्थायी प्रावधान है। स्पेशल दर्जा निरस्त करने के राष्ट्रपति के फैसले को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की पुष्टि की गई। यह फैसला कोर्ट की ओर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और उसके बाद जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं की एक श्रृंखला पर विचार करने के बाद आया। पांच जजों वाली संविधान पीठ ने सिर्फ संवैधानिक बदलावों को बरकरार रखा। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई में 5 जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि आर्टिकल 370 के प्रावधान अस्थायी थे और उन्हें निरस्त करने का फैसला संवैधानिक तौर पर सही है।

आतंकी अफजल गुरु को भारतीय संसद पर हमले में उसकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था। उसे मौत की सजा सुनाई गई। 4 अगस्त 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने अफजल की मौत की पुष्टि की। शौकत की सजा को 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया। 12 जनवरी 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने अफजल की मौत की सजा की समीक्षा की मांग वाली याचिका खारिज कर दी और कहा कि इसमें ‘कोई योग्यता नहीं है।’ 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में उसे फांसी पर लटका दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने दो जनवरी 2023 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। संवैधानिक पीठ ने नोटबंदी के फैसले पर सरकार को बड़ी राहत देते हुए कहा था कि इसमें कोई त्रुटि नहीं थी। पीठ ने बहुमत से माना कि नोटबंदी का उद्देश्य ठीक था। 8 नवंबर 2016 को हुई नोटबंदी को लेकर निर्णय प्रक्रिया में कोई त्रुटि नहीं मिली। कोर्ट ने 6 महीने तक चली लंबी सुनवाई के बाद माना कि नोटबंदी का फैसला सही था। गौर करने वाली बात यह है कि कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी का उद्देश्य ठीक था, भले ही वह उद्देश्य पूरा हुआ हो या न हुआ हो, निर्णय लेने की प्रक्रिया या उद्देश्य में कोई गलती नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान बेंच ने 17 अक्टूबर 2023 को फैसले में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार किया था। अदालत ने कहा था कि इसपर कानून बनाना संसद का काम है। समलैंगिकों की शादी को मान्यता देने से सुप्रीम कोर्ट ने एकमत से इनकार कर दिया। पांच जजों की बेंच में चार ने फैसला लिखा और तीन जजों का मत एक था। दो जजों के मत अलग थे। हालांकि, पांचों जज ने शादी की मान्यता देने से एकमत से इनकार कर दिया। गोद लेने के मामले को 3-2 के मत से खारिज कर दिया गया। सबसे पहले चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में ‘निजता के अधिकार’ को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने आदेश दिया था। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए अधिकार प्राकृतिक रूप से निजता का अधिकार संरक्षित है। फैसले से पहले मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इस सवाल पर तीन सप्ताह के दौरान करीब छह दिन तक सुनवाई की थी कि क्या निजता के अधिकार को संविधान में प्रदत्त एक मौलिक अधिकार माना जा सकता है? बाद में कोर्ट ने इसे संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई 2023 को अहम फैसला दिया था। इसमें कोर्ट कहा था कि दिल्ली सरकार के कंट्रोल में प्रशासनिक सेवा होगी। इसमें पब्लिक ऑर्डर, पुलिस, जमीन को अलग रखा गया। कहा गया कि चुनी हुई सरकार के पास ब्यूरोक्रेट का कंट्रोल होना चाहिए।

क्या लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कांग्रेस को कर दिया है कमजोर?

वर्तमान में लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया है! कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते-करते क्या बीजेपी विपक्ष मुक्त भारत की स्ट्रैटेजी की तरफ आगे बढ़ रही है। कांग्रेस समेत कई दूसरे विपक्षी दल सरकार पर ऐसा आरोप लगाते रहे हैं। बीते कल यानी रविवार को जब नीतीश कुमार बीजेपी के समर्थन से फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सवाल उठे कि बीजेपी जब जीत रही थी तो फिर उसे नीतीश की जरूरत क्यों। लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार को सिर्फ बिहार के एक नेता के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। नीतीश कुमार वह चेहरा थे जिन्होंने विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया और उनके ही प्रयासों का नतीजा था कि I.N.D.I.A गठबंधन बना। अब जबकि नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए हैं तो उनके ही राज्य बिहार में यह चर्चा चल रही है कि विपक्ष के बारात से बीजेपी दूल्हा लेकर चली गई। ऐसी चर्चा भले ही किसी गांव-कस्बे में हो रही है लेकिन इसके मायने तो निकाले ही जाएंगे। चुनाव से ठीक पहले बीजेपी की ओर से विपक्षी दलों पर करारा वार किया गया है। चोट गहरी है। 400+ के टारगेट के साथ बीजेपी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है और इस रणनीति के तहत ही ऐसा लग रहा है कि वह कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहती। चुनाव से पहले वह विपक्ष को काफी कमजोर कर देना चाहती है। महाराष्ट्र और बिहार ऐसे सामने दो उदाहरण भी हैं। पिछले लोकसभा चुनाव 2019 की बात की जाए तो बीजेपी 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और इन सभी सीटों पर उसे जीत हासिल हुई थी। इस बार जैसे समीकरण बन रहे थे तो उसमें विपक्ष भी यह मान रहा था कि 40 सीटों वाले राज्य में बीजेपी अपने पिछले आंकड़े से कम नहीं होगी। पिछली बार की तुलना में नुकसान बीजेपी को नहीं हो रहा था फिर बीजेपी को नीतीश की जरूरत क्यों। बिहार के राजनीतिक माहौल को देखा जाए तो नीतीश को बीजेपी की कहीं अधिक जरूरत महसूस हो रही थी। इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह है कि बीजेपी राज्य की सभी सीटों पर नजर बनाए हुए है। जेडीयू, बीजेपी और एलजेपी पिछले चुनाव में साथ गए थे तब 39 सीटों पर कब्जा जमाया था। एक सीट पर सिर्फ एनडीए का कब्जा नहीं हो सका। अब एक बार फिर बीजेपी का मिशन बिहार 40 ऑल पर है। नीतीश साथ नहीं रहते और इंडिया गठबंधन के दूसरे साथी जिसमें आरजेडी, वामदल, कांग्रेस सभी मिलकर लड़ते तो जेडीयू, कांग्रेस, आरजेडी सबके खाते में सीटें जाने की संभावना रहती। अब बीजेपी की कोशिश है कि राज्य में दूसरे दलों के खाते में सीटें न जाए। उसके और उसके सहयोगियों के पास ही सीटें रहे।

कुछ ऐसा ही कुछ समय पहले महाराष्ट्र में हुआ। शिवसेना टूट चुकी थी और बीजेपी के साथ मिलकर शिंदे सरकार चला रहे थे। इसी बीच एनसीपी में भी टूट की खबर आती है और अजित पवार अपने पार्टी के सांसदों और विधायकों को लेकर बीजेपी के पास चले आते हैं। शरद पवार की एनसीपी भी टूट जाती है। अजित पवार को डिप्टी सीएम बनाया जाता है। अजित पवार जब बीजेपी के साथ आते हैं तो तब कुछ ऐसे ही सवाल उठे थे कि जब शिवसेना टूट चुकी है और पर्याप्त संख्या भी विधानसभा में है तो फिर क्या जरूरत। इसको भी समझने के लिए लोकसभा चुनाव की ओर देखना जरूरी है। साथ ही बिहार और महाराष्ट्र के साथी दल वाले कनेक्शन को भी। महाराष्ट्र और बिहार सिर्फ इन दो राज्यों से ही लोकसभा की कुल 88 सीटें आती हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी दोनों साथ मिलकर लड़े और नतीजे बेहतर रहे। विधानसभा चुनाव में भी वैसा ही हुआ लेकिन सीएम पद को लेकर दोनों दूर हो गए। उद्धव ठाकरे विपक्षी खेमे में चले गए और सरकार बना लिए। सरकार बहुत दिन नहीं चली और उनकी पार्टी टूट गई। न केवल उद्धव बल्कि शरद पवार के सामने चुनौती काफी बड़ी हो गई है और बीजेपी उनकी मुश्किलों को कम नहीं होने दे रही है।

सिर्फ बड़े दल ही नहीं छोटे दलों को भी बीजेपी एनडीए में शामिल करा रही है। यूपी इसका एक अच्छा उदाहरण है। बीजेपी इस राज्य में मिशन 80 में जुटी हुई है। विपक्षी दलों के गठबंधन में न आने की बात कहकर मायावती अकेले ही चुनाव में जाने का ऐलान कर चुकी हैं। कांग्रेस को समाजवादी पार्टी ने यूपी में 11 सीटें देने की घोषणा की है। वहीं कांग्रेस कम से कम 20 सीटों पर लड़ना चाहती है। गठबंधन में कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा इसकी अंतिम घोषणा अभी नहीं हुई है। कांग्रेस के रुख को लेकर उसके सहयोगी दलों में नाराजगी देखी जा रही है। वहीं यूपी के अलावा दूसरे राज्यों में भी बीजेपी छोटे दलों को अपने साथ ला रही है। बिहार में चिराग पासवान, जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा को अपने साथ रखा है। 1998 में जब एनडीए बना था तो इसमें 24 पार्टियां शामिल हुई थीं। लेकिन कुछ पुराने साथी उससे दूर हो गए। अब एक बार फिर बीजेपी की हालिया कोशिश रंग ला रही है।

नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बने तो फिर देश में अगला चुनाव नहीं होगा,विपक्ष के कुछ नेता यह बात कहकर सवाल खड़ा करते हैं। हालिया बयान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का सामने आया है। ओडिशा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए सोमवार खरगे ने कहा कि यदि 2024 में मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे तो यह आम चुनाव देश का आखिरी चुनाव होगा। कांग्रेस की ओर से यह सवाल खड़े किए जा रहे हैं वहीं इंडिया गठबंधन के भीतर ही कांग्रेस की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। नीतीश कुमार की पार्टी ने भी कांग्रेस पर ही आरोप लगाया। वहीं नीतीश के अलग हो जाने के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि कांग्रेस की भूमिका अलग होनी चाहिए। उनको पद मिलना चाहिए था। बीजेपी क्यों नहीं चाहेगी कि विपक्ष कमजोर हो। विपक्ष की चिंता करना क्या सरकार की जिम्मेदारी है। विपक्ष एकजुट रहे साथ मिलकर लड़े यह किसकी जिम्मेदारी है। विपक्ष को इस सवाल का भी जवाब खोजना चाहिए।

जानिए राज्यसभा से कौन कौन-से नेता हो रहे हैं रिटायर?

आज हम आपको बताएंगे कि वर्तमान में राज्यसभा में कौन कौन-से नेता रिटायर हो रहे हैं! राज्यसभा की 56 सीटों अप्रैल के पहले हफ्ते में खाली होने जा रही हैं। इन्हें लेकर सोमवार केंद्रीय चुनाव आयोग ने चुनावों को ऐलान किया। इन सीटों के लिए आगामी 27 फरवरी को चुनाव होगा। इन खाली सीटों पर राजनीति के बड़े बड़े चेहरों का कार्यकाल खत्म हो रहा है। इनमें पूर्व पीएम मनमोहन सिंह से लेकर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा, एसपी की जया बच्चन, केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव, स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया, पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव, उद्योग मंत्री नारायण राणे, कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी, अखिलेश प्रताप सिंह, नासिर हुसैन जैसे लोग शामिल हैं। रिटायर हो रहे अन्य प्रमुख चेहरों में आईटी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, बीजेपी के मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी, सीनियर बीजेपी लीडर मुरलीधर, सुशील कुमार मोदी, पार्टी प्रवक्ता जीबी नरसिम्हा राव, सुधांशु त्रिवेदी, शिवसेना के अनिल देसाई, एनसीपी की वंदना चव्हाण, कांग्रेस के कुमार केतकर, आरजेडी के मनोज कुमार झा व अशफाक करीम, जेडीयू के अनिल प्रसाद हेगड़े और वशिष्ठ नारायण सिंह शामिल हैं।

राज्यसभा के इन चुनावों के मद्देनजर माना जा रहा है कि उच्च सदन में सियासी तस्वीर कुछ बदल सकती है। जहां कुछ सीटों में बीजेपी को नुकसान होगा तो वहीं कुछ राज्यों में उसे फायदा हो सकता है। दरअसल, मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में हुई बीजेपी की जीत उसकी सीटों में इजाफा करने में मददगार साबित होगी। जहां एक ओर लोकसभा चुनाव से ऐन पहले हो रहे इन चुनावों को लेकर तमाम सियासी दलों के सामने कई तरह के प्रश्न व समीकरण घूम रहे हैं। ज्यादातर पार्टियां इन सीटाें के लिए ऐसे उम्मीदवार देना चाहेंगी, जिसके जरिए वह आने वाले लोकसभा चुनाव में एक संकेत दे सकें। राजनीतिक दल मान रहे हैं कि राज्यसभा में उम्मीदवारों को चयन चुनाव के मद्देनजर कई तरह के संकेत देगा। गुजरात में दो सीटों का तो बंगाल में एक सीट का नुकसान होगा, वहीं हिमाचल प्रदेश व राजस्थान में एक-एक सीट तो तेलंगाना में दो सीटों का फायदा होने जा रहा है। जबकि कर्नाटक में पार्टी अपनी तीनों सीटें और मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में अपनी एक-एक सीट बचा पाने में कामयाब दिख रही है।इसीलिए विभिन्न पार्टियां जातिगत, सामाजिक समीकरणों को देखते हुए अपने उम्मीदवारों को चुनेंगी। वहीं कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी रिटायर हो रहे अपने कई सांसदों को लोकसभा लड़वा सकती है।

उल्लेखनीय है कि सदन में फिलहाल सबसे ज्यादा सदस्य बीजेपी के हैं, जिनकी तादाद 93 है, जबकि प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस की संख्या 30 है। इस चुनाव में कांग्रेस की नौ सीटें खाली हो रही हैं, लेकिन उसे दस सीटें मिलने का अनुमान है। इसमें कुछ राज्यों में जहां उसे नुकसान हो रहा है तो वहीं कुछ राज्यों में सीटों का फायदा है। बिहार में वह अपनी एक सीट बचा रही है। गुजरात में दो सीटों का तो बंगाल में एक सीट का नुकसान होगा, वहीं हिमाचल प्रदेश व राजस्थान में एक-एक सीट तो तेलंगाना में दो सीटों का फायदा होने जा रहा है। जबकि कर्नाटक में पार्टी अपनी तीनों सीटें और मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में अपनी एक-एक सीट बचा पाने में कामयाब दिख रही है।

यहां देखना भी अहम होगा, जिन सांसदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है, क्या उनके दल फिर से उन्हें मौका देंगे। इनमें अहम नाम पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, जया बच्चन व प्रकाश जावड़ेकर जैसे नामों का है। छह बार के राज्यसभा सांसद 92 वर्षीय मनमोहन सिंह का अपनी नरम सेहत के चलते अब फिर से राज्यसभा में लौटना मुश्किल लग रहा है। उनकी सेहत के चलते अब शायद ही कांग्रेस उन्हें मौका दे। वह फिलहाल राजस्थान से सांसद हैं। पिछली बार भी कांग्रेस ने 86 साल की उम्र में उन्हें सम्मान स्वरूप प्रतीकात्मक रूप से राज्यसभा भेजा था। वहीं जया बच्चन पर नजर रहेगी कि एसपी उन्हें फिर से मौका देती है या नहीं। राजनीतिक दल मान रहे हैं कि राज्यसभा में उम्मीदवारों को चयन चुनाव के मद्देनजर कई तरह के संकेत देगा। इसीलिए विभिन्न पार्टियां जातिगत, सामाजिक समीकरणों को देखते हुए अपने उम्मीदवारों को चुनेंगी। वहीं कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी रिटायर हो रहे अपने कई सांसदों को लोकसभा लड़वा सकती है।इसके अलावा, जाने-माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी पिछली बार टीएमसी के समर्थन से वेस्ट बंगाल से जीते थे। देखना होगा कि पार्टी उन्हें कहां से भेजती है। हालांकि कपिल सिब्बल के पार्टी छोड़ने के बाद बड़े वकीलों में सिंघवी सबसे अहम हैं, जो पार्टी के मुश्किल वक्त में खड़े होते रहे हैं।

जब भारत ने की पाकिस्तान की मदद!

हाल ही में भारत ने पाकिस्तान की भी मदद कर दी है! भारतीय नौसेना ने समुंदर में आज 19 पाकिस्तानी नाविकों को सोमाली डाकुओं के चुंगल से बचा लिया। जैसे ही नौसेना को संदेश मिला उसने तुरंत कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी लोगों को बचा लिया। नौसेना ने पूर्वी सोमालिया के पास एक मछली पकड़ने वाली नाव ‘अल नईमी’ और उसके चालक दल को बचाया। गौरतलब है कि सुमित्रा भारतीय नौसेना का स्वदेशी तट रक्षक जहाज है जिसे सोमालिया और अदन की खाड़ी के पूर्व में समुद्री डकैती रोकने और समुद्री सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है। 28 जनवरी को, एक ईरानी मछली पकड़ने वाली नाव ‘इमान’ के अपहरण संदेश मिलने पर जहाज ने तुरंत कार्रवाई की थी। डाकुओं ने चालक दल को बंधक बना लिया था। सुमित्रा ने जहाज को रोक लिया और 29 जनवरी की सुबह 17 ईरानी चालक दल के साथ नाव को सुरक्षित रूप से छुड़ा लिया।

INS सुमित्रा उसी दिन दोबारा एक्शन में आया। एक और ईरानी मछली पकड़ने वाली नाव ‘अल नईमी’ पर समुद्री डाकुओं ने हमला किया था और उसके 19 चालक दल के सदस्यों को बंधक बना लिया था। ये सभी पाकिस्तानी नागिरक थे। INS सुमित्रा ने बिना देरी किए नाव की लोकेशन का पता लगाया। इसके बाद तटरक्षकों ने हेलिकॉप्टर और बोट्स के जरिए चालक दल और नाव को छुड़ा लिया। INS सुमित्रा में तैनात जवानों ने नाव की तलाशी भी ली ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि डाकुओं ने कुछ छोड़ तो नहीं दिया और चालक दल सुरक्षित रहें।

INS सुमित्रा ने महज 36 घंटे के अंदर दो मछली पकड़ने वाली नावों को बचाकर समुंदर में नौसेना का पराक्रम को दुनिया को दिखाय दिया। ये नावें दक्षिणी अरब सागर में, कोच्चि से लगभग 850 किलोमीटर पश्चिम में समुद्री डाकुओं के कब्जे में थीं। इन नावों पर कुल 36 चालक दल थे, जिनमें 17 ईरानी और 19 पाकिस्तानी नागरिक शामिल थे। भारतीय नौसेना ने दिखा दिया कि वो समुद्र में सभी तरह के खतरों से लड़ने के लिए हमेशा तैयार है। लाल सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारतीय नौसेना देश के समुद्री हितों की रक्षा के लिए ऐक्शन मोड पर है। यह सक्रिय रुख इजराइल-हमास संघर्ष और हूती विद्रोहियों की ओर से वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने की बढ़ती धमकियों के बाद किया गया है। समुद्री डकैतों से निपटने के लिए नौसेना की पूरी तैयारी है। नौसेना ने इसका एक अदाहरण भी पेश किया है। दरअसल सोमालिया के पूर्वी तटीय क्षेत्र में तैनात एक भारतीय नौसैनिक युद्धपोत ने ईरान के झंडे वाले एक जहाज की ओर से मिली अपहरण संबंधी सूचना पर कार्रवाई की है। जहाज में कुछ समुद्री लुटेरे चढ़ गए थे। नौसेना के अधिकारियों ने सोमवार को कहा कि भारतीय नौसेना के इस उद्देश्य से तैनात युद्धपोत आईएनएस सुमित्रा ने तत्काल कार्रवाई करते हुए अपहृत जहाज और उसके चालक दल को रिहा करवाया।

नौसेना के प्रवक्ता कमांडर विवेक मधवाल ने कहा, ‘सोमलिया के पूर्वी तटों और अदन की खाड़ी में जलदस्यु रोधी अभियानों के लिए तैनात आईएनएस सुमित्रा ने ईरान के झंडे लगे मछली पकड़ने वाले जहाज ईमान के अपहरण के संबंध में सूचना पर कार्रवाई की। जहाज पर जलदस्यु चढ़ गए थे और चालक दल को बंधक बना लिया गया था।’ उन्होंने बताया कि आईएनएस सुमित्रा ने जहाज को रोका और समुद्री लुटेरों को चालक दल तथा जलपोत की सुरक्षित रिहाई के लिए बाध्य करने के वास्ते स्थापित मानक चालक प्रक्रियाओं एसओपी के अनुरूप काम किया।

मधवाल ने बताया कि जहाज पर चालक दल के सभी 17 सदस्यों और नौका को सफलतापूर्वक मुक्त कराया गया।लाल सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारतीय नौसेना देश के समुद्री हितों की रक्षा के लिए ऐक्शन मोड पर है। यह सक्रिय रुख इजराइल-हमास संघर्ष और हूती विद्रोहियों की ओर से वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने की बढ़ती धमकियों के बाद किया गया है। समुद्री डकैतों से निपटने के लिए नौसेना की पूरी तैयारी है। नौसेना ने इसका एक अदाहरण भी पेश किया है। उन्होंने बताया कि आईएनएस सुमित्रा ने जहाज को रोका और समुद्री लुटेरों को चालक दल तथा जलपोत की सुरक्षित रिहाई के लिए बाध्य करने के वास्ते स्थापित मानक चालक प्रक्रियाओं एसओपी के अनुरूप काम किया।दरअसल सोमालिया के पूर्वी तटीय क्षेत्र में तैनात एक भारतीय नौसैनिक युद्धपोत ने ईरान के झंडे वाले एक जहाज की ओर से मिली अपहरण संबंधी सूचना पर कार्रवाई की है। प्रवक्ता ने कहा, ‘हिंद महासागर क्षेत्र में जलदस्यु रोधी और समुद्री सुरक्षा अभियानों में भारतीय नौसैनिक युद्धपोतों की तैनाती समुद्र में सभी जहाजों और नाविकों की सुरक्षा के प्रति भारतीय नौसेना के दृढ़संकल्प को दर्शाती है।’

नीतीश कुमार ने 2022 में क्यों छोड़ा था बीजेपी का साथ?

आज हम आपको बताएंगे कि 2022 में नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ क्यों छोड़ा था! बिहार में राजनीतिक उठापटक के बीच नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है। नीतीश अब रविवार शाम को ही बीजेपी के समर्थन से फिर से राज्य में एनडीए की सरकार का नेतृत्व करेंगे। ऐसे में साल 2022 में बीजेपी से राहें जुदा करने वाले नीतीश आखिर क्यों फिर 2024 में एनडीएम में शामिल हुए हैं। यह एक अहम सवाल है। खास बात है कि जब अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ा था तो बीजेपी पर बड़े आरोप लगाए थे। उन्होंने बीजेपी पर उनकी पार्टी जेडीयू को ‘तोड़ने’ और ‘खत्म’ करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। इसके बाद उन्होंने पाला बदलकर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ सरकार बनाई थी। इतना ही नहीं, 3 महीने बाद ही नीतीश ने कहा था कि राजद के डिप्टी सीएम तेजस्वी प्रसाद यादव 2025 में महागठबंधन के विधानसभा चुनाव अभियान का नेतृत्व करेंगे। समय के साथ बिहार में एनडीए के वरिष्ठ सहयोगी, जेडीयू धीरे-धीरे खुद को सिकुड़ता हुआ देख रही थी। वह अपने जूनियर पार्टनर बीजेपी से लगातार पिछड़ रही थी। नीतीश बीजेपी से नाराज थे। इसकी वजह थी कि विधानसभा में उनकी पार्टी की सीटें 2015 में 71 सीट से घटकर 2020 के चुनावों में 43 सीटों पर आ गईं। दूसरी तरफ बीजेपी के सीटों की संख्या 53 से बढ़कर 74 हो गई। अपनी पार्टी के सहयोगियों के साथ निजी बातचीत में, नीतीश ने लोक जनशक्ति पार्टी एलजेपी के नेता चिराग पासवान को लगभग सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जेडीयू के सामने उम्मीदवार खड़ा करने के लिए बीजेपी को दोषी ठहराना शुरू कर दिया।

जेडीयू का मानना था कि चिराग ने उनकी पार्टी के वोट काटने और उसके उम्मीदवारों को हराने के लिए भाजपा के प्रॉक्सी के रूप में काम किया था। भले ही एलजेपी ने सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र जीता, लेकिन इसने नीतीश के वोट आधार में गंभीर सेंध लगाई। ऐसा कहा जाता है कि नीतीश कुमार डिप्टी सीएम रेनू देवी और तारकिशोर प्रसाद को लेकर सहज महसूस नहीं करते थे। इसकी वजह थी कि वह 13 साल तक डिप्टी सीएम रहे सुशील कुमार मोदी के साथ रहे थे। ऐसे में नए डिप्टी सीएम के साथ उनका तालमेल उतना अच्छा नहीं था। जेडीयू के तत्कालीन नेता आरसीपी सिंह, जो उस समय केंद्रीय मंत्री थे, का उपयोग करके इसे विभाजित करने के भाजपा के कथित प्रयासों से भी सावधान थे।

जेडीयू के अंदरूनी सूत्र कांग्रेस, राजद और इंडिया गुट के प्रति नीतीश के बढ़ते मोहभंग के कई कारण बताते हैं। इसका मुख्य कारण वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में उनका असहज महसूस होना बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले जेडीयू के कम से कम सात सांसद बीजेपी के संपर्क में हैं। ये सांसद 2019 में एनडीए के सामाजिक संयोजन के कारण जीते थे। राजद, कांग्रेस और वाम दलों के साथ गठबंधन में नीतीश ऐसे परिणाम की उम्मीद नहीं कर रहे थे। साथ ही, पूर्व पार्टी प्रमुख राजीव रंजन सिंह को छोड़कर जद (यू) के अधिकांश शीर्ष वरिष्ठ नेता भाजपा के साथ गठबंधन के पक्ष में थे। नीतीश को संभवतः यह अहसास हो गया था कि यदि उन्होंने कदम नहीं उठाया तो पार्टी में टूट हो सकती है।

पिछले महीने, उन्होंने जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ललन सिंह को हटाया था। माना जा रहा था कि ललन सिंह लालू प्रसाद और तेजस्वी के साथ निकटता बढ़ा रहे थे। यह बात नीतीश को पसंद नहीं थी। जेडी (यू) ने 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए के हिस्से के रूप में लड़ी गई 17 सीटों में से 16 पर जीत हासिल की। आंतरिक सर्वेक्षणों में उत्साहजनक परिणाम नहीं आने के कारण, नीतीश ने संभवतः यह अनुमान लगाया कि उनकी पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी जीत की संभावनाओं में सुधार करेगी। जद (यू) को संभवतः यह महसूस हुआ कि अयोध्या राम मंदिर का उद्घाटन, मोदी की लोकप्रियता और उनकी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के साथ मिलकर, एक जीत के फॉर्मूले का हिस्सा था।

रिपोर्ट के अनुसार नीतीश ही वो नेता थे जिन्होंने पिछले साल इंडिया ब्लॉक बनाने के लिए सभी पार्टियों को एक साथ लाने के लिए काम किया था। उन्हें इंडिया गठबंधन में प्रमुख पद की उम्मीद की थी। लेकिन टीएमसी और आप जैसी पार्टियों की बेचैनी के बीच ऐसा नहीं हो सका। 2017 के विपरीत, जब उसने महागठबंधन से अलग होने के लिए राजद को दोषी ठहराया था, इस बार जद (यू) कांग्रेस पर उंगली उठा रही है। वह कांग्रेस पर अन्य गठबंधन के सहयोगियों को बहुत अधिक जगह देने का आरोप लगा रही है। राहुल गांधी की तरफ से गठबंधन के बारे में बात करने के बजाय कांग्रेस की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू करने के बाद जद (यू) को भी गठबंधन में बने रहने का कोई कारण नजर नहीं आया। इंडिया ब्लॉक एक एकजुट इकाई के रूप में सामने आने और बीजेपी और मोदी को जवाबी बयान देने में विफल रहने पर, नीतीश ने फिर से अपनी पार्टी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक व्यावहारिक निर्णय लिया।

क्या नीतीश कुमार के सहारे बीजेपी ने INDIA गठबंधन पर कर दिया है वार?

नीतीश कुमार के सहारे भाजपा ने INDIA गठबंधन पर वार कर दिया है! नशा चढ़ा जो शरीफी का उतार फेंका है, बेशरम रंग कहां देखा दुनिया वालों ने’। दीपिका पादुकोण पर फिल्माए गए गाने की ये लाइनें सियासी पर्दे पर नीतीश के किरदार के लिए एकदम फिट बैठती हैं। राजनीतिक शराफत का रंग तो उन्होंने बहुत पहले ही उतार फेंका था, अब वे अपने सियासी फायदे के लिए सारी हदों को पार कर चुके हैं। उन्हें ना अपने वोटरों की चिंता रही है और ना राजनीतिक शुचिता की। हालांकि जैसा कि उनके करीबी रहे, पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा कि राजनीति में दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं होते। भाजपा ने अपने घर में उनके लिए एक खिड़की जरूर खुली रखी थी, और इस बार नीतीश कुमार उस खिड़की के जरिये दाखिल होने में कामयाब हो गए। सत्ता की मलाई के लिए नीतीश कुमार कब और कितनी बार पलटी मार चुके हैं, शायद अब लोगों ने ये याद रखना भी छोड़ दिया है। उनको इस तरह की पलटियां मारते रहने की आदत सी पड़ गई है। खुद को समाजवाद का पुरोधा और सिद्धांतों की राजनीति करने का दंभ भरने वाले नीतीश राजनीति के अपने अवसान काल में तमाम रंग दिखा चुके हैं। जॉर्ज फर्नांडीज, जिसके सहारे वो राजनीति की सीढियां चढ़े, उनको भी अपमानित करने से नीतीश ने नहीं छोड़ा। वंशवाद को लेकर नीतीश भले लालू पर निशाना साधते रहे हों लेकिन लालू ने कभी अपनी राजनीतिक लाइन से उस तरह समझौता नहीं किया जिस तरह नीतीश बार-बार अपनी विचारधारा से पलटी मारते दिखे। सत्ता में बने रहने की मजबूरियां क्या-क्या नहीं करातीं, नीतीश को इतिहास उसके एक काले अध्याय के तौर पर याद करेगा। नीतीश खुद जिन कर्पूरी ठाकुर, राममनोहर लोहिया और जेपी के राजनीतिक अनुयायी होने का दावा करते हैं, वो आज अगर उनकी राजनीति को देख रहे होंगे तो शायद ही उन्हें अपने आसपास फटकने देते।

इस पूरे घटनाक्रम पर नीतीश से अलग हम भाजपा की रणनीति पर विचार करें तो भाजपा ने नीतीश के कंधे पर बंदूक रखकर इंडिया गठबंधन पर निशाना साधा है। मोदी और भाजपा के विरोध में इस गठबंधन के सूत्रधार को अपने पाले में करके भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। रफ्तार पकड़ने से पहले ही विपक्ष की धार को मंद कर दिया है। रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि जब उस गठबंधन का सूत्रधार ही उसके बारे में ऐसी बात कह रहा है तो ऐसे गठबंधन का भविष्य ही क्या है। इंडिया गठबंधन के जरिये नीतीश कुमार जहां खुद पीएम कैंडिडेट बनने का सपना पाले थे, अब उसी को पलीता लगाकर मोदी को ऐतिहासिक जीत दिलाने के लिए काम करेंगे।

2022 में नीतीश ने जब भाजपा से मुंह मोड़ा था, तो भाजपा नीतीश के प्रति सख्त थी और उसकी रणनीति थी कि बिहार में अपनी ताकत बढ़ाकर अपने दम पर ही अपनी ही सरकार बनाई जाए। लेकिन बावजूद इसके नीतीश के साथ एक बार फिर जाने के पीछे की बड़ी वजह, एक बड़ा सियासी संदेश देना भी है। मोदी के विरोध में बने गठबंधन के सूत्रधार, जिसकी पहली बैठक उन्हीं की अगुवाई में पटना में आयोजित की गई थी, उसी को अपने पाले में करके मोदी के राजनीतिक विरोधियों पर एक नैतिक जीत की तरह दिखाया जाएगा। नीतीश के मुंह से निकली बातों को इंडिया गठबंधन के खिलाफ प्रचार का हथियार बनाया जाएगा।

मोदी के नेतृत्व में संघ परिवार अपने सभी प्रमुख मुद्दे जैसे राम मंदिर, धारा-370 सुलझाने के बाद अब उन्हें 400 सीटों के साथ हैट्रिक लगाकर ऐतिहासिक विदाई देना चाहता है। बता दें कि मोदी और भाजपा के विरोध में इस गठबंधन के सूत्रधार को अपने पाले में करके भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। रफ्तार पकड़ने से पहले ही विपक्ष की धार को मंद कर दिया है। रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि जब उस गठबंधन का सूत्रधार ही उसके बारे में ऐसी बात कह रहा है तो ऐसे गठबंधन का भविष्य ही क्या है। इंडिया गठबंधन के जरिये नीतीश कुमार जहां खुद पीएम कैंडिडेट बनने का सपना पाले थे, अब उसी को पलीता लगाकर मोदी को ऐतिहासिक जीत दिलाने के लिए काम करेंगे। संघ परिवार उन्हें एक ऐसे गैरकांग्रेसी पीएम की तरह खड़ा करना चाहता है जो नेहरू के बरख्स और उनसे भी बड़ा दिख सके। इंडिया गठबंधन भाजपा के इस लक्ष्य में सबसे बड़ी बाधा बनता दिख रहा था। इस गठबंधन के प्रमुख किरदार को अपने पाले में करके भाजपा ने अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में पहला कदम बड़ा दिया है।

नीतीश कुमार के हटने के बाद INDIA गठबंधन का क्या होगा नया रुख?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि नीतीश कुमार के हटने के बाद INDIA गठबंधन का नया रुख क्या होगा! लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों के I.N.D.I.A गठबंधन के लिए एक के बाद एक बुरी खबर आ रही है। बंगाल में ममता बनर्जी और पंजाब में AAP पहले ही लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने की बात कर चुके हैं। ऐसे में नीतीश कुमार ने आज एनडीए का दामन थामकर इंडिया गठबंधन को बहुत बड़ा झटका दे दिया है। जेडीयू ने बिहार में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के टूटने के लिए कांग्रेस की हठ और अहंकार को जिम्मेदार ठहराया है। जेडीयू ने कहा कि कांग्रेस नेता अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे थे, विपक्षी गठबंधन को नहीं। नीतीश कुमार ने कहा कि उन्हें ‘इंडिया’ और ‘महागठबंधन’ में चीजें ठीक नहीं लग रही थीं, इसलिए उन्होंने बीजेपी के साथ नया गठबंधन और नई सरकार बनाने का निर्णय लिया। हालांकि यूपी से इंडिया गठबंधन के लिए राहत की खबर है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 11 सीट देने की घोषणा की है। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने कहा कि कांग्रेस के भीतर का एक गुट ‘इंडिया’ गठबंधन का नेतृत्व हथियाना चाहता था और साजिश के तहत मल्लिकार्जुन खरगे का नाम गठबंधन के अध्यक्ष के तौर पर प्रस्तावित किया गया। इस महीने की शुरुआत में ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में खरगे के बारे में लिए गए निर्णय से जेडीयू को झटका लगा था। उधर कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नीतीश कुमार को देश में ‘आया राम-गया राम’ का प्रतीक बता दिया तो वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने नीतीश कुमार को गिरगिट तक कह दिया। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने की जगह इंडिया गठबंधन के वजूद को बचाना कांग्रेस के लिए चुनौती बन गया है।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उन दावों को खारिज कर दिया कि नीतीश कुमार के बाहर निकलने से विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ कमजोर हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे गठबंधन केवल मजबूत होगा, जैसा कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी कहा है। उन्होंने कहा, ‘कुछ दिनों तक सुर्खियों में रहने के अलावा इसका कोई असर नहीं होगा। अगर बीजेपी की सरकार बरकरार रहती है तो हमारे देश-भारत का भविष्य दांव पर है, लेकिन विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का भविष्य दांव पर नहीं है।’ ‘इंडिया’ के गठन में कुमार की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए रमेश ने पिछले वर्ष 23 जून को कुमार द्वारा बुलाई गई 18 विपक्षी दलों की बैठक का जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की यात्रा 23 जून को पटना से शुरू हुई थी और जिस व्यक्ति ने इस यात्रा को शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसने ही धोखा दे दिया। हमें नहीं पता कि उनकी राजनीतिक मजबूरियां क्या थीं, लेकिन बिहार के लोग उन्हें और बीजेपी को करारा जवाब देंगे।’

जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश में खुद को डुबो दिया जिसमें कोई योग्यता नहीं है और विपक्षी गठबंधन को नुकसान पहुंचाता है। माना जा रहा है कि उनका निशाना राहुल गांधी पर था। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने कहा कांग्रेस ने उन राज्यों में कभी सहयोगियों की मदद नहीं की जहां उसकी स्थिति मजबूत है। त्यागी ने कांग्रेस पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस का एक धड़ा इंडिया गठबंधन के नेतृत्व को हड़पना चाहता है और 19 दिसंबर को अशोका होटल में हुई गठबंधन की बैठक में एक साजिश के तहत गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए मल्लिकार्जुन खरगे का नाम सुझाया गया, जबकि इससे पहले मुंबई की बैठक में सर्वसम्मति से यह तय हुआ था कि यह गठबंधन किसी भी नेता का चेहरा आगे रखे बिना ही काम करेगा।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने और पाला बदलने के लिए नीतीश कुमार की आलोचना करते हुए उन्हें विश्वासघात करने में माहिर करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी गठबंधन इंडिया बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला ही उसे ‘धोखा देकर’ एनडीए में शामिल हो रहा है। रमेश ने टिप्पणी की कि राजनीतिक रंग बदलने की कुमार की प्रवृत्ति गिरगिट को भी मात देती है। उन्होंने कहा कि बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल सोमवार को राज्य में प्रवेश करने वाली ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ से ध्यान भटकाने की एक रणनीति है। उन्होंने कहा, ‘बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का इस्तीफा बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि वह समय-समय पर राजनीतिक रंग बदलते रहे हैं और रंग बदलने में तो वह गिरगिटों को भी कड़ी टक्कर दे रहे हैं। बिहार की जनता उन्हें और उनके इस कदम के लिए जिम्मेदार दिल्ली में बैठे लोगों को करारा जवाब देगी।’ रमेश ने कहा कि यह स्पष्ट है कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ से ध्यान भटकाने के लिए बीजेपी ने यह ‘राजनीतिक नाटक’ रचा है।

चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को बड़ा झटका देते हुए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ममता ने कहा है कि वह बंगाल में अकेली चुनाव लड़ेंगी। ममता बनर्जी ने पहले कांग्रेस को दो सीटें देने को कहा था लेकिन अब ममता ने साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस को एक भी सीट नहीं देंगी। पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटे हैं और ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर एकला चलो के साथ आगे बढ़ गई हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी के गढ़ बीरभूम जिले में ममता बनर्जी ने एक बंद कमरे में संगठनात्मक बैठक की। इस दौरान ममता बनर्जी ने पार्टी नेताओं से अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को कहा है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि वह बंगाल में सीटों के बंटवारे का मसला सुलझा लेगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद पंजाब के सीएम भगवंत मान ने भी पंजाब में लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया है। भगवंत मान ने कहा कि वो पंजाब की 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेंगे। वो किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। पंजाब में आप 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। हम समझौता नहीं करेंगे। ममता बनर्जी का अपना फैसला है और हमारा अपना। भगवंत मान ने कहा कि हमने 40 उम्मीदवारों की लिस्ट बना ली है। इन्हीं 40 में से 13 उम्मीदवारों को शार्ट लिस्ट किया जाएगा। भगवंत ने वहीं पंजाब की 13 जीतने का दावा किया। भगवंत मान ने कहा कि इस बार पंजाब में 13-0 से जीतेगी।

एनडीए ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी। तब इसमें बीजेपी, जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी एलजेपी शामिल थीं। अब नीतीश कुमार वापस एनडीए में आ गए हैं तो बीजेपी की बिहार में वही प्रदर्शन दोहराने की उम्‍मीद बढ़ गई है। बीजेपी के लिहाज से यह एक और कारण से अहम है। भगवा पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 का आंकड़ा पार करने का टारगेट सेट किया है। बिहार में पिछला प्रदर्शन दोहराए बगैर यह लक्ष्‍य हासिल कर पाना मुश्किल होगा।