Thursday, March 5, 2026
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क्या नीतीश कुमार के पलटने से विपक्ष बिखर गया है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नीतीश कुमार के पलटने से विपक्ष बिखरा है या नहीं! नीतीश कुमार वो मुख्यमंत्री हैं जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं जिससे दोबारा मुख्यमंत्री बन सकें। पिछले साल का जून महीना था, तारीख थी 23 । 2024 लोकसभा चुनाव के लिए पहला विपक्षी महाजुटान कराने के पीछे बिहार के सीएम नीतीश कुमार का भी हाथ था। इस बात को अब 7 महीने से ऊपर हो चुके हैं। इस बीच 5 बार एनडीए के खिलाफ तैयार विपक्षी गठबंधन ”इंडिया” की बैठकें हुईं। 4 बार फिजकल तो 1 बार वर्चुअल। लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले ही लग रहा है कि ‘इंडिया’ बिखराव की ओर है। ताजा झटका विपक्षी ब्रिगेड को नीतीश के रूप में लगा है। उन्होंने एक बार फिर पाला बदल लिया है। नए गठबंधन से मोह भंग कर एनडीए में वापस आ गए हैं। एक घंटा पहले ही 9वीं बार बिहार के सीएम के रूप में शपथ ली। वही नीतीश जो कल तक कहते थे कि मर जाएंगे पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। खैर, राजनीति यही है और नीतीश इसके मझे हुए खिलाड़ी। वहीं, नीतीश कुमार से पहले ममता बनर्जी ने भी अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने ऐलान किया है। यही नहीं आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अकेले लोकसभा और हरियाणा में अकेले विधानसभा लड़ने वाली है। विपक्ष के लिए एक के बाद एक तीन झटकों ने उसे एनडीए के खिलाफ लड़ाई में कमजोर कर दिया है। बिहार में राजनीतिक घटनाक्रम ने भाजपा को फुल टॉस की तरह एक आसान मौका दे दिया है। ममता, केजरीवाल के ऐलान के बाद नीतीश का वापस एनडीए में जाने से बीजेपी के लिए 2024 की लड़ाई और आसान हो गई है। क्षेत्रीय पार्टियों की बात करें तो तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ सीट बंटवारे की व्यवस्था तक पहुंचने के लिए ‘इंडिया’ गुट के भीतर टकराव के बीच बिहार में उलटफेर हुआ है। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सीट बंटवारे की बातचीत के बीच कांग्रेस पर निशाना साधा है और राज्य में इस नए गठबंधन से लगभग दूरी बना ली है। उन्होंने कहा है कि टीएमसी अकेले चुनाव लड़ेगी और किसी भी गठबंधन पर निर्णय चुनाव के बाद ही लिया जाएगा। कांग्रेस तब से डैमेज कंट्रोल में व्यस्त है और जोर देकर कहा है कि वे एक रास्ता खोजने के लिए काम कर रही है। पंजाब में सीटों के बंटवारे की बातचीत में भी बाधा आई है, जहां मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि AAP अकेले लड़ने की तैयारी कर रही है। हालिया बिहार घटनाक्रम का मतलब है कि भाजपा के लिए लाभ ज्यादा है। यह राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। नीतीश कुमार तो वैसे भी पाला बदलने के लिए जाने जाते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव के पहले उनका यह कदम भाजपा के साथ एनडीए को भी फायदा पहुंचाने वाला है।

नीतीश कुमार के इस्तीफे के कुछ ही समय बाद, उनके करीबी सहयोगी और जद यू के वरिष्ठ नेता के. सी. त्यागी ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए सबसे पुरानी पार्टी पर ‘इंडिया’ गुट को हाईजैक करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि जद यू को गठबंधन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, भले ही नीतीश कुमार विपक्षी ताकतों को एक साथ लाने के लिए सबसे आगे थे। केसी त्यागी ने कहा कि भाजपा की अजेय चुनाव मशीनरी का मुकाबला करने के लिए जिस तरह की तैयारी की आवश्यकता है, वह बड़े चुनाव से महीनों पहले भी कहीं नहीं देखी गई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस अपने गढ़ों में सहयोगियों को चुनाव लड़ने देने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन वह अन्य विपक्षी दलों के प्रभुत्व वाले राज्यों में अधिक सीटों के लिए जोर देती रही। उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है और अब यह क्षेत्रीय ताकतों को खत्म करना चाहती है।’ उन्होंने सीट बंटवारे की व्यवस्था को अंतिम रूप देने में देरी को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना साधा।

जद (यू) नेता की टिप्पणी क्षेत्रीय दलों के बार-बार किए गए इस दावे के खिलाफ है कि उन्हें उनके गढ़ों में बड़ी भूमिका दी जानी चाहिए। भारत से जद (यू) के बाहर निकलने से कांग्रेस को और झटका लगेगा क्योंकि क्षेत्रीय दल बिहार के घटनाक्रम का इस्तेमाल सीट बंटवारे में भारी सौदेबाजी के लिए कर सकते हैं। त्यागी ने कहा, ‘कांग्रेस के अहंकार के कारण गठबंधन समाप्त हो गया है।’ उन्होंने यह भी भविष्यवाणी की कि अन्य क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस के साथ गठबंधन से बाहर हो जाएंगे।नीतीश कुमार के दोबारा एनडीए में जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि राजनीति में ‘आया राम, गया राम जैसे कई लोग हैं और पार्टी को पता था कि ऐसा होगा।

जब से ‘इंडिया’ गठबंधन बना है, तब से भाजपा इस बात पर जोर दे रही है कि इतने सारे सहयोगियों का गठबंधन का अस्थिर होना तय है। भाजपा का कहना है कि ये सारी पार्टियां कई राज्यों में प्रतिद्वंद्वी भी हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि एनडीए ने देश में स्थिरता लाई है। भारत गुट के प्रमुख चेहरों में से एक सीएम नीतीश कुमार के गठबंधन से बाहर निकलने के साथ, विपक्षी गुट की अंतर्निहित अस्थिरता के बारे में भाजपा के दावों को विश्वसनीयता मिली है। जैसे-जैसे देश अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रहा है, वैसे-वैसे भाजपा अब प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे और एक सावधानीपूर्वक चुनाव मशीनरी से लैस एक अजेय ताकत के रूप में दिखाई दे रही है। दूसरी ओर, ‘इंडिया’ ब्लॉक अभी भी अपने घर को व्यवस्थित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

आखिर पटना में कितनी बार पलटी है राजनीति?

आज हम आपको बताएंगे कि पटना में कितनी बार राजनीति पलटी है! नीतीश कुमार ने एक बार फिर बिहार की राजनीति का रीसेट बटन दबा दिया है। अब बड़ा सवाल उठता है कि आखिर राजनीति के मौसम वैज्ञानिक ने बीजेपी के साथ जाने का फैसला क्यों किया? और कैसे नीतीश के कारण राज्य के तीन मुख्य राजनीतिक किरदारों के समीकरण बदल जाएंगे? हर साल डेढ़ साल में पिछले करीब एक दशक से सरकार बदल जाती है लेकिन सीएम नीतीशे कुमार होते हैं। बिहार की राजनीति में ये पलटूमार राजनीति से किसे फायदा किसे नुकसान समझिए। नीतीश कुमार करीब दो दशक से बिहार के सीएम बने हुए हैं। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने विकास पुरुष की छवि बनाई थी और हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के साथ चले थे। 2014 में नरेंद्र मोदी के उत्थान के बाद उन्होंने अपना रास्ता बदलना शुरू किया। कोई भी अकेली पार्टी बिना नीतीश के बहुमत के करीब नहीं पहुंच सकती थी। यही एक ऐसी बात थी जिसके बाद वो एक दशक से कम वक्त में अबतक चार बार पाला बदल चुके हैं।

लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद नीतीश अपने रास्ते से भटक गए और बीजेपी तथा आरजेडी के साथ समझौता कर सरकार बनाते गए। इससे उनकी छवि को धक्का भी लगा। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू, आरजेडी और बीजेपी के बाद तीसरे नंबर पर रही थी। सीएसडीएस लोकनीति सर्वे के अनुसार, 2010 में करीब 60 फीसदी लोगों ने नीतीश कुमार को एक और कार्यकाल देने की वकालत की थी लेकिन जबकि 2020 में ये घटकर महज 36 फीसदी रह गया था। यही नहीं, सबसे ज्यादा मुश्किल चीज तो ये थी कि वे लोगों के सीएम के सबसे पसंदीदा चेहरा नहीं थे बल्कि उनके सामने तेजस्वी यादव खड़े हो गए थे। इसके अलावा नीतीश को सवर्णों और अल्पसंख्यकों के समर्थन का भी नुकसान हुआ था। लेकिन नीतीश स्विगं वोटरों के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे। इन वोटर्स में ईबीसी गैर यादव ओबीसी, कुर्मी, कुशवाहा और गैर पासवान दलित वोट शामिल थे।

JDU ने RJD के साथ मिलकर थोड़े समय के लिए जो सरकार बनाई थी, उससे हम क्या सीख सकते हैं? अगर सबकुछ ठीक चलता तो ये कोशिश थी एक ऐसा बीच का रास्ता बनाने की कोशिश की जाए जो लोगों को भरोसा दे सके। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि बिहार में हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के बीच तेजी से बन रहा दो ध्रुवीय राजनीतिक माहौल JDU के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका था। आसान शब्दों में कहें तो JDU ऐसा बीच का रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहा है जो किसी को नाराज न करे और दोनों तरफ के लोगों को आकर्षित करे। लेकिन बिहार में राजनीति बहुत तेजी से दो गुटों में बंट रही है, एक तरफ हिंदुत्व समर्थक और दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के पक्षधर। अगर JDU इस माहौल में अपना वजूद बनाए रखना चाहती है तो उसे कुछ नया करना होगा।

RJD ने JDU के साथ सरकार बनाई तो JDU को नुकसान भी हुआ। क्योंकि RJD मुसलमानों और यादवों के सहारे अपने सामाजिक न्याय के वादे से JDU के वोट खींच सकता था। हालांकि RJD को JDU के मुकाबले तीन बड़े फायदे थे। पहला, मुसलमान और यादव, यानी बिहार की एक तिहाई आबादी, सीधे RJD को वोट देती है। दूसरा, RJD की विचारधारा सामाजिक न्याय पर टिकी है, वहीं JDU सोशल इंजीनियरिंग की बात करती है। तीसरा, तेजस्वी जैसा युवा नेता RJD को आगे ले जा सकते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि 2015 में आरजेडी JDU से वोट प्रतिशत के मामले में 2% आगे था, और 2020 में ये अंतर बढ़कर 8% हो गया था। जेडीयू अब ये दावा कर सकती है कि उसने आरजेडी के साथ गठबंधन में रहते हुए कई अहम उपलब्धियां हासिल कीं। खासकर जाति जनगणना और आरक्षण का कोटा बढ़ाना। इसके जरिए जेडीयू ने ईबीसी और दलितों में अपनी पकड़ को और मजबूत करने का काम किया। इसके अलावा नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ईबीसी नेता कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के बाद नीतीश ने पाला बदलने का पूरा प्लान एक्टिव कर दिया। इसके बदले में जेडीयू को राम मंदिर बनने के बाद बीजेपी के पक्ष में बनी हवा का फायदा तो मिलेगा ही साथ ही साथ वह अपनी लोकसभा सीटें बचाने में भी कामयाब हो सकते हैं।

इस पलटी के बाद ऐसा लगता है कि नीतीश ने आखिरकार प्रधानमंत्री बनने का सपना छोड़ दिया है। वो सोचते थे कि विपक्षी गठबंधन में संयोजक बनकर और त्रिशंकु संसद वाली स्थिति में वे अपनी अच्छी छवि का फायदा उठाकर पीएम बन सकते थे। हालांकि, इस बात की संभावना पहले से ही कम थी। असल में जेडीयू को नुकसान होने का खतरा ज्यादा था। अगर नीतीश कुमार के कमजोर दिखने से जेडीयू को नुकसान होता। नीतीश के कमजोर होने से पार्टी के अस्तित्व पर सवाल उठते। इसके अलावा लोकसभा चुनाव बाद बीजेपी और आरजेडी दोनों से मोलभाव करने की उनकी ताकत कम हो सकती थी। इसलिए वो एकसाथ चुनाव कराने की जिद कर रहे थे।

बीजेपी के लिए बिहार सबसे फायदे का सौदा है। ये एक ऐसा राज्य था जहां एनडीए को लोकसभा चुनाव में बड़ा नुकसान उठाने की उम्मीद थी। एक साल पहले, पटना में विपक्षी पार्टियों की बैठक में कहा गया था कि वे ‘देश को रास्ता दिखाएंगे’। लेकिन अब, पहली बात- नीतीश के वापस आने से बिहार में एनडीए के पक्ष में हवा बदल गई है। दूसरी बात, जिस नेता ने एनडीए से खुद को अलग किया था, उसने ही कांग्रेस की न्याय यात्रा के पंख काट दिए हैं। बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल ये है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व के कारण पार्टी का बिहार में भगवा दल का कोई बड़ा नेता नहीं बन पाया। 20 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन पार्टी अपनी खुद की पहचान नहीं बना पा रही है और हर चीज में नीतीश कुमार पर निर्भर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में, जब जेडीयू और बीजेपी अलग-अलग लड़े थे, तो बीजेपी को ज्यादा ओबीसी और दलित वोट मिले थे। 2015 और 2022 में जेडीयू का आरजेडी के साथ गठबंधन का मुख्य कारण भी यह था कि अपने मुख्य वोटरों को बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवाद और मोदी के नेतृत्व से बचाया जा सके।

जेडीयू के छिटकने के बाद आर आरजेडी के लिए मुश्किल बढ़ गई है। पार्टी अब चुनाव में जाति जनगणना के बाद ‘फॉरवर्ड बनाम बैकवर्ड’ की लड़ाई वाली रणनीति से आगे नहीं बढ़ पाएगी, जैसाकि उसने 2015 के विधानसभा चुनाव में किया था। जेडीयू गैर यादव ओबीसी वोटर्स के लिए सोशल इंजीनियरिंग के जरिए आगे बढ़ती है। ये वोटर्स राज्य में कथित ‘यादव प्रभुत्व’ और ‘जंगल राज’ के लौटने के खौफ के कारण महागठबंधन से छिटकी रहती है। हालांकि, आरजेडी के लिए अभी भी मौका है। वह अब 2025 विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सकती है और सरकार विरोधी लहर का फायदा उठा सकती है। यही नहीं, विपक्ष में रहकर आरजेडी अपने कार्यकर्ताओं को तैयार कर सकती है। तेजस्वी यादव ने महागठबंदन की सरकार में अच्छा काम करके लोगों का भरोसा जीता होगा। लेकिन पूरे देश के चुनावों की बात करें तो, बिहार में एनडीए का गढ़ इतना मजबूत है कि आरजेडी-कांग्रेस का पार पाना मुश्किल लगता है।

आखिर किन-किन लोगों को मिलती है Z प्लस सिक्योरिटी?

आज हम आपको बताएंगे कि Z प्लस सिक्योरिटी किन-किन लोगों को मिलती है! केंद्रीय गृह मंत्रालय ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की सुरक्षा बढ़ा दी है। उनकी सुरक्षा की कैटेगरी बढ़ाकर ‘जेड प्लस’ कर दी गई है। राज्यपाल खान के खिलाफ केरल के कोल्लम जिले में शनिवार को स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। उनके ऐसा करने पर खान अपने वाहन से बाहर निकले। फिर प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सड़क किनारे एक दुकान के सामने बैठ गए। इस घटना के बाद ही उनकी सिक्‍योरिटी बढ़ाने का फैसला लिया गया। जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी का क्‍या मतलब होता है? किन-किन लोगों को यह मिली हुई है? इस पर क‍ितना खर्च आता है? आइए, यहां इन सवालों के जवाब जानते हैं। देश में Z+ सिक्‍योरिटी अव्‍वल मानी जाती है। यह सुरक्षा की सर्वोच्च श्रेणी है। Z+ सिक्‍योरिटी के तहत 10 से ज्यादा एनएसजी कमांडो और पुलिस कर्मी समेत 55 ट्रेंड जवान मिलते हैं। जिस किसी को यह सिक्‍योरिटी मिलती है, ये सभी कमांडो 24 घंटे उस व्यक्ति के चारों ओर पैनी नजर रखते हैं। सुरक्षा में तैनात हर कमांडो मार्शल आर्ट का स्पेशलिस्ट होता है। ये आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय वित्त मंत्री, मुकेश अंबानी और उनके परिवार, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जैसे कई शीर्ष गणमान्य व्यक्तियों को यह सिक्‍योरिटी कवर मिला हुआ है।खतरे के साथ सुरक्षा श्रेणी बढ़ती है। ऐसे में जाहिर है कि यह उन्‍हें मिलती है जिनकी जान को सबसे ज्‍यादा खतरा होता है। प्रधानमंत्री को मिलने वाले एसपीजी यानी स्पेशल प्रोटेक्‍शन ग्रुप के बाद कह सकते हैं कि यह दूसरा सबसे सख्‍त कवर है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी उन लोगों में हैं जिन्‍हें जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी दी गई है। Z+ सुरक्षा पर एक व्‍यक्ति पर महीने में 40 से 45 लाख रुपये का खर्च आता है।

इस सुरक्षा का खर्च केंद्रीय गृह मंत्रालय उठाता है। हालांकि, अंबानी परिवार का उदाहरण लें तो वही इसका खर्च उठाता है। खतरे के साथ सुरक्षा श्रेणी बढ़ती है। ऐसे में जाहिर है कि यह उन्‍हें मिलती है जिनकी जान को सबसे ज्‍यादा खतरा होता है। प्रधानमंत्री को मिलने वाले एसपीजी यानी स्पेशल प्रोटेक्‍शन ग्रुप के बाद कह सकते हैं कि यह दूसरा सबसे सख्‍त कवर है। वहीं अगर बात राम मंदिर की करे तो अयोध्या में नव-निर्मित राम मंदिर में कल ही प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इससे पहले मंदिर परिसर की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिक्योरिटी, फेसिलिटी मैनेजमेंट और कैश लॉजिस्टिक कंपनी एसआईएस को सौंपी गई है। इस बात की घोषणा खुद कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर ऋतुराज सिन्हा ने की है। इस खबर के बाहर आते ही कंपनी के शेयर रॉकेट हो गए। कल बीएसई में इसके शेयर 10 फीसदी से भी ज्यादा चढ़ते हुए 52 हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए।

एसआईएस की तरफ से यहां जारी एक बयान में बताया गया कि राम मंदिर ट्रस्ट अयोध्या ने एसआईएस को ऑफिशियल प्राइवेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में नियुक्त किया है। हालांकि जब वहां मंदिर का निर्माण शुरू हुआ था, तभी से कंपनी के सिक्योरिटी गार्ड वहां तैनात थे। मतलब कि वहां मई 2022 से कंपनी के जवान सुरक्षा व्यवस्था संभाले हुए हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जैसे कई शीर्ष गणमान्य व्यक्तियों को यह सिक्‍योरिटी कवर मिला हुआ है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी उन लोगों में हैं जिन्‍हें जेड प्‍लस सिक्‍योरिटी दी गई है। Z+ सुरक्षा पर एक व्‍यक्ति पर महीने में 40 से 45 लाख रुपये का खर्च आता है।लेकिन इस बात की औपचारिक घोषणा अभी की गई है। सिक्योरिटी गार्ड का आमतौर पर मतलब लगाया जाता है सिर्फ मैनपावर से। लेकिन अयोध्या में एसआईएस ने लेटेस्ट टेक्नोलोजी का उपयोग करने की योजना तैयार की है। कंपनी से मिली जानकारी के अनुसार उसने मंदिर परिसर में और उसके आसपास सुरक्षा जनशक्ति की तैनाती के अलावा, भीड़ प्रबंधन में शामिल कर्मियों के लिए बॉडी कैमरे, सीसीटीवी वीडियो के लिए एआई सहित श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ तकनीक भी तैनात की है। इसमें अपनी सहयोगी कंपनी StaqU का भी साथ लिया गया है। तभी तो वहां सीसीटीवी वीडियो एनालिटिक्स में एआई का उपयोग हो रहा है। इसी के साथ वहां कस्टमाइज्ड ट्रेनिंग डिलीवरी के लिए एमट्रेनर वैन भी तैनात किये गए हैं। इसके साथ ही MySIS ऐप से भी इसकी जानकारी ली जा सकेगी।

जानिए लालू यादव और मुलायम यादव की दोस्ती की कहानी!

आज हम आपको लालू यादव और मुलायम यादव की दोस्ती की कहानी सुनाने जा रहे हैं! देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की अपनी छाप रही है। मंडल आंदोलन के बाद इन दोनों नेताओं की साख देश भर में बढ़ी। यूपी से मुलायम और बिहार से लालू प्रसाद यादव गैर कांग्रेसी, गैर भाजपाई दलों की सबसे बड़ी आवाज बने। दोनों के बीच दोस्ती भी खूब रही। लेकिन दोस्ती निभाने की बारी आई तो मुलायम यहां लालू से आगे निकल गए। लालू प्रसाद यादव कई बार मुलायम सिंह यादव के सपनों के बीच आए। कई बार उन्हें झटके दिए। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुलायम हमेशा लालू के साथ खड़े ही नजर आए। 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंदिर के सवाल पर बीजेपी से टकराव का फैसला कर लिया था, इसलिए एक तरफ समझौते से पीछे हटते हुए वीपी सिंह सरकार ने अधिग्रहण अध्यादेश वापस ले लिया। हेमंत शर्मा अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखते हैं कि दूसरी तरफ 23 अक्टूबर, 1990 की सुबह बिहार के समस्तीपुर में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक दी गई। उन्हें समस्तीपुर के सर्किट हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया। आडवाणी को सरकारी जहाज से पहले दुमका ले जाया गया, फिर सड़क के रास्ते मंसानझोर डाक बंगले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कैद किया गया। बिहार पुलिस ने उनका रथ कब्जे में ले लिया। अब टकराव तय था। इधर उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार ने अयोध्या को सील कर रखा था। सभी जिलाधिकारियों को आदेश थे कि वे अपने-अपने जिले से निकलने वाले कारसेवकों को रोकें। राज्य की सीमा पर भी कारसेवकों को रोकने के पुख्ता इंतजाम थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने देवरिया से बिहार जाने वाले राजमार्ग पर सेवरही के पास 40 फीट चौड़ी खाई खुदवा दी थी, क्योंकि इसी रास्ते से आडवाणी की रथयात्रा को उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना था।

वीपी सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए, पहले आडवाणी के रथ को देवरिया में रोका जाना था। मुलायम सिंह यादव रथ रोकने वाले नेता बनते। वीपी सिंह को यह मंजूर नहीं था। अरुण नेहरू ने बताया कि प्रधानमंत्री ने लालू यादव को संदेश भेजा कि वे आडवाणी को बिहार में ही रोक लें ताकि धर्मनिरपेक्षता का सारा नेतृत्व मुलायम सिंह यादव के पास ही न रहे। संकर्षण ठाकुर भी अपने किताब ‘बंधु बिहारी’ में लिखते हैं, राम रथ को रोकने की तार्किक जगह उत्तर प्रदेश ही होनी चाहिए थी, शांति और व्यवस्था के नाम पर। लेकिन प्रधानमंत्री वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो जाएं। दरअसल यूपी ही वीपी सिंह की भी कर्मभूमि थी और वो अपने लिए सियासी जमीन बचाए रखना चाहते थे। वीपी सिंह धर्मनिरपेक्षता का ताज मुलायम सिंह यादव को कतई नहीं देना चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने लालू यादव को आडवाणी का रथ रोकने के लिए कहा। ये वही लालू यादव थे, जिन्हें कभी वीपी सिंह सीएम बनाने के खिलाफ थे। लालू ने मौके हाथ से जाने नहीं दिया। आडवाणी की गिरफ्तारी होने के बाद लालू ने वीपी सिंह को जानकारी दी। लालू अब तक देश की सियासत में धर्मनिरपेक्षता के मसीहा के तौर पर छा चुके थे।

ये पहला मौका नहीं था जब मुलायम को सियासत में अपने मित्र लालू प्रसाद यादव से तगड़ा झटका मिला था। 6 साल बाद 1996 में कांग्रेस सिर्फ 141 सीटें जीत सकी। अटल बिहारी वाजपेयी के अगुवाई में 161 सीटें जीतकर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। सरकार बनाने का न्यौता भी मिला। लेकिन अटल सरकार सिर्फ 13 दिन ही चल सकी। इसके बाद नई सरकार को लेकर जोड़तोड़ शुरू हुआ। 141 सीटें जीतने वाली दूसरी सबसे बड़ी पार्टी गठबंधन सरकार बनाने के मूड में नहीं थी। तब वीपी सिंह का नाम सामने आया लेकिन उन्होंने बंगाल के सीएम ज्योति बसु का नाम आगे बढ़ाया। ज्योति बसु के नाम के प्रस्ताव को पोलित ब्यूरो ने नामंजूर कर दिया। अब सबकी निगाहें मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव पर आ टिकीं। लालू के खिलाफ चारा घोटाला चल रहा था लिहाजा वह पहले ही रेस से बाहर हो गए। वामदल के बड़े नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने मुलायम सिंह यादव के नाम की पैरवी की। माना जाने लगा कि मुलायम ही प्रधानमंत्री बनेंगे। शपथ ग्रहण की तैयारी भी हो गई थी। लेकिन अचानक लालू और शरद यादव ने अड़ंगा लगा दिया। इन्होंने मुलायम के नाम का विरोध कर दिया। मुलायम को जीवन भर इस बात का मलाल भी रहा। उन्होंने एक रैली में कहा था कि लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्रबाबू नायडू और वीपी सिंह के चलते वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।

तीन साल बाद एक बार फिर ऐसा ही मौका आया। 1999 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने संभल और कन्नौज से चुनाव जीता। उनका नाम दोबारा पीएम की रेस में आया लेकिन इस बार भी लालू, शरद आदि यादव नेताओं ने समर्थन नहीं दिया और एक बार फिर उनका सपना पूरा न हुआ। बाद में मुलायम ने अपनी जीत कन्नौज सीट बेटे अखिलेश यादव के छोड़ दी और अखिलेश पहली बार इस सीट से सांसद बने।

इतना सब होने के बाद भी दिलचस्प ये है कि मुलायम सिंह यादव राजनीति और व्यक्तिगत रिश्तों में विशेष संतुलन बनाने में माहिर थे। भले ही लालू से उन्हें कई बार बड़े सियासी झटके मिले, उनके सपने टूटे लेकिन दोस्ती बरकरार रही। यही दोस्ती बाद में रिश्तेदारी बनी और लालू की बेटी राजलक्ष्मी मुलायम के खानदान की बहू बनीं। उनके पोते तेज प्रताप यादव लालू के दामाद बने।

क्या अब INDIA गठबंधन से अखिलेश यादव भी होंगे दूर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब अखिलेश यादव भी INDIA गठबंधन से दूर होंगे या नहीं! इंडिया गठबंधन में सब ठीक नहीं है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में खुद को ‘अकेला’ कर चुकी हैं। अब नीतीश कुमार के भी एनडीए में जाने की चर्चाएं तेज हैं। इस बड़े राजनीतिक उठा-पटक के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव पर सबकी नजरें हैं। उनके नीतीश कुमार पर दिए गए ताजा बयान के भी सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं। दरअसल अखिलेश यादव कई बार इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका पर अपनी निराशा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने साफ कह दिया कि नीतीश की पहल पर ये गठबंधन बना था लेकिन कांग्रेस ने इसे लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई। अगर नीतीश इंडिया गठबंधन में रहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं चाहता हूं कि वह इसका हिस्सा बने रहें। दरअसल इंडिया गठबंधन का जब ऐलान हुआ तो यूपी से राष्ट्रीय लोकदल के साथ समाजवादी पार्टी इसमें शामिल हुई। लेकिन समय बीतने के साथ कांग्रेस और अखिलेश यादव में रिश्ते बिगड़ते चले गए। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनावों में सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और सपा के बीच तनातनी सबने देखी। फिर कांग्रेस का बसपा की तरफ ‘सॉफ्ट’ अप्रोच ने संतुलन और कठिन कर दिया। अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया कि अगर बसपा को गठबंधन में लाने की कवायद हाेती है तो समाजवादी पार्टी के लिए भी ऑप्शन खुले हैं। ताजा स्थिति ये है कि लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी में इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग फार्मूला भी तय नहीं हो पा रहा है। दरअसल कांग्रेस चाहती है कि यूपी में 2009 के उसके प्रदर्शन के आधार पर उसे सीटें दी जाएं, जबकि अखिलेश इस पर राजी नहीं हैं। सपा की तरफ से पहले ही संदेश दिया जा चुका है कि यूपी में सपा ही प्रमुख पार्टी है और जो भी सीटें दी जाएंगीं, वह सपा ही अपने पास से देगी।

दूसरी तरफ यूपी कांग्रेस का रुख भी समाजवादी पार्टी से अलग अपनी राह बनाने का दिख रहा है। एक तरफ प्रदेश भर में यात्राएं कर जनाधार मजबूत करने की कवायद चल रही है। वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में सरयू स्नान भी कर संदेश देने की कोशिश हुई। वहीं सपा और कांग्रेस के बीच भी दोनों ही तरफ से तल्ख बयानबाजी सामने आ चुकी हैं। हालांकि अखिलेश यादव सीधे-सीधे कुछ भी कहने से बचते रहे हैं। ताजे घटनाक्रम पर नजर डालें तो इंडिया गठबंधन में सब ठीक नजर नहीं आ रहा। ममता बनर्जी पहले ही पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। आम आदमी पार्टी का रुख भी पंजाब को लेकर ऐसा ही नजर आ रहा है। अब नीतीश कुमार के एनडीए में जाने की चर्चा है। ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश यादव भी अलग राह पकड़ेंगे?

दरअसल अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन की ताजा स्थिति का लेकर कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की पहल पर भी गठबंधन को बनाया गया था। लेकिन पहली बैठक में ही कांग्रेस ज्यादा तत्पर नहीं दिखी। गठबंधन में पीएम पद के लिए किसी का भी नंबर लग सकता है। नीतीश कुमार को बड़ा पद भी दिया जा सकता था, वह प्रधानमंत्री बन सकते थे। मैं अभी भी चाहता हूं कि वह गठबंधन का हिस्सा बने रहें। हालांकि अखिलेश यादव ने ये भी साफ कर दिया है कि वह प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं हैं। लेकिन यूपी में कांग्रेस के राहुल गांधी के साथ वह प्रचार करेंगे या नहीं इस पर उन्होंने बात समय पर छोड़ दी है।

पिछले कुछ वर्षों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि यूपी में इंडिया गठबंधन होता है तो अखिलेश के साथ आने से कांग्रेस को ही फायदा होगा। वर्तमान में सिर्फ रायबरेली ही उसके पास है। अमेठी भाजपा छीन चुकी है। समाजवादी पार्टी से सीट शेयरिंग होती है तो कहीं न कहीं कांग्रेस को उसके वोट बैंक का लाभ मिलेगा। वहीं अगर गठबंधन नहीं होता है तो कांग्रेस के लिए राहें आसान नहीं हैं। जमीन पर संगठन की उपस्थिति न के बराबर है। भाजपा का संगठन इस समय सबसे मजबूत स्थिति में है। रायबरेली में भी इस बार कांग्रेस के लिए आसान मुकाबला होने नहीं जा रहा। वहीं बसपा भी बेहद कमजोर स्थिति में है। सपा के साथ गठबंधन के चलते ही वह 2019 में 10 सीटें जीत सकी थी। बसपा का हाल ये है कि वह विधानसभा में सिर्फ एक विधायक लेकर खड़ी है। मुस्लिम मतदाता पिछले विधानसभा चुनावों में अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं कि वह सपा के ही साथ हैं। ऐसे में सीट शेयरिंग की कमान अखिलेश यादव के पास ही है।

जब मौका देख कर सियासी पलटवार करते हैं नीतीश कुमार!

नीतीश कुमार हमेशा से ही मौका देखकर सियासी पलटवार कर देते हैं! यह कहावत काफी चर्चित है- एक अनार, सौ बीमार। बिहार की राजनीतिक हालात में यह कहावत फिट बैठती है। नीतीश कुमार अनार की भूमिका में हैं, तो बीमार बन गए दो राजनीतिक दल- आरजेडी और बीजेपी। आरजेडी भी नीतीश के लिए उतनी ही बेताब है, जितनी बीजेपी। कभी बिहार में एकछत्र राज करने वाले आरजेडी को नीतीश की बैसाखी के बिना खड़ा हो पाना अब असंभव लगता है तो बीजेपी की हालत भी यही हो गई है। नीतीश भी इसे समझ रहे हैं। वह सियासत में अनार बनकर इतरा रहे हैं। अनार के बिना बिहार के सियासी दलों के पास सेहतमंद होने का कोई उपाय भी नहीं दिख रहा है। नीतीश कुमार भी अनार की औकात की वजह से अभी तक सब पर भारी पड़ते रहे हैं। नीतीश की पार्टी कभी अपने बूते सत्ता में नहीं आ पाई। हमेशा उसे दूसरे का सहारा ही लेना पड़ा। कभी बीजेपी तो कभी आरजेडी नीतीश की पार्टी जेडीयू की चेरी बनते रहे। सर्वाधिक सीटें लाने के बावजूद किसी ने सरकार बनाने की कभी हिम्मत नहीं जुटाई। मोल-तोल करने का नैतिक साहस भी किसी ने नहीं जुटाया। कम सीटों के बावजूद किसी को कभी नीतीश को हड़काने-धमकाने का साहस नहीं हुआ। नीतीश कुमार इसी का फायदा उठाते रहे।

झारखंड में यह अजूबा जरूर हुआ कि एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को सभी दलों ने सीएम बना दिया। दूसरा अजूबा बिहार में नीतीश कुमार ही रहे हैं। सरकार बनाने के लिए 243 सदस्यों वाली विधानसभा में 122 विधायकों का समर्थन जरूरी है। नीतीश की जेडीयू को कभी इतनी सीटें अकेले नहीं मिलीं, पर वे 18 साल से बिहार के सीएम बने हुए हैं। हद तो तब हो गई, जब 2020 में जेडीयू 43 विधायकों वाली पार्टी बन कर रह गई। फिर भी ताज नीतीश कुमार के सिर पर ही सजा। 80 विधायकों वाली बीजेपी या 79 विधायकों वाला आरजेडी पीछे छूट गए। कहते भी हैं- भाग्यवान का हल भूत भी जोतता है। नीतीश के भाग्य का ही यह कमाल है। भाग्य पर भरोसा नहीं करने वालों को भी इस पर भरोसा करना पड़ गया। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता रहा। नीतीश को ताकतवर दल भी समर्थन करते रहे। नीतीश भी अपनी इस ताकत को जानते हैं। तभी तो वे पल भर में मुंह फुला कर कभी आरजेडी से सट जाते हैं तो झटके में उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल भी फेंकते हैं। बीजेपी की मोनोपोली भी उन्हें रास नहीं आती। वे उसे भी काबू में रखते आए हैं। इसे उनका कौशल कहें या भाग्य का कमाल कि ऐसा ही पिछले 18 साल से होता रहा है।

नीतीश की जेडीयू विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी है। इसके बावजूद ऐंठ ऐसी कि बड़े-बड़े सूरमा उनका पानी भरते हैं। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद अपने को सियासत का धुरंधर मानते रहे हैं। अपने को किंगमेकर मानते रहे हैं। कभी किंग रहे लालू किंगमेकर की हालत में आ गए। अब तो उनसे यह रुतबा भी छीनता नजर आ रहा है। विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी और महागठबंधन बना कर सत्ता से कुछ ही कदम दूर रहने वाले लालू की हेकड़ी नीतीश ने खत्म कर दी है। अब वे भींगी बिल्ली की तरह नीतीश के आगे मिमिया रहे हैं।

बीजेपी आज देश की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद नीतीश की चेरी बनने को मजबूर हो गई है। नीतीश को बीजेपी की जरूरत है, पर वे अपनी शर्तें उससे मनवा रहे। बिहार की सियासत के लिए नीतीश कुमार अपरिहार्य बन गए हैं। नौटंकी भी उन्हें खूब आती है। चार साल पहले उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान खुलेआम कहा था कि यह उनका आखिरी चुनाव है। तब वे बीजेपी के साथ थे। आरजेडी के साथ आए तो कह दिया कि अगला चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। अब आरजेडी को ही नीतीश ने पटखनी दे दी है। लालू गिड़गिड़ा रहे हैं तो बीजेपी उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन से खुश करने में लगी है कि उसके साथ आ जाएं। नीतीश की राजनीति के पराभव की भविष्याणी करने वालों की बोलती बंद हो गई है। बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान फेल हो गया है।

पहले रामविलास पासवान को लोग मौसम विज्ञानी कहते थे। पर, नीतीश ने साबित कर दिया है कि उनसे बढ़ कर कोई मौसम विज्ञानी नहीं। कब बीजेपी को साथ लेना है तो कब आरजेडी को पटा लेना है, उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। किसी को काबू में कैसे रखा जाए और कितनी उड़ान भरने की छूट दी जाए, यह नीतीश से बेहतर कोई नहीं जानता। स्वर्गवासी हो चुके जार्ज फर्नांडीज हों या शरद यादव हों, सबको उन्होंने साधा। अपने स्वजातीय आरसीपी सिंह और लव-कुश समीकरण के पुरोधा उपेंद्र कुशवाहा को साधा तो ललन सिंह को भी उन्होंने औकात बता दी। नीतीश किसके हैं और किसके रहेंगे, यह उनके अलावा कोई नहीं जानता। लालू भले उन्हें पलटू राम और आंत में दांत होने की बात कहते रहे, लेकिन आज उसी नीतीश के सामने उनकी औकात भींगी बिल्ली जैसी हो गई है।

आखिर एनडीए में क्यों शामिल हो गए नीतीश कुमार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि नीतीश कुमार एनडीए में फिर से शामिल क्यों हो गए! अगस्त, 2022 में राजधानी पटना में बिल्कुल आज ही की तरह नजारा था। मीडियाकर्मी राजभवन के बाहर राजेंद्र चौक पर डेरा जमाए हुए थे। नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद उन्होंने बताया कि बीजेपी उनकी पार्टी को तोड़ने में लगी थी। इसलिए उन्हें ये फैसला लेना पड़ा। नीतीश कुमार ने उसके बाद आरजेडी के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाई। उन्होंने लोगों को ये एहसास दिलाया कि समाजवादी नेता और समाजवादी विचारधारा आगे बढ़नी चाहिए। इतना ही नहीं सत्ता संभालने के ठीक तीन महीने बाद नीतीश कुमार ने ये भी ऐलान कर दिया कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ा जाएगा। अब युवा ही नेतृत्व करेंगे। जनवरी, 2024 के 26 जनवरी के दिन गांधी मैदान में नीतीश कुमार तेजस्वी यादव से दूरी बनाते दिखे। दिन भर उनके पाला बदलने की अटकलें चलती रही। इस बीच आरजेडी राज्यसभा सांसद मनोज झा का सीधा बयान आया। उसके बाद जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार भी जवाब देने के मूड में आ गए। बिहार की राजनीति में स्टार्टिंग से जेडीयू हमेशा बीजेपी का बड़ा भाई बना रहा। जेडीयू की सीटें ज्यादा रही। जेडीयू हर तरीके से आगे रहा। समय के साथ जेडीयू का कुनबा पिछड़ गया। सीटें कम होती गईं। नीतीश कुमार इसलिए भी नाराज रहने लगे कि 2015 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की सीटें 71 रही। 2020 के विधानसभा चुनाव में सीटों की संख्या मात्र 43 बाद में 45 पर आ गई। वहीं बीजेपी के सीटों की संख्या बढ़ती गई। 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें बढ़ कर 74 हो गईं। राजद के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बीजेपी हो गई। नीतीश कुमार ने लगे हाथों अपने सहयोगियों और गाहे बगाहे मीडिया से बातचीत में एक और बात बोलने लगे। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने साजिश करके चिराग पासवान के जरिए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़ा करा दिया। इसकी दोषी बीजेपी है। जेडीयू ने वोट काटने का आरोप चिराग पासवान पर लगाया। बीजेपी पर प्रॉक्सी के रूप में काम करने का आरोप लगा। हालांकि, एलजेपी ने सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की।

अंदर की सूत्रों की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक नीतीश कुमार सरकार के निर्माण में बीजेपी की शर्तों से असहज रहे। नीतीश डिप्टी सीएम रेनू देवी और तारकिशोर प्रसाद को लेकर सहज महसूस नहीं करते थे। उनके साथ 13 साल तक डिप्टी सीएम रहे सुशील कुमार मोदी की तरह इन लोगों से उनका तालमेल अच्छा नहीं रहा। जेपी आंदोलन के जमाने से सुशील मोदी से नीतीश का रिश्ता है। दोनों के बीच की घनिष्टता किसी और नेता से ज्यादा है। उस वक्त जेडीयू के नेता आरसीपी सिंह, जो केंद्र में मंत्री थे। उनका उपयोग करके सुशील मोदी को हटा दिया गया। नीतीश कुमार सुशील मोदी के डिप्टी सीएम नहीं बनने से काफी असहज थे। सुशील मोदी हमेशा नीतीश कुमार की मंशा को समझते थे। सुशील मोदी बिहार बीजेपी के उन नेताओं पर लगाम लगाने में सफल हो जाते थे। जो नेता नीतीश के खिलाफ गलत बयानी करते थे। सुशील मोदी हमेशा नीतीश कुमार के पक्ष में खड़े रहते थे।

जेडीयू के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार के कांग्रेस, इंडिया गठबंधन और आरजेडी से मोहभंग होने के कई कारण हैं। इसका सबसे मुख्य कारण है वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में नीतीश द्वारा खुद को असहज महसूस किया जाना। कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले जेडीयू के कम से कम सात सांसद बीजेपी के संपर्क में हैं। इन सभी सांसदों का मानना है कि 2019 में उन्हें जीत एनडीए के सामाजिक संयोजन और मेहनत की वजह से मिली। सांसदों को पता है कि आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर खड़े होने पर लोगों का ऐसा समर्थन नहीं मिलेगा। जेडीयू के ललन सिंह को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश नेता बीजेपी के साथ गठबंधन बनाने के पक्ष में थे। नीतीश कुमार को ये एहसास हो गया कि यदि उन्होंने कार्रवाई नहीं कि तो पार्टी विभाजित हो जाएगी। उसके बाद उन्होंने पिछले महीने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह की जगह खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। कहा जा रहा है कि ललन सिंह की लालू से बढ़ रही नजदीकी भी नीतीश कुमार को पसंद नहीं थी।

दूसरी तरफ जेडीयू ने अपना पिछला इतिहास देखा। जेडीयू 2019 में लोकसभा चुनावों में एनडीए के साथ लड़ी गई 17 सीटों में से 16 पर जीत हासिल की थी। पार्टी की ओर से एक आंतरिक सर्वेक्षण कराया गया। जिसका परिणाम उत्साहजनक नहीं आया। नीतीश कुमार ने अनुमान लगाया कि यदि उनकी पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी जीत की संभावना देख रही है, तो इसमें हर्ज क्या है। उसके अलावा जेडीयू को ये भी महसूस हुआ कि अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन मोदी की लोकप्रियता को और आगे बढ़ा रहा है। लगे हाथों उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न भी दे दिया। मोदी की जीत में इन सबकी हिस्सेदारी ज्यादा होगी। इस वक्त बीजेपी के साथ रहकर इन सबका थोड़ा बहुत श्रेय भी लिया जा सकता है।

नीतीश कुमार ने बड़े अरमानों के साथ विपक्षी एकता की कवायद शुरू की थी। लेकिन वो सफल नहीं हुई। उन्हें इस गठबंधन में एक महत्वपूर्ण पद की उम्मीद थी। हुआ बिल्कुल उल्टा। इंडिया गठबंधन अपनी-डफली और अपनी राग बजाने लगा। टीएमसी और केजरीवाल की पार्टियों की बेचैनी ने ऐसा होने नहीं दिया। वे लोग अलग राग अलापने लगे। 2017 में महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश ने आरजेडी को इसका जिम्मेदार ठहराया था। इस बार कांग्रेस को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से अपनाया जा रहा अलग रास्ता भी विवाद का कारण बना है। राहुल गांधी द्वारा गठबंधन के बारे में बात करने के बजाय कांग्रेस की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की गई है। ये यात्रा बिल्कुल कांग्रेस की अपनी और अलग यात्रा है। इसलिए जेडीयू को अब महागठबंधन में रहने का कोई कारण नजर नहीं आया। इंडिया गठबंधन एकजुट रहने और मोदी को जवाब देने में पूरी तरह विफल रहा। वैसे में नीतीश ने अपनी पार्टी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक व्यवहारिक निर्णय लिया है। जिसका सियासी गलियारों में स्वागत भी हो रहा है।

क्या कांग्रेस का साथ छोड़ देंगे सभी क्षेत्रीय दल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस का साथ छोड़ेंगे या नहीं! लोकसभा चुनाव में अब बमुश्किल दो-ढाई महीने बचे हैं। नरेंद्र मोदी की निगाह पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद दूसरा ऐसा प्रधानमंत्री बनने पर है जो लगातार तीन बार सत्ता के सिंहासन पर बैठा। अयोध्या में भव्य राम मंदिर से पैदा हुई हिंदुत्व लहर पर सवार बीजेपी जाति को साधने में भी पीछे नहीं है। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान हो चुका है। दलितों को लुभाने के लिए बड़ा अभियान शुरू करने का प्लान भी तैयार हो चुका है। दूसरी तरफ विपक्ष खासकर उसके सबसे बड़ा गठबंधन I.N.D.I.A. की नजर हर हाल में मोदी के विजय रथ को रोकने पर है। लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले ही विपक्ष का I.N.D.I.A. हांफने लगा है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिसकी पहल पर विपक्षी गठबंधन ने आकार लिया, वही नीतीश कुमार अब पलटी मारने जा रहे हैं। ये वैसे ही है जैसे युद्ध शुरू होने से ऐन पहले सारथी ही पाला बदल ले। नीतीश के संभावित यू-टर्न के अलावा ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस को आंख दिखा रहे हैं। कई और राज्यों में भी विपक्षी गठबंधन के भविष्य पर सवालिया निशान लगा हुआ है। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यूपी ही नहीं, तकरीबन पूरे देश में एक तरह ही लहर सी पैदा हुई है, जिसे ‘राम लहर’ कह सकते हैं। चुनाव में इसका फायदा बीजेपी को ही मिलेगा क्योंकि इससे उसका हिंदुत्व वोट बैंक सध रहा है। लेकिन बीजेपी सिर्फ इतने से संतुष्ट नहीं है। हिंदुत्व वोट के साथ-साथ वह जातिगत समीकरणों को भी साधने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के अगले ही दिन मोदी सरकार ने समाजवादी दिग्गज कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान किया। इसके जरिए बीजेपी ने पिछड़े वर्ग और उसमें भी खासकर अत्यंत पिछड़ी जातियों पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने की कोशिश की है। इसके अलावा जल्द ही पार्टी देशभर में दलित समुदाय को साधने के लिए बड़ा अभियान छेड़ने जा रही है। उनके लिए जगह-जगह सम्मेलन होंगे। बीजेपी के कार्यकर्ता दलित समुदाय तक पहुंचेंगे और उनके हित में लिए गए मोदी सरकार के फैसलों को बताएंगे। जाहिर है लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी युद्धस्तर पर तैयारी कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के खिलाफ बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट करने की कवायद करने वाले नीतीश कुमार के अब खुद यू-टर्न लेने की चर्चा है। जेडीयू चीफ और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही पिछले साल जून में पटना में विपक्षी दलों की महाजुटान की थी। उनकी पहल पर ही विपक्ष के तमाम दल मतभेदों के बावजूद एक प्लेटफॉर्म पर आने को तैयार हुए ताकि लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा सीटों पर विपक्ष की तरफ से साझा उम्मीदवार उतारा जा सके। लेकिन जब चुनाव एकदम सिर पर आ गया तो नीतीश कुमार ही पाला बदलने जा रहे। तिनका-तिनका जोड़कर विपक्षी एकजुटता का ताना-बाना तैयार करने वाले जेडीयू चीफ ऐन वक्त पर खुद ही गठबंधन से दूर होने जा रहे हैं। ये विपक्षी इंडिया गठबंधन के लिए बहुत बड़ा झटका है।

ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार ने विपक्षी गठबंधन की नाव में पहला छेद किया है। उनसे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी विपक्षी I.N.D.I.A. की नाव में छेद कर चुकी हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बंगाल में प्रवेश करने से पहले ही ममता ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी टीएमसी लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी 42 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी। उनके इस ऐलान को कांग्रेस ने ‘स्पीड ब्रेकर’ बताकर ये जताने की कोशिश की कि दीदी को जल्द ही मना लिया जाएगा। लेकिन दीदी के तेवरों से ऐसा लगता तो बिल्कुल नहीं है। खुद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ममता को खत लिखकर उनसे राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल होने की गुजारिश की थी। ममता ने उनके अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया। दो टूक कह दिया कि वह राहुल की यात्रा में ‘5 मिनट तक के लिए भी’ शामिल नहीं हो सकतीं। वह ‘एकला चलो’ की राह पर निकल चली हैं। टीएमसी एमपी डेरेक ओ ब्रायन इसके लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं जो लगातार ममता बनर्जी पर हमलावर रहे हैं। सुष्मिता देव तो अधीर को बीजेपी का एजेंट तक बता रही हैं। जवाब में अधीर ने जोश-जोश में डेरेक ओ ब्रायन को ‘विदेशी’ कह दिया लेकिन अब उस बयान के लिए माफी मांग रहे हैं। उनका माफीनामा बता रहा है कि कांग्रेस आलाकमान ने बंगाल में विपक्षी एकजुटता की उम्मीद नहीं छोड़ी है।

सिर्फ नीतीश या ममता ही नहीं, आम आदमी पार्टी भी विपक्षी गठबंधन की नाव में छेद करती दिख रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान दावा कर रहे हैं कि आम आदमी पार्टी पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों को जीतेगी यानी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। मान इतना बड़ा ऐलान खुद से नहीं कर सकते, अरविंद केजरीवाल की सहमति जरूर ली होगी। दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में भी कांग्रेस से अपने लिए लोकसभा सीटों की मांग कर रही है। दिल्ली की 7 सीटों को लेकर तो दोनों पार्टियों में बात बन सकती है लेकिन पंजाब का मामला फंस चुका है। दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस की राज्य इकाई भी आम आदमी पार्टी से किसी तरह का गठबंधन नहीं चाहती लेकिन आलाकमान के स्तर पर सीटों के तालमेल की कोशिश की जा रही थी।

सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले राज्य यूपी में भी विपक्षी एकजुटता के चिथड़े उड़ चुके हैं। मायावती की बहुजन समाज पार्टी पहले ही विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. का हिस्सा नहीं है। अखिलेश की समाजवादी पार्टी और जयंत चौधरी की आरएलडी भले ही कांग्रेस के साथ विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं लेकिन सीट शेयरिंग पर बात बनती नहीं दिख रही। इतना ही नहीं, अखिलेश यादव ने तो कांग्रेस का इंतजार किए बिना जयंत चौधरी के साथ सीट शेयरिंग का ऐलान भी कर दिया। यूपी में कांग्रेस करीब 2 दर्जन सीटें चाह रही है लेकिन अखिलेश 2 से ज्यादा सीट देने के मूड में नहीं थे। हालांकि, शनिवार को अखिलेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि यूपी में कांग्रेस 11 सीटों पर लड़ेगी।

ऐसा ही हाल महाराष्ट्र का है। यूपी के बाद लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें महाराष्ट्र में ही हैं। यहां महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की अगुआई वाले एनसीपी का गुट शामिल है। यहां सीट शेयरिंग पर पेच कितनी बुरी तरह फंसा हुआ है इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इसकी वजह से ही कांग्रेस के बड़े युवा चेहरों में शुमार रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने पार्टी छोड़ दी और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना का दामन थाम लिया। देवड़ा जिस मुंबई साउथ सीट से लड़ना चाह रहे थे, उस पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने दावा ठोक रखा है। 48 लोकसभा सीट वाले महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) अकेले अपने लिए 23 सीटों पर अड़ी है। यानी बाकी कांग्रेस, एनसीपी और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के लिए सिर्फ 25 सीटें ही बचेंगी। जाहिर है, महाराष्ट्र में सीट शेयरिंग बहुत ही उलझा हुआ है।

क्या दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दे पाएंगे भारत के स्वदेशी हथियार?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत के स्वदेशी हथियार दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब दे पाएंगे या नहीं! 26 जनवरी को 75वें गणतंत्र दिवस की परेड में स्वदेशी हथियारों का जोरदार प्रदर्शन हुआ, जिसमें LCH प्रचंड चॉपर, पिनाका रॉकेट लॉन्चर, नाग एंटी-टैंक मिसाइल और स्वाथी हथियार खोजी रडार शामिल थे। बेशक ये सब देखने में शानदार हैं, लेकिन क्या ये काफी हैं? स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत 2018 से 2022 के बीच दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था। इतनी मात्रा में हथियारों का आयात करना भारत की वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में रक्षा तैयारियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। हाल ही में, जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के नियमों को संशोधित किया है ताकि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के माध्यम से यूक्रेन को पैट्रियट मिसाइलों के निर्यात की अनुमति मिल सके। इसी महीने, जनरल इलेक्ट्रिक के एक वरिष्ठ कार्यकारी ने पुष्टि की कि एलसीए लड़ाकू कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण, भारत को जीई404 इंजन की आपूर्ति में एक साल का विलंब होने वाला है। कुछ हफ्ते पहले, भारत में निर्मित 155 मिमी के तोपखाने के गोले यूक्रेनी सेना की ओर से इस्तेमाल किए जाने की खबरें आई थीं। यहां साझा विषय वैश्विक स्तर पर सेनाओं का पुनर्पूंजीकरण और मौजूदा सैन्य औद्योगिक परिसर एमआईसी की मांग में वृद्धि को पूरा करने के लिए उत्पादन को बढ़ाने में असमर्थता है। यही कारण है कि पश्चिमी शक्तियों को यूक्रेन की आपूर्ति के लिए अपने स्वयं के भंडार को ही खाली करना पड़ रहा है।

आंकड़े खुद बोलते हैं। फाइनेंशियल टाइम्स ने 15 रक्षा ठेकेदारों का विश्लेषण किया, जिससे पता चला कि 2022 में इन कंपनियों के ऑर्डर बैकलॉग 777 बिलियन डॉलर से अधिक हो गए, जो दो साल पहले की तुलना में 10% अधिक है। 2022 में यूरोप ने कई पीढ़ियों में सैन्य खर्च में सबसे तेज वृद्धि देखी – लगभग 30%। रूस और चीन के आंकड़े उतनी बारीकी से उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन हाल के वर्षों में चीन के नौसेना के निर्माण को देखते हुए, चीनी रक्षा ठेकेदारों के साथ ऑर्डर बैकलॉग बहुत बड़े होने की संभावना है। SIPRI के अनुसार, वैश्विक सैन्य व्यय वास्तविक रूप से 3.7% बढ़कर 2022 में 2.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। बचाव में, बढ़त का समय अधिक होता है। सैद्धांतिक परिवर्तनों से लेकर बजट प्रतिबंधों तक, प्लेसमेंट के आदेश से लेकर वास्तविक उत्पादन तक। यही कारण है कि वर्तमान में वास्तविक व्यय भविष्य में कम होने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर जीडीपी के % के रूप में सैन्य व्यय 2.2-2.3% बॉलपार्क में बना हुआ है। मुद्दा आपूर्ति श्रृंखला और कुशल श्रम क्षमता का है जिसके परिणामस्वरूप आपूर्ति मांग को पूरा करने में विफल रहती है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है? पहली सीख तो यह है कि घरेलू आपूर्ति के लिए नो प्लान बी है, विशेष रूप से गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स जैसी उपभोग्य सामग्रियों के लिए सच है। महंगे, बहुअरब डॉलर के प्लेटफॉर्म जो जनता की कल्पना को उत्तेजित करते हैं जैसे राफेल लड़ाकू विमान या एस400 एसएएम अगर उनकी जरूरत खत्म हो जाती है तो वे बेकार हो जाते हैं। हाल के दशकों में कई बार यह एक दर्दनाक सबक के रूप में हमें सीख दे गया है। कारगिल में, भारतीय वायु सेना के पास 100 से भी कम आयातित सटीक निर्देशित गोला-बारूद थे, जिनमें से प्रत्येक को विशेष रूप से उच्च मूल्य के लक्ष्य के लिए निर्धारित किया गया था। एर्गो, ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे आसानी से बख्शा जा सके।

दूसरा सबक यह है कि वृद्धि क्षमताओं का निर्माण करना और भी कठिन है। यदि यह अमेरिकी एम. आई. सी. के लिए कठिन है, तो यह एक नए भारतीय संस्करण के लिए कई गुना कठिन है। घरेलू ठेकेदारों के पास एक स्थिर आपूर्ति श्रृंखला को चिकनाई देने के लिए पर्याप्त ऑर्डरबुक की आवश्यकता होती है जिसे आपात स्थितियों में बढ़ाया जा सकता है। यहां एक ऑर्डर के बाद तीन साल में एक और और 7 साल बाद तीसरा ऑर्डर आपूर्ति श्रृंखला को नाजुक रखता है।

1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद से, यह माना जाता है कि पारंपरिक युद्ध छोटे और तेज होंगे। नतीजन, भारत के युद्ध अपव्यय भंडार को नंगे-हड्डियो के स्तर पर रखने के लिए जाना जाता है। सीमा पर तनाव होने पर बार-बार गोला-बारूद की “आपातकालीन खरीद” की ओर से मान्य किया जाता है। इतने सारे पैसे और बड़े प्लेटफार्मों-टैंक, लड़ाकू विमानों, जहाजों पर खर्च किए गए ध्यान के साथ-इन प्लेटफार्मों के लिए निर्वाह क्षमता के Bare Bones Level के स्तर का होना आत्म-पराजय है। यह हाल ही में है कि भारत 155 मिमी गोला-बारूद में आत्मनिर्भर हुआ और वो भी भारतीय सेना की ओर से पहली 155 मिमी बंदूक को शामिल करने के लगभग चार दशक बाद।

क्या ASI सर्वे की रिपोर्ट मानेगी अदालत? क्या कहता है कानून!

वर्तमान में व्यास जी तहखाना में पूजा करने की एक सफलता हिंदू पक्ष को मिल चुकी है, लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अदालत ASI सर्वे की रिपोर्ट मानेगी या नहीं और कानून क्या कहता है! अयोध्या में रामलला अपने घर विराज चुके हैं। इसके पीछे है 500 सालों का संघर्ष और बलिदान जो बताता है कि अयोध्यापति इतनी आसानी से अपनी नगरी को नहीं लौटे। अपने राम के लिए लड़ाई लड़ने वाले हिंदू समाज ने अदालतों में लड़ाई लड़ी। जिला अदालत से इलाहाबाद हाई कोर्ट और फिर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट तक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की लड़ाई चली और आखिर तय हो गया कि वहां पहले राम का मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। अयोध्या के बाद भगवान शंकर की नगरी काशी में कुछ ऐसा ही विवाद चल रहा है। वहां हिंदू भव्य मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाने की बात कहते हैं तो मुस्लिम पक्ष इस बात से इनकार करता आया है। हालांकि, फैसला कोर्ट को लेना है। लेकिन एक दिन पहले पुरातत्व विभाग ने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई कर रहे जिला जज को इस विवाद से जुड़े सबूत दिए हैं। इन सबूतों के आधार पर कहा जा रहा है कि वहां भव्य मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई थी। शनिवार को विश्व हिंदू परिषद ने ASI की बात को सही ठहराया है। वीएचपी के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अलोक कुमार ने कहा कि एएसआई की ओर से ज्ञानवापी मस्जिद से जुटाए गए सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस भव्य मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई थी। मंदिर का एक हिस्सा, खासकर पश्चिमी दीवार, हिंदू मंदिर का बचा हुआ हिस्सा है। रिपोर्ट यह भी साबित करती है कि पहले से मौजूद मंदिर के कुछ हिस्सों, जिनमें स्तंभ और पिलर शामिल हैं, को संशोधित करके मस्जिद के दायरे को बढ़ाने और सभन के निर्माण में इस्तेमाल किया गया था। वीएचपी का कहना है कि जिसे वजुखाना कहा जाता था, उसमें शिवलिंग इस बात में कोई संदेह नहीं छोड़ता है कि संरचना में मस्जिद जैसा चरित्र नहीं है। उन्होंने कहा कि संरचना में पाए गए शिलालेखों में जनार्दन, रुद्र और उमेश्वर सहित नामों की खोज इस बात का प्रमाण है कि यह एक मंदिर है। आलोक कुमार ने यह भी कहा कि एकत्र किए गए साक्ष्य और एएसआई की ओर से प्रदान किए गए निष्कर्ष यह साबित करते हैं कि इस पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में था और जैसा कि वर्तमान में एक हिंदू मंदिर का है। इस प्रकार, पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की धारा 4 के अनुसार भी, संरचना को हिंदू मंदिर घोषित किया जाना चाहिए। ASI के जिला जज को सौंपे सबूत भले वहां मंदिर होने की बात कहते हों लेकिन आखिरी फैसला कोर्ट को करना है।

भारत के पुरातत्व विभाग ने पिछले महीने वाराणसी जिला अदालत को ज्ञानवापी मस्जिद के बारे में अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी थी। उनसे ये पता लगाने को कहा गया था कि क्या मस्जिद किसी पुराने हिंदू मंदिर के ऊपर बनी है। इस रिपोर्ट की कॉपियां गुरुवार को दोनों पक्षों को दे दी गईं। हिंदू पक्ष का दावा है कि मौजूदा मस्जिद 17वीं सदी में असली काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर उसी जगह बनाई गई। एएसआई ने पुष्टि की है कि मस्जिद एक पहले से मौजूद मंदिर के ऊपर बनाई गई थी जिसमें एक बड़ा केंद्रीय कक्ष था और क्रमशः उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में कम से कम एक कक्ष था। काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर पर चल रहे मुकदमे में यह रिपोर्ट कितनी महत्वपूर्ण है? इसपर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और क्या है!

800 पन्नों की एएसआई रिपोर्ट को विशेषज्ञ साक्ष्य माना जाएगा जिसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है, और इसे केवल अंकित मूल्य पर लेने की आवश्यकता नहीं है। दीवानी मुकदमे में पक्ष गवाहों को गवाही देने के लिए लाएंगे, जिनसे दूसरे पक्ष की ओर से जिरह की जाएगी। इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, पुरालेखविदों, तथ्यों के गवाहों और धार्मिक ज्ञान वाले विशेषज्ञ गवाहों को अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मामले में, चूने की सुरखी के उपयोग पर पुरातत्व विभाग के निष्कर्षों की दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग व्याख्या की गई थी। मुस्लिम पक्ष ने तर्क दिया कि चूने की सुरखी इस्लामी संरचनाओं में उपयोग की जाने वाली एक विशिष्ट सामग्री है। हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने इसका विरोध किया और विशेषज्ञों की गवाही से साक्ष्य का हवाला दिया था। हिंदू पक्ष ने पुरातत्वविद् सूरज भान के बयानों पर भरोसा किया जिन्होंने कहा कि यह कहना सही है कि चूने के पानी का उपयोग तीसरी शताब्दी ईस्वी में तक्षशिला और पाकिस्तान में कुषाण काल के दौरान किया गया था और पुरातत्वविद् डॉ जया मेनन जिन्होंने कहा कि ‘निश्चित रूप से चूने के गारे का उपयोग नवपाषाण काल से किया जाता था।’

अनिवार्य रूप से, अदालतों को पहले यह निर्धारित करना होगा कि क्या ASI रिपोर्ट पर निर्णायक रूप से भरोसा किया जा सकता है, और फिर, 15 अगस्त, 1947 को मस्जिद के धार्मिक चरित्र के लिए हिंदू मंदिर के अस्तित्व का क्या अर्थ है। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मुकदमे में 2003 की एक एएसआई रिपोर्ट का हवाला दिया गया था, और अपने 2019 के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से इस पर भरोसा नहीं किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ASI प्राप्त पुरातात्विक निष्कर्षों पर शीर्षक की खोज कानूनी रूप से आधारित नहीं हो सकती है। बारहवीं शताब्दी के बीच, जिसमें अंतर्निहित संरचना दिनांकित है और सोलहवीं शताब्दी में मस्जिद का निर्माण, चार शताब्दियों की एक मध्यवर्ती अवधि है। (i) अंतर्निहित संरचना को तोड़ने का कारण और (ii) क्या पहले से मौजूद संरचना को मस्जिद के निर्माण के लिए ध्वस्त किया गया था, इस पर कोई सबूत उपलब्ध नहीं है। जमीन का मालिकाना हक तय किए गए कानूनी सिद्धांतों और साक्ष्य मानकों को लागू करने पर तय किया जाना चाहिए। सबसे पहले, रखरखाव का प्रारंभिक मुद्दा, क्या इस तरह का मुकदमा भी दायर किया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की ओर से निर्णायक रूप से तय किया जाना होगा। हालाँकि, यह मुद्दा पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के भविष्य पर निर्भर करता है। पूजा स्थल अधिनियम की धारा 3 और 4 1991 में रामजन्मभूमि आंदोलन के मद्देनजर अधिनियमित की गई थी। यह धाराएं अनिवार्य रूप से घोषणा करती हैं कि किसी पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र वही रहेगा जो 15 अगस्त, 1947 को था और यह कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक संप्रदाय के किसी भी पूजा स्थल को किसी अन्य संप्रदाय या धारा में परिवर्तित नहीं करेगा। अयोध्या में उस समय मौजूद विवादित ढांचा इस कानून का एकमात्र अपवाद था। पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट शीर्षक मामले के लिए सबूत नहीं है क्योंकि 1991 के अधिनियम द्वारा निर्धारित समय सीमा स्वतंत्रता की तारीख है।

अदालत ने कहा, ‘राज्य ने कानून बनाकर संवैधानिक वचन को मजबूत किया है और सभी धर्मों की समानता और धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा किया है, जो संविधान के मूलभूत स्वरूप का एक हिस्सा है।’ कोर्ट ने आगे कहा कि पूजा स्थल अधिनियम भारतीय संविधान के तहत धर्मनिरपेक्षता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को लागू करने की एक न हटने वाली बाध्यता लागू करता है। यह कानून इसलिए भारतीय राजनीति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की रक्षा के लिए बनाया गया कानूनी उपकरण है, जो संविधान के मूलभूत स्वरूपों में से एक है। अदालत ने आगे कहा कि गैर-वापसी मूलभूत संवैधानिक सिद्धांतों का एक मूलभूत लक्षण है, जिनमें से धर्मनिरपेक्षता एक प्रमुख घटक है। इस प्रकार, पूजा स्थल अधिनियम एक विधायी हस्तक्षेप है जो हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के एक आवश्यक तत्व के रूप में गैर-वापसी को संरक्षित करता है।”