Thursday, March 5, 2026
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विक्की जैन को अंकिता लोखंडे के बिना बिग बॉस ओटीटी 3 का बुलावा आया.

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टेलीविजन पर सबसे लोकप्रिय रियलिटी शो में से एक है ‘बिग बॉस’। सलमान खान द्वारा होस्ट किए जाने वाले इस रियलिटी शो पर लगातार विवाद के बावजूद छोटे पर्दे का यह शो पिछले 18 सालों से दर्शकों का मनोरंजन कर रहा है। ‘बिग बॉस’ का 17वां सीजन हाल ही में खत्म हुआ है। ‘बिग बॉस 17’ पिछले साल अक्टूबर से शुरू हुआ था। करीब साढ़े तीन महीने के सफर के बाद पिछले रविवार को ‘बिग बॉस 17’ का फिनाले था। ‘बिग बॉस’ के इस सीजन के प्रतियोगियों में टेलीविजन अभिनेत्री अंकिता लोखंडे, प्रियंका चोपड़ा की चचेरी बहन मन्नारा चोपड़ा, कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी शामिल थे। मुनव्वर ने अंकिता और मन्नारा को हराकर विजेता ट्रॉफी अपने नाम की। अंकिता सूखे मुंह और खाली हाथों के साथ ‘बिग बॉस’ के कमरे से बाहर आईं। इससे पहले अंकिता के पति विक्की जैन को निष्कासित कर दिया गया था. ‘बिग बॉस 17’ के बाद इस बार यह ‘बिग बॉस ओटीटी’ का तीसरा सीजन है। खबर है कि विक्की को रियलिटी शो के ओटीटी वर्जन के लिए बुलाया गया है. अंकिता पिछले रविवार को ही ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर निकली हैं। भले ही अंकिता विजेता की ट्रॉफी नहीं जीत पाईं, लेकिन विक्की ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक पोस्ट लिखा कि उन्हें उन पर बहुत गर्व है। कुछ ही दिनों में खबर आई कि विक्की को प्रोड्यूसर्स ने ‘बिग बॉस ओटीटी 3’ के लिए बुलाया है। हालांकि, अंकिता को अभी तक इस बारे में कोई प्रपोजल नहीं मिला है। अंकिता और विक्की ने ‘बिग बॉस 17’ के घर में कपल के तौर पर एंट्री की थी। क्या अंकिता को छोड़ अकेले ‘बिग बॉस ओटीटी 3’ के घर में कदम रखेंगे उनके पति?

वहीं अंकिता ने भी ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर आकर खुशखबरी सुनाई। हाल ही में अंकिता ने सोशल मीडिया पर बताया कि वह फिल्म ‘स्वतंत्र वीर सावरकर’ में रणदीप हुडा के साथ नजर आने वाली हैं। फिल्म का टीजर शेयर करते हुए अंकिता ने लिखा, ”वह ‘बिग बॉस’ का घर छोड़कर कुछ नया शुरू करके खुश हैं।’ हालांकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि वह रणदीप की फिल्म में कौन सा रोल निभाएंगे। फिल्म 22 मार्च को रिलीज हो रही है.

2018 से प्यार. टेलीविजन एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे ने तीन साल के प्यार के बाद 2021 में बिजनेसमैन विक्की जैन से शादी कर ली। शादी के कुछ साल बाद अंकिता और विक्की ने ‘बिग बॉस’ के घर में बतौर कपल एंट्री की। जब से सलमान खान रियलिटी शो में आए हैं, तब से उनकी शादीशुदा जिंदगी पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। विक्की और अंकिता अन्य प्रतियोगियों के सामने एक-दूसरे का अपमान करने से नहीं चूके। अंकिता कई बार विक्की के साथ तलाक की राह पर चलने की चेतावनी भी दे चुकी हैं। फिनाले से पहले विक्की ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर हो गए थे। ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर निकलने के बाद अंकिता के पति ने पूर्व महिला प्रतियोगियों के साथ जमकर पार्टी की। वहीं अंकिता विनर के खिताब के लिए संघर्ष कर रही हैं. दोनों के बीच चल रही उथल-पुथल के दौरान विक्की और अंकिता की मां ‘बिग बॉस’ के घर में आईं। उस वक्त अंकिता की सास ने बौमा पर आरोपों का पहाड़ खड़ा कर दिया था. विक्की की मां ने साफ कहा कि उन्होंने अपने बेटे के प्रति अंकिता के व्यवहार को हल्के में नहीं लिया. उन्होंने विक्की से यहां तक ​​कहा कि उन्होंने अंकिता से शादी करने से पहले उन्हें चेतावनी दी थी. इस बार विक्की ने अपनी मां की शिकायत खुलकर बताई.

विक्की ने कहा कि उनके और अंकिता के बीच हुए झगड़े के बारे में न तो उनकी मां को पता था और न ही अंकिता की मां को. बाहर से देखने पर उन्हें लग रहा था कि शायद उनके और अंकिता के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं. बड़े होने के नाते वे इस बात से चिंतित थे। विक्की का दावा है कि उनकी मां अंकिता से बहुत प्यार करती हैं। विक्की ने कहा कि उनके और अंकिता के बीच हुए झगड़े के बारे में न तो उनकी मां को पता था और न ही अंकिता की मां को. बाहर से देखने पर उन्हें लग रहा था कि शायद उनके और अंकिता के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं. बड़े होने के नाते वे इस बात से चिंतित थे। विक्की का दावा है कि उनकी मां अंकिता से बहुत प्यार करती हैं।

आदित्य L1 पर लॉन्च किया गया मैग्नेटोमीटर बूम आखिर क्या है?

आज हम आपको बताएंगे कि आदित्य L1 पर लॉन्च किया गया मैग्नेटोमीटर बूम क्या है! भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने आदित्य-L1 में लगे छह मीटर लंबे मैग्नेटोमीटर बूम  को सफलतापूर्वक तैनात और एक्टिव कर दिया है। आदित्य सोलर प्रोब 11 जनवरी 2024 को L-1 प्वाइंट पर तैनात किया गया था। इस दौरान 132 दिनों तक मैग्नेटोमीटर को बंद रखा गया था। बूम के अंदर दो स्टेट-ऑफ-द-आर्ट, अत्यधिक सटीक फ्लक्सगेट मैग्नेटोमीटर सेंसर्स हैं, जो अंतरिक्ष में ग्रहों के बीच चुंबकीय शक्ति और क्षेत्र को डिटेक्ट करता है। चाहे यह फील्ड कितनी भी कमजोर क्यों न हो। ये सेंसर्स स्पेसक्राफ्ट के शरीर से 3 मीटर और 6 मीटर की दूरी पर तैनात किए गए हैं। इतनी दूरी इसलिए रखी गई है ताकि आदित्य के शरीर से निकलने वाली चुंबकीय शक्ति सेंसर्स पर अपना असर न डालें। दो सेंसर्स की जरूरत इसलिए थी ताकि मैग्नेटिक फील्ड की ज्यादा सटीक जानकारी मिल सके। बूम के अंदर पांच सेगमेंट हैं, जो उसे आसानी से मुड़ने और फैलने में मदद करते हैं। इन दोनों मैग्नेटोमीटर को तैनात होने में 9 सेकेंड लगे। फिलहाल यह दोनों सही से काम कर रहे हैं। इसरो ने बताया कि बहुत जल्द ही इसके डेटा का भी खुलासा किया जाएगा।

इसरो ने कहा, ‘सेंसर अंतरिक्ष यान से तीन और छह मीटर की दूरी पर स्थापित किए गए हैं। इन दूरियों पर उन्हें स्थापित करने से माप पर अंतरिक्ष यान द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का प्रभाव कम हो जाता है, और उनमें से दो का उपयोग करने से इस प्रभाव का सटीक अनुमान लगाने में सहायता मिलती है। दोहरी सेंसर प्रणाली अंतरिक्ष यान के चुंबकीय प्रभाव को खत्म करने में सहायक होती है।’ बता दें कि इसरो ने सूर्य का अध्ययन करने के लिए देश के पहले सौर मिशन यान ‘आदित्य एल1’ को छह जनवरी को पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर अपनी अंतिम गंतव्य कक्षा में स्थापित करा दिया था। ‘आदित्य एल1’ का दो सितंबर, 2023 को सफल प्रक्षेपण किया गया था। ‘आदित्य एल1’ को सूर्य परिमंडल के दूरस्थ अवलोकन और पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर ‘एल1’ पर सौर वायु का वास्तविक अवलोकन करने के लिए तैयार किया गया है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य सौर वातावरण में गतिशीलता, सूर्य के परिमंडल की गर्मी, सूर्य की सतह पर सौर भूकंप या ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ सीएमई, सूर्य के धधकने संबंधी गतिविधियों और उनकी विशेषताओं तथा पृथ्वी के करीब अंतरिक्ष में मौसम संबंधी समस्याओं को समझना है।

यही नहीं आपको बता दें कि भारत के चंद्रयान-3 मिशन का विक्रम लैंडर चांद की सतह पर मौजूद है। यह मिशन काफी पहले बंद हो चुका है। लेकिन हाल ही में नासा ने इसके जरिए एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। नासा के एक अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक लेजर से निशाना लगाया। चंद्रमा पर पहली बार परिक्रमा कर रहे नासा की सैटेलाइट ने विक्रम लैंडर पर एक उपकरण से लेजर किरण प्रसारित की और फिर वह परावर्तित हुई। इस प्रयोग के जरिए चंद्रमा की सतह पर टार्गेट का सटीक पता लगाने में कामयाबी मिलेगी। भारत के चंद्रयान-3 मिशन का विक्रम लैंडर 23 अगस्त को सफलतापूर्वक चंद्रमा पर उतरा था। उसने एक ऐतिहासिक लैंडिंग की थी। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के शिव शक्ति पॉइंट पर यह उतरा था। इसके अंदर से प्रज्ञान रोवर भी निकला था, जिसने सतह पर कई प्रयोग किए थे। नासा ने एक बयान में कहा, ’12 दिसंबर 2023 को 3pm पर नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर ने अपने लेजर अल्टीमीटर उपकरण को विक्रम की ओर पॉइंट किया।’

बयान में आगे कहा गया, ‘जब लेजर ट्रांसमिट किया गया तो लैंडर LRO से 100 किमी दूर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र के पास मैन्जिनस क्रेटर के पास था। ऑर्बिटर ने विक्रम पर लगे एक छोटे नासा रेट्रोरेफ्लेक्टर से वापस लौटकर आई रोशनी को दर्ज किया। इसके बाद नासा वैज्ञानिकों को पता चला कि उनकी तकनीक काम कर गई।’ नासा के मुताबिक किसी वस्तु की ओर लेजर पल्स भेजना जमीन से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों को ट्रैक करने में इस्तेमाल होने वाला तरीका है।लेकिन चंद्रमा पर तकनीक को उल्टा इस्तेमाल किया गया है। एक चलते अंतरिक्ष यान से एक स्थिर अंतरिक्ष यान पर लेजर पल्स को भेजा गया, ताकि उसके सटीक स्थान का पता किया जा सके। वैज्ञानिक जियाओली सन ने कहा, ‘हमने दिखाया है कि हम चंद्रमा की कक्षा से सतह पर अपने रेट्रोरिफ्लेक्टर का पता लगा सकते हैं।’ इसरो ने बयान में कहा कि चंद्रयान-3 लैंडर पर लेजर रेट्रोरिफ्लेक्टर एरे ने काम शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत नासा के LRA को विक्रम लैंडर पर लगाया गया था।

जानिए देश की लेडी टार्जन चामी मुर्मू के बारे में सबकुछ!

आज हम आपको देश की लेडी टार्जन चामी मुर्मू  के बारे में बताने जा रहे हैं! गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कार की घोषणा की गई। झारखंड की चामी मुर्मू को भी पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है। चामी मुर्मू का जीवन जनजातीय पर्यावरण और महिला सशक्तीकरण के नाम रहा है। उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पुरस्कार दिया था। पिछले 28 सालों में चामी 28 हजार महिलाओं को स्वरोजगार दे चुकी हैं। लेडी टार्जन के नाम से मशहूर चामी मुर्मू ने सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत 40 से अधिक गांवों की महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ा है। एसएचजी से जुड़ने के बाद 40 से अधिक गांवों की इन महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव आया। चामी मुर्मू के प्रयास से इन गांवों की 28 हजार से अधिक महिलाओं को रोजगार से जोड़ा गया, जिसकी वजह से उनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। महिलाएं सशक्त हुई।

चामी मुुर्मू ने जंगल की अवैध कटाई के खिलाफ जंग छेड़ कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा काम किया। इसके अलावा चामी ने लकड़ी माफिया और नक्सल गतिविधियों के खिलाफ भी पूरे समर्पण के साथ अभियान चलाया। जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए उनके कार्यों की वजह से ही उन्हें ‘लेडी टार्जन’ का दर्जा मिल चुका है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम करने वाली चामी मुर्मू का कहना है कि 1988 में वन माफियाओं की ओर से पेड़-पौधों के अंधाधुंध कटाई और तस्करी से ग्रामीणों के सामने जलाने की लकड़ी तक की समस्या उत्पन्न हो गई। उस दौर में जब लोगों को दो वक्त का खाना जुगाड़ कर पाना मुश्किल होता था, उस समय उन्होंने 10 महिलाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग उनके साथ जुड़ते गए। उन्होंने अपनी टीम के साथ अकसिया, नीम, साल, शीशम के पौधे भी लगाए, जो फर्जीचर और घरेलू सामान बनाने में काफी उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।

सरायकेला-खरसावां की रहने वाली चामी के प्रयास से 30 लाख से ज्यादा पौधरोपण किया गया। लकड़ियों की अवैध कटाई रोकने और नक्सल गतिविधियों से सुरक्षा को लेकर चामी कई सालों से काम कर रही हैं। अपने एनजीओ ‘सहयोगी महिला’ के माध्यम से प्रभावशाली पहल की सुरक्षित मातृत्व, एनीमिया और कुपोषण से मुक्ति कार्यक्रम और किशोरियों की शिक्षा पर जोर दिया। चामी मुर्मू को पद्म पुरस्कार मिलने पर केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने ‘एक्स’ पर लिखा- सरायकेला खरसावां झारखंड की राजनगर की चामी मुर्मू को पद्मश्री पुरस्कार मिलने पर बहुत बधाई और शुभकामनाएं। उन्हें देश भर में ‘सरायकेला की सहयोगी’ के नाम से भी जाना जाता है। चामी मुर्मू ने पर्यावरण और महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। इसी तरह एक सिपाही हवलदार अब्दुल माजिद भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट की 9वीं बटालियन के स्क्वाड कमांडर थे। यह स्पेशल फोर्सेज रेजिमेंट 2011 से जम्मू-कश्मीर में काम कर रही है। 22 नवंबर, 2023 को राजौरी जिले के जंगली इलाकों में तलाशी अभियान के दौरान आतंकवादियों की गोलीबारी में राष्ट्रीय राइफल्स की 63वीं बटालियन के कैप्टन एमवी प्रांजल गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके बचाव के लिए हवलदार अब्दुल माजिद का दस्ता आगे बढ़ा। तभी हवलादर अब्दुल माजिद ने भारी गोलाबारी की रेंगते हुए आगे बढ़े और कैप्टन प्रांजल को निकालकर सुरक्षित क्षेत्र में पहुंचा दिया। उसके बाद हवलदार माजिद फिर आतंकियों से मोर्चा लेने पहुंच गए। उन्होंने असाधारण सामरिक कौशल से गुफा के पास अपने दस्ते को तैनात किया जहां से आतंकी छिपकर अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। गोलीबारी में हवलदार माजिद के पैर में गोली लग गई। खून के तेज रिसाव के बावजूद हवलदार अब्दुल माजिद अपने कर्तव्य पर डटे रहे और रेंगते हुए गुफा के अंदर पहुंचकर आतंवादियों की तरफ ग्रेनेड फेंक दिया। इस घटना में घायल आतंकवादी जान बचाने के लिए गुफा से निकले। हवलदार माजिद ने आतंकवादियों से अपनी टीम की रक्षा करने के लिए गोलियां बरसाईं और खुद बलिदान होने से पहले आतंकवादियों को मार गिराया। उस दौर में जब लोगों को दो वक्त का खाना जुगाड़ कर पाना मुश्किल होता था, उस समय उन्होंने 10 महिलाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग उनके साथ जुड़ते गए।साइटेशन में कहा गया है, ‘उनके असाधारण साहस, निःस्वार्थ भावना और अति विशिष्ट वीरता के लिए गंभीर रूप से घायल अधिकारी को बाहर निकालने और फिर एक कट्टर विदेशी आतंकवादी को मार गिराने के लिए हवलदार अब्दुल माजिद को मरणोपरांत ‘कीर्ति चक्र’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।’

जानिए किन-किन वीर सैनिकों को किया गया वीरता पुरस्कार से सम्मानित?

आज हम आपको बताएंगे कि किन-किन वीर सैनिकों को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है! देश 75वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी वीरता पुरस्कारों का ऐलान गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर की गई है। इस बार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सशस्त्र बलों के 80 वीरों को वीरता पुरस्कारों से सम्मानित करने की मंजूरी दी है, जिनमें 12 मरणोपरांत पुरस्कार शामिल हैं। इन पुरस्कारों में छह कीर्ति चक्र (तीन मरणोपरांत), 16 शौर्य चक्र दो मरणोपरांत, 53 सेना मेडल सात मरणोपरांत, एक नौसेना मेडल वीरता और चार वायु सेना मेडल वीरता शामिल हैं। रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि तीन कीर्ति चक्र और दो शौर्य चक्र मरणोपरांत प्रदान किए जाएंगे। ये पुरस्कार क्रमशः युद्धकाल के महावीर चक्र और वीर चक्र के समकक्ष हैं। मंत्रालय ने बताया कि कीर्ति चक्र के लिए चुने गए वीरों में मेजर दीपेंद्र विक्रम बस्नेत 4 सिख, मेजर दिग्विजय सिंह रावत 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज, कैप्टन अंशुमान सिंह आर्मी मेडिकल कोर, 26 पंजाब – मरणोपरांत, हवलदार पवन कुमार यादव 21 महार रेजिमेंट, हवलदार अब्दुल माजिद 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज- मरणोपरांत और सिपाही पवन कुमार ग्रेनेडियर्स, 55 राष्ट्रीय राइफल्स – मरणोपरांत शामिल हैं। इन सूरवीरों की गाथाएं हरेक देशवासी और भारत मां के सपूतों की प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी। मणिपुर में घुसते ही 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज के ट्रूप कमांडर मेजर दिग्विजय सिंह रावत ने एक इनोवेटिव और मजबूत खुफिया नेटवर्क का निर्माण किया। इस नेटवर्क के जरिए उन्होंने महीनों की मेहनत से घाटी के विद्रोही समूहों वीबीआईजी का सटीक नक्शा बनाया। एक ऑपरेशन के दौरान मेजर रावत को सूचना मिली कि वीबीआईजी एक वीआईपी को मणिपुर में निशाना बनाने की योजना बना रहे हैं। इस सूचना के आधार पर मेजर रावत ने अपने एक सूत्र को सक्रिय किया जिसने विद्रोही समूहों को भटका दिया। वह सूत्र सफलतापूर्वक विद्रोही समूह को उसी इलाके में ले गया, जहां मेजर दिग्विजय सिंह की टीम उनका इंतजार कर रही थी। आतंकवादियों ने सैनिकों को देखते ही ऑटोमेटिक हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। लेकिन, गोलियों की बौछार के बीच भी हार नहीं मानते हुए मेजर रावत ने अपनी टीम को कुशलता से नियंत्रित किया और खुद रेंगते हुए आतंकवादियों के एक स्वयंभू कैप्टन को मार गिराया और दूसरे को घायल कर दिया। खुफिया जानकारी के अनुसार, ये दोनों ही असम राइफल्स पर घात लगाकर हमला करने के मास्टरमाइंड थे। इसी तरह, एक अन्य ऑपरेशन के दौरान मेजर रावत को वीबीआईजी कैडरों के घुसपैठ की सूचना मिली। क्षेत्र के अपनी समझ का उपयोग करते हुए उन्होंने एक नजदीकी निगरानी प्रणाली बनाई और बड़े आतंकियों को सीधी लड़ाई में हराकर पकड़ लिया। साइटेशन में कहा गया है, ‘कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी के प्रति समर्पण, बेजोड़ शौर्य, साहस और रणनीतिक कौशल के लिए मेजर दिग्विजय सिंह रावत को ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया जाता है।’

मेजर दीपेंद्र विक्रम बस्नेत तैनात एक घात के कमांडर थे। 15 जून, 2023 को नियंत्रण रेखा के पास कुपवाड़ा जिले का केरेन सेक्टर में पांच आतंकवादियों के एक समूह के संभावित घुसपैठ के बारे में खुफिया जानकारी मिलने पर घात लगाया गया था। मेजर दीपेंद्र विक्रम बस्नेत की सर्विलांस टीम ने इन आतंकवादियों को देखा और उन्हें चेतावनी दी, लेकिन घुसपैठिये आतंकी नहीं माने। हाई प्रेसर की स्थिति में उत्कृष्ट सूझबूझ का परिचय देते हुए उन्होंने आतंकियों को फांसने के लिए तुरंत अपना पोजिशन चेंज किया। 16 जून, 2023 की आधी रात के बाद जैसे ही आतंकवादी घात लगाकर बैठे, मेजर की टीम ने उनपर भारी गोली-बारी की और आतंकियों को नीचे धकेल दिया। हालांकि, जवाब में आतंकी कमांडर ने अंधाधुंध फायरिंग करते हुए मेजर पर ग्रेनेड फेंक दिया। मेजर दीपेंद्र और उनकी टीम ने भारी खतरे को भांप लिया।

इस बीच मेजर ने भारी गोलीबार में भी जान की परवाह किए बिना रेंगते हुए आतंकवादी की ओर बढ़े और उसे करीब से मार गिराया। इसके बाद हुई गोलीबारी में उनका सामना दूसरे आतंकवादी से हो गया। मेजर दीपेंद्र ने इस आतंकवादी को भी आमने-सामने की भीषण लड़ाई में उलझाया और अपने खंजर से ही उसे मार डाला। उसके बाद भी मेजर दीपेंद्र ऑपरेशन को नियंत्रित करते रहे और तीसरे आतंकी का सफाया करने में भी अपनी टीम की सहायता की। अधिकारी ने अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी और ऑपरेशन की सफलता सुनिश्चित की। मेजर दीपेंद्र की बहादुरी और उनकी सूझबूझ के कारण ऑपरेशन में भारी हथियारों से लैस सीमा पार के पांच आतंकवादी मार गिराए गए। साइटेशन कहता है, ‘अपने नुकसान की परवाह किए बिना असीम शौर्य का परिचय देते हुए क्लिनिकल ऑपरेशन की योजना बनाने और उसे उत्कृष्ट नेतृत्व से क्रियान्वित करने के लिए मेजर दीपेंद्र विक्रम बस्नेत को ‘कीर्ति चक्र’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।’

कैप्टन अंशुमान सिंह को 19 मार्च 2020 को आर्मी मेडिकल कोर में नियुक्त किया गया था। ऑपरेशन मेघदूत के तहत कैप्टन अंशुमान 26वीं पंजाब बटालियन के चंदन कॉम्प्लेक्स में बतौर चिकित्सा अधिकारी शामिल हुए। 19 जुलाई, 2023 की रात चंदन ड्रॉपिंग जोन में भीषण आग लग गई। अधिकारी ने आग की आवाज सुनी और अपनी फाइबर ग्लास हट से बाहर निकले। देखा कि बगल के फाइबर ग्लास हट धुएं के गुबार में ढक गया है और जल्द ही वो आग के आगोश में आ जाएगा। ऐसी परिस्थिति में कैप्टन अंशुमान ने साहस का परिचय दिया और 4 से 5 सैनिकों को निकाल लिया। उन्होंने लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने का निर्देश दिया। तब तक मेडिकल जांच रूम आग की चपेट में आ गया। वो मेडिकल एड बॉक्स निकालने के लिए तुरंत अपने फाइबर ग्लास हट के अंदर गए, हालांकि आग की लपटें फैल जाने के कारण वो बॉक्स नहीं ला सके क्योंकि तेज हवाओं के कारण फाइबर ग्लास बुरी तरह दहक उठा था। बेहद प्रयास के बावजूद अंदर फंसे कैप्टन अंशुमान को बाहर नहीं निकाला जा सका। आग बुझी तब हट से उनका शव मिला। साइटेशन में कहा गया है, ‘कैप्टन अंशुमान सिंह ने अपनी सुरक्षा की परवाह किए बगैर असाधारण बहादुरी और सर्वोच्च संकल्प का प्रदर्शन किया। उनका कार्य वीरता और बलिदान को दर्शाता है। भारतीय सेना की सर्वोत्तम परंपराओं के लिए कैप्टन अंशुमान सिंह को मरणोपरांत ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया जाता है।’

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में 27 फरवरी, 2023 को एक ऑपरेशन के दौरान हवलदार पवन कुमार शहीद हो गए थे। संभावित घुसपैठ की खुफिया जानकारी मिली तो हवलदार पवन कुमार यादव ने अपनी टीम का नेतृत्व किया। जानकारी थी कि चार-पांच आतंकवादियों की टीम कुपवाड़ा में नियंत्रण रेखा के पास घने जंगली इलाके में घात लगाए घुसपैठ की फिराक में हैं। इस खूफिया सूचना पर हवलदार पवन कुमार यादव ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन की चौकी के करीब घात लगा दी। आतंवादियों हवलदार पवन की टीम पर नजदीक से गोलियां बरसानी शुरू कर दी। लेकिन हवलदार पवन कुमार यादव रेंगते रहे और आतंकवादियों तक पहुंच गए। हवलदार पवन ने अपनी सूझ-बूझ के दम पर बेहद दुरूह इलाके में भागते हुए आतंकवादी को मार गिराया। दूसरा आतंकवादी भाग ही रहा था। हवलदार पवन ने अपनी जान की परवाह न करते हुए भारी गोलीबारी के बीच उस आतंकवादी का पीछा करते रहे। पीछा करने में थककर चूर होने के बावजूद हवलदार पवन ने अदम्य साहस का परिचय दिया और आमने-सामने की लड़ाई में दूसरे आतंकवादी को भी मार गिराया। हालांकि इस दौरान खुद पवन कुमार भी गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में वीरगति को प्राप्त हो गए। साइटेशन कहता है, ‘कर्तव्य के निर्वहन में अपनी जान जोखिम में डालकर विशिष्ट वीरता, निडरता और वीरता से दो कट्टर विदेशी आतंकवादियों को मार गिराने के लिए हवलदार पवन कुमार यादव को ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया जाता है।’

हवलदार अब्दुल माजिद भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट की 9वीं बटालियन के स्क्वाड कमांडर थे। यह स्पेशल फोर्सेज रेजिमेंट 2011 से जम्मू-कश्मीर में काम कर रही है। 22 नवंबर, 2023 को राजौरी जिले के जंगली इलाकों में तलाशी अभियान के दौरान आतंकवादियों की गोलीबारी में राष्ट्रीय राइफल्स की 63वीं बटालियन के कैप्टन एमवी प्रांजल गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके बचाव के लिए हवलदार अब्दुल माजिद का दस्ता आगे बढ़ा। तभी हवलादर अब्दुल माजिद ने भारी गोलाबारी की रेंगते हुए आगे बढ़े और कैप्टन प्रांजल को निकालकर सुरक्षित क्षेत्र में पहुंचा दिया। उसके बाद हवलदार माजिद फिर आतंकियों से मोर्चा लेने पहुंच गए। उन्होंने असाधारण सामरिक कौशल से गुफा के पास अपने दस्ते को तैनात किया जहां से आतंकी छिपकर अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। गोलीबारी में हवलदार माजिद के पैर में गोली लग गई। खून के तेज रिसाव के बावजूद हवलदार अब्दुल माजिद अपने कर्तव्य पर डटे रहे और रेंगते हुए गुफा के अंदर पहुंचकर आतंवादियों की तरफ ग्रेनेड फेंक दिया। इस घटना में घायल आतंकवादी जान बचाने के लिए गुफा से निकले। हवलदार माजिद ने आतंकवादियों से अपनी टीम की रक्षा करने के लिए गोलियां बरसाईं और खुद बलिदान होने से पहले आतंकवादियों को मार गिराया। साइटेशन में कहा गया है,

‘उनके असाधारण साहस, निःस्वार्थ भावना और अति विशिष्ट वीरता के लिए गंभीर रूप से घायल अधिकारी को बाहर निकालने और फिर एक कट्टर विदेशी आतंकवादी को मार गिराने के लिए हवलदार अब्दुल माजिद को मरणोपरांत ‘कीर्ति चक्र’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।’

पिछले वर्ष 27 फरवरी को दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के एक गांव में आतंकवादियों की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिली। इस सूचना पर सिपाही पवन कुमार ने आतंकियों के खिलाफ अभेद्य घेरा बनाने में जबर्दस्त सामरिक कौशल का प्रदर्शन किया। जब बारी कमरे के अंदर की तलाशी लेने की आई तो सिपाही पवन कुमार टीम के साथियों के साथ आगे बढ़ गए। जैसे ही वो पहली मंजिल के पास पहुंचे छिपे हुए आतंकवादियों ने सिपाही पवन कुमार और उनके साथियों की तरफ ग्रेनेड फेंक दिया और अंधाधुंध गोलीबारी की। सिपाही पवन कुमार ने बिना घबराए धैर्य का परिचय दिया और आतंकवादियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की। सिपाही पवन कुमार को इस बात का अहसास हुआ कि उसके साथी गंभीर खतरे से घिर गए हैं तो अदम्य साहस के साथ आगे बढ़े और एक आतंकवादी से आमने-सामने की लड़ाई की। सिपाही पवन कुमार ने आतंकवादी से करीबी की लड़ाई में उसका हथियार छीनकर उसे मार गिराया जबकि दूसरे आतंकी को घायल कर दिया। इस भीषण गोलाबारी में सिपाही पवन कुमार गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए और कर्तव्य के निर्वहन में अपना जान न्योछावर किर दिया। सिपाही पवन कुमार ने जिसका खात्मा किया उसकी पहचान ‘ए’ कैटिगरी के आतंकवादी के रूप में हुई। साइटेशन कहता है, ‘कर्तव्य की सीमा से परे अदम्य साहस और अद्वितीय शक्ति प्रदर्शित करने के लिए सिपाही पवन कुमार को मरणोपरांत ‘कीर्ति चक्र’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।’

फ्रांसिसी लेखिका क्रिस्टियानो वेक्ड को भारत से क्यों है इतना प्रेम?

आज हम आपको बताएंगे कि फ्रांसिसी लेखिका क्रिस्टियानो वेक्ड को भारत से इतना प्रेम क्यों है! जब बेरूत में उनका बचपन बीत रहा था, तब उनके पास एक गुप्त नखलिस्तान था। वह था- किताबों से भरा एक कमरा। यह हमारे पड़ोसी मेडेलीन का था। उन्होंने तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन किया था लेकिन उन्हें कभी इसे पढ़ाने का मौका नहीं मिला। उस समय वही महिला अच्छी कहलाती थी जो घर पर रहकर अपने बच्चों की देखभाल करे। शिक्षक न बन पाना मेडेलीन की मायूसी का सबब था। इसकी भरपाई के लिए उन्होंने अपनी इमारत में बच्चों को इकट्ठा करके कहानियां सुनाने लगीं। उनकी लाइब्रेरी बहुत समृद्ध थी। हमें वहां ज्यां पॉल सांत्र और अल्बर्ट कैमस जैसे फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिकों से लेकर कार्ल मार्क्स के घोषणापत्र तक, सेंट ऑगस्टिन के कन्फेशन की पुस्तक से लेकर 700 श्लोक वाले हिंदू धर्मग्रंथ भगवद गीता तक, सब कुछ उपलब्ध था। मेरा पसंदीदा समय वह था जब मेडेलीन मुझे भारत के बारे में कहानियां सुनाया करतीं। कई अरब लेखकों ने भारत के समृद्ध इतिहास और विविध संस्कृति के बारे में लिखा है। उनमें नोबेल पुरस्कार विजेता मिस्र के उपन्यासकार नागुइब महफूज भी शामिल थे। महफूज की ‘द जर्नी ऑफ इब्न फत्तौमा’ एक रूपक कहानी है जो पाठकों को अपने नायक के साथ एक विचारोत्तेजक यात्रा पर ले जाती है। वो अपनी मातृभूमि में भ्रष्टाचार से निराश व्यक्ति हैं। इसलिए वो विभिन्न देशों की यात्रा करते हैं जहां उनका सामना विभिन्न सभ्यताओं से होता है। उनका मानना है कि भारत में सभी धर्म शांतिपूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व में रहते हैं।

एक अन्य प्रसिद्ध अरब ग्रंथ ‘रिहला’ 14वीं शताब्दी में मोरक्को के यात्री और न्यायविद इब्न बतूता का लिखा हुआ है। इसमें उनकी भारत यात्रा का वर्णन है। जब वो 1334 में भारत पहुंचे तो उन्हें शासक मुहम्मद बिन तुगलक ने नौकरी की पेशकश की और उन्होंने दिल्ली में न्यायाधीश के रूप में भी काम किया। उन्होंने कई शहरों का दौरा किया और चीन जाने से पहले आठ साल तक भारत में रहे। भारत और उसके लोगों के साथ बतूता का अनुभव उनकी पुस्तक में दिलचस्प अंदाज में दर्ज है।भारत से प्रभावित एक अन्य प्रसिद्ध अरब लेखक लेबनानी-अमेरिकी दार्शनिक खलील जिब्रान हैं। कई विद्वानों ने जिब्रान की पुस्तक ‘द प्रोफेट’ के नायक अल मुस्तफा और भगवद गीता के कृष्ण के बीच समानताएं देखी हैं। दोनों पात्रों में लोगों के प्रति नैतिक जिम्मेदारी की गहरी भावना है। दोनों अपने अनुयायियों को भौतिकवादी दुनिया से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। जिब्रान की भारत में विशेष रुचि थी। इसकी वजह थी नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ उनकी घनिष्ठता।

अरब लेखकों का भारत के प्रति आकर्षण 14वीं शताब्दी से भी पुराना है। 816 से 869 तक अब्बासिद दरबार में इराकी लेखक और विद्वान अल जाहिज ने भारतीयों के व्यावसायिक कौशल की जमकर प्रशंसा की है। वो लिखते हैं, ‘मुद्रा व्यापारी अपनी नकदी और अपने कारोबार को चलाने का जिम्मा केवल पहली या दूसरी पीढ़ी के सिंधी [भारतीयों] को सौंपते हैं क्योंकि अनुभव से पता चलता है कि विनिमय के मामले में वे सबसे अधिक सक्षम, सावधान और विश्वसनीय हैं।’ ये वे कौशल हैं जिन्हें भारतीयों ने वर्तमान में भी बनाए रखा है जिसे मैंने व्यक्तिगत रूप से सात वर्षों तक संयुक्त अरब अमीरात यूएई में रहते हुए देखा है।

लेकिन मेडेलीन की लाइब्रेरी, जहां मुझे ये सारे खजाने मिले, युद्ध के समय एक मिसाइल से हमला कर दिया गया। इसे जलाकर नष्ट कर दिया गया। और तब से उसने अपनी किताबों पर इस तरह शोक व्यक्त किया जैसे कि वे हाड़-मांस की हों। मैं उसका दर्द भी अपने दिल में रखती हूं। भले ही हम लेबनानी घाटे के आदी हैं, फिर भी यह मामला अलग लगा। ऐसा लगा मानो हमने अपनी आत्मा का एक हिस्सा खो दिया हो। लेकिन आज इतने साल बीत जाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि भले ही मैंने मेडेलीन की किताबों का आनंद थोड़े समय के लिए ही उठाया हो, लेकिन उन किताबों को पढ़ने का लाभ जीवन भर मिलता है। उस पुस्तकालय से और उन सभी अरब लेखकों से, जिनका मैंने यहां उल्लेख किया है, एक विशेष बात जो मुझे प्राप्त हुई, वह है भारत के प्रति मेरा आकर्षण, इसके प्रति मेरा प्रेम। मुझे नहीं लगता कि भारत के प्रति यह जुनून मुझे कभी छोड़ेगा क्योंकि जो मन और स्मृति में अंकित हो गया है, वह सदैव हृदय में अंकित रहेगा।

क्या पीएम मोदी की राम भक्ति संविधान हित है या अहित?

पीएम मोदी की राम भक्ति पर सवाल उठाने वाले आज यह जान ले कि यह भक्ति संविधान हित है या अहित! भारत के 75वें गणतंत्र दिवस की तैयारियों पर इस सप्ताह अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन का साया मंडरा गया। ऐसा आभास होता है कि दोनों प्रतिस्पर्धा में हैं – एक ओर राम को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में रखने वाला हिंदू गणराज्य और दूसरी ओर संविधान को प्रतीक के रूप में रखने वाला धर्मनिरपेक्ष गणराज्य। लेकिन यह पूरी तरह गलत चरित्र चित्रण है क्योंकि संविधान एक धार्मिक नायक के सार्वजनिक उत्सव के साथ पूरी तरह से संगत है। मैथ्यू जॉन ने अपनी अद्भुत तर्कपूर्ण पुस्तक में लिखा है कि संविधान निर्माताओं ने भारतीयों को सांप्रदायिक पहचान – हिंदू और मुस्लिम – के रूप में देखा, जैसा कि अंग्रेजों ने किया था। इसका मतलब यह नहीं था कि वे विभाजनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रहे थे बल्कि इसके विपरीत उन्होंने पहचाना कि भारतीयों में विविधता है और फिर बहुत सोच-समझकर सबके लिए एक धरातल मुहैया कराने की कोशिश हुई। यही कारण है कि जब विवाह और अन्य व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की बात आई तो केवल हिंदू कानून में सुधार किया गया जबकि बाकी सभी धर्मों में बहुविवाह की प्रथा तब भी व्यापक रूप से प्रचलित थी। समुदायों में सुधार एक झटके में नहीं बल्कि टुकड़ों में किया जाएगा। इस तरह नए गणतंत्र ने धार्मिक प्रथाओं को आधुनिक बनाने का काम अपने ऊपर ले लिया, जो संविधान निर्माताओं के विचारों के अनुरूप था कि नया भारतीय राज्य भारतीयों के लिए स्वतंत्रता का सक्रिय गारंटर होगा। यह एक निष्क्रिय राज्य बने रहकर, धार्मिक प्रथाओं को जारी रखकर ऐसा नहीं करेगा, जिसे ‘कोई लेना-देना नहीं’ वाली धर्मनिरपेक्षता के रूप में वर्णित किया गया है।

इसके बजाय संविधान ने देश को हिंदू मंदिरों में सभी जातियों के लोगों के प्रवेश सुनिश्चित करवाने का कानून पारित करने में सक्षम बनाया और राज्य को सभी धर्मों के गैर-धार्मिक पहलुओं को रेग्युलेट करने के लिए भी अधिकृत किया। जैसे वक्फ बोर्ड कानून और टेंपल बोर्ड कानून जो क्रमशः मुस्लिम और हिंदू धार्मिक समूहों की संपत्ति को रेग्युलेट करते हैं। संविधान का संदेश साफ है- राज्य सक्रिय रूप से सुधारवादी होगा, भले ही विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच समानता हो।

फ्रांस में लैसाइट लागू है। मतलब सार्वजनिक स्थल पर कोई भी व्यक्ति धार्मिक प्रतीक इस्तेमाल नहीं कर सकता है। धर्मनिरपेक्षता की फ्रांसीसी अवधारणा साफ है- चर्च को राज्य सेअलग करना। भारतीय संविधान ने इसका अनुकरण नहीं किया। दिलचस्प बात यह है कि संविधान में लैसाइट का एक मजबूत समर्थक अखिल भारतीय हिंदू महासभा था, जिसका नेतृत्व उसके लंबे समय के नेता विनायक दामोदर सावरकर ने किया था। महासभा से समर्थित ‘हिंदुस्थान फ्री स्टेट के संविधान’ में स्पष्ट प्रावधान था, ‘आज भारत में या उसके किसी भी प्रांत के लिए कोई राज्य धर्म नहीं होगा।’

यदि यह प्रावधान संविधान में शामिल किया गया होता तो यह तर्क दिया जा सकता था कि प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार के प्रमुख के रूप में किसी मूर्ति की प्रतिष्ठा करके संविधान की भावना का उल्लंघन किया। लेकिन सावरकर के संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के चरम समर्थन को नजरअंदाज कर दिया गया। यह भारतीय नागरिक के जीवन में आध्यात्मिकता की केन्द्रीयता की पहचान थी। इस विचार के भी बहुत ज्यादा समर्थक थे। स्वतंत्रता सेनानी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के फॉरवर्ड ब्लॉक के महासचिव हरि विष्णु कामत चाहते थे कि यह केंद्रीयता प्रस्तावना में ही प्रतिबिंबित हो। उन्होंने एक संशोधन प्रस्तावित किया कि संविधान की शुरुआत ‘ईश्वर के नाम पर’ से होनी चाहिए। वह संशोधन मामूली अंतर से पराजित हुआ।

फिर भी इस सप्ताह के अंत में अपने अस्तित्व के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे सुप्रीम कोर्ट को अपने आदर्श वाक्य ‘यतो धर्म ततो जय: धर्म की जीत होती ही है’ को अपनाने में कोई परेशानी नहीं हुई। भारतीय गणतंत्र ने हमेशा सर्वोच्च सत्ता के महत्व को, चाहे कोई उसे किसी भी नाम से पुकारना चाहे, और जीवन को आकार देने वाली एक अंतर्निहित शक्ति के रूप में धर्म को मान्यता दी है। लेकिन इसने कभी भी भारतीय राज्य का मूलभूत आधार नहीं बनाया। संविधान राज्य को अनेक शक्तियां प्रदान करता है कि वह धर्मों में सुधार के लिए क्या कर सकता है। यह राज्य या निर्वाचित प्रतिनिधियों को धार्मिक समारोहों में भाग लेने से और न तो नागरिकों को खुले तौर पर धार्मिक विश्वासों का पालन करने से रोकता है। प्रधानमंत्री का अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का नेतृत्व करना संवैधानिक रूप से उचित है, जैसा कि तबस्सुम शेख का बेंगलुरु में अपने कॉलेज में बिना किसी राज्य के हस्तक्षेप के हिजाब पहनकर जाना। धर्म के खुले आचरण और सार्वजनिक जीवन के बीच कोई संवैधानिक मतभेद नहीं है।

यह ‘सर्व धर्म समभाव’ के अधिक स्वदेशी और समायोजनकारी विचार पर आधारित है। यह इस संवैधानिक समझ का आधार है कि राज्य ने जेसुइट स्कूलों को धन मुहैया कराया है, सार्वजनिक भवनों के उद्घाटन पर नारियल तोड़ने के समारोह नियमित रूप से आयोजित किए गए हैं और राष्ट्रपति भवन में भव्य इफ्तार पार्टियों का आयोजन किया गया है। यही समझ राम में आस्था रखने वाले प्रधानमंत्री को मूर्ति की प्रतिष्ठा करने की अनुमति देती है। बेशक जब बात अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद की आती है तो क्या यह अभिषेक गहरे सांप्रदायिक घावों को भरता है या उनके नीचे एक रेखा खींचता है, यह देखना बाकी है।

आखिर क्या होता है सपिंड विवाह?

आज हम आपको सपिंड विवाह के बारे में जानकारी देने वाले हैं! देश में संविधान बनने के बाद लोगों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए। मौलिक अधिकारों में एक अधिकार शादी भी है। कोई भी लड़का-लड़की अपने पसंद से एक दूसरे से विवाह कर सकते हैं। इसमें जात-धर्म या क्षेत्र बाधा नहीं बन सकते। लेकिन देश में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें शादी नहीं हो सकती। इन्हें ‘सपिंड विवाह’ कहते हैं। मौलिक अधिकार होने के बावजूद भी कपल इन रिश्तों में शादी नहीं कर सकते। गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस हफ्ते एक महिला की याचिका खारिज कर दी। वह हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 5(v) को असंवैधानिक घोषित करने की लंबे समय से कोशिश कर रही थी। यह धारा दो हिंदूओं के बीच शादी को रोकती है अगर वे सपिंड हैं। अगर उनके समुदाय में ऐसा रिवाज होता है तो ये लोग शादी कर सकते हैं। 22 जनवरी को दिए अपने आदेश में, कोर्ट ने कहा कि अगर शादी के लिए साथी चुनने को बिना नियमों के छोड़ दिया जाए, तो गैर-कानूनी रिश्ते को मान्यता मिल सकती है। ये तो हो गई अब तक की अपडेट। संपिड शब्द अपने आप में कुछ लोगों के लिए नया तो कुछ लोगों के लिए आम हो सकता है। संपिड विवाह को लेकर हमारी पूरी बात टिकी है। सपिंड विवाह उन दो लोगों के बीच होता है जो आपस में खून के बहुत करीबी रिश्तेदार होते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट में, ऐसे रिश्तों को सपिंड कहा जाता है। इनको तय करने के लिए एक्ट की धारा 3 में नियम दिए गए हैं। धारा 3(f)(ii) के मुताबिक, ‘अगर दो लोगों में से एक दूसरे का सीधा पूर्वज हो और वो रिश्ता सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आए, या फिर दोनों का कोई एक ऐसा पूर्वज हो जो दोनों के लिए सपिंड रिश्ते की सीमा के अंदर आए, तो दो लोगों के ऐसे विवाह को सपिंड विवाह कहा जाएगा। हिंदू मैरिज एक्ट के हिसाब से, एक लड़का या लड़की अपनी मां की तरफ से तीन पीढ़ियों तक किसी से शादी नहीं कर सकता/सकती। मतलब, अपने भाई-बहन, मां-बाप, दादा-दादी और इन रिश्तेदारों के रिश्तेदार जो मां की तरफ से तीन पीढ़ियों के अंदर आते हैं, उनसे शादी करना पाप और कानून दोनों के खिलाफ है।बाप की तरफ से ये पाबंदी पांच पीढ़ियों तक लागू होती है। यानी आप अपने दादा-परदादा आदि जैसे दूर के पूर्वजों के रिश्तेदारों से भी शादी नहीं कर सकते/सकतीं। यह सब इसलिए है कि बहुत करीबी रिश्तेदारों के बीच शादी से शारीरिक और मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, कुछ खास समुदायों में अपने मामा-मौसी या चाचा-चाची से शादी करने का रिवाज होता है, ऐसे में एक्ट के तहत उस शादी को मान्यता दी जा सकती है।

पिता की तरफ से ये शादी को रोकने वाली पाबंदी परदादा-परनाना की पीढ़ी तक या उससे पांच पीढ़ी पहले तक के पूर्वजों के रिश्तेदारों तक जाती है। मतलब, अगर आप ऐसे किसी रिश्तेदार से शादी करते हैं जिनके साथ आपके पूर्वज पांच पीढ़ी पहले तक एक ही थे, तो ये शादी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत मानी नहीं जाएगी। ऐसी शादी को “सपिंड विवाह” कहते हैं और अगर ये पाई जाती है और इस तरह की शादी का कोई रिवाज नहीं है, तो उसे कानूनी तौर पर अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि ये शादी शुरू से ही गलत थी और इसे कभी नहीं हुआ माना जाएगा।

जी हां! इस नियम में एक ही छूट है और वो भी इसी नियम के तहत ही मिलती है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, अगर लड़के और लड़की दोनों के समुदाय में सपिंड शादी का रिवाज है, तो वो ऐसी शादी कर सकते हैं। हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 3(a) में रिवाज का जिक्र करते हुए बताया गया है कि एक रिवाज को बहुत लंबे समय से, लगातार और बिना किसी बदलाव के मान्यता मिलनी चाहिए। साथ ही, वो रिवाज इतना प्रचलित होना चाहिए कि उस क्षेत्र, कबीले, समूह या परिवार के हिंदू मानने वाले उसका पालन कानून की तरह करते हों। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सिर्फ पुरानी परंपरा ही काफी नहीं है। अगर कोई रिवाज इन शर्तों को पूरा करता है, तो भी उसे तुरंत मान्यता नहीं दी जाएगी। ये रिवाज “स्पष्ट, अजीब नहीं और समाज के हितों के विरुद्ध नहीं” होना चाहिए। इसके अलावा, अगर परिवार के भीतर ही कोई रीति-रिवाज चलता है, तो उसे उस परिवार में बंद नहीं होना चाहिए यानी उसके अस्तित्व पर सवाल न उठे हों। मतलब, वो परंपरा वहां अभी भी सच में मान्य होनी चाहिए।

इस कानून को महिला ने अदालत के सामने चुनौती दी थी। हुआ यह था कि 2007 में, उसके पति ने अदालत के सामने यह साबित कर दिया कि उनकी शादी सपिंड विवाह थी और महिला के समुदाय में ऐसी शादियां नहीं होतीं। इसलिए उनकी शादी को अमान्य घोषित कर दिया गया था। महिला ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन अक्टूबर 2023 में कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी। मतलब, अदालत ने ये माना कि सपिंडा विवाह को रोकने वाला हिंदू मैरिज एक्ट का नियम सही है। महिला ने हार नहीं मानी और दोबारा हाई कोर्ट में उसी कानून को चुनौती दी। इस बार उन्होंने ये कहा कि सपिंड शादियां कई जगह पर होती हैं, चाहे वो समुदाय का रिवाज न भी हो। उन्होंने दलील दी कि हिंदू मैरिज एक्ट में सपिंड शादियों को सिर्फ इसलिए रोकना कि वो रिवाज में नहीं, असंवैधानिक है। ये संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो बराबरी का अधिकार देता है। महिला ने आगे यह भी कहा कि दोनों परिवारों ने उनकी शादी को मंजूरी दी थी, जो साबित करता है कि ये विवाह गलत नहीं है।

कई यूरोपीय देशों में ऐसे रिश्तों के लिए कानून भारत की तुलना में कम सख्त हैं जिन्हें भारत में गैर-कानूनी संबंध या सपिंड विवाह माना जाता है। जैसे कि फ्रांस में, साल 1810 के पीनल कोड के तहत व्यस्कों के बीच आपसी सहमति से होने वाले इन रिश्तों को गैर-अपराध बना दिया गया था। यह कोड नेपोलियन बोनापार्ट के शासन में लागू किया गया था और बेल्जियम में भी लागू था। हालांकि, साल 1867 में बेल्जियम ने अपना खुद का पीनल कोड बना लिया, लेकिन वहां आज भी इस तरह के रिश्ते कानूनी रूप से मान्य हैं। पुर्तगाल में भी इन रिश्तों को अपराध नहीं माना जाता। आयरलैंड गणराज्य में 2015 में समलैंगिक विवाह को मान्यता तो दी गई, लेकिन इसमें ऐसे रिश्ते शामिल नहीं किए गए। इटली में ही ये रिश्ते सिर्फ तभी अपराध माने जाते हैं जब ये समाज में हंगामा मचाए। अमेरिका में बात थोड़ी अलग है। वहां के सभी 50 राज्यों में सपिंडा जैसी शादियां अवैध हैं। हालांकि, न्यू जर्सी और रोड आइलैंड नाम के दो राज्यों में अगर व्यस्क लोग आपसी सहमति से ऐसे रिश्ते में हैं तो इसे अपराध नहीं माना जाता।

क्या है ज्ञानवापी मस्जिद का सच सामने लाने वाली GPR टेक्निक?

आज हम आपको ज्ञानवापी मस्जिद का सच सामने वाली GPR टेक्निक के बारे में जानकारी देने वाले हैं! उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित ज्ञानवापी में हुए ASI के सर्वे के दौरान मंदिर या मस्जिद के सच को सामने लाने में ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार टेक्निक काफी अहम साबित हुई। मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर होने के पुख्‍ता सबूत इसी तकनीक के जरिए सामने आए हैं। सर्वे में मिली मूर्तियां, खंडित धार्मिक चिह्न, सजावटी ईंटे, दैवीय युगल, चौखट के अवशेष सहित अन्‍य 250 सामग्रियां को प्रमाण के रूप में ASI ने जिलाधिकारी की सुपुर्दगी में कोषागार में जमा कराया है। यह सामग्रियां हिंदू पक्ष के लिए अहम प्रमाण हैं। ASI ने 839 पेज की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट में कहा है कि ज्ञानवापी परिसर में मौजूद ढांचा मस्जिद से पहले वहां हिंदू मंदिर था। रिपोर्ट में इस बात का कई बार जिक्र है। आर्किटेक्‍ट, स्‍ट्रक्‍चर, बनावट और वर्तमान ढांचा स्‍पष्‍ट तौर पर हिंदू मंदिर का भग्‍नावशेष है। एक अवशेष ऐसा मिला है, जिस पर तीन अलग-अलग भाषाओं में श्‍लोकों के साथ जनार्दन, रुद्र और उमेश्‍वर के नाम लिखे हैं। एक ऐसा स्‍थान भी मिला है जहां ‘महामुक्ति मंडप’ लिखा है।

सर्वे में 34 अवशेष और भग्‍नावेष और 32 ऐसे साक्ष्‍य मिले हैं , जो पूरी तरह दावा कर रहे हैं कि ज्ञानवापी में मस्जिद से पहले हिंदू मंदिर था और वर्तमान ढांचा यानी मस्जिद 17 वीं शताब्‍दी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जो पहले स्‍ट्रक्‍चर हिंदू मंदिर था, उसे 17वीं शताब्‍दी में तोड़े जाने के बाद उसके पिलर और अन्‍य सामग्री का इस्‍तेमाल मस्जिद बनाने में किया गया। ASI सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञानवापी मस्जिद की पूरी पश्चिमी दीवार हिंदू मंदिर का हिस्‍सा है। यह आड़े हॉरिजेंटल सांचों से सुसज्जित है। दीवार से जुड़ा केंद्रीय कक्ष अभी भी अपरिवर्तित है, जबकि बाहर के दो कक्षों में बदलाव कर दिया गया है। ज्ञानवापी स्थित चबूतरे के पूर्वी भाग में तहखाने को बनाते समय पहले के मंदिर के स्‍तंभों का उपयोग किया गया। एक स्‍तंभ ऐसा मिला है, जिसे घंटियों से सजाया गया है। चारों तरफ दीपक रखने के लिए जगह बनी है।सर्वे रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ज्ञानवापी के एक तहखाने में दो मीटर चौड़ा कुआं है, जिसे ढका गया है। मंदिर के केंद्रीय कक्ष को मोटी और मजबूत दीवारों वाली चिनाई से बंद किया गया है। मंदिर के केंद्रीय कक्ष का मुख्‍य प्रवेश द्वार पश्चिम से था, जिसे दीवार खड़ी कर अवरुद्ध कर दिया गया था।

ASI के अनुसार, ज्ञानवापी में मौजूद संरचना मस्जिद में प्रयुक्‍त स्‍तंभों और भित्ति स्‍तंभों का व्‍यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से अध्‍ययन किया गया। मस्जिद के सहन के निर्माण के लिए पहले से मौजूद मंदिर के स्‍तंभों सहित अन्‍य सामग्री का थोड़े से संशोधनों के साथ उपयोग किया गया। मस्जिद के गलियारे में स्‍तंभों के अध्‍ययन से पता चलता है कि वे मूल रूपसे पहले से मौजूद हिंदू मंदिर का हिस्‍सा थे। मौजूदा संरचना में उनके फिर से उपयोग के लिए कमल पदक के दोनों ओर उकेरी गई आकृतियों को खराब कर दिया गया और कोनों से पत्‍थरों के द्रव्‍यमान को हटाने के बाद उस स्‍थान को पुष्‍प डिजाइन से सजाया गया। ऐसे स्‍तंभ पश्चिमी कक्ष की उत्तरी और दक्षिणी दीवार पर मौजूद है।

सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि ज्ञानवापी के तहखानों में मूर्तिकला के अवशेष मिले हैं।

हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और नक्‍काशीदार वस्‍तुशिल्‍प तहखाने में मिट्टी के नीचे दबे मिले। स्‍वास्तिक चिह्न और नागदेवता के निशान भी मिले हैं। चौकोर अरघा मिला है, जिसे शिवलिंग का बताया जा रहा है। चतुर्भुज मूर्ति, जनेऊधारी तथा भगवान विष्‍णु की मूर्ति भी मिली है। तहखाने में शेर के रूप में नरसिंह भगवान की तस्‍वीर भी मिली। एक कमरे के अंदर मिले अरबी-फारसी शिलालेख में उल्‍लेख है कि मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के शासनकाल में हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके कई साक्ष्‍य वर्तमान ढांचे के अंदर भी मौजूद हैं। अधिवक्‍ता हिंदू पक्ष विष्‍णु जैन ने कहा कि ASI सर्वे रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि ज्ञानवापी पहले मंदिर था। औरंगजेब के समय में हिंदू मंदिर की संरचना को ढहा दिया गया। इसके बाद मंदिरों के अवशेषों और खंभों का उपयोग मस्जिद बनाने में किया गया। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमिटी के अधिवक्ता एखलाक अहमद ने कहा कि जो भी मूर्तियां और अन्‍य साक्ष्‍य मिलने का दावा किया जा रहा है, वह मस्जिद के अंदर नहीं मिली है। मस्जिद परिसर में पांच किराएदार थे जो मूर्तियां बनाते थे और मलबा पीछे की तरफ फेंक देते थे। कोई ऐसी मूर्ति नहीं मिली है, जिसे कहा जाए कि ये भगवान शिव की मूर्ति है। जहां तक सर्वे रिपोर्ट का सवाल है तो पूरी पढ़ने के बाद आपत्ति दाखिल करेंगे।

ज्ञानवापी पर क्या कहती है एएसआई सर्वे की रिपोर्ट जानिए?

आज हम आपको बताएंगे कि ज्ञानवापी पर एएसआई सर्वे की रिपोर्ट क्या कहती है! वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को लेकर एक अहम पड़ाव आया है। एएसआई ने पूरे विवादित परिसर के सर्वे किया, जिसकी रिपोर्ट वाराणसी जिला कोर्ट ने हिंदू-मुस्लिम पक्ष को सौंप दी है। रिपोर्ट का हवाला देते हुए हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि ASI ने कहा है कि मौजूदा ढांचे के निर्माण से पहले वहां एक बड़ा हिंदू मंदिर मौजूद था। रिपोर्ट में मंदिर को 17वीं शताब्दी में तोड़े जाने, मंदिर के खंभों और हिंदू देवी-देवताओं के मलबे मिलने का सबूत मिला है। हालांकि मुस्लिम पक्ष की तीखी प्रतिक्रिया आई है और इसका खंडन किया है। एएसआई सर्वे की रिपोर्ट के बाद भी मुस्लिम पक्ष में इतना विश्वास क्यों है, आइए समझते हैं। ज्ञानवापी मस्जिद समिति ने शुक्रवार को कहा कि मस्जिद का एएसआई सर्वेक्षण सिर्फ एक रिपोर्ट है, कोई फैसला नहीं, जिसके बारे में हिंदू पक्ष के वकीलों का दावा है कि इसे पहले से मौजूद मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने कहा कि वे एएसआई सर्वेक्षण रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं, जिसके बाद वे टिप्पणी करेंगे।

ज्ञानवापी मस्जिद का प्रबंधन करने वाली समिति के सचिव मोहम्मद यासीन ने कहा, ‘यह सिर्फ एक रिपोर्ट है, कोई फैसला नहीं। कई तरह की रिपोर्ट हैं। यह इस मुद्दे पर अंतिम शब्द नहीं है।’ उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय जब पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम, 1991 से संबंधित मामले की सुनवाई करेगा तो वे समिति अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। अधिनियम कहता है कि अयोध्या में राम मंदिर को छोड़कर किसी भी स्थान का ‘धार्मिक चरित्र’ 15 अगस्त, 1947 को मौजूद स्थान से नहीं बदला जा सकता है। मुस्लिम पक्ष के वकील अखलाक अहमद का कहना था कि इस सर्वे रिपोर्ट में सरसरी निगाह से देखा है कि जो भी फोटो हैं, ये पुराने हैं जो एडवोकेट कमीशन के समय में सामने आ चुके थे। कोई भी नया फोटो नहीं है। बस अंतर इतना ही है कि पहले केवल फोटो खींचकर द‍िखाए गए थे, अब इनकी नाप-जोख करके लिख दिया गया है। कोई नया सबूत नहीं मिला है।

खुदाई के बारे में उनका कहना था कि खुदाई के लिए उन्‍हें मना किया गया था। एएसआई के डायरेक्‍टर ने भी हलफनामा दायर करके कहा था कि खुदाई नहीं की जाएगी। लेकिन उन्‍होंने मंदिर के पश्चिमी हिस्‍से में जो मलबा था उसकी सफाई कराई। उसे हमें फायदा यह हुआ कि वहां हमारी जमीन पर दो मजारें थीं वह खुल गईं हैं। उन्‍होंने दक्खिनी तहखाने में कुछ मिट्टी निकाली है जब कुछ नहीं मिला तो उसी तरह मिट्टी छोड़ दी। हिंदू पक्ष के इस दावे पर कि पश्चिमी दीवार मंदिर की दीवार है, इस पर अखलाक अहमद बोले, ऐसा गलत है। पश्चिमी दीवार में ऐसी कोई मूर्ति नहीं लगी है जिससे कहा जा सके कि वह मंदिर की दीवार है। मुस्लिम पक्ष आगे क्‍या करेगा यह पूछने पर उन्‍होंने कहा, पूरी रिपोर्ट पढ़ने पर देखेंगे कि इसमें क्या गलत रिपोर्ट दी गई है। उस पर हम लोग ऑब्‍जेक्‍शन दाखिल करेंगे।

जो मूर्तियों और शिवलिंग पाए जाने के फोटो पर उन्‍होंने कहा, ये कोई बड़ी बात नहीं है। हमारी एक इमारत थी, जिसे हम नॉर्थ गेट या छत्‍ता द्वार कहते थे उसमें हमारे पांच किराएदार थे। वे लोग मूर्तियां बनाते थे, जो मलबा था वह पीछे की तरफ फेंक देते थे। वही मलबे में मिले हैं, यह कोई अहम सबूत नहीं है। सारी मूर्तियां खंड‍ित हैं, टूटी हुई हैं। कोई ऐसी मूर्ति नहीं मिली जिसे कहा जाए कि भगवान शिव की मूर्ति है। या शिवलिंग मिला हो जिसके आधार पर कहा जा सके कि यह मंदिर है।

एएसआई की 839 पेज की रिपोर्ट में एएसआई की सर्वे रिपोर्ट में ये पाया गया है कि मस्जिद से पहले वहां हिंदू मंदिर था, जो तोड़कर मस्जिद बनाई गई। एएसआई ने ये पाया है कि हिन्दू मंदिर का स्ट्रक्चर 17वीं शताब्दी में तोड़ा गया है और मस्जिद बनाने में मलबे का उपयोग किया गया है। दो तहखानों में हिन्दू देवी-देवताओं का मलबा मिला है। एएसआई की रिपोर्ट में ये पाया गया है कि मस्जिद की पश्चिमी दीवार एक हिन्दू मंदिर का भाग है। पत्थर पर फारसी में मंदिर तोड़ने में आदेश और तारीख मिली है। महामुक्ति मंडप लिखा पत्थर भी मिला है। विष्णु शंकर जैन ने कहा कि वजू खाने के सर्वे के लिए मांग करेंगे।

जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए हत्या का हुआ खुलासा!

एक ऐसी घटना जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए हत्या का खुलासा किया गया! आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI आने वाले कुछ वर्षों में ही कामकाज के तरीकों में बड़ा बदलाव करने वाला है। इसका एक और उदाहरण मिला जब दिल्ली पुलिस ने एक मृतक की ऐसी तस्वीर बनवा ली मानो वो जिंदा हो। एक मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने की यह तरकीब पुलिसिंग और जांच को पूरी तरह से बदल सकती है, खासकर गुमशुदा लोगों और फरार संदिग्धों के मामलों में। पुलिस ने एआई कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल कर पीड़ित की पहचान करके यह कारनामा किया है। पुलिस ने एआई के जादू से एक तस्वीर को बदलकर मृतक को ‘जीवित’ कर दिया। उन्होंने उसकी बंद आंखें खोलीं, होंठों का रंग वापस लाया और बैकग्राउंड बदल दिया ताकि उसका चेहरा पहचानने में आसानी हो। पुलिस ने लगभग 2,000 पोस्टर छपवाए और उन्हें बस स्टॉप, पुलिस स्टेशनों और रेलवे स्टेशनों पर चिपका दिया। जब पीड़ित के परिवार के लोग गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने एक पुलिस स्टेशन गए तो उन्होंने वहां लगा पोस्टर देखा। उस व्यक्ति की पहचान 35 वर्षीय हितेंद्र सिंह के रूप में हुई, जो एक ऑडिट फर्म में काम करता था। उनका शव 10 जनवरी को गीता कॉलोनी फ्लाईओवर के पास गोल्डन जुबली पार्क में पाया गया था। पहचान हो जाने के बाद पुलिस ने उनके मोबाइल फोन और इंटरनेट एक्टिविटी का विश्लेषण किया, 800 से अधिक सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले तो हितेंद्र के तीन दोस्तों रॉकी, जेम्स और एनी पर शक की सुई चली गई। आरोप है कि इन तीनों ने पैसे के विवाद में हितेंद्र की हत्या कर दी और बाद में उसका शव फेंक दिया। तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

मामले को सुलझाने के लिए पुलिस के लिए पीड़ित की पहचान बहुत महत्वपूर्ण थी। डीसीपी नॉर्थ मनोज मीना के अनुसार, इसमें कई चुनौतियां थीं। उन्होंने बताया, ‘उदाहरण के लिए, चेहरे के रंग को ठीक करना, खासकर होंठों के रंग को नीले से गुलाबी में लाना। फिर, चेहरे से गंदगी हटाकर उसे तरोताजा करना, मूल बैकग्राउंड को बदलना, आंखों को बढ़ाकर उन्हें एक जीवित व्यक्ति की तरह बनाना। हमने एक एआई एक्सपर्ट से संपर्क किया और चेहरे को फिर से बनाने के लिए कई उपकरणों का इस्तेमाल किया।’

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि आमतौर पर अगर कोई शिकायतकर्ता संदिग्ध को देख लेता है तो उसके बताए अनुसार व्यक्ति की पहचान के लिए एक स्केच तैयार किया जाता है। उन्होंने कहा, ‘कुछ मामलों में हम फरार अपराधियों के कई स्केच बनाते हैं, यह अनुमान लगाते हुए कि वे विभिन्न हेयरस्टाइल या अलग-अलग आंखों के रंग के साथ कैसे दिख सकते हैं। इस मामले में हमारा लक्ष्य भी यही था। हम बस यह देखना चाहते थे कि खुली आंखों और अलग-अलग बैकग्राउंड के साथ पीड़ित कैसा दिख सकता है।’ ऑफिसर ने बताया कि फोटो दो घंटे में तैयार हो गया था।

उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में यह पाया गया कि गुमनाम शवों के पोस्टर में मृतक की साफ तस्वीर नहीं होती है। एक बार हितेंद्र की एआई जनरेटेड फोटो तैयार हो जाने के बाद ‘पहाचनें और पुलिस को बताएं’ के नोटिस छपवाकर प्रमुख स्थानों पर चिपकाए दिए गए। 14 जनवरी को पीड़ित का परिवार गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने छावला पुलिस स्टेशन पहुंचा तो उनकी नजर नोटिस पर पड़ी। उन्होंने नोटिस देखा और तुरंत कोतवाली के एसएचओ से संपर्क किया।

पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘जांच के दौरान, हमें पता चला कि हितेंद्र को आखिरी बार 9 जनवरी को जेम्स, रॉकी और एनी के साथ देखा गया था। जब पुलिस ने जेम्स से संपर्क किया तो उसने कहा कि हितेंद्र रात 10.30 बजे तक उसके साथ था और फिर अकेले चला गया। हालांकि, जल्द ही तीनों संदिग्धों के फोन बंद हो गए जिससे पुलिस को शक हुआ। इस पर दिल्ली-एनसीआर में उनके संभावित ठिकानों पर छापेमारी की गई और आखिरकार उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।’

अधिकारी ने बताया, ‘पकड़े गए लोगों की पहचान परमवीर सिंह उर्फ जेम्स, हरनीत सिंह उर्फ रिकी और प्रियंका उर्फ एनी के रूप में हुई। तीनों ने पूछताछ में कबूल किया कि उन्होंने 9 जनवरी की रात को सिंह की हत्या की थी। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि सिंह और जेम्स के बीच बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने उसे खत्म करने की योजना बनाई। आरोप है कि पीड़ित को पार्टी के बहाने बुलाया गया और फिर चादर से गला घोंटकर मार दिया गया। पुलिस ने बाद में उस कार को भी जब्त कर लिया जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर शव फेंकने के लिए किया गया था।’