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आखिर क्या है हेमंत करकरे की मौत का विवाद?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर हेमंत करकरे की मौत का विवाद क्या है! लोकसभा चुनाव में तीसरे फेज की वोटिंग से पहले महाराष्ट्र कांग्रेस के एक नेता ने 26/11 हमले को लेकर ऐसा दावा किया, जिस पर सियासी पारा चढ़ने लगा है। बीजेपी ने कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। दरअसल, महाराष्ट्र विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष विजय वडेट्टीवार ने कहा कि 26/11 हमले में अपनी जान गंवाने वाले पुलिसकर्मी हेमंत करकरे की मौत ‘अजमल कसाब जैसे आतंकी की गोली से नहीं हुई, बल्कि संघ के करीबी एक पुलिसकर्मी की गोली से हुई’ थी। उज्जवल निकम ने अदालत में इसे लेकर तथ्य छिपाए थे। बता दें कि कांग्रेस नेता का बयान सांप्रदायिक कार्ड खेलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है। बीजेपी ने अपनी शिकायत में कहा कि उनका बयान न केवल न्यायपालिका की ओर से स्थापित तथ्यों का खंडन करता है, बल्कि इसे सांप्रदायिक मुद्दों के साथ जोड़कर राष्ट्रीय सुरक्षा को भी कमजोर करता है। इसका स्पष्ट उद्देश्य सांप्रदायिक तनाव भड़काना है।

कांग्रेस नेता के इसी कमेंट पर बीजेपी ने चुनाव आयोग से शिकायत दर्ज कराई है और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। पूरा मामला तब सामने आया जब विजय वडेट्टीवार ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे की हत्या जिस गोली से हुई थी, वह कसाब या आतंकियों की बंदूक से नहीं चलाई गई थी। यह बात एसएम मुश्रीफ की किताब में लिखी गई है। बता दें कि कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार के बयान को लेकर बीजेपी अब चुनाव आयोग पहुंची है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता का बयान सांप्रदायिक कार्ड खेलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है।कोर्ट से जमानत दिलाने वाला कोई भी सामान्य वकील यह काम कर सकता था।पार्टी ने कहा कि कांग्रेस ने अब तक इस कमेंट से खुद को अलग नहीं किया है। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि उज्जवल निकम ने कोर्ट के सामने यह बात क्यों नहीं रखी। कांग्रेस नेता ने उज्जवल निकम को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वो बीजेपी के लिए काम करते आ रहे हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अजमल कसाब को फांसी दिलाना कोई बड़ी बात नहीं है। कोर्ट से जमानत दिलाने वाला कोई भी सामान्य वकील यह काम कर सकता था।

कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार के बयान को लेकर बीजेपी अब चुनाव आयोग पहुंची है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता का बयान सांप्रदायिक कार्ड खेलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है। बीजेपी ने अपनी शिकायत में कहा कि उनका बयान न केवल न्यायपालिका की ओर से स्थापित तथ्यों का खंडन करता है, बल्कि इसे सांप्रदायिक मुद्दों के साथ जोड़कर राष्ट्रीय सुरक्षा को भी कमजोर करता है। इसका स्पष्ट उद्देश्य सांप्रदायिक तनाव भड़काना है।

बीजेपी ने आरोप लगाया कि इन घटनाओं की संवेदनशीलता और वडेट्टीवार के पद को देखते हुए झूठी कहानियां फैलाने का यह कदम बेहद गंभीर है। पार्टी ने ये भी जोड़ा कि जब विजय वडेट्टीवार राज्य में मंत्री थे तो उस दौरान उन्होंने कभी इस तरह के दावे नहीं किए। बता दें कि महाराष्ट्र विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष विजय वडेट्टीवार ने कहा कि 26/11 हमले में अपनी जान गंवाने वाले पुलिसकर्मी हेमंत करकरे की मौत ‘अजमल कसाब जैसे आतंकी की गोली से नहीं हुई, बल्कि संघ के करीबी एक पुलिसकर्मी की गोली से हुई’ थी। उज्जवल निकम ने अदालत में इसे लेकर तथ्य छिपाए थे। कांग्रेस नेता के इसी कमेंट पर बीजेपी ने चुनाव आयोग से शिकायत दर्ज कराई है और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उज्जवल निकम ने कोर्ट के सामने यह बात क्यों नहीं रखी। कांग्रेस नेता ने उज्जवल निकम को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वो बीजेपी के लिए काम करते आ रहे हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अजमल कसाब को फांसी दिलाना कोई बड़ी बात नहीं है। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार के बयान को लेकर बीजेपी अब चुनाव आयोग पहुंची है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता का बयान सांप्रदायिक कार्ड खेलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है।कोर्ट से जमानत दिलाने वाला कोई भी सामान्य वकील यह काम कर सकता था।पार्टी ने कहा कि कांग्रेस ने अब तक इस कमेंट से खुद को अलग नहीं किया है। इससे ऐसा लगता है कि वह ऐसे बयान का मौन समर्थन कर रही है। आयोग को इस तरह के विवादित कमेंट का समर्थन करने और इसका प्रचार करने के लिए कांग्रेस और उसके नेता दोनों पर एक्शन लेना चाहिए।

इस बार के तीसरे फेस में कौन-कौन थे मुख्य चेहरे?

आज हम आपको बताएंगे कि इस बार के तीसरे फेस में कौन-कौन से मुख्य चेहरे थे! लोकसभा चुनाव 2024 के तीसरे चरण के तहत 12 राज्यों की 94 सीट के लिए चुनाव प्रचार रविवार शाम छह बजे थम गया। इन सीट पर सात मई यानी मंगलवार को मतदान होगा। इस फेज में जिन सीटों पर चुनाव होगा उनमें गुजरात की 25, कर्नाटक की 14, महाराष्ट्र की 11, उत्तर प्रदेश की 10 सीटें शामिल हैं। इनके अलावा मध्य प्रदेश की नौ, छत्तीसगढ़ की सात, बिहार की पांच, असम की चार और गोवा की दो सीट पर भी 7 मई को वोटिंग होगी। उत्तर प्रदेश की संभल, हाथरस, आगरा, फतेहपुर सीकरी, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, आंवला और बरेली संसदीय सीट पर मतदान होगा। यूपी में इस चरण के दौरान 100 उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि 1.88 करोड़ मतदाता मतदान कर सकेंगे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव मैनपुरी लोकसभा सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने के लिये प्रयास कर रही हैं। इस सीट पर उन्होंने अपने ससुर और सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। सपा के मुख्य राष्ट्रीय महासचिव राम गोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव फिरोजाबाद सीट से फिर चुनाव मैदान में हैं। आदित्य यादव सपा का गढ़ मानी जाने बदायूं लोकसभा सीट से अपने चुनावी करियर की शुरुआत कर रहे हैं। तीसरे चरण के चुनाव में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता रहे कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह एटा से ‘हैट्रिक’ बनाने की उम्मीद कर रहे हैं। बरेली में मुख्य मुकाबला बीजेपी के छत्रपाल सिंह गंगवार और सपा के प्रवीण सिंह ऐरन के बीच है। कांग्रेस ने फतेहपुर सीकरी से रामनाथ सिंह सिकरवार को मैदान में उतारा है, जबकि उसके सहयोगी दल समाजवादी पार्टी ने बाकी नौ संसदीय क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

मध्यप्रदेश की नौ सीट के लिए चुनाव के दौरान तीन बड़े दिग्गजों शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह का राजनीतिक भविष्य तय होगा। इस दौरान 1.77 करोड़ से अधिक मतदाता नौ सीट के लिए मैदान में उतरे 127 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। इनमें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीट शामिल हैं। मध्य प्रदेश की इन नौ सीट में मुरैना, भिंड (एससी), ग्वालियर, गुना, सागर, विदिशा, भोपाल, राजगढ़ और बैतूल (एसटी) निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं।

बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगभग 17 वर्षों के बाद विदिशा सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं। वो पहले भी कई बार लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। शिवराज का मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार प्रताप भानु शर्मा से है। राजगढ़ सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री 77-वर्षीय दिग्विजय सिंह का मुकाबला दो बार के बीजेपी सांसद रोडमल नागर से है। बीजेपी को मध्य प्रदेश की सभी 29 सीट पर अपनी जीत की उम्मीद है। गुना सीट पर यादव समुदाय के वोट चुनावी पलड़ा झुका सकते हैं और यहां सिंधिया का मुकाबला कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह यादव से है। वर्ष 2019 में सिंधिया कांग्रेस के उम्मीदवार थे, लेकिन बीजेपी के केपी यादव से सिंधिया परिवार के इस गढ़ में हार गए थे। ग्वालियर के पूर्व शाही परिवार के वंशज सिंधिया ने 2020 में कांग्रेस छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए थे। विदिशा में शिवराज सिंह चौहान सहज दिख रहे हैं, लेकिन राजगढ़ में मुकाबला करीबी हो सकता है। दिग्विजय सिंह 1984 और 1991 में राजगढ़ सीट से जीते थे, लेकिन 1989 में हार गए, वह 1993 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

गुजरात की 26 लोकसभा सीट में से 25 लोकसभा सीट और पांच विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए भी प्रचार थम गया है। कांग्रेस के नीलेश कुंभाणी का नामांकन खारिज होने और अन्य उम्मीदवारों के नामांकन वापस लेने के बाद बीजेपी के मुकेश दलाल सूरत से पहले ही निर्विरोध जीत चुके हैं। गुजरात के प्रमुख उम्मीदवारों में गांधीनगर सीट से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, पोरबंदर सीट से मनसुख मांडविया और राजकोट सीट से परषोत्तम रूपाला शामिल हैं। गुजरात में कांग्रेस ने चार मौजूदा और आठ पूर्व विधायकों को मैदान में उतारा है और वह आम आदमी पार्टी (आप) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है। समझौते के तहत कांग्रेस को 24 सीट (सूरत सहित) मिलीं, जबकि आप को भावनगर और भरूच दी गई हैं। आप ने मौजूदा विधायक चैतर वसावा को भरूच सीट से और उमेश मकवाना को भावनगर सीट से मैदान में उतारा है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, गुजरात में कुल 4.97 करोड़ वोटर हैं, जिनमें 2.56 करोड़ पुरुष, 2.41 करोड़ महिलाएं हैं। ये 50,788 मतदान केंद्रों पर वोटिंग कर सकेंगे।

भारत चीन सीमा विवाद पर क्या बोले विदेश मंत्री?

हाल ही में विदेश मंत्री ने भारत चीन सीमा विवाद पर एक बयान दिया है! विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने ईस्टर्न लद्दाख में चीन के साथ चल रहे गतिरोध को लेकर कहा कि चीन के साथ भारत की जो बातचीत चल रही है वह पेट्रोलिंग को लेकर है। उन्होंने कहा कि आजकल जो बातचीत चल रही है, वह डिसइंगेजमेंट की बातचीत नहीं है, वह पेट्रोलिंग को लेकर बात है। कुछ ऐसी जगह हैं जहां वे हमें पेट्रोलिंग (गश्ती) से रोकते हैं तो हम भी उन्हें पेट्रोलिंग से रोकते हैं। विदेश मंत्री ने कहा कि अभी जो पेट्रोलिंग की बात हो रही है, ऐसी जगह पर हो रही है जहां हमने एक दूसरे को ब्लॉक किया हुआ है। विदेश मंत्री ने कहा कि पेट्रोलिंग का एक पैटर्न होता है। हर फौज देखती है कि दूसरा क्या कर रहा है। अगर वह पेट्रोलिंग पैटर्न के हिसाब से कर रहा है तो ठीक है लेकिन कोई पैटर्न से निकल जाता है तो थोड़ी टेंशन होती है। ये पूछने पर कि जब सरकार कहती है कि हमारी एक इंच जमीन नहीं गई है और कोई आगे नहीं आया है, हमारी जमीन पर नहीं आया तो ईस्टर्न लद्दाख में कई पॉइंट्स पर जो डिसइंगेजमेंट हुआ, वह किसलिए? विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि जब आप कहते हैं कि वो भी आगे आए, तो हम भी आगे आए। उन्होंने कहा कि 2020 से पहले दोनों फौज अपने बेस या अपने कैंप से ऑपरेट करते थे। 2020 में चीन की ओर से वे अपने बेस से बाहर तो आए लेकिन काफी बड़ी संख्या में आए और कई तरह के हथियार भी उनके पास ज्यादा थे। इसके जवाब में सरकार ने भी हमारी फोर्स बढ़ाई।

विदेश मंत्री ने कहा कि मई-जून 2020 में हम दोनों (भारत- चीन सेना) की बहुत क्लोजअप डिप्लॉयमेंट थी क्योंकि हम दोनों अपनी पोजिशन से आगे थे। ये नहीं था कि आमने सामने थे, क्रिस-क्रॉस थे। कोई आगे थे, कोई ऊपर था, कोई नीचे था, कोई साइड में था, बहुत नजदीक में थे। उन्होंने कहा कि होना यह चाहिए था कि हमें फिजिकल कॉन्टेक्ट में आना ही नहीं चाहिए था, हम तय प्रक्रिया के हिसाब से दूरी रखते, पर उसका उल्लंघन हुआ। हम बहुत क्लोज आ चुके थे इसलिए डिसइंगेजमेंट की बात हुई, हम भी अपने बेस पर वापस जाएं, वो भी अपने बेस पर वापस जाएं। ताकि आगे से कोई हिंसक घटना ना हो। इसके लिए दोनों के बीच समझौता हुआ। एस.जयशंकर ने कहा कि जिस तरह समझौता हुआ वह कोई नई बात नहीं थी। भारत- चीन बॉर्डर में देखें तो हमारा सबसे पहले जो विवाद था वह 1958 में उत्तराखंड के बाराहोती में था। उस वक्त बाराहोती में समझौता हुआ कि वे भी अपने बेस मे चलें जाएं और हम भी अपने बेस में चले जाएं और वहां पेट्रोलिंग रोका जाए। उसके बाद कुछ न कुछ होता रहा। राजीव गांधी के समय में सुमदोरॉग चू में भी यही हुआ कि वे आगे आए, हम भी आगे गए। फिर समाधान यह निकला कि वह भी अपने बेस में जाएं हम भी जाएं। जहां तनाव के चांस ज्यादा थे वहां कहा कि पेट्रोलिंग नहीं करेंगे।

ईस्टर्न लद्दाख में जब तनाव शुरू हुआ तो चीनी सैनिक चार जगहों पर आगे आ गए थे जिसके बाद भारतीय सेना ने भी अपनी तैनाती बढ़ाई और बातचीत के बाद पैंगोंग एरिया यानी फिंगर एरिया और गलवान में पीपी- 14, गोगरा में पीपी-17 और हॉट स्प्रिंग एरिया में डिसइंगेजमेंट हुआ। जिन जगहों पर डिसइंगेजमेंट हुआ वहां नो-पेट्रोलिंग जोन बने हैं। यानी जब तक दोनों देश मिलकर कोई हल नहीं निकालते तब तक कोई वहां पेट्रोलिंग नहीं करेगा। गतिरोध खत्म करने के लिए दोनों देशों की सेनाओं के बीच कई दौर की कोर कमांडर स्तर की मीटिंग हो चुकी है और बातचीत आगे भी जारी रखने के लिए दोनों देश राजी हैं।

देपासांग प्लेन्स में चीन ने भारतीय सेना की पेट्रोलिंग ब्लॉक की हुई है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक पहले वाई-जंक्शन जिसे बॉटल नेक एरिया कहते हैं उससे आगे तक भारतीय सैनिक पेट्रोलिंग के लिए जाते थे। देपसांग प्लेन्स सामरिक तौर पर इसलिए अहम है क्योंकि यह भारत के डीबीओ एयरस्ट्रिप के पास है और यहां से काराकोरम दर्रा भी करीब 30 किलोमीटर दूर है। देपसांग पर खतरे का मतबल दरबुक-श्योक-दौलतबेग ओल्डी DS-DBO रोड पर खतरा है। यह रोड लेह को काराकोरम पास से जोड़ती है। डेमचॉक में भी चारदिंग ला एरिया में अलग अलग दावे हैं, चीन ने चारदिंग नाले के इस तरह अपने टेंट बनाए हैं।

क्या चीन और ईरान में भी हो रही है दोस्ती ?

वर्तमान में चीन और ईरान में भी दोस्ती होती जा रही है! ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम राईसी हाल ही में पाकिस्तान पहुंचे थे। इस दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे को सहयोग का भरोसा दिलाया। रईसी की ये यात्रा इसलिए भी अहम है क्योंकि दोनों देशों के बीच कुछ समय पहले तनाव देखने को मिला था। दूसरी ओर अमेरिका ने भी इस पर पाकिस्तान से नाखुशी जाहिर की। रईसी की यात्रा खत्म हो गई है लेकिन इसके नतीजे अभी भी साफ नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि यह पूरी तरह से संभव है कि चीन की ओर से पाकिस्तान और ईरान पर निकटता के लिए दबाव डाला जा रहा है। वह दोनों देशों को बाहर से एक तरह का भरोसा दे रहा है क्योंकि दोनों ही उसके लिए जरूरी हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या ईरान, पाकिस्तान और चीन की तिकड़ी भारत के लिए कोई मुश्किल खड़ी कर सकती है। फर्स्टपोस्ट की एक्सपर्ट के हवाले से की गई रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और पाकिस्तान के बीच गैस पाइपलाइन का प्रश्न राईसी की यात्रा में आया। दोनों देशों के संयुक्त बयान में भी इसका जिक्र किया गया। पाकिस्तान पर अमेरिका इस पाइपलाइन प्रोजेक्ट से हटने का दवाब बना रहा है लेकिन वह इससे पीछे भी नहीं जा सकता है। पाकिस्तान 18 अरब डॉलर का भारी जुर्माना चुकाने की असहज स्थिति में है और उसको गैस की भी सख्त जरूरत है। संयुक्त बयान में इस मुद्दे पर कहा गया कि दोनों पक्षों ने क्षेत्र के लोगों की इच्छा और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार बातचीत और शांतिपूर्ण तरीकों से कश्मीर के मुद्दे को हल करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का कोई संदर्भ नहीं है। ऐसा लगता है कि ईरान को इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं है।पाकिस्तान का कहना है कि उसने अमेरिका से छूट का अनुरोध किया है लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं है। ईरान पर अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध हैं। पाकिस्तान को उम्मीद है कि चीन उसे मदद करेगा लेकिन हालिया समय में जिस तरह से चीनी नागरिकों पर पाक में हमले हुए हैं, उससे चीजें मुश्किल हुई हैं।

ईरानी राष्ट्रपति की यात्रा के बाद जारी संयुक्त बयान का दूसरा फोकस आतंकवाद पर है। ये एक ऐसा विषय है, जिस पर दोनों देश एक-दूसरे पर भी आरोप लगाते रहे हैं। एक-दूसरे की जमीन पर आतंकियों को निशाना बनाने के लिए हमलों के बाद ईरान-पाकिस्तान के रिश्तें हाल ही में काफी खराब हो गए थे। इससे आगे निकलते हुए दोनों पक्ष बाजारों और व्यापारिक क्षेत्रों को विकसित करने की कोशिश भी कर रहे हैं। हालांकि इस पर भी सीमा पर मौजूद कई संगठन मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। ईरान की पाक यात्रा के दौरान कश्मीर का भी मामला आया। प्रेस इवेंट में पाक पीएम शरीफ ने इसे उठाया लेकिन ईरानी राष्ट्रपति राईसी ने इसे टाल दिया। संयुक्त बयान में इस मुद्दे पर कहा गया कि दोनों पक्षों ने क्षेत्र के लोगों की इच्छा और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार बातचीत और शांतिपूर्ण तरीकों से कश्मीर के मुद्दे को हल करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का कोई संदर्भ नहीं है। ऐसा लगता है कि ईरान को इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं है।

ईरान ने भले ही कश्मीर पर पाकिस्तान की जुबान नहीं बोली लेकिन भारत के लिए आगे मुसीबत हो सकती है। ईरान, रूस, चीन, तुर्की और पाकिस्तान के बीच एक तरह का गुट उभरने लगा है। तुर्की का हमेशा पश्चिम के साथ मतभेद में रहा है और बाकी देश प्रतिबंधों से बुरी तरह आहत हुए हैं। सभी देश रूस को सैन्य उपकरणों के आपूर्तिकर्ता कर रहे हैं और ज्यादातर चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से भी जुड़े हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या ईरान, पाकिस्तान और चीन की तिकड़ी भारत के लिए कोई मुश्किल खड़ी कर सकती है। फर्स्टपोस्ट की एक्सपर्ट के हवाले से की गई रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और पाकिस्तान के बीच गैस पाइपलाइन का प्रश्न राईसी की यात्रा में आया। दोनों देशों के संयुक्त बयान में भी इसका जिक्र किया गया। पाकिस्तान पर अमेरिका इस पाइपलाइन प्रोजेक्ट से हटने का दवाब बना रहा है लेकिन वह इससे पीछे भी नहीं जा सकता है।यह पूरी तरह से संभव है कि चीन ही पाकिस्तान और ईरान को इस गुट में धकेल रहा है। चीन को ईरान से सस्ता तेल मिलता है। पाकिस्तान भी चीन के लिए भौगोलिक स्थिति के कारण उपयोगी है। इस गुट में कोई भी करीबी भारत के लिए चिंता की बात होगी।

आखिर क्या है जापानी सेना की 731 यूनिट की क्रूरता की कहानी?

आज हम आपको जापानी सेना की 731 यूनिट की क्रूरता की कहानी सुनाने जा रहे हैं! दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कई अमानवीय घटनाओं की बात सामने आई थी लेकिन जापान की ‘यूनिट 731’ने इस दौरान दुनिया में अब तक देखे गए सबसे कुख्यात युद्ध अपराधों को अंजाम दिया था। जापानी सेना की एस यूनिट ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दो लाख से ज्यादा लोगों को मार डाला था। इस यूनिट ने चीनी, कोरियाई, रूसी और अमेरिकी बंदियों पर अमानवीय परीक्षण और प्रयोग करते हुए ना सिर्फ पुरुषों बल्कि महिलाएं और बच्चों को भी क्रूर यातना देकर मार डाला था। इस यूनिट ने लोगों को सिर्फ सीधे गोली ही नहीं मारी। इंजेक्शन लगाकर तड़पाते हुए लोगों को मारा तो हथियार परीक्षण के नाम पर लोगों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। महिलाओं के साथ बलात्कार कर उनको मार डाला गया। रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिट 731 के भयानक कामों में से एक शीतदंश परीक्षण था, इसमें बंदियों के अंगों को बर्फ से भरे टब में डुबोया जाता था। बंदी के हाथ-पैरों तब तक बर्फ में पकड़े रखा जाता था, जब तक कि वे ठोस रूप से जम न जाएं और त्वचा पर बर्फ की परत ना बन जाए। यूनिट 731 बंदियों के शरीर को बर्फ में जमाने तक ही नहीं रुकती थी। बर्फ से जमे बंदियों के शरीर को फिर से गर्म करने के लिए भी किए अमानवीय प्रयोग किए गए। बर्फ से जमे शरीर के अंग को गर्म पानी में डुबोया या खुली आग के पास रखा जाता था। कई बार रात भर ऐसे ही बाहर छोड़ दिया जाता था, ताकि यह देखा जा सके कि उनके जमे खून को पिघलने में कितना समय लगा। शीतदंश परीक्षण जापान की यूनिट 731 द्वारा उपयोग की जाने वाली कई भयानक यातना तकनीकों में से एक थी।

इस यूनिट ने चीनी आबादी को खत्म करने के लिए घातक कीटाणुओं का इस्तेमाल किया। ये एक तरह से जर्म्स का मानव शरीर पर प्रयोग था। डॉक्टरों ने कीटाणुओं को शरीर में प्रवेश कराने के बाद लक्षणों की निगरानी की।बंधे हुए लोगों पर चाकुओं और संगीनों से भी वार क्या जाता था। माना जाता है कि यूनिट 731 ने दो से तीन लाख के बीच लोगों को मारा था।रूसी और अमेरिकी बंदियों पर अमानवीय परीक्षण और प्रयोग करते हुए ना सिर्फ पुरुषों बल्कि महिलाएं और बच्चों को भी क्रूर यातना देकर मार डाला था।बर्फ से जमे बंदियों के शरीर को फिर से गर्म करने के लिए भी किए अमानवीय प्रयोग किए गए। इससे जब लोग सबसे तेजी से बीमार पड़ते थे तो उन्हें मुर्दाघर की मेज पर लहूलुहान करके मार दिया जाता था। बीमार व्यक्ति जब मरने की हालत में आ जाता था तो चमड़े के जूते पहने एक अधिकारी मेज पर चढ़ जाता था और पीड़ित की छाती पर इतनी ताकत से कूदता था कि उसकी पसली कुचल जाती थी। उनके खून से दूसरे बंदियों को संक्रमित किया जाता था।

रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रयोगों में लोगों को घूमने वाले सेंट्रीफ्यूज के अंदर मारना, उन्हें रोगग्रस्त जानवरों के खून के साथ इंजेक्ट करना शामिल था। यूनिट 731 लोगों पर हथियारों का परीक्षण भी करते थे। लोगों को बांधकर बंदूकों से निशाना लगाया जाता था। बंधे हुए लोगों पर चाकुओं और संगीनों से भी वार क्या जाता था। माना जाता है कि यूनिट 731 ने दो से तीन लाख के बीच लोगों को मारा था।रूसी और अमेरिकी बंदियों पर अमानवीय परीक्षण और प्रयोग करते हुए ना सिर्फ पुरुषों बल्कि महिलाएं और बच्चों को भी क्रूर यातना देकर मार डाला था। इस यूनिट ने लोगों को सिर्फ सीधे गोली ही नहीं मारी। इंजेक्शन लगाकर तड़पाते हुए लोगों को मारा तो हथियार परीक्षण के नाम पर लोगों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। यूनिट 731 बंदियों के शरीर को बर्फ में जमाने तक ही नहीं रुकती थी। बर्फ से जमे बंदियों के शरीर को फिर से गर्म करने के लिए भी किए अमानवीय प्रयोग किए गए।

बर्फ से जमे शरीर के अंग को गर्म पानी में डुबोया या खुली आग के पास रखा जाता था। कई बार रात भर ऐसे ही बाहर छोड़ दिया जाता था, ताकि यह देखा जा सके कि उनके जमे खून को पिघलने में कितना समय लगा।द्वितीय विश्व युद्ध का ‘डरावना बंकर’ पूर्वोत्तर चीन के अंडा शहर के पास खोजा गया था। इसे यूनिट 731 का सबसे बड़ा ‘परीक्षण स्थल’ माना जाता है। पुरातत्वविदों को हेइलोंगजियांग प्रांत में बहुत से कंकाल खोजे थे, जो यूनिट 731 की क्रूरता की गवाही देते हैं।

जब तीसरे चरण से ठीक पहले मोदी पहुंचे अयोध्या!

हाल ही में तीसरे चरण से ठीक पहले मोदी अयोध्या पहुंच गए थे! लोकसभा चुनाव के बीच राम मंदिर की गूंज सुनाई पड़ रही है। बीजेपी और पीएम मोदी की ओर से बार-बार चुनावी सभाओं में राम मंदिर का जिक्र किया जा रहा है। पीएम मोदी की अगुवाई में इस साल 22 जनवरी को अयोध्या में भगवान श्री रामलला की प्राणप्रतिष्ठा की गई। 22 जनवरी के इस कार्यक्रम के बाद पहली बार पीएम मोदी रविवार फिर अयोध्या में थे। लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण से दो दिन पहले मोदी को श्रीरामलला के समक्ष साष्टांग दंडवत करते देखा गया। मोदी ने फैजाबाद संसदीय क्षेत्र (अयोध्या) से बीजेपी उम्मीदवार के समर्थन में रोड शो किया। रोड शो के लिए मोदी का रथ जैसे ही आगे बढ़ा ‘जय श्री राम’, ‘हर हर मोदी-घर घर मोदी’, ‘फिर से मोदी सरकार-अबकी 400 पार’ जैसे नारे गूंज रहे थे। भीड़ काफी थी और एक बार फिर लोगों को 22 जनवरी वाले दिन का एहसास हो रहा था। पीएम मोदी का रोड शो भले ही एक प्रत्याशी के लिए था लेकिन इसके मायने अलग थे। अभी 5 चरणों का चुनाव बाकी है और बीजेपी इस माहौल को भुनाने की कोशिश जरूर करेगी। पीएम मोदी ने रविवार को अयोध्या में भगवान श्री रामलला का दर्शन पूजन करने के बाद सुग्रीव किला से लता मंगेशकर चौक तक रोड शो कर जनता-जनार्दन का आशीर्वाद लिया। मोदी ने सोशल मीडिया ‘एक्‍स’ पर अपने रोड शो का एक वीडियो शेयर करते हुए कहा कि अयोध्यावासियों का हृदय भी प्रभु श्री राम जैसा विशाल है। रोड शो में आशीर्वाद देने आई जनता-जनार्दन का अभिनंदन। मोदी की एक झलक पाने के लिए लोग करीब चार-पांच घंटे पहले से सड़क के दोनों किनारे खड़े थे। उनका रोड शो शुरू होने के बाद मोदी को देखने के लिए लोगों में होड़ लग गई। मोदी लोगों के अभिवादन का जवाब दे रहे थे। जो लोग अयोध्या दर्शन के लिए आए थे वह भी रोड शो के लिए रूक गए थे। अयोध्या के इस रोड शो के चुनावी मायने मतलब भी निकाले जा रहे हैं। चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि यह रोड शो सिर्फ एक सीट के लिए नहीं था।

दो चरणों का मतदान अब तक हो चुका है। इन दो चरणों में यूपी की 16 सीटों पर वोटिंग हो चुकी है लेकिन यूपी की अब भी 64 सीटों पर वोटिंग बाकी है। बीजेपी की ओर से इस बार 80 की 80 सीटों को जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। तीसरे चरण में मंगलवार को दस सीटों पर वोटिंग है। इसमें संभल, हाथरस, आगरा, मैनपुरी, एटा, बरेली जैसी सीटें शामिल हैं। इसके बाद के चरणों में अवध और पूर्वांचल के सीटों पर वोटिंग होनी है। अयोध्या का इलाका अवध और पूर्वांचल दोनों के बीच का है। 13 और 20 मई के चुनाव में अयोध्या के आस-पास की कई सीटें शामिल हैं। लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, बस्ती, संत कबीर नगर, जौनपुर, आजमगढ़, भदोही की सीटें शामिल हैं।

एक ओर विपक्ष के कई नेताओं का कहना है कि राम मंदिर कोई मुद्दा नहीं है। वहीं दूसरी ओर पीएम मोदी अपनी चुनावी सभाओं में राम मंदिर का जिक्र बार-बार कर रहे हैं। बिहार, बंगाल, यूपी की चुनावी सभाओं में मोदी ने राम मंदिर का जिक्र कर विपक्ष पर जमकर हमला बोला। चुनाव के बीच कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 22 जनवरी के आस-पास राम मंदिर के जरिए जो माहौल बना था उसका असर धीरे-धीरे थोड़ा कम हुआ। हालांकि इनका यह भी कहना है कि मोदी के रोड शो के बाद एक बार फिर वैसा ही नजारा देखने को मिला। पीएम मोदी बिना बोले ही अयोध्यावासियों का हृदय भी प्रभु श्री राम जैसा विशाल है। रोड शो में आशीर्वाद देने आई जनता-जनार्दन का अभिनंदन। मोदी की एक झलक पाने के लिए लोग करीब चार-पांच घंटे पहले से सड़क के दोनों किनारे खड़े थे। उनका रोड शो शुरू होने के बाद मोदी को देखने के लिए लोगों में होड़ लग गई।अपने मन की बात यहां से कह गए। राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा से पहले दिसंबर 2023 में भी मोदी ने रोड शो किया था। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद मोदी फिर अयोध्या में रोड शो में शामिल हुए। साधु-संत भी सड़क के किनारे खड़े होकर मोदी के स्वागत में उत्साहित दिखे। मोदी के स्वागत में बच्चे, बड़े और महिलाएं भी मौजूद रहीं। जो नजारा दिखा उसका असर आने वाले चरणों में दिख सकता है!

आखिर कैसे सुलझ पाएगी विनय त्यागी की मर्डर मिस्ट्री?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर विनय त्यागी की मर्डर मिस्ट्री कैसे सुलझा पाएगी! टाटा स्टील के अधिकारी विनय त्यागी के हत्या की गुत्थी सुलझ नहीं सकी है। एक ओर पुलिस जहां 3 घंटे वाले सवाल पर जांच को आगे बढ़ा रही है तो वहीं परिवारवालों का कुछ अलग ही कहना है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि किसी ने हत्या की योजना बनाई होगी। विनय के पिता विशम्भर सिंह त्यागी ने बताया कि उनका बेटा 17 अप्रैल को कोलकाता से स्टील कंपनी के दिल्ली ऑफिस में जॉइन किया। वह अपने कुछ सहकर्मियों और डिस्ट्रीब्यूटर के प्रदर्शन से खुश नहीं था और उनके खिलाफ एक्शन लिया। उन्होंने बताया कि एक रेस्टोरेंट मालिक ने शिकायत की थी कि उत्तराखंड के एक वितरक ने नए स्टील के दरवाजे लगाने के लिए उससे 70 लाख रुपये लिए थे, लेकिन कई दिनों बाद भी काम शुरू नहीं किया। उन्होंने बताया कि मेरे बेटे ने रेस्टोरेंट का दौरा किया और डिस्ट्रीब्यूटर को हटा दिया। पुलिस का कहना है कि त्यागी पर लूटपाट के प्रयास में हमला किया गया होगा, उनका लैपटॉप, पर्स और फोन गायब था। त्यागी को उनके परिवार के सदस्यों ने शालीमार गार्डन में खेतान पब्लिक स्कूल के पीछे सड़क किनारे एक गड्ढे में पाया। परिवारवालों का कहना है कि शुक्रवार को त्यागी ने रात 11.21 बजे अपनी पत्नी रुचि को फोन किया और राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन से उसे पिक करने के लिए कहा। उसने व्हाट्सएप पर अपनी लोकेशन उसके साथ शेयर की, लेकिन थोड़ी देर बाद उसे डिलीट कर दिया और कहा कि वह पैदल घर लौटेगा। जब वह एक घंटे बाद भी घर नहीं आया, तो हमने उसे फोन करना शुरू किया, लेकिन उसका फोन बंद था। हम मेट्रो स्टेशन पहुंचे, लेकिन वह वहां भी नहीं मिला।

मेट्रो स्टेशन त्यागी के घर से डेढ़ किलोमीटर दूर है। परिवार ने त्यागी की तलाश शुरू कर दी। सुबह 3 से 3.30 बजे के बीच वे खेतान स्कूल के पास से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने अपने घर से बमुश्किल 200 मीटर दूर एक नाले से एक हाथ बाहर निकलता देखा। जब हम वहां पहुंचे, तो हमने विनय को नाले में पड़ा पाया। हमने उसे बाहर निकाला और पाया कि उसके सीने में दो चाकू के घाव थे। हम उसे पास के अस्पताल ले गए, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।

विशम्भर सिंह ने कहा कि विनय की हत्या से पहले उसने 1 लाख 40 हजार रुपए दूसरे खाते में ट्रांसफर किए थे। उन्होंने कहा हमारा मानना है कि उसे ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया होगा। वहीं पुलिस ने बताया कि त्यागी के फोन की आखिरी लोकेशन लोनी में कहीं थी। आरोपी ने त्यागी के सिम को करीब तीन मिनट के लिए दूसरे फोन में ट्रांसफर किया था और फिर डिवाइस को बंद कर दिया था। हालांकि पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलने के बाद त्यागी ने करीब तीन घंटे तक क्या किया।

डीसीपी ट्रांस-हिंडन निमिष पाटिल के अनुसार, त्यागी रात 8.17 बजे राजेंद्र नगर स्टेशन से बाहर आकर पास की शराब की दुकान पर गए। वहां जाकर वोदका की एक बोतल खरीदी। इसके अलावा, हमारे पास कोई जानकारी नहीं है। हालांकि परिवार ने कहा कि त्यागी ने रात 11.21 बजे उन्हें फोन किया और अपनी पत्नी से उसे मेट्रो स्टेशन से लेने के लिए कहा। बता दें कि वितरक ने नए स्टील के दरवाजे लगाने के लिए उससे 70 लाख रुपये लिए थे, लेकिन कई दिनों बाद भी काम शुरू नहीं किया। उन्होंने बताया कि मेरे बेटे ने रेस्टोरेंट का दौरा किया और डिस्ट्रीब्यूटर को हटा दिया। पुलिस का कहना है कि त्यागी पर लूटपाट के प्रयास में हमला किया गया होगा, उनका लैपटॉप, पर्स और फोन गायब था। त्यागी को उनके परिवार के सदस्यों ने शालीमार गार्डन में खेतान पब्लिक स्कूल के पीछे सड़क किनारे एक गड्ढे में पाया।फिर डिवाइस को बंद कर दिया था। हालांकि पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलने के बाद त्यागी ने करीब तीन घंटे तक क्या किया। परिवारवालों का कहना है कि शुक्रवार को त्यागी ने रात 11.21 बजे अपनी पत्नी रुचि को फोन किया और राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन से उसे पिक करने के लिए कहा। लेकिन स्टेशन से बाहर निकलने के बाद से उन तीन घंटों का क्या हुआ? हमें इसका पता लगाना है। सीसीटीवी फुटेज खंगालने वाली पुलिस टीम बाइक पर सवार तीन लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रही है जो उस इलाके में घूम रहे थे जहां त्यागी मृत पाए गए थे।

आखिर जंगलों में लगी भीषण आग क्यों नहीं बुझ पाती?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जंगलों में लगी भीषण आग बुझ क्यों नहीं पाती है! उत्तराखंड के जंगल धू-धूकर जल रहे हैं। हालत यह है कि 24 घंटे में अगलगी की 24 घटनाएं सामने आई हैं। उत्तराखंड की आग ने अमेरिकी राज्य कैलिफॉर्निया में हाल में हुई वारदात की याद दिला दी है। कैलिफॉर्निया में भी आग से कई दिनों तक दहशत का माहौल रहा जिसकी चर्चा दुनियाभर में होती रही। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली तो जंगल की आग पर जल्द काबू पाने में हम असफल क्यों रहते हैं? भारत तो फिर विकासशील देश है, लेकिन अमेरिका तो सुपर पावर है, फिर भी कैलिफॉर्निया के जगंलों में इतने लंबे समय तक आग क्यों फैलती रही? क्या विज्ञान के इतने विकास के बावजूद हमारे पास वो तकनीक हाथ नहीं लग सकी है जिससे जंगल की आग को कुछ घंटों में ही काबू कर लिया जाए? उत्तराखंड के विभिन्न जंगलों में आग की कई घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। प्रदेश में नवंबर से अब तक 910 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। प्रदेश में 1,145 हेक्टेअर से अधिक वन क्षेत्र में लगी आग ने अब तक पांच जिंदगियां लील ली हैं जबकि पांच अन्य लोग उसकी चपेट में आकर आंशिक रूप से जल गए हैं। पहली आग लगभग छह महीने पहले भड़की थी और अब तक फैल ही रही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि उत्तराखंड की भयावहता भी कैलिफॉर्निया के जंगल की आग से अलग नहीं है।

दरअसल, उत्तराखंड में लगी आग, दुनिया भर में लगी आग की तरह ही, कई कारकों के कारण महत्वपूर्ण चुनौतियां पेश करती है। जंगल का इलाका ऊबड़-खाबड़ और खड़ी ढलान वाला है जहां घनी वनस्पतियां हैं। इस कारण प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने और वहां इधर से उधर आ-जा पाना आसान नहीं है। उत्तराखंड में कई वन क्षेत्रों की तरह अक्सर सूखे और तेज हवाएं चलती हैं, जो जंगल की आग को भड़काने में काफी मददगार होती हैं। सूखी वनस्पति आग के लिए ईंधन का काम करती है, जबकि तेज़ हवाएं तेजी से लपटों और अंगारों को आगे बढ़ाती हैं, जिससे आग अप्रत्याशित रूप से और बड़े क्षेत्रों में फैल सकती है। अधिकारियों ने कहा कि उत्तराखंड में जंगल की आग की घटनाएं मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण होती हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोग कभी-कभी कृषि या पशुधन चराने के लिए क्षेत्रों को खाली करने के लिए घास के मैदानों में आग लगा देते हैं। इससे अनजाने में बड़ी जंगल की आग भड़क जाती है।

अधिकारियों ने बताया कि इसके अलावा, इस प्री-मानसून सीजन में कम बारिश के कारण मिट्टी की नमी की कमी और जंगल में मौजूद सूखी पत्तियों, चीड़ की सुइयों और अन्य ज्वलनशील पदार्थों की उपस्थिति ने भी ऐसी घटनाओं में योगदान दिया है। उत्तराखंड के चमोली पुलिस ने गैरसैण इलाके में स्थित एक जंगल में आग लगाने के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि इन लोगों ने कथित तौर पर जंगल में लगी आग की घटना का वीडियो रिकॉर्ड किया और सोशल मीडिया पर लाइक, व्यू और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए शेयर कर दिया।

हालांकि आग बुझाने के लिए तकनीक मौजूद है, लेकिन जंगल की विशेष परिस्थितियों के कारण ये बहुत कारगर साबित नहीं हो पातीं। उदाहरण के लिए, पानी की बाल्टियों या टैंकों से लैस हेलीकॉप्टर आग की लपटों और हॉटस्पॉट पर पानी गिराने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग उपलब्धता, मौसम की स्थिति और जल स्रोतों की पहुंच जैसे कारकों से सीमित हो सकता है। इसी तरह, जंगल की आग की प्रगति को धीमा करने के लिए विशेष अग्निरोधी रसायनों का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इसके इस्तेमाल में कई तरह की समस्याएं हैं।

हालांकि, अग्निशमन कर्मियों और संसाधनों के सामूहिक प्रयासों के बावजूद जंगल में तेजी से फैलती आग को बुझाना एक लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है। आग कितनी भीषण है, मौसम की स्थिति कैसी है और आग बुझाने के संसाधन कैसे हैं, बता दे कि सूखी वनस्पति आग के लिए ईंधन का काम करती है, जबकि तेज़ हवाएं तेजी से लपटों और अंगारों को आगे बढ़ाती हैं, जिससे आग अप्रत्याशित रूप से और बड़े क्षेत्रों में फैल सकती है। अधिकारियों ने कहा कि उत्तराखंड में जंगल की आग की घटनाएं मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण होती हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोग कभी-कभी कृषि या पशुधन चराने के लिए क्षेत्रों को खाली करने के लिए घास के मैदानों में आग लगा देते हैं। इन सब कारकों से तय होता है कि आग पर काबू पाना कितना कठिन या आसान होगा। कुल मिलाकर कहें तो जंगल की आग को नियंत्रित करने में अक्सर उपयुक्त संसाधन, रणनीतिक योजना और अनुकूल परिस्थितियों के मिले-जुले कारकों की भूमिका होती है।

महेंद्र सिंह धोनी के करीबी दोस्त के साथ रिलेशनशिप में हैं कृति शैनन?

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हाल ही में कृति-कबीर की कुछ तस्वीरें एक माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर वायरल हुईं। इस जोड़े ने लंदन में जश्न मनाया।
कृति शैनन महेंद्र सिंह धोनी की करीबी दोस्त के साथ रिलेशनशिप में हैं। ऐसी फुसफुसाहटें वेदी के अंदर सुनाई देती हैं। कबीर बहिया, लंदन के एक सफल उद्योगपति। संयोग से हार्दिक पंड्या भी कबीर के अच्छे दोस्त हैं. हाल ही में कृति-कबीर की कुछ तस्वीरें एक माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर वायरल हुईं। इस जोड़े ने लंदन में जश्न मनाया। ज्ञात हो कि कबीर के पिता लंदन के एक प्रमुख उद्योगपति हैं।

हाल ही में एक इंटरव्यू में कृति ने बताया कि वह अपने पार्टनर में क्या खूबियां चाहती हैं। उनके शब्दों में, ”मेरा पार्टनर ऐसा होगा, वैसा होगा. ये क्या हैं?” दो के एक जैसे होने का कोई मतलब नहीं है!” इसके बाद वह कहते हैं कि पार्टनर को यह बताना कि उसे क्या बनना है, उस पर दबाव डालना है। वह सोचता है कि सच्चा साथी वही है जिसके साथ घंटों बातें की जा सकें, जिसके साथ हंसी-मजाक किया जा सके। “उसे मेरे काम का सम्मान करना होगा। मेरे लिए, आदर्श साथी वह है जो बिना किसी दिखावे के अंदर के असली इंसान को देख सके,” अभिनेत्री ने कहा।

फिलहाल कृति शैनन फिल्म ‘क्रू’ की सफलता का आनंद ले रही हैं। फिल्म में कृति के अलावा करीना कपूर खान और तब्बू भी हैं। हाल ही में कृति ने अपने करियर के उतार-चढ़ाव के बारे में बात की। संयोग से, उन्होंने सितारों के बच्चों पर भी टिप्पणी की।

कृति ने कहा कि करियर की शुरुआत में कई बार इंडस्ट्री के स्टार्स को उनसे ज्यादा मौके मिलते थे। अभिनेत्री ने यह भी टिप्पणी की कि यह विषय कभी-कभी उन्हें उदास कर देता है। कृति ने कहा, ”एक समय मुझे पता था कि मेरी क्षमता बहुत अधिक है। मैं एक गहरे किरदार का इंतजार कर रहा था।’ मैं खुद को फिर से साबित करना चाहता था।’ लेकिन ऐसा नहीं होता.” कृति मामले को समझाते हुए कहती हैं, ”दरअसल घड़ी के आकार के मुताबिक आप इसे भर सकते हैं. यदि बर्तन छोटा है, तो आप कम पानी पकड़ेंगे। मुझे बड़े के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा।

कृति ने टाइगर श्रॉफ के साथ हीरोपंती से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। कृति ने कहा कि जब उनके पास मौके कम होते थे तो कई स्टार किड्स को आसानी से काम मिल जाता था। कृति ने कहा, ‘मैं फिल्मी परिवार के साम्राज्य में नए लोगों को देखती थी कि उन्हें बिना कुछ किए कितनी आसानी से काम मिल जाता है। मैं हैरान हो जाती.” एक अन्य इंटरव्यू में फिल्म ‘मिमी’ की एक्ट्रेस ने इंडस्ट्री की एकता पर भी कमेंट किया. कृति ने कहा, ‘अगर हम एक-दूसरे की मदद करें, एकता की राह पर चलें तो हम दूसरे लेवल पर पहुंच सकते हैं।’ अगर तारीफ करनी है तो दिल से की जानी चाहिए. मुझे इंडस्ट्री में एकता नजर नहीं आती. मैं नहीं जानता कि जब कोई फिल्म अच्छा कारोबार करती है तो कितने लोग वास्तव में खुश होते हैं।”

ये चाहत बहुत दिनों से थी. आख़िरकार कंगना रनौत चुनावी राजनीति के मैदान में उतर गईं। पिछले कुछ वर्षों से एक भी हिट नहीं हुई है। आखिर में एक्ट्रेस ने वैकल्पिक पेशे के तौर पर राजनीति को चुना? इस बार वह लोकसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश के मंडी से बीजेपी के उम्मीदवार बने हैं. उस खबर के बाद इस बार कृति शैनन राजनीति में जा रही हैं! वह इस समय बॉलीवुड की सबसे व्यस्त अभिनेत्रियों में से एक हैं। एक के बाद एक नौकरी की पेशकश. हाल ही में उनकी और शाहिद कपूर स्टारर ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ ने बॉक्स ऑफिस पर ओवरऑल अच्छा प्रदर्शन किया है। उनकी फिल्म ‘क्रू’ जल्द ही रिलीज होगी. फिल्म का प्रमोशन शुरू हो चुका है. इस बीच एक्ट्रेस के चुनाव लड़ने की नई अटकलें सामने आ रही हैं. वोट से पहले कृति ने इस बारे में खुलकर बात की।

गोविंदा गुरुवार को महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की शिंदेसेना पार्टी में शामिल हुए। इस पार्टी के सूत्रों के मुताबिक उन्हें लोकसभा चुनाव में मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट से उम्मीदवार बनाया जा सकता है. इसके बाद एक और खबर जंगल में आग की तरह फैल गई. कपूर खानदान की दोनों बेटियां करिश्मा और करीना लड़ेंगी आगामी लोकसभा चुनाव! इस बार कृति को लेकर अटकलें तेज हैं. आख़िरकार नायिका ने चुप्पी तोड़ी. उनके शब्दों में, ”मैंने कभी राजनीति में आने के बारे में नहीं सोचा था. मुझे नहीं लगता कि मैं तब तक काम कर सकता हूं जब तक मुझे अपने दिमाग के अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। जब तक वह कॉल न आये मैं ऐसा नहीं करता. हां, इस बार अगर मेरा दिल इजाजत देगा तो मैं राजनीति में शामिल हो जाऊंगा।”

प्रियंका ने राहुल पर ‘शहजादा’ की जगह ‘शहंशा’ बोलकर मोदी के सिलसिलेवार प्रहारों का जवाब दिया

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उस युद्ध के मुख्य सेनानियों के प्रचार को मापने के लिए, ‘प्रोपेगेशन मीटर’ नामक एक विशेष खंड है। इस बार कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाद्रा. कांग्रेस के वफादार उन्हें देखकर इंदिरा गांधी को याद करते थे. जब वह अपनी दादी की तरह संकीर्ण बॉर्डर वाली एकवर्णी खादी साड़ी पहनकर निकलती थीं तो गैर-कांग्रेसी भी प्रशंसा की दृष्टि से देखते रह जाते थे। लेकिन ये सब ‘ब्रह्मास्त्र’ एपिसोड से पहले की बात है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना ‘ब्रह्मास्त्र’ (राहुल गांधी के मुकाबले) प्रियंका गांधी वाड्रा को सक्रिय राजनीति में उतारा था. उत्तर प्रदेश को संभालने की जिम्मेदारी. उसके बाद कभी भी इंदिरा-पोती को उस तरह साड़ी में नहीं देखा गया। ‘इंदिरा की तरह’ प्रियंका जल्द ही ‘आई लाइक मी’ बन गईं और केजो ने पकड़ लिया। राजस्थानी ब्लॉक प्रिंट सूती कुर्ता-पायजामा और घूंघट। प्रियंका इसी पोशाक में दादा राहुल के लिए प्रचार करते हुए रायबरेली में नजर आई थीं. हालाँकि, प्रियंका ने गर्मियों में समुद्री हरे रंग का कुर्ता-पायजामा चुना। उसने सफेद प्रिंटेड घूँघट भी लिया और उसे एक स्कूली लड़की की तरह आड़ा-तिरछा मोड़ लिया। गर्दन की छाप, कंधे को न छूने वाले बालों को थोड़ा ढीला छोड़ दिया गया था और पीछे बांध दिया गया था। कान में एक छोटा सा पेंडेंट.

तार्किक ढंग से बोलता है. लेकिन नरम अंदाज में कहा. प्रियंका को एक हाथ अपनी कमर पर रखकर और दूसरा हाथ अपने चेहरे के सामने लहराते हुए बात करते हुए देखकर, किसी को भी अचानक पड़ोस की कहानी-प्रेमी किशोरी जैसा महसूस हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो नेता जैसा खुरदरापन नहीं है। परिणामस्वरूप, गरमागरम भाषणों का अभाव हो गया है। चैनल की भाषा में जिसे ‘विस्फोटक’ कहा जाता है, प्रियंका बिल्कुल नहीं हैं। राहुल ने प्रचार मंच से कई बार मोदी पर हमला बोला. उन्होंने लोगों की समस्याओं के बारे में और भी बातें कहीं. पिछले पांच साल से वह उत्तर प्रदेश में क्या चल रहे हैं, यह बात भाषण में कैद हो गई. उन्होंने ज़मीन के करीब रहने वाले लोगों की समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया, जिनका तथाकथित ‘ग्लैमरस’ समाधान संभव नहीं है. प्रियंका के भाषण में कृषि क्षेत्रों में आवारा जानवरों की समस्या के समाधान के रूप में गोबर एकत्र करने के सरकार के वादे का भी जिक्र किया गया।

सभा में समाज के निचले तबके के लोगों की अच्छी खासी भीड़ थी. कांग्रेस के चिन्ह वाली नेहरू टोपी पहनकर उन्होंने इंदिरा और राजीव गांधी के नाम पर नारे लगाए। प्रियंका ने उनके परिवार के साथ रायबरेली के पुराने रिश्ते का इतिहास बताया तो नारेबाजी का स्तर और बढ़ गया. निवर्तमान रायबरेली सांसद सोनिया गांधी ने बीमारी के कारण इस बार अपनी सीट अपने बेटे राहुल के लिए छोड़ दी। भीड़ से राहुल के नाम के नारे भी सुनाई दिए. लेकिन केवल कुछ ही बार.

लोकसभा चुनाव प्रचार की शुरुआत से ही वह लगातार राहुल गांधी को ‘शहजादा’ कहते रहे हैं. गौरतलब है कि हर सार्वजनिक सभा में अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ उस विशेषण का इस्तेमाल करने के बाद, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ‘कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति’ की ओर बढ़ रहे हैं!

कभी प्रधानमंत्री कहते हैं, ”राजाओं, सुल्तानों, निज़ामों, नवाबों ने भारतीयों पर जो अत्याचार किए हैं, उस पर चुप रहो शहजादा.” कभी कहते हैं, ”आज़ादी के बाद से कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की राजनीति की है.” एक बार फिर, “कांग्रेस की योजना देश की संपत्ति छीनकर मुसलमानों के बीच बांटने की है,” उसने चेतावनी दी, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने मुसलमानों को अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) और अन्य से बाहर रखा है। पिछड़ा समुदाय (ओबीसी) कोटा उन्होंने शिकायत की कि वह आरक्षण का हिस्सा देना चाहते हैं। ऐसे में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने शनिवार को मोदी पर हमला बोला. उन्होंने प्रधानमंत्री को संबोधित करने के लिए ‘शहंशा’ शब्द का इस्तेमाल किया.

शनिवार को झारखंड में बीजेपी की बैठक में मोदी ने कहा, ”अब पाकिस्तान चाहता है कि कांग्रेस के शहजादा भारत के प्रधानमंत्री बनें.” इसके कुछ घंटे बाद प्रियंका ने मोदी के राज्य गुजरात पर निशाना साधा. उन्होंने बनासकांटा में कांग्रेस की ‘नया संकल्प सभा’ ​​में कहा, ”इस राज्य में एक शहंशाह है. वह महल में रहता है. उन्हें लोगों का दुख-दर्द नजर नहीं आता. लेकिन मेरे दादा राहुल लोगों की समस्याओं को समझने के लिए 4,000 किलोमीटर तक चले।”