Thursday, March 5, 2026
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जब राम मंदिर के लिए राम भक्तों का नहीं रहा खुशी का ठिकाना!

हाल ही में राम मंदिर के लिए राम भक्तों का खुशी का ठिकाना नहीं रहा! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या के मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अपने संबोधन में कालचक्र की बात की। उन्होंने कहा कि एक बार फिर कालचक्र बदलेगा और साकारात्मक दिशा में बढ़ेगा। समय के लिए यह भी कहा जाता है कि वो सबसे ज्यादा बलवान है, उसके आगे सारी शक्तियां शून्य हैं- मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान। अयोध्या में राम जन्मभूमि पर इस्लामी आक्रांता के अत्याचार की निशानी मिटाने की संघर्ष गाथा भी समय की शक्ति का अनुभव कराते हैं। एक वक्त था जब अयोध्या में कारसेवकों पर उत्तर प्रदेश की पुलिस ने गोलियां चलाईं और एक वक्त आया है जब रामभक्तों पर वायुसेना के हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा की गई। 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद वीएचपी का शुरू हुआ राम मंदिर आंदोलन कई रामभक्तों का सबकुछ छीन लिया तो कई को हिंदू हृदय सम्राट की ख्याति दिला दी। उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा उन्हीं शख्सियतों में शामिल हैं जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को आकाश की ऊंचाई दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। दोनों की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में मुलाकात हुई तो एक-दूसरे से लिपटकर जार-बेजार रोईं। दोनों की नम आंखों वाली तस्वीरों ने खूब चर्चा बटोरीं। लेकिन एक तस्वीर बहुत कम ही नजरों से गुजर सकी जिसमें उमा भारती ने साध्वी ऋतंभरा के गले में इस तरह हाथ डाले हैं, मानो वो उनकी पीठ पर चढ़ी हों। यह तस्वीर बहुत खास क्योंकि इसने दशकों पुरानी उस दृश्य की याद दिला दी है जब मंदिर आंदोलन आग की दरिया से गुजर रहा था।

वो दिन 6 दिसंबर, 1992 का था। वही दिन जब अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बने बाबरी मस्जि के ढांचे को कारसेवकों ने ध्वस्त कर दिया था। उसी दिन की एक तस्वीर मीडिया की सुर्खियां बटोरने लगीं। उस तस्वीर में भी उमा भारती हैं। इसी मुद्रा में जैसा वो साध्वी ऋतंभरा के साथ सोमवार को दिखीं। तब साध्वी की जगह मुरली मनोहर जोशी थे। उमा भारती बीजेपी के इस दिग्गज नेता की पीठ पर सवार दिखती हैं। दावा किया गया कि यह तस्वीर बाबरी विध्वंस के बाद की है। कहा जाता है कि बाबरी का ढांचा गिरने की खबर से उमा इतनी उत्साहित हो गईं कि वो उछाल मारकर मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर लद गईं। हालांकि, उमा भारती ने इसका जोरदार खंडन किया। वो कहती हैं कि यह तस्वीर 6 दिसंबर, 1992 की ही है, लेकिन बाबरी विध्वंस से घंटों पहले की जब अयोध्या में कारसेवक जुट रहे थे और उनसे संवाद चल रहा था।

बहरहाल, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि जब वो केरल के धनुषकोडी में थे तो सोच रहे थे कि भगवान राम जब समुद्र के रास्ते लंका जा रहे थे तो वह एक कालचक्र के परिवर्तन का सूचक था। आज फिर लगता है कि कालचक्र बदलेगा। पहले आक्रांताओं के अत्याचार से सदियों पीड़ित रहे हिंदुओं को आजादी के बाद भी अपने ही देश में दशकों तक दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया। राम मंदिर के निर्माण को जानकार लोग हिंदू पुनर्जागरण का प्रतीक मान रहे हैं। उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा उन्हीं शख्सियतों में शामिल हैं जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को आकाश की ऊंचाई दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। दोनों की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में मुलाकात हुई तो एक-दूसरे से लिपटकर जार-बेजार रोईं। दोनों की नम आंखों वाली तस्वीरों ने खूब चर्चा बटोरीं। लेकिन एक तस्वीर बहुत कम ही नजरों से गुजर सकी जिसमें उमा भारती ने साध्वी ऋतंभरा के गले में इस तरह हाथ डाले हैं, मानो वो उनकी पीठ पर चढ़ी हों।

अगर यह पुनर्जागरण है तो निश्चित रूप से इसका प्रभाव भविष्य पर भी होगा। यह तस्वीर बाबरी विध्वंस के बाद की है। कहा जाता है कि बाबरी का ढांचा गिरने की खबर से उमा इतनी उत्साहित हो गईं कि वो उछाल मारकर मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर लद गईं। हालांकि, उमा भारती ने इसका जोरदार खंडन किया। वो कहती हैं कि यह तस्वीर 6 दिसंबर, 1992 की ही है, लेकिन बाबरी विध्वंस से घंटों पहले की जब अयोध्या में कारसेवक जुट रहे थे और उनसे संवाद चल रहा था।करोड़ों हिंदुओं के लिए कालचक्र भले ही बदलने वाला हो, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा जैसी राम मंदिर आंदोलन की नायिकाओं के लिए तो बदल चुका है। दोनों के आंखों से झर-झर बहते आंसू तो आगंतुक कालचक्र के पांव पखार रहे थे।

क्या मालदीव को ले डूबेंगे मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू?

मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू अब मालदीव को ले डूबने पर तुले हैं! चीन का जासूसी जहाज ‘जियांग यांग होंग 03’ मालदीव जा रहा है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने इस कदम से मानो चीन को भारत के दरवाजे पर ही बुला लिया है। उसी मालदीव ने हाइड्रोग्राफिक सर्वे पानी के नीचे का अध्ययन के लिए भारत के साथ मिलकर किए जाने वाले काम को रोकने को कहा है। मालदीव इसे अपनी स्वायत्तता में दखल मानता है। लेकिन उसे चीन से कोई दिक्कत नहीं! मालदीव का यह रुख तब सामने आया है जब हाल ही में श्रीलंका ने चीनी जासूसी जहाजों को अपने बंदरगाहों में आने से मना कर दिया। ऐसे में भारत के पड़ोस में एक कदम आगे, दो कदम पीछे जैसी स्थिति बन गई है। कुछ दिन पहले ही लक्षद्वीप का मसला सामने आया था, जिससे पता चला कि मालदीव की नई सरकार के नेतृत्व में भारत-मालदीव संबंधों में तनाव आने वाला है। मालदीव के उप-मंत्रियों द्वारा पीएम मोदी का अपमान और भारत के बारे में अपमानजनक बातें करने से भारत में काफी नाराजगी थी। लेकिन मुइज्जू ने सिर्फ भारत पर निर्भरता कम करने की रट लगाते रहे। मुइज्जू सरकार ने भारत से कई मांगें की हैं, लेकिन इन मुद्दों को हल करने के लिए भारत के किसी भी प्रस्ताव का जवाब नहीं दिया है। यूएई में मुइज्जू और मोदी की मुलाकात के बाद भी मालदीव का कोई जवाब नहीं आया। लगभग 77 भारतीय रक्षाकर्मी मालदीव में आपातकालीन मेडिकल और रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए दो भारतीय ध्रुव हेलीकॉप्टर और एक डोर्नियर विमान का संचालन कर रहे हैं। मुइज्जू सरकार ने 17 मार्च को होने वाले संसदीय चुनावों से ठीक पहले 15 मार्च तक मालदीव से इन भारतीय सैनिकों को वापस लेने का एकतरफा अल्टीमेटम दिया है। दूसरी तरफ, मालदीव तुर्की से सैन्य ड्रोन खरीद रहा है। हाल ही में चार क्षेत्रीय देशों के कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन में श्रीलंका, मॉरीशस और भारत ने भाग लिया, लेकिन मालदीव नहीं आया। इसके उलट मुइज्जू चीन की ग्लोबल सिक्यॉरिटी इनिशिएटिव में शामिल हो गए।

मालदीव और चीन के संबंधों को अब विस्तृत रणनीतिक सहकारी साझेदारी में अपग्रेड कर दिया गया है। मालदीव पर पहले से ही चीन का 1.3 अरब डॉलर का कर्ज है, जो मालदीव के कुल कर्ज का एक बड़ा हिस्सा है। अब मुइज्जू ने चीन को अपने देश का ‘निकटतम विकास साझेदार’ बताया है। चीन ने मालदीव को 13 करोड़ डॉलर का अनुदान भी दिया है। मुइज्जू को न सिर्फ यह उम्मीद है कि चीन लोन रीपेमेंट को रीशेड्यूल करेगा, बल्कि रास माले में आवास, स्वास्थ्य और पर्यटन के बुनियादी ढांचे और एक वाणिज्यिक बंदरगाह जैसे उनके चुनावी वादों को पूरा करने में भी मदद करेगा। भारत ने मालदीव को बड़ी परियोजनाओं और बजट सहायता से सहारा दिया है, फिर भी मालदीव पर कोई वित्तीय बोझ नहीं पड़ा। बावजूद इसके मालदीव अब श्रीलंका जैसे कर्ज के जाल में फंसता दिख रहा है। मुइज्जू चीन के साथ मुफ्त व्यापार समझौते (एफटीए) को आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे मालदीव पर कर्ज बढ़ सकता है। चीनी पर्यटकों के मालदीव टुअर से भी यह अंतर नहीं भर पाएगा। हाल ही में माले के मेयर के चुनावों में विपक्षी उम्मीदवार की जीत हुई, जो पहले खुद मुइज्जू का पद था। इसका मतलब है कि संसदीय चुनावों से पहले मुइज्जू ‘भारत हटाओ’ और कट्टरपंथी इस्लामी विचारों को और हवा दे सकते हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब वो अपने गुरु और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन से विरासत में मिली पार्टी को मजबूत करने की चुनौती से निपट रहे हैं। सरकारी वेबसाइट पर 152 उप-मंत्रियों की लिस्ट इसी का संकेत है।

मालदीव में इस्लाम दशकों से उदारवादी, बल्कि प्रगतिशील रहा है, जहां बड़े नेता कट्टरपंथी विचारों से दूर रहे हैं। लेकिन मुइज्जू की सरकार शायद मालदीव को पहले से ज्यादा इस्लामिक बनाने का लक्ष्य लेकर चलने वाली पहली सरकार होगी। उन्होंने पिछले महीने क्रिसमस का त्योहार मनाने पर रोक लगा दी थी, हालांकि रिजॉर्ट्स में मनाने की इजाजत दी थी। मालदीव ने आबादी के औसत के लिहाज से सबसे ज्यादा जिहादियों को इराक और सीरिया में आईएसआईएस के साथ लड़ने के लिए भेजा है। ऐसे इस्लामिक तत्वों को बढ़ावा देने से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में अल-कायदा के खिलाफ।

मालदीव में बहुदलीय लोकतंत्र 2008-09 में ही आया। इस सफर में भारत हमेशा साथ खड़ा रहा, चाहे 2004 का सुनामी हो, 2014 का पीने के पानी का संकट हो या 2020 का कोविड। मालदीव के बड़े भाई के स्तर से भारत को घटाना तो समझ में आता है, लेकिन चीन को वो जगह देने का दांव भारी पड़ सकता है। मालदीव को जल्द ही पता चल सकता है कि चीन के गले लगाकर वो आजादी भी खो देंगे जो थोड़ी-बहुत बची है। उन्हें भारत को ‘रौबदार’ कहने और चीन को हमारे रणनीतिक और सुरक्षा क्षेत्र में लाने जैसा काम करने से बचने की जरूरत है। भारत को भी ‘मालदीव का बहिष्कार करो’ जैसे नारे लगाने से बचना चाहिए। भारत को अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए धैर्य रखना चाहिए, लेकिन दृढ़ता भी जरूरी है। कम्पाल में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई ‘खरी बातचीत’ नई परिस्थिति के अनुकूल दिशा में उठाया गया पहला कदम है।

आखिर विदेश मंत्री ने आतंकवाद के लिए क्या कहा?

हाल ही में विदेश मंत्री ने आतंकवाद के लिए एक बड़ा बयान दे दिया है! भारत अब थप्पड़ खाकर किसी के आगे अपना दूसरा गाल नहीं बढ़ाएगा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कहा कि भारत पिछले 10 वर्षों में बदल चुका है और अब यह ईंट का जवाब पत्थर से देने की नीति पर बढ़ चला है। उन्होंने आतंकवाद पर अपना विचार खुलकर रखते हुए कहा कि भारत को इसका सामना पहले दिन से ही करना पड़ा है। उन्होंने कहा, ‘दुनिया में पिछले 80 सालों में आतंकवाद को जिस तीव्रता और लंबे समय तक हमने सहा है, शायद किसी और देश ने सहा हो। यह मत समझिए कि आतंकवाद कल शुरू हुआ या सिर्फ कश्मीर या पंजाब की बात है। ये तो आजादी के साथ ही शुरू हुआ था, जब तथाकथित ‘कबायली’ पाकिस्तान से आए थे। ये लोग जिन्होंने बाद में ये सब चलाया, उन्होंने अपने संस्मरणों में इसे गौरवपूर्ण उपलब्धि बताई है।’ विदेश मंत्री ने कहा कि चूंकि हमने पहले दिन से आतंक का सामना किया है और इस बारे में हमें पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि जिस चीज को आप समझते नहीं, उसका जवाब नहीं दे सकते। जयशंकर ने कहा कि मुंबई पर खौफनाक आतंकी हमले से पहले तो लोग आंतवकाद को लेकर उलझन में थे। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि आज इस देश में जो बदला है, खासकर मुंबई 26/11 मेरे लिए एक टर्निंग पॉइंट था। 26/11 के नंगे सच, उसके खौफनाक प्रभाव को देखने से पहले बहुत लोग भ्रम में थे।’ उन्होंने कहा कि कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी बढ़ा दो की नीति अब नहीं चलने वाली। विदेश मंत्री बोले, ‘अब हमें सबसे पहले उसका जवाब देना चाहिए क्योंकि कुछ लोग कहते हैं कि थप्पड़ लगने पर हमारी ‘दूसरा गाल बढ़ाने’ की रणनीति बहुत शानदार थी। देश आपस में प्रतिस्पर्धा करेंगे, लेकिन कुछ नियम तो हैं। कोई उन नियमों को नहीं तोड़ सकता। इसलिए कूटनीति, राजनीति, कानून, सुरक्षा सभी इसमें शामिल हैं। उदाहरण के लिए गृह मंत्री जी ‘नो मनी फॉर टेरर’ के लिए बहुत काम कर रहे हैं। आखिरकार, आतंक को पैसों से ही बढ़ावा मिलता है।’मुझे नहीं लगता कि यह देश का मिजाज है। मुझे नहीं लगता कि यह समझदारी है। अगर कोई सीमा पार आतंकवाद कर रहा है तो जवाब देना ही होगा, उससे निपटने के लिए पैसे खर्च करने ही होंगे।’

जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद से लड़ने के लिए तीन मोर्चों पर काम होना चाहिए जो हो भी रहा है। उन्होंने कहा, ‘पहली महत्वपूर्ण बात है कि हम खुद ऐसी क्षमता, मानसिकता और इच्छाशक्ति कैसे विकसित करें। और पिछले एक दशक में आप ये बदलाव देख सकते हैं। दूसरा, आतंकवाद को नाजायज ठहराना होगा। बाकी दुनिया को नहीं सोचना चाहिए कि ये भारत-पाकिस्तान का कोई पुराना झगड़ा है। हमें ये स्पष्ट करना होगा कि आतंकवाद देशों के बीच वैध प्रतिस्पर्धा से बाहर है। आजादी के साथ ही शुरू हुआ था, जब तथाकथित ‘कबायली’ पाकिस्तान से आए थे। ये लोग जिन्होंने बाद में ये सब चलाया, उन्होंने अपने संस्मरणों में इसे गौरवपूर्ण उपलब्धि बताई है।’ विदेश मंत्री ने कहा कि चूंकि हमने पहले दिन से आतंक का सामना किया है और इस बारे में हमें पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि जिस चीज को आप समझते नहीं, उसका जवाब नहीं दे सकते।हां, देश आपस में प्रतिस्पर्धा करेंगे, लेकिन कुछ नियम तो हैं। कोई उन नियमों को नहीं तोड़ सकता। इसलिए कूटनीति, राजनीति, कानून, सुरक्षा सभी इसमें शामिल हैं। उदाहरण के लिए गृह मंत्री जी ‘नो मनी फॉर टेरर’ के लिए बहुत काम कर रहे हैं। आखिरकार, आतंक को पैसों से ही बढ़ावा मिलता है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘तीसरा, 2030 में क्या होगा? इसका दोटूक जवाब है- आतंकवाद को लगातार नाजायज ठहराते रहना। उन देशों का हाल लोगों को दिखाया गया जो आतंक का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें एहसास होगा कि उनका ही नुकसान होता है, जैसे पड़ोसी देश में हो रहा है। थप्पड़ लगने पर हमारी ‘दूसरा गाल बढ़ाने’ की रणनीति बहुत शानदार थी। मुझे नहीं लगता कि यह देश का मिजाज है। मुझे नहीं लगता कि यह समझदारी है। अगर कोई सीमा पार आतंकवाद कर रहा है तो जवाब देना ही होगा, उससे निपटने के लिए पैसे खर्च करने ही होंगे।’उन्होंने इन ताकतों को पाला, वही ताकतें अब उनके पीछे पड़ रही हैं। तो विकास में मिसाल बनने की तरह, विनाश में भी मिसाल बन सकते हैं। दुनिया यह देखेगी कि जो देश आतंक को पोषित करता है, वही खुद उसका शिकार हो जाता है। मुझे उम्मीद है कि 2030 तक ये चीजें मिलकर दुनिया में बदलाव लाएंगी।’

ईरान और पाकिस्तान के झगड़े के बीच क्या विचार रखता है भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि ईरान और पाकिस्तान के झगड़े के बीच भारत क्या विचार रखता है! लाल सागर में विद्रोही ग्रुप हूतियों के हमले और ईरान-पाक के बीच झगड़े से दुनिया में काफी उथल-पुथल मची हुई है। इस बीच भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी ईरान का दौरा किया था। जयशंकर ने ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के साथ बैठक की थी। अब इन्हीं दो मुद्दों को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय के नए प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से सवाल किया गया। रणधीर जायसवाल ने जवाब देते हुए कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विस्तार से एक प्रेस बयान दिया था। ईरान में लाल सागर और अदन की खाड़ी में हिंसा और अस्थिर स्थिति पर चर्चा हुई थी। लाल सागर संकट पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हम इस पूरी स्थिति से बहुत चिंतित हैं। यह हमारे लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि आपने देखा होगा कि विदेश मंत्री ने वहां विस्तृत संयुक्त प्रेस बयान दिया था। लाल सागर और अदन की खाड़ी में हिंसा और अस्थिर स्थिति पर चर्चा हुई थी। हम इस पूरी स्थिति से बहुत चिंतित हैं। इसका प्रभाव सिर्फ हम पर नहीं पड़ता, बल्कि यह भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है। इसलिए हमारे अपने हित भी प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन साथ ही, हमारे पास भारतीय नौसेना है जो इस क्षेत्र में गश्त लगा रही है। पाकिस्तान पर हुई एयर स्ट्राइक के पीछे कई लोग भारत का हाथ मानते हैं क्योंकि 15 जनवरी के अगले ही दिन यानी 16 जनवरी को ईरान ने यह हवाई हमले किए थे। हालांकि ऐसा कुछ भी आधिकारिक नहीं है। एस जयशंकर ने सिर्फ इतना कहा था कि मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि चाय बहुत बढ़िया थी।वे समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं ताकि हमारे आर्थिक हित प्रभावित न हों। हालांकि ईरान-पाक के बीच जारी जंग पर रणधीर जायसवाल ने ज्यादा कुछ नहीं कहा।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर इस हफ्ते दो दिन के ईरान दौरे पर थे। उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से द्विपक्षीय बैठक भी की थी। इसी सोमवार यानी 15 जनवरी को दोनों नेताओं की मुलाकात हुई और अगले ही दिन ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान वाले हिस्से में हवाई हमले कर दिए। ईरान ने पाकिस्तान में छुपकर आतंकी हमलों को अंजाम देने वाले आतंकवादी समूह जैश अल-अदल के ठिकानों पर हमले किए। ऐसा इसलिए भी क्योंकि ईरान को लगता है कि यह आतंकी समूह 3 जनवरी को हुए बॉम्ब ब्लास्ट के लिए जिम्मेदार था। पाकिस्तान पर हुई एयर स्ट्राइक के पीछे कई लोग भारत का हाथ मानते हैं क्योंकि 15 जनवरी के अगले ही दिन यानी 16 जनवरी को ईरान ने यह हवाई हमले किए थे। हालांकि ऐसा कुछ भी आधिकारिक नहीं है। एस जयशंकर ने सिर्फ इतना कहा था कि मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि चाय बहुत बढ़िया थी।

जयशंकर ने लाल सागर में हो रहे हमलों पर भी चिंता जताई थी। ईरान के विदेश मंत्री होसैन अमीराब्दुल्लाहियन के साथ व्यापक बातचीत के बाद एक संयुक्त बयान जारी किया था। उसमें कहा गया कि भारत लाल सागर में उभरती स्थिति पर करीब से नजर रख रहा है। हाल ही में हिंद महासागर के महत्वपूर्ण हिस्से में समुद्री वाणिज्यिक यातायात की सुरक्षा के खतरों में भी इजाफा हुआ है। विद्रोही समूह हूती असल में इजराल-हमास जंग में फिलिस्तीनियों की तरफ से हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि आपने देखा होगा कि विदेश मंत्री ने वहां विस्तृत संयुक्त प्रेस बयान दिया था। लाल सागर और अदन की खाड़ी में हिंसा और अस्थिर स्थिति पर चर्चा हुई थी। हम इस पूरी स्थिति से बहुत चिंतित हैं। इसका प्रभाव सिर्फ हम पर नहीं पड़ता, बल्कि यह भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है। इसलिए हमारे अपने हित भी प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन साथ ही, हमारे पास भारतीय नौसेना है जो इस क्षेत्र में गश्त लगा रही है।उनका कहना है कि वह फिलिस्तीनियों के एकजुटता के साथ खड़े हैं। हूती लगातार इजरायल की ओर गाजा में हमले का विरोध कर रहे हैं। युद्ध थमता न देख यह विद्रोही ग्रुप इजरायल को निशाना बना रहा है। लाल सागर में इजरायल की जहाजों या उससे संबंधित जहाजों को भी लगातार निशाना बना रहा है।

प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन क्या कर रहा था विपक्ष? जानिए!

आज हम आपको बताएंगे की प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन विपक्ष क्या कर रहा था! 500 सालों का इंतजार, कई बलिदान और संघर्ष आज खत्म हो गए। दुल्हन सी सजी अयोध्या नगरी में प्रभु श्री राम आखिरकार पुन: वापस आ गए। वही अयोध्या जो त्रेतायुग में उनकी थी, जिसके वो राजा थे। दोपहर 12:29 से 12:30 बजे के बीच के वो 84 सेकेंड के शुभ मुहुर्त में सभी भारतीयों ने रामलला की उस अलौकिक छटा के दर्शन किए। पीएम मोदी ने कहा कि अब हमारे राम टेंट में नहीं रहेंगे। क्रिकेट जगत, बॉलीवुड और उद्योग जगत के अलावा संतों की भीड़ इस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनी। लेकिन दिखाई नहीं दिया तो बस विपक्ष। जिस मंदिर ट्रस्ट ने समारोह का आयोजन किया , उन्होंने कई विपक्षी नेताओं को भी बुलाया था, लेकिन उन्होंने दूर रहने का फैसला किया। कुछ का कहना है कि बीजेपी धार्मिक आयोजन का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है विपक्ष की ओर से किसी ने इस कार्यक्रम में शिरकत नहीं की। तो विपक्ष था कहां और भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा के समय क्या कर रहा था? आइए आपको बताते हैं। सांसद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा के सिलसिले में असम में हैं। वहां राहुल गांधी आज 15वीं सदी के समाज सुधारक श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान बटाद्रा थान जाने वाले थे।लेकिन आरोप है कि उन्हें मंदिर जाने से रोका गया। रोक लगाए जाने पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी ने पूछा, ‘हम मंदिर दर्शन करना चाहते हैं। मैंने कौन सा अपराध किया है कि मंदिर नहीं जा सकता?’ ऐसे में उपजी सियासत के बाद राहुल गांधी सहित पूरी विपक्षी पार्टी प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही शायद बटाद्रा थान जाएगी। असम के बीजेपी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस नेताओं के बीच इस पर तीखी बहस हो चुकी है। सरमा ने गांधी से अपील की है कि वह बटाद्रा थान न जाएं, क्योंकि इससे ऐसा लगेगा कि राम मंदिर और बटाद्रा सत्र के बीच कोई प्रतियोगिता चल रही है। असम सीएम ने कहा कि टीवी चैनल एक तरफ राम मंदिर का समारोह दिखाएंगे, दूसरी तरफ गांधी को श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान पर जाते हुए दिखाएंगे।

अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह के बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी धार्मिक सद्भावना का संदेश देने के लिए कोलकाता में एक समानांतर रैली आयोजित कर रही हैं। अयोध्या समारोह के लिए निमंत्रण प्राप्त करने वाली सुश्री बनर्जी सबसे पहले प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर में दर्शन किय इसके बाद वे ‘सर्व-धर्म रैली’ का आयोजन किया। भाजपा ने ममता पर अयोध्या समारोह से ध्यान हटाने का प्रयास करने का आरोप लगाया और यहां तक ​​कि रैली रोकने के लिए हाई कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था, लेकिन असफल रहे। तृणमूल ने जवाब दिया है कि उसने अतीत में भी ऐसी रैलियां आयोजित की हैं। दूसरी ओर ममता बनर्जी के बड़े नेता और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने एक विवादित बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि उनका धर्म उन्हें नहीं सिखाता कि उस पूजा स्थल को माने जाएं जो नफरत, हिंसा और बेगुनाहों की लाशों पर बना है।

अयोध्या कार्यक्रम को चिह्नित करने के लिए आज दिल्ली में आम आदमी पार्टी आप की ओर से नियोजित कार्यक्रमों की एक लंबी सूची में शोभा यात्राएं, भंडारे, सुंदर कांड गायन और आरती शामिल है। इन कार्यक्रमों में पार्टी के मंत्री, विधायक और पार्षद भाग लेंगे। आप नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले कहा था कि उन्हें सूचित किया गया था कि उन्हें औपचारिक रूप से कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता। पत्र में, उन्होंने लिखा कि बहुत सारे वीआईपी और वीवीआईपी कार्यक्रम में आएंगे और सुरक्षा कारणों से, केवल एक व्यक्ति को अनुमति दी जाएगी। मैं अपनी पत्नी, बच्चों और अपने माता-पिता के साथ जाना चाहता हूं। इसलिए हम बाद में जाएंगे। दिल्ली में आयोजित रामलीला और भंडारा आयोजन के बीच अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आज प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में आयोजित भंडारों में शामिल हुआ। इससे पहले वह रविवार को तीन दिवसीय भव्य रामलीला का मंचन देखा था। AAP ने कहा कि भगवान राम किसी विशेष राजनीतिक दल से संबंधित नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘वह भारतीय सभ्यता के महानतम आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मानवता को सुशोभित करते हैं। इसलिए सीएम अरविंद केजरीवाल निश्चित रूप से उनका आशीर्वाद लेने जाएंगे, और पार्टी के सभी नेता अपने परिवारों के साथ मिलने के लिए एक साथ कतार में खड़े होंगे।’

सीएम केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के सभी मंत्रियों, विधायकों, पार्षदों और कार्यकर्ताओं से शोभा यात्राओं में भाग लेने, भंडारों में योगदान देने और लोगों की सेवा करने का आग्रह किया था। सीएम अरविंद केजरीवाल,स्वास्थ्य मंत्री सौरभ भारद्वाज, शिक्षा मंत्री आतिशी सहित कई नेताओं ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर तस्वीरें भी साझा की हैं। शिक्षा मंत्री आतिशी ने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के शुभ अवसर पर भगवान श्रीराम की पूजा-स्तुति व हवन किया। इस संसार के कण-कण में श्रीराम है, हर मानव के मन में श्रीराम है।अगर हम मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में अपना ले तो जीवन धन्य हो जाएगा। मंत्री सौरभ भारद्वाज ने लिखा कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के शुभ अवसर पर चिराग दिल्ली के प्राचीन मंदिर में सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया गया।

एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रमुक ने स्पष्ट कर दिया है कि वह एक मस्जिद को ध्वस्त करने के बाद मंदिर के निर्माण से सहमत नहीं हैं। वहीं भाजपा ने आरोप लगाया है कि तमिलनाडु में सत्तारूढ़ दल अयोध्या कार्यक्रम के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर रहा था। द्रमुक ने इस आरोप का खंडन किया है और भाजपा पर सलेम में अपने युवा सम्मेलन से ध्यान हटाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आरोप लगाया है कि तमिलनाडु सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर के कार्यक्रम के सीधा प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार द्वारा प्रबंधित मंदिरों में श्री राम के नाम पर पूजा, भजन या प्रसाद की अनुमति नहीं दी जा रही है। श्रीमती सीतारमण ने एक्स पर पोस्ट किया कि इस हिंदू विरोधी, घृणित कार्रवाई की कड़ी निंदा करती हूं। इससे पहले, द्रमुक मंत्री और स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने अयोध्या कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा था, ‘हमें वहां मंदिर बनने से कोई समस्या नहीं है। हम मस्जिद को ध्वस्त करने के बाद मंदिर के निर्माण से सहमत नहीं हैं।’

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने उन्हें आमंत्रित करने के लिए मंदिर ट्रस्ट को धन्यवाद दिया है, लेकिन कहा है कि वह समारोह के बाद अयोध्या मंदिर जाएंगे, जब वहां भीड़ कम होगी। उनके समकालीन और राष्ट्रीय जनता दल के संरक्षक लालू यादव भी दूर रहेंगे। श्री यादव, जो तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने मंदिर के लिए समर्थन जुटाने के लिए लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व वाली रथ यात्रा को रोक दिया, ने पिछले सप्ताह मीडिया से कहा कि वह इस कार्यक्रम को छोड़ देंगे। उन्होंने कोई कारण नहीं बताया। अन्य विपक्षी नेताओं में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा है कि वह प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद अपने परिवार के साथ मंदिर जाएंगे। उन्होंने निमंत्रण के लिए आयोजकों को धन्यवाद दिया है। सीपीएम ने पहले कहा था कि वह इस कार्यक्रम को छोड़ देगी, यह कहते हुए कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करती है, भाजपा के लिए धर्म को राजनीति के साथ जोड़ना सही नहीं है।

क्या विपक्ष पर भारी पड़ सकता है राम मंदिर ना आने का फैसला?

राम मंदिर ना आने का फैसला विपक्ष को अब भारी पड़ सकता है! एक ही नारा एक ही नाम जय श्री राम जय श्री राम, देश के कोने-कोने से आज यही आवाज आई। अयोध्‍या में प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह का देशभर में उत्‍सव मना। जगह-जगह झांकियां, हवन- यज्ञ, भंडारे और न जाने क्‍या-क्‍या। सबकुछ भुला देशवासियों ने प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह को त्‍योहार की तरह मनाया। यह और बात है कि इस उत्सव से कांग्रेस सहित विपक्ष के ज्‍यादातर दलों ने दूरी बनाई। उन्‍होंने खुद यह विकल्‍प चुना। समारोह में शामिल होने का न्‍योता मिलने के बावजूद वे इसमें नहीं गए। उन्‍होंने इसे भारतीय जनता पार्टी और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का इवेंट बताकर न जाने का फैसला किया। यह सही है कि राम मंदिर आंदोलन में बीजेपी और संघ के संघर्ष को खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन, भगवान राम न बीजेपी के हैं और न संघ के। कांग्रेस और दूसरे दल शायद यह भूल गए कि देश ने बीजेपी के लिए नहीं, बल्कि राम के लिए उत्‍सव मनाया है। कहीं लोकसभा चुनाव से पहले अयोध्‍या से दूरी बनाकर विपक्ष ने बहुत बड़ा जोखिम तो नहीं ले लिया है? समारोह में शामिल हों या नहीं, इसे लेकर विपक्षी दलों के नेताओं में कभी एकराय नहीं बन पाई। यहां तक एक ही पार्टी के नेताओं में इसे लेकर मतभेद थे। कांग्रेस का उदाहरण लेते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व ने प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया। बीजेपी यह साबित करने में जरा भी कसर नहीं छोड़ने वाली कि अध्‍योध्‍या समारोह में नहीं शामिल होने वाले दल सिर्फ राम विरोधी ही नहीं, बल्कि हिंदू विरोधी भी हैं। शायद कांग्रेस और दूसरे दल यहां सेंटिमेंट्स को समझने में पूरी तरह से चूक गए हैं। आज पूरा देश ज‍िस तरह से राममय द‍िख रहा हैइन नेताओं में मल्‍ल‍िकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी शामिल रहे। इसके उलट कर्ण सिंह सहित पार्टी के कई दिग्‍गज नेताओं ने साफ कहा कि समारोह में शामिल होने से गुरेज नहीं होना चाहिए। तृणमूल कांग्रेस चीफ ममता बनर्जी हों या सपा प्रमुख अखिलेश यादव, द्रमुक प्रमुख एमके स्‍टालिन और वाम दल विपक्ष के तमाम नेताओं ने अध्‍योध्‍या समारोह में जाने से खुद अपने लिए लक्ष्मण रेखा खींच ली। लोकसभा चुनाव से पहले यह फैसला लेना किसी बड़े जुए से कम नहीं है। यह जनभावनाओं के उलट लिया गया बड़ा निर्णय है।

अनजाने में ही सही, लेकिन इसने 2024 के लिए बीजेपी के चुनावी एजेंडे को हवा दे दी है। यह बीजेपी के हिंदुत्‍व के नैरेटिव को मजबूती देगा। आगामी चुनावों में बीजेपी राम मंदिर को बड़ा मुद्दा बनाने वाली है। इसके सामने रोजगार और महंगाई जैसे दूसरे मुद्दे बौने साबित हो सकते हैं। बीजेपी यह साबित करने में जरा भी कसर नहीं छोड़ने वाली कि अध्‍योध्‍या समारोह में नहीं शामिल होने वाले दल सिर्फ राम विरोधी ही नहीं, बल्कि हिंदू विरोधी भी हैं। शायद कांग्रेस और दूसरे दल यहां सेंटिमेंट्स को समझने में पूरी तरह से चूक गए हैं। आज पूरा देश ज‍िस तरह से राममय द‍िख रहा है, उससे एक बात का तो जरूर पता लगता है। व‍िपक्ष से अनुमान लगाने में गलती हो गई है।

व‍िपक्षी दलों का समारोह से दूरी बनाने का फैसला आगामी चुनावों में बीजेपी की स्थिति को मजबूत करेगा। पहले ही विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A तमाम तरह की खटपट से जूझ रहा है।समारोह में शामिल होने का न्‍योता मिलने के बावजूद वे इसमें नहीं गए। उन्‍होंने इसे भारतीय जनता पार्टी और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का इवेंट बताकर न जाने का फैसला किया। यह सही है कि राम मंदिर आंदोलन में बीजेपी और संघ के संघर्ष को खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन, भगवान राम न बीजेपी के हैं और न संघ के। कांग्रेस और दूसरे दल शायद यह भूल गए कि देश ने बीजेपी के लिए नहीं, बल्कि राम के लिए उत्‍सव मनाया है। कहीं लोकसभा चुनाव से पहले अयोध्‍या से दूरी बनाकर विपक्ष ने बहुत बड़ा जोखिम तो नहीं ले लिया है? समारोह में शामिल हों या नहीं, इसे लेकर विपक्षी दलों के नेताओं में कभी एकराय नहीं बन पाई। चुनाव में अब जब कुछ ही महीने बचे हैं, घटक दलों में सीट शेयिरिंग का फॉर्मूला तक नहीं तय हो पाया है। बैठकों के अलावा चुनाव के लिए दूसरे दलों की किसी तरह की कोई तैयारी नहीं दिख रही है। आज भी एजेंडे के नाम पर विपक्ष खाली हाथ ही खड़ा है। उसने देश के सामने कोई रोडमैप पेश नहीं किया है कि कोई क्‍यों उन्‍हें सत्ता की चाबी सौंपे।

राम मंदिर के जरिए क्या है पीएम मोदी के संदेश?

हाल ही में पीएम मोदी ने राम मंदिर के जरिए कुछ संदेश दिए हैं! राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही बीजेपी के एक बड़ा चुनावी वादा पूरा हो गया है। लोकसभा चुनाव में अब कुछ ही वक्त बचा है। अब बीजेपी अपने पूरे हुए चुनावी वादे यानी आर्टिकल 370 हटाना, महिला आरक्षण और राम मंदिर निर्माण के साथ चुनावी मैदान में जाएगी। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को विपक्ष पर भी अप्रत्यक्ष तरीके से तंज कसा, वहीं युवाओं को भी संदेश दिया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सरकार की तारीफ की तो संघ के अल्पसंख्यक आउटरीच मिशन की तरफ भी इशारा किया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तपस्वी बताया। साथ ही उन्होंने लोगों को कर्तव्य के बारे में बताते हुए इसका जिक्र भी कर दिया कि सरकार की कई योजनाएं गरीबों को राहत दे रही हैं। यह पहला मौका नहीं है जब संघ की तरफ से केंद्र के कामकाज की तारीफ की गई है। संघ प्रमुख का विजयादशमी का भाषण संघ कार्यकर्ताओं के लिए गाइडलाइन की तरह होता है। तब भी भागवत ने केंद्र के काम का जिक्र किया था और सरकार के काम से खुशी जाहिर की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग कहते थे कि राम मंदिर बना तो आग लग जाएगी लेकिन वे भारत के सामाजिक भाव की पवित्रता को नहीं जान पाए। रामलला के इस मंदिर का निर्माण भारतीय समाज के शांत, धैर्य, आपसी सद्भाव का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि राम आग नहीं ऊर्जा हैं, विवाद नहीं समाधान हैं। बीजेपी के नेता अपने भाषण में इसका जिक्र तो करते रहते हैं कि जो अब तक नहीं हो पाया वह इस सरकार में हो गया है। वे राम मंदिर का श्रेय भी पीएम मोदी को देते हैं। प्रधानमंत्री ने सीधे तो कुछ नहीं कहा लेकिन इशारों में कह दिया कि जो अब तक नहीं हुआ, अब हुआ। मोदी ने कहा, ‘मैं प्रभु श्रीराम से क्षमा याचना भी करता हूं कि हमारे पुरुषार्थ, त्याग, तपस्या में कुछ कमी रह गई होगी कि इतनी सदियों तक यह कार्य नहीं कर पाए। आज वह कमी पूरी हुई।’ पीएम ने ये भी कहा कि कई देशों ने इतिहास की उलझी गांठों को खोलने की कोशिश की तो मुश्किल परिस्थियां बनीं। हमारे देश ने इतिहास की गांठ को गंभीरता और भावुकता के साथ खोला।

प्रधानमंत्री इस मौके पर कहा कि यही समय है, सही समय है। एक हजार साल के भारत की नींव रखनी है। पीएम ने चंद्रयान से लेकर स्वदेशी फाइटर जेट तेजस और पहले स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर विक्रांत तक का जिक्र किया। बीजेपी का मानना है कि युवा उनके लिए एक बड़ा सपोर्ट बेस है। युवाओं के लिए देश का विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी को युवाओं का भारी समर्थन मिला था।

प्राण प्रतिष्ठा के बाद जब संघ प्रमुख मोहन भागवत यह बता रहे थे कि राम राज्य में लोग कैसा व्यवहार करते थे और अब सभी को कैसा व्यवहार करना चाहिए तो उन्होंने ये भी कहा कि सारे कलह को विदाई देनी होगी। जो छोटे-छोटे विवाद रहते हैं उस पर लड़ाई छोड़नी होगी, समन्वय से चलना होगा। संघ पिछले काफी वक्त से इस मिशन पर लगा हुआ है। उन्होंने लोगों को कर्तव्य के बारे में बताते हुए इसका जिक्र भी कर दिया कि सरकार की कई योजनाएं गरीबों को राहत दे रही हैं। यह पहला मौका नहीं है जब संघ की तरफ से केंद्र के कामकाज की तारीफ की गई है। संघ प्रमुख का विजयादशमी का भाषण संघ कार्यकर्ताओं के लिए गाइडलाइन की तरह होता है। तब भी भागवत ने केंद्र के काम का जिक्र किया था और सरकार के काम से खुशी जाहिर की थी।संघ के वरिष्ठ प्रचारकों के एक टीम लगातार मुस्लिम समुदाय के प्रमुख लोगों से मिल रही है और सहमति के बिंदुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। संघ के वरिष्ठ प्रचारक ने कहा कि विवाद के बिंदुओं को भूलकर हमें वह देखना चाहिए जो हममें समान है। युवा उनके लिए एक बड़ा सपोर्ट बेस है। युवाओं के लिए देश का विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी को युवाओं का भारी समर्थन मिला था।संघ प्रमुख पहले भी कह चुके हैं कि हम सबके पूर्वज समान हैं। आपस में कुछ विवाद हो सकते हैं लेकिन अपनेपन को रखना पड़ेगा।

क्या राम मंदिर के जरिए विकसित होगी भाजपा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राम मंदिर के जरिए भाजपा विकसित होगी या नहीं! अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन देश के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। आम चुनाव से ठीक पहले हुए इस आयोजन के बाद इस पर अगले कुछ दिन जमकर राजनीति भी होनी ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी राम मंदिर को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए लगातार तीसरी बार रेकॉर्ड जीत की उम्मीद में इस सियासी पिच पर उतर चुकी है तो विपक्ष के लिए यह मुद्दा हमेशा की तरह उलझन भरा साबित हो रहा है। क्या राम मंदिर के माध्यम से ही बीजेपी विपक्ष को अगले आम चुनाव में पूरी तरह अलग-थलग कर देगी या विपक्ष अगले कुछ दिनों में अपने हिसाब से कोई नया अजेंडा तय कर सकता है? अभी यही सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को बीजेपी किसी एक मंदिर या सिर्फ भगवान राम से जोड़कर नहीं पेश कर रही है। इसे अपनी विरासत की वापसी के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले पीएम मोदी ने दक्षिण के उन तमाम मंदिरों का भी दौरा किया, जहां से किसी न किसी रूप में राम का नाम जुड़ा रहा है। अगर गौर करें तो पीएम मोदी ने हमेशा से विकास और विरासत को जोड़कर पेश किया है। उन्होंने कई मौकों पर इसे रेखांकित करने की भी कोशिश की। बीजेपी का मानना है कि पिछले कुछ सालों में विरासत को पुनर्जीवित करने के अलग-अलग स्तरों पर किए गए सिलसिलेवार प्रयासों की बदौलत देश में नई भावना का उदय हुआ, जिसका लाभ उसे मिलेगा। दूसरे टर्म में पीएम मोदी अपने तमाम भाषणों में गुलामी और उपनिवेशवाद की सोच से मुक्ति दिलाने और हिंदू परंपरा से मिली विरासत को फिर से स्थापित करने की बात करते रहे हैं। उज्जैन महाकाल, केदारनाथ, वाराणसी सहित तमाम धार्मिक स्थलों को नए सिरे से विकसित करने के अलावा हिंदू परंपरा को उचित स्थान दिलाने का दावा भी किया जाता रहा। नए संसद भवन की स्थापना भी इसी पहल का हिस्सा है। इस क्रम में कई अलग तरह की पहल भी की गई। अनुच्छेद 370 को हटाने जैसे फैसले को भी इसी संदर्भ से जोड़कर पेश किया गया। पीएम मोदी ने कई मौकों पर कहा कि पहले खुद भारतवासी भी भारतीय मूल्यों पर बात करने से हिचकते थे। उनमें कहीं न कहीं एक तरह की हीन भावना थी। इसे 2014 के बाद बीजेपी के सुविचारित अभियान के माध्यम से काफी हद तक दूर कर देने का दावा किया जा रहा है।

बीजेपी नेतृत्व ने इस बात को समझा कि पुरानी विरासत स्थापित करने की मुहिम के जरिए पार्टी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के अजेंडे को एक साथ लागू कर सकती है और उस पर हिंदुत्व की राजनीति करने का सीधा आरोप भी नहीं लगेगा। यही कारण है कि इस बार बीजेपी ने आम चुनाव से पहले अपना मुख्य अजेंडा इसी के इर्द-गिर्द रखा है। एक सीनियर नेता ने कहा कि इसी समय जब पूरे देश में 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की संकल्प यात्रा चल रही है, राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा लोगों को अपने इतिहास पर गर्व करने का मौका दे रही है। बीजेपी अपने इस नैरेटिव को अजेय फैक्टर मान रही है और दावा कर रही है कि इस बार उसे 2014 और 2019 से भी बड़ी जीत मिलेगी।

इस मजबूत नैरेटिव को आम चुनाव में काउंटर करने का विपक्षी गठबंधन का कोई ठोस प्लान अभी तक नजर नहीं आया। अधिकतर विपक्षी दलों ने सोमवार को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा वाले कार्यक्रम के आमंत्रण को अस्वीकार किया और समारोह को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाकर 22 जनवरी के बाद राम मंदिर आकर दर्शन करने की बात कही।

असल में विपक्षी दलों को पता है कि विरासत और धर्म का मुद्दा बीजेपी की ओर से तैयार की गई अपनी पिच है, जहां अगर वे खेलने की कोशिश करेंगे तो बीजेपी हर हाल में उन पर भारी पड़ेगी। ऐसे में सोमवार के समारोह के बाद विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने हिसाब से नैरेटिव स्थापित करने की होगी। इसके लिए पहले से ही अलग-अलग तैयारी के संकेत मिलने लगे हैं। राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस न्याय यात्रा शुरू कर चुकी है। पार्टी को उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में यह न सिर्फ जोर पकड़ेगी बल्कि नया नैरेटिव बनाएगी। उधर, बिहार में जेडीयू और आरजेडी की तरफ से कमंडल की राजनीति के सामने मंडल की राजनीति को सामने कर समानांतर नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है। 24 जनवरी को नीतीश कुमार कर्पूरी जयंती के मौके पर एक बड़ी रैली करेंगे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने तो सोमवार को ही रैली कर दी। तमाम राज्यों में विपक्षी नेता इसी तरह समानांतर नैरेटिव की तलाश में हैं। वैसे, देश में बनी हिंदू भावना को देखते हुए विपक्षी नेता सॉफ्ट हिंदुत्व का भी प्रयोग कर रहे हैं। मसलन- अरविंद केजरीवान ने दिल्ली में 22 जनवरी के इर्द-गिर्द कई कार्यक्रमों का आयोजन किया। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने भी सोमवार को छुट्टी की घोषणा की। विपक्षी नेताओं की मंशा है कि हिंदू विरोधी छवि न दिखाते हुए वे अपना नया नैरेटिव सामने लाएं। लेकिन उन्हें पता है कि ऐसा करना उनके लिए आसान नहीं होगा। सोमवार के आयोजन का असर कब तक और कितना प्रभावी रहेगा, अभी इन्हें इसका भी आकलन करना है। कुल मिलाकर विपक्ष के लिए आम चुनाव से पहले बेहद कठिन चुनौती है जिसे पार करना उनके लिए आसान नहीं होगा।

क्या अब विपक्ष पूरी तरह से बिखर चुका है?

अब विपक्ष पूरी तरह से बिखर चुका है! जब पूरे देश और दुनिया के कई हिस्सों से आए रामभक्त अयोध्या में इकट्ठा हो गए तब विपक्ष पूरी तरह बिखर गया। विपक्ष के नेता एक-दूसरे से अलग विभन्न कार्यक्रमों में मशगूल रहे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी असम के नगांव जिले में वशिष्ठ संत श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान बोर्डोवा सत्र बटाद्रवा थान के बाहर धरने पर बैठ गए, जब उनका काफिला तीर्थ स्थान के रास्ते में पुलिस की बैरिकेड से टकरा गया। राहुल ने रास्ता रोक रहे पुलिसकर्मियों से पूछा, ‘मुझे यहां आमंत्रित किया गया है और अब प्रशासन कह रहा है कि मैं नहीं जा सकता। हाथ जोड़कर पूछता हूं, मेरा क्या अपराध है? मैं क्यों नहीं जा सकता?’ असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को राहुल को सलाह दी थी कि अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले तक बोर्डोवा सत्र में न जाएं। सत्र प्रबंधन ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने अयोध्या समारोह से जुड़े पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी शाम 3 बजे तक परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते।

उधर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में अपनी ‘संप्रीति रैली’ का समापन भाजपा से एक सवाल करके किया। गोदावरी नदी के किनारे रामकुंड और कलाराम मंदिर में एक घंटे से अधिक समय बिताया और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मनाने के लिए ‘महाआरती’ की। उनकी पत्नी रश्मि, बेटे आदित्य और तेजस के साथ-साथ पार्टी के कई नेता उनके साथ थे। उधर, एनसीपी चीफ शरद पवार समारोह में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने कहा कि जब भीड़ कम हो जाएगी तो वो मंदिर जाएंगे।ममता ने बीजेपी से पूछा, ‘क्या आप महिला विरोधी हैं?’ ममता बनर्जी ने सबसे एकजुट रहने का आह्वान किया। ममता ने कालीघाट मंदिर में पूजा के बाद अपनी यात्रा शुरू की। बता दें कि रविवार को राहुल को सलाह दी थी कि अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले तक बोर्डोवा सत्र में न जाएं। सत्र प्रबंधन ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने अयोध्या समारोह से जुड़े पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी शाम 3 बजे तक परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का न्योता ठुकराने वाले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव कार्यक्रम में शामिल तो नहीं हुए लेकिन एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें उम्मीद है कि देश ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा परिकल्पित राम राज्य की ओर जाने वाले मार्ग का अनुसरण करेगा।’ फिर एक गुरुद्वारा, एक चर्च और एक मस्जिद पर रुकने के बाद लगभग एक लाख की भीड़ को संबोधित करने से पहले उन्होंने उन विपक्षी दलों को निशाना बनाया जो बीजेपी के सामने खड़े नहीं होते। वहीं, शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने गोदावरी नदी के किनारे रामकुंड और कलाराम मंदिर में एक घंटे से अधिक समय बिताया और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मनाने के लिए ‘महाआरती’ की। उनकी पत्नी रश्मि, बेटे आदित्य और तेजस के साथ-साथ पार्टी के कई नेता उनके साथ थे। उधर, एनसीपी चीफ शरद पवार समारोह में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने कहा कि जब भीड़ कम हो जाएगी तो वो मंदिर जाएंगे।

यूपी कांग्रेस नेताओं ने अभिषेक के समारोह पर रणनीतिक चुप्पी साध रखी जबकि आचार्य प्रमोद कृष्णम और पूर्व सांसद निर्मल खत्री समेत पार्टी के कई अन्य नेता समारोह में शामिल हुए। सूत्रों ने बताया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय दिनभर वाराणसी के पास अपने गृहनगर में रहे। कृष्णम ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘यह दिन सनातन धर्म की जीत और भारत में रामराज्य की स्थापना का प्रारंभ है। मुझे इसका हिस्सा बनकर खुशी हो रही है।’ बता दे कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को राहुल को सलाह दी थी कि अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले तक बोर्डोवा सत्र में न जाएं। सत्र प्रबंधन ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने अयोध्या समारोह से जुड़े पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी शाम 3 बजे तक परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का न्योता ठुकराने वाले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव कार्यक्रम में शामिल तो नहीं हुए लेकिन एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें उम्मीद है कि देश ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा परिकल्पित राम राज्य की ओर जाने वाले मार्ग का अनुसरण करेगा।’ वहीं, आरजेडी के संरक्षक लालू प्रसाद भी न्योता मिलने के बाद भी प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूर रहे।

जब 5 अगस्त 2020 को हुआ था शिलापूजन!

एक ऐसा समय जो 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का शिलापूजन हुआ था! राम सरकार फिर से अपने भव्य महल में विराजमान होने जा रहे हैं। वह राम जो चराचर जगत के हर कण- कण में विद्यमान हैं। वह राम जो सनातन धर्म में आस्था रखने वाले हरेक व्यक्ति के जीवन से मृत्यु तक में साथ होते हैं। जब भी परिवार में पुत्र का आगमन होता है, लोग राम- सा बेटे की अभिलाषा रखते हैं। लक्ष्मण से भाई की कामना करते हैं। महिलाओं में सीता से धैर्य और संघर्ष की कामना की जाती है। उस प्रभु श्रीराम का अपने धाम में एक स्थायी निवास तक नहीं था। मुगल आक्रांता ने सोलहवीं शताब्दी में जिस मंदिर को ध्वस्त करवाया। वहां मस्जिद का निर्माण करा दिया। वहां 21वीं सदी के लगभग उसी कालखंड में मेरे प्रभु श्रीराम का भव्य महल बनकर तैयार है। भगवान श्रीराम जब इस महल में विराजमान होंगे। उनकी प्राण प्रतिष्ठा होगी। मेरे हिसाब से यह उनके 500 वर्षों के वनवास से वापसी का एक मौका होगा। यह मौका आज की पीढ़ी देख रही है। यह उनका सौभाग्य है। वरना, मैं तो अपनी इसी धरती पर अपने आराध्य के लिए संघर्ष करते, मरते, खपते कई पीढ़ियों को देखा है। आज उन तमाम लोगों को याद करने का मौका है, जो मंदिर के लिए आंदोलन के संघर्ष की आवाज बुलंद करते रहे। 1528 में मंदिर बचाने के लिए संघर्ष करने वाले और क्रूर मुगलों के तलवार का शिकार बनने वाले साधु- संत और सनातन धर्मावलंबियों की शहादत को याद करती हूं। मंदिर के लिए 1853 में पहले संघर्ष से लेकर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में संघर्ष करने वाले तमाम लोगों को याद करती हूं। जो खप गए, आज बैकुंठ धाम से जब इस मंदिर को देख रहे होंगे, निश्चित तौर पर उनकी आत्मा तृप्त हुई होगी। मैं अयोध्या मंदिर के पुनर्निर्माण की कहानी आज सुनाने जा रही हूं। सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को आज के ऐतिहासिक दिन देखने का मौका हमें दिया है। लेकिन, क्या यह सब इतना आसान था। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। हिंदुओं ने हाई कोर्ट के आदेश को बेमन से स्वीकार तो कर लिया था। लेकिन, सुन्नी वक्फ बोर्ड को हाई कोर्ट का फैसला रास नहीं आया। हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू करने का निर्णय लिया। अब यहां पर दिक्कत फंसी दस्तावेतों की। सुप्रीम कोर्ट में सारे दस्तावेज अंग्रेजी में अनुवाद होकर जमा होने थे। इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करती। यूपी की पहले मायावती और वर्ष 2012 में बनी अखिलेश यादव सरकार ने इसमें रुचि नहीं दिखाई। केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार इस विवाद में उलझने के मूड में नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट में बस तारीखें आगे बढ़ रही थी। इसी बीच देश की राजनीति में वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी की एंट्री हुई। लोकसभा चुनाव 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। भगवान राम के प्रदेश यूपी की 80 में से 73 सीटों पर एनडीए को जीत मिली। भाजपा 71 सीटों पर जीती थी। इसके बाद राम मंदिर का मुद्दा गरमाना शुरू हुआ। लेकिन, प्रदेश में तब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। दस्तावेजों के ट्रांसलेशन का मुद्दा हल नहीं हो रहा था। वर्ष 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनी। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान हुए। राम मंदिर मुददे ने कोर्ट में इसके बाद जोर पकड़ा। कोर्ट ने जिन कागजातों की मांग की, उसे उपलब्ध कराया गया। जनवरी 2019 में 30 हजार पन्नों के ट्रांसलेशन का मामला उठा।

दरअसल, कोर्ट में कुल 13,886 पेज के दस्तावेज पेश किए गए। इसके अलावा 257 रिलेटेड डॉक्यूमेंट और वीडियो टेप पेश किए गए। साथ ही, हाईकोर्ट के फैसले के 4304 प्रिंटेड और 8533 टाइप किए पन्ने भी सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए जाने थे। सुप्रीम कोर्ट ने तब 29 जनवरी 2019 तक ट्रांसलेशन की प्रक्रिया को पूरा कराने का आदेश दिया था। अयोध्या राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े मूल दस्तावेज अरबी, फारसी, संस्कृत, उर्दू और गुरमुखी में लिखे हुए हैं। योगी सरकार ने इसका ट्रांसलेशन कराकर कोर्ट के सामने मुद्दे को पेश कर दिया। तमाम दस्तावेजों के अध्ययन और 40 दिनों की नियमित सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय सामने आया। कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ का पूरा भूखंड रामलला विराजमान को सौंपा। केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण के आदेश दिए गए।

अयोध्या में भगवान श्रीरामलला के मंदिर के निर्माण के साथ तीर्थ क्षेत्र की सूरत बदलने का भी प्रयास किया गया है। आज अयोध्या की सड़कों पर चलते हुए आपको त्रेता युग काल सा अहसास होगा। आधुनिक सुविधाओं से इस शहर को लैस किया गया, लेकिन पौराणिकता के साथ कोई समझौता नहीं किया गया। 2017 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के साथ ही योगी आदित्यनाथ अयोध्या की योजना पर जुटे। सीएम योगी ने अब तक 80 माह की सरकार में 47 अहम फैसले लिए। अयोध्या के विकास की योजना पर 31 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। बजट की कमी रामनगरी को नहीं होने दी गई। इसका परिणाम है कि अयोध्या में आज वर्ल्ड क्लास इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनकर तैयार है। अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन की आभा देखते ही बनती है। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि को जोड़ने वाले चार रास्तों को शानदार बनाया गया।

सीएम योगी ने अयोध्या को फंड देने के साथ- साथ समय भी दिया। अब तक वे 64 बार अयोध्या की यात्रा कर चुके हैं। सीएम योगी रविवार की शाम भी अयोध्या पहुंचे हैं। वे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेने आए हैं। लगातार योजनाओं के स्थल निरीक्षण के कारण इसकी गति कभी कम नहीं हो पाई। सीएम योगी ने सरकार बनने के बाद दिवाली पर दीपोत्सव कार्यक्रम का आयोजन शुरू किया। आज अयोध्या दीपोत्सव ग्लोबल ब्रांड बन चुका है।