Thursday, March 5, 2026
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क्या राम मंदिर के जरिए विकसित होगी भाजपा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राम मंदिर के जरिए भाजपा विकसित होगी या नहीं! अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन देश के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। आम चुनाव से ठीक पहले हुए इस आयोजन के बाद इस पर अगले कुछ दिन जमकर राजनीति भी होनी ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी राम मंदिर को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए लगातार तीसरी बार रेकॉर्ड जीत की उम्मीद में इस सियासी पिच पर उतर चुकी है तो विपक्ष के लिए यह मुद्दा हमेशा की तरह उलझन भरा साबित हो रहा है। क्या राम मंदिर के माध्यम से ही बीजेपी विपक्ष को अगले आम चुनाव में पूरी तरह अलग-थलग कर देगी या विपक्ष अगले कुछ दिनों में अपने हिसाब से कोई नया अजेंडा तय कर सकता है? अभी यही सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को बीजेपी किसी एक मंदिर या सिर्फ भगवान राम से जोड़कर नहीं पेश कर रही है। इसे अपनी विरासत की वापसी के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले पीएम मोदी ने दक्षिण के उन तमाम मंदिरों का भी दौरा किया, जहां से किसी न किसी रूप में राम का नाम जुड़ा रहा है। अगर गौर करें तो पीएम मोदी ने हमेशा से विकास और विरासत को जोड़कर पेश किया है। उन्होंने कई मौकों पर इसे रेखांकित करने की भी कोशिश की। बीजेपी का मानना है कि पिछले कुछ सालों में विरासत को पुनर्जीवित करने के अलग-अलग स्तरों पर किए गए सिलसिलेवार प्रयासों की बदौलत देश में नई भावना का उदय हुआ, जिसका लाभ उसे मिलेगा। दूसरे टर्म में पीएम मोदी अपने तमाम भाषणों में गुलामी और उपनिवेशवाद की सोच से मुक्ति दिलाने और हिंदू परंपरा से मिली विरासत को फिर से स्थापित करने की बात करते रहे हैं। उज्जैन महाकाल, केदारनाथ, वाराणसी सहित तमाम धार्मिक स्थलों को नए सिरे से विकसित करने के अलावा हिंदू परंपरा को उचित स्थान दिलाने का दावा भी किया जाता रहा। नए संसद भवन की स्थापना भी इसी पहल का हिस्सा है। इस क्रम में कई अलग तरह की पहल भी की गई। अनुच्छेद 370 को हटाने जैसे फैसले को भी इसी संदर्भ से जोड़कर पेश किया गया। पीएम मोदी ने कई मौकों पर कहा कि पहले खुद भारतवासी भी भारतीय मूल्यों पर बात करने से हिचकते थे। उनमें कहीं न कहीं एक तरह की हीन भावना थी। इसे 2014 के बाद बीजेपी के सुविचारित अभियान के माध्यम से काफी हद तक दूर कर देने का दावा किया जा रहा है।

बीजेपी नेतृत्व ने इस बात को समझा कि पुरानी विरासत स्थापित करने की मुहिम के जरिए पार्टी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के अजेंडे को एक साथ लागू कर सकती है और उस पर हिंदुत्व की राजनीति करने का सीधा आरोप भी नहीं लगेगा। यही कारण है कि इस बार बीजेपी ने आम चुनाव से पहले अपना मुख्य अजेंडा इसी के इर्द-गिर्द रखा है। एक सीनियर नेता ने कहा कि इसी समय जब पूरे देश में 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की संकल्प यात्रा चल रही है, राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा लोगों को अपने इतिहास पर गर्व करने का मौका दे रही है। बीजेपी अपने इस नैरेटिव को अजेय फैक्टर मान रही है और दावा कर रही है कि इस बार उसे 2014 और 2019 से भी बड़ी जीत मिलेगी।

इस मजबूत नैरेटिव को आम चुनाव में काउंटर करने का विपक्षी गठबंधन का कोई ठोस प्लान अभी तक नजर नहीं आया। अधिकतर विपक्षी दलों ने सोमवार को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा वाले कार्यक्रम के आमंत्रण को अस्वीकार किया और समारोह को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाकर 22 जनवरी के बाद राम मंदिर आकर दर्शन करने की बात कही।

असल में विपक्षी दलों को पता है कि विरासत और धर्म का मुद्दा बीजेपी की ओर से तैयार की गई अपनी पिच है, जहां अगर वे खेलने की कोशिश करेंगे तो बीजेपी हर हाल में उन पर भारी पड़ेगी। ऐसे में सोमवार के समारोह के बाद विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने हिसाब से नैरेटिव स्थापित करने की होगी। इसके लिए पहले से ही अलग-अलग तैयारी के संकेत मिलने लगे हैं। राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस न्याय यात्रा शुरू कर चुकी है। पार्टी को उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में यह न सिर्फ जोर पकड़ेगी बल्कि नया नैरेटिव बनाएगी। उधर, बिहार में जेडीयू और आरजेडी की तरफ से कमंडल की राजनीति के सामने मंडल की राजनीति को सामने कर समानांतर नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है। 24 जनवरी को नीतीश कुमार कर्पूरी जयंती के मौके पर एक बड़ी रैली करेंगे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने तो सोमवार को ही रैली कर दी। तमाम राज्यों में विपक्षी नेता इसी तरह समानांतर नैरेटिव की तलाश में हैं। वैसे, देश में बनी हिंदू भावना को देखते हुए विपक्षी नेता सॉफ्ट हिंदुत्व का भी प्रयोग कर रहे हैं। मसलन- अरविंद केजरीवान ने दिल्ली में 22 जनवरी के इर्द-गिर्द कई कार्यक्रमों का आयोजन किया। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने भी सोमवार को छुट्टी की घोषणा की। विपक्षी नेताओं की मंशा है कि हिंदू विरोधी छवि न दिखाते हुए वे अपना नया नैरेटिव सामने लाएं। लेकिन उन्हें पता है कि ऐसा करना उनके लिए आसान नहीं होगा। सोमवार के आयोजन का असर कब तक और कितना प्रभावी रहेगा, अभी इन्हें इसका भी आकलन करना है। कुल मिलाकर विपक्ष के लिए आम चुनाव से पहले बेहद कठिन चुनौती है जिसे पार करना उनके लिए आसान नहीं होगा।

क्या अब विपक्ष पूरी तरह से बिखर चुका है?

अब विपक्ष पूरी तरह से बिखर चुका है! जब पूरे देश और दुनिया के कई हिस्सों से आए रामभक्त अयोध्या में इकट्ठा हो गए तब विपक्ष पूरी तरह बिखर गया। विपक्ष के नेता एक-दूसरे से अलग विभन्न कार्यक्रमों में मशगूल रहे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी असम के नगांव जिले में वशिष्ठ संत श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान बोर्डोवा सत्र बटाद्रवा थान के बाहर धरने पर बैठ गए, जब उनका काफिला तीर्थ स्थान के रास्ते में पुलिस की बैरिकेड से टकरा गया। राहुल ने रास्ता रोक रहे पुलिसकर्मियों से पूछा, ‘मुझे यहां आमंत्रित किया गया है और अब प्रशासन कह रहा है कि मैं नहीं जा सकता। हाथ जोड़कर पूछता हूं, मेरा क्या अपराध है? मैं क्यों नहीं जा सकता?’ असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को राहुल को सलाह दी थी कि अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले तक बोर्डोवा सत्र में न जाएं। सत्र प्रबंधन ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने अयोध्या समारोह से जुड़े पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी शाम 3 बजे तक परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते।

उधर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में अपनी ‘संप्रीति रैली’ का समापन भाजपा से एक सवाल करके किया। गोदावरी नदी के किनारे रामकुंड और कलाराम मंदिर में एक घंटे से अधिक समय बिताया और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मनाने के लिए ‘महाआरती’ की। उनकी पत्नी रश्मि, बेटे आदित्य और तेजस के साथ-साथ पार्टी के कई नेता उनके साथ थे। उधर, एनसीपी चीफ शरद पवार समारोह में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने कहा कि जब भीड़ कम हो जाएगी तो वो मंदिर जाएंगे।ममता ने बीजेपी से पूछा, ‘क्या आप महिला विरोधी हैं?’ ममता बनर्जी ने सबसे एकजुट रहने का आह्वान किया। ममता ने कालीघाट मंदिर में पूजा के बाद अपनी यात्रा शुरू की। बता दें कि रविवार को राहुल को सलाह दी थी कि अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले तक बोर्डोवा सत्र में न जाएं। सत्र प्रबंधन ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने अयोध्या समारोह से जुड़े पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी शाम 3 बजे तक परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का न्योता ठुकराने वाले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव कार्यक्रम में शामिल तो नहीं हुए लेकिन एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें उम्मीद है कि देश ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा परिकल्पित राम राज्य की ओर जाने वाले मार्ग का अनुसरण करेगा।’ फिर एक गुरुद्वारा, एक चर्च और एक मस्जिद पर रुकने के बाद लगभग एक लाख की भीड़ को संबोधित करने से पहले उन्होंने उन विपक्षी दलों को निशाना बनाया जो बीजेपी के सामने खड़े नहीं होते। वहीं, शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने गोदावरी नदी के किनारे रामकुंड और कलाराम मंदिर में एक घंटे से अधिक समय बिताया और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मनाने के लिए ‘महाआरती’ की। उनकी पत्नी रश्मि, बेटे आदित्य और तेजस के साथ-साथ पार्टी के कई नेता उनके साथ थे। उधर, एनसीपी चीफ शरद पवार समारोह में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने कहा कि जब भीड़ कम हो जाएगी तो वो मंदिर जाएंगे।

यूपी कांग्रेस नेताओं ने अभिषेक के समारोह पर रणनीतिक चुप्पी साध रखी जबकि आचार्य प्रमोद कृष्णम और पूर्व सांसद निर्मल खत्री समेत पार्टी के कई अन्य नेता समारोह में शामिल हुए। सूत्रों ने बताया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय दिनभर वाराणसी के पास अपने गृहनगर में रहे। कृष्णम ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘यह दिन सनातन धर्म की जीत और भारत में रामराज्य की स्थापना का प्रारंभ है। मुझे इसका हिस्सा बनकर खुशी हो रही है।’ बता दे कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को राहुल को सलाह दी थी कि अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पहले तक बोर्डोवा सत्र में न जाएं। सत्र प्रबंधन ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने अयोध्या समारोह से जुड़े पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी शाम 3 बजे तक परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का न्योता ठुकराने वाले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव कार्यक्रम में शामिल तो नहीं हुए लेकिन एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें उम्मीद है कि देश ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम द्वारा परिकल्पित राम राज्य की ओर जाने वाले मार्ग का अनुसरण करेगा।’ वहीं, आरजेडी के संरक्षक लालू प्रसाद भी न्योता मिलने के बाद भी प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूर रहे।

जब 5 अगस्त 2020 को हुआ था शिलापूजन!

एक ऐसा समय जो 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का शिलापूजन हुआ था! राम सरकार फिर से अपने भव्य महल में विराजमान होने जा रहे हैं। वह राम जो चराचर जगत के हर कण- कण में विद्यमान हैं। वह राम जो सनातन धर्म में आस्था रखने वाले हरेक व्यक्ति के जीवन से मृत्यु तक में साथ होते हैं। जब भी परिवार में पुत्र का आगमन होता है, लोग राम- सा बेटे की अभिलाषा रखते हैं। लक्ष्मण से भाई की कामना करते हैं। महिलाओं में सीता से धैर्य और संघर्ष की कामना की जाती है। उस प्रभु श्रीराम का अपने धाम में एक स्थायी निवास तक नहीं था। मुगल आक्रांता ने सोलहवीं शताब्दी में जिस मंदिर को ध्वस्त करवाया। वहां मस्जिद का निर्माण करा दिया। वहां 21वीं सदी के लगभग उसी कालखंड में मेरे प्रभु श्रीराम का भव्य महल बनकर तैयार है। भगवान श्रीराम जब इस महल में विराजमान होंगे। उनकी प्राण प्रतिष्ठा होगी। मेरे हिसाब से यह उनके 500 वर्षों के वनवास से वापसी का एक मौका होगा। यह मौका आज की पीढ़ी देख रही है। यह उनका सौभाग्य है। वरना, मैं तो अपनी इसी धरती पर अपने आराध्य के लिए संघर्ष करते, मरते, खपते कई पीढ़ियों को देखा है। आज उन तमाम लोगों को याद करने का मौका है, जो मंदिर के लिए आंदोलन के संघर्ष की आवाज बुलंद करते रहे। 1528 में मंदिर बचाने के लिए संघर्ष करने वाले और क्रूर मुगलों के तलवार का शिकार बनने वाले साधु- संत और सनातन धर्मावलंबियों की शहादत को याद करती हूं। मंदिर के लिए 1853 में पहले संघर्ष से लेकर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में संघर्ष करने वाले तमाम लोगों को याद करती हूं। जो खप गए, आज बैकुंठ धाम से जब इस मंदिर को देख रहे होंगे, निश्चित तौर पर उनकी आत्मा तृप्त हुई होगी। मैं अयोध्या मंदिर के पुनर्निर्माण की कहानी आज सुनाने जा रही हूं। सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को आज के ऐतिहासिक दिन देखने का मौका हमें दिया है। लेकिन, क्या यह सब इतना आसान था। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। हिंदुओं ने हाई कोर्ट के आदेश को बेमन से स्वीकार तो कर लिया था। लेकिन, सुन्नी वक्फ बोर्ड को हाई कोर्ट का फैसला रास नहीं आया। हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू करने का निर्णय लिया। अब यहां पर दिक्कत फंसी दस्तावेतों की। सुप्रीम कोर्ट में सारे दस्तावेज अंग्रेजी में अनुवाद होकर जमा होने थे। इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करती। यूपी की पहले मायावती और वर्ष 2012 में बनी अखिलेश यादव सरकार ने इसमें रुचि नहीं दिखाई। केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार इस विवाद में उलझने के मूड में नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट में बस तारीखें आगे बढ़ रही थी। इसी बीच देश की राजनीति में वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी की एंट्री हुई। लोकसभा चुनाव 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। भगवान राम के प्रदेश यूपी की 80 में से 73 सीटों पर एनडीए को जीत मिली। भाजपा 71 सीटों पर जीती थी। इसके बाद राम मंदिर का मुद्दा गरमाना शुरू हुआ। लेकिन, प्रदेश में तब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। दस्तावेजों के ट्रांसलेशन का मुद्दा हल नहीं हो रहा था। वर्ष 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनी। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान हुए। राम मंदिर मुददे ने कोर्ट में इसके बाद जोर पकड़ा। कोर्ट ने जिन कागजातों की मांग की, उसे उपलब्ध कराया गया। जनवरी 2019 में 30 हजार पन्नों के ट्रांसलेशन का मामला उठा।

दरअसल, कोर्ट में कुल 13,886 पेज के दस्तावेज पेश किए गए। इसके अलावा 257 रिलेटेड डॉक्यूमेंट और वीडियो टेप पेश किए गए। साथ ही, हाईकोर्ट के फैसले के 4304 प्रिंटेड और 8533 टाइप किए पन्ने भी सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए जाने थे। सुप्रीम कोर्ट ने तब 29 जनवरी 2019 तक ट्रांसलेशन की प्रक्रिया को पूरा कराने का आदेश दिया था। अयोध्या राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े मूल दस्तावेज अरबी, फारसी, संस्कृत, उर्दू और गुरमुखी में लिखे हुए हैं। योगी सरकार ने इसका ट्रांसलेशन कराकर कोर्ट के सामने मुद्दे को पेश कर दिया। तमाम दस्तावेजों के अध्ययन और 40 दिनों की नियमित सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय सामने आया। कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ का पूरा भूखंड रामलला विराजमान को सौंपा। केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण के आदेश दिए गए।

अयोध्या में भगवान श्रीरामलला के मंदिर के निर्माण के साथ तीर्थ क्षेत्र की सूरत बदलने का भी प्रयास किया गया है। आज अयोध्या की सड़कों पर चलते हुए आपको त्रेता युग काल सा अहसास होगा। आधुनिक सुविधाओं से इस शहर को लैस किया गया, लेकिन पौराणिकता के साथ कोई समझौता नहीं किया गया। 2017 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के साथ ही योगी आदित्यनाथ अयोध्या की योजना पर जुटे। सीएम योगी ने अब तक 80 माह की सरकार में 47 अहम फैसले लिए। अयोध्या के विकास की योजना पर 31 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। बजट की कमी रामनगरी को नहीं होने दी गई। इसका परिणाम है कि अयोध्या में आज वर्ल्ड क्लास इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनकर तैयार है। अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन की आभा देखते ही बनती है। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि को जोड़ने वाले चार रास्तों को शानदार बनाया गया।

सीएम योगी ने अयोध्या को फंड देने के साथ- साथ समय भी दिया। अब तक वे 64 बार अयोध्या की यात्रा कर चुके हैं। सीएम योगी रविवार की शाम भी अयोध्या पहुंचे हैं। वे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेने आए हैं। लगातार योजनाओं के स्थल निरीक्षण के कारण इसकी गति कभी कम नहीं हो पाई। सीएम योगी ने सरकार बनने के बाद दिवाली पर दीपोत्सव कार्यक्रम का आयोजन शुरू किया। आज अयोध्या दीपोत्सव ग्लोबल ब्रांड बन चुका है।

जब रामलाल की मूर्ति को लेकर कांग्रेस में हुआ था विवाद जानिए वह किस्सा?

एक समय ऐसा था जब रामलाल की मूर्ति को लेकर कांग्रेस में विवाद हुआ था आज वह किस्सा आप जानने वाले हैं! 23 दिसंबर, 1949 की रात को विवादित ढांचे में रामलला की मूर्ति रखे जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यूपी के सीएम गोविंद बल्लभ पंत से इसे हटाने का आदेश दिया। हालांकि विभाजन और दंगों के बाद से तुरंत निकले देश में यह आसान नहीं था। प्रधानमंत्री के आदेश का विरोध न केवल तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट केके नायर और सिटी मजिस्ट्रेट गुरु दत्त सिंह की ओर से हुआ बल्कि फैजाबाद में कांग्रेस के भीतर से भी हुआ। फैजाबाद के स्थानीय कांग्रेस विधायक बाबा राघव दास, उन लोगों में से थे जिन्होंने मूर्ति हटाने के किसी भी कदम का मुखर विरोध किया, यहां तक कि ऐसा होने पर इस्तीफा देने की धमकी भी दी। बाबा राघव दास ने आचार्य नरेंद्र देव जो फैजाबाद के ही रहने वाले थे और इस क्षेत्र में उनकी जबर्दस्त पकड़ थी। उनको चुनाव में हराया था। द डिमोलिशन एंड द वर्डिक्ट में पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने लिखा है कि 1950 में जब केंद्र, नेहरू के निर्देश पर, राज्य सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव डाल रहा था तब राघव दास ने धमकी दी कि अगर मूर्ति को हटाया गया तो वह विधानसभा और पार्टी से इस्तीफा दे देंगे। राघव दास वही विधायक थे जिन्होंने उपचुनाव में आचार्य नरेंद्र देव को हराया था। सोशलिस्ट धड़े से 13 विधायकों ने यूपी विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उपचुनाव का ऐलान हुआ। उपचुनाव में फैजाबाद सीट पर सबकी नजर थी। यहां से समाजवादी विचारक आचार्य नरेंद्र देव मैदान में थे, जो उन इस्तीफा देने वाले सोशलिस्ट विधायकों में शामिल थे।

1948 के उपचुनाव में मौजूदा विधायक और समाजवादी दिग्गज आचार्य नरेंद्र देव को लगभग 1,300 वोटों के अंतर से हराकर राघव दास ने फैजाबाद सीट जीती थी। नरेंद्र देव के इस्तीफे के बाद राघव दास को खुद यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने उपचुनाव के लिए चुना था। मुखोपाध्याय की पुस्तक में कहा गया है कि नरेंद्र देव की हार सुनिश्चित करने के लिए, पंत ने खुद अयोध्या में राघव दास के लिए प्रचार किया। चुनाव प्रचार के दौरान कहा गया कि नरेंद्र देव एक नास्तिक हैं जो भगवान राम में विश्वास नहीं करते।

राघव दास ने कसम खाई कि वह वह राम जन्मभूमि को विधर्मियों से मुक्त कराएंगे। उपचुनाव के दौरान अयोध्या में जो पोस्टर लगे उसमें आचार्य नरेंद्र देव को रावण की तरह दिखाया गया और कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघव दास को राम की तरह पेश किया गया। महाराष्ट्र में जन्मे लेकिन राघव दास की कर्मभूमि पूर्वी यूपी थी। देवरिया के बरहज कस्बे में उनका आश्रम है। वैसे बाबा राघव दास की पहचान किसी धार्मिक संत की नहीं बल्कि एक गांधीवादी और समाजसेवक की थी। उन्हें पूर्वांचल का गांधी और संत विनोबा के भूदान आंदोलन का ‘हनुमान’ कहा जाता है। नवनिर्वाचित विधायक शुरू से ही राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ गए। 20 अक्टूबर, 1949 को अयोध्या में रामचरितमानस का नौ दिवसीय अखंड पाठ आयोजित किया गया। भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज द्वारा लिखी गई एक नई किताब, ट्रिस्ट विद अयोध्या में कहा गया है कि लोग उन्हें पूर्वांचल का गांधी भी कहते थे। दरअसल राघव दास में आध्यात्मिक प्रतिभा भी थी। वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया के बरहज के प्रसिद्ध संत योगीराज अनंत महाप्रभु के शिष्य और उत्तराधिकारी थे। राघव दास एक समाज सुधारक भी थे। महाराष्ट्र में पुणे के एक ब्राह्मण परिवार में राघवेंद्र के रूप में जन्मे, राघव दास ने 17 साल की उम्र में घर छोड़ दिया, सत्य की तलाश में पूर्वी उत्तर प्रदेश में घूमते रहे और मौनी बाबा नामक एक तपस्वी से हिंदी सीखी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुछ शैक्षणिक संस्थान राघव दास के नाम पर हैं। इनमें बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर, बाबा राघव दास इंटर कॉलेज, देवरिया और बाबा राघव दास डिग्री कॉलेज, बरहज शामिल हैं। राघव दास का 1958 में निधन हो गया। आचार्य नरेंद्र देव को हराया था। सोशलिस्ट धड़े से 13 विधायकों ने यूपी विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उपचुनाव का ऐलान हुआ। उपचुनाव में फैजाबाद सीट पर सबकी नजर थी। यहां से समाजवादी विचारक आचार्य नरेंद्र देव मैदान में थे, जो उन इस्तीफा देने वाले सोशलिस्ट विधायकों में शामिल थे।12 दिसंबर 1998 को, वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान, राघव दास की जयंती के अवसर पर भारत सरकार की ओर से नेहरू से मुकाबला करने वाले ‘राम भक्त’ कांग्रेस विधायक की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया गया था।

जानिए श्री राम भगवान के सबसे बड़े सबूत राम सेतु की कहानी!

आज हम आपको श्री राम भगवान की सबसे बड़े सबूत रामसेतु की कहानी सुनाने जा रहे हैं! प्रधानमंत्री मोदी रविवार को तमिलनाडु के अरिचल मुनाई पहुंचे और उन्होंने समुद्र तट पर पुष्प अर्पित किए। मोदी ने वहां ‘प्राणायाम’ भी किया। उन्होंने समुद्र का जल हाथों में लेकर प्रार्थना की और अर्घ्य दिया। प्रधानमंत्री ने वहां बने राष्ट्रीय प्रतीक स्तंभ पर भी पुष्पांजलि अर्पित की। रामायण से जुड़े तमिलनाडु के मंदिरों का उनका दौरा सोमवार को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से ठीक पहले संपन्न हुआ है। मोदी ने श्री कोठंडारामस्वामी मंदिर में पूजा की और दर्शन किए, जो धनुषकोडी और अरिचल मुनाई की ओर जाने वाले रास्ते पर है, जहां से श्रीलंका कुछ ही दूरी पर है। तमिल में कोठंडारामस्वामी भगवान राम को धनुष और बाण से दर्शाते हैं। मोदी ने रात्रि प्रवास रामेश्वरम में किया था और इसके बाद वह अरिचल मुनाई गए। कहा जाता है कि अरिचल मुनाई वह स्थान है, जहां रामसेतु का निर्माण हुआ था।  राम सेतु एक ऐसा पुल है, जो समुद्र के पार तमिलनाडु में पंबन आइलैंड को श्रीलंका के मन्नार आइलैंड से जाेड़ता है। रामसेतु का संबंध रामायण से है। मान्यता है कि श्रीराम और उनकी वानर सेना ने माता सीता को रावण से मुक्‍त कराने के लिए एक पुल बनाया था, जिसे रामसेतु नाम दिया गया। यह पुल मनुष्‍य द्वारा बनाया गया है या प्राकृतिक है इस बात पर पिछले कई वर्षों से बहस चल रही है। हालांकि राम सेतु आज भी एक रहस्‍य है। यही वजह है कि आज भी लोग इस सेतु के बारे में जानने में दिलचस्‍पी रखते हैं।

प्रोजेक्ट रामेश्वरम नाम के एक अध्‍ययन के जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने कहा है कि 7000 से 18000 साल पहले रामेश्वरम के आइलैंड और श्रीलंका के आइलैंड की खोज हुई थी। यानी ऐसा माना जाता है कि पुल 500-600 साल पुराना है। इस पुल की लंबाई 48 किमी है। रामायण में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि पुल तैरते हुए पत्थरों से बनाया गया है। हैरानी की बात यह है कि ऐसे तैरते हुए पत्‍थर आज भी रामेश्वरम में देखे जाते हैं। वाल्मीकि की रामायण में सबसे पहले राम सेतु का उल्लेख किया गया है। पौराणिक रूप से यह पुल भगवान राम की वानर सेना द्वारा निर्मित माना जाता है। सेना के एक वानर नाला ही थे, जिन्होंने सेना के अन्य सदस्यों को पुल बनाने का निर्देश दिया था। रावण से अपनी पत्नी सीता को बचाने के लिए भगवान राम को लंका पहुंचने में मदद करने के लिए पुल का निर्माण किया गया था। दिलचस्‍प बात यह है कि सेतु बनाते समय सभी पत्थरों पर भगवान राम का नाम उकेरा गया था। इससे भी दिलचस्‍प बात ये है कि जब पत्‍थरों पर चलकर पुल पार किया गया, तो यह चमत्‍कार ही था कि पत्‍थर डूबे नहीं।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसे भगवान राम ने वानर सेना की मदद से बनवाया था। उन्हें श्रीलंका पहुंचने के लिए इस पुल का निर्माण करना पड़ा। दरअसल, रावण ने भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण कर उन्हें वहीं कैद कर लिया गया था। हैरानी की बात यह है कि रामायण (5000 ईसा पूर्व) का समय और पुल का कार्बन एनालिसिस का तालमेल एकदम सटीक बैठता है। हालांकि, आज भी ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो यह बताता है कि पुल मानव निर्मित है। 15 वीं शताब्दी तक, पुल पर चलकर जा सकते थे। रिकॉर्ड बताते हैं कि, 1480 तक पुल पूरी तरह से समुद्र तल से ऊपर था।

कई बार विवादों में रहा रामसेतु राम सेतु मुद्दा एक बड़े विवाद में तब फंस गया जब यूपीए सरकार के दौरान सेतुसमुद्रम परियोजना को हरी झंडी दिखाकर सेतु के चारों ओर ड्रेजिंग करने का प्रस्ताव दिया गया, जिसमें दक्षिणपंथी निकायों और तत्कालीन विपक्षी भाजपा ने इसे हिंदू भावनाओं पर हमला बताया। राम सेतु पर विभिन्न अध्ययनों का प्रस्ताव किया गया है, सबसे हाल ही में 2021 में, जब सरकार ने इसकी उत्पत्ति का पता लगाने के लिए एक पानी के नीचे अनुसंधान परियोजना को मंजूरी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल अक्टूबर महीने में रामसेतु केस से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना है कि यह एक प्रशासनिक विषय है, जिस पर कोर्ट सुनवाई नहीं करेगा। मामले से जुड़ी याचिका में कहा गया है कि समुद्र का पानी ऊपर आ जाने के चलते राम सेतु के दर्शन में कठिनाई होती है। अगर दोनों तरफ कुछ दूरी तक एक दीवार बना दी जाए, तो रामसेतु आसानी से दिखाई पड़ेगा। यह याचिका हिंदू पर्सनल लॉ बॉर्ड के अध्यक्ष अशोक पांडे ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी। याचिका में ये भी कहा गया है कि दीवार बन जाने के बाद दुनिया भर के लोग पुल के दर्शन के लिए धनुषकोडी जा सकेंगे वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि कोर्ट दीवार बनाने का निर्देश कैसे दे सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक अन्य याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राम सेतु को एक नेशनल हैरिटेज घोषित कर दिया जाए।

क्या शाहरुख खान के कम बैक से डर गए हैं बाकी अभिनेता?

वर्तमान में बाकी के अभिनेता शाहरुख खान के कम बैक से डर चुके हैं! बीते साल शाहरुख खान ने अपनी तीन ब्लॉकबस्टर फिल्मों से दुनियाभर में 2500 करोड़ से ज्यादा की कमाई करके सबको हैरान कर दिया। पांच साल बाद ‘पठान’ से कमबैक कर उन्होंने ‘जवान’ और ‘डंकी’ जैसी हिट फिल्में दीं। सभी में उन्होंने जमकर एक्शन किया और दर्शकों को खूब हंसाया। उनका मनोरंजन किया। मगर उनके इस कमबैक से चारों तरफ खलबली मच गई। अब खबर है कि बाकी दोनों खान यानी आमिर और सलमान भी किंग खान की राह पर चलने की प्लानिंग कर रहे हैं।  साल 2023 में लंबे अरसे बाद बॉक्स ऑफिस पर जोरदार वापसी करके शाहरुख खान ने सबको हैरान कर दिया। कहा जा रहा है कि बीते साल दो सुपरहिट व एक हिट फिल्म देने के बाद शाहरुख जल्दी ही अपनी नई फिल्मों की घोषणा करने वाले हैं। जानकारों की मानें, तो सबसे पहले वह अपनी बेटी सुहाना खान के साथ फिल्म ‘द किंग’ में नजर आएंगे। इसके बाद उनके डायरेक्टर विशाल भारद्वाज व डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के साथ फिल्में करने की चर्चा है। साथ ही उनके डायरेक्टर फराह खान, एटली या लोकेश कनगराज में से किसी एक साउथ डायरेक्टर के साथ भी एक फिल्म करने की चर्चा है। वहीं फैंस तो ‘टाइगर वर्सेज पठान’ के अलावा शाहरुख के ‘धूम 4’ भी करने की डिमांड कर रहे हैं। बहरहाल, किंग खान के लंबे ब्रेक के बाद जोरदार वापसी के हिट ट्रेंड को देखते हुए बाकी दोनों खान सितारे भी सलमान और आमिर भी उनकी ही राह पर चलने की प्लानिंग करते नजर आ रहे हैं।

सलमान खान की बीते साल दो फिल्में ‘किसी का भाई किसी की जान’ और ‘टाइगर 3’ रिलीज हुईं। पहली फिल्म 100 करोड़ व दूसरी 200 करोड़ क्लब में एंट्री कर पाई। इससे पहले उनकी फिल्मों राधे व अंतिम को भी अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला था। ऐसे में, चर्चा है कि सलमान भी किंग खान की तर्ज पर धमाकेदार वापसी करने की प्लानिंग कर रहे हैं। यही वजह है कि इस साल उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। जानकारों की अगर मानें, तो फिलहाल भाईजान एक्टिंग से ब्रेक लेकर कड़ी मेहनत में जुटे हैं। चर्चा है कि सलमान ने शेरशाह जैसी हिट फिल्म बना चुके डायरेक्टर विष्णु वर्धन के साथ एक फिल्म द बुल साइन की है, जिसके निर्माता करण जौहर होंगे। सलमान की इस पैन इंडिया फिल्म में साउथ की हीरोइन सामंथा रुथ प्रभु के उनके अपोजिट काम करने की बात कही जा रही है। यह फिल्म भारतीय सेना के एक कमांडो ऑपरेशन पर आधारित होगी। इसके अलावा पिछले दिनों सलमान के डायरेक्टर संजय लीला भंसाली के साथ फिल्म इंशाअल्लाह पर काम शुरू करने की भी चर्चा हुई थी, जो उनके बीच मतभेदों के चलते कई साल पहले अटक गई थी। स्पाई यूनिवर्स की फिल्म टाइगर वर्सेज पठान के अलावा सलमान के अपने चहेते डायरेक्टर सूरज बड़जात्या के साथ एक पारिवारिक फिल्म प्रेम की शादी में काम करने की चर्चा है। वहीं भाईजान के करीबी सूत्रों का यह भी कहना है कि वह जल्द ही अपनी सुपरहिट फिल्मों के सीक्वल दबंग 4 व किक 2 पर भी काम शुरू कर सकते हैं।

मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान की आखिरी सुपरहिट फिल्म साल 2016 में आई फिल्म दंगल थी। उसके बाद उनकी फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार को भी ठीकठाक रिस्पॉन्स मिला। लेकिन उनकी फिल्मों ठग्स ऑफ हिंदोस्तान व लाल सिंह चड्ढा को फ्लॉप की श्रेणी में शामिल किया गया। ऐसे में आमिर भी ऐक्टिंग से कुछ दिनों का ब्रेक लेकर अपनी आने वाले फिल्मों की तैयारी में जुट गए। पिछले दिनों धूमधाम से अपनी बेटी आइरा की शादी करने वाले आमिर ने अपने प्रॉडक्शन हाउस के बैनर तले राजकुमार संतोषी के साथ एक फिल्म लाहौर 1947 घोषित की है। इसमें लीड रोल में सनी देओल होंगे। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि खुद आमिर भी इसमें नजर आएंगे या नहीं। इसके अलावा सुपरहिट तारे जमीन पर के बाद आमिर ने एक और फिल्म सितारे जमीन पर की घोषणा की है। हालांकि अभी तय नहीं है कि वह इस साल क्रिसमस पर कौन सी फिल्म रिलीज करने वाले हैं। बता दें कि आमिर खान हॉलिवुड फिल्म चैपियंस का रीमेक भी बनाना चाहते थे। लेकिन लाल सिंह चड्ढा की असफलता के बाद शायद वह इसे प्रोड्यूस करने की प्लानिंग कर रहे हैं। साथ ही पिछले दिनों उनके एडवोकेट उज्जवल निकम की बायॉपिक भी करने की खबर आई थी। इन सबके अलावा फैंस आमिर खान से उनकी सुपरहिट फिल्मों 3 इडियट्स, गजनी और पीके के सीक्वल पर भी काम शुरू करने की डिमांड कर रहे हैं। पिछले दिनों आमिर के अपने बेटे जुनैद के लिए भी एक फिल्म बनाने की खबर आई थी। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि आमिर ने फिल्मी पर्द पर जबर्दस्त वापसी के लिए क्या प्लानिंग की है।

बीते साल शाहरुख खान ने करीब चार साल के लंबे इंतजार के बाद बड़े पर्दे पर जोरदार वापसी की। इससे पहले आखिरी बार वह साल 2018 में क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्म जीरो में नजर आए थे। उसके बाद किंग खान ने कुछ समय के लिए ग्लैमर की दुनिया से दूरी बना ली थी। जानकारों के मुताबिक शाहरुख ने अपना समय स्क्रिप्ट पढ़ने और लोगों से मिलने में बिताया। तमाम ऑप्शंस में से उन्होंने अपने लिए अलग अलग जॉनर की तीन फिल्मों पठान, जवान और डंकी को चुना। इस फिल्म उन्होंने स्पाई यूनिवर्स की साइन की, तो दूसरी ओर पहली बार साउथ डायरेक्टर एटली के साथ अपने प्रॉडक्शन हाउस के तले फिल्म बनाई। वहीं तीसरी फिल्म उन्होंने हर दिल अजीज डायरेक्टर राजकुमार हिरानी के साथ बनाई। जवान और पठान जहां ब्लॉकबस्टर रहीं। वहीं डंकी ने भी ठीक-ठाक प्रदर्शन किया। इन तीनों फिल्मों के बूते शाहरुख ने एक साल में दुनियाभर में 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करने का नया रेकॉर्ड बनाया।

इस बार के गणतंत्र दिवस पर क्या कुछ होने वाला है खास?

आज हम आपको बताएंगे कि इस बार के गणतंत्र दिवस पर क्या कुछ खास होने वाला है! गणतंत्र दिवस की तैयारियां शुरू हो गई हैं। रव‍िवार को भारतीय सेना के जवानों ने 26 जनवरी की परेड में दी जाने वाली 21 तोपों की सलामी के लिए रिहर्सल की। जवानों ने अपनी रिहर्सल के लिए स्वदेशी 105 एमएम फील्ड तोप का इस्तेमाल किया। इस तोप का उपयोग पहली बार 2023 में गणतंत्र दिवस परेड के दौरान 21 तोपों की सलामी के लिए किया गया था। भारतीय तोपों ने ब्रिटिश 25-पाउंडर तोपों की जगह ले ली है। 21 तोपों की सलामी विशेष रूप से डिजाइन किए गए कारतूस या खाली राउंड से दी जाती है। इसका इस्‍तेमाल गोले दागने के बजाय फायरिंग की आवाज पैदा करने के लिए किया जाता है। इस बीच दिल्ली ईस्टर्न रेंज के एडिशनल सीपी सागर सिंह कलसी ने गणतंत्र दिवस से पहले शनिवार को शाहदरा जिले के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। सागर सिंह कलसी ने कहा, ‘गणतंत्र दिवस को देखते हुए हम कई व्यवस्थाएं कर रहे हैं। हमारा सिर्फ एक उद्देश्य है। समारोह का शानदार आयोजन कराना। सभी सीमाओं पर सुरक्षा जांच भी चल रही है।’देश में पहली बार ट्राई-सर्विस कंटिंजेंट इस साल के गणतंत्र दिवस परेड में मार्च करेगा।

भारतीय सेना की कैप्टन शरण्या राव ने बताया कि उन्हें गर्व है कि वह त्रि-सेवा दल की सैन्य यूनिट का नेतृत्व करेंगी। उन्होंने कहा, ‘मैं एक अतिरिक्त अधिकारी हूं और त्रि-सेवा दल की सैन्य यूनिट का नेतृत्व करूंगी। यह एक गर्व का क्षण है। इतिहास में पहली बार त्रि-सेवा दल मार्च करेगा।’ केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी में राष्ट्रीय कैडेट कोर की ओर से आयोजित गणतंत्र दिवस परेड शिविर में शामिल हुए। सिंह ने एनसीसी छात्रों की प्रशंसा की और कहा, ‘आज आपका प्रदर्शन देखने के बाद मैं कहना चाहूंगा कि यह उत्कृष्ट था। मैं ऐसे अद्भुत सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन के लिए एनसीसी छात्रों को बधाई और आशीर्वाद देना चाहता हूं। आपके समर्पण ने मुझे प्रेरित किया है। मुझे विश्वास है कि एनसीसी का प्रत्येक कैडेट ऐसे समर्पण और प्रतिभा से भरा हुआ है।’ यही नहीं आपको बता दें कि इस साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत आ रहे हैं। खबर है कि उनकी यात्रा के दौरान वह दिल्ली के अलावा कई अन्य शहरों की भी सैर करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, तीन दिन की इस यात्रा के दौरान मैक्रों दिल्ली के आसपास किसी दूसरे शहर में भी जा सकते हैं। भारत और फ्रांस इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वह कम से कम समय में किसी दूसरे शहर तक जा सकते हैं। यह भी पता चला है कि गणतंत्र दिवस परेड में फ्रांसीसी सैन्य दल भी शामिल हो सकता है। भारत आने के दौरान मैक्रों 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात करेंगे।

मैक्रों इस साल गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि होंगे। यह भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने का संकेत है। मैक्रों की यात्रा की तैयारियों के लिए उनके राजनयिक सलाहकार ने शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात की। एक विश्लेषक ने कहा कि भारत की तरह फ्रांस भी अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता की अवधारणा का अनुसरण करता है और पीएम मोदी के मैक्रों के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। इससे पहले 2016 में गणतंत्र दिवस समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद मुख्य अतिथि थे। मोदी इस साल फ्रांस में राष्ट्रीय दिवस बास्तिल डे समारोह और परेड के मुख्य अतिथि थे। भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी की 25वीं वर्षगांठ को चिह्नित करने के लिए एक सैन्य बैंड के नेतृत्व में 241 सदस्यीय त्रि-सेवा भारतीय सशस्त्र बल दल ने भी परेड में भाग लिया था। हाल के वर्षों में मेक इन इंडिया पहल के तहत फ्रांस भारत के शीर्ष रक्षा साझेदारों में से एक रहा है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 26 जनवरी, 2024 को गणतंत्र दिवस पर आयोजित होने वाली परेड में मुख्य अतिथि होंगे। इसी के साथ वह छठे फ्रांसीसी नेता बन जाएंगे जिन्हें भारत ने यह सम्मान प्रदान किया है। मैक्रों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमंत्रण पर भारत की यात्रा पर आएंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने को लेकर भारत से मिले निमंत्रण पर पीएम मोदी धन्यवाद कहा था। इमैनुएल मैक्रों ने 22 दिसंबर को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा था, ‘आपके निमंत्रण के लिए धन्यवाद, मेरे प्रिय मित्र भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आपके गणतंत्र दिवस पर मैं आपके साथ जश्न मनाने के लिए रहूंगा!’

आखिर 75 सालों में कितनी बदली है अयोध्या?

आज हम आपको बताएंगे कि 75 सालों में अयोध्या आखिर कितनी बदली है! 23 दिसंबर साल 1949, राम जन्मभूमि चौकी के चौकीदार अब्दुल बरकत को तड़के घंटा-घड़ियाल’ की आवाज और ‘भये प्रगट कृपाला, ‘ के भजन सुनाई देने लगे। बरकत बरबस ही बाबरी मस्जिद की ओर खिंचे चले गए। उन्होंने जो वहां देखा, उसके मुताबिक, पूर्व विश्व हिंदू परिषद उपाध्यक्ष जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल ने अपनी किताब ‘श्री राम जन्मभूमि: ऐतिहासिक और कानूनी परिदृश्य’ में संक्षेप में बताया है। बकौल अब्दुल बरकत, उन्होंने प्रकाश की एक चमक देखी जो सोने की हो गई और तभी उन्होंने वह देखा जो शायद किसी को सपने में भी नसीब न हो। बरकत ने बताया कि उस चमक के साथ उन्हें चार या पांच साल के बहुत सुंदर भगवान जैसे बच्चे का चित्र दिखाई दिया। यही नहीं अब्दुल बरकत को मस्जिद के अंदर सिंहासन पर रखी मूर्ति की आरती करते हुए हिंदुओं की भीड़ भी दिखी। वह 4 या 5 साल का नन्हा बालक कोई और नहीं बल्कि रामलला थे। मतलब साक्षात प्रभु श्री राम। लला या लल्ला अवध क्षेत्र में छोटे लड़कों के लिए एक प्रेमपूर्ण शब्द है। रामलला का प्रकट होना राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के 491 साल के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। इसके बाद मुसलमानों ने भगवान राम की उस मूर्ति के चमत्कार पर सवाल उठाया और अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत अभिराम दास पर 9 इंच की मूर्ति रखने का आरोप लगाया। जब जिला मजिस्ट्रेट केके नायर और शहर मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह से मूर्ति हटाने को कहा गया तो उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और यूपी के मुख्यमंत्री जीबी पंत समेत अपने बड़े अधिकारियों की अवज्ञा की। राज्य सरकार ने तब मस्जिद को बंद कर दिया, लेकिन हिंदुओं को बाहर से राम लला विराजमान की पूजा करने की अनुमति दे दी। यहां से मुकदमों की एक श्रृंखला शुरू हुई। हिंदू पक्ष से दिगंबर अखाड़ा के प्रतिनिधियों ने 1950 में और इसके बाद निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। 1961 में, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद और उसके आसपास के कब्रिस्तान पर दावा किया। फिर जुलाई 1989 में, रामलला विराजमान ने जस्टिस अग्रवाल के माध्यम से खुद अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्होंने मस्जिद को हटाने और विवादित जमीन वापस मांगी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से रामलला के दावे को आंशिक रूप से स्वीकार करने और उन्हें निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को 2.77 एकड़ जमीन का एक तिहाई हिस्सा देने से पहले कई साल बीत गए। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर, 2019 के अपने फैसले में राम लल्ला को पूरी जमीन दे दी। इसने इस स्थान को ‘राम का जन्म स्थान’ के रूप में मान्यता दी।

निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने 15 जनवरी, 1885 को विवादित जमीन का आंशिक दावा वापस लेने के लिए पहला मुकदमा दायर किया था। वह मस्जिद के सामने राम चबूतरा नामक चौकी पर एक मंडप बनाना चाहते थे। लेकिन सब-जज हरकिशन सिंह ने उनकी दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे तनाव बढ़ सकता है। जिला जज कर्नल FEA चैमियर अधिक सहानुभूतिपूर्ण थे, उन्होंने स्वीकार किया कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है, लेकिन उन्होंने यथास्थिति बनाए रखते हुए कहा कि 350 साल पहले की गई गलती को सुधारने में बहुत देर हो गई है।

तीन गुंबद वाली बाबरी मस्जिद 1528 ई. में बनाई गई थी। ऐसा माना जाता है कि मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने भगवान राम की जन्मस्थली के तौर पर एक मंदिर को गिराया था। तब से हिंदू उस जमीन को वापस पाने की कोशिश कर रहे थे। सम्राट अकबर के समय में उनके लिए राम चबूतरा बनाया गया था, लेकिन उनके परपोते औरंगजेब के शासन में यह विवाद और बढ़ गया। कुछ स्रोतों के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह की सेना भी राम जन्मभूमि को मुक्त करने के लिए लड़ाई में शामिल हुई थी। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के अधीन, ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर जेम्स आउटराम ने मस्जिद को लेकर सांप्रदायिक संघर्ष की सूचना दी थी। इसलिए 1859 में, जब भारत ब्रिटिश राज के अधीन आया, तो अदालत ने मस्जिद का आंतरिक प्रांगण मुसलमानों को और चबूतरे वाला बाहरी प्रांगण हिंदुओं को सौंप दिया।

6 दिसंबर, 1992 को कार सेवा को फिर से शुरू करने का दिन तय किया गया था। कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया जिसमें कहा गया था कि विवादित स्थल पर कोई स्थायी निर्माण नहीं होगा। लेकिन उस दिन, 1.5 लाख कार सेवकों ने मस्जिद को ध्वस्त कर दिया, जिससे देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें 2,000 से अधिक लोग मारे गए। केंद्र सरकार की ओर से उनकी सरकार बर्खास्त करने और यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू करने से पहले कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। भाजपा ने इसके बाद दो दशकों से अधिक समय तक मंदिर के मुद्दे को जिंदा रखा, जब तक कि 2014 में उसे केंद्र में भारी जनादेश नहीं मिला। 2019 में जब अनुकूल सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तब तक नरेंद्र मोदी बड़े जनादेश के साथ पीएम के रूप में दूसरी बार वापस आ चुके थे और यूपी में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री थे, जिनकी गोरखपुर पीठ तीन पीढ़ियों से मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई है।

जानिए आचार्य गिरिराज किशोर की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको आचार्य गिरिराज किशोर की अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! पिछले वर्ष देश ने एक सुखद रिकॉर्ड बनाया। रिकॉर्ड है देहदान का। मृत्यु के बाद शरीर के अंगों का उपयोग किसी मरीज के जीवन बचाने या फिर उनके किसी अंग के अभाव को पूरा करने में हो जाए, इसका संकल्प करने वालों की तादाद देश में पहली बार चार अंकों में पहुंच गई। पिछले वर्ष कुल 1,028 लोगों ने देह दान किया। देश में देहदान की परंपरा अभी भी जोर नहीं पकड़ सकी है। इसके पीछे का मूल कारण है धार्मिक नियम। हमारा देश हिंदू बहुल है। हिंदू सनातन धर्म के आदेशों से शासित हैं। सनातन में मोक्ष का सर्वोच्च महत्व है। मृत्यु के बाद आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो, इसके लिए शव का विधिवत दाह संस्कार करने और फिर श्राद्ध का विधान है। इस कारण हिंदुओं में यह धारणा गहरे पैठी है कि शव का अंतिम संस्कार नहीं हो तो मृतक की आत्मा भटकती रहती है, उसे मोक्ष नहीं मिल पाता है। इसी तरह दूसरे धर्मों में भी मृत्यु के बाद शव का क्या किया जाए, इसके अलग-अलग नियम हैं। संबंधित धर्म के लोग मृतक के शव का वही विधान करते हैं जो उन्हें धार्मिक नियम बताते हैं। लेकिन कई ऐसे भी महापुरुष होते हैं जो बदलती परिस्थितियों में समाज को नई दिशा देने के लिए धार्मिक परंपराओं के दायरे से निकल जाते हैं। आचार्य गिरिराज किशोर भी वैसी ही एक महान आत्मा का नाम है। वो अब इस दुनिया में नहीं रहे।

आज जब अयोध्या के राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम से पूरा देश राममय हो गया है और दूसरी तरफ रिकॉर्ड देहदान की खबर आई है, तब आचार्य गिरिराज किशोर को याद करना बेहद प्रासंगिक है। आचार्य गिरिराज किशोर की धार्मिक आस्था इतनी प्रबल थी कि उन्होंने जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन किया। कर्मकांड के प्रति गहन आस्थावान आचार्य गिरिराज किशोर ने अपने देहदान का संकल्प लिया था और जब उनका निधन हुआ तो उनकी इच्छा के मुताबिक उनके शव का दान कर दिया गया। आचार्य गिरिराज किशोर हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। वो आजीवन कुंवारे रहे और सामाजिक कल्याण के लिए कठोर संघर्ष किया। उन्होंने निराश्रित बच्चों की शिक्षा के लिए विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। दूसरी तरफ, उन्होंने सनातन की रक्षा के लिए ईसाई मिशनरियों से भी खूब लड़ाई लड़ी। इसाई मिशनरी देश के कोने-कोने में धोखाधड़ी से धर्मांतरण करते रहे हैं। यह आज भी धड़ल्ले से जारी है। किशोर ने गोरक्षा आंदोलन का भी नेतृत्व किया।

आचार्य गिरिराज किशोर ने आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल नेताओं की एक पूरी पीढ़ी का मार्गदर्शन किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस में कई प्रमुख योगदान दिए। किशोर हिंदी साहित्य, इतिहास और राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासल की थी। वो साहित्य और संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे। उन्होंने आरएसएस के प्रभाव में आजीवन कुंवारे रहने का संकल्प पूरा किया। 1948 में सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया तो किशोर को 13 महीने जेल में बिताने पड़े।आचार्य गिरिराज किशोर ने स्पष्ट कहा, ‘मंदिर निर्माण के द्वारा राष्ट्र का स्वाभिमान जागृत होगा और स्वाभिमानी राष्ट्र ही उन्नति कर सकता है, अन्य कोई नहीं।’ जब चावला ने कहा कि देश का निर्माण आर्थिक प्रगति से होता है तो किशोर ने कहा ऐसा नहीं है। वो कहते हैं, ‘इट इज नॉट द गोल्ड दैट मेक द नेशन, इट इज मैन हू मै द नेशन।’

उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास से ज्यादा जरूरी है व्यक्ति निर्माण का कार्य और मंदिर निर्माण से स्वाभिमान का निर्माण होगा। स्वाभिमानी व्यक्ति ही समाज में साकारात्मक योगदान दे सकता है। आचार्य गिरिराज किशोर ने बाबरी मस्जिद को पराधीनता का चिह्न बताया और पूछा कि आजादी के बाद कांग्रेस की सरकारों को गुलामी के ऐसे चिह्नों को मिटा देना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उस वक्त गिरिराज किशोर विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष थे।

हिंदू अधिकारों, सामाजिक कल्याण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति किशोर की अटूट प्रतिबद्धता ने वीएचपी पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ा। किशोर ने विहिप की युवा शाखा बजरंग दल के प्रमुख संरक्षक के रूप में भी कार्य किया। गिरिराज किशोर का 13 जुलाई, 2014 की रात विहिप मुख्यालय में निधन हुआ था। तब वो 94 वर्ष थे। आचार्य गिरिराज किशोर की इच्छा के मुताबिक उनका शव दधीचि देहदान समिति के माध्यम से दिल्ली के आर्मी मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया गया था।

क्या भारत से नफरत करने लगे हैं मालदीव के राष्ट्रपति?

वर्तमान में मालदीव के राष्ट्रपति भारत से नफरत करने लगे हैं! नफरत जहर है। खुद को ही मारता है। किसी से नफरत में अंधापन खुद को ही नुकसान पहुंचाता है। लेकिन शख्स को पता नहीं चलता क्योंकि आंखों पर नफरत की पट्टी जो बंधी होती है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू का भी यही हाल है। भारत की नफरत में वह इतने अंधे हो चुके हैं कि अपने ही नागरिकों की जान जाने का कोई परवाह नहीं है। मालदीव में एक 13 साल का बच्चा तड़प-तड़पकर मर गया। अगर समय पर इलाज मिलता तो उसकी जान बच सकती थी। लेकिन इलाज में देरी हुई क्योंकि मालदीव की सरकार मेडिकल इमर्जेंसी में भारत के भेजे हेलिकॉप्टरों और प्लेन का इस्तेमाल नहीं करना चाहती जबकि ये भेजे ही इसीलिए गए हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि चीन की गोद में बैठे मुइज्जू को भारत से नफरत है। लेकिन इतनी भी क्या नफरत मिस्टर मुइज्जू कि एक मासूम तड़प-तड़पकर मर जाए? कुछ लोकल मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है मुइज्जू ने बच्चे को एयरलिफ्ट करने के लिए भारत के भेजे डोर्नियर विमान का इस्तेमाल करने को मंजूरी नहीं दी। मुइज्जू चीन के कठपुतली हैं ये जगजाहिर है। वह भारतविरोधी हैं ये भी जाहिर है। लेकिन विरोध तक तो ठीक है। मुइज्जू के लिए ये विरोध तो भारत के प्रति नफरत में तब्दील हो गया है। अंधी नफरत में। लोकल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 13 साल के बच्चे को ब्रेन ट्यूमर था। वह एक सुदूरवर्ती द्वीप विलमिंगटन का रहने वाला था जो गाफ अलिफ विलिंगिली द्वीपसमूह का हिस्सा है। वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधा मौजूद नहीं हैं। ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित बच्चे को स्ट्रोक आया था और परिवार इलाज के लिए उसे एयरलिफ्ट कर राजधानी माले ले जाना चाहता था। वाकया बुधवार रात का है। बच्चे का परिवार अधिकारियों और दफ्तरों में गुहार लगाता रहा कि उसके बच्चे को बचा लीजिए, एयरलिफ्ट करा दीजिए लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बच्चे की हालत बिगड़ती चली गई। गाफ अलिफ विलिंगिली के जिस अस्पताल में बच्चे का इलाज चल रहा था वहां लोग सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने लगे। बच्चे को एयरलिफ्ट करने में हो रही देरी से लोगों में रोष था। आखिरकार 16 घंटे बाद गुरुवार सुबह उसे एयरलिफ्ट किया गया लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और बच्चा बचाया नहीं जा सका। भारत ने मालदीव को जो हेलिकॉफ्टर और डोर्नियर विमान दिए हैं उनका काम ही मानवीय मदद करना है। रेस्क्यू की जरूरत पड़ने या मेडिकल इमर्जेंसी की स्थिति में उनका इस्तेमाल होता है। लेकिन वह बच्चा तड़प-तड़पकर मर गया और उसे समय से एयरलिफ्ट नहीं किया जा सका क्योंकि मुइज्जू नहीं चाहते कि मेडिकल इमर्जेंसी में भारत के भेजे हेलिकॉप्टर या विमानों का इस्तेमाल हो।

मुइज्जू ने पिछले साल हुए चुनाव में ‘इंडिया आउट’ का अभियान चलाया था। उन्होंने मालदीव से भारतीय सैनिकों को बाहर निकालने के वादे के साथ चुनाव लड़ा था। ये सैनिक प्राकृतिक आपदा या किसी भी मुश्किल के वक्त में मानवीय मदद पहुंचाने और ट्रेनिंग देने के लिए मालदीव में हैं। मालदीव सरकार ने भारतीय सैन्यकर्मियों को उनके ऑपरेशन और मेंटिनेंस की जिम्मेदारी से हटने को कहा है। इससे मालदीव में भारतीय हेलिकॉप्टर और विमानों के इस्तेमाल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत से 15 मार्च तक अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए कहा है। हालांकि, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में आपसी सहमति से समाधान निकालने के लिए दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब मुइज्जू की भारत से अंधी नफरत की बेदी पर किसी मासूम की बलि चढ़ी है। कुछ दिन पहले ही एक और लड़के की इस वजह से मौत हो गई थी क्योंकि मुइज्जू ने डोर्नियर विमान को तैनात करने की इजाजत नहीं दी थी। मुइज्जू सरकार की इस हरकत के खिलाफ मालदीव के लोगों में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। स्थानीय लोगों ने अस्पताल के बाहर मुइज्जू सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा दिखा। आम लोगों के साथ-साथ राजनेताओं और बुद्धिजीवियों में भी नाराजगी दिख रही है। मालदीव के सांसद मिकैल नसीम ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘भारत के प्रति राष्ट्रपति की दुश्मनी को संतुष्ट करने के लिए लोगों की जान नहीं ली जानी चाहिए।’ संयुक्त अरब अमीरात में मालदीव के पूर्व डेप्युटी एम्बेसडर रहे मोहम्मद फैजल ने लिखा, ‘कुछ ही दिन पहले, एक अद्दू फैमिली ने समुद्र के पास अपने बेटे को इसलिए खोया कि मुइज्जू ने डोर्नियर की तैनाती से इनकार कर दिया था। आज जीए विलिंगिली के एक और युवा लड़के को अपनी जान गंवानी पड़ी जबकि डोर्नियर संभवतः उसे बचा सकता था। मुइज्जू के तुच्छ अभिमान के लिए और कितनी जिंदगियां कुर्बान होंगी।’ लोगों में रोष है। आक्रोश है। एक राष्ट्रपति का किसी देश के प्रति नफरत में अंधा हो अमानवीय हो जाना दुखद है।

मिस्टर मुइज्जू, भारत से इतनी भी क्या नफरत? कम से कम मानवता का ही ध्यान रखे होते। नफरत में अपने ही लोगों पर अमानवीय हो जाना कहां तक ठीक है? नफरत के अंधेपन में मानवीय गरिमा को तो ताक पर मत रखिए मिस्टर मुइज्जू! हम तो सिर्फ इतना ही कहेंगे- गेट वेल सून मुइज्जू। ईश्वर आपको सद्बुद्धि दें।