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अमेरिका के भारत को जेनोफोबिक कहने पर क्या बोले विदेश मंत्री?

हाल ही में विदेश मंत्री ने अमेरिका के भारत को जेनोफोबिक बोलने पर एक बयान दिया है! केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा भारत को ‘जेनोफोबिक’ यानी विदेशियों के प्रति नापसंदगी कहने और उसे आर्थिक रूप से संकटग्रस्त देशों की श्रेणी में रखने को खारिज कर दिया। उन्होंने शुक्रवार को ईटी राउंडटेबल में कहा, ‘सबसे पहले हमारी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा नहीं रही है। भारत हमेशा से बहुत ही अनोखा देश रहा है… जो अपनी मेहमाननवाजी के लिए जाना जाता है। मैं वास्तव में कहूंगा कि दुनिया के इतिहास में भारत ऐसा देश रहा है, जिसने जरूरतमंद की हमेशा मदद की है। अलग-अलग समाजों से अलग-अलग लोग भारत आते हैं।’ जयशंकर ने मोदी सरकार के कानून सीएए का भी हवाला दिया जो पड़ोंसी देशों से आने वाले लोगों को नागरिकता देता है। उन्होंने कहा, हमारे पास नागरिकता संशोधन कानून (सीएए ) है, जो उन लोगों के लिए दरवाजे खोलता के लिए है जो दूसरे देशों में मुसीबत में हैं… मुझे लगता है कि हमें उन लोगों के लिए अपने दरवाजे खुले रखने चाहिए जिन्हें भारत आने की जरूरत है, जो भारत आने का दावा करते हैं।’

इसके बाद विदेश मंत्री ने सीएए की आलोचना करने वालों को फटकार लगाई। उन्होंने कहा, ‘ऐसे लोग हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सीएए की वजह से इस देश में दस लाख मुसलमान अपनी नागरिकता खो देंगे। उनसे जवाब क्यों नहीं लिया जा रहा है? क्या अब तक किसी की नागरिकता गई है?’

उन्होंने कहा कि एक खास विचार से प्रभावित पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग ग्लोबल नेरेटिव चलाकर भारत को टारगेट करने की कोशिश कर रहा है। यह वह वर्ग है जो हमेशा से मानता रहा है कि उन्हें ग्लोबल नेरेटिव को कंट्रोल करना चाहिए। जयशंकर ने आगे कहा, ‘ऐसे लोगों ने कई मामलों में अपने राजनीतिक स्वार्थ को भी उजागर कर दिया। उन्होंने भारत में दूसरे राजनीतिक दलों का खुला समर्थन करने का संकेत दिया है। वे खास मुद्दों पर आगे आए हैं, अपनी अजेंडा चलाया है। अगर वे कोई बयान देते हैं या फैसला सुनाते हैं, तो आपको इन्हें पहचानना चाहिए कि ये विचार आ कहां से रहे हैं। ये वो लोग हैं, जिन्होंने खुले तौर पर ऐलान किया है कि जो कुछ हो रहा है उसमें उनकी हिस्सेदारी है। उनका मानना है कि जो कुछ हो रहा है उसमें उनकी भूमिका है।

विदेश मंत्री ने कहा, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की खराब रैंकिंग भी एक राजनीतिक हिट जॉब थी। गाजा में युद्ध को लेकर अमेरिकी कॉलेज के विरोध प्रदर्शन पर जोर देते हुए जयशंकर ने कहा, ‘भारत में हर बार जब कोई आंदोलन होता है, तो हमें जनता से कैसे निपटना है, इस बारे में बहुत सारा उपदेश सुनने को मिलता है। मैं आपको आज आपको टेलीविजन पर ये तस्वीरें देखने को कह रहा हूं। जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सीएए की वजह से इस देश में दस लाख मुसलमान अपनी नागरिकता खो देंगे। उनसे जवाब क्यों नहीं लिया जा रहा है? क्या अब तक किसी की नागरिकता गई है?’वे अब क्या उपदेश देंगे, वे क्या करते हैं, उनका एजेंडा क्या है, उनकी निष्पक्षता क्या है, या इसकी कमी है? इन सब बातों को समझने की जरूरत है। आप कह सकते हैं कि ये एक सार्वजनिक संगठन है या… कोई थिंक टैंक रिपोर्ट दे रहा है। यह दूसरे तरीकों से राजनीति है। मैं इसे पहचानता हूं और मैं इसे उजागर करूंगा।’

पाकिस्तान में टारगेट किलिंग के लिए भारत को दोषी ठहराने वाली प्रेस रिपोर्टों पर विदेश मंत्री ने कहा, ‘आतंकवादी वहां बड़ी संख्या में हैं। आंकड़ों के अनुसार, जहां वे बड़ी संख्या में होंगे, वहां उनके साथ कुछ न कुछ होगा। अब उन्होंने एक ऐसा धंधा बना लिया है जो आतंकवादियों का है… उन्होंने भारत में दूसरे राजनीतिक दलों का खुला समर्थन करने का संकेत दिया है। वे खास मुद्दों पर आगे आए हैं, अपनी अजेंडा चलाया है। अगर वे कोई बयान देते हैं या फैसला सुनाते हैं, तो आपको इन्हें पहचानना चाहिए कि ये विचार आ कहां से रहे हैं। ये वो लोग हैं, जिन्होंने खुले तौर पर ऐलान किया है कि जो कुछ हो रहा है उसमें उनकी हिस्सेदारी है।वहां कुछ भी हो सकता है।’ विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐसा नेता बताया जो जीवन में एकाध बार आता है। जयशंकर ने कहा कि इसी दृढ़ विश्वास ने उन्हें कूटनीतिक करियर के बाद राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया, जो 2015 से 2018 तक विदेश सचिव रहे और 2019 में विदेश मंत्री बने।

आखिर क्या है प्रियंका गांधी की सीट पर सस्पेंस?

आज हम आपको प्रियंका गांधी की सीट पर सस्पेंस बताने जा रहे हैं! अमेठी और रायबरेली, इन दो हाई प्रोफाइल सीटों के ऊपर चढ़ी सस्पेंस की चादर शुक्रवार सुबह हट गई। अमेठी से केएल शर्मा और रायबरेली से राहुल गांधी को उतारकर कांग्रेस ने इन दो सीटों की पूरी पिक्चर शीशे की तरह साफ कर दी। राहुल गांधी अब केरल की वायनाड के बाद यूपी की रायबरेली से भी चुनाव लड़ेंगे, लेकिन प्रिंयका गांधी को फिर एक बार टिकट न देकर कांग्रेस ने चौंकाया भी है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रियंका गांधी सुपरस्टार कैंपेनर हैं, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को उनकी जरूरत है, इसलिए वह चुनाव नहीं लड़ रही हैं। बात यहां खत्म हो जाती तो क्या था। जयराम रमेश ने बाद में एक ट्वीट किया जिसमें लिखा कि यह एक लंबा चुनाव है। शतरंज की कुछ चालें अभी भी खेलनी बाकी हैं, थोड़ा इंतजार करिए। रमेश के एक्स हैंडल पर ट्वीट की यह अंतिम लाइन क्या इस ओर इशारा कर रही है कि आगे प्रियंका गांधी को किसी सीट से चुनाव लड़ाया जा सकता है? जयराम रमेश ने कहा कि पार्टी चाहती थी कि प्रियंका और राहुल दोनों चुनाव लड़ें, लेकिन हकीकत में, मेरे और पार्टी के कई लोगों के लिए यह स्पष्ट था कि चूंकि पीएम मोदी ने प्रचार अभियान को पूरी तरह से अलग स्तर पर ले जाकर परिवार, इंदिरा और राजीव गांधी पर हमला किया है, इसलिए प्रियंका भाजपा के हमलों का जवाब देने में सक्षम हैं। वह पूरे देश में प्रचार कर रही हैं। प्रियंका राजनीति के लिए बनी हैं और वह हर तरह से स्वाभाविक हैं। लोगों के साथ उनका जुड़ाव, उनके प्रचार की शैली, उनका व्यक्तित्व, इसलिए यह समय की बात है कि वह चुनावी राजनीति में कब आएंगी। वह राजनीति में पूरी तरह से शामिल हैं, हमें किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि प्रियंका के चुनाव न लड़ने का एक बहुत महत्वपूर्ण कारण यह है कि वह कांग्रेस की ‘सुपरस्टार’ प्रचारक हैं जो बीजेपी का जोरदार तरीके से मुकाबला कर रही हैं।

अमेठी और रायबरेली से उम्मीदवार तय होने के बाद जयराम रमेश ने ट्वीट किया। जयराम ने लिखा कि राहुल गांधी के रायबरेली से चुनाव लड़ने की खबरों पर कई लोगों की राय है। याद रखें, वह राजनीति और शतरंज के एक अनुभवी खिलाड़ी हैं। पार्टी नेतृत्व बहुत चर्चा के बाद और एक बड़ी रणनीति के हिस्से के रूप में अपने निर्णय लेता है। इस एकल निर्णय ने भाजपा, उसके समर्थकों और उसके चापलूसों को भ्रमित कर दिया है। भाजपा के स्वघोषित चाणक्य, जो ‘परम्परा सीट’ के बारे में बात करते थे, अब निश्चित नहीं हैं कि कैसे प्रतिक्रिया दें। रायबरेली न केवल सोनिया जी की बल्कि खुद इंदिरा गांधी की भी सीट रही है। यह विरासत नहीं है, यह एक जिम्मेदारी और कर्तव्य है।

जहां तक गांधी परिवार का सवाल है, यह सिर्फ अमेठी-रायबरेली नहीं है, उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरा देश गांधी परिवार का गढ़ है। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश से तीन बार और केरल से एक बार सांसद रह चुके हैं। प्रधानमंत्री विंध्य से नीचे की एक भी सीट से चुनाव लड़ने का साहस क्यों नहीं जुटा पाए हैं? कांग्रेस परिवार लाखों कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं पर बना है। कल एक प्रख्यात पत्रकार अमेठी में कांग्रेस पार्टी के एक जमीनी कार्यकर्ता से व्यंग्यात्मक रूप से पूछ रहा था, टिकट पाने की आपकी बारी कब होगी? यह तो है! कांग्रेस का एक आम कार्यकर्ता अमेठी में भाजपा के अहंकार को तोड़ देगा।

प्रियंका जी जोर-शोर से प्रचार कर रही हैं और अकेले ही नरेंद्र मोदी के झूठ को चुप करा रही हैं। जिस तरह से उन्होंने मार्च 1985 में संपत्ति शुल्क के उन्मूलन पर प्रधानमंत्री द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों का जवाब दिया, वह एक तीखी फटकार थी। इसलिए यह महत्वपूर्ण था कि वह केवल एक निर्वाचन क्षेत्र तक ही सीमित न रहें। वह देश भर में प्रचार कर रही हैं। आज स्मृति ईरानी की एकमात्र पहचान यह है कि वह राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ती हैं। अब उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। अर्थहीन बयान देने के बजाय, स्मृति ईरानी को अब स्थानीय विकास के बारे में जवाब देना होगा। उन्हें बंद अस्पतालों, इस्पात संयंत्रों और आईआईआईटी के बारे में बोलना होगा। यह एक लंबा चुनाव है।

क्या चुनावों से पहले ही हार मान रही है कांग्रेस?

वर्तमान में कांग्रेस चुनावों से पहले ही हार मानती जा रही है! लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की परेशानी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। पहले सूरत, फिर इंदौर और अब पुरी। कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव से पहले मैदान से पीछे हट जा रहे हैं। अब पुरी से कांग्रेस उम्मीदवार सुचारिता मोहंती ने पार्टी का टिकट लौटा दिया है। मोहंती का कहना है कि उनके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं हैं। लोकसभा में बिना लड़े ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की यह तीसरी बड़ा झटका है। दूसरी तरफ कांग्रेस इन घटनाक्रमों को लेकर बीजेपी पर लोकतंत्र का चीरहरण करने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत कह चुकी हैं कि बीजेपी के शीर्ष नेता विपक्षी उम्मीदवारों को डराने-धमकाने और मामले दर्ज करवाने का काम कर रहे हैं। उम्मीदवारों का पर्चा खारिज होने, टिकट लौटाने और नाम वापस लेने को लेकर कांग्रेस बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रही है। सूरत के संदर्भ में कांग्रेस का कहना था कि बीजेपी के मजबूत गढ़ में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इतना घबराए और डरे हुए क्यों हैं? पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह आरोप भी लगाया कि सूरत के बाद इंदौर लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस के उम्मीदवारों को नामांकन वापस लेने के लिए डराया और धमकाया गया। पुरी लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार सुचारिता मोहंती ने पैसे की तंगी से जूझ रही पार्टी से कम वित्तीय सहायता का हवाला देते हुए चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। ओडिशा में लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए इसे बड़ा झटका माना जा रहा है। पुरी लोकसभा सीट और इसके तहत सात विधानसभा क्षेत्रों के लिए 25 मई को वोटिंग होनी है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 मई है। बीजेडी के अरूप पटनायक और बीजेपी के संबित पात्रा पहले ही अपना नामांकन पत्र दाखिल कर चुके हैं। मोहंती ने शनिवार को कहा कि मैंने पार्टी का टिकट लौटा दिया है। उन्होंने कहा कि मैंने शुक्रवार रात को पार्टी के आला अधिकारियों को एक मेल भेजा, जिसमें पार्टी से शून्य फंडिंग के कारण चुनाव नहीं लड़ने के अपने फैसले से अवगत कराया। हाल ही में मोहंती ने चुनाव लड़ने के लिए चंदा मांगते हुए एक क्राउडफंडिंग अभियान शुरू किया था। उसने पैसे मांगते हुए अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक यूपीआई क्यूआर कोड साझा किया था। मोहंती ने कहा कि उन्हें दानदाताओं की मदद लेने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि नकदी की कमी से जूझ रही कांग्रेस के बैंक खाते पहले ही फ्रीज कर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि चूंकि मैं अपने दम पर धन नहीं जुटा सकता था, इसलिए मैंने पार्टी से मुझे धन मुहैया कराने की अपील की। जब मेरे प्रयास सफल नहीं हुए, तो मैंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। मोहंती ने 2014 में भी पुरी संसदीय सीट से चुनाव लड़ा था।

सूरत लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार नीलेश कुंभाणी का नामांकन पत्र 21 अप्रैल को खारिज कर दिया गया था। जिला निर्वाचन अधिकारी ने प्रथम दृष्टया प्रस्तावकों के हस्ताक्षर में विसंगतियां पाई थीं। निर्वाचन अधिकारी सौरभ पारधी ने अपने आदेश में कहा था कि नामांकन फॉर्म पर प्रस्तावकों के हस्ताक्षर असली नहीं लग रहे थे। आदेश में कहा गया कि प्रस्तावकों ने अपने हलफनामों में कहा था कि उन्होंने फॉर्म पर खुद हस्ताक्षर नहीं किए हैं। बीजेी उम्मीदवार मुकेश दलाल के चुनाव एजेंट दिनेश जोधानी ने कांग्रेस उम्मीदवार के नामांकन पत्र पर आपत्ति जताई थी। अधिकारियों की तरफ से फॉर्म खारिज किए जाने के बाद बीजेपी ने अन्य आठ नामांकन पत्र भी वापस करवा लिए। इसके बाद बीजेपी के मुकेश दलाल को निर्विरोध विजेता घोषित कर दिया गया। इसके बाद कांग्रेस की गुजरात इकाई ने नीलेश कुम्भाणी को छह साल के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया। कांग्रेस राज्य इकाई का कहना था कि पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि नामांकन पत्र नीलेश घोर लापरवाही या बीजेपी से उनकी मिलीभगत के कारण रद्द हुआ।

मध्य प्रदेश के इंदौर संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस को 29 अप्रैल को बड़ा झटका लगा था। यहां से पार्टी के उम्मीदवार अक्षय कांति बम ने अपना नामांकन वापस ले लिया था। इंदौर में कांग्रेस के अक्षय कांति बम और भाजपा के उम्मीदवार शंकर लालवानी के बीच मुकाबला था। वहीं, 29 अप्रैल को अक्षय ने निर्वाचन कार्यालय पहुंचकर अपना नामांकन वापस ले लिया। पिछले विधानसभा चुनाव में इंदौर में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। इंदौर में किसी सीट पर कांग्रेस को जीत नहीं मिली थी। संभावना जताई जा रही है कि अक्षय कांति बम बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। इस पर बीजेपी नेता और राज्य सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक्स पर लिखा, इंदौर से कांग्रेस के लोकसभा प्रत्याशी अक्षय बम का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अध्यक्ष जेपी नड्डा और मुख्यमंत्री मोहन यादव व प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा के नेतृत्व में भाजपा में स्वागत है।

बीजेपी के सीटों को जीतने को लेकर क्या बोले राजनीतिज्ञ?

हाल ही में कई राजनीतिज्ञ द्वारा बीजेपी के सीटों को जीतने को लेकर बयान दिया गया है! देश में अभी दो चरण के चुनाव खत्म हो चुके हैं और इनमें क्या ट्रेंड सामने आए हैं? पार्टियां अगले पांच चरणों के चुनाव के लिए क्या रणनीति बना रही है, भारतीय राजनीति किस दिशा में बढ़ती रही है, कौन सी पार्टी की रणनीति जमीन पर काम करती दिख रही है! जहां तक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य की बात है तो दो चरणों का चुनाव हो चुका है और अभी पांच चरणों के चुनाव होने हैं। अभी तक हुए दो चरणों के चुनाव में वोटर टर्नआउट एक अहम फैक्टर दिख रहा है, अलग- अलग तरह के कयास लगा रहे है और लोगों की राय आनी शुरू हो गई है। तमिलनाड़ु, केरल, कर्नाटक, नार्थ के कुछ हिस्सों में चुनाव हुए हैं। जहां तक नजर आ रहा है तो ट्रेंड एक ही तरफ चल रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाएं बड़ी संख्या में वोट करती हैं। 2014-2019 के आंकडे देखें तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और महिलाओं में कोई ऐसा भाव नहीं दिखा कि वो कोई सत्ता परिवर्तन चाहती हैं। लगता नहीं है कि कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं होगा। बीजेपी के लिए कुछ जगह राह आसान है तो कुछ जगह मुश्किल भी जाती है। अभी तक 2019 से ट्रेंड में कोई बदलाव होता नहीं दिख रहा है। जहां तक बीजेपी अपने गठबंधन एनडीए के लिए 400 प्लस के दावे कर रही है तो ये बाते अपने कैडर में जोश भरने के लिए किया गया है लेकिन लगता है कि बीजेपी 300 प्लस का स्कोर करेगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी की सीटें बढ़ेंगी,चाहे एक ही सीट क्यों न बढ़े। वहीं तमिलनाडु में भी कुछ न कुछ मिलेगा। उड़ीसा, नॉर्थ ईस्ट, यूपी में भी बीजेपी की सीटें बढ़ेंगी। पंजाब में भी वह कुछ सीटों पर फाइट में है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में तो बीजेपी पहले से ही मजबूत है। महाराष्ट्र में दो धड़े नजर आ रहे हैं लेकिन लगता है कि बीजेपी को नुकसान नही होगा बल्कि अजीत पवार या उनके गठबंधन में शामिल दूसरे गुट को सीटों का नुकसान होगा। केरल में एक- दो सीट पर फाइट को छोड़ दें तो बीजेपी के लिए कुछ खास नहीं है। कर्नाटक और बिहार में पिछली बार के मुकाबले बीजेपी को सीटों का नुकसान हो सकता है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बीजेपी को कुछ सीटें मिल सकती हैं।

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद जब विपक्ष की एकता का दौर शुरू हुआ तो सब कुछ ठीक लग रहा था। कर्नाटक के बाहर का चुनाव देखें तो मध्यप्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ का चुनाव अलग- अलग तरह से लड़ा गया। लोगों से बातचीत कर घोषणापत्र बनाया गया। कर्नाटक में गारंटी शब्द का प्रयोग हुआ लेकिन उस बढ़त को पार्टी आगे नहीं बढ़ा सकी। कर्नाटक में कांग्रेस ने काफी मेहनत की। मध्यप्रदेश में दुनिया कह रही थी कि कांग्रेस जीत रही थी लेकिन हमें नहीं दिख रही थी। मेहनत व स्थिरता का कोई विकल्प नहीं है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गई लेकिन वहां पर कांग्रेस ने अच्छी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि राजस्थान में गहलोत सरकार ने कई अच्छी- अच्छी स्कीम लागू की थी लेकिन कोई भी स्कीम 100 पर्सेंट वोट नहीं दिला सकती। राजस्थान के प्रचार में देखें तो स्कीम में लागू होने से कांग्रेस गेम में आ गई। साथ में नई गारंटी भी रखी। 2030 का विजन डॉक्युमेंट बनाया। गहलोत तीसरी बार सीएम थे। नई बात जोड़ी गई लेकिन पार्टी के पास वो हिम्मत नहीं थी कि जिनकी टिकट काटने की जरूरत है, उनकी टिकट काटी जाए। सर्वे के आधार पर जिनकी टिकट कटनी चाहिए थी, उनकी टिकट नहीं काटी गई। वहां पर कांग्रेस काफी सीटें बहुत कम अंतर से हारी। किसी भी चुनाव में पार्टी लड़ती है, सरकार चुनाव नहीं लड़ती। पार्टी अगर चाहे कि हमारा काम कोई और कर दें तो कोई विकल्प नहीं था। पार्टी चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त नहीं थे। इसी कारण पार्टी को राजस्थान में भी हार का मुंह देखना पड़ा। कर्नाटक में महिलाओं को कांग्रेस की गारंटी का पता था, फ्री बस वाला पता था। हिमाचल में भी गारंटी पता था। गारंटी सफल मॉडल की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन कांग्रेस ने विनिंग कॉम्बिनेशन के साथ छेड़छाड़ की और कांग्रेस में गारंटी से न्याय यात्रा की तरफ फोकस कर दिया गया। गारंटी वर्ड की अपनी वैल्यू है। एक कॉम्बिनेशन चल रहा है। जनघोषणा पत्र लोगों से फीडबैक लेकर बनाया गया था। विनिंग कॉमिबनेशन को चेंज करना ठीक नहीं। भारत जोड़ो यात्रा की सफलता का ही नाम बदल गया। वहीं गारंटी को बीजेपी ने अच्छी तरह से पकड़ लिया। राजनीति में हिम्मत और विश्वनीयता जरूरी है। अगर एक पोस्टर पर फोटो छोटी या बड़ी लगाने में फैसला लेने में भी कई दिन लग जाते हैं तो यह मुश्किल स्थिति है। वहीं बीजेपी में ये बात छोटी है और कांग्रेस में यह बात बहुत बड़ी हो जाती है। बीजेपी के राज्य प्रभारी की कहीं फोटो नहीं होती, बाकी चुनाव में कांग्रेस के राज्य प्रभारी की फोटो होती है।

सबसे रोचक चुनाव पंजाब का है। पूरे देश में सबसे रोचक चुनाव है। कोई नहीं बता सकता कि किसी एक पार्टी की सीट आ रही है। वहां वोट अच्छी तरह से बंटता नजर आ रहा है। पंजाब में कड़ा मुकाबला है और वहां चार पार्टियों के बीच लड़ाई है। पंजाब में जालंधर, होशियारपुर , गुरदासपुर , लुधियाना, पटियाला सीट पर बीजेपी को अर्बन एरिया में फायदा हो सकता है। जिन जगहों पर पहले बीजेपी कैंडिडेट को एंट्री तक नहीं मिलती थी, वहां पर माहौल बदल रहा है। जहां तक स्पेस की बात है तो अकाली दल पंजाब की बीएसपी है। बीएसपी का जिस तरह से तय वोटर है, उसी तरह से अकाली दल का भी है। लेकिन अकाली दल की समस्या यह है कि पार्टी अर्बन हिंदू वोट कनेक्ट नहीं कर पा रही है। अर्बन एरिया में डर है। बीजेपी- अकाली का अलायंस होता तो इस गठबंधन को बहुत बड़ा फायदा होता। लेकिन अकाली दल डर गया कि बीजेपी से गठबंधन के बाद कहीं गांव का वोटर भी नहीं आए। फिरोजपुर व बठिंडा को छोड़कर उनके लिए मुश्किल रहेगा। अकाली तीन से चार सीटों की लड़ाई में दिख रहा है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आपस में स्पेस का फाइट कर रही है। चार पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला है।

पार्टियों के लिए चुनावी रणनीति बनाने में शामिल संस्थान की भूमिका अहम होती जा रही है। पार्टियां उनके महत्व को स्वीकार तो करती हैं लेकिन उनको क्रेडिट देने में हिचकती हैं। जबकि इस फील्ड को पब्लिकली स्वीकार किया जाना चाहिए। इससे दो तीन लाभ है। ये इंडस्ट्री को और रोजगार जुड़ते हैं। पत्रकार, रिसर्चर, मल्टीमीडिया जुड़ना चाहता है। वैसे इस फील्ड में दशकों से काम हो रहा है। पहले भी नेताओं के रोड शो, रैलियों के लिए रूट, उनके कार्यक्रम तय होते थे और अब कंपनियां भी रणनीति बनाती हैं। रिसर्च के बेस पर इनपुट होता है। लीडर फिर बताता है।

टूट रही है दुशमांटर की पार्टी! क्या हरियाणा में बच रही है सैनी की सरकार?

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हरियाणा के राज्यपाल को चौटाला का पत्र: ‘विधानसभा सत्र बुलाएं और सैनी की श्रेष्ठता का सबूत लें’
दो महीने पहले तक बीजेपी के सहयोगी रहे चौटाला ने गुरुवार को मांग की कि राज्यपाल को तुरंत विधानसभा का सत्र बुलाना चाहिए और मुख्यमंत्री सैनी से श्रेष्ठता का सबूत लेना चाहिए.
जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) प्रमुख दुष्मंत चौटाला ने हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में बहुमत का सबूत मांगा है। दो महीने पहले तक बीजेपी के सहयोगी रहे चौटाला ने गुरुवार को मांग की कि राज्यपाल को तुरंत विधानसभा का सत्र बुलाना चाहिए और मुख्यमंत्री सैनी से श्रेष्ठता का सबूत लेना चाहिए.

पूर्व उपमुख्यमंत्री चौटाला ने राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा, ”मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि सभी 10 लोकसभाओं में छठे चरण का मतदान कराने के लिए सरकार के बहुमत का निर्धारण करने के लिए तुरंत संबंधित अधिकारियों को फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दें।” राज्य में 25 मई को विधानसभा चुनाव होंगे. इससे पहले हरियाणा में बीजेपी को झटका लगा था. मंगलवार रात तीन निर्दलीय विधायकों ने बीजेपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया. जिससे सैनी सरकार के बहुमत पर सवाल खड़ा हो गया है.

हालांकि, मुख्यमंत्री सैनी ने कहा है कि उनकी सरकार पर कोई संकट नहीं है. हालांकि, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने यह कहते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन की मांग उठाई है कि भाजपा सरकार के पास बहुमत नहीं है. संयोग से, न केवल समर्थन वापसी, तीन निर्दलीय विधायकों – रणधीर गोलन (पंडूरी), धर्मपाल गोंदर (नीलोखेड़ी) और सोमबीर सिंह सांगवान (दादरी) ने भी सार्वजनिक रूप से कांग्रेस को अपना समर्थन देने की घोषणा की है।

हरियाणा में पिछले 10 साल से बीजेपी सत्ता में है. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पिछले मार्च में सरकार के प्रति विरोधी रवैये के कारण मनोहरलाल खट्टर को हटाकर सैनी को मुख्यमंत्री बनाया था। तभी दुष्मंता चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने लोकसभा सीटों के बंटवारे पर मतभेद के कारण हरियाणा में एनडीए सरकार छोड़ दी थी। तब से सैनी ने निर्दलीय विधायकों के भरोसे सरकार को बचाए रखा है.

हरियाणा विधानसभा में 90 सदस्य हैं। दो पद खाली होने से बहुमत साबित करने का जादुई आंकड़ा 45 है। बीजेपी के पास स्पीकर समेत 40 विधायक हैं. चार निर्दलीय विधायक एक तरफ. नतीजतन, जादुई आंकड़े से एक विधायक कम रह गया है। कांग्रेस के 30, जेजेपी के 10 और इनेलो के 1 विधायक तीन निर्दलीय विधायकों के साथ विपक्षी खेमे में शामिल हो गए।

बीजेपी की सहयोगी जेजेपी ने एक बार कहा था कि अगर विधानसभा में शक्ति परीक्षण हुआ तो वे सैनी सरकार के खिलाफ वोट करेंगे. जेजेपी प्रमुख और पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्मंत ने भी सैनी पर हमला बोलते हुए उन्हें हरियाणा के इतिहास का सबसे कमजोर मुख्यमंत्री बताया. हालांकि, मुख्यमंत्री सैनी ने दावा किया, ”सरकार गिरने की कोई स्थिति पैदा नहीं हुई है.” अन्य निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिल रहा है.”

एक सूत्र के मुताबिक, अगर विधानसभा में शक्ति परीक्षण हुआ तो जेजेपी के 10 में से कम से कम चार विधायक बीजेपी के साथ होंगे. जेजेपी विधायक रामनिवास सूर्यखेड़ा और योगीराम शिहाग पहले ही सार्वजनिक रूप से भाजपा को समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं। गौरतलब है कि हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता हुड्डा ने अभी तक सैनी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं किया है।

हरियाणा में अगले अक्टूबर में विधानसभा चुनाव हैं. सूत्रों के मुताबिक, ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि अगले पांच-छह महीने के लिए सरकार छोड़ने से कोई फायदा नहीं होगा. बल्कि अगर कांग्रेस वहां लोकसभा में अच्छा प्रदर्शन करती है तो विधानसभा में बीजेपी की हार पक्की हो जाएगी. इसके अलावा चूंकि विधानसभा चुनाव में छह महीने से भी कम समय बचा है, इसलिए कांग्रेस को नई सरकार बनाने का मौका मिलना संभव नहीं है. कांग्रेस पर चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने का आरोप लगेगा. और ऐसे में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को डर है कि पद्मा शिबिर को सहानुभूति वोट मिल सकते हैं.

राज्य के सभी 10 लोकसभा क्षेत्रों में छठे चरण में 25 मई को मतदान होगा. इससे पहले हरियाणा में सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को झटका लगा है. मंगलवार रात तीन निर्दलीय विधायकों ने बीजेपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया. जिसके चलते मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की सरकार बहुमत खोने की कगार पर है.

लेकिन मुख्यमंत्री सैनी इस स्थिति में भी शांत हैं. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पर कोई संकट नहीं है. हालांकि, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने यह कहते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन की मांग उठाई है कि सैनी सरकार के पास बहुमत नहीं है. संयोग से, न केवल समर्थन वापसी, तीन निर्दलीय विधायकों – रणधीर गोलन (पंडूरी), धर्मपाल गोंदर (नीलोखेड़ी) और सोमबीर सिंह सांगवान (दादरी) ने भी सार्वजनिक रूप से कांग्रेस को अपना समर्थन देने की घोषणा की है। हरियाणा में पिछले 10 साल से बीजेपी सत्ता में है. सरकार के खिलाफ संस्थागत विरोध के चलते बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने पिछले साल मार्च में मनोहरलाल खट्टर को हटाकर सैनी को मुख्यमंत्री बना दिया था. तभी दुष्मंता चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने लोकसभा सीटों के बंटवारे पर मतभेद के कारण हरियाणा में एनडीए सरकार छोड़ दी थी। तब से सैनी ने निर्दलीय विधायकों के भरोसे सरकार को बचाए रखा है.

“बहुत सुंदर लग रही है”! आलिया ने खुद को बुरी नजर से बचाने के लिए किया एक खास काम

मेट गाला में आलिया को देख चिल्लाए लापता दीपिका का नाम! वीडियो को लेकर अटकलें
विदेशी पत्रकारों ने नहीं पहचाना आलिया को! वह अपना नाम भूल गया और ‘दीपिका पादुकोन’ कहने लगा!
फैशन की दुनिया में हर किसी के लिए एक रात छुट्टी होती है। न्यूयॉर्क में एक शानदार इवेंट में सभी सितारे ग्रुप में नजर आए. नाम है मेट गाला. एक प्रमुख फ़ैशन-पत्रिका के संपादक इस आयोजन के प्रभारी हैं। आमंत्रण सूची में स्थान पाने के लिए आपको एक शीर्ष सितारा बनना होगा। एक्ट्रेस आलिया भट्ट को पहली बार 2023 में बुलाया गया था. आलिया 2024 में मेट गाला में फिर नजर आईं। डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी द्वारा डिजाइन की गई साड़ी में आलिया ने सबका ध्यान खींचा। बाउमा की सफलता से सास नीतू कपूर तो खुश हैं ही, इंडस्ट्री के उनके साथियों को भी गर्व है। उन्होंने आलिया की जमकर तारीफ की. लेकिन, विदेशी पत्रकारों ने आलिया को नहीं पहचाना! इसके बजाय, उन्होंने गलती से उन्हें ‘दीपिका पादुकोन’ कहना शुरू कर दिया।

हाल ही में एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें दिख रहा है कि आलिया रेड कार्पेट पर उतरी हैं. उन्हें देखकर फोटोग्राफर्स का एक ग्रुप दीपिका का नाम पुकारने लगा. लेकिन कई लोगों को लगता है कि ये वीडियो फर्जी है. बाद में समझ आया कि आलिया के वीडियो में जानबूझकर दीपिका का नाम लाया गया. हालांकि एक्ट्रेस इस घटना से शर्मिंदा नहीं हुईं और वहां से चली गईं।

हर साल मेट गाला का आयोजन एक खास थीम पर किया जाता है। स्टार्स भी उसी हिसाब से सजकर आते हैं। बहुत से लोग खुले विचारों वाले होते हैं और मेकअप के साथ प्रयोग करते हैं। तो कुछ मजेदार फैशन-मोमेंट बनते हैं। हालांकि, इस साल दीपिका और प्रियंका चोपड़ा इस इवेंट से गायब हैं। लेकिन आलिया की साड़ी ने सभी का मन मोह लिया है. मेट गाला 2024 का केंद्रबिंदु अभिनेत्री आलिया भट्ट हैं। शानदार पोशाक में कान के पीछे अचानक एक काली नोक फंस गई। ब्लैक टिप प्रशंसकों और फोटोग्राफरों की नजरों से बच नहीं पाई।

लेकिन आलिया के कान के पीछे ये काला सिरा क्यों? भारतीय संस्कृति में कई लोग मानते हैं कि काली नोक बुराई से बचाती है। उस दिन आलिया बेहद खूबसूरत लग रही थीं तो एक्ट्रेस ने सोचा होगा कि इससे लोगों का ध्यान आसानी से आकर्षित हो जाएगा. और इसलिए आलिया सावधान रहने के लिए कान के पीछे काली टिप पहनना नहीं भूलीं।

आलिया के फैंस का भी कहना है कि एक्ट्रेस ने सही किया. एक प्रशंसक ने टिप्पणी की, “आलिया बहुत सुंदर लग रही है। उसने यह सही किया. काली नोक उसे बुरी नज़र से बचाएगी।”

हर साल की तरह मई के पहले सोमवार को न्यूयॉर्क के ‘मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट’ में ‘मेट गाला’ इवेंट का आयोजन किया गया। हॉलीवुड और बॉलीवुड के शीर्ष कलाकार मौजूद थे. उनकी प्रतिभा से यह समारोह जगमगा उठा। यहां, स्टार संगठन के लिए धन जुटाने के लिए अपना खुद का फैशन स्टेटमेंट बनाता है, जहां मानदंडों को तोड़ना ठीक है। इवेंट के रेड कार्पेट पर दूसरी बार चलीं आलिया भट्ट, एक्ट्रेस ने किया कितना खर्च?

मेट गाला में बार की थीम ‘द गार्डन ऑफ टाइम’ थी। स्टार्स ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए खुद को तैयार किया। इस बार आलिया ने साड़ी पहनी। डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी द्वारा डिजाइन की गई साड़ी में आलिया ने सबका ध्यान खींचा। पेस्टल ग्रीन कलर की नेट साड़ी पूरी तरह से हस्तनिर्मित है। पूरी साड़ी पर सफेद और गुलाबी फूलों का काम किया गया है। सभी रेशम सोता, मनके लटकन, कांच के मोतियों से बने हैं। साड़ी की लंबी आस्तीन कालीन पर लिपटी हुई है। आँचल में आकर्षक कढ़ाई। जो करीब 23 फीट लंबा है. इस साड़ी को बनाने में आलिया को करीब 1956 घंटे लगे।

मेट गाला दुनिया के सबसे मशहूर फैशन इवेंट में से एक है। यहां प्रवेश का अधिकार जैसा नहीं है. ऐसे आयोजन में भाग लेने के लिए जेब में ताकत होनी चाहिए। अगर आप यहां भाग लेना चाहते हैं तो आपको लाखों से करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे। मेट गाला के एक टिकट की कीमत 75 हजार डॉलर से शुरू होती है। और अगर आप पूरी टेबल बुक करना चाहते हैं तो कीमत 3 लाख 50 हजार डॉलर है। जो भारतीय मुद्रा में क्रमशः 63 लाख रुपये और 2 करोड़ 92 लाख रुपये के करीब है। सारी आय मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट के कॉस्ट्यूम इंस्टीट्यूट फंड में जाती है। टेबल आमतौर पर ड्रेसमेकर या उसकी एजेंसी द्वारा बुक की जाती हैं। हालांकि, अभी तक इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि आलिया की तरफ से किसी ड्रेसमेकर या स्पॉन्सर ने वो पैसे दिए हैं या नहीं.

आखिर क्यों एस्ट्राजेनेका ने बाजार से वापस ली कोविड-19 वैक्सीन!

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एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटिश मीडिया में दावा किया कि वह ‘व्यावसायिक कारणों’ से इस दवा को बाजार से वापस ले रही है। उनका स्पष्टीकरण यह है कि कोरोना वायरस के नए वेरिएंट से निपटने के लिए बाजार में अधिक प्रभावी टीके आ गए हैं।
ब्रिटिश-स्वीडिश फार्मास्युटिकल कंपनी ने कल घोषणा की कि वह एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कोविड-19 वैक्सीन के दुष्प्रभावों को स्वीकार करने के कुछ सप्ताह बाद वैश्विक बाजार से अपनी कोरोना वायरस वैक्सीन ‘एजेडडी1222’ को वापस ले रही है। एस्ट्राजेनेका द्वारा निर्मित इस एंटीडोट को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने ‘कोविशील्ड’ नाम से विकसित किया है।

एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटिश मीडिया में दावा किया कि वह ‘व्यावसायिक कारणों’ से इस दवा को बाजार से वापस ले रही है। उनका स्पष्टीकरण यह है कि कोरोना वायरस के नए वेरिएंट से निपटने के लिए बाजार में अधिक प्रभावी टीके आ गए हैं। ‘AZD1222’ का अब निर्माण या बाजार में आपूर्ति नहीं की जाएगी। वैक्सीन अब यूरोपीय संघ के किसी भी देश में उपलब्ध नहीं है। 5 मार्च को बाजार से वैक्सीन वापस लेने का अनुरोध किया गया था। इसे कल अंतिम रूप दे दिया गया.
एस्ट्राजेनेका के खिलाफ कई मुकदमे चल रहे हैं। कथित तौर पर इनकी वैक्सीन के साइड इफेक्ट से मौत हुई है. इसके अलावा ‘थ्रोम्बोसिस विद थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम’ (टीटीएस) भी कई लोगों को हो चुका है। इसके परिणामस्वरूप रक्त का थक्का जमना, रक्त संचार कम होना जैसी समस्याएं सामने आई हैं।

2020 में, जब दुनिया भर में कोरोनोवायरस का प्रकोप बढ़ रहा था, एस्ट्राजेनेका और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने संयुक्त रूप से ‘AZD1222’ वैक्सीन विकसित की। सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित ‘कोविशील्ड’ भारत और अन्य निम्न-मध्यम वर्ग के देशों में वितरित की जाती है। ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका ने उस सीरम को लाइसेंस दिया था। भारत में बनी वैक्सीन अफ्रीका, एशिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजी गईं. एस्ट्राजेनेका ने फरवरी में मुकदमे के दौरान दबाव में स्वीकार किया था कि उसकी दवा के दुष्प्रभाव हैं। वे कहते हैं, ”खतरा बहुत कम है, लेकिन टीटीएस हो सकता है.”

वादी के वकील ने अदालत से कहा, ”उपाय में एक खामी है. अतीत में इसकी प्रभावकारिता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।”

एस्ट्राजेनेका के खिलाफ अब तक 51 मामले दर्ज हो चुके हैं. वादी ने कुल £100 मिलियन से अधिक के नुकसान का दावा किया। लॉ फर्म ले डे की पार्टनर सारा मूर ने कहा, “दुर्भाग्य से, एस्ट्राजेनेका, सरकार और उनके वकील एक रणनीतिक खेल खेलने की कोशिश कर रहे हैं।” वे मामले पर खर्च करने को तैयार हैं. लेकिन पीड़ितों के जीवन पर इसके गंभीर प्रभाव पर ध्यान देने में अनिच्छा है।

एस्ट्राजेनेका ने कहा, ”हमें उन लोगों से सहानुभूति है जिन्हें शारीरिक नुकसान हुआ है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है. मरीज़ों की सुरक्षा हमेशा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। दवा को बाजार में उतारने की मंजूरी देने वाली दवा नियामक एजेंसी ने हमेशा सभी प्रतिबंधों का पालन किया। यह सभी मामलों में दवा या मारक है।”

वैक्सीन बनाने वाली कंपनी एस्ट्राजेनेका ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में एक और कदम आगे बढ़ाया है। यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (ईएमए) ने हाल ही में कंपनी की कॉकटेल वैक्सीन खुराक ‘इवुशील्ड’ को मंजूरी देने का प्रस्ताव दिया है। यह एजेंसी यूरोपीय संघ के देशों में दवाओं पर निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार है। इस बार यह प्रस्ताव अंतिम मंजूरी के लिए यूरोपीय आयोग के पास जाएगा। इसे जो मिलेगा वह 27 सदस्य देशों के बाजारों में फैलाया जाएगा। बता दें कि एवुशेल्ड को पिछले साल दिसंबर में ही संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आपातकालीन उपयोग के लिए मंजूरी दी गई है।

EMA ने वयस्कों और 12 वर्ष तक के बच्चों में AVUSHEELD के उपयोग को हरी झंडी दे दी है। संगठन ने कहा, जिन लोगों को रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी समस्याएं हैं, यहां तक ​​कि जिन लोगों पर अन्य टीकों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, वे भी यह टीका आसानी से ले सकते हैं।

कैसे काम करती है ये वैक्सीन? निर्माताओं ने कहा कि एवुशील्ड में दो “मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज”, जिन्हें टिक्सेज़ेविमैब और सिल्गाविमैब कहा जाता है, सीधे सार्स-कोव-2 वायरस के स्पाइक प्रोटीन के दो अलग-अलग हिस्सों पर हमला करते हैं। संगठन ने यह भी बताया कि कम से कम पांच हजार लोगों को इस वैक्सीन की प्रायोगिक खुराक दी गई. संबंधित रिपोर्टों से पता चला है कि जिन लोगों को टीका लग चुका है, उनमें से लगभग 77% लोगों में संक्रमण के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है। रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि इस कॉकटेल वैक्सीन की प्रभावशीलता लगभग छह महीने तक रहती है। हालाँकि, ईएमए ने कहा कि परीक्षण किए गए विषयों में कभी भी कोविड नहीं था और उन्हें कोई टीकाकरण या अन्य कोविड-19 निवारक नहीं मिला था।

अस्थायी कर्मचारी ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस के खिलाफ कराई शिकायत दर्ज l

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राज्यपाल पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगने के बाद राजभवन में अस्थायी कर्मचारियों के काम की समीक्षा शुरू हुई
2 मई को राजभवन की एक अस्थायी कर्मचारी ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस के खिलाफ छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई थी. उस रात, शिकायतकर्ता ने हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दी।
राजभवन में कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों के कामकाज की समीक्षा शुरू कर दी गयी है. 2 मई को राजभवन की एक अस्थायी कर्मचारी ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस के खिलाफ छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई थी. उस रात, शिकायतकर्ता ने हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दी। जिसके साथ ही राज्य की राजनीति में हंगामा शुरू हो गया. और उसके बाद राजभवन में अस्थायी कर्मियों के काम की समीक्षा शुरू हो गयी. राजभवन में फिलहाल करीब 40 अस्थायी कर्मचारी हैं. मूलतः राजभवन में उनका काम और उनकी भूमिका अब राज्यपाल की निगरानी में है. राजभवन सूत्रों के मुताबिक, राजभवन के किस विभाग में कौन सा कर्मचारी काम करता है, कितने समय तक राजभवन में रहता है, इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है. अस्थायी कर्मियों पर विस्तृत रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी जायेगी. हालांकि, अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि रिपोर्ट की जांच के बाद क्या फैसला लिया जाएगा.

इस बीच, छेड़छाड़ की घटना की जांच के लिए कोलकाता पुलिस की एक जांच टीम दो बार राजभवन का दौरा कर चुकी है. कोलकाता पुलिस सूत्रों के मुताबिक, राजभवन के छह कर्मचारियों को इस संबंध में पहले ही नोटिस दिया जा चुका है। पुलिस की ऐसी भूमिका पर राजभवन ने अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं की है. हालाँकि, अस्थायी कर्मचारी बेरोजगार होने से डरते हैं। क्योंकि, जिस तरह से उनके काम का मूल्यांकन शुरू हुआ है, उसमें उन्हें आशंका के बादल नजर आ रहे हैं. डेढ़ साल से अधिक समय तक राजभवन में रहने के बावजूद राज्यपाल बोस ने कभी भी अस्थायी कर्मचारियों के काम की समीक्षा या मूल्यांकन नहीं किया। लेकिन उन्होंने इस मामले में कार्रवाई तब की जब ‘पीस रूम’ में ईपीबीएक्स में काम करने वाली एक महिला अस्थायी कर्मचारी ने उनके खिलाफ शिकायत की। नवान्न ने राजभवन के अस्थायी कर्मचारियों के मूल्यांकन के बारे में जाना। प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक प्रशासन के शीर्ष अधिकारी इस प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं.

उधर, राजभवन में एक अस्थायी महिला कर्मी से छेड़छाड़ के आरोप में राज्यपाल के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी गयी है. इसके बाद राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल ने राज्यपाल को राजभवन की सीसीटीवी फुटेज जारी करने की चुनौती दी. राजभवन ने बुधवार को कहा कि वे सीसीटीवी फुटेज जारी करेंगे. लेकिन हर किसी के लिए नहीं. राजभवन की ओर से जारी बयान के मुताबिक, ”पश्चिम बंगाल का कोई भी नागरिक सीसीटीवी फुटेज देख सकता है. केवल दो पार्टियाँ ऐसा नहीं कर सकतीं – एक राजनेता ममता बनर्जी और दो उनकी पुलिस।” राज्यपाल पर छेड़छाड़ के आरोपों के बाद सत्तारूढ़ दल ने जिस तरह से उनके खिलाफ कदम उठाया है, उसका जवाब देने के लिए राज्यपाल बोस एक के बाद एक कदम उठा रहे हैं। बंगाल के राजनीतिक कारोबारियों का एक वर्ग यही सोचता है.

हर दिन क्या होता है! जैसे-जैसे मतदान का दौर आगे बढ़ रहा है, एक के बाद एक घटनाओं से राजनीति नई करवट ले रही है। सभी घटनाएं समान परिमाण और प्रभाव वाली नहीं होतीं। अंतिम परिणाम बताएगा कि वह मतदाताओं पर कितना प्रभाव डाल सकते हैं या डाल सकते हैं। लेकिन वे मतदान के माहौल में फेलाना नहीं हैं।

और कोई बहुचर्चित शब्द देखने और सुनने से दिमाग में घूमता रहता है. वह है ‘धारणा’. जब यह वस्तु बड़ी हो जाती है, अर्थात् मानवीय अनुभूति का कण बन जाती है, तो किसी घटना की सच्चाई को कई बार आसानी से पीछे छोड़ सकती है।

हम देश के ‘गर्वित’ मतदाता हैं, जिसका फैसला राजीव गांधी 1989 में ‘चोर’ के आरोप में हार गए थे। जनता की धारणा। लेकिन बोफोर्स में राजीव का भ्रष्टाचार साबित नहीं हो सका. 2019 में पुलवामा में, बेघोर में सीआरपी बस के काफिले पर दुश्मन द्वारा प्रायोजित विस्फोट में हमारे जवानों के एक समूह की मौत हो गई। बालाकोट में खदेड़ दिया गया. उन चुनावों में प्रखर राष्ट्रवाद ने सत्तारूढ़ भाजपा को स्वाभाविक रूप से उत्साहित किया। धारणा। हालांकि कुछ समय बाद जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल के बयान से देश को पता चला कि उन्होंने सुरक्षा के लिहाज से उस दिन और घटना वाले दिन जवानों के लिए विमान तक नहीं मांगा था. , खुद प्रधानमंत्री ने राज्यपाल से यह बात सुनने के बाद उनसे मामले को “दबाने” के लिए कहा था!

हैदराबाद से मिली शर्मनाक हार पर राहुल की ‘फिसली ज़ुबान ‘

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हैदराबाद से मिली शर्मनाक हार पर मलिक के गोयनका को डांटने से पहले राहुल की ‘ज़ुबान फिसली’
हैदराबाद से 10 विकेट से हार के बाद संजीव गोयनका की आलोचना हुई. मैच के बाद राहुल ने कहा कि हैदराबाद की अविश्वसनीय बल्लेबाजी देखकर वह अवाक रह गए। हैदराबाद से 10 विकेट से हार के बाद संजीव गोयनका की आलोचना हुई. राहुल टीम मालिक के खिलाफ कुछ नहीं बोल सके. हालांकि, मैच के बाद उन्होंने कहा कि हैदराबाद की अविश्वसनीय बल्लेबाजी देखकर वह अवाक रह गए।

बुधवार को आईपीएल में हैदराबाद और लखनऊ का मुकाबला था. उस मैच में लखनऊ ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 165/4 रन बनाए. जवाब में हैदराबाद ने 9.4 ओवर में बिना कोई विकेट खोए विजयी रन बना लिया. उन्होंने अभिषेक शर्मा (28 गेंदों पर 75) और ट्रैविस हेड (30 गेंदों पर 89) के दम पर जीत हासिल की।

पुरस्कार समारोह में आकर राहुल ने कहा, ”मुझे कोई भाषा नहीं मिल रही है. ऐसी बैटिंग मैंने पहले भी टीवी पर देखी है.’ लेकिन आज मैंने अविश्वसनीय बल्लेबाजी देखी. हर गेंद बल्ले के बीचोबीच लगती दिख रही थी. उनके कौशल को कोर्निश करें. ऐसा लगता है कि इससे छक्का मारने के कौशल को काफी अनुग्रह मिला है।” राहुल आगे कहते हैं, “मुझे यह समझने का मौका नहीं मिला कि दूसरी पारी में पिच का व्यवहार कैसा था। जिस तरह से उन्होंने पहली गेंद से मारना शुरू किया, उन्हें रोकना मुश्किल था।”

राहुल ने पावर प्ले में टीम की बल्लेबाजी की विफलता को भी जिम्मेदार ठहराया। उस समय उन्होंने केवल 27 रन बनाए और दो विकेट भी खोए। राहुल ने कहा, ‘जब आप मैच हारते हैं तो फैसले पर सवाल उठाना बहुत आसान होता है। पावर प्ले में हम कम से कम 40-50 रन पीछे थे। विकेट खोने के बाद मैं अपनी लय हासिल नहीं कर सका।”

हैदराबाद से हार के बाद लखनऊ सुपर जाइंट्स के कप्तान केएल राहुल ने मालिक संजीव गोयनका पर तंज कसा। जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर फैला तो आलोचनाओं का तूफान आ गया. इस बार तो और भी बड़ी संभावनाएं सामने आई हैं. मालूम हो कि गोयनका राहुल को लखनऊ के कप्तान पद से हटा सकते हैं. जैसा कि महेंद्र सिंह ने धोनी के साथ किया था.

टीम मालिक चाहे जो भी हो, ये सवाल उठ रहे हैं कि राहुल जैसे लगातार और सफल खिलाड़ी भारतीय टीम में इस व्यवहार को कितना स्वीकार करेंगे. अटकलें तेज हैं कि क्या गोयनका अब व्यक्तिगत रूप से राहुल को पसंद करते हैं या नहीं। 2022 में अपने जन्म के बाद से ही राहुल लखनऊ के कप्तान हैं. पिछली दो बार वह अंक तालिका में तीसरे स्थान पर रहे लेकिन फाइनल नहीं खेल सके।

इस बार भी लखनऊ प्लेऑफ की रेस में है. लेकिन गोयनका टीम से ट्रॉफी चाहते हैं. इसलिए अटकलें हैं कि राहुल को अगली बड़ी नीलामी से पहले जाने दिया जा सकता है। कई लोगों का दावा है कि सीज़न के बीच में राहुल का नेतृत्व आश्चर्यजनक नहीं है। 2017 में इस खराब प्रदर्शन के कारण संजीव ने धोनी से नेतृत्व छीनकर स्टीव स्मिथ को दे दिया. कई लोगों ने उस घटना को अच्छी तरह से नहीं लिया. चर्चाएँ और आलोचनाएँ प्रचुर हैं। लेकिन गोयनका अपने फैसले पर अड़े रहे.

बाद में कहा, ”मीडिया और सोशल मीडिया में कोई भी कुछ भी कह सकता है। मैं सभी की राय की सराहना करता हूं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस बात पर चर्चा करना जरूरी है कि मैंने यह फैसला सार्वजनिक तौर पर क्यों लिया. सभी निर्णय हर समय लोकप्रिय नहीं हो सकते।”

उन्होंने धोनी और स्मिथ की तुलना करते हुए कहा, ‘आप किसी नए लड़के की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं कर सकते जो 10-15 साल से कप्तानी कर रहा हो. लेकिन हम जिस दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रहे हैं, उस पर सवाल उठाए जा सकते हैं। हमने सोचा कि टीम को एक युवा कप्तान की जरूरत है।” इसलिए जो टीम मालिक धोनी जैसे क्रिकेटर को हटाने के लिए दोबारा नहीं सोचता, वह राहुल को भी आसानी से हटा सकता है, इसमें किसी को संदेह नहीं है।

बुधवार को क्या हुआ था?

लखनऊ मैच के बाद संजीव मैदान पर आये. राहुल ने बाउंड्री के किनारे खड़े होकर हाथ हिलाया और काफी समझाया. उनके व्यवहार से साफ था कि वह टीम की हार से खुश नहीं थे. संजीव कुछ क्रिकेटरों की तरफ इशारा करने लगे. वीडियो से यह भी पता चल रहा है कि उनकी आवाज काफी ऊंची थी. संजीव की ताकत के आगे राहुल कुछ नहीं बोल सका. वह सिर झुकाये चुपचाप खड़ा रहा। वह संजीव की बात सुन रहा था। बाद में संजीव ने कोच जस्टिन लैंगर से भी बात की. वह वीडियो ख़त्म हो गया है

क्या अपने बच्चों का दर्द नहीं समझ पा रहे मां-बाप?

वर्तमान में अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों का दर्द नहीं समझ पा रहे हैं! कोटा में एक और छात्र ने खुदकुशी कर ली है। कोचिंग में नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे 20 साल के भरत राजपूत ने अपने कमरे में पंखे से लटककार जान दे दी। अपने सुसाइड नोट में उसने कहा है कि सॉरी पापा, इस बार भी मेरा सेलेक्शन नहीं हो पाएगा। छात्र नीट की तैयारी कर रहा था। उसका दो बार से सेलेक्शन नहीं हो पाया था। कोटा में इस साल अब तक 10 छात्र जान गंवा चुके हैं। नीट की परीक्षा 5 मई को होनी है। दरअसल, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल वर्क एंड ह्यूमन सर्विसेज प्रैक्टिस में छपी एक रिसर्च-स्टूडेंट्स सुसाइड्स इन इंस्टीट्यूशंस ऑफ हायर एजुकेशन इन इंडिया: रिस्क फैक्टर्स एंड इंटरवेंशंस में कहा गया है कि सबसे ज्यादा खुदकुशी 15-29 साल के युवा करते हैं। इसके बाद 30-44 साल के लोगों में खुदकुशी का ट्रेंड ज्यादा देखा गया। इसके बाद 45-59 साल के लोगों में अपेक्षाकृत सुसाइड का चलन कम है, वहीं, 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में काफी कम सुसाइड करने का चलन है। सबसे ज्यादा यूथ सुसाइड हर 1 लाख में से 80 लड़कियां करती हैं। वहीं, हर 1 लाख में 34 लड़के सुसाइड कर लेते हैं। ओमेगा-जर्नल डेथ एंड डाइंग में छपी एक स्टडी कहती है कि युवाओं में सुसाइड के पीछे कई तरह के रिस्क फैक्टर होते हैं।- ये हैं बायोलॉजिकल रिस्क फैक्टर्स, साइकोलॉजिकल रिस्क फैक्टर्स और सोशियो-एनवायरनमेंटल फैक्टर्स। स्टडी के अनुसार, युवावस्था अपने आप में सुसाइड का एक रिस्क फैक्टर होता है। किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज पर कदम रखने वाले युवाओं में शारीरिक बदलाव काफी ज्यादा होते हैं, जो उन्हें मानसिक रूप से आक्रामक बनाता है। उनमें कई तरह के हॉर्मोन निकलते हैं, जो उनके मूड को चिड़चिड़ा और आक्रामक बनाते हैं। वो सही-गलत के फैसले नहीं ले पाते हैं। वहीं, साइकोलॉजिकल फैक्टर्स में युवावस्था की ओर बढ़ रहे लड़के-लड़कियों में नकारात्मक असर ज्यादा होते हैं। उनका आत्मविश्वास डगमगाया रहता है। नाउम्मीदी ज्यादा आसानी से घर कर सकती है। इससे आत्महत्या की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा, किसी युवा के साथ सेक्शुअल, फिजिकल और इमोशनल अब्यूज हो रहा है या कभी हुआ है तो वह उससे किसी सदमे से कम नहीं होता है। वह जल्दी इससे उबर नहीं पाता है। वह धीरे-धीरे खुद को अकेला पाता है। इसके अलावा, परीक्षा के दौरान पढ़ाई और प्रदर्शन का लगातार दबाव कुछ बच्चे झेल नहीं पाते और खुदकुशी की कोशिश करते हैं। कोचिंग और शिक्षण संस्थानों का दबाव उन्हें ऐसे गलत कदम उठाने पर मजबूर कर देता है।

2021 में 13 हजार से ज्यादा स्टूडेंट्स ने खुदकुशी की। इसका मतलब यह है कि हर दिन 35 छात्र किसी ने किसी वजह से अपनी जान गंवा रहे थे। वहीं, 2022 में भी 13 हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान दे दी। इनमें से 18 साल से कम उम्र के 1123 खुदकुशी की वजह परीक्षा में फेल होना बताया गया। जान गंवाने वालों में 578 लड़कियां, 575 लड़के थे। वहीं, परीक्षा में फेल होने की वजह से किसी भी उम्र के 2,095 छात्रों ने अपनी जान दे दी। NCRB के आंकड़े इतने भयावह हैं कि आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं कि बच्चों के मन पर क्या गुजर रही है? वो परीक्षा के दौरान कितने टेंशन में रहते हैं। 2022 में 18 साल से कम उम्र के बच्चों ने खुदकुशी करके जान गंवाई है, उनकी संख्या 10,295 है। इनमें 5,588 लड़कियां और 4,616 लड़के थे। समाधान अभियान की प्रमुख अर्चना अग्निहोत्री कहती हैं कि 18 साल से कम उम्र की लड़कियां लड़कों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील होती हैं। एक तो आगे बढ़ने का अवसर मिलने पर उन पर सामाजिक दबाव भी ज्यादा होता है औ दूसरा यह है कि उनके शरीर में कई तरह के हॉर्मोनल बदलाव भी होते रहते हैं। ऐसे में उन्हें इस उम्र में शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा समस्याएं होती हैं। माता-पिता इस बात को अक्सर नजरअंदाज करते हैं, जो कई बार भारी पड़ जाता है। यही बात लड़कों के मामले में भी लागू होती है। मगर, चूंकि वह घर से बाहर जा पाते हैं, दोस्त बना लेते हैं और खेलकूद जैसी गतिविधियां लड़कियों के मुकाबले ज्यादा आसानी से कर पाते हैं तो उनमें सुसाइड की आशंका अपेक्षाकृत कम होती है।

अर्चना अग्निहोत्री बताती हैं कि हमें अपने बच्चों का अभिभावक बनने के बजाय उनका दोस्त बनना होगा। परीक्षा के दौरान आपको उनसे लगातार बात करनी होगी। उनके मूड को अच्छा बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। आप बच्चे के साथ कुछ समय के लिए खेल सकते हैं। कोई फिल्म दिखा सकते हैं। उनके पसंद की कोई रेसेपी बना सकते हैं। और सबसे बड़ी बात उनके दिमाग से यह बोझ हटाना होगा कि अगर परीक्षा में फेल हो गए तो भी टेंशन की कोई बात नहीं है। परीक्षा इतनी बड़ी चीज नहीं है। कैरियर हजारों हैं। ऐसी बातें करके परीक्षा का दबाव हल्का करना चाहिए। उनसे कभी परीक्षा के नंबरों पर बात नहीं करनी चाहिए।