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क्या वर्तमान की राजनीति में चल रहा है वोट जिहाद?

अब वर्तमान की राजनीति में वोट जिहाद चल रहा है! देश में चुनावी माहौल अपने चरम पर है। दो चरणों के चुनाव हो चुके हैं और तीसरे फेज के लिए प्रचार जोरों शोरों से चल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर खूब शब्दों के बाण छोड़ रहे हैं। चुनावी समर के बीच एक शब्द ने फिर सुर्खियां बंटोरनी शुरू कर दी हैं। नाम है जिहाद। यह ऐसा शब्द है जिसे किसी दूसरे शब्द के पीछे लगाकर उसकी परिभाषा गढ़ी जाती है। आपने अब तक लव जिहाद और लैंड जिहाद तो सुना होगा, लेकिन इस बार एक और शब्द की उत्पत्ति हुई है, नाम है ‘वोट जिहाद’। हर बार इस तरह की शब्दावली के लिए भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाए जाते थे, लेकिन इस बार यह शब्द कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद की भतीजी की ओर से उछाला गया है। भतीजी समाजवादी पार्टी में हैं और एक खास समुदाय के लोगों से वोट जिहाद करने की अपील कर रही हैं। उनके इस वीडियो के बाद देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। बीजेपी लगातार हमलावर है, विपक्ष ने एक बार फिर सत्तासीन पार्टी को एक मौका दे दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद की भतीजी मारिया आलम खान ने वोट जिहाद की अपील कर राजनीति में नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। मारिया आलम फर्रुखाबाद लोकसभा सीट के लिए चुनाव प्रचार करने पहुंची थीं। उन्होंने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संघी सरकार को हटाने के लिए बहुत अक्लमंदी के साथ एकजुट होकर, बहुत खामोशी से वोटों का जिहाद करो, क्योंकि हम सिर्फ वोटों का जिहाद कर सकते हैं। आरोप है कि मारिया ने यह बयान मुसलमानों को लामबंद करने के लिए कहा था। इससे वोटों का ध्रुवीकरण हो रहा है। इस बयान पर समाजवादी पार्टी बचाव कर रही है तो वहीं बीजेपी इसपर हमलावर है।

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से भी मारिया आलम के बयान पर प्रतिक्रिया मांगी गई लेकिन उन्होंने इससे किनारा कर लिया। उन्होंने बयान का बचाव करते हुए कहा कि कभी-कभी चुनाव में मतदाताओं को वोट देने के वास्ते उत्साहित करने के लिए भारी शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। अखिलेश ने आगे कहा कि मुझे लगता है कि मारिया आलम के बयान का मतलब वह नहीं था, जिसके लिए कार्रवाई शुरू की गई। इरादा यह था कि अधिक से अधिक संख्या में वोट पड़ें और सभी लोग मतदान करें।

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े ने कहा कि झूठ फैलाने वाले विपक्षी दलों ने अब ‘वोट जिहाद’ अभियान शुरू कर दिया है। इससे पता चलता है कि वे हताश और निराश हैं। तावड़े ने कहा कि एक तरफ वे ओबीसी का आरक्षण मुसलमानों को दे रहे हैं, दूसरी तरफ वे चुनाव के दौरान ‘वोट जिहाद’ की बात कर रहे हैं। तावड़े ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी नेता राहुल गांधी से पूछा कि क्या यह अभियान पार्टी आलाकमान के निर्देश पर शुरू किया गया है?

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि पिछले 24 घंटे में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सलमान खुर्शीद की भतीजी और समाजवादी पार्टी नेता मारिया आलम खान के दो ऐसे सांप्रदायिक बयान आए हैं, जो हमारे देश के कानून के साथ ही मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का भी उल्लंघन है। इंडी गठबंधन के नेताओं के बयान से साफ हो गया है कि घमंडिया गठबंधन लोकतंत्र के महापर्व के दौरान नफरत और जहर की खेती कर रहा है। ये हिंदुओं के खिलाफ वोट के जिहाद की बात कर रहे हैं। भाटिया ने कहा कि एक तरफ ये कहते हैं कि मुसलमानों एकजुट होकर वोट जिहाद कर दो और दूसरी तरफ कांग्रेस के रिमोट कंट्रोल अध्यक्ष खरगे हिंदुओं को बांटने और भगवान शिव को भगवान राम से लड़ाने की बात कर रहे हैं। SP मुखिया अखिलेश यादव भी वोट जिहाद के बयान की आलोचना नहीं कर रहे हैं। इससे स्पष्ट हो गया है कि उनके पीडीए का मतलब ‘प्रहार धर्म और आस्था पर’ है। बीजेपी प्रवक्ता ने इसे विचारधारा की लड़ाई बताते हुए कहा कि विपक्षी गठबंधन की सोच ही संविधान विरोधी और तालिबानी है।

वोट जिहाद को समझने से पहले आपको जिहाद शब्द को समझना होगा। जिहाद का शाब्दिक अर्थ होता है किसी काम को पूरा करने के लिए पूरा जोर लगाना। राजनीति में इसका उपयोग वोटों के ध्रुवीकरण के लिए होता है। मारिया आलम खान के वोट जिहाद का मतलब है कि एक खास समुदाय के लोग जोर लगाकर ऐसी वोटिंग करें जिससे सत्ता में बैठी मोदी सरकार हार जाए। इस शब्द का यह मतलब भी है कि मुसलमान बीजेपी उम्मीदवारों और उनकी जनसभाओं का बहिष्कार करें। उनके इस बयान पर केस भी दर्ज हो गया है।

यह साल 2017 में उछाला गया था। इसका मतलब था कि एक खास समुदाय के लोग हिंदू बहुल क्षेत्रों में बसने और वहां मस्जिद या मदरसे का निर्माण कराते हैं। उत्तराखंड में लोगों ने आरोप लगाया था कि उनके घरों, जमीनों में एक विशेष समुदाय के लोग कब्जा कर रहे हैं। तभी से यह टर्म लोगों के बीच चर्चा में आया था।

जब नागों से डरा सिकंदर!

एक समय ऐसा था जब सिकंदर नागों से डर गया था! सिकंदर महान जब दुनिया जीतने निकला तो उसके साथ सेनाएं और यूनानी दार्शनिक, इतिहासकार और भूगोलवेत्ता भी गए। इसी में से एक था स्ट्रैबो। यूनान का महान दार्शनिक और भूगोलवेत्ता स्ट्रैबो ने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है कि जब सिकंदर पांच नदियों वाले इलाके यानी पंजाब क्षेत्र में पहुंचा तो वहां पर उसका सामना बड़े-बड़े सांपों से हुआ। सिकंदर सेनापति नियार्कस तरह-तरह के सांपों को देखकर हैरान रह गया। इस वजह से यहां के लोग जमीन से काफी ऊंचाई पर रहते थे। उस वक्त दक्षिण-पश्चिम के पहाड़ी कश्मीर क्षेत्र के राजा अभिसार के पास 80 और 140 फीट के दो विशालकाय नाग रहते थे। वह उन्हें कभी-कभी दरबार में भी लेकर आता था। भारत में तब गुफाओं में रहने वाले बड़े-बड़े सांपों को कोई परेशान नहीं करता था। उन्हें पवित्र माना जाता था और वो गुफाओं में रहा करते थे। इन सभी नागों को वासुकी ही कहा जाता था, क्योंकि ये वासुकी के वंशज माने जाते हैं। जब सिकंदर की सेना इन गुफाओं के पास से गुजरी तो ये नाग उन सेना के कदमों की आवाज सुनकर बेहद नाराज हुए। उन्होंने गुस्से में आकर एकसाथ इतनी तेज फुफकार भरी कि हर कोई डर गया और वहां से सेना भाग खड़ी हुई। वासुकी के वंशज 70 फीट लंबे नागों ने गुफा से बाहर केवल सिर ही निकाला था और लोग सहम गए थे। यह जिक्र जेएच वोगेल की किताब इंडियन सरपेंट-लोर में किया गया है। जेम्स फरग्यूसन ने अपने ग्रंथ ट्री एंड सरपेंट वर्शिप (1868) में लिखा है कि नागों को पूजने वाले सपेरे उत्तर भारत में रहा करते थे। भारतीय सेना में ब्रिगेड सर्जन रहे डॉ. सीएफ ओल्डहैम ने लिखा है कि नागों का प्रमुख शहर तक्षशिला हुआ करता था। एक भारतीय राजा जन्मेजय ने तक्षशिला पर कब्जा कर लिया था। उसने हजारों नागों को जिंदा जला दिया था। जन्मेजय की यह कहानी महाभारत में है।

दरअसल, हाल ही में गुजरात के पैनान्ध्रो लिग्नाइट खदान में सांप के जीवाश्म खोजे गए हैं। ये अवशेष दुनिया में अब तक के सबसे बड़े जीवित सांपों में से एक है। इस नाग की लंबाई 15 मीटर थी, जो डायनासोर टी-रेक्स से भी लंबा था। ये नाग 5 करोड़ साल पहले धरती पर रहता था। ये इतना विशाल था कि एनाकोंडा जैसे बड़े-बड़े अजगर भी इसके आगे बौने नजर आते थे। वैज्ञानिकों ने खोजे गए इस सांप को वासुकी इंडिकस नाम दिया है। हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक वासुकी भगवान शिव के गले में मौजूद सांप का नाम है। इसका जीनस नाम हिंदू धर्म में नागों के पौराणिक राजा वासुकी से लिया गया है।

शशांक शेखर पांडा की किताब नागाज इन द स्कल्पचरल डेकोरेशंस ऑफ अर्ली वेस्ट ओडिशन टेंपल्स में लिखा है कि नागों का जिक्र सबसे पहले महाभारत और वाराह पुराण में मिलता है, जो पाताललोक में रहते थे। वाराह पुराण के अनुसार, ऋषि कश्यप के सात पुत्र थे, जिन्हें वासुकी, तक्षक, करकोटका, पदम, महापदम, शंखपाला और कूलिका। मायाशिल्प में कहा गया है कि वासुकी नाग का रंग मोतियों की तरह सुनहरा सफेद था। वहीं तक्षक का रंग लाल था और उसके फन पर स्वस्तिक का निशान था। करकोटा का रंग काला और उसके फन पर तीन सफेद धारियां थी। पदम का रंग गुलाबी था, जबकि महापदम का रंग सफेद था। उसके फन पर त्रिशूल का निशान था। शंखपाला का रंग पीला और कूलिका का रंग लाल था। महाभारत में कहा गया है कि वासुकी समेत ये नाग महर्षि कश्यप और कद्रु की संतान थे। महाभारत में कहा गया है कि हजारों की संख्या में नाग भोगवतीपुर में रहा करते थे। वासुकी की पत्नी शतशीर्षा थी। नागधन्वातीर्थ में देवताओं ने वासुकी को नागराज बनाया था। मान्यता है कि नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था।

ऐसी मान्यता है कि वासुकी शिव के परम भक्त हैं और उनका निवास स्थान भगवान शिव का शरीर ही है। 17वीं सदी की किताब शिल्परत्न में कहा गया है कि नाग आधे इंसान और आधे सांप जैसे हुआ करते थे। शरीर का निचला हिस्सा सांप जैसा था, जबकि ऊपरी हिस्सा इंसानों जैसा। नागों के 1 से लेकर 9 सिर होते थे। मत्स्य पुराण में भी नागों का वर्णन है। हड़प्पा सभ्यता में भी नागों के चित्र बने हुए हैं। मिट्टी की कई नाग आकृतियां मिली हैं। इसमें बिहार के एक पुरातात्विक स्थल चिरांद से हैं। पांच सिर वाले नाग की मूर्ति भरहुत से मिली है। नागों को शिव से जोड़ा जाता है। आज भी कई मंदिरों में शिवलिंग के साथ या शिव के साथ नाग की आकृति लिपटी हुई दिखाई दे जाती है।

दिल्ली में आचार्य पंडित विनोद शास्त्री के अनुसार, एक बार भगवान शिव को अपनी आंतरिक शक्ति से पता चला कि नागवंश का नाश होने वाला है, तब शिव और माता पार्वती ने अपनी पुत्री मनसा का विवाह जरत्कारू के साथ कर दिया। इनके पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के नागयज्ञ के समय नागों की रक्षा की। समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने मंदराचल पर्वत को बांधने के लिए रस्सी का काम किया था, जिससे लक्ष्मी समेत कई तरह के रत्न निकले। त्रिपुरदाह के समय नाग वासुकी शिव के धनुष की डोर बन गए थे। वासुकी के बड़े भाई शेषनाग हैं जो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं और उनके लिए आरामदेह बिस्तर बन जाते हैं। 1000 नागों में शेषनाग सबसे बड़े भाई हैं, जबकि दूसरे स्थान पर वासुकी और तीसरे स्थान पर तक्षक हैं।

महाभारत के अनुसार, पांडवों के पौत्र राजा परीक्षित एक बार शिकार खेलते हुए शमीक ऋषि के आश्रम में चले गए थे। ऋषि उस वक्त ध्यान में लीन थे। इस पर परीक्षित ने गुस्से में ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया। जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यह बात मालूम चली तो उन्होंने परीक्षित को यह श्राप दिया कि उनकी सात दिन के भीतर तक्षक नाग के काटने से मृत्यु हो जाएगी। राजा परीक्षित को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने भागवत कथा सुननी शुरू कर दी। सातवें दिन तक्षक नाग ने उन्हें डस लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए परीक्षित के बेटे जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया। इस यज्ञ में सभी सांप आकर गिरने लगे थे। ऐसे में वासुकी नाग ने अपनी बहन जरत्कारु से नागों की रक्षा का निवेदन किया। तब जरत्कारू ने अपने ज्ञानी पुत्र आस्तिक को नागों को बचाने का जिम्मा सौंपा। आस्तिक ने अग्नि की पूजा की और जनमेजय से यज्ञ की आहुतियों को रोकने को कहा। इससे वासुकी और तक्षक यज्ञ में भस्म होने से बच गए।

क्या पाकिस्तान की मदद से भारत को घेरेगा चीन?

चीन और पाकिस्तान की मदद से भारत को घेर सकता है! जम्मू-कश्मीर में एक खूबसूरत सी जगह है शक्सगाम घाटी। भारत का स्विट्जरलैंड मानी जाने वाली इस घाटी को ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट भी कहा जाता है। शक्सगाम वैली अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में है। इसी घाटी के 5,180 वर्ग किलोमीटर के भारतीय इलाके को पाकिस्तान ने 1963 में एक समझौते के तहत गैरकानूनी तरीके से चीन को दे दिया था। भारत बीते छह दशक से लद्दाख में भारतीय इलाके की 38,000 वर्ग किमी जमीन पर चीन के अवैध कब्जे का विरोध भी करता रहा है। इस समझौते को चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता भी कहा जाता है। हाल ही में भारत ने शक्सगाम घाटी में सड़क बनाने की कोशिशों का चीन के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया है। एक अंग्रेज केनेथ मैसन की किताब’एक्सप्लोरेशन ऑफ द शक्सगाम वैली एंड आघिल रेंजेज, 1926′ में लिखा गया है कि सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से मेजर मैसन हिमालयी क्षेत्र का सर्वे करने पहुंचे थे। 1918 में उन्होंने बताया कि पामीर का पठार रूस को जोड़ने का एक रास्ता है। मैसन ने ही शक्सगाम के बारे में भी जिक्र किया है, जो काराकोरम इलाके में है। उन्होंने बताया कि यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। काराकोरम नाम वैसे तो तुर्की भाषा का है, जिसका मतलब है काले कंकड़ का इलाका। इसके बाद सर मार्टिन कोनवे ने अपनी किताब ‘क्लाइमबिंग इन द हिमालयाज’ में भी शक्सगाम वैली के बारे में बताया है। वहीं कर्नल वुड ने इस इलाके के बारे में बताया है कि यहां पर ईस्टर्न काराकोरम और अपर यारकंद वैली है। इसके बाद अंग्रेज एक्सप्लोरर विलियम मूरक्रॉफ्ट ने 1820 से 22 तक लेह का दौरा किया, जिसमें उन्होंने शक्सगाम को भारतीय हिस्से में बताया था।

डिफेंस एंड स्ट्रेटेजिक अफेयर्स एनालिस्ट ले.कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, ड्रैगन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के जरिए दोहरी रणनीति अपना रहा है। एक तो वह आर्थिक रूप से खुद को मजबूत कर रहा है और दूसरा भारत जैसे देशों पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है। वह एक तरह से भविष्य में होने वाली जंग के लिए खुद को तैयार कर रहा है। शक्सगाम घाटी ही वह रास्ता है, जहां से चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच से लेकर अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशिया तक पहुंच बनाना चाहता है। इससे वह अपने प्रतिद्वंद्वी देश भारत को भी घेर सकता है।

द फॉरगाटन फैक्ट ऑफ चाइना आक्यूपाईड कश्मीर’ के लेखक सुजन आर चिनॉय लिखते हैं कि चीन ने काराकोरम इलाके में अपनी पैठ 1750 के दशक से ही जमानी शुरू कर दी थी। उस समय चीन में क्विंग साम्राज्य के चौथे राजा कियान लौंग थे। तब चीन ने यह दावा किया था कि पामीर के पठार से सटे कुनलुन रेंज से गुजरने वाला काराकोरम दर्रे के पूर्वी हिस्से को मंचाऊ साम्राज्य ने 1759 में ही शामिल कर लिया था। उस वक्त के चीन के ऐतिहासिक नक्शे में यारकंद के निचले हिस्से और शक्सगाम से निकलने वाली नदियों को ही दर्शाया गया था। 1890 के पहले तक शक्सगाम वैली को लेकर चीन ने कोई दावा नहीं किया था और न ही शिनजियांग प्रांत के हिस्से में अक्साई चिन को ही दिखाया गया था।

ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से अंग्रेज एक्सप्लोरर विलियम मूरक्रॉफ्ट, ब्रिटिश डिप्लोमैट नेई एलियास और ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर फ्रांसिस ई यंगहसबैंड ने पूरे हिमालय क्षेत्र की यात्राएं कीं। उन्होंने 1879-80 में काराकोरम से लेकर तिब्बत और मध्य एशिया तक की यात्राएं कीं। उन्होंने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है कि 1889-90 में हुंजा, जिसे कंजुत भी कहा जाता था, एक स्वतंत्र राज्य था। उस वक्त पहली बार चीन ने हुंजा के मीर इलाके पर अपना दावा किया। चीन ने 1865 में कश्मीर के महाराजा रणजीत सिंह के बनाए किले शाहिदुल्लाह पर अपना कब्जा जमा लिया। यह किला काराकश नदी और रसकम नदी के बीच में स्थित था। मीर हुंजा में किरगिज, ईरानी और तुरानी मूल के लोग खेती करते थे और चीन के अफसर रसकम और शक्सगाम वैली में रहने वाले लोगों से जबरन टैक्स वसूलते थे। धीरे-धीरे हुंजा पर चीन अपना अधिकार जताने लगा।

1891 में महाराणा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों की मदद से मीर को हराकर हुंजा को अपने राज्य का एक हिस्सा बना लिया। बस यहीं पर अंग्रेज चीन की चाल को समझने में चूक गए। उस समय रूस पूरी दुनिया में आक्रामक रूप से आगे बढ़ रहा था। भारत की ब्रिटिश सरकार को भी लगा कि कहीं रूस उनके भारतीय उपनिवेश पर कब्जा न कर ले। ऐसे में उन्होंने चीन को कुन लुन और काराकोरम माउंटेन रेंज के बीच पांव पसारने का न्यौता दे दिया। अंग्रेजों ने चीन को तो एक किराएदार की तरह बुलाया था, मगर वह धीरे-धीरे ट्रांस काराकोरम इलाके का खुद को मालिक मानने लगा। यह इनपुट ब्रिटिश भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन के पास पहुंचा तो उन्होंने लिखा-अगर हम चीन को उस इलाके में मजबूत बनाते हैं तो एक दिन वह काशगर-यारकंद इलाके में पूरा कब्जा कर लेगा। यहां तक कि कश्मीर के महाराजा ने जब चीनियों के शाहिदुल्लाह किले का ढहाने की शिकायत की तो अंग्रेजों ने इस पर ध्यान नहीं दिया और अक्टूबर, 1892 में चीन ने काराकोरम दर्रे के पास एक बॉर्डर पिलर लगा दिया। रसकम वैली में चीन की मौजूदगी अंग्रेजों की गलत नीतियों का नतीजा रही। हालांकि, इसके बाद भी भारत की आजादी के बाद भी शक्सगाम वैली पर चीन ने कभी दावा नहीं किया था।

1963 के इस समझौते का अनुच्छेद 6 कहता है कि कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच है। इसी समझौते के अनुच्छेद 2 के तहत चीन ने इस इलाके में अपने दखल को बढ़ाया है। 1948 से पहले जम्मू और कश्मीर राज्य का हिस्सा था। 1948 के युद्ध के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर के कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया, जिसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) कहा जाता है। 1963 के सीमा समझौते में शक्सगाम इलाके को चीन का देने के पीछे पाकिस्तान की दलील थी कि इससे पाकिस्तान और चीन की दोस्ती और मजबूत होगी। पाकिस्तान का कहना था कि ऐतिहासिक रूप से इस इलाके में कभी इंटरनेशनल बॉर्डर तय ही नहीं था, ऐसे में इस जमीन को चीन के हवाले करने से पाकिस्तान का कोई नुकसान नहीं हुआ। वहीं, भारत शक्सगाम को हमेशा से अपना हिस्सा बताता है। उसके अनुसार, शक्सगाम का यह पूरा इलाका भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य का अभिन्न हिस्सा है।

क्या वर्तमान में रायबरेली बन गया है कांग्रेस का आखिरी किला?

वर्तमान में रायबरेली कांग्रेस का आखिरी किला बन गया है! लोकसभा चुनाव 2024 में वैसे तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी पहले ही वायनाड से चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके थे। लेकिन सबके जेहन में एक ही सवाल था कि क्या राहुल गांधी अमेठी वापस लौटेंगे? कांग्रेस में लंबे समय के इंतजार के बाद आखिरकार फैसला हो गया है। राहुल गांधी यूपी लौट आए हैं लेकिन अब वो अमेठी नहीं रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। रायबरेली से उनकी मां सोनिया गांधी लगातार सांसद रहीं और अब उन्होंने राज्यसभा में जाने का फैसला कर लिया है। वहीं अमेठी सीट को लेकर गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले केएल शर्मा को टिकट दिया गया है। जानकार मानते हैं कि अमेठी छाेड़ रायबरेली चुनने का अहम कारण सोनिया की लगातार जीत में छिपा है। 2019 के चुनाव में भले ही राहुल गांधी अमेठी हार गए हों लेकिन साेनिया गांधी ने रायबरेली में परिवार का झंडा बुलंद रखा था। यूपी में कांग्रेस की ये एकमात्र जीत थी। 2019 के लोकसभा चुनाव रिजल्ट पर नजर डाल लें तो बात ज्यादा समझ में आ जाती है। इस चुनाव में सोनिया गांधी ने रायबरेली से आसान जीत दर्ज की थी। हालांकि पिछले चुनावों की तुलना में उनका जीत का अंतर कम जरूर हो गया था। इस चुनाव में सोनिया गांधी ने करीब 56.41 प्रतिशत के साथ 5 लाख 34918 वोट हासिल किए। वहीं भाजपा से दिनेश प्रताप सिंह काफी कोशिश के बाद ही 38.78 प्रतिशत यानी 3 लाख 67,740 वोट ही हासिल कर सके थे। इससे पहले सोनिया गांधी ने महज 33 प्रतिशत वोट हासिल कर भाजपा के अजय अग्रवाल को करीब 3 लाख वोटों से मात दी थी। उस चुनाव में सोनिया गांधी को 5 लाख से ज्यादा वोट मिले थे, जबकि अजय अग्रवाल 1 लाख 73 हजार के करीब वोट ही हासिल कर सके थे। इससे जाहिर है कि 2014 से 2019 के बीच पांच साल में भाजपा ने यहां काफी मेहनत की। जिस पार्टी को 2014 के चुनाव में महज 10.89 प्रतिशत वोट मिले थे, उसी पार्टी ने दिनेश प्रताप सिंह की अगुवाई में 38.78 प्रतिशत वोट तक का सफर तय कर लिया।

खास बात ये है कि दिनेश प्रताप सिंह इस बार भी चुनाव मैदान में हैं। मोटे तौर पर देखें तो रायबरेली सीट गांधी परिवार का गढ़ ही कहा जाएगा। लेकिन करीब से देखें तो यहां भगवा (भाजपा) भी अपनी छाप छोड़ता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने संगठन से लेकर चुनाव स्तर तक रायबरेली में काफी मेहनत की है। पहले दिनेश प्रताप सिंह के बारे में जान लेते हैं। दिनेश प्रताप सिंह पुराने कांग्रेसी नेता हैं। कभी सोनिया गांधी के करीबियों में शुमार थे। 2010 में वह कांग्रेस से पहली बार विधान परिषद सदस्य बने थे। फिर 2016 में भी कांग्रेस ने उन्हें एमएलसी बनाया। लेकिन 2017 में यूपी में योगी सरकार आने के बाद सियासी गणित बदल गई। विधानसभा में प्रचंड जीत हासिल करने के फौरन बाद से ही भाजपा ने रायबरेली में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। इसी क्रम में दिनेश प्रताप सिंह 2018 में कांग्रेस का दामन छोड़ भाजपा का साथ हो लिए।

फिर 2019 में सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर दिनेश प्रताप सिंह ने भाजपा को मजबूती दी। रायबरेली में दिनेश प्रताप सिंह के परिवार का पंचवटी आवास खासा चर्चा में रहता है। दिनेश के भाई राकेश और परिवार के अन्य सदस्य की यहां की राजनीति में अच्छी दखल रही। एक समय में घर में ही एमएलसी, विधायक, ब्लाक प्रमुख से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष रहे।

लेकिन 2018 में दिनेश के भाजपा चले जाने के बाद से साख थोड़ी कम होती दिखी। 2019 में लोकसभा चुनाव में दिनेश की हार और फिर 2022 के विधानसभा चुनाव में दिनेश के भाई राकेश सिंह की हरचंदपुर सीट से हार ने इस बात को और बल दे दिया कि रायबरेली की राजनीति में पंचवटी का प्रभाव कम हो रहा है। लेकिन फिर भाजपा ने दिनेश प्रताप सिंह को 2022 में ही विधान परिषद भेज दिया। यही नहीं यूपी में योगी सरकार 2.0 में उन्हें स्वतंत्र प्रभार का मंत्री बनाकर स्पष्ट संदेश दे दिया गया।

2022 के विधानसभा चुनाव परिणाम पर नजर डालें तो अदिति सिंह ने भाजपा से चुनाव लड़ा और आराम से रायबरेली सदर की सीट पर जीत दर्ज कर ली। इसके अलावा रायबरेली की 4 अन्य विधानसभा सीटें बछरावां, हरचंदपुर, सलोन, सरेनी और ऊंचाहार में समाजवादी पार्टी की जीत हुई।इसमें बछरावां में सपा के श्याम सुंदर, हरचंदपुर में राहुल राजपूत, सरेनी में देवेंद्र प्रताप सिंह और ऊंचाहार में मनोज पांडेय विजयी रहे। सलोन सीट पर भाजपा के अशोक कुमार ने जीत दर्ज की। हालांकि ये विधानसभा क्षेत्र लोकसभा चुनाव में अमेठी में आता है।जाहिर है राहुल गांधी की जीत में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को विशेष जोर लगाना होगा। लेकिन इसमें भी एक ट्विस्ट है।

भाजपा भले ही पूरी रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है लेकिन उसे राहुल ही नहीं गांधी परिवार के रुतबे से भी मुकाबला करना होगा। ये वो सीट है जिसे पूरा गांधी परिवार दशकों से जुड़ा रहा है। गांधी परिवार के मैदान में उतरते ही यहां जाति का फैक्टर गायब हो जाता है। 1957 से रायबरेली सीट अस्तित्व में आई। इससे पहले 1952 के चुनाव में रायबरेली और प्रतापगढ़ दोनों जिले मिलाकर एक सीट हुआ करती थी। तब यहां से इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी चुनाव जीते थे। फिर रायबरेली सीट बनने के बाद भी फिरोज गांधी दूसरी बार जीत दर्ज कर संसद पहुंचे। फिर 1967 में इंदिरा गांधी ने इसी सीट से पहली बाार चुनाव लड़ा और इसके बाद 1971, 1977 और 1980 तक चुनाव लड़ा। इसमें 1971 का चुनाव विवादित रहा। इस चुनाव को कोर्ट ने रद कर दिया।

1980 में इंदिरा गांधी ने मेंडक सीट अपनी पास रखी और रायबरेली छोड़ दी। यहां उपचुनाव में अरुण नेहरू कांग्रेस से जीते। 1984 में भी अरुण नेहरू ही जीते। फिर 1989 और 1991 में शीला कौल और फिर 1996 व 1998 में भाजपा ने यहां जीत दर्ज की। 1999 में रायबरेली फिर कांग्रेस के पास आ गई। इस बार कैप्टन सतीश शर्मा ने यहां से जीत दर्ज की फिर 2004, 2009, 2014 और 2019 तक सोनिया गाधी लगातार सांसद रहीं। अब उन्होंने अपनी विरासत राहुल गांधी को सौंपी है।

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को क्यों कहा पिंजरे का तोता?

एक समय ऐसा था जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा था! कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आए ही थे। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया था। वह जीत के जश्‍न में झूम रही थी। तभी सुप्रीम कोर्ट ने कोयला घोटाले में तल्‍ख टिप्‍पणी कर उसका पूरा नशा उतार दिया था। कोयला घोटाले की सुनवाई के दौरान उसने सरकार को जमकर फटकार लगाई थी। सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट देखने पर अदालत तमतमा गई थी। स्टेटस रिपोर्ट में सरकार की ओर से किए गए बदलाव से उसका भाव ही बदल गया था। यूपीए का दूसरा कार्यकाल था और अश्विनी कुमार थे कानून मंत्री। उनके कहने पर ही स्‍टेटस रिपोर्ट में बदलाव किया गया था। कोर्ट इस बात से इतना नाराज हुआ था कि उसे सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता तक कहना पड़ गया था। अश्विनी कुमार ने मंगलवार को कांग्रेस से इस्‍तीफा दे द‍िया। तब सीबीआई ने कोर्ट में एक हलफनामा सौंपा था। इसमें केंद्रीय जांच एजेंसी ने बताया था कि कोयला घोटाले की पड़ताल कर रही स्‍क्रीनिंग कमेटी ने कुछ चार्ट बनाए थे। अश्विनी कुमार ने इन्‍हें हटवा दिया था। उन्‍होंने जांच के संबंध में कुछ वाक्‍यों को भी बदलवाया था। कोलगेट घोटाले में जांच पर सौंपे गए सीबीआई के हलफनामे को पढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट बुरी तरह से नाराज हो गया था। उसने कहा था कि सरकार के सुझाव पर सीबीआई ने घोटाले की रिपोर्ट का सार बदला। तब रंजीत सिन्‍हा सीबीआई के डायरेक्‍टर थे। स्टेटस रिपोर्ट में कानून मंत्री अश्विनी कुमार और अन्य अधिकारियों की ओर से बदलाव किए जाने से सुप्रीम कोर्ट बहुत नाराज हो गया था। गुस्‍से में उसने कहा था कि सीबीआई का काम जांच करना है न कि अलग-अलग मंत्रालयों में जाकर रिपोर्ट दिखाना। कोर्ट ने सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। जस्टिस आरएम लोढ़ा की अगुआई वाली बेंच इस केस की सुनवाई कर रही थी। उसने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता तक कह डाला था। बेंच ने कहा था कि सीबीआई डायरेक्टर के हलफनामे से साबित होता है कि उसके कई मालिक हैं और वह सबसे आदेश लेती है।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा तब कहा था कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोते की तरह है और वही दोहराती है, जो उसके मालिक कहते हैं। अदालत ने पूछा था कि सरकार बताए कि वो सीबीआई की आजादी सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाएगी? कोर्ट ने तब कोयला घोटाले के जांच अधिकारी उप-महानिरीक्षक (डीआईजी) रवि कांत मिश्रा को आईबी से वापस सीबीआई में भेजने के लिए केंद्र से तुरंत कदम उठाने को भी कहा था। कोर्ट ने आदेश दिया था कि कोयला घोटाले की जांच कर रहे अधिकारी बाहर के किसी आदमी को रिपोर्ट नहीं कर सकते। न मंत्री, न अफसर और न ही सरकारी वकील रिपोर्ट देख सकते हैं।

पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने पंजाब विधानसभा चुनाव से कुछ दिन पहले मंगलवार को कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सुबह इस्तीफा भेजा। उन्‍होंने कहा कि वो पार्टी से बाहर रहकर देश के लिए बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं। उन्होंने अपने इस्‍तीफे में कहा, ‘मैं 46 साल के लंबे जुड़ाव के बाद पार्टी से अलग हो रहा हूं। आशा करता हूं कि ऐसे परिवर्तनकारी नेतृत्व से प्रेरित होकर जनता के लिए अतिसक्रियता से काम करता रहूंगा जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की ओर से दी गई उदारवादी लोकतंत्र की उच्च प्रतिबद्धता की परिकल्पना आधारित हो।’ उन्होंने अतीत में मिली जिम्मेदारियों के लिए कांग्रेस अध्यक्ष का आभार प्रकट किया और उनकी अच्छी सेहत की कामना की।

वरिष्ठ वकील मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार में कानून मंत्री थे। वह 2002 से 2016 तक तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे। वह अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल भी रह चुके हैं। कुमार ने पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए 20 फरवरी को होने वाले मतदान से कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस से इस्तीफा दिया है। इससे पहले 25 जनवरी को पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। अश्विनी कुमार का नाम अभी अब कांग्रेस छोड़ने वाले उन प्रमुख नेताओं की फेहरिस्त में जुड़ गया है जो कभी कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका में माने जाते थे। इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो गए तो लुईजिन्हो फलेरियो, सुष्मिता देव और अशोक तंवर जैसे कुछ नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया।

क्या भारत में स्वतंत्र नहीं है सीबीआई?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सीबीआई भारत में स्वतंत्र है या नहीं! केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है। अब यह सिलसिला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से शिकायत की है कि सीबीआई उसकी आम सहमति के बिना राज्य के मामलों में जांच आगे बढ़ा रही है। प. बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि चूंकि प्रदेश ने पहले ही सीबीआई को दी गई आम सहमति वापस ले ली, इसलिए उसके पास अब राज्य सरकार की अनुमति लिए बिना जांच का अधिकार नहीं रह गया है। ममता सरकार ने अपनी शिकायत में साफ तौर पर आरोप लगाया है कि दरअसल सीबीआई केंद्र सरकार का मुखौटा है। एजेंसी सिर्फ और सिर्फ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के इशारे पर काम कर रही है और ऐसी प्रवृत्तियों पर रोक लगनी चाहिए। केंद्र सरकार ने इस शिकायत को पूरी तरह निराधार बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा कि प. बंगाल की याचिका को तुरंत खारिज किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में जारी इस बहस ने सीबीआई की स्वायत्तता को लेकर दशकों पुराने प्रश्न को फिर से सामने खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह कि क्या सीबीआई आज भी पिंजड़े बंद वह तोता है जिसे केंद्र सरकार अपने इशारे पर नचाती है? केंद्र की बीजेपी नीत एनडीए सरकार का तो कहना है कि सीबीआई पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। यूपीए सरकार के दौर में यही बीजेपी सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कहा करती थी। 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोता बता दिया तो बीजेपी ने सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर यूपी सरकार पर हमला बढ़ा दिया। लेकिन जब बीजेपी सत्ता में आई और कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा तो दोनों के नैरेटिव उलट हो गए। तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने 3 अप्रैल, 2022 को कहा कि सीबीआई अब ‘पिंजरे में बंद तोता’ नहीं है और देश की शीर्ष अपराधिक जांच एजेंसी के रूप में अपना कर्तव्य निभा रही है।

तब रिजिजू ने ट्वीट कर सीबीआई के जांच अधिकारियों के पहले सम्मेलन में एक दिन पहले दिए गए अपने संबोधन का एक छोटा वीडियो भी साझा किया। रिजिजू ने अपने संबोधन में कहा, ‘मुझे अच्छी तरह याद है कि एक समय था, जब सरकार में बैठे लोग कभी-कभी जांच में बाधा बन जाते थे।’ उन्होंने कहा कि आज एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में मुख्य भूमिका निभा रहा है। हालांकि, एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के पाला बदलकर एनडीए एनडीए घटक दल में शामिल होने के आठ महीने बाद सीबीआई ने उनके खिलाफ मामलों की क्लोजर रिपोर्ट फाइल की तो विपक्ष ने इसे केंद्र सरकार का कदम ही बताया।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में प. बंगाल के वकील कपिल सिब्बल की दलील है कि अगर सीबीआई स्वायत्त संस्था है तो फिर संसद में उससे जुड़े सवालों के जवाब केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के राज्य मंत्री देते हैं। उधर, मामले में केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘सीबीआई भारत सरकार के नियंत्रण में नहीं है।’ मेहता ने कहा कि सीबीआई की निगरानी का हक भारत सरकार के पास नहीं है। उन्होंने कहा, ‘केंद्र न तो अपराध के रजिस्ट्रेशन की निगरानी कर सकता हूं, न ही जांच की निगरानी कर सकता हूं और न ही यह निगरानी कर सकता हूं कि वह मामला कैसे बंद करेगी, या आरोप पत्र कैसे दाखिल करेगी, दोषसिद्धि कैसे होगी या दोषमुक्ति कैसे होगी।’

सॉलिसिटर जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि भारत सरकार ने कोई केस दर्ज नहीं किया है बल्कि सीबीआई ने किया है।’ उन्होंने कहा कि प. बंगाल ने याचिका में जिन मामलों का उल्लेख किया है, उनमें वे मामले भी शामिल हैं जिन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट ने दर्ज करने का आदेश दिया था। सिब्बल ने मेहता की दलील का विरोध किया और कहा कि उन्होंने कहा कि जब राज्य ने अपनी सहमति वापस ले ले तो सीबीआई राज्य में प्रवेश कर जांच नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि जब किसी राज्य में सीबीआई आती है तो वहां ईडी भी आ जाती है और इसका देश की राजनीति पर बड़ा असर पड़ता है। सिब्बल ने कहा कि सीबीआई कोई वैधानिक प्राधिकरण नहीं है और यह एक जांच एजेंसी है।

इस पर जजों की बेंच ने पूछा, ‘इसे वैधानिक प्राधिकरण क्यों नहीं माना जा सकता?’ जवाब में सिब्बल ने कहा, ‘सीबीआई सरकार की जांच शाखा है।’ उन्होंने डीएसपीई अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख किया जिसमें विशेष पुलिस प्रतिष्ठानों के संचालन और प्रशासन से संबंधित धारा 4 भी शामिल है। सिब्बल ने कहा, ‘भारत संघ के प्रशासनिक ढांचे में पुलिस प्रतिष्ठान की देखरेख कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पास है।’ सिब्बल ने कहा कि जब संसद में सीबीआई के बारे में सवाल पूछा जाता है तो इसका जवाब कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के राज्य मंत्री देते हैं।

दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र के खिलाफ शीर्ष अदालत में एक मूल मुकदमा दायर किया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि सीबीआई प्राथमिकी दर्ज कर रही है और अपनी जांच आगे बढ़ा रही है जबकि राज्य ने अपने अधिकार क्षेत्र में संघीय एजेंसी को मामलों की जांच के लिए दी गई आम सहमति वापस ले ली है। पश्चिम बंगाल सरकार ने सीबीआई को जांच करने अथवा राज्य में छापे मारने के संबंध में दी गई आम सहमति 16 नवंबर, 2018 को वापस ले ली थी। अनुच्छेद 131 केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद में उच्चतम न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। एसजी तुषार मेहता ने जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को बताया कि संविधान का अनुच्छेद 131 सर्वोच्च न्यायालय को प्रदत्त ‘सर्वाधिक पवित्र अधिकार क्षेत्र में से एक’ है और इस प्रावधान के दुरुपयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती।

आखिर भारत के प्रति क्या विचार रखता है अमेरिका?

आज हम आपको बताएंगे कि भारत के प्रति अमेरिका क्या विचार रखता है! यह जैसे एक रवायत हो गई है। अमेरिकी सरकार का एक आयोग हर वर्ष दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक आजादी पर एक रिपोर्ट जारी करता है और उसमें भारत की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है। जवाब में भारत उसकी जमकर लताड़ लगाता है और उसकी खामियां गिनवाता है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी अमेरिकी आयोग (USCIRF) की इस वर्ष की रिपोर्ट भी आ गई। इसमें भारत को उन 17 देशों की लिस्ट में रखा गया है, जिन्हें धार्मिक आजादी के कथित उल्लंघन की वजह से खास चिंता वाला देश चिह्नित किया गया। स्वाभाविक है कि भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में हुईं गलतियां गिनाई जाएं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही किया। उन्होंने बेलाग-लपेट कहा कि अमेरिकी आयोग राजनीतिक अजेंडे के तहत पक्षपात करने के लिए कुख्यात है। जयसवाल ने कहा कि यह राजनीति अजेंडे वाली एक पक्षपाती संस्था के तौर पर जाना जाता है। इस कारण उन्हें इस मामले में अमेरिकी कमीशन से कोई खास उम्मीदें नहीं हैं कि वह भारत की विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने की कोशिश करेगा। जयसवाल ने भारत में आम चुनावों के वक्त ऐसी रिपोर्ट जारी करने के पीछे की विशेष मंशा पर भी सवाल उठाया। उन्होंने साफ कहा कि इस रिपोर्ट के जरिए दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश कभी सफल नहीं होगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोटूक कहा कि अमेरिकी आयोग में बैठे लोग इस रिपोर्ट के बहाने भारत के खिलाफ अपना दुष्प्रचार करते रहते हैं। अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट में बीजेपी पर ‘भेदभावपूर्ण राष्ट्रवादी नीतियों को आगे बढ़ाने’ का आरोप लगाया गया है। इसने कहा कि बीजेपी पूरी तरह से पक्षपाती है और यह देश की विविधता, बहुलतावादी और लोकतांत्रिक लोकाचार को समझने की उम्मीद भी नहीं करती है। जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्त ने ने कहा, ‘हमें वास्तव में कोई उम्मीद नहीं है कि यूएससीआईआरएफ भारत के विविध, बहुलवादी और लोकतांत्रिक चरित्र को समझने की कोशिश भी करेगा।’

अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) ने बुधवार को जारी अपनी रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि पिछले वर्ष भारत सरकार सांप्रदायिक हिंसा से निपटने में विफल रही। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2023 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति और खराब हुई। बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार ने भेदभावपूर्ण राष्ट्रवादी नीतियों को मजबूत किया, घृणास्पद बयानबाजी को बढ़ावा दिया और सांप्रदायिक हिंसा को संबोधित करने में विफल रही, जिससे मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित, यहूदी और आदिवासी (स्वदेशी लोग) असमान रूप से प्रभावित हुए। गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए), नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और धर्मांतरण और गोहत्या विरोधी कानूनों के लगातार लागू होने के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनकी ओर से वकालत करने वालों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया, निगरानी की गई और निशाना बनाया गया।’

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘धार्मिक अल्पसंख्यकों पर रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया संस्थानों और गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) को एफसीआरए नियमों के तहत सख्त निगरानी के अधीन किया गया था। फरवरी 2023 में भारत के गृह मंत्रालय ने एनजीओ सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एफसीआरए लाइसेंस को निलंबित कर दिया था। इसी तरह, अधिकारियों ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान मुस्लिम विरोधी हिंसा पर रिपोर्टिंग करने के लिए तीस्ता सीतलवाड सहित न्यूजक्लिक के पत्रकारों के कार्यालयों और घरों पर छापे मारे।’

प्रवासी भारतीयों के एक थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज (FIIDS) ने इन आरोपों का जवाब दिया। संस्था ने कहा, ‘2023 में भारत में कोई बड़ा हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। इसे दंगों से मुक्त वर्ष मानने के बजाय रिपोर्ट में छिटपुट घटनाओं को ऐसे पेश किया गया मानो पूरे देश ऐसी घटनाएं आम हैं। रिपोर्ट तैयार करते वक्त यह भी नहीं सोचा गया कि भारत में इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी है।’ एफआईआईडीएस के नीति एवं रणनीति प्रमुख खंडेराव कांड ने कहा कि अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट ‘तथ्यों को छिपाने, आंशिक आंकड़ों का उपयोग करने, पूरे संदर्भ को छिपाने, अलग-अलग घटनाओं को सामान्य बनाने तथा देश के कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाने’ पर आधारित है। उन्होंने कहा, ‘इस रिपोर्ट में आंशिक और पृथक घटनाओं का उपयोग करके 1.4 अरब की आबादी वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को गलत तरीके से ब्रांड किया गया है। जटिल और हिंसक अतीत की पृष्ठभूमि के विरुद्ध सकारात्मक हालिया रुझानों को इंगित करने का अवसर खो दिया गया है।’ उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, एफएटीएफ के तहत भारत का मूल्यांकन करने की सिफारिश अत्यधिक संदिग्ध है, खासकर तब जब भारत स्वयं आतंकवाद का निशाना रहा है।’

उन्होंने कहा कि यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट में भारत की धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का उल्लेख नहीं किया गया है, जिसमें बलपूर्वक, धोखाधड़ी से और जबरन धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध है। उन्होंने कहा, ‘इसके बजाय इसने भोले-भाले, वंचित लोगों को बचाने के लिए कानूनों के प्रवर्तन के बारे में शिकायत की।’ संगठन ने बयान जारी कर कहा, ‘एफआईआईडीएस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और अमेरिका के एक मजबूत सहयोगी के खिलाफ किसी भी प्रभाव या एजेंडे के बारे में संदेह और सवाल उठाता है। 2021 में अमेरिका-भारत संबंधों की परिणामी प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, एफआईआईडीएस अनुशंसा करता है कि अमेरिकी विदेश विभाग को यूएससीआईआरएफ की सिफारिशों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए और उन्हें खारिज करना चाहिए।’

केजरीवाल को कौन सी जमीन मिलेगी? सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को दे सकता है निर्देशl

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क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (यूपी) प्रमुख अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव में जमानत मिलेगी? इस सवाल का जवाब शुक्रवार को मिल सकता है. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना ने बुधवार को बताया कि वह 10 मई को केजरीवाल मामले में अंतरिम आदेश जारी कर सकते हैं.

आप संयोजक केजरीवाल ने ईडी की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई. सुनवाई में केजरीवाल की जमानत का मुद्दा उठा. न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मंगलवार को कोई आदेश पारित नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को यह आदेश दे सकता है.

मंगलवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल द्वारा दायर किया गया मामला कोई सामान्य मामला नहीं है. केजरीवाल की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ”लोकसभा चुनाव में भाग लेना केजरीवाल के लोकतांत्रिक अधिकार के अंतर्गत है.” न्यायमूर्ति खन्ना की पीठ ने कहा कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करेगी. क्योंकि केजरीवाल एक जन प्रतिनिधि हैं. चुनाव जीता. उन्हें चुनाव में प्रचार करना है. केजरीवाल की जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने कोर्ट से कहा कि आपराधिक मामलों में गिरफ्तार सभी लोगों के समान अधिकार हैं. केजरीवाल को जमानत देने से गलत संदेश जाएगा. जस्टिस खन्ना की बेंच ने यह भी कहा, ‘अगर केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी जाती है तो कोर्ट नहीं चाहेगा कि वह किसी भी सरकारी काम में शामिल हों।’ अन्यथा विवाद उत्पन्न हो सकता है. हम सरकारी काम में दखल नहीं देना चाहते. अगर चुनाव नहीं होता तो इस जमानत मुद्दे पर विचार नहीं किया जाता.” केजरीवाल किसी भी सरकारी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे.

मंगलवार की सुनवाई में ईडी को सुप्रीम कोर्ट के सवालों का सामना करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, जांच धीमी क्यों हो रही है? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि इस मामले में गवाहों और आरोपियों से पूछताछ करने में ईडी को इतना समय क्यों लगा. सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश जारी नहीं किया. एक्साइज मामले में गिरफ्तार अरविंद केजरीवाल की अर्जी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से अहम सवाल उठाए. न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि आम आदमी पार्टी (यूपी) प्रमुख द्वारा दायर मामला कोई सामान्य मामला नहीं है। साथ ही पीठ ने ईडी से कहा, ”आप किसी को उसके जीवन के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते.” शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि केजरीवाल एक मुख्यमंत्री हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर केजरीवाल को अंतरिम जमानत मिल भी जाती है तो भी वह किसी भी सरकारी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं कर पाएंगे.

21 मार्च को केजरीवाल को दिल्ली के एक्साइज भ्रष्टाचार मामले में ईडी ने गिरफ्तार कर लिया था. तब से वह जेल में बंद है. केजरी ने सबसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि उनकी गिरफ्तारी ‘अवैध’ थी। लेकिन इस महीने की शुरुआत में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्वर्णकांत शर्मा द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आप प्रमुख ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

पिछली सुनवाई में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्त की बेंच ने कहा था, ‘लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने पर विचार किया जा सकता है।’ इसलिए अदालत अंतरिम जमानत पर विचार कर सकती है। इसके बाद से ही केजरीवाल की जमानत को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं.

मंगलवार को सुनवाई के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री की जमानत का मुद्दा उठा. केजरीवाल की ओर से वकील अभिषेक मनु सिंघवी कोर्ट में पैरवी कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ”लोकसभा चुनाव लड़ना केजरीवाल के लोकतांत्रिक अधिकार में है।” न्यायमूर्ति खन्ना की पीठ ने कहा कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करेगी। क्योंकि, केजरीवाल एक जन प्रतिनिधि हैं. चुनाव जीता. उन्हें चुनाव प्रचार करना है. हालांकि, केजरीवाल की जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने कोर्ट से कहा कि आपराधिक मामलों में गिरफ्तार सभी लोगों के पास समान अधिकार हैं. केजरीवाल को जमानत देने से गलत संदेश जाएगा. जांच के लिए उन्हें छह महीने में नौ बार तलब किया गया। लेकिन वह एक बार भी सामने नहीं आये. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”देश में आम चुनाव चल रहा है, हम इसे कभी नजरअंदाज नहीं कर सकते.”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”हम जांच करते हैं कि अंतरिम जमानत देते समय किसी के साथ दुर्व्यवहार तो नहीं किया जाएगा.” ईडी ने कोर्ट को बताया कि केजरी को जांच में ‘असहयोग’ करने के कारण गिरफ्तार किया गया है. केंद्रीय जांच ब्यूरो का कहना है कि अगर केजरीवाल को जमानत दे दी गई तो लोग सोचेंगे कि उन्होंने कुछ नहीं किया है।

निर्वाचित सांसद के खिलाफ बलात्कार और महिला-उत्पीड़न के वीडियो सोशल मीडिया पर जारी !

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एक निर्वाचित सांसद के खिलाफ बलात्कार और महिला-उत्पीड़न के वीडियो, तस्वीरें और जानकारी वाली 3,000 फाइलों वाली एक पेन ड्राइव मिल रही है, एक के बाद एक आरोप सामने आ रहे हैं, चुनाव के बाद विदेश भाग गए नेता के खिलाफ इंटरपोल नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
तूने जिनका अपमान किया है,/ उन सब के बराबर होगा।” जब रवीन्द्रनाथ ने इस अभागे देश के लिए यह कविता लिखी थी, तब भारत स्वतंत्र नहीं था, शासक और शासन का चुनाव जनमत के आधार पर नहीं होता था। आज ये सब किताबों में है, 18वें आम चुनाव का तीसरा चरण बीत चुका है, लेकिन एक चीज़ नहीं बदली- शासक की अपमान करने की आदत. सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा घोटाला: निर्वाचित शासक जनता का अपमान करेगा, उस अपमान को शासन के स्तर पर ले जाएगा। अनादर के स्तर कई गुना हैं; लेकिन इसका सार लोगों के प्रतिनिधियों के रूप में दुष्टों के चयन में निहित है। हाल के दिनों में भारत में हुए हर चुनाव से पता चला है कि उम्मीदवारों के चयन में अपराध कोई कारक नहीं है। खासकर केंद्र में सत्तारूढ़ दल के लिए, एक उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड लगभग एक प्रमाण पत्र की तरह होता है: अपराध जितना गंभीर होगा, उतना ही गंभीर होगा। वरना प्राजंल रेवन्ना, बृजभूषण सिंह, कुलदीप सेंगर क्यों चुनाव में बीजेपी का चेहरा बनेंगे, प्रधानमंत्री खुद किसी के समर्थन से जनसभा में वोट मांगेंगे; ‘सुधारवादी’ नेता बिल्किस बानो गैंग रेप की आरोपी को विधानसभा चुनाव में मिलेगा टिकट!

एक निर्वाचित सांसद के खिलाफ बलात्कार और महिला-उत्पीड़न के वीडियो, तस्वीरें और जानकारी वाली 3,000 फाइलों वाली एक पेन ड्राइव मिल रही है, एक के बाद एक आरोप सामने आ रहे हैं, चुनाव के बाद विदेश भाग गए नेता के खिलाफ इंटरपोल नोटिस जारी किए जा रहे हैं। देश के सर्वश्रेष्ठ पहलवान यौन उत्पीड़न के आरोप में एक नेता के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, कुछ विरोध में खेल छोड़ रहे हैं। इन नेताओं के कुकर्मों का बेड़ा भयावह है, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक है इनके न्यूनतम या बिना किसी सज़ा के बच निकलने के उदाहरण। कुछ के मामले में, इसे पार्टी या गठबंधन में लौटने के लिए समय और अवसर लेते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता है; कुछ मामलों में आरोपी को टिकट देने के बजाय उम्मीदवार के बेटे को सेब के अलावा कुछ नहीं दिया गया। न्यायिक प्रक्रिया के लंबे और जटिल चक्र में अदालत में खड़े होने का कलंक धीरे-धीरे सार्वजनिक स्मृति से मिट जाता है। यह एक अटूट चक्र है, जहां आरोपी, अपराधी या दागी नेता के चेहरे बदल जाते हैं, पार्टी और सत्ता की छत्रछाया में उनके पालन-पोषण और संरक्षण की व्यवस्था नहीं बदलती। भाजपा शासन में ऐसे मामलों के प्रसार से पता चलता है कि किसी नेता, उम्मीदवार या जन प्रतिनिधि के लिए क्या व्यवहार स्वीकार्य है और क्या नहीं, यदि कोई आरोपी या अपराधी उम्मीदवार किसी भी सीमा को पार करता है तो उसे छोड़ दिया जाना चाहिए – उनके पास कोई नीति नहीं है; सारी नैतिकता, असीम पूर्वाग्रह का दलदल ही है।

सत्ताधारी दल का ऐसा व्यवहार न केवल लोकतंत्र के विपरीत है, बल्कि नागरिकों के विचारों की अवमानना ​​और उपेक्षा के धरातल पर खड़ा है। यदि एक पक्ष अपराध और अपराधियों को नज़रअंदाज कर रहा है, तो दूसरा पक्ष विभिन्न स्तरों के नागरिकों के अधिकारों और सशक्तिकरण से पूरी तरह इनकार कर रहा है; कभी महिलाओं पर अत्याचार, कभी धार्मिक अल्पसंख्यकों पर, कभी दलितों पर। भाजपा और उसका गठबंधन भले ही चुनावी घोषणापत्रों और सार्वजनिक सभाओं में महिलाओं को सशक्त बनाने की बात करते हों, लेकिन उनके अनगिनत नेताओं, कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों की उपलब्धियों से यह स्पष्ट है कि महिलाओं के सम्मान, समानता और सुरक्षा के सवाल उनके लिए बेमानी और निरर्थक हैं, महिलाएं हैं उनके लिए वोट बैंक बुक से ज्यादा कुछ नहीं। धार्मिक ध्रुवीकरण और जाति की राजनीति का तो जिक्र ही नहीं, ये दोनों वोट हथियाने के लिए सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवारों के हथियार बन गए हैं। लोकतंत्र का मूल मंत्र नागरिकों के अधिकार और सम्मान हैं, इन्हें लगातार नकार कर कोई आगे नहीं बढ़ सकता, यह बात शासक को याद रखनी होगी।

‘अश्लील’ वीडियो मामले में जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) प्रमुख एचडी देवेगौड़ा के बेटे एचडी रेवन्ना की मुश्किलें बढ़ गई हैं। विशेष जांच दल यानी एसआईटी ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया है. सूत्रों के मुताबिक, वह देश छोड़कर न जा सकें, इसलिए यह नोटिस जारी किया गया है।

पिछले हफ्ते, प्राजल के यौन दुराचार के 1,300 वीडियो (जिसे आनंदबाजार ऑनलाइन ने सत्यापित नहीं किया है) से भरी एक पेन ड्राइव सामने आई थी। शिकायतकर्ता देवराज गौड़ा ने दावा किया कि पिछले पांच सालों से हासन के सांसद हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के वीडियो रिकॉर्ड करते थे। उन्होंने कहा, ”प्रज्जल का इरादा पीड़ितों को ब्लैकमेल करना था.” हालांकि, घटना के बाद देवेगौड़ा के पोते ने देश छोड़ दिया.

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार पहले ही एक सीट गठित कर घटना की जांच के आदेश दे चुकी है. उन्होंने तदनुसार जांच शुरू कर दी है। नोटिस जारी कर प्राजल और उनके पिता एचडी रेवन्ना को पूछताछ के लिए बुलाया गया है. हालाँकि, अभी तक कोई भी जांच अधिकारियों के सामने पेश नहीं हुआ है। जांच अधिकारियों को डर है कि एचडी रेवन्ना पूछताछ से बचने के लिए देश छोड़ सकते हैं. इसलिए उनके खिलाफ पहले लुकआउट नोटिस जारी किया गया था. वहीं देवेगौड़ा के बेटे पर भी एक महिला के अपहरण का आरोप लगा है.

बीजेपी चिंतित! तीसरे चरण के बाद भी उत्तर प्रदेश या गुजरात में मतदान प्रतिशत में कोई खास सुधार नहींl

लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण की प्राथमिक दर से वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं, हालांकि पहले दो चरणों की तुलना में यह मामूली थी। हालाँकि, भाजपा नेतृत्व विशेष रूप से आश्वस्त नहीं है। काउ-ज़ोन राज्यों में मध्य प्रदेश में 66 प्रतिशत मतदान हुआ। लेकिन मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश और गुजरात में बीजेपी के औसत मतदान प्रतिशत में कोई खास सुधार नहीं हुआ.

पहले दो चरणों में 60 फीसदी के करीब मतदान हुआ था. हालांकि बाद में यह बढ़कर 66 फीसदी हो गया. वहीं, आज रात 11:40 बजे तक देशभर की 93 लोकसभा सीटों पर औसतन 64.40 फीसदी वोट पड़े। चुनाव आयोग को लगता है कि अंतिम आंकड़ों में वह पहले दो चरणों से आगे निकल जाएगा. जिन 93 निर्वाचन क्षेत्रों में आज मतदान हो रहा है, उनमें से भाजपा ने पांच साल पहले लोकसभा में 71 सीटें जीती थीं। इस सूची में गुजरात की 26 सीटें भी शामिल हैं, जिनमें से सभी पिछली बार भाजपा ने जीती थीं। उस नतीजे को बरकरार रखना अब बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है.

नरेंद्र मोदी आज सुबह अहमदाबाद के निशान हायर सेकेंडरी स्कूल मतदान केंद्र पर वोट डालने पहुंचे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे. मतदान के बाद प्रधानमंत्री कुछ दूर तक पैदल चले और कार में बैठ गये. सड़क के दोनों ओर भीड़ में एक अंधी लड़की को देखकर मोदी उससे बात करने के लिए आगे बढ़े। बच्ची ने प्रधानमंत्री को गले लगाकर गले लगा लिया. जब एक सुरक्षा गार्ड ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो मोदी ने उन्हें आंख मारकर आगे बढ़ने को कहा. प्रधानमंत्री ने बच्ची के सिर पर हाथ रखा और कुछ देर बात की. इसके बाद उन्होंने मीडिया के जरिए देशवासियों से कहा, ”आज तीसरे चरण का मतदान है. हमारे देश में दान का बहुत महत्व है. इसे ध्यान में रखते हुए नागरिकों को अधिक से अधिक मतदान करना चाहिए।

भले ही प्रधान मंत्री ने स्वयं मतदान करके अनुरोध किया, उनके अपने राज्य, गुजरात में मतदान प्रतिशत काफी कम था। दिन के अंत में गुजरात में 58.98 फीसदी वोटिंग हुई. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, गुजरात में बड़े फेरबदल की संभावना कम है. इसलिए मतदान कम होने पर भी चिंता की कोई बात नहीं है। बल्कि पहले दो एपिसोड की तरह ही उत्तर प्रदेश के आंकड़ों ने भी बीजेपी को असहज कर दिया है. तीसरे चरण में उत्तर प्रदेश की जिन दस सीटों पर मतदान हुआ, उन इलाकों को मुख्य रूप से यादव-भूमि के नाम से जाना जाता है. मुलायम सिंह यादव के परिवार के तीन सदस्य आज दस में से तीन निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए मैदान में थे। दिन के अंत में उत्तर प्रदेश में 57.34 फीसदी वोटिंग हुई. नतीजतन, पार्टी नेतृत्व को लगता है कि इस यात्रा में भी बीजेपी कार्यकर्ताओं-समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा बूथ पर नहीं गया.

बिहार में भी यही स्थिति है. नीतीश कुमार के राज्य में 58.18 फीसदी मतदान हुआ. हालांकि, इस सफर में मध्य प्रदेश में 66.05 फीसदी वोटिंग होने से बीजेपी कार्यकर्ताओं में थोड़ी राहत है. पार्टी नेतृत्व का दावा है कि वे इस बार राज्य की सभी 9 सीटें जीतने जा रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में ध्रुवीकरण की राह पर चल रहे हैं. तीसरे दौर के मतदान के दिन मंगलवार को ध्रुवीकरण उनके अभियान का मुख्य स्वर था। गौरतलब है कि इस दिन कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने मतदाताओं से मोदी के ध्रुवीकरण प्रयासों को खारिज करने की अपील की थी. उन्होंने सीधे तौर पर कहा, ”यह नफरत फैलाने वाला भाषण और ध्रुवीकरण की कोशिश राजनीतिक फायदे के लिए है.” इस दिन, तृणमूल नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मोदी की ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ सामने आईं. उनका कटाक्ष, ”मोदी मैजिक ख़त्म!” और मोदी नहीं आएंगे!” मौजूदा लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद से ही मोदी विकसित भारत का प्रचार छोड़कर सीधे ध्रुवीकरण की राह पर चल रहे हैं. उन्होंने बिना किसी प्रतिक्रिया के मुगलों, मुस्लिम लीग, मांस-भक्षण जैसे मुद्दों पर अभियान चलाया, अगले दौर से पहले उन्होंने महाराज बनाम नवाब, राज बनाम बादशाह के साथ कांग्रेस पर हमला किया। इस बार मोदी ने तीसरी बार ‘वोट जिहाद’ को ‘हथियार’ दिया है. वह जहां भी संभव हो उस ‘हथियार’ का उपयोग कर रहा है। मध्य प्रदेश के खरगोन में आज का चुनाव प्रचार कुछ अलग नहीं था. प्रधानमंत्री ने कहा, ”भारत आज इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. आपको तय करना है कि भारत में ‘वोट जिहाद’ चलेगा या राम राज्य?” मोदी ने कहा, ”मोदी को 400 सीटें चाहिए क्योंकि कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर में बाबरी का ताला नहीं लगा सकती.” उन्होंने कांग्रेस पर ‘वोट जिहाद’ का आरोप लगाते हुए कहा, ‘कांग्रेस कह रही है, मोदी के खिलाफ ‘वोट जिहाद’ करो.’ यानी एक खास धर्म के लोगों को मोदी के खिलाफ गठबंधन के तौर पर वोट देने के लिए कहना! सोचिए कांग्रेस किस स्तर पर आ गई है! वे हताशा के कारण उस स्थिति में हैं।

मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए पाकिस्तान को भारत के मतदान क्षेत्र में घसीटना नहीं छोड़ा। उनके शब्दों में, ”कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि सेना आतंकवादी गतिविधियां करती है… पाकिस्तान निर्दोष है. एक अन्य कांग्रेस नेता ने कहा कि मुंबई आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान का हाथ नहीं है. “भारत” विपक्ष के एक नेता फिर कहते हैं, “पाकिस्तान चूड़ियाँ पहनकर नहीं बैठा है।”

कांग्रेस समेत विरोधियों का कहना है कि मोदी के पास अपने अभियान में कोई सकारात्मक हथियार नहीं है. इसलिए हताशा में उन्होंने ध्रुवीकरण का रास्ता चुना. मोदी के इस हथियार को कुंद करने के लिए कांग्रेस मुख्य रूप से उनके सामाजिक-आर्थिक एजेंडे को साधने में सक्रिय है। पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र जारी होने के बाद सोनिया ने आज पहला वोट संदेश दिया. प्रधानमंत्री और भाजपा ने देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को पटल पर ला दिया है।’ एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, ”युवा समुदाय गंभीर बेरोजगारी का सामना कर रहा है। महिलाओं पर अत्याचार होता है, दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के साथ भारी भेदभाव होता है। देश के हर कोने में यही तस्वीर है. ये है मोदी और बीजेपी के लिए देश की हालत. देश के विकास में उनकी कोई सद्भावना नहीं है. उनका एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर सत्ता पर कब्ज़ा करना है।

ममता भी मोदी और बीजेपी के ध्रुवीकरण के विरोध में उतर आई हैं. पुरुलिया की एक चुनावी रैली में तृणमूल नेता चुनाव आयोग की आलोचना करने से नहीं चूके. उन्होंने कहा, ”उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों को वोट देने से नहीं रोका जा रहा है. वोट देने गये थे, धूप में पीट-पीट कर मार डाला. मुझे अभी खबर मिली. क्या आपको लगता है कि चुनाव आयोग कार्रवाई करेगा? बिल्कुल नहीं यह ‘आदर्श आचार संहिता’ नहीं, ‘मोदी आचार संहिता’ है! कुछ लोग बीजेपी की मध्यस्थता कर रहे हैं. बांग्ला में छूओगे तो लोग हाथ जोड़ लेंगे. अगर पांच मुसलमानों को वोट नहीं देने दिया गया तो क्या नरेंद्र मोदी जीतेंगे! अरे नहीं, पांच लाख, पांच करोड़ और आपके खिलाफ वोट करेंगे। ”मतदान अत्याचार से नहीं होता.”