Thursday, March 5, 2026
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जानिए कैसी हुई अयोध्या धाम की सुरक्षा?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर अयोध्या धाम की सुरक्षा कैसे की गई! आखिरकार लंबे इंतजार के बाद वो शुभ घड़ी आ गई जब श्रीरामलला अपने टेंट से भव्य और दिव्य मंदिर में स्थापित हो गए । 22 जनवरी को प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है। उधर इस कार्यक्रम के मद्देनजर अयोध्या की सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य किले में तब्दील हो गई है। अयोध्या का सुरक्षा कवच इतना बेजोड़ है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। क्योंकि राम नगरी में जल, जमीन से लेकर आसमान तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम किए गए हैं। यूपी के स्पेशल डीजी प्रशांत कुमार ने बताया यूपी पुलिस के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण है। जितनी बड़ी चुनौती है, उतनी ही बड़ी अपॉर्चुनिटी भी है। उन्होंने बताया कि व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। ट्रैफिक का डायवर्जन अयोध्या के आसपास के जिलों से ही कर दिया गया है। बीते शाम से अयोध्या में सिर्फ वही गाड़ियां जा रही है, जिनको जिला प्रशासन ने जाने की अनुमति दी है या फिर जिन वीवीआईपी को ट्रस्ट की ओर से आमंत्रित किया गया है। इसके साथ प्रशांत कुमार ने बताया कि जो कैटिगराइज्ड वीआईपी है, उनके लिए पुलिस स्कॉट की व्यवस्था लखनऊ या फिर अयोध्या एयरपोर्ट से ही किया गया है।

स्पेशल डीजी एलओ ने बताया कि कार्यक्रम में बैठने की व्यवस्था ट्रस्ट की ओर से की गई है। लेकिन वहां पर पुलिस की व्यवस्था भी रहेगी। उन्होंने बताया कि सेक्टर की तरह बांटकर विभिन्न भाषायों का ज्ञान रखने वाले अधिकारियों को वहां पर तैनात किया जाएगा। इसके अतिरिक्त वहां जो भी अधिकारी रहेंगे उसमें अधिकतर लोग सादे कपड़ों में रहेंगे। साथ ही कुछ आवश्यक अधिकारी शस्त्र के साथ भी वहां मौजूद रहेंगे। प्रशांत कुमार ने बताया कि राम मंदिर परिसर और उसके आसपास के इलाकों में सीसीटीवी लगाए गए हैं। उसमें एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। पूरे अयोध्या जिले में लगभग 10000 सीसीटीवी कैमरा लगाए गए हैं।

अयोध्या में होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी वीआईपी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं। प्रशांत कुमार ने बताया कि इस बार पुलिस व्यवस्थाओं में टेक्नोलॉजी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। केंद्र व राज्य सरकार की एजेंसियों के साथ पूरी तरह से समन्वय बनाकर रियल टाइम इन्फॉर्मेशन शेयरिंग है। इसके साथ ही सीमलेस इन्फॉर्मेशन उनके साथ है। इसके अलावा सरयू नदी के रास्तों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्ट्रीट बोट की व्यवस्था की गई है। डीजी एलओ ने कहा कि सुरक्षा के लिए एंटी ड्रोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही भीड़ को मैनेज करने के लिए ड्रोन इत्यादि का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। वहीं अयोध्या के लता मंगेशकर चौक पर रैपिड एक्शन फोर्स के जवान भी तैनात कर दिए गए हैं।

वहीं सूत्रों के मुताबिक अयोध्या में कल होने वाले प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए त्री-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है। प्रदेश सरकार द्वारा मंदिरों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के लिए गठित स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स, सीआरपीएफ और यूपी पुलिस 22 जनवरी को श्रीराम मंदिर की सुरक्षा में तैनात रहेगी। वहीं एनएसजी द्वारा ट्रेंड एसएसएफ के लगभग 100 कमांडो मंदिर परिसर और उसके आसपास की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसके साथ ही सीआरपीएफ के जवान रामलला के गर्भगृह वाले मुख्य मंदिर में तैनात रहेंगे। साथ ही एसएसएफ के 1400 के करीब जवान मंदिर के बाहर रेड जोन में सुरक्षा में तैनात रहेंगे। इसके साथ ही यलो जोन में यूपी पुलिस और पीएसी के जवान तैनात रहेंगे। इसमें एसएसएफ के जवान भी गश्त करते रहेंगे। यूपी पुलिस की अतिरिक्त बल, ड्रोन, सीसीटीवी से भी सुरक्षा की निगरानी करेगी।

वहीं इस कार्यक्रम में पीएम मोदी समेत 8 हजार के करीब मेहमानों के पहुंचने की उम्मीद है। इसमें कई वीवीआईपी गेस्ट भी शामिल है। इसको देखते हुए ट्रैफिक डायवर्जन से लेकर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किया गया है। शहर के एंट्री प्वाइंट से लेकर राम मंदिर तक चप्पे-चप्पे पर पुलिस, सीसीटीवी और एटीएस के कमांडो तैनात किए जा रहे हैं। छावनी में तब्दील हुई राम नगरी में ब्लैककैट कमांडो, बख्तरबंद गाड़ियां और ड्रोन की व्यवस्था की गई है।

श्रीराम लला प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों के वाहनों की पार्किंग के लिए पुख्ता इंतजाम किये हैं। अयोध्या धाम में पार्किंग के लिए 51 स्थानों को चिन्हित किया गया है। इन पार्किंग में 22,825 वाहनों को पार्क किया जा सकेगा। पार्किंग स्थलों को गूगल मैप पर अपलोड कर दिया गया है। वहीं पार्किंग स्थलों को वीवीआईपी, वीआईपी और अन्य मेहमानों के लिए भी रिजर्व किया गया है। इन पार्किंग को वायरलेस और पीए सिस्टम से लैस किया गया है। रामपथ और भक्ति पथ स्थित 6 पार्किंग स्थानों को वीवीआईपी मेहमानों के वाहनों के लिए रिजर्व किया गया है। यहां पर वीवीआईपी मेहमानों की 1225 गाड़ियां पार्क हो सकेंगी।

इसके अलावा धर्म पथ मार्ग और परिक्रमा मार्ग पर नौ पार्किंग स्थानों को वीआईपी के लिए रिजर्व किया गया है। यहां पर वीआईपी की दस हजार से अधिक गाड़ियों को पार्क किया जाएगा। इसके अलावा प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों के लिए अलग-अलग स्थानों पर पार्किंग को रिजर्व किया गया है। वहीं पुलिस फोर्स के लिए एनएच-27 में आठ पार्किंग स्थानों को रिजर्व किया गया है। यहां पुलिस की दो हजार से अधिक गाड़ियों को पार्क किया जाएगा। साथ ही यहां पर सुरक्षा के लिहाज से काफी पुख्ता इंतजाम किये गये हैं। इन पार्किंग स्थल की निगरानी ड्रोन से की जाएगी।

क्या भारत जोड़ो न्याय यात्रा के अलावा भी प्रचार प्रसार करेंगे कांग्रेसी नेता ?

अब भारत जोड़ो न्याय यात्रा के अलावा भी कांग्रेस नेता प्रचार प्रसार करने जा रहे हैं! आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। एक तरफ जहां राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस अपनी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ निकाल रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने देशभर में पार्टी कार्यकर्ताओं में चुनाव को लेकर जोश भरने के लिए आने वाले दिनों में कुछ सभाएं करने की योजना बनाई है। इस कवायद का मकसद अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश के साथ लोगों के बीच जाकर संपर्क और संवाद बनाना है। बताया जाता है कि कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को चुनाव के मद्देनजर आगामी रणनीति और तैयारियों से जुड़े गुरु मंत्र देने की योजना बनाई है। सूत्रों के मुताबिक, इसमें पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया जाएगा कि उन्हें जमीन पर पार्टी की बात, उसका संदेश, उसकी विचारधारा किस तरह लेकर जानी है। यह भी बताया जाएगा कि किन मुद्दों को जनता के बीच लेकर जाना है, किस तरह से बीजेपी के दुष्प्रचार की काट करनी है। कहा जा रहा है कि इस कवायद का एक मकसद अलग-अलग राज्यों में अपने वर्कर्स को I.N.D.I.A गठबंधन और घटक दलों के साथ मिलकर विपक्षी खेमे का प्रचार करने के लिए तैयार करना है। इसके मद्देनजर खरगे 31 जनवरी से शुरू हो रहे आगामी बजट सत्र से पहले कुछ राज्यों में सभाएं और बड़ा आयोजन करने जा रहे हैं।

इस सिलसिले में रविवार को खरगे असम के कलियाबोर नागांव में एक विशाल रैली को संबोधित करेंगे, जहां राहुल गांधी की अगुवाई में ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ भी मौजूद रहेगी। बताया जा रहा है कि असम में कांग्रेस के साथ गठबंधन में मौजूद कुछ क्षेत्रीय पार्टियां भी रैली का हिस्सा बन सकती हैं। कांग्रेस की योजना है कि यात्रा के दौरान हर प्रदेश में कम से कम एक ऐसी बड़ी रैली का आयोजन किया जाए, जहां राहुल गांधी के साथ-साथ खरगे भी मौजूद रहें। वहीं, आगामी 25 जनवरी को हैदराबाद में एक बड़ा आयोजन किया जा रहा है, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष तेलंगाना राज्य भर से आए अपने बूथ वर्कर्स को संबोधित करेंगे। इस दौरान हैदराबाद में एक जनसभा का आयोजन भी हो सकता है। जबकि आगामी 27 जनवरी को तमिलनाडु में और 28 जनवरी को उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष सभाएं लेंगे। इन दोनों ही राज्यों में खरगे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की जनसभा में कांग्रेस के साथ सत्तारूढ़ डीएमके और वीसीके जैसे सहयोगी दल भी भाग ले सकते हैं।

बता दे कि सूत्रों के मुताबिक, बैठक में आगामी लोकसभा चुनाव और भारत न्याय यात्रा को लेकर दिए गए तमाम तरह के निर्देश दिए। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं द्वारा इन सभी से भी से अपने अपने इलाके में जुटने के लिए कहा गया। ये तमाम कॉर्डिनेटर्स केंद्रीय नेतृत्व और जिला इकाई के बीच समन्वय के तौर पर काम करेंगे। इन लोगों को बताया गया कि इस दौरान वॉर रूम कैसे काम करेगा, कैसे समन्वय करना है। उल्लेखनीय है कि यह तमाम समन्वय हर सीट पर इस तरह से काम करेंगे कि उस सीट पर पार्टी की स्थिति, संभावनाएं क्या हैं? अगर उस सीट पर पार्टी का प्रत्याशी है तो उसके लिए माहौल बनाना या फिर अगर गठबंधन का उम्मीदवार है तो उस दल के साथ कॉर्डिनेशन करना भी इन्हीं की जिम्मेदारी रहेगी। इनका काम चुनाव की शुरुआत से लेकर चुनाव प्रचार व वोटिंग तक रहेगा। उल्लेखनीय है कि ये लोग पार्टी के अलावा गठबंधन को भी फीडबैक देंगे।

वहीं दूसरी ओर इन समन्वयकों से कहा गया कि यह अपने अपने इलाकों में राहुल गांधी नीत भारत जोड़ो न्याय यात्रा के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना सुनिश्चित करें। यात्रा के उद्देश्य, सोच व संदेश तक जमीन तक लोगों के बीच ले जाएं। शुक्रवार को सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस की गठबंधन के घटक दलों के साथ भी मीटिंग होनी है।28 जनवरी को उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष सभाएं लेंगे। इन दोनों ही राज्यों में खरगे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की जनसभा में कांग्रेस के साथ सत्तारूढ़ डीएमके और वीसीके जैसे सहयोगी दल भी भाग ले सकते हैं। इनमें एसपी व आम आदमी पार्टी के साथ बैठक होनी है। यूपी को लेकर कांग्रेस की गठबंधन समिति की एसपी नेताओं के साथ मुलाकात होनी है। वहीं आप के साथ दिल्ली, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों पर चर्चा होनी है।

राम मंदिर के इतिहास में क्यों खास है 1 फरवरी 1986 का दिन?

राम मंदिर के इतिहास में 1 फरवरी 1986 का दिन बेहद ही खास है! रामचरित मानस के बालकांड की यह चौपाई आज सही साबित हो रही है। कई वर्षों के संघर्षों और बलिदान के बाद भगवान राम अपने घर, अपनी अयोध्या वापस आ रहे हैं। राम नगरी की सुंदरता तो जैसे इस समय देखते ही बनती है। अयोध्या से लेकर यूपी और पूरे देश में बस रामा-राम ही हो रहा है। 22 जनवरी 2024 की तारीख देश के इतिहास में दर्ज हो जाएगी वो भी सुनहरे अक्षरों से। दोपहर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के बाद राम और उनकी अलौकिक मूर्ति वहां सदा के लिए विराजमान हो जाएगी। लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने अपनी किताब कुछ ऐसा लिखा है कि हमें इतिहास में दोबारा लौटना होगा। ज्यादा पीछे नहीं बस 38 साल पहले। मतलब साल 1986 जब वहां विवादित बाबरी मस्जिद थी और वहां के दरवाजे खोले गए थे। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के काल में यह हुआ था। अय्यर की किताब में इस बात का जिक्र है। बकौल मणिशंकर अय्यर राम मंदिर बाबरी मस्जिद को तब हिंदू मंदिर ही कहते थे का ताला खुलवाने के लिए राजीव गांधी जिम्मेदार नहीं थे बल्कि कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार थी। इस बात के बाद हम आपको उस तारीख की बात बताएंगे। राम मंदिर का ताला खुलने के पीछे की इनसाइड स्टोरी बताएंगे। इसे फिर से समझने के लिए हमें दोबारा फ्लैसबैक में जाना होगा। घटना आज से 38 साल पहले 31 जनवरी 1986 की है। तब केंद्र में इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी सत्ता संभाल रहे थे। उत्तर प्रदेश में भी उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी। वीर बहादुर मुख्यमंत्री थे। यूपी के फैजाबाद के एक वकील उमेश चंद्र ने राम मंदिर का ताला खुलवाने के लिए जिला अदालत में एक याचिका दायर कर रखी थी। याचिका को मंजूर करते हुए जिला अदालत ने मंदिर खोलने का आदेश दे दिया। इसके बाद 1 फरवरी को राम मंदिर के ताले 37 साल बाद से जो बंद पड़े थे खोल दिए गए। ताला खुलते ही बड़ी संख्या में हिंदू तीर्थयात्री, जो जानबूझकर इकट्ठे हुए थे, अंदर आ गए और राजीव को इसके बारे में कुछ नहीं पता था। तब गृह राज्य मंत्री अरुण नेहरू थे। अरुण नेहरू ने उस समय एक बयान देकर सियासी हलकों में भूचाल ला दिया। अरुण कुमार ने कहा कि ये ताले राजीव गांधी ने खुलवाए थे। इस बयान के आने के बाद एक समुदाय राजीव गांधी को दोष देना लगा जबकि राजीव गांधी को फैजाबाद जिला अदालत के इस फैसले के बारे में कुछ पता ही नहीं था।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अरुण कुमार के इस बयान का खंडन उस समय पीएमओ में सचिव रहे वजाहत हबीबुल्लाह ने किया था। हबीबुल्लाह ने बताया कि राजीव गांधी ने ताला खोलने को नहीं कहा था। क्योंकि राजीव को अजदालत के आदेश की जानकारी ही नहीं थी। यह भी सच है कि अरुण कुमार ने कभी वजाहत हबीबुल्लाह के इस बयान का खंडन नहीं किया। इसका जिक्र मणिशंकर अय्यर ने अपनी किताब ‘द राजीव आई न्यू एंड व्हाय ही वाज़ इंडियाज मोस्ट मिस अंडरस्टॉड प्राइम मिनिस्टर’ में कही हैं। अय्यर ने लिखा कि बाबरी मस्जिद के दरवाजे खोलने के लिए पार्टी जिम्मेदार थी, न कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और इसमें भाजपा की ओर से पोषित तब के गृह राज्य मंत्री अरुण नेहरू का हाथ था। अय्यर ने अपनी किताब में आगे बताया है कि हां, ताला खोलने में कांग्रेस का हाथ था, लेकिन कांग्रेस के व्यक्ति को पता था कि राजीव गांधी ने कभी भी उन ताले को खोलने की अनुमति नहीं दी होगी। अय्यर ने आगे लिखा कि अरुण नेहरू भाजपा में शामिल हो गए और इसलिए वह भाजपा की ओर से प्लांट किए गए थे।

1986 में ताला खुलवाने के विवाद के बाद 1989 आते-आते कांग्रेस सरकार कई घोटालों जैसे बोफोर्स दलाली के मुद्दे पर घिरती चली गई। वोट शेयर से लेकर सीट तक कम होने लगीं। और आखिर में 1989 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार गिर गई। ताला खुलवाने से नाराज मुसलमान भी छिटक गए। कांग्रेस एमपी, यूपी, राजस्थान और बिहार समेत कई राज्यों में हार गई। इसके बाद राम मंदिर का मुद्दा उछला जिसे भारतीय जनता पार्टी ने लपक लिया। लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या से सोमनाथ तक राम रथयात्रा निकालकर राम मंदिर के मुद्दे को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया। मणिशंकर अय्यर ने लिखा कि मेरा एकमात्र मुद्दा यह है कि चुनाव के बीच में ‘शिलान्यास को छोड़कर इस सब में शामिल नहीं होने वाला एकमात्र व्यक्ति राजीव था। उन्होंने ताला नहीं खोला, उन्होंने भाजपा के साथ बातचीत नहीं की और जब गुंबदों को गिराया जा रहा था तो वे चुप नहीं बैठे। राजीव को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, बल्कि कांग्रेस को दोषी ठहराया जाना चाहिए।

क्या आने वाले चुनाव के लिए तैयार है कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस आने वाले चुनाव के लिए तैयार है या नहीं! कांग्रेस ने शनिवार को आरोप लगाया कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान असम के उत्तर लखीमपुर शहर में इसके कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया। उनके वाहनों में तोड़फोड़ की गई। बैनर फाड़ दिए गए। मुख्य विपक्षी दल ने घटना से संबंधित कुछ वीडियो जारी करते हुए यह दावा भी किया कि यह हमला भाजपा सरकार के सहयोग से किया गया। उसने कहा कि यह मुख्यमंत्री हिमंत बिस्‍वा सरमा और भाजपा की घबराहाट को दिखाता है। कांग्रेस की असम इकाई के प्रमुख भूपेन कुमार बोरा ने कहा कि शहर में यात्रा का स्वागत करने के लिए लगाए गए सभी होर्डिंग और पोस्टर शुक्रवार रात फाड़ दिए गए और बैनर लगाने पहुंचे पार्टी के सदस्यों की पिटाई की गई।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘डिस्प्ले ले जाने के लिए पार्टी की ओर से इस्तेमाल किए गए दो वाहनों को भी उपद्रवियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को वहां से तुरंत नहीं जाने पर गंभीर अंजाम भुगतने की धमकी भी दी।’ बोरा ने कहा, ‘हमने पुलिस में दो शिकायतें दी हैं -एक हमारे कार्यकर्ताओं की पिटाई करने और वाहनों को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है और दूसरी शिकायत, पोस्टर फाड़े जाने से संबंधित है।’ उन्होंने दावा किया कि जिस कार से उपद्रवी घटनास्थल पर पहुंचे थे वह एक ऐसे व्यक्ति की है जो स्थानीय भाजपा विधायक का करीबी माना जाता है।

इस बीच, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि इस तरह के हमले से कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी डरने वाले नहीं हैं। खरगे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘हम असम के लखीमपुर में भाजपा के गुंडों की ओर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा के वाहनों पर हुए शर्मनाक हमले और कांग्रेस पार्टी के बैनर-पोस्टर फाड़े जाने की कड़ी निंदा करते हैं। पिछले 10 वर्षों में भाजपा ने भारत के लोगों को संविधान से दिए गए हर अधिकार और न्याय को कुचलने और ध्वस्त करने का प्रयास किया है। वह भाजपा लोकतंत्र का उल्लंघन कर उनकी कांग्रेस आवाज दबाना चाहती है।’ उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस पार्टी असम में भाजपा सरकार की ओर से अपनाई गई हमले और धमकी की इस रणनीति से डरने वाली नहीं है। कांग्रेस पार्टी भाजपा के इन पिट्ठुओं के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करेगी। हमारी लड़ाई और राहुल गांधी की न्याय के प्रति प्रतिबद्धता अटूट है।’

कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी वेणुगोपाल ने घटना से संबंधित वीडियो फुटेज साझा करते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा से ‘सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री’ हिमंत बिस्‍वा सरमा कितने डरे हुए हैं, क्या इसका और सबूत चाहिए? देखो उनके गुंडे कांग्रेस के पोस्टर फाड़ रहे हैं और वाहनों को तोड़ रहे हैं! यात्रा के भारी प्रभाव से वह इतना घबरा गए हैं कि वह किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं।’ कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने नयी दिल्ली में संवाददाताओं से कहा, ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा को मिल रहे समर्थन से भाजपा और इसके नेता घबरा गए हैं। असम के लखीमपुर में जिस तरह से हमला किया गया, उससे पता चलता है कि भाजपा इस यात्रा को मिल रहे समर्थन से घबरा गई है।’ उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा घबराहट के कारण और भाजपा में अपनी वफादारी साबित करने के लिए इस तरह की हरकत पर उतर आए हैं। माकन ने ‘हमले’ की निंदा करते हुए कहा, ‘राहुल गांधी और कांग्रेस इस तरह के हमलों से डरने और घबराने वाले नहीं हैं। यात्रा जारी रहेगी।’ उन्होंने आरोप लगाया कि हमला असम की भाजपा सरकार के सहयोग से हुआ।

कांग्रेस की असम इकाई की मीडिया कमेटी के प्रमुख भरत नाराह ने कहा कि भाजपा नीत राज्य सरकार यात्रा में व्यवधान डाल रही है ताकि लोगों को इसमें भाग लेने से रोका जा सके। हमने पुलिस में दो शिकायतें दी हैं -एक हमारे कार्यकर्ताओं की पिटाई करने और वाहनों को नुकसान पहुंचाने से संबंधित है और दूसरी शिकायत, पोस्टर फाड़े जाने से संबंधित है।’ उन्होंने दावा किया कि जिस कार से उपद्रवी घटनास्थल पर पहुंचे थे वह एक ऐसे व्यक्ति की है जो स्थानीय भाजपा विधायक का करीबी माना जाता है।‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ फिलहाल अरुणाचल प्रदेश में है और रविवार को फिर से असम में दाखिल होगी। यह यात्रा 67 दिन में 6,713 किलोमीटर की दूरी तय करेगी और 15 राज्यों के 110 जिलों से गुजरते हुए 20 या 21 मार्च को मुंबई में समाप्त होगी।

क्या हिंदुओं को पहले ही मिल जानी चाहिए थी राम जन्मभूमि?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हिंदुओं को पहले ही राम जन्मभूमि मिल जानी चाहिए थी या नहीं! अयोध्या का झगड़ा, राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद बहुत लम्बा चला। 2019 तक, जब सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ किया। अब सवाल उठता है कि क्या इसे पहले ही बातचीत और समझौते से सुलझाया नहीं जा सकता था? राम मंदिर के भव्य उद्घाटन की तैयारी चल रही है, तो ये सोचने का भी मौका है कि अतीत में क्या हुआ था। इस बहस में ये सवाल जरूरी है कि इस विवाद को लम्बा करने में मुसलमानों का क्या रोल था? वो अपनी हक का दावा छोड़ने को क्यों राजी नहीं थे? कुछ कहते हैं कि अगर मुसलमानों ने अपनी हकदारी छोड़ दी होती तो शायद इतिहास अलग होता। वो हिंदू भावनाओं का सम्मान करते हुए एक बड़ा दिल दिखाते। लेकिन कुछ ये भी कहते हैं कि मुसलमानों के लिए तो पीछे हटना ही फायदेमंद होता। उनके लिए तनाव बढ़ाने से रोकना और टकराव से बचना ही अच्छा था। लंबे समय में तो उन्हें ही ज्यादा नुकसान हुआ, जैसा कि अब तक हुआ है। शायद इससे बीजेपी अपनी हिंदुत्व की राजनीति से पीछे नहीं हटती, लेकिन रफ्तार जरूर कम होती और माहौल थोड़ा शांत होता।

साथ ही, विवादित मंदिरों के मामले में 1991 के उपासना स्थल कानून को सख्ती से लागू कर पाते, जिसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जैसा था, वैसे ही रहेगा। संघ पर उदार हिंदुओं की तरफ से इस बात का दबाव बढ़ता कि वे अब दूसरे पुराने ऐतिहासिक विवादों को जिंदा न करे, हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को दुरुस्त करने का सुनहरा मौका था, इस विवाद को सुलझाकर। इससे सबसे ज्यादा फायदा तो कम्युनिटी के नाते मुसलमानों को ही होता। लेकिन समझौते की बात तक न मानने से दरार और गहरी हो गई। दूसरा और शायद ज्यादा अहम कारण, जिसे मुसलमानों को पीछे हटने के लिए प्रेरित करना चाहिए था, वो ये था कि ये विवादित जमीन भगवान राम की जन्मस्थली मानी जाती है। इसलिए हिंदुओं के लिए इसका धार्मिक महत्व कहीं ज़्यादा था। जो लोग हिंदुत्व की राजनीति से सहमत न हों, वो भी इस जगह से गहरा धार्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं। उनके लिए, ये उतना ही पवित्र है जितना मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना और ईसाइयों के लिए वेटिकन सिटी।

मुझे याद है, लखनऊ विश्वविद्यालय के एक विद्वान, जो खुद को गैर-राजनीतिक बताते थे, मुझसे कह रहे थे: ‘राम मंदिर तो बहुत हैं, लेकिन ये जन्मस्थली होने की वजह से खास है।’दूसरी तरफ, मुसलमानों के लिए ये सिर्फ जमीन का झगड़ा था। इसका कोई धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व नहीं था। अयोध्या की तंग गलियों में इसे ढूंढना भी मुश्किल था। कई स्थानीय लोगों को सही रास्ता बताने में भी परेशानी होती थी। न ही ये मस्जिद कोई संरक्षित ऐतिहासिक इमारत थी, जिसे दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता था। हां, ये जरूर है कि मुसलमानों को राम जन्मभूमि के बदले दूसरी जगह मस्जिद बनाने का वादा किया गया था। इस्लाम में, ज़रूरत पड़ने पर मस्जिद को दूसरी जगह ले जाने या तोड़ने की मनाही नहीं है। मुस्लिम दुनिया में, सऊदी अरब समेत तमाम मुल्कों में बुनियादी ढांचे के कामों के लिए अक्सर मस्जिदों को हटाया या दूसरी जगह बनाया जाता है।

अयोध्या की विवादित मस्जिद में काफी समय से नमाज नहीं पढ़ी जाती थी। सरकार ने जमीन के झगड़े की वजह से उसे बंद कर रखा था। फैजाबाद के आसपास ऐसी और भी बहुत सारी बेकार पड़ी मस्जिदें थीं। किसी को इसकी कोई खास परवाह नहीं थी। मेरे पैतृक कस्बे रुदौली जो बाराबंकी के पास है, में हद-से-हद कुछ ही लोग उस टूटी-फूटी इमारत को गंभीरता से लेते थे जो अचानक सुर्खियों में आ गई थी। मुसलमानों के लिए अयोध्या जमीन का सवाल था, धर्म, आस्था या इतिहास का नहीं। ये जरूर है कि आम धारणा के विपरीत, मुसलमानों में काफी बड़ा तबका ऐसा था जो झगड़े से बचना चाहता था। वे जानते थे कि हार तय थी, इसलिए एक बड़ा कदम उठाकर, एक ‘पवित्र इशारा’ कर, तनाव कम करना चाहते थे। इनमें उत्तर प्रदेश के कई आम मुसलमान शामिल थे, जिनका जीवन इस तनाव से उथल-पुथल हो गया था। उनका मानना था कि बेकार पड़ी मस्जिद के लिए झगड़ा करना बेमानी है।

उत्तर प्रदेश बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी यूपीबीएमएसी के संयोजक जफरयाब जिलानी ने समझौता न करने का बचाव करते हुए कहा था, ‘अगर हम हिंदुओं से ये मस्जिद हार गए, तो पहले से ही दबे-सहमे इस अल्पसंख्यक समुदाय के पास इस देश के नागरिक होने का जो बचा-खुचा हौसला है, वो भी टूट जाएगा।’ ये एक अतिवादी दावा था और ये दिखाता था कि मुसलमान नेताओं की समझ हकीकत से कितनी दूर है। ये मुद्दा जल्दी ही अलग-अलग मुस्लिम गुटों के लिए अपनी ताकत दिखाने का जरिया बन गया।

इस बीच, तथाकथित धर्म-निरपेक्ष पार्टियां, खासकर कांग्रेस जो खुद को मुसलमानों का हितैषी मानती है, और पूरा उदारवादी वर्ग, अयोध्या विवाद को हिंदू दक्षिणपंथ के साथ अपने रूढ़िवादी विचारों की लड़ाई लड़ने के लिए इस्तेमाल करने लगा। 1988 के नवंबर में, ‘इंडिया टुडे’ की एक खास रिपोर्ट में फरजंद अहमद और दिलीप अवस्थी ने लिखा कि कैसे मुस्लिम गुट और उनके “धर्म-निरपेक्ष” राजनीतिक साथी, राजनीतिक फायदे के लिए अयोध्या के मुद्दे को हवा दे रहे थे और 1989 के आम चुनावों के लिए बीजेपी से सीधे टकराव में लगे हुए थे।

वक्त समझदारी और जल्दी से विवाद सुलझाने की जरूरत थी, लेकिन मुस्लिम नेताओं का रवैया निराशाजनक था। शहाबुद्दीन से जब बाबरी मस्जिद समन्वय समिति के अगले कदम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ‘हम जल्दी में नहीं हैं। हम सिर्फ शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं, वो भी मस्जिद को हिंदुओं के हवाले किए बिना।’

समस्या ये थी कि इस ‘शांतिपूर्ण समाधान’ को कभी साफ-साफ नहीं बताया गया। असल में, इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति थी ही नहीं। अहंकार और गलत ‘मुस्लिम गर्व’ की भावना ने शांति बहाल करने की जरूरत को दबा दिया। “मस्जिद बचाओ” का पूरा अभियान गलत सोच पर आधारित था और अल्पकालिक फायदे हासिल करने के लिए चलाया गया था, जैसा कि बाद की घटनाओं ने दिखाया। अगर मुसलमान समझौता कर लेते तो क्या चीजें जरूर बदलतीं, ये सवाल इतिहास की कल्पनाओं में ही रह जाएगा।

आखिर क्या है बोइंग सुकन्या प्रोग्राम?

आज हम आपको बोइंग सुकन्या प्रोग्राम के बारे में जानकारी देने वाले हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को बेंगलुरु में विमान बनाने वाली दुनिया की दिग्गज कंपनी बोइंग के परिसर का उद्घाटन किया। बोइंग इंडिया इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नॉलजी सेंटर अमेरिका से बाहर बोइंग का किसी भी देश में अबतक का सबसे बड़ा परिसर है। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने बोइंग सुकन्या प्रोग्राम को भी लॉन्च किया। आखिर क्या है ये प्रोग्राम और इससे किस तरह लड़कियों को होगा फायदा, आइए विस्तार से समझते हैं। बोइंग सुकन्या कार्यक्रम का उद्देश्य देश के बढ़ते एविएशन सेक्टर में देशभर से और अधिक लड़कियों की एंट्री में मदद देना है। ये कार्यक्रम पूरे भारत की लड़कियों और महिलाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कौशल सीखने और एविशन सेक्टर में नौकरियों के लिए प्रशिक्षण पाने के मौके मुहैया करेगा। इस प्रोग्राम के तहत, लड़कियों के लिए STEM साइंस, टेक्नॉलजी, इंजीनियरिंग और मैथ करियर में रुचि जगाने में मदद करने के लिए ये 150 जगहों पर ‘स्टेम लैब’ बनाए जाएंगे। यह कार्यक्रम पायलट बनने के लिए प्रशिक्षण ले रहीं महिलाओं को छात्रवृत्ति भी प्रदान करेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के सरकार के प्रयासों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार एयरोस्पेस क्षेत्र में महिलाओं के लिए नए अवसरों का सृजन करने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ कहा, ‘चाहे फाइटर पायलट हों या नागरिक उड्डयन, भारत महिला पायलटों की संख्या के मामले में दुनिया में सबसे आगे है।’ उन्‍होंने बताया कि भारत में 15 प्रतिशत पायलट महिलाएं हैं, जो वैश्विक औसत से 3 गुना अधिक है। बोइंग सुकन्या कार्यक्रम का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह विमानन क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देगा। इसके अलावा दूर-दराज के इलाकों में रहने वालीं गरीब लड़कियों को पायलट बनने के उनके सपने को साकार करने में मदद करेगा। पीएम ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत पायलट के रूप में करियर बनाने के लिए सरकारी स्कूलों में करियर कोचिंग और विकास संबंधी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

लड़कियों के लिए पायलट का करियर चुनने के लिए मुफीद मौके का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने एविएशन सेक्टर में अपनी सरकार की उपलब्धियां भी गिनाई। उन्होंने कहा कि आज भारत में करीब 150 हवाई अड्डे चालू हैं, जबकि 2014 में इनकी संख्‍या लगभग 70 थी। पीएम ने यह भी कहा कि हवाई अड्डों की दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने अर्थव्यवस्था के समग्र विकास और रोजगार सृजन के लिए एयर कार्गो क्षमता में बढ़ोतरी का भी जिक्र किया।

अत्याधुनिक BIETC यानी बोइंग इंडिया इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नॉलजी सेंटर अमेरिका के बाहर बोइंग का सबसे बड़ा निवेश है। ये भव्य परिसर 43 एकड़ में फैला हुआ है और इसे बनाने में 1600 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। BIETC के उद्घाटन के बाद पीएम मोदी ने सुकन्या लाभार्थियों से भी बातचीत की। दुनिया की दिग्गज विमान कंपनी बोइंग के कैंपस खुलने के साथ ही कर्नाटक एक नए एविएशन हब के तौर पर उभर रहा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में इसका जिक्र किया। कर्नाटक में पिछले साल एशिया की सबसे बड़ी हेलीकॉप्टर मैन्यूफैक्चरिंग फैक्ट्री के उद्घाटन को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि बोइंग की यह नई सुविधा कर्नाटक के एक नए एविएशन हब के तौर पर उभरने का स्पष्ट संकेत है।

अमेरिका की दिग्गज विमान निर्माता कंपनी बोइंग को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना और महिलाओं को पायलट बनाने में मदद के लिए बोइंग सुकन्या जैसा प्रोग्राम शुरू करना अपने आप में काफी अहम है। इस प्रोग्राम के लॉन्च होने पर बोइंग कंपनी की सीओओ स्टेफ़नी पोप ने पीएम मोदी को शुक्रिया कहा। पीएम मोदी ने बोइंग सुकन्या प्रोग्राम को महिला सशक्तीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण करार दिया। इसके जरिए उन्होंने महिला वोटरों को साधने की कोशिश की। दरअसल, पिछले कई चुनावों से देश की आधी आबादी यानी महिलाएं बीजेपी के लिए नए वोट बैंक के तौर पर उभरी हैं। भाजपा महिलाओं की पसंदीदा पार्टी बनकर उभरी है और इसकी सबसे बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियां और उनकी सरकार की स्कीम हैं। दशकों ले लटके ऐतिहासिक महिला आरक्षण बिल को पास कराना हो या तीन तलाक को खत्म करना, बीजेपी इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया कदम मानती है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के अलावा राज्यों की तमाम बीजेपी सरकारें भी महिलाओं को सीधा फायदा पहुंचाने वाली कई तरह की वेल्फेयर स्कीम चला रही हैं। केंद्र सरकार की बात करें तो उसकी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला योजना, जनधन अकाउंट, मिशन पोषण, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन, मैटरनिटी लीव को 12 की जगह 26 हफ्ते करना, मातृवंदन योजना के तहत बच्चे के जन्म पर मां को 5000 रुपये जैसी तमाम योजनाएं महिलाओं पर ही केंद्रित हैं। सेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन देने जैसे कदम से केंद्र ने समान अवसर और समानता का अधिकार देने की कोशिश की है।

उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन का लाभ मिला है। जनधन योजना के तहत 27 करोड़ से अधिक महिलाओं का बैंक में खाता खुला है। बैंक से बिना गारंटी के कर्ज वाली मुद्रा लोन स्कीम के लाभार्थियों में 70 फीसदी महिलाएं हैं। स्टैंड अप इंडिया स्कीम की लाभार्थियों में आधे से ज्यादा महिलाएं हैं। चुनावों में बीजेपी को इन स्कीमों का लाभ मिलता रहा है। एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के हालिया चुनाव में पार्टी की जीत के पीछे मोदी सरकार की महिला हितैषी स्कीमों का बड़ा हाथ रहा है। मध्य प्रदेश में तो राज्य सरकार की लाडली बहना योजना को गेमचेंजर माना गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी देशभर में महिलाओं की पसंदीदा पार्टी थी। देशभर में बीजेपी को औसतन 36 प्रतिशत महिलाओं का वोट मिला। कांग्रेस को 20 प्रतिशत और बाकी 44 प्रतिशत वोट TMC, BJD जैसे क्षेत्रीय दलों को मिले थे। पिछले लोकसभा चुनाव में कम से कम 160 सीटें ऐसी थीं जहां महिलाओं का वोटर टर्न आउट पुरुषों के मुकाबले ज्यादा था और इन सीटों में ज्यादातर पर बीजेपी ने ही जीत हासिल की।

जानिए मुगलों से लेकर वर्तमान तक का राम मंदिर का इतिहास!

आज हम आपको मुगलों से लेकर वर्तमान तक का राम मंदिर का इतिहास बताने जा रहे हैं! आम तौर पर जहां सेनाएं रहती हैं, उन जगहों को छावनी कहा जाता है, लेकिन प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली और मंदिरों की नगरी अयोध्या इस लिहाज से अलग है। यहां छावनियां हैं, लेकिन इनमें पुलिस या सेना के जवान नहीं बल्कि साधु-संत रहते हैं। ये छावनियां भी अपने आराध्य प्रभु राम की अगवानी को तैयार हैं। 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा उत्सव के रंग में ये छावनियां रंग चुकी हैं और इनमें रोज आरती और पाठ हो रहे हैं। यहां ठहरे हुए साधु संत और भक्त कीर्तन-भजन में लीन हैं और इंतजार कर रहे हैं उस वक्त का जब रामलला की उनके भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होगी। मणिरामदास की छावनी में भक्तों और साधुओं का आना-जाना लगा हुआ है। सुबह की शुरुआत यहां रामलला को भोग लगाने के बाद भजन कीर्तन से शुरू होती है। दिन भर भजन-कीर्तन का दौर चलता रहता है। बड़ी छावनी में भी ऐसा ही है। यहां के मंदिर में दिया बाती के बाद साधु यहां पाठ शुरू कर देते हैं। भक्त भी इसमें शामिल होते हैं। यह आयोजन दोपहर तक चलता रहता है। शाम को एक बार फिर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता है। तपसी छावनी में भी राम नाम का पाठ चल रहा है। लोग रामलला की स्तुति कर रहे हैं। आम तौर पर शांत रहने वाली इन छावनियों में इन दिनों चहल-पहल भी बढ़ी है और भक्तों और संतों की जुटान भी। सुबह से लेकर शाम तक तमाम आयोजन हो रहे हैं। अयोध्या में साधुओं की इन छावनियों का कोई लिखित इतिहास नहीं है। सबसे अलग-अलग दावे हैं कि ये छावनियां कैसे अस्तित्व में आईं और इन्हें छावनी क्यों कहा जाता है। हालांकि, यह एक बात जरूर सभी में समान है कि साधु-संतों का जमावड़ा धर्म की रक्षा और ईश्वर की स्तुति के लिए हुआ था।

अयोध्या में चार प्रमुख छावनियां हैं- तुलसीदास जी की छावनी, बड़ी छावनी, तपसी जी की छावनी और छोटी छावनी। छोटी छावनी को ही अब मणिरामदास छावनी कहा जाता है। बात तुलसीदास जी की छावनी की करें तो यह अब लगभग वीरान रहती है, या कहें कि इसका अस्तित्व अब खत्म सा हो चुका है। वजह बताई जाती है साधु-संतों की कम आवाजाही। तपसी जी की छावनी या तपस्वी जी की छावनी अयोध्या शहर के रामघाट इलाके में है।

भव्य इमारत और इमारत पर की गई कारीगरी यह बोध करा देती है कि इसका इतिहास काफी उजला रहा होगा। छावनी के वर्तमान महंत जगतगुरु परमहंस आचार्य बताते हैं कि त्रेता युग में जब श्रीराम का जन्म हुआ तब देश भर के साधु-संन्यासी उनका दर्शन करने के लिए अयोध्या आ जुटे थे। पहले तो वे पेड़ के नीचे ही रह लेते थे। यह क्रम चलता रहा। बाद में जब मुगलों का समय आया तो यहां रहने वाले साधु उनसे मुकाबिल हो गए। धर्म की रक्षा के लिए किलेबंदी की गई। उनकी सेनाओं को नगर के भीतर प्रवेश करने से रोका गया। वह दावा करते हैं कि अयोध्या में प्राचीनतम पीठ और सबसे सिद्ध पीठ तपसी जी की छावनी है।

इन छावनियों में केवल साधु-संत ही नहीं रहते, बल्कि भक्त भी रहते हैं। हालांकि दोनों के रहने के स्थान बिल्कुल अलग हैं। बड़ी छावनी अयोध्या नगर से दूर एक किनारे पर लगभग तीन एकड़ जमीन पर आबाद है। चारों तरफ बुलंद चहारदीवारी है। आने-जाने के लिए एक ही दरवाजा है। इसके भीतर दाखिल होने पर आपको संतों के इस स्थान को छावनी क्यों कहा जाता है, उसका बोध हो जाता है। मजबूत किलाबंदी यहां दिखाई देती है।

छावनी के बीच में एक मंदिर है, जिसे हजारा मंदिर कहा जाता है और इसी के चारों तरफ छोटे-छोटे कमरे बने हैं। एक तरफ के कमरों में साधु रहते हैं और दूसरी तरफ के कमरों में भक्त। इस व्यवस्था के बारे में यहां रहने वाले संत बताते हैं कि साधुओं की दिनचर्या अलग होती है, जबकि भक्तों की अलग। दोनों की दिनचर्या में कोई व्यवधान न हो, इसलिए यहां ऐसी व्यवस्था की गई है। यहां के लोग बताते हैं कि एक बार हजार-बारह सौ साधु अयोध्या में रुकने के लिए आए। तब इस छावनी के पहले महंत रहे रघुनाथ दासजी महाराज ने उन साधुओं को यहां एक साल तक रहने के लिए जगह दी। हालांकि तब ये रुके तो फिर वापस नहीं गए। साधु आते-जाते रहे, लेकिन यह जगह वैसे ही छावनी में तब्दील रही। माना जाता है कि इसका क्षेत्रफल सभी छावनियों में सबसे बड़ा है। लिहाजा, इसे बड़ी छावनी कहा जाता है।

यूं तो इसे छोटी छावनी कहा जाता है, लेकिन आज के समय में अयोध्या में इस छावनी का कद सबसे बड़ा है। बाकी छावनियों की तुलना में सबसे ज्यादा चहल-पहल भी यहीं रहती है। सीआरपीएफ के जवान सुरक्षा में तैनात रहते हैं। वजह यह है कि इस छावनी के वर्तमान महंत नृत्यगोपालदास श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष भी हैं। इस छावनी के बारे में भी यही कहा जाता है कि साधु-संतों का जमावड़ा यहां धर्म की रक्षा के लिए मुगल काल में हुआ था, तब यह अस्तित्व में आई थी।

कहा जाता है कि पहले काफी संख्या में साधु छावनियों में रहते थे, लेकिन अब इनमें उतनी संख्या नहीं है। बावजूद इसके 100-200 साधु-संत हर छावनी में रहते हैं। ज्यादातर अपने ही कमरों में रहकर ध्यान करते हैं। कुछ ही लोग हैं, जिनका निकलना सामान्य तौर पर बाहर होता है। ऐसा भी माना जाता है कि त्रेतायुग में जब श्रीराम वनवास को गए तब भी साधुओं ने नगर के आसपास डेरा डाल लिया था। वह अयोध्या के रक्षक के तौर पर यहां रहा करते थे। वह यहीं रहकर राम भजन में लीन रहते थे और श्रीराम के वापस आने का इंतजार करते रहे।

क्या भारत म्यांमार के बीच दीवार खड़ी करना असम के लिए फायदेमंद होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत म्यांमार के बीच दीवार खड़ी करना क्या असम के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है! सीमा पार से घुसपैठ हमारे लिए कितनी बड़ी चुनौती है, यह किसी से छिपा नहीं है। पाकिस्तान लगातार लाइन ऑफ कंट्रोल को पार करने की हिमाकत करता आया है। भारी सुरक्षा के बावजूद उसकी ओर से सैनिक सीजफायर तोड़ते हैं और आतंकवादी आतंकी घटनाओं को अंजाम देते हैं। हालांकि हमारी सेना लगातार उन्हें मुंहतोड़ जवाब भी देती आई है। बांग्लादेश की सीमा से पश्चिम बंगाल दाखिल होने वाले लोगों की भी संख्या कम नहीं है। बड़ी संख्या में बांग्लादेशी पश्चिम बंगाल के अलावा देश के अलग-अलग कोनों में फैले हुए हैं। इनके पास भारत का पासपोर्ट, आधार कार्ड के साथ नागरिकता भी होती है। लेकिन इन दो के अलावा एक और बॉर्डर है जहां हाल की घुसपैठ ने चिंता बढ़ा दी है। भारत-म्यांमार बॉर्डर। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अब दोनों देशों के बीच सुरक्षा बढ़ाने के साथ कंटीले तारों के बाड़ भी लगाए जाएंगे। बता दें कि पहले भारत- म्यांमार के बीच खुली सीमा थी, यानी लोग आसानी से आ-जा सकते थे। म्यांमार की भारत के 4 राज्यों से सीमा लगती है। तो क्या मोदी सरकार के इस कदम से असम में घुसपैठ कम होगी। शनिवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम पुलिस कमांडो की पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया था। शाह ने इस दौरान एक महत्वूर्ण बात कही। परेड को संबोधित करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि पहले भारत और म्यांमार के बीच खुली सीमा थी, यानी लोग आसानी से आ-जा सकते थे। लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इस सीमा को सुरक्षित करने का फैसला किया है। हम बांग्लादेश की सीमा की तरह ही पूरी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाएंगे। ये बाड़ सीमा को पार करने से रोकेंगे। पहले भारत और म्यांमार के बीच एक समझौता था जिसके तहत सीमावर्ती इलाकों के लोग बिना वीजा के आ-जा सकते थे। लेकिन, अब सरकार इस समझौते पर फिर से बातचीत कर रही है और दोनों देशों के बीच यह खुली आवाजाही बंद करने वाली है। सरकार ने हाल ही में पूरी सीमा पर स्मार्ट जाली लगाने का काम शुरू किया है।

सीमा सुरक्षा बढ़ाने के लिए भारत, म्यांमार सीमा पर जाली लगाएगा और दोनों देशों के बीच खुली आवाजाही बंद कर देगा। भारत और म्यांमार के बीच 1970 में एक समझौता हुआ था, जिसे भारत-म्यांमार फ्री मूवमेंट रिजाइम कहा जाता है। इस समझौते के तहत, भारत और म्यांमार के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग बिना वीजा के एक-दूसरे के देश में आ-जा सकते थे। इस समझौते का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के बीच सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देना था। 1970 के बाद से भारत सरकार लगातार इसे रिन्यू करा देती है। आखिरी बार 2016 में इस एग्रीमेंट को रिन्यू किया गया था।लेकिन, अब इसी को भारत सरकार बंद करा देगी। दोनों देशों की सीमा के बीच एक कंटीली दीवार होगी। बता दें कि दोनों देश लगभग 1600 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं। FMR के मुताबिक, दोनों ओर 25 किलोमीटर तक आने-जाने की सुविधा थी।

भारत सरकार की ओर से फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि इस वक्त सीमा पार म्यांमार से 600 से ज्यादा सैनिक भारत में भगकर आ गए हैं। सैनिक म्यांमार से लगती मिजोरम की सीमा से अंदर दाखिल हुए हैं और वहीं लांग्टलाई जिले के तुईसेंटलांग में असम राइफल्स के पास शरण ले रखी है। म्यांमार में सैनिकों के ठिकानों पर पश्चिमी म्यांमार राज्य के रखाइन में एक हथियारबंद विद्रोही गुट अराकन आर्मी के उग्रवादियों ने कब्जा कर लिया है। इसलिए सैनिक भारी मात्रा में भारत भाग रहे हैं। म्यांमार सरकार ने इन सैनिकों से भारत सरकार की ओर से अपने सैनिकों को वापस मांगा है। सैनिको के अलावा आतंकवादी, हथियारों और ड्रग्स के तस्करों की भी एंट्री इस आसान आवाजाही के चलते सरल हो गई थी। असम में सीमा पार से घुसपैठ एक गंभीर समस्या है। यह समस्या कई वर्षों से असम के लिए एक चुनौती रही है। असम भी घुसपैठ की समस्या से जूझता आया है। असम की सीमा हालांकि म्यांमार से नहीं लगती। लेकिन उसे भी बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों से समस्या होती आई है। सीमा के पास वाले इलाकों में बांग्लादेशियों की बढ़ती संख्या का वहां के लोगों ने भी विरोध किया था। लोगों का कहना था कि असमिया संस्कृति नष्ट हो रही है। असम में म्यांमार से भले करीब न हो लेकिन, मिजोरम, मणिपुर से उसकी सीमा लगती है और म्यांमार से मिजोरम, मणिपुर दोनों की सीमाएं पास है। इस वजह से मणिपुर, मिजोरम के रास्ते म्यांमार से भागे लोग असम में अपनी गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। शाह का यह फैसला असम के हित का काम करेगा। NRC और CAA की इसलिए सबसे ज्यादा जरूरत असम के लिए बताई जाती है।

अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि हम बांग्लादेश की सीमा की तरह ही पूरी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाएंगे। शाह का यह कहना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बंगाल के रास्ते पूरे भारत में बांग्लादेशी घुसपैठिए शरण ले चुके हैं। वह यहां आतंकवादी, तस्कर, गलत धंधों को अंजाम देते हैं। पश्चिम बंगाल में तो इन्होंने अपना बसेरा बनाने के साथ भारत के अलग-अलग हिस्सों में फैले हैं। हाल के महीनों में भारत की सुरक्षा जांच एजेंसियों ने दिल्ली, पुणे, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई, गुजारात सहित कई राज्यों से इनकी गिरफ्तारी भी हुई। बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और प्रदेश के बड़े शहरों में रहते हैं। इनकी खास बत यह है कि ये लोग आम लोगों की भाषा और बोल-चाल को जल्दी अपनाकर काफी घुलमिल जाते हैं। अपने गैरकानूनी कामों को अंजाम देने के लिए इन्होंने भारत की नागरिकता के साथ हर प्रमाणपत्र मौजूद है। ऐसे में पहचान और भी मुश्किल हो जाती है।

जब राम मंदिर बनवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से आया निर्णय!

एक ऐसा समय जब राम मंदिर बनवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्णय आ गया था! 16वीं शताब्दी से 21वीं शताब्दी तक राम मंदिर के लिए हिंदुओं की तड़प देखी है। आज जब हिंदु वर्ग का सबसे बड़ा सपना पूरा हो रहा है, मैं साक्षी हूं। अयोध्या में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीरबाकी के अत्याचार को मैंने सहा है। हिंदुओं का पांच शताब्दियों तक अपने आराध्य वर्गों के लिए तड़प को मैं जीती रही हूं। विभिन्न वर्गों में विभाजित हिंदू जनमानस को एकजुट होने में 500 साल लग गए। वर्गों में बंटे हिंदू जब एक रामलला के सामने दीन भाव से खड़े हुए तो भग्वतवत्सल भगवान ने भी उन्हें वापस लौटने का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया। राम की जीवनी हमें हमेशा प्रेरित करती रही है। राम हर युग में प्रासंगिक रहे हैं। राम मंदिर पर हो रही राजनीति से घबराने की जरूरत नहीं है। यह तो मैं त्रेतायुग से देखती आ रही हूं। राजनीति तो तब भी रची गई थी, जब भगवान श्रीराम बाल्यकाल को पार कर जवानी में कदम रख चुके थे। राजा दशरथ उनके राज्याभिषेक की तैयारी में जुट गए थे। इस दौरान राजा दशरथ के ही महल में रहने वाली दासी मंथरा ने साजिश रची। माता कैकेई के बुद्धि पर अपनी राजनीति का ऐसा मायाजाल फेरा, प्रभु श्रीराम को सत्ता संभालने की जगह 14 वर्ष तक वनवास के लिए जाना पड़ा। इसलिए, प्रभु राम के कार्य में राजनीति न हो, यह संभव नहीं है। हालांकि, तमाम राजनिति के पार प्रभु श्रीराम रामराज्य की स्थापना करते हमेशा दिखाई देते हैं। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस की घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। कई राज्यों में सांप्रदायिक दंगे हुए। बाद में, वोट बैंक की राजनीति में समाज को एक बार फिर विभिन्न वर्गों में बांट दिया गया। राम मंदिर का मुद्दा अब चुनावी भाषणों और भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में दिखता था। इस बीच में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश और केंद्र में भी सत्ता में आ चुकी थी। लेकिन, गठबंधन धर्म ने भाजपा को राम मंदिर मामले में कोई भी बड़ा निर्णय नहीं ले पाई। विपक्षी दलों के लिए राम मंदिर का मुद्दा भाजपा को घेरने का अस्त्र बन गया था। एक बार पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेई ने लोकसभा में कहा था कि राम मंदिर का मुद्दा हमारी पार्टी से जुड़ा मुद्दा है, जिसे हम कभी नहीं छोड़ सकते। आज हम गठबंधन धर्म का पालन कर रहे हैं, जिस दिन हम उस काबिल होंगे, राम मंदिर जरूर बनेगा। हालांकि, मामला कोर्ट में था। अब यह मामला श्री राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद के नाम से जाना जाने लगा। फैजाबाद कोर्ट से होते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट तक मामला पहुंच चुका था।

1990 में विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने कारसेवा के दौरान अयोध्या विवादित परिसर के आसपास के एएसआई सर्वे का खूब जिक्र किया था। दरअसल, 1975-76 में एक सर्वे हुआ था। इसमें राम मंदिर के अवशेष खुदाई में मिलने के दावे किए गए थे। 1990 में इससे संबंधित कुछ मामला आया और उसके बाद विवाद गहराना शुरू हुआ। विश्व हिंदू परिषद और भाजपा इस मुद्दे को लगातार उठा रही थी। कारसेवा के दौरान भी यह मुद्दा खास गरमाया। लेकिन, राम मंदिर के जमीन पर कब्जे में एएसआई सर्वे एक बड़ी भूमिका निभाने वाला था। यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वर्ष 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एएसआई सर्वे का मामला उठाया गया। कोर्ट ने सुनवाई की और एएसआई को खुदाई कर अपनी रिपोर्ट देने का आदेश दिया। यहीं से बाबरी विवाद की कहानी बदलनी शुरू हुई। आज मैं हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चली राम मंदिर विवाद की कहानी सुनाने जा रही हूं।

6 दिसंबर की घटना के बाद रााज जन्मभूमि का मामला जमीन विवाद बन गया था। दरअसल, 1949 में बाबरी परिसर में रामलला प्रगट हो गए थे। मामला कोर्ट तक पहुंच चुका था। वर्ष 1975- 76 आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एएसआई जन्मभूमि विवाद में एंट्री ली। दावा किया जाता है कि यह सर्वे आरएसएस के इशारे पर कराया गया था। बाबरी परिसर के अगल- बगल में एएसआई पहले भी तीन बार सर्वे कर चुकी थी। एएसआई के पहले निदेशक एलेग्जेंडर कनिंघम ने 1862-63 में अयोध्या का सबसे पहली बार परिसर का सर्वे किया था। यह सर्वे आदेश अंग्रेजी सरकार के वर्ष 1858 में बाबरी परिसर को दो भागों में बांटने के बाद आया था। इसके बाद अलोइस फ्यूरर के नेतृत्व में 1889 से 1891 के बीच विवादित परिसर का दूसरी बार एएसआई ने सर्वे किया। 1969- 70 में प्रो. एके नारायण के नेतृत्व में एएसआई ने विवादित परिसर की तीसरी बार खुदाई की। 1975 में प्रो. बीबी लाल ने चौथी बार खुदाई की। इस बार उनके नेतृत्व में विशेषज्ञों ने साइट के नजदीक पहुंच कर सर्वे किया।

प्रो. लाल उस समय एएसआई के महानिदेशक थे। सर्वे के बाद प्रो. लाल के दावों ने राम मंदिर विवाद को सुलगा दिया। 1990 में राम मंदिर आंदोलन के जोर पकड़ने के दौरान प्रो. बीबी का एक लेख पत्रिका मंथन में छपा। अपने लेख में प्रो. लाल ने दावा किया कि मस्जिद के नीचे उन्हें मंदिर जैसे खंभे मिले थे। उन्होंने दावा किया कि जब मैंने बाबरी साइट का सर्वे किया तो मस्जिद की नींव के पास मंदिर का एक खंभा दिखा। यह बहुत ही पुराना था। प्रो. लाल के इस दावे को विश्व हिंदू परिषद और हिंदूवादी संगठनों ने जमकर उठाया। उनकी ओर से कहा गया कि यह पिलर प्राचीन राम मंदिर के हैं। हालांकि, प्रो. लाल के दावों पर आर्कियोलॉजिस्ट्स ने भी सवाल खड़े कर दिए। विवाद तब अधिक गहराया जब 1993 के वर्ल्ड आर्कियोलोजिक कांग्रेस में प्रो. लाल को बाबरी परिसर में किए सर्वे के रिसर्च पेपर को रखने नहीं दिया गया।

आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट प्रक्रिया फेल होने के बाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई। इसके बाद 27 सितंबर 2018 को केस संविधान पीठ को भेजने पर बहस के बाद फैसला आया। मामले की सुनवाई तीन जजों की ही पीठ में कराए जाने की बात कही। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर 2018 को रिटायर हो गए। 8 जनवरी 2019 को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग करते हुए, विवाद को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंप दिया। 8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को आठ सप्ताह में मध्यस्थता का प्रयास करने का आदेश दिया। मध्यस्थता की कार्यवाही 13 मार्च को शुरू हुई और मई तक पूरा किया जाना था। कई पक्षों के अनुरोध पर अदालत ने 10 मई को मध्यस्थता अवधि 15 अगस्त तक बढ़ा दी गई। राम जन्मभूमि पक्षकार गोपाल सिंह विशारद ने 9 जुलाई को कोर्ट से हर रोज सुनवाई की मांग की। कोर्ट में उन्होंने मध्यस्थता के सुस्त होने की रिपोर्ट दी।

सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता की आखिरी कोशिश विफल होने के बाद 6 अगस्त से श्रीराम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर ऐतिहासिक सुनवाई शुरू हुई। यह सुनवाई 40 दिनों तक चली। इसमें कोर्ट ने बाबरी मस्जिद कमिटी, निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान समेत अन्य पक्षों को सुना। चीफ जस्टिस ने 18 अक्टूबर तक बहस पूरी करने का अनुरोध सभी पक्षों से किया। 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के ऐतिहासिक बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अब्दुल नजीर, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने पांच शताब्दियों से चले आ रहे विवाद पर 9 नवंबर 2019 को बड़ा फैसला दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से देवता श्रीरामलला विराजमान को टाइटल प्रदान किया। विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला विराजमान को दिए जाने का आदेश दिया गया। इसके अलावा मुस्लिम पक्ष सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन अयोध्या में किसी स्थान पर देने का आदेश दिया गया। जनवरी 1993 में अधिग्रहित भूमि भी रामलला को मंदिर निर्माण के लिए दी गई। केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाकर मंदिर का संचालन करने और राम मंदिर का निर्माण कराने का आदेश दिया गया। इस फैसले ने उस नारे को सही साबित कर दिया, मंदिर वहीं बनाएंगे। इस फैसले के बाद मंदिर का उसी राम जन्मभूमि पर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

क्या बढ़ने वाली है देश में ठंड?

देश में अब ठंड और भी बढ़ने वाली है! दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत में इन दिनों शीतलहर और कोहरे का सितम जारी है। मौसम विभाग ने उत्तर भारत के इलाकों में अगले तीन से पांच दिनों के लिए कड़ाके की ठंड और कोहरे का अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग ने रेड अलर्ट जारी करते हुए कहा कि अगले पांच दिनों के दौरान उत्तर भारत में घने कोहरे की स्थिति बनी रहने की संभावना है, जबकि अगले तीन दिनों के दौरान उत्तर भारत में ठंडे दिन की स्थिति बनी रह सकती है। शीतलहर के चलते कई जगहों पर स्कूलों को बंद किया गया है। दिल्ली, यूपी, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में जहां शीतलहर का अलर्ट है, तो वहीं हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी को लेकर अलर्ट जारी किया गया है। मौसम विभाग ने कहा कि समुद्र तल से 12.6 किमी ऊपर 130-140 समुद्री मील नॉट की ‘जेट स्ट्रीम हवाएं’ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में चल रही हैं। IMD के अनुसार इसी मौसमी बदलाव की वजह से बर्फीली हवाएं नीचे की तरफ आ रही हैं और उत्तर भारत में शीत लहर/ठंडे दिन की स्थिति बढ़ रही है। अगले 3-4 दिनों में जेट स्ट्रीम की इसी तरह की तीव्रता जारी रहने की संभावना है।’

मौसम विभाग ने अपने बुलेटिन में कहा कि उत्तरी राजस्थान, दक्षिण हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों में न्यूनतम तापमान 2-5 डिग्री सेल्सियस और पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों, राजस्थान और मध्य प्रदेश के शेष हिस्सों में 6-10 डिग्री सेल्सियस के बीच है। IMD ने कहा, ‘दक्षिण हरियाणा, दक्षिण उत्तर प्रदेश और उत्तरी राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में यह सामान्य से 2-4 डिग्री सेल्सियस नीचे है। शुक्रवार को बीकानेर पश्चिमी राजस्थान और कानपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे कम न्यूनतम तापमान 2.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।’

मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है कि पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के कई हिस्सों में शनिवार सुबह तक और कुछ हिस्सों में रात/सुबह में कुछ घंटों के लिए और अगले चार दिनों तक कुछ हिस्सों में घने कोहरे की स्थिति बनी रह सकती है। वहीं उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में शुक्रवार और रविवार की सुबह कुछ घंटों के लिए और अगले तीन दिनों तक अलग-अलग हिस्सों में रात/सुबह में घने कोहरे और शीतलहर की स्थिति बनी रहने की संभावना है। बिहार के कुछ हिस्सों में 24 जनवरी तक और पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के कुछ हिस्सों में रविवार तक ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी। IMD के अधिकारी ने बताया कि अगले तीन दिनों के दौरान पूर्वी भारत के कई हिस्सों में न्यूनतम तापमान में 2-3 डिग्री सेल्सियस की गिरावट होने की संभावना है और उसके बाद कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होगा। दक्षिण हरियाणा, दक्षिण उत्तर प्रदेश और उत्तरी राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में यह सामान्य से 2-4 डिग्री सेल्सियस नीचे है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में भी मौसम में काफी बदलाव देखा गया है. वहां पर भी कड़ाके की ठंड जारी है. देखा जाए तो गाजियाबाद, कानपुर समेत कई शहरों में ठंडी हवा के साथ-साथ सुबह कोहरा देखा गया. IMD के मुताबिक, यूपी की राजधानी लखनऊ की बात करें तो यहां पर मिनिमम टेंपरेचर 11 डिग्री सेल्सियस और मैक्सीमम टेंपरेचर 25 डिग्री रहने की संभावना है. IMD ने यहां भी घने कोहरे का अलर्ट जारी किया है.  शुक्रवार को बीकानेर पश्चिमी राजस्थान और कानपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे कम न्यूनतम तापमान 2.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।’बिहार में भी मौसम जल्द ही मिजाज बदलने वाला है. बिहार की राजधानी पटना समेत राज्य में नए साल पर बारिश की संभावना बै. IMD के अनुसार, 29 दिसंबर से पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने की वजह से नए साल में पटना सहित कई राज्यों में 2 या 4 जनवरी को भारी बारिश हो सकती है. IMD के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बहुत घना कोहरा छा सकता है. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा के कुछ हिस्सों, मध्य प्रदेश और उत्तर पूर्व भारत में नृत्य कोहरा संभव है. जम्मू कश्मीर का गुलमर्ग बर्फबारी से गुलजार हुआ है. वहीं हिमाचल के पर्वतीय इलाकों में भी कड़ाके की ठंड है. आईएमडी ने अगले पांच दिनों के दौरान उत्तर भारत के बाकी हिस्सों में न्यूनतम तापमान में कोई महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना नहीं होने की भी भविष्यवाणी की है। आईएमडी ने कहा, ‘शनिवार और रविवार को पंजाब और हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों में शीतलहर जारी रहने की संभावना है। रविवार तक उत्तराखंड में अलग-अलग स्थानों पर पाला पड़ने की संभावना है।