Thursday, March 5, 2026
Home Blog Page 758

क्या इस साल बॉक्स ऑफिस पर लौट पाएगी रौनक?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस साल बॉक्स ऑफिस पर रौनक लौट पाएगी या नहीं! नया साल 2024 शुरू हो चुका है, लेकिन बॉक्स ऑफिस अभी भी रौनक नहीं लौटी है। हालांकि यह भी सच है कि फिलहाल उत्तर भारत में जबरदस्त ठंड के चलते भी दर्शक सिनेमाघरों का रुख कम कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि बॉक्स ऑफिस के ठंडा पड़े होने की एक वजह जबरदस्त सर्दी है, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं होगा कि पिछले काफी अरसे से कोई ऐसी फिल्म भी रिलीज नहीं हुई है, जिसे देखने के लिए दर्शक सिनेमाघरों के बाहर लाइनें लगा लें। बता दें कि बीते साल के क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्मों शाहरुख खान की ‘डंकी’, प्रभास की ‘सलार’ और जेसन मोमोआ की ‘एक्वामैन एंड द लॉस्ट किंगडम’ को दर्शकों की ओर से उम्मीद के मुताबिक रिस्पॉन्स नहीं मिला। उसके बाद नए साल में रिलीज हुई विजय सेतुपति और कटरीना कैफ की फिल्म ‘मैरी क्रिसमस’ को भी दर्शकों ने उतना पसंद नहीं किया। हर किसी को शाहरुख की ‘डंकी’ से भी कुछ ऐसा ही धमाकेदार प्रदर्शन करने की उम्मीद थी, लेकिन यह फिल्म ऐसा कमाल नहीं कर पाई। ‘डंकी’ ने जहां घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपए की कमाई की, वहीं दुनियाभर में यह महज 460 करोड़ रुपए ही कमा पाई। वहीं, प्रभास की ‘सलार’ ने जरूर दुनियाभर में 700 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की।हालांकि, तेजा सज्जा की ‘हनुमान’ ने जरूर थोड़ी उम्मीद जगाई है। बावजूद इसके फिलहाल बॉक्स ऑफिस ठंडा ही नजर आ रहा है।

बॉक्स ऑफिस के जानकार कहते हैं कि क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्मों ‘सलार’ व ‘डंकी’ को देखने दर्शक तो पहुंचे, लेकिन इन फिल्मों के लिए दिसंबर महीने की पहली तारीख को रिलीज हुई रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ जैसा क्रेज देखने को नहीं मिला। घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 550 करोड़ रुपए से ज्यादा और दुनियाभर में 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करने वाली फिल्म ‘एनिमल’ ने रणबीर कपूर को सुपरस्टार की कैटिगरी में लाकर खड़ा कर दिया। इससे पहले सिर्फ शाहरुख खान ‘जवान’, ‘पठान’ और सनी देओल की ‘गदर 2’ ने ही बीते साल बॉक्स ऑफिस पर इतना जोरदार प्रदर्शन किया था। हालांकि, हर किसी को शाहरुख की ‘डंकी’ से भी कुछ ऐसा ही धमाकेदार प्रदर्शन करने की उम्मीद थी, लेकिन यह फिल्म ऐसा कमाल नहीं कर पाई। ‘डंकी’ ने जहां घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपए की कमाई की, वहीं दुनियाभर में यह महज 460 करोड़ रुपए ही कमा पाई। वहीं, प्रभास की ‘सलार’ ने जरूर दुनियाभर में 700 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की।

बहरहाल, बीते साल घरेलू बॉक्स ऑफिस पर चार फिल्मों ‘जवान’, ‘पठान’, ‘गदर 2’ व ‘एनिमल’ के घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करने के बाद अब हर किसी को इस साल घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 500 करोड़ रुपए और दुनियाभर में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म का इंतजार है। बता दें कि बीते साल बॉक्स ऑफिस पर पहली 500 करोड़ी फिल्म शाहरुख खान की ‘पठान’ जनवरी में ही मिल गई थी। ऐसे में, अब हर किसी की नजरें ऋतिक रोशन की फिल्म ‘फाइटर’ हैं। इसके बाद अप्रैल के महीने में अक्षय कुमार की फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ के अलावा साउथ सिनेमा की कई बड़ी फिल्में रिलीज होंगी। इनमें जूनियर एनटीआर की ‘देवरा’ से लेकर चियान विक्रम की ‘थंगालान’ और सूर्या की ‘कंगुवा’ की काफी चर्चा है।प्रभास की ‘सलार’ और जेसन मोमोआ की ‘एक्वामैन एंड द लॉस्ट किंगडम’ को दर्शकों की ओर से उम्मीद के मुताबिक रिस्पॉन्स नहीं मिला। उसके बाद नए साल में रिलीज हुई विजय सेतुपति और कटरीना कैफ की फिल्म ‘मैरी क्रिसमस’ को भी दर्शकों ने उतना पसंद नहीं किया। हालांकि, तेजा सज्जा की ‘हनुमान’ ने जरूर थोड़ी उम्मीद जगाई है।

क्रिसमस वीकेंड पर रिलीज हुई फिल्मों ‘सलार’ व ‘डंकी’ को देखने दर्शक तो पहुंचे, लेकिन इन फिल्मों के लिए दिसंबर महीने की पहली तारीख को रिलीज हुई रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल‘ जैसा क्रेज देखने को नहीं मिला। घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 550 करोड़ रुपए से ज्यादा और दुनियाभर में 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करने वाली फिल्म ‘एनिमल’ ने रणबीर कपूर को सुपरस्टार की कैटिगरी में लाकर खड़ा कर दिया। बावजूद इसके फिलहाल बॉक्स ऑफिस ठंडा ही नजर आ रहा है। वहीं, प्रभास की अगली फिल्म ‘कल्कि 2898 AD’ की रिलीज डेट मई में घोषित हो चुकी है। जबकि इंडिपेंडेंस डे पर साल का सबसे बड़ा क्लैश अजय देवगन की ‘सिंघम अगेन’ और अल्लू अर्जुन की ‘पुष्पा 2’ के बीच होने वाला है।

राम आंदोलन और नाथ संप्रदाय में क्या है संबंध?

आज हम आपको बताएंगे कि राम आंदोलन और नाथ संप्रदाय में क्या संबंध है! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियों का जायजा लेने जाते हैं तो उनसे ज्यादा खुश कोई और नहीं होता होगा। इसका पहला कारण तो साफतौर पर पेशेवर है। एक तो यूपी सरकार के प्रमुख के रूप में वह अयोध्या में व्यापक परिवर्तन के सूत्रधार रहे हैं। दूसरी वजह उनके दिल के काफी करीब और निजी है क्योंकि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण और वहां भगवान की प्राण प्रतिष्ठा उनके गुरू अवेद्यनाथ की आखिरी इच्छा थी, जो अब पूरी होने जा रही है। नाथ संप्रदाय पर कई किताबें लिख चुके लेखक प्रदीप कुमार राव कहते हैं कि साल 2010 से 2014 तक अपने अंतिम वर्षों में महंत अवेद्यनाथ ने बहुत कम बात की लेकिन जब भी उन्होंने बात तो वह ज्यादातर राम मंदिर के बारे में थी। स्वाभाविक तौर पर योगी आदित्यनाथ के लिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह एक भावनात्मक क्षण है। आख़िरकार, नाथ संप्रदाय में ‘गुरु की आज्ञा’ का पालन सर्वोपरि है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘गुरु गोरखनाथ के अनुयायियों के लिए राम मंदिर एक सपने के सच होने जैसा है। अपने खून-पसीने और संसाधनों से उन्होंने इसकी लौ को जीवित रखा।’

साल 1935 में ‘महंत’ के रूप में नियुक्त हुए दिग्विजय नाथ ने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसने गोरखनाथ मठ को दक्षिणपंथी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना दिया। यह अयोध्या में विवादित परिसर में राम मंदिर बनाने का एक संवेदनशील मुद्दा था। साल 1937 में दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा में शामिल हो गए और राम मंदिर के लिए हिंदुओं को एकजुट करना शुरू कर दिया। 1949 में उन्होंने अयोध्या में स्वयंसेवकों की एक टीम का नेतृत्व किया। बलरामपुर के तत्कालीन राजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह और एक प्रमुख संत स्वामी करपात्री महाराज के साथ इस मुद्दे पर मीटिंग भी की। 22-23 दिसंबर 1949 की आधीरात को जब भगवान राम की मूर्ति तत्कालीन विवादित ढांचे में रखी गई थी, तब दिग्विजय नाथ अयोध्या में थे। यहां उन्होंने स्वयंसेवकों को प्रार्थना शुरू करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि तत्कालीन राज्य सरकार ने डीएम को मूर्ति हटाने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इस कदम से सांप्रदायिक हिंसा हो सकती है। राव कहते हैं कि मूर्ति की स्थापना को आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है। इसके बाद से भगवान एक मूर्त वास्तविकता बन गए जिसने आंदोलन को बढ़ावा दिया और भक्तों और साधुओं को मंदिर के लिए लड़ाई तेज करने के लिए प्रेरित किया। महंत दिग्विजय नाथ ने 1969 में अपनी मृत्यु तक इस आंदोलन को बढ़ावा देना जारी रखा।

अपने गुरु की विरासत को आगे बढ़ाते हुए महंत अवेद्यनाथ ने आंदोलन से जुड़े सभी हिंदू संगठनों और साधुओं को एक मंच पर लाने के लिए 1984 में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। राव कहते हैं, ‘उन्होंने सितंबर 1984 में मंदिर की मुक्ति के लिए बिहार के सीतामढ़ी से अयोध्या तक एक महत्वपूर्ण मार्च का आयोजन किया और लोगों से उस पार्टी या नेता को वोट देने का आह्वान किया जो मंदिर निर्माण का समर्थन करता है।’

31 अक्टूबर 1985 को कर्नाटक के उडुपी में धर्म संसद के दौरान अवेद्यनाथ और दिगंबर अखाड़े के महंत रामचन्द्र दास परमहंस ने मस्जिद का ताला खोलने की मांग की ताकि भक्त प्रार्थना कर सकें। मांग को आगे बढ़ाने के लिए एक समिति अखिल भारतीय संघर्ष समिति का भी गठन किया गया। राव याद करते हैं, ‘1 फरवरी 1986 को जब फैजाबाद के तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने ताला खोलने का आदेश दिया, तब अवेद्यनाथ अयोध्या में थे।’ 22 सितंबर 1989 को दिल्ली की एक रैली में अवेद्यनाथ ने घोषणा की कि राम जन्मभूमि पर ‘शिलान्यास’ 9 नवंबर, 1989 को होगा। 1990 में हरिद्वार में एक बैठक में उन्होंने घोषणा की कि साधु मंदिर निर्माण शुरू करने के लिए अयोध्या जाएंगे, लेकिन कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका क्योंकि तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह और तत्कालीन यूपी सीएम नारायण दत्त तिवारी ने उनसे इस कार्यक्रम को स्थगित करने का आग्रह किया था। जब पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया तो अवेद्यनाथ ने इस मुद्दे पर उनसे मिलने के लिए प्रतिनिधिमंडल को लीड किया था। बाद में उन्होंने घोषणा की कि 30 अक्टूबर 1992 को दिल्ली में धर्म संसद आयोजित की जाएगी और 2 दिसंबर 1992 को कार सेवा शुरू की जाएगी।

मंदिर आंदोलन ने युवा अजय सिंह बिष्ट को 1992 में गोरखपुर के गोरखनाथ मठ की ओर आकर्षित किया था। महंत अवेद्यनाथ से मुलाकात के बाद उन्होंने अपने परिवार को त्याग दिया और नाथ संप्रदाय के संन्यासी का जीवन अपना लिया और अपने नए जीवन में योगी आदित्यनाथ के रूप में जाने गए। आदित्यनाथ ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की बैठकों में भाग लिया। उनके गुरु की अध्यक्षता में हुई बैठक में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा के नेताओं के अलावा अयोध्या के संतों ने भी भाग लिया।

योगी को ये बैठकें आयोजित करने का काम दिया गया जिसके लिए उन्हें हिंदू नेताओं और विद्वानों से सराहना मिली। उनकी क्षमताओं से प्रभावित होकर महंत अवेद्यनाथ ने 1996 में उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। राव कहते हैं कि 1997-98 में जब राम मंदिर आंदोलन यूपी के अन्य हिस्सों में चमक खोने लगा तो आदित्यनाथ ने गोरखपुर और आसपास के जिलों में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से इस मुद्दे को पूर्वांचल में जीवित रखा। साल 1998 में महंत अवेद्यनाथ ने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया और आदित्यनाथ के लिए गोरखपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का रास्ता बनाया, जहां से उन्होंने चार बार जीत हासिल की थी। साल 1998 में लोकसभा में पदार्पण करने वाले आदित्यनाथ ने सदन में राम मंदिर का मुद्दा उठाया।

साल 2017 का साल राम मंदिर आंदोलन के निर्णायक वर्षों में से एक है। इस साल गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने यूपी के मुख्यमंत्री का पद संभाला। राव का कहना है कि सीएम के तौर पर योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या को इस महान दिन के लिए तैयार करने के प्रयास शुरू कर दिए थे। राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रफेसर मनोज दीक्षित कहते हैं, ‘अयोध्या में बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं को शुरू करने के अलावा योगी आदित्यनाथ का सबसे बड़ा योगदान ‘दीपोत्सव’ का आयोजन करना है, जिसने अयोध्या की लार्जर दैन लाइफ छवि बनाई है।’

इससे पहले कि रामलला को अपना ‘महल’ वापस मिल पाता, योगी ने महामारी के दौरान उन्हें एक ढांचे में ट्रांसफर कर दिया। हनुमानगढ़ी के पुजारी महंत राजू दास कहते हैं कि अयोध्या को ‘नव्यता, दिव्यता, भव्यता’ की ओर ले जाने का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जाता है। एक समय था जब योगी जी साल में 4-5 बार अयोध्या आते थे और संतों से चर्चा करते थे कि मंदिर कैसे बनाया जाए? अब सीएम के रूप में वह मंदिर निर्माण कार्य का जायजा लेने और विकास परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए महीने में 5-6 बार आते हैं।

जानिए बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने वाले जज केएम पांडेय की कहानी!

आज हम आपको बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने वाले जज केएम पांडेय की कहानी सुनाने जा रहे हैं! राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह की जोर-शोर से तैयारी है। 22 जनवरी को लेकर अयोध्या दुल्हन की तरह सजाई जा रही है। समारोह काे लेकर लोगों को खूब उत्साह देखा जा रहा है। सियासी दल भी अपने-अपने हिसाब से राजनीति करने में व्यस्त हैं। इस बीच राम मंदिर आंदोलन की चर्चा खूब है। देश भर के तमाम कारसेवक अपनी कहानियां बता रहे हैं। कोई दशकों के उपवास के बाद राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के साथ अन्न ग्रहण करने की तैयारी कर रहा है तो कई दर्शन के लिए पैदल ही अयोध्या रवाना हो चुके हैं। इसी बीच मंदिर आंदोलन की अहम कड़ी बाबरी मस्जिद का ताला खुलने के जिला जज के फैसले और उसके बाद के घटनाक्रम की कहानी आपको बताते हैं। बताते हैं कि कैसे इस फैसले के पीछे एक काला बंदर था? फिर उन जज कृष्ण मोहन पांडेय केएम पांडेय का क्या हुआ? वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा अपनी किताब “युद्ध में अयोध्या” में लिखते हैं कि 28 जनवरी 1986 को फैजाबाद के मुंसिफ मजिस्ट्रेट हरि शंकर दुबे, एक वकील उमेश चंद्र पांडेय की राम जन्मभूमि का ताला खोलने की मांग करने वाली अर्जी को खारिज कर देते हैं। दो दिन बाद ही फैजाबाद के जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय की अदालत में पहले से चल रहे मुकदमा संख्या 2/1949 में उमेश चंद्र पांडेय एक दूसरी अर्जी दाखिल करते हैं। जिला जज बेहद तेज रफ्तार से दूसरे ही रोज जिला कलेक्टर और पुलिस कप्तान को तलब कर उनसे इस सवाल पर प्रशासन की मंशा पूछते हैं। इस मामले पर हलफनामा देने की बजाए इन दोनों अफसरों ने मौखिक जवाब दिया कि ताला खाेलने से कोई गड़बड़ी नहीं होगी। न ही कानून और व्यवस्था की कोई समस्या खड़ी होगी। दरअसल यह फैसला जिला प्रशासन के जरिए केंद्र सरकार का था, जिसे राज्य और जिला प्रशासन लागू करा रहा था। दोनों अफसरों के इस बयान से जज को फैसला लेने में आसानी हुई।

वह आगे लिखते हैं कि बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों के कानूनी दावे का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुश्ताक अहमद सिद्दीकी ने इस अर्जी पर अदालत से अपनी बात रखने की पेशकश की थी। जज ने कहा, उन्हें सुना जाएगा। लेकिन उन्हें बिना सुने ही उसी शाम 4 बजकर 40 मिनट पर जज साहब ने फैसला सुना दिया। इस फैसले में कहा गया, “अपील की इजाजत दी जाती है। प्रतिवादियों को गेट संख्या ओ और पी पर लगे ताले तुरंत खोले जाने का निर्देश दिया जाता है। प्रतिवादी आवेदक और उनके समुदाय को दर्शन और पूजा आदि में कोई अड़चन या बाधा नहीं डालेंगे।” दरअसल इस इमारत के दो गेट थे, जिसमें जिला प्रशासन ने अपनी सुविधा के लिए गेट के नाम ओ और पी रखे थे। जिला जज के फैसले के फौरन बाद डीएम और एसएसपी जिला जज को पहुंचाने उनके घर जाते हैं। उनकी सुरक्षा बढ़ा दी जाती है। फिर 40 मिनट के अंदर ही पुलिस की मौजूदगी में ताला तोड़ दिया जाता है और अंदर पूजा-पाठ, कीर्तन शुरू हो जाता है। दिलचस्प बात ये है कि जज साहब के इस फैसले के पीछे भावना, आस्था और भगवान के रूप में एक बंदर भी था।

किताब में आगे लिखा गया है कि जज कृष्ण मोहन पांडेय धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक थे और पीसीएस ज्यूडिशियल परीक्षा 1959 के टाॅपर थे। 1960 में वह एडिशनल मुंसिफ के तौर पर उन्होंने नौकरी शुरू की थी। 17 अगस्त 1985 को वह फैजाबाद के जिला जज बने। ताला खुलवाने के फैसले का असर उन्हें अपने कॅरियर में भी काफी झेलना पड़ा। फैसले के बाद उन्हें स्टेट ट्रांसपोर्ट अपील प्राधिकरण में चेयरमैन पद पर भेज दिया गया। यही नहीं जब उनके हाईकोर्ट जज बनने की बात चली तो वीपी सिंह सरकार ने पेंच फंसा दिया। उनकी फाइल में प्रतिकूल टिप्पणी कर दी गई।

वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव ने भी उनके हाईकोर्ट का जज बनने का विरोध किया। फिर केंद्र में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और डॉ सुब्रहमण्यम स्वामी उनकी सरकार में कानून मंत्री बने। स्वामी के अनुसार वीपी सिंह और उनके समय के ताकतवर अधिकारी रहे भूरेलाल केएम पांडेय को हाईकोर्ट का जज बनाने के खिलाफ थे। वहीं मुलायम सिंह यादव भी उन्हें जज नहीं बनने देना चाहते थे। उनकी फाइल में राज्य सरकार ने लिख दिया कि इन्होंने 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का विवादित फैसला दिया था इसलिए इन्हें हाईकोर्ट में जज नहीं बनाया जाए। लेकिन सुब्रहमण्यम स्वामी ने केएम पांडेय की फाइल फिर से खोली और काफी कोशिश की बाद आखिरकार केएम पांडेय 24 जनवरी 1991 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज बने। लेकिन एक महीने बाद ही उनका 22 जनवरी 1991 को ट्रांसफर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के लिए कर दिया गया।

जान लीजिए बच्चों की कोचिंग के नए नियम!

आज हम आपके बच्चों की कोचिंग के नए नियम बताने वाले हैं! प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे बेस्ट बनें। बचपन की बेफिक्री वाली उम्र में ही बच्चों पर हम उम्मीदों का बोझ डाल देते हैं कि बड़ा अफसर बनना है, डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है। कई बार हम अपने अधूरे सपनों को बच्चों में जीने लगते हैं। पैरेंट्स की इस सोच का दोहन करने के लिए बड़े शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक धड़ल्ले से कोचिंग सेंटर उग रहे हैं जहां बेचे जाते हैं सपने। सपने डॉक्टर बनाने के, इंजीनियर बनाने के, सीए बनाने के, अफसर बनाने के, टॉपर बनाने के। अपेक्षाओं के बोझ से बने दबाव से स्टूडेंट्स के टूटने और खुदकुशी करने जैसी घटनाएं भी बढ़ रही हैं। दूसरी तरफ, तमाम कोचिंग सेंटर भी फर्जी और गुमराह करने वाले दावों से स्टूडेंट और पैरेंट्स के साथ खिलवाड़ करते हैं। ‘कोटा फैक्ट्री’ नाम की चर्चित वेब सीरीज में इस समस्या को दिखाने की कोशिश हुई थी। हाल ही में आई चर्चित फिल्म ’12th फेल’ में भी इस समस्या की झलक दिखाने की कोशिश हुई थी। फिल्म में दिखाया गया कि यूपीएससी की तैयारी कराने वाला एक कोचिंग सेंटर अपने विज्ञापनों में उन टॉपरों के नाम और तस्वीर का भी इस्तेमाल करता है जो उसके यहां कभी पढ़े ही नहीं थे। अब भारत सरकार ने कोचिंग सेंटरों के लिए कड़े नियम तय किए हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की तरफ से जारी ‘कोचिंग सेंटरों के पंजीकरण और नियमन के लिए दिशानिर्देश 2024’ का मुख्य उद्देश्य कोचिंग सेंटरों के रजिस्ट्रेशन का फ्रेमवर्क तैयार करना और उनकी मनमानी पर रोक लगाना है। शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी इन व्यापक दिशानिर्देशों से कोचिंग संस्थानों को रेग्युलेट करने, स्टूडेंट्स की चिंताओं को दूर करने और प्राइवेट कोचिंग सेक्टर के अनियंत्रित विकास पर लगाम लगाना है। कोचिंग सेंटरों के लिए अब 16 साल से कम उम्र के स्टूडेंट्स का दाखिला लेने की मनाही है।

गाइडलाइंस के मुताबिक, ‘कोचिंग सेंटर’ का मतलब उस संस्थान से है जो किसी व्यक्ति द्वारा स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी स्तर के छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं या अकादमिक सहायता के लिए कोचिंग देने के लिए स्थापित, चलाया या संचालित किया जाता है। और जिसमें 50 से ज्यादा स्टूडेंट हों। सरल शब्दों में कहें तो, अगर कोई संस्थान 50 से ज्यादा छात्रों को किसी भी तरह की पढ़ाई, परीक्षा या स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी के काम में मदद दे रहा है, तो उसे ‘कोचिंग सेंटर’ माना जाएगा। स्टूडेंट्स की खुदकुशी के बढ़ते मामलों, आग लगने की घटनाओं और कोचिंग सेंटरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के साथ-साथ उनके पढ़ाने के तरीकों में कमी से जुड़ीं तमाम शिकायतों के बाद सरकार को ये गाइडलाइंस लानी पड़ीं। पिछले साल देश में कोचिंग सेंटर का हब कहे जाने वाले कोटा में 26 कोचिंग स्टूडेंट ने खुदकुशी की थी। ये हाल के वर्षों में कोटा या किसी भी शहर में स्टूडेंट्स की खुदकुशी का अबतक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

गाइडलाइंस में स्पष्ट किया गया है कि कोचिंग सेंटर किसी भी तरह के गुमराह करने वाले वादे जैसे रैंक की गारंटी या अच्छे मार्क लाने के जैसे वादे नहीं करेंगे। इसके अलावा वे अपनी कोचिंग क्वॉलिटी और सुविधाओं को लेकर गुमराह करने वाले विज्ञापन जारी नहीं करेंगे। कोचिंग सेंटर किसी भी ऐसे ट्यूटर या व्यक्ति को भर्ती नहीं कर सकते जो किसी अदालत की तरफ से किसी अपराध के दोषी ठहराए गए हों। इसके अलावा, ट्यूटर के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी तय कर दी गई है। अगर कोई व्यक्ति स्नातक और उसके समतुल्य योग्यता नहीं रखता तो उसे कोचिंग सेंटर ट्यूटर के तौर पर नहीं रख सकते हैं।

कोचिंग सेंटरों के लिए अपनी वेबसाइट पर ट्यूटरों के क्वॉलिफिकेशन से जुड़े डीटेल, कोर्सेज, पाठ्यक्रम और शुल्क वगैरह से जुड़े डीटेल को अपडेट रखना अनिवार्य किया गया है। कोई भी शख्स अगर कोचिंग इंस्टिट्यूट की वेबसाइट पर जाए तो उसे वहीं पर जानकारी मिल जाए कि वहां किन-किन कोर्सेज की पढ़ाई हो रही है। फीस क्या है, जो ट्यूटर हैं उनकी योग्यता क्या है। इससे पैरंट्स और स्टूडेंट्स को फैसला लेने में आसानी होगी। अलग-अलग कोर्स के लिए वसूली जाने वाली ट्यूशन फी वाजिब और तार्किक होनी चाहिए। गाइडलाइंस के मुताबिक, कोचिंग सेंटर जो भी फीस चार्ज करेंगे उसका रसीद उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। अगर कोई स्टूडेंट कोर्स पूरा होने से पहले ही उसे छोड़ता है तो कोचिंग सेंटर को उसे 10 दिनों के भीतर प्रो-राटा आधार यानी आनुपातिक आधार पर रीफंड देना होगा। गाइडलाइंस का पालन सुनिश्चित करने के लिए उसमें कोचिंग सेंटरों पर पेनाल्टी लगाना भी प्रस्तावित है। अगर कोई कोचिंग सेंटर नियमों का उल्लंघन करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। उस पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, कोचिंग सेंटर का रजिस्ट्रेशन भी रद्द किया जा सकता है।

सभी कोचिंग सेंटरों को जो पहले से मौजूद हों या फिर नई हों, उनके लिए रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। कोई कोचिंग सेंटर गाइडलाइंस का उल्लंघन तो नहीं कर रहा, ये देखना राज्य सरकार का काम होगा। कोचिंग सेंटरों की निगरानी करने, रजिस्ट्रेशन के लिए जरूरी मानदंडों पर वे खरी उतरती हैं या नहीं और गाइडलाइंस का पालन हो रहा है या नहीं, ये देखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी।

आखिर क्यों बंद की गई 16 से कम उम्र के बच्चों की कोचिंग?

हाल ही में केंद्र सरकार ने 16 से कम उम्र के बच्चों की कोचिंग बंद कर दी है! बच्‍चों के लिए कोचिंग के दरवाजे बंद हो गए हैं। सरकार ने इसे लेकर बड़ा ऐलान किया है। नए दिशानिर्देश के मुताबिक कोचिंग संस्थान 16 साल से कम उम्र के स्‍टूडेंट्स का अपने यहां दाखिल नहीं कर सकेंगे। न ही अच्छे नंबर या रैंक दिलाने की गारंटी जैसे वादे कर पाएंगे। इस फैसले के पीछे सरकार ने अपनी मंशा भी जाहिर की है। इसके जरिये वह कोचिंग की ‘मशरूमिंग’ को रोकना चाहती है। गला-काट प्रतिस्‍पर्धा को खत्‍म करना भी इसकी एक मंशा है। नई गाइडलाइंस को स्‍टूडेंट्स में सुसाइड के बढ़ते मामलों, आग की घटनाओं, कोचिंग संस्थानों में सुविधाओं की कमी के अलावा उनकी ओर से अपनाई जाने वाली टीचिंग टेक्‍नीक के बारे में सरकार को मिली शिकायतों के बाद तैयार किया गया है। हालांकि, सरकार के इस फैसले ने पैरेंट्स की उलझन बढ़ा दी है। उनके मन में कई सवाल खड़े होने लगे हैं। वजह भी वाजिब है। यह बच्‍चों के भविष्‍य से जुड़ा सीधा मसला है। आइए, यहां इस फैसले की पेचीदगियों को समझने की कोशिश करते हैं। बच्‍चे करीब 16-17 साल तक इंटरमीडिएट करते हैं। सरकार के इस फैसले का मतलब यह है कि बच्‍चे अब ये कोचिंग नहीं कर सकेंगे। कोई भी पैरेंट शौकिया अपने बच्‍चे को कोचिंग नहीं भेजना चाहता। अक्‍सर यह उनकी मजबूरी होती है। स्‍टैंडर्ड बढ़ने के साथ उनके लिए बच्‍चों को खुद पढ़ा पाना मुश्किल हो जाता है। सबसे ज्‍यादा बच्‍चे फिजिक्‍स, केमिस्‍ट्री, मैथ्‍स और अकाउंट्स के लिए कोचिंग करते हैं। अक्‍सर स्‍कूलों में उन्‍हें जितना पढ़ाया जाता है वह नाकाफी होता है। कई बार बच्‍चों को दो-दो या तीन-तीन सब्‍जेक्‍ट में कोचिंग लेनी पड़ती है। अब इन बच्‍चों और पैरेंट्स के सामने एक बड़ी चुनौती होगी। बच्‍चों के कॉन्‍सेप्‍ट कैसे क्‍लीयर होंगे।

लखनऊ में रहने वाले अजयेन्द्र राजन शुक्ला की बेटी 9वीं की छात्रा है। वह कहते हैं- कोरोना काल के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई के चलते मेरी बेटी की पढ़ाई प्रभावित हुई। आठवीं तक उसने बिना किसी ट्यूशन आदि के एग्जाम क्लियर किया। लेकिन परफार्मेंस देखकर मुझे लगने लगा कि बेटी को सपोर्ट की जरूरत है। स्कूल की पढ़ाई ही उसके लिए काफी नहीं। उसका अकैडमिक स्तर बेहतर करने के लिए मैंने एक प्राइवेट कोचिंग सेंटर में उसका दाखिला कराया। साल भर से वह वहां पढ़ रही है और उसके प्रदर्शन में सुधार भी मैं देख रहा हूं। कोचिंग इंस्टीट्यूट की तरफ से काउंसिलिंग से लेकर पैरेंट्स टीचर मीटिंग भी समय-समय पर कराई जाती है। अब इस फैसले के बाद मेरा सवाल यह है कि अगर 16 साल के बच्चे कोचिंग की सहायता नहीं ले सकते तो उन्हें सपोर्ट कैसे दिलाया जाए। प्राइवेट ट्यूशन करा पाना हर पैरेंट के सामर्थ्य की बात नहीं है। कोचिंग इंस्टीट्यूट कम से कम कम कीमत में बेहतर शिक्षा तो दे ही रहे हैं। हम कहां जाएं?

यह सवाल सिर्फ एक पैरेंट का नहीं है। कमोबेश हरेक पैरेंट के मन में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। यह फैसला ऐसे समय आया जब हाल ही में स्‍कूलों में शिक्षा के स्‍तर पर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई है। SER 2023 ‘बियॉन्ड बेसिक्स’ सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि 14 से 18 साल तक के 86.8 फीसदी बच्चे स्कूल में हैं। यह और बात है कि उनमें से 25 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो अपनी ही क्षेत्रीय भाषा में दूसरी कक्षा की किताब पढ़ने में कठिनाई महसूस करते हैं। यानी सातवीं से 12वीं में पढ़ने वाले करीब एक चौथाई बच्‍चे ठीक से दूसरे दर्ज की किताब तक नहीं पढ़ पा रहे हैं। बेसिक मैथ्‍स की बात करें तो आधे से ज्‍यादा स्टूडेंट्स डिवीजन नहीं कर पाते हैं। यह सर्वे स्‍कूल में पढ़ाई के स्‍टैंडर्ड को साफ दर्शाता है।

नवीन कुमार पाण्डेय भी उन पैरेंट्स में हैं जिन्‍होंने सरकार की नई गाइडलाइंस पर राय जाहिर की है। वह कहते हैं कि कोचिंग संस्थानों के लिए गाइडलाइंस को सही मायने में लागू तभी किया जा सकता है जब बच्चों पर बस्तों का बोझ कम कर दिया जाए। यह संभव नहीं कि ‘तोता रटंत’ वाली व्यवस्था में गार्जियन अपने बच्चे को ट्यूशन या कोचिंग में नहीं भेजकर खतरा मोल लें। जब बच्चे की शैक्षणिक समझ का महत्व ही कुछ तयशुदा सवाल होंगे तो फिर जवाब तैयार करना ही गार्जियन, स्टूडेंट से लेकर स्कूल-कोचिंग तक, पूरे एजुकेशन सिस्टम की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। इस व्यवस्था में ट्यूशन-कोचिंग का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ सकता, चाहे आप कितने भी नियम बना लें। 16 साल का मतलब है कि बच्चा इंटर तक कोचिंग नहीं जा सकता। भला किस गार्जियन के पास इतना वक्त है कि बच्चे का होम वर्क करवा ले। सरकारी स्कूल तो छोड़ दें प्रतिष्ठा प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में भी आर्ट, क्राफ्ट जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों का औपचारिकता ही निभाई जाती है, सिखाने का कोई मकसद नहीं होता है। ऐसे-ऐसे टास्क दिए जाते हैं जो या तो बच्चे के गार्जियन पूरा करते हैं या फिर दुकानों से बने-बनाए प्रॉजेक्ट्स खरीदकर जमा कर दिए जाते हैं। इस प्रक्रिया में बच्चा कहां और क्या सीखता है? होमवर्क के नाम पर बच्चे के मां-बाप को बताने की कोशिश होती है कि बच्चा पैदा किया है तो भुगतो। भला क्या मजाल कि बच्चा होमवर्क पूरा कर ले, उसके मां-बाप जूझते रहते हैं। कई बार तो पति-पत्नी में इस बात को लेकर झगड़ा होता है कि बेटे/बेटी का होमवर्क पूरा करने का ठेका हमने ही लिया क्या, आप भी कर दिया करें। इस तरह चलता है ट्यूशन और कोचिंग का कारोबार। इस जंजाल से मुक्ति पाना है तो गाइडलाइंस जारी करना काफी नहीं होगा, इसकी जड़ में जाना होगा कि आखिर देश के कोने-कोने में कोचिंग का जंगल कैसे उग आए।

सरकार की मंशा भी गलत नहीं है। पिछले कुछ सालों में बच्‍चों में सुसाइड की घटनाएं बढ़ी है। कॉम्पिटीशन बच्‍चों में टेंशन और डिप्रेशन पैदा कर रहा है। इस प्रेशर के कारण पिछले साल कोटा में रिकॉर्ड संख्या में छात्रों ने सुसाइड किया। सरकार बच्‍चों लेवल प्‍लेइंग फील्‍ड भी तैयार करना चाहती है। अभी की व्‍यवस्‍था में साधन संपन्‍न या यूं कहें कोचिंग और ट्यूशन लेने की क्षमता रखने वाले स्‍टूडेंट्स के पास ज्‍यादा अवसर होते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर बच्‍चे कोचिंग न ले पाने के कारण दूसरे बच्‍चों से पिछड़ते हैं। लेकिन, एक सवाल यह है कि लेवल प्‍लेइंग फील्‍ड के नाम पर एजुकेशन के स्‍टैंडर्ड से समझौता नहीं किया जा सकता है। किसी एक स्‍टैंडर्ड के बच्‍चे को उस लेवल की न्‍यूनतम जानकारी जरूर होनी चाहिए। बच्‍चों को प्रमोट करते जाना भी अच्छा नहीं है।

आखिर आईआईटी कानपुर में क्यों हो रही है इतनी आत्महत्या?

हाल ही के दशक में आईआईटी कानपुर में कई आत्महत्या देखने को मिली! आईआईटी कानपुर में एक महीने के अंदर तीन सुइसाइड हो चुके हैं। आईआईटी कानपुर में लगातार सुइसाइड के मामले सामने आ रहे हैं। जिसकी वजह आईआईटी प्रशासन सवालों के घेरे में है। आईआईटी कानपुर में जितनी भी सुइसाइड केस हुए हैं, उनकी असल वजह अभी तक सामने आई है। सभी मौतें एक रहस्य बन कर रह गईं हैं। बल्कि सुइसाइड करने वालों छात्रों के परिजनों भी नहीं समझ पाए कि उनके बच्चे ने आत्महत्या क्यों की? आइए अब तक हुए मामलों पर सिलसिलेवार ढंग से नजर डालते हैं,झारखंड के दुमका जिले के रणबहियार गांव में रहने वालीं प्रियंका जायसवाल केमिकल इंजिनियरिंग से पीएचडी कर रहीं थीं। प्रियंका ने बीते 29 दिसंबर 2023 को दाखिला लिया था। प्रियंका के पिता नरेंद्र जायसवाल बीसीसीएल माइंस रेस्क्यू स्टेशन सुदामडीह के प्रभारी प्रबंधक हैं। वर्तमान में उनकी तैनाती धनबाद में है। छात्रा के पिता नरेंद्र जायसवाल गुरूवार सुबह से बेटी को कॉल कर रहे थे। लेकिन प्रियंका का फोन रिसीव नहीं हो रहा था। जिसकी वजह से नरेंद्र परेशान थे। जब प्रियंका ने कॉल रिसीव नहीं की, तो उन्होंने हॉस्टल मैनेजर रितु पांडेय को कॉल किया। उन्होंने हॉस्टल मैनेजर को बताया कि उनकी बेटी सुबह से फोन नहीं उठा रही है। रितु पांडेय ने जब जाकर देखा, तो प्रियंका का शव उसके कमरे में फंदे से लटक रहा था।

आईआईटी कानपुर में केमिकल इंजिनियरिंग से पीएचडी करने वाली छात्रा प्रियंका जायसवाल पढ़ने में ब्रिलिएंट थी। उसने आईआईटी तमिलनाडू से एमटेक किया था। इसके बाद उसने गेट में अच्छी रैकिंग हासिल की थी। जिसकी वजह से प्रियंका को आईआईटी कानपुर में दाखिला मिला था। प्रियंका ने 29 दिसंबर 2023 को दाखिला लिया था। वहीं, कुछ दिनों पहले ही क्लासेस शुरू हुईं थीं। जिसकी वजह से अभी पढ़ाई का इतना दबाव भी नहीं था। साथी छात्रों के मुताबिक प्रियंका अभी अन्य छात्र-छात्राओं से घुलमिल भी नहीं पाई थी। प्रियंका पर फिलहाल किसी तरह का दबाव नहीं था, तो उसने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया।

आईआईटी प्रशासन ने पीएचडी स्टूडेंट प्रियंका जासवाल के सुइसाइड की खबर पुलिस को दी। छात्रा की सुइसाइड से पुलिस में भी हड़कंप मच गया। डीसीपी, एडीसीपी, एसीपी और कल्यानपुर थाने की पुलिस के सामने हॉस्टल के रूम के दरवाजा तोड़कर प्रियंका के शव को बाहर निकाला गया। फोरेंसिक टीम ने घटना स्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य इकट्ठे किए। पुलिस ने छात्रा के मोबाइल फोन को अपने कब्जे में ले लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक, इंस्टाग्राम, वॉट्एसएप समेत एक्स को खंगालने में जुटी है। वहीं, छात्रा के शव को मॉर्चुरी में रखा गया है। परिजनों के आने के बाद शव का पोस्टमॉर्टम कराया जाएगा।

आईआईटी कानपुर में पढ़ने वाली छात्रा स्वप्निल भास्कर ने 2005 में सुइसाइड कर लिया था।आईआईटी कानपुर से एमटेक करने वाले शैलेश शर्मा ने 2006 में सुइसाइड कर लिया था, आईआईटी कानपुर में पढ़ने वाले जे भारद्वाज ने ट्रेन के आगे कूद कर जान देदी थी। आईआईटी से बीटेक करने वाले प्रशांत कुमार ने 2008 में सुइसाड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से बीटेक करने वाली छात्रा जोया चटर्जी ने 2008 में फेल होने आहत होकर सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से एमटेक करने वाले जे सुमन ने 2009 में सुइसाइड कर लिया था, आईआईटी कानपुर से पीएचडी करने वाले छात्र भीम सिंह ने 2018 में सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर सांइस एंड इंजिनियरिंग विभाग के प्रफेसर प्रमोद सुब्रमण्यम ने 2020 में सुइसाइड कर लिया था। आईआईटी में पढ़ने वाले छात्र प्रशांत सिंह ने 2022 में सुइसाइड कर लिया था।

आईआईटी कानपुर में एक महीने के अंदर यह तीसरी सुइसाइड है। आईआईटी कानपुर में प्रोजेक्ट एक्जीक्यटिव ऑफिसर के पद पर तैनात पल्लवी चिल्लका ने बीते 19 दिसंबर 2023 को हॉस्टल के रूम में सुसाइड कर लिया था। पल्लवी मूलरूप से ओड़िसा की रहने वाली थीं। उन्होंने बीते अगस्त 2023 में ज्वाइनिंग की थी, आईआईटी कानपुर में बीते 10 जनवरी 2024 को मेरठ के कंकरखेड़ा में रहने वाले विकास कुमार मीणा ने सुइसाइड कर लिया था। विकास मीणा आईआईटी कानपुर से एरोस्पेस इंजिनियरिंग से एमटेक कर रहे थे। विकास मीणा ने सुइसाइड करने से पहले सुइसाइड नोट लिखा था। उनके रूम से किसी ने उनका लिखा हुआ, सुइसाइड नोट चोरी कर लिया था। आईआईटी कानपुर से केमिकल इंजिनियरिंग से पीएचडी करने वाली प्रियंका जायसवाल ने 18 जनवरी 2024 को सुइसाइड कर लिया। आईआईटी कैंपस में लगातार सुइसाइड की घटनाएं सामने आ रही हैं। जिसकी वजह से आईआईटी कानपुर सवालों के घेरे में हैं।

जब मंच से कारसेवकों का बढ़ाया गया जोश!

एक ऐसा समय जब मंच से कारसेवकों का जोश बढ़ाया गया था! 6 दिसंबर की तारीख मैं कभी नहीं भूल सकती। उस दिन मेरी धरती पर प्रभु राम का नाम लेकर तमाम नियमों को तोड़ा गया। मेरे राम तो ऐसे थे, जिन्होंने पूरे जीवन मर्यादा का पालन किया। इस कारण वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। पिता के एक वचन के लिए 14 साल वन जाने वाले राम के धाम में उस दिन मर्यादाएं टूटी थी। हालांकि, मैं तब भी चुप थी, जब मेरे प्रभु राम के मंदिर को तोड़कर कर मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीरबाकी ने मस्जिद का निर्माण करा दिया था। लेकिन, उस दिन सभी स्तर पर मर्यादाएं टूटी थी। केंद्र सरकार पूरी स्थिति को काबू कर पाने में सक्षम थी, वहां से कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार रामभक्त कारसेवकों पर गोली न चलने का आदेश देकर पहले ही तय कर चुकी थी, अगर स्थिति बिगड़ी तो प्रशासन और पुलिस मूकदर्शक बनकर देखती रहेगी। आगे जो कुछ करना होगा, वह कारसेवक ही करेंगे। 6 दिसंबर की घटना को कारसेवकों के आक्रोश की परिणति के रूप में पेश किया जाता है। उस दिन कारसेवकों ने मुगलों के उस गुलामी के प्रतीक को मिटा दिया। सब कुछ कानून के दायरे में होता तो बात अलग थी, लेकिन उस दिन कानून टूटता रहा और कानून के रखवाले कुछ नहीं कर पाए। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित परिसर में किसी प्रका का निर्माण न होने देने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वर को इसी की निगरानी के लिए नियुक्त किया गया था। लेकिन, निर्माण की जगह ध्वंस हो रहा था। इस प्रकार की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था। मतलब, निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना थी और ध्वंस कानून- व्यवस्था का मसला। जिसे संभालने में केंद्र और राज्य दोनों सरकारें फेल हो गई। 6 दिसंबर की दोपहर 3:00 बजते- बजते मस्जिद का एक गुंबद गिरा और फिर मस्जिद का मुख्य गुंबद गिरा। बाबरी के अध्याय का आज समापन हो रहा था और देश में एक नए विवाद शुरुआत। साथ ही, यह राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद के अंत की भी शुरुआत साबित हुई। दोपहर 12:00 बजे से शुरू हुई कारसेवा करीब 2:45 बजे पहले मुकाम पर पहुंचती दिखने लगी। विवादित ढांचे का बायां गुंबद गिरा। विश्व हिंदू परिषद जिस मुख्य गुंबद को रामलला का गर्भगृह कहती थी। वह बीच का गुंबद शाम 4:40 बजे नीचे आया। उस समय तक मंदिर आंदोलन के तमाम सीनियर नेता कारसेवा स्थल से निकल गए थे। रामकथा कुंज में लगाए गए लाउडस्पीर के तार को दुरुस्त करा लिया गया था। अब रामकथा कुंज के मंच पर दूसरी पंक्ति के राजनेता और विश्व हिंदू परिषद के साधु- संत मौजूद थे। उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेंद्र मंच से भाषण की शुरुआत कर चुके थे। आचार्य धर्मेंद्र रामकथा कुंज के मंच कारसेवकों से अपील कर रहे थे कि जिन्होंने प्रसाद नहीं लिया है, वह प्रसाद ले लें। प्रसाद का मतलब बाबरी मस्जिद की ईंटों से था। कारसेवकों को जमीन समतल किए जाने की भी बात कही गई। उमा भारती कह रही थीं, अभी काम पूरा नहीं हुआ है। जब तक काम पूरा न हो जाए, परिसर न छोड़ें। पूरा इलाका समतल करना है। इस तमाशे में उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेंद्र की भूमिका सबसे खास थी।

उमा भारती उस दिन काफी खुश दिख रही थी। वह कारसेवकों को ललकार रही थी। 6 दिसंबर 1992 की कारसेवा में उमा भारती ने दो नारा दिया। एक नारा था, ‘राम नाम सत्य है, बाबरी मस्जिद ध्वस्त है’। वहीं, दूसरा नारा था, ‘एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो’। कारसेवक मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे के साथ- साथ अब इन दोनों नारों से जुड़ गए। उमा भारती ने भीड़ के सामने मेरठ की शिव कुमारी को बाबरी गुंबद पर चढ़ने वाली पहली महिला कारसेवक कहकर संबोधित किया। इसके बाद तो गुंबद पर चढ़ने वालों की होड़ मच गई। इसके बाद मंच पर 1990 की कारसेवा में मारे गए युवा भाइयों रामकुमार और शरद कोठारी के माता- पिता को भी भीड़ के सामने लाया। उमा भारती ने कहा कि इनके बेटों का बलिदा व्यर्थ नहीं गया। इनकी आंखों में आज खुशी के आंसू हैं। हमने उनकी हत्या का बदला ले लिया। उमा कारसेवकों से शुभ और पवित्र कार्य को पूरा करने की अपील करती जा रही थीं। बीच में माइक से अन्य साधु- संत हनुमान चालीसा और हनुमान अष्टक का पाठ कर रहे थे।

कारसेवक 6 दिसंबर को कुछ अलग ही सोच के साथ आए थे। वह 1934 वाली स्थिति नहीं चाहते थे। 1934 में रामभक्तों ने बाबरी के तीनों गुंबदों को तोड़कर दिया था। बाद में फैजाबाद कलेक्टर ने उसका निर्माण करा दिया। इस बार बाबरी परिसर को समतल करके ही कारसेवा समाप्त किए जाना था। ढांचा गिरते ही कारसेवकों पूरी ताकत के साथ मलबे को समतल करने में जुट गए। वह वहां जल्द से जल्द रामलला को दोबारा स्थापित करना चाह रहे थे। पुलिस- सुरक्षा बल, केंद्र सरकार और कल्याण सिंह सरकार तीनों इसी काम के पूरा होने का इंतजार कर रही थी। इसके बाद ही कोई कार्रवाई होनी थी। कारसेवकों ने ढांचे का मालवा पीछे खाई में गिराया। जमीन समतल करने में लग गए। 15×15 गज के टुकड़े पर जल्दी से जल्दी 5 फीट की दीवार बनाई गई। इसके नीचे अस्थाई चबूतरे तक 18 सीढ़ियां बनी।

अस्थायी निर्माण होने के बाद वहां रामलला की स्थापना होनी थी। लेकिन, मूर्ति गायब होने की खबर सामने आई। कारसेवकों में से किसी ने बाबरी परिसर से रामलला को लेकर निकले पुजारी आचार्य सत्येंद्र के हाथ से मूर्ति गायब कर दी थी। अस्थायी मंदिर निर्माण होने के बाद रामलला नहीं मिले तो हड़कंप मचा। केंद्र सरकार से लेकर यूपी सरकार तक मूर्ति स्थापना के इंतजार में थी। पल- पल का अपडेट कंट्रोल रूप से लिया जा रहा थाञ केंद्र की ओर से अयोध्या मामले का प्रभारी केंद्रीय राज्यमंत्री पीआर कुमार मंगलम को बनाया गया था। वह भी अयोध्या पर पैनी नजर बनाए हुए थे। अधिकारियों से पूछ रहे थे कि मूर्तियां अस्थायी मंदिर में रखी गई हैं या नहीं। केंद्र सरकार उस दिन मूर्तियों की स्थापना को लेकर विशेष रूप से सक्रिया थी।

रामलला की मूर्ति गायब होने के बाद केंद्र सरकार हरकत में आई। केंद्रीय मंत्री कुमार मंगलम ने अयोध्या के राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र से संपर्क किया। उनसे तत्काल उपाय ढूंढ़ने का अनुरोध किया। राजा साहब को जैसे ही मामले की जानकारी मिली, उन्होंने अपने घर में रखी गई रामलला की मूर्तियों को अस्थायी मंदिर में स्थापित किए जाने के लिए भेज दिया। दरअसल, राजा साहब की दादी ने रामलला की एक मूर्ति बनवाई थी। वह राम मंदिर में उसे स्थापित कराना चाहती थीं। राजा साहब ने इस मौके पर मूर्ति को अस्थायी मंदिर में स्थापित करा दिया। केंद्रीय मंत्री को मामले की जानकारी दी गई। इसके बाद पीएम नरसिंह राव ने कैबिनेट बैठक बुलाकर कल्याण सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की। कैबिनेट की सिफारिश लेकर केंद्रीय गृह मंत्री एसबी चह्वाण स्वयं राष्ट्रपति भवन गए। राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने तत्काल कल्याण सरकार को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। अयोध्या केंद्र के हवाले थी। हालांकि, इस अधिसूचना से करीब 3 घंटे पहले कल्याण सिंह यूपी के राज्यपाल को इस्तीफा सौंप चुके थे।

बाबरी विध्वंस की प्राथमिकी के तहत नेताओं की गिरफ्तारी हुई। एफआईआर के आधार पर लालकृष्ण आडवाणी, विष्णु हरि डालमिया, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और विनय कटियार 8 दिसंबर 1992 को गिरफ्तार किए गए। उन्हें माता टीला डैम ललितपुर के गेस्ट हाउस में रखा गया। सीजेएम ललितपुर आरआर यादव की कोर्ट में उन्हें 10 जनवरी को पेश किया। जज आरआर यादव ने 10 जनवरी 1992 की शाम छह बजे फैसला सुनाया। जज ने सभी आरोपियों को बिना शर्त ससम्मान रिहा कर दिया। जज ने अपने छह पेज के फैसले में कहा था कि सरकार एफआईआर के संबंध में प्राथमिक साक्ष्य पेश करने में असमर्थ रही है। इसके बाद राम मंदिर का आंदोलन चुनावी मुद्दा बन गया। लड़ाई अब नेताओं के भाषण और कोर्ट में लड़ी जा रही थी। यूपी में 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में काशीराम के साथ मिलकर मुलायम सिंह यादव ने चुनाव लड़ा।

यूपी के चुनावी मैदान में नारा दिया गया, ‘मिले मुलायम- काशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। बदले सामाजिक समीकरण के यह चुनाव गठबंधन ने जीता। यूपी में सत्ता बदली। राम मंदिर का मुद्दा भी गौण हो गया। विवादित ढांचा गिराए जाने के अगले 11 सालों तक राम मंदिर आंदोलन में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मिली। मामला फैजाबाद कोर्ट से होते हुए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच रहा था। परिणाम कुछ नहीं निकल रहा था। इस बीच 1998 और 1998 में दो बार केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए सत्ता में आई। यूपी में भी भाजपा दोबार सरकार बनाने में कामयाब रही। लेकिन, मंदिर मुद्दा कोर्ट की दहलीज पार नहीं कर पाया। रामलला अब टेंट में थे।

How to Download ISM Gist Malayalam Typing Software Free ➤ Easy Guide


Download ISM Malayalam Typing Software Free

We all want to type in Malayalam easily on our computers, right? Well, we’ve found a great way to do it! Let’s talk about how to download ISM Gist Malayalam typing software free. This tool is perfect for anyone who needs to type in Malayalam on Windows 7 or 10. It’s not just any typing tool; it’s designed to make typing in Malayalam a breeze with its user-friendly keyboard layout. Whether it’s for creating documents or communicating in Malayalam, this software has got us covered.

Why Choose ISM Gist for Malayalam Typing?

  • User-Friendly: The Malayalam keyboard layout is easy to understand and use.
  • Versatile: Perfect for both Windows 7 and 10 users.
  • Free: Yes, you read that right! It’s totally free.

How to Get Started

  1. Visit the Official Site: Just search for the ISM Gist Malayalam typing software.
  2. Download: Find the download link for the free version.
  3. Install: Follow the installation guide. It’s simple and quick!

Features We Love

  • Malayalam Text Input Software: Makes typing in Malayalam effortless.
  • Compatibility: Works smoothly on Windows 7 and 10.
  • Free Malayalam Typing Tool: No cost involved, which is fantastic for us!

Discover how to download ISM Gist Malayalam typing software free, a safe and legal tool designed for seamless Malayalam text input on Windows 7 and 10. This free Malayalam typing software offers a user-friendly keyboard layout, enhancing document creation and communication. Perfect for anyone needing reliable Malayalam language software on their PC.

🔑 Keywords to Remember:

  • Free Malayalam typing tool
  • Malayalam keyboard layout
  • Windows Malayalam typing
  • Malayalam language typing

📌 Remember: Always download from the official site to ensure it’s safe and legal. Happy typing!

How to Download ISM Gist Malayalam Typing Software for Free

Finding how to download ISM Gist Malayalam typing software free is easy and beneficial for all of us who love typing in Malayalam. This software is a game-changer for creating Malayalam documents and communicating in our beautiful language on PCs.

How to download ism gist malayalam typing software free for windows 10

For those of us using Windows 10, getting this free Malayalam typing software is straightforward. Just follow these simple steps:

  1. Go to the official website where ISM Gist is available.
  2. Look for the Windows 10 version of the software.
  3. Click on the download link and wait for the download to complete.
  4. Once downloaded, open the file and install it by following the on-screen instructions.

How to download ism gist malayalam typing software free for pc

Downloading ISM Gist for our PCs, regardless of the operating system, involves a few easy steps:

  1. Search for the ISM Gist official download page on the internet.
  2. Find the version that is compatible with your PC.
  3. Click the download button and wait for the file to download.
  4. Open the downloaded file and proceed with the installation process to start typing in Malayalam.

How to download ism gist malayalam typing software free for windows 7

For our friends still using Windows 7, don’t worry; you can also enjoy Malayalam typing:

  1. Visit the official ISM Gist download page tailored for Windows 7 users.
  2. Locate the download link for the Windows 7 version.
  3. Download the software by clicking on the link.
  4. After downloading, install the software by following the instructions provided.

Key Features of ISM Malayalam Typing Software

When we talk about typing in Malayalam, ISM Malayalam Typing Software stands out. It’s packed with features that make Malayalam typing easy and efficient for us. From its user-friendly interface to its compatibility with different Windows versions, it’s a tool we all appreciate.

ISM V6 Features

ISM V6 is a game-changer for us. It offers advanced Malayalam language input methods that are both intuitive and efficient. With features like auto-correction and spell-check, typing in Malayalam has never been easier. Plus, its Malayalam keyboard layout is designed to suit both beginners and advanced users.

Comparison between different ISM flavours

Comparing different versions of ISM, we notice significant improvements in each new release. The latest versions support Windows Malayalam typing more smoothly and offer more Malayalam text input software features. Whether it’s ISM Gist for Windows 7 or ISM Malayalam typing software free download Windows 10, each version is tailored to meet our evolving needs.

Technical Setup Details

Understanding the technical setup of ISM Malayalam Typing Software is crucial for us. It’s compatible with various Windows versions, making Malayalam typing for Windows 10 and Windows 7 a breeze. The installation process is straightforward, ensuring that we can start typing in Malayalam without any hassle.

Frequently Asked Questions (FAQs)

How to download and install ism?

To download and install ISM, we first need to find a reliable source. Once we have the software, we click on the download button, wait for it to finish, and then open the file. The installation guide will help us through the rest. It’s like following a recipe to bake a cake, easy and straightforward!

Is ism a free software?

Yes, ISM is a free software! This means we don’t have to spend our allowance or ask our parents for money to use it. It’s like getting a free ticket to type in Malayalam on our computers.

How to download inscript Malayalam keyboard?

Downloading the Inscript Malayalam keyboard is like finding a treasure map. We search for the Inscript Malayalam keyboard online, find the download link, and click on it. After downloading, we follow the steps to add it to our system. It’s our key to unlocking Malayalam typing.

What is ism Malayalam typing software?

ISM Malayalam typing software is our magic tool for typing in Malayalam. It lets us create documents, send emails, and do much more in Malayalam easily. Think of it as our friendly robot that understands Malayalam and helps us communicate in our language on the computer.

Aviator Predictor Download ➤ Boost Your Wins in Online Casino Game



banner

Download Aviator Predictor: Enhance Your Betting Strategy

When we’re all about diving into the thrilling world of aviator game strategy and virtual plane betting, there’s one tool we can’t overlook—the Aviator Predictor download. This nifty piece of software is like having a co-pilot in the cockpit of online casino tools, guiding us through the clouds of chance and strategy games. 🎮✈️

Why We Love the Aviator Predictor

First off, the Aviator Predictor v4.0 and Aviator Predictor Premium APK are game-changers. They’re designed to enhance our gameplay experience and improve our betting odds in these fast-paced casino games. With features that help us predict when the virtual plane might take off or land, it’s like having a crystal ball for high reward casino games.

  • 🎲 Primary Rules & Gameplay: Understanding the basics is crucial. The Aviator game is all about timing and prediction. We place our bets and watch as the virtual plane takes off, with the multiplier increasing the higher it flies. The goal? Cash out before the plane flies away!

  • 🔄 Practice in Demo Mode, Then Switch to Real Money Mode: The Aviator Predictor allows us to practice our strategies in demo mode without risking real money. Once we’re confident, we can switch to real money mode and start maximizing our winnings.

  • 💬 Social Features and Real-Time Data: One of the coolest parts of the Aviator game is its social features. We can chat with other players in real-time, share tips, and even see live bets and cash-outs as they happen. The Aviator Predictor integrates this data to offer more accurate predictions.

  • 🔄 Autoplay and Auto-Cashout Functions: For us, the convenience of setting up autoplay and auto-cashout is a huge plus. It means we can set our betting strategy and let the tool do the work, keeping our gameplay smooth and enjoyable.

  • 📈 Game RTP and Bonuses: Knowing the game’s Return to Player (RTP) helps us strategize better. And with bonuses like a first deposit bonus of up to ₹450,000 + 250 free spins, we’ve got more reasons to play and win.

  • 🎯 Prediction, Strategy, Tricks, and Tips: The Aviator Predictor is packed with features to help us refine our betting strategy. From prediction algorithms to tips on maximizing bonuses, it’s all about giving us the edge.

Discover the Aviator Online Casino Game, a thrilling blend of chance and strategy where players bet on a virtual plane’s flight. Enhance your gameplay with our safe, legal, and free tools like the Aviator Predictor download. Access features such as the Aviator Predictor v4.0 and Premium APK to improve your betting odds and maximize winnings.


main-image

Why Use an Aviator Predictor?

Aviator Predictor v4.0 Download: What’s New?

The Aviator Predictor v4.0 download is like getting a brand-new, shiny toy that makes our aviator game strategy even cooler. Imagine having a magic wand that helps us see into the future of our virtual plane betting games. That’s what this new version feels like! 🌟✨

  • Faster and Smarter: It’s like the predictor went to the gym and got super strong. Now, it can make predictions faster and with more accuracy. This means we can make better decisions quicker!
  • User-Friendly Interface: They’ve made it so easy to use, it’s like the buttons just understand what we want. This means we spend less time figuring out how to use it and more time winning.
  • Enhanced Compatibility: Whether we’re playing on a phone or a computer, this version is like a chameleon. It adapts and works perfectly, so we can play anywhere, anytime.

By downloading the Aviator Predictor v4.0, we’re basically giving ourselves a VIP pass to be ahead in the game. It’s like having a secret weapon that makes winning more fun and a lot easier.

Aviator Predictor Premium APK: Features and Benefits

With the Aviator Predictor Premium APK, it’s like we’re stepping into a luxury version of our favorite game. This premium package is packed with features that make us feel like we’re flying first class in the world of online casino tools.

  • Exclusive Predictions: Think of it as having a personal fortune teller for our bets. The premium version gives us access to predictions that aren’t available anywhere else.
  • No Ads: It’s like having an ad blocker built right in. We can focus on our game without any annoying interruptions.
  • Continuous Updates: Just when we think it can’t get any better, it does. With regular updates, the predictor keeps getting smarter, helping us stay on top of our game.

Choosing the Aviator Predictor Premium APK is like choosing to ride in a limousine instead of a regular car. It gives us that extra comfort and edge in our betting strategy, making every game a VIP experience.

Aviator Predictor Online Free vs. Premium: Which to Choose?

Deciding between the Aviator Predictor online free version and the premium one is like choosing between ice cream and a sundae. Both are great, but one has a little extra topping that makes it even better.

  • Free Version: It’s like the ice cream. Delicious, does the job, and gives us a taste of how much fun we can have predicting and winning in our games. It’s perfect for us if we’re just starting out or if we’re not ready to commit to the premium version yet.
  • Premium Version: This is the sundae. It has all the goodness of the free version plus some amazing extras—like exclusive predictions and no ads—that make our gaming experience even sweeter.


main-image

How to Safely Download and Use Aviator Predictor

Aviator Predictor Hack APK Download: Risks and Safeguards

When we’re looking to get ahead in the game, it’s tempting to search for shortcuts like an Aviator Predictor hack APK download. But, let’s be real, going down the hack route is like wandering into a dark alley; it’s risky and can lead to trouble. 🚫👾

  • Risks: Downloading a hacked APK could mean inviting malware into our devices, risking our personal info, and even getting banned from the game. It’s like opening our digital doors to strangers.
  • Safeguards: To keep our gaming safe and fun, we stick to official sources for an Aviator Predictor download. It’s like choosing a well-lit path instead of that dark alley. We make sure our antivirus is up to date, too, just in case we bump into any digital bumps.

Steps for Secure Aviator Predictor Download

To safely boost our aviator game strategy, following the right steps for an Aviator Predictor download is key. It’s like following a treasure map; every step brings us closer to gold. 🗺️💎

  1. Visit Official Sources: We start by going to trusted websites or app stores. It’s like shopping at a well-known store instead of a shady market.
  2. Check Reviews: We look at what other players say. It’s like asking friends for advice before trying something new.
  3. Verify Compatibility: We make sure it works with our device. It’s like checking if a puzzle piece fits before adding it to our game.
  4. Install Securely: We follow the instructions carefully, keeping our antivirus on guard. It’s like having a safety net while walking a tightrope.

Aviator Predictor Login: Getting Started

Once we’ve safely downloaded the Aviator Predictor, it’s time to dive in. Logging in is the first step on our adventure. It’s like opening the door to a treasure-filled cave. 🚪💰

  • Create an Account: We sign up with our details. It’s like getting our exclusive pass to the club.
  • Explore Features: We take a tour of all the cool tools and features. It’s like checking out the map before we start our treasure hunt.
  • Set Preferences: We adjust the settings to suit our style. It’s like setting up our gear before the big game.


main-image

Alternatives to Aviator Predictor

Aviator Predictor 1xBet: Integrating with Betting Platforms

When we’re exploring the vast world of virtual plane betting, it’s essential to have tools that sync seamlessly with our favorite betting platforms. That’s where Aviator Predictor 1xBet comes into play. Imagine having a buddy who’s always got the inside scoop on the next flight pattern of our virtual plane. That’s what this integration feels like. 🤝✈️

  • Seamless Integration: It’s like having a bridge that connects our betting account with powerful prediction tools. This means we can make informed bets without switching between apps.
  • Enhanced Betting Experience: With real-time data flowing directly into our betting strategy, it’s like we’re playing the game with x-ray vision. We can see beyond the surface, making our bets smarter.
  • Exclusive Access: Sometimes, platforms like 1xBet offer special features or bonuses for using integrated tools. It’s like getting a VIP pass to the best rides at an amusement park.

Free Tools Similar to Aviator Predictor

In our quest for the ultimate aviator game strategy, we’re always on the lookout for tools that can give us an edge without breaking the bank. Free tools similar to the Aviator Predictor are like finding hidden treasures in the vast sea of the internet. 🌐💎

  • Community-Driven Predictors: Imagine a group of seasoned aviators coming together to share their predictions. These community tools are built on shared knowledge, making them a goldmine for insights.
  • Basic Prediction Software: There are free versions of prediction software that, while not as advanced as the Aviator Predictor Premium APK, still provide us with a glimpse into potential game outcomes. It’s like having a basic compass instead of a GPS; it still points us in the right direction.
  • Online Forums and Guides: Sometimes, the best tools are the knowledge and experiences shared by other players. Online forums and strategy guides are packed with tips and tricks that can help us refine our betting strategy. It’s like sitting around a campfire, exchanging adventure stories with fellow explorers.

While these free tools might not have all the bells and whistles of the premium versions, they offer us a starting point to enhance our gameplay experience and improve our betting odds. It’s about making the most of what we have and using it to climb higher in the world of fast-paced casino games.


main-image

FAQs on Aviator Predictor

Is there a real Aviator predictor?

Yes, there is! We’ve found that the Aviator Predictor is a real tool that helps us with our aviator game strategy. It’s like having a smart friend who gives us hints on when the virtual plane might take off or land. This tool is designed to improve our betting odds and make the game even more exciting. 🛩️💡

Can I predict an Aviator?

With the Aviator Predictor, predicting the outcome of a virtual plane’s flight becomes easier. It doesn’t mean we can guess right every time, but it sure helps a lot. The predictor uses data and algorithms to give us a better chance at guessing when to cash out. It’s like having a little cheat sheet that makes our guesses smarter. 📊✨

Is Aviator Predictor 12.0 5 APK available?

We’ve heard about different versions of the Aviator Predictor, but finding a specific version like 12.0 5 APK might be tricky. It’s important to stick to official sources or updates for the Aviator Predictor download options to make sure we’re using safe and compatible versions with our devices. Always check for the latest version to get the best features and improvements! 📱🔄

How to get Aviator predictor activation code?

Getting an Aviator Predictor activation code usually involves downloading the tool and following the setup instructions. Sometimes, the code might be sent via email or displayed on the download page. Make sure to enter the code correctly to unlock all the cool features that help us win more at the game. It’s like getting a key to a treasure chest full of helpful tips and tricks! 🔑💎

banner

आखिर कैसी थी आयरिश आजादी की वो जंग?

आज हम आपको आयरिश आजादी की जंग के बारे में बताने जा रहे हैं! सन 1920 को कई मायनों में ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत के दबदबे के अंत की शुरुआत का साल कहा जा सकता है। इसी साल अंग्रेजों के खिलाफ उसके दो अहम उपनिवेशों में इंकलाब का स्वर तेजी से उभरा। आयरलैंड और भारत में आजादी के आंदोलनों ने इस कदर जोर पकड़ा कि अंग्रेजी राज के लिए उस पर काबू पाना मुश्किल हो गया। आयरलैंड के लोग आजादी के लिए युद्ध का बिगुल बजा रहे थे, जबकि भारतीय असहयोग आंदोलन चलाने की तैयारी में थे। अंग्रेजों का सबसे बड़ा डर यह था कि उनके खिलाफ उठ रही ये आवाजें कहीं एक होकर ब्रिटिश साम्राज्य का अंत न कर दें। यही वजह है कि पंजाब में तैनात हुकूमत की फौज के आयरिश जवानों के एक बड़े जत्थे ने जब 1919 में जलियांवाला बाग में कत्लेआम के बाद शुरू हुए विद्रोह के स्वर में स्वर मिलाया तो, लंदन में बैठे अफसरों के पसीने छूट गए।

जिस घटना से ब्रिटिश हुक्मरान हिल गए, वह थी 1920 में भारत में तैनात कनॉट रेंजर्स की बगावत। आयरलैंड में तो इस बगावत का असर बाद तक कायम रहा, लेकिन भारत में यह तब भी ‘मामूली’ बात थी। यह और बात है कि अंग्रेजों के खिलाफ यह विद्रोह भारत भूमि पर ही हुआ। अंग्रेज सेंसरशिप की वजह से दुनिया से इस बगावत की खबर बहुत हद तक छुपा ले गए। लेकिन भारतीय इतिहासकारों ने भारत के आयरिश कनेक्शन पर खूब लिखा। मिसाल के लिए, गदर क्रांति, जिसे आयरिश-हिंदू-जर्मन या ऐनी लार्सन प्लॉट भी कहा जाता है और होम रूल आंदोलन। हालांकि पता नहीं क्यों, उन्होंने कनॉट रेंजर्स की बगावत पर कलम नहीं चलाई। आज तक यह साफ नहीं हुआ है कि बगावत करने वाले आयरिश पंजाब या किसी और इलाके के लोकल लीडर्स के संपर्क में आए या नहीं। लेकिन इनमें से कम-से-कम दो ने जालंधर से सोलन तक बगावत के दिनों में यात्रा की। स्थानीय बाजार से कपड़े खरीदे ताकि आयरिश झंडे बनाकर फहराए जा सकें। अंग्रेजों ने बगावत को कोर्ट-मार्शल और सजा-ए-मौत के जरिए निपटाया। आयरिश जवानों पर कई मुकदमे चले। जेम्स डेली नाम के आयरिश जवान को नवंबर की एक सर्द सुबह सोलन में गोली मार दी गई। उसकी उम्र 21 बरस थी। शुरू में कुल 14 लोगों के नाम सजा-ए-मौत का फरमान जारी हुआ। लेकिन मौत आई सिर्फ जेम्स के हिस्से। बाकियों को जेल में डाल दिया गया।

बगावत’ शब्द से ब्रिटिश भय खाते रहे हैं। खासतौर से भारत में हुए 1857 के विद्रोह से। इस विद्रोह ने दुनिया का सबसे ताकतवर साम्राज्य बनने के उनके मंसूबों को भी खतरे में डाल दिया था। 18वीं सदी के ढलते वर्षों में एक कामयाब सशस्त्र विद्रोह के बाद अंग्रेज अमेरिकी उपनिवेश पहले ही गंवा चुके थे। कनॉट रेंजर्स की फर्स्ट बटालियन के करीब 400 जवानों ने उस वक्त ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जालंधर और सोलन में विद्रोह का झंडा बुलंद किया, जिस वक्त महात्मा गांधी भारत में पहला असहयोग आंदोलन चलाने की योजना बना रहे थे। तब जालंधर और सोलन पंजाब सूबे में आते थे। विडंबना यह थी कि कुछ महीने पहले तक इस राज्य के लेफ्टिनेंट गवर्नर एक आयरिश माइकल-ओ-ड्वॉयर हुआ करते थे। इन्हें साल भर पहले यानी 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम देने वाले जनरल रेजिनल्ड डायर का बचाव करने के लिए कुख्याति मिली। जब कनॉट रेंजर्स ने विद्रोह किया, तो पूरे सूबे में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।

कनॉट रेंजर्स के विद्रोह के सौ बरस बाद आयरिश और भारतीय आखिरकार साथ आए और उन्होंने एक-दूसरे को जोड़ने वाले इतिहास के इस धागे का ओर-छोर ढूंढना शुरू किया है। उनका फोकस खास तौर पर 1920 की बगावत से जुड़े हालात और घटनाओं पर है। इसके तहत कुछ समय पहले एक वेबिनार का आयोजन किया गया, जिसका नाम था, ‘इंडिया, आयरलैंड ऐंड वर्ल्ड वॉर 1 : द कनॉट रेंजर्स 1920 म्यूटिनी ऐंड इट्स सोशियो-पॉलिटिकल डायमेंशंस’।

JNU के इतिहास विभाग और आयरिश दूतावास ने डेली की कुर्बानी के शताब्दी-स्मरण के तौर पर यह वेबिनार रखा। इसमें आयरलैंड के संदर्भ में बगावत की कहानियों और इसके असर पर चर्चा हुई। यह भी पता चला कि आयरिश समाज आज भी इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंटा है। एक मानता है कि यह बगावत देश के मुक्ति-संघर्ष से जुड़ी थी। दूसरा इसे स्थानीय विद्रोह करार देता है। उसे लगता है कि इस बगावत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि शहीद के दर्जे के साथ पेंशन और दूसरी सहूलियतें मिलें।