Friday, March 6, 2026
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क्या अमेरिका में भारतीयों पर आ सकता है संकट?

अमेरिका में अब भारतीयों पर संकट भी आ सकता है! डोनल्ड ट्रम्प ने रिपब्लिकन आयोवा कॉकस में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 30 अंकों से रिकॉर्ड जीत हासिल की और तुरंत अमेरिका-मेक्सिको सीमा को सील करने की अपनी योजना बता दी। 2019 में जो बाडेन ने एक साहसिक घोषणा की थी- जिसे भी दमन का डर है, उसे तुरंत सीमा की तरफ भगाना चाहिए। यह बयान अब बाइडेन पर भारी पड़ रहा है। तब से अमेरिका-मेक्सिको बॉर्डर पर अप्रवासियों की बाढ़ आ गई है। पिछले साल सीमा पर गश्त करने वाले एजेंटों ने अवैध रूप से प्रवेश करने की कोशिश कर रहे लोगों के साथ 25 लाख से अधिक झड़प की सूचना दी। बाइडेन फिर से राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे हैं तो अवैध आव्रजन एक विस्फोटक मुद्दा बन गया है। उनके संभावित रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी ट्रंप सीमा पर ‘अराजकता’ का मुद्दा बार-बार उठा रहे हैं। उन्होंने वादा किया है कि अगर वो जीते तो ‘अमेरिकी इतिहास में सबसे बड़े घरेलू निर्वासन अभियान’ को अंजाम देंगे। यह एक ऐसे व्यक्ति का वादा है जिसने सीमा पर ‘दीवार’ खड़ी की और ‘अमेरिका को सुरक्षित रखने’ के लिए सीमा नियंत्रण के कठोर कानून बनाए। इसलिए उनके वादों पर भरोसा किया जा सकता है।

अवैध आव्रजन इतना ज्यादा बढ़ गया है कि डेमोक्रेटिक गवर्नर और मेयर भी इस पर बढ़-चढ़कर बातें कर रहे हैं। अस्थायी आश्रय स्थल अवैध प्रवासियों से खचाखच भर गए हैं और अमेरिकी खजाने को चूना लग रहा है। अमेरिकी शहरों में हताशा का माहौल है। शहरों को हजारों प्रवासियों को आवास और भोजन देने के लिए के ‘जुगाड़’ करना पड़ रहा है। बाइडेन प्रशासन दो साल से अधिक समय से अवैध प्रवासियों के संकट को नजरअंदाज किया हुआ है। व्हाइट हाउस ने जोर देकर कहा कि यह कोई समस्या नहीं है और रिपब्लिकन राजनीति कर रहे हैं। मुख्यधारा के मीडिया ने ‘सब ठीक है’ का नैरेटिव आगे बढ़ाय तो दक्षिणपंथी मीडिया संस्थान अमेरिका की दक्षिणी सीमा पर अवैध प्रवासियों के उमड़े समुद्र के ड्रोन फुटेज दिखा रहे थे। इन हालात में अमेरिका में अवैध तरीके से प्रवेश करने वाले भारतीयों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय बन गई है। पिछले साल 96 हजार से अधिक भारतीयों को पकड़ा गया था। अमेरिका में रहने वाले संपन्न भारतीय भले ही इस बारे में खुलकर बात न करें, लेकिन राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन कैंडिडेट अवैध आव्रजन को प्रमुख मुद्दा बना रहे हैं। निक्की हेली और विवेक रामास्वामी जो हाल ही में चुनावी रेस छोड़ दी है इस बात का लगातार हवाला देते हैं कि उनके परिवार कानूनी रूप से अमेरिका आए और उन्होंने कड़ी मेहनत की, जिसका मतलब है कि उनके मन में ‘डंकी रूट’ से आने वालों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।

यह देखना होगा कि क्या अवैध भारतीयों की संख्या में वृद्धि से भारतीय अमेरिकियों को एक सफल, शिक्षित और अच्छी तरह से आत्मसात समुदाय के रूप में देखने की धारणा भी बदलेगी। अतीत में भारत समेत जिन देशों से कभी अमेरिका में अवैध प्रवास नहीं हुआ करता था, पिछले दो वर्षों से उन देशों के भी अवैध प्रवासियों की बाढ़ आ गई है। इनकी संख्या अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की कुल आबादी की आधी तक पहुंच गई है। अगर ट्रम्प जीत जाते हैं तो वो भारतीय प्रवासियों पर स्पष्ट रुख नहीं दिखाएंगे। ध्यान रहे कि पिछली बार उनके अप्रवासी विरोधी ब्रिगेड ने न केवल अवैध अप्रवासियों का पीछा किया बल्कि कानूनी रूप से आने वालों को भी उतना ही परेशान किया। ट्रंप प्रशासन में एच-1बी वीजा की प्रक्रिया पर मनमाने और निरंकुश नियम थोप दिए गए थे। वीजा आवेदनों की रिजेक्शन रेट बढ़ा, वीजा की अवधि तीन से एक वर्ष तक कम कर दी गई और किसी विशेष व्यवसाय में क्या शामिल है, इसकी परिभाषा ही बदल दी गई। भारतीय श्रमिक बुरी तरह प्रभावित हुए क्योंकि एच-1बी वीजा से अमेरिका जाने वालों में सबसे ज्यादा संख्या उनकी ही है।

याद करें कि स्टीव बैनन ने कहा था कि सिलिकॉन वैली में दक्षिण एशिया के बहुत ज्यादा सीईओ हैं। भला हो अमेरिकी कंपनियों का जिन्होंने एक के बाद एक मुकदमे किए और जजों ने ट्रंप प्रशासन के नियमों को खारिज किया। इसके बाद ही स्थिति में सुधार हुआ, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। बाइडेन ने ट्रम्प के ‘बाय अमेरिकन एंड हायर अमेरिकन’ एग्जिक्युटिव ऑर्डर को रद्द कर दिया था जो ट्रंप की जीत के बाद आसानी से वापस आ सकता है। भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों को इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाना होगा और यह बताना होगा कि वो किसके साथ खड़े हैं- कानून का पालन करने वाले वैध प्रवासियों के या व्यवस्था भंग करने वालों के साथ।

नई दिल्ली को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए और उन एजेंटों और प्रभावशाली लोगों के नेटवर्क पर शिकंजा कसना चाहिए, इंस्टाग्राम पर जिनकी खुशनुमा कहानियां पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में अमेरिका के लिए कई तरह के मिथक गढ़ती हैं। वहीं, अवैध प्रवासियों के शोषण की दुखद कहानियां कभी सामने नहीं आतीं। विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर भारतीय अवैध प्रवासी आर्थिक कारणों से अमेरिका आ रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब बेरोजगारी का संकट पूरे भारत में है तो तो केवल दो राज्य के लोग ही ‘डंकी रूट’ से अमेरिका पहुंचने को आमादा क्यो हैं। जब हताश और जिद्दी लोग अमेरिकी सीमा पर पहुंचते हैं तो उनमें से लगभग सभी जाति, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव का दावा करते हुए शरण मांगते हैं। कुछ तो भारत से राजनेताओं के पत्र भी साथ ले जाते हैं। अमेरिका की बात करें तो वहां सिस्टम धराशायी हो चुका है और वकीलों की बल्ले-बल्ले हो रही है। दोनों राजनीतिक पार्टियां दशकों से किसी फॉर्म्युले पर सहमत नहीं हो पाई हैं कि आखिर अवैध प्रवासियों की समस्या से कैसे निपटा जाए। इसे टालना ही आसान है।

जब अंतिम संस्कार के समय हो रहा था बटवारा, माँ कर रही थी इंतजार!

हाल ही में ऐसी घटना सामने आई जिसमें अंतिम संस्कार के समय माँ इंतजार कर रही थी और बच्चे बटवारा कर रहे थे! भारतीय समाज में परिवार एक सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। हमारे यहां माता-पिता अपनी औलाद की बेहतरी के लिए अपना जीवन खुशी-खुशी खर्च कर डालते हैं। उनमें औलाद को लेकर एक उम्मीद जरूर होती है कि ये हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। लेकिन बदलते समाज में धीरे-धीरे ये धारणा टूटती नजर आ रही है। आप इसे तरक्की की जंग कह लीजिए नौकरी का दबाव या संयुक्त परिवार टूटने और न्यूक्लियर फैमिली के साइड इफेक्ट लेकिन सच ये ही है कि रिश्तों की डोर धीरे-धीरे बुरी तरह उलझती जा रही है। हालांकि माता-पिता के अपने बेटे या बेटी के लिए सब कुछ दांव पर लगाने की धारणा नहीं बदली है लेकिन बदले में बुढ़ापे का सहारा वाली उम्मीद जरूर बिखरती नजर आ रही है। अर्थी पर एक मां का शव 9 घंटे तक मुखाग्नि का इंतजार करता रहे और उसी श्मशान घाट में उसकी तीन बेटियां संपत्ति के बंटवारे की जंग लड़ती रहें तो आप क्या कहेंगे? घर में मां की मृत्यु हो जाए और 20 दिन बाद उसकी सड़ी-गली लाश निकले और महज 30 किलोमीटर दूर रहने वाले बेटे को पता तक न चले, ऐसी स्थिति को और आप क्या कहेंगे? उत्तर प्रदेश के मथुरा का ये मामला है। यहां 85 वर्षीय महिला पुष्पा की मौत हो गई, अंतिम संस्कार के लिए शव श्मशान घाट लाया गया। लेकिन अर्थी पर रखा गया शव मुखाग्नि के लिए 9 घंटे तक ‘इंतजार’ करता रहा। क्योंकि पुष्पा की तीन बेटियां उसी श्मशान घाट में जमीन के हक की लड़ाई लड़ रही थीं। दरअसल पुष्पा की तीन बेटियां मिथिलेश, सुनीता और शशि हैं। पुष्पा कुछ दिन पहले बड़ी बेटी मिथिलेश के घर में रहने चली गई थीं। विवाद की जड़ ये है कि दूसरी बहनाें का आरोप था कि मिथिलेश ने अपनी मां को फुसलाकर करीब डेढ़ बीघे खेत बेच दिया। जब पुष्पा की मौत के बाद शव को लेकर मिथिलेश के परिजन श्मशान घाट पहुंचे तो दो अन्य बेटियां सुनीता और शशि भी यहां पहुंच गईं।

श्मशान घाट जिसे मोक्ष धाम भी कहा जाता है, वहां जमीन को लेकर लड़ाई शुरू हो गई। तीनों बहनें संपत्ति का बंटवारा कराने के लिए आपस में जूझती रहीं। वहीं बगल में चिता पर रखा शव अंतिम संस्कार के लिए तरसता रहा। अंतिम संस्कार कराने आए पंडित को रोक दिया गया। बवाल इतना बढ़ गया कि पुलिस को दखल देना पड़ गया। कई घंटे मशक्कत के बाद आखिरकार तीनों बहनों के बीच उसी श्मशान में लिखित समझौता हुआ, बंटवारा फाइनल हुआ तब जाकर मां के शव का अंतिम संस्कार किया जा सका।

सोचिए इन तीनों बहनों का जीवन बसाने के लिए मां ने जीवन भर कितने जतन किए होंगे। ये घटना तो सिर्फ बानगी भर है। नोएडा गाजियाबाद से लेकर हर शहर में ऐसे न जाने कितने किस्से मिल जाएंगे। कहीं बेटा इतना व्यस्त है कि पिता की मौत के बाद उसके शव को मुखाग्नि देने की ‘फुरसत’ नहीं है। कहीं संपत्ति के लिए बेटियां लड़ी-कटी जा रही हैं। इसी तरह साल भर पहले ग्रेटर नोएडा में बीटा वन कॉलोनी में एक 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला डॉक्टर की लाश बरामद की गई। शव पूरी तरह सड़ चुका था, उसमें कीड़े पड़ गए थे। पता चला कि महिला की मौत 20 दिन पहले ही हो चुकी थी। जांच में सामने आया कि उसका एक बेटा भी है लेकिन वह करीब 30 किलोमीटर दूर गाजियाबाद में रहता है। चार महीने से उसकी अपनी मां से बात नहीं हुई थी। उसकी सास ने जब मां से मिलने की इच्छा जताई तो वह मां के पास पहुंचा था। मगर बहुत देर हो चुकी थी। पता चला कि महिला बिहार में सरकारी डॉक्टर हुआ करती थीं। रिटायरमेंट के बाद वह ग्रेटर नोएडा में आकर रहने लगी थीं। पति से तलाक हो चुका था। बेटा उनके साथ रहता था। लेकिन कुछ महीनों पहले वह अपने परिवार के साथ गाजियाबाद में सेटल हो गया। महिला के बारे में पता चला कि वह सीनियर सिटीजन क्लब बनवाना चाहती थीं, ताकि बुजुर्गों को जीवन काटने के लिए किसी सहारे की जरूरत न पड़े।

2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक गुजारा भत्ता एवं कल्याण कानून, 2007 के प्रावधानों को तीन माह के भीतर लागू करने का निर्देश दिया था। यह कानून राज्य सरकार को वरिष्ठ नागरिकों को गुजारा खर्च, चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन की रक्षा करने की सहूलियत प्रदान करता है। सरकार सीनियर सिटीजन के अधिकार सुरक्षित कर सकती है। लेकिन जब बुजुर्ग समय के साथ अक्षम हो जाए। उसे सिर्फ एक सहारे की जरूरत हो। धन दौलत नहीं औलाद का कंधा ही उसके लिए काफी हो तो सरकार कैसे उसकी औलाद को रिश्ता निभाना सिखाए? हमारे आसपास ही ऐसी तमाम कहानियां भरी पड़ी हैं। कहीं एक ही घर में बेटा अपने परिवार को दुलार कर रहा है, और उसके ही बुजुर्ग माता-पिता खाने के लिए टिफिन सर्विस के सहारे हैं। कहीं अकेले घर में मां या पिता सन्नाटे में घुटने को मजबूर हैं क्योंकि बेटे या बेटी अपने परिवार के साथ अलग सेटल हैं।

आखिर रिश्तो में क्यों हो रहे हैं कत्ल?

वर्तमान में रिश्तों में कत्ल होते जा रहे हैं! अगर रिश्तों में शक का दीमक लग गया तो उसको पूरी तरह चट ही कर जाता है। रिश्तों के बीच अगर शक आ गया तो वे सिर्फ खत्म तक नहीं होते बल्कि कई बार बहुत ही बदसूरत मोड़ ले लेते हैं। शक न सिर्फ रिश्तों का कत्ल करता है बल्कि अपनों का कत्ल तक करा देता है। बेवफाई में कत्ल तो कभी बेवफाई के शक में कत्ल। कभी ईगो के लिए अपने ही जिगर के टुकड़े की हत्या तो कभी कर्ज के बोझ से मुक्ति की चाह में पलायनवादी कायरता में फूल सी नाजुक बिटिया का कत्ल। कभी शौक और सपने पूरे नहीं होने पर पति का मर्डर। हैदराबाद में बेवफाई के शक में एक ऑटो ड्राइवर ने पत्नी को चाकुओं से गोदकर मार डाला। बेंगलुरु में एक शख्स को पत्नी के चरित्र पर शक था तो सोते वक्त लकड़ी के लट्ठ से उसे कूचकर मार डाला। नॉर्थईस्ट दिल्ली में एक व्यक्ति ने बेवफाई के शक में पत्नी को मार डाला। आर्टिफिशियल इंटेलिंजेस के क्षेत्र में काम करने वाले स्टार्टअप की महिला सीईओ ने 4 साल के बेटे को सिर्फ इसलिए मार डाला कि वह नहीं चाहती थी कि उसका पति बच्चे से मिले। कर्ज के बोझ तले दबे एक शख्स ने उससे मुक्ति पाने के लिए नई पहचान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का फैसला करता है और इस सिलसिले में अपनी ही मासूम बिटिया को मार डालता है। बाद में अदालत उसे उम्रकैद की सजा देती है। पति दुबई घुमाने नहीं ले गया तो पत्नी ने उसे मार डाला। रिश्तों के कत्ल की खबरों से आजकल अखबार अटे पड़े रहते हैं। एक दिन पहले की बात है। मंगलवार सुबह हैदराबाद में एक ऑटो ड्राइवर ने पत्नी को चाकुओं से गोदकर मार डाला। हैदराबाद के अब्दुलपुरमेट में 41 वर्ष की पुष्पलता का शव 2 बेडरूम वाले एक सरकारी फ्लैट में मिला। आरोपी की पहचान विजय के रूप में हुई। उसकी बहन को साफ-सफाई के एवज में हाल ही में 2 बीएचके फ्लैट मिला था। विजय ने चाकू से ताबड़तोड़ हमला करके पुष्पलता की हत्या कर दी। इतना ही नहीं, जब उसके शरीर में किसी तरह की भी हरकत नहीं रही तब उसने पुष्पलता के सिर को धड़ से अलग कर दिया। दोनों की 15 वर्ष पहले शादी हुई थी और उनके 2 बच्चे भी थे। विजय ने सिर्फ इसलिए अपनी पत्नी को मार डाला क्योंकि उसे बेवफाई का शक था।

हालिया वक्त में बेवफाई के शक में कत्ल की ये कोई इकलौती घटना नहीं है। इंटरनेट पर सर्च कीजिए, ऐसी खबरों का अंतहीन सिलसिला दिखेगा। पिछले 5-6 महीने में घटीं इन कुछ घटनाओं को ही देखिए। पिछले साल नवंबर में एक शख्स ने पहले तो गला घोंटकर पत्नी को मार डाला और बाद में उसके शव को एक सुनसान इलाके में फेंक आया। वजह वही बेवफाई का शक। नवंबर 2023 में ही बेंगलुरु के अनेकल में एक 40 वर्ष की महिला की उसके पति ने सोते वक्त लकड़ी के लट्ठा से कूच-कूचकर मार डाला। वजह वही बेवफाई का शक। पिछले साल सितंबर में नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के जाफराबाद में एक व्यक्ति ने एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर के शक में अपनी पत्नी को मार डाला। दोनों की 11 साल की बेटी भी मां को बचाने की कोशिश में जख्मी हुई थी। पिछले साल अगस्त में केरल के कोल्लम जिले में 30 साल के एक शख्स ने दिनदहाड़े अपनी पत्नी का गला रेत दिया। 23 वर्ष की पत्नी तिरुवनंतपुरम स्थित लुलु मॉल में मॉडल के तौर पर काम करती थी। दोनों की लव मैरिज हुई थी। पति ने कुछ दिन पहले ही थाने में अपनी पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने उस दिन पत्नी को थाने बुलाया था। जब वह थाने से बाहर आई तब पति ने चाकू से उसका गला रेत दिया। हालांकि, महिला खुशकिस्मत रही और उसकी जान बच गई।

पिछले साल नवंबर में पुणे की एक महिला ने पति की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी कि वह उसे बर्थडे गिफ्ट के तौर पर दुबई की यात्रा नहीं कराया। पुणे के पॉश इलाके वानावाडी की एक सोसाइटी में एक बिजनसमैन को अपनी पत्नी को दुबई घुमाने से इनकार करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। निखिल खन्ना ने 6 साल पहले रेनुका से लव मैरिज की थी। रेनुका ने अपने जन्मदिन पर दुबई की ट्रिप नहीं कराने और शादी की सालगिरह पर महंगे गिफ्ट नहीं दिलाने को लेकर पति से झगड़ गई। बात इतनी बिगड़ गई कि उसने पति के चेहरे पर जोरदार घूसा मार दिया। घूसा इतना जोरदार था कि निखिल के दांत टूट गए और चेहरा लहूलुहान हो गया। वह तुरंत बेहोश होकर जमीन पर गिर गया और उसकी मौत हो गई।

इसी महीने गोवा में सूचना सेठ नाम की एक महिला सीईओ ने 4 साल के बेटे को सिर्फ इसलिए मार डाला कि वह नहीं चाहती थी कि उसका पति बच्चे से मिले। पति-पत्नी तलाक की प्रक्रिया से गुजर रहे थे और बच्चे की कस्टडी को लेकर दोनों में कानूनी लड़ाई चल रही थी। अदालत ने आदेश दिया था कि वह हर रविवार को बेटे को पिता से मिलाएगी। इससे बचने के लिए वह बेंगलुरु से गोवा चली गई ताकि रविवार को बच्चे को उसके पिता से न मिलवाना पड़े। उसके ईगो ने उसे इतना अंधा बना दिया कि उसने ममता और वात्सल्य को भी कलंकित कर दिया। उसका ईगो ममता पर भारी पड़ गया और उसने अपने ही हाथों अपनी कोख उजाड़ दी। 4 साल के मासूम बेटे की हत्या के बाद वह शव को बैग में भरकर टैक्सी से बेंगलुरु के लिए रवाना हो गई लेकिन भेद खुल गया और वह गिरफ्तार कर ली गई। पुलिस से पूछताछ में उसने ये भी बताया कि बेटे का चेहरा उसके पिता से मिलता था, जिसे वह नापसंद करती थी। हत्या की एक वजह ये भी थी।

पिछले महीने केरल के एर्नाकुलम की एक अदालत ने अपनी ही बेटी के हत्यारे पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई। कातिल पिता एक कारोबारी था और कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था। कर्ज न चुकाना पड़े, इसके लिए उसने नई पहचान के साथ नए सिरे से जिंदगी जीने का प्लान बनाया। लेकिन अगर वह नए सिरे से कहीं गुमनाम जिंदगी जीना शुरू कर देता है तो बेटी का क्या होगा? बस इसलिए उसने 10 साल की बेटी को नशीला पदार्थ पिलाकर मार डाला। शव को उसने नदी में फेंक दिया। मार्च 2021 के इस हत्याकांड ने पूरे केरल को हिला दिया था। वफ़ा और जफ़ा से इतर भी जिंदगी है। बेवफाई के शक की बुनियाद पर उसी की जान ले लेना जिस पर कभी जान छिड़कते थे, अपने आप में मोहब्बत पर बदनुमा दाग लगाने जैसा है। जब आपका ईगो आपकी ममता और आपके वात्सल्य पर भारी पड़ जाए और मां अपने ही जिगर के टुकड़े की कातिल बन जाए तो ये चेतने का वक्त है! हमें सोचने की जरूरत है कि आखिर हम ये आ कहां गए हैं जहां नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत के चक्कर में एक पिता अपनी ही बिटिया को बेरहमी से मार डालता है। आखिर रिश्तों को ये हो क्या गया है?

जब 1992 में राम मंदिर आंदोलन हुआ अग्रसर!

1992 एक ऐसा समय था जब राम मंदिर आंदोलन अग्रसर हुआ था! उत्तर प्रदेश में 1991 की विधानसभा चुनाव में एक नई सरकार चुनकर आ गई थी। मुलायम सिंह यादव सरकार का पतन हो चुका था। प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। अब सब की नजर भाजपा की नई सरकार पर थी, मेरी भी। भाजपा जो 1990 से लगातार राम मंदिर के मुद्दे को लेकर मुखर थी। प्रदेश में सरकार बनाने के बाद उसके अगले कदम की सभी प्रतीक्षा कर रहे थे। लोग देखना चाहते थे कि क्या भाजपा सरकार बनाने के बाद राम मंदिर के मुद्दे पर क्या कदम उठाती है? हालांकि, कल्याण सरकार ने शुरुआती दिनों में राम मंदिर की चर्चा के बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया। कोई एक्शन नहीं होने से लोगों का गुस्सा बढ़ने लगा। कल्याण सिंह सरकार तक शिक्षा- परीक्षा सुधारों के जरिए अपनी विकास की छवि को प्रदर्शित करने में लगी थी। लेकिन, लोगों की अपेक्षा राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा सरकार के अगले कदम पर था। सरकार भी जानती थी कि इस मुद्दे के स्तर पर उनकी ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है। सरकार भी मुद्दे में कोर्ट के आदेशों की आने की बात करने लगी तो लोगों ने पूर्व की सरकार और कल्याण सरकार की राम मंदिर मसले पर तुलना शुरू कर दी। कल्याण सरकार लगातार लोकप्रियता खोती जा रही थी। भाजपा के सामने चुनौती ऐसे कोई मुद्दे को खड़ा करने की थी, जिससे पार्टी की छवि लोगों के बीच फिर से बढ़ाया जा सके। हिंदुत्ववादी पार्टी के तौर पर स्थापित छवि को पार्टी गिरने नहीं देना चाहती थी। केंद्र में बनी कांग्रेस की पीवी नरसिंह राव सरकार की पैनी नजर यूपी पर थी। नरसिंह राव सरकार किसी भी स्थिति में मुद्दे को हवा दिए जाने से रोकने में जुटे हुए थे। हालांकि, खुलकर कांग्रेस भी राम मंदिर के मुद्दे का विरोध करती नहीं दिख पा रही थी। 1992 के पहले तीन माह अनिश्चितता में बीत चुके थे। अब हिंदुत्वववादी संगठनों का धैर्य जवाब देने लगा था। वहीं, सरकारें कोर्ट पर भरोसा रखने का अनुरोध करती रही। मुलायम सरकार के कारसेवकों पर गोली चलाए जाने की घटना से आक्रोशित विश्व हिंदू परिषद का अब धैर्य जवाब देने लगा था। जनता भी सरकार से कार्रवाई की मांग करने लगी। ऐसे में विश्व हिंदू परिषद आगे आई। मई- जून 1992 में अयोध्या में कारसेवा का फैसला लिया गया। विश्व हिंदू परिषद ने जून के आखिर में यह घोषित किया। मैं अयोध्या जो 1990 से लगातार युद्ध में थी। वह एक बार फिर गरमाने वाली थी। प्रदेश की राजनीति में बड़ा भूचाल आने के संकेत थे। मैं अयोध्या हूं और मैं उस जुलाई 1992 की कहानी सुनाती हूं।

आज से करीब 23 साल पहले भी इसी तरह से उत्साहित थी। प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से राम मंदिर निर्माण की अफवाह उठ रही थी। जमीन पर कोई काम नहीं हो रहा था। अप्रैल- मई से इस दिशा में प्रयास शुरू हुआ। दावा किया जा रहा था कि जुलाई के पहले पखवाड़े में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इसके लिए 100 फीट लंबे और 80 फीट चौड़े चबूतरे का निर्माण किया जाना था। विश्व हिंदू परिषद की ओर से अंदर ही अंदर तैयारी चल रही थी। लेकिन, जैसे ही यह मामला जुलाई की शुरुआत में आम लोगों के बीच आया, अचानक 9 जुलाई 1992 को मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया। इस घटना ने देश की राजनीति के मूड को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। वीएचपी ने जिस प्रकार से निर्माण की योजना पर काम शुरू किया, उससे साफ था कि यह एक पूरी प्लानिंग के तहत इस कार्य को किया गया।

8 जुलाई 1992 को अयोध्या में हलचल अचानक तेज हो गई थी। कई बड़े नेता अयोध्या में कैंप कर रहे थे। 8 जुलाई की रात विनय कटियार विवादित स्थल पर पहुंचे। वहां पर 1989 में मंदिर के शिलान्यास के बाद उस स्थल पर जो छतरी लगाई गई थी। उन लोगों ने उसे हटा दिया। विनय कटियार और उनके साथियों के इस एक्शन ने 9 जुलाई की सुबह होने वाली कार्रवाई का भेद खोल दिया। 9 जुलाई की सुबह विवादास्पद स्थल पर सर्वदेव अनुष्ठान की तैयारी थी। महंत रामचंद्र परमहंस उस सुबह अन्य साधु- संतों और तीर्थयात्रियों के साथ वहां पहुंचे। उनके साथ कुछ कारसेवक छोटे- छोटे कलश में सरयू का जल लेकर आए थे। शिलान्यास स्थल के आसपास की जमीन पर जल छिड़ककर उसे पवित्र किया गया। शिलान्यास स्थल के छोटे चबूतरे पर निर्माण शुरू करने के लिए जैसे ही दीपक जलाए गए। साधु- संतों ने शंख की ध्वनि से पूरे इलाके को गूंजायमान कर दिया।

विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता और साधु- संत उस स्थल पर पूरी कार्रवाई कर रहे थे, जिसे हाई कोर्ट ने विवादित घोषित कर दिया था। हाई कोर्ट ने बाबरी परिसर के 2.77 एकड़ जमीन के हिस्से को विवादित घोषित करते हुए इसे राज्य सरकार को अधिग्रहित कर दिया था। इसका सीधा मतलब यह था कि वहां किसी प्रकार का निर्माण नहीं किया जा सकता है।

हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ कार्रवाई हो रही थी। केंद्र और राज्य सरकार इस मुद्दे पर कोई कार्रवाई करने के मूड में नहीं दिख रही थी। इसका कारण यह था कि केंद्र की पीवी नरसिंह राव सरकार उस दौरान हर्षद मेहता स्कैम के कारण विवादों में घिरती दिख रही थी। राव सरकार के वाणिज्य मंत्री पी. चिदंबरम पर हर्षद मेहता से कनेक्शन सामने आया। विवाद में नाम आने के कारण चिदंबरम को राव सरकार से इस्तीफा देना पड़ा। चिदंबरम पर आरोप था कि उनकी कुछ फर्जी कंपनियों ने हर्षद मेहता के फर्म में इन्वेस्ट किया था। वहीं, भाजपा सरकार भी लोकप्रियता खो रही थी। जनाधार को बचाए रखने के लिए मंदिर के मुद्दे पर चुप्पी ही कल्याण सरकार को लोकप्रिय बना सकती थी। इस कारण केंद्र और राज्य सरकार ने मंदिर निर्माण के मुद्दे को एक प्रकार से हरी झंडी दे दी। सीएम कल्याण सिंह और भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी इसे एक मौके के तौर पर देख रहे थे।

भारतीय जनता पार्टी वीएचपी के राम मंदिर की घोषणा के साथ अपने पुराने मुद्दे पर वापस लौट आई। वहीं, हर्षद मेहता स्कैम से ध्यान भटकाने के लिए राव सरकार ने भी इस मुद्दे को हवा ही दी। वीएचपी के मंदिर निर्माण के कार्यक्रम की शुरुआत के बाद दिल्ली तक एक्शन शुरू हो गया। मुद्दा राम मंदिर ही बन गया। तमाम चर्चाएं थम गई। पीवी नरसिंह सरकार ने तब केंद्रीय गृह मंत्री शंकर राव चह्वाण के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल अयोध्या भेजा। केंद्रीय गृह मंत्री करीब 35 मिनट तक अयोध्या में रहे।

पीएम कार्यालय में अयोध्या प्रकोष्ठ के प्रमुख नरेश चंद्रा ने 5 दिसंबर 1992 को इलाहाबाद हाई कोर्ट से 2.77 एकड़ विवादित जमीन के अधिग्रहण के मु्द्दे पर ऑपरेटिव हिस्से को सुनाने के अनुरोध का दावा किया। नरेश चंद्रा ने कहा कि हाई कोर्ट ने राज्य सरकार इसकी गुजारिश करेगी। केंद्र की ओर से इसका समर्थन किया जाएगा। यूपी सरकार की ओर से जब हाई कोर्ट में इससे संबंधित आवेदन किया गया तो केंद्र के वकील ही नहीं पेश हुए। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी केंद्र के खिलाफ लोगों में शक गहरा गया। इसे पीएम नरसिंह राव के एक बार फिर पलटने के रूप में देखा जाता है।

राम मंदिर का जब भी जिक्र होते की अटल बिहारी वाजपेयी का भी जिक्र होता है। भले ही 6 दिसंबर 1992 की कारसेवा को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी अयोध्या नहीं गए थे। लेकिन, 5 दिसंबर 1992 की शाम को लखनऊ में दिया गया भाषण आज भी याद किया जाता है। अटल जी ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला लिया है, उसका अर्थ मैं ये निकालता हूं कि यह कारसेवा को नहीं रोकता है। सचमुच में सुप्रीम कोर्ट ने हमें दिखा दिया है कि हम कारसेवा करेंगे, रोकने का तो सवाल ही नहीं है। कल कारसेवा करके अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय की अवहेलना नहीं होगी। कारसेवा करके सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान किया जाएगा। वहां नुकीले पत्थर निकले हैं, तो उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता है। तो जमीन को समतल करना पड़ेगा। बैठने लायक करना पड़ेगा। तभी तो यज्ञ का आयोजन होगा। अटल जी के इस के इस भाषण में कंकड़- पत्थर को साफ करने का मतलब, बाबरी मस्जिद को विवादित स्थल से हटाए जाने से लगाया जाता है।

आखिर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में कैसे होगा सीट बंटवारा ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में सीट बंटवारा कैसे होगा! लोकसभा चुनाव का समय करीब आ रहा है और उत्तर प्रदेश में अभी तक विपक्षी गठबंधन के साथियों में यह तय नहीं हो सका है कि किसे कितनी सीटें मिलेंगी। राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस ने 20m सीटों की मांग की है लेकिन समाजवादी पार्टी को यह मांग जायज नहीं लग रही है। दोनों दलों के नेताओं के बीच बैठक का एक और दौर होगा।  बैठक में मौजूद रहे कांग्रेस और सपा के नेताओं में इसी मुद्दे पर बात हुई कि सीटों के बंटवारे का निर्धारण जीत दर्ज करने की संभावना के आधार पर होगा। बात अगर 2019 में हुए पिछले चुनाव की करें तो कांग्रेस को केवल रायबरेली सीट पर ही जीत हासिल हुई थी, जहां से सोनिया गांधी सांसद बनी थीं।

यह बात कांग्रेस और सपा के बीच ही हुई है। मायावती से साफ कह दिया है कि बसपा चुनाव से पहले किसी भी गठबंठन का हिस्सा नहीं बनेगी और नतीजों के बाद विकल्प खुला रखेगी। वहीं रालोद असल में सपा के साथ गठबंधन में है। कांग्रेस के अनुसार सीट शेयरिंग निर्धारण के बाद यह सपा पर निर्भर करेगा कि वह अपने हिस्से की कितनी सीटें जयंत चौधरी को देते हैं। इस बैठक में कांग्रेस की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, सलमान खुर्शीद, आराधना मिश्रा मौजूद रहे। वहीं सपा की तरफ से रामगोपाल यादव, जावेद अली खान और उदयवीर सिंह उपस्थित रहे। अखिलेश यादव ने कहा कि 2024 में पीडीए गठबंधन ही एनडीए को हराएगा। I.N.D.I.A के साथ सीटों के बंटवारे पर उन्होंने कहा कि इस पर जल्द ही फैसला होगा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में अखिलेश के शामिल होने की संभावना नहीं है। जब उनसे यात्रा में शामिल होने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ना तो कांग्रेस हमें अपने कार्यक्रमों में बुलाती है, ना ही भाजपा।जानकारी के अनुसार यूपी की हर एक सीट को लेकर चर्चा हुई। दोनों दलों ने आंकड़ों के आधार पर हर सीट पर अपनी बात रखी।

इससे पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बुधवार को पीडीए की प्रथम चरण की यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यात्रा का प्रथम चरण 1 फरवरी तक चलेगा, जो प्रदेश के कई जिलों से होकर गुजरेगी। इस मौके पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि 2024 का साल नया जरूर है पर यह केंद्र की सत्ता परिवर्तन का भी साल है। आज लोकतंत्र खतरे में है। यही नहीं बता दे कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के सबसे बड़े आलोचकों के तौर पर पेश किया है। उन्‍हें पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष के प्रमुख चेहरे के तौर पर देखा जाता है। बीजेपी की कोशिश राहुल को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की है। वह कांग्रेस में राहुल के प्रभाव को कम करना चाहती है। यही वजह है कि हाल के सालों में बीजेपी ने राहुल की टीम से कई युवा नेताओं को शामिल किया है। उन्हें मुख्‍य पद देकर इनाम भी दिया है। इन नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह शामिल हैं। सिंधिया केंद्रीय विमानन मंत्री हैं। प्रसाद योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण मंत्री हैं। वहीं, आरपीएन सिंह को बीजेपी में बड़े पद का इंतजार है। 

अखिलेश यादव ने कहा कि 2024 में पीडीए गठबंधन ही एनडीए को हराएगा। I.N.D.I.A के साथ सीटों के बंटवारे पर उन्होंने कहा कि इस पर जल्द ही फैसला होगा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में अखिलेश के शामिल होने की संभावना नहीं है। जब उनसे यात्रा में शामिल होने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ना तो कांग्रेस हमें अपने कार्यक्रमों में बुलाती है, ना ही भाजपा। इससे पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बुधवार को पीडीए की प्रथम चरण की यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यात्रा का प्रथम चरण 1 फरवरी तक चलेगा, जो प्रदेश के कई जिलों से होकर गुजरेगी। इस मौके पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि 2024 का साल नया जरूर है पर यह केंद्र की सत्ता परिवर्तन का भी साल है।पिछली बार 2019 में हुए चुनाव में आंकड़ों पर गौर करें तो बीजेपी के खाते में कुल वोट का 49.56 प्रतिशत गया था। वहीं बसपा को 19.26, सपा को 17.96 और कांग्रेस को 6.31 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था। हालांकि सपा और बसपा एक साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरे थे। लेकिन चुनाव के बाद फिर से दोनों दलों के बीच खटास आ गई थी।

इंडिगो की फ्लाइट में क्या हुआ था, आरोपी पैसेंजर ने क्या दिया बयान?

हाल ही में इंडिगो की फ्लाइट में एक पैसेंजर ने पायलट को थप्पड़ जड़ दिया था, जिसके बाद आरोपी पैसेंजर का बयान सामने आया है! इंडिगो फ्लाइट में को-पायलट के साथ हुई मारपीट को लेकर कई नए खुलासे होने लगे हैं। 13 घंटे की देरी के कारण फ्लाइट में साहिल कटारिया नाम के पैसेंजर ने को-पायलट की पिटाई कर दी थी। हालांकि, अब इसी फ्लाइट में सवार दूसरे पैसेंजर उस दिन हुई घटना के लिए साहिल को पूरी तरह कसूरवार नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस घटना की आड़ में एयरलाइन ने अपने कुप्रबंधन पर पूरी तरह पर्दा डालने का काम किया है। बीते रोज मॉडल और एक्‍ट्रेस एवगेनिया बेल्सकिया ने इसे लेकर सिर्फ साहिल को दोष देने के बजाय एयरलाइन पर सवाल उठाया था। अब इसी फ्लाइट में सवार एक और शख्‍स सनल विज ने उस दिन की पूरी कहानी सुनाई है। सनल विज भी उस दिल्ली-गोवा फ्लाइट 6ई-2175 पर सवार थे जिसमें पैसेंजर ने देरी के कारण पायलट की पिटाई कर दी थी। बेल्सकिया के बाद सनल दूसरे प्रत्‍यक्षदर्शी हैं जिन्‍होंने इस घटना के बारे में बताया है। सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में सनल विज ने कहा- हालांकि, वह हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं। लेकिन, एयरलाइन ने इस घटना का फायदा उठाया। पैसेंजर ने जो किया उसके पीछे उसने अपने सभी कुप्रबंधन और गलतियों को छिपा लिया।

सनल ने अपने पोस्‍ट में लिखा- ‘समाचार लेखों की सीरीज में 14 जनवरी को इंडिगो फ्लाइट 6E2175 के पायलट पर हुए हमले को कवर किया गया है। एक सह-यात्री के रूप में मैं घटना के बारे में अपना प्रत्यक्ष विवरण साझा करने के लिए मजबूर महसूस करता हूं। आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि मैं हिंसा का समर्थन नहीं करता। मैं अपना अनुभव साझा करना चाहता हूं और घटनाओं पर प्रकाश डालना चाहता हूं।’ सनल ने कहा, ‘फ्लाइट 6E2175 को सुबह 7.40 बजे उड़ान भरनी थी। लेकिन, देरी का सामना करना पड़ा। आखिरकार शाम 5.35 बजे यह निकली। शिशुओं, बच्चों और बुजुर्गों सहित लगभग 186 यात्रियों के साथ दोपहर 12.20 बजे खराब मौसम के कारण पांच घंटे की देरी के बाद बोर्डिंग शुरू हुई।’सनल के मुताबिक, दोपहर 1.30 बजे पायलट ने घोषणा की कि वह चालक दल के सदस्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह भी भरोसा दिया कि फ्लाइट शीघ्र ही रवाना होगी।

सनल विज ने आगे बताया, ‘यह साफ हो गया कि ग्राउंड स्टाफ और क्रू ने हमें गलत सूचना दी थी। जैसा कि विमान की रिकॉर्डिंग से पता चलता है, चालक दल के सदस्यों को गैर-पेशेवर व्यवहार करते हुए ग्राउंड स्टाफ के साथ लंबी बातचीत करते देखा गया। पानी के लिए बुजुर्ग यात्रियों के कई अनुरोधों को नजरअंदाज किया गया। चालक दल के सदस्य अपनी ही बातचीत में व्यस्त थे।’ सनल ने दावा किया कि चालक दल के सदस्य देरी से दोपहर करीब 2.40 बजे पहुंचे। फिर विमान के दरवाजे बंद हो गए। उन्होंने बताया, ‘हालांकि, जब विमान कुछ समय तक टस से मस नहीं हुआ तो यात्रियों ने पूछताछ की। इसके बाद क्रू के सदस्यों के साथ बहस शुरू हो गई। लगभग 3.20 बजे को-पायलट देरी पर यात्रियों को संबोधित कर रहे थे जब हमला हुआ।’बेशक, इस पैसेंजर ने कहा कि हिंसा को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन, उन्होंने गैर-पेशेवर रवैया दिखाने और 185 लोगों को घंटों तक बिना भोजन के इंतजार कराने के लिए एयरलाइन पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि शाम चार बजे के बाद यात्रियों को भोजन उपलब्ध कराया गया।

विज ने कहा, ‘हिंसा अस्वीकार्य है, लेकिन इंडिगो के मिसमैनेजमेंट, अनप्रोफेशनलिज्‍म और 185 यात्रियों के घंटों तक बिना भोजन के फंसे रहने के बारे में क्या? कई घंटों तक विमान में बंद रहने के बाद शाम 4 बजे के बाद हमें खाना उपलब्ध कराया गया। यह घटना इंडिगो के स्थिति से निपटने के तरीके पर सवाल उठाती है। क्या अधिकारियों को गैर-पेशेवर आचरण की जांच नहीं करनी चाहिए और यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि इस तरह का कुप्रबंधन दोबारा न हो? इससे पहले घटना को शूट करने वाले बेल्सकिया ने दावा किया था कि पायलट समझने और मदद करने के बजाय सवाल पूछने के लिए यात्रियों को दोषी ठहरा रहा था। उन्होंने कहा था कि स्थिति तब बिगड़ गई जब पायलट ने जवाबी आरोप लगाया और यात्रियों पर बहस और सवाल करके देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया। पायलट पर हाथ उठाने वाले इंडिगो यात्री की पहचान साहिल कटारिया के रूप में हुई है। उसे पायलट के साथ मारपीट करने के बाद में गिरफ्तार किया गया था। यह घटना रविवार शाम को हुई थी।

आखिर क्या है भारतीय सेना की नई प्रमोशन पॉलिसी?

आज हम आपको भारतीय सेना की नई प्रमोशन पॉलिसी के बारे में जानकारी देने वाले हैं! भारतीय सेना में अब प्रमोशन बोर्ड साल में दो बार भी बैठ सकता है। इसी महीने से लागू नई प्रमोशन पॉलिसी में इसका प्रावधान किया गया है। अब तक साल में एक बार ही प्रमोशन बोर्ड बैठता था यानी एक बार ही तय होता था कि किसका प्रमोशन होना है या नहीं। सेना के एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक यह प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि सेना की अलग अलग आर्म और सर्विस में अगर कोई पीछे छूट गया है तो उसे भी बराबरी पर ला सकें। साथ ही प्रमोशन पॉलिसी में पहले के सारे कंफ्यूजन को हटाया गया है। अब तक कई अलग अलग पॉलिसी लेटर के आधार पर प्रमोशन के नियम माने जाते थे और इसमें इसलिए कंफ्यूजन रहता था क्योंकि कोई पहली पॉलिसी लेटर का उल्लेख करता था तो कोई दूसरी पॉलिसी लेटर का। अब जो पॉलिसी बनाई गई है वह भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई है ताकि कम से कम 10 साल तक कोई बदलाव की जरूरत ना हो। इसमें संगठन के इंटरेस्ट को भी ध्यान में रखा है और सेना के सभी अधिकारियों की महत्वाकांक्षाओं का भी ख्याल रखा है। पहले पांच साल का डेटा देखकर अनुमान लगाते थे कि कर्नल के और ब्रिगेडियर के कितने पद खाली हो रहे हैं और उस हिसाब से ही प्रमोशन दिया जाता था। इसमें सिर्फ रिटायर होने वाले लोग ही नहीं होते बल्कि प्री मैच्योर रिटायरमेंट, डेपुटेशन पर जाने वाले लोग भी होते थे। इसमें त्रुटि का मार्जिन ज्यादा रहता था तो ओवर प्रमोशन हो जाते थे। इससे नई रैंक में पोस्ट पाने के लिए वेटिंग पीरियड ज्यादा हो जा रहा था और फिर हर प्रमोशन पर इसका असर दिख रहा था। अब तीन साल में कितने पद खाली होंगे इसका अनुमान एक साथ लगाया जाएगा जिससे त्रुटि की गुंजाइश कम होगी और फिर प्रमोशन पाने के बाद पोस्टिंग होने में वेटिंग पीरियड भी कम होगा।

इसके साथ ही नई प्रमोशन पॉलिसी में मेजर जनरल स्टाफ बनने वालों के लिए भी कैरियर में आगे का रास्ता खुल गया है। अब तक कोई अधिकारी मेजर जनरल स्टाफ बन जाते थे तो उनके कैरियर में फुल स्टाप लग जाता था और उन्हें फिर आगे प्रमोशन नहीं मिलता था। लेकिन अब मेजर जनरल स्टाफ का भी प्रमोशन हो सकेगा और वह लेफ्टिनेंट जनरल स्टाफ बन सकेंगे। यही नहीं इसी महीने से भारतीय सेना ने प्रमोशन की नई पॉलिसी लागू की है। इसमें ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे आर्मी फिट बनेगी। पॉलिसी के तहत सीनियर रैंक टू स्टार, थ्री स्टार जनरल में शेप-1 यानी मेडिकली फिट अधिकारी को ही प्रमोशन दिया जाएगा। अब तक स्टाफ पोस्टिंग में प्रमोशन के लिए यह नियम नहीं था, लेकिन अब स्टाफ पोस्टिंग भी पूरी तरह फिट ऑफिसर को ही मिलेगी। साथ ही, आर्मी अलग-अलग कोर्स के वेटेज को लेकर भी बदलाव करने की योजना बना रही है। इस बारे में स्टडी चल रही है। प्रमोशन के लिए कोर्स का वेटेज इस तरह करने की प्लानिंग है कि अफसर कोर्स के पीछे नहीं, एक्सपर्टीज यानी अपनी फील्ड में महारत पर फोकस करें।

सेना में स्टडी चल रही है कि प्रमोशन के लिए अलग-अलग कोर्स के जो नंबर दिए जाते हैं, उन्हें इस तरह बदला जाए कि अधिकारी अपनी फील्ड में महारत हासिल करने पर फोकस करें और इससे जुड़े कोर्स को प्राथमिकता दें। इसे क्वांटिफाइड सिस्टम ऑफ सिलेक्शन कहते हैं। एक अधिकारी ने उदाहरण दिया, जैसे अभी MTech करने पर कम वेटेज है और स्टाफ कॉलेज का ज्यादा वेटेज है, लेकिन अब इस पर फोकस किया जा रहा है कि अधिकारी अपनी फील्ड की एक्सपर्टीज पर जोर दें और उनके प्रमोशन के चांस भी प्रभावित ना हों। करीब छह महीने पहले इस बारे में स्टडी शुरू हुई है जिसे पूरा होने में कम से कम एक साल लगेगा।

नई प्रमोशन पॉलिसी में फिट रहने पर जोर दिया गया है। अगर ऑफिसर पूरी तरह फिट हैं, तभी कर्नल और ब्रिगेडियर रैंक में उन्हें कमांड पोजिशन दी जाएगी। अगर वह शेप-1 यानी एकदम फिट नहीं हैं, तो उन्हें स्टाफ पोस्टिंग ही मिलेगी। अब तक शेप-1 न होने पर भी मेजर जनरल या लेफ्टिनेंट जनरल बन जाया करते थे, लेकिन उन्हें स्टाफ पोस्टिंग ही मिलती थी। नई पॉलिसी में प्रावधान है कि अगर ऑफिसर मेडिकली फिट नहीं हैं, तो उन्हें प्रमोशन ही नहीं मिलेगा यानी वह ब्रिगेडियर से ऊपर प्रमोट नहीं किए जाएंगे। पूर्वी लद्दाख में जब चीन के साथ अचानक तनाव बढ़ा, तब कई अधिकारियों को तुरंत पीस पोस्टिंग से वहां भेजा गया। क्योंकि वहां तुरंत तैनाती बढ़ाने की जरूरत थी। बाद में यह तय किया गया कि शेप-1 को ही कमांड पोस्टिंग और सीनियर रैंक में प्रमोशन मिलेगा।

क्या गरीबी से निजात पा रहा है भारत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत गरीबी से निजात पा रहा है या नहीं! बीते नौ वर्षों में देश के लगभग 24.8 करोड़ लोगों का गरीबी से पीछा छूट गया। नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुआयामी गरीबी से मुक्ति पाने के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार ने सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की है। नीति आयोग के दो शीर्ष अधिकारियों ने सोमवार को नई रिसर्च रिपोर्ट जार की। रिसर्च में स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, मातृ स्वास्थ्य और बैंक खातों सहित 12 मापदंडों के आधार पर बहुआयामी गरीबी का आकलन किया गया है। इन कसौटियों के आधार पर तय गरीबों की आबादी 2022-23 में 11.3% तक कम होने का अनुमान है, जो 2019-21 में 15% और 2013-14 में 29.2% थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी से लड़ाई में इस बड़ी जीत की सराहना की। उन्होंने ट्वीट किया, ‘बहुत उत्साहजनक, समावेशी विकास को आगे बढ़ाने और हमारी अर्थव्यवस्था में परिवर्तनकारी बदलावों पर ध्यान देने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हम चौतरफा विकास की दिशा में काम करते रहेंगे और हर भारतीय के लिए समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करेंगे।’

नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद और वरिष्ठ सलाहकार योगेश सुरी की तरफ से तैयार पेपर में दावा किया गया है कि अगले वित्त वर्ष 2024-25 तक भारत में गरीब आबादी का प्रतिशत सिंगल डिजिट में आ जाएगा। पेपर लिखने वालों का यह भी दावा है कि भारत 2030 तक अपने सभी आयामों में गरीबी को आधा करने के लक्ष्य से काफी आगे है। पेपर में कहा गया है, ‘एमपीआई बहुआयामी गरीबी सूचकांक के सभी 12 संकेतकों में इस अवधि के दौरान उल्लेखनीय सुधार हुआ है।’

हालांकि इसने कई मापदंडों के अनुमान नहीं बताए, लेकिन कहा गया कि पोषण अभियान, एनीमिया मुक्त भारत और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी पहलों ने मदद की है। इसमें कहा गया, ‘2013-14 से 2022-23 की अवधि के दौरान बहुआयामी गरीबी में गिरावट की दर में तेजी आई है। यह संभव हो पाया है क्योंकि खास तरह के वंचित पहलुओं में सुधार लाने के लिए सरकार ने कई पहल किए हैं और तरह-तरह की योजनाएं लागू की हैं।’ रमेश चंद ने पत्रकारों को बताया कि वित्त वर्ष 2023 तक के नौ वर्षों में कृषि क्षेत्र में वृद्धि किसी अन्य अवधि की तुलना में तेज हुई है।हालांकि, इसने चेतावनी दी कि गरीबी में कमी की गति तब तेज होती है जब स्तर अधिक होते हैं और आगे की गिरावट बाहरी कारकों से भी जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा, पेपर में जताए गए अनुमान राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण पर आधारित हैं, जिसके लिए डेटा महामारी से पहले एकत्र किया गया था और ताजा अनुमान महामारी के प्रभाव का सटीक आकलन नहीं कर सकते।

कुल संख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि उत्तर प्रदेश ने 5.9 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। उसके बाद बिहार का नंबर है जहां के 3.8 करोड़ लोग गरीबी के अभिशाप से मुक्त हुए। पेपर में कहा गया है, ‘यह भी देखा गया है कि जिन राज्यों में गरीबी की घटना अधिक है, उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में गरीबी के अनुपात में अधिक कमी देखी है। इससे यह पता चलता है कि विभिन्न राज्यों में बहुआयामी गरीबी असमानता पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है।’ आपको बता दें कि भारत में आंकड़ों पर बहस चलती रहती है। पिछले साल आई वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी के मुताबिक 2011 में 22.5 फीसदी गरीबी थी जो 2019 में घटकर 10.2 फीसदी रह गई। यह आंकड़ा आईएमएफ के डेटा से मेल नहीं खाता है। अमेरिका का जाने माने ब्लॉगर-इकनॉमिस्ट Noah Smith ने World Poverty Clock और The Washington Post के एक चार्ट का हवाला देते हुए एक चार्ट ट्वीट किया है। इसके मुताबिक भारत में छह साल में गरीबी में भारी गिरावट आई है। 2016 में गरीबों की आबादी 12.4 करोड़ थी जो 2022 में 1.5 करोड़ रह गई है। मैं इसका विरोध करने की तैयारी कर रहा था कि तभी स्मिथ ने खुद ही कुछ और चार्ट ट्वीट कर दिए। इनमें अलग-अलग मान्यताओं के हिसाब से गरीबी के अलग-अलग अनुमान लगाए गए थे।

एक लंबे चार्ट में साल 2017 की 2.15 डॉलर की गरीबी रेखा को आधार बनाया गया था। इसके मुताबिक 1993 में देश में गरीबों की संख्या 47.6 फीसदी थी जो 2019 में घटकर 10 फीसदी रह गई है। इस दौरान गरीबी के अनुमान में लगातार गिरावट आई है फिर चाहे सरकार किसी भी पार्टी की रही हो। इसके लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों श्रेय ले सकती हैं। मनमोहन सिंह जब 2004 प्रधानमंत्री बने थे तो देश में गरीबी 39.9 परसेंट थी और 2014 में यह 18.7 फीसदी रह गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गरीबी में गिरावट जारी रही। 2019 में यह 10 फीसदी रह गई।

क्या पीएम मोदी के मूर्ति छूने से नाराज है शंकराचार्य?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शंकराचार्य पीएम मोदी के मूर्ति छूने से नाराज है या नहीं! पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। उन्होंने इसे लेकर कहा है कि वह अयोध्या नहीं जाएंगे क्योंकि उन्हें अपने पद की गरिमा का ध्यान है। उन्होंने कहा कि वहां पीएम नरेंद्र मोदी मूर्ति का लोकार्पण करेंगे और उसे स्पर्श करेंगे। क्या मैं वहां ताली बजा-बजाकर जय-जय करूंगा? शंकराचार्य के इस बयान के बाद से कंट्रोवर्सी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी के मूर्ति को स्पर्श करने को शंकराचार्य द्वारा रेखांकित करने पर पुराने विवाद की यादें भी ताजा हो गई हैं। साथ ही सवाल भी उठ रहे हैं कि ऐसे समय में जब नरेंद्र मोदी को सनातन धर्म के प्रतीकों के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है तब स्वामी निश्चलानंद उनसे नाराज क्यों हैं? और ऐसे बागी बयान क्यों दे रहे हैं? गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती उर्फ नीलाम्बर का जन्म बिहार में हुआ था। 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में लगभग 31 साल की आयु में स्वामी करपात्री महाराज के सान्निध्य में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इसके बाद से वह नीलाम्बर से स्वामी निश्चलानंद हो गए थे। पुरी के 144वें शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ महाराज ने स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी मानकर 9 फरवरी 1992 को पुरी के 145 वें शंकराचार्य पद पर आसीन किया था।

राम मंदिर आंदोलन के बहाने धर्म और राजनीति के आपस में घुल-मिल जाने के दौर में तमाम संत खुलकर अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने लगे हैं। अयोध्या के तमाम मठों के महंत और शंकराचार्य भी राजनैतिक पार्टियों के समर्थन में यदा-कदा नजर आते हैं। ऐसे माहौल में भी पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद इस बात पर भरोसा करते हैं कि शंकराचार्य का पद किसी पार्टी को समर्थन देने वाला नहीं बल्कि शासकों पर शासन करने वाला पद है। उनकी वेबसाइट पर यह वाक्य प्रमुखता से दर्ज भी है। ऐसे में उनकी इस सैद्धांतिकी में पीएम मोदी से उनका विरोध काफी हद तक समझा भी जा सकता है।

निश्चलानंद स्वामी राजनीति में संतों का इस्तेमाल किए जाने की प्रवृत्ति से भी नाराज दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने इसे लेकर एक बयान दिया था कि सियासी पार्टियां पहले संतों को अपना स्टार प्रचारक बनाती हैं और बाद में उन्हें मौनी बाबा बना देती हैं। उन्होंने श्री-श्री रविशंकर और योग गुरु बाबा रामदेव का उदाहरण भी दिया। उन्होंने किसी पार्टी का नाम लिए बिना कहा था कि पहले राजनैतिक दल ने दोनों का भरपूर इस्तेमाल किया। शासन सत्ता पाते ही उन्हें मौनी बाबा बना दिया गया। स्वामी निश्चलादनंद की भाजपा से नाराजगी क्या है, इसका जवाब साफतौर पर नहीं दिया जा सकता। हालांकि, अपने बयानों में जब-तब उन्होंने भाजपा नेताओं और संघ प्रमुख को भी निशाने पर लिया है। उन्होंने बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री की इसलिए निंदा की थी कि वह भाजपा के प्रचारक बन गए हैं। इसके अलावा हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था पर बयान देने वाले मोहन भागवत के लिए कहा था कि उनके पास ज्ञान की कमी है। इतना ही नहीं, हिंदू मंदिरों में सरकार के हस्तक्षेप से भी निश्चलानंद को दिक्कत है। अपने एक बयान में उन्होंने कहा था कि मंदिरों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए और ट्रस्ट को सक्षम बनकर मंदिरों में बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए। मंदिरों के लगातार हो रहे ‘कॉरिडोरीकरण’ का भी निश्चलानंद ने अक्सर विरोध किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वामी निश्चलानंद कभी प्रशंसा करते हैं तो कभी उनसे नाराज भी रहते हैं। उनके बयानों से लगता है कि राम मंदिर निर्माण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज्यादा उपस्थिति भी उनकी आपत्ति का कारण है। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान उन्होंने इसे लेकर बड़ा बयान दिया था। निश्चलानंद ने सवालिया लहजे में कहा था कि राम जन्मभूमि को लेकर मोदी की क्या भूमिका रही थी? राम मंदिर निर्माण को लेकर क्या उनका एक भी भाषण सुनने को मिलेगा। अयोध्या न जाने के लिए स्वामी निश्चलानंद ने जो कारण गिनाया है, उसमें उन्होंने कहा है, ‘मोदी लोकार्पण करें। मूर्ति को स्पर्श करेंगे, तो मैं वहां ताली बजाकर जय-जयकार करूंगा क्या?’ उनके इस बयान के तमाम मतलब भी निकाले जा रहे हैं। कहा यह भी जा रहा है कि शंकराचार्य को मोदी के मूर्ति छूने से दिक्कत है। इस संदर्भ में एक पुराने विवाद की भी चर्चा चल पड़ी है। दरअसल, वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश की इजाजत नहीं थी। साल 1958 में काफी लंबी लड़ाई के बाद दलितों को प्रवेश का मौका मिला। तब जैसे ही दलितों ने मंदिर में शिवलिंग को छुआ, तब करपात्री महाराज ने इसका विरोध किया था। उन्होंने विश्वनाथ मंदिर को अछूत घोषित कर दिया और काशी में ही गंगा के तट पर एक दूसरा काशी विश्वनाथ बनवा डाला था।

इन्हीं करपात्री महाराज के सान्निध्य में निश्चलानंद ने भी संन्यास ग्रहण किया है। ऐसे में इस पुराने विवाद को नरेंद्र मोदी के रामलला की मूर्ति के स्पर्श करने को लेकर शंकराचार्य की जताई जा रही कथित आपत्ति से जोड़कर देखा जा रहा है।

आखिर कौन है शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?

आज हम आपको शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बारे में बताने वाले हैं! रामलला के प्राण प्रतिष्ठा को लेकर हिंदू समाज में जहां एक तरफ खुशी की लहर है तो वहीं संत समाज के एक धड़े की तरफ से आपत्ति भी सामने आई है। इस पर आपत्ति जताने वाले उत्तराखंड ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद हैं। उन्होंने अधूरे या निर्माणाधीन मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा किए जाने पर ऐतराज जताया है। उन्होंने शास्त्रों को हवाला दिए बिना ही सिर या आंखों की मूर्ति शरीर में प्राण प्रतिष्ठा को गलत करार दिया है। यह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आखिर हैं कौन, जान लीजिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अयोध्या राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय को लेकर सवाल उठाया है। दरअसल, सितंबर 2022 में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद पर समाधि से पहले उत्तराधिकारियों का चयन कर लिया गया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ का प्रमुख बनाया गया। उन्होंने दावा किया कि चारों शंकराचार्यों को प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण नहीं आया, इसलिए वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हो रहे हैं। हालांकि स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद किसी भी सूरत में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह ब्राह्मण है तो इनको संन्यास का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रोक लगने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने पट्टाभिषेक करवाया और अब अपने आप को शंकराचार्य लिख रहे हैं जो कि सरासर गलत है। इन पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए।

प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुर गांव में 15 अगस्त 1969 को जन्मे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का नाम उमाशंकर पांडेय था। कक्षा 6 तक की पढ़ाई गांव में ही करने के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए बाहर भेज दिया गया। एक बार उनके पिता उन्हें गुजरात ले गए, वहां पर काशी के संत रामचैतन्य से उनकी मुलाकात हुई। उन्होंने बेटे को वहीं पर छोड़ दिया। तबसे यहीं पर रहकर उमाशंकर पूजन पाठ और पढ़ाई में रम गए। गुजरात में रहकर अगले कुछ साल तक पढ़ाई करने के बाद उमाशंकर फिर वाराणसी पहुंचे। वहां पर उनकी मुलाकात स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुई। इसके बाद उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। साल 2000 में उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए। इसके बाद उमाशंकर पांडे से वह दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बन गए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 4 जून 2022 को ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान किया था। पुलिस प्रशासन की तरफ से रोके जाने के बाद वे 108 घंटे तक अनशन पर बैठे रहे। मंदिर भगवान का शरीर होता है, उसके अंदर की मूर्ति आत्मा होती है। बता दें कि अविमुक्तेश्वरानंद किसी भी सूरत में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह ब्राह्मण है तो इनको संन्यास का कोई अधिकार नहीं है।उसके बाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के कहने पर उन्होंने अनशन को समाप्त कर लिया था।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि मंदिर में अगर प्रतिष्ठा हो रही तो मंदिर पूरा बना हुआ होना चाहिए। अगर चबूतरे पर प्रतिष्ठा हो रही है तो चबूतरा पूरा बना होना चाहिए। यही इतनी बात कुछ लोगों को समझ नहीं आ रही है क्योंकि उन्हें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। ऐसे लोग कहते हैं कि गर्भगृह तो बन गया है बाकी भले नहीं बना। अधिकतर लोग समझते हैं कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा होनी है, जबकि ऐसा नहीं है। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होनी है।’

स्वामी ने आगे बात कहते हुए कहा, ‘मंदिर भगवान का शरीर होता है, उसके अंदर की मूर्ति आत्मा होती है। बता दें कि अविमुक्तेश्वरानंद किसी भी सूरत में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नहीं है और ना ही यह ब्राह्मण है तो इनको संन्यास का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रोक लगने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने पट्टाभिषेक करवाया और अब अपने आप को शंकराचार्य लिख रहे हैं जो कि सरासर गलत है। इन पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 4 जून 2022 को ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान किया था। पुलिस प्रशासन की तरफ से रोके जाने के बाद वे 108 घंटे तक अनशन पर बैठे रहे। उसके बाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के कहने पर उन्होंने अनशन को समाप्त कर लिया था।मंदिर का शिखर भगवान की आंखें हैं। कलश भगवान का सिर है और मंदिर में लगा झंडा भगवान के बाल हैं। बिना सिर या आंखों के शरीर में प्राण-प्रतिष्ठा करना सही नहीं है। यह हमारे शास्त्रों के खिलाफ है।’