Friday, March 6, 2026
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2024 में कैसे और किन लोगों को मिलेगा बीजेपी से टिकट?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि 2024 में बीजेपी से किन लोगों को कैसे टिकट मिलेगा! 2024 के लोकसभा चुनाव के बीजेपी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बीजेपी ने इस बार 10 फीसदी वोट बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। पिछले चुनाव में बीजेपी ने 37.36 प्रतिशत वोट हासिल किए थे और 303 सीटें जीती थीं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी ने सभी घोड़े खोल दिए हैं। पिछले दो साल से ग्राउंड लेवल पर बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक्टिव हैं। पार्टी के कार्यकर्ता, विधायक और सांसद पीएम मोदी के दस साल की उपलब्धि के साथ जनसंपर्क में जुट गए हैं। चुनाव की कमान पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने संभाली है। तीसरी बार लगातार जीत के लिए पार्टी कई ऐसे प्रयोग करने जा रही है, जिसे पिछले विधानसभा चुनाव में आजमाया जा चुका है। चर्चा है कि केंद्रीय नेतृत्व मौजूदा सांसदों के परफॉर्मेंस का आकलन कर रही है। प्रदेश के पदाधिकारियों से फीडबैक लिए जा चुके हैं। टिकट फाइनल करने से पहले हर संसदीय क्षेत्र में कमेटियां जाएंगी और केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रिपोर्ट देगी। इसके अलावा जातीय और सामाजिक समीकरणों के आधार पर नए चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी है। ऐसा माना जा रहा है कि बिहार में इस बार आईएएस और आईपीएस रहे कई युवा ऐसे चेहरों को बीजेपी टिकट देगी, जिनकी छवि तेजतर्रार अफसरों की रही है। बताया जा रहा है कि पार्टी बीजेपी शासित राज्यों में मंत्रियों, विधायकों और पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा चर्चित नेताओं को मैदान में उतारेगी। यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, केशव प्रसाद मौर्य और जतिन प्रसाद भी लोकसभा प्रत्याशी बनाए जा सकते हैं। 2019 में भी बीजेपी ने योगी सरकार के चार मंत्रियों रीता बहुगुणा जोशी, सत्यदेव पचौरी, मुकुट बिहारी वर्मा और एस पी सिंह बघेल को चुनाव में उतारा था। मुकुट बिहारी वर्मा को छोड़कर सभी मंत्री चुनाव जीतने में सफल रहे थे। केशव मौर्य को एक बार फिर फूलपुर से उतारने की चर्चा है। जतिन प्रसाद अपनी परंपरागत सीट शाहजहांपुर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं। इसके अलावा मंत्री दयाशंकर मिश्रा को भी लोकसभा में जोर आजमाइश करनी होगी। ऐसा प्रयोग राजस्थान और मध्यप्रदेश में किया जाएगा। राजस्थान में विधानसभा हार चुके राजेंद्र राठौर और सतीश पूनिया पर बीजेपी दांव लगाएगी। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को विदिशा या भोपाल लोकसभा सीट से लड़ाया जा सकता है। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष बी डी शर्मा और नरोत्तम मिश्रा के नाम पर कैंडिडेट की लिस्ट में हो सकता है। ऐसा ही प्रयोग महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में भी आजमाया जाएगा।

2024 के लोकसभा चुनाव में ऐसे मंत्रियों को भी चुनाव लड़ाया जाएगा, जो फिलहाल राज्यसभा में हैं। पीएम नरेंद्र मोदी खुद ही संसदीय दल की बैठक में इस प्रस्ताव को लेकर आए थे। इस लिस्ट में उन नेताओं के नाम हैं, जो दो बार लगातार राज्यसभा का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। पिछले चुनाव में पटना साहिब सीट पर रविशंकर प्रसाद और अमेठी में स्मृति ईरानी को चुनाव में उतारा गया था और दोनों जीतने में सफल रहे थे। अगले चुनाव के लिए इसमें धर्मेंद्र प्रधान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, गजेंद्र शेखावत का नाम टॉप पर है। इसके अलावा निर्मला सीतारमन, अश्विनी वैष्णव, भूपेंद्र यादव, नारायण राणे,पुरुषोत्तम रुपाला, हरदीप सिंह पुरी, राजीव चंद्रशेखर और पीयूष गोयल जैसे दिग्गजों के नाम भी शामिल हैं। धर्मेंद्र प्रधान अपने गृह राज्य ओडिशा से चुनाव लड़ेंगे। हरदीप सिंह पुरी को दिल्ली और भूपेंद्र यादव को हरियाणा से उतारा जा सकता है। पुरुषोत्तम रूपाला और पीयूष गोयल गुजरात से चुनावी मैदान में उतरेंगे। निर्मला सीतारमन को केरल और राजीव चंद्रशेखर कर्नाटक से चुनावी ताल ठोकेंगे। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और नारायण राणे को महाराष्ट्र में अपनी ताकत दिखानी होगी। झारखंड की हजारीबाग सीट से राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश को मौका दिया जा सकता है।

पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह टिकट बंटवारे में गुजरात का फॉर्मूला लागू करेगी। 70 प्लस की उम्र और परफॉर्मेंस की कसौटी पर खरे नहीं उतरने वाले करीब 30 फीसदी मौजूदा सांसदों का टिकट सकता है। टिकट कटने वालों लोकसभा सांसदों की संख्या 65 से 70 तक हो सकती है। इन सीटों पर नए चेहरों, राज्यसभा सांसदों और दिग्गज नेताओं को उतारा जाएगा। इसके अलावा दूसरे पार्टी से आने वाले दिग्गजों को भी इन सीटों पर टिकट दिया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार, अमित शाह की कैंची यूपी और बिहार में ज्यादा चलेगी। बिहार की कटौती वाली लिस्ट में केंद्रीय मंत्री समेत कई चौंकाने वाले नाम भी हो सकते हैं। बंगाल, हरियाणा, असम, उत्तराखंड और झारखंड में भी बड़े पैमाने पर प्रत्याशी बदले जा सकते हैं। जातीय समीकरणों के आधार पर इनमें में कई नेताओं को राज्यसभा में लाया जाएगा या दूसरे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति हो सकती है। बीजेपी इस प्रयोग को गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान समेत कई राज्यों में आजमा चुकी है, जहां से उसे बेहतर नतीजे मिले हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के पास दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहला 2019 में बीजेपी 436 सीटों पर चुनाव लड़ी और 133 सीटों पर हार गई। 2024 में उन सीटों को जीतना आसान नहीं है। दूसरा, पिछले पांच साल में कई राज्यों में एडीए गठबंधन के पुराने साथी विपक्ष के खेमे में जा चुके हैं। बिहार में जेडी यू, पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना यूबीटी अब अलायंस के पार्टनर नहीं रहे। अलायंस बदलने से तीन राज्यों की 56 सीटों का समीकरण बदल गया है। इन सीटों पर अब बीजेपी अपने उम्मीदवार उतारेगी। बिहार, पंजाब और महाराष्ट्र की कुल 25-30 सीटों पर बीजेपी को नए सिरे से जिताऊ कैंडिडेट की तलाश करनी होगी। महाराष्ट्र में शिवसेना शिंदे और एनसीपी अजित गुट गठबंधन में शामिल हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए पार्टी ने प्लानिंग कर ली है। कमजोर यानी पिछले चुनाव में हारी हुई सीटों पर 22 जनवरी के बाद कभी भी कैंडिडेट की लिस्ट जारी हो सकती है। इसके अलावा नई सीटों पर भी फरवरी के अंत तक उम्मीदवारों की घोषणा कर दी जाएगी। इन क्षेत्रों में पीएम नरेंद्र मोदी की रैली भी पहले चरण में होगी।

आखिर दारा सिंह चौहान को बीजेपी से क्यों मिल रहा है बार-बार मौका?

वर्तमान में दारा सिंह चौहान को बीजेपी से लगातार मौका मिलने जा रहा है! उत्तर प्रदेश में मऊ जिले के घोसी विधानसभा सीट के पूर्व विधायक, पूर्व मंत्री और प्रदेश के कद्दावर नेता दारा सिंह चौहान का जलवा बरकरार है। घोसी विधानसभा उपचुनावमें सपा से मिली करारी हार के बाद भी भाजपा का दारा मोह कम नहीं हुआ है। भाजपा ने एक बार फिर दारा पर भरोसा जताते हुए अबकी विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया है। मंगलवार को भाजपा के केंद्रीय कार्यालय ने दारा सिंह चौहान के उम्मीदवारी पर मोहर लगाते हुए इन्हें विधान परिषद उपचुनाव का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। दारा सिंह चौहान को प्रदेश की राजनीति में मौसम वैज्ञानिक माना जाता है। लोगों का ऐसा मानना भी है की दारा सिंह चौहान हमेशा सत्ता के करीब रहे हैं चाहे सत्ता किसी पार्टी की रही हो। दारा सिंह चौहान का राजनीतिक इतिहास भी इसी इशारा करता है। सत्ता के करीब रहने के लिए दारा सिंह चौहान हमेशा पाला बदलने में माहिर रहे हैं कभी बसपा, कभी सपा तो कभी बीजेपी। 2017 में योगी सरकार में वन मंत्री के पद पर रहने वाले तारा सिंह चौहान 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा पर पिछड़ों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए सपा के खेमे में शामिल हो गए लेकिन जब चुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में आए तो 1 साल के भीतर ही दारा सिंह चौहान ने अपना पाला बदलते हुए फिर से भाजपा का दामन थाम लिया।

सपा का साथ छोड़ने के साथ-साथ दारा सिंह चौहान ने अपने विधायकी से भी इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद घोसी विधानसभा की सीट रिक्त हो गई थी। निर्वाचन आयोग ने इस सीट पर 2023 में उपचुनाव की घोषणा कर दी थी। उपचुनाव में दारा सिंह चौहान ने फिर से भाजपा का दामन थामा और भाजपा प्रत्याशी के रूप में इसी विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में कूद पड़े। हालांकि इस बार उनका मुकाबला सपा के सुधाकर सिंह से था। पूर्व विधायक सुधाकर सिंह क्षेत्रीय राजनीति में अपना दबदबा रखते हैं । सुधाकर सिंह घोसी की जनता को यह समझाने में सफल रहे की दारा सिंह चौहान मौका परस्त हैं और बार-बार अपने लाभ के लिए दल बदलने की कोशिश करते हैं उन्होंने घोसी से क्षेत्रीय नेता को जिताने की अपील भी की थी जिसके बाद सुधाकर ने इस उप चुनाव को क्षेत्रीय बनाम बाहरी बनाते हुए दारा सिंह चौहान को करारी शिकायत दे दी।

दारा सिंह चौहान को सपने में भी इस बात की उम्मीद नहीं थी कि जिस सीट पर वह 2022विधनसभा चुनाव में इतनी आसानी से कब्जा जमा चुके थे उस पर उनको इतनी करारी हार का सामना करना पड़ेगा। मन में मंत्री पद का सपना सजा दारा सिंह चौहान को इस उपचुनाव में मायूसी हाथ लगी लेकिन दारा सिंह चौहान लगातार भाजपा के शीर्ष नेताओं के संपर्क में बने रहे। भाजपा द्वारा विधान परिषद उपचुनाव में दारा सिंह चौहान को प्रत्याशी बनाए जाने पर क्षेत्र के लोगों ने अपनी-अपनी राय दी है। क्षेत्र के प्रवीण राय ने कहा कि भाजपा के पास पूर्वांचल में कोई बड़ा चौहान चेहरा नहीं है, जिसके कारण दारा सिंह चौहान को टिकट देना भाजपा की मजबूरी बन जाती है। वहीं पत्रकार श्री राम जायसवाल ने बताया कि पूर्वांचल के कुछ सीटों पर दारा सिंह चौहान वोटरों पर अपनी पकड़ रखते हैं और 2024 में भाजपा चौहान वोटरों को साधने के लिए दारा सिंह चौहान पर अपना दांव खेल रही है। मॉर्निंग वॉक्स सिंडिकेट के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ अरुण सिंह का मानना है कि दारा सिंह चौहान भाजपा के बड़े नेताओं के करीबी हैं जिसके कारण भाजपा से टिकट पा जाते हैं वही क्षत्रिय महासभा के जन्मेजय सिंह ने कहा कि करारी हार के बाद भी भाजपा का बार-बार दारा सिंह चौहान पर दांव लगाना भाजपा की इमेज खराब कर रहा है मिशन 2024 में भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

विधानसभा उपचुनाव 2023 के करारी हार के बाद भी भाजपा ने दारा सिंह चौहान पर विश्वास जताते हुए उनको फिर से विधान परिषद उपचुनाव का प्रत्याशी बनाया है। दारा सिंह चौहान को विधान परिषद उपचुनाव में प्रत्याशी घोषित करने के पीछे भाजपा की नजरे लोकसभा चुनाव 2024 पर टिकी हुई हैं ऐसा माना जाता है कि दारा सिंह चौहान के जरिए भाजपा चौहान वोटरों को अपनी तरफ खींचने की फिराक में हैं अब देखना है दिलचस्प होगा कि भाजपा का दर मोह आगे कहां तक सफल हो पाता है।

जब पहली बार तय की गई राम मंदिर आंदोलन की दिशा!

एक ऐसा समय जब पहली बार राम मंदिर आंदोलन की दिशा तय की गई थी! प्रभु रामलला 1990 आते- आते पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा बन गए थे। विवादित परिसर में मंदिर का निर्माण होगा या नहीं, यह राजनीतिक रैलियों का मुद्दा बन गया था। मंदिर बनेगा तो कैसे बनेगा? यह सवाल भी उठने लगा था। 1853 और 1934 में मस्जिद को ध्वस्त करने की दो नाकाम कोशिशें हो चुकी थीं। राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने 30 अक्टूबर 1990 को पहुंचे रामभक्त कारसेवक गोलीकांड का शिकार हुए थे। कारसेवकों की मौत ने देश के हिंदू समाज को आक्रोशित कर दिया था। मुलायम सिंह सरकार के खिलाफ जनाक्रोश लगातार बढ़ रहा था। कुछ यही हाल केंद्र की वीपी सिंह सरकार का था। 1990 की घटनाओं ने यूपी ही नहीं देश की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा कर दिया था। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व के एजेंडे के साथ आगे बढ़ रही थी। वहीं, दूसरी तरफ जनता दल की ओर से कांग्रेस के बने- बनाए सामाजिक समीकरण में सेंधमारी शुरू कर दी थी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों का राजनीतिक उभार हो चुका था। बीपी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन को लागू कर ओबीसी वर्ग को राजनीतिक तौर पर सजग कर दिया था। ओबीसी वर्ग राजनीतिक तौर पर जागरूक हुआ तो लीडरशिप में भागीदारी की मांग तेज हो गई। इसके साथ ही राम मंदिर का मुद्दा और गहराना शुरू हो गया। भारतीय जनता पार्टी ने जातियों की राजनीति के बीच हिंदू धर्म को आधार पर तमाम वर्गों को जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। 1990 की कारसेवकों पर गोलीकांड की घटना ने देश को राजनीतिक तौर पर झकझोड़ दिया था। राम मंदिर का मुद्दा अब आंदोलन से उन्माद की तरफ बढ़ने लगा। अयोध्या में ‘लंका कांड’ की शुरुआत हो चुकी थी। युद्ध का बिगुल बज चुका था। ऐसे में दो बड़ी घटनाएं हुई। पहली देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद अल्पमत में आ गई थी। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। 10 नवंबर 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई। जनता दल के दूसरे धड़े के नेता चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए। इस बार चंद्रशेखर को समर्थन कांग्रेस ने दिया। 2 दिसंबर 1989 को बनी वीपी सिंह सरकार अपने एक साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई। जनता दल में एक और दरार की पटकथा मुलायम- लालू लिख चुके थे। वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर की सरकार बनी, लेकिन यह कांग्रेस की एक सोची- समझी राजनीति थी। दरअसल, कांग्रेस कारसेवकों पर गोलीकांड के कारण भाजपा को किसी राजनीतिक लाभ लेने से वंचित रखना चाहती थी। ऐसे में अयोध्या एक बार फिर राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका था। मेरे राम पर बड़ी राजनीतिक संघर्ष का यह आरंभ था।

1990 में मुलायम सरकार ने 30 अक्टूबर और 2 नवंबर को अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवा कर देश की राजनीति को बदल दिया। यूपी से देश तक इसका अलग संदेश गया। हालांकि, 1989 में राजीव सरकार के पतन और वीपी सिंह सरकार के गठन के बाद राम एक मुद्दा बन चुके थे। वीपी सिंह सरकार में शामिल भाजपा इस मुद्दे को छोड़ने को तैयार नहीं थी। लालकृष्ण आडवाणी के रथ यात्रा के ऐलान के साथ वीपी सिंह सरकार ने हिंदू- मुस्लिम पक्ष के बीच वार्ता के जरिए मुद्दे का हल निकालने की पहल की। हालांकि, यह कोशिश आगे नहीं बढ़ पाई। ऐसे में वीपी सिंह सरकार ने एक ऐसा आदेश दिया, जिसने मेरे प्रभु राम के मंदिर के बनने की आस दिखने लगी। वीपी सिंह सरकार ने विवादित स्थल के अधिग्रहण का आदेश जारी कर दिया। वीपी सिंह सरकार की ओर से जारी भूमि अधिग्रहण के अध्यादेश का मुस्लिम पक्ष की ओर से जोरदार विरोध शुरू हो गया। वीपी सिंह सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। भाजपा ने सरकार के इस कदम को मुस्लिम तुष्टीकरण से जोड़ा।

वीपी सिंह सरकार के गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर पीएम बने। कांग्रेस की पहल पर 1989 में अयोध्या राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ था। ऐसे में कांग्रेस फिर एक्टिव हुई। वीपी सिंह जिस वार्ता की योजना बना रहे थे। हिंदू- मुस्लिम पक्ष को एक राय बनाने के लिए वार्ता के मंच तक जाने की कोशिश की गई। पीएम चंद्रशेखर ने राम मंदिर मुद्दे पर वार्ता के लिए अपनी सरकार में मंत्री सुबोध कांत सहाय और तीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, भैरों सिंह शेखावत और शरद पवार की एक कमेटी गठित की। इस कमेटी को हिंदू और मुस्लिम पक्ष से वार्ता कर मुद्दे के समाधान की राह निकालने को तैयार किया गया था। सरकार की कमेटी के नेतृत्व में दोनों पक्ष मिले। हिंदू और मुस्लिम पक्ष की ओर से प्रमाणों को पेश किया गया।

मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधि इतिहासकारों ने अयोध्या में मौका मुआयना करके दोबारा बातचीत में आने को कहा। 25 जनवरी 1991 को यह वार्ता टूट गई। पीएम चंद्रशेखर के मित्र तांत्रिक चंद्रास्वामी ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा लिया। लेकिन, कोई नतीजा नहीं निकला। इसी दौरान कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार गिर गई। बातचीत का सिलसिला खत्म हो गया। इसके बाद अगले तीन दशकों तक राम मंदिर चुनावी और राजनीतिक मुद्दा बनकर चलता रहा।

देश में चंद्रशेखर को एक कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर कांग्रेस ने अपने चुनावी कैंपेन की शुरुआत कर दी। कांग्रेस देश में आम चुनाव की तैयारी कर ली थी। लेकिन, यूपी में पार्टी मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने की रणनीति पर काम कर रही थी। कांग्रेस की रणनीति थी कि यूपी में मुलायम को अल्पमत की सरकार साबित कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए। दरअसल, 1989 के यूपी चुनाव में जनता दल यूपी की 425 सीटों वाली विधानसभा में 208 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस 94 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। भाजपा 57 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। मुलायम वीपी सिंह और चौधरी देवीलाल के समर्थन से यूपी में मुख्यमंत्री बन गए। वीपी सिंह सरकार गिरने के बाद मुलायम ने पाला बदला। पीएम चंद्रशेखर के समाजवादी जनता दल का दामन थाम लिया। कांग्रेस के चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद कांग्रेस मुलायम सरकार को भी गिराने की तैयारी में थी।

अप्रैल 1990 में एक रात दिल्ली में कांग्रेस ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने की रणनीति बनाई। अगले दिन राजभवन को कांग्रेस मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेने वाली थी। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने इस मामले की जानकारी मुलायम तक पहुंचा दी। लखनऊ में मुलायम सिंह यादव ने अपने- अपने बंगलों में सो रहे सभी मंत्रियों को जगाया। कैबिनेट की आपात बैठक हुई। ‘बाई सर्कुलेशन’ कैबिनेट से इस प्रस्ताव की मंजूरी ली गई कि मंत्रिपरिषद विधानसभा भंग कर नए विधानसभा चुनाव की सिफारिश करती है। कांग्रेस का खेल खराब हो गया और प्रदेश में चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई।

अक्टूबर- नवंबर 1990 में अयोध्या में जिस प्रकार से कारसेवकों पर गोलियां चली। लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया, उसने देश में अलग ही माहौल बना दिया। देश में मंडल कमीशन के बाद की राजनीति के बाद बदले सामाजिक समीकरणों से उपजे नेता राज्यों की कमान संभाल रहे थे। देश की आजादी के बाद बड़े स्तर पर समीकरणों में बदलाव हो रहा था। कांग्रेस से सवर्ण वोट बैंक किनारे हो रहा था। मंडल कमीशन के मुद्दे के बाद ओबीसी वोट बैंट भी छिटका। कांग्रेस की सबसे बड़ी समर्थक मुस्लिम वोट बैंक ने भी 1986 में राम मंदिर का ताला खोलने और 1989 में शिलान्यास कार्यक्रम की मंजूरी से नाराज हो गई। क्षेत्रीय क्षत्रपों के दलों ने इस राजनीति पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया। इसके बाद भी कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी हुई थी। पावर पॉलिटिक्स में बाउंस बैक करने का दम रखती थी। ऐसे में राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार पर जासूसी का आरोप लगाया। चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया गया।

चंद्रशेखर सरकार गिरने के बाद देश में मध्यावधि चुनावों की घोषणा हुई। 20 मई से वोटिंग का ऐलान चुनाव आयोग की ओर से किया गया। कांग्रेस ने अपना जोरदार प्रचार अभियान शुरू किया। अल्पसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी से चिंतित राजीव गांधी इस बार राम मंदिर के मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचते दिख रहे थे। देश में पहले चरण की वोटिंग के बाद राजीव गांधी प्रचार अभियान के लिए तमिलनाडु के श्रीपेररुंबदूर पहुंचे थे। वहां पर बम विस्फोट में उनकी हत्या कर दी गई। कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर का साथ मिला। चुनाव आयोग ने इस घटना के बाद 12 और 15 जून को वोटिंग का ऐलान किया। राजीव हत्याकांड से मंडल और कमंडल दोनों कमजोर हुआ।

लोकसभा चुनाव 1991 में कांग्रेस ने 36.26 फीसदी वोट शेयर के साथ 232 सीटों पर जीत हासिल की। हालांकि, कांग्रेस बहुमत के 268 सीटों के आंकड़े से 36 सीट कम रह गई थी। हालांकि, पार्टी ने पर्याप्त बहुमत जुटाया और पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ। इस चुनाव में कमंडल का जोर दिखा। अपने तीसरे लोकसभा चुनाव में भाजपा 20.11 फीसदी वोट शेयर के साथ देश की 120 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। आठ साल से भी कम समय में पार्टी 2 से 120 तक पहुंच चुकी थी। यह राम मंदिर मुद्दे का परिणाम था। इस चुनाव में जनता दल 59 और माकपा 35 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही।

क्या विपक्ष के INDIA गठबंधन का खेल बिगाड़ेगी बसपा?

विपक्ष के INDIA गठबंधन का बसपा खेल बिगाड़ सकती है! बहुजन समाज पार्टी बसपा प्रमुख मायावती की आगामी लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा हिंदी पट्टी के सर्वाधिक सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन इंडिया को नुकसान पहुंचा सकती है।आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस वाईएसआरसीपी, तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति बीआरएस और ओडिशा में बीजू जनता दल जैसे अन्य क्षेत्रीय दल भी अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे और इन राज्यों में इन दलों को तीसरी ताकत के रूप में देखा जा रहा है। कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर ने पहले ही लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ जाने का फैसला कर लिया है। बसपा की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपने 68वें जन्मदिन पर सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले ही लड़ेगी लेकिन चुनाव के बाद सरकार बनाने वाली पार्टी को उचित भागीदारी के साथ समर्थन देगी। मायावती ने उनके राजनीति से संन्यास लेने की खबरों को आधारहीन बताते हुए कहा मैं अंतिम सांस तक पार्टी को मजबूत करती रहूंगी। कांग्रेस ने पिछले साल फरवरी में अपने रायपुर अधिवेशन के घोषणापत्र में कहा था कि किसी तीसरी ताकत के उभरने से भाजपा/राजग को फायदा होगा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राजग से वैचारिक आधार पर मुकाबला करने के लिए विपक्षी एकजुटता की तत्काल आवश्यकता है। कांग्रेस ने इस बात से इनकार किया है कि उसका कोई भी नेता बसपा नेतृत्व के संपर्क में था। हालांकि, सूत्रों ने कहा कि बसपा के साथ अनौपचारिक बातचीत चल रही थी। कहा था कि बसपा को इंडिया गठबंधन में शामिल होने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

सपा और बसपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में 38-38 सीटों पर मिलकर लड़ा था और अमेठी और रायबरेली सीटों पर कांग्रेस के खिलाफ अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे। तब उत्तर प्रदेश में महागठबंधन के तहत बसपा ने जहां 10 सीटें जीती थीं, वहीं सपा ने पांच सीटें जीती थीं। भाजपा प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा मायावती जी ने दुर्घटनाग्रस्त हो रहे विमान ‘इंडि’ इंडिया गठबंधन पर सवार होने से इनकार कर दिया है, जिसके पायलट आंखों पर पट्टी बांधकर उड़ान भर रहे हैं।

बता दे कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपने बर्थ डे पर इंडिया गठबंधन को बड़ा सरप्राइज दिया। इंडिया गठबंधन में शामिल होने के अटकलों पर विराम लगाते हुए उन्होंने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस के यूपी प्रभारी ने बहुजन समाज पार्टी बीएसपी से चुनावी तालमेल को हवा दी थी। बसपा प्रमुख ने अखिलेश यादव को भी खरी-खोटी सुनाते हुए सपा के फ्रेंडली फाइट के मंसूबे पर भी पानी फेर दिया। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, इनसे बचकर रहना चाहिए। मायावती ने कहा कि विरोधी दल उनके संन्यास की अफवाह फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अभी संन्यास लेने वाली नहीं हैं। वह अंतिम समय तक पार्टी के लिए काम करती रहेंगी। बीएसपी चीफ के ऐलान के बाद तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश में 2024 का लोकसभा चुनाव त्रिकोणीय होगा। बीजेपी, बीएसपी और सपा-रालोद-कांग्रेस के गठबंधन के बीच यूपी में फाइनल मुकाबला होगा। मायावती के फैसले से बीजेपी नेताओं ने राहत की सांस ली होगी, क्योंकि 80 लोकसभा सीटों पर वन-टु-वन फाइट के मंसूबे भी ध्वस्त हो गए हैं।

2024 में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने सभी लोकसभा सीटों पर वन-टु-वन फाइट का फॉर्मूला दिया था। इंडिया गठबंधन भी इस फॉर्मूले पर राजी था। विपक्षी दलों को कोशिश है कि 2024 में बीजेपी के सामने विपक्ष की ओर से सिर्फ एक उम्मीदवार हो। 1977 के लोकसभा चुनाव में तब के विपक्षी दलों ने जनता पार्टी इसी फॉर्मूले पर बनाई थी। तब जनता पार्टी ने ताकतवर इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को हराकर केंद्र की सत्ता हासिल की थी। इंडिया गठबंधन में भी सभी विपक्षी दल एक छतरी के नीचे इकट्ठा हुए। विपक्षी दलों को नरेंद्र मोदी के खिलाफ बड़ी जीत के लिए 80 लोकसभा सीटों वाले में ज्यादा से ज्यादा सहयोगियों की दरकार थी। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच समझौते की राय बनी। दलों ने बीएसपी प्रमुख मायावती को भी गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की, मगर वह नहीं मानी। कुछ दिन पहले बीएसपी सांसद मलूक नागर ने गठबंधन में शामिल होने के लिए मायावती को पीएम कैंडिडेट बनाने की शर्त रख दी। इससे बसपा के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की अफवाह को हवा मिल गई। मगर अपने जन्मदिन पर मायावती ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर सपा-कांग्रेस गठबंधन को तगड़ा झटका दे दिया।

ओवैसी ने आम आदमी पार्टी पर क्यों बोला हमला?

हाल ही में ओवैसी ने आम आदमी पार्टी पर हमला बोल दिया है! AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने RSS का छोटा रिचार्ज बता आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्‍होंने सुंदरकांड पर AAP के ताजा फैसले को लेकर जमकर हमला क‍िया है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व वाली पार्टी ने मंगलवार को दिल्ली के सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में सुंदरकांड पाठ आयोजित करने का फैसला लिया है। ओवैसी ने दावा किया यह फैसला 22 जनवरी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह के मद्देनजर लिया गया। आम आदमी पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज ने सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी मंगलवार को दिल्ली के सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में सुंदरकांड पाठ कार्यक्रम आयोजित करेगी। अगले सप्ताह से हर मंगलवार को शहर के सभी विधानसभा क्षेत्रों और नगर निगम वार्ड सहित 2,600 स्थानों पर सुंदरकांड और हनुमान चालीसा के पाठ किए जाएंगे। इसके लिए आम आदमी पार्टी के भीतर एक संगठन बनाया गया है। सुंदरकांड महाकाव्य रामचरितमानस का एक अध्याय है। यह भगवान हनुमान को समर्पित है।आप ने यह घोषणा 22 जनवरी को अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए अभी तक औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला है। हालांकि, मुख्यमंत्री को कुछ दिन पहले एक पत्र मिला था जिसमें कहा गया था कि उन्हें एक औपचारिक निमंत्रण भेजा जाएगा और वह उस दिन अपना कोई और कार्यक्रम नहीं रखें।

सुंदरकांड आयोजित करने के AAP के ताजा फैसले के बाद ओवैसी खफा हो गए। उन्‍होंने सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म एक्‍स पर इस फैसले को लेकर अपना गुस्‍सा जाहिर किया। उन्‍होंने कहा- आरएसएस के छोटे रिचार्ज ने फैसला लिया है कि दिल्‍ली की हर विधानसभा क्षेत्र में हर महीने के पहले मंगलवार को सुंदरकांड पाठ का आयोजन किया जाएगा। ये फैसला 22 जनवरी के उद्घाटन की वजह से लिया गया। ओवैसी ने बिल्‍किस बानो का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि ये लोग वही हैं जिन्‍होंने उस मसले पर चुप्‍पी बनाए रखी थी। यह कहा था कि वे सिर्फ शिक्षा और सेहत जैसे मसलों पर बात करना चाहते हैं।

बता दे कि राममय माहौल के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने बड़ा ऐलान किया है। राजधानी दिल्ली में हर महीने पहले मंगलवार को AAP सुंदरकांड का आयोजन करेगी। विधायक और पार्षद हर महीने सुंदरकांड का आयोजन करेंगे। सुदरकांड के साथ-साथ हनुमान चालीसा का भी पाठ होगा। हर महीने 2600 जगहों पर सुंदरकांड का आयोजन पार्टी करेगी। AAP के नेता व दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने सोमवार इसका ऐलान किया। आम आदमी पार्टी की ओर से यह ऐलान उस वक्त किया गया है जब विपक्षी पार्टियां 22 जनवरी को होने जा रहे राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर बीजेपी पर निशाना साध रही हैं। कांग्रेस समेत कई दल यह आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी इसके जरिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इस मुद्दे पर जारी सियासत के बीच अब आम आदमी पार्टी की ओर से उठाया गया यह कदम क्या बीजेपी की काट के लिए है?  दिल्ली के मंत्री और AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने सोमवार कहा कि राम जी के नाम और हनुमान जी की भक्ति पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। जो सवाल उठा रहा है वह गलत सवाल उठा रहा है। राम मंदिर के लिए हमलोगों की तरफ से कोई सवाल नहीं है। जब सुप्रीम कोर्ट में फैसला आया तो हमने इसका स्वागत किया। राम मंदिर बन रहा है यह हम सबके लिए बहुत गर्व व उल्लास की बात है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पार्टी की ओर से हनुमान भक्ति दिखाई गई है। अरविंद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में चुनाव जीतने के बाद हनुमान जी के दर्शन के लिए मंदिर गए। मार्च 2021 में भी दिल्ली विधानसभा में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वे हनुमान के भक्‍त हैं और हनुमान रामचंद्र जी के और इस नाते वह रामचंद्र जी के भी भक्‍त हुए। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने दिल्‍ली के भीतर ‘राम राज्‍य’ लाने की कोशिश की है। उस वक्त ही दिल्ली के सीएम ने घोषणा करते हुए कहा था कि अयोध्‍या में भव्‍य मंदिर बनने के बाद सरकार बुजुर्गों को मुफ्त में दिल्‍ली से अयोध्‍या दर्शन के लिए ले जाएगी। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के भीतर भी शामिल दलों की अलग-अलग राय है। कांग्रेस की ओर से पिछले दिनों यह क्लियर कर दिया गया कि उनकी पार्टी के नेता 22 जनवरी को अयोध्या के कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे। कांग्रेस की ओर से यह आरोप लगाया गया कि यह कार्यक्रम आरएसएस और बीजेपी का है। वहीं गठबंधन में शामिल ममता बनर्जी ने भी इसको लेकर बीजेपी पर निशाना साधा। यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव और विश्व हिंदू परिषद के बीच इस मुद्दे पर खींचतान भी दिखी। अखिलेश यादव ने कहा है कि वह प्राण प्रतिष्ठा के बाद सपरिवार जाएंगे। सॉफ्ट हिंदुत्व वाली राजनीति से एक ओर जहां कांग्रेस किनारा करती नजर आ रही है तो वहीं दूसरी और AAP का स्टैंड अलग नजर आ रहा है।

क्या विजय माल्या जैसे ठग भारत आएंगे वापस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि विजय माल्या जैसे ठग क्या भारत वापस आ सकते हैं या नहीं! सरकार ने भारत में करोड़ों-अरबों का घपला करके विदेश भागने वालों की जल्दी वापसी की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। घोटालेबाजों की फौज जो ब्रिटेन में बैठी है, उसे वापस भारत लाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की एक टीम गठित की गई है। सरकार केंद्रीय जांच अभिकरण सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय ईडी और राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए से बने एक उच्च स्तरीय दल को जल्द ही ब्रिटेन रवाना कर रही है। इसका लक्ष्य भारत के मोस्ट वॉन्टेड भगोड़ों को वापस लाने की प्रक्रिया को तेज करना है, जिनमें हथियार डीलर संजय भंडारी, हीरा व्यापारी नीरव मोदी और किंगफिशर एयरलाइंस के प्रमोटर विजय माल्या शामिल हैं। इसके अलावा, टीम भगोड़ों की अवैध कमाई का पता लगाने की भी कोशिश करेगी, जो उन्होंने ब्रिटेन और अन्य देशों में संपत्ति खरीदने पर खर्च की है। सूत्रों का कहना है कि इस दल की अगुवाई विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कर रहे हैं। लंदन में भारतीय उच्चायोग ने यूके के अधिकारियों के साथ बैठकें तय की हैं। इन बैठकों में वही सबूत जुटाए जाएंगे जिनसे मालूम चले कि भगोड़ों ने लंदन में कितनी संपत्ति हथिया ली है और उनके बैंक खातों में क्या लेनदेन हुए हैं।

हथियार डीलर भंडारी 2016 में फरार हो गया था। इससे पहले आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने यूपीए सरकार के दौरान हुए कई रक्षा सौदों की जांच शुरू की थी। यूके के साथ बातचीत के लिए विदेश मंत्रालय को शामिल किया गया है क्योंकि सभी अनुरोध उसी के जरिए दूसरे देशों को भेजे जाते हैं। नीरव मोदी पर पीएनबी की 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि के धोखाधड़ी के आरोप हैं, जबकि बैंकों को ठगने के लिए माल्या की 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क और जब्त की गई थी।ईडी के मुताबिक, भंडारी ने लंदन और दुबई में संपत्ति हथिया ली थी, जिन्हें बाद में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा के सहयोगी माने जाने वाले सीसी थंपी के नियंत्रण वाली कंपनियों के नाम कर दिया गया था। भंडारी, मोदी और माल्या का प्रत्यर्पण फिलहाल यूके में अटका हुआ है क्योंकि उन्होंने भारत वापसी के खिलाफ उच्च अदालतों में अपील कर रखी है। ईडी ने पहले ही भारत में उनकी संपत्तियों को जब्त कर लिया है। विजय माल्या और नीरव मोदी की हजारों करोड़ की संपत्ति बेचकर बैंकों का बकाया चुकाया जा चुका है।

लंदन जाने वाला दल लंबित सूचनाओं के आदान-प्रदान पर बातचीत करने वाला है जो आपसी कानूनी सहायता संधि एमएलएटी के तहत काफी समय से यूके के अधिकारियों के पास लंबित है। ईडी कई रक्षा सौदों में कथित तौर पर मिले रिश्वत के सिलसिले में भंडारी, थंपी और वाड्रा की जांच कर रही है। अन्य देशों में संपत्ति खरीदने पर खर्च की है।भारत और यूके दोनों ही एमएलएटी के हस्ताक्षरकर्ता हैं और आर्थिक अपराधियों और अन्य से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच के लिए सूचना साझा करने के लिए बाध्य हैं। एनआईए की टीम इस समय खालिस्तानी आंदोलन में शामिल कई आतंकवादी संदिग्धों की जांच कर रही है।

हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय एमएलएटी से संबंधित सभी मामलों को देखने के लिए नोडल मिनिस्ट्री है, लेकिन इस मामले में यूके के साथ बातचीत के लिए विदेश मंत्रालय को शामिल किया गया है क्योंकि सभी अनुरोध उसी के जरिए दूसरे देशों को भेजे जाते हैं। नीरव मोदी पर पीएनबी की 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि के धोखाधड़ी के आरोप हैं, जबकि बैंकों को ठगने के लिए माल्या की 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति कुर्क और जब्त की गई थी।

ईडी कई रक्षा सौदों में कथित तौर पर मिले रिश्वत के सिलसिले में भंडारी, थंपी और वाड्रा की जांच कर रही है। अन्य देशों में संपत्ति खरीदने पर खर्च की है। सूत्रों का कहना है कि इस दल की अगुवाई विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कर रहे हैं। लंदन में भारतीय उच्चायोग ने यूके के अधिकारियों के साथ बैठकें तय की हैं। इन बैठकों में वही सबूत जुटाए जाएंगे जिनसे मालूम चले कि भगोड़ों ने लंदन में कितनी संपत्ति हथिया ली है और उनके बैंक खातों में क्या लेनदेन हुए हैं।एजेंसी ने भारत में भंडारी की 26 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पहले ही कुर्क कर ली है और उसके खिलाफ आरोप पत्र भी दायर किया है, जबकि एक विशेष अदालत ने उसे माल्या और मोदी की तरह भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित कर दिया है।

क्या चीन से निजात पाएगा ताइवान?

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या ताइवान अब चीन से निजात पा सकता है या नहीं! ताइवान के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी ने तीसरी बार जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है। चीन की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कुओमिनतांग के उम्मीदवार होउ यू-यी और नवगठित ताइवान पीपुल्स पार्टी के नेता को वेन-जे को हराकर लाई चिंग-ते विलियम लाई चीनी गणराज्य के राष्ट्रपति चुने गए हैं। लाई को लगभग 40% वोट मिले, जबकि केएमटी और टीपीपी उम्मीदवारों को क्रमशः 33% और 26% वोट मिले। चीन ने लाई को लगातार ‘अलगाववादी’ और ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थक बताया है। इसने ताइवान जलडमरूमध्य में ज्यादा पोत और हवाई जहाज भेजने के साथ नाकेबंदी की मॉक ड्रिल करके सैन्य दबाव भी बढ़ा दिया है। इस ग्रे जोन वॉरफेयर टैक्टिक्स से चीन ने ताइवान को डराने की भरपूर कोशिश की है। मतदान से कुछ ही दिन पहले नववर्ष के मौके पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि एकीकरण एक ऐतिहासिक अनिवार्यता है और चीन निश्चित रूप से ताइवान के साथ ‘एकीकृत’ होगा। जिनपिंग ने तो यह कहकर दबाव बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि इसका उल्टा असर हुआ है।

ध्यान लाई की जीत के मामूली अंतर पर केंद्रित है। 2016 और 2020 के चुनावों में निवर्तमान डीपीपी अध्यक्ष साई इंग-वेन ने आसानी से बहुमत हासिल किया था। लेकिन तस्वीर ज्यादा बारीक है। भले ही डीपीपी के हिस्से 2020 में 57% के मुकाबले 2024 में घटकर 40% के आसपास ही वोट आए लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि इस वर्ष वास्तव में त्रिकोणीय चुनावी जंग हुई। उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चुनाव में खड़े तीसरे उम्मीदवार को वेन-जे कई सालों तक डीपीपी समर्थक रहे थे। संक्षेप में, 2016 से ही वोटिंग में केएमटी विरोधी वोट लगातार 50% से अधिक रहे हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव ने दो महत्वपूर्ण रुझानों की पुष्टि की है – चीन के साथ तालमेल का केएमटी का संदेश ताइवान के लोगों को पसंद नहीं आ रहा, और यह कि ताइवान के लोगों में स्थानीय पहचान की भावना बढ़ रही है। चीनी गणराज्य से अलग एक ताइवानी पहचान के लिए 2014 में शुरू हुआ सनफ्लावर मूवमेंट की जड़ें बहुत गहरी हो गई हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि ताइवानी चीन से आजादी का ऐलान करने को छटपटा रहे हैं। केएमटी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को अभी भी 33% वोट मिले। राष्ट्रपति चुनाव के साथ हुए संसदीय चुनावों के परिणाम भी इस धारणा को पुष्ट करते हैं, क्योंकि केएमटी ने 113 सीटों में से 52 सीटें हासिल की हैं। यह डीपीपी से एक सीट ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि अधिक से अधिक युवा ताइवानी खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं और उन्हें डर है कि अगर ताइवान का चीन में विलय हो जाएगा तो शायद उन्हें यह आजादी नहीं मिल पाए। डेंग शियाओपिंग ने एक देश दो व्यवस्था के साथ शानदार प्रयोग किए थे। इस व्यवस्था में हॉन्गकॉन्ग, मकाओ और ताइवान के लोगों को अपने-अपने इलाकों पर चीनी संप्रभुता को स्वीकार करते हुए मर्जी की जिंदगी जीने की अनुमति मिली थी। इस कदम से चीन के लिए हॉन्गकॉन्ग और मकाओ की शांतिपूर्ण वापसी सुरक्षित हो गई। चीन के मौजूदा नेताओं की तरफ से हॉन्गकॉन्ग पर 1997 के साइनो-ब्रिटिश एग्रीमेंट को कठोरता से लागू किया जाना, हॉन्गकॉन्ग के अंब्रेला मूवमेंट पर कार्रवाई और हॉन्गकॉन्ग के लिए नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों ने ताइवानियों में चीन पर भरोसा कम कर दिया है।

चूंकि ताइवानी संसद में कोई भी पार्टी बहुमत हासिल करने में सक्षम नहीं है, इस कारण अगले चार वर्षों तक वहां सभवतः चेक्स एंड बैलेंस का सिस्टम ही बना रहेगा। चयनित राष्ट्रपति इस वास्तविकता को समझते हुए नरम रुख अपना रहे हैं। वो चीन के धौंस का विरोध जरूर कर रहे हैं, लेकिन ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता बनाए रखने का वादा भी कर रहे हैं। लाई ने घोषणा की कि वह क्रॉस-स्ट्रेट की यथास्थिति बनाए रखेंगे, टकराव को बातचीत से बदलेंगे और चीन के साथ आदान-प्रदान को बढ़ावा देंगे। बीजिंग को कम से कम अगले चार वर्ष तक अपने सबसे खराब विकल्प के साथ तालमेल बनाए रखना होगा। ताइवान की युवा पीढ़ी को यूनिफाइड चीन को लेकर बहुत कुछ पता नहीं है। कम्युनिस्ट शासन के तहत चीनी समाज में मौलिक बदलाव आ गया है जिसके कारण ताइवानियों लिए चीन के साथ जुड़ना मुश्किल होता जा रहा है। अभी भी केएमटी का समर्थन करने वाले ताइवान के कई नेताओं के पास ‘दोहरी नागरिकता’ है, लेकिन आम ताइवानियों के पास जाने की कोई और जगह नहीं है। बीजिंग इस मजबूत होती पहचान को जीरो सम गेम के रूप में देखता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि 1949 से ही चीन एक मिनट के लिए भी ताइवान पर पैर नहीं जमा सका है।

ताइवान जलडमरूमध्य को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे खतरनाक संभावित विस्फोट बिंदु बनने की वजह अमेरिका की भागीदारी है। वॉशिंगटन का दावा है कि वह ताइवान में लोकतंत्र को संरक्षित रखने की लड़ाई लड़ रहा है। हकीकत यह है कि वह अपने जियो-स्ट्रैटिजिक हितों की रक्षा के लिए लड़ रहा है। अमेरिका दरअसल चीन को प्रशांत में फैलने से रोकने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई द्वीप श्रृंखला को संरक्षित रखना चाहता है। 100 समुद्री मील की दूरी पर स्थित एक द्वीप को नियंत्रित करने में असमर्थता दुनिया के दूसरे सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के लिए बड़ी हताशा का सबसब है। दूसरी तरफ, उसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र की तरफ से उसके जियो-स्ट्रैटिजिक हितों को चुनौती दी जा रही है। ये परिस्थितियां आने वाले वर्षों में तनावपूर्ण माहौल में और इजाफे का संकेत हैं।

क्या गठबंधन करने से मायावती को डर लगता है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गठबंधन करने से मायावती को डर लगता है या नहीं! बहुजन समाज पार्टी बीएसपी चीफ मायावती ने आज अपने जन्मदिन पर लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। मायावती के इस ऐलान से कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी को आस थी कि मायावती I.N.D.I.A गठबंधन का हिस्सा होंगी। लेकिन मायावती ने न केवल अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर भी हमला किया। उन्होंने अखिलेश को गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला बताया। बीएसपी सुप्रीम ने इसके अलावा दावा किया कि गठबंधन करने से बीएसपी को फायदा नहीं होता है और बाकी पार्टियों का वोट बीएसपी को ट्रांसफर नहीं होता है। तो क्या बीएसपी चीफ मायावती के वोट ट्रांसफर नहीं होने के दावे में सच है? आइए समझते हैं। गौरतलब है कि बीएसपी ने 1993 और 2019 में एसपी के साथ गठबंधन करके क्रमश: विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ा था। बीएसपी सबसे पहले सरकारी कर्मचारियों के संगठन के तौर पर शुरू हुआ था। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने BAMCEF पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी संघ का निर्माण किया था। धीरे-धीरे ये संगठन राजनीतिक पार्टी में बदलने लगा। 1982 में BAMCEF ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति DS-4 का गठन किया। बाद में यही आगे चलकर बीएसपी पार्टी बनी। बीएसपी का मकसद मुसलमानों और दलितों को एक करना था। लेकिन इस दल के साथ ओबीसी का साथ कभी नहीं रहा। यहां तक कि मुस्लिमों का समर्थन भी कभी खुलकर इस दल को नहीं मिला। मायावती के मुस्लिमों को भरोसेमंद नहीं बताने वाले बयान के बाद ये अल्पसंख्यक समुदाय बीएसपी से और बिदक गया था।

हालांकि बीएसपी 1987 में यूपी में तीन विधानसभा उपचुनाव में बड़ी बढ़त मिली और उसे 26.3 फीसदी वोट मिले। यही नहीं, बीएसपी ने आरएलडी और बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगा दी और उसके जीत का मार्जिन को 21.93 से घटाकर 0.70 फीसदी कर दिया। वहीं बीजेपी का विनिंग मार्जिन 9.86 से घटकर 0.20 फीसदी रह गया था। ये बीएसपी के उभार का ही परिणाम था कि जनता पार्टी के दिग्गज नेता रहे राम विलास पासवान को 1987 में हरिद्वार लोकसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था और वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। हरिद्वार सीट से बीएसपी की तरफ से मायावती भी चुनाव लड़ी थीं। इस उपचुनाव में कांग्रेस कैंडिडेट राम सिंह 1 लाख 49 हजार 377 वोट लेकर 23 हजार 978 वोटों से जीत दर्ज की थी। दूसरे नंबर पर मायावती रही थीं और उन्हें 1 लाख 25 हजार 399 वो मिले थे। पासवान चौथे नंबर पर खिसक गए थे और उन्हें महज 34 हजार 225 वोट ही मिल पाए थे। यहां से बीएसपी के उभार की कहानी शुरू होती है।

अब मायावती के दावे के सच को भी जानने की कोशिश करते हैं। 1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद चुनाव होते हैं। एसपी और बीएसपी दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। उसी समय ये मशहूर श्लोगन आया था कि ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। इन चुनावों में बीजेपी को हार मिलती है और एसपी-बीएसपी गठबंधन की सरकार बनती है। लेकिन अगर आंकड़े को देखो तो बीजेपी चुनाव भले ही हार गई थी लेकिन 1991 की तुलना में 31.45% 1993 में उसका वोट प्रतिशत लगभग 2 फीसदी बढ़कर 33.3% तक पहुंच गया था। इसके अलावा जिन सीटों पर बीजेपी के उम्मीद्वारों की जमानत जब्त हुई उसकी संख्या में भी कमी आई और वो घटकर आधा हो गया। 1991 में 41 सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई थी जो 1993 में घटकर 20 हो गई थी। 1993 के चुनाव में एसपी और बीएसपी ने 176 सीटों पर जीत दर्ज की थी। एसपी को 109 और बीएसपी को 67 सीटें मिली थीं। एसपी का वोट शेयर 17.9% और बीएसपी की वोट शेयर 11.12% था। 1993 के यूपी विधानसभा चुनाव में एसपी और बीएसपी में वोट ट्रांसफर हुआ था। दोनों दलों के कैडर एक-दूसरे के कैंडिडेट को जीत दिलाने की पूरी कोशिश की। यानी पहले गठबंधन में तो दोनों दलों में जमकर वोट ट्रांफसर हुआ और यही वजह थी की राम लहर के बाद भी बीजेपी को यूपी में हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, राज्य में ये गठबंधन ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया था।

2019 के लोकसभा चुनाव में एसपी-बीएसपी गठबंधन के कारण दोनों दलों को फायदा तो जरूर हुआ। इसमें सबसे ज्यादा फायदा बीएसपी को हुआ जो 2014 में शून्य सीट से बढ़कर 2019 में 10 सीट पर पहुंच गई। वहीं एसपी को कोई ज्यादा फायदा नहीं हुआ और उसे केवल 5 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। बीएसपी की सीटों में बढ़ोतरी उसके खांटी माने जाने वाले वोटरों की वजह से माना गया। इस चुनाव में एक बात तो साफ रही की एसपी के वोटर्स बीएसपी की तरफ नहीं गए। वहीं बीएसपी के वोटर भी खुलकर एसपी की तरफ नहीं गए। मायावती ने इसके बाद बयान जारी कर कहा था कि एसपी के यादव समुदाय के वोटर्स ने बीएसपी का साथ नहीं दिया था। तो सवाल उठता है कि मायावती का ये दावा कितना सही है? इस बात की खोज करना तो बेहद मुश्किल है कि किसी समुदाय के वोटर ने किसी पार्टी को वोट दिया या नहीं।

बड़ा सवाल उठता है कि 2019 में बीएसपी ज्यादा सीटें कैसे जीत गई। तो इसका सीधा सा उत्तर है कि एसपी और बीएसपी का सीट शेयर की रणनीति। बीएसपी को वैसी सीटें मिलीं जहां एसपी और बीएसपी का वोट प्रतिशत बीजेपी के वोट प्रतिशत से ज्यादा थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में एसपी और बीएसपी का संयुक्त वोट शेयर 2019 में जिन 38 सीटों पर बीएसपी चुनाव लड़ रही थी उनमें से 23 सीटों पर 60.5 प्रतिशत था। वहीं एसपी के 37 सीटों में से 18 पर दोनों दलों का संयुक्त वोट शेयर 48.6 प्रतिशत था। मामले में निश्चित तौर पर बीएसपी को फायदा हुआ। जबकि एसपी को गठबंधन से ज्यादा लाभ नहीं हुआ। दूसरी तरफ 2019 के चुनाव में एसपी और बीएसपी दोनों 2014 वाले वोट शेयर को बरकरार नहीं रख पाए।

क्या लालू यादव और नीतीश कुमार होंगे दूर?

अब लालू यादव और नीतीश कुमार दूर हो सकते हैं! बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का फिर हिस्सा बनेंगे ? यह सवाल फिलहाल अनुत्तरित है, लेकिन लगातार मिल रहे संकेतों को समझने की कोशिश करें तो इस सवाल का संभावित जवाब तो मिल ही जाएगा। नीतीश कुमार कई बार प्रवाह में बोल जाते हैं कि ‘2005 के पहले बिहार में कुछ था जी। विकास का जो कुछ भी काम हुआ है, वह हम लोगों ने किया है।’ कुछ देर के लिए नीतीश के इस बयान को यह मान कर नजरअंदाज कर सकते हैं कि उनके लंबे समय तक बीजेपी के साथ रहने और आरजेडी की बाट लगाते रहने का उनका रटा रटाया तकिया कलाम जुबान से अभी उतरा नहीं है, लेकिन नीतीश कुमार ने नवनियुक्त 96,823 शिक्षकों के नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में जो कहा, उससे मौजूदा माहौल में उनका तकिया कलाम मान लेना बड़ी भूल होगी। अब तो बीजेपी विधायक दल के नेता विजय कुमार सिन्हा भी कह रहे हैं कि एनडीए सरकार में जिन कामों के लिए फैसले हुए थे, मौजूदा सरकार उन पर ही अमल कर रही है। इसी बीच पूर्व सीएम और अब एनडीए का हिस्सा बन चुके जीतन राम मांझी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर लिखा- ‘राज्य में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट से कुछ अधिकारियों से ज्यादा राजद-जदयू-कांग्रेस के कार्यकर्ता परेशान हैं। राजद के लोग इस सोच में परेशान हैं कि फ्लैक्स में नीतीश जी का फोटों दें कि ना? वैसे जो भी परिवर्तन होगा, वह राज्यहित में होगा।’

बिहार की राजनीति में बदलाव की बुनियाद अक्सर पर्व-त्यौहारों पर हुए राजनीतिज्ञों के जुटान के बाद पड़ती रही है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, एक महीने के खरमास के बाद ही मकर संक्रांति से नए काम की शुरुआत की परंपरा रही है। नीतीश कुमार के इंडी अलायंस में संयोजक का पद ठुकराए जाने के बाद पहले से चली आ रही आशंका बलवती हो गई है कि वे अब एनडीए में वापसी करेंगे। बीजेपी भी इस बात को खारिज नहीं करती है। मांझी ने तो खुलकर नए समीकरण के संकेत दे दिए हैं। उनका यह कहना कि जो भी होगा, बिहार के हित में होगा, बड़ा संदेश अपने अंदर छिपाए हुए है। हालांकि नीतीश के महागठबंधन के साथ जाने के बाद बीजेपी के नेता कहते रहे हैं कि नीतीश के लिए अब एनडीए में दरवाजे बंद हो चुके हैं। पर, यह सबको पता है कि राजनीति में कोई किसी के लिए दरवाजे-खिड़की स्थायी तौर पर बंद नहीं करता। महागठबंधन ने भी नीतीश के लिए नो एंट्री का बोर्ड दो साल तक टांगे रखा, लेकिन वक्त अनुकूल आने पर बोर्ड किस कबाड़खाने का हिस्सा बन गया, पता नहीं चला।

नीतीश कुमार वर्ष 2005 से जेडीयू को बिना बहुमत मिले सीएम बनते रहे हैं। देखते-देखते 18 साल बीत गए। वे लंबे समय तक बीजेपी के सहारे सरकार चलाते रहे तो दूरी बार आरजेडी के सहारे सत्ता की चाबी अपने पास रखे हुए हैं। नीतीश के पास कौन-सी वह ताकत है, जिसके बिना बिहार में किसी सरकार का बनना-चलना मुश्किल है। यहां तक किसी दल की कामयाबी भी कठिन है। नीतीश को सीएम बनाने के लिए पहली बार बीजेपी साथ आई तो अब साथ छूटने के बाद भी उसके मन से नीतीश की कसक नहीं जा रही है। नीतीश आज की तारीख में 45 विधायकों वाली पार्टी के नेता हैं। उनसे तकरीबन दोगुनी सीटें बीजेपी और आरजेडी के पास हैं। इसके बावजूद नीतीश की अपनी ताकत ही है, जो सबको उन्हें सीएम बनाने को मजबूत करती है। बीजेपी यह कैसे भूलेगी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में अगर बिहार की 40 में 39 सीटें एनडीए की झोली में गईं तो इसके पीछे नीतीश कुमार की ही ताकत थी।

इसे समझने के लिए अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं। लालू यादव और राबड़ी देवी के 15 साल के शासन को समाप्त कर वर्ष 2005 में नीतीश ने बिहार की सत्ता पहली बार संभाली थी। 2010 आते-आते उन्होंने बिहार से आरजेडी के पांव उखाड़ दिए। पर, नीतीश जब 2015 में आरजेडी के साथ हुए तो ‘मृतप्राय’ आरजेडी को संजीवनी मिल गई। यह ठीक है कि विधानसभा चुनाव में आरजेडी को नीतीश से कुछ अधिक सीटें मिलीं, लेकिन सत्ता का सुख आरजेडी को 10 साल बाद नीतीश की वजह से ही मिला।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने नीतीश को अपनी पांच सीटें काट कर दीं तो यह उसका उन पर कोई एहसान नहीं था। सच तो यह है कि बीजेपी को यह मालूम था कि नीतीश जैसा चेहरा बिहार में उसके पास नहीं है। नीतीश साथ आए तो एनडीए ने लोकसभा चुनाव में जीत का रिकॉर्ड बना दिया। बिहार की कुल 40 में 39 सीटें उसे मिल गईं। इंडी अलायंस ने नीतीश की ताकत को ठीक ढंग से समझा नहीं है। उन्हें बार-बार बिदकाने का प्रयास किया गया। जिस तरह वे विपक्षी दलों के संयोजन का काम कर रहे थे, उसे एक मुकाम तक पहुंचा कर दिखा दिया। इसके बावजूद उन्हें आधिकारिक तौर पर संयोजक का पद तक नहीं दिया गया।

उल्टे विपक्षी एकता की कमान संभालने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह कह कर उन्हें और अपमानित कर दिया कि संयोजक बनने का सवाल कौन बनेगा करोड़पती जैसा है। नीतीश की नाराजगी की खबरें जब तूल पकड़ने लगीं तो आधी-अधूरी वर्चुअली जुटी महफिल में उन्हें संयोजक का पद ऑफर किया गया। तुर्रा यह कि राहुल गांधी ने यह भी जोड़ दिया कि ममता बनर्जी तो उन्हें संयोजक बनाने के खिलाफ हैं।

नीतीश कुमार ने शिक्षकों के नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में कहा- ‘हमने कहा था कि 7 निश्चय-2 के तहत 10 लाख युवक-युवतियों को सरकारी नौकरी एवं 10 लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराया जाएगा। अब तक 3 लाख 63 हजार से अधिक लोगों की बहाली हो चुकी है और 5 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। हमलोग शीघ्र ही रिक्त पदों पर बहाली का काम शुरू करेंगे और बहुत जल्द 5 लाख लोगों की बहाली का काम भी पूरा हो जाएगा।’ दरअसल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश कुमार ने सात निश्चय के दूसरे भाग की घोषणा की थी। तब वे एनडीए में थे। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि शिक्षक नियुक्ति जैसे फैसले अगर पिछले डेढ़ साल में हुए तो इसकी घोषणा उन्होंने एनडीए में रहते की थी। यही वह बिंदु है, जहां से नीतीश कुमार के एनडीए में जाने का पुख्ता इशारा मिलता है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2020 में विधानसभा चुनाव अभियान शुरू करने से पहले निश्चय पत्र 2020 जारी किया था। इसमें 7 निश्चय पार्ट 2 की चर्चा थी। उन्होंने कहा था- ‘हम 7 निश्चय पार्ट 2 के बूते सक्षम व स्वावलंबी बिहार बनाएंगे। लोगों की सेवा करना हमारा धर्म है। आप (जनता) सभी को धन्यवाद कि मुझे बिहार की सेवा का मौका दिया। मुझे विश्वास है कि आपके सहयोग और आशीर्वाद से 7 निश्चय पार्ट 2 को क्रियान्वित कर राज्य को और ऊंचाइयों तक पहुंचाते हुए सक्षम एवं स्वावलंबी बिहार बनाएंगे।’ 7 निश्चय पार्ट 2 में पहला था- युवा शक्ति, बिहार की प्रगति। दूसरा- सशक्त महिला, सक्षम महिला, तीसरा- हर खेत को पानी, चौथा- स्वच्छ गांव, समृद्ध गांव, पांचवां- स्वच्छ शहर, विकसित शहर, छठा- सुलभ संपर्कता और सातवां था- सबको अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधा।

नीतीश ने सात निश्चय के तहत शिक्षकों की नियुक्ति की बात कही है। यह बात आरजेडी के गले नहीं उतर रही। क्योंकि तेजस्वी यादव ने 2022 में नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बनते ही 10 लाख सरकारी नौकरी की बात कही थी। आरजेडी नेताओं का कहना है कि इसमें सात निश्चय की बात कहां से आ गई। आरजेडी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव अब्दुल बारी सिद्दीकी, शक्ति यादव समेत कई नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि तेजस्वी यादव ने यह वादा किया था। उनका 15 महीने का कार्यकाल बिहार में पहले की 15 साल की सरकार पर भारी है। यह सबको पता है कि 15 साल तक नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ बिहार में एनडीए की सरकार चलाई। जिस तरह नीतीश कहते हैं कि 2005 के पहले बिहार में कुछ था या होता था क्या, उसी अंदाज में आरजेडी नेताओं ने उन्हें जवाब दिया है कि 15 साल में जो नहीं हुआ, वह 15 महीने में तेजस्वी यादव के कारण हो सका है।

आखिर कौन थे डॉ राम बक्स सिंह?

आज हम आपको डॉ राम बक्स सिंह के बारे में जानकारी देने वाले हैं! यूपी में सीतापुर जिले से ताल्लुख रखने वाले राजेन्द्र सिंह ने अपने पिता डॉ. राम बक्स सिंह को भारत रत्न से नवाजने के लिए केंद्र सरकार से मांग कर दी है। राजेन्द्र सिंह ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय डॉ. राम बक्स सिंह ने बायोगैस के जनक के रूप में वैश्विक मंच पर एक अमिट छाप छोड़ी है। राजेन्द्र सिंह ने दावे के साथ कहा कि अब तक भारत में बायोगैस और गोबर गैस पर जो भी काम हुआ है उसका श्रेय वैज्ञानिक स्व. डॉ. राम बक्श सिंह को ही जाता है। उन्होंने गोबर के अलावा वनस्पति आदि से भी बायोगैस और गोबर गैस की प्रौद्योगिकी, रासायनिक विधि का अविष्कार किया है, जिसने खाद बनाने की प्रक्रिया में Fermentation & Decomposition को गति दी।साथ ही एक मूल्यवान ज्वलनशील गैस का निर्माण भी किया। उन्होंने बताया कि डॉ. सिंह ने दो सौ से अधिक कम लागत वाले डाइजेस्टर विकसित किए हैं। जो पौधों और जानवरों के कचरे को खाद उर्वरक और ईंधन के लिए मीथेन में परिवर्तित करने के लिए डिजाइन किए थे। जिसे भारत समेत 15 से अधिक देशों में बायोगैस और गोबर गैस संयंत्र स्थापित किए गए थे।

यूपी के सीतापुर जिले के रहने वाले राजेन्द्र सिंह ने एनबीटी ऑनलाइन से बातचीत करते हुए बताया कि उनके पिता डॉ. सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित वैज्ञानिक थे, जिन्होंने न केवल अपनी मातृभूमि में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि 26 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार के अधीन भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार ने डॉ. राम बक्स सिंह के कार्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक अमूल्य संग्रह का महत्वपूर्ण अधिग्रहण किया है।यह अधिग्रहण एक अग्रणी वैज्ञानिक के असाधारण योगदान का परिणाम है। यह उनकी विरासत को मजबूत करता है साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी है।डॉ. राम बक्स सिंह ने 1950 के दशक के दौरान साल 9 सितंबर 1957 को सीतापुर जिले के रामनगर में भारत का पहला गोबर गैस संयंत्र डिजाइन कर उसे स्थापित किया था। जिसका उद्घाटन तत्कालीन केंद्रीय सामुदायिक विकास मंत्री एस. के. डे और यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव गोविंद नारायण ने किया था।

इसके बाद साल 1960 में डॉ. सिंह ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित एशिया के पहले “गोबर गैस रिसर्च स्टेशन” अजीतमल-इटावा में अनुसंधान और संचालन का काम किया। लगभग दो दशकों तक यूपी सरकार के अधीन केंद्र प्लानिंग रिसर्च एंड एक्शन डिवीजन में प्रभारी अधिकारी के रूप में काम किया है। उन्होंने 7 किताबें लिखी है। जिन्हें भारत, यूएस लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस वाशिंगटन डीसी. और अन्य देशों के राज्य व केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित है। उनकी किताब को बायोगैस की बाइबिल माना जाता है।इतना ही नहीं, डॉ. राम बक्स सिंह द्वारा किये गए अविष्कार, अनुसंधान, विकास कार्य और उनकी उपलब्धियों को यूएस. सीनेट ने यूएस. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव सीनेट में कार्यवाही के दौरान चर्चा का विषय भी रहा है। साथ ही विश्वविद्यालयों और दुनिया भर में कई अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक संस्थानों में उनके प्रौद्योगिकी को मान्यता भी दी गई है।

वहीं डॉ. राम बक्स सिंह को अपने 40 वर्षों के कार्यकाल में डेनमार्क, ईरान, जर्मनी, नेपाल, अमेरिका, सीलोन समेत 15 देशों में 1000 से अधिक बायोगैस और गोबर गैस सिस्टम का डिजाइन विकसित और स्थापित करने का अवसर भी मिला है। जून 1972 में संयुक्त राज्य अमेरिका में राल-जिम-फार्म, बेन्सन, वर्मोंट में पहला बायो गैस संयंत्र बनाया गया। जिसका उद्घाटन अलास्का के सीनेटर माइक ग्रेवल ने किया था। वहीं बायोगैस और गोबर गैस की दिशा में किए गए शोध को देखते हुए स्व. डॉ. राम बक्स सिंह ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा 3 बार बायोगैस सलाहकार के रूप में प्रतिनिधित्व किया।

डॉ. राम बक्स सिंह उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रहने वाले थे। उनका जन्म साल 1925 में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने 18 सितंबर 2016 को लखनऊ में अंतिम सांस ली थी। डॉ. सिंह ने 1963 में दिल्ली के एशिया इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था। इसके बाद 1979 में कैलिफोर्निया की पेसिफिक वेस्टर्न यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इतना ही नहीं, अक्षय-उर्जा में लगातार शोध एवं कार्य में योगदान के लिए डॉ. राम बक्स सिंह को पेसिफिक वेस्टर यूनिवर्सिटी कैलिफोर्निया द्वारा मास्टर ऑफ एप्लाइड साइंस एवं डॉक्टर ऑफ टेक्नोलॉजिकल फिलॉसफी की मानद उपाधि भी प्रदान की गई थी।

डॉ. राम बक्स सिंह के बेटे राजेन्द्र सिंह ने पिता को उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए भारत रत्न की मांग करते हुए कहा कि जब हमारा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, ऐसे में मां भारती के लाल महान वैज्ञानिक स्व. डॉ. राम बक्श सिंह को राष्ट्रीय पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित करके हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि आज जब समूचा विश्व स्वच्छ उर्जा ग्रीन एनर्जी अथवा गैर परंपरागत उर्जा के उत्सर्जन और उपयोग व इसके स्रोत पर हर अंतरराष्ट्रीय मंचों में इस विषय को गंभीरता से ले रहा है। इतना ही नहीं भारत सरकार भी इस दिशा में तेज़ी के साथ काम कर रही है। सीतापुर के मूल निवासी राजेन्द्र सिंह ने बताया कि हाल ही में जर्मनी में हुए G7 बैठक में ग्रीन एनर्जी एलाइंस एवं जीरो कार्बन एमिशन & G21 मीटिंग इन दिल्ली की महत्ता को भारत के प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच पर उल्लेखित किया था। ऐसे में स्व. राम बक्स सिंह जिन्होंने अपनी ऊर्जा और सारा समय देश हित में गैर-परंपरागत ऊर्जा बायोगैस और गोबर गैस के शोधकर्ता के रूप में समर्पित किया है। अमेरिकी सरकार द्वारा प्रदत्त यूएस ग्रीन कार्ड के बावजूद उन्होंने भारत में रहने का निर्णय लिया और यहां रहकर ग्रामीण भारत की ऊर्जा उपयोगिता में आत्मनिर्भरता और ग्रामीण भारत के सतत विकास का काम लगातार करते रहे।