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आखिर इस्लाम धर्म को क्यों छोड़ रहे हैं लोग?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि लोग वर्तमान में इस्लाम धर्म को क्यों छोड़ रहे हैं! जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो उसका शरीर एक धर्म के साथ पैदा होता है। बच्चे को ये धर्म के नाम का ठप्पा अपना माता पिता से मिलता है। ऐसे में ये कह सकते हैं कि धर्म या मजहब को हम नहीं चुनते हैं वो जन्म के बाद ही हमारे साथ परछाई की तरह साथ रहता है। हालांकि जब बच्चा बड़ा होता है तो उसे पता चलता है कि उसके अलावा और भी धर्म हैं और वो उनके रीति रिवाज कानूनों को देखता है। ऐसे में कई बार लोगों को अपने धर्म से ज्यादा दूसरों का धर्म पसंद आता है और वो अपने धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने की सोचते हैं लेकिन अपनी धार्मिक पहचान छोड़ना इतना भी आसान नहीं है। हालांकि दुनियाभर इस वक्त इस्लाम को मानने वाले लोग ऐसा कर गुजर रहे हैं। दरअसल इन दिनों भारत, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों के अलावा कई मुस्लिम बहुल देशों में भी एक आंदोलन जोर पकड़ रहा है जिसमें वहां के मुस्किम लोग अपना धर्म छोड़ रहे हैं। भारत हो या अन्य देशों में इस वक्त एक मुहिम चल रही है। जिसे एक्स मुस्लिम मूवमेंट का नाम दिया गया है। इस मूवमेंट में मुस्लिम लोग इस्लाम धर्म छोड़ रहे हैं। उन लोगों का कहना है कि इस्लाम में कुछ चीजें ठीक नहीं हैं ऐसे में हम उस मजहब का पालन नहीं कर सकते हैं। हाल ही में केरल की एक महिला सफिया पीएम ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका डाली है। जिसमें उन्होंने कहा कि वो अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी शरिया कानून से नहीं बल्कि भारतीय उत्तराधिकारी कानून के तहत चाहती हैं। सफिया एक्स मुस्लिम ऑफ केरल संगठन की जनरल सेक्रेटरी हैं सफिया ने कहा कि उन्होंने आधिकारिक तौर पर इस्लाम तो नहीं छोड़ा है लेकिन वो इस्लाम को नहीं मानती हैं।

बता दें कि केरल की सफिया पीएम ही नहीं कई अन्य लोग भी हैं जिनका इस्लाम से मोहभंग हो गया है। इस्लाम धर्म को छोड़ने वाली केरल की नूरजहां ने टाइम्स ऑफ इंडिया से इस मामले में बात करते हुए बताया कि उन्होंने इस्लाम क्यों छोड़ा? नूरजहां ने कहा कि उनके इस्लाम छोड़ने की एक नहीं कई वजहें हैं जैसे हिजाब पहनने की मजबूरी, महिलाओं से भेदभाव और मजहब के नाम पर कट्टरता। इन सभी चीजों ने उनके अंदर से इस्लाम को खत्म कर दिया जिसके बाद वो नास्तिकता की तरफ बढ़ गईं। नूरजहां का कहना है कि इस्लाम धर्म में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। उन्हें दोयम दर्जे का माना जाता है।

2018 में प्रकाशित प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में रहने वाले 23 प्रतिशत वयस्क जो मुस्लिम परिवार में बड़े हुए, अब अपनी पहचान मुसलमान के रूप में नहीं बताते हैं। इस्लाम छोड़ने वालों में 7 फीसदी लोगों ने बताया कि वे इसकी शिक्षाओं से सहमत नहीं थे। एंग्लिकन इंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में एक सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 55 प्रतिशत पूर्व-मुसलमान नास्तिक बन जाते हैं, लगभग 25 प्रतिशत ईसाई बन जाते हैं जबकि अन्य 10 प्रतिशत के बारे में पता नहीं चलता है।बीबीसी ने 2015 में अपनी पड़ताल में पाया था कि ब्रिटेन में इस्लाम छोड़ने वालों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।बता दें कि कई बार लोगों को अपने धर्म से ज्यादा दूसरों का धर्म पसंद आता है और वो अपने धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने की सोचते हैं लेकिन अपनी धार्मिक पहचान छोड़ना इतना भी आसान नहीं है। हालांकि दुनियाभर इस वक्त इस्लाम को मानने वाले लोग ऐसा कर गुजर रहे हैं। दरअसल इन दिनों भारत, अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों के अलावा कई मुस्लिम बहुल देशों में भी एक आंदोलन जोर पकड़ रहा है जिसमें वहां के मुस्किम लोग अपना धर्म छोड़ रहे हैं। भारत हो या अन्य देशों में इस वक्त एक मुहिम चल रही है। जिसे एक्स मुस्लिम मूवमेंट का नाम दिया गया है। इस मूवमेंट में मुस्लिम लोग इस्लाम धर्म छोड़ रहे हैं। इसमें सिर्फ समाज ही नहीं बल्कि अपने ही परिवार के लोग भी शामिल होते हैं। ऐसे में इन पूर्व मुस्लिमों का खुलकर सामने आना ऐसे लोगों को हिम्मत देता है। यूरोप के सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश फ्रांस में 15000, जबकि अमेरिका में एक लाख मुसलमान हर साल धर्म छोड़ देते हैं।

आखिर कैसे भाव रखता है पीएम मोदी और शरद पवार के बीच का रिश्ता?

आज हम आपको बताएंगे कि पीएम मोदी और शरद पवार के बीच का रिश्ता आखिर कैसा भाव रखता है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनसीपी नेता शरद पवार दोनों ही एक दूसरे पर कभी भी तीखे वार करने से पीछे नहीं हटते हैं। हाल ही में एक रैली को संबोधित करते हुए बिना नाम लिए पीएम मोदी ने शरद पवार पर निशाना साधा। उन्होंने शरद पवार को भटकती आत्मा कहा। पीएम मोदी ने कहा कि महाराष्ट्र ने लंबे समय तक अस्थिरता का दौर देखा है। आज मैं कुछ बोलने जा रहा हूं, लेकिन कोई अपने सिर पर टोपी ना ले लेना। हमारे यहां कहते हैं कि कुछ भटकती आत्माएं होती हैं, जिनकी इच्छाएं पूरी नहीं होती हैं और जिनके सपने पूरे नहीं होते हैं, वो आत्माएं भटकती रहती हैं। ऐसी आत्मा को खुद का काम नहीं हुआ तो दूसरों का काम बिगाड़ने में मजा आता है। हमारा महाराष्ट्र भी ऐसी भटकती आत्माओं का शिकार हो चुका है। आज से 45 साल पहले यहां के एक बड़े नेता ने अपनी महत्वाकांक्षा के लिए खेल की शुरुआत की थी, तब से महाराष्ट्र एक अस्थिरता के दौर में चला गया और कई मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए। पीएम मोदी ने बिना नाम लिए शरद पवार को बहुत दूर की बातें कह गए। जिसपर शरद पवार ने पलटवार करते हुए कहा कि मोदी पहले कहा करते थे कि वह हमारी उंगली पकड़कर राजनीति में आए हैं लेकिन आजकल वह मझे भटकती आत्मा कह रहे हैं। वह मुझ पर काफी गुस्सा है। ऐसा नहीं है कि पीएम मोदी और शरद पवार शुरू से ही एक दूसरे पर तंज कसते आ रहे हैं।एक वक्त ऐसा था कि पीएम मोदी शरद पवार को अपना गुरु कहा थे लेकिन अब दोनों के रिश्ते काफी बदल गए हैं।लेकिन उसके बाद जब साल 2019 लोकसभा चुनाव पास आए तो फिर ये मिठास कड़वाहट में बदलती चल गई। पहले दोनों का रिश्ता काफी अच्छा था एक वक्त ऐसा था कि पीएम मोदी शरद पवार को अपना गुरु कहा थे लेकिन अब दोनों के रिश्ते काफी बदल गए हैं।

कई दशकों से एक दूसरे को जानने वाले ये दोनों नेता पहले एक दूसरे काफी करीब थे। कई बार एक दूसरे की तारीफ भी करते देखे गए थे। पीएम मोदी ने साल 2015 में पुणे जिले के बारामती में कृषि विज्ञान केंद्र का उद्घाटन करने के बाद शरद पवार के घर पहुंच गए थे। वहां पर उन्होंने उनके परिवार के साथ खाना भी खाय था। इतना ही नहीं नोटबंदी के बाद पीएम मोदी एक कार्यक्रम में शरद पवार को अपना राजनीतिक गुरु भी कह दिया था। पीएम मोदी ने पुणे में हुए एक सम्मेलन में कहा था कि शरद पवार के प्रति मेरे मन में व्यक्तिगत सम्मान है। उन्होंने मेरी उंगली पकड़ कर मुझे राजनीति में चलने में मदद की। मुझे सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा करते हुए बहुत ही गर्व हो रहा है।

शरद पवार को राजनीतिक गुरु मानने के दो साल बाद ही भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने शरद पवार को पद्म विभूषण से सम्मानित किया। यहां तक तो दोनों के रिश्ते में शब्दों की मिठास बराबर आ रही थी लेकिन आजकल वह मझे भटकती आत्मा कह रहे हैं। वह मुझ पर काफी गुस्सा है। ऐसा नहीं है कि पीएम मोदी और शरद पवार शुरू से ही एक दूसरे पर तंज कसते आ रहे हैं। पहले दोनों का रिश्ता काफी अच्छा था एक वक्त ऐसा था कि पीएम मोदी शरद पवार को अपना गुरु कहा थे लेकिन अब दोनों के रिश्ते काफी बदल गए हैं।लेकिन उसके बाद जब साल 2019 लोकसभा चुनाव पास आए तो फिर ये मिठास कड़वाहट में बदलती चल गई।

पद्म विभूषण से सम्मानित होने के के एक साल बाद ही शरद पवार के तेवर बदल गए और उन्होंने आम चुनाव पास आते ही पीएम मोदी पर तंज कसना शुरू कर दिया। साल 2018 में पुणे में एनसीपी के अधिवेशन में नरेंद्र मोदी को बातूनी पीएम कहते हुए देश में दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की बदतर स्थिति पर चुप्पी तोड़ने को कहा। शरद पवार के इन तीखे हमलों के बाद पीएम मोदी ने एनसीपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लोकसभा चुनाव 2019 प्रचार के दौरान उन्होंने बारामती में लोगों से बंधनों को तोड़ने के लिए कहा और शरद पवार के शासन को खत्म करने का आह्वान किया। उसके बाद पीएम मोदी ने एनसीपी को राष्ट्रवादी नहीं ‘भष्ट्रवादी’ पार्टी करार दिया। उसके बाद से आए पवार हो या पीएम मोदी दोनों ही नेता कई बार एक दूसरे पर निशाना साधते हुए तंज कस चुके हैं।

प्रज्वल रेवन्ना की सेक्स स्कैंडल के बारे में क्या बोले कुमारस्वामी?

हाल ही में प्रज्वल रेवन्ना के सेक्स स्कैंडल के बारे में कुमारस्वामी ने एक बयान दिया है! कर्नाटक की हासन लोकसभा सीट से एनडीए उम्मीदवार प्रज्वल रेवन्ना के अश्लील वीडियो मामले में राज्य सरकार ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है। इसी बीच प्रज्वल रेवन्ना के विदेश भाग जाने की जानकारी मिली है। इन सभी घटनाक्रमों पर टिप्पणी करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि जिन्होंने गलत किया है उन्हें सजा मिलनी चाहिए। कुमारस्वामी ने कहा कि वह कथित सेक्स स्कैंडल में अपने भतीजे और हासन से सांसद प्रज्वल रेवन्ना की संलिप्तता के बारे में जांच में तथ्य सामने आने का इंतजार करेंगे, लेकिन उन्होंने कहा कि जिसने भी अपराध किया है, उसे माफ करने का सवाल ही नहीं उठता। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रज्वल रेवन्ना के कथित तौर पर देश छोड़ने से उनका कोई लेना-देना नहीं है और जरूरत पड़ने पर उन्हें वापस लाना विशेष जांच दल (एसआईटी) की जिम्मेदारी है। प्रज्वल रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री और जद (एस) के संरक्षक एचडी देवेगौड़ा के बड़े बेटे एचडी रेवन्ना की संतान हैं। एचडी रेवन्ना भी विधायक हैं और मंत्री भी रह चुके हैं। प्रज्वल रेवन्ना की संलिप्तता वाले कुछ कथित वीडियो हाल के दिनों में हासन जिले में वायरल हो रहे हैं। प्रज्वल हासन से बीजेपी-जद(एस) गठबंधन के उम्मीदवार हैं। इस सीट पर मतदान 26 अप्रैल को संपन्न हो चुका है। कुमारस्वामी ने कहा कि मुझे पता चला है कि मुख्यमंत्री ने एसआईटी जांच का आदेश दिया है। चाहे मैं हों या देवेगौड़ा (उनके पिता), हमने हमेशा महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्वक व्यवहार किया है और जब भी कोई अपनी पीड़ा लेकर आया तो हमने समस्या को हल करने का प्रयास किया है।

बेंगलुरु में संवाददाताओं से उन्होंने कहा कि हासन मुद्दे में जांच के बाद तथ्य सामने आने दीजिए। चाहे कोई भी हो, जिसने भी कानून की नजर में गलत किया है, उसे माफ करने का कोई सवाल ही नहीं है। इसलिए जांच से तथ्य सामने आने दीजिए, उसके बाद मैं प्रतिक्रिया दूंगा। प्रज्वल रेवन्ना के विदेश जाने के सवाल पर कुमारस्वामी ने कहा कि इसका मेरे से संबंध नहीं है। एसआईटी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। अधिकारियों को काम पर लगा दिया गया है। अगर वह विदेश चले गये हैं तो उन्हें वापस लाना एसआईटी की जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कथित सेक्स स्कैंडल में सांसद की संलिप्तता की जांच को लेकर एसआईटी गठित करने की घोषणा की है।उन्होंने कहा कि जिसने भी अपराध किया है, उसे माफ करने का सवाल ही नहीं उठता। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रज्वल रेवन्ना के कथित तौर पर देश छोड़ने से उनका कोई लेना-देना नहीं है और जरूरत पड़ने पर उन्हें वापस लाना विशेष जांच दल (एसआईटी) की जिम्मेदारी है। प्रज्वल रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री और जद (एस) के संरक्षक एचडी देवेगौड़ा के बड़े बेटे एचडी रेवन्ना की संतान हैं। एचडी रेवन्ना भी विधायक हैं और मंत्री भी रह चुके हैं। इस बीच मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक पुलिस इस बात से अवगत है कि प्रज्वल देश छोड़ चुके हैं। बयान में कहा गया है कि प्रज्वल रेवन्ना के वीडियो हासन में वायरल किए जा रहे हैं। और प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया।

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों की तीन सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (सीआईडी) बिजय कुमार सिंह करेंगे। अन्य दो सदस्य, सहायक पुलिस महानिरीक्षक सुमन डी. पेनेकर और मैसुरु की पुलिस अधीक्षक सीमा लाटकर हैं। एसआईटी को शीघ्र अपनी जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया है।

बयान में कहा गया कि सरकार ने कर्नाटक राज्य महिला आयोग की प्रमुख के अनुरोध पर एक एसआईटी गठित करने का फैसला किया है। आयोग की अध्यक्ष डॉ. नागलक्ष्मी चौधरी ने गुरुवार को सिद्धरमैया और राज्य पुलिस प्रमुख आलोक मोहन को पत्र लिखकर हासन में वायरल हो रहे वीडियो की जांच की मांग की। इसलिए जांच से तथ्य सामने आने दीजिए, उसके बाद मैं प्रतिक्रिया दूंगा। प्रज्वल रेवन्ना के विदेश जाने के सवाल पर कुमारस्वामी ने कहा कि इसका मेरे से संबंध नहीं है। एसआईटी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। अधिकारियों को काम पर लगा दिया गया है। अगर वह विदेश चले गये हैं तो उन्हें वापस लाना एसआईटी की जिम्मेदारी है।प्रज्वल ने अपने चुनाव एजेंट के माध्यम से अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराई है कि वीडियो से फर्जी है और चुनाव से पहले उनकी छवि खराब करने के लिए इसे प्रसारित किया जा रहा है।

क्या अब बीजेपी पर भारी पड़ेगा प्रज्वल रेवन्ना का सेक्स स्कैंडल?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रज्वल रेवन्ना का सेक्स स्कैंडल बीजेपी पर भारी पड़ेगा या नहीं! देश में इस बार सात चरणों में लोकसभा चुनाव पूरे होने हैं। जिसमें से दो चरणों के लिए वोटिंग हो गई है। इसी बीच कर्नाटक में बीजेपी की सहयोगी पार्टी जनता दल एस के एक उम्मीदवार और पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना कथित सेक्स स्कैंडल की वजह से विवादों में आ गए हैं। प्रज्वल रेवन्ना इस लोकसभा चुनाव में जिस हासन सीट से खड़े हुए हैं उस पर दूसरे चरण में वोटिंग हो गई है लेकिन सेक्स स्कैंडल में नाम सामने आने के बाद से ही जनता दल एस पार्टी पर सवाल उठने लगे हैं। जिसका नुकसान जनता दल (सेक्युलर) को तीसरे चरण में भुगतना पड़ सकता है। कर्नाटक में दो चरणों में लोकसभा चुनाव होने हैं। कर्नाटक की 14 लोकसभा सीटों पर 26 अप्रैल को वोटिंग हुई थी। जबकि बची हुई सीटों पर 7 मई को वोटिंग होगी। लोकसभा हसन सीट से सांसद प्रज्वल रेवन्ना का नाम सामने आने के बाद से पार्टी पर कई तरह के सवाल उठ रहे थे। विपक्षी नेता भी लगातार पार्टी और केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं। इस सेक्स स्कैंडल विवादपर बढ़ते हंगामे को देखते हुए जेडीएस ने आनन- फानन में कोर कमिटी की बैठक की और प्रज्वल रेवन्ना को पार्टी से सस्पेंड कर दिया। इसके साथ ही कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया।

प्रज्वल रेवन्ना को लोकसभा सीट में टिकट देना अब बीजेपी की सहयोगी पार्टी जेडीएस के लिए सिरदर्द बन गया है। जब से प्रज्वल रेवन्ना का सेक्स स्कैंडल सामने आया है। विपक्ष जेडीएस के साथ ही बीजेपी को भी निशाने पर ले रहा है। जिसके बाद अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मामले में बीजेपी के रुख को एकदम साफ कर दिया है। अमित शाह ने आज कहा कि बीजेपी का रुख स्पष्ट है कि हम देश की ‘मातृ शक्ति’ के साथ खड़े हैं, देश की नारी शक्ति के साथ हैं। नरेंद्र मोदी जी का देश को एक कमिटमेंट है कि कहीं भी मातृ शक्ति के अपमान को सहन नहीं किया जा सकता।

अमित शाह ने आगे कहा कि कांग्रेस पार्टी हम पर आरोप लगाना चाहती है, मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि वहां किसकी सरकार है? सरकार कांग्रेस पार्टी की है। उन्होंने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? हमें इस पर कार्रवाई नहीं करनी है क्योंकि यह राज्य की कानून व्यवस्था का मामला है, राज्य सरकार को इस पर कार्रवाई करनी है। प्रियंका गांधी हमसे सवाल पूछ रही हैं, नरेंद्र मोदी या मुझसे सवाल करने की जगह अपने मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री से सवाल करिए।

देवराज गौड़ा ने जद (एस) पर आरोप लगाया कि उन्हें प्रज्वल रेवन्ना सेक्स स्कैंडल की खुफिया रिपोर्ट पहले से ही थी उसके बावजूद प्रज्वल रेवन्ना के लोकसभा में उम्मीदवारी की घोषणा की। उन्होंने कहा कि मैंने वीडियो के बारे में हमारे अध्यक्ष को एक पत्र लिखा और कार्यालय को दिया, लेकिन जैसा कि उन्होंने कहा, पत्र उन तक भी नहीं पहुंचा था। मैंने पत्र में लिखा था कि जद (एस) के साथ गठबंधन करने में कोई समस्या नहीं है। लेकिन उन पर (प्रज्वल रेवन्ना) यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप हैं। उन्होंने आगे बताया कि प्रज्वल रेवन्ना का ड्राइवर कार्तिक मेरे पास आया और कहा कि उसे परेशान किया जा रहा है। उसने (कार्तिक ने) कहा कि उसके (प्रज्वल रेवन्ना) पास कई अश्लील वीडियो हैं। मैंने ड्राइवर से पूछा कि क्या उसने यह वीडियो किसी को दिया है। कार्तिक ने कहा कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष को अश्लील वीडियो दिए थे।लयह सोचकर कि यह पेन ड्राइव समस्या पैदा करेगी, मैंने पार्टी को पत्र लिखा -यह संवादहीनता है और उन्हें टिकट मिल गया। इसके साथ ही, यह भाजपा की गलती नहीं थी क्योंकि खुफिया रिपोर्ट होने के बावजूद जद (एस) ने उन्हें टिकट दिया।

जेडीएस ने पार्टी की छवि धूमिल होता देखकर प्रज्वल रेवन्ना को पार्टी से निलंबित कर दिया है। ऐसे में अगर प्रज्वल रेवन्ना लोकसभा चुनाव जीत गए तो पार्टी से निलंबित किए जाने के बाद भी वो लोकसभा सदस्य बने रहेंगे। अगर वो चुनाव हार जाते हैं तो उनका राजनीतिक करियर पर काफी असर पड़ेगा। बता दें कि सेक्स स्कैंडल मामले में पुलिस ने प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। अगर पीड़ित महिला रेप की शिकायत करती है तो प्रज्वल रेवन्ना को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। बता दें कि अभी जर्मनी भाग गए हैं।

क्या अब भीषण गर्मी के बीच राहत देगी बरसात?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब भीषण गर्मी के बीच बरसात राहत देगी या नहीं! आज से मई की शुरुआत है और देशभर में पड़ रही भीषण गर्मी और लू ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। दिल्ली एनसीआर में सूरज की पहली किरण के साथ जो गर्मी पड़नी शुरू होती है दोपहर तक धरती तपने लग जाती है। हाल ऐसा है कि अगर कुछ देर के लिए बाहर किसी काम से बाहर निकले तो वापस आते- आते शर्ट पसीने से भीग जाती है लेकिन इस चिलचिलाती गर्मी के बीच मौसम विभाग गुड न्यूज लेकर आ गया है। दरअसल मौसम विभाग की मानें तो मई का पहला सप्ताह दिल्ली एनसीआर के लोगों के लिए राहतभरा रहने वाला है। मौसम विभाग के अनुसार दिल्ली में आज से तीन मई तक अधिकतम तापमान 38 डिग्री के आसपास रहेगा। आसमान में बादल छाए रहेंगे और कुछ जगहों पर हल्की बूंदाबांदी भी हो सकती है। इसके साथ तेज हवा भी चलने का अनुमान है। डिग्री सेल्सियस रहने की संभावना है। इसके साथ ही लोगों को बाहर कम निकलने की सलाह दी है। मौसम विभाग ने ठाणे, मुंबई और रायगढ़ में कुछ जगहों पर आने वाले कुछ दिनों में लू चलने की संभावना जताई है।जिसके कारण मई का पहला सप्ताह दिल्ली के लोगों को भीषण गर्मी से थोड़ी राहत तो देकर ही जाएगा।

दिल्लीवासियों की तरह मई का पहला सप्ताह भी कूल- कूल गुजरने वाला है। IMD के अनुसार एक से तीन मई तक आसमान में हल्के बादल छाए रहेंगे। वहीं चार मई को ये बादल काले और घने हो जाएंगे और रात होते- होते बारिश में बदल जाएंगे। वहीं 5 और 6 मई को भी दिल्ली का मौसम हल्का ठंडा बना रहेगा। न्यूनतम तापमान 24 डिग्री सेल्सियस रहने की संभावना है।

भीषण गर्मी से तप रहे उत्तर प्रदेश के लोगों पर भी आने वाले दिनों में इंद्रदेव थोड़े मेहरबान होते दिख रहे हैं। हालांकि अभी पूरा यूपी भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। सूर्यदेव के तेवर के आगे तो दिन में लोग घरों से बाहर निकलने से भी कतरा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि मंगलवार को कुशीनगर, गाजीपुर और वाराणसी में दिन का तापमान 43 डिग्री सेल्सियस के पार दर्ज किया किया। हालांकि लू की मार झेल रहे यूपी वालों के लिए भी IMD ने राहत भरी भविष्यवाणी की है। मौसम विभाग के अनुसार मई के पहले सप्ताह में उत्तर प्रदेश में कुछ जिलों में बारिश हो सकती है। पांच और छह मई को राज्य के कुछ जिलों में गरज और चमक के साथ बारिश पड़ने की संभावना है। बारिश होने के कारण उत्तर प्रदेश के लोगों को भी लू से राहत मिलेगी।

महाराष्ट्र के कई हिस्सों में दिन के साथ ही रात में भी भीषण गर्मी पड़ रही है। आलम ये है कि 24 घंटे पंखा चलाना पड़ रहा है लेकिन उससे भी गर्मी से कुछ खास राहत नहीं मिल रही है। मौसम विभाग के अनुसार महाराष्ट्र को अभी लू से कोई राहत नहीं मिलने वाली है। IMD ने मराठवाड़ा, मुंबई , रायगढ़, ठाणे और कोंकण गोवा के लिए हीटवेव का अलर्ट जारी कर दिया है।वहीं चार मई को ये बादल काले और घने हो जाएंगे और रात होते- होते बारिश में बदल जाएंगे। वहीं 5 और 6 मई को भी दिल्ली का मौसम हल्का ठंडा बना रहेगा। न्यूनतम तापमान 24 डिग्री सेल्सियस रहने की संभावना है। इसके साथ ही लोगों को बाहर कम निकलने की सलाह दी है। मौसम विभाग ने ठाणे, मुंबई और रायगढ़ में कुछ जगहों पर आने वाले कुछ दिनों में लू चलने की संभावना जताई है।

बता दे कि दो दिन की भीषण गर्मी के बाद बुधवार को मुंबई में हल्के बादल छाए रहे। नतीजतन मुंबई का अधिकतम तापमान सांताक्रूज़ में 34.7 डिग्री और कोलाबा में 34 डिग्री दर्ज किया गया। सांताक्रूज में 24 घंटे में अधिकतम तापमान पांच डिग्री तक गिर गया। कोलाबा में भी अधिकतम तापमान 1.2 डिग्री तक गिर गया। हालांकि बादल छाए रहने और नमी बढ़ने के कारण न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी हुई है। बुधवार को सांताक्रूज़ का न्यूनतम तापमान 28.1 डिग्री सेल्सियस और कोलाबा का 27.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। सांताक्रूज़ में न्यूनतम तापमान औसत से 3.8 डिग्री अधिक था। मुंबईकरों को बुधवार को उमस के कारण पसीने से भी परेशानी हुई, लेकिन गर्म मौसम की तुलना में यह सहनीय था। कई मुंबईकरों ने बुधवार को बताया। इससे पहले 2019 में सांताक्रूज में न्यूनतम तापमान 28.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। इसलिए, बुधवार का तापमान भी पिछले 10 सालों में अप्रैल में सबसे अधिक न्यूनतम तापमान के रूप में दर्ज किया गया।

संपत्तियों के बंटवारे विषय पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संपत्तियों के बंटवारे विषय पर एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के बीच यह बहस जारी है कि क्या सरकार निजी संपत्तियों को जब्त या पुनर्वितरित कर सकती है। संपत्ति बंटवारे को लेकर छिड़ी बहस के बीच सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मंगलवार सुप्रीम कोर्ट से कहा कि समतावाद हासिल करने के लिए ये ‘देहाती और बचकानी’ तरीके हैं। संविधान के अनुच्छेद 39(बी) में समुदाय के भौतिक संसाधनों के वितरण की परिकल्पना की गई है, जिसका उद्देश्य आम लोगों की भलाई है। मेहता ने चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 9 जजों की बेंच से कहा कि हर नागरिक की संपत्ति का योग करके और उसे एक खास वर्ग में बराबर-बराबर बांटकर देश की संपत्ति की गणना करने का प्रस्ताव करना एक देहाती और बचकानी विधि होगी। इस तरह के विचार आर्थिक विकास, शासन, सामाजिक कल्याण और राष्ट्र की समझ की कमी को दर्शाते हैं। मेहता ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की जमीन का एक टुकड़ा है और उसे एक बड़े क्षेत्र के निवासियों की आम भलाई के लिए सड़क बनाने की जरूरत है, तो निजी स्वामित्व वाली उस जमीन को समुदाय की व्यापक भलाई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले भौतिक संसाधन के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।चौथे दिन दलीलें सुन रही थी कि क्या निजी संपत्तियों को भी संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) के तहत समुदाय का भौतिक संसाधन माना जा सकता है और परिणामस्वरूप, सरकार द्वारा इसे अपने अधिकार में लेकर सार्वजनिक भलाई के लिए नागरिकों के बीच वितरित किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘अनुच्छेद 39 (बी) आधारित कानून का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय, नस्ल या जाति के लोगों की संपत्ति को छीनकर दूसरे वर्ग के नागरिकों में वितरित करना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि कोई भी निजी संपत्ति समुदाय का भौतिक संसाधन नहीं है और प्रत्येक निजी संपत्ति समुदाय का भौतिक संसाधन है ये दो अलग दृष्टिकोण हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजीकरण और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए इसकी समकालीन व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह भी कहा कि निजी और सार्वजनिक संपत्तियों के बीच बड़ा विरोधाभास नहीं हो सकता है। पीठ ने कहा, हम आज भी निजी संपत्ति की रक्षा करते हैं, हम अभी भी व्यवसाय जारी रखने के अधिकार की रक्षा करते हैं। हम अभी भी इसे राष्ट्रीय एजेंडे के हिस्से के रूप में चाहते हैं। मैं इसे सरकार का एजेंडा नहीं कहता।

पीठ ने कहा कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, 1990 से ही निजी क्षेत्र द्वारा निवेश को प्रोत्साहित करने की नीति रही है। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे। मामले में बुधवार को भी दलीलें रखी जाएंगी।पीठ इस विवादास्पद कानूनी प्रश्न पर निर्णय लेने के लिए चौथे दिन दलीलें सुन रही थी कि क्या निजी संपत्तियों को भी संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) के तहत समुदाय का भौतिक संसाधन माना जा सकता है और परिणामस्वरूप, सरकार द्वारा इसे अपने अधिकार में लेकर सार्वजनिक भलाई के लिए नागरिकों के बीच वितरित किया जा सकता है।

पीठ ने पहले के एक फैसले में न्यायमूर्ति वी आर कृष्णा अय्यर अब रिटायर द्वारा की गई टिप्पणियों को थोड़ा अतिवादी करार दिया। पीठ ने कहा, निजी और सार्वजनिक संपत्तियों के बीच कोई सख्त द्वंद्व नहीं हो सकता है। न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर की व्याख्या थोड़ा अतिवादी है। यह व्याख्या कहती है कि चूंकि समुदाय व्यक्तियों से बना है…गणना करने का प्रस्ताव करना एक देहाती और बचकानी विधि होगी। इस तरह के विचार आर्थिक विकास, शासन, सामाजिक कल्याण और राष्ट्र की समझ की कमी को दर्शाते हैं। मेहता ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की जमीन का एक टुकड़ा है और उसे एक बड़े क्षेत्र के निवासियों की आम भलाई के लिए सड़क बनाने की जरूरत है, तो निजी स्वामित्व वाली उस जमीन को समुदाय की व्यापक भलाई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले भौतिक संसाधन के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।इसलिए समुदाय के भौतिक संसाधनों का मतलब व्यक्ति का संसाधन और व्यक्ति के भौतिक संसाधन का मतलब समुदाय का संसाधन भी होगा। पीठ में न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे। मामले में बुधवार को भी दलीलें रखी जाएंगी।

आखिर मुसलमानों को आरक्षण देना क्या गलत होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मुसलमानों को आरक्षण देना गलत होगा या नहीं! 13 दिसंबर, 1946 की बात है, जब हमारे देश का संविधान बनाने के लिए बनी संविधान सभा में बहस चल रही थी। उसी दौरान जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के बारे में बात की गई थी। सभा में इस प्रस्ताव को लेकर मुस्लिम लीग ने आपत्ति जताई। उसका कहना था कि भारतीय संविधान में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए आरक्षण दिए जाने का प्रावधान किया जाए। हालांकि, नेहरू ने मुस्लिमों के साथ बाकी अल्पसंख्यक समूहों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग का विरोध किया। नेहरू ने इस बारे में मुस्लिम लीग के चेयरमैन मुहम्मद अली जिन्ना को पत्र लिखकर बताया भी था। सलाहकार समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल भी अल्पसंख्यकों को किसी भी तरह का आरक्षण दिए जाने के खिलाफ थे। हालांकि, उन्होंने यह जरूर कहा कि संविधान में केंद्र और राज्य सरकारों को यह देखना चाहिए कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल रहा है या नहीं। समिति की मांगें संविधान सभा ने मांग लीं, मगर मुस्लिम लीग अब भी राजी नहीं था। वह अब भी पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग कर रहा था। यही बात भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की वजह बनी। संविधान सभा में उठी मुस्लिमों के आरक्षण की यह बात मौजूदा चुनावी माहौल फिर से गरमा गई है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को तेलंगाना की एक रैली में कहा- जब तक मैं जीवित हूं, किसी भी कीमत पर संविधान की ओर से दिए गए एससी-एसटी और ओबीसी के आरक्षण को मुसलमानों को नहीं बांटने दूंगा। डॉ. बीआर आंबेडकर ने धर्म-आधारित कोटे के खिलाफ फैसला किया था। उन्होंने इसे केवल एससी/एसटी/ओबीसी के लिए बनाया था, लेकिन कांग्रेस पार्टी और उसके ‘राजकुमार’ (राहुल गांधी) अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए पिछले दरवाजे से मुसलमानों के लिए कोटा लाकर हाशिए पर मौजूद वर्गों के अधिकारों को छीनकर भारतीय संविधान को कमजोर कर रहे हैं।

ब्रिटिश भारत में पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की आवाज सबसे पहले महात्मा ज्योतिबा फुले ने उठाई थी। 1882 में शैक्षिक सुधार के लिए बने हंटर आयोग के समक्ष ज्योतिबा फुले ने पिछड़ों को आरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने तब कहा था कि हिंदुस्तान में जातिवाद और वर्ण व्यवस्था की वजह से ही सैकड़ों जातियां गुलाम हैं, ऐसे में उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए। महात्मा फुले का यह आइडिया कोल्हापुर रियासत के एक राजा छत्रपति शाहूजी महाराज को इतना भाया कि उन्होंने 1901-02 में कोल्हापुर रियासत में आरक्षण लागू कर दिया। उन्होंने वंचित समुदाय के लिए नौकरियों में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की। यह आरक्षण देने का पहला सरकारी आदेश था। यह तब की बात है, जब कोल्हापुर में नौकरियों में 90 फीसदी पदों पर ब्राह्मण और दूसरी अगड़ी जातियां काबिज थीं।

दरअसल, अक्टूबर 1899 की बात है, जब शाहू जी महाराज पंचगंगा नदी में धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे। उस अनुष्ठान के दौरान ब्राह्मण पुजारी वैदिक मंत्रों को न पढ़कर पुराण के मंत्र बोल रहा था। शाहूजी ने जब उस पुजारी से आपत्ति जताई तो उसने कहा कि मराठे शूद्र वर्ण में आते हैं, ऐसे में उनके लिए वैदिक मंत्र नहीं बोले जा सकते। वैदिक मंत्रों का उच्चारण महज ब्राह्मणों के लिए ही किया जा सकता है। इस बात से शाहूजी महाराज इतने नाराज हुए कि उन्होंने ऐलान कर दिया किसी भी मंदिर या मठ के लिए सरकारी खजाने से कोई धन नहीं दिया जाएगा। यहीं से उनके मन में पिछड़े तबकों को अवसर की समानता देने की बात बैठ गई।

मानव संसाधन विकास केंद्र की एक किताब-‘भारत में आरक्षण नीति’ के अनुसार, 1901 में देश में पहली बार आधिकारिक और व्यवस्थित रूप से जनगणना कराई गई। यहीं पर पहली बार मुस्लिमों का जिक्र किया गया और उन्हें 133 सामाजिक समूहों में शामिल किया है। 1909 और 1919 में भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया। 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी में जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया गया, जिसमें गैर ब्राह्मणों को 44 फीसदी, ब्राह्मणों को 16 फीसदी, मुस्लिमों को 16 फीसदी, एंग्लो-इंडियन को 16 फीसदी और अनुसूचित जातियों को 8 फीसदी आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था की गई। इससे पहले 1895 में मैसूर की रियासत में पुलिस विभाग में ब्राह्मणों, मुसलमानों और दूसरी हिंदू जातियों को आबादी के हिसाब से सरकारी सेवाओं में स्थान आरक्षित किए गए। जब हालात नहीं सुधरे तब मैसूर के महाराजा ने तत्कालीन हाईकोर्ट के जज सर एलसी मिलर की अगुवाई में एक कमेटी बनाई। मिलर कमेटी ने पिछड़ा वर्ग की परिभाषा जाति और वर्ग के आधार पर तय की और उसमें मुस्लिमों को भी शामिल किया। क्योंकि इनका प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं में नहीं था।

केरल में पूरे मुस्लिम समुदाय को ओबीसी के तहत रिजर्वेशन दिया गया है। इसमें 8 फीसदी आरक्षण शैक्षिक संस्थाओं, जबकि 10 फीसदी आरक्षण सरकारी नौकरियों में दिए जाने की बात है। वहीं, तमिलनाडु में करीब 95 फीसदी मुस्लिम समुदायों को आरक्षण के दायरे में रखा गया है। कर्नाटक में ओबीसी के लिए 32 फीसदी आरक्षण है, जिसमें सभी मुस्लिमों के लिए एक सब कैटेगरी बनाई गई है। वहां पर मुस्लिमों को 4 फीसदी रिजर्वेशन दिया गया है। तेलंगाना में भी सभी मुस्लिमों को 3 फीसदी आरक्षण दिया गया है। वहीं, राजस्थान, यूपी, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बस पिछड़े मुसलमानों को ही ओबीसी के तहत आरक्षण दिया जा रहा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजीव रंजन गिरि कहते हैं कि भाजपा चुनावी फायदा लेना चाहती है। मुस्लिमों को अभी जो भी आरक्षण मिल रहा है, वह ओबीसी कोटे से ही दिया जा रहा है। जबकि भाजपा के नेता चुनावी रैलियों में यह बात फैला रहे हैं कि मुस्लिमों को आरक्षण दिया जा रहा है, जो धार्मिक आधार पर है।

शिवाजी शुक्ला कहते हैं कि मुस्लिमों को आरक्षण पिछड़ा वर्ग के तहत दिया जा रहा है। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत की गई है, जिसमें कहा गया है कि राज्य जिन नागरिकों को पिछड़े वर्ग में मानता है, उन्हें ओबीसी में शामिल कर आरक्षण का लाभ दे सकता है। कर्नाटक समेत भारत के पांच राज्य ऐसे हैं, जहां सभी मुस्लिमों को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। ऐसा करने के लिए संबंधित राज्यों में सभी मुस्लिमों को ओबीसी मान लिया गया है। दरअसल, पेंच यहां फंसा हुआ है कि क्या देश के सभी मुस्लिमों को पिछड़ा मान लिया जाए? यह मामला भी कोर्ट में हैं। मुस्लिमों को धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। यह भी एक हकीकत है कि सभी मुस्लिम पिछड़े नहीं हो सकते। ऐसे में जिन राज्यों ने पूरे मुस्लिम समुदाय को आरक्षण दिया है, वहां पर आरक्षण का मामला कोर्ट में है। भाजपा भी इसी बात का विरोध कर रही है।

जब दिल्ली के 100 स्कूलों को मिली धमकियां !

हाल ही में दिल्ली के 100 स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकियां मिली थी! दिल्ली-एनसीआर के दर्जनों स्कूलों में अफरा-तफरी मची है। इन स्कूलों में बम रखे होने के ईमेल मिले हैं। प्रशासन जांच में जुटा है तो पैरेंट्स परेशान हैं। ठीक पांच महीने पहले 1 दिसंबर, 2023 को बेंगलुरु और आसपास के जिलों के 60 स्कूलों में बम होने के ईमेल भेजे गए थे। तब भी ऐसी ही अफरा-तफरी मची थी। आखिर बच्चों से बढ़कर क्या है दुनिया में! खतरे की दूर-दूर की आशंका भी पैरेंट्स को पैनिक करने के लिए काफी होती है। फिर यहां तो बम की धमकी मिली। स्कूलों की तरह कभी एयर पोर्ट्स पर तो कभी हवाई जहाज में, कभी रेलवे स्टेशन पर तो कभी ट्रेन में, यहां तक कि राजभवन में बम होने की सूचनाएं दी जाती हैं। कई बार धमकियां मिलती हैं कि ऐसा करो वरना बम से उड़ा देंगे। यह अलग बात है कि ऐसी ईमेल और धमकियां अक्सर फर्जी ही साबित होते हैं, लेकिन यह तो सच है कि हर बार हड़कंप मचता है और सांसें अटक जाती हैं। सवाल है कि लोगों में दहशत फैलाने की ऐसी घिनौनी मानसिकता आती कहां से है और ऐसे लोगों पर क्या शिकंजा कसा भी जाता है? इसी वर्ष जनवरी में दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे आईजीआई एयरपोर्ट के कंट्रोल रूम में कॉल आई। कॉलर ने धमकी दी कि दरभंगा से दिल्ली आने वाली स्पाइसजेट की फ्लाइट में बम रख दिया गया है। इसके बाद एयरपोर्ट पर फुल इमर्जेंसी घोषित कर दिया गया।

पिछले वर्ष दिसंबर महीने में रात 11.30 बजे राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए कंट्रोल रूम को एक अनजान कॉल आई। कॉलर ने कहा कि उसने राजभवन में बम रखा है। पिछले वर्ष अगस्त महीने तक मुंबई पुलिस कंट्रोल रूम को 32 हॉक्स कॉल्स मिली थीं। इन मामलों में मुंबई पुलिस ने 17 लोगों को गिरफ्तार किया था। एक गिरफ्तार आरोपी ने अकेले पांच महीनों में 89 कॉल्स की थी। 2021 के जनवरी-फरवरी महीने में नोएडा में बम की सूचना दी गई। जहां बम होने की बात कही गई थी, वहां पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने जांच की तो वहां से पटाखे मिले जिसे इस तरह से बांधकर रखा गया था कि बम की तरह दिखे। तब एक महीने के अंदर तीन फर्जी कॉल्स आए थे जिनमें विभिन्न अस्पतालों को निशाना बनाए जाने की बात कही गई थी।

ऊपर की घटनाओं से साफ है कि फर्जी कॉल के जरिए हड़कंप मचाने की वारदातें आम हो गई हैं। हर साल दर्जनों, सैकड़ों हॉक्स कॉल्स के जरिए अलग-अलग जगहों पर पैनिक क्रिएट किया जाता है। हर बार पुलिस-प्रशासन को कड़ी मशक्कत करनी होती है। उनका बड़ा रिसोर्स फर्जीवाड़े से निपटने में लगता है तो स्कूल या कोई सार्वजनिक जगहों पर बम जैसी अफवाहों से आम लोगों की भी धड़कनें तेज हो जाती हैं। प्रशासन सूचना या धमकी मिलने के बाद दो तरह से इंगेज होता है। एक तो उसे तुरंत संबंधित स्थल पर तलाशी लेनी होती है, भीड़ का मैनेजमेंट करना होता है तो दूसरी तरफ उसे फर्जी कॉल करने वालों तक पहुंचने के लिए भी लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना होता है।

कई बार प्रशासन दहशत फैलाकर मजा लेने वाले सनकियों तक पहुंच भी जाता है, लेकिन अक्सर छोटे-मोटे मामलों में हीला-हवाली भी हो जाती है। लेकिन बुधवार को जिस तरह दिल्ली-एनसीआर में हड़कंप मचाया गया, वह तो हद से बहुत आगे का मामला है। अगर ऐसी घटनाएं बार-बार हुईं तो न केवल शासन-प्रशासन के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी बल्कि आम लोगों के मन में आशंका के बादल घने होने लगेंगे।पांच महीनों में 89 कॉल्स की थी। 2021 के जनवरी-फरवरी महीने में नोएडा में बम की सूचना दी गई। जहां बम होने की बात कही गई थी, वहां पुलिस और बम निरोधक दस्ते ने जांच की तो वहां से पटाखे मिले जिसे इस तरह से बांधकर रखा गया था देश ने पिछले 10 वर्षों में जगह-जगह बम विस्फोट की वारदातों की आशंका से छुटकारा पाया है, अब ऐसी फर्जी कॉल्स से दहशत का वही मंजर क्रिएट किया जाने लगा है। जरूरी है कि हॉक्स कॉल्स करने वाली सनकियों से भी आतंकियों जैसे ही निपटा जाए क्योंकि दोनों की मंशा एक ही होती है- ज्यादा से ज्यादा दहशत फैलाना। असल में बम रखा जाए और वह फट भी जाए तो जितना दहशत फैलता है, उससे कम खौफ फर्जी कॉल्स से नहीं फैलता। इसलिए वक्त आ गया है कि ऐसे सनकियों को पाताल से भी ढूंढकर निकाला जाए और उन्हें ऐसी सजा दी जाए कि दूसरा कोई ऐसी सनक पालने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

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