Friday, March 6, 2026
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जब कारसेवकों पर हुई दनादन गोलीबारियाँ!

एक ऐसा समय जब कारसेवकों पर दनादन गोलीबारियाँ की गई! 1853, 1858 से 1934 और 1949 का वक्त भी जिया। लेकिन, 90 के दशक ने मेरी धरती को राजनीति का केंद्र बिंदु बना दिया। राजीव गांधी जिस सॉफ्ट हिंदुत्व की विचारधारा के साथ हिंदू और मुस्लिम वर्ग के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे थे। राजनीति कहीं उससे काफी आगे बढ़ चुकी थी। देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने राजीव के छोड़े गए हिंदुत्व की डोर को थामा और मंदिर आंदोलन के मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया। लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से राम मंदिर का रथ लेकर निकाले थे। उनके रथ को बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव ने रोक दिया। अयोध्या पहुंचने से पहले रथ यात्रा रुक चुकी थी। वैदिक काल में अश्वमेध यज्ञ की परंपरा थी। इसमें यज्ञ कराने वाला राजा घोड़े छोड़ता था और अगर कोई राजा उसे पकड़ता तो अश्वमेध यज्ञ करने वाले राजा से उसे युद्ध करना होता था। रामायण काल में भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ का जिक्र आता है। उनके छोड़े घोड़े को उनके ही वन में रह रहे पुत्रों लव और कुश ने पकड़ा था। इस घोड़े को छुड़वाने के लिए प्रभु राम को स्वयं अपने पुत्रों से युद्ध करने मैदान में उतरना पड़ा। हालांकि, अब राजतंत्र नहीं था। भाजपा केंद्र की सत्ता में साझीदार थी। मतलब पावर में थी। अश्वमेध यज्ञ की तरह उनका रथ देश के तमाम हिस्सों से होते 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचनी थी। लालू यादव ने 23 अक्टूबर 1990 को ही आडवाणी की गिरफ्तारी के साथ रथ रोक दिया। इसके बाद युद्ध यानी आक्रोश का प्रदर्शन तय था। लालू के रथ रोकने के कदम को चैलेंज माना गया। हालांकि, जिस हिंदुत्व के एजेंडे को सेट करने के लिए यह रथ यात्रा निकली थी, वह आडवाणी की 2गिरफ्तारी से पूरा होता दिखा। विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में मैदान सजा रखा था। आजाद देश में सबसे बड़ी कारसेवा का ऐलान किया गया था। वहीं, यूपी की मुलायम सिंह यादव की सरकार किसी भी स्थिति में कारसेवा को पूरी नहीं होने देना चाहती थी। यह मेरे प्रभु राम के मंदिर आंदोलन के लंका कांड की शुरुआत थी।

बिहार में लालू सरकार ने राम मंदिर रथ यात्रा को रोक कर मंदिर आंदोलन को बाधित करने का संदेश दिया। वहीं, यूपी की मुलायम सरकार ने दावा किया कि 30 अक्टूबर 1990 को प्रस्तावित कारसेवा को किसी भी स्थिति नहीं होने दिया जाएगा। यहां कारसेवा के मतलब को समझ लेना आवश्यक है। दरअसल, राजीव सरकार ने 1989 में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर का शिलान्यास करने की अनुमति दे दी थी। यह मंदिर आंदोलन का सबसे अहम पड़ाव था। एक प्रकार से राजीव सरकार ने मंदिर के अस्तित्व को मान्यता दे दी थी। लेकिन, विवादित स्थल खड़ा था। वहां जर्जर मस्जिद थी। इसमें हर शुक्रवार को जुमे की नमाज पढ़ी जाती थी। हिंदू पक्ष यहां पर मंदिर बनाने की योजना तैयार कर रहा था। इसी मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा होनी थी। बाहर में अंग्रेजों के जमाने में निर्धारित राम चबूतरे से निर्माण कार्य शुरू किया जाना था, लेकिन तत्कालीन केंद्र की वीपी सिंह और यूपी की मुलायम सिंह सरकार विवादित स्थल पर किसी प्रकार का निर्माण नहीं होने देना चाहती थी।

विश्व हिंदू परिषद ने रामभक्तों को जुटाकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया। सितंबर 1990 में विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और शिवसेना की ओर से मंदिर पुननिर्माण के लिए आंदोलन चलाया। अब हिंदुओं के भीतर भी मंदिर को एक अलग भाव पैदा होने लगा। लोग सवाल करने लगे कि हमारी आस्था की कद्र सरकारें क्यों नहीं कर रही हैं? जवाब कहीं से नहीं मिल रहा था। वीएचपी, आरएसएस और भाजपा लगातार लोगों को अयोध्या में जुटकर अपने भगवान को जनमानस के सामने लाने की अपील कर रहे थे। 30 अक्टूबर 1990 को आडवाणी की रथ यात्रा अयोध्या पहुंचनी थी। लेकिन, पहले ही आडवाणी गिरफ्तारी के साथ राम मंदिर रथ रुक चुका था। विश्व हिंदू परिषद का अभियान जारी था। अयोध्या में रामभक्तों का जुटान होने लगा। भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी और विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने रामभक्तों को अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया। देशभर में इसको लेकर हलचल तेज हो गई। उस समय यूपी में मुलायम सिंह यादव सरकार थी। मुलायम सरकार ने विवादित परिसर की सुरक्षा का वादा किया। बाबरी मस्जिद परिसर और अयोध्या शहर को सुरक्षा बलों के हवाले दे दिया गा। मुलायम ने साफ कहा था कि अयोध्या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। मुलायम के दावों पर रामभक्तों का जोश उबाल मार रहा था। हर रामभक्त प्रभु रामलला के मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर घर से निकलने लगा। पहली बार देशभर से 21 अक्टूबर 1990 से अयोध्या में रामभक्त कारसेवकों का जुटान शुरू हुआ। हर दिन के साथ उनकी संख्या बढ़ रही थी। कारसेवा की तिथि पहले से 30 अक्टूबर निर्धारित थी।

एक्शन डे यानी 30 अक्टूर 1990 को लेकर रामनगरी में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व की गई थी। पुलिस ने अयोध्या के लिए सभी बस और ट्रेन सेवाओं पर रोक लगा दी थी। सीमाओं को सील कर दिया गया। कारसेवकों को किसी भी स्थिति में अयोध्या नहीं पहुंचने देने की कोशिश सरकार के स्तर पर की गई। ऐसे में अधिकांश कारसेवक पैदल ही अयोध्या की तरफ कूच कर गए। एक रिपोर्ट तो यहां तक दावा करती है कि कई कारसेवक तो सरयू की तेज धार को तैरकर अयोध्या पहुंच गए थे। यूपी पुलिस ने विवादित ढांचे की करीब डेढ़ किलोमीटर पहले से बैरिकेडिंग लगा दी। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। अयोध्या में अब एक्शन डे आ गया था। कारसेवा की शुरुआत 30 अक्टूबर 1990 सुबह 10 बजे से हुई। सुबह 10 बजे महंत नृत्य गोपाल दास और विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल कारसेवकों के एक बड़े समूह के साथ विवादित स्थल की तरफ बढ़े। पुलिस ने कारसेवकों को रोकने की कोशिश की। लेकिन, कारसेवक आगे बढ़ते रहे। इसी दौरान लाठीचार्ज का आदेश दे दिया गया। कारसेवकों पर लाठियां बरसने लगी। एक लाठी अशोक सिंघल के सिर पर लगी। उनके सिर में चोट लगने की खबर कारसेवकों के बीच आग की तरफ फैली और वे उग्र हो गए। इसके बाद पुलिसकर्मियों और कारसेवकों के बीच भिड़ंत शुरू हो गई। करीब एक घंटे तक अयोध्या में युद्ध जैसी स्थिति बनी रही। सुबह करीब 11 बजे पुलिस और कारसेवकों के बीच भिड़ंत के बीच एक साधु ने कॉन्स्टेबलों की एक बस को अपने नियंत्रण में ले लिया।

आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर ले जाने के लिए यह बस वहां खड़ी की गई थी। कारसेवकों को गिरफ्तार कर इसमें रखा जा रहा था। पुलिस ने राम जन्मभूमि रोड पर बैरिकेडिंग कर रखी थी। साधु ने बस को कब्जे में लेने के बाद तेज गति से आगे की तरफ भगाना शुरू कर दिया। सुरक्षाकर्मी जब तक कुछ समझते बस बैरिकेडिंग को तोड़ते हुए आगे की तरफ निकल गई। इससे अन्य लोगों के लिए पैदल चलने का रास्ता साफ हो गया। सुरक्षाकर्मी सतर्क थे। विवादित स्थल के पास भारी सुरक्षा बंदोबस्त थे। इसके बाद भी वहां तक करीब 5000 कारसेवक पहुंच चुके थे। पुलिस उनके पीछे-पीछे दौड़ रही थी। रुकने को कह रही थी। कारसेवक दौड़ते आगे बढ़ रहे थे।

रामभक्तों पर दो दिनों में दूसरी बार गोली चली। हनुमानगढ़ी से लेकर विवादित परिसर के बीच रामभक्तों को गोलियों से निशाना बनाया जाने लगा। फायरिंग शुरू होने के बाद कारसेवक इधर- उधर भागने लगे। सुरक्षा बलों के लिए आज कारसेवकों की जान लेना मकसद बन गया था। प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि इस दिन हनुमानगढ़ी के आसपास की गलियां खून से लाल हो गई थी। नालियों में खून बह रहा था। सुरक्षाकर्मी इस भीड़ में 30 अक्टूबर को बाबरी मस्जिद पर भगवा झंडा फहराने वाले कोठारी बंधुओं को ढूंढ़ रहे थे। सुरक्षाबलों ने एक घर में छिपे कोठारी बंधुओं को खींचकर सड़क पर लाए। बीच सड़क पर उन्हें गोली मारे जाने का दावा प्रत्यक्षदर्शियों की ओर से किया जाता है।

कोठारी बंधुओं के अलावा जोधपुर के सेठाराम माली, गंगानगर के रमेश कुमार, फैजाबाद महावीर प्रसाद, अयोध्या के रमेश पांडेय, मुजफ्फरपुर के संजय कुमार, जोधपुर के प्रो. महेंद्रनाथ अरोड़ा, राजेंद्र धारकर, बाबूलाल तिवारी और एक अनाम साधु के इस घटना में मारे जाने का रिकॉर्ड मिलता है। हिंदू संगठनों का दावा है कि पुलिस ने उस दिन सैकड़ों कारसेवकों की हत्या की। कई शवों का अज्ञात स्थानों पर दाह संस्कार कराया। बड़ी संख्या में लाशों को बोरे में भरकर सरयू नदी में भी प्रवाहित करने का आरोप भी पुलिस पर है।

अयोध्या मंदिर आंदोलन में आज भी कोठारी बंधुओं का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। राजकुमार कोठरी और शरद कोठारी दो भाई थे। कलकत्ता में संघ से जुड़े हुए थे। वे आरएसएस की शाखाओं में शामिल होते थे। उन्होंने दूसरे साल तक का प्रशिक्षण लिया हुआ था। वीएचपी की 30 अक्टूबर की कारसेवा की घोषणा होते ही दोनों ने अयोध्या जाने की जिद शुरू कर दी। उनके पिता हीरालाल कोठारी ने दोनों भाइयों को भाग लेने की अनुमति दे दी। दिसंबर 1990 में उनकी बहन की शादी होने वाली थी। फिर भी दोनों भाई कारसेवा के लिए निकल पड़े। बहन को वादा किया कि शादी तक वापस आ जाएंगे। कोलकाता से वाराणसी पहुंचने पर उन्हें पता चला कि अयोध्या के लिए ट्रेन सेवा बंद है। रास्तों को बंद कर दिया गया है। दोनों ने टैक्सी ली और आजमगढ़ पहुंच गए। वहां से उन्होंने पैदल अयोध्या जाने का फैसला किया। करीब 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर 30 अक्टूबर 1990 को दोनों भाई अयोध्या पहुंच गए। 30 अक्टूबर की कारसेवा में बाबरी पर भगवा फहरा कर वे सुर्खियों में आ गए।

2 नवंबर 1990 की कारसेवा में कोठारी बंधु दिगंबर अखाड़ा की तरफ से निकल रहे कारसेवकों के हुजूम में शामिल थे। दोनों भाई बजरंग दल के संस्थापक अध्यक्ष विनय कटियार के नेतृत्व में सड़क पर दोबारा उतरे। पुलिस ने इस दौरान कारसेवकों पर फायरिंग शुरू कर दी। दोनों भाई एक मकान में छिप गए। दावा किया जाता है कि एक पुलिस अधिकारी ने शरद कोठारी को घर से पकड़ लिया। सड़क पर खड़ाकर उन्हें गोली मार दी गई। बड़े भाई राजकुमार कोठारी उस समय शरद को बचाने के लिए दौड़े। उन्हें भी गोली मार दी गई। 4 नवंबर 1990 को दोनों भाइयों का सरयू तट पर अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान कारसेवकों की भारी भीड़ सरयू तट पर उमड़ी। इसी भीड़ में मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम कहकर संबोधित किया गया था।

क्या अब बिगड़ने वाले हैं भारत मालदीव के रिश्ते?

अब भारत मालदीव के रिश्ते बिगड़ सकते हैं! मालदीव ने भारत को उनके देश से भारतीय सैनिक हटाने के लिए डेडलाइन दे दी है। मालदीव ने भारत से कहा है कि 15 मार्च से पहले अपने सैनिक हटा लें। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की चीन यात्रा से लौटते ही मालदीव ने अपने तेवर सख्त करने शुरू किए हैं। इससे पहले शनिवार को ही मुइज्जू ने कहा था कि हमारा देश भले ही छोटा है लेकिन हमें बुली करने का लाइसेंस किसी के पास नहीं है। उन्होंने किसी देश का नाम तो नहीं लिया लेकिन माना जा रहा था कि उनका इशारा भारत की तरफ था। मालदीव की पिछली सरकार के अनुरोध पर ही मालदीव में भारत की सेना की एक छोटी टुकड़ी है। आईडीएसए में रिसर्च फैलो और साउथ एशिया एक्पर्ट स्मृति पटनायक कहती हैं कि 15 मार्च अभी काफी दूर है और इस बीच कुछ भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि मालदीव यह कहकर कि भारत की मिलिट्री वहां तैनात है, राजनीति खेल रहा है। वहां भारत के जो सैनिक हैं वे ट्रेनर हैं, जो मालदीव की नैशनल डिफेंस फोर्स को ट्रेनिंग देते हैं। इससे मालदीव का ही फायदा है। अगर मालदीव नहीं चाहता कि वे वहां रहें तो भारत को इससे क्या दिक्कत हो सकती है।

स्मृति पटनायक कहती हैं कि मालदीव की मौजूदा सरकार का चुनावी प्रचार ही जब भारत के विरोध में था तो अब वह जो स्टैंड ले रहे हैं या जिस तरह के स्टेटमेंट दे रहे हैं यह आश्चर्यजनक नहीं है। वहां काफी पोलराइज माहौल है और वहां चीन बनाम भारत की राजनीति हो रही है। मालदीव इस मसले को एक हद तक ही ले जा सकता है लेकिन यह नहीं लगता कि ये भारत और मालदीव के रिश्ते के ब्रेकडाउन तक जाएगा। मालदीव ने चीन से टूरिस्ट भेजने का आग्रह किया है। लेकिन मालदीव जाने वाला ज्यादातर हाईएंड टूरिस्ट वेस्टर्न टूरिस्ट और बॉलिवुड यानी भारत से जाते हैं, जिससे मालदीव की कमाई होती है। कॉमन चीनी टूरिस्ट से मालदीव कितना कमा सकता है यह देखना होगा।मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह वादा किया था कि मालदीव में सरकार बनाते ही वह विदेशी सेना को अपने देश से बाहर करेंगे। मालदीव में इस वक्त करीब 70 भारतीय सैनिक हैं। भारतीय सैनिकों के पास कुछ सर्विलांस एयरक्राफ्ट भी हैं जो हिंद महासागर की निगरानी करते हैं। आपदा राहत के साथ ही मेडिकल हेल्प भी भारतीय सैनिकों के जरिए पहुंचाई जाती है। इंडियन नेवी का डॉर्नियर हेलिकॉप्टर और दो दूसरे हेलिकॉप्टर भी वहां हैं।

बता दे कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने चीन से वापस आने के बाद ही अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। मालदीव वापस लौटते ही उन्होंने एक बार फिर भारत से अपने सैनिकों को वापस बुलाने को कहा है। हालांकि इस बार मामला काफी सीरियस हो गया है, क्योंकि मुइज्जू की ओर से अब इसे लेकर एक समय सीमा दे दी गई है। मालदीव ने कहा कि भारत के सैन्यकर्मियों को 15 मार्च तक देश छोड़ देना चाहिए। शी जिनपिंग के साथ मुलाकात के बाद से ही मुइज्जू के तेवर बदले-बदले लग रहे हैं। मालदीव राष्ट्रपति कार्यालय में सार्वजनिक नीती सचिव अब्दुल्ला नाजिम इब्राहिम ने कहा, ‘भारतीय सैन्यकर्मी मालदीव में नहीं रह सकते। यह राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू और इस प्रशासन की नीति है।’ रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्तमान में मालदीव में 88 भारतीय सैन्यकर्मी हैं। लगभग दो महीने पहले भी राष्ट्रपति मुइज्जू ने भारतीय सैनिकों की वापसी की बात कही थी। मोहम्मद मुइज्जू भारत विरोध के लिए जाने जाते हैं और ‘इंडिया आउट’ प्रचार के जरिए वह सत्ता में आए हैं।

मालदीव और भारत ने सैनिकों की वापसी पर बातचीत करने के लिए एक हाई लेवल कोर ग्रुप बनाया है। इस ग्रुप ने रविवार को माले में विदेश मंत्रालय मुख्यालय में अपनी पहली बैठक की। रिपोर्ट के मुताबिक इस मीटिर में भारतीय उच्चायुक्त मुनु महावर भी मौजूद रहे। नाजिम ने इस मीटिंग की पुष्टि की है और कहा कि बैठक के एजेंडे में 15 मार्च तक सैनिकों को वापस बुलाने का अनुरोध किया गया। मालदीव से भारतीय सैनिकों की वापसी मुइज्जू का प्रमुख चुनावी वादा रहा है। पांच दिनों की चीन यात्रा से लौटने के बाद मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने शनिवार को भारत के खिलाफ एक कड़ा बयान दिया। इसमें उन्होंने कहा कि उनका देश छोटा हो सकता है, लेकिन ‘इससे किसी को हमें धमकाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता।’ मुइज्जू ने यह बयान ऐसे समय में दिया है, जब मालदीव के मंत्रियों की ओर से पीएम मोदी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की गई थी। इसने दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों को खराब किया है।

चीन की यात्रा से लौटने पर उन्होंने मीडिया से किसी देश का नाम लिए बिना कहा, ‘हमारे पास इस महासागर में छोटे द्वीप हैं, लेकिन हमारे पास 9,00,000 वर्ग किलोमीटर का एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र है। मालदीव इस महासागर का सबसे बड़ा हिस्सा रखने वाले देशों में से एक है।’ नवंबर में पदभार संभालने के बाद मुइज्जू की यह पहली चीन यात्रा है। भारत पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए राष्ट्रपति मुइज्जू ने कहा, ‘यह महासागर किसी विशिष्ट देश का नहीं है। यह हिन्द महासागर इस क्षेत्र में स्थित सभी देशों का है।’ 

बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता के लिए क्या बोले शशि थरूर?

हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता के लिए एक बयान दिया है! लोकसभा चुनाव को बमुश्कल दो से तीन महीने बाकी हैं। पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए और विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A दोनों मैदान में हैं। बीजेपी का कहना है कि इस बार आंकड़ा 400 को भी पार कर जाएगा। लेकिन तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने जो कहा है वो एनडीए को परेशान कर सकता है। थरूर ने कहा कि 2024 के आम चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है लेकिन, सहयोगियों से उसे झटका लग सकता है। सहयोगियों से शशि थरूर का मतलब एनडीए के साथी दलों से था। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के बारे में बोलते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा कि भारत एक विविधतापूर्ण देश है और यह देश उस स्थिति के साथ रहने के लिए पूरी तरह से तैयार है, जहां उसके पास सभी राज्यों में 100 प्रतिशत सहमति नहीं है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ‘इंडिया: द फ्यूचर इज नाउ’ सत्र में कहा कि मुझे अब भी लगता है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। लेकिन, मेरा मानना है कि उनकी भाजपा संख्या को उस स्तर तक कम किया जा सकता है, जहां सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या जुटाने के वास्ते उनके संभावित सहयोगी समर्थन करने के इच्छुक नहीं होंगे। हो सकता है कि एनडीए से अलग होकर सहयोगी दल हमारे साथ सहयोग करने को तैयार हों। इसलिए हमें इसे आजमाना होगा।

शशि थरूर ने इंडिया गठबंधन पर बोलते हुए कहा कि इस गठबंधन में सीटे बंटवारे को लेकर कठिनाइयां हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि उन्हें अधिक से अधिक राज्यों में पर्याप्त समझौता होने की उम्मीद है ताकि हार की किसी भी आशंका से बचा जा सके। थरूर के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस देश के लोगों को ध्यान रखने की जरूरत है, वह यह है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को वोट दें क्योंकि मोदी, मोदी का नारा लगाने वालों को पता होना चाहिए कि केवल वाराणसी के लोग ही प्रधानमंत्री मोदी को वोट कर सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘हर किसी को अपनी सीट पर उस सबसे अच्छे उम्मीदवार को वोट देना होगा, जिसे लेकर उन्हें लगता है कि वे उनका अच्छी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। और, अगर वे केवल मोदी के लिए वोट करना चाहते हैं तो यह उनकी पसंद है।’

इस कार्यक्रम में इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल, नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, अमेरिकी चिकित्सक एवं लेखक अब्राहम वर्गीस और मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन समेत 400 प्रसिद्ध हस्तियों ने भाग लिया। केएलएफ रविवार को समाप्त हुआ। बता दें कि बीजेपी 2024 लोकसभा चुनाव के लिए उन राज्यों के तरफ देख रही है, जहां से पहले सफलता नहीं मिली। भारत से पांच दक्षिणी राज्यों में कुल 129 लोकसभा सीटें हैं और 2019 में को केवल 29 सीटों पर सफलता मिली। कर्नाटक की 25 और तेलंगाना की चार सीटों के अलावा बाकी बचे तीन राज्य केरल, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में बीजेपी का खाता भी नहीं खुला। अब बीजेपी 20 लोकसभा सीट वाले केरल का मिथक तोड़ने और दक्षिण के 5 राज्यों में सीट दोगुना करने की प्लानिंग कर रही है। अभी तक के चुनावी इतिहास में भारतीय जनता पार्टी को केरल में एक लोकसभा सीट पर भी जीत नसीब नहीं हुई। पिछले दिनों पीएम मोदी ने त्रिशूर ने रोड शो और रैली कर अपनी मंशा जता दी । अब बीजेपी नेता तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में कैंपेन शुरू करने वाले हैं। कर्नाटक में बीजेपी का आधार है, पिछले चुनाव में वहां से 25 सीटें मिली थीं। जेडी एस से समझौते के बाद इस बार भी पीएम मोदी कर्नाटक में बड़ी जीत की उम्मीद कर रहे हैं।

केरल एक ऐसा राज्य है, जहां हिंदुओं की आबादी 54 फीसदी से अधिक है। इस राज्य में 26.56 आबादी मुस्लिम और 18 फीसदी ईसाई है। बीजेपी हिंदू वोटर वाले इलाके में फोकस कर रही है। यहां बीजेपी की उम्मीद आरएसएस की मौजूदगी के कारण जिंदा है, मगर पार्टी के कार्यकर्ता ग्राउंड पर कम ही नजर आते हैं। अभी तक के चुनावों में मजबूत दावेदारी नहीं होने के कारण राइट विंग के वोटर कांग्रेस को वोट देते रहे। पिछले दो लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने एक्टर सुरेश गोपी, के पी श्रीसन, कुम्मनम राजशेखरन और ओ राजगोपाल जैसे नेताओं को मैदान में उतारकर अपनी मजबूत मौजूदगी का एहसास कराया है। जीत के लिए बीजेपी एझावा समुदाय और क्रश्चियन वोटरों के बीच अपनी बैठ बना रही है। इस चुनाव में पार्टी कई सीटों पर एझावा समुदाय के नेताओं को मैदान में उतार सकती है। बीजेपी की नजर त्रिशूर, मध्य केरल में पथानामथिट्टा, एटिंगल और तिरुवनंतपुरम लोकसभा पर टिकी है।

त्रिशूर लोकसभा सीट से एक बार फिर पूर्व राज्यसभा सांसद सुरेश गोपी को पार्टी अपना उम्मीदवार बना सकती है। 2019 के चुनाव में सुरेश गोपी ने 28.2 फीसदी वोट हासिल किए थे। इसके अलावा तिरुवनंतपुरम सीट पर भी कांग्रेस नेता शशि थरूर के मुकाबले के लिए बड़े चेहरे को उतारा जा सकता है। तिरुवनंतपुरम सीट से चौथी बार शशि थरूर मैदान में होंगे। 2009, 2014 और 2019 के चुनावों में बीजेपी ने इस सीट से चुनाव हारी तो जरूर, मगर हर चुनाव में वोटों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की। 2019 के चुनाव में बीजेपी के नेता कु्म्मनम राजशेखरन को 31 फीसदी और कांग्रेस नेता शशि थरूर को 41 फीसदी वोट मिले थे। पथानामथिट्टा सीट पर भी बीजेपी का वोट शेयर 28 फीसदी के करीब पहुंचा था। एटिंगल लोकसभा सीट पर भी पार्टी को 24 फीसदी वोट मिले थे। बीजेपी को उम्मीद है कि केरल में सवर्ण माने जाने वाले नायर, गैर कैथोलिक क्रिश्चियन और एझावा समुदाय के करीब जाकर इन सीटों को जीता जा सकता है।

भारत जोड़ो न्याय यात्रा के लिए क्या बोली बीजेपी?

हाल ही में बीजेपी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर एक बयान दिया है! भारतीय जनता पार्टी भाजपा ने ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ को ‘भारत तोड़ो यात्रा’ बताते हुए रविवार को हमला बोला। बीजेपी ने कहा कि कांग्रेस को राहुल गांधी को आगे बढ़ाने और नेहरू-गांधी परिवार की पकड़ बनाए रखने पर जोर देने के बजाय पार्टी छोड़ने वाले नेताओं और अपनी पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा प्रताड़ित लोगों को न्याय दिलाना चाहिए। अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी रविवार को मणिपुर से मुंबई की यात्रा पर निकले। रविवार को ही पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवरा ने कांग्रेस छोड़ी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं।केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने यात्रा को धोखा बताया और कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को न्याय नहीं मिल रहा है और वे दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं। ठाकुर ने कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, हिमंत विश्व शर्मा, हार्दिक पटेल, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आर पी एन सिंह और सुनील जाखड़ जैसे नेताओं के कांग्रेस छोड़ने का जिक्र किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ऐसे नेताओं की एक लंबी सूची है जिन्होंने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि उन्हें पार्टी में न्याय नहीं मिला। अब, मिलिंद देवरा ने भी कांग्रेस छोड़ दी है।’ ठाकुर ने कहा, ‘कांग्रेस की न्याय यात्रा एक धोखा है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी लोगों को न्याय देने की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस नेता खुद न्याय से वंचित हैं।’

अनुराग ठाकुर ने कहा कि इसके विपरीत भाजपा में हर किसी को उचित सम्मान मिलता है और यही कारण है कि ‘पार्टी में कोई मुख्यमंत्री है, कोई केंद्रीय मंत्री है, कोई सांसद है और कोई विधायक है।’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास जताया है और उनके साथ जुड़ने के इच्छुक हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रीजीजू ने सवाल किया कि यात्रा का उद्देश्य भारत को एकजुट करना है या इसे विभाजित करना। उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘राहुल गांधी पूर्वोत्तर जा रहे हैं लेकिन क्या उन्होंने उन गिरोहों का समर्थन करने के लिए माफी मांगी है जो खुले तौर पर पूर्वोत्तर को देश को बाकी हिस्सों से काटना चाहते हैं?’

अरुणाचल पश्चिम के सांसद रीजीजू ने पूर्वोत्तर पर छात्र नेता शरजील इमाम की टिप्पणी का एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि गांधी ने टुकड़े-टुकड़े गिरोह का समर्थन किया इसलिए वह भारत जोड़ो यात्रा का नाटक कर रहे हैं। शरजील अभी जेल में हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने पार्टी में वंशवाद बनाए रखने और गांधी को आगे बढ़ाने के लिए दक्षिण से उत्तर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के महीनों बाद पूर्व से पश्चिम की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू की है।

दुष्यंत गौतम ने मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी की कांग्रेस छोड़ने वाले सभी लोग महात्मा गांधी की आत्मा को शांति पहुंचा रहे हैं जो चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए। गौतम ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘मुझे नहीं पता कि जब वह बोलते हैं तो किस तरह की भावना हावी हो जाती है। वह जो कहते हैं उसे कोई नहीं समझता। मुझे लगता है कि यह महात्मा गांधी की आत्मा है जो उन्हें बार-बार कांग्रेस को खत्म करने के लिए कहती है।’ उन्होंने सवाल किया कि यह कैसी ‘न्याय यात्रा’ है। उन्होंने पूछा, ‘क्या आप यह उन लाखों लोगों को न्याय देने के लिए कर रहे हैं जो आपके पूर्वजों द्वारा देश के विभाजन के कारण मारे गए, उन लोगों को जो भोपाल गैस रिसाव की घटना में मारे गए, या उन सिखों को जो 1984 के दंगों में मारे गए?’ भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ऐसे नेताओं की एक लंबी सूची है जिन्होंने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि उन्हें पार्टी में न्याय नहीं मिला। अब, मिलिंद देवरा ने भी कांग्रेस छोड़ दी है।’ ठाकुर ने कहा, ‘कांग्रेस की न्याय यात्रा एक धोखा है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी लोगों को न्याय देने की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस नेता खुद न्याय से वंचित हैं।’गौतम ने कहा, ‘वे सभी उनसे न्याय की मांग कर रहे हैं।’ भाजपा नेता ने दावा किया कि कांग्रेस का पूरा प्रयास यह रहता है कि मां और बेटे को न्याय मिले और गांधी किसी भी तरह आगे बढ़ें।

क्या अब भारत की दृष्टि से बचेगा पाकिस्तान?

अब पाकिस्तान का भारत की दृष्टि से बचना मुश्किल होगा! भारत ने पाकिस्‍तान की हर नापाक हरकत पर नजर रखने का बंदोबस्‍त कर लिया है। इसके लिए आदमी नहीं, टेक्‍नोलॉजी का काम करेगी। भारतीय सेना ने पंजाब सेक्‍टर में फॉरवर्ड बेस पर मध्यम-ऊंचाई और लंबे समय तक टिकने वाले ड्रोनों को तैनात करने का फैसला किया है। इनका नाम दृष्टि-10 है। इन्‍हें जल्‍द ही काम पर लगाने की तैयारी है। इन ड्रोन से भारतीय सेना की सर्विलांस क्षमता को बढ़ावा मिलने की उम्‍मीद है। भारत के सामने सुरक्षा के लिहाज से इस समय पाकिस्‍तान और चीन के रूप में दोहरी चुनौती है। यही कारण है कि सेना सुरक्षा तैयारियों में किसी भी तरह की कमी नहीं छोड़ना चाहती है। भारतीय फर्म एडडिफेंस की ओर से इन ड्रोन को अगले दो से तीन महीनों में बल में शामिल किए जाने की उम्मीद है। भारतीय सेना ने इमरजेंसी प्रावधानों के तहत फर्म से इनमें से दो ड्रोन के लिए ऑर्डर दिए हैं। इन प्रावधानों के अनुसार, विक्रेताओं की ओर से आपूर्ति की जाने वाली प्रणालियां 60 फीसदी से ज्‍यादा स्वदेशी होनी चाहिए। इन्‍हें डिफेंस में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत होना चाहिए।

सैन्य अधिकारियों ने बताया कि भारतीय सेना की इन ड्रोनों को पंजाब सेक्टर में तैनात करने की योजना है। इससे सेना रेगिस्तानी सेक्टर के साथ पंजाब के उत्तर के इलाकों सहित एक बड़े क्षेत्र पर नजर रख सकती है। भारतीय सेना पहले से ही हेरॉन मार्क 1 और मार्क 2 ड्रोन ऑपरेट कर रही है। उसने बलों के लिए सरकार से अनुमोदित आपातकालीन खरीद की अंतिम किश्त के तहत दृष्टि-10 या हर्मीस-900 ड्रोन के लिए ऑर्डर भी दिए हैं।

अडानी डिफेंस ने ड्रोनों के लिए टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर इजरायली फर्म एल्बिट के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। भारतीय कंपनी ने कहा था कि उसने 70 फीसदी तक इनका स्‍वदेशीकरण कर लिया है। इसे और बढ़ाने के लिए वह और काम करेगी। भारतीय सेना ने इजरायल से और ज्‍यादा सैटेलाइट-इनेबल्‍ड ड्रोनों को भी शामिल किया है। उसके पास इजरायली विमान उद्योगों के साथ सीधे सौदे में खरीदे गए कुछ हेरॉन मार्क 2 ड्रोन पहले से हैं।

भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार और महानिदेशक आर्मी एविएशन लेफ्टिनेंट जनरल अजय सूरी ने ड्रोनों का अनावरण इस सप्ताह की शुरुआत में हैदराबाद में किया था। भारतीय नौसेना इन्‍हें पाकिस्तान के साथ समुद्री सीमा के अलावा ऊंचे समंदरों पर नजर रखने के लिए पोरबंदर में तैनात करने जा रही है। इसका कारण यह है कि इनमें 30 घंटे से ज्‍यादा समय तक उड़ान भरने और एक बार में लगभग 2,000 किमी की दूरी तय करने की क्षमता है।

बता दे कि अडाणी ग्रुप की कंपनी ने भारतीय नौसेना के लिए ड्रोन स्वदेशी ड्रोन बनाया है। इस स्वदेशी ड्रोन का नाम UAV दृष्टि-10 रखा गया है। ये स्टारलाइनर ड्रोन है, जिसे आज अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने भारतीय नौसेना को सौंप दिया। इस स्वदेशी ड्रोन के शामिल होने के बाद भारतीय नौसेना का ताकत और ज्यादा बढ़ गई है। स्वदेशी तकनीक पर आधारित ये ड्रोन काफी एडवांस है। बुधवार को हैदराबाद में फ्लैगऑफ कार्यक्रम में नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने ड्रोन का अनावरण किया। UAV दृष्टि-10 ड्रोन किस तरह से नौसेना की ताकत बढ़ाएगा आइए बताते हैं। हैदराबाद में फ्लैगऑफ कार्यक्रम में नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार ने भारतीय नौसेना की जरूरतों के साथ अपने रोडमैप को बताया। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए अडाणी ग्रुप की सराहना की। नौसेना प्रमुख ने कहा, ‘यह ISR टेक्नॉलजी और समुद्री वर्चस्व में आत्मनिर्भरता की ओर एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। अडाणी ग्रुप ने न केवल मैन्युफेक्चरिंग में बल्कि ड्रोन के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल में भी मदद की है। हमारे नौसैनिक अभियानों में दृष्टि-10 का एकीकरण हमारी क्षमताओं को बढ़ाएगा, समुद्री निगरानी में ये ड्रोन हमारी मदद करेगा।’

अडानी एंटरप्राइजेज से जुड़े जीत अडानी ने हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं के मद्देनजर खुफिया, निगरानी और टोही प्लेटफार्मों के बढ़ते महत्व पर जोर दिया। उन्होंने प्रभावी सूचवा प्रसार के लिए खुफिया तंत्र,बेहतर कम्युनिकेशन, ड्रोन जैसी मानव रहित तकनीक और साइबर टेक्नॉलजी की जरूरत पर जोर दिया। दिया। वहीं अडाणी ने कहा कि वह भारतीय सुरक्षा बलों की जरूरतों को पूरा करने और भारत को वैश्विक निर्यातक के रूप में स्थान देने के लिए तीनों सेनाओं और सीमा पर तैनात सुरक्षाबलो के लिए खुफिया और निगरानी के लिए प्लेटफॉर्म के विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने कहा, हमें भारतीय नौसेना की सेवा करने और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने पर गर्व है’।

आखिर राम मंदिर क्यों नहीं जा रही कांग्रेस?

कांग्रेस राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में नहीं जा रही है! अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के निमंत्रण को ठुकराते हुए कांग्रेस ने 22 जनवरी को वहां जाने से इनकार कर दिया है। निमंत्रण, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के अलावा सोनिया गांधी और अधीर रंजन चौधरी को मिला था। लेकिन, पार्टी ने इसे BJP-RSS का कार्यक्रम बता दिया। कई अन्य विपक्षी नेताओं ने भी निमंत्रण के बावजूद कार्यक्रम से दूरी बना ली है। इसके बाद यह बड़ा सवाल सामने है कि कांग्रेस और विपक्ष के अधिकतर नेताओं ने यह सियासी जोखिम क्यों लिया? क्या है इसके पीछे उनकी रणनीति? आम चुनाव में वे इसे किस तरह काउंटर करेंगे‌? राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में नहीं जाना सियासी जोखिम भरा फैसला माना जा रहा है। जानकारों के अनुसार, पार्टी आगे किस तरह के संदेश देगी, यह इस पर तय करेगा कि जोखिम कितना होगा। कांग्रेस का कहना है कि 22 जनवरी के कार्यक्रम से भले वह अलग रहेगी लेकिन उससे पहले और उसके बाद पार्टी के तमाम नेता राम मंदिर दर्शन करने जरूर जाएंगे। पार्टी सूत्रों का दावा है कि आम चुनाव से पहले तमाम नेता वहां एक बार जाएंगे। ऐसी भी चर्चा है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वह राम मंदिर भी जा सकते हैं। लेकिन, चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख के अनुसार, इसमें जोखिम तो है। उन्होंने कहा कि पिछले कई मौकों पर हम देख चुके हैं कि विपक्षी दल जनमानस की नब्ज समझने में या तो विफल रहे या इसमें देरी की। वे बालाकोट स्ट्राइक पर भी चूक गए। उन्होंने कहा कि राम मंदिर ऐसा मुद्दा है जो BJP को फायदा पहुंचाएगी, जिसके जवाब में कम से कम अभी विपक्ष के पास कोई कारगर रणनीति नहीं दिखती है।

कांग्रेस नेताओं का दावा है कि इस कदम से कोई सियासी नुकसान नहीं होगा। पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा NBT से कहते हैं कि पार्टी ने मंदिर जाने से इनकार ही कब किया है? पार्टी ने बस BJP-RSS के कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार किया है। वह दावा करते हैं कि इससे उलटे उन्हें समर्थन ही मिलेगा कि उन्होंने धर्म में राजनीति करने की मंशा नहीं दिखाई। हालांकि पार्टी के अंदर इसे लेकर बेचैनी तो है। पार्टी को यह जरूर लगता है कि दक्षिण में इसका कोई असर नहीं होगा, जहां वह इस बार पूरी ताकत झोंक रही है, लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्र में आने वाले दिनों में अपनी बात को सावधानी से रखना होगा। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के अलग-अलग नेताओं को राम मंदिर पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से परहेज करने को कहा गया है।

अब यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्ष खासकर सॉफ्ट हिंदुत्व के एप्रोच को बदलकर सेकुलर राजनीति को अपनाने की ओर बढ़ेगा? यह सवाल इसलिए क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से इस मसले पर कांग्रेस का एप्रोच उलझन भरा रहा है। दरअसल, 2014 से लेकर अब तक कांग्रेस ने कई प्रयोग किए लेकिन अब तक इन मुद्दों की काट खोजने में सफलता नहीं मिली। 2014 के बाद जब कांग्रेस ने करारी हार के बाद एके एंटोनी के नेतृत्व में इसकी समीक्षा की तो पाया था कि हिंदू में बड़ा तबका ऐसा महसूस कर रहा है कि कांग्रेस बहुत हद तक उनके हितों को अनदेखा करता है और पूरा फोकस अल्पसंख्यकों पर रखता है। रिपोर्ट में कहा गया कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया और हिंदुओं का बड़ा तबका उनके साथ आया। सुधार करते हुए एंटोनी कमिटी ने सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर लौटने की सलाह दी थी। लेकिन छिटपुट मौकों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियां इस धारणा को बदलने में विफल रहीं। राष्ट्रवाद का मुद्दा इसमें शामिल होने के बाद तो विपक्ष और बैकफुट पर चला गया। बीच में जहां कांग्रेस की सरकारें बनीं, मसलन छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल हों, या राजस्थान में अशोक गहलोत की अगुवाई वाली सरकार, वहां पार्टी ने खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रयोग किया। लेकिन तब भी पार्टी के अंदर इस मसले पर दो तरह की राय थी। कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने एनबीटी को दिए इंटरव्यू में कहा गया था- सॉफ्ट हिंदुत्व क्या होता है? सॉफ्ट या हार्ड हिंदुत्व जैसी कोई चीज नहीं होती है। हम धर्मनिरपेक्ष देश में हैं, जहां संविधान हर नागरिक को समान अधिकार की बात करता है। कांग्रेस बस इसी संविधान को मानती है और इसी अनुरूप चलती है। सभी को सम्मान, सभी को हक और सभी को सुरक्षा का अहसास दिलाना हमारा दायित्व है। हम असल मायने में सेकुलर हैं। पूजा करना सभी की आस्था है। मैं भी हिंदू हूं। पूजा करता हूं। इसका मतलब नहीं है कि मैं आरएसएस के हिंदुत्व को स्वीकार करूं। धर्मनिरपेक्षता ही हमारा रास्ता है। वहीं अयोध्या मसले पर भी पार्टी के आधिकारिक स्टैंड के इतर कुछ नेताओं ने राय दी। मतलब पिछले कुछ वर्षों से सॉफ्ट हिंदुत्व के मसले पर जो कांग्रेस के अंदर उलझन और दो राय थी, इस बार वह मजबूती से सामने आई है।

कोर्ट का आदेश और खुल गया था बाबरी मस्जिद का ताला!

एक ऐसा समय भी था जब कोर्ट का आदेश आया और खुल गया था बाबरी मस्जिद का ताला! अयोध्या पर आज कहा जा रहा है कि राजनीति हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अयोध्या को राजनीतिक एजेंडे के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन, अयोध्या पर राजनीति कब नहीं हुई? यह कोई दावे के साथ नहीं सकता है। राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के लिए मुगल शासक बाबर ने अपने सिपहसालार मीरबाकी के जरिए मंदिर गिरवाई। मस्जिद बनवाया। वह भी तो एक राजनीतिक प्रपंच ही था। अंग्रेजों ने बांटवारा कर भारतीय समाज को दो भागों में बांटा। लोगों को बांटकर 200 सालों तक राज करते रहे। जाते- जाते देश के दो टुकड़े कर गए। तो क्या उसे राजनीतिक नहीं कहेंगे। 1949 में मस्जिद में जब रामलला प्रगट हुए तो उन्हें दोबारा चबूतरे तक लाने में देश- प्रदेश की सत्ता के पसीने छूट गए। तब क्या मुद्दा राजनीतिक नहीं था। लेकिन, धर्म और राजनीति का जो खेल 1984 में शुरू हुआ, वह अलग था। मैं अयोध्या हूं और मैं आपको आज 1986 का प्रभु रामलला के दर पर लगे ताला खुलने की उस कहानी को सुनती हूं। सुनिए और विचार कीजिए कि क्या बिना राजनीति के इस कार्य को पूरा कराया गया। देश में नई गठित भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक मौके जैसा था। उसने कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व को आधार बनाकर हिंदुत्व की विचारधारा की ऐसी राजनीति की कि अगले 30 सालों में पार्टी ने देश में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। 22- 23 दिसंबर की रात बाबरी मस्जिद परिसर में रामलला के प्रगट होने के बाद विवाद गहरा गया था। फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी परिसर में रामलला और उनके परिजनों की मूर्ति मिलने के बाद वहां ताला लगवाने का आदेश जारी किया। निचली अदालत के आदेश के खिलाफ बार- बार अपील की जाती रही, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही थी। लेकिन, 1986 में मेरे राम ने अलग ही लीला दिखाई। स्थानीय वकील उमेश चंद्र पांडेय की ओर से एक याचिका दायर की गई। इसमें रामलला का ताला खुलवाने और पूजा की मांग की गई। एक इंटरव्यू में वकील उमेश चंद्र पांडेय ने कहा है कि 1984 में अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद का राम मंदिर निर्माण को लेकर पहला सम्मेलन हुआ। उस समय वकालत के साथ उमेश पत्रकारिता से जुड़े थे। वे भी इसे कवर करने पहुंचे थे।

विश्व हिंदू परिषद के मंच से राम मंदिर को लेकर कई दावे किए गए। इसी क्रम में जस्टिस एसएन काटजू की ओर से कहा गया कि पूजा स्थल पर ताला लगाने का कोई प्रशासनिक आदेश नहीं है। इसके बाद उमेश चंद्र ने रिकॉर्ड खोजना शुरू किया। उन्हें कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिसमें पूजा स्थल पर ताला लगाए जाने का आदेश हो। पूरी पड़ताल करने के बाद 25 जनवरी 1986 को उमेश चंद्र ने फैजाबाद सिविल कोर्ट में सदर मुंसिफ के सामने ताला खुलवाने की अर्जी दायर की। सदर मुंसिफ ने कोई आदेश जारी नहीं किया। अर्जी पर कहा गया कि इस मामले के सभी दस्तावेज हाई कोर्ट के पास हैं।

28 जनवरी 1986 को सदर मुंसिफ के आदेश पर उमेश चंद्र ने जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट में अपील दायर की। 31 जनवरी 1986 को जिला जज पूरे दिन इस याचिका पर अर्जेंट सुनवाई की। उमेश चंद्र ने कोर्ट से साफ कहा कि उनकी यह अपील प्रशासन के खिलाफ है। वह मुस्लिम पक्ष के खिलाफ नहीं हैं। एक फरवरी को सुनवाई की अगली तारीख दी गई। डीएम इंदु प्रकाश पांडेय और एसपी करमवीर सिंह कोर्ट में तलब किए गए। डीएम और एसपी दोनों ने अदालत में हाजिर हुए। उन्होंने कहा कि हमें ताला खुलने से कोई ऐतराज नहीं है। ताला खुलने से लॉ एंड ऑर्डर को किसी प्रकार का खतरा नहीं होने का दावा किया गया। जिला जज केएम पांडेय की कोर्ट ने दोनों को सुनने के बाद ताला खोलने का आदेश दे दिया।

जिला जज केएम पांडेय के आदेश का त्वरित पालन कराया गया। आजाद भारत में कोर्ट के आदेश का इस तेजी से पालन का यह पहला मामला था। दरअसल, 1 फरवरी 1986 की शाम 4:40 बजे अदालत का फैसला आया। शाम 5:20 बजे विवादित परिसर का ताला खुल चुका था। दरअसल, अदालत का आदेश जारी होते ही सभी पक्ष बाबरी परिसर पहुंच गया। वहां ताला खोलने की कोशिश शुरू हुई। ताला इतना पुराना था कि खुलना संभव नहीं था। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में ताले को तोड़ दिया गया। इसके बाद से आंगन के अंदर प्रवेश कर पूजा की स्थिति बन गई। विश्व हिंदू परिषद की रथयात्रा भी अयोध्या की सीमा में 1 फरवरी को पहुंच रही थी। ताला खुलवाने को यह रथ यात्रा निकली थी। मकसद पूरा होते ही इस रथ यात्रा को विजय रथ यात्रा का नाम दे दिया गया। तमाम रिपोर्ट्स दावा करती है कि कोर्ट के फैसले के अनुपालन के बाद अयोध्या में कोई हलचल नहीं हुई थी। सबकुछ सामान्य था।

सीनियर पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में इस घटना का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वीर बहादुर सिंह से मेरी इस मुद्दे पर उनकी लंबी चर्चा हुई थी। पूर्व सीएम के मुताबिक राजीव गांधी के परामर्श से अरुण नेहरू पूरे मामले का संचालन कर रहे थे। सीएम वीर बहादुर सिंह से कहा गया था कि कोर्ट में सरकार कोई हलफनामा न दे। फैजाबाद के डीएम और एसपी को कोर्ट में हाजिर होकर कहने का आदेश था कि अगर ताला खुला तो प्रशासन को कोई ऐतराज नहीं होगा। हालांकि, कोर्ट के आदेश के एक सप्ताह के भीतर हाशिम अंसारी ने कोर्ट में ताला खुलवाने के आदेश को चुनौती दी। कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया।

मेरे लिए कोर्ट का यह आदेश खुशियां लाने वाला था। मेरे प्रभु रामलला ताला तोड़कर बाहर निकल आए थे। भक्त अब उनकी पूजा करने का कानूनी अधिकार हासिल कर चुके थे। हालांकि, राजीव गांधी सरकार और यूपी की वीर बहादुर सिंह की सरकार ने जिस तेजी से आदेश का पालन कराया, यह चौंकाने वाला था। इसके पीछे के कारणों पर आज भी बहस होती है। एक वर्ग का दावा है कि विश्व हिंदू परिषद के हिंदुत्व एजेंडे को काटने के लिए यह कदम उठाया गया। 1949 में अयोध्या डीएम के सुझाव पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और यूपी की गोविंद बल्लभ पंत सरकार ने जिस बाबरी मस्जिद में फेंसिंग करने और श्रद्धालुओं को रामलला के निकट न जाने के लिए पर्याप्त उपाय किए थे।

राजीव गांधी सरकार ने इस मामले में बड़ा निर्णय लिया। राजीव सरकार ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर प्रभु रामलला की पूजा को लेकर काम शुरू कर दिया गया। दरअसल, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को सबसे बड़ी जीत मिली। पार्टी 404 सीटों पर लोकसभा चुनाव 1984 के चुनाव में जीती थी। बावजूद इसके कांग्रेस के प्रति असंतोष बढ़ रहा था। हालांकि, वर्ष 1986 की इस घटना को राजनीतिक रूप से राजीव गांधी की सबसे बड़ी भूल के रूप में देखा जामा है। इस निर्णय के बाद देश में कांग्रेस के जनाधार में लगातार गिरावट आई। पार्टी कभी भी इस निर्णय के बाद पूर्ण बहुमत हासिल करने में अब तक सफल नहीं हो पाई।

राजीव गांधी ने वर्ष 1989 में राम मंदिर को लेकर बड़ा निर्णय लिया। यूपी के पूर्व सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाकर उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवा दिए थे। इसके बाद हिंदुओं को प्रभु रामलला के दर्शन का मौका मिला। शाहबानो केस में घिरे राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे। हिंदू वर्ग में उनके खिलाफ माहौल बन रहा था। इसके अलावा कई घोटालों के आरोप भी राजीव सरकार पर लगने लगे थे। ऐसे में राजीव गांधी ने लोकसभा चुनाव 1989 के भाषणों में अक्सर देश में रामराज लाने का वादा किया। 1989 प्रयाग कुंभ के बाद विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण पर आंदोलन को तेज किया। परिषद की ओर से 9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। इस पर काफी विवाद और खींचतान मची।

रामराज लाने का चुनावी वादा करने वाले राजीव सरकार के सामने कोई ऑप्शन नहीं था। वह हिंदुओं को नाराज नहीं करना चाहते थे। राजीव सरकार ने विश्व हिंदू परिषद को मंदिर के शिलान्यास की इजाजत दे दी। तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को उन्होंने शिलान्यास कार्यक्रम में भेजा। विश्व हिंदू परिषद की ओर से बिहार के रहने वाले कामेश्वर चौपाल से शिलान्यास कराया गया। राम मंदिर आंदोलन का यह एक अहम पड़ाव था। कई राजनीतिक विश्लेषक दाव करते हैं कि राजीव पर भगवान राम का असर था। भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि अगर 1989 में राजीव सरकार बनती तो निश्चित तौर पर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती।

हूतियों के लिए क्यों चुप है भारत?

वर्तमान में भारत हूतियों के लिए चुप्पी साधे हुआ है! साल 2023 खत्‍म होने के करीब था। तभी अरब सागर में भारत के पश्चिमी तट पर मालवाहक जहाज एमसी केम प्लूटो पर ड्रोन हमले ने हलचल बढ़ा दी। इसके बाद भारत ने यहां तीन युद्धपोत तैनात कर दिए। इस बीच लाल सागर में भारतीय झंडा लगे एक दूसरे जहाज एमवी साईं बाबा पर एकतरफा ड्रोन हमला हुआ। अमेरिका ने दावा किया कि दोनों ड्रोन ईरान से दागे गए। दूसरी तरफ ईरान ने इस आरोप को बेबुनियाद बताया। बेशक, भारत ने अब तक यही माना है कि हमलों के अपराधियों की पहचान नहीं हुई है। लेकिन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह यह भी कह चुके हैं कि व्‍यापारी जहाजों पर हमलों को अंजाम देने वालों को पाताल से भी खोजकर निकाल लाया जाएगा। उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। दोनों व्‍यापारी जहाजों पर हुए हमलों ने भारत की तेल सुरक्षा के महत्व को उजागर किया है। लाल सागर उन दो मार्गों में से एक है जो भारत की तेल आपूर्ति को सुनिश्‍चित करता है। दूसरा मार्ग फारस की खाड़ी है। लाल सागर में हूतियों के हमलों और अब फारस की खाड़ी में ड्रोन हमलों ने दुनिया की सबसे व्यस्त शिपिंग लाइन की कमजोरी को खोल दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी मर्स्‍क ने अगली सूचना तक लाल सागर के जरिये सभी कंटेनर शिपमेंट को रोक दिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत हिंद महासागर में एक क्षेत्रीय शक्ति है। वह क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता है। इस प्रकार उसे यह सुनिश्चित करना है कि समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रहें। यह सही है कि भारत क्षेत्र में व्यापार के समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने की बात करता है। लेकिन, अपने घोषित उद्देश्य के बावजूद वह लाल सागर में सुरक्षा चुनौतियों का समाधान और नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाली समुद्री सुरक्षा पहल ‘ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्डियन’ में शामिल नहीं हुआ।

इसके दो कारण हैं। एक, लंबे समय से चली आ रही गुटनिरपेक्ष विदेश नीति के रुख को देखते हुए भारत हमेशा किसी भी गठबंधन में शामिल होने से सावधान रहा है। फिर अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन की तो बात ही छोड़ दें। अमेरिका-भारत के बीच रिश्‍ते 2008 से लेकर 2022 तक तेजी से फले-फूले हैं। इस दौर में ऐतिहासिक अमेरिका-भारत नागरिक परमाणु समझौते को अंतिम रूप दिया गया तो दोनों के बीच कई तरह की टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर आपसी सहमति बनी। हालांकि, पिछले कुछ समय में स्थिति थोड़ी बदली है। नवंबर 2023 में भारतीय नागरिक पर अमेरिकी धरती पर एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। इसने आपसी रिश्‍तों में कुछ जटिलताएं पैदा की हैं। तब से अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने गणतंत्र दिवस समारोह और क्‍वाड शिखर सम्मेलन 2024 के लिए भारत आने का न्‍योता ठुकराया है। शिखर सम्‍मेलन लगातार दूसरे साल भी संकट में दिख रहा है।

दूसरा कारण ईरान के साथ भारत के अपने रिश्ते हैं। साथ ही अतीत में ईरान के प्रति अमेरिकी पॉलिसी से मिले सबक भी। 2018 में संयुक्त व्यापक कार्य योजना जेसीपीओए से बाहर निकलने के बाद भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन किया था। ऐसा करते हुए उसने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया था। प्रतिबंध से पहले भारत ने 2 करोड़ 35 लाख टन ईरानी क्रूड ऑयल का आयात किया था। यह उसकी 2018-19 की कुल जरूरत का लगभग दसवां हिस्सा था। यही नहीं, भारत ने इसे काफी आकर्षक शर्तों और छूट पर आयात किया था।

जैसे ही भारत ने ईरानी तेल खरीद में कटौती की चीन ने इसका फायदा उठाया। भारत का रणनीतिक प्रतिस्पर्धी और दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड आयातक चीन ईरान का नंबर-1 ग्राहक बन गया। 2020 और 2023 के बीच अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का चीन को ऑयल शिपमेंट तीन गुना से ज्‍यादा हो गया। जबकि इस सबक ने यह सुनिश्चित किया कि भारत यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों पर पश्चिम को फॉलो नहीं करेगा। लेकिन, मिड‍िल ईस्‍ट में तनाव अब भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को खतरे में डाल रहे हैं। खासकर ईरान के साथ। यही कारण है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ईरान का दौरा कर रहे हैं।

भारत ईरान में अपना निवेश बढ़ा रहा है। चाबहार बंदरगाह उसकी दिलचस्‍पी का एक प्रमुख केंद्र है, जहां सालों की मध्यस्थता के बाद भारत भू-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह में एक टर्मिनल विकसित करने के लिए बहु-वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहता है। यह मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है।

यह दिलचस्‍पी भी एकतरफा नहीं है। ईरान भी भारत के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को पुनर्जीवित करने का इच्छुक है। खासकर तब जब भारत बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ कच्‍चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक और उपभोक्ता बन गया है। ओपेक ने 2024 की पहली तिमाही के लिए तेल पर कटौती पर भी जोर दिया है। इसे देखते हुए भारतीय रिफाइनर अपनी तेल आपूर्ति में और विविधता लाएंगे। इससे नई दिल्ली और तेहरान को आपसी संबंधों को मजबूत करने में बढ़ावा मिलेगा।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारत की घरेलू राजनीति पर काफी असर पड़ता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से घरेलू ईंधन की लागत बढ़ जाती है। इसका असर बड़े पैमाने पर निम्न-आय वर्ग पर पड़ेगा। यह बदले में 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। इस तरह हमलों में ईरान का हाथ होने के अमेरिकी दावों से भारत का सहमत न होना न सिर्फ क्षेत्र में बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी उसके आर्थिक और रणनीतिक हितों से गहराई से जुड़ा है। इसके अलावा इस मामले पर अपनी विदेश नीति की स्थिति बनाए रखना रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दिखाता है। यह उन लोगों के लिए भी एक रिमाइंडर है जो दुनिया को द्विध्रुवीय लेंस के जरिये देखते हैं। इस विचार के उलट अब एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था उभर रही है, जो मूल्यों से ज्‍यादा हितों पर आधारित होगी।

जब लाल कृष्ण आडवाणी लाए राम रथ यात्रा!

एक समय ऐसा था जब लाल कृष्ण आडवाणी राम रथ यात्रा लेकर आए थे! देश में 1989 आते- आते हिंदुत्व की राजनीति ने विस्तार लेना शुरू कर दिया था। विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के मुद्दे को लगातार उठा रही थी। वहीं, भारतीय जनता पार्टी देश की राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रही थी। राजीव गांधी हिंदुत्व की राजनीति के जरिए देश में भारतीय जनता पार्टी के उभार रोकने की कोशिश में जुटे हुए थे। ऐसे में मेरे प्रभु रामललला देश की राजनीति का एक मुद्दा बन चुके थे। विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को उठाकर हिंदू वर्ग को जगाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन, इस मुद्दे से लोगों की भावना जुड़ नहीं पा रही थी। 1985 में रामायण के प्रसारण की योजना और फिर 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश ने हिंदुओं के भीतर राम मंदिर मुद्दे की चर्चा शुरू की। 1989 में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति देकर राजीव गांधी सरकार ने इस मुद्दे से हिंदू वर्ग को जोड़ दिया। हालांकि, 1984 के चुनाव में रिकॉर्ड जीत करने वाले राजीव गांधी वर्ष 1989 आते- आते अलोकप्रिय हो गए थे। उन पर बोफोर्स घोटाले का दाग लग चुका था। उनके मंत्रिमंडल सहयोगी विश्वनाथ प्रताप सिंह उनके खिलाफ खड़े हो चुके थे। ऐसे में कांग्रेस हिंदुत्व के मध्यमार्ग को अपनाने की कोशिश करती दिखी। यहीं पर भाजपा को राह दिखी। पार्टी ने राम मंदिर को हिंदुओं का हक बताना शुरू किया। फिर, भाजपा ने इस मुद्दे को ऐसा पकड़ा, जिसने उसे देश की राजनीति में स्थापित कर दिया। सोमनाथ से दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या राम मंदिर निर्माण के रथ पर सवार हुए तो इसके सारथी की भूमिका नरेंद्र मोदी को दी गई। अगले ढाई दशक बाद 2014 में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। मोदी सारथी से देश के प्रधानमंत्री बने। मैं अयोध्या हूं। आज मैं अपने प्रभु रामलला के आंदोलन के इस महत्वपूर्ण मोड़ की कहानी सुनाती हूं। मैंने राम मंदिर के विध्वंस के बाद से पांच शताब्दियां देखी। कई राजाओं के शासन देखे। अंग्रेजों की गुलामी को झेला। आजाद भारत की सरकारों के बदलते रंग देखे। लेकिन, मेरे प्रभु रामलला के मंदिर को लेकर अगर सबसे महत्वपूर्ण काल को पूछें तो वह वर्ष 1989 था। मंदिर की मांग को लेकर लगातार मांगें सदियों से चल रही थी। लेकिन, भावनाओं को आकार 1989 में ही मिला। हिंदुओं की भावनाओं को जागृत होती देख विश्व हिंदू परिषद ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया। राजीव गांधी लोकसभा चुनाव में जा रहे थे। अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की उस मांग को मान लिया, जिस पर कोई सुनवाई पिछली पांच शताब्दियों से नहीं हो पा रही थी। प्रयाग कुंभ 1989 में हिंदू संतों ने एक मत से राम मंदिर के निर्माण और शिलान्यास का प्रस्ताव पास किया। 9 नवंबर 1989 को शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा की गई। इसी माह में लोकसभा चुनाव होने थे। राजीव गांधी सरकार ने पहले इस कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की।

विश्व हिंदू परिषद के नेताओं को मनाने की कोशिश की गई। लेकिन, वीएचपी इस निर्णय से पीछे हटने को तैयार नहीं थी। वीएचपी की ओर से कहा गया कि रामलला पांच शताब्दियों से बिना मंदिर के रह रहे हैं। अब हिंदू अपने आराध्य का मंदिर चाहते हैं। वीएचपी ने चुनावी रैलियों में रामराज लाने का वादा करने वाले राजीव गांधी को घेरना शुरू किया। इसके बाद राजीव गांधी के सामने विकल्प नहीं बचा। उन्हें हिंदू वोट बैंक छिटकता दिखा। उन्होंने बाबरी परिसर में राम मंदिर के निर्माण के शिलान्यास कार्यक्रम की इजाजत दे दी। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह इस कार्यक्रम में पहुंचे। मेरे प्रभु रामलला के मंदिर की नींव वीएचपी कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल ने रखी। उस दिन इतना तो तय हो गया कि अब मेरे प्रभु रामलला का मंदिर यहां बनना तय है। वक्त बदलना था।

राम मंदिर का शिलान्यास होने के बाद देश में आम चुनावों की वोटिंग हुई। 22 और 26 नवंबर 1989 को हुई वोटिंग में देश ने एक अलग राजनीतिक लाइन तैयार कर दी। इस चुनाव में कांग्रेस भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन राजीव गांधी लोकसभा में बहुमत के आंकड़े से पिछड़ गए। दरअसल, बोफोर्स घोटाला और पंजाब में बढ़ते आतंकवाद की वजह से राजीव गांधी सरकार की खूब आलोचना हो रही थी। राजीव सरकार में विश्वनाथ प्रताप सिंह वित्त और रक्षा मंत्री थे। वही राजीव गांधी के सबसे बड़े आलोचक हो गए। जनता दल का दामन था। इस चुनाव को भले ही राजीव और कांग्रेस विरोध के नाम पर लड़ा गया, लेकिन भाजपा की नजर राम मंदिर मुद्दे पर मुखर रुख अपनाए जाने के परिणाम पर थी। 1980 में गठित हुई भाजपा जब 1984 के चुनाव में पहली बार उतरी तो पार्टी के घोषणापत्र में राम मंदिर नहीं था। लेकिन, 1986 में राम मंदिर का ताला खुलने और राजीव गांधी के राम मंदिर को लेकर लिए गए निर्णयों को भाजपा ने भांपा। खुलकर मंदिर आंदोलन के पक्ष में आ गई। 1989 के चुनाव में भाजपा ने खुलकर अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनवाने की वकालत की।

बहरहाल, लोकसभा के चुनाव हुए। 1984 के चुनाव में 404 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बनाने वाली कांग्रेस महज 197 सीटों पर सिमट गई। दरअसल, इस चुनाव में 531 सीटों पर पहले वोटिंग हुई थी। जनता दल 143 सीटों पर जीत करने में सफल रही। कांग्रेस 39.53 फीसदी वोट शेयर के साथ देश की सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। वहीं, 17.97 फीसदी वोट शेयर हासिल कर जनता दल दूसरे स्थान पर थी। लेकिन, इस चुनाव ने भारतीय जनता पार्टी की रणनीति को बदल कर रख दिया।

केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी। यह एक अनोखी सरकार थी। इस सरकार को भाजपा ने भी समर्थन दिया था और कम्युनिस्ट पार्टी ने भी। हालांकि, पर्दे के पीछे से कांग्रेस का खेल जारी था। जनता दल में सेंधमारी की कोशिश चल रही थी। भाजपा जानती थी कि यह बेमेल गठबंधन अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला है। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी ने वर्ष 1990 में रथ यात्रा का ऐलान कर दिया। सोमनाथ से 25 सितंबर 1990 को रथ यात्रा निकालने की तैयारी शुरू हुई। भाजपा तब सरकार का हिस्सा थी। पीएम वीपी सिंह इस रथ यात्रा के आयोजन को होने नहीं देना चाहते थे। आडवाणी की रथ यात्रा के तात्कालिक कारणों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि उस समय तक विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के मुद्दे को गरमा दिया था।

राम मंदिर को लेकर लोगों में एक प्रकार से भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। विश्व हिंदू परिषद की ओर से 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में कारसेवा की घोषणा कर दी गई थी। विश्व हिंदू परिषद का दावा था कि इस कारसेवा में 40 हजार लोग पहुंचेंगे। गुजरात के सोमनाथ से निकलने वाली आडवाणी की रथ यात्रा विभिन्न राज्यों से होते हुए 30 अक्टूबर के दिन ही अयोध्या पहुंचनी थी। भाजपा की मांग अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत कराने की थी। विश्व हिंदू परिषद की कारसेवा का उद्देश्य यही था।

लालू यादव ने इसके बाद आडवाणी के रथ को सासाराम में रोकने की योजना बनाई। यहां भी अधिकारियों ने इस योजना को लीक कर दिया। लालू दो बार अपने अभियान में फेल हो चुके थे। ऐसे में एक फुलप्रूफ प्लान तैयार किया गया। पटना में बैठे लालू ने समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कराने की योजना बनाई। इस प्लान में कोई गड़बड़ी नहीं हो, इसके लिए उन्होंने अपने स्तर पर पूरी योजना तैयार की। दिन था 23 अक्टूबर। आडवाणी का रथ समस्तीपुर पहुंचा तो इसका भव्य स्वागत किया गया। देर रात तक समस्तीपुर सर्किट हाउस में रथी आडवाणी से मिलने वालों का तांता लगा रहा। लालू की प्लानिंग आडवाणी को रात में गिरफ्तार कराने की थी, ताकि कानून व्यवस्था प्रभावित न हो। लालू ने अधिकारियों को निर्देश दे रखे थे, लेकिन इंतजार करने का भी निर्देश दिया था। सिग्नल लालू की तरफ से आना था।

23 अक्टूबर रात 2 बजे समस्तीपुर सर्किट हाउस का फोन बजा। सर्किट हाउस में आडवाणी के सहयोगी ने फोन उठाया। फोन पर एक पत्रकार ने लालकृष्ण आडवाणी के बारे में जानकारी मांगी। सहयोगी ने कहा कि आडवाणी जी सो रहे हैं। पत्रकार ने सवालिया लहजे में पूछा, वहां सब ठीक तो है? कितने लोग हैं? इस पर उस सहयोगी ने कहा कि सभी लोग जा चुके हैं। आडवाणी जी अभी अकेले विश्राम कर रहे हैं। यह लालू यादव थे, जो पत्रकार बनकर सर्किट हाउस का भेद पता कर रहे थे। लालू को जैसे ही सर्किट हाउस की स्थिति की जानकारी मिली, उन्हें आभास हो गया कि लाइन क्लीयर है। इसके बाद अधिकारियों को सिग्नल गया और आडवाणी गिरफ्तार कर लिए गए।

लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद बवाल मच गया। लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रुक चुकी थी। भारतीय जनता पार्टी ने इसे प्रतिष्ठा का विषय माना। 23 अक्टूबर 1990 को ही भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। इस ऐलान के बाद वीपी सरकार पर संकट के बादल गहरा दिए। वहीं, भाजपा समर्थकों का आक्रोश चरम पर था। राम मंदिर का मुद्दा चिंगारी से आग बन चुकी थी। विश्व हिंदू परिषद के कारसेवा का ऐलान पहले से था। उसे किसी भी स्थिति में नहीं रुकने देने के दावे किए जा रहे थे। बिहार में लालू यादव के कारनामे के बाद जनता पार्टी में उनका कद बड़ा हो गया था। मुलायम सिंह यादव ने भी तब ऐलान कर दिया कि अयोध्या में 30 नवंबर 1990 को प्रस्तावित कार सेवा नहीं होने दी जाएगी। अयोध्या में सुरक्षा ऐसी होगी कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और भाजपा हर हाल में कारसेवा को लेकर तैयार बैठी हुई थी। अब संग्राम तय था।

आखिर मिलिंद देवड़ा ने क्यों छोड़ी कांग्रेस?

हाल ही में कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ दी है! राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से पहले कांग्रेस का एक बड़ा युवा चेहरे ने पार्टी छोड़ दी है। ऐसी अटकलें हैं कि पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा कांग्रेस का दामन छोड़कर एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, कुछ दिन पहले ही देवड़ा ने ऐसी अटकलों को खारिज करते हुए कहा था कि वह कांग्रेस छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं। उन्हें लेकर पहले भी पिछले कुछ साल से जब-तब इस तरह की अटकलें लगती रही हैं। लेकिन इस बार उनकी नाराजगी की वजह मुंबई साउथ लोकसभा सीट पर शिव सेना उद्धव बाल ठाकरे की दावेदारी है। देवड़ा इस सीट को अपनी पारंपरिक सीट मानते हैं और यहां से खुलकर अपनी दावेदारी की है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा अगले हफ्ते से मणिपुर से शुरू होने जा रही है जो 20 मार्च को मुंबई में ही खत्म होगी। इस दौरान अगर देवड़ा पार्टी छोड़ते हैं तो ये कांग्रेस के साथ-साथ राहुल गांधी के लिए भी बड़ा झटका साबित होगा। देवड़ा को गांधी का करीबी माना जाता है। मिलिंद देवड़ा मुंबई साउथ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन इस सीट पर कांग्रेस के सहयोगी उद्धव ठाकरे की अगुआई वाली शिवसेना यूबीटी ने भी दावा ठोक दिया है। महाराष्ट्र में कांग्रेस की एनसीपी और शिवसेना यूबीटी के साथ गठबंधन है। तीनों विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. में भी शामिल हैं। विपक्षी गठबंधन में अभी सीट बंटवारे पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। इसे लेकर बातचीत ही चल रही है कि किस राज्य में कौन सी पार्टी कितने सीटों पर लड़ेगी और किन-किन सीटों पर लड़ेगी। लेकिन देवड़ा की परेशानी ये है कि उद्धव ठाकरे ने हाल ही में मुंबई साउथ के गिरगांव में हुई अपनी रैली में सार्वजनिक तौर पर इस सीट पर अपनी पार्टी का दावा ठोक दिया। इस सीट से शिवसेना यूबीटी के अरविंद सावंत पिछले दो चुनाव से लगातार जीत रहे हैं। दिल्ली में हाल में हुई कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना यूबीटी की मीटिंग में भी इस सीट को लेकर चर्चा हुई थी। माना जा रहा है कि मुंबई साउथ सीट शिवसेना यूबीटी के खाते में जा सकती है।

उद्धव ठाकरे की दावेदारी के बाद मिलिंद देवड़ा ने भी बीते रविवार को मुंबई साउथ लोकसभा सीट पर अपना दावा ठोका था। उन्होंने कहा था कि उनके परिवार ने पिछले 50 वर्षों से इस क्षेत्र की सेवा की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर दो मिनट का एक वीडियो स्टेटमेंट भी जारी किया था। चूंकि सीट शेयरिंग फॉर्म्युले के तहत मुंबई साउथ सीट शिवसेना यूबीटी के खाते में जा सकती है, इसलिए देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने की अटकलों को बल मिला है। माना जा रहा है कि वह एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो सकते हैं और मुंबई साउथ सीट से विपक्षी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार को चुनौती दे सकते हैं। बता दें कि वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर मिलिंद देवड़ा ने लिखा कि ‘आज वह अपनी राजनीतिक यात्रा के अहम अध्याय का अंत कर रहे हैं। मैंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है, साथ ही कांग्रेस पार्टी से अपने परिवार के 55 साल पुराने रिश्ते का भी अंत कर रहा हूं। मैं सभी नेताओं, सहयोगियों और पार्टी कार्यकर्ताओं का उनके इतने सालों के समर्थन के लिए शुक्रगुजार हूं।’ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि मिलिंद देवड़ा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में देवड़ा के शिवसेना के टिकट पर दक्षिण मुंबई सीट से चुनाव लड़ने की भी चर्चाएं हैं। 

गौरतलब है कि मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने की अटकलें बीते कई दिनों से चल रहीं थी। हालांकि उन्होंने इसे अफवाह बताकर कांग्रेस छोड़ने की बात से इनकार किया था। मिलिंद देवड़ा ने ये बात स्वीकार की थी कि वह अपने समर्थकों से चर्चा कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। मिलिंद देवड़ा मुंबई की दक्षिण मुंबई लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन इस बार गठबंधन के तहत शिवसेना यूबीटी दक्षिण मुंबई सीट पर अपनी दावेदारी कर रही है। ऐसे में देवड़ा को अपना टिकट कटने की आशंका थी।

दक्षिण मुंबई सीट पर देवड़ा परिवार का दबदबा रहा है। हालांकि पिछले दो आम चुनाव में शिवसेना के अरविंद सावंत इस सीट से जीत दर्ज कर रहे हैं। यही वजह है कि इस बार भी शिवसेना इस सीट पर अपना दावा जता सकती है और गठबंधन के चलते हो सकता है कि कांग्रेस को यह सीट छोड़नी पड़े। ऐसे में माना जा रहा है कि इसी के चलते देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया है।