Friday, March 6, 2026
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जब 1986 में राम मंदिर का खुलवाया गया था ताला?

1986 में पहली बार राम मंदिर का ताला खुलवाया गया था! राम मंदिर के उद्घाटन की तारीख 22 जनवरी तय है। इस उद्घाटन से पहले कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी बीजेपी में जुबानी जंग चल रही है। कर्नाटक में मंत्री और कांग्रेस नेता ने कहा कि बीजेपी राम मंदिर का श्रेय ले रही है कि जबकि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाने के लिए कदम उठाए थे। लेकिन राम मंदिर के लिए आंदोलन से लेकर रथ यात्रा की शुरुआत में बीजेपी ने बढ़त बनाई थी। कहा जाता है कि, 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने के बाद से राजीव विपक्ष के निशाने पर थे। लोग कांग्रेस सरकार से थोड़े बिदके हुए थे। ऐसे में विरोधियों की आवाज दबाने के लिए राजीव ने 1986 में उस समय के यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाकर अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाने की पहल की थी। 1985 में, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शाह बानो मामले में मुस्लिम धर्मगुरुओं के सामने झुकने का निर्णय लिया था। राजीव ने शीर्ष अदालत के फैसले को पलटते हुए संसद से कानून पास करवा दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि शाह बानो को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने का हक है। राजीव ने शरिया कानून के अनुरूप गुजारा भत्ता व्यवस्था को खत्म करने वाला एक कानून बनाया था। राजीव के इस फैसले का देश में विरोधियों ने काफी निशाना बनाया था।

शाहबानो प्रकरण से विपक्षियों के निशाने पर आए राजीव ने इसके अगले ही साल हिंदुओं को लुभाने का दांव चला। 1985 में ही राजीव गांधी के कहने पर दूरदर्शन पर रामानंद सागर की रामायण का प्रसारण शुरू हुआ था। इसके बाद शाह बानो प्रकरण के बाद राजीव ने हिंदुओं को भी कुछ देने की मंशा से कुछ महीने बाद ही राजीव ने राम मंदिर का ताला खुलवा दिया था। राजीव ने इसके लिए उस समय के यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह को मनाया और राम जन्मभूमि के ताले खुलवाए। राजीव के फैसले से पहले राम मंदिर में पुजारी को साल में केवल एक बार पूजा करने का अधिकार था। 1949 में यहां भगवान राम की मूर्ति स्थापित की गई थी।

हालांकि, राजीव के इस फैसले के बाद भी अयोध्या के समीकरण में कोई खास बदलाव नहीं आया था। बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी और विश्व हिंदू परिषद पहले के तरह अपने मिशन में लगे रहे थे। दूसरी तरफ राजीव के 1986 के फैसले के बाद कई लोगों ने इसे अलग-अलग तरीके से व्याख्या की। हिंदू और मुस्लिम दोनों इस जगह पर अपना दावा कर रहे थे। राजीव के फैसले के बाद लोगों ने इसे हिंदुओं के दावे को पुख्ता बताया। 1989 में चुनावी भाषणों के दौरान राजीव गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि इसपर आम राय बनान की कोशिश जारी है और अयोध्या में ही राम मंदिर बनेगा। सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया था कि अगर 1989 में अगर राजीव गांधी पीएम बन गए होते तो राम मंदिर के लिए प्रयास और तेज हो गए होते। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि 1 फरवरी 1986 को राम जन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाना सही फैसला नहीं था। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि यह सही नहीं था। मुखर्जी ने अपनी किताब The Turbulent Years: 1980-96 में इस बात का जिक्र किया है।

राजीव गांधी ने ही 1989 में विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दी थी। तब देश के तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को भी शिलान्यास में भाग लेने के लिए भेजा गया था। इसके बाद राम मंदिर के लिए पहली ईंट लगाई गई थी। 1991 में राजीव गांधी की लिट्टे के आतंकियों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को उतनी तवज्जो नहीं दी। हालांकि, कांग्रेस पीएम पी वी नरसिम्हा राव के समय में ही बाबरी मस्जिद गिराई गई थी। इसके कुछ समय बाद 1993 में राव सरकार ने विवादित जमीन के अधिग्रहण के लिए एक अध्यादेश लाई थी। इस अध्यादेश को 7 जनवरी 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने मंजूरी दी ती। फिर इसे उस समय के गृह मंत्री एसबी चव्हाण ने लोकसभा में मंजूरी के लिए रखा था। इसके पास होने के बाद इसे अयोध्या एक्ट के नाम से जाना गया था। इस कानून के तहत केंद्र सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन के साथ चारो तरफ 60.70 एकड़ जमीन को अपने कब्जे में ले लिया था। उस समय सरकार की योजना वहां राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं को बनाने की थी।

आखिर नोएडा का वेद वन क्यों बनता जा रहा है गंदावन?

वर्तमान में नोएडा का वेद वन गंदावन बनता जा रहा है! राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में पिछले साल वेद वन पार्क बनाया गया। सनातन संस्कृति और वेदों की थीम पर बने इस पार्क को बनाने के लिए नोएडा अथॉरिटी ने करोड़ों खर्च कर दिए। इस पार्क की खूबसूरती, यहां की थीम, लाइट, फब्बारे सब कुछ शानदार हैं। रात में वेदों का महत्व बताता लाइट शो किसी को भी मोहित करने की ताकत रखता है। लेकिन साल भर पहले बने इस वेद वन पार्क में माहौल बदल गया है। आप यहां जाएंगे तो वेदों से ज्यादा रील्स बनाने वाले दिख जाएंगे। पूरे पार्क में जहां-तहां नंगा नाच करने वाले इन नमूनों के दर्शन आपको हो जाएंगे। अगर आपके साथ बच्चे हैं तो हाथ से उनकी आंख मीचने की नौबत भी आ सकती है। भारतीय संस्कृति और वेदों के महत्व को दर्शाने वाला यह पार्क धीरे-धीरे अश्लीलता और फूहड़पन का अड्डा बनता जा रहा है। योगी जी! जरा इस ओर भी ध्यान दीजिए, वेद वन को बचा लीजिए। पूरे पार्क में न सुरक्षाबल तैनात हैं, न ही मैनेजमेंट के पर्याप्त लोग। इसका फायदा उठा कर आत्ममुग्ध और इंस्टाग्राम की दुनिया में खोए हुए कथित इन्फ्लुएंसर सारी हदें पार कर रहे हैं। जिस पार्क में लोगों को शांति का अनुभव होना चाहिए, वहां परिवार के साथ जाना भी दुश्वार होता जा रहा है। वेद वन पार्क के गेट से एंट्री लेते ही सप्त ऋषियों की मूर्तियां दिख जाएंगी। पार्क में लगी फुलवाड़ी को देखेंगे तो आपको कल्पवृक्ष के पेड़ देखने को मिलेंगे। ये वही कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देवताओं का पेड़ माना जाता है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष निकला। मान्यता ये भी है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा की इच्छा को पूरा करने के लिए इस कल्पवृक्ष को धरती पर लाए थे। ऐसा भी माना जाता है कल्पवृक्ष भगवान कृष्ण का ही अवतार हैं। ऋषियों की तपस्या के प्रतीक कल्पवृक्ष के आगे इस पार्क में फूहड़पन परोसा रहा है। दुख की बात है कि जिन कथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को वेद वन के महत्व के बारे में बताना चाहिए था, वो यहां ‘बंदूक चलेगी रे… बंदूक चलेगी’ पर ठुमका लगा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब पार्क के सेंटर में एक बोर्ड लगाया गया, जिसके आगे ऊंची पेंट पहने तमाम इन्फ्लुएंसर ठुमके लगा रहे थे।

एक और ये रंगारंग कार्यक्रम चल रहा था, तो दूसरी ओर एक 3-4 साल का बच्चा अपनी मां का हाथ पकड़े इसे बड़े गौर से देख रहा था। शायद उसे लगा होगा कि पार्क ऐसे ही रील्स बनाने के लिए होते होंगे। आजादी के नाम पर कुछ भी कैसे चल सकता है? अगर ये शहर का कोई आम पार्क होता तो समझ भी आता, लेकिन जिस पार्क का नाम ‘वेद वन’ हो वहां ये सब कैसे हो सकता है? ये सवाल न सिर्फ मैनेजमेंट के लोगों से नहीं बल्कि समाज से भी है। वेद वन पार्क में चारों वेदों के बोर्ड लगे हैं। उन पर शानदार कारीगरी की गई है। 12 एकड़ में फैला वेद वन सप्तऋषियों के क्षेत्र में बंटा हुआ है। यानी सातों ऋषियों के नाम पर पार्क में छोटे-छोटे स्थान बनाए गए हैं। इनमें कश्यप, भारद्वाज, अत्रि, विश्वामित्र समेत सातों ऋषियों के बारे में जानकारी है। प्राचीन काल में गुरुकुल पद्धति के बारे में भी यहां बेहद खास तरीके से समझाने की कोशिश की गई है। पार्क के सेंटर में एक तालाब बनाया गया है जिसमें फब्बारे चलते हैं। इसके सामने अगस्त्य ऋषि की कलाकृति है। इस पार्क में वो सबकुछ है जो किसी भी व्यक्ति को भारतीय वेद-शास्त्रों और सप्तऋषियों के बारे में पर्याप्त जानकारी दे सके। यहां की हरियाली और सुंदरता भी लाजवाब है। रात में लेजर शो भी चलता है। लेकिन दुख की बात है कि टेक्नॉलजी और संस्कृति के समावेश से बना ये पार्क तेजी से फूहड़पन का अड्डा बनता जा रहा है।

वेद वन पार्क में काम करने वाले एक कर्मचारी ने नाम ने लेने की शर्त पर बताया कि यहां कई लोग बिना टिकट के ही घुस आते हैं। पार्क की दीवारें छोटी हैं, आसपास के लोग इसे फांदकर आसानी से अंदर घुस जाते हैं। दीवारों को ऊंचा करने का प्रस्ताव नोएडा अथॉरिटी के पास लंबित है। सवाल ये है कि जब करोड़ों रुपये के इस पार्क को बनाया जा रहा था तो पहले से दीवारें ऊंची क्यों नहीं की गईं? इस तरह तो पार्क में परिवार के साथ घूमने आने वाले लोगों की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है। पार्क के बाहर खड़े यूपी पुलिस के एक जवान ने बताया कि उनकी ड्यूटी आगे चौराहे पर है। नोएडा अथॉरिटी की तरफ से पुलिस से सुरक्षा नहीं मांगी गई है, इसलिए पार्क में पुलिस बल की तैनाती नहीं है।

वेद वन पार्क में मैनेजमेंट की लापरवाही साफ तौर पर देखी जा सकती है। इसी का नतीजा है कि कुछ नमूने पार्क के अंदर खुलेआम फूहड़पन का प्रदर्शन करने से नहीं चूक रहे। हमें किसी के टैलेंट से दिक्कत नहीं है। अगर अच्छे डांसर हैं तो खूब नाचिए कौन मना कर रहा है? आप नच बलिए जैसे रियलिटी शो में जाइए। नोएडा का नाम रोशन करिए। सबको आप पर नाज होगा, लेकिन ये क्या चल रहा है? क्या आप अपने घर के मंदिर में जूता पहनकर सपना चौधरी के गाने पर ऐसे ही ठुमका लगाते हैं, जैसे यहां लगा रहे हैं?

आप चाहते तो वेद वन जैसे ऐतिहासिक पार्क के महत्व के बारे में बता सकते थे। आर्यभट्ट की खोज पाई के बारे में बता सकते थे। हमारे सूर्य सिद्धांत पर रील्स बना सकते थे। इन सबके बारे में पार्क में दर्शाया गया है लेकिन सेल्फी स्टिक और स्पीकर लेकर आने वाले इन इन्फ्लुएंसर को शायद ये सब पुरानी और बेबुनियादी बातें लगती हैं। उन्हें तो रील्स बनाने से मतलब है। इसमें गलती सोशल मीडिया की नहीं है। सोशल मीडिया तो महज एक माध्यम है। आप इसे जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर कोई सब्जी काटने वाले चाकू से अपनी नाक काट रहा है तो गलती चाकू की नहीं उसकी विक्षिप्त सोच की है। ठीक वैसे ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी है। आप चाहे फूहड़पन कर लो या फिर अपनी संस्कृति को समझने की कोशिश। लेकिन यह बेहद गंभीर मुद्दा है, जो धीरे-धीरे और जटिल बनता जा रहा है। इस पर सरकार और प्रशासन को तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। उससे भी ज्यादा समाज को सोचना होगा कि आखिर कब तक हर गलती को यह सोचकर बर्दाश्त किया जाएगा कि सरकार देख लेगी।

क्या अब भारत का सच्चा साथी बनेगा बांग्लादेश?

बांग्लादेश अब भारत का सच्चा साथी बन सकता है! बांग्लादेश के आम चुनावों में शेख हसीना की ‘अवामी लीग’ ने भारी बहुमत हासिल कर ली है। इसके साथ ही शेख हसीना बांग्लादेश की सत्ता बरकरार रह गई। वो लगातार तीन बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं और चौथी बार भी 299 सीटों के लिए हुए मतदान में 223 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी कर ली। शेख हसीना का बांग्लादेश की सत्ता में लौटना भारत के लिए भी खुशखबरी है। भारत के लिहाज से हसीना की जीत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि मालदीव, नेपाल और तुर्किये जैसे देशों में भारत विरोधी दलों ने सरकार बना ली है। इस कारण भारत का मुखर विरोध करने वाले चीन-पाकिस्तान जैसे देशों की लिस्ट लंबी हो रही थी। शेख हसीना की पहचान भारत समर्थक नेता की है। उन्होंने चुनावों के दौरान भारत के साथ बांग्लादेश की दोस्ती का जिक्र भी किया। पिछले वर्ष नेपाल में राष्ट्रीय चुनाव हुए तो पुष्प दहल कमल ‘प्रचंड’ की कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल कम्यूनिस्ट सेंटर को जीत मिली। प्रचंड ने प्रधानमंत्री बनते ही भारत विरोधी बयान भी दे डाला। उन्होंने भारत से तीन क्षेत्र- लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख वापस लेने का वादा किया। नेपाल सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में कहा गया कि भारत ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा इलाकों पर अतिक्रमण किया है। नई सरकार इन इलाकों को वापस लेने की पूरी कोशिश करेगी। दिलचस्प बात है कि नेपाल की कम्यूनिस्ट सरकार की कम्यूनिस्ट चीन पर एक शब्द नहीं बोली जिसने नेपाल की लंबी-चौड़ी जमीन पर अतिक्रमण कर रखा है। प्रचंड से पहले नेपाल के प्रधानमंत्री रहे केपी शर्मा ओली भी भारत विरोधी बयानों के लिए चर्चा में रहा करते थे। उन्होंने भारत के खिलाफ कई बयान दिए जिनसे भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में तनाव का दौर रहा। हालांकि, चुनावों के वक्त उनका सुर बदल गया था। तब वो भारत-नेपाल के बीच मधुर संबंधों की वकालत करने लगे। लेकिन जब उनकी कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल माओवादी-लेनिनवादी को झटका लगा और ओली सत्ता से दूर हो गए तो फिर भारत के खिलाफ जहर उगलने लगे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि भारत ने नेपाल के चुनावों में दखल दी ताकि सरकार बदल जाए। उनके दावों में कितना दम है, इस बात से ही समझा जा सकता है कि भारत ने एक विरोधी को हटाकर दूसरे विरोधी को ही सत्ता में बिठा दिया। आखिर प्रचंड भी तो भारत विरोधी हैं तो फिर वह ओली की विदाई और प्रचंड को सत्ता में देखना क्यों चाहेगा?

तुर्किये यूं तो भारत से दूर है, उसकी सीमा हमसे नहीं मिलती, लेकिन वैश्विक मंचों पर उसकी कारिस्तानियां तो भारत को प्रभावित करती हैं। तुर्किये में रेसेप तैयप एर्दोगान की जस्टिस एंड डिवेलपमेंट पार्टी जीती तो वहां भारत विरोध की भावनाएं पैदा होने लगीं। एर्दोगान ने न केवल तुर्किये को कट्टरपंथ की राह पर धकेला बल्कि भारत विरोधी नीतियों को खूब हवा दी। भारत ने 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निरस्त किया तो एर्दोगन भारत के खिलाफ आग उगलने लगे। उनके नेतृत्व में तुर्किये ने भारत को हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर घेरने को कोशिशें कीं। यह अलग बात है कि तुर्किये की चीख-चिल्लाहट का भारत पर कोई असर नहीं पड़ा और दुनिया ने चीन-पाकिस्तान के साथ तुर्किये की रुदाली गैंग को कोई तवज्जो नहीं दिया। पाकिस्तान के समर्थन में तुर्किये की गतिविधियों का असर मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी तक सीमित रहा जो तुर्किये के बिना भी पाकिस्तान के हक में ही बातें करता।

चीन में एकदलीय शासन व्यवस्था है। वहां चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी (CCP) का ही शासन रहता है, भले बागडोर किसी के हाथ में हो। पिछले 10 वर्षों से शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति हैं। उनकी भारत विरोधी मानसिकता के प्रमाणों की कोई कमी नहीं। दशकों बाद भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक संघर्ष हुए। 2020 में जिनपिंग के इशारे पर चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए ने भारत की सीमा का अतिक्रमण करने की कोशिश की और उसे ऐसा जवाब मिला जिसकी जिनपिंग ने कल्पना नहीं की होगी। जिनपिंग की विस्तारवादी और भारत विरोधी नीतियों का ही असर है कि भारत और चीन की सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा एलएसी पर पिछले तीन साल से आमने-सामने खड़ी है। जिनपिंग ने भारत विरोधी नीति को तब आगे बढ़ाया जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें पूरा सम्मान दिया। पीएम मोदी के न्योते पर राष्ट्रपति जिनपिंग भारत आए और उनके आवभगत को दुनिया ने देखा। लेकिन वो कहते हैं ना, जिसने कुछ ठान रखी हो, उसका मिजाज नहीं बदला जा सकता। कितना भी स्वागत-सत्कार हो जाए, जिनपिंग के दिल में भरी भारत विरोधी भावना को भला कोई कैसे निकाल सकता है।

पाकिस्तान तो ऐसा पड़ोसी है जो भारत के साथ शाश्वत दुश्मनी के भाव में रहता है। भारत को हजार जख्म देकर लहुलुहान करो, घास की रोटी खाकर भारत से हजार साल लड़ेंगे जैसे बयान पाकिस्तान की सेना और वहां के प्रधानमंत्री के स्तर से आ चुके हैं। पाकिस्तान में भारत विरोधी भावना का स्तर इस बात से आंका जा सकता है कि आज वो देश बर्बादी की कगार पर पहुंच चुका है, लेकिन भारत के खिलाफ जहर उगलने में कभी बाज नहीं आता। पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवर-उल-हक कक्कड़ ने भारत को दुनिया का सबसे पाखंडी देश तक कहा। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने से भी बाज नहीं आए। आज भी पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में शांति अच्छी नहीं लगती। उधर, पंजाब सीमा पर पाकिस्तान ड्रोन के जरिए हथियारों और ड्रग्स की अवैध खेप पहुंचाता रहता है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष पकड़ में आए पाकिस्तानी ड्रोनों की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज की गई।

भारत विरोधी सरकार का सबसे ताजा गठन मालदीव में हुआ है। वहां भारत विरोधी मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी पीपुल्स नैशनल कांग्रेस ने हालिया चुनावों में जीत दर्ज की। मुइज्जू ने राष्ट्रपति चुनावों में भारत के खिलाफ खूब जहर उगला था। उन्होंने मालदीव में भारतीय सेना की मौजूदगी को चुनावी मुद्दा बनाया और वादा किया कि उनकी सरकार बनने पर भारतीय सेना को वापस भेजा जाएगा। मुइज्जू की सरकार बनने के बाद मालदीव में भारत विरोधी फैसले भी होने लगे। मुइज्जू ने भारत से अपनी सेना वापस बुलाने को कहा। उन्होंने सत्ता संभालने के बाद पहली विजिट भारत की करने की परंपरा पर भी सवाल उठाया और तुर्किये चले गए। मुइज्जू ने भारत को उकसाने के लिए चीन का दौरा शेड्यूल किया। बात यहीं तक रहती तो भी ठीक थी, मुइज्जू के मंत्रियों ने भारत और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भद्दी टिप्पणियां करनी शुरू कर दी। हालांकि, इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। मूलतः पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश मालदीव को भारत के गुस्से का सामना करना पड़ा और भारतीयों ने धड़ाधड़ अपने ट्रिप कैंसल करने शुरू कर दिए। इससे मालदीव तुरंत घुटनों पर आ गया और मुइज्जू को अपने मंत्रियों के खिलाफ कदम उठाने पड़े।

बांग्लादेश पर चीन की गिद्ध दृष्टि पड़ी है। वह वहां भारत को कमजोर करने की जीतोड़ कोशिशों में लगा रहता है। ऐसे में भारत विरोधी दल की जीत होने से मुश्किलें बढ़ सकती थी, लेकिन शेख हसीना की सत्ता में वापसी हो गई। यह भारत के लिए राहत की बात जरूर है। बांग्लादेश में भारत की कई विकास परियोजनाएं चल रही हैं। भारत-बांग्लादेश कई समझौतों पर आगे बढ़ रहे हैं जो चीन को चुभ रहा है। रेलवे से लेकर बिजली तक, भारत कई परियोजनाओं में बांग्लादेश की मदद कर रहा है। शेख हसीना सरकार से भारत के रिश्तों की प्रगाढ़ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने जी-20 सम्मेलन की अध्यक्षता की तो बांग्लादेशी प्रधानमंत्री को भी न्योता दिया। भारत के न्योते पर शेख हसीना अपनी बेटी के साथ भारत आई थीं। उनकी सत्ता में लगातार चौथी बार वापसी से भारत-बांग्लादेश के बीच रिश्तों में और मजबूती आने की उम्मीद है।

क्या बीजेपी को मिल पाएगा पसमांदा मुसलमानो का पूरा वोट बैंक?

यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या पसमांदा मुसलमानो का पूरा वोट बैंक बीजेपी को मिल पाएगा या नहीं! साल 2024 आ चुका है और कुछ महीनों के बाद ही लोकसभा चुनाव होने हैं। राम मंदिर के उद्घाटन के बीच जहां सत्ताधारी बीजेपी जोश से भरी हुई है। तो वहीं विपक्षी गठबंधन भी कमर कस रहा है। इस बीच कई नए-पुराने दल भी तैयारी में हैं। बात यूपी की करें तो यहां पर पिछले कुछ सालों में मुकाम हासिल करने वाले कई दल हैं। इनमें निषाद पार्टी और सुभासपा सत्ता के अंदर-बाहर होते रहते हैं। लेकिन एक दल ऐसा भी है, जो 10 साल पहले इन दोनों ही दलों से सियासत में काफी आगे था, जिसका नाम था- पीस पार्टी। पिछले कुछ महीनों से पीस पार्टी ऑफ इंडिया फिर से चर्चा में है। दरअसल, बदलते राजनीतिक समीकरण के बीच पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद अयूब ने बीजेपी और एनडीए गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का इशारा कर दिया है। पिछले दो दशक के दौरान हुए 3 लोकसभा और 3 विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले अयूब ने एनडीए के साथ गठबंधन का रास्ता खुला होने की बात कही है। उन्होंने कांग्रेस, सपा और बसपा पर मुस्लिमों को केवल वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान गोंडा में जनसभा करते हुए डॉक्टर अयूब ने कहा था कि पीस पार्टी मोदी को आतंकवादी मानती है, क्योंकि उनसे पूरा देश आतंकित है। ऐसे व्यक्ति को पीएम चुनने और देश की कमान सौंपने का कोई मतलब है। वहीं 2016 में गोरखपुर के चंपा देवी पार्क में सभा के दौरान उन पर तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल और धर्मविशेष पर टिप्पणी करने का केस भी दर्ज हुआ था।

गोरखपुर के निवासी डॉक्टर मोहम्मद अयूब ने 15-16 साल पहले राजनीति की राह पकड़ ली थी। मोहम्मद अयूब गोरखपुर के बड़हलगंज कस्बा निवासी हैं। पसमांदा मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखने वाले अयूब ने 2008 में पीस पार्टी का गठन किया था। अगले ही साल 2009 में उन्होंने 20 सीट पर लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी के खाते में एक भी सीट नहीं आई लेकिन लगभग एक फीसदी वोट पाकर उन्‍होंने राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी ऑफ इंडिया ने 208 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे, जहां उसे 2.35 प्रतिशत वोट मिले। और वोट प्रतिशत के हिसाब से वह पांचवें स्थान पर रही। मुरादाबाद की कांठ सीट से अनीसुर्रहमान जीते। सिद्धार्थनगर की डुमरियागंज सीट से कमाल यूसुफ को जीत मिली, जबकि खुद डॉक्टर अयूब संतकबीरनगर की खलीलाबाद सीट से निर्वाचित हुए थे। हालांकि 2017 के चुनाव में केवल 1 सीट पर जीत मिली।

पीस पार्टी के गठन के बाद 2009 लोकसभा और 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन कर मुस्लिम समुदाय पर अपनी पकड़ का एहसास करा दिया था। हालांकि बदले दौर में किसी बड़ी पार्टी का समर्थन नहीं मिलने के कारण डॉक्टर अयूब राजनीतिक तौर पर हाशिए पर चले गए। अब पसमांदा वोटबैंक को लेकर बीजेपी की राजनीति के दौर में एक बार फिर से वह जड़ें मजबूत करने में जुट गए हैं। उनका फोकस पूर्वांचल से लेकर वेस्ट यूपी तक मुस्लिम राजनीति पर है।

2017 के बाद मुस्लिम वोटर समाजवादी पार्टी और बीएसपी की तरफ लामबंद होने लगे और पीस पार्टी हाशिये पर चली गई। सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार, 2017 में 55 फीसदी मुस्लिम वोटरों ने सपा को वोट दिया। 14 फीसदी मुस्लिम वोट बसपा के खाते में गई। 33 फीसदी मुसलमानों ने कांग्रेस का समर्थन किया। दो फीसदी मुस्लिम वोट बीजेपी को भी मिले थे। प्यू सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, आश्चर्यजनक यह रहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पांच में से एक मुस्लिम वोटर ने बीजेपी के लिए वोट किया। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने बीजेपी विरोध के लिए समाजवादी पार्टी के लिए एकमुश्त वोटिंग की थी।

बीजेपी खुद पिछले दो साल से पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने के लिए अभियान चला रही है। मुसलमान वोटरों के बीच पीएम मोदी की मन की बात के उर्दू तर्जुमा वाले किताबें बांटी जा रही है। मदरसों में बीजेपी के अल्पसंख्यक सेल के नेता पार्टी के संदेश लेकर मीटिंग कर रहे हैं। मई 2023 के निकाय चुनाव में बीजेपी ने 395 मुस्लिम कैंडिडेट उतारे थे। पसमांदा मुसलमानों को संदेश देने के लिए यूपी में पहले ही दानिश आजाद अंसारी को योगी कैबिनेट में शामिल किया है। ऐसे में डॉ. अयूब का बयान बीजेपी को राहत दे सकता है।

क्या मायावती को है अखिलेश यादव से खतरा?

मायावती को अब अखिलेश यादव से खतरा हो सकता है! उत्तर प्रदेश की राजनीति के दो प्रमुख दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच वर्षों बाद एक बार फिर रिश्ते तल्खी की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। एक तरफ अखिलेश यादव हैं जो इंडिया गठबंधन को साफ कर चुके हैं कि बसपा से गठबंधन होने की सूरत में वह साथ नहीं रहेंगे। वहीं दूसरी तरफ मायावती भी अब अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को लेकर अपना आक्रामक होती दिख रही हैं। पिछले दो दिनों से मायावती लगातार समाजवादी पार्टी पर हमलावर हैं। वह अचानक से स्टेट गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाने लगी हैं और बसपा कार्यालय की सुरक्षा को लेकर अनहोनी की आशंका जता रही हैं। सवाल ये है कि जिस गेस्ट हाउस कांड को भुलाकर उन्होंने अखिलेश-डिंपल को मंच पर आशीर्वाद दिया था, मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा किया था, वह फिर कैसे याद आ गया? क्या वाकई मायावती को खतरा लग रहा है? पूरा मामला समझने के लिए आपको थाेड़ा पीछे से शुरुआत करनी होगी। 2017 में भाजपा की सत्ता पर जोरदार वापसी से पहले उत्तर प्रदेश में राजनीतिक माहौल सपा और बसपा के इर्द-गिर्द ही सिमटा होता था। 90 के दशक से लेकर 2012 तक के विधानसभा चुनाव गवाह हैं कि दोनों पार्टियों को इसका लाभ भी खूब मिला। दोनों ही दलों ने इसी आपसी विराेध के चलते कई बार गठबंधन सरकार और एक-एक बार बहुमत की सरकार भी बनाई। सवाल ये है कि क्या पुरानी प्रतिद्वंद्विता फिर से जिंदा होने का लाभ इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव में मिलेगा?

हाल के कुछ घटनाक्रम पर नजर डालें तो कहानी वोट बैंक के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश की पहल पर मायावती ने गठबंधन की हामी भरी। दोनों पार्टियों ने चुनाव लड़ा और 15 सीटें लोकसभा की जीतीं। इनमें 10 सीटें बसपा के खाते में गईं, वहीं अखिलेश सिर्फ 5 सीटें ही सपा को जितवा सके। चुनाव के बाद मायावती ने ये कहकर गठबंधन से किनारा कर लिया कि बसपा के वोट तो सपा को ट्रांसफर हुए लेकिन सपा के वोट बसपा प्रत्याशियों को नहीं मिला। हालांकि हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी।

बहरहाल, मायावती के गठबंधन तोड़ने के बाद अखिलेश यादव ने दलित वोटरों को जोड़ने के बड़े प्लान पर काम करना शुरू किया। उन्होंने बसपा के ही कई दिग्गज नेताओं को अपने पाले में किया। आज अखिलेश यादव पीडीए प्लान यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को एक साथ लाने की मुहिम में जुटे हैं। इसी बीच 2022 के विधानसभा चुनावों में एक और बात हुई। इन चुनावों में बहुजन समाज पार्टी सिर्फ 1 सीट जीत सकी। समाजवादी पार्टी ने 111 सीटें जीतीं और चुनाव परिणाम में मुस्लिम वोटरों का एकतरफा झुकाव सपा की तरफ नजर आया। ये बड़ा बदलाव था क्योंकि यूपी में बसपा और सपा दोनों की ही ताकत मुस्लिम मतदाता रहे हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद बसपा को तगड़ा झटका लगा।

ताजा घटनाक्रम की बात करें तो दिसंबर में इंडिया गठबंधन की बैठक हुई। यहां अखिलेश यादव ने साफ कर दिया कि अगर बहुजन समाज पार्टी को गठबंधन में शामिल करने की कवायद हाेती है तो समाजवादी पार्टी भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। अखिलेश ने साफ कर दिया कि दोनों पार्टियां एक साथ गठबंधन में शामिल नहीं हाे सकतीं। मीडिया में ये बात सामने आई तो मायावती के उत्तराधिकारी और बसपा के राष्ट्रीय महासचिव आकाश आनंद ने तंज किया, “इंडिया अलायंस की बैठक में कुछ लोग भाजपा से कम और बीएसपी से ज्यादा डरे हुए हैं।” लेकिन बात यहीं तक रुकी नहीं अखिलेश अब सार्वजनिक तौर पर अपने तंज भरे अंदाज में बसपा से किनारा करते नजर आने लगे हैं। पिछले दिनों बलिया में जब बसपा के इंडिया गठबंधन में शामिल होने पर सवाल पूछा गया तो अखिलेश ने कहा कि उनकी मायावती की जिम्मेदारी कौन लेगा?

अखिलेश का बयान आया तो जवाब में मायावती बिफर उठीं। उन्होंने न सिर्फ अखिलेश को गिरेबान में झांकने की नसीहत दे डाली बल्कि मुलायम सिंह यादव को भी लपेटे में ले लिया। मायावती ने एक्स पर लिखा, “अपनी व अपनी सरकार की खासकर दलित-विरोधी रही आदतों, नीतियों एवं कार्यशैली आदि से मजबूर सपा प्रमुख द्वारा बीएसपी पर अनर्गल तंज कसने से पहले उन्हें अपने गिरेबान में भी झांंककर जरूर देख लेना चाहिए कि उनका दामन भाजपा को बढ़ाने व उनसे मेलजोल के मामले में कितना दागदार है। तत्कालीन सपा प्रमुख द्वारा भाजपा को संसदीय चुनाव जीतने से पहले व उपरान्त आर्शीवाद दिए जाने को कौन भुला सकता है। फिर भाजपा सरकार बनने पर उनके नेतृत्व से सपा नेतृत्व का मिलना-जुलना जनता कैसे भूला सकती है? ऐसे में सपा साम्प्रदायिक ताकतों से लडे़ तो यह उचित होगा।”

मायावती यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने चाैबीस घंटे के बाद एक्स के माध्यम से सपा पर फिर हमला किया। इस बार उन्होंने सपा से 2019 गठबंधन करने पर सफाई दी और स्टेट गेस्ट हाउस कांड की यादें ताजा करते हुए बसपा कार्यालय की सुरक्षा की गुहार तक लगा दी। मायावती ने लिखा, “सपा अति-पिछड़ों के साथ-साथ जबरदस्त दलित-विरोधी पार्टी भी है, हालांकि बीएसपी ने पिछले लोकसभा आमचुनाव में सपा से गठबन्धन करके इनके दलित-विरोधी चाल, चरित्र व चेहरे को थोड़ा बदलने का प्रयास किया। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद ही सपा पुनः अपने दलित-विरोधी जातिवादी एजेंडे पर आ गई। अब सपा मुखिया जिससे भी गठबन्धन की बात करते हैं उनकी पहली शर्त बसपा से दूरी बनाए रखने की होती है, जिसे मीडिया भी खूब प्रचारित करता है।”

उन्होंने लिखा कि इस असुरक्षा को देखते हुए सुरक्षा सुझाव पर पार्टी प्रमुख को अब पार्टी की अधिकतर बैठकें अपने निवास पर करने को मजबूर होना पड़ रहा है, जबकि पार्टी दफ्तर में होने वाली बड़ी बैठकों में पार्टी प्रमुख के पहुंचने पर वहां पुल पर सुरक्षाकर्मियों की अतिरिक्त तैनाती करनी पड़ती है। ऐसे हालात में बीएसपी यूपी सरकार से वर्तमान पार्टी प्रदेश कार्यालय के स्थान पर अन्यत्र सुरक्षित स्थान पर व्यवस्था करने का भी विशेष अनुरोध करती है, वरना फिर यहां कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है। साथ ही, दलित-विरोधी तत्वों से भी सरकार सख़्ती से निपटे, पार्टी की यह भी मांग है।

पूरे घटनाक्रम पर गौर करें तो अखिलेश की रणनीति साफ दिख रही है, वह पीडीए के अपने फॉर्मूले पर आगे बढ़ रहे हैं। 2019 में वह बसपा से गठबंधन का खामियाजा उठा चुके हैं। अब वह दोबारा बसपा से करीबी के मूड में नहीं हैं। वह दोबारा किसी गठबंधन से बच रहे हैं, जिसमें बसपा और सपा साथ हों। वहीं दूसरी तरफ मायावती के लिए चिंता की बात ये है कि बसपा इस समय राजनीतिक रूप से हाशिए है। पार्टी के कई दिग्गज नेता उनसे दूर हो चुके हैं। 2019 में जीते सांसद भी दूसरी पार्टियों के संपर्क में हैं। बसपा की ताकत माने जाने वाले दलित वोट बैंक पर 2017 के बाद से भाजपा बड़ी सेंध लगा चुकी है। वहीं मुस्लिम मतदाता भी पार्टी से मुंह मोड़ता दिखाई दे रहा है। ऐसी परस्थिति में मायावती का ये स्टेट गेस्ट हाउस की यादें ताजा कराने की दावं कितना चलेगा ये समय ही बताएगा।

क्या राजीव गांधी ने खोली थी राम मंदिर की राह?

एक समय ऐसा था जब राजीव गांधी ने ही राम मंदिर की राह खोली थी! अयोध्या में बने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की घड़ी ज्यों-ज्यों नजदीक आ रही है, सियासी दलों में इसे लेकर घमासान मचा हुआ है। प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए निमंत्रण पत्र बांटे जा रहे हैं। उद्यमी, व्यवसायी, नेता, समाजसेवी, राजनीति जैसे समाज के विभिन्न तबकों के लोगों को न्योता भेजा जा रहा है। राजनीति तो पानी की तरह है, जहां स्कोप मिला, वहीं पसर गई। इसलिए समाज का कोई अंग, आचार-व्यवहार और यहां तक कि रिश्ते भी राजनीति से अब अछूते नहीं बचे हैं। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होनी है, तो भाजपा विरोधी सभी दल इस चिंता से दुबले हुए जा रहे हैं कि मंदिर निर्माण का श्रेय भाजपा लेना चाहती है। इसलिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण मिलने पर कुछ दलों ने जाने से साफ मना कर दिया, तो कुछ ऊहापोह की स्थिति में हैं। सबसे ज्यादा ऊहापोह की स्थिति कांग्रेस में है। उस कांग्रेस में, जिसके नेता राजीव गांधी ने राम मंदिर के शिलान्यास की पहल की। बात 1988 की है। भारी बहुमत से बनी राजीव गांधी की सरकार पर बोफोर्स तोप घोटाले में रिश्वतखोरी के आरोप पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लगाए थे। तब वीपी सिंह राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री थे। कांग्रेस की इससे भारी बदनामी हुई और इस बात का खतरा खड़ा हो गया कि अगला चुनाव कांग्रेस जीत भी पाएगी या नहीं। राजीव के करीबियों ने उन्हें सुझाव दिया कि राम मंदिर का शिलान्यास करा देना चाहिए। इससे भाजपा के उभार को रोका जा सकता है। तब संसद में भाजपा दो सदस्यों वाली पार्टी थी।

यह दस्तावेजी सच है कि राजीव गांधी की सरकार ने ही शिलान्यास की इजात दी, लेकिन इसका फायदा कांग्रेस नहीं उठा सकी। चुनाव 1989 के नवंबर में होने थे। इस बीच विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) और साधु-संतों ने 9 नवंबर 1989 की तारीख शिलान्यास के लिए तय कर दी। बहरहाल, शिलान्यास और चुनाव प्रचार अभियान में कांग्रेस ने मंदिर के शिलान्यास को मुद्दा नहीं बनाया, लेकिन भाजपा ने इसे अपनी कामायाबी मानी। नवंबर में ही मंदिर के बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आना था। विहिप की कोशिश थी कि फैसला आने से पहले ही शिलान्यस कर देना चाहिए। यही वजह थी कि शिलान्यास की तारीख 9 नवंबर तय हुई। विहिप ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच के आदेश के पहले ही स्थितियों को भांपते हुए तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने विश्व हिन्दू परिषद को शिलान्यास की इजाजत दे दी। केंद्र सरकार की सहमति से कोर्ट का फैसला आने के पहले ही विवादित स्थल के बाहर शिलान्यास हो गया। सात घन फुट का गड्ढा खोद कर आधारशिला रख दी गई। आधार शिला के पत्थर बिछाने वालों में अनुसूचित जाति से आने वाले बिहार के कामेश्वर चौपाल भी शामिल थे। यह कहा जाए कि उन्होंने मंदिर की नींव की पहली ईंट रखी तो अनुचित नहीं होगा।

उसके बाद भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सितंबर से अक्टूबर 1990 तक राम रथयात्रा निकाली। रथयात्रा के बहाने भाजपा ने हिन्दुत्व को हवा दी। बिहार में तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी की रथयात्रा रोक दी और उन्हें गिरफ्तार करा दिया। भाजपा को इससे भी हिन्दू समाज की सहानुभूति मिली। भाजपा अगर लोकसभा में सिर्फ दो सदस्यों से बढ़ कर आज 300 सीटों के पार गई है तो इसमें राम और उनकी जन्मस्थली अयोध्या की बड़ी भूमिका है।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस तन्मयता से राम मंदिर का निर्माण कराया और 2024 के लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारी की है, उससे विरोधी दलों के कान खड़े हो गए हैं। विरोधी दल समझ नहीं पा रहे कि वे मुस्लिम समुदाय के एकमुश्त तकरीबन 20 प्रतिशत वोटों की तिलांजलि दे दें या भाजपा की तरह इस दलील के साथ अवसर का लाभ उठाएं कि राजीव गांधी की सरकार ने ही मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दी थी। प्रसंगवश यह उल्लेख भी जरूरी है कि राजीव गांधी ने वृंदावन जाकर इस बाबत देवरहा बाबा से सलाह मांगी थी। बाबा के कहने पर ही उन्होंने आधारशिला रखने की छूट दी थी।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्योता मिलने के बाद सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी ने जाने से साफ मना कर दिया है। नीतीश कुमार और लालू यादव की ओर से भी अभी तक कोई संकेत नहीं मिला है। बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को छोड़ कर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने चुप्पी साध ली है। भाजपा विरोधी अन्य दल भी साफ-साफ कुछ नहीं बोल रहे। कांग्रेस यहां भी राजीव गांधी की तरह चूकती नजर आ रही है। शिलान्यास की छूट दी राजीव गांधी की सरकार ने, लेकिन उसे वह सियासी लाभ का मुद्दा नहीं बना पाए। कांग्रेस की दुर्गति का दौर तभी से शुरू हुआ और अभी तक जारी है। कांग्रेस चाहती तो जनता को यह बता कर अपना झंडा बुलंद कर सकती थी कि प्राण प्रतिष्ठा भले नरेंद्र मोदी की सरकार की देखरेख में हो रही है, पर आधारशिला रखने की छूट उसके ही नेता राजीव गांधी ने दी थी।

कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि वह गलतियों से सीखती नहीं। भाजपा की नकल करने में उसे संकोच नहीं होता। राहुल गांधी मंदिरों में जाते हैं। खुद को ब्राह्मण साबित करने की पूरी कोशिश करते हैं। अपने को ब्राह्मण कुल का साबित करने के लिए जनेऊधारी बन जाते हैं। यानी भाजपा के हिन्दुत्व की नकल करने में वे संकोच नहीं करते। ममता बनर्जी भी हिन्दुत्व के प्रति आकर्षण जताने के लिए चंडी पाठ करने लगती हैं। पर, मुद्दों को भुनाने की कला में विरोधी दल भाजपा की तरह कामयाब नहीं होते। अयोध्या में हो रहे 22 जनवरी के आयोजन में अगर विरोधी दल सहभागी नहीं बनते तो इसका संकेत साफ है कि वे भाजपा की राह आसान कर रहे हैं। भाजपा उन्हें हिन्दू विरोधी करार देने की पूरी कोशिश करेगी।

जानिए अयोध्या राम मंदिर के बारे में सब कुछ!

आज हम आपको अयोध्या राम मंदिर के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं! लंबी प्रतीक्षा के बाद अयोध्या में रामलला के विराजमान होने की घड़ी पास आ रही है। 22 जनवरी को भगवान राम बालस्वरूप में अपने नवनिर्मित मंदिर में विराजित होंगे। लेकिन, 2.70 एकड़ में विकसित किया जा रहा तीन मंजिला मंदिर राम के धाम का महज एक हिस्सा भर है। पूरा धाम जिसे मंदिर परिसर या कॉम्प्लेक्स का नाम दिया गया है, इसे पूरा होने में एक साल से अधिक का समय लगेगा। 70 एकड़ के इस कॉम्प्लेक्स को अध्यात्म, इतिहास और सुविधाओं के संगम के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे यहां आने पर श्रद्धालुओं को त्रेतायुगीन परंपराओं और भव्यता का अनुभव हो सके। प्रधानमंत्री 22 जनवरी को जिस गर्भगृह में प्राण प्रतिष्ठा करेंगे वह ग्राउंड फ्लोर पर है। प्राण प्रतिष्ठा तक ग्राउंड फ्लोर के ही कार्य को अंतिम रूप दिया जा सकेगा, जिस पर 160 खंभे या स्तंभ बने हैं। प्रवेश का मुख्य द्वार जिसे सिंहद्वार कहा गया है, उसका काम भी लगभग पूरा हो चुका होगा। यहां अलग-अलग प्रतिमाओं के स्थापित होने का कार्य चल रहा है। सिंहद्वार के ही समीप बनने वाले प्लाजा पर दीप स्तंभ भी बनाए जाएंगे। फर्स्ट फ्लोर जिस पर राम दरबार स्थापित होना है, उसका काम भी अंतिम चरण में है। साथ ही पांचों मंडप- नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना और कीर्तन मंडप को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है। मंदिर के चारों ओर बन रही सुरक्षा दीवार या 732 मीटर लंबे परकोटे का निर्माण पूरा होने में अभी समय लगेगा।

मंदिर कॉम्प्लेक्स का दो-तिहाई क्षेत्र करीब 48 एकड़ हरित क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जाएगा, जिससे मंदिर की प्राकृतिक आभा निखर सके। इसके लिए लैंडस्केपिंग और पौधारोपण पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होंगे। परिसर में विकसित की जाने वाली वाटिकाओं का नामकरण भी रामायणकालीन पात्रों के नाम पर होगा। परिसर में जो पौधे लगाए जा रहे हैं, वे भी अलग-अलग नक्षत्रों और ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार चयनित किए गए हैं। मंदिर कॉम्प्लेक्स का एक बड़ा हिस्सा तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं के लिए भी विकसित किया जा रहा है। परिसर में जिन प्राचीन मंदिरों को संरक्षित किया गया है, उन्हें भी लैंडस्केपिंग के जरिए मनोरम बनाया जाना है। इसमें प्राचीन शिवमंदिर से लेकर शेषावतार मंदिर तक शामिल है। अयोध्या राम की जन्मस्थली है, इसलिए वहां उनकी पूजा उनके बालरूप में ही होती है। गर्भगृह में भगवान राम की प्रतिमा उनके बालस्वरूप रामलला के रूप में ही स्थापित की जाएगी। इसलिए, गर्भगृह में वह पांच वर्ष की आयु के बालक के रूप में अकेले ही स्थापित किए जाएंगे। फर्स्ट फ्लोर पर गर्भगृह में रामदरबार बनेगा। यहां भगवान राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ विराजेंगे। उनके चरणों में भगवान शंकर का अवतार माने जाने वाले भक्त हनुमान भी सुशोभित होंगे।

भारतीय सनातन परंपरा में राम सामूहिकता और समरसता के भी आदर्श हैं। इसलिए, उनके मंदिर में भी इस भावना का प्रतिबिंब दिखेगा। मंदिर के चारों ओर परकोटे पर छह मंदिर बन रहे हैं। साथ ही ऋषि मंदिर में महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य, ऋषि पत्नी अहिल्या के साथ निषादराज और माता शबरी के मंदिर स्थापित होंगे। मंदिर कॉम्प्लेक्स में राम की परंपरा से जुड़े दूसरे सहयोगियों की धरोहरों को भी संरक्षित और विकसित किया जा रहा है। माना जाता है कि जब प्राचीन काल में यहां मंदिर था तो उसकी स्थापना के साथ चारों ओर भगवान राम के अभियान में सहयोग देने वाले पात्रों से जुड़े स्थान भी स्थापित किए गए थे। इसे सुरक्षा घेरे के तौर पर देखा जाता था। कॉम्प्लेक्स को विकसित करते समय भी इस भावना का ध्यान रखा गया है। किष्किंधा के राजकुमार अंगद के नाम पर स्थापित अंगद टीला और समुद्र पर पुल बनाकर लंका की राह सुगम बनाने वाले नल के नाम पर बना टीला भी कार्ययोजना का हिस्सा हैं। समृद्धि और धन के देवता कुबेर के टीले को भी संरक्षित किया जा चुका है। इस पर गिद्धराज जटायु की प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। परिसर में स्थित सीता कूप को भी संरक्षित किया गया है। मान्यता है कि इसमें सभी तीर्थों का जल समाहित है।

यहां यज्ञशाला का निर्माण हो रहा है। यज्ञ, आहुति सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपादित किए जाएंगे। कर्म क्षेत्र इसे अनुष्ठान मंडप का रूप दिया गया है। यहां श्रद्धालु विभिन्न संस्कार और कार्यक्रम आयोजित कर सकेंगे। गुरु वशिष्ठ पीठिका भगवान राम सहित चारों भाइयों को गुरु वशिष्ठ ने शास्त्रों की शिक्षा दी थी। इसलिए उनके नाम पर पीठिका भी स्थापित की जाएगी। भक्ति टीला मंदिर कांप्लेक्स में टीले को योग, अध्यात्म और प्रार्थना के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां पर श्रद्धालु प्रार्थना और ध्यान कर सकेंगे। प्रसाद मंडप इसका नाम भगवान राम के भाई भरत के नाम पर भरत प्रसाद मंडप रखा गया है। यहां पर प्रसाद, भोग आदि तैयार होंगे, जो पूजन-अर्चन में उपयोग होंगे।

जानिए अयोध्या नगरी का पूरा इतिहास!

आज हम आपको अयोध्या नगरी का पूरा इतिहास बताने वाले हैं! कौशलपुर की राजधानी। वह अयोध्या नगरी, जिसे न कभी जीता जा सका और न कभी जीता जा सकता है। जिसके साथ युद्ध करना असंभव है। रघु, दिलीप, अज, दशरथ और राम जैसे रघुवंशी राजाओं के पराक्रम और शक्ति के कारण उनकी राजधानी को अपराजेय माना जाता था। इसलिए नगरी का ‘अयोध्या’ नाम सर्वदा सार्थक रहेगा। सतयुग के सतकाल को मैंने देखा है। राजा भरत को मैंने देखा। राज हरिश्चंद्र का सुख पाया। त्रेता युग के वैभव को मैंने जिया। मैंने राजा दशरथ के शासन को देखा। उनके काल की विरासत मेरी धमनियों में आज भी बहती है। राजा दशरथ के चार लालों ने मेरी धरती पर पैर रखा मेरी गलियों में घूमे। उनका बचपन, उनकी जवानी और उनकी कहानी मेरी रगों में रची- बसी है। उस राम के वैभव को समेटे मैंने द्वापर और कलियुग का आगमन देखा। भाइयों को आपस में कटते देखा। भ्रष्टाचार को बढ़ते देखा। मुस्लिम शासकों के आक्रमण को झेला। मुगलों के तांडव का साक्षात्कार किया। मेरी धरती पर बने मेरे भगवान के मंदिर को भी टूटते मैंने देखा। उस मंदिर के लिए मेरी धरती पर अपने पुत्रों के खून बहते भी देखा। मेरी आंखों के कोर भी गीले हुए। फिर, अपने प्रभु की मंदिर का निर्माण होते भी देख रहा हूं। मैं अयोध्या हूं और मैं अपनी कहानी आपको खुद सुनाने वाला हूं। कहानी की शुरुआत वर्तमान से करता हूं। आज मेरी गलियां चमक रही हैं। मेरी धरती नई सड़कें बन रही हैं। मेरा वैभव फिर लौट रहा है। मेरे यहां का रेलवे स्टेशन भी प्रभु श्रीराम के रंग में रंगा है तो एयरपोर्ट भी भगवान की आभा झलकती है। आज मेरी भव्यता को देखकर सब हर्षित हो रहे हैं। लेकिन, क्या यह सब इतना आसान था। बिल्कुल नहीं। 500 की लंबी लड़ाई मैंने देखी है। मेरी बात करने वालों पर अत्याचार मैंने देखा है। लेकिन, मैं 9 नवंबर 2019 को कैसे भूल सकता हूं। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का वह आदेश, जिसने मेरी धरती को राम मंदिर से फिर आबाद कर दिया। इसके बाद 5 अगस्त 2020 का वह दिन। मेरी धरती धन्य हुई। मेरे आराध्य प्रभु श्रीराम के वैभव के वापस लौटने की शुरुआत का दिन। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे दर पधारे। मेरी धरती के जिस टुकड़े पर भगवान राम ने जन्म लिया था, वहां मंदिर की नींव रखी गई।

मेरी धरती पर जब नींव का पहला कुदाल चला, मैं कितनी खुश थी। अंदाजा नहीं लगा सकते। मेरी रगों में राम का संचार हो रहा था। वह सपना, वह उम्मीद, वह भरोसा, जो करोड़ों लोगों ने मेरी तरफ नजर टिकाकर रखा था, वह पूरा हो रहा था। राम के मंदिर बनने की शुरुआत हुई। करोड़ों लोगों की भक्ति का वह चरम बिंदु था। मेरे लिए जो भी युद्ध लड़े गए। इस दिन एक बार फिर मैं जीत गई। क्योंकि, मैं अयोध्या हूं।

मेरी जमीन पर खड़ी की गई मस्जिद- मंदिर की लड़ाई लंबी थी। उबाऊ भी। फिर भी न कोई थका। न हारा। 100 सालों से अधिक की कानूनी लड़ाई लड़ी गई। फिर आया 9 नवंबर 2019 का दिन। श्रीराम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश का दिन। सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबी सुनवाई के बाद मेरे दर को लेकर चल रहे विवाद पर फैसला सुनाया। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में बैठी संवैधानिक पीठ ने अपने आदेश में कहा कि विवादित जमीन पर हिंदुओं का हक है। मेरी जीत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि मुस्लिम पक्ष को अलग से 5 एकड़ जमीन दी जाए। मेरे ही दर पर उन्हें भी जमीन दी गई है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कुछ को कहां मंजूर था। कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं। सुप्रीम कोर्ट में सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। फिर मेरे दर पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई। सरकार के स्तर पर।

आपको यहां बता दूं कि सुप्रीम कोर्ट के पांचों जजों की सहमति से मेरे घर के जन्मभूमि विवाद पर फैसला सुनाया गया। फैसले में एएसआई की रिपोर्ट का जिक्र किया गया। एएसआई ने मेरी छाती को चीर कर देखा था। विवादित ढांचे के भीतर मेरे भगवान का मंदिर था। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने आदेश में कहा कि एएसआई ने भी विवादित जमीन पर पहले मंदिर होने के सबूत पेश किए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि हिंदू अयोध्या को मेरे राम का जन्मस्थल मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एएसआई नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी।

मेरे प्रभु रामलला की जन्मभूमि पर फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे। आदेश पारित करने के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 को रिटायर हो गए। लेकिन, अपने आखिरी बड़े फैसले में उन्होंने मेरी जमीन पर प्रभु रामलला के मंदिर का रास्ता साफ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से मेरी धरती पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। अब तो ग्राउंड फ्लोर बनकर तैयार हो गया है। 22 जनवरी को मंदिर का उद्घाटन होने जा रहा है। मेरे प्रभु रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान होंगे। मेरी धरती और मेरे राम ने हमेशा भारत की राजनीति को प्रभावित किया। राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि परिसर की पूरी जमीन को एक ट्रस्ट के हवाले करने का आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया कि केंद्र सरकार ट्रस्ट का निर्माण करेगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का निर्माण किया। ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास बनाए गए। विश्व हिंदू परिषद से चंपत राय को महासचिव बनाए गए। ट्रस्ट में 15 सदस्य हैं। ट्रस्ट ने राम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता में राम मंदिर निर्माण कमिटी का गठन किया। मेरी धरती पर राम मंदिर निर्माण कमिटी ने तय समय सीमा में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को पूरा कराने में मदद की है।

22 जनवरी 2024 को मंदिर निर्माण के प्रथम चरण का कार्य पूरा होने के बाद मेरे प्रभु रामलला को अपने भव्य मंदिर में विराजमान किया जाएगा। मेरे दर पर रामलला के नए मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां जोरदार तरीके से चल रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर मेरी धरती पर आएंगे। मेरी सदियों का इंतजार पूरा होगा। मेरे रामलला अपने मंदिर में विराजमान होंगे, वह दिन कितना सुहावन होगा।

नीरज को सुनील की शुभकामनाएँ, सहल को विचार l

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टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा ने बेहद मजबूत ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ द्वंद्व से पहले सुनील छेत्री को प्रेरित किया। वह पिछले साल मई में दोहा, कतर में डायमंड लीग के चैंपियन बने। भारतीय टीम अगले शनिवार को रेगिस्तान में एएफसी एशियन कप में अपने सफर की शुरुआत करेगी. टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा ने शक्तिशाली ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ द्वंद्व से पहले सुनील छेत्री का हौसला बढ़ाया।

नीरज ने एक वीडियो संदेश में भारतीय फुटबॉल टीम को बधाई देते हुए कहा, “एएफसी एशियन कप के लिए भारतीय टीम को मेरी शुभकामनाएं। देशवासियों से अनुरोध है कि भारतीय टीम का समर्थन करें। उन्होंने कड़ी मेहनत की. मुझे उम्मीद है कि भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन करेगी।”

हालांकि, एएफसी एशियन कप शुरू होने से पहले भारतीय टीम के कोच इगोर स्टिमैक की मुख्य चिंता फुटबॉलरों की चोटें हैं। सहल अब्दुल समद ने अपना आखिरी मैच 6 दिसंबर को मोहन बागान के लिए खेला था. तब से वह चोट के कारण टीम से बाहर चल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले मैच में सहल का प्रदर्शन भी संदेह के घेरे में है. इगोर अपनी जगह अनिरुद्ध थापा या ब्रेंडन फर्नांडीस में से किसी एक को खेल सकते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के अलावा उज्बेकिस्तान और सीरिया भारत के साथ एक ही समूह में हैं। गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू ने कहा, ”हमारा ग्रुप आसान नहीं है. यह एक कठिन लड़ाई होगी.” उनका करियर 19 साल का है. सुनील छेत्री ने इन 19 सालों में भारत के लिए 145 मैच खेले हैं. 93 गोल किये. वह अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गए हैं. लेकिन गोल के प्रति उनकी भूख अभी भी कम नहीं हुई है. हालाँकि, नजरिया बदल गया है। मानसिकता में बदलाव आ रहा है. कतर के दोहा में एएफसी एशियन कप में खेलने उतरने से पहले सुनील ने यह बात कही।

पिछले कुछ महीनों से इस बात को लेकर काफी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सुनील कब संन्यास लेंगे। भारत के कोच इगोर स्टिमाच ने साफ कर दिया है कि आखिरी फैसला सुनील ही लेंगे. उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा. सुनील की जुबान पर भी रिटायरमेंट की बात आ गई है. उन्होंने कहा, ”मैंने एशियन कप से पहले अपनी पत्नी सोनम से बात की थी. उन्होंने कहा, मैं बहुत दबाव झेलता हूं. मुझे एन्जॉय करने को कहा. सोनम एक सांस में सही थी. इस बार मैं वही करने की कोशिश करूंगा जो मुझे बचपन में अच्छा लगता था।’ मैं मैदान पर अतिरिक्त दबाव नहीं लूंगा. रिटायरमेंट से पहले कितने दिन खेलूंगा, इसी मानसिकता के साथ मैदान पर उतरूंगा.

पहले वह मैदान पर जोश में आ जाते थे.’ लेकिन अब वह काफी शांत हैं. गर्म नहीं होता. भारतीय कप्तान ने इस बदलाव का श्रेय अपने बेटे को दिया. उन्होंने कहा, ”अब मैं बहुत खुश और शांत हूं. मेरे पिता बनने के बाद से यह बदल गया है। मैं अपने परिवार के साथ जो समय बिता सकता हूं वह मुझे नए सिरे से क्षेत्र में प्रवेश करने की ऊर्जा देता है। सब कुछ सोनम के लिए हो रहा है. ताकि मैं दिन में 8 घंटे सो सकूं, अच्छी एक्सरसाइज कर सकूं, उस समय का ज्यादातर समय बच्चे की देखभाल कर सकूं।”

सुनील अपनी पिछली तैयारी में कोई कमी नहीं रखना चाहते, भले ही उन्हें मैदान पर उतरने में मजा आया। उनके मुंह से अनुशासन की बात सुनी गई है. सुनील ने कहा, ”अनुशासन का पालन करना चाहिए. क्योंकि फुटबॉल एक टीम गेम है. एक दूसरे की मदद की जरूरत है. यह अनुशासन बेहतर समझ का एक बड़ा साधन है। अभ्यास में कड़ी मेहनत करें मैंने सदैव अनुशासित रहने का प्रयास किया है। आने वाले दिनों में भी मैं ऐसा ही करूंगा।” सुनील दो बार (2011 और 2019) एशियन कप में खेल चुके हैं। यह उनकी तीसरी प्रतियोगिता है. भारत के ग्रुप में ऑस्ट्रेलिया, उज्बेकिस्तान, सीरिया जैसी टीमें हैं. सुनील उन्हें चुनौती देने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा, ”एशियाई कप हमारे लिए बहुत बड़ी प्रतियोगिता है. वहां आपको ऑस्ट्रेलिया और उज्बेकिस्तान जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ खेलना होगा। पिछले 7-8 सालों में हमारे देश में फुटबॉल में काफी सुधार हुआ है. लेकिन प्रतिस्पर्धा यह समझने का सबसे बड़ा मंच है कि वास्तव में कितनी प्रगति हुई है। अगर हम यहां अच्छा प्रदर्शन कर सके तो पूरी दुनिया हमारी तरफ देखेगी।’

2011 एशियन कप में भारत ने पहला मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला था. सुनीलेरा 0-4 से हार गए. सुनील ने कहा कि इस बार ऑस्ट्रेलिया के लिए जीतना आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा, ”हमारी तैयारी अच्छी रही है. उस समय हम ऑस्ट्रेलियाई फुटबॉलरों के बारे में कुछ नहीं जानते थे। लेकिन अब मैं उनकी ताकत और कमजोरियों को जानता हूं।’ मैंने उसी के अनुसार अपनी योजना बनाई है।’ लेकिन असली बात इसे मैदान पर उतारना है.’ टीम के सभी फुटबॉलर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार हैं. मैं एक समय में एक ही मैच में जाना चाहता हूं।’

एशियन कप में भारत का पहला मैच 13 जनवरी को है. प्रतिद्वंद्वी ऑस्ट्रेलिया है. सुनीलेरा ग्रुप के बाकी दो मैच 18 जनवरी को उज्बेकिस्तान और 23 जनवरी को सीरिया के खिलाफ खेलेंगे।

यमन ने अमेरिका, ब्रिटेन पर किया हमला!

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यमन ने अमेरिका, ब्रिटेन पर किया हमला! मिसाइलों से विद्रोही हाउती विद्रोहियों के कई शिविर नष्ट हो गएनवंबर से अशांत लाल सागर। गाजा में फिलिस्तीनियों पर इजरायल के हमलों के विरोध में हमास समर्थक हौथिस ने वाणिज्यिक जहाजों पर हमला किया है। लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर सिलसिलेवार हमलों के बाद अमेरिका ने यमन के हौथी विद्रोहियों को “अंतिम चेतावनी” जारी की है। उसके बाद, ईरान द्वारा समर्थित शिया सशस्त्र समूह को “संयमित” न होने के कारण पश्चिमी दुनिया ने खारिज कर दिया। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट है कि यमन में हौथिस के कई ठिकानों पर लाल सागर में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों ने हमला किया है. अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने कहा कि हाउथिस द्वारा वाणिज्यिक जहाजों पर किया गया हमला इस प्रतिकार का कारण है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने गुरुवार रात एक बयान में कहा कि ”जरूरत पड़ने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.” दूसरी ओर, हौथी विद्रोहियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका सहित पश्चिमी दुनिया के हमलों का ‘जवाब’ देने की भी चेतावनी दी है. संयोग से, पिछले 19 नवंबर से, अशांत लाल सागर। क्योंकि गाजा में इजराइल पर हमले के विरोध में घोषित हमास समर्थित हाउथिस ने एक के बाद एक वाणिज्यिक जहाजों पर हमला करना शुरू कर दिया। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात 2015 से ईरान समर्थित शिया विद्रोही समूह हौथिस के खिलाफ अभियान में यमनी सरकारी बलों की मदद कर रहे हैं। इसके चलते उन्होंने कई बार उन दोनों देशों पर हमला किया है। हाल ही में, यमन की राजधानी सना के उत्तर में हौथी विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इलाकों में यमन के सरकारी बलों ने एक अभियान शुरू किया है।

5 दिसंबर को अमेरिकी संसद में एक गंभीर निर्णय लिया गया – उस देश को यह स्वीकार करना होगा कि यहूदी राज्य आंदोलन की आलोचना यहूदी-विरोध का नाम है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने खुद एक भाषण में खुद को यहूदी-राज्य आंदोलन का भागीदार होने का दावा किया है. स्वाभाविक रूप से, इस खबर से संपूर्ण मुस्लिम जगत और फिलिस्तीन समर्थक लोगों में आक्रोश है। वे इसमें ‘इस्लामोफोबिया’ या मुस्लिम-घृणा का भूत देखते हैं। यह नफरत तो है, लेकिन इसमें और भी बहुत कुछ है। सच तो यह है कि अरब-इजरायल संघर्ष में पश्चिमी दुनिया हमेशा इजराइल के साथ रही है। पश्चिम में प्रोटेस्टेंट वामपंथी कोई अपवाद नहीं हैं। फिलीस्तीनी दार्शनिक एडवर्ड सईद अरब-फिलिस्तीनी दुर्दशा के प्रति फ्रांसीसियों की उदासीनता से सिमोन डी ब्यूवोइर या जीन-पॉल सात्रे के समान ही नाराज थे। जो लोग वियतनाम मुक्ति युद्ध के पक्षधर हैं वे फ़िलिस्तीन मुक्ति युद्ध के बारे में चुप क्यों हैं?

हम इज़राइल के प्रति पश्चिमी दुनिया के इस अवांछित पूर्वाग्रह को कैसे समझा सकते हैं? इजराइल की भूमि, एक ओर, फिलिस्तीनियों की भूमि में यहूदियों का अन्यायपूर्ण जबरन उपनिवेशीकरण है, और दूसरी ओर, यह यहूदियों की आत्म-स्थापना का प्रतीक है, जो हजारों लोगों पर अत्याचार कर रहे हैं। वर्षों का. असीरियन, बेबीलोनियन और यूनानी साम्राज्यों द्वारा उत्पीड़न और अंततः यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने के बाद, इब्राहीम की संतानें रोमनों द्वारा पीछा करते हुए पश्चिमी एशिया से लेकर पृथ्वी के छोर तक बिखर गईं। तभी से यहूदी का अर्थ बेघर, अछूत हो गया। यहूदियों का अर्थ है ‘यहूदी बस्ती’ का निर्वासन।

पूर्व-फ्रांसीसी क्रांतिकारी यूरोपीय समाज में, यदि कोई यहूदी पैदल यात्री सड़क पर चलता था, तो ईसाई न केवल उसकी छाया को रौंद देते थे, बल्कि खुले दिन के उजाले में उसका अपमान भी करते थे। यूरोपीय उपनिवेशों में अश्वेतों की तरह नफरत किए जाने वाले यहूदियों को पहली बार फ्रांस में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान पूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त हुए। 19वीं सदी की शुरुआत में जर्मनी के प्रशिया राज्य ने भी यहूदियों की मुक्ति की घोषणा की। यह ऐसा है जैसे यहूदियों के हाथ में चाँद लग गया हो। लेकिन मुक्ति की यह चाहत जल्द ही मैदान में दम तोड़ गई. फ्रांसीसी क्रांति के दौरान मिले पंख को नेपोलियन ने दोबारा काट दिया। प्रशिया का वादा भी भ्रामक साबित हुआ। यहूदियों को सरकार या सेना में ज़िम्मेदार पद संभालने का कोई अधिकार नहीं था।

सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर अपंग, यहूदी राष्ट्रवादी आकांक्षाएं उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुईं, जो एक यहूदी राज्य की योजना में परिणत हुईं, जिसे ‘ज़ायोनीवाद’ या यहूदी-राज्य आंदोलन के रूप में जाना जाता है। इस आंदोलन के संस्थापक थियोडोर हर्ज़ल थे। अपने लेखन में, हर्ज़ेल का दावा है कि उन्होंने हजारों वर्षों के पारंपरिक साहित्य में व्यक्त यहूदी दर्द-आशा-इच्छा के सार पर प्रकाश डाला है। बाइबिल की व्याख्या के अनुसार, भविष्य का यहूदी राज्य वास्तव में सपने देखने वाले की मंदिर-निर्माण परियोजना की तरह, इज़राइल की भूमि और यहूदियों के बीच एक दैवीय समझौते का परिणाम है।