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पहले चरण के कम मतदान पर क्या बोला चुनाव आयोग?

हाल ही में चुनाव आयोग ने पहले चरण के कम मतदान पर बयान दिया है! लोकसभा चुनाव के पहले फेज में वोटिंग प्रतिशत ने अब इलेक्शन कमीशन को भी चिंता में डाल दिया है। चुनाव आयोग को जो आंकडे़ मिले हैं, उसके हिसाब से 2019 की तुलना में इस बार कुल मतदान में लगभग तीन प्रतिशत अंकों की गिरावट देखी गई है। अब बाकी चरणों के लिए ईसीआई नए तरीके से अपनी रणनीति पर काम करेगा। नवीनतम आंकड़ों की मानें तो अब तक 66% फीसदी मतदान पहले चरण में हुआ है। यह अभी भी 2019 के 69 फीसदी के मुकाबले कम है। चुनाव आयोग इस बात को मानता है कि मतदान कम होने का कारण उन्हें बहुत चिंता है। आयोग के एक बड़े अधिकारी ने कहा कि लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह तो था, लेकिन इतना काफी नहीं था कि वे मतदान केंद्र पर जाकर वोट डाल सकें। उन्होंने बताया कि मतदान बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने बहुत कोशिशें कीं। स्वीप कार्यक्रम (SVEEP) के तहत मतदान बढ़ाने की योजना बनाई गई, मशहूर हस्तियों को चुनाव आयोग का दूत बनाकर लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित किया गया, क्रिकेट मैच के दौरान भी लोगों को वोट डालने के लिए जागरूक किया गया और मतदान केंद्रों को भी बेहतर बनाया गया ताकि वोट डालना आसान हो। लेकिन ऐसा लगता है कि ये कोशिशें काफी नहीं रहीं।

चुनाव आयोग कम मतदान के कारणों का विश्लेषण कर रहा है। चुनाव आयोग के पदाधिकारी ने कहा कि इस मुद्दे पर सप्ताह के अंत में होने वाली बैठकों में चर्चा की गई थी और हम मतदान कार्यान्वयन कार्यक्रम के तहत सोमवार तक और अधिक रणनीतियों के साथ सामने आएंगे। सूत्रों के अनुसार, कम मतदान का संभावित कारण गर्मी हो सकती है क्योंकि इस बार मतदान 2019 की तुलना में आठ दिन बाद शुरू हुआ। कई मतदाताओं द्वारा परिणाम को एक पूर्व निष्कर्ष मानते हुए उदासीनता और त्योहार और शादी के मौसम के साथ टकराव को भी फैक्टर माना जा रहा है।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, केवल तीन राज्यों-छत्तीसगढ़, मेघालय और सिक्किम में 2019 की तुलना में अधिक मतदान हुआ। नागालैंड में 57.7 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2019 की तुलना में 25 प्रतिशत से अधिक कम है। मणिपुर में 7.7 प्रतिशत अंक, मध्य प्रदेश में 7 प्रतिशत अंक और राजस्थान और मिजोरम में 6 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज की गई। बिहार में सबसे कम 49.2% मतदान दर्ज किया गया। हालांकि इसने चुनाव आयोग को आश्चर्यचकित नहीं किया क्योंकि सर्वेक्षण में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र को शामिल किया गया था, 2019 में मतदान 53.47% था। यूपी में भी इस बार पहले फेज में 66.5 प्रतिशत से घटकर 61.1 प्रतिशत हो गया।

तमिलनाडु में बड़े टिकट अभियान के बावजूद यह प्रतिशत 69.7% से 72.1% तक गिर गया। इसमें डीएमके और भाजपा की तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन की विवादास्पद ‘सनातन धर्म’ टिप्पणी पर बहस भी खास असर नहीं दिखा पाई। उत्तराखंड में भी मतदाताओं का उत्साह कम देखा गया, जहां मतदान 2019 में 61.5 प्रतिशत से घटकर 57.2 प्रतिशत हो गया। पश्चिम बंगाल, जो एक उच्च-टर्नआउट राज्य रहा है, ने 81.9% पर प्रभावशाली मतदान देखा, लेकिन यह भी 2019 के 84.7% के आंकड़े से कम था।

निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने कहा कि उन मतदाताओं की श्रेणी की पहचान करना मुश्किल है जिन्होंने कम मतदान में योगदान दिया हो सकता है। उन्होंने कहा कि हम मतदाताओं की प्रोफाइल नहीं बनाते हैं और उन्हें अलग-अलग श्रेणियों के रूप में गिनते हैं। मशहूर हस्तियों को चुनाव आयोग का दूत बनाकर लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित किया गया, क्रिकेट मैच के दौरान भी लोगों को वोट डालने के लिए जागरूक किया गया और मतदान केंद्रों को भी बेहतर बनाया गया ताकि वोट डालना आसान हो। लेकिन ऐसा लगता है कि ये कोशिशें काफी नहीं रहीं।ईसी के एक अधिकारी ने कहा कि इसका एकमात्र समाधान उदासीनता को दूर करने और गणना किए जाने के लिए सभी श्रेणियों को प्रोत्साहित करना और तैयार करना है। उम्मीद है कि आयोग 26 अप्रैल को अगले दौर के मतदान से पहले मतदान बढ़ाने की संशोधित रणनीतियों के साथ सामने आएगा।

सोशल मीडिया में ऐसे भी कयास लगाए जा रहे हैं कि पहले चरण में कम वोटिंग से भारतीय जनता पार्टी भी टेंशन में आ गई है। सोशल मीडिया साइट्स जैसे एक्स पर लो वोटिंग पर्सेंट कम होने पर बीजेपी के हारने की भी बात भी कह रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी चर्चा है कि कम वोटिंग पर्सेंट से जीतने का मार्जिन भी कम हो सकता है।

पहले दो चरण के क्रिमिनल उम्मीदवारों के बारे में जानिए!

आज हम आपको पहले दो चरण के क्रिमिनल उम्मीदवारों के बारे में जानकारी देने वाले हैं! सुप्रीम कोर्ट को बताया गया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ पेंडिंग क्रिमिनल केसों के निपटारे के लिए गठित स्पेशल कोर्ट में 2023 में 2 हजार से ज्यादा मामलों में फैसला सुनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कोर्ट सलाहकार विजय हंसारिया ने इस मामले में शीर्ष अदालत में हलफनामा पेश कर बताया कि पेंडिंग केसों के जल्दी निपटान और हाई कोर्ट की निगरानी मामले में निर्देश दिए जाने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोकसभा के पहले दो चरणों के चुनाव में 18 फीसदी उम्मीदवारों के खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर गुहार लगाई गई है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ क्रिमिनल केस का जल्दी निपटारा होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एफिडेविट में बताया गया कि लोकसभा चुनाव के शुरुआती दो फेज में करीब 500 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। एडीआर की 2024 के चुनाव के पहले और दूसरे फेज की रिपोर्ट का हवाला देते हुए हंसारिया ने कहा कि पहले दो चरणों में कुल 2810 उम्मीदवारों में से 501 के खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज हैं और यह कुल उम्मीदवारों का 18 फीसदी है। कोर्ट सलाहकार की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले के निर्देश और हाई कोर्ट द्वारा उठाए गए कदम के कारण स्पेशल कोर्ट में 2023 में 2 हजार से ज्यादा केसों में फैसला हुआ है।कुल उम्मीदवारों का 19 फीसदी का आंकड़ा था और इनमें 13 फीसदी यानी 1070 के खिलाफ गंभीर मामलों में केस दर्ज थे। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की ओर से पीआईएल दाखिल की गई है और कहा गया है कि सांसदों व विधायकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई जल्द हो और उनमें जल्द फैसला सुनाया जाना चाहिए। इसके बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में केस लंबित है और कई केस काफी दिनों से लंबित है। हाई कोर्ट से मिली जानकारी के मुताबिक रिपोर्ट में कहा गया है कि एक जनवरी 2023 तक लॉ मेकर्स के खिलाफ 4697 क्रिमिनल केस पेंडिंग थे। एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की ओर से पीआईएल दाखिल की गई है और कहा गया है कि सांसदों व विधायकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई जल्द हो और उनमें जल्द फैसला सुनाया जाना चाहिए।पिछले साल 2018 केसों का निपटारा हुआ साथ ही 2023 में 1746 नए केस दर्ज हुए और इस तरह से एक जनवरी 2024 तक 4474 केस लंबित हैं। ही रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें 327 के खिलाफ ऐसे मामले दर्ज हैं जो गंभीर किस्म के हैं और उसमें दोषी पाए जाने पर पांच साल या उससे ज्यादा सजा का प्रा‌वधान है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी करीब करीब यही स्थिति थी जिसमें कुल 7928 उम्मीदवारों में 1500 के खिलाफ क्रिमिनल केस थे और यह कुल उम्मीदवारों का 19 फीसदी का आंकड़ा था और इनमें 13 फीसदी यानी 1070 के खिलाफ गंभीर मामलों में केस दर्ज थे। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की ओर से पीआईएल दाखिल की गई है और कहा गया है कि सांसदों व विधायकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई जल्द हो और उनमें जल्द फैसला सुनाया जाना चाहिए।

कोर्ट सलाहकार की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले के निर्देश और हाई कोर्ट द्वारा उठाए गए कदम के कारण स्पेशल कोर्ट में 2023 में 2 हजार से ज्यादा केसों में फैसला हुआ है। इसके बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में केस लंबित है और कई केस काफी दिनों से लंबित है।लोकसभा चुनाव के शुरुआती दो फेज में करीब 500 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। एडीआर की 2024 के चुनाव के पहले और दूसरे फेज की रिपोर्ट का हवाला देते हुए हंसारिया ने कहा कि पहले दो चरणों में कुल 2810 उम्मीदवारों में से 501 के खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज हैं और यह कुल उम्मीदवारों का 18 फीसदी है। कोर्ट सलाहकार की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले के निर्देश और हाई कोर्ट द्वारा उठाए गए कदम के कारण स्पेशल कोर्ट में 2023 में 2 हजार से ज्यादा केसों में फैसला हुआ है। हाई कोर्ट से मिली जानकारी के मुताबिक रिपोर्ट में कहा गया है कि एक जनवरी 2023 तक लॉ मेकर्स के खिलाफ 4697 क्रिमिनल केस पेंडिंग थे। पिछले साल 2018 केसों का निपटारा हुआ साथ ही 2023 में 1746 नए केस दर्ज हुए और इस तरह से एक जनवरी 2024 तक 4474 केस लंबित हैं।

क्या सरकार छीन सकती है आपकी संपत्ति क्या है सच?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार आपकी संपत्ति छीन सकती है या नहीं और इसके पीछे का सच क्या है! क्या आपकी संपत्ति सरकार ले सकती है? क्या उसे दूसरे लोगों में बांटा जा सकता है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो इन दिनों चुनावी रैलियों में गूंज रहे हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को राजस्थान के बांसवाड़ा में जनसभा में कहा कि कांग्रेस का घोषणापत्र कह रहा है कि वे माताओं-बहनों के सोने का हिसाब करेंगे। फिर उस संपत्ति को बांट देंगे। इसे उनको बांटेंगे जिनके बारे में मनमोहन सिंह की सरकार ने कहा था कि संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। मोदी ने कहा कि पहले जब उनकी सरकार थी, तब उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब ये है कि वे संपत्ति जुटाकर जिनके ज्यादा बच्चे हैं, उनको बांटेंगे। घुसपैठियों (बांग्लादेशी) को बांटेंगे। आपकी मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा? मोदी ने कहा कि क्या आपको ये मंजूर है ? आपकी संपत्ति सरकार को ऐंठने का अधिकार है क्या? क्या आपकी संपत्ति को, आपकी मेहनत से कमाई संपत्ति को सरकार को ऐंठने का अधिकार है? मोदी के इस बयान पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पलटवार करते हुए कहा कि पहले चरण के मतदान में निराशा हाथ लगने के बाद नरेंद्र मोदी के झूठ का स्तर इतना गिर गया है कि घबरा कर वह अब जनता को मुद्दों से भटकाना चाहते हैं। कांग्रेस के ‘क्रांतिकारी मेनिफेस्टो’ को मिल रहे अपार समर्थन के रुझान आने शुरू हो गए हैं। देश अब अपने मुद्दों पर वोट करेगा, अपने रोजगार, अपने परिवार और अपने भविष्य के लिए वोट करेगा। भारत भटकेगा नहीं!

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हैदराबाद में 6 अप्रैल को चुनावी रैली में ‘जितनी आबादी उतना हक’ का नारा देते हुए देश में आर्थिक-सामाजिक सर्वे कराने की बात कही थी। उन्होंने कहा, अगर पार्टी जीतकर सत्ता में आई तो देश में जातिगत जनगणना के साथ आर्थिक सर्वे भी कराया जाएगा ताकि पता लगाया जा सके कि किसके पास कितना पैसा पहुंच रहा है। यानी की देश की अधिकतर संपत्ति पर किसका कंट्रोल है। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भी सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराने का वादा किया है। पार्टी का कहना है कि इन्हीं आंकड़ों के आधार पर जनता को योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।

आजादी के बाद भारत में संपत्ति के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 के तहत एक मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी। इन प्रावधानों ने नागरिकों को संपत्ति अर्जित करने, धारण करने और इसका निपटारा करने के अधिकार की गारंटी दी। कानून के अधिकार के बिना संपत्ति से वंचित करने पर रोक लगा दी। बाद में इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 के जरिए लाया गया, जिसने संपत्ति के मूल अधिकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया। अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 को 20 जून, 1979 से हटा दिया गया। इस संशोधन से संविधान में एक नया प्रावधान अनुच्छेद 300-A जोड़ा गया, जिसने संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के बजाय विधिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया।

फिलहाल, संपत्ति का अधिकार मुख्य रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 300-A द्वारा शासित होता है। इसमें कहा गया है कि कानून के अधिकार के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। पहले के प्रावधानों के विपरीत मौजूदा स्थिति यह है कि संपत्ति का अधिकार पूर्ण नहीं है और इसे कानून द्वारा विनियमित किया जा सकता है। इस संशोधन के अनुसार, निजी संपत्ति का होना एक मौलिक मानव अधिकार है। इसे कानूनी प्रक्रियाओं और आवश्यकताओं का पालन किए बिना राज्य द्वारा नहीं लिया जा सकता है।

अब जरा 19वीं सदी की ओर चलते हैं, जब जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने संपत्ति के बारे में दो किताबों में लिखकर पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया।’कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ और ‘दास कैपिटल’ जैसी किताबों ने एक समय पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों पर राजनीतिक और आर्थिक रूप से निर्णायक असर डाला था। माना जाता है कि रूसी क्रांति के बाद सोवियत संघ का उदय इस बात का उदाहरण था। यहां तक कि 20वीं सदी के इतिहास पर समाजवादी खेमे का बहुत असर रहा है। पहले ये समझ लेते हैं कि कार्ल मार्क्स के वे कौन से सिद्धांत हैं, जिन्होंने नए वर्ग और संपत्ति के बंटवारे को लेकर नया ताना-बाना समझाया था।

आखिर वर्तमान में जेल में क्या कर रहे हैं छोटा राजन?

आज हम आपको बताएंगे कि वर्तमान में छोटा राजन जेल में क्या कर रहे हैं! कहते हैं कि जेल में बड़े-बड़ों की हेकड़ी निकल जाती है। कोई भी आरोपी अगर जेल गया और ज्यादा समय उसे वहां रुकना पड़ा तो मानो उसके चेहरे का नूर ही गायब हो जाता है। हालांकि, एक समय मुंबई में खौफ का दूसरा नाम रहे अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन को लेकर ये बात सही साबित नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि उसकी एक नई तस्वीर सामने आई है। ये तस्वीर ऐसे समय में आई जब वो पिछले 9 साल से दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद है। इसे देखकर कहा जा सकता है कि छोटा राजन मानो जेल में रहकर और भी ज्यादा स्वस्थ हो गया है। उसके चेहरे पर एक चमक सी आ गई है। हम ऐसा इसलिए कह रहे क्योंकि अक्टूबर 2015 में जब उसे इंडोनेशिया के बाली से प्रत्यर्पण कर भारत लाया गया था तो उस समय भी उसकी तस्वीरें सामने आई थी। जिसमें वो काफी थका-थका सा नजर आ रहा था। हालांकि, अब जिस तरह से वो बेहद फिट नजर लग रहा, उसके बाद चर्चा शुरू हो गई है कि क्या छोटा राजन जेल के अंदर कोई टॉनिक ले रहा? दाऊद के सबसे कट्टर दुश्मन राजेंद्र सदाशिव निखलजे उर्फ छोटा राजन की इस नई तस्वीर ने उसकी भी टेंशन बढ़ा दी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि दाऊद ने कई बार छोटा राजन को मरवाने की कोशिश की। हालांकि, उसका सपना कभी पूरा नहीं हुआ। यही नहीं कोरोना काल के दौरान छोटा राजन के कोविड संक्रमित और बेहद गंभीर स्थिति होने की खबरें भी आई थीं। उस समय कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी दावा किया गया था कि उसकी मौत हो गई। हालांकि, तिहाड़ के सबसे सुरक्षित जेल नंबर-2 में बंद छोटा राजन की मौत को लेकर कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई, ऐसे में वो सभी दावे अफवाह साबित हुए।

अब जिस तरह से छोटा राजन की एक नहीं दो-दो तस्वीरें सामने आई उसे लेकर चर्चा तेज हो गई। दोनों तस्वीर को देखें तो एक में वो कोरोना संक्रमित होने पर दिल्ली एम्स में इलाज कराता नजर आ रहा। वो अस्पताल के बेड पर पड़ा हुआ है। उसकी हालत बेहद गंभीर नजर आ रही। हालांकि, इसी के साथ एक और तस्वीर भी सामने आई। इसमें वो ऐसा लग रहा मानो पुलिस वैन के अंदर है। इसमें वो बिल्कुल फिट दिख रहा। उसके चेहरे की चमक से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो जेल में रहकर भी स्वास्थ्य पर फोकस कर रहा। ऐसी भी खबरें है कि छोटा राजन जेल में रोजाना योगा करता है। उसके पूरी तरह फिट नजर आने की एक वजह ये भी मानी जा रही कि वो जेल में खुद सुरक्षित महसूस कर रहा। उसे दाऊद के गुर्गों का भी खतरा नहीं सता रहा।

छोटा राजन के फिट नजर आने वाली नई तस्वीर को लेकर चर्चा इसलिए भी हो रही क्योंकि कई दूसरे मामलों में जेल की सजा काटने वालों की हालत चौंकाने वाली थी। आपको जेट एयरवेज के फाउंडर नरेश गोयल की वो तस्वीर याद होगी, जब जेल जाने के बाद उनका लुक ही बदल गया था। इसी साल जनवरी में जेट एयरवेज के फाउंडर नरेश गोयल मुंबई की आर्थर रोड जेल में बंद थे। एक स्पेशल कोर्ट ने उन्हें अपनी बीमार पत्नी से मिलने की अनुमति दी थी। उनके जेल से बाहर निकलने की एक तस्वीर मीडिया सामने आई। कभी आसमान से बातें करने वाले नरेश गोयल इस तस्वीर में टूटे हुए और असहाय लग रहे थे। उनकी शेव बढ़ी हुई थी। नरेश गोयल केनरा मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसे थे। इस तरह कभी आसमान में उड़ने वाले नरेश गोयल गंभीर हालात से गुजर रहे थे।

इंद्राणी मुखर्जी का भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ। जेल की रोटी ने इंद्राणी की मानो सूरत ही बदल के रख दी। शीना बोरा मर्डर केस में आरोपी इंद्राणी अक्टूबर 2015 में जेल की सजा काट रही थी। इसी दौरान उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसे गंभीर हालात में मुंबई के जेजे अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। जेल की जिंदगी ने चमक-धमक में खोई रहने वाली इंद्राणी की मानो सूरत ही बदल दी थी। उसे बेहोशी की हालत में अस्पताल लाया गया था। उस समय इंद्राणी की जो तस्वीर सामने आई वो उसका हाल बयां करने के लिए काफी थी।

निठारी कांड के आरोपी मनिंदर सिंह पंढेर को अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर जेल से बरी कर दिया गया था। दिसंबर 2006 में निठारी कांड का खुलासा हुआ था। तब D-5 कोठी के पास नाले में नर कंकाल मिले थे। साल 2005 और 2006 में हुए निठारी कांड में कुल 19 मुकदमे दर्ज हुए थे। बाद में ये केस सीबीआई को सौंप दिया गया था। 2017 में पंढेर को सीबीआई कोर्ट ने दो मामलों में फांसी की सजा थी। इस दौरान जब वो जेल रहा तो उसकी हालत बेहद खराब हो गई थी। पूरे रौब में नजर आने वाला पंढेर जब हाईकोर्ट के आदेश पर 2023 में जेल से निकला तो कमजोर नजर आ रहा था। अब इन तीनों ही मामलों में आरोपियों की तस्वीर से उनकी स्थिति को समझा जा सकता है। कैसे जेल जाने से पहले का उनका और जेल की सजा के बाद बदली उनकी सूरत सब स्थिति बयां कर रही है। वहीं इन सबसे अलग छोटा राजन का लुक बिल्कुल अलग ही नजर आ रहा। यही वजह है कि उसकी नई तस्वीर सुर्खियां बटोर रही है।

आखिर क्या है राजनीति के मंगलसूत्र की खबर?

आज हम आपको राजनीति के मंगलसूत्र की खबर सुनाने जा रहे हैं जिसमें पीएम मोदी से लेकर राहुल गांधी फंसते जा रहे हैं! लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा जुबानी जंग भी तेज होती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को फिर दोहराया कि विपक्षी पार्टी और इंडिया ब्लॉक की नजर ‘लोगों की कमाई और संपत्ति पर है’। उन्होंने एक दिन पहले कहा था कि कांग्रेस सरकार देश की संपत्ति को ‘घुसपैठियों’ और ‘अधिक बच्चे पैदा करने वालों’ में बांट देगी। उन्होंने यह भी कहा था कि कांग्रेस का आशय मुसलमानों से है। अलीगढ़ में एक रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस के शहजादे कहते हैं कि वे जांच करवाएंगे कि कौन कितना कमाता है। आपके पास कितनी संपत्ति है, आपके पास कितना पैसा है, आपके पास कितने घर हैं। सरकार इस संपत्ति पर कब्जा करेगी और इसे सभी को बांटेगी।’ पीएम मोदी ने कहा कि हमारी माताओं और बहनों के पास सोना है। यह स्त्रीधन है, इसे पवित्र माना जाता है। कानून भी इसकी रक्षा करता है। उनकी नजर आपके मंगलसूत्र पर है।’ जैसे ही पीएम मोदी ने ये टिप्पणी की, कांग्रेस तुरंत पलटवार के मूड में आ गई। पीएम मोदी के ‘मंगलसूत्र’ वाले कमेंट पर कांग्रेस ने चुनाव आयोग पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने दावा किया कि ये बात उनके घोषणापत्र में कही गई है। कांग्रेस का कहना है कि पीएम मोदी ने ‘विभाजनकारी और दुर्भावनापूर्ण’ बयान देकर आचार संहिता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है। पार्टी ने चुनाव आयोग से पीएम मोदी के खिलाफ एक्शन की मांग कर दी है। यही नहीं पार्टी ने ये भी बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कांग्रेस के घोषणापत्र के बारे में ‘उन्हें शिक्षित करने’ के लिए पीएम मोदी से मिलने का समय भी मांगा है।

अब सवाल ये कि कांग्रेस की ओर से जारी घोषणा पत्र, जिसे पार्टी ने ‘न्याय पत्र’ नाम दिया है, इसमें कहा क्या गया है? कांग्रेस के घोषणापत्र में संपत्ति के पुनर्वितरण का कोई विशेष उल्लेख नहीं है, लेकिन वादा किया गया है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है, तो वह ‘नीतियों में जरूरी बदलावों के जरिए संपत्ति और आय की बढ़ती असमानता को दूर करेगी’। घोषणापत्र के पहले अध्याय ‘समानता’ में ‘जातिगत भेदभाव’ को ‘रियलिटी’ के रूप में बताया गया है। ये तर्क दिया गया है कि ‘ओबीसी, एससी और एसटी भारत की आबादी का लगभग 70 फीसदी हिस्सा हैं। हाई रैंकिंग वाले प्रोफेशन, सर्विस और कारोबार में उनका प्रतिनिधित्व तय अनुपात से कम है।’ इसके बाद इसमें ‘जातियों और उप-जातियों, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की गणना के लिए राष्ट्रव्यापी सामाजिक-आर्थिक और जातीय जनगणना कराने’ का वादा किया गया है। इसमें कहा गया है कि ‘आंकड़ों के आधार पर हम सकारात्मक कार्रवाई के एजेंडे को मजबूत करेंगे।’

कांग्रेस के घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों को लेकर कहा गया है कि ‘भारत की पूर्ण क्षमता को साकार करने के लिए माइनॉरिटीज का आर्थिक सशक्तिकरण एक आवश्यक कदम है।’ इसमें यह वादा किया गया है कि सुनिश्चित किया जाएगा बैंक अल्पसंख्यकों को बिना किसी भेदभाव के इंस्टीट्यूशनल क्रेडिट उपलब्ध कराएंगे।’ इसके अलावा, ये भी कहा गया है कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि अल्पसंख्यकों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक रोजगार, लोक निर्माण अनुबंध, कौशल विकास, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में बिना किसी भेदभाव के उचित अवसर प्राप्त हों।

अब सवाल ये कि प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों कहा कि राहुल गांधी लोगों की संपत्ति की जांच की बात कर रहे? दरअसल, राहुल गांधी अक्सर कास्ट सेंशस और उसके बाद इकोनॉमिक मैपिंग की जरूरत के बारे में बोलते रहे हैं। ऐसी टिप्पणी उन्होंने इस चुनाव अभियान के दौरान भी कही हैं। 9 मार्च को उन्होंने एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा कि बिहार में किए गए जातीय सर्वेक्षण से पता चला है कि 88 फीसदी गरीब दलित,यही नहीं पार्टी ने ये भी बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कांग्रेस के घोषणापत्र के बारे में ‘उन्हें शिक्षित करने’ के लिए पीएम मोदी से मिलने का समय भी मांगा है। आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों से आते हैं। उन्होंने आगे कहा कि बिहार से जो आंकड़े आए हैं, वे देश की वास्तविक तस्वीर की एक छोटी सी झलक मात्र हैं। हमें इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि देश की गरीब आबादी किन परिस्थितियों में रह रही है। इसलिए हम दो ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहे- जातीय गणना, इकोनॉमिक मैपिंग। इसके आधार पर हम आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा को खत्म करेंगे।

जब पहले आम सभा चुनाव में महिलाओं के नाम उनके पति या पिता के नाम से जाने जाते थे!

एक ऐसा समय भी था जब पहले आम सभा चुनाव में महिलाओं के नाम उनके पति या पिता के नाम से जाने जाते थे! देश के पहले आम चुनाव के वक्त वोटर लिस्ट में महिलाओं का नाम सीधे-सीधे नहीं लिखवाया जाता था। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का परिचय कुछ इसी तरह से दिया जाता रहा है। लेकिन, एक व्यक्ति की कोशिशों ने यह तस्वीर बदलकर रख दी। वह थे देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन, जो नाम से भले ही सुकुमार थे, मगर फैसलों से बेहद सख्त। बात तब की है, जब 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हो चुका था। उस वक्त अंतरिम सरकार चल रही थी। ऐसे में यह सोचा गया कि देश का शासन लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार द्वारा चलाया जाए। लोग यह मानते रहे कि यह काम कुछ ही महीने का है। हालांकि, नई सरकार का गठन इतना भी आसान नहीं था। जनवरी, 1950 में चुनाव आयोग बना और होनहार सुकुमार सेन को देश का पहला चुनाव आयुक्त की कमान दी गई। सुकुमार सेन के सामने चुनाव क्षेत्रों के नामांकन से लेकर वोटर लिस्ट बनाने जैसी कई बड़ी चुनौतियां थीं। आखिरकार कड़ी मशक्कत के बाद मतदाता लिस्ट का पहला मसौदा प्रकाशित हुआ तो पता चला कि इसमें 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए। इन महिलाओं को फलाने की बेटी या फलाने की बीवी के रूप में दर्ज किया गया था। आजादी से पहले कुछ इसी तरह से महिलाओं के नाम लिखे जाते थे। मगर, ये आजाद भारत था। सुकुमार सेन अड़ गए और कहा कि महिलाओं को उनके अपने नाम से ही जाना जाएगा। इसके बाद से आम चुनावों में महिला वोटर्स के नाम ही उनकी पहचान बने।

आजादी के वक्त देश में 17 करोड़ वोटर्स थे, जो आज की तारीख में करीब 98 करोड़ हो चुके हैं। इतना लंबा सफर तय करने में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इससे ज्यादा भूमिका सुकुमार सेन जैसे ईमानदार और दृढ़ कर्तव्य वाले चुनाव आयुक्तों की रही। सुकुमार सेन ने वोटर्स को ताकतवर बनाने का बीड़ा उठाया। 17 करोड़ वोटर्स को 3200 विधायक और लोकसभा के लिए 489 सांसद चुनने थे। इन वोटर्स में से महज 17 फीसदी ही साक्षर थे। ऐसे में चुनाव आयोग को मतदान के खास तरीके ईजाद करने पड़े। आयोग ने चुनाव कराने के लिए 3 लाख से ज्यादा अफसरों और चुनावकर्मियों को ट्रेनिंग दी गई।

सुकुमार सेन की कवायद का अंग्रेज मजाक उड़ाते कि आने वाले वक्त में दुनिया लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की बेहूदी नौटंकी देखेगी। किसी ने कहा कि भारत में यूनिवर्सल वोटिंग राइट्स कराने का आइडिया ठीक नहीं है, क्योंकि उस समय तक यूरोप के बहुत से देशों और यहां तक कि खुद को लोकतंत्र का बड़ा नुमाइंदा कहलाने वाले अमेरिका में भी महिलाओं को वोटिंग राइट्स नहीं थे। मगर, सुकुमार सेन लोगों के खिल्ली उड़ाने की परवाह नहीं की और न ही उन्होंने सफल चुनाव कराने के लिए किसी तरह का कोई समझौता ही किया।

पहले आम चुनाव में सुकुमार सेन ने यह फैसला किया कि हर एक मतदान केंद्र में हर उम्मीदवार के लिए एक मतपेटी रखी जाएगी और मतपेटी पर प्रत्याशी का चुनाव चिह्न छपा होगा। हर वोटर को एक खाली मतपत्र दिया जाएगा, जिसे वह अपने पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डालेगा। इस काम के लिए 20 लाख स्टील के बक्सों का इस्तेमाल हुआ। चुनाव चिन्ह और बाकी ब्यौरों को दर्ज करने के लिए मतपेटी को पहले सरेस कागज या ईंट के टुकड़े से रगड़ना पड़ता था। शुरुआती दो चुनावों के बाद यह तरीका बदल दिया गया। अब मतपत्र पर हर उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती थी। यही तरीका अगले 40 सालों तक अपनाया जाता रहा। 90 के दशक के आखिर में आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल शुरू किया और 2004 तक पूरे देश में ईवीएम का इस्तेमाल होने लगा।

सुकुमार सेन ने आखिर सारी तैयारियों के बाद अक्टूबर, 1951 से फरवरी, 1952 तक चुनाव कराया। यह 1952 का ही चुनाव कहा जाता है, क्योंकि ज्यादातर चुनाव 1952 में हुआ। चुनाव कैंपेन, वोटिंग और मतगणना में 6 महीने लग गए। लोगों ने इस चुनाव में जमकर भागीदारी की। कुल वोटर्स में से 50 फीसदी से ज्यादा ने वोट डाले। यूनिवर्सल वोटिंग राइट्स वाले इस चुनाव ने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। पूरी दुनिया तक यह मैसेज गया कि भारत ने कामयाबी के साथ इतना बड़ा चुनाव करा लिया। 1952 का चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

क्या भारत देश को नहीं समझ पा रही है पश्चिमी मीडिया?

भारत देश को पश्चिमी मीडिया ना पहले समझ पाई थी ना अब समझ पा रही है! 1980 और 1990 के दशक की शुरुआत में हिंदी पट्टी में चुनावों को कवर करने वाले पत्रकारों को अक्सर बीबीसी के एक कथित सर्वेक्षण पर सवालों का सामना करना पड़ता था। यह पूछे जाने पर कि क्या बीबीसी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र से अमुक उम्मीदवार की जीत की भविष्यवाणी की है? सुझाव हास्यप्रद था। बीबीसी को यूपी के किसी कम चर्चित जिले की सीट के नतीजे पर अटकलें क्यों लगानी चाहिए? यह बेतुका था लेकिन अफवाहें संक्रामक थीं। बीबीसी पोल की घटना को देखने के दो तरीके हैं। सबसे पहले, इसे बुश टेलीग्राफ के अपेक्षाकृत हानिरहित, बाद वाले मॉर्डन उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। बुश टेलीग्राफ से आशय उस साधन से है जिससे जंगल के निवासी तेजी से खबर को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलाते हैं। इसी तर्ज पर इंदिरा गांधी के आपातकाल को कमजोर हो गया था। उससे भी पहले, 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह किया गया था।दूसरे, ऐसे समय में जब भारतीय प्रेस की पहुंच सीमित थी और सरकारी स्वामित्व वाले मीडिया की विश्वसनीयता संदिग्ध थी, बीबीसी का आह्वान राजनीतिक मान्यता का एक साधन बन गया। इसने समाजवाद की दोपहर के दौरान विदेशी मीडिया की चकित कर देने वाली विश्वसनीयता को प्रदर्शित किया। याद करें कि राजीव गांधी को 1984 में अपनी मां की हत्या की प्रामाणिक खबर पाने के लिए बीबीसी के जोरदार शॉर्टवेव प्रसारण को देखना पड़ा था। तब से, भारत और इसके मीडिया परिवेश में तेजी से बदलाव आया है। विदेशी मीडिया अब प्रशंसा और देवीकरण का विषय नहीं रह गया है। यदि सोशल मीडिया कोई संकेत है, तो द इकोनॉमिस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) आदि जैसे सम्मानित प्रकाशनों को आज अपने स्वयं के राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देने और एक मुखर, आत्मविश्वासी भारत को समझने में विफलता के लिए कड़ी आलोचना की जा रही है।

 अतीत में, विदेशी मीडिया ने समय-समय पर सरकारों की आलोचना की थी। इंदिरा गांधी ने मुश्किल से उनकी उपस्थिति को बर्दाश्त किया था – लेकिन, आज, पश्चिमी मीडिया के प्रति मोदी सरकार की अधीरता को भारत के मध्यम वर्ग के एक बड़े वर्ग द्वारा शेयर किया जाता है। यह धारणा कि पश्चिम के सामने भारत की जो तस्वीर पेश की जा रही है, वह वैसी ही है जिसे महात्मा गांधी ने एक बार “सेनेट्ररी इंस्पेक्टर की रिपोर्ट” के रूप में वर्णित किया था, यह अब भारतीयों के बीच व्यापक है। यह उनके अपने जीवन के अनुभव से मेल नहीं खाता है। अधिकांश समस्या सांस्कृतिक प्रतीत होती है। कांग्रेस-प्रभुत्व वाले प्राचीन शासन के महानगरीय, अंग्रेजी नेतृत्व से निपटने के आदी, विदेशी संवाददाता आज राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बीजेपी नेतृत्व से अलग हो गए हैं जो स्वदेशी सेटिंग में अधिक घरेलू है। पिछले दशक में शासक वर्ग के सामाजिक बदलाव को पश्चिम के भारत-दर्शक पूरी तरह से पचा नहीं पाए हैं। यह सामाजिक दूरी इस धारणा से जटिल हो गई है कि नया भारत प्रांतीय एलीट क्लास की दया पर निर्भर है।

वैश्विक मामलों के बारे में भारतीय मीडिया की समझ पर टिप्पणी करते हुए, द इकोनॉमिस्ट के बरगद कॉलम ने अगस्त 2023 में लिखा: ‘दुनिया में भारत की भूमिका पर न्यू मीडिया फोकस अति-पक्षपातपूर्ण, राष्ट्रवादी और अक्सर आश्चर्यजनक रूप से गलत जानकारी वाला होता है।’ अपवादों में फलता-फूलता मोदी विरोधी इको सिस्टम शामिल है जिसके घटते स्थानीय प्रभाव की भरपाई इसकी वैश्विक उपस्थिति से होती है। इनमें मुख्य रूप से पश्चिमी परिसरों में रहने वाले शिक्षाविद् शामिल हैं, जिनकी भारत के गेटकीपर के रूप में भूमिका को मोदी ने अनाप-शनाप तरीके से नजरअंदाज कर दिया है। उदार अहंकार के पुजारियों पर द इकोनॉमिस्ट के तिरस्कारपूर्ण तिरस्कार को फेंकने का प्रलोभन अनूठा है। भारत आम चुनाव शुरू हो चुका है, यह सुझाव देने के लिए एक संगठित प्रयास प्रतीत होता है कि परिणाम को राजनीतिक वैधता से अलग किया जाना चाहिए। स्वीडन स्थित वी-डेम इंस्टीट्यूट की डेमोक्रेसी रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत में अब एक लोकतंत्र नहीं बल्कि ‘चुनावी निरंकुशता’ है। हालांकि ऐसा निष्कर्ष स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के ‘लोकतंत्र और लोगों के विचारों की अभिव्यक्ति और गतिविधियों को कमजोर करने वाले दमन के पैटर्न’ पर आधारित है। हालांकि, वास्तव में इसे भगवा चुनौती के प्रति कांग्रेस की अप्रभावी प्रतिक्रिया पर नाराजगी से अलग नहीं किया जा सकता है।

राहुल गांधी की यात्रा में शामिल लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक प्रोफेसर ने कहा है कि चुनाव स्वतंत्र तो होगा, लेकिन निष्पक्ष नहीं होगा। फाइनेंशियल टाइम्स में, बीजेपी की निर्णायक जीत की संभावना को आर्थिक विकास के लिए लोकतंत्र को नजरअंदाज करने की एशियाई प्रवृत्ति के रूप में समझाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस जेनेटिक कमी को ‘वंश’ के वापस सत्ता में आने के बाद ठीक किया जा सकता है। तब तक, जैसा कि चैथम हाउस की रिपोर्ट बताती है, भारत के लोकतंत्र का संरक्षण पश्चिम की निरंतर सतर्कता पर निर्भर होना चाहिए। संक्षेप में, यह दावा किया जा रहा है कि चुनाव बिल्कुल पक्के नहीं हैं क्योंकि परिणाम पहले से तय निष्कर्ष जैसा लगता है। यदि जनमत सर्वेक्षणों ने मोदी की हार का संकेत दिया होता, तो चुनावी निरंकुशता चमत्कारिक रूप से प्रतिस्पर्धी राजनीति के उत्सव में बदल गई होती। 4 जून के बाद ईवीएम में हेरफेर की थ्योरी गेस्ट रोल में आने की संभावना के साथ, यह माना जा रहा है कि भारत हिंदू बहुसंख्यक शासन की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यह असंतुष्टों और अल्पसंख्यकों के लिए जीवन को असहनीय बना देगा। एक फाइनेंशियल टाइम्स के पत्रकार ने यहां तक पूछा है, ‘क्या यह भारत का आखिरी लोकतांत्रिक चुनाव होगा?

यह चेतावनी कि लोकतंत्र सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दावे के साथ असंगत है, पश्चिमी धारणा से उत्पन्न होती है कि उदार लोकतांत्रिक धारणाओं को राष्ट्रवाद की रूपरेखा को आकार देना चाहिए। उदारवादी पश्चिम के दृष्टिकोण से, मोदी हंगरी के दूसरे नेता विक्टर ओर्बन हैं, जिन्होंने यूरोप की ईसाई विरासत पर एक विकृत, नियम-आधारित व्यवस्था पर जोर दिया है। मोदी ने इन चुनावों को एक दृढ़ और आत्मविश्वासी व्यक्ति के लिए जनादेश के रूप में पेश किया है। भारत विकसित देशों की श्रेणी में, ऐसे भारत का उदय यथास्थिति को अस्थिर कर देगा। इसलिए उनकी वैधता पर सवाल उठाने के लिए यह एक एहतियाती हमला है। ये टूलकिट पॉलिटिक्स है।

आखिर लॉरेंस बिश्नोई की हिट लिस्ट में कौन-कौन है शामिल?

आज हम आपको बताएंगे कि लॉरेंस बिश्नोई की हिट लिस्ट में कौन-कौन शामिल है! बॉलीवुड एक्टर सलमान खान के घर पर हुई फायरिंग को लेकर कुख्यात गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई एक बार फिर खबरों में है। पुलिस ने इस मामले में गुजरात के भुज से दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। अभी तक की पूछताछ में दोनों ने कबूल किया है कि वो लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े हुए हैं। ऐसा पहली बार नहीं है, जब सलमान खान इस खूंखार गैंगस्टर के निशाने पर हैं। सबसे पहले साल 2018 में लॉरेंस बिश्नोई ने अपने खास गुर्गे संपत नेहरा को सलमान खान की हत्या करने के लिए भेजा था। हालांकि, संपत नेहरा पकड़ा गया और लॉरेंस का प्लान फेल हो गया। इसके बाद भी उसने कई बार सलमान को डराने की कोशिश की। पिछले साल एनआईए ने इस बात का खुलासा किया था कि लॉरेंस बिश्नोई की हिट लिस्ट में सलमान खान का नाम शामिल हैं। सलमान के अलावा इस लिस्ट में 9 लोगों के नाम और हैं। शगुनप्रीत, दिवंगत पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला के मैनेजर थे और उनके सारे काम संभालते थे।अमित शरण की हत्या में सुखप्रीत का हाथ था और वो इसका बदला जरूर लेगा। लकी पटियाल का नाम लॉरेंस की उस लिस्ट में शामिल है, जिन्होंने मिड्डूखेड़ा के हत्यारों का साथ दिया। इसके अलावा लॉरेंस ने बताया कि लकी पटियाल ने उसके साथी गुरलाल बराड़ की भी हत्या की थी। गोंडर गैंग का गुर्गा रम्मी मसाना गैंगस्टर लॉरेंस के निशाने पर है। लॉरेंस ने पूछताछ में बताया था कि वो रम्मी से अपने चचेरे भाई अमनदीप की हत्या का बदला लेना चाहता है। एनआईए की पूछताछ में लॉरेंस ने बताया था कि शगुनप्रीत ने उसके करीबी विक्की मिड्डूखेड़ा के हत्यारे को छिपने में मदद की थी। तभी से, वो शगुनप्रीत की जान का दुश्मन है।

मनदीप धालीवाल गैंगस्टर लक्की पटियाल का साथी है। पूछताछ के दौरान लॉरेंस ने कहा कि मनदीप ने भी शगुनप्रीत की तरह विक्की मिड्डूखेड़ा के हत्यारे का साथ दिया था। मनदीप ‘ठग्स-लाइफ’ नाम से अपना एक अलग गैंग चलाता है। लॉरेंस की हिट लिस्ट में उसका नाम है। कौशल चौधरी से लॉरेंस बिश्नोई की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। लॉरेंस ने एनआईए को बताया था कि कौशल चौधरी ने मिड्डूखेड़ा की हत्या में शामिल भोलू शूटर, अनिल लाठ और सनी लेफ्टी को हथियार मुहैया कराए थे। इसके बाद से ही लॉरेंस ने तय कर लिया था कि वो कौशल चौधरी को नहीं छोड़ेगा।

लॉरेंस का मानना है कि कौशल चौधरी के साथ मिलकर गैंगस्टर अमित डागर ने मिड्डूखेड़ा के मर्डर की प्लानिंग तैयार की थी। एनआईए के मुताबिक, अमित डागर का नाम लॉरेंस की हिट लिस्ट में है। लॉरेंस बिश्नोई का दूसरा दुश्मन गैंग बंबीहा है, जिसकी कमान सुखप्रीत सिंह बुड्ढा के हाथ में है। देवेंद्र बंबीहा की मौत के बाद सुखप्रीत इस गैंग को संभाल रहा है। लॉरेंस ने एनआईए को बताया था कि उसके साथी अमित शरण की हत्या में सुखप्रीत का हाथ था और वो इसका बदला जरूर लेगा। लकी पटियाल का नाम लॉरेंस की उस लिस्ट में शामिल है, जिन्होंने मिड्डूखेड़ा के हत्यारों का साथ दिया। इसके अलावा लॉरेंस ने बताया कि लकी पटियाल ने उसके साथी गुरलाल बराड़ की भी हत्या की थी। गोंडर गैंग का गुर्गा रम्मी मसाना गैंगस्टर लॉरेंस के निशाने पर है। लॉरेंस ने पूछताछ में बताया था कि वो रम्मी से अपने चचेरे भाई अमनदीप की हत्या का बदला लेना चाहता है।

गोंडर गैंग का चीफ गुरप्रीत शेखो भी लॉरेंस बिश्नोई के रेडार पर है। लॉरेंस का मानना है कि उसके चचेरे भाई अमनदीप की हत्या के लिए गुरप्रीत ने ही शूटरों को हथियार मुहैया कराए थे। संपत नेहरा पकड़ा गया और लॉरेंस का प्लान फेल हो गया। इसके बाद भी उसने कई बार सलमान को डराने की कोशिश की। पिछले साल एनआईए ने इस बात का खुलासा किया था कि लॉरेंस बिश्नोई की हिट लिस्ट में सलमान खान का नाम शामिल हैं। सलमान के अलावा इस लिस्ट में 9 लोगों के नाम और हैं। शगुनप्रीत, दिवंगत पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला के मैनेजर थे और उनके सारे काम संभालते थे।लॉरेंस बिश्नोई अपने साथी विक्की मिड्डूखेड़ा की हत्या के लिए भोलू शूटर, सनी लेफ्टी और अनिल लाठ को दोषी मानता है। मिड्डूखेड़ा के मर्डर के बाद से ही ये तीनों लॉरेंस के निशाने पर हैं। बताया जाता है कि ये तीनों कौशल चौधरी गैंग के लिए काम करते हैं।

कांग्रेस चुनाव प्रचार के कौन से है अहम चेहरे?

आज हम आपको कांग्रेस चुनाव प्रचार के अहम चेहरे बताने जा रहे है! देश में पहले चरण का चुनाव हो चुका है और दूसरे चरण के लिए ताबड़तोड़ रैलियां हो रही हैं। इस दौरान कांग्रेस में पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ ही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के प्रचार कार्यक्रमों पर नजर डालें तो साफ है कि प्रियंका जहां नॉर्थ में प्रचार कर रही हैं, वहीं खरगे-राहुल का ज्यादा जोर साउथ पर है। हालांकि वे नॉर्थ में भी प्रचार कर रहे हैं। दूसरी ओर शुक्रवार से प्रियंका गांधी ने साउथ का भी रुख करना शुरू किया है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पार्टी उम्मीदवारों की ओर से इन तीन चेहरों की सबसे ज्यादा मांग है। ये तीनों ही नेता रोजाना दो से तीन रैलियां एक राज्य में तो कभी-कभी दो राज्यों में कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ेगा, इनके कार्यक्रम की मांग बढ़ती जाएगी। खरगे ने दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में बाकायदा रोडशो कर घर-घर जाकर पार्टी के मेनिफेस्टो की कॉपियां बांटीं। वहीं उन्होंने राजस्थान के जयपुर में मेनिफेस्टो जारी किया, जहां कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी साथ थीं। पिछले कुछ हफ्तों में खरगे ने कर्नाटक के बेंगलुरु से लेकर, कोलार और अपने गृह जिले कलबुर्गी तक में रैलियां कीं तो वहीं उन्होंने तमिलनाडु के पुडुचेरी, कडलोर, राजस्थान के जयपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ से लेकर बिहार के किशनगंज और कटिहार तक में जनसभाएं कीं। खरगे लगातार मोदी सरकार की कमियों को गिना रहे हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी जनसभाओं के साथ-साथ मीडिया को संबोधन से लेकर रोडशो और अलग-अलग ग्रुपों में जनसंवाद कर रहे हैं। राहुल ने अपने प्रचार अभियान में अपने भारत जोड़ो यात्रा का टच देने की कोशिश की है। वायनाड से चुनावी मैदान में उतरे राहुल दक्षिण के तमाम राज्यों में लगातार दौरे कर रहे हैं। कनार्टक में मांडया, कोलार तक उन्होंने तमाम रैलियां कीं। केरल में राहुल की कोशिश लगभग पूरे राज्य का दौरा करने की रही। यहां दूसरे चरण में चुनाव होने हैं। राहुल कन्नूर, वायनाड, कोझिकोड और पथनापुरम जैसे इलाकों का दौरा कर रहे हैं। इनके अलावा वह नॉर्थ इंडिया में लगातार सभाएं कर रहे हैं। शनिवार को वह यूपी के अमरोहा से लेकर बिहार के भागलपुर में थे। राहुल ने अब सहयोगी दलों के साथ संयुक्त प्रचार शुरू कर दिया है। अमरोहा में वह अखिलेश यादव के साथ नजर आए तो भागलपुर में वह तेजस्वी यादव के साथ लोगों को संबोधित करते दिखे। राहुल गांधी लगातार बीजेपी और संघ की विचारधारा पर सवाल उठाते हुए इसे देश के लोकतंत्र और संविधान के लिए चुनौती बता रहे हैं।

वहीं प्रियंका गांधी की भी खासी मांग है। वह अब तक उत्तराखंड में रुढ़की, रामनगर, यूपी में सहारनपुर, राजस्थान में जयपुर, दौसा, अलवर, जालौर में रोडशो, जनसभाएं और लोगों के बीच संवाद करती दिखीं। केरल में तिरुअनंतपुर में थरूर के लिए वोट मांगती दिखीं तो वहीं नॉर्थ ईस्ट में त्रिपुरा और असम के जोरहाट में पार्टी के लिए प्रचार कर चुकी हैं। प्रियंका की मांग के पीछे एक बड़ी वजह महिला वोटर्स मानी जा रही हैं। कांग्रेस के एक अहम रणनीतिकार का कहना है कि प्रियंका की लोकप्रियता का बड़ा कारण लोगों को उनमें उनकी दादी की छवि दिखना है। वहीं दूसरी ओर वह बड़ी आसानी से महिलाओं से कनेक्ट कर लेती हैं। इसलिए उम्मीदवारों से उनकी अधिक मांग आ रही है। केरल से लेकर जोरहाट तक में प्रियंका का महिलाओं के बीच पहुंचकर उनसे बात करना, उनके साथ उनके कार्यक्रमों में शामिल होना खासी भीड़ खींच रहा है। प्रियंका लगातार युवाओं की बेरोजगारी, महंगाई, महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे उठा रही हैं।

बीजेपी की ओर से प्रमुख चेहरा पीएम नरेंद्र मोदी लगातार मैदान में हैं। एक तरफ वह गैर बीजेपी शासित राज्यों में जाकर वहां मौजूद सत्तारूढ़ दलों पर सवाल उठाते हैं, वहां की सरकारों को कटघरे में खड़ा करते हैं तो दूसरी ओर वह I.N.D.I.A. गठबंधन के घटक दलों खासकर कांग्रेस को भ्रष्टाचार, परिवारवाद जैसे मुद्दों से घेर रहे हैं। वह तमिलनाडु गए तो सत्तारूढ डीएमके के परिवारवाद और भ्रष्ट्रचार का मुद्दा उठाया जबकि बंगाल में उन्होंने संदेशखाली को लेकर ममता बनर्जी सरकार पर जमकर हमला बोला। पीएम मोदी रोजाना दो से तीन राज्यों के दौरे कर रहे हैं। वह अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाने के साथ ही कांग्रेस सरकार के आधे दशक से ज्यादा समय में राज्यों में हुए घोटालों को रेखांकित कर रहे हैं। शनिवार को वह महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में थे। पीएम मोदी की मांग बीजेपी के अलावा एनडीए के सहयोगी दलों की ओर से भी आ रही है। यूपी में पीएम मोदी का खास जोर है, यहां से सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें आती हैं। वह यूपी के अमरोहा से लेकर मध्य प्रदेश के दमोह, वेस्ट बंगाल सहित नॉर्थ ईस्ट के त्रिपुरा और असम से लेकर साउथ में तमिलनाडु और केरल तक के दौरे कर चुके हैं। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में बीजेपी अपना जमीनी आधार बनाने की कोशिश कर रही है। रामनवमी के दिन पीएम मोदी असम के नलबाड़ी में थे।

क्या इसराइल और ईरान के युद्ध को खत्म कर सकता है भारत?

भारत अब इसराइल और ईरान के युद्ध को खत्म कर सकता है! इजरायल और ईरान की तनातनी पर दुनिया के देशों की नजर है। इस संघर्ष का कितना खौफनाक नतीजा सामने आएगा, दुनिया के अधिकांश देशों के नागरिक इस बात को लेकर चिंतित है। बीते शुक्रवार की सुबह दुनिया को ये खबर मिली कि इजरायल ने ईरान के इस्फ़हान इलाके में मिसाइल हमला कर दिया। वहां ईरान की परमाणु सुविधाएं हैं। हमले में कितना नुकसान हुआ, ये अभी साफ नहीं है। पश्चिम एशिया में 7 अक्टूबर 2023 से हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। हमास के हमले ने इजरायल की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया था। इस हमले में लगभग 1200 इजरायली मारे गए और 200 से ज्यादा बंधक बना लिए गए। इजरायल ने इसे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यहूदियों के सबसे बड़े नुकसान के रूप में देखा। ये 2008 से चले आ रहे इजरायल-हमास के झगड़ों से कहीं ज्यादा गंभीर था। इजरायल ने अपनी ताकत दिखाने के लिए जवाबी कार्रवाई की, जिससे 6 महीने से ज्यादा चली लड़ाई में 30,000 से ज्यादा लोग मारे गए और गाजा में 10 लाख से ज्यादा फिलिस्तीनी बेघर हो गए। अमेरिका भले ही पूर्वी भूमध्यसागर में दो युद्धपोतों के समूह तैनात कर चुका है, लेकिन हालात और बिगड़ गए हैं। हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के रास्ते जहाजों पर हमला किया और शिपिंग को बाधित किया है. वहीं हिज्बुल्लाह ने रॉकेट और ड्रोन दागे हैं, जिससे उत्तरी इजरायल के करीब 70,000 लोग बेघर हो गए हैं। इजरायल ने भी दक्षिणी लेबनान की सीमा से लगे इलाकों में हिज्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। अमेरिका और ब्रिटेन ने कई अन्य देशों के साथ मिलकर ‘ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन’ चलाया है और हूती ठिकानों पर हमले किए हैं।

इजरायल का मानना है कि ईरान हमास, हिजबुल्लाह और हाउती को मदद कर रहा है। इसी सिलसिले में इजरायल ने सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरानी वाणिज्य दूतावास परिसर में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के कई कमांडरों पर हमला कर उन्हें मार डाला। ईरान ने इसे अपने ‘संप्रभु क्षेत्र’ पर हमला माना। इससे पहले इजरायल सीरिया और लेबनान के रास्ते हिजबुल्लाह को भेजे जाने वाले सामानों पर हमला करता रहा है, लेकिन यह हमला उससे कहीं ज्यादा गंभीर था। जवाब में ईरान ने 300 ड्रोन, 30 क्रूज मिसाइल और 100 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलों से इजरायल पर हमला किया। 1973 के योम किप्पुर युद्ध के बाद यह किसी देश की ओर से सीधे तौर पर इजरायल पर किया गया पहला हमला था। 1948, 1967 और 1973 में अरब देशों के गठबंधन को इजरायल ने हरा दिया था। इसके बाद 1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन के साथ शांति समझौते हुए। 2020 में अब्राहम एकॉर्ड के तहत इजरायल के यूएई, बहरीन, कतर और मोरक्को के साथ राजनयिक संबंध स्थापित हुए। जवाब में इजरायल ने ईरान के इस्फहान शहर पर सीमित हवाई हमला किया, जो यह दिखाता है कि वो ईरान की हवाई सुरक्षा को भेद सकता है।

जब तक इजरायल-हमास लड़ाई कम होने की राह पर नहीं चलती, तब तक परेशानी बनी रहेगी, चाहे हालात और बिगड़ें या नहीं। फिलहाल ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। अमेरिका, मिस्र और कतर के बीच-बचाव की कोशिशों के बावजूद छह हफ्ते के युद्धविराम की बातचीत हफ्तों से रुकी हुई है।

इजरायल का लक्ष्य गाजा से हमास को खत्म करना है। लेकिन छह महीने की कोशिशों के बाद भी हजारों हमास लड़ाके अभी भी सक्रिय बताए जा रहे हैं, खासकर दक्षिण गाजा के रफाह इलाके में, जो अभी इजरायल की पहुंच से बाहर है। इससे बड़े पैमाने पर आम लोगों की मौतों को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ गई है। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ अमेरिका के अनुभव और 1982 से 2000 के बीच दक्षिण लेबनान में हिज़्बुल्लाह के साथ इजरायल के खुद के कब्जे के अनुभव को देखते हुए हमास को पूरी तरह खत्म करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

गाजा पर शासन करने के लिए हमास के अलावा किसी फिलिस्तीनी संगठन को मजबूत बनाने के इजरायल के विरोध और गाजा पर फिर से कब्जा करने के अंतरराष्ट्रीय विरोध से लड़ाई के बाद के समझौते मुश्किल हो रहे हैं। युद्ध के बाद गाजा के बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण के लिए अरब देशों की मदद के लिए दो-राष्ट्र समाधान की तरफ बढ़ने की जरूरत हो सकती है। लेकिन, इजरायल की मौजूदा सरकार ऐसे किसी भी समाधान के खिलाफ है, और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू 1990 के दशक के मध्य से लगातार ऐसी किसी भी संभावना को कमजोर करने का काम कर रहे हैं। इजरायल की राजनीति धीरे-धीरे दाईं ओर खिसक गई है। उनका ये मानना है कि फिलिस्तीन के कुछ लोग इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते और अतीत में समझौतों का विरोध कर चुके हैं। अक्टूबर में हुए बड़े हमले और उसकी तैयारी को देखते हुए, इजरायल की सुरक्षा को लेकर चिंतित लोगों की दलीलें और मजबूत हो जाएंगी।

दुनिया में अमेरिका की भूमिका कम होने की बातें हो रहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ उसके वैश्विक दखल को लेकर बहस भी चल रही है। फिर भी, इस पूरे संकट को सुलझाने की कोशिश में अमेरिका ही एकमात्र बड़ी शक्ति है। वो इजरायल, अरब देशों, और बिचौलियों के जरिए ईरान और हमास से बातचीत कर रहा है। लेकिन, इसका प्रभाव सीमित ही नजर आता है। नेतन्याहू अमेरिका की सलाह नहीं मानते, ईरान सीधे इजरायल पर हमला करने से नहीं हटता और हमास बंधकों को रिहा करने के कई प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करता। शायद अब समय आ गया है कि इस मामले को सुलझाने के लिए और बड़े प्रयास किए जाएं। चूंकि चीन, रूस और अमेरिका अब तक संयुक्त राष्ट्र में एक-दूसरे की कोशिशों को नाकामयाब करने में लगे हैं, तो G20 की मौजूदा अध्यक्षता कर रहे ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका को यह देखना चाहिए कि क्या वे यूरोप और अरब देशों के कुछ और G20 देशों के साथ मिलकर कोई रास्ता निकाल सकते हैं। यह इस बात की अच्छी परीक्षा हो सकती है कि G20 वाकई में दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण संगठन है जैसा वो अक्सर दावा करता है।