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क्या वर्तमान की सरकार से परेशान है जनता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जनता वर्तमान की सरकार से परेशान है या विपक्ष भ्रांतियां फैला रहा है! जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिमसागर एक्सप्रेस में हमारा सफर करीब 72 घंटे में पूरा हुआ। 3800 किलोमीटर के सफर में 68 स्टॉप आए। 12 राज्यों से गुजरती हुई इस ट्रेन में कई स्टेशनों पर यात्री बदले। सफर के साथ साथ राज्य बदला, भाषा बदली, खान-पान बदला लेकिन बेरोजगारी के बात हर कहीं सुनाई दी। युवाओं ने बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बताया। सरकार को अच्छी एजुकेशन देनी चाहिए और बेरोजगारी कम होनी चाहिए, लगभग हर राज्य के लोगों ने इस बात का जिक्र किया। बेरोजगारी का जिक्र करने वाले तीन तरह के लोग मिले। एक जिन्होंने बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बताया और उसके आगे चुप्पी साध ली। वहीं ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने बेरोजगारी की बात की साथ ही बदलाव की भी बात की और ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने बेरोजगारी और महंगाई को मुद्दा माना लेकिन साथ ही यह भी कहा कि मोदी सरकार अच्छा काम कर रही है और साथ ही मोदी सरकार के कामों को गिनाने लगे। जिन लोगों ने मुद्दा बताकर चुप्पी साध ली, उनका झुकाव किस तरफ होगा, ये चुनाव के नतीजों में सामने आएगा। लेकिन यह साफ है कि वे एक अहम फैक्टर बन गए हैँ।

महंगाई का जिक्र भी लगभग हर बातचीत में सुनाई दिया। सिलेंडर के दाम से लेकर खाने-पीने की चीजों के महंगाई की बात लोगों ने की। सरकारी कर्मचारियों ने जहां सरकार से मांग की कि ओल्ड पेंशन स्कीम लागू होनी चाहिए वहीं प्राइवेट कर्मचारियों का यह दर्द था कि महंगाई के साथ प्राइवेट कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं बढ़ती और इसके लिए भी सरकार को कुछ करना चाहिए। हरियाणा की दो बुजुर्ग महिलाएं जहां वृद्धावस्था पेंशन बढ़ने से खुश थी वहीं उन्होंने कहा कि मोदी फिर आएगा तो फिर पेंशन और बढ़ाएगा।

तमिलनाडु के युवाओं ने बिजनेस और इकॉनमी ग्रोथ की बात की और स्टार्टअप्स के लिए ज्यादा सुविधाओं की मांग की। केरल के यात्रियों ने सबसे पहली बात सफाई की कही। केरल से बढ़ी संख्या में पर्यटक कश्मीर आते हैं। हिमसागर एक्प्रेस अकेली ट्रेन है जो जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी के बीच चलती है। उन्होंने कहा कि यह ट्रेन बहुत स्लो है साथ ही बहुत गंदगी है। वंदे भारत जैसी ट्रेन चलाई जानी चाहिए। दरअसल 72 घंटों के इस सफर में शुरू के 24 घंटे तो सफाई दिखी और हर 5-6 घंटे में कोच में सफाई की भी जा रही थी लेकिन उसके बाद पूरे सफर में कोई सफाई नहीं हुई। डस्टबिन इतने छोटे कि दो कोच के बीच में कूड़े का ढेर जमा हो गया। टॉयलेट की हालत जितनी बुरी सोची जा सकती है, उतनी ही खराब। केरल के यात्रियों ने तंज कसते हुए कहा कि लोगों को आकर केरल के स्टेशन और वहां की सफाई देखनी चाहिए।

कई लोगों ने ऐसे मुद्दे गिनाए जिन पर ज्यादा चर्चा ही नहीं होती। ट्रेन जब रोहतक से गुजरी तो बढ़ी संख्या में महिलाएं बच्चों को लेकर चढ़ी। दो एसी कोच के बीच में एकदम भीड़ हो गई। ट्रेन में रेलवे के एक अधिकारी ने कहा कि यह बड़ी दिक्कत है और कोई इसका कुछ करता नहीं। लगातार ट्रेन में एसी कोच बढ़ रहे हैं लेकिन स्लिपर और जनरल डिब्बे कम हो गए हैं। ऐसे में लोग जहां दरवाजा खुला दिखे वहीं चढ़ जा रहे हैं। बता दें कि सरकार को अच्छी एजुकेशन देनी चाहिए और बेरोजगारी कम होनी चाहिए, लगभग हर राज्य के लोगों ने इस बात का जिक्र किया। बेरोजगारी का जिक्र करने वाले तीन तरह के लोग मिले। एक जिन्होंने बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बताया और उसके आगे चुप्पी साध ली। वहीं ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने बेरोजगारी की बात की साथ ही बदलाव की भी बात की और ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने बेरोजगारी और महंगाई को मुद्दा माना लेकिन साथ ही यह भी कहा कि मोदी सरकार अच्छा काम कर रही है और साथ ही मोदी सरकार के कामों को गिनाने लगे। वह कहने लगे, देखो इन महिलाओं को छोटे छोटे बच्चों के साथ कैसे चढ़ी, अगर मैं इन्हें चढ़ने नहीं देता तो ट्रैक पर ही बच्चे कट जाते। कई बार हमें अपनी आंखें बंद करनी पड़ती हैं लेकिन इस दिक्कत का समाधान होना चाहिए। यात्रियों ने भी कहा कि आम जनता को सुविधा के नाम पर सिर्फ एसी कोच बढ़ाने से गरीबों की दिक्कत बढ़ी है। गरीब कैसे महंगी ट्रेन में जाएगा।

क्या देशभर का मौसम दिखा रहा है अपना रंग रूप?

वर्तमान में देशभर का मौसम अपना रंग रूप दिखा रहा है! दिल्ली-एनसीआर में गर्मी धीरे-धीरे अपना असर दिखा रही हैं। भले ही अभी मई-जून का महीना नहीं आया है लेकिन देश के कई हिस्सों में लू अपना असर दिखा रही है। पूर्वी भारत बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल से लेकर ओडिशा में लू चल रही है। मौसम विभाग ने तो पूर्वी भारत के लिए लू को लेकर अलर्ट जारी किया है। आईएमडी के अनुसार पूर्वी भारत में पारा 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। दूसरी, तरफ पूर्वोत्तर भारत में बारिश देखने को मिल रही है। मौसम विभाग का कहना है कि अरुणाचल में आने वाले पांच दिन में भारी बारिश हो सकती है। असम से लेकर मेघालय में भीइस बाद दो दिन के अंतराल के बाद फिर से लू वाली स्थितियां बन जाएंगी। वहीं, बिहार में अगले 5 दिन तक हीटवेव के हालात बने रहेंगे। मौसम विभाग ने राज्य में अगले 5 दिन के लिए लू को लेकर ऑरेन्ज अलर्ट दे रखा है। बिहार में लू के हालात के साथ ही दिन और रात का तापमान सामान्य से अधिक है। इसके अलावा झारखंड में भी हीटवेव की संभावना बनी हुई है। हल्की से अधिक बारिश हो सकती है। दिल्ली को लेकर मौसम विभाग का कहना है कि राजधानी में अभी लू के हालात नहीं है। राजधानी में अगले दो दिन तक पारा 38 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही बना रहेगा। इसके बाद तापमान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसके अलावा सोमवार को हल्की-फुल्की बारिश भी हो सकती है। मौसम विभाग का कहना है कि दिल्ली में कुछ वेदर स्टेशन पर तापमान 40 के पार पहुंचा है।

अभी हीटवेव पूर्वी भारत में चल रही है। हमारा अनुमान हैं कि वहां कुछ राज्यों में लू चलती रहेगी। पश्चिम बंगाल में रविवार के लिए लू को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया है। इसके पीछे वजह है कि वहां सामान्य से गंभीर लू चलने के आसार हैं। आईएमडी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरेश कुमार ने बताया कि राज्य के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से 4 से लेकर 6 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक है। इसके अलावा रातें भी गर्म हो रही हैं। मौसम विभाग के अनुसार सोमवार से पश्चिम बंगाल में तापमान में कुछ कमी आ सकती है। ऐसे में आने वाले चार दिनों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है। ओडिशा में रविवार और सोमवार दो दिन के लिए लू को लेकर ऑरेंन्ज अलर्ट जारी किया गया है। उसके बाद अनुमान है कि तापमान में गिरावट आ सकती है। इस बाद दो दिन के अंतराल के बाद फिर से लू वाली स्थितियां बन जाएंगी। वहीं, बिहार में अगले 5 दिन तक हीटवेव के हालात बने रहेंगे। मौसम विभाग ने राज्य में अगले 5 दिन के लिए लू को लेकर ऑरेन्ज अलर्ट दे रखा है। बिहार में लू के हालात के साथ ही दिन और रात का तापमान सामान्य से अधिक है। इसके अलावा झारखंड में भी हीटवेव की संभावना बनी हुई है।

मौसम विभाग का कहना है कि दक्षिण प्रायद्वीप इलाके में हीटवेव की स्थिति नहीं है। लेकिन वहां पर अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक है। इसकी वजह से लोगों को बेचैनी हो सकती है। 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। दूसरी, तरफ पूर्वोत्तर भारत में बारिश देखने को मिल रही है। मौसम विभाग का कहना है कि अरुणाचल में आने वाले पांच दिन में भारी बारिश हो सकती है। असम से लेकर मेघालय में भी हल्की से अधिक बारिश हो सकती है। दिल्ली को लेकर मौसम विभाग का कहना है कि राजधानी में अभी लू के हालात नहीं है।ऐसे में मौसम विभाग की तरफ से केरल, तमिलनाडु, तटीय आंध्र प्रदेश के लिए आने वाले चार-पांच दिन के लिए वहां ह्यूमिडिटी को लेकर चेतावनी दी है। वहीं, उत्तर पश्चिम भारत की बात करें तो वहां पश्चिमी विक्षोभ का असर दिख रहाहैं। ऐसे में वहां तापमान बहुत अधिक नहीं है। इन इलाकों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से नीचे हैं। मौसम विभाग का कहना है कि धूप निकलने से वहां धीरे-धीरे तापमान 2 से तीन डिग्री तक बढ़ सकता है। ऐसे में उत्तर पश्चिम भारत में आने वाले 4-5 दिन में अभी लू की कोई संभावना नहीं बन रही है।

मौसम विभाग ने पूर्वोत्तर भारत में अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय में बारिश होने की बात कही है। मौसम विभाग के अनुसार अरुणाचल में 5 दिनों तक भारी बारिश का अनुमान है। इसके अलावा असम और मेघालय में अगले कुछ दिन तक हल्की से थोड़ी भारी बारिश हो सकती है। दूसरी तरफ, वेस्टर्न हिमालय रीजन में भी पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो रहा है।

आखिर कहां-कहां रद्द हुआ है विपक्षी उम्मीदवारों का पर्चा?

हाल ही में कई सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों का प्रचार रद्द हो चुका है! 2024 के चुनावी रण में पहले दौर की वोटिंग संपन्न हो चुकी है। अब 26 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान है। इसे लेकर सभी पार्टियां प्रचार अभियान में जुटी हैं। वहीं इस चुनाव में कई सीटें ऐसी भी रहीं जहां उम्मीदवारों के पर्चे ठीक से भरे नहीं होने की वजह से खारिज कर दिए गए। इस फेहरिस्त में कांग्रेस, बीएसपी और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार भी शामिल हैं। सबसे ताजा मामला गुजरात के सूरत लोकसभा सीट पर सामने आया, जहां कांग्रेस कैंडिडेट नीलेश कुंभाणी का नामांकन रद्द हो गया। इसके पहले कुछ और नेताओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है। मध्य प्रदेश के खजुराहो लोकसभा सीट पर सपा प्रत्याशी का भी पर्चा खारिज हुआ। वहीं उत्तर प्रदेश की आंवला और बरेली लोकसभा सीट से बीएसपी उम्मीदवारों का पर्चा रद्द होने से पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। चुनाव तारीखों का ऐलान करने के साथ ही इलेक्शन कमीशन नामांकन की तारीख से लेकर नाम वापसी की डेट तक पूरा शेड्यूल जारी करता है। जैसे ही नामांकन का दौर शुरू होता है तो अलग-अलग पार्टियों के उम्मीदवार और निर्दलीय कैंडिडेट नामांकन करते हैं। कोई भी नागरिक इसमें नामांकन कर सकता है, इसके लिए उसका नाम वोटिंग लिस्ट में होना जरूरी है। नामांकन के दौरान उम्मीदवारों को फॉर्म दिया जाता है, जिसमें सभी जरूरी जानकारियां देनी होती हैं। अगर पर्चा भरते समय कोई गलत जानकारी दी गई या फिर फॉर्म गलत या अधूरा भरा गया तो भी नामांकन रद्द हो सकता है। नामांकन प्रक्रिया समेत चुनावी कार्यक्रम के दौरान जिला निर्वाचन अधिकारी की भूमिका अहम हो जाती है।

गुजरात में लोकसभा चुनावों की वोटिंग से पहले कांग्रेस तगड़ा झटका लगा है। सूरत लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार नीलेश कुंभाणी और उनके डमी कैंडिडेट के नामांकन को निर्वाचन अधिकारी ने रद्द कर दिया है। बीजेपी की तरफ से निर्वाचन अधिकारी को शिकायत दी गई थी कि कुंभाणी और डमी उम्मीदवार के नामांकन में जिन प्रस्तावकों ने साइन किए हैं वो सही नहीं हैं। इसी के बाद विवाद बढ़ा और निर्वाचन अधिकारी ने कांग्रेस के कैंडिडेट को अपना पक्ष रखने का मौका दिया था। 21 अप्रैल को 11 बजे कांग्रेस का पक्ष सुनने के बाद जिला कलेक्टर/निर्वाचन अधिकारी ने दोनों फॉर्म रद्द कर दिए। कांग्रेस ने इसके लिए बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने बीजेपी पर साम, दाम, दंड से नामांकन रद्द करवाने का आरोप लगाया। कांग्रेस की तरफ से इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दिए जाने की संभावना है।

पर्चा खारिज होने की लिस्ट में मायावती की पार्टी बीएसपी के दो कैंडिडेट भी शामिल हैं। यूपी के बरेली और आंवला लोकसभा सीट पर बीएसपी प्रत्याशियों का पर्चा रिजेक्ट हुआ है। बरेली लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी ने छोटेलाल गंगवार को टिकट दिया था, हालांकि, अब उनका पर्चा खारिज कर दिया गया है। जिला निर्वाचन अधिकारी रविंद्र कुमार ने बताया कि बरेली लोकसभा सीट से 28 प्रत्याशियों ने 42 नामांकन पत्र दाखिल किए थे। शनिवार को नामांकन पत्रों की जांच की गई। जांच के दौरान 14 प्रत्याशियों के नामांकन पत्रों को खारिज कर दिया गया है। 14 उमीदवारों के नामांकन पत्र मान्य हैं। उन्होंने बताया कि बरेली से बसपा प्रत्याशी छोटेलाल गंगवार ने दो नामांकन पत्र दाखिल किए थे – एक 16 और दूसरा 18 अप्रैल को। बसपा प्रत्याशी के नामांकन पत्र में कुछ कॉलम खाली थे। इस कारण उनके नामांकन पत्र खारिज कर दिए गए हैं। अब बसपा बरेली के चुनावी मैदान से बाहर हो गई है।

वहीं आंवला सीट से चुनाव लड़ने वाले सत्यवीर सिंह का भी पर्चा खरिज हुआ है। सत्यवीर अपने आपको बीएसपी का उम्मीदवार बता रहे थे, लेकिन पार्टी सुप्रीमो मायावती ने सिंबल आबिद अली को दे दिया। आरोप है कि सत्यवीर फर्जी लेटर लगाकर अपनी दावेदारी जता रहे थे। मायावती के फैसले से सत्यवीर सिंह को करारा झटका लगा। रिटर्निंग ऑफिसर ने बीएसपी मुखिया से बात करने के बाद सत्यवीर सिंह का पर्चा खारिज कर दिया। आंवला और बरेली सीट पर दूसरे फेज में वोटिंग है।

इससे पहले समाजवादी पार्टी के भी एक उम्मीदवार का नामांकन खारिज हुआ है। ये मामला मध्य प्रदेश की खजुराहो लोकसभा सीट का है। समाजवादी पार्टी मीरा यादव को खजुराहो सीट से टिकट दिया था। हालांकि, उनके नामांकन को रिजेक्ट कर दिया गया। सपा उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने पर पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सवाल उठाए थे। अखिलेश यादव ने कहा कि घटना की न्यायिक जांच होनी चाहिए। किसी उम्मीदवार का पर्चा निरस्त करना लोकतांत्रिक अपराध है। सपा ने बीजेपी उम्मीदवार वीडी शर्मा के खिलाफ मीरा यादव को मैदान में उतारा था। खजुराहो में भी दूसरे फेज में वोटिंग है। कर्नाटक के शिवमोग्गा लोकसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार का नामांकन खारिज हुआ। आप कैंडिडेट सुभान खान का पर्चा खारिज कर दिया गया। बताया जा रहा कि सुभान खान ने पार्टी का बी-फॉर्म जमा नहीं किया था। हालांकि, उन्हें एक इंडीपेंडेट उम्मीदवार के रूप में मानने का कोई मौका नहीं था क्योंकि उन्होंने केवल दो प्रस्तावकों का जिक्र किया था।

क्या कैराना सीट पर हो रही है दो परिवारों की सियासी जंग?

वर्तमान में कैराना सीट पर दो परिवारों की सियासी जंग हो रही है! उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना के नाम पर ही स्थानीय लोकसभा क्षेत्र का नाम पड़ा है। यहां के लोग दो किस्सों को बखूबी जानते हैं। पहला किस्सा तो करीब 120 साल पुराना है। यहां के हसन और सिंह परिवार के बीच सियासी अदावत चलती है। दोनों राजनीतिक घरानों के पूर्वज एक ही हैं। गुर्जर परिवार की कलस्यान खाप से ताल्लुक रखने वाले कुनबे का एक परिवार धर्मांतरण के बाद मुस्लिम बन गया था। इन्हीं दोनों परिवार के लोग बीते कई सालों से राजनीति में दो ध्रुवों पर हैं। दूसरा किस्सा करीब 8 साल पहले का है, जो हिंदुओं के पलायन से जुड़ा है। घर बेचकर पलायन के मुद्दे ने कैराना को सुर्खियों में ला दिया था। इस बार का लोकसभा चुनाव भी यहां पर इन दोनों मुद्दों के इर्द-गिर्द ही घूमता है। गुर्जर बिरादरी के एक ही परिवार से निकले चौधरी हुकुम सिंह और चौधरी मुनव्वर हसन के परिवार बीते साढ़े तीन दशक से राजनीतिक रूप से प्रतिद्वंदी हैं। इस बार 2024 के लोकसभा चुनाव में हुकुम परिवार से प्रदीप सिंह चौधरी बीजेपी के टिकट से चुनावी मैदान में हैं। वहीं हसन परिवार से इकरा हसन राजनीतिक शुरुआत कर रही हैं। इंग्लैंड से पढ़ाई करके लौटीं 30 साल की इकरा इस बार कैराना में काफी मजबूती से चुनाव लड़ रही हैं।

इकरा के पिता पूर्व सांसद मुनव्‍वर हसन की 2008 में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उस समय मुनव्वर के बेटे नाहिद हसन और बेटी इकरा हसन छोटे-छोटे थे। तब उनकी मां तबस्सुम हसन ने पति की सियासी विरासत को संभालते हुए 2009 में कैराना लोकसभा सीट पर चुनाव जीता था। फिर नाहिद मैदान में आए और विधानसभा में दांव आजमाना शुरू किया। अब इकरा भी राजनीति में आ गई हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाई नाहिद हसन को जेल हो जाने की वजह से इकरा ने ही चुनाव प्रचार की कमान संभाली और भाई की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। लंदन से लौटने के बाद से वह लगातार क्षेत्र में सक्रिय बनी हुई हैं। लंबे समय तक ब्रिटेन में रहने के बावजूद अपनी सादगी के लिए पसंद की जाने वाली इकरा हसन को अखिलेश यादव ने कैराना लोकसभा सीट से मैदान में उतारा है।

कैराना के एक व्यस्त चौराहे पर फल विक्रेता फुरकान सिद्दिकी ने बताया कि नाहिद भाई को बेकसूर होते हुए भी जेल भेजा गया, तब इकरा इंग्लैंड से पढ़ाई करके वापस लौटीं। दो साल से वह परिवार की तरफ से राजनीतिक कमान संभाल रही हैं। इस बार चुनाव में वह खुद हैं और हम लोग साथ हैं। वहीं रेडीमेड गार्मेंट्स विक्रेता मुन्ना खान ने कहा कि इकरा अभी युवा हैं और राजनीतिक-सामाजिक रूप से समर्पित हैं। हम सभी लोग उसे पसंद करते हैं। चुनाव में निश्चित तौर पर उसकी जीत होगी। इकरा ने खुद हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बताया कि कैराना में हम लोगों को खास चुनौती नहीं मिल रही है। बीजेपी की तरफ से राष्ट्रीय मुद्दों को पेश किया जा रहा है लेकिन कैराना में पब्लिक के बीच जाने पर स्थानीय मुद्दे ही हावी हैं। यहां की जनता हमारे साथ खड़ी है। 2014 में कैराना लोकसभा सीट से बीजेपी के हुकुम सिंह ने 5 लाख 65 हजार 909 वोट के साथ जीत हासिल की थी। यहां दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नाहिद हसन को 3 लाख 29 हजार 81 वोट मिले थे। हुकुम सिंह के निधन के बाद कैराना लोकसभा सीट पर साल 2018 में उपचुनाव हुए थे।

कैराना का एक और पहलू भी है। वह है- पलायन। 2016 में बीजेपी के तत्कालीन सांसद हुकुम सिंह ने इलाके से बड़ी संख्या में हिंदू परिवारों के पलायन कर जाने का आरोप लगाया। उन्होंने 346 परिवार की लिस्ट भी जारी की, जो उत्पीड़न की वजह से अपना घर बेचकर दूसरी जगह चले गए। यह मामला सुर्खियों में आया और खूब सियासी विवाद हुआ। विवाद का तूफान तो थम गया लेकिन दाग अभी भी हैं। कैराना की टीचर्स कॉलोनी में हिंदू परिवार कथित तौर पर घर बेचने के बाद बस गए। आरडीएस कोचिंग चलाकर 200 बच्चों को पढ़ाने वाले एस. शर्मा ने बताया कि अभी हम सबका फोकस और अधिक बच्चों को शिक्षित करके कुछ बेहतर बनाने पर है। अतीत में जो हो चुका, उसे भुला देना ही ठीक है।

कुछ ऐसी ही बात किराना की दुकान चलाने वाले अक्षित गर्ग ने भी कही। उन्होंने पलायन के मुद्दे पर कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया। लेकिन बीजेपी कार्यालय में शक्ति सिंह ने लड्डू खिलाते हुए चुनाव से पहले ही जीत दर्ज करने की बात कही। उन्होंने कहा कि यहां पर हिंदुओं का पलायन हुआ। अपराध का स्तर बढ़ा हुआ है। कोई भी इंसान अपराध को लेकर सहज कैसे हो सकता है। लोग अभी भी इन सवालों को पूछ रहे हैं। बाबूजी हुकुम सिंह के परिवार ने हम लोगों के काफी कुछ किया है। सब लोग उनके साथ हैं।

क्या दक्षिण का किला भी भेदना होगा मोदी सरकार को?

मोदी सरकार को लोकसभा चुनाव में दक्षिण का किला भी भेदना होगा! देश में लोकसभा चुनाव शुरू हो चुका है। 19 अप्रैल को पहले दौर का मतदान हो चुका है। लोकसभा चुनाव साथ देश में क्रिकेट का टूर्नामेंट आईपीएल भी चल रहा है। भारत एक ऐसा देश हैं जहां राष्ट्र के रूप में चुनावों के साथ-साथ क्रिकेट को भी उतना ही पसंद करता है। दोनों के बीच समानताएं भी दिख जाती हैं। ऐसे में क्रिकेट के जरिये आज की राजनीति परिदृश्य को समझते हैं। वेस्टइंडीज के धाकड़ बल्लेबाज ब्रायन लारा ने टेस्ट क्रिकेट में सबसे अधिक 375 रन का रिकॉर्ड बनाया था। लारा को अपने ही 375 के रिकॉर्ड को पार करने और 400 रन का स्कोर बनाकर इतिहास में दर्ज होने में दस साल लग गए। इस बार 400 की यह संख्या लोकसभा चुनावों में राजनीतिक चर्चा पर हावी दिख रही है। अब सवाल है कि क्या बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इन चुनावों में ‘अबकी बार 400 बार” के अपने बहुप्रचारित लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश की जाएगी? एनडीए सरकार के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा है कि ‘दुनिया में एकमात्र लोकप्रिय सरकार है जो एक दशक के बाद भी लोगों की पसंद बनी हुई है। अब एनडीए 400 का आंकड़ा पार कर पाएगा या नहीं यह तो 4 जून को ही पता चलेगा, लेकिन एक बात काफी हद तक तय है कि आने वाले समय में इसका लोकप्रिय चुनावी नारे की सच्चाई में कड़ी मशक्कत दिख रही है। इसके लिए एनडीए को दक्षिण भारत की 130 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करना होगा। संसद में अपनी सभी भारी संख्या के बावजूद पीएम मोदी के नेतृत्व वाला एनडीए गुट अभी भी दक्षिण में केवल टुकड़ों में मौजूद है। बीजेपी के पास दक्षिण भारत की 130 में से केवल 29 सीटें हैं। इनमें से अधिकांश कर्नाटक से और कुछ तेलंगाना से आती हैं। हालांकि, जो बात बीजेपी को एक दुर्जेय चुनावी संगठन बनाती है, वह अपने राजनीतिक सक्रियता और माहौल बनाने के जरिए उन जगहों पर अपनी जमीन बनाने में निपुणता है, जहां उसके पास करने के लिए बहुत गुजांइश होती है।प्रधान मंत्री ने चुनावों से पहले प्रचार अभियान का नेतृत्व किया है। वर्ष की शुरुआत से, मोदी ने दो दर्जन से अधिक बार इस क्षेत्र का दौरा किया है। वो भी अक्सर बहुत धूमधाम और प्रदर्शन के साथ। पीएम ने यहां विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया है। एनडीए उम्मीदवारों के लिए रोड शो और रैलियां आयोजित कीं। इसके जवाब में विपक्षी दल द्रमुक, कांग्रेस, बीआरएस और वामपंथियों ने चक्रव्यूह की तर्ज पर जोश के साथ अपना हमला तेज कर दिया। प्रधानमंत्री की गति को ध्यान में रखते हुए, बीजेपी के वरिष्ठ मंत्रियों ने भी लगातार दौरा किया। उन्होंने अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया। संसद के शीतकालीन सत्र के तुरंत बाद, भाजपा ने दक्षिण में 84 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए एक रोडमैप तैयार किया। यहां उसने प्रदर्शन किया था। इसने उन्हें ‘सबसे कमजोर’ कहा और उम्मीदवारों की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए ‘विस्तारकों’ को तैनात किया। कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान पैदल सैनिकों का पहली बार टेस्ट किया गया था। दक्षिण में अधिकांश बीजेपी उम्मीदवार भी ‘मोदी की गारंटी’ के मुद्दे पर चल रहे हैं। यह प्रधान मंत्री के मजबूत नेतृत्व के बारे में अधिक है और खुद उम्मीदवारों के बारे में कम दिखता है।

उत्तर भारत में बढ़ते मतदान आधार के बावजूद, बीजेपी ऐतिहासिक रूप से कभी भी तमिलनाडु में कोई महत्वपूर्ण पैठ नहीं बना पाई है। फैक्ट यह है कि पार्टी का वोट शेयर 5% से भी कम रहा है। यह राज्य पर क्षेत्रीय पार्टियों के नियंत्रण को बताता है। यह भगवा पार्टी के सही मायनों में अखिल भारतीय पार्टी बनने के मिशन के बीच एकमात्र बाधा बनी हुई है। हालांकि, बीजेपी यहां सीटें नहीं तो वोट शेयर में अपनी संभावनाएं बढ़ाने के लिए एक ठोस प्रयास करती नजर आ रही है। तमिलनाडु में बीजेपी के अभियान का नेतृत्व स्वयं प्रधान मंत्री और राज्य स्तर पर अनामलाई के रूप में नए चेहरे ने किया है। एएनआई के साथ हाल ही में एक इंटरव्यू में, पीएम मोदी ने कहा दावा किया कि द्रमुक के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भाजपा की ओर अनुकूल वोटों में बदल रही है। प्रधान मंत्री ने बीजेपी के राज्य प्रमुख अनामलाई को ‘संतन विरोधी’ और ‘वंशवाद से प्रेरित द्रमुक’ के खिलाफ लड़ने वाला ‘स्पष्ट नेता’ बताया था। तमिलनाडु बीजेपी प्रमुख अन्नामलाई के जमीनी स्तर के प्रयासों और प्रतिद्वंद्वी द्रमुक को उनकी चुनौती ने ध्यान आकर्षित किया है। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और सत्तारूढ़ डीएमके पार्टी के साथ टकराव ने राज्य में भाजपा को सुर्खियों में ला दिया है। हालांकि सामान्य साझेदार अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन नहीं करते हुए, भाजपा ने क्षेत्र में छह से अधिक छोटे दलों के साथ गठबंधन किया है। हालांकि, मुख्यमंत्री स्टालिन, जो कि इंडिया ब्लॉक के सबसे मजबूत क्षेत्रीय नेताओं में से एक हैं, ने दावा किया कि पीएम मोदी की दक्षिण यात्राएं ‘ उस नुकसान की भरपाई करने के लिए जो उत्तर में उनका इंतजार कर रहा है।’

यूडीएफ और एलडीएफ भाजपा को चुनौती देने को लेकर आमने-सामने हैं। ये एक-दूसरे पर बीजेपी विरोधी वोटों को विभाजित करने का आरोप लगा रहे हैं। जबकि बीजेपी को उम्मीद है कि युवाओं के लिए उसकी अपील और पीएफआई पर प्रतिबंध से उसका समर्थन बढ़ सकता है। बीजेपी प्रवासी वोटों का भी दोहन कर रही है, जैसा कि वी मुरलीधरन ने भारत के बढ़ते वैश्विक दबदबे का जिक्र करते हुए एक अभियान ‘हर भारतीय पासपोर्ट का सम्मान’ में कहा था।चुनाव से पहले अपने कट्टर हिंदुत्व चेहरे पर पर्दा डालने की भाजपा की कोशिश के कारण आरएसएस इस समय पीछे चला गया है। इस बीच, सीएम पिनाराई विजयन, जो इंडिया ब्लॉक के वरिष्ठ क्षेत्रीय नेताओं में से एक हैं, ने दावा किया है कि केरल के लोग अपनी चुनावी रैलियों के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए वादों के ढेर पर विश्वास नहीं करेंगे। विभाजन के एक और संकेत में, उन्होंने अपने घोषणापत्र में विवादास्पद सीएए पर चुप रहने के लिए कांग्रेस पर भी हमला किया। राहुल गांधी, जो वायनाड से सांसद हैं, ने कहा है कि ‘भाजपा 150 सीटों को पार नहीं करेगी’ और आगामी चुनावों को ‘ विचारधाराओं की लड़ाई है।

जब सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से मजबूत हुआ देश का संविधान!

आज हम आपको सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बताएंगे जिसे देश का संविधान मजबूत हुआ है! देश में लोकसभा चुनाव जारी है। पहले दौर का मतदान 19 अप्रैल को चुका है। अभी 6 चरण का मतदान बाकी है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 100% ईवीएम-वीवीपीएटी सत्यापन की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने ईवीएम में अपना विश्वास दोहराया। यह 72 साल पुराने अदालती हस्तक्षेपों की लंबी सूची में एक नया फैसला है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने आजादी के बाद से देश में हुए चुनाव से जुड़े फैसलों के जरिये भारत के लोकतंत्र को आकार और समृद्ध किया है। धनंजय महापात्रा ऐसे ही ऐतिहासिक निर्णयों के बारे में बता रहे हैं। पहले आम चुनाव से कुछ महीने पहले, जनवरी 1952 में, सुप्रीम कोर्ट ने पोन्नुस्वामी मामले में फैसला सुनाया था। इसमें शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 329 (बी) में ‘चुनाव’ शब्द “चुनाव को बुलाने वाली अधिसूचना जारी करने के साथ शुरू होने वाली पूरी चुनावी प्रक्रिया को दर्शाता है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि चुनावी प्रक्रिया एक बार शुरू होने के बाद किसी भी मध्यस्थ चरण में कोर्ट की तरफ से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। परिणामस्वरूप, एक पीड़ित उम्मीदवार परिणामों की घोषणा के बाद केवल चुनाव याचिका के माध्यम से चुनाव विसंगतियों को चुनौती दे सकता है।

उस समय 1969 में कांग्रेस विभाजित हो गई थी। जगजीवन राम और एस निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाले गुटों ने पार्टी के नाम पर दावा किया। ऐसे में चुनाव आयोग (ईसी) ने यह देखते हुए जगजीवन राम गुट के पक्ष में फैसला सुनाया कि उन्हें कांग्रेस सांसदों, विधायकों और प्रतिनिधियों का बहुमत समर्थन प्राप्त था। बाद में, सादिक अली मामले (1971) में, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को बरकरार रखा। उस समय यह पता लगाने में स्पष्ट कठिनाइयां थीं कि प्राथमिक सदस्य कौन थे और उनकी इच्छाओं का पता लगाने में… यह वैध रूप से माना जा सकता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य और प्रतिनिधियों ने कुल मिलाकर प्राथमिक सदस्यों के विचारों को प्रतिबिंबित किया। चुननाव आयोग ने हाल ही में शिवसेना और एनसीपी में हुए विभाजन पर उसी आधार पर फैसला सुनाया, जिस आधार पर उसने 1969 के कांग्रेस मामले में दिया था।

12 जून 1975 को, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से चुनाव रद्द कर दिया। इसके बाद आपातकाल की घोषणा हो गई। सुप्रीम कोर्ट में पीएम की अपील के लंबित रहने के दौरान, संसद ने चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम, 1975 पारित किया। इससे लोक प्रतिनिधित्व (आरपी) अधिनियम के कई प्रावधानों को बदल दिया गया। संसद ने 39वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम भी बनाया, जिसमें अदालतों को पीएम और स्पीकर के चुनावों की जांच करने से रोक दिया गया। नवंबर 1975 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा के चुनाव को बरकरार रखा, लेकिन 39वें संशोधन अधिनियम को आंशिक रूप से रद्द कर दिया। इसने अदालतों को पीएम और स्पीकर के खिलाफ चुनाव याचिकाओं पर विचार करने से रोक दिया।

सदी के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता अधिकारों की रक्षा और विस्तार के लिए कई ऐतिहासिक फैसले दिए। 2002 में, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स मामले में, इसने फैसला सुनाया कि मतदाताओं को उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड, शिक्षा स्तर और संपत्ति सहित उनके बारे में जानने का मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार चुनने के अधिकार का पूरक है। यह भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से आता है। इसके बाद एनडीए सरकार एक विधेयक लेकर आई। इसमें उम्मीदवारों को आपराधिक पृष्ठभूमि घोषित करने से छूट देने के लिए आरपी अधिनियम में धारा 33बी पेश की। 2004 में, SC ने इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद उम्मीदवारों को एफआईआर सहित उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की घोषणा करना अनिवार्य कर दिया गया।

लिली थॉमस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आरपी एक्ट की धारा 8(4) को रद कर दिया। ये धारा सांसदों और विधायकों को भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने या अन्य आपराधिक मामलों में दो या अधिक साल की सजा होने के बाद भी विधायक बने रहने की अनुमति देती थी। ऐसा अगर वे दोषसिद्धि के 90 दिनों के भीतर उच्च मंच पर अपील करते। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, अयोग्यता स्वचालित रूप से लागू हो जाती है। यदि कोई ऊपरी अदालत दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाती है तो एक विधायक अपनी सीट वापस पा सकता है।

सुब्रमण्यम स्वामी मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने शुरू में अनिच्छुक चुनाव आयोग को चरणबद्ध तरीके से ईवीएम में वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) लागू करने के लिए मजबूर किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस बात से संतुष्ट हैं कि ‘पेपर ट्रेल’ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है। ईवीएम में मतदाताओं का विश्वास केवल ‘पेपर ट्रेल’ की शुरुआत से ही हासिल किया जा सकता है। वीवीपैट प्रणाली वाली ईवीएम मतदान प्रणाली की सटीकता सुनिश्चित करती हैं।

15 फरवरी, 2024 को, CJI डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 5-जजों की पीठ ने राजनीतिक डोनर की पहचान गुप्त रखने वाली चुनावी बांड योजना को ‘असंवैधानिक’ और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया। चुनावी फंडिंग के एक तरीके के रूप में चुनावी बांड 2017 में पेश किए गए थे। भारतीय स्टेट बैंक के फैसले और अदालत के बाद के सख्त निर्देशों के कारण इलेक्टोरल बॉन्ड डेटा सार्वजनिक डोमेन में आ गया।

क्या वर्तमान में युवा नहीं डालना चाहते मत?

वर्तमान में युवा मत नहीं डालना चाहते हैं! देश में 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवाओं में से महज 38% ने 2024 के चुनावों के लिए खुद को मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड कराया है। एक्सपर्ट इस ट्रेंड से चिंतित हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या युवाओं की लोकतंत्र में रुचि खत्म हो गई है? क्या उनके हाथों में भविष्य अंधकारमय है? दरअसल, उपरोक्त में से कोई भी नहीं। देश का युवा कोई सामान नहीं है जिसका नुकसान हो गया है। यह उनकी युवावस्था है जो उन्हें सुस्त दिनचर्या से सावधान करती है। यदि किसी चुनाव के साथ कोई जबरदस्त, बड़ा विरोध या बदलाव का कारक जुड़ा हो तो स्थिति एक झटके में बदल जाती है। जब ऐसा होता है, तो मतदान एक कार्निवल बन जाता है। ऐसे में 25 वर्ष से कम उम्र के मतदाताओं का मतदान बड़े वयस्कों को शर्मसार कर सकता है। अन्यथा, चुनाव तो बूढ़ों के लिए हैं। हमारे यहां बुजुर्ग लोग विभिन्न दलों के घोषणापत्रों पर विचार करते हैं। उसपर खूब चर्चा करते हैं या यूं कहें उसे खूब चबाते हैं, वे बार-बार जुगाली करते हैं। उन्हें मतदान केंद्र तक उसी उबाऊ तरीके से जाने दीजिए, जिस तरह उन्होंने अपना जीवन जिया है। जब किसी प्रतियोगी को हराना ही हो तो अभियान के ढोल नगाड़े के बिना मतदान करना एक नीरस मामला है! 2024 के चुनाव युवा मतदाताओं को वह उत्साह देने में विफल रहे हैं क्योंकि उन्हें विश्वास है कि उन्हें परिणाम पहले से ही पता है। इसलिए पहले की तरह वोटिंग के आंकड़ों में उनकी संख्या पिछड़ जाएगी। बिहार, दिल्ली और यूपी में, हाल ही में 18 साल पूरा करने वाले युवाओं में से 25% से भी कम ने खुद को मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड कराया है। यह संख्या बिहार 17% के साथ सबसे कम है, लेकिन राजनीतिक रूप से सक्रिय महाराष्ट्र की स्थिति भी 22% वोटर रजिस्ट्रेशन के साथ बहुत बेहतर नहीं है।

इस परिदृश्य की तुलना 2014 से करें तो एक अलग ही स्थिति नजर आती है। उस समय युवा मतदाताओं ने बीजेपी को पूर्ण बहुमत देने के लिए बूथों पर धावा बोल दिया था। 18-25 आयु वर्ग की तरफ से मिले कुल वोट राष्ट्रीय औसत से 2% अधिक थे। भाजपा को मिले वोटों के मामले में, यह सामान्य मतदाताओं की तुलना में 3% अधिक था। अतीत के विपरीत, उस बार युवा मतदाता पीछे नहीं थे। 2014 में, 1991 के बड़े आर्थिक सुधार के बाद पैदा हुए लोग मतदान में अपना पहला मौका पाने के लिए तैयार थे। क्या वे भाग्यशाली नहीं थे? तब तक, उम्र की सीमा से परे, उन्होंने केवल सुस्त, पेट वाले बूढ़े लड़ाकों को देखा, जो पूरी तरह से थके हुए थे। इन द्वंद्वों के परिणाम महत्वहीन थे और विजेता हमेशा खंडित जनादेश से जीतता था।

अब, आखिरकार 2014 में, युवाओं को लगा कि उनके पास पूरा करने के लिए एक स्पष्ट मिशन है। एक तरफ एक करिश्माई, स्पष्टवादी, एक प्राचीन योग्य व्यक्ति के खिलाफ बाहरी व्यक्ति था, जो अब अपने चरम पर पहुंच चुका है, लेकिन प्रतिष्ठान द्वारा समर्थित है। एक रोमांचक लड़ाई को भांपते हुए युवा ने चुनौती देने वाले को स्पष्ट जीत दिलाने के लिए अतिक्रमण में कदम रखा। चुनाव से छह महीने पहले मूड में बदलाव स्पष्ट था। यह भावना 2019 में भी बनी रही क्योंकि मोदी की जीत के लिए एकीकरण की आवश्यकता थी, कहीं ऐसा न हो कि यह उन्हीं निष्क्रिय लोगों के हाथों में वापस चली जाए जिन्होंने पहले शासन किया था। इससे पता चलता है कि 2014 और 2019 के बीच युवा मतदाताओं के बीच भाजपा का समर्थन 61% से बढ़कर 68% हो गया। यह केवल 7% की वृद्धि नहीं थी, बल्कि उस वर्ष देशभर में भाजपा के एकत्रीकरण के अनुपात में 4% की वृद्धि में भी योगदान दिया।

युवा भारतीय इस मामले में अनोखे नहीं हैं। विश्व स्तर पर यह देखा गया है कि अधिकांश मतदाता मध्यम आयु वर्ग के हैं। इस संबंध में, बहुत बूढ़े और बहुत युवा शायद एक ही गीत गा रहे हैं, क्योंकि जैसे-जैसे कोई व्यक्ति अधेड़ उम्र से वृद्धावस्था की ओर बढ़ता है, मतदान करने का उत्साह कम होता जाता है। अमेरिका में भी, लगातार युवा उदासीनता तभी परेशान होती है जब वहां एक ऐसा चुनाव जिसमें एक मकसद और एक दुश्मन को परास्त किया जाना है। क्लिंटन और ओबामा ने युवाओं के भारी समर्थन से जीत हासिल की और बाइडन ने भी ट्रम्प के खिलाफ जीत हासिल की। 2020 में जिन राज्यों में युवा मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई, वे न्यू जर्सी, मिनेसोटा, कोलोराडो और मेन थे। बाइडेन बिडेन ने उन सभी में जीत हासिल की थी।

युवा अपने बड़ों की तरह अलार्म घड़ी न बजाएं। वे चुनाव के दिन बिना नींद के उत्साह में न उठें, लेकिन वे राजनीतिक रूप से कटे हुए नहीं हैं। वे तभी मैदान में उतरते हैं जब गड़गड़ाहट और रोष होता है और वैचारिक पक्षपात खुलकर सामने आता है। यही कारण है कि वे हर जगह सार्वजनिक प्रदर्शनों का जीवन और आत्मा हैं। हालांकि वे वोट देने में धीमे हैं। भारत में, युवाओं ने निर्भया आंदोलन और अन्ना हजारे के अभियान में भी नेतृत्व किया। फ्रांस में, जबकि 2021 के नगरपालिका चुनावों में केवल 13% युवाओं ने मतदान किया। इसके बावजूद 2019 में, ‘येलो वेस्ट’ हड़ताल के दौरान, उन्होंने पेरिस की सड़कों पर दस लाख लोगों को इकट्ठा किया था। इसी तरह, यह युवा ही थे जिन्होंने 2011 में अमेरिका में ‘वॉल स्ट्रीट पर कब्ज़ा आंदोलन’ का नेतृत्व किया था। 18 साल के युवाओं को एक अच्छी लड़ाई दीजिए और वे चुनाव के दिन झूमते हुए सामने आएंगे। युवा अपने वजन से कम वजन से मुक्का मारने से नफरत करते हैं।

क्या भाटी गैंग से है एल्विस यादव को खतरा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या एल्विस यादव को भाटी गैंग से खतरा है या नहीं! रेव पार्टियों में सांप के जहर के सप्लाई करने के आरोप में 14 दिन की न्यायिक हिरासत में बंद बिग बॉस ओटीटी-2 विनर एल्विश यादव को हाई सिक्योरिटी सेल में शिफ्ट कर दिया गया है। ग्रेटर नोएडा के लुक्सर जेल की हाई सिक्योरिटी सेल में एल्विश यादव को रखा गया है। इससे पहले रविवार शाम से एल्विश यादव को लुक्सर जेल के क्वारंटाइन सेल में बंद माफियाओं के साथ रखा गया था। लुक्सर जेल में वर्तमान में कई माफिया बंद हैं। उनमें से 2 माफियाओं के बारे में लुक्सर जेल अधीक्षक ने बताया। जेल अधीक्षक अरुण प्रताप सिंह ने बताया कि वर्तमान में इस जेल में कई माफिया बंद हैं। उनमें से दो माफिया मनोज आसे और अनिल भाटी है। अनिल भाटी सुंदर भाटी गैंग से संबंध रखता है। इसको जेल में आए करीब एक साल से अधिक समय हो गया है। गैंगस्टर ऐक्ट आदि गंभीर धाराओं में सजा काट रहा है। दूसरा माफिया मनोज आसे भी गैंगस्टर ऐक्ट आदि धाराओं में करीब 6 महीने से सजा काट रहा है।

अनिल भाटी वर्तमान में लुक्सर जेल में बंद है। वह कुख्यात सुंदर भाटी का भतीजा है। जिला प्रशासन ने उस पर रासुका लगा दी थी। अनिल भाटी सुंदर के बड़े भाई सहदेव भाटी का बेटा है। गिरोह का कमान भी वही सम्भाल रहा है। बता दें कि वर्ष 2017 नवंबर महीने में अनिल भाटी ने अरुण यादव से सुपारी लेकर अपने शूटर से बीजेपी नेता शिव कुमार यादव की हत्या करवाई थी। उस दिन शिवकुमार अपने ड्राइवर बलीनाथ और प्राइवेट गनर रहीस पाल के साथ पुराना हैबतपुर में बने अपने स्कूल से कार में प्रताप विहार में बने घर जा रहे थे।

तिगरी गोल चक्कर के पास अनिल भाटी के भेजे बदमाशों ने दोनों ओर से घेरकर गोलियां बरसाई गई थीं। इस घटना में शिवकुमार, बलीनाथ और रहीसपाल की मौत हो गई थी। इस घटना की साजिश अरुण यादव ने रची थी। अनिल भाटी ने अपने शूटर नरेश तेवतिया, रावण उर्फ अनिरुद्ध भारद्वाज, अमर फौजी उर्फ राजकुमार से अंजाम दिलवाया। इस बर्बर घटना में अनिल भाटी की भूमिका और पुराने आपराधिक रिकॉर्डों को देखते हुए उसके खिलाफ उस समय के गौतमबुद्ध नगर के तत्कालीन डीएम ने रासुका लगाने का फैसला लिया था।

मनोज आसे उर्फ मनोज इमलिया ग्रेटर नोएडा के इमलिया गांव का रहने वाला है। वर्तमान में लुक्सर जेल में बंद है। वह रंगदारी लूट समेत के घटनाओं में शामिल है। वह करीब 20 वर्षों से जरायम की दुनिया में है। वर्ष 2023 अप्रैल तक इस कुख्यात पर एक लाख का इनाम घोषित था। मनोज आसे और उसके चार बदमाशों के साथ वर्ष 2023 अप्रैल माह में रात के समय पुलिस मुठभेड़ के दौरान कासना थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस की गोली से घायल अवस्था में उसे दबोचा गया था। उस पर हत्या और रंगदारी समेत करीब 16 आपराधिक केस दर्ज हैं। मनोज आसे पुलिस की फाइलों में हिस्ट्रीशीटर गैंगस्टर है।

उधर, सोमवार और मंगलवार को भी ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय गौतमबुद्ध नगर में वकीलों की हड़ताल की वजह से एल्विश यादव की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो पाई। अब कल एल्विश यादव की जमानत याचिका पर सुनवाई होने की उम्मीद है। लुक्सर जेल अधीक्षक अरुण प्रताप सिंह ने एनबीटी ऑनलाइन की टीम को बताया कि उसे लुक्सर जेल की हाई सिक्योरिटी सेल में सोमवार को शिफ्ट कर दिया गया है। पहले नॉर्मल प्रोसीजर के तहत उसे आम कैदियों के साथ रखा जाना था, लेकिन एक सेलिब्रिटी होने के नाते उसे हाई सिक्योरिटी सेल में बंद किया गया है। उच्च सुरक्षा बैरक में तीन कैदियों के साथ एल्विश को रखा गया है। 17 मार्च यानी रविवार को उसे क्‍वारंटाइन बैरक में रखा गया था। वह कंबल बिछाकर जमीन पर सोया। आम कैदियों के तरह उसे भी रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील रुद्र विक्रम सिंह ने एनबीटी ऑनलाइन को बताया कि जेल में आमतौर पर सभी साधारण कैदियों को बैरक में रखा जाता है। एक बैरक में 20 से पचास कैदी होते हैं, जबकि हाई रिश्क कैदियों को हाई सिक्योरिटी सेल या अण्डा सेल में रखा जाता है। इसके पीछे दो वजहें होती हैं, एक तो इस प्रकार के कैदियों का अपराध जघन्य होता है या इन्हें जेल में बंद अन्य कैदियों से सुरक्षा का खतरा रहता है। क्वारंटाइन सेल में आमतौर पर उन कैदियों को रखा जाता है, जो किसी गंभीर बीमारी से गुजर रहे हों या जिन्हें अन्य कैदियों के संपर्क से दूर रखना हो।

डीसीपी नोएडा विद्या सागर मिश्र ने बताया कि मामले की विवेचना जारी है। साक्ष्य जुटाए गए हैं। इसके साथ ही साक्ष्य में जो भी सामने आएंगे, उनसे पूछताछ की जाएगी। उन्होंने बताया है कि वीडियो फुटेज की जांच भी की जा रही है, जो भी व्यक्ति की संलिप्तता आएगी, उनसे पूछताछ करेंगे। उन्होंने एल्विश आर्मी की एक्स (ट्विटर) पर कहे गए अपशब्द पर भी कार्रवाई की बात कही। उस पर सोशल मीडिया की टीम कार्रवाई करेगी। डीसीपी नोएडा ने एल्विश की पुलिस कस्टडी रिमांड पर बताया कि जांच में जरूरत पड़ी तो अप्लाई कर सकते हैं। वहीं, पुलिस सूत्रों की मानें तो एल्विश के फोन की भी जांच की जा रही है। इसमें कई राज सामने आ सकते हैं।

क्या उत्तर प्रदेश सरकार से नाराज है क्षत्रिय समाज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या क्षत्रिय समाज उत्तर प्रदेश सरकार से नाराज है या नहीं! लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को सकुशल संपन्न हो गया। वेस्ट यूपी की आठ लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ है। वेस्ट यूपी में ठाकुरों की नाराजगी का असर दिखाई दिया। वोटिंग प्रतिशत कम रहा। दूसरे चरण में 26 अप्रैल को 13 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की 89 संसदीय सीट पर मतदान होगा। उतर प्रदेश की गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर 24 अप्रैल को चुनाव प्रचार बंद हो जाएगा और 26 अप्रैल को मतदान होगा। पूरे देश की नजर उत्तर प्रदेश पर है। 543 लोकसभा सीटों में से सबसे ज्‍यादा 80 संसदीय सीटें यूपी में ही हैं। ऐसा कहा जाता है कि दिल्‍ली का रास्‍ता उत्‍तर प्रदेश से होकर गुजरता है। सबसे ज्‍यादा लोकसभा सीटों पर जिस पार्टी का कब्‍जा होता है, उसके लिए देश की सत्‍ता हासिल करना आसान हो जाता है। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐन चुनाव के समय राजपूत समाज की नाराजगी भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा सकता है। फिर भी किसी नुकसान से बचने के लिए भाजपा नेतृत्व सक्रिय हो गया है। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो स्वयं ठाकुर बिरादरी से आते हैं, उन्होंने मोर्चा संभाल लिया है। उन्होंने गुरुवार को गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और हापुड़ में फैले साठा चौरासी के ठाकुरों को साधने के लिए पिलखुवा में जनसभा की। इस दौरान मुख्यमंत्री ने भाषण में बहुत सी बातें कही। राज्य में कानून व्यवस्था से लेकर एक वर्ग विशेष के अपराधियों को समाप्त करने तक की बातें कही। उन्होंने राजपूत बिरादरी के कथित ठेकेदारों पर व्ंयग्य किया। कहा कि चुनाव के समय बहुत से लोग आते हैं। क्षेत्र की, समाज की बात करते हैं। ऐसे लोगों को कह देना कि जाओ भाई चुनाव के बाद आना। ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि अबकी बार 400 पार का नारा देने वाली और यूपी की 80 सीटों पर जीत का दावा करने वाली भाजपा से गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर ठाकुर समाज के लोग भाजपा से नाराज है। इस पर राजनीतिक विश्लेषक और ठाकुर बिरादरी के अध्यक्ष का क्या कहना है?

राजनीतिक विश्लेषक नवीन दुबे का कहना है कि गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है। भाजपा प्रत्याशी डॉ. महेश शर्मा का विरोध व्यापक रूप से जहां फ्लैट ऑनर्स में देखने को मिल रहा है तो वहीं पांचों विधानसभाओं में भी क्षत्रिय समाज की नाराजगी एक बड़ा विषय है। यहां लगभग साढ़े चार लाख के आसपास क्षत्रिय मतदाता हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्षत्रिय समाज का प्रत्याशी न दिए जाने के कारण भाजपा को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। साठा मतलब 60 गांवों की सभा और चौबीसी यानी 24 गांवों की सभा, के गांवों में भी इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है।

उधर, बसपा ने गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में क्षत्रिय प्रत्याशी उतारकर चुनाव को रोचक बना दिया है। गौतमबुद्ध नगर में सपा और बसपा प्रत्याशी ने खुलकर फ्लैट ऑनर्स के मुद्दों पर बोलना शुरू कर दिया है, जबकि भाजपा प्रत्याशी के पास कहने को कुछ नहीं है। ऐसे में जैसे-जैसे 26 अप्रैल की तारीख नजदीक आ रही है। सियासी पारा चढ़ रहा है। सपा ने गुर्जर प्रत्याशी देकर अपना पीडीए कार्ड खेला है। साथ ही मुस्लिम वोट जो लगभग साढ़े तीन लाख के आसपास है, सपा का प्रमुख वोटर है। तीन लाख के आसपास गुर्जर और एक लाख के आसपास यादव वोटर के साथ अन्य पिछड़ा वोटर यदि सपा के साथ जाता है तो यहां सपा जीतने के चांस ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि बसपा प्रत्याशी से भाजपा को बड़ा नुकसान होता दिख रहा है।

अगर बात करें आरएसएस की तो आरएसएस की वह सक्रियता इस चुनाव में नहीं दिख रही है, जैसी अमूमन दिखाई देती है। इसका एक बड़ा कारण जौनपुर से भाजपा प्रत्याशी कृपा शंकर सिंह का होना है। ये वही कृपा शंकर सिंह हैं, जिन्होंने आरएसएस को 26/11 आतंकी हमले का साजिशकर्ता बताया था। ऐसे में संघ ने अंदरखाने कृपा शंकर सिंह को लेने का व्यापक विरोध भी दर्ज कराया था, लेकिन मोदी के सामने संघ बौना साबित होता दिखाई दिया। जिसके कारण संघ में भारी नाराजगी के चलते स्वयंसेवक चुनाव में नहीं लगे हैं। यहां बसपा दलित, क्षत्रिय वोटों के साथ प्रतिस्पर्धा में तो हैं, लेकिन वह अपनी जीत से ज्यादा भाजपा को बड़ा नुकसान देती दिखाई दे रही है।

उधर, भाजपा की ओर से ऐसे लोगों को टिकट वितरण किए गए, जिनका क्षेत्र में विरोध है। यदि बात की जाए गौतमबुद्ध नगर लोकसभा प्रत्याशी कि तो यहां के सांसद डॉ. महेश शर्मा का क्षेत्र में प्रत्येक समाज और जाति-धर्म में पूरा विरोध है। उनके ऊपर जातिवाद, अहंकार, तानाशाही क्षेत्र से नदारद रहने का ठप्पा लगा हुआ है। उनके ऊपर अपने ही दल के नेताओं, विधायकों यहां तक कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विरोध करने का आरोप है। ठाकुर समाज के बसपा के प्रत्याशी राजेंद्र सिंह सोलंकी उन पर भारी पड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।

नए आपराधिक कानून के लिए क्या बोले CJI?

हाल ही में CJI ने नए आपराधिक कानून के लिए एक बयान दिया है! चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि संसद द्वारा नए आपराधिक कानूनों में किए गए बदलाव इस बात का साफ संकेत है कि भारत बदल रहा है और आगे बढ़ रहा है और मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए नए कानूनी उपकरणों की जरूरत है। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने नए आपराधिक न्याय कानूनों के अधिनियमन को समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया और कहा कि भारत अपनी आपराधिक न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव के लिए तैयार है। आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रशासन में भारत का प्रगतिशील पथ’ विषय पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने उक्त बातें कही। इस मौके पर कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता समेत अन्य लोग मौजूद थे। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि नया आपराधिक न्याय कानून में बदलाव समाज के लिए ऐतिहासिक पल है और कहा कि भारत अपनी आपराधिक न्याय प्रणाली में अहम बदलाव के लिए तैयार है। इस मौके पर उन्होंने यह भी कहा कि यह नए कानून तभी सफल होंगे जब हम नागरिक के तौर पर उन्हें अपनाएं। साथ ही कहा कि नए कानून ने क्रिमिनल जस्टिस पर भारत के कानूनी ढांचे को एक नए युग में बदल दिया है। उन्होंने कहा कि पीड़ितों की हितों को प्रोटेक्ट करने के लिए अपराध की जांच व प्रॉसिक्यूशन अभियोजन कुशल तरीके से हो इसके लिए जरूरी बदलाव व सुधार किए गए हैं।

चीफ जस्टिस ने कहा कि संसद ने कानूनी बदलाव के जरिये तीन नए कानून पारित किए हैं और यह संकेत देता है कि भारत बदल रहा है और वह आगे बढ़ रहा है। गौरतलब है कि 28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 75 वें वर्षगांठ के मौके पर आयोजित समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार मौजूदा संदर्भ और बेहतरीन प्रथाओं के अनुसार कानून का आधुनिकीकरण कर रही है। पीएम ने कहा था कि तीन नए कानून बनाने से भारत के कानून, पुलिस और जांच प्रणाली एक नए युग में जा पहुंची है। एक जुलाई से लागू हो रहा है तीनों क्रिमिनल लॉतीनों क्रिमिनल लॉ एक जुलाई 2024 से अमल में आ जाएगा लेकिन हिट एंड रन से जुड़े प्रावधान के अमल पर रोक रहेगी। आईपीसी, सीआरपीसी और इंडियन एविडेंस एक्ट की जगह बनाए गए तीनों नए कानून को एक जुलाई 2024 से अमल में लाने के लिए नोटिफाई किया जा चुका है। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीनों नए कानून भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य एक्ट को एक जुलाई से लागू किया जाएगा, लेकिन नोटिफिकेशन में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता की धारा-106 (2) को फिलहाल होल्ड कर दिया है यानी धारा-106 (2) फिलहाल लागू नहीं होगा यह प्रावधान हिट एंड रन से जुड़े अपराध से जुड़ा हुआ है।

संसद से तीनों कानूनों को 21 दिसंबर 2023 को पास हो गया था जिसके बाद राष्ट्रपति ने इस पर 25 दिसंबर 2023 को मुहर लगा दी थी। पुराने औपनिवेशिक काल के कई शब्दावली को हटा दिया गया है। ऐसे करीब 475 शब्दों को डिलीट किया गया है जिनमें लंदन गजट, ज्यूरी, हर हैनिस आदि शामिल हैं। पहले जहां चार सौ बीस (420) यानी धोखाधड़ी, दफा 302 यानी हत्या व 376 यानी रेप जैसे अपराध के लिए कानून की किताब में लिखी धाराएं लोगों के जुबान पर चढ़ी हुई थी वह सब अब बदल गई है। भारतीय न्याय संहिता में कुल 358 धाराएं हैं और उसमें 20 नए अपराध को परिभाषित किया गया है।

राजद्रोह जैसे अपराध को अब नए कानून में हटा दिया गया।बीएन 2 संहिता की धारा-113 में आतंकवाद से संबंधित परिभाषा और सजा काि प्रावधान है। सीआरपीसी में जहां कुल 484 धाराएं थीं वहीं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं हैं।इस मौके पर उन्होंने यह भी कहा कि यह नए कानून तभी सफल होंगे जब हम नागरिक के तौर पर उन्हें अपनाएं। साथ ही कहा कि नए कानून ने क्रिमिनल जस्टिस पर भारत के कानूनी ढांचे को एक नए युग में बदल दिया है। उन्होंने कहा कि पीड़ितों की हितों को प्रोटेक्ट करने के लिए अपराध की जांच व प्रॉसिक्यूशन अभियोजन कुशल तरीके से हो इसके लिए जरूरी बदलाव व सुधार किए गए हैं। कुल 177 ऐसे प्रावधान हैं जिसमें संशोधन हुआ है। बीएनएसएस, 2023 में सबूतों के मामले में ऑडियो-विडियो इलेक्ट्रॉनिक्स तरीके से जुटाए जाने वाले सबूतों को प्रमुखता दी गई है। नए कानून में किसी भी अपराध के लिए जेल में अधिकतम सजा काट चुके कैदियों को उसके निजी बॉन्ड पर रिहा करने का प्रावधान रखा गया है। वहीं भारतीय साक्ष्य अधिनियम में कुल 170 धाराएं होंगी ।