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जब ईरान के राजा हिंदुस्तान से लेते थे टैक्स!

एक समय ऐसा भी था जब ईरान के राजा हिंदुस्तान से टैक्स लेते थे! ईरान में नक्शे-रूस्तम नाम की एक जगह है, जहां प्राचीन फारस के महान शासक डेरियस प्रथम की कब्र है। डेरियस को दारा के नाम से जाना जाता था। उसकी कब्र पर लिखा है-दारा के पास कितने देश थे, ये उसकी तराशी हुई आकृतियों से पता चल सकता है। तुम्हें इस बात का अंदाजा हो जाएगा कि किसी फारसी का भाला कितनी दूर तक जाता है। यानी उसका साम्राज्य दूर-दूर तक फैला है।

यह कहानी है ईरान के सुनहरे दौर की, जब पूरी दुनिया तक ईरान यानी तब के फारस की तूती बोलती थी। उसके पास साइरस और दारा जैसे महान राजा थे, जिन्होंने ईरान को बनाया। इन्हीं के जमाने में प्राचीन हिंदुस्तान से भी भारत का कनेक्शन था। प्राचीन ईरान यानी फारस को युद्धों ने ही बनाया था। उस दौर में एक से बढ़कर एक योद्धा और शासक पैदा हुए, जिन्होंने ईरान को पूरी दुनिया के नक्शे पर स्थापित कर दिया। हखमनी वंश के डेरियस प्रथम यानी दारा के शासनकाल में हखमनी साम्राज्य मिस्र से लेकर सिंधु नदी तक फैल गया था। उसने यूनान पर कब्जा किया और उत्तर में शकों से भी जंग जीती। दारा ने इतने बड़े साम्राज्य में एक जैसी मुद्रा चलाई और आरामाइक लिपि को राजभाषा करार दिया। उसने पर्सेपोलिस तथा पसरागेड जैसी जगहों पर महत्वपूर्ण निर्माण कार्य भी शुरु करवाया जो आज भी हखमनी स्थापत्य कला की पहचान हैं। दारा के शासन का ही असर था कि मौर्य सम्राट अशोक ने अपने कुछ शिलालेखों में खरोष्ठी और आरामाइक लिपि का इस्तेमाल किया। उसने पूरे साम्राज्य को 20 प्रांतों में बांटा और हर प्रांत के लिए गवर्नर यानी क्षत्रप नियुक्त किए। आज दुनिया में शासन की यह प्रणाली दारा की ही देन है।

आज जो आप हाइवे और सड़कें देखते हैं, उसकी अहमियत दारा ने उसी वक्त पहचान ली थी। उसने अपने पूरे साम्राज्य को खूबसूरत और चौड़ी सड़कों से जोड़ा। हाइवे का जाल बिछा दिया। राजा दारा ने चिट्ठी पहुंचाने के लिए डाक प्रणाली का भी चलन शुरू किया। पूरी दुनिया को उसने डाक व्यवस्था अपनाने के लिए प्रेरित किया। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में दारा की आर्मी ने भारत पर आक्रमण किया और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत, सिंध और पंजाब के प्रांतों को अपने अधिकार में कर लिया। सिकंदर के भारत पर आक्रमण करने तक ये क्षेत्र ईरानी साम्राज्य के नियंत्रण में रहे। ऐसे में फारस के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध रहे। ईरान ने लगभग दो शताब्दियों तक भारत के साथ संबंध बनाए रखे। इस दौरान भारतीय व्यापारी दूर देशों की यात्रा करते थे। ऊनी कंबल, खाल, घोड़े, हाथी और कीमती पत्थर बेचते थे। इस दौरान भारत में फारसी चांदी के सिक्के चलन में थे। इन सिक्कों की ढलाई इतनी शानदार थी कि पूरी दुनिया में उनका नाम था।

भारतीय प्रांत से ईरान को राजस्व के रूप में खूब सारा सोना मिलता रहा। दारा के यूनानी सेनापति स्काईलक्स ने सिंधु से भारतीय समुद्र में उतरकर अरब और मकरान के तटों का पता लगाया था। वह जरथुस्त्र धर्म को माननेवाला था। राजा दारा ने सड़कों के जाल के अलावा नील नदी से लेकर लाल सागर तक एक नहर भी बनवाई हुई थी। दारा के खिलाफ एशिया माइनर के आयोनियन यूनानियों ने विद्रोह किया। लेकिन यह विद्रोह दबा दिया गया। विद्रोह के केंद्र माइलेतस नगर पर कब्जा करने के बाद वहां के समस्त पुरुषों का कत्लेआम कर दिया गया। औरतों और बच्चों को बंदी बनाकर अपने देश ले गए।

फारसियों के विस्तारवाद का असर 1935 में तब महसूस किया गया जब रेजा शाह पहलवी ने फारस के नाम से जाने जाने वाले देश का नाम बदलकर ईरान कर दिया। दरअसल, ईरान शब्द एरान से आया, जिसे प्राचीन फारसी राजा उन लोगों को कहते थे, जिन पर उन्होंने शासन किया था। मूल फारसी आर्य भाषी थे। आर्य एक भाषाई समूह है, जिसमें मध्य एशिया के बड़ी संख्या में खानाबदोश लोग शामिल थे। एक महान राजा के बनाए साम्राज्य को दूसरे महान राजा ने नष्ट कर दियासेंट एंड्रूयूज विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड के प्रोफेसर अली अंसारी के अनुसार, प्राचीन फारस के हखमनी साम्राज्य की राजधानी पर्सिपोलिस के खंडहरों को देखने जाने वाले हर सैलानी को तीन बातें मुख्य रूप से बताई जाती हैं। पहला-ये डेरियस द ग्रेट यानी दारा ने बनाया था। इसे उसके बेटे जेरेक्सीज ने आगे बढ़ाया। इसे उस इंसान ने तबाह कर दिया, जिसका नाम सिकंदर द ग्रेट था।

क्या भारत के एयर बेस बन चुके हैं अभेद्य?

वर्तमान में भारत के एयर बेस अभेद्य बन चुके हैं! कभी पठानकोट और उरी जैसी घटना नहीं हो, इसके लिए सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा चाक-चौबंद करने की नेक्स्ट लेवल की तैयारी हो रही है। भारतीय वायुसेना अपने ऐसेट्स को आतंकी हमलों से फुल प्रुफ रखने के लिए देशभर में अपने और 30 एयर बेस की ग्राउंड पेरिमीटर सिक्यॉरिटी को अपग्रेड करने की योजना शुरू की है। इन 30 एयर बेस पर वैसे ही नए व्यापक मल्टि लेयर्ड, मल्टि सेंसर, हाइटेक सर्विलांस और घुसपैठ का पता लगाने वाले सिस्टम लगाए जाने हैं जो 23 ‘महत्वपूर्ण और संवेदनशील’ एयर बेस पर लगाए जा चुके हैं। यह सिस्टम एकीकृत परिधि सुरक्षा प्रणाली (IPSS) के नाम से जाना जाता है।  पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकवादियों ने जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमला किया था। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने पहले 23 एयर बेस के लिए आईपीएसएस इंस्टॉलेशन को मंजूरी दी थी, जिसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) को ठेका मिला था।एयरबेस की निगरानी के लिए तैनात होने वाले आईपीसएसएस सिस्टम की पांच परतों में इलेक्ट्रिक स्मार्ट पावर की बाड़ेबंदी, इन्फ्रा रेड लाइट वाले सीसीटीवी कैमरे, रेडार, डेडिकेटेड ऑप्टिकल फाइबर केबल और जमीन के अंदर होने वाली हलचल का पता लगाने वाली प्रणालियां (UVDS) एवं डुअल पीटीजेड (पैन, टिल्ट, जूम) थर्मल और विजिबल कैमरे शामिल होंगे। भारतीय कंपनियों को अब जारी रिक्वेस्ट ऑफर इन्फर्मेशन (RFI) के अनुसार, भारतीय वायुसेना चाहती है कि 30 एयर बेस पर घुसपैठ का पता लगाने और निगरानी के लिए पांच परतों वाला आईपीएसएस सिस्टम लगाया जाए।

यह खास परिस्थिति में फोटो और वीडियो के विश्लेषण से उचित निर्णय लेने में मददगार साबित होगा जिसमें एआई की बड़ी भूमिका होगी। कम लागत वाले लेकिन ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले आतंकी हमलों ने मौजूदा व्यवस्था में कई कमियों को उजागर किया था। इन हमलों में आतंकियों को मिली सफलता से साफ पता चला कि सैन्य ठिकानों के आसपास की नए पैमाने से सुरक्षा सुनिश्चित करने, मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपीज) को उन्नत करने से लेकर नियमित सिक्यॉरिटी ऑडिट और खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों के बीच सहज समन्वय की कितनी जरूरत है।एयरबेस की निगरानी के लिए तैनात होने वाले आईपीसएसएस सिस्टम की पांच परतों में इलेक्ट्रिक स्मार्ट पावर की बाड़ेबंदी, इन्फ्रा रेड लाइट वाले सीसीटीवी कैमरे, रेडार, डेडिकेटेड ऑप्टिकल फाइबर केबल और जमीन के अंदर होने वाली हलचल का पता लगाने वाली प्रणालियां (UVDS) एवं डुअल पीटीजेड (पैन, टिल्ट, जूम) थर्मल और विजिबल कैमरे शामिल होंगे।

एक अधिकारी ने बताया, ‘गैप फ्री सिस्टम में हवाई निगरानी के लिए मिनी यूएवी (मानवरहित हवाई वाहन) भी होने चाहिए। यूवीडीएस को एयरबेस की परिधि में अगर घुसपैठियों के चलने, रेंगने और सुरंग खोदने के कारण होने वाली हलचल का पता लगाने में सक्षम होना चाहिए।नए व्यापक मल्टि लेयर्ड, मल्टि सेंसर, हाइटेक सर्विलांस और घुसपैठ का पता लगाने वाले सिस्टम लगाए जाने हैं जो 23 ‘महत्वपूर्ण और संवेदनशील’ एयर बेस पर लगाए जा चुके हैं।भारतीय वायुसेना चाहती है कि 30 एयर बेस पर घुसपैठ का पता लगाने और निगरानी के लिए पांच परतों वाला आईपीएसएस सिस्टम लगाया जाए। यह सिस्टम एकीकृत परिधि सुरक्षा प्रणाली (IPSS) के नाम से जाना जाता है।  पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के आतंकवादियों ने जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमला किया था। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने पहले 23 एयर बेस के लिए आईपीएसएस इंस्टॉलेशन को मंजूरी दी थी, जिसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) को ठेका मिला था। भारतीय कंपनियों को अब जारी रिक्वेस्ट ऑफर इन्फर्मेशन (RFI) के अनुसार, भारतीय वायुसेना चाहती है’ वायुसेना ने विक्रेताओं से इस साल 24 जून तक आईपीएसएस के लिए आरएफआई पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा है। ध्यान रहे कि पाकिस्तान में बलोच उग्रवादियों ने 25 मार्च को ही एक और नौसैनिक एयर बेस पर हमला किया था।

हाल के वर्षों में पठानकोट, उरी, नगरोटा, अखनूर और अन्य शिविरों पर आतंकवादी हमलों की एक सीरीज चली। इससे पता चला कि सैन्य प्रतिष्ठानों और ठिकानों के आसपास सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने की कितनी जरूरत है। कम लागत वाले लेकिन ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले आतंकी हमलों ने मौजूदा व्यवस्था में कई कमियों को उजागर किया था। इन हमलों में आतंकियों को मिली सफलता से साफ पता चला कि सैन्य ठिकानों के आसपास की नए पैमाने से सुरक्षा सुनिश्चित करने, मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपीज) को उन्नत करने से लेकर नियमित सिक्यॉरिटी ऑडिट और खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों के बीच सहज समन्वय की कितनी जरूरत है।

आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने क्यों कहा इस बार जितनी चाहिए एनडीए?

हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहा कि इस बार एनडीए जरूर जितनी चाहिए! रविवार को प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में बीजेपी ने अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया। मैनिफेस्टो लॉन्च के दौरान मोदी ने एक बार फिर पहले से मजबूत NDA सरकार बनाने की मांग की है। मोदी के इस बयान के पीछे छुपा कोई बड़ा इशारा है। राजनीति के दांव-पेच समझने वाले लोग यह बखूबी जानते हैं कि मोदी कोई भी बात हल्के में कभी नहीं बोलते। एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में तनाव है, ऐसे में संकल्प पत्र के लॉन्च पर मोदी की यह मांग काफी कुछ कह रही है। इजरायल और ईरान तनातनी के बीच मोदी ने कहा कि उनकी सरकार समय-समय पर विदेशों में संघर्ष की स्थिति में फंसे भारतीयों को वापस लाने में कामयाब रही है। मोदी ने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर और तेजी से विकास के लिए यह भारत का समय है।भरोसेमंद आवाज के रूप में स्थापित किया है। हमने मानवता के लाभ के लिए भारत के विचारों और कार्यों की स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया है। हमारे मानव केंद्रित विश्व दृष्टिकोण ने सर्वसम्मति निर्माता, प्रथम उत्तरदाता और वैश्विक दक्षिण के लिए एक आवाज बनने में मदद की है। भारतीय नागरिकों को अन्य संघर्ष क्षेत्रों के अलावा युद्ध प्रभावित यूक्रेन और इजरायल से निकाला गया था। दिल्ली में बीजेपी ऑफिस में घोषणा पत्र के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि आज दुनिया भर में अनिश्चितता और तनाव का माहौल है। हर जगह संघर्ष हो रहा है। संकट की इस घड़ी में संघर्षग्रस्त देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। वैश्विक अशांति के समय, भारत में एक स्पष्ट बहुमत के साथ एक स्थिर सरकार की आवश्यकता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। भाजपा एक ऐसी सरकार बनाने के लिए प्रतिबद्ध है जो देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी और इसे प्रगति और विकास की ओर ले जाएगी। भाजपा का यह संकल्प पत्र ऐसी सरकार का आश्वासन देता है। भारत एक वैश्विक सहयोगी के रूप में, मानवता के कल्याण के लिए लगातार प्रयास करेगा। भारतीय जनता पार्टी दृढ़ता से राष्ट्र के हित में साहसिक और चुनौतीपूर्ण निर्णय लेती है और देश को प्राथमिकता देती है। उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने भारत को दुनिया के लिए विश्वबंधु मित्र के रूप में स्थापित किया। साथ ही यह एक ऐसी सरकार भी थी जो देश के हित में बड़े और कठिन निर्णय ले सकती थी।

सरकार ने बताया कि मोदी सरकार में संघर्ष क्षेत्रों में फंसे 1.5 करोड़ भारतीयों को निकालने में कामयाब रही। मोदी ने कहा कि हमने पिछले 10 वर्षों में भारत को विश्व स्तर पर एक विश्वसनीय, भरोसेमंद आवाज के रूप में स्थापित किया है। हमने मानवता के लाभ के लिए भारत के विचारों और कार्यों की स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया है। हमारे मानव केंद्रित विश्व दृष्टिकोण ने सर्वसम्मति निर्माता, प्रथम उत्तरदाता और वैश्विक दक्षिण के लिए एक आवाज बनने में मदद की है। भारतीय नागरिकों को अन्य संघर्ष क्षेत्रों के अलावा युद्ध प्रभावित यूक्रेन और इजरायल से निकाला गया था।

भाजपा के घोषणा पत्र में देश के नाम लिखे प्रधानमंत्री मोदी के एक पत्र को भी शामिल किया गया था। इस पत्र में उन्होंने भारत के तेजी से विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव के बारे में विस्तार से बताया।पीएम मोदी ने कहा कि आज दुनिया भर में अनिश्चितता और तनाव का माहौल है। हर जगह संघर्ष हो रहा है। संकट की इस घड़ी में संघर्षग्रस्त देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। वैश्विक अशांति के समय, भारत में एक स्पष्ट बहुमत के साथ एक स्थिर सरकार की आवश्यकता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। भाजपा एक ऐसी सरकार बनाने के लिए प्रतिबद्ध है जो देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी और इसे प्रगति और विकास की ओर ले जाएगी। भाजपा का यह संकल्प पत्र ऐसी सरकार का आश्वासन देता है।विश्व दृष्टिकोण ने सर्वसम्मति निर्माता, प्रथम उत्तरदाता और वैश्विक दक्षिण के लिए एक आवाज बनने में मदद की है। भारतीय नागरिकों को अन्य संघर्ष क्षेत्रों के अलावा युद्ध प्रभावित यूक्रेन और इजरायल से निकाला गया था। उन्होंने लिखा कि लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन के दौरान मैंने कहा था यही समय है, सही समय है। आज दुनिया भर में कई सम्मानित लोग भी यही कह रहे हैं कि यह भारत का समय है। असल में, आज भारत को बेहतर भविष्य बनाने की वैश्विक कोशिशों में एक अहम खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

क्या इजरायल जैसा सुरक्षा कवच भारत के पास भी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत के पास इजरायल जैसा सुरक्षा कवच है या नहीं! ईरान ने एकसाथ सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलों से इजरायल पर हमला बोल दिया। हालांकि, गिनती की कुछ मिसाइलों के सिवा ईरान का एक भी हमला कामयाब नहीं हो सका। ईरान के एकमुश्त हमलों को नाकामयाब बनाने का श्रेय इजरायल के ‘आयरन डोम’ को जाता है। आयरन डोम इजरायल का वह कवच है जो आसमान से आने वाले घातक से घातक हथियारों को पहचानकर नेस्तनाबूद कर देता है। एक विदेशी पत्रकार ने सोशल मीडिया एक्स पर ईरानी हमलों के खिलाफ आयरन डोम की सफलता की गाथा लिखी है। उन्होंने बताया, ‘इजरायल की आयरन डोम एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम कमाल का है। इसने इजरायल पर ईरान से आई 331 मिसाइलों और ड्रोन में से सभी 185 कामिकेज ड्रोन को मार गिराया। इसने 110 बैलिस्टिक मिसाइलों में से 103 को मार गिराया। साथ ही, सभी 36 क्रूज मिसाइलों को भी मार गिराया। सिर्फ 7 बैलिस्टिक मिसाइलों का ही असर इजराइली क्षेत्र पर हुआ।’ इस पर भारतीय उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने इजरायल के पास आयरन डोम समेत एयर डिफेंस बाकी सिस्टम्स भी गिना दिए। उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘इजरायल के पास आयरन डोम से भी ज्यादा है। उनके पास डेविड स्लिंग नामक एक लंबी दूरी का इंटरसेप्शन सिस्टम है। उनके पास एरो 2 और 3 सिस्टम भी हैं। लेजर का उपयोग करने वाला आयरन बीम भी है। अभेद्य डिफेंस इंटरसेप्शन सिस्टम होना आज आक्रामक हथियारों के जखीरे जितना ही महत्वपूर्ण है।’ महिंद्रा ने भारत में भी बेहद ताकतवर डिफेंस सिस्टम पर फोकस और खर्च बढ़ाने की जरूरत बताई है।

महिंद्रा का कहना सौ फीसदी सही है। भारत भी इजरायल जैसे ही चीन-पाकिस्तान जैसे दुश्मनों से घिरा है। दोनों ही पड़ोसी देश परमाणु हथियारों से लैस हैं। हमारे पास भी परमाणु हथियार हैं। दरअसल, परमाणु हथियार युद्ध को एक सीमा तक सीमित रखने के लिए होते हैं ताकि संपूर्ण विनाश की नौबत नहीं आए। यही वजह है कि दुश्मन के हमलों को निष्प्रभावी करना ही सर्वोच्च प्राथमिकता होती है, उनके इलाकों में ज्यादा से ज्यादा तबाही मचाना दूसरी। यह स्वाभाविक ही है कि युद्ध की परिस्थिति में दुश्मन को नुकसान पहुंचाने से ज्यादा जरूरी खुद का बचाव करना है। तो सवाल है कि क्या भारत इसके लिए तैयार है? क्या भारत के पास भी आयरन डोम जैसा कोई एयर डिफेंस सिस्टम है जो दुश्मन के हथियारों को हवा में ही मार गिराए? भारत का बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस प्रोग्राम एक दोहरी प्रणाली है जिसमें दो भूमि और समुद्र आधारित इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल हैं। पृथ्वी वायु रक्षा (PAD) मिसाइल हाई अल्टिट्यूट पर इंटरसेप्शन जबकि उन्नत वायु रक्षा (AAD) मिसाइल लो अल्टिट्यूड पर इंटरसेप्शन के लिए है। यह द्वीस्तरीय ढाल 5,000 किलोमीटर दूर से छोड़ी गई किसी भी आने वाली मिसाइल को रोकने में सक्षम है। इस सिस्टम में प्रारंभिक चेतावनी और ट्रैकिंग रडार और कमांड एंड कंट्रोल पदों का एक ओवरलैपिंग नेटवर्क भी शामिल है।

अब इसका नाम बदलकर प्रद्युम्न बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर कर दिया गया है। इसे 50 किलोमीटर से ऊपर की ऊंचाई (एक्सो-वायुमंडलीय) पर आने वाली मिसाइलों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। यह एएडी के साथ भारत की द्वीस्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली का हिस्सा है। भारत के बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का एक हिस्सा एएडी एक एंटी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली है जिसे 15-25 किलोमीटर की ऊंचाई पर एंडो एटमॉसफेयर में आने वाली मिसाइलों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका उद्देश्य शहरों और रणनीतिक संपत्तियों को बैलिस्टिक मिसाइल हमलों से बचाना है।

भारत और इजरायल ने इसे संयुक्त रूप से विकसित किया है। बराक 8 एक उन्नत, लंबी दूरी की मिसाइल रक्षा और वायु रक्षा प्रणाली है। बराक 8 एयर डिफेंस सिस्टम कम और लंबी दूरी, दोनों पर हवाई खतरों को रोकने में सक्षम है और इसका उपयोग भारतीय और इजरायली दोनों सशस्त्र बल करते हैं। यह सिस्टम बहुमुखी है और इसे जहाजों के साथ-साथ जमीन पर भी तैनात किया जा सकता है। इस मिसाइल का नौसैनिक संस्करण समुद्र में अपने युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए आ रही दुश्मन की क्रूज मिसाइलों और लड़ाकू जेट को रोक सकती है। इसे भारतीय वायु सेना और थल सेना में भी शामिल किया जाना है। भारत ने रूस से एस-400 एयर डिफेंस खरीदा है। भारत ने अपनी रक्षा प्रणाली को अभेद्य बनाने के लिए अमेरिकी चेतावनियों की बिल्कुल परवाह नहीं की और रूस से एस-400 खरीद लिया। भारत ने पाकिस्तान और चीन से दो तरफा खतरे से निपटने के लिए उत्तर-पश्चिम और पूर्व में पहले तीन S-400 स्क्वाड्रन तैनात किए हैं। S-400 सबसे उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों में से एक माना जाता है। इसमें रडार, नियंत्रण उपकरण और लगभग सभी प्रकार के हवाई लक्ष्यों विमान, ड्रोन, बम, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने और नष्ट करने के लिए कई प्रकार की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें शामिल हैं।

इस बार के लोकसभा चुनाव में एनडीए जीतेगा या इंडिया गठबंधन?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में एनडीए जीतेगा या इंडिया गठबंधन! आम चुनाव का सियासी क्लामेक्स अब चरम पर पहुंच गया है। सात चरणों में होने वाले चुनाव के पहले चरण का चुनाव भी शुक्रवार को समाप्त हो जाएगा। नतीजा 4 जून को पता चलेगा लेकिन अगर अब तक चुनाव प्रचार और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के तरीके को देखें तो पक्ष और विपक्ष एकदम अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं। दोनों की सियासी धारा एकदम अलग दिख रही है।अगर बीजेपी की अगुआई में NDA का अब तक का चुनावी प्रचार देखें तो स्पष्ट है कि उसका पूरा चुनाव नरेन्द्र मोदी के नाम, काम और करिश्मे के भरोसे है। सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि उसके सहयोगियों के लिए भी सबसे बड़ा और अकेला सियासी तुरुप का पत्ता नरेन्द्र मोदी ही हैं। ‘मोदी की गारंटी’ इनका सबसे प्रमुख चुनावी थीम और हथियार दिखा है। पार्टी के मौजूदा सांसद या स्थानीय इनकंबेंसी को काउंटर करने के लिए इस चुनाव को राष्ट्र का चुनाव बनाया जा रहा है, और पीएम नरेन्द्र मोदी को लगातार तीसरी बार चुनने लिए वोट मांगा जा रहा है। एनडीए को अहसास है कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता में तो कहीं कोई गिरावट नहीं है लेकिन कई जगह स्थानीय समीकरण उसके खिलाफ हो सकते हैं। इसका काउंटर करने के लिए राष्ट्रीय मुद्दों को सामने लाकर चुनाव को ‘मोदी चाहिए या नहीं चाहिए’ वाला बनाया जा रहा है। चुनाव को प्रेजिडेंसियल फार्म में ले जाया जा रहा है। हालत यह है कि बिहार में पूर्णिया लोकसभा सीट पर जेडीयू उम्मीवार के रोडशो में उनके सामने नरेन्द्र मोदी की बड़ी फोटो लगी थी और उनके दल के नेता नीतीश कुमार की तस्वीर ही गायब थी। यही सूरत दूसरे सहयोगी दलों में भी दिखी। सहयोगी दल भी अपने इलाके में पीएम मोदी की रैली की सबसे अधिक मांग कर रहे हैं। पीएम मोदी भी इस बार मजबूत देश के लिए मजबूत सरकार को आधार बनाकर मैदान में दिख रहे हैं।

 विपक्षी गठबंधन पूरे चुनाव को स्थानीय मुद्दों और अपने लुभावने वादों के इर्द-गिर्द रखने की कोशिश में है। विपक्षी दल ‘पीएम नहीं, एमपी चुनें’ वाले नैरेटिव पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में वे चुनाव को अधिकतर स्थानीय रंग देने की कोशिश में हैं। विपक्ष के एक सीनियर नेता ने कहा कि दिल्ली को केंद्र में रखकर प्रचार जितना हाई वोल्टेज दिखेगा, उनके लिए मौके उतने ही कम हो जाएंगे। वह इस बात का जवाब दे रहे थे कि विपक्ष का चुनाव प्रचार बीजेपी के मुकाबले फीका क्यों दिखता है। तमाम विपक्षी दल स्थानीय मुद्दे और स्थानीय उम्मीदवार को ही ऊपर रख रहे हैं। इसके अलावा कांग्रेस 38 लाख सरकारी नौकरियां या महिलाओं को एक लाख रुपये सालाना मानदेय जैसे लोक लुभावने वादों की बात कर रही है। वहीं विपक्ष जमीन पर संविधान बदलने की आशंका को भी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके पीछे इनकी मंशा खासकर दलित और ट्राइबल वोट को अपने पक्ष में करने की है। इसीलिए पहले चरण के चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में नरेन्द्र मोदी ने इस आरोप को काफी आक्रामक रूप से काटने की कोशिश की।

2014 से अब तक कई चुनावों में मिली हार के बाद इस बार विपक्ष ने पहली बार चुनाव में सीधे नरेन्द्र मोदी पर हमला नहीं करते हुए उनकी नीतियों और रोजगार, संविधान बदलने जैसे मुद्दे चुने हैं। साथ ही बड़े विपक्षी नेता राष्ट्रीय मुद्दों से परहेज कर रहे हैं। क्षेत्रीय दलों के नेता अपने राज्यों के मुद्दे के साथ चुनाव में हैं। नरेन्द्र मोदी हमेशा राजनीति को अपने हिसाब से पिच पर मोड़ने के लिए जाने जाते हैं। वह कहीं न कहीं चुनाव को देश के विकास और विरासत से जोड़ने में सफल रहे हैं। साथ ही तमाम ओपिनियन पोल में भले बीजेपी को पूर्ण बहुमत से बड़ी जीत का अनुमान जताया गया लेकिन उनके सर्वे में बेरोजगारी और महंगाई मुद्दे भी सबसे अहम रहे।चुनाव को प्रेजिडेंसियल फार्म में ले जाया जा रहा है। हालत यह है कि बिहार में पूर्णिया लोकसभा सीट पर जेडीयू उम्मीवार के रोडशो में उनके सामने नरेन्द्र मोदी की बड़ी फोटो लगी थी और उनके दल के नेता नीतीश कुमार की तस्वीर ही गायब थी। यही सूरत दूसरे सहयोगी दलों में भी दिखी। इन सब विरोधाभासों के बीच चुनाव करीब आते-आते माहौल तमाम करवटें ले रहा है लेकिन जैसा कि राजनीति में कहा जाता है कि चुनाव में मुद्दे-मसले बदलने के लिए 24 घंटे का भी वक्त बहुत होता है, अभी कुछ भी हो सकता है क्योंकि चुनाव पूरी तरह समाप्त होने में महीने से भी अधिक का वक्त है।

आखिर कहां से आया था नोटा बटन का आईडिया?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर नोटा बटन का आईडिया कहां से आया था! लोकसभा चुनाव 2024 के पहले फेज के लिए वोटिंग शुरू हो चुकी है। सोशल मीडिया पर मतदान के साथ ही NOTA (इसमें से कोई नहीं) भी ट्रेंड में है। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स यह भी कह रहे हैं कि जब से नोटा का ऑप्शन मिला है तब से भाजपा जीत रही है। कहीं विरोध के रूप में नोटा का इस्तेमाल भाजपा को फायदा तो नहीं पहुंचा रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में 1.06 फीसदी वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे। वहीं 2018 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के दौरान सबसे ज्यादा 1.98 फीसदी वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे। 2019 में लक्षद्वीप में नोटा के तहत सबसे कम यानी 100 वोट डाले गए थे। वहीं, राज्यों में सबसे कम नोटा का प्रतिशत दिल्ली और मिजोरम में रहा। दोनों राज्यों में नोटा के लिए 0.46 प्रतिशत वोट डाले गए। हालांकि, बीते 5 साल लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नोटा के तहत 1.29 करोड़ वोट पड़े। कुछ एक्सपर्ट तो इसे बिना दांत और नाखून के बाघ भी बता रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ. राजीव रंजन गिरि ने नोटा को ज्यादा प्रभावी नहीं बताया। उन्होंने कहा कि बेहतर तो ये होता कि जिन प्रत्याशियों को वोटर नकार रहे हैं, उन्हें अगले चुनाव में लड़ने से रोका जाना चाहिए। वह कहते हैं कि नोटा का इस्तेमाल इतना मामूली है कि इससे किसी प्रत्याशी के जीत-हार का फैसला नहीं हो सकता है। इतना जरूर है कि जहां कांटे की टक्कर है, वहां पर यह निर्णायक हो सकता है। वहीं, हाल ही में ADR के हेड मेजर जनरल रि. अनिल वर्मा ने एक एजेंसी से बातचीत में कहा था कि नोटा एक तरह से बिना दांत के बाघ जैसा है। यह राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ आक्रोश या असहमति जताने का एक प्लेटफॉर्म भर है।

सुप्रीम कोर्ट के सितंबर, 2013 में आए एक फैसले के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा का का इस्तेमाल शुरू किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह निर्देश दिया था कि वह बैलट पेपर्स या ईवीएम में नोटा का प्रावधान करे ताकि वोटर्स को किसी को भी वोट नहीं करने का हक मिल सके। इसके बाद आयोग ने ईवीएम में नोटा का बटन आखिरी विकल्प के रूप में रखा। दरअसल, रूल 49-O के नियम के अनुसार, किसी वोटर को यह हक है कि वह वोट नहीं करे। नोटा से पहले कोई वोटर अगर किसी प्रत्याशी को वोट नहीं देना चाहता था तो उसे फॉर्म 490 भरना पड़ता था। हालांकि, पोलिंग स्टेशन पर ऐसे फॉर्म भरना उस वोटर के लिए खतरा भी हो सकता था। यह कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 का उल्लंघन भी था। इससे वोटर की गोपनीयता से समझौता करना पड़ता था।

एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते एक दशक में दागदार प्रत्याशियों की संख्या में इजाफा हुआ है। 2009 में लोकसभा चुनाव जीतने वाले कुल 543 उम्मीदवारों में से 162 यानी 30 फीसदी ऐसे थे, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले थे। वहीं, 76 यानी 14 फीसदी प्रत्याशी ऐसे थे, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चल रहे थे। 2019 में लोकसभा पहुंचने वाले ऐसे प्रत्याशी 43 फीसदी हो चुके थे, जबकि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे करीब 29 फीसदी प्रत्याशी लोकसभा पहुंचे थे। नोटा का विचार सबसे पहले अमेरिका के एक नगर निगम से आया था। दरअसल, 1976 में कैलिफोर्निया की सैंटा बारबरा काउंटी में ऑफिशियल इलेक्टोरल बैलट में वहां की म्यूनिसिपल इन्फॉर्मेशन काउंटी ने नोटा के इस्तेमाल का प्रस्ताव पारित किया था। हमारे देश में 2009 में भारत कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में यह अपील की थी कि नोटा का इस्तेमाल बैलट में करने के लिए सुनिश्चित किया जाए। इससे वोटर को यह आजादी मिलेगी कि वह किसी अयोग्य उम्मीदवार को न चुने। द पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने इस बारे में बाकायदा एक जनहित याचिका दायर की। पहली बार नोटा का इस्तेमाल 2013 में चार राज्यों छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किया गया था।

नोटा का विकल्प अर्जेंटीना, बेलारूस, बेल्जियम और बुल्गारिया में आई डॉन्ट सपोर्ट एनीवन के रूप में मौजूद है। कनाडा, कोलंबिया, फ्रांस, ग्रीस में ब्लैंक वोट तो भारत-अमेरिका में नन ऑफ द अबव के रूप में यह विकल्प है। इंडोनेशिया में एंपटी बॉक्स तो कजाखिस्तान, स्विट्जरलैंड और उरुग्वे में नन ऑफ दीज कैंडिडेट्स कहा जाता है। रूस में नोटा में अगेंस्ट ऑल के रूप में यह मौजूद है।

जब पहली बार भारत से विदेश डिलीवर हुई ब्रह्मोस मिसाइल!

हाल ही में भारत से विदेश ब्रह्मोस मिसाइल डिलीवर हो चुकी है! कभी राफेल फाइटर जेट तो कभी एस-400 मिसाइल सिस्टम के भारत आने की तस्वीरें तो आपने जरूर देखी होंगी। ये पहली बार है जब भारत ने किसी दूसरे देश को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस सौंपी है। दोनों देशों ने 2022 में 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसी डील के तहत भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें दी है। शुक्रवार को भारतीय वायु सेना का सी-17 ग्‍लोबमास्‍टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम लेकर फिलिपींस के कलार्क एयर बेस पहुंचा। इस दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की डिलिवरी के फोटो आपका दिल जीत लेंगे। रक्षा जानकारों का कहना है कि फिलिपींस के साथ हुई यह डिफेंस डील भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए पहला प्रमुख इंटरनेशनल एक्सपोर्ट ऑर्डर था। यह ऑर्डर 290 किमी की रेंज वाली एक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल के तट-आधारित संस्करण के लिए है। दोनों देशों के बीच साल 2022 में इसे लेकर डील हुई थी। भारत और फिलीपींस के बीच लगभग 37.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर पर डील को लेकर सहमति हुई थी।

भारत की ओर से फिलीपींस को यह मिसाइल प्रणाली की डिलीवरी उस वक्त दी गई है, जब दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और चीन के बीच लगातार तनाव बना हुआ है। भारत ने शुक्रवार को फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का पहला सेट सौंपा है। इस दौरान फिलीपींस मरीन कॉर्प्स के अफसरों को भारतीय अधिकारियों ने मिठाई भी खिलाई। फिलीपींस मरीन कॉर्प्स को यह मिसाइल सिस्टम पहुंचाने के लिए भारतीय वायु सेना के सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की मदद ली गई। सी-17 ग्लोबमास्टर शुक्रवार को फिलीपींस पहुंचे हैं। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ-साथ इस प्रणाली के लिए ग्राउंड सिस्टम का निर्यात बीते महीने से ही शुरू हो गया था। माना जा रहा है कि ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली को फिलीपींस की ओर से अपने तटीय इलाकों में तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत और रूस के बीच एक संयुक्त तौर पर बनाया गया है। भारत में डीआरडीओ और रूस के एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनिया इसके प्रमुख साझेदार हैं।

ब्रह्मोस मिसाइल को पूरे विश्व भर में सबसे सटीक और सफल मिसाइल प्रोग्राम में से एक माना जाता है। डिफेंस एक्सपर्ट बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर सबसे अग्रणी और सबसे तेज सटीक-निर्देशित हथियार के रूप में ब्रह्मोस ने भारत की निवारक क्षमताओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय सेना ने 2007 से कई ब्रह्मोस रेजिमेंटों को अपने शस्त्रागार में एकीकृत किया है। पूर्व एयर चीफ मार्शल आर. के. एस. भदौरिया ने ब्रह्मोस मिसाइल के फिलिपींस को एक्सपोर्ट किए जाने पर जमकर तारीफ की है।ग्‍लोबमास्‍टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम लेकर फिलिपींस के कलार्क एयर बेस पहुंचा। इस दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की डिलिवरी के फोटो आपका दिल जीत लेंगे। रक्षा जानकारों का कहना है कि फिलिपींस के साथ हुई यह डिफेंस डील भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए पहला प्रमुख इंटरनेशनल एक्सपोर्ट ऑर्डर था। यह ऑर्डर 290 किमी की रेंज वाली एक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल के तट-आधारित संस्करण के लिए है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट में लिखा- ये भारत के लिए गर्व का पल है। IAF_MCC सी-17 ने फिलीपींस को निर्यात की गई पहली भारत में निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की आपूर्ति की। भारतीय उद्योग के लिए ये बड़ा मील का पत्थर है। यह तो डिफेंस एक्सपोर्ट में भारतीय कहानी की शुरुआत है।

रक्षा विशेषज्ञों ने मिसाइल प्रणाली के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि एक मिसाइल प्रणाली कई सब-सिस्टम से बनी होती है। इसमें लॉन्चर, वाहन, लोडर, कमांड और नियंत्रण केंद्र शामिल हैं। भारत के पास लंबी दूरी की कई मिसाइलें हैं।ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ-साथ इस प्रणाली के लिए ग्राउंड सिस्टम का निर्यात बीते महीने से ही शुरू हो गया था। माना जा रहा है कि ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली को फिलीपींस की ओर से अपने तटीय इलाकों में तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत और रूस के बीच एक संयुक्त तौर पर बनाया गया है। भारतीय उद्योग के लिए ये बड़ा मील का पत्थर है। यह तो डिफेंस एक्सपोर्ट में भारतीय कहानी की शुरुआत है।भारत में डीआरडीओ और रूस के एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनिया इसके प्रमुख साझेदार हैं। वहीं, फिलीपींस को जो मिसाइलें दी जा रही हैं, वह मूल रूप से छोटे संस्करण की हैं। इसके साथ ही सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि एक्सपोर्ट की जा रही मिसाइलें बिल्कुल नई हैं और वे उस खेप का हिस्सा नहीं हैं, जो भारतीय सशस्त्र बलों के लिए हैं।

आखिर दुबई में कैसे आई तूफानी बाढ़?

हाल ही में दुबई में तूफानी बाढ़ देखने को मिली! दुबई समेत UAE के कई इलाकों में इस हफ्ते हुई भारी बारिश से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई जगह बाढ़ जैसे हालात हो गए। व्यस्त दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी जलमग्न हो गया, जिसके कारण कई फ्लाइट्स रद्द करनी पड़ीं। अचानक बारिश और उसके बाद आई बाढ़ के हालात से उबरने की कोशिश यहां के लोग कर रहे हैं। जिस तरह से संयुक्त अरब अमीरात के कई इलाकों में जोरदार बारिश हुई उसे लेकर लोगों ने आश्चर्य जताया। उन्होंने आशंका जताई कि क्या यह क्लाउड सीडिंग (बारिश कराने के लिए मौसम परिवर्तन की तकनीक को क्लाउड सीडिंग कहते हैं) थी। जिसके कारण दुबई में बाढ़ आई। ऐसे प्रोजेक्ट में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से यूएई में हुई बारिश के क्लाउड सीडिंग से किसी भी संबंध को खारिज किया है। मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विज्ञानियों ने इस रिकॉर्ड वर्षा के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया है। ऐसा माना जाता है कि सूखे से जूझ रहा यूएई अपने घटते भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए समय-समय पर क्लाउड सीडिंग करता है, इसलिए सोमवार रात और मंगलवार शाम के बीच हुई अत्यधिक बारिश ने क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए। देश में 24 घंटे से भी कम समय में रिकॉर्ड 255 मिमी बारिश हुई, जिससे दुबई में बाढ़ आ गई। वहीं पड़ोसी देशों कतर, ओमान, बहरीन और सऊदी अरब में भी भारी बारिश हुई, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात के दुबई में इसका सबसे अधिक असर पड़ा।

भारत में क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट से जुड़े आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी ने कहा कि क्लाउड सीडिंग और दुबई में आई बाढ़ के बीच कोई संबंध नहीं है। सच्चिदानंद त्रिपाठी ने हमारे सहयोगी अखबार टीओआई से बात करते हुए कहा कि तूफान के विकास के शुरुआती फेज में सीडिंग की कोशिश की जाती है। इस मामले में जब सिस्टम ओमान की खाड़ी से आगे बढ़ा तो यह पहले से ही एक तेज तूफान था। ऐसे सिस्टम को सीड करना बेहद असंभव और असुरक्षित है। सीडिंग से अधिकतम 25 फीसदी बारिश में वृद्धि हो सकती है। इस मामले में कुल बारिश 25 सेमी थी, इसलिए बिना सीडिंग के भी 20 सेमी बारिश हुई होगी।

जाने-माने जलवायु वैज्ञानिक और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव माधवन राजीवन ने भी ऐसे किसी भी संबंध की संभावना को खारिज किया। उन्होंने कहा कि क्लाउड सीडिंग से इतनी भारी बारिश और बाढ़ नहीं आ सकती। संभावित कारणों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यह जलवायु परिवर्तन का बिल्कुल स्पष्ट संकेत है। ये भारी तूफान था जो खाड़ी क्षेत्र में एक्टिव एक सिनॉप्टिक सिस्टम के कारण आया। ग्लोबल वार्मिंग के साथ यह प्रवृत्ति है कि अगर बारिश होती है, तो बहुत भारी बारिश होती है। हमें दुनिया के किसी भी हिस्से में और किसी भी समय इस तरह की घटनाओं के बारे में जानकारी की उम्मीद रखनी चाहिए।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के पूर्व प्रमुख केजे रमेश का भी मानना है कि बादल छाए रहना भारी बारिश का मुख्य कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी विक्षोभ के कारण होने वाली अत्यधिक बारिश की घटनाएं इस क्षेत्र में बाढ़ का मुख्य कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ इसके संबंध पर उन्होंने कहा कि यह सभी लोग जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग के तहत कोई भी बारिश कराने वाला सिस्टम अधिक मजबूत होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से वायुमंडल में बादल अतिरिक्त नमी धारण कर लेते हैं और भारी होते जाते हैं। इसी से बारिश कराने वाले सिस्टम की तीव्रता बढ़ जाती है। मौसम की घटनाओं के बारे में विस्तार से बताते हुए केजे रमेश ने कहा कि अरब सागर से अतिरिक्त नमी के कारण पश्चिमी लहरों का दक्षिण की ओर विस्तार हुआ। इसी के चलते मौसम में बदलाव हुआ। इसी वजह से न केवल संयुक्त अरब अमीरात बल्कि ओमान, उत्तरी सऊदी अरब, बहरीन, कतर में भी भारी बारिश हुई। इससे पहले, इसी प्रकार के वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से अफगानिस्तान में दो दिनों तक भारी वर्षा हुई थी। जिसके चलते पाकिस्तान में बाढ़, तूफान और बिजली गिरने की घटनाएं हुईं थीं।

यूएई के क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट के बारे में रमेश ने बताया कि इस देश ने 2002 में अपने बारिश बढ़ाने वाले प्रयोग शुरू किए थे। इसमें वो आस-पास के क्षेत्रों में बारिश करने वाली मौसम प्रणाली विकसित होने पर विमान आधारित क्लाउड सीडिंग करने की कोशिश की। ऐसे प्रयासों के माध्यम से, क्लाउड सीडिंग टीम बारिश को प्राकृतिक रूप से होने वाली बरसात से 15 फीसदी अधिक बढ़ाने में सक्षम थे।

आखिर लोकसभा चुनाव के पहले चरण में क्या-क्या हुआ?

आज हम आपको बताएंगे कि लोकसभा चुनाव के पहले चरण में क्या-क्या हुआ है! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी महाकुंभ का विधिवत शंखनाद हो गया है। लोकसभा चुनाव 2024 के पहले फेज में शुक्रवार को 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 102 सीटों पर जमकर वोटिंग हुई। चुनाव आयोग के मुताबिक, देशभर में रात 9 बजे तक 62.37 फीसदी मतदान हुआ। इस दौरान मणिपुर में भारी हिंसा की सूचना मिली है। पश्चिम बंगाल में भी हिंसा की कुछ छिटपुट घटनाएं सामने आईं। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक पोलिंग बूथ पर लाठी-डंडे चले। कांग्रेस-बीजेपी कार्यकर्ताओं में झड़प हुई। इसमें कुछ लोग घायल भी हुए। हालांकि, जल्द पुलिस प्रशासन ने स्थिति को संभाला। वहीं छत्तीसगढ़ में एक ग्रेनेड लॉन्चर के गोले में दुर्घटनावश ब्लास्ट होने से सीआरपीएफ के एक जवान की मौत हो गई। चुनाव के दौरान कुछ और जगहों से भी छुटपुट घटनाओं की सूचना आई। फिलहाल पहले दौर की वोटिंग संपन्न हो चुकी है। ECI की ओर से रात 9 बजे तक जारी आंकड़ों में 62.37 फीसदी मतदान हुआ। ये साल 2019 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों से कुछ कम ही रहा। लोकसभा चुनाव में पहले फेज के लिए मतदान सुबह सात बजे आरंभ हुआ और शाम छह बजे तक चला। चुनाव आयोग के मुताबिक, शाम 7 बजे तक 60.03 फीसदी वोटिंग हुई। जिन बूथ पर 6 बजे के बाद भी वोटर्स की लाइन लगी थी वहां तय वक्त से आगे भी वोटिंग को जारी रही। इससे संभावना जताई जा रही कि वोटिंग पर्सेंट में आगे कुछ बदलाव आ सकता है। वहीं अलग-अलग राज्यों में शुक्रवार शाम 6 बजे तक के वोटिंग पर्सेंट देखें तो पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई। यहां 77.57 फीसदी मतदान हुआ। दूसरे नंबर त्रिपुरा रहा, जहां 76.10 फीसदी वोटिंग हुई। मेघालय में 69.91 फीसदी, मध्य प्रदेश में 63.25, तमिलनाडु में 62.08, यूपी में 57.54 फीसदी, बिहार में 46.32 फीसदी मतदान हुआ। महाराष्ट्र में 54.85, उत्तराखंड में 53.56, जम्मू-कश्मीर में 65.08, राजस्थान में 50.27, छत्तीसगढ़ में 63.41, असम में 70.77 फीसदी वोटिंग हुई। अरुणाचल में 64.07, नगालैंड 56.18, मिजोरम में 53.96, सिक्किम 68.06 फीसदी, मणिपुर 68.62 फीसदी, अंडमान निकोबार में 56.87, लक्षद्वीप में 59.02, पुडुचेरी में 72.84 फीसदी मतदान हुआ।

2024 के चुनावी रण में पहले फेज की वोटिंग के दौरान युवा मतदाताओं में खासा उत्साह देखने को मिला। मतदान केंद्रों पर पहली बार मतदान करने वालों में विवाह परिधान में आए कई नवविवाहित जोड़े नजर आए। वहीं दिव्यांग लोग और स्ट्रेचर, व्हीलचेयर पर आए कुछ बुजुर्ग शामिल अपने मताधिकार के इस्तेमाल को लेकर एक्टिव नजर आए। पहले चरण में 102 सीटों पर मतदान हुआ। इसके साथ ही 8 केंद्रीय मंत्रियों, विपक्ष के कई बड़े नेताओं की किस्मत का फैसला वोटिंग मशीन में कैद हो गया। इन 102 सीटों पर कुल 1,625 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे।

चुनाव के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा की शिकायतें आईं। सबसे ज्यादा हिंसा की सूचना मणिपुर से आई। इनर मणिपुर लोकसभा सीट के तहत आने वाले थोंगजु विधानसभा क्षेत्र में स्थानीयों और अज्ञात लोगों के बीच झड़प की खबरें आईं। मणिपुर में कुछ जगहों पर ईवीएम को नुकसान पहुंचाए जाने की भी खबरें आईं। उधर पूर्वी नगालैंड के छह जिलों में सन्नाटा पसरा रहा। यहां अलग राज्य की मांग को लेकर आदिवासी संगठनों के एक संघ ने अनिश्चितकालीन बंद का आह्वान किया। इसके कारण लोग घरों में ही रहे।

नगालैंड के छह पूर्वी जिलों में मतदान कर्मी वोटिंग सेंटर्स पर नौ घंटे तक इंतजार करते रहे, लेकिन कोई वोटर नहीं आया। ‘फ्रंटियर नगालैंड टेरिटरी’ (एफएनटी) की मांग को लेकर दबाव बनाने के लिए एक संगठन की ओर से बुलाए गए बंद के बाद क्षेत्र के चार लाख मतदाताओं में से कोई भी वोटिंग करने नहीं आया। मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने शुक्रवार को इसकी पुष्टि की कि राज्य सरकार को ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) की एफएनटी की मांग से कोई दिक्कत नहीं है। वह पहले ही इस क्षेत्र के लिए स्वायत्त शक्तियों की सिफारिश कर चुकी है। ईएनपीओ पूर्वी क्षेत्र के सात जनजातीय संगठनों की शीर्ष संस्था है। अधिकारियों ने बताया कि जिला प्रशासन और अन्य आपातकालीन सेवाओं से जुड़े लोगों और गाड़ियों को छोड़कर सड़कों पर किसी भी व्यक्ति या वाहन की कोई आवाजाही नहीं दिखी। नगालैंड के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी आवा लोरिंग ने बताया कि 20 विधानसभा क्षेत्रों वाले इस क्षेत्र के 738 मतदान केंद्रों पर मतदान कर्मी सुबह सात बजे से शाम चार बजे तक मौजूद रहे। सीईओ कार्यालय के सूत्रों ने बताया कि इन नौ घंटों में कोई भी वोट डालने नहीं आया। बीस विधायकों ने भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। नगालैंड के 13.25 लाख मतदाताओं में से पूर्वी नगालैंड के छह जिलों में 4,00,632 मतदाता हैं।

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर वोटिंग हुई। इस दौरान रामपुर में सपा प्रत्याशी मोहिबुल्लाह नदवी की पुलिस से तीखी नोकझोंक हो गई। वहीं, मुरादाबाद के सपा सांसद एसटी हसन ने पुलिस पर अभद्रता का आरोप लगाया है। रामपुर से सपा उम्मीदवार मोहिबुल्लाह नदवी ने पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि खास वर्ग के मतदाताओं को पुलिस परेशान कर रही है। पूरे जिले से शिकायतें आई है। उनका यह वीडियो वायरल हो रहा है। मुरादाबाद से सपा सांसद डॉक्टर एसटी हसन ने एक सब इंस्पेक्टर पर बड़ा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि दरोगा ने ऑफिस में घुसकर उनके और स्टाफ से बदसलूकी की। एसटी हसन ने कहा कि मामले की शिकायत चुनाव आयोग और पुलिस-प्रशासन से की जाएगी।

आखिर क्या है महाराष्ट्र की बारामती सीट की कहानी?

आज हम आपको महाराष्ट्र की बारामती सीट की कहानी बताने जा रहे हैं! बारामती में इस बार अभूतपूर्व मुकाबला है। NCP के दो धड़ों की यह निर्णायक लड़ाई है। इसमें अजित हारे तो BJP में उनका कद घट जाएगा और शरद पवार हारे तो उनके राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप आरंभ हो जाएगा। अजित की उम्मीदवार उनकी पत्नी सुनेत्रा हैं, जबकि शरद पवार ने बेटी सुप्रिया सुले को उतारा है। इस तरह भौजाई और ननद के बीच यह दंगल है। उनके रूप में असल में भतीजे और चाचा की यह राजनीतिक लड़ाई है। NCP के इन दो धड़ों की तरह शिवसेना के एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट भी टकरा रहे हैं। वहां भी इन दोनों का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा है। BJP इसका लाभ उठाकर अपना ‘मिशन 45’ पूरा करना चाहती है यानी महाराष्ट्र की कुल 48 लोकसभा सीटों में से 45 जीतना! अब बारामती लौटते हैं। दो पवारों की इस लड़ाई में जो भी जीते वह होगा तो आखिर पवार ही! बारामती पिछले 55 वर्षों से पवार परिवार का गढ़ रहा है। शरद पवार 1967 से लेकर 1985 तक, पांच बार बारामती से और 2009 में एक बार सोलापुर जिले के माढ़ा से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। इसी तरह अजित पवार 1991 में बारामती से लोकसभा पहुंचे थे। यही नहीं, 1991 से 2019 तक, वह सात बार बारामती से विधायक रह चुके हैं।

सुप्रिया पहली बार 2006 में महाराष्ट्र से राज्यसभा पहुंचीं। इसके बाद 2009 से 2019 तक, तीन बार लोकसभा के लिए चुनी गईं। अब वह चौथी बार लोकसभा इलेक्शन लड़ रही हैं। दूसरी ओर, सुनेत्रा कभी राजनीतिक मैदान में नहीं उतरीं। लेकिन, पर्यावरण, ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। बारामती हाई-टेक टेक्सटाइल पार्क की अध्यक्ष रह चुकी हैं। इस पार्क से 15 हजार ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं। शरद पवार द्वारा स्थापित विद्या प्रतिष्ठान की वह उपाध्यक्ष हैं। यह प्रतिष्ठान कई स्कूल-कॉलेज चलाता है, जिनमें कोई 25 हजार छात्र पढ़ते हैं। पर्यावरण पर उनका इनवाइरमेंटल फोरम ऑफ इंडिया है, जो फ्रांस के NGO से भी जुड़ा है।

सुप्रिया इकलौती संतान हैं शरद पवार की। सदानंद सुले से 1991 में उन्होंने शादी की। उनके दो बच्चे हैं – रेवती और विजय। वहीं, सुनेत्रा धाराशिव (पूर्व नाम उस्मानाबाद) के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से हैं। पद्मसिंह पाटिल की बहन हैं। उनके भतीजे राणा जगजीत सिंह पाटिल अभी BJP से विधायक हैं। सुनेत्रा के दो पुत्रों में से जय बिजनेस संभालते हैं, जबकि पार्थ राजनीति में हैं। पार्थ 2019 में मावल सीट से लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। उधर, सुनेत्रा के मायके वाले BJP में चले गए। अजित पवार की BJP से दोस्ती का धागा शायद यही है। सुप्रिया ने NCP तोड़ने और पवार परिवार में फूट डलवाने के BJP पर जो आरोप लगाए हैं, उसकी पृष्ठभूमि शायद यही है। मतलब यह कि आज बारामती में पवार खानदान में जो लड़ाई दिख रही है, उसके बीज काफी पहले पड़ चुके हैं। इसका अंदाजा ननद सुप्रिया और भौजाई सुनेत्रा, दोनों को था। इसलिए दोनों खेमे काफी पहले से चुनाव की तैयारी कर रहे थे। सुप्रिया गांव-गांव जाकर लोगों से मिलती हैं। सुबह 8 बजे से ही उनके बहुत व्यस्त कार्यक्रम होते हैं, जो देर रात तक चलते हैं। पिता शरद पवार भी पूरे क्षेत्र का लगातार दौरा कर रहे हैं। प्रचार के दौरान ननद-भौजाई एक-दूसरे पर व्यक्तिगत प्रहार कतई नहीं करतीं। ननद तो कहती हैं, ‘वहिणी (भौजाई) मां के समान होती है। यही हमारी संस्कृति है।’ प्रचार की शुरुआत में दोनों की बारामती के हनुमान मंदिर में मुलाकात हुई। दोनों मुस्कुराते हुए एक-दूसरे से मिलीं। शायद यह राजनीतिक मुस्कान हो। वैसे हर चुनाव के पहले पवार परिवार का उम्मीदवार आशीर्वाद लेने इस मंदिर में पहुंचता रहा है।

दोनों प्रचार में विकास के मुद्दे उठाती हैं। सुनेत्रा कहती हैं, ‘लोग जब मिलते हैं तब दादा (अजित) की तारीफ करते हैं। वही हैं, जो विकास को बारामती खींचकर लाए।’ उधर, सुप्रिया पिता शरद पवार और सांसद के रूप में अपने कामों की फेहरिस्त पेश करती हैं। सुप्रिया 55 की हैं तो सुनेत्रा 60 साल की। दोनों ही उच्च शिक्षित। बारामती संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से दो-दो तीन पार्टियों में बंटे हैं। भोर (संग्राम थोपटे) और पुरंदर (संजय जगताप) कांग्रेस के पास है, इंदापुर (दत्तात्रेय भाले) और बारामती (अजित पवार) NCP के पास, जबकि खड़कवासला (भीमराव तपकीर) और दौंड (राहुल कुल) में BJP के विधायक हैं। गौर करें तो लगता है कि चार विधानसभा क्षेत्रों में अजित पवार खेमा हावी है। कांग्रेस के दो क्षेत्र शरद पवार की ओर झुक सकते हैं। दौंड के विधायक राहुल कुल तो शरद पवार और सुप्रिया के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। 2019 में सुप्रिया के खिलाफ उनकी पत्नी कांचन ने चुनाव लड़ा था। सुप्रिया को 53% और कांचन को 41% वोट मिले थे। कांचन, सुनेत्रा के चचेरे भाई विजय सिंह निंबालकर की पुत्री हैं। कांचन का परिवार में विवाह जोड़ने में सुनेत्रा अगुवा थीं। इस वजह से दौंड इलाके में सुनेत्रा का सिक्का चल सकता है।

उधर, एकनाथ शिंदे, देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने बागियों को एक-एक कर चुप करा दिया है। यह भी सुनेत्रा के पक्ष में जाएगा। महाराष्ट्र में दो राजनीतिक गठबंधन हैं, महायुति और महा विकास आघाड़ी। महायुति में BJP, शिंदे और अजित गुट सहयोगी हैं, जबकि महा विकास आघाड़ी में कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे गुट मित्र दल हैं। दोनों गठबंधनों में आपसी खींचतान, मनमुटाव और एक-दूसरे के खिलाफ व्यूह रचना भी है। इसका असर बारामती में ननद-भौजाई की चुनावी लड़ाई में कितना और कैसा होगा यह 7 मई को मतदान के दिन ही दिखाई पड़ेगा।