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आखिर एक साल बाद भी क्यों नहीं मिले गुड्डू बमबाज-शाइस्ता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि 1 साल बाद भी गुड्डू बमबाज-शाइस्ता नहीं मिल पाए हैं! 15 अप्रैल 2023 का दिन प्रयागराज और उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम दिन के तौर पर दर्ज है। आज के दिन ऐसा कांड हुआ, जो पहले कभी देखने को नहीं मिला। रात के पहर में पुलिस कस्टडी में एक पूर्व सांसद और एक पूर्व विधायक की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। बाहुबली अतीक अहमद (Atique Ahmed) और उसके छोटे भाई अशरफ (Ashraf) को गोलियों से छलनी कर दिया गया। इस घटना से हड़कंप की स्थिति हो गई। आज उस घटना को एक साल बीत गया है। उमेश पाल हत्याकांड के बाद से अतीक के उल्टे दिन शुरू हो गए थे। उस कांड में अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन को भी मुख्य साजिशकर्ता बनाया गया था। सीसीटीवी में बम फेंकते हुए दिखाई पड़ा गुड्डू मुस्लिम भी अतीक का खास गुर्गा था। अशरफ की पत्नी जैनब की भूमिका भी पाई गई। ये सभी आज तक फरार है। घटना के एक साल बाद भी कई सवाल मौजूं बने हुए हैं। अपराध से राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने वाले अतीक अहमद का सिक्का प्रयागराज सहित पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के दर्जनों जिलों में चलता था। वह गुजरात के साबरमती जेल में सजा काट रहा था। उसका छोटा भाई अशरफ बरेली जेल में सजायाफ्ता था। इस बीच 24 फरवरी को प्रयागराज में दिनदहाड़े वकील उमेश पाल की हत्या कर दी गई। अतीक के बेटे असद के साथ आए शूटर्स ने पूरी प्लानिंग के साथ गोली और बम मारकर उमेश को मौत के घाट उतार दिया। यही मामला अतीक के पूरे परिवार के लिए काल साबित हुआ। सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश को जवाब देते हुए भरे सदन में माफिया को मिट्टी में मिला डालने का ऐलान कर दिया। पुलिस-प्रशासन ऐक्टिव हो गया। पुलिस ने घटना के मुख्य आरोपी माफिया अतीक के बेटे असद अहमद और साथी गुलाम को झांसी में एनकाउंटर में मार गिराया था। 3 अन्य आरोपियों का अलग-अलग जगह एनकाउंटर हो चुका है। लेकिन, इस घटना में सबसे अधिक चर्चित हुआ गुड्डू बमबाज। वह कांड के दौरान झोले से बम निकाल कर लगातार बरसता दिखाई पड़ रहा था। गुड्डू मुस्लिम को लेकर तमाम किस्से गढ़े गए। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक खास बवाल मचा। तमाम कहानियां निकलकर सामने आईं।

पिछले साल 24 फरवरी को की घटना को अंजाम देने के फरार बमबाज के गिरेबां तक यूपी पुलिस के हाथ नहीं पहुंच पाए हैं। गुड्‌डू मुस्लिम के साथ-साथ घटना को अंजाम दिलाने में बड़ी भूमिका निभाने वाली माफिया अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। पुलिस लगातार उमेश पाल के कातिलों को ढूंढ निकालने के दावे करती है, लेकिन गिरफ्तारी की कार्रवाई अब तक नहीं हो सकी है। वहीं अशरफ की पत्नी जैनब भी इनामी है और अभी तक चंगुल से बाहर है। इस घटना के एक साल के बाद भी पुलिस के हाथ खाली ही हैं। पुलिस अब भी सवालों पर जांच जारी होने की बात कर रही है। कोई ठोस जानकारी किसी भी स्तर से नहीं मिल पा रही है। उमेश पाल मर्डर के बाद भी सवाल वही है, आखिर गुड्‌डू मुस्लिम कहां गया? इस सवाल का जवाब न तो प्रयागराज पुलिस के पास है। न ही उमेश पाल केस की जांच करने वाली एसआईटी ही इस संबंध में कोई जवाब दे पा रही है। यूपी एसटीएफ की ओर से मामले की जांच के क्रम में देश के कई इलाकों में छापे मारे गए।

बमबाज गुड्‌डू मुस्लिम की तलाश के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा, मुंबई, नागपुर में छिपे होने की बात सामने आई। यूपी के मेरठ, श्रावस्ती से लेकर झांसी तक छापे मारे गए। लेकिन, गुड्‌डू मुस्लिम को पकड़ने में पुलिस कामयाब नहीं हुई। प्रयागराज पुलिस की ओर से उस पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित किया है। इसी तरह से शाइस्ता परवीन को भी पकड़ने में पुलिस कामयाब नहीं हो पाई है। शाइस्ता परवीन पर उमेश पाल के शूटरों को पनाह देने और हत्याकांड की प्लानिंग का आरोप लगा है। शाइस्ता को पकड़ने के लिए प्रयागराज पुलिस की ओर से 26 फरवरी से ही कार्रवाई शुरू हो गई। लेकिन, माफिया अतीक की पत्नी प्रयागराज में ऐसे गुम हुई कि पुलिस के खोजे नहीं मिल पा रही है।

माफिया सरगना की पत्नी का जाल इतना बड़ा है कि उस तक पहुंच पाना यूपी पुलिस के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। यूपी पुलिस इस मामले में आरोपी अतीक के भाई अशरफ की पत्नी जैनब फातिमा तक नहीं पहुंच पाई है। 13 अप्रैल को असद अहमद के एनकाउंर और 15 अप्रैल को अतीक और अशरफ की हत्या के बाद उम्मीद की जा रही थी कि शाइस्ता और जैनब सामने आएंगे। दोनों बाहर नहीं आए। पुलिस इसके बाद से अब तक हवा में ही हाथ-पांव मारती नजर आ रही है। कातिलों तक पहुंचने के लिए एक साल के बाद भी पुलिस की तमाम कोशिश विफल रही है।

क्या उत्तर प्रदेश के मुसलमान हो गए हैं चुप ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उत्तर प्रदेश की मुसलमान अब चुप हो गए हैं! आसमान साफ है। तेज धूप की बारिश हो रही है। मेरठ में घंटाघर के एक कोने में पसीने से लथपथ और बेदम लोगों का एक समूह भाजपा के झंडे लहरा रहा है। पार्टी के लिए वोट मांग रहा है। बाहर उठ रहे शोर और जुलूस को देखकर मेटल वर्क्स फैक्ट्री से कर्मियों का एक समूह बाहर निकला। जैसे उन्होंने चुनावी प्रचार कर रहे लोगों की भीड़ देखी, वापस मुड़कर जाने लगा। मुजम्मिल अब्बास नामक लड़के ने कहा कि इस सबसे दूर रहना ही बेहतर है। लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण के चुनाव की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है। यूपी की आठ सीटों पर 19 अप्रैल यानी शुक्रवार को वोटिंग होगी। पश्चिमी यूपी की इन आठ सीटों पर अगर 2019 के रिजल्ट देखें तो स्थिति समझ में आएगी। इस चरण की पांच सीटों पर 2019 में भारतीय जनता पार्टी को हार झेलनी पड़ी थी। सपा-बसपा गठबंधन को तब बड़े स्तर पर सफलता मिली थी। लेकिन, इस बार के चुनाव में सबसे अहम है मुस्लिम मतदाताओं की चुप्पी। राजनीतिक रैलियों से लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट हो या गांव के आसपास चौपाल की चर्चाओं में मुसलमानों की चुप्पी साफ देखी जा रही है। अलीगढ़ में एक कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान चलाने वाले 38 वर्षीय मो. कामरान कहते हैं कि पिछले वर्षों के विपरीत मुसलमानों को लेकर बहुत अधिक नुक्कड़ बहसें नहीं होती हैं। देवबंद जैसी बड़ी अल्पसंख्यक उपस्थिति वाली जगहों पर भी मुस्लिम वोट बैंक का मुद्दा प्रभावी होता नहीं दिख रहा है। कामरान कहते हैं कि हमारा मनोबल गिरा हुआ है। निसंदेह डर है। कौन जानता है कि इसका गलत अर्थ निकाला जाएगा और पुलिस को रिपोर्ट कर दी जाएगी। हम सदैव चिंतित, सावधान रहते हैं। इसके अलावा एक समय यहां कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक कारक थे, वह प्रभाव कम होता दिख रहा है। मेरठ कार्यालय में एक बड़ी शीशे वाली मेज के पीछे बैठे एक व्यस्त धर्मार्थ अस्पताल के निदेशक से सवाल किया गया कि क्या यूपी में मुसलमान शांत हो गए हैं? उनका जवाब आता है, निश्चित रूप से। शामली, बागपत, आगरा कहीं भी चले जाइए। आप पाएंगे कि हमारी आवाजें दबी हुई हैं। हम अनावश्यक ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहते। हम अब सबसे आगे नहीं आना चाहते। कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि हम ‘चेहरा’ बनें। चतुराई से काम लेना बुद्धिमानी है, शोर-शराबा नहीं।

बुलंदशहर के सियाना में आम के बड़े बागों के मालिक एक व्यापारी ने इस बात पर सहमति जताई कि इस वक्त पर मुस्लिम की ज़ुबान तो बंद ही है। साथ ही, स्थानीय नेता या उम्मीदवार कहां हैं? हमें टिकट कौन दे रहा है? तो, हम किसके पक्ष में हैं? सहारनपुर, नगीना, बिजनौर, कैराना, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर शुक्रवार को मतदान होगा। इन सभी सीटों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटर हैं। पीलीभीत को छोड़कर इनमें से अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी 35 फीसदी से अधिक है।

कांग्रेस ने सहारनपुर में इमरान मसूद को मैदान में उतारा है। वहीं, कैराना में समाजवादी पार्टी के इकरा हसन और रामपुर में मोहिबुल्लाह नदवी मैदान में हैं। मायावती ने इरफान सैफी को मुरादाबाद से चुनाव लड़ने के लिए खड़ा किया है। मायावती ने पिछले हफ्ते मुजफ्फरनगर में एक रैली के दौरान कहा था कि वह अपनी पार्टी, बसपा से लड़ने के लिए एक मुस्लिम उम्मीदवार चाहती थीं, लेकिन कोई नहीं मिला… वे बहुत डरे हुए हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे सलमान गौरी ने कहा कि एक तरह से मुसलमानों को अपना मुंह बंद रखने के लिए मजबूर किया गया है। कौन जेल जाना चाहता है? हमारे बीच इतने सारे गरीबों के साथ बोलकर अनावश्यक जोखिम लेना उचित नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ध्रुवीकृत चुनाव नहीं चाहते हैं। इसका मतलब होगा पहले से ही शक्तिशाली भाजपा को पहले से तैयार जीत सौंपना। देवबंद के मुफ्ती अरशद फारूकी जैसे कई समुदाय प्रमुखों और मौलवियों का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग का मतलब वोट देने से मोहभंग नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में लोकतांत्रिक प्रक्रिया हमारे लिए और अधिक कीमती हो गई है। मुझे यह स्पष्ट करने दीजिए। मुसलमानों से वोट डालने की अपील ईदगाहों, मस्जिदों, मदरसों से की गई है। ये अपीलें जारी रहेंगी।

धर्मार्थ अस्पताल के निदेशक भी मुसलमानों की चुप्पी को एक अलग नजरिए से पेश करते हैं। वे कहते हैं कि हमारा मसला विकास नहीं, वजूद का है। अर्थ समझाते हुए वे बताते हैं कि हमारा प्रमुख मुद्दा विकास नहीं है। यह अस्तित्व का मसला है। पहचान का मामला है। मुसलमान अब यह समझता है। वह उसी के अनुरूप मतदान करेंगे। नगीना लोकसभा सीट से आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और निर्दलीय उम्मीदवार चंद्रशेखर आजाद को लेकर दावा करते हैं कि अगर वे जीत जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नगीना आरक्षित सीट पर मुसलमानों की बड़ी आबादी है। वहीं, बीजेपी अल्पसंख्यक सेल के पश्चिमी यूपी उपाध्यक्ष कदीम आलम की एक अलग थ्योरी है। वे कहते हैं कि मुसलमानों को इस समय ऐसा लगता है जैसे वे गहरी नींद में हैं, क्योंकि वे भ्रमित हैं। वे किसे वोट देंगे? विपक्ष कहां है? यह सवाल हर किसी के मन में है।

क्या रामदेव बाबा की कंपनी ने दिया है धोखा क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रामदेव बाबा की कंपनी ने धोखा दिया है या नहीं और सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या कहता है! सुप्रीम कोर्ट ने योगगुरु रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण को कोविड, कैंसर और हृदय संबंधी बीमारियों समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं के जादुई इलाज की पेशकश करने पर आड़े हाथों लिया है। रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से मंजूरी न मिलने के बावजूद कोरोनिल टैबलेट के साथ कोविड का इलाज खोजने का दावा किया। खुद से पैकेजिंग और प्रमोशन में माहिर यह जोड़ी जिस तरह से असंख्य हर्बल औषधियों और गोलियों को पैकेज करते हैं, ये कोई साधारण व्यवसायी नहीं कर सकता है। उनके पास बहुत बड़ी संख्या में अनुयायी हैं, और उनके अनुयायियों में से कई अंधभक्त हैं। अंधभक्त भी आसान वोट बैंक हैं क्योंकि योग गुरु, मैं उन्हें बाबा नहीं कहूंगा। वो अपने समर्थकों को निर्देश देने खुशी महसूस करते हैं। बीजेपी शासित उत्तराखंड सरकार, जहां रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद का मुख्यालय है, उनको भी सुप्रीम कोर्ट की नाराज पीठ ने नहीं बख्शा। जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने पूछा कि उन सभी गुमनाम लोगों का क्या होगा जिन्होंने पतंजलि की इन दवाओं का सेवन किया। जो ऐसी बीमारियों को ठीक करने के लिए बताई गई, जिनका इलाज नहीं हो सकता? पीठ ने केंद्र की ओर से दाखिल जवाब पर भी कोई कसर नहीं छोड़ी। कोर्ट ने कहा कि यह संतोषजनक नहीं है। केंद्र ने अदालत से कहा कि जादुई इलाज का दावा करने वाले विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार राज्यों को है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र के तर्क को मानना मुश्किल है। 2020 की शुरुआत में, जब भारत कोविड महामारी की पहली लहर से लड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद ने बड़ा दावा किया। इसने कोविड का इलाज खोज लिया है, ऐसा तब कहा गया जब पूरा चिकित्सा जगत इस बात से जूझ रहा था कि तेजी से बढ़ रहे वायरस को कैसे ठीक किया जाए और कैसे रोका जाए।

कोविड का ‘इलाज’ कोरोनिल नाम की एक गोली का विज्ञापन करते हुए, रामदेव नरेंद्र मोदी सरकार के दो मंत्रियों- स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और परिवहन, राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के साथ खड़े थे। रामदेव कैमरों पर मुस्कुराए, यहां तक कि उन्होंने सरकार की ओर से अनिवार्य किया गया मास्क पहनने की भी जहमत नहीं उठाई। न ही कोई ‘दो गज की दूरी’ थी। कोरोनिल को कोविड के लिए ‘पहला साक्ष्य-आधारित रिसर्च इलाज’ के रूप में प्रचारित किया गया था। इससे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) काफी चिंतित था। डिटेल्स के अनुसार, जो अब व्यापक रूप से सभी जानते हैं, मुंबई स्थित फीजिशियन डॉ जयेश लेले ने सरकार के आयुष मंत्रालय में आरटीआई आवेदन दिया। ये मंत्रालय हेल्थकेयर के ट्रेडिशनल सिस्टम को रेगुलेट करता है। लेले को आरटीआई के जरिए जो जवाब मिला उससे उन्हें आश्चर्य नहीं हुआ। कोरोनिल को विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंजूरी नहीं थी। दुख की बात ये है कि इस अवैज्ञानिक, अप्रमाणित, बहु-विज्ञापित टैबलेट के लिए केंद्रीय मंत्रियों के रूप में मजबूत राजदूत थे। इसके लाखों खरीदार भी थे, सभी को एक ऐसे वायरस से पीड़ित होने का डर था जो अचानक भारत के साथ-साथ दुनिया भर में महामारी बन चुका था।

कोरोनिल की बिक्री तेजी से हुई। बिक्री और पॉवरफुल मंत्रियों के जबरदस्त समर्थन से उत्साहित रामदेव ने 2021 में IMA की ओर से अदालत में दायर केस पर भी ध्यान नहीं दिया। पतंजलि आयुर्वेद ने अपना विज्ञापन जारी रखा। इसने फैटी लीवर, सिरोसिस, किडनी फेल्योयर और थायरॉयड सहित कई बीमारियों के लिए जादुई इलाज का दावा किया। ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों पर छाए रामदेव एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए, जबकि पतंजलि आयुर्वेद ने ट्रक भरकर ‘दवाएं’ बांटीं। उन्हें अपने राजनीतिक संरक्षकों से ‘प्रतिरक्षा’ का इतना भरोसा था कि उन्होंने एलोपैथी को ‘बेवकूफ और दिवालिया’ तक कह दिया। एक बार फिर, IMA ने उनसे अपने दावे वापस लेने को कहा और डॉ. हर्षवर्धन से महामारी रोग अधिनियम के तहत योग गुरु के खिलाफ आरोप लगाने की अपील की। कानून का उल्लंघन सभी विज्ञापन उल्लंघन नहीं होते हैं, लेकिन औषधि और जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954, विशेष रूप से 54 बीमारियों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाता है। इस सूची में कैंसर, ब्लडप्रेशर और हृदय रोग सहित कई अन्य बीमारियां शामिल हैं।

आश्चर्यजनक रूप से या वास्तव में पतंजलि ने इन सभी के लिए इलाज की पेशकश की। जब से सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पतंजलि और उसके संरक्षकों को ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की धमकी दी है, रामदेव और बालकृष्ण ने माफी मांगी है। हालांकि, अदालत उन्हें गंभीरता से लेने के मूड में नहीं है। उन्होंने पहले भी माफी मांगी थी और फिर तुरंत विज्ञापन के कारोबार में वापस चले गए थे। स्वास्थ्य संबंधी खतरा गंभीर है क्योंकि पतंजलि की पहुच बहुत बड़ी है। इसकी अपनी वेबसाइट का दावा है कि उसने यूएई से लेकर कनाडा और अमेरिका तक के बाजार स्थापित किए हैं। स्थानीय स्तर पर, 18 राज्यों में इसकी 47,000 से अधिक खुदरा दुकानें और गोदाम हैं। रामदेव को प्राप्त प्रतिरक्षा के स्तर से आश्चर्यचकित न हों। पिछले साल राज्यसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, भ्रामक विज्ञापन देने के लिए पतंजलि के खिलाफ 53 शिकायतें मिली थीं।

कानून में भ्रामक विज्ञापनों के लिए जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। रामदेव ने पहले ही बिना शर्त माफी मांग ली है, लेकिन क्या यह यहीं तक सीमित रह जाएगी, क्योंकि योग गुरु ने उसी अदालत में दी गई माफी का उल्लंघन किया है? सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अमानुल्लाह ने पिछली सुनवाई में रामदेव को जमकर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि माफी मांगना ही काफी नहीं है। आपको अदालत के आदेश का उल्लंघन करने के परिणाम भुगतने चाहिए। हम इस मामले में उदार नहीं होना चाहते। इस मामले में उदारता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक रूप से उनकी निंदा की है और उनके उत्पादों को धर्म और संस्कृति के नाम पर बड़े करीने से पैक किया है।

क्या केरल में बीजेपी को कोई आशा नजर आ रही है?

वर्तमान में बीजेपी को केरल में कोई ना कोई आशा नजर जरूर आ रही है! लोकसभा चुनाव से पहले केरल में चर्च को लेकर चर्चा तेज है। वे समुदाय की चिंताओं को प्रमुख चुनावी मुद्दे के रूप में उठाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें किसानों के मुद्दों से लेकर ईसाइयों पर हमलों तक शामिल हैं। इसके साथ ही वे गुटीय झगड़ों में भी बंटे हुए हैं। केरल में ईसाई 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी का 18.4% हिस्सा हैं। इसकी चुनावी राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां सिरो मालाबार और मलंकारा चर्च और उनके संप्रदाय, सभी अपनी आवाज को दिल्ली तक पहुंचाने के लिए तैयार हैं। मार्च 2023 में, साइरो मालाबार चर्च के थालास्सेरी के आर्कबिशप, मार जोसेफ पैम्प्लानी ने कहा था कि रबर किसानों का वोट उस पार्टी को जाएगा जो रबर का एमएसपी ₹300 तय करेगी। केंद्र को उनका संदेश था कि अगर आप ₹300 का एमएसपी तय करने के बाद किसानों से रबर खरीदते हैं, तो हम राज्य से एक भी सांसद नहीं होने के आपके अफसोस को खत्म कर देंगे। पैम्प्लानी की घोषणा ने ऐसी हलचल पैदा कर दी जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। तब से, चर्च के पदाधिकारियों ने फिर से जोर दिया है कि कोई भी पार्टी चर्च के लिए अछूत नहीं है। किसी भी पार्टी की राजनीतिक गुलामी नहीं होनी चाहिए। घाटी क्षेत्रों में अधिकांश ईसाई किसान हैं। इनमें से अधिकतर अपनी उपज की पर्याप्त कीमत नहीं मिलने के कारण संकट में हैं। कई किसान परिवारों पर कर्ज के बदले भारी बोझ चढ़ गया है। थालास्सेरी चर्च के वरिष्ठों के अनुसार, केंद्र को रबर के आयात को प्रतिबंधित करना चाहिए। इस तरह स्थानीय किसानों का समर्थन करना चाहिए। ‘ईसाइयों पर हमलों’ के बावजूद उनके तथाकथित बीजेपी समर्थक रुख के आरोप को बयान को विकृत करने के रूप में देखा गया। थालास्सेरी निकाय का कहना है कि समर्थन मुद्दा-आधारित है। रबर के एमएसपी का मणिपुर में हमलों से कोई लेना-देना नहीं है।

मणिपुर में हिंसा भड़कने से कुछ हफ्ते पहले पैम्प्लानी का बीजेपी को लेकर बयान आया था। इसके बाद चर्च के लिए बीजेपी के प्रयासों का खुलकर जवाब देना कठिन हो गया। उत्तर भारत में ईसाइयों पर हमले, सीएए का विरोध करने की आवश्यकता और मणिपुर की हिंसा चर्च के विभिन्न अंगों की तरफ से प्रकाशित पत्रिकाओं और पत्रिकाओं में चुभने वाले संपादकीय में बार-बार मुद्दे रहे हैं। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पादरी ने यहां तक कहा कि चर्च लीडरशिप में जो लोग एक साल पहले बीजेपी के पक्ष में बात करते थे, वे अब ऐसा नहीं कर रहे हैं। चर्च डेली दीपिका ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद 18 मार्च को एक मजबूत संपादकीय लिखा था। इसमें कहा गया है कि कई राज्यों में एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब ‘अल्पसंख्यकों पर हमला’ न होता हो। इसमें कहा गया था कि राज्यों में भ्रष्टाचार और अहंकार ने भारत की तरफ से उठाए गए आरोपों में विश्वास की कमी को समझाया। सिरो मालाबार चर्च के पूर्व प्रवक्ता फादर पॉल थेलाकट ने ‘मणिपुर के अत्याचारों’ को ‘धर्म का पतन’ करार दिया था। इसमें लिखा गया था कि मैं हिंदू धर्म को उसके ऊंचे आदर्शों…उसकी आतिथ्य सत्कार और बहुलवादी भावना के लिए पसंद करता हूं। लेकिन वोटिंग पैटर्न हिंदुत्व के अनुकूल है, जिससे हर भारतीय को चिंतित होना चाहिए।

मणिपुर पर चर्च एक स्वर में बोलते हैं, लेकिन स्थानीय मुद्दों पर अलग-अलग सुर चल रहे हैं। मलंकारा चर्च के दो गुटों, ऑर्थोडॉक्स चर्च और जैकोबाइट चर्च के बीच दशकों से चल रहा झगड़ा पैरिशों पर कंट्रोल को लेकर है। सिरिएक ऑर्थोडॉक्स चर्च के वैश्विक प्रमुख ने फरवरी में केरल की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान पिनाराई से मलंकारा चर्च विधेयक पारित करने का आग्रह किया था। यह एक बड़ा विवाद है। 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने प्रभावी रूप से रूढ़िवादी गुट को सभी चर्च संपत्तियों पर नियंत्रण प्रदान कर दिया था। हालांकि, एलडीएफ के प्रति नरम जैकोबाइट गुट ने अपने गढ़ में कई चर्चों पर कब्जा करने का विरोध किया है। चर्च विधेयक प्रत्येक मामले में अधिकार और स्वामित्व पर ‘बहुमत’ के जरिये प्राधिकारी के रूप में समाधान की सिफारिश करता है। साथ ही जिला मजिस्ट्रेट को इस तरह के बहुमत का पता लगाने की सिफारिश करता है। जैकोबाइट चर्च इसका स्वागत करता है क्योंकि यह प्रभावी रूप से सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार करने में मदद करता है। ऑर्थोडॉक्स चर्च ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है। यहां तक कि एक फरवरी के कार्यक्रम में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से समर्थन भी मांगा है।

सिरो मालाबार चर्च अप्रैल की शुरुआत में इडुक्की सूबा के कक्षा 10-12 के लिए पैरिश-लेवल वेकेशन के दौरान द केरल स्टोरी की स्क्रीनिंग की बचाव किया था। इसके अलावा करिकुलम में ‘लव जिहाद’ को शामिल करने का भी बचाव किया था। इसके विरोध में, विरोधियों ने एक अन्य सूबे में मणिपुर पर एक फिल्म की स्क्रीनिंग का आयोजन किया। फादर थेलाकाट जैसे चर्च के वरिष्ठ लोगों के लिए, ‘लव जिहाद’ का मुद्दा बनने की प्रवृत्ति परेशान करने वाली है। उन्होंने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि हर धर्म में धार्मिक कट्टरवाद बढ़ रहा है। उन्होंने ‘समुदायों के बीच समस्याओं’ को सुलझाने के लिए बातचीत का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह अफसोस की बात है कि ‘सिरो-मालाबार कैथोलिकों में अल्पसंख्यक सांप्रदायिक होते जा रहे हैं’।

पिछले क्रिसमस पर स्नेह यात्रा के हिस्से के रूप में, बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सैकड़ों ईसाई घरों का दौरा किया। 2024 के चुनावों की घोषणा से कुछ हफ्ते पहले, त्रिशूर के बीजेपी उम्मीदवार सुरेश गोपी ने महत्वपूर्ण ईसाई आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्र, त्रिशूर में मुख्य गिरजाघर को एक स्वर्ण मुकुट की पेशकश की। गोपी ने यहां बीजेपी का वोट शेयर 2014 में 11% से बढ़ाकर 2019 में 28% कर दिया है। केरल में बीजेपी का कहना है कि पार्टी को ईसाइयों से अपने पक्ष में ‘साइलेंट वोटिंग’ की उम्मीद है। पीएफआई पर केंद्र के प्रतिबंध से कई ईसाइयों को राहत मिली है। पार्टी को उम्मीद है कि वह राज्य में राजनीतिक इस्लाम को लेकर बेचैनी का फायदा उठाएगी। चर्च प्रतिक्रिया दे रहा है।

क्या महाराष्ट्र में बीजेपी गढ़ पाएगी अपना किला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी महाराष्ट्र में अपना किला गढ़ पाएगी या नहीं! महाराष्ट्र में जब भी हिंदुत्व की बात होती है, तो सबसे पहले बाल ठाकरे का नाम आता है। ऐसे में बीजेपी के लिए महाराष्ट्र में चुनौती बढ़ी है। बीजेपी ने इस बार 400 पार का दावा किया है। पार्टी संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल करना चाहती है। लेकिन इतने बड़े टारगेट को हासिल करने के लिए महाराष्ट्र में बड़ी भूमिका होगी। यहां बीजेपी गठबंधन को पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन करना होगा। 2019 में, बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ने महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 41 पर जीत हासिल की। इसमें बीजेपी ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटें मिलीं। शिवसेना के बंटवारे के साथ, महाराष्ट्र की लड़ाई रोमांचक हो गई है, ये एक महत्वपूर्ण राज्य बन गया है जो बीजेपी के लिए जीतना जरूरी है, और वह भी केवल संख्या के लिहाज से नहीं बल्कि अन्य कई नजरिए से भी। महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बीजेपी नहीं बल्कि एक क्षेत्रीय पार्टी हिंदुत्व की मिशाल बनती रही है, जिसके पास एक ऐसा जनाधार है जो शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है और राजनीतिक विरोधियों के साथ प्रभावी ढंग से बौद्धिक लड़ाई भी करने में सक्षम है। लेकिन महाराष्ट्र में हिंदुत्व कभी भी अपने आप काम नहीं कर पाया, केवल बाल ठाकरे द्वारा समर्थित मूलनिवासी मराठा मानुष राजनीति के साथ मिलकर काम किया। बीजेपी, जिसे ब्राह्मणों और सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग द्वारा संचालित पार्टी माना जाता है, जिसमें शारीरिक या बौद्धिक ताकत की कोई क्षमता नहीं है। बीजेपी को बाल ठाकरे के नेतृत्व को स्वीकार करना पड़ा। लेकिन जैसे-जैसे इसका विस्तार हुआ, बीजेपी ने गठबंधन की शर्तों को तय करना शुरू कर दिया। 2014 में सत्ता संभालने के बाद, इसने महाराष्ट्र में शिवसेना को एक आश्रित गठबंधन का सहयोगी बना दिया, जिसे उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने का भी मौका नहीं मिला।

2019 के विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद, बीजेपी ने सरकार बनाने के लिए शिवसेना पर भरोसा किया। घटनाओं के एक नाटकीय मोड़ में, उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया और एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की सरकार बना ली। सभी को हैरान करते हुए और तमाम बाधाओं के बावजूद, एमवीए ने कोविड महामारी के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया। पार्टी ने प्रभावशाली नेतृत्व दिखाया। विशेष रूप से, उद्धव एक कुशल प्रशासक के रूप में उभरे, जिन्होंने सुषमा अंधारे जैसे बहुजन नेताओं को पार्टी में प्रमुख पद दिए। हाल के वर्षों में उद्धव ने प्रबोधनकर ठाकरे की विरासत का आह्वान किया है, जो कि गैर-ब्राह्मण आंदोलन के लिए बहुत महत्व रखने वाला नाम है। इस बात पर जोर देते हुए कि उनका हिंदुत्व शेंडी और जांवा, ब्राह्मण का ताला और पवित्र धागा किस्म का नहीं है, बल्कि भगवान हनुमान के गदाधारी जैसा है।

शिवसेना का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने कोंकणी मराठा सेना के दिग्गज नारायण राणे को राज्य में अपना चेहरा बनाया। पार्टी की स्वदेशी राजनीति में पैठ बनाने की बेताबी तब चरम पर पहुंच गई जब उसने चिपी एयरपोर्ट के उद्घाटन के दौरान हिंदी भाषी ज्योतिरादित्य सिंधिया से मराठी में बात करवाई। हालांकि, ये प्रयास शिवसेना और कांग्रेस और एनसीपी के साथ उसके गठबंधन को हिला पाने में विफल रहे। यह वह समय था जब महाराष्ट्र की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों को आंतरिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा, जिसके कारण एकनाथ शिंदे और अजित पवार के नेतृत्व में दोनों में विभाजन हुआ। हालांकि, व्यापक रूप से माना जाता है कि बीजेपी ने विभाजन की साजिश रची, जिससे उद्धव और शरद पवार दोनों के लिए सहानुभूति ही बढ़ी है। इसके अलावा, उद्धव की सेना को बदनाम करने के अपने सभी प्रयासों के बावजूद, बीजेपी को बाल ठाकरे की मूलनिवासी हिंदुत्व विरासत का हवाला देना होगा।

प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) एक अन्य महत्वपूर्ण पार्टी है, जिसका दलित-बहुजन समर्थन आधार है। 2019 के आम चुनावों के दौरान, VBA ने कांग्रेस-NCP गठबंधन को प्रभावी रूप से कमजोर कर दिया, इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की मदद की। एमवीए वीबीए को समायोजित करने के लिए अनिच्छुक रहा है, जो शुरू में गठबंधन में शामिल नहीं होना चाहता था। वीबीए के अपने दम पर चुनाव लड़ने के फैसले को दलित-बहुजन जनता ने अच्छी तरह से स्वीकार नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप, एमवीए उम्मीदवारों के लिए अपना समर्थन व्यक्त करने की संभावना है, बीजेपी का आत्मविश्वास उसके कार्यकाल और उसके संसाधन-समृद्ध अभियान से बढ़ा है। लेकिन महाराष्ट्र में वह एनसीपी और शिवसेना के टूटने में अपनी भूमिका की नकारात्मक धारणा से जूझ रही है और सीटों को लेकर शिंदे सेना से जूझ रही है। 2019 में बीजेपी ने 25 में से 23 सीटें जीती थीं। यह मानना थोड़ा मुश्किल है कि इस बार वह उस रिकॉर्ड को सुधार पाएगी।

क्या जामिया की RCA बन रहीं है कलेक्टर का गढ़?

वर्तमान में जामिया की RCA कलेक्टर का गढ़ बनती जा रही है! यूपीएससी का रिजल्ट आए और जामिया की चर्चा ना हो ऐसा हो नहीं सकता। पिछले कुछ सालों में यूपीएससी का रिजल्ट आते ही लोग सवाल करते हैं कि इस बार जामिया वाली कोचिंग से कितने लोगों का सेलेक्शन हुआ है। मंगलवार को यूपीएससी का रिजल्ट आने के बाद भी ऐसा ही सुनने और पढ़ने को मिला। दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया की रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी (RCA) से इस बार 31 लोगों ने सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की। इस बार आरसीए से कोचिंग लेने वाले 71 स्टूडेंट्स ने इंटरव्यू के लिए क्वालिफाई किया था। आरसीए के 2023 के रिजल्ट में पिछले वर्ष की तुलना में 8% की बढ़ोतरी हुई है। आज देशभर में आरसीए किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आरसीए हाशिए पर रहने वाले समुदायों के युवाओं के सिविल सेवा में जाने का सपना साकार कर रही है। यह सिर्फ कोचिंग सेंटर भर नहीं है बल्कि उन तबकों के लोगों की उम्मीद है जिनका नौकरशाही में प्रतिनिधित्व बिल्कुल कम है। 2012 में अपनी स्थापना के बाद से, अकादमी ट्रेनिंग लेने वाले 300 से अधिक स्टूडेंट्स यूपीएससी परीक्षा पास कर सिविल सर्विस जॉइन कर चुके हैं। इसके साथ अगर अन्य केंद्र और राज्य सेवाओं को जोड़ दें तो यह संख्या 600 से अधिक हो जाती है। सिविल सेवा परीक्षा 2021 में ऑल इंडिया रैंक 1 हासिल करने वाली श्रुति शर्मा ने आरसीए से ही पढ़ाई की थी। जामिया के इस कोचिंग सेंटर का उद्देश्य अधिक संख्या में महिलाओं, मुसलमानों, एससी/एसटी और विकलांग लोगों को ट्रेनिंग देकर इस अंतर को पाटना है। इसका उद्देश्य है कि सिविल सेवाओं में इन वर्गों का बेहतर प्रतिनिधित्व संभव हो सके। मंगलवार को, कोचिंग अकादमी ने दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में अपने 31 छात्रों की सफलता का जश्न मनाया। 2010 में अपनी स्थापना के बाद से, आरसीए ने एससी, एसटी और अल्पसंख्यक समुदायों और महिलाओं के छात्रों को मुफ्त कोचिंग प्रदान की है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की तरफ से संचालित ये सेंटर एकमात्र अकादमी है जो मुफ्त में सिविल सर्विस की तैयारी के लिए कोचिंग प्रदान करती है। इस सेंटर ने लगातार बेहतरीन रिजल्ट दिए हैं।

दिल्ली, श्रीनगर, जम्मू, हैदराबाद, गुवाहाटी, मुंबई, पटना, लखनऊ, बेंगलुरु और मलप्पुरम में आरसीए के 10 सेंटर हैं। कोचिंग प्रोग्राम की जरूरतों को पूरा करने के लिए सेंटर में बेहतरीन प्रोफेशनल्स फैकल्टी की टीम है। छात्रों का सेलेक्शन प्रवेश परीक्षा और उसके बाद इंटरव्यू के आधार पर किया जाता है। छात्रों को क्लास टीचिंग की पेशकश की जाती है। इसमें समय-समय पर टेस्ट और वैल्यूएशनके जरिये मजबूत किया जाता है। जामिया के आरसीए में सालाना 100 सीटें उपलब्ध होती हैं। यहां छात्रों को मुख्य परीक्षा की तैयारी और इंटरव्यू के लिए 20 महीने की कड़ी कोचिंग प्रक्रिया है। यहां भोजन और रहने के लिए प्रति माह 2,500 रुपये और रखरखाव के लिए 1,000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। केंद्र में पूर्व सरकारी सलाहकारों और नौकरशाहों सहित लगभग 40 गेस्ट फैकल्टी मेंबर हैं। यहां लगभग 20% छात्र आमतौर पर कमजोर वर्गों से होते हैं। इन्हें 5 लाख रुपये और 10 लाख रुपये की स्कॉलरशिप की पेशकश की जाती है।

यूपीएससी इंटरव्यू के लिए उपस्थित होने वाले 71 आरसीए छात्रों में से, 31 का फाइनल सेलेक्शन हो गया। खास बात है कि इनमें से 11 महिलाएं थीं। उनमें नौशीन का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। नौशीन ने ऑल इंडिया लेवल पर नौवीं रैंक हासिल की। नौशीन यूपी गोरखपुर के रहने वाली हैं। उन्होंने डीयू के खालसा कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है। उनके पिता सरकारी सेवा में हैं और मां गृहिणी हैं। डीयू में सिविल सेवाओं में रुचि बढ़ने के बाद, आरसीए में नौशीन आकांक्षा को एक मजबूत आधार मिला।

झारखंड की मूल निवासी 28 वर्षीय प्रेरणा सिंह, 271वें स्थान पर रहीं। उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की और मिरांडा हाउस से समाजशास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने जामिया से सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। चौथे प्रयास में प्रीलिम्स में सफल होने से पहले उन्होंने तीन बार यूपीएससी परीक्षा का प्रयास किया। इसके बाद उन्होंने आरसीए में मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू की तैयारी की थी।

हमारे यहां तैयारी में एडमिशन के लिए एक ऑल इंडिया लेवल पर परीक्षा है। इसके बाद 10 शहरों में इंटरव्यू होते हैं। हम समाज के कमजोर वर्गों के छात्रों को प्राथमिकता देते हैं। साथ ही उन लोगों को प्राथमिकता देते हैं जो गंभीर और प्रेरित हैं। आरसीए में क्लासेज और रेगुलर टेस्ट सीरीज के साथ यह एक कठोर प्रक्रिया है। सीनियर स्टूडेंट नए लोगों को सलाह देते हैं। साइकोलॉजिस्ट और काउंसलर भी उपलब्ध हैं। हमारी लाइब्रेरी 24/7 खुली रहती है। यहां सेमिनार रूम हैं जहां छात्र, विशेषकर लड़कियां जब चाहें तब पढ़ सकती हैं। हलीम ने कहा कि कोचिंग 16 महीने तक चली। आरजीसी शुरू में यूजीसी की पहल थी। हालांकि, 2018-2020 में इसकी फंडिंग बंद कर दी गई। हलीम ने कहा कि अब भी, हम अपने पूर्व छात्रों से पैसे नहीं लेते हैं। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट केवल भोजन और रहने के लिए पैसे देते हैं। यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करना कोई डिग्री हासिल करने जैसा नहीं है। अन्य कोचिंग केंद्रों के विपरीत, हम एक व्यापक लर्निंग इकोसिस्टम प्रदान करते हैं।

क्या मॉक पोल में हुई है कोई गड़बड़ी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सच में मॉक पोल में कोई गड़बड़ी हुई है या नहीं! चुनाव आयोग ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केरल के कासरगोड में वोटिंग के अभ्यास के दौरान ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ ईवीएम में कथित तौर पर एक अतिरिक्त वोट दिखने के आरोप झूठे हैं। आयोग की तरफ से शीर्ष अदालत में पेश हुए वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त नीतेश कुमार ने ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘ये खबरें गलत हैं। हमने जिलाधिकारी से आरोपों की पड़ताल की है और यह बात सामने आई है कि ये गलत हैं।’ दरअसल, गुरुवार को असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की तरफ से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि ऐसी खबरें हैं कि ईवीएम ‘मॉक पोल’ के दौरान एक अतिरिक्त वोट दिखा रही थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील को भूषण के आरोपों को देखने की बात कही। इसी के बाद वरिष्ठ चुनाव अधिकारी ने शीर्ष अदालत में ईवीएम पर अपना पक्ष रखते हुए आरोपों को खारिज किया। शीर्ष अदालत उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिनमें ईवीएम के माध्यम से डाले गए वोट का ‘वोटर वेरिफियेबिल पेपर ऑडिट ट्रेल’ से पूरी तरह मिलान करने का अनुरोध किया गया था। इस मामले में गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गई और सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त नीतेश कुमार व्यास ने जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच से कहा, ‘ये खबरें गलत हैं। हमने डीएम से आरोपों की पड़ताल की है और यह बात सामने आई है कि ये गलत हैं। हम अदालत में विस्तृत रिपोर्ट जमा करेंगे।’ व्यास शीर्ष अदालत में यह बताने के लिए पेश हुए कि आखिर ईवीएम कैसे काम करती है। इससे पहले दिन में शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह से इस मुद्दे पर विचार करने को कहा था। वकील प्रशांत भूषण ने इस मुद्दे को उठाया था।

याचिकाकर्ता एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ की ओर से भूषण ने अदालत से कहा कि इस तरह की खबरें हैं कि ईवीएम ‘मॉक पोल’ की कवायद के दौरान एक अतिरिक्त वोट दर्शा रही थीं। उन्होंने कहा, ‘केरल के कासरगोड में मॉक पोल हुआ। 4 ईवीएम और वीवीपैट में बीजेपी के लिए एक अतिरिक्त वोट दिख रहा था। मनोरमा ने इस रिपोर्ट को किया है।’ इस पर बेंच ने चुनाव आयोग के वकील से कहा, ‘मिस्टर मनिंदर सिंह, प्लीज इसे क्रॉसचेक कीजिए।’ सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने ईवीएम में कथित गड़बड़ी के आरोपों को खारिज करते हुए विस्तार से बताया कि आखिर ये कैस काम करती है। अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को बनाने वाली कंपनी को यह नहीं पता होता कि किस बटन को किस राजनीतिक पार्टी को दिया जाएगा या किस मशीन को किस राज्य या क्षेत्र में भेजा जाएगा। ईवीएम और उनके VVPAT इकाइयों के काम करने के तरीके के बारे में सवालों का जवाब देते हुए, आयोग के वरिष्ठ अधिकारी ने जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपंकर दत्ता की बेंच को यह भी बताया कि वोटिंग यूनिट में एक बैलट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और एक वीवीपीएटी यूनिट होता है, जो मूल रूप से एक प्रिंटर है।

वोटिंग से 7 दिन पहले, उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की उपस्थिति में वीवीपीएटी मशीन की 4 एमबी फ्लैश मेमोरी पर चुनाव चिन्हों की तस्वीरें अपलोड की जाती हैं। अधिकारी ने बताया कि बैलट यूनिट उम्मीदवारों या चुनाव चिन्हों के प्रति असंवेदनशील होती है. इसमें सिर्फ वही बटन होते हैं जिनके सामने पार्टी के चुनाव चिन्ह चिपकाए जाते हैं। जब कोई बटन दबाया जाता है, तो यूनिट कंट्रोल यूनिट को एक संदेश भेजती है, जो वीवीपीएटी यूनिट को सतर्क करती है, जो बदले में दबाए गए बटन से जुड़े चुनाव चिन्ह को प्रिंट करती है।

जस्टिस दत्ता ने कहा, ‘यह चुनाव प्रक्रिया है। पवित्रता होनी चाहिए। किसी को यह आशंका न हो कि जो अपेक्षित है वह नहीं किया जा रहा है।’ प्रक्रिया को समझाते हुए, चुनाव आयोग के अधिकारी ने कहा कि चुनाव चिह्नों को वीवीपैट इकाई पर लोड करने के बाद, यह जांचने के लिए इसे प्रिंट करने का कमांड दिया जाता है कि सही चुनाव चिह्न लोड किए गए हैं। उन्होंने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर और उम्मीदवार इस बात की पुष्टि के लिए हस्ताक्षर करते हैं, उन्होंने यह भी कहा कि लगभग 17 लाख वीवीपैट मशीनें हैं।

उन्होंने बताया कि मतदान की तारीख से पहले ही मशीनों को स्ट्रॉन्ग रूम्स में रख दिया जाता है और उन्हें एकतरफा नहीं खोला जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आम तौर पर हर विधानसभा क्षेत्र के लिए एक स्ट्रॉन्ग रूम होता है। अधिकारी ने बताया कि मशीनों को एक मॉक पोल के जरिए परखा जाता है और उम्मीदवारों को इसके लिए 5 प्रतिशत मशीनों को बेतरतीब ढंग से चुनने की इजाजत दी जाती है। उन्होंने कहा कि वोटिंग के दिन भी मॉक पोल कराए जाते हैं और वीवीपैट पर्चियों को निकालकर गिना जाता है और उनका मिलान किया जाता है।

आखिर क्या है भाजपा से उम्मीदवार देवरिया के मणि परिवार की कहानी?

आज हम आपको भाजपा से उम्मीदवार देवरिया के मणि परिवार की कहानी सुनाने जा रहे हैं! उत्तर प्रदेश की देवरिया लोकसभा सीट पर भाजपा ने लंबे इंतजार के बाद प्रत्याशी घोषित कर दिया है। पार्टी ने यहां से पूर्व सांसद जनरल श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी के बेटे शशांक मणि त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया है। स्वभाव से मिलनसार शशांक मणि त्रिपाठी समाजसेवी हैं। वर्तमान में वह जागृति यात्रा और जागृति एंटरप्राइज सेंटर-पूर्वांचल के संस्थापक हैं। शशांक मणि त्रिपाठी के पिता श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने ही 1996 में देवरिया लोकसभा सीट पर पहली बार कमल खिलाया था। कांग्रेस सपा गठबंधन ने यहां से कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिलेश सिंह को टिकट दिया। जबकि बसपा ने अभी तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। देवरिया जिले के बरपार गांव के मूल निवासी शशांक मणि त्रिपाठी का पारिवारिक बैकग्राउंड काफी मजबूत है। इनके बाबा पंडित सूरत नारायण मणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस रहे हैं। वह कई जिलों के डीएम, काशी विद्यापीठ वाराणसी के वाइस चांसलर और गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्थापक रहे हैं। वह विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं। शशांक के पिता श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी भारतीय थल सेना में लेफ्टिनेंट जनरल रहे हैं। सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली और 1996 में देवरिया लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर सांसद बने। देवरिया सीट की राजनीति में पहली बार उन्होंने ही भाजपा को जीत दिलाकर कमल खिलाया था।

शशांक मणि के परिवार की गिनती प्रदेश के सम्मानित परिवारों में होती है। शशांक मणि त्रिपाठी के चाचा श्रीनिवास मणि त्रिपाठी देवरिया जिले की गौरी बाजार सीट से विधायक रहे हैं। उनकी पहचान तेजतर्रार हिन्दूवादी नेता के रूप में रही है। मणि के तीसरे चाचा श्रीविलास मणि त्रिपाठी आईपीएस अधिकारी रहे हैं। वह उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी भी रह चुके हैं। इनके कई रिश्तेदार भी प्रदेश और केंद्र में अच्छे पदों पर नियुक्त है। शशांक मणि त्रिपाठी ने अपनी स्कूली शिक्षा लखनऊ के कॉल्विन तालुकदार कॉलेज से पूरी की। बाद में उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बी.टेक. की डिग्री हासिल की और आईएमडी लुसेन से एमबीए किया है। बैकग्राउंड काफी मजबूत है। इनके बाबा पंडित सूरत नारायण मणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस रहे हैं। वह कई जिलों के डीएम, काशी विद्यापीठ वाराणसी के वाइस चांसलर और गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्थापक रहे हैं। वह विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं।वर्तमान में वह जागृति यात्रा और जागृति इंटरप्राइजेज के चेयरमैन है। शशांक मणि की पहचान इलाके में समाजसेवी और मिलनसार नेता की है। इनको टिकट मिलने पर देवरिया जिले के भाजपा समर्थकों में खुशी की लहर है।

देवरिया लोकसभा सीट से 2019 में भाजपा ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी को टिकट दिया था। रमापति राम त्रिपाठी चुनाव जीत कर सांसद भी बने। मगर पार्टी ने इस बार उनका टिकट काटकर शशांक मणि त्रिपाठी को मैदान में उतारा है। कांग्रेस सपा गठबंधन ने यहां से कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिलेश सिंह को टिकट दिया। जबकि बसपा ने अभी तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। देवरिया जिले के बरपार गांव के मूल निवासी शशांक मणि त्रिपाठी का पारिवारिक बैकग्राउंड काफी मजबूत है। सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली और 1996 में देवरिया लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर सांसद बने। देवरिया सीट की राजनीति में पहली बार उन्होंने ही भाजपा को जीत दिलाकर कमल खिलाया था।इनके बाबा पंडित सूरत नारायण मणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस रहे हैं।

वह कई जिलों के डीएम, काशी विद्यापीठ वाराणसी के वाइस चांसलर और गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्थापक रहे हैं। बैकग्राउंड काफी मजबूत है। इनके बाबा पंडित सूरत नारायण मणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस रहे हैं। बता दें कि देवरिया जिले के बरपार गांव के मूल निवासी शशांक मणि त्रिपाठी का पारिवारिक बैकग्राउंड काफी मजबूत है। इनके बाबा पंडित सूरत नारायण मणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस रहे हैं। वह कई जिलों के डीएम, काशी विद्यापीठ वाराणसी के वाइस चांसलर और गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्थापक रहे हैं। वह कई जिलों के डीएम, काशी विद्यापीठ वाराणसी के वाइस चांसलर और गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्थापक रहे हैं। वह विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं। विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं।कांग्रेस सपा गठबंधन के तहत देवरिया लोकसभा सीट कांग्रेस को मिली है कांग्रेस नेहा से राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिलेश सिंह को टिकट दिया है, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक उम्मीदवार घोषित नहीं किया है।

क्या बीजेपी से नाराज है उत्तर प्रदेश के ठाकुर?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उत्तर प्रदेश के ठाकुर बीजेपी से नाराज है या नहीं! यूपी की मुजफ्फरनगर समेत कई सीट पर अंदरूनी कलह बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकती है। वहीं पहले चरण से ठीक पहले क्षत्रिय समाज की नाराजगी ने भारतीय जनता पार्टी को मुश्किलों में डाल दिया है। उधर ठाकुरों की नाराजगी दूर करने के लिए बीजेपी ने सीएम योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री व लखनऊ से उम्मीदवार राजनाथ सिंह को मैदान में उतार दिया है। वहीं इसको लेकर सपा मुखिया अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी दलों ने हमला बोल दिया है। दरअसल यूपी, एमपी और गुजरात समेत कई राज्यों में बीजेपी की ताकत का आधार क्षत्रिय समाज का साथ आना माना जाता है। राजनीतिक गलियारों में क्षत्रियों को लेकर यहां तक कहा जाता है कि ठाकुर नेता भले ही शारीरिक रूप से किसी अन्य दल के साथ खड़ा हो लेकिन उसका मन बीजेपी के साथ होता है। यही वजह है कि बीजेपी पर समय समय पर सवर्णों की पार्टी होने का टैग भी लगा है। वहीं क्षत्रिय समाज से आने वाले योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ठाकुर बिरादरी पूरी तरह से बीजेपी के साथ जुड़ गई है। यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तक ठाकुर बिरादरी से आते हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले ठाकुर बिरादरी बीजेपी से नाराज बताई जा रही है।

बीजेपी के टिकट बंटवारे के बाद क्षत्रिय बिरादरी की नाराजगी बढ़ती जा रही है। इसको लेकर पश्चिमी यूपी में कई जगहों पर महापंचायते भी हो चुकी है। जिसमें ठाकुरों ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। खबरों की माने तो सहारनपुर के ननौत गांव, मेरठ के कपसेड़ा और गाजियाबाद के धौलाना में पंचायतें हुई हैं। इसके अलावा बीते दिनों जेवर में भी पंचायत हुई थी। दावा किया जा रहा है कि इन पंचायत में पश्चिमी यूपी के साथ-साथ हरियाणा राजस्थान और दिल्ली से भी लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए थे। इन पंचायतों में सहारनपुर से लेकर नोएडा तक किसी भी ठाकुर नेता को टिकट ना दिए जाने पर विरोध जताया गया है। गाजियाबाद से जनरल वीके सिंह का टिकट कटने से लोगों में नाराजगी है। इतना ही नहीं, मेरठ और सहारनपुर मंडल से टिकट ना मिलने से भी क्षत्रिय समाज में नाराजगी है।

वहीं चुनाव के समय में क्षेत्रीय समाज की बीजेपी के खिलाफ नाराजगी की यूं तो कई वजहें हैं उसमें से एक मोदी सरकार में मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला का बयान भी माना जा रहा है। मंत्री पुरुषोत्तम ने एक कार्यक्रम में कहा था कि जब ठाकुर राजाओं ने हथियार डाल दिये थे और अंग्रेजो से हाथ मिला लिया था तब दलितों ने हथियार उठा और लड़ाई को जारी रखा था हालांकि क्षत्रिय समाज की नाराजगी के बाद मोदी सरकार के मंत्री ने माफी भी मांग ली थी लेकिन लगातार हो रहे विरोध के बाद यह माना जा रहा है कि क्षत्रियों की नाराजगी अभी शांत नहीं हुई है। वही ठाकुरों की नाराजगी की एक वजह सम्राट मिहिर भोज को गुर्जर बताना भी बताया जा रहा है।

यूपी में राजपूतों की आबादी 10% के करीब है इतना ही नहीं 80 लोकसभा सीट में से 15 सीट पर क्षत्रिय समाज का मजबूत दखल है। लेकिन उसके बाद पश्चिमी यूपी की 26 सीटों में से केवल मुरादाबाद सीट पर ही ठाकुर प्रत्याशी को मैदान में उतारा है। वहीं गाजियाबाद सीट से जनरल वीके सिंह का टिकट काट दिया है। इसी वजह से बीजेपी कैसरगंज सीट से सांसद बृज भूषण शरण सिंह का टिकट नहीं काट पा रही है। संगीत सोम जैसे फायर ब्रांड नेताओं को टिकट न मिलाना भी एक नाराजगी का एक कारण है। मेरठ और सहारनपुर में 2.5 लाख ठाकुर वोटर है। जबकि गाजियाबाद में 3 लाख के आसपास ठाकुर वोटर है। मुरादाबाद में 2 लाख और अलीगढ़ में डेढ़ लाख वोटर है। बाकी अन्य सीटों पर भी ठाकुर बिरादरी के वोटर ठीकठाक संख्या में हैं।

उधर बीजेपी व सहयोगी दलों को मिलाकर अबतक यूपी की लगभग 10 लोकसभा सीटों पर ठाकुर बिरादरी के कैंडिडेट को उतारा गया है। जिसमें लखनऊ लोकसभा सीट से राजनाथ सिंह, मैनपुरी सीट से ठाकुर जयवीर सिंह, मुरादाबाद लोकसभा सीट से कुमार सर्वेश सिंह और बलिया लोकसभा सीट से नीरज शेखर को उम्मीदवार बनाया गया है। इसके अलावा डुमरियागंज लोकसभा सीट से जगदंबिका पाल, जौनपुर सीट से कृपा शंकर सिंह, गोंडा लोकसभा सीट से कीर्तिवर्धन सिंह को टिकट दिया गया है साथ ही फैजाबाद सीट से लल्लू सिंह, हमीरपुर सीट से पुष्पेंद्र सिंह चंदेल और अकबरपुर सीट से देवेंद्र सिंह भोले को कैंडिडेट घोषित किया गया है। फिलहाल कई सीटों पर अभी उम्मीदवारों की घोषणा होना बाकी है।

आखिर क्या है लखनऊ का पिटबुल केस?

आज हम आपको लखनऊ का पिटबुल केस के बारे में बताने जा रहे हैं! लखनऊ के कैसरबाग स्थित बंगाली टोला में 12 जुलाई की सुबह 80 साल की सुशीला त्रिपाठी पर उनके पालतू फीमेल डॉग ने कथित रूप से हमला कर दिया। ज्यादा खून बह जाने के चलते उनकी जान चली गई। सुशीला के बेटे अमित एक जिम ट्रेनर हैं जो उस समय घर पर नहीं थे। हादसे के बाद पिटबुल ब्रीड की डॉगी को नगर निगम ने जब्त कर लिया है। उसे बिहेवियर स्टडी के लिए ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनैशनल के सेंटर में रखा गया है। यह खबर लगातार चर्चा में बनी हुई है, जिसे सुनकर हर कोई हैरान है। पेट पैरंट्स, ऐक्टिविस्ट, डॉक्टर, एनजीओ और आम लोगों में बहस छिड़ गई है कि आखिर एक पालतू कुत्ता अपने ही परिवार के सदस्य की जान कैसे ले सकता है। किसी को ब्राउनी पिटबुल डॉगी के घर का नाम के प्रति हमदर्दी है तो कुछ उसे कातिल की नजर से देख रहे हैं। कोई इस हमले के लिए पिटबुल नस्ल के एग्रेसिव बिहेवियर को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई इसे बेहतर ट्रेनिंग और माहौल की कमी। सुशीला त्रिपाठी के बेटे अमित ने तीन साल पहले पिटबुल ब्रीड की डॉगी ब्राउनी को अडॉप्ट किया था। तब वह तीन महीने की थी। अमित ने मीडिया को बताया है कि इससे पहले कभी भी उसने हमें नुकसान नहीं पहुंचाया, उस दिन पता नहीं क्या हो गया। अमित खुद भी इस हादसे से हैरान हैं। वहीं एनजीओ का मानना है कि सिर्फ स्टेटस सिंबल के लिए डॉग नहीं रखने चाहिए, बल्कि उन्हें सही माहौल और ट्रेनिंग भी जरूरी है। लखनऊ स्थित एनजीओ जीव बसेरा की अध्यक्ष राखी किशोर कहती हैं, ‘कुछ विशेष ब्रीड के डॉग जैसे पिटबुल, रॉट वाइलर या फिर जर्मन शेफर्ड लोग इन्हें स्टेटस सिंबल के लिए पाल लेते हैं।’ वह आगे कहती हैं, ‘कुत्ता घर लाने से पहले जरूरी है आप उसे एक परिवार के सदस्य के रूप में देखें। हमें उस विशेष ब्रीड के बारे में जानकारी और बेसिक रिसर्च पूरी करनी चाहिए। पिटबुल जैसे डॉग को घर में फ्रेंडली और केयरिंग माहौल मिलना जरूरी है। इसके अलावा ट्रेनिंग पर भी बहुत ध्यान देना होता है, प्रफेशनल ट्रेनर्स रखें या फिर घर पर ही ट्रेनिंग दे रहे हैं तो जितने सदस्य हैं उनका कमांड उस पर रहे।’

नगर निगम लखनऊ ने अमेरिकन पिटबुल, रॉट वाइलर, साइबेरियन हस्की, डॉबरमैन, बॉक्सर और जर्मन शेफर्ड जैसे ब्रीड को घातक करार देते हुए इन्हें घर पर न पालने से बचने की सलाह दी है। ऐक्टिविस्ट कामना पांडेय इस पर कहती हैं कि ‘नगर निगम की इस अडवाइजरी से प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं। लोग अपने पालतू जानवरों के डर के चलते अगर छोड़ने लग गए तो ये भी क्रूरता और अवैध होगा।’ उन्होंने कहा, ‘इस तरह अडवाइजरी जारी करने के बजाय नगर निगम को ब्रीडिंग सेंटर को रेग्युलेट करना चाहिए। यहां पर ओनर से उसके बैकग्राउंड की कोई जानकारी या पूछताछ की जाती है और यह भी नहीं देखा जाता है विशेष ब्रीड का डॉग उनके घर के माहौल में रह भी पाएगा या नहीं। इसके अलावा पेट शॉप में अवैध तरीके से जानवर रखते हैं, उन पर भी ऐक्शन लिया जाना जरूरी है।’

यह सामने आया है कि सुशीला और उनके बेटे पड़ोसियों के विरोध के चलते पिटबुल को घर पर ही टहलाते थे। ऐक्टिविस्ट कामना पांडेय बताती हैं, ‘डॉग के गुस्सैल होने के कई कारण होते हैं। इनमें से एक वजह डॉग का लोगों से इंट्रैक्शन न होना भी शामिल है। पिटबुल जैसे बड़ी ब्रीड वाले डॉग को वॉक के लिए घर पर जगह कम पड़ती है, इन्हें बाहर ले जाना जरूरी है ताकि पर्याप्त एक्सरसाइज हो सके। इसे लेकर पशु कल्याण विभाग की ओर से सर्क्युलर भी जारी हो चुका है कि पार्कों में कुत्ता टहलाने पर बैन नहीं लगाया जा सकता है। हालांकि फिर भी विवाद की खबरें आती हैं।’ इस घटना के बाद पड़ोसियों में दहशत है। उनका कहना है कि जो कुत्ता अपने ही घर के सदस्य पर हमला कर सकता है, उससे डर लगना लाजिमी है। ब्राउनी को नगर निगम के जब्त किए जाने के बाद से लोग थोड़े राहत में हैं।

लखनऊनगर निगम के पशु कल्याण विभाग का कहना है कि यहां किसी भी ब्रीड के डॉग को पालने पर प्रतिबंध नहीं है फिर भी लोगों को आक्रामक ब्रीड वाले डॉग को पालने से बचना चाहिए। इसके साथ ही नगर निगम से देशी-विदेशी किसी भी तरह के डॉग को पालने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी है। इसकी वैधता एक साल तक होती है। ऐसा न करने पर 5000 रुपये जुर्माने का प्रावधान है। नगर निगम के पशु कल्याण विभाग ने पाया कि ब्राउनी फीमेल डॉग है और उसका स्टरलाइजेशन (बधियाकरण) नहीं हुआ था। ऐसे में हार्मोनल इश्यू भी कभी-कभी डॉग के एग्रेसिव नेचर की वजह हो सकता है। अमित ने मीडिया को बताया कि ब्राउनी ने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। बस एक बार उनकी मां को दांत लगा था, इस पर जब अमित ब्राउनी पर गुस्सा हुए तो मां ने ही मना कर दिया कि उसने काटा नहीं है। जीव बसेरा की राखी किशोर कहती हैं, ‘मैं नहीं मानती कि कोई भी डॉग अगर भाग-भागकर सबको नहीं काट रहा है तो उसका दिमाग बिल्कुल ही आपे से बाहर हो चुका है। अगर सभी को काट रहा हो तब तो उसका इलाज करना चाहिए। न्यूरोलॉजिकल, मेंटल डिसीज या ट्रॉमा हो सकता है लेकिन अगर सिर्फ एक को काट रहा तो कोई वजह रही होगी जिससे वह ट्रिगर हुआ।’

नगर निगम ने ब्राउनी को हाउस ऑफ स्ट्रे एनिमल (एचएसआई) को सौंप दिया है। उसे इंदिरा नगर जरहरा स्थित एबीसी सेंटर में रखा गया है। पशु कल्याण विभाग के अधिकारी डॉ. अभिनव वर्मा ने बताया, ‘पहले दो दिन डॉगी थोड़ी परेशान रही, रो भी रही थी और लेकिन तीसरे दिन से सुधार हुआ है। अब वह खाना भी खा रही है। वह तीन साल से उस परिवार के साथ थी लेकिन एकदम से अटैचमेंट कम तो नहीं होगा। हमने इसे 14 दिन के लिए ऑब्जर्वेशन पर रखा गया है। इसके बाद उसे एनजीओ या ट्रेनर को सौंपा जाएगा। इसके लिए हमारी प्रक्रिया चल रही है।’ पशु कल्याण विभाग जॉइंट सेक्रेटरी डॉ. अरविंद कुमार राव ने कहा कि ‘फिलहाल ब्राउनी को ऐसी परिस्थितियों में अमित त्रिपाठी को नहीं सौंपा जाएगा। अमित चाहें तो नगर निगम से इजाजत लेकर उससे मिल सकते हैं लेकिन हमारे पास अभी उनका कोई कॉल नहीं आया।’