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क्या पीएम मोदी के दम पर जीत रही है बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी पीएम मोदी के दम पर जीत रही है या नहीं! 2014 से ही मोदी फैक्टर का बीजेपी की चुनावी जीत पर बहुत बड़ा असर पड़ा है। लेकिन क्या ‘मोदी लहर’ को नापा जा सकता है? पीएम नरेंद्र मोदी बीजेपी को कितने वोट और सीटें दिलाते हैं? अतुल ठाकुर ने मोदी के कारण बीजेपी को मिले मतों का अनुमान लगाने के तीन अलग-अलग तरीके अपनाए गए तो पता चला कि ये बहुत अलग नहीं हैं। बीजेपी की जड़ें भारतीय जनसंघ में हैं, जिसने पहले लोकसभा चुनाव में तीन सीटें जीती थीं। पहली बार सरकार में आने का मौका 1977 के चुनाव में मिला, जो आपातकाल के बाद हुए थे और जिसमें इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को पहली बार जनता पार्टी के गठबंधन ने सत्ता से बाहर कर दिया था। जनता पार्टी में विभाजन के बाद 1980 में बीजेपी का गठन हुआ। 1984 के चुनाव में उसने दो लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से हारने से पहले उसने 1998 और 1999 में गठबंधन सरकारें बनाईं। 2014 में वह स्पष्ट बहुमत के साथ वापस आई, जो 1984 के बाद से नहीं देखा गया था। तो सवाल है कि बदल क्या गया? बीजेपी ने 2014 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। इस चुनाव में पार्टी को 2009 की तुलना में 9.4 करोड़ अधिक वोट मिले। 2019 में उसने इससे भी बेहतर प्रदर्शन किया। बीजेपी के कुल वोट 2014 के 17.2 करोड़ से बढ़कर 22.9 करोड़ हो गए। पिछले लोकसभा चुनाव में वोटों की संख्या 6.8 करोड़ वोटों से तीन गुना से भी ज्यादा थी, जो बीजेपी ने 1996 में जीते थे, जब उसकी सरकार सिर्फ 13 दिनों में गिर गई थी।

सीटों और वोटों के मामले में मोदी के प्रभाव को मापने के लिए दो व्यापक परिकल्पनाओं पर काम किया है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे सही हैं, हमने अपनी गणना की तुलना सीएसडीएस-लोकनीति की तरफ से 2019 के चुनाव के बाद किए गए सर्वेक्षण से की। 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव परिणामों की तुलना से एक पैटर्न सामने आता है जो ‘मोदी लहर’ पर प्रकाश डालता है। पता चलता है कि देशभर की 127 सीटें ऐसी हैं जहां 2009 की तुलना में 2014 में बीजेपी के वोट शेयर 20% से अधिक बढ़ गए। बीजेपी ने 2009 में इन 127 सीटों में से केवल पांच जीती थीं जबकि पांच साल बाद 2014 के चुनाव में पार्टी के झोले में 104 सीटें गिर गईं। कहा जा सकता है कि इन सीटों पर ‘मोदी लहर’ का सबसे ज्यादा असर हुआ।

बेशक, बीजेपी के सभी नए वोट ‘मोदी वोट’ नहीं थे। यूपीए-II सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी वोट था और कई राज्यों में स्थानीय गठबंधन और कारक थे जिन्होंने एनडीए की मदद की। लेकिन मोदी बीजेपी के सबसे बड़े पुल और पुश फैक्टर थे- पूरे भारत में नए वोट लाने और विपक्ष से मतदाताओं को दूर करने में मदद की। हमने बीजेपी के वोट शेयर पर मोदी के प्रभाव को मापने के लिए विधानसभा और संसदीय चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन की भी तुलना की। 2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव को ही लें, जो लोकसभा चुनाव के कुछ महीने बाद हुए थे। पार्टी ने 40 सीटें जीतीं और 36.5% वोट हासिल किए। लोकसभा चुनाव में, बीजेपी ने मोदी के नाम पर प्रचार किया था। नतीजा- 58.2% वोट शेयर और राज्य की 10 लोकसभा सीटों पर जीत। वोट शेयर में 21.7 प्रतिशत अंकों के अंतर को मोदी फैक्टर के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

केवल हरियाणा ही नहीं, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच बीजेपी के वोटों में 20% से अधिक की वृद्धि देखी गई। गोवा, छत्तीसगढ़, दिल्ली, झारखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तराखंड में यह अंतर 15% से अधिक था। बिहार और महाराष्ट्र में वृद्धि इतनी तेज नहीं थी क्योंकि वहां बीजेपी का मजबूत स्थानीय दलों के साथ गठबंधन नहीं हो पाया था। कुल मिलाकर, विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच बीजेपी के वोटों में 4.5 करोड़ से अधिक की वृद्धि हुई। इन्हें ‘मोदी वोट’ कहा जा सकता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद किए गए सीएसडीएस-लोकनीति सर्वेक्षण के नतीजे टाइम्स ऑफ इंडिया के दो अनुमानों के करीब हैं। सर्वे के सवालों का जवाब देने वाले 24.7% लोगों ने कहा कि अगर मोदी पीएम उम्मीदवार नहीं होते तो वे बीजेपी को वोट नहीं देते। अन्य 14% अनिश्चित थे कि वे पार्टी को वोट देंगे या नहीं। बीजेपी ने 2019 में लोकसभा चुनाव में 22.9 करोड़ वोट मिले, इनमें से 24.7% वोट 5.6 करोड़ वोट में बदल जाते हैं, जो राज्य विधानसभाओं और संसद में बीजेपी के वोटों के अंतर के लगभग बराबर है।

जानिए कैसे सफल हुआ चंद्रयान-3 मिशन?

आज हम आपको बताएंगे कि चंद्रयान-3 मिशन आखिर कैसे सफल हुआ! भारत के चंद्रयान-3 मिशन ने 23 अगस्त, 2023 को अविश्वसनीय रूप से सॉफ्ट लैंडिंग के साथ इतिहास रच दिया था। पिछले महीने टेक्सास में चंद्र और ग्रह विज्ञान सम्मेलन में इसरो वैज्ञानिकों की तरफ से पेश एक नए पेपर से पता चलता है कि उतरने के लिए आवश्यक शक्तिशाली इंजनों के बावजूद, लैंडर ने न्यूनतम चंद्रमा की धूल उड़ाई। यह स्टडी अमिताभ, के सुरेश, कन्नन वी अय्यर, अजय के पराशर, श्वेता वर्मा और अब्दुल्ला सुहैल की तरफ से की गई थी। इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र से । चंद्रयान-3, जिसने पृथ्वी पर इतना शोर मचाया, चंद्रमा पर बमुश्किल धूल उड़ाई। इस धूल का भविष्य के चंद्र अन्वेषण मिशनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा की सतह पर उतरना कोई आसान काम नहीं है। अंतरिक्ष यान को धीमा करने और नियंत्रित तरीके से नीचे उतरने के लिए शक्तिशाली इंजन चालू करने चाहिए। हालांकि, यह इंजन निकास चंद्रमा की सतह के साथ संपर्क कर सकता है, धूल और मलबे के ढेर को उड़ा सकता है। इसे लैंडिंग स्थल के चारों ओर फैला सकता है। पिछले चंद्र लैंडिंग मिशन, जैसे कि प्रसिद्ध अपोलो मिशन और चीन के चांग’ई-3, ने 60 मीटर लगभग 200 फीट तक की ऊंचाई धूल के गुबार उठाए थे। ऐसे विशाल धूल के बादल संभावित रूप से संवेदनशील उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साथ ही लैंडिंग स्थल का दृश्य अस्पष्ट कर सकते हैं। यहां तक कि रोवर्स या अंतरिक्ष यात्रियों की तरफ से एकत्र किए गए साइंटिफिक सैंपल को भी दूषित कर सकते हैं।

चंद्रयान-3 के लैंडर विक्रम ने केवल 8.7-12 मीटर (28-39 फीट) की धूल का गुबार उठाया। ये बात लैंडर, ऑर्बिटर (चंद्रयान -2 से) और रोवर प्रज्ञान पर लगे कैमरों से ली गई तस्वीरों से पता चलता है। इसके अलावा, धूल फैलने से प्रभावित क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा था, जो केवल 145 वर्ग मीटर (लगभग 1,560 वर्ग फीट) को कवर करता था। यह एक दिशा में लगभग 17 मीटर (56 फीट) और दूसरी दिशा में 14 मीटर (46 फीट) तक फैला था। सॉफ्ट टचडाउन से पता चलता है कि लैंडर के डिजाइन और इंजन कॉन्फिगरेशन को इंजन प्लम और चंद्र सतह के बीच न्यूनतम संपर्क के लिए अनुकूल किया गया था। चंद्रयान-3 की उपलब्धि कई कारकों के संयोजन के कारण होने की संभावना है। इसमें लैंडर का हल्का डिजाइन, इंजन के जोर का सटीक नियंत्रण और लैंडिंग स्थल पर चंद्रमा की मिट्टी के विशिष्ट गुण शामिल हैं।

लैंडर विक्रम, चंद्रमा के दक्षिणी गोलार्ध में ‘मंजिनस-यू’ और ‘बोगुस्लाव्स्की-एम’ क्रेटर के बीच एक बिंदु पर उतरा। इसे बाद में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘शिव शक्ति’ नाम दिया। इसके लैंडर इमेजर (एलआई) ने लगभग रियल टाइम मोड में कुल 835 तस्वीरों को कैप्चर किया और धरती पर भेजा। इससे लैंडिंग प्रक्रिया और चंद्र सतह के वातावरण में महत्वपूर्ण जानकारी मिली। लैंडिंग के दौरान, चंद्रयान -3 के सभी चार इंजनों ने फायरिंग शुरू कर दी। मंदी के लिए लगभग 30 किमी की ऊंचाई और लैंडर के 800 मीटर की ऊंचाई पर पहली बार मंडराने तक काम किया। उसके बाद, टचडाउन तक केवल दो डायगनल इंजन चालू रखे गए थे। जब लैंडर के फुटपैड में चार सेंसर ने टचडाउन का संकेत दिया, तो शून्य के एक्सेलेरोमीटर रीडिंग के कॉम्बिनेशन में, इंजन 30 मिलीसेकंड के भीतर बंद कर दिए गए। इससे लैंडर की चंद्रमा की सतह पर एक हल्की और नियंत्रित लैंडिंग सुनिश्चित हुई।

चंद्रमा धूल की कम से कम गड़बड़ी भविष्य के चंद्र अन्वेषण मिशनों के लिए महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। यह न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव के साथ चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान उतारने की संभावना को दर्शाता है। साथ ही वैज्ञानिक अध्ययन के लिए चंद्रमा की सतह की प्राचीन प्रकृति को संरक्षित करता है।लैंडिंग स्थल के चारों ओर फैला सकता है। पिछले चंद्र लैंडिंग मिशन, जैसे कि प्रसिद्ध अपोलो मिशन और चीन के चांग’ई-3, ने 60 मीटर लगभग 200 फीट तक की ऊंचाई धूल के गुबार उठाए थे। ऐसे विशाल धूल के बादल संभावित रूप से संवेदनशील उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साथ ही लैंडिंग स्थल का दृश्य अस्पष्ट कर सकते हैं। यहां तक कि रोवर्स या अंतरिक्ष यात्रियों की तरफ से एकत्र किए गए साइंटिफिक सैंपल को भी दूषित कर सकते हैं। साथ ही संवेदनशील उपकरणों को नुकसान के जोखिम को कम करता है। इसके अलावा, इस कम धूल गड़बड़ी के पीछे के तंत्र को समझने से इंजीनियरों को भविष्य के मिशनों के लिए अधिक कुशल और पर्यावरण के प्रति जागरूक लैंडर और रोवर्स डिजाइन तैयार करने में भी मदद मिल सकती है।

एक ऐसा नेता जिसने पहला चुनाव 910 रुपए में जीता था !

आज कहानी ऐसे नेता की जिसने पहला चुनाव 910 रुपए में जीता था! खुला बदन, हल्की-लम्बी दाढ़ी मूंछ, कंधे पर सफेद या हरा गमछा और बिना चप्पल-जूते तक संसद भवन में अंदर प्रवेश करने वाले शख्स को देखकर सभी हैरान रह जाते। झारखंड के सिंहभूम लोकसभा सीट से पांच पर सांसद और चाईबासा विधानसभा क्षेत्र से चार विधायक रहे बागुन सुम्ब्रुई की सादगी की चर्चा अब भी होती है। आधुनिक राजनीति के संत-महात्मा के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले बागुन सुम्ब्रुई की चर्चा बहुपत्नियों के लिए भी होती है। दर्जी से राजनेता बने बागुन सुम्ब्रई ने अपना पहला चुनाव साइकिल को बंधक रखकर जीता था। वहीं झारखंड आंदोलन के दौरान बाहर लोगों पर ‘भेलवा तेल’ ज्वलनशील तेल डालकर इलाके से भगाने का काम किया, जिसकी चर्चा वक्त पूरे देशभर में हुई और इस कदम से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। आजादी के पहले 1945 से ही बागुन सुम्बुई चाईबासा शहर के सदर बाजार में दर्जी का काम कर अपनी जीविकोपार्जन कर रहे थे। लेकिन सातवीं कक्षा तक पढ़े बागुन सुम्ब्रुई अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में कूद गए। वे जयपाल सिंह मुंडा के करीब आए। बाद में उन्होंने अपने इलाके में झारखंड आंदोलन की कमान संभालने के साथ ही ‘बिहारी झारखंड छोड़ो’ का नारा दिया। इस आंदोलन को इलाके में जबरदस्त समर्थन मिला। आंदोलन में स्थानीय ‘हो’ भाषा नहीं जानने वाले करीब 500 बिहारी शिक्षकों को चिह्नित किया गया। बागुन सुम्ब्रुई के नेतृत्व में उन्हें खदेड़ दिया गया। इस आंदोलन में क्षेत्र से भागने वाले सभी प्राथमिक स्कूल के शिक्षक थे। लेकिन 1984 में बागुन सुम्ब्रुई कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद 1984 और 1989 में भी जीत हासिल की। इसके बाद वर्ष 2000 में चाईबासा सीट से विधायक बने और राबड़ी देवी की सरमार में मंत्री बने। अलग झारखंड राज्य गठन के बाद बागुन सुम्ब्रुई झारखंड विधानसभा के पहले उपाध्यक्ष बने।उनके नेतृत्व में झारखंड आंदोलन इतना उग्र हुआ कि बिहारी शिक्षक, कर्मचारी और ठेकेदार को पकड़ कर उनपर भेलवा तेल (ज्वलनशील) डाल दिया जाने लगा। इस आंदोलन से इलाके में बागुन सुम्बुई नायक के रूप में उभरे।

1967 में बागुन सुम्ब्रुई ने सबसे पहले झारखंड पार्टी के टिकट पर चाईबासा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। निधन से कुछ दिन पहले बागुन सुम्ब्रई ने एक इंटरव्यू में बताया था पहले चुनाव में सिर्फ 910 रुपये खर्च हुआ। वे अपने समर्थकों के साथ साइकिल से पूरे विधानसभा में घूम-घूम कर प्रचार करते थे। चुनाव के अंतिम समय में पैसे के अभाव में इन्होंने अपनी साइकिल 125 रुपये में चाईबासा के टीनु ठाकुर को बंधक रख दी। चुनाव में जीत हासिल करने के छह महीने बाद पैसा देखकर साइकिल वापस ली। साल 1969 और 072 में भी वे झारखंड पार्टी उम्मीदवार के रूप में चाईबासा सीट से विजयी रहे। इस दौरान बागुन 1970 में बिहार में दारोगा प्रसाद राय के मंत्रिमंडल में वन एवं पर्यावरण और परिवहन मंत्री रहे। बाद में बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार में वर्ष 1971 में वे उत्पाद मंत्री बने।

वर्ष 1977 में बागुन सुम्ब्रई पहली बार जनता पार्टी के सहयोग से झारखंड पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सिंहभूम लोकसभा सीट से विजयी हुए। इसके बाद वर्ष 1980 में वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और जनता पार्टी के टिकट पर लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। लेकिन 1984 में बागुन सुम्ब्रुई कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद 1984 और 1989 में भी जीत हासिल की। इसके बाद वर्ष 2000 में चाईबासा सीट से विधायक बने और राबड़ी देवी की सरमार में मंत्री बने। अलग झारखंड राज्य गठन के बाद बागुन सुम्ब्रुई झारखंड विधानसभा के पहले उपाध्यक्ष बने।

बागुन सुम्ब्रुई करीब 40 वर्षों तक सांसद-विधायक और मंत्री रहे, लेकिन संपत्ति बनाने पर कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई। जीवनका के अंतिम समय में वे चाईबासा में अपने श्वसुर के घर भाड़े पर रहते थे, लेकिन सातवीं कक्षा तक पढ़े बागुन सुम्ब्रुई अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में कूद गए। वे जयपाल सिंह मुंडा के करीब आए। बाद में उन्होंने अपने इलाके में झारखंड आंदोलन की कमान संभालने के साथ ही ‘बिहारी झारखंड छोड़ो’ का नारा दिया। इस आंदोलन को इलाके में जबरदस्त समर्थन मिला।जबकि पैतृक गांव में खेतीबारी करते। पेंशन की राशि मिलती थी, उसी से उनका गुजर-बसर चलता रहा। अपने से काफी कम उम्र के जनप्रतिनिधियों को को करोड़पति बनते देखकर भी उनमें कोई इर्ष्या का भाव नहीं आता, वे अपने में संतुष्ट थे और लंबी बीमारी के बाद वर्ष 2018 में जमशेदपुर के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

क्या बीजेपी खेल रही है शाही घरानों के जरिए राजनीति?

वर्तमान में बीजेपी शाही घरानों के जरिए राजनीतिक खेल रही है !लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी घमासान तेज है। बीजेपी समेत सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारियों में जुट गई हैं। बीजेपी इस बार 400 से ज्यादा सीटों पर जीत का दावा कर रही है। बीजेपी ने इस टारगेट को पूरा करने के लिए जीतोड़ मेहनत शुरू कर दी है। बीजेपी एक सटीक रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है। उसी के तहत बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में पूर्व शाही परिवारों के 10 से अधिक वंशजों को चुनावी मैदान में उतारा है। शाही परिवारों को चुनावी मैदान में उतारने के साथ ही सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि बीजेपी अक्सर समाजवादी पार्टी, राजद, द्रमुक और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों पर भाई-भतीजावाद का आरोप लगाती है, लेकिन खुद ही राजघरानों के सहारे चुनावी रण जीतने का प्रयास कर रही है। दरअसल बीजेपी ने उन सीटों पर राजघरानों के वारिसों को उतारा है जहां उसका प्रभाव कम है। आगामी लोकसभा चुनावों में, 10 से अधिक शाही वंशज बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें से कुछ राजनीति में नए हैं। इस कदम का उद्देश्य पूर्व शाही परिवारों से जुड़े मतदाताओं को आकर्षित करना है। ओडिशा में बीजेपी ने राजघरानों से संबंध रखने वाले दो लोगों को अपना प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी ने पटनागढ़-बोलांगीर से लोकसभा सीट संगीता कुमारी सिंह और कालाहांडी लोकसभा सीट से मालविका केशरी देव को टिकट दिया है। संगीता की शादी कनकवर्धन सिंह देव से हुई है। उनका परिवार लंबे समय से सियासत से जुड़ा हुआ है। कनकवर्धन के दादा राजेंद्र नारायण सिंह देव स्वतंत्रता पार्टी के सदस्य थे। वह 1967 में एंटी कांग्रेस वेव के दौरान राज्य के सीएम बने। संगीता बोलांगीर से बीजेपी के मौजूदा सांसद हैं। दूसरी तरफ मालविका के पति अर्का केशरी देव पहले बीजद में थे। इन दोनों ने सितंबर 2013 में बीजेपी की सदस्यता ली। अर्का कालाहांडी रियासत के प्रमुख प्रताप केशरी देव के पोते हैं। वह साल 2014 में कालाहांडी से चुनाव जीत चुके हैं। इससे पहले 1957, 1962, 1967 और 1971 में प्रताप केशरी इस सीट से स्वतंत्रता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गए। वह 1977 में निर्दलीय चुनाव जीते थे।

राजस्थान में बीजेपी ने पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। वह झालावार-बारा लोकसभा सीट से चार बार के सांसद हैं। वसुंधरा सिंधिया राजघराने से संबंध रखती हैं। राजस्थान में बीजेपी ने राजसामंद सीट से मेवाड़ राजघराने की महिमा को टिकट दिया है। महिमा के पति विश्वराज सिंह नाथद्वारा से विधायक हैं। राजसामंद से पहले दिया कुमारी सांसद थीं। अब वह राजस्थान की डिप्टी सीएम हैं। एमपी में बीजेपी ने गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दिया है। पंजाब में पटियाला से परनीत कौर को उतारा गया है। वह पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह की पत्नी हैं। परनीत 1999 से 2014 तक कांग्रेस के टिकट पर पटियाला से सांसद थी।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने कृष्णानगर लोकसभा सीट से राजमाता अमृता रॉय को टिकट दिया है। उनके सामने टीएमसी की महुआ मोइत्रा हैं। कर्नाटक में बीजेपी में मैसूरु लोकसभा सीट पर प्रताप सिम्हा की जगह यदूवीर कृष्णदत्त चामराजा वडियार को टिकट दिया है। वह मैसूर राजपरिवार से संबंध रखते हैं। उत्तराखंड की टिहरी गढ़वाल सीट से बीजेपी ने मौजूदा सांसद और पूर्ववर्ती टेहरी-गढ़वाल साम्राज्य की रानी माला राज्य लक्ष्मी शाह (73 वर्ष) को टिकट दिया है। उनका परिवार लंबे समय से सियासत से जुड़ा हुआ है। कनकवर्धन के दादा राजेंद्र नारायण सिंह देव स्वतंत्रता पार्टी के सदस्य थे। वह 1967 में एंटी कांग्रेस वेव के दौरान राज्य के सीएम बने। संगीता बोलांगीर से बीजेपी के मौजूदा सांसद हैं। दूसरी तरफ मालविका के पति अर्का केशरी देव पहले बीजद में थे। इन दोनों ने सितंबर 2013 में बीजेपी की सदस्यता ली।उनका जन्म काठमांडू में हुआ था और उन्होंने 1975 में टेहरी-गढ़वाल के महाराजा मनुजेंद्र शाह साहिब बहादुर से शादी की थी।

नॉर्थ ईस्ट के राज्य त्रिपुरा में ईस्ट त्रिपुरा लोकसभा सीट पर बीजेपी ने महारानी कीर्ति सिंह देबबर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है। इन दोनों ने सितंबर 2013 में बीजेपी की सदस्यता ली।उनका जन्म काठमांडू में हुआ था और उन्होंने 1975 में टेहरी-गढ़वाल के महाराजा मनुजेंद्र शाह साहिब बहादुर से शादी की थी।वह त्रिपुरा के माणिक्य वंश से संबंध रखती हैं और उनकी शादी छत्तीसगढ़ के कवर्धा के राजपरिवार में हुई है। उनके पति योगेश्वर राज सिंह कांग्रेस में रह चुके हैं। वह टिपरा मोथा पार्टी के नेता प्रद्योत किशोर मनिया देबबर्मा की बहन हैं।

लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव क्या खड़ी करेगा मुसीबत?

लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव मुसीबत खड़ी कर सकता है! लोकसभा चुनाव के साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल और सिक्किम में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। लोकसभा चुनाव में एनडीए के लिए 400 से ज्यादा सीटें जीतने के मिशन के साथ बीजेपी ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश पर खास फोकस किया है। आंध्र में तो टीडीपी-बीजेपी-जनसेना का गठबंधन हो गया है, लेकिन ओडिशा में बीजेपी और पिछले 25 साल से राज्य की सत्ता पर काबिज बीजेडी के बीच समझौता नहीं हो सका है। वहीं आंध्र प्रदेश में इस वक्त जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व में YSRCP की सरकार है। पिछले विधानसभा चुनाव में जहां बीजेपी के निशाने पर पूरी तरह चंद्रबाबू नायडू की पार्टी TDP थी, वहीं इस बार टीडीपी एनडीए में साथ है। ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी संग बीजेपी के गठबंधन की बात नहीं बन पाई है। 1998 के लोकसभा चुनाव में दोनों दल एक साथ लड़े थे। बीजेडी ने 12 सीटों पर चुनाव लड़ा और 9 पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी ने 9 सीटों पर चुनाव लड़ा और 7 पर जीत हासिल की। 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजू जनता दल ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेडी को 20 और बीजेपी को 1 सीट मिली। उसके बाद राज्य में बीजेपी का कैडर मजबूत होता गया और 2019 के चुनाव में बीजेपी ने अपने दम पर ओडिशा की कुल 21 में से 8 सीटें जीती थीं। बीजेडी को 12 सीटों पर जीत मिली थी। एक सीट कांग्रेस के खाते में गई थी। ओडिशा विधानसभा में भी बीजेपी के 23 विधायक हैं और बीजेडी के 112 विधायक हैं। कांग्रेस के राज्य में 9 विधायक हैं। केंद्र की मोदी सरकार के साथ बीजेडी सुप्रीमो नवीन पटनायक के संबंध अच्छे रहे हैं।

आंध्र प्रदेश में अभी जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व में वाईएसआरसीपी की सरकार है। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी का गठबंधन टूट गया था। इस बार टीडीपी, बीजेपी और जनसेना पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। जगन मोहन रेड्डी के पिता राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में 2004 और 2009 में सत्ता कब्जाई। 2009 में राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद जगन मोहन को लगा कि कांग्रेस में उनकी उपेक्षा हो रही है और फिर जगन ने 2011 में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी बना ली। 2014 का चुनाव टीडीपी और बीजेपी ने मिलकर लड़ा था। तब भी जगन मोहन की पार्टी ने 70 सीटें जीती और 28 पर्सेंट वोट हासिल किए। कांग्रेस का सफाया तय हो चुका था। 2019 के चुनाव से पहले ही 2018 में टीडीपी ने आंध्र को विशेष राज्य के दर्जे के मुद्दे पर बीजेपी से नाता तोड़ दिया और फिर 2019 का चुनाव अलग लड़ा। तब वाईएसआरसीपी 151 सीटों पर जीत के साथ सत्ता में आई। अब इस बार राज्य में मुकाबला वाईएसआरसीपी बनाम टीडीपी-बीजेपी-जनसेना गठबंधन का है। 2014 में जब टीडीपी-बीजेपी साथ थे तो टीडीपी ने 102 सीटें जीती थी, जबकि बीजेपी को 4 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं अलग होने के बाद 2019 के चुनाव में टीडीपी को विधानसभा चुनाव में 23 जबकि बीजेपी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। कांग्रेस भी अपना खाता नहीं खोल पाई। 2019 लोकसभा चुनाव में 25 सीटों वाले इस राज्य में वाईएसआर कांग्रेस ने 22 पर जीत दर्ज की है। टीडीपी के खाते में 3 सीटें गई थी।

ओडिशा में जहां बीजेपी मुख्य विपक्षी पार्टी है, वहीं आंध्र प्रदेश में बीजेपी गठबंधन में है। जिस तरह से बीजेपी ने ओडिशा में अपना कैडर मजबूत किया है, उसको देखते हुए ओडिशा में बीजेपी का प्रदर्शन पिछली बार के मुकाबले बेहतर रहेगा। हालांकि, राज्य विधानसभा में नवीन पटनायक अभी भी लोगों की पसंद हो सकते हैं और विधानसभा में उनकी पार्टी बीजेपी को बहुमत के आसार हैं। लोकसभा में पिछली बार की तुलना में बीजेपी 8 सीटों से ज्यादा हासिल कर सकती है। वह कहते हैं कि साउथ में अक्सर पांच साल बाद सरकारें बदल जाती है। तमिलनाडु में जयललिता को लगातार दो बार मौका मिला, लेफ्ट और टीआरएस भी दो बार जीती। आंध्र में भी 2004-2014 कांग्रेस की सरकार थी लेकिन इस बार का चुनाव वाईएसआरसीपी के लिए बड़ी चुनौती उभरकर आ गया है। टीडीपी अकेले कमजोर थी लेकिन बीजेपी और जनसेना के आने के बाद वो एक मजबूत पार्टी बनकर उभर रही है। पिछले चुनाव में वाईएसआरसीपी और टीडीपी के बीच में काफी गैप था। दूसरा आंध्र प्रदेश से तेलंगाना के अलग होने के बाद वहां पर ग्रामीण सीटें बहुत है, जहां पर उसमें वाईएसआर का काफी प्रभाव है। टीडीपी का उभार शहरों तक देखने को मिल रहा है, ऐसे में लग रहा है कि बेशक वाईएसआर की सीटें कम होंगी लेकिन हो सकता है कि उन्हें एक बार फिर सीएम बनने का मौका मिले।

क्या अब भारत में होगा कैंसर का देशी इलाज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब भारत में कैंसर का देशी इलाज होगा या नहीं! कैंसर के इलाज का एक स्वदेशी तरीका ईजाद किया गया है, जिसे दुनिया में सबसे सस्ता बताया गया है। अब तक CAR T-सेल थैरेपी से कैंसर के इलाज को सुगम और किफायती बनाया गया है। लेकिन भारत में तैयार की गई थैरेपी का नाम है- NexCAR19 CAR T-सेल थैरेपी। आईआईटी बॉम्बे और टाटा मेमोरियल सेंटर ने मिलकर जीन आधारित इस इलाज को तैयार किया है। आईआईटी बॉम्बे के निदेशक प्रोफेसर शुभाशीष चौधरी ने कहा कि विदेश में इस इलाज की कीमत तकरीबन चार करोड़ रुपये है, जबकि भारत में यह खर्च लगभग 30 लाख रुपये होगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुरुवार को इसे लॉन्च किया। कार्यक्रम आईआईटी बॉम्बे में हुआ। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा, भारत की पहली जीन थैरेपी की शुरुआत कैंसर के खिलाफ हमारी लड़ाई में एक बड़ी उपलब्धि है। मेक इन इंडिया की पहल पर बनी इस थैरेपी के बारे में एक्सपर्ट का कहना है कि ये दुनिया की सबसे सस्ती थैरेपी है, जिससे आने वाले समय में कैंसर से लड़ने में देश को मजबूती मिलेगी।

सीएआर टी-सेल इम्यूनोथैरेपी और जीन थैरेपी का एक रूप है। इसमें वाइट ब्लड सेल्स और टी सेल्स को निकालकर फिर से बॉडी में अलग-अलग तरीके से डाला जाता है। टी-सेल्स को कैंसर से लड़ने के लिए प्रोग्राम किया जाता है। इसको इस तरह समझें, जैसे युद्ध पर जाने से पहले सेना को ट्रेनिंग दी जाती है। वैसे ही इस थैरेपी में हमारे शरीर की ही सेल्स को पावरफुल बनाकर कैंसर से लड़ने के लिए तैयार किया जाता है। द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साल 2019 में तकरीबन 12 लाख नए कैंसर के मामले और 9.3 लाख मौतें दर्ज की गई थीं। एशिया में इस बीमारी से जूझने वाला भारत दूसरा सबसे बड़ा देश है। NexCAR19 CAR T-सेल थेरेपी भारत की पहली ‘मेक इन इंडिया’ CAR T-सेल थैरेपी है, जिससे इलाज की लागत में काफी कमी आने की उम्मीद जताई गई है। एक्सपर्ट के मुताबिक सीएआर टी-सेल इम्यूनोथेरेपी और जीन थैरेपी का एक रूप है। जीन आधारित थैरेपी विभिन्न प्रकार के कैंसर को ठीक करने में मदद करेगी।

बता दे कि वेल्स की राजकुमारी केट मिडलटन को सिर्फ 42 साल की उम्र में कैंसर हो गया। उन्होंने खुद एक विडियो मेसेज जारी कर कैंसर होने की पुष्टि की है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतनी कम उम्र में केवल केट को ही नहीं, बल्कि भारत में भी कैंसर के मामलों में इजाफा हुआ है। कैंसर एक्सपर्ट का कहना है कि तंबाकू और स्मोकिंग का बढ़ता चलन, पॉल्यूशन, प्लास्टिक, नाइट लाइफ, जंक फूड, हैवी मेटल्स, इंडस्ट्री एक्सपोजर, कॉस्मेटिक का इस्तेमाल, माइक्रोवेव जैसी चीजें उम्र से पहले ही लोगों को कैंसर का शिकार बना रही हैं। जेनेटिक कारण से कैंसर होने का खतरा रहता है। यह माता-पिता में से किसी एक के जीन से बच्चे में आता है। ऐसे लोगों में कम उम्र में कैंसर होने की संभावना रहती है। लेकिन इसकी संख्या कम होती है। 50 साल से कम उम्र में सबसे ज्यादा मुंह और गले का कैंसर बढ़ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह गुटखा, तंबाकू का सेवन है। 12 से 15 साल के बीच बच्चे गुटखा चबाना शुरू करते हैं और 40 साल के आसपास आते आते कैंसर के शिकार हो जाते हैं। कहीं से भी इस कैंसर की वजह जीन नहीं है।

लंग्स अक्सर 60 साल के बाद ही खराब होते हैं, तभी किसी को लंग्स कैंसर होता था। अभी स्मोकिंग के अलावा प्रदूषण लंग्स कैंसर की बड़ी वजह बन रहा है। 50 साल से कम उम्र में लंग्स कैंसर के मरीजों की संख्या काफी बढ़ी है। वहीं, महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर काफी तेजी से बढ़ रहा है। 5 से 10 पर्सेंट मामले में जेनेटिक वजह तो है, लेकिन इसके अलावा बाकी में लाइफस्टाइल की वजह से कैंसर हो रहा है। प्लास्टिक के सेवन से निकलने वाला केमिकल एंडोक्राइन को डिस्टर्ब करता है। प्लास्टिक में पाए जाने वाला थैलेड और बीएसए स्ट्रेजोन को प्रभावित करता है और इसकी वजह से ब्रेस्ट और ओवरी के कैंसर होते हैं।

नाइटलाइफ भी कैंसर पैदा करता है। यानी नॉर्मल साइकल रात में सोना और दिन में जगने की बजाए जो लोग रात में जागते हैं और दिन में सोते हैं, उनमें कैंसर का खतरा ज्यादा है। यूके में इस पर स्टडी हुई थी। अस्पतालों में जो नर्सेज रात में ड्यूटी करती थीं और नॉर्मल नर्सेज जो दिन में काम करती थी। दोनों में तुलना की गई तो रात में काम करने वाली महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा ज्यादा पाया गया।

आखिर क्यों और कैसे हो रही है पाकिस्तान में हत्याएं?

वर्तमान में पाकिस्तान में हत्याएं लगातार होती ही जा रही है! पाकिस्तान में आतंकियों की हत्या करने के लिए भारत सरकार ने आदेश दिया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ इस पूरे हत्या को अंजाम दे रही है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कंट्रोल करते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत उन लोगों को निशाना बना रहा है, जिसे वह दुश्मन मानता है। गार्जियन की रिपोर्ट में दोनों देशों के खुफिया अधिकारियों के साथ इंटरव्यू और पाकिस्तानी जांचकर्ताओं की ओर से शेयर किए गए डॉक्यूमेंट्स का जिक्र है। रिपोर्ट कहती है कि 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक साहसी दृष्टिकोण अपनाया। दावे के मुताबिक 2020 से अब तक 20 आतंकियों की हत्या अज्ञात हमलावरों की ओर से की गई है। गार्जियन की रिपोर्ट देखकर पाकिस्तानी मीडिया गदगद हो गया है। जियो न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘द गार्जियन की रिपोर्ट पाकिस्तान के दावों को और अधिक बल देती है। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने पाकिस्तान की धरती पर हत्याओं के आदेश दिए।’

जियो ने अपनी रिपोर्ट में रॉ को कुख्यात जासूसी एजेंसी बताया। इसके साथ ही कहा कि पुलवामा हमले के बाद से ही भारत ने इन हत्याओं को अंजाम देना शुरू कर दिया। जियो ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि पाकिस्तान के अलावा भारत खालिस्तान समर्थकों को भी निशाना बनाता है। जियो ने कहा कि भारतीय एजेंट्स ने कई पाकिस्तानियों को हत्या करने के लिए पैसे भी दिए। रिपोर्ट कहती है कि भारत हमला होने से पहले ही आतंकियों को मार रहा था। लेकिन अब रिपोर्ट पर सवाल खड़े होने लगे हैं। द गार्जियन की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने का सबसे बड़ा कारण है कि इसे पूरी तरह पाकिस्तान के दस्तावेजों और खुफिया एजेंसी के आधार पर लिखा गया है। वहीं इस रिपोर्ट में कई तथ्यात्मक गलतियों को भी लोगों ने दिखाया है, जिससे पता चलता है कि इतने प्रतिष्ठित अखबार ने जल्दबाजी में इस रिपोर्ट को छाप दिया। डिफेंस एक्सपर्ट अभिषेक अय्यर मित्रा ने सवाल उठाते हुए लिखा कि रिपोर्ट में खालिस्तान समर्थक गुरपतवंत सिंह पन्नू को मरा हुआ लिख दिया गया, जो कि गलत है। यह दावा किया जाता है कि मार्च 2022 के दौरान कराची में गोलीबारी को अंजाम देने के लिए अफगानिस्तान से लोगों को को बड़ी रकम दी गई थी। इस हमले के बाद वो वहां से गायब हो गए और बॉर्डर पार गए थे। हालांकि बाद में उन्हें पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने पकड़ लिया था।बाद में द गार्जियन ने इसे सुधारा। वहीं आतंकी रियाज अहमद की फोटो भी गलत लगाई गई थी। भारत सरकार ने भी इस रिपोर्ट को नकारते हुए, ‘झूठा और दुर्भावनापूर्ण भारत विरोधी प्रचार’ बताया है।

बता दे कि दो भारतीय खुफिया अधिकारियों के अनुसार, विदेशों में रहकर भारत के खिलाफ साजिश करने वालों को निशाना बनाने की यह प्रक्रिया खुफिया मिशनों से प्रभावित थी, जिसमें मोसाद और केजीबी के साथ समानताएं थीं। हालांकि विदेश मंत्रालय ने इन दावों का स्पष्ट रूप से खंडन किया है। रिपोर्ट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पिछले बयान को दोहराया गया है जिसमें उन्होंने कहा था विदेश में हुईं टारगेट किलिंग भारत सरकार की नीति के अनुरूप नहीं हैं। पाकिस्तानी जांचकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि ये हत्याएं भारतीय खुफिया स्लीपर सेल द्वारा की गई थीं, जो मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात से संचालित होती थीं, हत्याओं को अंजाम देने के लिए स्थानीय अपराधियों या जिहादियों को झूठे बहाने से नियुक्त करती थीं। गार्जियन की रिपोर्ट में जाहिद अखुंड की हत्या का जिक्र है, जिसे जहूर मिस्त्री के नाम से जाना जाता है। जहूर घोषित आतंकवादी है, जिसने एयर इंडिया का एक विमान हाईजैक किया था। इसके साथ ही कहा कि पुलवामा हमले के बाद से ही भारत ने इन हत्याओं को अंजाम देना शुरू कर दिया। जियो ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि पाकिस्तान के अलावा भारत खालिस्तान समर्थकों को भी निशाना बनाता है।गार्जियन के अनुसार, पाकिस्तान के दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि रॉ के एक एजेंट पर कई महीनों तक अखुंड के ठिकाने और गतिविधियों पर खुफिया जानकारी जुटाने के लिए फंडिंग देने का आरोप है। यह दावा किया जाता है कि मार्च 2022 के दौरान कराची में गोलीबारी को अंजाम देने के लिए अफगानिस्तान से लोगों को को बड़ी रकम दी गई थी। इस हमले के बाद वो वहां से गायब हो गए और बॉर्डर पार गए थे। हालांकि बाद में उन्हें पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने पकड़ लिया था।

पाकिस्तान में हो रही हत्याओं के लिए क्या बोले विदेश मंत्री एस जयशंकर?

हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान में हो रही हत्याओं के लिए एक बयान दिया है! भारत ने पाकिस्तान में हत्याओं की साजिश रचने के दावों का सख्ती से खंडन किया है। उन दावों को ‘भारत विरोधी झूठा और दुर्भावनापूर्ण प्रचार’ बताया है। यह प्रतिक्रिया उन आरोपों के मद्देनजर आई है, जिसमें भारत पर अपनी खुफिया एजेंसी रॉ के जरिए 2020 से पाकिस्तान में लगभग 20 हत्याओं में शामिल होने का आरोप लगा था। ब्रिटेश के अखबार द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय और पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों का हवाला देते हुए, कि ये कार्रवाइयां विदेशी धरती पर आतंकवादियों को खत्म करने के एक मिशन का हिस्सा थीं, जिसमें खालिस्तान आंदोलन को हवा देने वाले सिख अलगाववादियों को निशाना बनाना भी शामिल था। आरोप 2019 में पुलवामा हमले के बाद शुरू की गई एक रणनीति की ओर इशारा करते हैं, जिसका उद्देश्य आतंकी हमले के खतरे को पनपने से पहले ही बेअसर कर देना है।

दो भारतीय खुफिया अधिकारियों के अनुसार, विदेशों में रहकर भारत के खिलाफ साजिश करने वालों को निशाना बनाने की यह प्रक्रिया खुफिया मिशनों से प्रभावित थी, जिसमें मोसाद और केजीबी के साथ समानताएं थीं। हालांकि विदेश मंत्रालय ने इन दावों का स्पष्ट रूप से खंडन किया है। रिपोर्ट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पिछले बयान को दोहराया गया है एजेंसियों ने पकड़ लिया था।एक पाकिस्तानी अधिकारी ने गार्जियन को बताया, ‘पाकिस्तान में हत्याओं का आयोजन करने वाले भारतीय एजेंटों की यह नीति रातोंरात नहीं बनी है। हमारा मानना है कि उन्होंने यूएई में इन स्लीपर सेल को स्थापित करने के लिए लगभग दो साल तक काम किया है जो ज्यादातर फांसी का आयोजन कर रहे हैं। उसके बाद, हमने कई हत्याओं को देखना शुरू किया।’जिसमें उन्होंने कहा था विदेश में हुईं टारगेट किलिंग भारत सरकार की नीति के अनुरूप नहीं हैं। पाकिस्तानी जांचकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि ये हत्याएं भारतीय खुफिया स्लीपर सेल द्वारा की गई थीं, जो मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात से संचालित होती थीं, हत्याओं को अंजाम देने के लिए स्थानीय अपराधियों या जिहादियों को झूठे बहाने से नियुक्त करती थीं।

गार्जियन की रिपोर्ट में जाहिद अखुंड की हत्या का जिक्र है, जिसे जहूर मिस्त्री के नाम से जाना जाता है। जहूर घोषित आतंकवादी है, जिसने एयर इंडिया का एक विमान हाईजैक किया था। गार्जियन के अनुसार, पाकिस्तान के दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि रॉ के एक एजेंट पर कई महीनों तक अखुंड के ठिकाने और गतिविधियों पर खुफिया जानकारी जुटाने के लिए फंडिंग देने का आरोप है। यह दावा किया जाता है कि मार्च 2022 के दौरान कराची में गोलीबारी को अंजाम देने के लिए अफगानिस्तान से लोगों को को बड़ी रकम दी गई थी। इस हमले के बाद वो वहां से गायब हो गए और बॉर्डर पार गए थे। हालांकि बाद में उन्हें पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने पकड़ लिया था।एक पाकिस्तानी अधिकारी ने गार्जियन को बताया, ‘पाकिस्तान में हत्याओं का आयोजन करने वाले भारतीय एजेंटों की यह नीति रातोंरात नहीं बनी है। हमारा मानना है कि उन्होंने यूएई में इन स्लीपर सेल को स्थापित करने के लिए लगभग दो साल तक काम किया है जो ज्यादातर फांसी का आयोजन कर रहे हैं। उसके बाद, हमने कई हत्याओं को देखना शुरू किया।’

 हालांकि, रॉ के एक पूर्व सीनियर अधिकारी ने इस दावे का खंडन किया कि एजेंसी इन हत्याओं में शामिल थी। कार्रवाइयां विदेशी धरती पर आतंकवादियों को खत्म करने के एक मिशन का हिस्सा थीं, जिसमें खालिस्तान आंदोलन को हवा देने वाले सिख अलगाववादियों को निशाना बनाना भी शामिल था। आरोप 2019 में पुलवामा हमले के बाद शुरू की गई एक रणनीति की ओर इशारा करते हैं, जिसका उद्देश्य आतंकी हमले के खतरे को पनपने से पहले ही बेअसर कर देना है।गार्जियन के अनुसार, उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह की कार्रवाई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जानकारी के बिना नहीं होगी, जो बदले में प्रधानमंत्री को सूचित करेगा। सिख अलगाववादियों को निशाना बनाना भी शामिल था। आरोप 2019 में पुलवामा हमले के बाद शुरू की गई एक रणनीति की ओर इशारा करते हैं, जिसका उद्देश्य आतंकी हमले के खतरे को पनपने से पहले ही बेअसर कर देना है।कभी-कभी एजेंसी सीधे प्रधानमंत्री से बात करती है। उन्होंने कहा, ‘मैं उनकी मंजूरी के बिना कुछ नहीं कर सकता।’ उनका मानना है कि ये हत्याएं संभवतः पाकिस्तान द्वारा की गई थीं।

अदिति सिंह के लिए क्या बोली प्रियंका गांधी?

हाल ही में प्रियंका गांधी ने अदिति सिंह पर एक बयान दिया है! उत्तर प्रदेश के रायबरेली से भाजपा विधायक अदिति सिंह ने कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। समाचार एजेंसी एएनआई के साथ पॉडकास्ट में अदिति ने खुलासा किया है कि वह जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आईं तो प्रियंका ने उन्हें बदनाम करने की कोशिश की। आरोप है कि प्रियंका ने उस समय अदिति के पति अंगद सिंह पर पत्नी के चरित्र को लेकर लांछन लगाने का दबाव बनाया, तभी चुनाव में टिकट मिलेगा। रायबरेली में कांग्रेस से राजनीति शुरुआत करके फिर बीजेपी में शामिल हो चुकीं अदिति ने यह भी बताया कि अंगद सिंह से उनका तलाक हो चुका है। अंगद सिंह पंजाब के निवासी हैं और यहां की नवांशहर सीट से विधायक थे। अंगद सिंह 2017 में पहली बार विधायक चुने गए थे, उस समय वे कांग्रेस में थे। अदिति ने बताया कि पंजाब में टिकट बंटवारे के दौरान प्रियंका गांधी ने अंगद के सामने शर्त रखी कि वो अपनी पत्नी अदिति सिंह के कैरेक्टर को लेकर आरोप लगाएं।रायबरेली से भाजपा विधायक अदिति ने बताया कि जब वो 2017 में पहली बार विधायक बनी थीं तो संयोग से राहुल गांधी से भी उनकी मुलाकात हुई थी। उस दौरान राहुल गांधी ऐसे दिख रहे थे जैसे उन्हें किसी चीज की खबर ना हो और कोई जानकारी ना हो। इसी शर्त पर टिकट दिया जाएगा। पूर्व पति को अदिति के खिलाफ अपमानजनक बयान देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की गई।

अदिति का ही राजनीतिक घराने से ताल्लुकात है। अदिति सिंह के पिता बाहुबली अखिलेश कुमार सिंह 24 वर्षों तक रायबरेली विधायक बने रहे। अब उनकी बेटी दूसरी बार विधायक चुनी गई हैं। वह अब बीजेपी में शामिल हैं। उधर, अंगद सिंह के दादा दिलबाग सिंह छह बार नवांशहर के विधायक रहे हैं। अंगद के पिता प्रकाश सिंह और मां गरिकबाल कौर भी एक-एक बार विधायक रह चुकी हैं। राहुल गांधी ने अपना सिर ऊपर की तरफ उठाया और जोर-जोर से हंसने लगे। अदिति ने बताया कि उस समय वह चौंक उठी थीं। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में गांधी परिवार भी ज़्यादा अकड़ है। वे खुद को सबसे ऊपर समझते हैं। पिता अखिलेश सिंह की विरासत को संभाल रहीं अदिति सिंह रायबरेली से दो बार से विधायक हैं। पहली बार वह कांग्रेस से जीतकर आईं तो वहीं दूसरी बार भाजपा में शामिल होकर जीतीं।बता दें कि लखनऊ से सटे रायबरेली जिले में कांग्रेस के झंडे पर चुनाव जीतकर विधानसभा की राजनीति में एंट्री करने वाली अदिति सिंह ने अब गांधी परिवार को लेकर सनसनीखेज खुलासे किए हैं। अब भाजपा में शामिल हो चुकीं अदिति ने राहुल गांधी की राजनीतिक समझ को लेकर राज खोला है।

रायबरेली से भाजपा विधायक अदिति ने बताया कि जब वो 2017 में पहली बार विधायक बनी थीं तो संयोग से राहुल गांधी से भी उनकी मुलाकात हुई थी। उस दौरान राहुल गांधी ऐसे दिख रहे थे जैसे उन्हें किसी चीज की खबर ना हो और कोई जानकारी ना हो। अदिति सिंह ने बताया कि राहुल गांधी ने उस दौरान पूछा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से कितने विधायक हैं? अदिति सिंह ने जवाब में 7 की संख्या बताई। इसके बाद राहुल गांधी ने अपना सिर ऊपर की तरफ उठाया और जोर-जोर से हंसने लगे। अदिति ने बताया कि उस समय वह चौंक उठी थीं। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में गांधी परिवार भी ज़्यादा अकड़ है। वे खुद को सबसे ऊपर समझते हैं। पिता अखिलेश सिंह की विरासत को संभाल रहीं अदिति सिंह रायबरेली से दो बार से विधायक हैं। पहली बार वह कांग्रेस से जीतकर आईं तो वहीं दूसरी बार भाजपा में शामिल होकर जीतीं।

अदिति ने प्रियंका गांधी पर गंभीर आरोप लगाया। इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि पंजाब में टिकट बंटवारे के दौरान प्रियंका गांधी ने पति अंगद के सामने शर्त रखी कि वो अपनी पत्नी अदिति के कैरेक्टर को लेकर आरोप लगाएं। बता दे कि अंगद सिंह 2017 में पहली बार विधायक चुने गए थे, उस समय वे कांग्रेस में थे। अदिति ने बताया कि पंजाब में टिकट बंटवारे के दौरान प्रियंका गांधी ने अंगद के सामने शर्त रखी कि वो अपनी पत्नी अदिति सिंह के कैरेक्टर को लेकर आरोप लगाएं। इसी शर्त पर टिकट दिया जाएगा। पूर्व पति को अदिति के खिलाफ अपमानजनक बयान देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की गई। इसी शर्त पर टिकट दिया जाएगा। पूर्व पति को अदिति के खिलाफ अपमानजनक बयान देने के लिए दबाव बनाने की कोशिश की गई।

क्या रायबरेली की सीट पर रहेगा अखिलेश परिवार का ही राज?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि रायबरेली की सीट पर अखिलेश परिवार का ही राज रहेगा या नहीं! उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सूबे की सत्ता संचालित होती है। लेकिन लखनऊ के बगल में ही रायबरेली जिला है, जो देश की सत्ता की अहम धुरी रही है। इसकी वजह यहां पिछले कई दशकों से गांधी परिवार का राज रहा है। लेकिन इसी रायबरेली शहर में एक और सत्ता चलती रही है। वो सत्ता है अब दिवंगत हो चुके बाहुबली अखिलेश सिंह (Akhilesh Singh) की। रायबरेली सदर सीट पर अखिलेश फैमिली का ही राज रहा है। बीते 30-35 सालों से यही एक परिवार विधानसभा की जंग जीतता रहा है। चाहे गांधी परिवार के साथ हों या विरोध हो गया हो, इस एक परिवार की अपनी सत्ता कायम रही है। अब अखिलेश की बेटी अदिति सिंह (Aditi Singh) पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल रही हैं। वही अदिति जो अब प्रियंका और राहुल गांधी पर हमलावर तेवर अपना रही हैं। कांग्रेस के साथ राजनीति की शुरुआत करने वाली अदिति बाद में बीजेपी के साथ आ गईं। पहली बार कांग्रेस के बाद अब भाजपा से विधायक अदिति ने सीधा गांधी फैमिली पर अटैक शुरू किया है। राहुल गांधी की राजनीतिक समझ के साथ ही अदिति ने प्रियंका गांधी पर शादीशुदा घर तोड़ने की कोशिश का सनसनीखेज आरोप लगाया है। लोकसभा चुनाव के लिए अभी तक रायबरेली सीट से कोई उम्मीदवार फाइनल नहीं हुआ है लेकिन उससे पहले ही स्थानीय राजनीति तेज हो गई है।

अदिति सिंह का ही राजनीतिक घराने से ताल्लुकात है। अदिति के पिता बाहुबली अखिलेश कुमार सिंह 24 साल तक रायबरेली विधायक बने रहे। किसी के लिए वह रॉबिनहुड थे तो किसी के लिए बाहुबली। अखिलेश रायबरेली सदर सीट से कभी नहीं हारे। 1993 से 2017 तक पांच बार विधायक रहे। अब उनकी बेटी दूसरी बार विधायक चुनी गई हैं। अब वह भाजपा के साथ हैं। रायबरेली हमेशा से गांधी परिवार का गढ़ रहा, लेकिन इसी रायबरेली की सदर विधानसभा सीट पर अखिलेश सिंह की विधायकी रही। पहले कांग्रेस से और बाद में निर्दलीय फिर एक बार पीस पार्टी से। अखिलेश वैसे तो हमेशा गांधी फैमिली के लिए हनुमान की भूमिका में रहे। लेकिन बीच में रिश्ते बिगड़ने पर सोनिया और प्रियंका की तमाम कोशिशों के बावजूद भी उन्हें हराया नहीं जा सका।

अखिलेश सिंह के पिता धुन्नी सिंह की रायबरेली में प्रभावशाली और दबंग छवि थी। इंदिरा गांधी के करीबी माने जाते थे। धुन्नी सिंह की हत्या हुई थी। बाद में धुन्नी सिंह की हत्या करने वाले ज्यादातर लोगों की हत्या कर दी गई। अखिलेश सिंह पर भी कई मुकदमे दर्ज रहे। सैयद मोदी के कत्ल में भी नाम आया था, पर 1996 में वह बरी हो गए। रायबरेली के ही एक और बाहुबली और पूर्व मंत्री मनोज पांडेय से अखिलेश सिंह की अदावत रही। यह दुश्मनी 2019 को लोकसभा चुनाव से कुछ पहले ही खत्म हुई। मनोज पांडेय के भाई राकेश पांडेय की हत्या के बाद ही 2003 में अखिलेश को कांग्रेस से निकाला गया था। अखिलेश सिंह का स्वभाव सत्ता विरोधी भी रहा। एक बार एसपी ने उनके चचेरे भाई अशोक सिंह को सांसदी का टिकट दिया फिर टिकट काटते हुए अशोक को चुनाव लड़ाने से मना कर दिया। इस पर अखिलेश सिंह ने साफ कर दिया कि उनके भाई चुनाव तो लड़ेंगे ही। तब प्रदेश में एसपी की सरकार थी और अखिलेश को इसका खमियाजा भुगतना पड़ा था।

एनआई के साथ पॉडकास्ट में अदिति सिंह ने खुलासा किया है कि वह जब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आईं तो प्रियंका ने उन्हें बदनाम करने की कोशिश की। आरोप है कि प्रियंका गांधी ने उस समय अदिति के पति अंगद पर पत्नी के चरित्र को लेकर लांछन लगाने का दबाव बनाया, तभी चुनाव में टिकट मिलेगा। प्रियंका पर आरोप के बाद अदिति ने बताया कि जब वो 2017 में पहली बार विधायक बनी थीं तो संयोग से राहुल गांधी से भी उनकी मुलाकात हुई। उस दौरान राहुल गांधी ऐसे दिख रहे थे प्रियंका गांधी पर शादीशुदा घर तोड़ने की कोशिश का सनसनीखेज आरोप लगाया है। लोकसभा चुनाव के लिए अभी तक रायबरेली सीट से कोई उम्मीदवार फाइनल नहीं हुआ है लेकिन उससे पहले ही स्थानीय राजनीति तेज हो गई है।जैसे उन्हें किसी चीज की खबर और कोई जानकारी ना हो। अदिति ने बताया कि राहुल ने उस दौरान पूछा कि यूपी में कांग्रेस से कितने विधायक हैं? अदिति ने जवाब में 7 की संख्या बताई तो राहुल गांधी जोर-जोर से हंसने लगे। अदिति ने बताया कि उस समय वह चौंक उठी थीं।