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आखिर क्या है उत्तराखंड की लोकसभा सीटों का झमेला?

उत्तराखंड की लोकसभा सीटों का झमेला बढ़ता ही जा रहा है! लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में अब तक 26 प्रत्याशी मैदान में हैं। बुधवार को नामांकन का आखिरी दिन है। राष्ट्रीय पार्टियों के साथ-साथ क्षेत्रीय दल भी चुनाव में नामांकन के लिए जोर-शोर से जुटे हुए हैं। उत्तराखंड की पांचों सीटों पर वैसे तो जोरदार टक्कर है, लेकिन हरिद्वार संसदीय सीट हॉट सीट बन गई है। यहां दो-दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की प्रतिष्ठा की लड़ाई है। भाजपा से पूर्व मुख्यमंत्री तो कांग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे चुनाव मैदान में हैं। दोनों रावतों की लड़ाई में किसका वर्चस्व कायम रहेगा यह तो आने वाले समय ही बताएगा। हालांकि पांचों सीटों में से हरिद्वार पर मुकाबला कड़ा और रोचक होने जा रहा है। इस सीट पर सबसे ज्यादा प्रत्याशी चुनाव मैदान में है। उत्तराखंड में भाजपा ने जहां तीन सीटिंग सांसदों के साथ दो नए चेहरों को मौका दिया है। वहीं कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों को बदला है। कुछ नए चेहरों को जगह दी है। साथ ही दो युवाओं को प्रत्याशी बना कर युवा शक्ति को बढ़ावा देने का संदेश भी दिया है। हालांकि किसी महिला प्रत्याशी को टिकट न देने के कारण पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी है।

हरिद्वार लोकसभा सीट में दो-दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के बीच मुकाबला है। भाजपा ने पूर्व सीएम और कद्दावर नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व सीएम हरीश रावत की जिद के आगे घुटने टेकते हुए उनके बेटे वीरेंद्र रावत को अपना प्रत्याशी बनाया है। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खानपुर विधायक उमेश कुमार भी चुनाव मैदान में हैं। विधायक उमेश कुमार इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकते हैं, जबकि राजनीतिज्ञ इन तीनों में से कांग्रेस पार्टी को मजबूत मान रहे हैं, क्योंकि हरिद्वार में कांग्रेस के विधायक ज्यादा है। इसके चलते मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। बहुजन समाज पार्टी ने भी हरिद्वार सीट पर अपना प्रत्याशी उतारा है। बसपा ने यहां से पहले राज्य आंदोलनकारी और जनता कैबिनेट पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष भावना पांडे को अपना प्रत्याशी बनाया था। भावना पांडे के बसपा में आने से पार्टी के कार्यकर्ता नाराज हो गए, जिस पर पार्टी ने भावना पांडे को निष्कासित कर दिया। इसके बाद भावना पांडे भाजपा में शामिल हो गईं। बसपा ने मुजफ्फरनगर के मीरापुर से पूर्व विधायक मौलाना जमील अहमद कासमी को हरिद्वार संसदीय सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है।

टिहरी लोकसभा से भाजपा ने सिटिंग एमपी माला राज्य लक्ष्मी शाह को एक बार फिर प्रत्याशी बनाया है। भाजपा प्रत्याशी के सामने कांग्रेस के पूर्व विधायक जोत सिंह गुनसोला चुनाव मैदान में हैं। भाजपा जहां वर्तमान सांसद और प्रत्याशी के जीत का दम ठोक रही है, वहीं कांग्रेस के जोत सिंह गुनसोला राजशाही खत्म करने और संसदीय सीट पर कांग्रेस का कब्जा होने का दावा कर रहे हैं।

टिहरी संसदीय सीट से ही युवा नेता बॉबी पवार भी चुनाव मैदान में हैं, जिन्हें कई क्षेत्रीय दलों ने अपना समर्थन दिया है। बॉबी पवार उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष हैं और लंबे समय से उत्तराखंड के युवाओं की लड़ाई लड़ रहे हैं। बॉबी पंवार के नामांकन जुलूस में जौनसार के लोग भारी संख्या में शामिल हुए। हालांकि सवाल यह भी है कि नामांकन जुलूस में शामिल यह भीड़ वोटों में तब्दील हो सकेगी या नहीं। क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने कैडर वोट हैं, जिनके लिए पार्टियां आश्वत हैं कि उनका कैडर वोट कहीं नहीं खिसकेगा। हालांकि बॉबी पवार की रैली में उमड़ी अभूतपूर्व भीड़ केवल भीड़ साबित होगी या वोट बैंक में तब्दील होगी, यह चुनाव परिणाम ही बताएगा।

हालांकि बॉबी पंवार के नामांकन जुलूस में उमड़ी भीड़ ने राजनीतिज्ञ को भी के माथे पर भी चिंता की लकीरें डाल दी हैं। टिहरी लोकसभा सीट से डेमोक्रेटिव पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया ने भी अपना प्रत्याशी उतारा है। पार्टी प्रत्याशी रामपाल सिंह ने मंगलवार को अपना नामांकन कराया है।

उत्तराखंड में हरिद्वार के बाद पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट सबसे अधिक चर्चित सीट साबित हो रही है। इस सीट पर भाजपा ने पूर्व राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को टिकट दिया है। बलूनी पीएम मोदी के करीबियों में माने जाते हैं। वहीं उनके प्रतिद्वंदी के रूप में कांग्रेस ने पूर्व विधायक गणेश गोदियाल को चुनाव मैदान में उतारा है। एक ओर अनिल बलूनी को टिकट दिए जाने से जहां स्थानीय कार्यकर्ताओं में कुछ नाराजगी है तो वहीं स्थानीय नेता होने के कारण गणेश गोदियाल की ओर जनता का रुख देखा जा रहा है। गणेश गोदियाल की श्रीनगर गढ़वाल क्षेत्र में अच्छी पहुंच है। पौड़ी लोकसभा सीट में आने वाले बद्रीनाथ क्षेत्र के विधायक राजेंद्र भंडारी कुछ दिनों पहले ही भाजपा में शामिल हो गए हैं, लेकिन उनके समर्थक अभी भी कांग्रेस में हैं। जिसका असर इस चुनाव में देखा जा सकता है।

नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा सीट पर सिटिंग सांसद अजय भट्ट और युवा प्रत्याशी प्रकाश जोशी के बीच का मुकाबला होने जा रहा है। सिटिंग एमपी अजय भट्ट अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहे हैं तो वहीं राहुल गांधी के करीबियों में से एक माने जाने वाले प्रकाश जोशी इस संसदीय चुनाव में जीत को लेकर चुनाव मैदान में उतरे हैं। इनके अलावा बसपा प्रत्याशी अख्तर अली माहीगीर भी चुनाव मैदान में हैं। बसपा प्रदेश अध्यक्ष शीशपाल चौधरी के अनुसार बसपा ने नैनीताल-उधम सिंह नगर से अपने कैडर कार्यकर्ता को प्रत्याशी बनाया है। अख्तर अली 1984 से बसपा से जुड़े हुए हैं और विभिन्न पदों पर रह चुके हैं। हालांकि मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है, लेकिन यह भी तय है कि बसपा प्रत्याशी इन राष्ट्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।

उधर भाजपा ने स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर दी है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अनुराग ठाकुर, स्मृति ईरानी, वीके सिंह, दुष्यंत कुमार, नायब सिंह सैनी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, तीरथ सिंह रावत, विजय बहुगुणा सहित 40 नेताओं के नाम शामिल हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से फिलहाल स्टार प्रचारकों की कोई सूची नहीं आई है। 26 मार्च तक कुल 26 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। टिहरी गढ़वाल में 6, पौड़ी गढ़वाल में 8, अल्मोड़ा में 3, नैनीताल में 3 और हरिद्वार में 6 नामांकन हो चुके हैं। आज नामांकन के आखिरी दिन की स्थिति शाम तक साफ हो पाएगी लेकिन सबसे ज्यादा प्रत्याशी पौड़ी गढ़वाल में हैं। यहां पर मुकाबला मुकाबला भी काफी रोचक होने जा रहा है क्योंकि अधिकांश लोग भाजपा प्रत्याशी को पैराशूट प्रत्याशी बताते हुए मशहूर गढ़वाली गीत गा रहे हैं। यह जरूर हो सकता है कि मोदी लहर में भाजपा प्रत्याशी इस चुनावी नैया को पार कर ले लेकिन यह भी तय है की जीत का अंतर बेहद कम होगा।

जानिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अद्भुत कहानी!

आज हम आपको पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं! पूर्व प्रधानमंत्री और महान अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह की औपचारिक राजनीति से अलविदा होने का दिन आ गया है। आज वो राज्यसभा से रिटायर हो जाएंगे। संसद के उच्च सदन के सदस्य के रूप में उनके छह वर्षों के कार्यकाल का आज आखिरी दिन है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद कहा था कि ‘इतिहास उनकी समीक्षा करते वक्त दयाभाव रखेगा।’ अब राजनीति के क्षेत्र में इतिहास बनने जा रहे मनमोहन सिंह की समीक्षा का वक्त आ गया है। मनमोहन सिंह को जानने-समझने वाले बाकियों की बात बाद में, लेकिन पहले उनके बयान का जिक्र कर लेते हैं जिनके बारे में खुद मनमोहन सिंह ने अपनी आखिरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलकर राय रखी थी। वो शख्सियत कोई और नहीं बल्कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। तारीख थी 8 फरवरी, 2024। राज्यसभा के कुछ सदस्यों को विदाई देने का मौका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदाई भाषण दे रहे हैं। रिटायर हो रहे सदस्यों के बारे में बारी-बारी से चर्चा कर रहे हैं। अब बारी आई है मनमोहन सिंह की। मोदी कहते हैं, ‘मैं विशेष रूप से माननीय डॉ. मनमोहन सिंह जी का उल्लेख करना चाहूंगा। उन्होंने छह बार इस सदन में अपने मूल्यवान विचार रखे। सदन के नेता के रूप में और प्रतिपक्ष के नेता के रूप में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।’ पीएम मोदी मनमोहन सिंह के एक सांसद का दायित्व निभाने को लेकर काफी अभिभूत हैं। वो मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं। मोदी कहते हैं, ‘मुझे याद है, उस सदन के अंदर पिछले कुछ दिनों में एक वोटिंग का अवसर था। पता था कि विजय ट्रेजरी बेंच की होने वाली है, अंतर भी बहुत था। लेकिन डॉक्टर मनमोहन सिंह जी व्हीलचेयर में आए, वोट किया। एक सांसद अपने दायित्व के लिए कितना सजग है, इसका वो उदाहरण हैं। वो प्रेरक उदाहरण हैं। इतना ही नहीं, कभी कमिटी मेंबर्स के चुनाव हुए, वो व्हीलचेयर में वोट देने आए। सवाल यह नहीं है कि किसको ताकत देने के लिए वो आए थे। मैं मानता हूं कि वो लोकतंत्र को ताकत देने आए थे। इसलिए आज विशेष रूप से उनके दीर्घायु जीवन के लिए हम सबकी तरफ से प्रार्थना करता हूं। वो निरंतर हमारा मार्गदर्शन करते रहें, हमें प्रेरणा देते रहें।’

मोदी ने कभी मनमोहन पर जोरदार तंज भी कसा था। संभवतः उसी परिप्रेक्ष्य में कहा, ‘वैचारिक मतभेद, कभी बहस में छींटाकसी, वो तो बहुत अल्पकालीन होती है। लेकिन इतने लंबे अर्से तक जिस प्रकार से उन्होंने इस सदन का मार्गदर्शन किया है, देश का मार्गदर्शन किया है, जब भी हमारे लोकतंत्र की चर्चा होगी, तो कुछ माननीय सदस्यों चर्चा होगी, उसमें माननीय मनमोहन सिंह के योगदान की चर्चा जरूर होगी।’ मनमोहन को एक प्रेरक शख्सियत बताकर बाकी सांसदों को सुझाव भी देते हैं। मोदी कहते हैं, ‘चाहे इस सदन में हों या उस सदन में, जो आज नहीं हैं शायद भविष्य में आने वाले हैं, मैं सभी सांसदों से ये जरूर कहूंगा कि ये जो माननीय सांसद होते हैं, किसी भी दल के क्यों न हों, जिस प्रकार से उन्होंने अपने जीवन को कंडक्ट किया होता है, जिस प्रकार की प्रतिभा के दर्शन उन्होंने अपने कार्यकाल में कराए होते हैं, उससे हमें एक गाइडिंग लाइट के रूप में सीखने का प्रयास करना चाहिए।’

दरअसल, मनमोहन सिंह ने दिल्ली सर्विस बिल पर वोटिंग करने व्हिलचेयर पर आए थे। उस वक्त मनमोहन सिंह काफी कमजोर दिख रहे थे। उनकी तस्वीर देश ने देखा तो बरबस उनकी तारीफ किए नहीं रहा। हां, एक बार मन में यह भी सवाल आया कि क्या जरूरत थी इस हाल में आने की जब उनके वोट से हार-जीत पर कोई फर्क पड़ना नहीं था। जो ऐसा सोच रहे होंगे, उन्हें पीएम मोदी ने मनमोहन के उस हाल में भी संसद आने का मर्म समझा दिया। ध्यान रखिए,

मनमोहन सिंह के लिए उस व्यक्ति ने ये बातें कहीं जिनके लिए मनमोहन से 4 जनवरी, 2014 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल किया गया था। तब मनमोहन ने टके सा जवाब देते हुए कहा था, ‘नरेंद्र मोदी के गुण-दोष पर बहस किए बिना, मेरा पक्का यकीन है कि उनका प्रधानमंत्री बनना देश के लिए विनाशकारी साबित होगा।’

ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह की तारीफ करने वाले पीएम मोदी विपक्ष के अकेले नेता हैं। मोदी मंत्रिमंडल के ही सबसे चर्चित मंत्रियों में एक नितिन गडकरी ने नवंबर, 2022 में कहा था कि आर्थिक सुधारों के लिए देश मनमोहन सिंह का कर्जदार रहेगा। कौन भूल सकता है कि 1990 के दशक की शुरुआत भारत के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जब देश को भुगतान संतुलन के गंभीर संकट का सामना करना पड़ा। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लाइसेंस-कोटा राज से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। अभूतपूर्व आर्थिक सुधारों के लिए उनकी नीतियां सरकारी नियंत्रण को कम करने, विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने और व्यापार व्यवस्था में सुधार पर केंद्रित थीं। इन सुधारों ने न केवल संकट को टाला बल्कि भारत को मजबूत आर्थिक विकास के मार्ग पर भी स्थापित किया।

वर्ष 2004 का लोकसभा चुनाव आया जिसमें सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी कांग्रेस पार्टी ने पहली बार गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने का फैसला किया। चुनाव बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का गठन हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इसकी अध्यक्ष बनीं। सोनिया का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए उछला। तभी विदेशी मूल का मुद्दा छा गया और सोनिया ने मनमोहन सिंह का नाम आगे कर दिया। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और सोनिया राष्ट्रीय सलाहकार

परिषद (NAC) की चेयरपर्सन बन गईं। मनमोहन सिंह सरकार 2009 में दोबारा सत्ता में लौटी। मनमोहन सिंह की 10 वर्षों की सरकार ने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं जिनमें एक बेहद महत्वपूर्ण भारत-अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर डील थी। मनमोहन ने अपने कार्यकाल के बाद मीडिया ब्रीफिंग में खुद भी इसे अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बताई। मनमोहन सरकार के खाते में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), सूचना का अधिकार कानून (RTI), यूनिवर्सल आइडी कार्ड आधार जैसी अन्य बड़ी उपलब्धियां हैं।

हाल में मनमोहन की तारीफ करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक सात वर्ष पहले मनमोहन सिंह की बहुत कड़ी आलोचना की थी। वो तारीख थी 9 फरवी, 2017। तब पीएम मोदी ससंद का निम्न सदन लोकसभा में खड़े थे। उन्होंने मनमोहन सिंह के लिए जो कहा, वो हमेशा-हमेशा के लिए एक यादगार बयान बन गया है। मोदी ने कहा, ‘डॉ. मनमोहन सिंह जी पूर्व प्रधानमंत्री हैं, आदरणीय व्यक्ति हैं। पिछले 30-35 साल से भारत के आर्थिक निर्णयों से उनका सीधा संबंध रहा है और निर्णायक भूमिका में रहा है। 35 साल तक। इस देश में शायद ही कोई ऐसा अर्थजगत का व्यक्ति होगा जिसने हिंदुस्तान की आजादी के 70 साल में आधा समय एक ही व्यक्ति का इतना दबदबा रहा है और इतने घोटालों की बातें आ रही हैं। लेकिन खासकर हम राजनेताओं को डॉ. साहब से बहुत कुछ सीखने जैसा है। इतना सारा हुआ लेकिन उन पर एक दाग नहीं लगा। बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाना, ये कला तो डॉक्टर साहब ही जानते हैं और कोई नहीं जानता।’

तो क्या मनमोहन सिंह ने एक अर्थशास्त्री के रूप में इतने लंबे वक्त तक प्रभावी पदों पर रहकर जो योगदान दे सके, वो उम्मीद से कम हैं? आरबीआई के पूर्व गवर्नर और मनमोहन सिंह सरकार की आर्थिक सलाहकार परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष सी रंगराजन से जुड़ा एक वाकया याद आता है। मनमोहन के दूसरे कार्यकाल के आखिरी वर्षों में डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट आ रही थी। एक पत्रकार ने पीएम से इस बारे में पूछ लिया तो उन्होंने सीधा उत्तर देने के बाद सी रंगराजन से शिकायत की कि उनसे रुपये के बारे में पूछा जा रहा है। तब रंगराजन ने सामान्य प्रतिक्रिया दी, लेकिन बाद में अपने करीबी से बोले, ‘एक सफल अर्थशास्त्री के रूप में पहचाने जाने वाले प्रधानमंत्री की ऐसी बात चौंकाने वाली थी।’

जब पाकिस्तान शरणार्थी की बच्ची ने आईआईटी में कर दिया कमाल?

हाल ही में एक पाकिस्तान शरणार्थी बच्ची ने आईआईटी में कमाल कर दिया है! सिर्फ कक्षा V और कक्षा VI में सरकारी स्कूल की छात्रा हैं। वे आईआईटी दिल्ली के टेक्निल फेस्ट में भाग लेने वाले इंजीनियरिंग योग्यता वाले छात्रों के आसपास भी नहीं है। इसके बावजूद 9 से 12 साल की उम्र की इन चार लड़कियों ने आईआईटी दिल्ली के प्रतिष्ठित ट्राइस्ट 2024 में सीनियर स्टूडेंट्स के साथ सम्मानपूर्वक प्रतिस्पर्धा की। ये लड़कियां पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों में से एक हैं। इन्होंने टेक फेस्ट में अपने रोबॉट से सबको प्रभावित किया। संध्या कुमारी, मुस्कान, रेशमा भील और आरती राजस्थान के जोधपुर से आईआईटी दिल्ली फेस्ट में शामिल होने आई थीं। ये इस प्रतियोगिता में सबसे कम उम्र की प्रतियोगी भी रहीं। इन लड़कियों ने एक ‘ग्रिपर बॉट’ डेवलप किया है। इस रोबोट को वस्तुओं को पकड़ने और बाधाओं के माध्यम से नेविगेट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह रोबोट इन लड़कियों की रोबोटिक्स विज्ञान की समझ और अनुप्रयोग को प्रदर्शित करता है। उनके प्रोजेक्ट ने प्रतियोगिता में आवश्यक सभी कार्य पूरे कर लिए हैं। इन लड़कियों को अब फाइनल रिजल्ट का इंतजार है। चार लड़कियों की उपलब्धि और भी अधिक सराहनीय है क्योंकि वे उन परिवारों से हैं जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न के डर से पाकिस्तान से भागने के बाद भारत में शून्य से शुरुआत करनी पड़ी थी। ऐसी एडवांस तकनीक के साथ उनका जुड़ाव सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन नामक जोधपुर एनजीओ द्वारा किया गया था। इनकी देखरेख में ही बच्चों को असीम आत्मविश्वास दिया।

आईआईटी-डी में बीटेक ऊर्जा विज्ञान तृतीय वर्ष की छात्रा और ट्राइस्ट 2024 की समन्वयक रितिका सिंह ने कहा कि मुख्य रूप से, ट्रिस्ट कॉलेज के छात्रों के लिए है। हालांकि कभी-कभी ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के छात्र भी भाग लेते हैं। उन्होंने बताया कि इन लड़कियों को जिस मानदंड का पालन करना था, वह यह था कि उनके पास एक ग्रिपर बॉट होना चाहिए जो बाधाओं को लेकर काम कर सकते। रीतिका सिंह ने बताया कि अपने स्तर पर कई अन्य प्रतिभागियों की तुलना में, लड़कियों ने एक्टिविटी की सीरीज पूरी की। जबकि कई टीमें प्रतिस्पर्धा करने में भी सक्षम नहीं थीं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में बच्चे थोड़े शर्मीले थे लेकिन हमने उन्हें सहज बनाया और उनमें तेजी से आत्मविश्वास आया!

इन बच्चियों ने नमस्कार के साथ लोगों का अभिवादन किया। उन्होंने खुशी-खुशी अपने अनुभव साझा करते हुए, आईआईटी-दिल्ली में स्वागत योग्य माहौल की सराहना की। उन्होंने कहा, दीदी और भाइयों ने उन्हें प्रेरित किया। छठी कक्षा की छात्रा संध्या ने मुस्कुराते हुए बताया कि मुझे रोबोट पर काम करना पसंद है। संध्या ने कहा कि अब मैं अधिक जटिल रोबोट बनाना और संचालित करना सीख रही हूं। उन्होंने कहा कि शुरुआत में यह थोड़ा मुश्किल था। सबसे कठिन हिस्सा बाधाओं को दूर करते समय वस्तु को न गिराना था। लेकिन अनगिनत अभ्यास सत्रों के साथ, हमने इसे बनाया। इस घटना के बाद मेरे और बस्ती के अन्य परिवारों ने शिक्षा को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है।

छठी कक्षा की छात्रा मुस्कान के पिता 2015 में सिंध के मीरपुर से आकर साइकिल मरम्मत की दुकान खोली थी। मुस्कान ने कहा कि मैं भी बड़ी होकर आईएएस अधिकारी बनना चाहती हूं। जब उनका परिवार पाकिस्तान से आया था उस समय मुस्कान महज एक साल की थीं। केवल मुस्कान के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट है क्योंकि उसका जन्म उसी देश में हुआ था। बाकी तीन किसी देश के नागरिक नहीं हैं। मुस्कान के पिता कमलजी ने खुशी से कहा कि मैंने कभी आईआईटी के बारे में नहीं सुना था और न ही कभी सपना देखा था कि मेरी बेटी इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करेगी। उन्होंने कहा कि हम सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन के आभारी हैं, जिसने मेरे बच्चे की क्षमता को पहचाना। पाकिस्तान में हमारे गांव में कोई स्कूल नहीं था और हर कोई बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित था। लेकिन यहां भारत में, हम एक उज्ज्वल भविष्य का सपना देख सकते हैं। कमलजी ने कहा कि वह अपनी बेटी को वह सम्मान हासिल करते देखने के लिए डबल शिफ्ट में काम करने को तैयार हैं जिसे वह कभी हासिल नहीं कर सकते।

पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली रेशमा और आरती अपनी उपलब्धि से खुश थीं। रेशमा ने कहा कि मुझे लगता है कि अब हम अधिक जटिल रोबोटों पर काम कर सकते हैं, शायद जिसकी गति अधिक हो। एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी आरती ने कहा कि हमने आवश्यक कार्य पूरे कर लिए, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रैक्टिस करने की आवश्यकता है कि अगली बार हम इसे और अधिक स्पीड से करें। आईआईटी-गुवाहाटी और आईआईएम-कोलकाता से स्नातक और सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन के संस्थापक संजीव नेवार के अनुसार, चार लड़कियों ने लचीलेपन और आशा की एक कहानी स्थापित की थी। इन्होंने प्रवासियों के परिवारों के बीच शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति को रेखांकित किया था, जो अब प्रेरित हैं अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर चुके हैं।

क्या INDIA गठबंधन में फिर से हो रही है बगावत?

वर्तमान में INDIA गठबंधन में एक बार फिर से बगावत हो रही है! लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग में कुछ ही दिन बाकी है और उससे पहले जम्मू- कश्मीर भी उस सूची में शामिल हो गया है जहां I.N.D.I.A गठबंधन के सहयोगी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने कश्मीर में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। मुफ्ती ने कहा नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हमारे लिए उम्मीदवार खड़ा करने और चुनाव लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। इससे पूर्व भी दूसरे राज्यों में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। यूपी, बिहार और बंगाल इन तीन राज्यों में भी मामला ठीक नहीं है। बंगाल में तो पहले ही बात नहीं बनी और बिहार में सीट बंटवारे के ऐलान के बाद भी सब कुछ ठीक नहीं। वहीं यूपी जैसे बड़े राज्य में एक नया गठबंधन बनने से ‘इंडिया’ गठबंधन की चुनौती और भी बढ़ गई है। अभी हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी दलों की ओर से एकजुटता दिखाने की कोशिश हुई लेकिन ऐसा लग रहा है कि देश की राजधानी से दिया गया संदेश राज्यों तक नहीं पहुंच रहा है। पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा कि विपक्षी दलों के गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायन्स की घटक नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पीडीपी के पास कश्मीर की सभी तीन लोकसभा सीट पर उम्मीदवार खड़े करने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हाल में ऐलान किया था कि वह सभी तीनों सीट पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इंडिया गठबंधन में हुए सीट बंटवारे के तहत जम्मू की दो सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दीं। मुफ्ती ने कहा उन्होंने उम्मीदवार खड़ा करने और चुनाव लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व का रवैया निराशाजनक और आहत करने वाला है। उन्होंने कहा जब मुंबई में इंडिया गठबंधन की मीटिंग तो मैंने वहां कहा कि चूंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला हमारे वरिष्ठ नेता हैं, इसलिए वह सीट बंटवारे पर फैसला करेंगे और इंसाफ करेंगे। मुझे उम्मीद थी कि वह पार्टी हितों को एक तरफ रख देंगे। लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कश्मीर में सभी तीन सीट पर चुनाव लड़ने का एकतरफा फैसला लिया।

इंडिया’ गठबंधन से अलग होकर अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल ने एक नया गठबंधन बनाया है। अपना दल (कमेरावादी) और मजलिस—ए—इत्तेहाद—उल—मुस्लिमीन (AIMIM) के बीच नया गठबंधन बना है। इतना ही नहीं पल्लवी पटेल ने कहा है कि राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के नेता एवं पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य का आशीर्वाद उनके साथ है और वे साथ मिलकर सामाजिक न्याय के लिये मजबूत लड़ाई लड़ेंगे। पल्लवी पटेल ने कहा कि उनके ‘पिछड़ा, दलित, मुसलमान न्याय मोर्चा’ ने जनभावनाओं की लगातार अनदेखी कर रही सरकार और विपक्ष के ‘बड़े लोगों’ के खिलाफ जनता को एक विकल्प दिया है। उन्होंने कहा हम तो लगातार विपक्षी इंडिया गठबंधन के अभिन्न अंग के रूप में काम कर ही रहे थे, लेकिन आप लोगों ने देखा कि किस प्रकार हम लोगों को धोखा दे दिया गया। धोखा भी ऐसे वक्त पर दिया गया जब चुनावी गतिविधियां पूरे देश में काफी तेज हैं। हम राजनीतिक दल हैं तो हमें अपना रास्ता तो बनाना ही होगा और उसी के परिणामस्वरुप हमने यह गठबंधन बनाया है। हमने इस प्रदेश की जनता को एक विकल्प देने का काम किया है। इस सवाल पर कि क्या सपा छोड़कर राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी का झंडा थामने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य को भी पिछड़ा, दलित, मुसलमान न्याय मोर्चा में शामिल किया जाएगा, पटेल ने कहा, मोर्चा में हमने सभी का स्वागत किया है और रही बात स्वामी प्रसाद मौर्य जी की तो वह अपने आप में सामाजिक न्याय की एक लंबी लड़ाई लड़ने वाले बहुत ही उच्च स्तर के नेता हैं तो उनको कैसे कोई किनारे कर सकता है। वह हमारे साथ हैं।

बिहार के महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भले ही राज्य की 40 लोकसभा सीटों में से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) 26 और कांग्रेस 9, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) तीन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है लेकिन पूर्णिया सीट सीट ने पूरे बिहार में महागठबंधन की टेंशन बढ़ा दी है। घोषणा के अनुसार, कांग्रेस को पूर्णिया लोकसभा छोड़ने के लिए मजबूर किया गया जहां से राज्यसभा सदस्य रंजीत रंजन के पति पप्पू यादव को चुनाव लड़ने की उम्मीद थी। पप्पू यादव ने दावा किया है कि उन्हें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने कांग्रेस से टिकट मिलने का आश्वासन दिया था। पूर्णिया सीट से बीमा भारती को उम्मीदवार बनाया है जिन्होंने अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। वहीं पप्पू यादव अब भी अपनी जिद पर कायम हैं और कहा है कि मर जाएंगे लेकिन पूर्णिया नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने कहा है कि वे किसी भी कीमत पर पूर्णिया से चुनाव लड़ेंगे। उनकी ओर से आरजेडी पर भी आरोप लगाए गए और कहा कि राजनीति बहुत गंदी हो गई है।

आखिर जनता क्यों करती है ट्रोल ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जनता ट्रोल क्यों करती है! मुंबई इंडियंस के नए कप्तान पांड्या आजकल कई दिक्कतों से जूझ रहे हैं। एक तरफ लगातार तीन मैच हारकर उनकी टीम इस वक्त आईपीएल प्वाइंट्स टेबल में आखिरी पायदान पर है। वहीं दूसरी तरफ हार्दिक को इस आईपीएल सीजन में ग्राउंड पर हूटिंग और सोशल मीडिया पर भद्दी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। रोहित शर्मा की जगह कप्तान बनाए जाने के बाद से ही हार्दिक हेटर्स के निशाने पर हैं। हार्दिक पांड्या को ग्राउंड से लेकर सोशल मीडिया तक, हेटर्स बुरी तरह जलील कर रहे हैं। कोई उन्हें छपरी कह रहा है तो कोई उन्हें ‘बेवफा’ बोल रहा हैं। हेटर्स मर्यादा की सीमा लांघकर पांड्या पर ऐसे-ऐसे शब्दों के बाण चला रहे हैं, जिनका सभ्य समाज में जिक्र तक नहीं किया जा सकता। आखिर पांड्या का कसूर क्या है? अगर एक युवा खिलाड़ी अपने करियर की बेहतर संभावनाओं की तलाश में एक टीम को छोड़कर दूसरी टीम में शामिल हो जाता है तो इसमें कौन सा गुनाह है? दरअसल पांड्या आईपीएल की ‘गुजरात टाइटंस’ टीम को छोड़कर ‘मुंबई इंडियंस’ टीम में बतौर कप्तान शामिल हुए हैं। लेकिन हेटर्स उन पर ऐसे हमला बोल रहे हैं कि जैसे वो इंडिया की जगह पाकिस्तान से खेल रहे हैं। हेटर्स मुंबई इंडियंस की हार का गुस्सा पांड्या पर भद्दे-भद्दे कमेंट करके निकाल रहे हैं। मुंबई इंडियंस की टीम इससे पहले भी आईपीएल मैच लगातार हारती रही है, इसमें कोई नई बात नहीं है। बाकी टीमें भी हारती हैं, लेकिन हार्दिक को जिस तरह से मैदान से लेकर सोशल मीडिया तक ट्रोल किया जा रहा है, वो परेशानी की बात है। हेटर्स को सोचना होगा अल्फाजों के जरिए किसी की ‘मॉब लिचिंग’ का अधिकार किसी के पास नहीं है। जब सड़क पर किसी एक शख्स को लोगों की भीड़ मिलकर पीटती है तो उसे ‘मॉब लिंचिंग’ कहा जाता है। सड़क पर मॉब लिचिंग से शरीर जख्मी होता है। लेकिन अल्फाजों के जरिए एक शख्स को टारगेट करना और उसपर भद्दे-भद्दे कमेंट करना दिल और दिमाग दोनों को हिलाकर रख देता है। शायद पांड्या भी आजतक इसी दर्द से गुजर रहे हैं। पांड्या ये तकलीफ झेलने वाले कोई पहले शख्स नहीं है। बॉलीवुड और सोशल मीडिया स्टार भी आए दिन हूटिंग और ट्रोलिंग का शिकार होते हैं। फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत समेत कई सेलिब्रिटी भी इस तकलीफ को झेल चुके हैं। वहीं एल्विश यादव, अंजलि अरोड़ा समेत अन्य सोशल मीडिया स्टार भी हूटिंग और ट्रोलिंग के दर्द को अच्छे से समझते हैं। यहां सवाल खड़ा होता है कि एक भीड़ को किसी के चरित्र का चीरहरण का अधिकार कौन देता है? भीड़ मानसिकता एक दीमक की तरह है जो धीरे-धीरे सभ्य समाज की पंरपराओं और मर्यादाओं को खा रही हैं।

आज हम सोशल मीडिया के युग में जी रहे है। इंटरनेट पर साइबर क्राइम के अलावा एक और बड़ी समस्या है, जो अब खतनाक रूप धारण करती जा रही है। हंसी मजाक और टांग खींचने से शुरु हुआ ट्रोलिंग, अब इंटरनेट के बदलते स्वरूप के चलते चरित्र हनन जैसी गंभीर समस्या बनता जा रहा है।

सोशल मीडिया पर लोग अपना असली नाम छिपाकर दूसरों को आसानी से परेशान कर सकते हैं। ये ट्रोलिंग कई कारणों से हो सकती है। कभी-कभी ध्यान खींचने के लिए, कभी-कभी मनोरंजन के लिए, बदला लेने के लिए, या फिर बोरियत मिटाने के लिए। लेकिन इस बात के बारे में सोचना होगा कि आपकी ट्रोलिंग से किसी को गंभीर परेशानी हो सकती है। जब सोशल मीडिया पर किसी को टारगेट कर ट्रोल किया जाता है तो ट्रोलिंग का शिकार हो रहा है शख्स घबराहट , डिप्रेशन, समाज से कट जाना , गहरे सदमे में जाना, खाने की आदतों में बदलाव , नशे की चीज़ों का इस्तेमाल, खुद को कमतर समझना आदि मानसिक परेशानियों की चपेट में आ सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत सभी नागरिकों को अपने विचार रखने की आजादी दी गई है और सोशल मीडिया के जरिए लोगों ने इस आजादी का इस्तेमाल भी किया है। लेकिन, इस आजादी की भी एक सीमा है और इसमें दूसरे कानूनों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब समेत अन्य सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंटेंट, भड़काऊ कंटेंट या फिर अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत पैदा करने वाला कंटेंट शेयर नहीं कर सकते। भारत के आईटी नियम के अनुसार साइबर क्राइम में सजा का प्रावधान है। ये सजा 3 साल से लेकर आजीवन कारावास तक है।साथ ही जुर्माने का प्रावधान एक लाख से 10 लाख रुपए तक है।

जब किसी एक शख्स को सरेआम भीड़ की ओर से मानसिक यातनाएं दी जाती है। भद्दे-भद्दे कमेंट और गाली गलौज की जाती है। सोशल मीडिया पर मीम्स और जोक्स बनाकर हमला बोला जाता है। तब पीड़ित शख्स के अलावा पीड़ित शख्स का पूरा परिवार डिप्रेशन में आ जाता है। सोचिए जब किसी शख्स पर भद्दी-भद्दी टिप्पणी की जाती हैं तो उस शख्स की बहन को कैसा लगता होगा? उस शख्स की मां क्या महसूस करती होगी? उस शख्स के पिता को कैसा फील होता होगा? उसकी पत्नी और बच्चे कितना घुटते होंगे? हेटर्स आगे से किसी को टारगेट करने से पहले इन सवालों का जवाब खुद से जरूर मांग लें।

क्या बीजेपी में आकर नेताओं के धुल जाते हैं पाप?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी में आकर नेताओं के पाप धुल जाते हैं या नहीं! देश में लोकसभा चुनाव को लेकर हलचल काफी तेज है। चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। दरअसल शराब घोटाले के आरोप में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल तिहाड़ जेल में बंद हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी विपक्षी दलों के नेताओं को चुन-चुनकर टारगेट कर रही है। बीजेपी में शामिल होने के बाद नेताओं से भ्रष्टाचार के आरोप हटा लिए जा रहे हैं। इस बीच इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में है कि 2014 के बाद से कथित भ्रष्टाचार के लिए विपक्ष के 25 नेता जो केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का सामना कर रहे थे, बीजेपी में शामिल हुए और उनमें से 23 को राहत मिल गई। उनके खिलाफ जांच या तो बंद हो गई या ठंडे बस्ते में चली गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है कि 2014 के बाद जिन प्रमुख राजनेताओं का जिक्र किया जा रहा है, वे विपक्षी दलों से बीजेपी में शामिल हो गए थे। इनमें से 10 कांग्रेस से हैं, एनसीपी और शिवसेना से चार-चार, टीएमसी से तीन, टीडीपी से दो और समाजवादी पार्टी और वाईएसआरसीपी से एक-एक नेता शामिल है। विपक्षी दलों के पार्टी बदलने के बाद जांच एजेंसी की कार्रवाई अमूमन निष्क्रिय रही है। इस सूची में शामिल 6 राजनेता आम चुनाव से कुछ हफ्ते पहले अकेले इसी साल बीजेपी में गए हैं। 2022 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच से पता चला था कि 2014 के बाद जब एनडीए सत्ता में आया तो कैसे प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो ने 95 प्रतिशत प्रमुख विपक्षी राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई की। विपक्ष इसे ‘वॉशिंग मशीन’ के जरिए भ्रष्टाचार के आरोपों को धोने की कवायद बताता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 और 2023 की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान केंद्रीय कार्रवाई का एक बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र पर केंद्रित था। 2022 में एकनाथ शिंदे गुट ने शिवसेना से अलग होकर बीजेपी के साथ नई सरकार बना ली। एक साल बाद अजित पवार गुट एनसीपी से अलग हो गया और सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन में शामिल हो गया। अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल के मामले भी बंद हो गए हैं। कुल मिलाकर महाराष्ट्र के 12 प्रमुख राजनेता 25 की सूची में हैं, जिनमें से 11 नेता 2022 या उसके बाद बीजेपी में चले गए, जिनमें एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस के चार-चार शामिल हैं। इनमें से कुछ मामले गंभीर हैं।

शुभेंदु अधिकारी इस समय पश्चिम बंगाल में बीजेपी के कद्दावर नेता और नेता प्रतिपक्ष हैं। ममता सरकार में मंत्री रहे शुभेंदु से सीबीआई ने शारदा घोटाला मामले में पूछताछ की थी। टीएमसी आरोप लगाती रही है कि जब अधिकारी टीएमसी में थे तो जांच एजेंसियां उन्हें परेशान करती थी लेकिन, बीजेपी में जाते ही उन्हें क्लीन चिट मिल गई। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खिलाफ मामले भी अटके हुए हैं। हिमंता को 2014 में सारदा चिटफंड घोटाले में सीबीआई की पूछताछ और छापेमारी का सामना करना पड़ा था, लेकिन 2015 में उनके बीजेपी में शामिल होने के बाद से उनके खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ा है। चव्हाण इस साल बीजेपी में शामिल हो गए, जबकि आदर्श हाउसिंग मामले में सीबीआई और ईडी की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है।

25 मामलों में से केवल दो में कार्रवाई नहीं रुकी। इनमें पूर्व कांग्रेस सांसद ज्योति मिर्धा और पूर्व टीडीपी सांसद वाईएस चौधरी का है। दोनों नेताओं के बीजेपी में शामिल होने के बाद भी ईडी द्वारा ढील दिए जाने का कोई सबूत नहीं है। कम से कम अभी तक तो कोई सबूत नहीं मिला। सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग से इस बारे में कमेंट मांगने पर द इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि उनके सवालों का जवाब नहीं दिया। हालांकि, सीबीआई के एक अधिकारी ने कहा कि एजेंसी की सभी जांच सबूतों पर आधारित हैं। जब भी सबूत मिलते हैं उचित कार्रवाई की जाती है। उन मामलों के बारे में पूछे जाने पर जहां आरोपी के पक्ष बदलने के बाद एजेंसी ने अपना रास्ता बदल लिया है, अधिकारी ने कहा, ‘कुछ मामलों में विभिन्न कारणों से कार्रवाई में देरी होती है। लेकिन वे खुले हैं।’ ईडी के एक अधिकारी ने कहा कि उसके मामले अन्य एजेंसियों की एफआईआर पर आधारित हैं। अगर अन्य एजेंसियां अपना मामला बंद कर देती हैं, तो ईडी के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। फिर भी, हमने ऐसे कई मामलों में आरोपपत्र दायर किए हैं। जिन मामलों में जांच चल रही है, जरूरत पड़ने पर कार्रवाई की जाएगी।

आखिर कौन है तीन बार सांसद रहे भुवनेश्वर प्रसाद मेहता?

आज हम आपको तीन बार सांसद रहे भुवनेश्वर प्रसाद मेहता के बारे में जानकारी देने वाले है! लोकसभा चुनाव को लेकर देश भर में माहौल बन चुका है। चुनाव आयोग की ओर से शेड्यूल की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम राजनीतिक दल रैलियों में जुट गए हैं। पीएम मोदी की हालिया रैलियों पर नजर डालें तो एक बात तो साफ है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वह विरोधियों को परिवारवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने का मन बना चुके हैं। राजनीति में जब भ्रष्टाचार की बात हो रही है तब हम अपने संसद के सदस्य रह चुके ऐसे राजनेता की कहानियां बता रहे हैं जो कहीं ना कहीं ईमानदारी और संघर्ष के प्रतीक माने जाते रहे हैं। लेकिन उनकी जिंदगी के पन्ने पलटकर देखे जाएं तो पता चलता है कि वह भारतीय संसद के लिए किसी रत्न से कम नहीं रहे। सीरीज की पहली कहानी झारखंड के पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता की है।झारखंड के हजारीबाग लोकसभा सीट से पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के नेता रहे। राजनीति में भुवनेश्वर प्रसाद मेहता का जिक्र आते ही एक ईमानदार और बेदाग छवि वाले नेता का चेहरा लोग याद करते हैं। तीन बार संसद में हजारीबाग का प्रतिनिधित्व कर चुके भुवनेश्वर प्रसाद मेहता 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाग्य आजमाना चाहते हैं, लेकिन उनकी पार्टी और इंडिया गठबंधन उन्हें मौका देती है या नहीं, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन यह बात जरूर है कि ईमानदारी और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का जिक्र आने पर भुवनेश्वर प्रसाद मेहता की जिंदगी से युवा नेताओं को काफी कुछ सीखने की जरूरत है। हजारीबाग के कटकमसांडी प्रखंड के लुपुंग में प्रसादी मेहता पास के गांव की रहने वाली मुनिया देवी को ब्याह कर लाए थे। शादी के कुछ साल बाद ही उन दोनों को एक बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने भुवनेश्वर प्रसाद मेहता रखा। भुवनेश्वर अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े रहे। 7वीं तक गांव में पढ़ने के बाद भुवनेश्वर प्रसाद हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए हजारीबाग चले गए। यहां उन्होंने पांच रुपये किराए पर एक कमरा लिया और पढ़ाई में जुट गए। पैसे की तंगी के चलते भुवनेश्वर हर शनिवार को पैदल अपने गांव चले जाते और वहां से सप्ताह भर का दाल, चावल, आलू, तेल, सब्जी आदि लेकर पैदल ही हजारीबाग वाले कमरे पर आ जाते।

9वीं में पहुंचने पर भुवनेश्वर प्रसाद छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और 15-20 रुपये की आमदनी कर परिवार से खर्च लेना बंद कर दिया। अच्छे नंबरों से इंटर पास होने के बाद कॉलेज में पहुंचे, लेकिन ट्यूशन पढ़ाना जारी रखा। तब तक वह ट्यूशन से 400 रुपये तक कमा लेते। साथ ही उन्हें हर महीने 25 रुपये छात्रवृति भी मिल जाती। इसी बीच भुवनेश्वर का रुझान राजनीति की तरफ हुआ। उन्होंने कॉलेज में पिछड़ा वर्ग छात्र संघ बनाया और बाद में छात्रसंघ चुनाव में जीत दर्ज कर महासचिव बने। ग्रेजुएशन कंप्लीट होने के बाद भुवनेश्वर ने सरकारी नौकरी तलाशने के बजाय अपने गांव लौटे और एक स्कूल खोला, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह आर्थिक कमी के चलते बंद हो गई। इसके बाद भुवनेश्वर प्रसाद तेनुघाट में विद्युत संयंत्र के लिए ठेकेदारी करने लगे, यहां उन्होंने सिंचाई कामगार यूनियन बनाया। उस दौर में बिहार के कद्दावर समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर की ओर से भुवनेश्वर को पार्टी ज्वाइन करने का ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया और 1966 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए।

कामरेड मंजूर हसन से प्रेरित होकर भुवनेश्वर प्रसाद मेहता तब से लेकर आज तक मजदूरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस वजह से वह अब तक 45 बार जेल जा चुके हैं। कई बार पुलिस की पिटाई में अधमरा भी हो चुके हैं। चुनावी राजनीति में भी भुवनेश्वर सघर्ष करने से पीछे नहीं हटे। इस वजह से उनके समर्थक उन्हें ‘जायंट किलर’ कहते हैं। भुवनेश्वर प्रसाद CPI के टिकट पर पहली बार हजारीबाग विधानसभा सीट से उतरे। महज 5000 रुपये खर्च कर चुनाव में भाग्य आजमाया, लेकिन हार मिली। इसके बाद वह उपप्रमुख और मुखिया का भी चुनाव जीते।

करीब 45 साल से सक्रिय राजनीति में रहने वाले भुवनेश्वर प्रसाद मेहता आज की राजनीति में धन और बल के बढ़ते प्रभाव से बेहद दुखी रहते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह से संसद में 300 से ज्यादा सांसद करोडपति हैं, वह लोकतंत्र के लिए बेहद दुखद है। आज जिस तरह से चुनाव में पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले समय में गरीब, ईमानदार और स्वच्छ छवि के लोग चुनाव नहीं जीत पाएंगे। वह मानते हैं कि राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिए योग्य युवाओं को आगे आना चाहिए। भुवनेश्वर प्रसाद मेहता की ईमानदारी का आलम यह है कि इतने लंबे समय तक संसद और विधान सभा के सदस्य रहने के बावजूद आज की चकाचौंध वाली जिंदगी से दूर हैं। वह आज भी पूर्व जनप्रतिनिधि के रूप में मिलने वाली पेंशन का एक फीसदी पार्टी कोष में जमा करते हैं। राजनीति में परिवारवाद के विरोधी रहे भुवनेश्वर प्रसाद की तीन बेटियां और एक बेटे अच्छी शिक्षा हासिल कर नौकरी कर परिवार का पालन पोषण करते हैं।

जब नेहरू को राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह ने दी थी चुनौती !

एक ऐसा समय था जब राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह ने नेहरू को चुनौती दी थी! राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह ने आजादी की लड़ाई में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सहयोग किया। कांग्रेस पार्टी के रामगढ़ अधिवेशन को सफल कराने में भी पूरा साथ दिया। इतना ही नहीं कामाख्या नारायण सिंह ने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपना राज उन्हें समर्पित करने का प्रस्ताव भी दिया। लेकिन देश को आजादी मिलने के कुछ ही महीने पहले उनकी पंडित जवाहर लाल नेहरू से ऐसी अनबन हुई कि जब तक कामाख्या नारायण सिंह जीवित रहे, कांग्रेस पार्टी को रामगढ़ राजा के प्रभाव वाले इलाके में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। दूसरी तरफ रामगढ़ राजपरिवार के कई सदस्यों को पहले आम चुनाव से लेकर 1970 के दशक तक लगातार सफलता मिलती रही। अलग झारखंड राज्य गठन के बाद भी रामगढ़ राज परिवार के सदस्य सौरभ नारायण सिंह को सफलता मिली। अब भी परिवार के कई सदस्य कांग्रेस और बीजेपी से जुड़ कर सक्रिय में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। झारखंड की राजनीति के पुराने जानकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार बताते है कि कामाख्या नारायण सिंह आजादी की लड़ाई के अंतिम दौर में एक दिन प. जवाहर लाल नेहरू से मिलने दिल्ली पहुंचे। जिस वक्त राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह प. नेहरू से मिलने पहुंचे, उस वक्त प. नेहरू पार्टी के कुछ अन्य नेताओं के साथ चर्चा में व्यस्त थे, इस कारण राजा रामगढ़ की बातों पर पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाए। इस व्यवहार से कामाख्या नारायण सिंह प. नेहरू पर भड़क गए और उन्होंने प. नेहरू को अपने प्रभाव क्षेत्र में चुनौती देने का ऐलान कर दिया। प. नेहरू के आवास से गुस्से से बाहर निकले कामाख्या नारायण सिंह ने अलग पार्टी बनाने का फैसला लिया। 1946 में कामाख्या नारायण सिंह ने छोटानागपुर-संतालपरगना जनता पार्टी का गठन किया। पहले आम चुनाव में उन्होंने लोकसभा की जगह बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

रामगढ़ राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह ने खुद 1951 के बिहार विधानसभा चुनाव में एक साथ चार सीटों पर जीत हासिल की। कामाख्या नारायण सिंह को अपनी पार्टी छोटानागपुर संताल परगना जनता पार्टी के टिकट पर बगोदर, पतारबार, गोमिया और बड़कागांव विधानसभा सीट से जीत मिली। वहीं उनकी पार्टी के राम नारायण सिंह पहले लोकसभा चुनाव में हजारीबाग पश्चिम सीट से विजयी रहे। जबकि 1957 के लोकसभा चुनाव में छोटानागपुर संताल परगना जनता पार्टी के तीन उम्मीदवार विजयी हुए, जिसमें चतरा से विजया राजे, गिरिडीह से कुरैशी एसए मतिन और हजारीबाग से ललित राजे लक्ष्मी विजयी रहीं। इसके अलावा 1962 के चुनाव में उनकी पार्टी के 7 सांसद हो गए और 50 विधायकों के साथ कामाख्या नारायण सिंह विपक्ष के नेता बने।

1967-68 में बिहार में जब पहली बार गैर कांग्रेस दलों की सरकार बनी, तो इसमें रामगढ़ राजा की बड़ी भूमिका रही। उनके परिवार के ही भाई कुंवर बसंत नारायण सिंह, मां शशांक मंजरी देवी, पत्नी ललिता राजलक्ष्मी और पुत्र टिकैट इंद्र जितेंद्र नारायण सिंह कई बार सांसद और विधायक बने। कामाख्या नारायण सिंह खुद बिहार सरकार में मंत्री रहे। उनके भाई कुंवर बसंत नारायण सिंह और पत्नी ललिता राजलक्ष्मी भी मंत्री बनीं। कामाख्या नारायण सिंह के सहयोग से ही हजारीबाग के कैलाशपति सिंह और रंका के गोपीनाथ सिह बिहार सरकार में मंत्री बने थे।

पुराने हजारीबाग जिले यानी चतरा, हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा, बोकारो और रामगढ़ में तो जिस किसी को भी कामाख्या नारायण सिंह ने चुनाव में खड़ा किया, वे जीतते रहे। आजादी के पहले और बाद में जिस समय कांग्रेस की तूती बोलती थी, कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता कामाख्या नारायण सिंह के खिलाफ कैंप करते, फिर भी ये चुनाव जीत जाते थे। उनका प्रभाव इतना था कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार धनबाद सहित आरा और छपरा से भी चुनाव जीतते थे। 1967 से लेकर 1970 के बीच बिहार की राजनीति में काफी उथल-पुथल रहा। इसी दौरान 6 मई 1970 को कामाख्या नारायण सिंह ने कोलकाता सिथत अपने आवास में अंतिम सासें लीं। उनके निधन को लेकर यह अफवाह उड़ाई कि कामाख्या नारायण सिंह का निधन नहीं हुआ, बल्कि संपत्ति के कई विवादों में उलझने से अपने को बचाने के लिए वे चुपचाप विदेश खिसक गए हैं। उनकी जगह किसी दूसरे मृत व्यक्ति की अंत्येष्टि की गई है। हालांकि यह बेसिर पैर की बात थी।

रामगढ़ राजपरिवार के अंतिम राजा कामाख्या नारायण सिंह की मौत के बाद कुंवर बसंत नारायण सिंह दल-बल के साथ भारतीय जनसंघ में शामिल हो गए। जिसके कारण इस राष्ट्रीय पार्टी को झारखंड के इलाके में राजनीतिक जमीन की प्राप्ति हुई। बाद में भारतीय जनता पार्टी की इस क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ मजबूत हुई। कुंवर बसंत नारायण सिंह खुद कई बार हजारीबाग लोकसभा सीट से के सांसद रहे।

जयंत चौधरी के लिए क्या बोले शाहिद सिद्दीकी?

हाल ही में शाहिद सिद्दीकी ने जयंत चौधरी पर एक विवादित बयान दिया है! लोकसभा चुनाव 2024 में सभी की नजरें मुस्लिम वोटरों पर गड़ी हुई हैं। यूपी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मुसलमानों की ठीकठाक आबादी है। अकेले यूपी में 20 फीसदी के करीब मुसलमान वोटर हैं। साथ ही 29 लोकसभा सीट ऐसी हैं, जिन पर मुस्लिम वोटर जीत-हार की निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। इसी क्रम में NDA का हिस्सा बनते ही एक बड़े मुस्लिम नेता ने राष्ट्रीय लोकदल का साथ छोड़ दिया है। RLD के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शाहिद सिद्दीकी ने पार्टी से इस्तीफा देते हुए कहा कि मैं खामोशी से देश के लोकतांत्रिक ढांचे को समाप्त होते नहीं देख सकता हूं। मुख्यमंत्रियों की गिरफ्तारी से भी आहत हूं। इसके साथ ही उन्होंने माफिया मुख्तार अंसारी की मौत मामले में जांच की मांग की थी। गुजरात के गोधराकांड के बाद तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू करने पर सपा ने उन्हें निष्कासित कर दिया था। शाहिद सिद्दीकी ने बताया कि उन्होंने RLD मुखिया जयंत चौधरी को अपना इस्तीफा भेज दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल की सदस्यता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद से अपना त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने कहा कि आज देश के संवैधानिक ढांचों और लोकतंत्र के ऊपर हमला है। ऐसे में किसी का चुप रहना पाप है। शाहिद ने कहा कि बीजेपी नेताओं से अपील करता हूं कि उन्हें अटल जी के रास्ते को अपनाना चाहिए और राजधर्म निभाने की बात करनी चाहिए। आज जिस तरीके से मुख्यमंत्रियों को गिरफ्तार किया जा रहा है। नेताओं के 15-15 साल पुराने मुकदमे निकाले जा रहे हैं। चुनाव के ठीक समय ऐसा होना ये राजधर्म नहीं है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बीजेपी नेता जो अटल जी और बीजेपी की नीति में विश्वास करते हैं, उन्हें भी इसका विरोध करना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों के लीडरों से अपील है कि भारत का लोकतंत्र सबसे महत्वपूर्ण है। सत्ता आती जाती रहती है। इमरजेंसी का हमने विरोध किया था। हमने जेल काटी थी। ये इसलिए नहीं किया कि हम इंदिरा गांधी या कांग्रेस के विरोधी थे। हम देश के हित में खड़े होना चाहते थे। आज भी हम देश के हित में खड़े होना चाहते हैं। सवाल इस समय बीजेपी, आरएलडी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का नहीं है। सवाल हिंदुस्तान और लोकतंत्र का है। पूरी दुनिया में हमारी पहचान हमारे लोकतंत्र की वजह से है। इस पहचान और इज्जत को आगे बढ़ाना है।

मऊ से 5 बार के विधायक माफिया मुख्तार अंसारी की मौत पर भी आरएलडी के उपाध्यक्ष रहे शाहिद सिद्दीकी ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी। शाहिद ने इस मामले में जांच की मांग की थी। उन्होंने कहा कि मुख्तार अंसारी महान स्वतंत्रता सेनानी और महात्मा गांधी के सहयोगी डॉ. एम.ए. अंसारी के परिवार से आते हैं। स्थानीय माफिया द्वारा उनके परिवार पर किए गए हमलों के कारण वो (मुख्तार अंसारी) आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो गए थे। उनकी मौत की पूरी जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह संदिग्ध परिस्थितियोंपूर्व राज्यसभा सांसद शहीद सिद्दीकी राष्ट्रीय लोकदल में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। शाहिद पत्रकार होने के साथ ही नई दिल्ली से प्रकाशित उर्दू साप्ताहिक पत्रिका के मुख्य संपादक भी हैं। शाहिद सिद्दीकी का जन्म 1951 में पत्रकारों और लेखकों के परिवार में हुआ था। उनके पिता मौलाना अब्दुल वहीद सिद्दीकी एक पत्रकार और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता थे। शाहिद सिद्दीकी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। 1997-99 तक कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रमुख रह चुके हैं। बाद में शाहिद सपा में शामिल हो गए थे। 2002 से 2008 तक सपा में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वो राज्यसभा सांसद रहे चुके हैं। जुलाई 2008 में बसपा में शामिल हो गए थे, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ बोलने के कारण उन्हें 2009 में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। में हुई है।

पेशे से पत्रकार शाहिद सिद्दीकी को गोधरा कांड के बाद अल्पसंख्यक विरोधी दंगों पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने के लिए उन्हें जुलाई 2012 में समाजवादी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। उस इंटरव्यू में मोदी ने कहा था कि अगर मैं दोषी हूं तो मुझे फांसी दे दो। कवर-पेज साक्षात्कार छह पृष्ठों का था और इसमें गुजरात में मुसलमानों की स्थिति, गोधरा के बाद के दंगे और अन्य संवेदनशील मुद्दे शामिल थे। सिद्दीकी ने उन्हें अस्वीकार करने के समाजवादी पार्टी के रुख को महज एक मजाक करार देते हुए कहा था कि मैं मुलायम सिंह यादव सहित समाजवादी पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं की उपस्थिति में पार्टी में शामिल हुआ था, इसलिए यह मजाक वास्तव में दुखद है।

वहीं, इससे पहले आरएलडी के तीन नेताओं ने एकसाथ पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, जिसमें आरएलडी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष रहे आरिफ महमूद का नाम भी शामिल था। आरिफ महमूद ने मुसलमानों की अनदेखी करने को लेकर RLD मुखिया जयंत चौधरी पर आरोपों की बौछार की थी। आरिफ महमूद ने आरोप लगाया था कि जयंत चौधरी का अल्पसंख्यकों के प्रति कोई रुझान नहीं था। जब भी हम अपनी समस्याओं को उनके सामने रखते थे तो कभी भी उन्होंने उन समस्याओं को कंसीडर नहीं किया। कार्यालय में अल्पसंख्यक का बोर्ड लगा था, उसे भी निकाल कर फेंक दिया गया। दफ्तर में अलपसंख्यकों को बैठने तक की जगह नहीं दी थी। उन्होंने बताया कि हमारे अध्यक्ष रहते हुए जयंत चौधरी कभी भी अल्पसंख्यको की मीटिंग में नहीं आए। वो रोजा इफ्तार से भी परहेज करने लगे थे।

लोकसभा चुनाव में किसकी होगी हार किसकी होगी जीत?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि लोकसभा चुनाव में किसकी हार होगी और किसकी जीत होगी! आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। सात चरणों में होने वाले चुनाव की वोटों की गिनती 4 जून को होगी और 19 अप्रैल को पहले चरण का चुनाव होने वाला है। रविवार को एक तरह से इंडिया गठबंधन दिल्ली में संयुक्त रैली से चुनावी अभियान के अंतिम चरण की शुरुआत कर सकता है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी दिन मेरठ से बीजेपी के अभियान की शुरूआत कर सकते हैं। भले आम चुनाव 543 लोकसभा सीटों पर हो रहा हो, लेकिन दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा, यह दिशा उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 सीटें ही करेंगी। 2019 और 2014 आम चुनाव में भी अगर नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से गद्दी पर बैठे तो इसके पीछे इन दोनों राज्यों का विशाल जनादेश ही था। 2019 में बीजेपी गठबंधन को दोनों राज्यों में 103 सीटें मिली। पिछली बार तो UP में समाजवादी और BSP के गठबंध्न के बावजूद बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की। इस बार BSP अलग है। साथ ही जयंत बीजेपी के साथ हैं। जानकारों के अनुसार, बीजेपी इस बार इन दोनों राज्यों में कुछ सीटें बढ़ाने की उम्मीद ही कर रही है। वहीं, विपक्ष को पता है कि अगर इन दोनों राज्यों में बीजेपी की सीटें कम नहीं हुई तो लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना बेहद कठिन होगा।

विपक्ष इस बार बीजेपी को रोकने के लिए एक सीट, एक उम्मीदवार देने की कोशिश कर रहा है। विपक्ष का मानना है कि अगर बीजेपी के सामने एक साझा उम्मीदवार रहा और वोट नहीं बंटे तो मोदी की अगुवाई में NDA को रोका जा सकता है। लेकिन ऐसा कितनी सीटों पर होगा, अभी यह तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। UP जैसे बड़े राज्य में मायावती साथ नहीं आईं। ऐसे में अंतिम लाइन अप सामने आने के बाद तस्वीर साफ होगी। बीजेपी का दावा है कि ऐसा होने से भी फर्क नहीं पड़ेगा। इसके लिए वह 2019 के चुनाव परिणाम का हवाला दे रही है, जब पार्टी को 223 सीटों पर 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले।

मोदी सरकार ने पिछले 10 वर्षों में बीजेपी का चरित्र बहुत हद तक बदलने में सफलता पाई है। इसके लिए सामाजिक आधार को भी बदलने की कोशिश भी बहुत हद तक सफल भी रही। चाहे उज्ज्वला योजना हो या गरीबों को घर देने की योजना या फिर किसानों को हर साल 6 हजार रुपये अनुदान, मोदी ने गरीबों के बीच अपने वोट को विस्तार दिया है। इसे ‘बॉटम ऑफ पिरामिड वोट’ कहा जाता है। पहले बीजेपी की पकड़ इस वर्ग में कमजोर हुआ करती थी। विपक्ष इसमें सेंध लगाने के लिए लोक-लुभावने वादे के साथ उतरी है।

इस बार आम चुनाव में कई नए तरह के गठबंधन बने। पहले विपक्ष ने इंडिया गठबंधन के नाम पर प्रयोग किया। हालांकि, नीतीश कुमार के एनडीए में जाने और ममता बनर्जी के सीट समझौते से अलग होने के बाद इसे झटका भी लगा। लेकिन कई जगह चुनावी गणितीय आंकड़ों में वह निश्चित तौर पर मजबूत दिखे। इसे काउंटर करने के लिए अंतिम समय में बीजेपी ने भी एनडीए ताबड़तोड़ कई दलों को मिलाया। हालांकि ओडिशा-पंजाब में समझौता नहीं हो पाया। चुनाव सिर्फ गणित से नहीं जीते-लड़े जाते हैं। इसके लिए केमेस्ट्री भी जरूरी है। जो गठबंधन गणित मजबूत कर केमेस्ट्री को अपने पक्ष में करने में सफल होगा, उसके लिए परिणाम और बेहतर निकलेगा।

अंत में जिस राजनीतिक दल का सिस्टम बेहतर होगा, नजदीकी मुकाबले वाले चुनाव में जो अपने वोटरों को बूथ तक लाने में सफल रहेंगे वही अडवांटेज में रहेगा। जाहिर है इसमें पैसा और दूसरे संसाधन भी अहम फैक्टर होंगे। इनके बीच बूथ मैनेजमेंट भी चुनाव की दिशा तय करेगा। संघ-बीजेपी के बीच किस तरह की केमेस्ट्री चुनाव तक बनती है, विपक्षी दल बीजेपी के राजनीतिक संसाधन को किस तरह काउंटर करते हैं। बीजेपी इस बार इन दोनों राज्यों में कुछ सीटें बढ़ाने की उम्मीद ही कर रही है। वहीं, विपक्ष को पता है कि अगर इन दोनों राज्यों में बीजेपी की सीटें कम नहीं हुई तो लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना बेहद कठिन होगा।चुनाव प्रचार को कितना विस्तार देते हैं, इन सब बातों से भी चुनाव तय होगा। अभी तक विपक्ष कोई मजबूत नैरेटिव नहीं लाया है। वहीं, मोदी की अगुआई में बीजेपी 400 पार के नारे के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सफल हो गई है।