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क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में पकड़ी गई है कभी गलतियां?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में कभी गलतियां पकड़ी गई है या नहीं या उसे पर ऐसे ही विवाद खड़ा हो गया है! लोकसभा चुनाव की गहमा-गहमी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इस बीच ईवीएम के साथ दिए गए वोट को देखने के लिए लगाई जाने वाली वीवीपैट मशीन फिर से चर्चा में है। विपक्ष हर मतदाता को वीवीपैट से निकली पर्चियों को देने की वकालत करता है जबकि चुनाव आयोग इसके खिलाफ है। आयोग का तर्क है कि अगर सारे चुनाव में वीवीपैट की पर्चियों को हर वोटर को देना शुरू कर दिया जाएगा तो फिर पुराने समय में बैलेट पेपर और ईवीएम के साथ होने वाले चुनाव में क्या फर्क रह जाएगा? हम फिर से पुराने युग में नहीं लौट जाएंगे? इसमें वोट देने और फिर वोटों की गिनती करने में लंबा समय लगता है। वीवीपैट एक ऐसी मशीन है, जो चुनाव के समय ईवीएम के साथ कनेक्ट की जाती है। इसे मतदाता द्वारा अपनी पसंद की पार्टी और उम्मीदवार को दिए गए वोट को डबल चेक करने के लिए लगाया जाता है। वोटर अपने उम्मीदवार और पार्टी को ईवीएम में बटन दबाकर वोट देता है तो वीवीपैट मशीन एक पर्ची जेनरेट करती है। वह पर्ची सात सेकंड तक मतदाता को वीवीपैट मशीन में लगे शीशे के एक बॉक्स में दिखाई देती है। इसके बाद वहां से ऑटोमेटिक कटकर वीवीपैट मशीन के अंदर ही गिर जाती है। पर्ची में मतदाता द्वारा दिए गए वोट पर उस उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है। इसका मकसद यह होता है कि अगर कोई उम्मीदवार चुनाव संपन्न होने के बाद ऐसा आरोप लगाता है कि ईवीएम से वोट में कोई गड़बड़ी की गई है, तो तमाम पर्चियों का उस विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र के लिए ईवीएम में पड़ी वोट से मिलान कराया जाता है। दोनों के वोट एक समान होने पर उस चुनाव को वैलिड घोषित कर दिया जाता है।

चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि 2017 से वीवीपैट का इस्तेमाल 100 फीसदी होना शुरू हो गया। पहली बार 2019 के लोकसभा चुनावों में 100 फीसदी वीवीपैट का इस्तेमाल किया गया। इसमें हर विधानसभा क्षेत्र के पांच पोलिंग स्टेशनों को रैंडमली चुनकर वीवीपैट की सभी पर्चियों का ईवीएम में पड़े वोटों के साथ मिलान कराया जाता है। अगर कैंडिडेट शिकायत करता है तो वहां के रिटर्निंग ऑफिसर के पास यह अधिकार होता है कि वह पूरी विधानसभा या फिर जरूरत के मुताबिक लोकसभा सीट पर पड़े सभी वोटों का सौ फीसदी वीवीपैट की पर्चियों के मिलान का आदेश दे सकता है।

विपक्ष चाहता है कि वीवीपैट की सभी पर्चियों को वोट देने वाले मतदाता को दिया जाए। फिर EVM में दिए गए वोट से संतुष्ट होते हुए उस पर्ची को वहीं एक बॉक्स में डाल दे, ताकि कोई उम्मीदवार किसी तरह की धांधली होने की शिकायत करता है या फिर कोर्ट जाता है तो उनका मिलान कराया जा सके। राजनीतिक पार्टियां चाहती हैं कि वीवीपैट में अभी जो पर्ची जनरेट होती है, वह तुरंत वहीं कटकर मशीन के अंदर ही ना गिरे, वह वोटर को मिले। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।

चुनाव आयोग और आयोग के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कहना है कि देशभर में 2017 के बाद से एक भी मामला ऐसा सामने नहीं आया, जिसमें ईवीएम में पड़े वोट और वीवीपैट की पर्चियों के रिजल्ट अलग-अलग आए हों। 2017 में गोवा में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान चार विधानसभा सीटों पर पड़ी वोट में गड़बड़ी की शिकायत की गई थी। इन चारों सीटों पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों का मिलान कराया गया। चारों के रिजल्ट सही निकले। रावत का सवाल है कि आज के दौर में भी सारी ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों का मिलान किया जाने लगा तो फिर ईवीएम का मतलब ही क्या रह जाएगा? उनका कहना है कि ऐसा किया जाने लगा तो देश फिर से बैलट पेपर युग में चला जाएगा। आज भारत में वोटों की गिनती होने के कुछ ही घंटे में रिजल्ट आपके सामने होता है जो दुनिया में सबसे अधिक तेज रिजल्ट देने वाला है।

शुरुआत में 479 पोलिंग स्टेशनों की वीवीपैट पर्चियों के मिलान की बात हुई थी। आयोग को यह कम लगे। आयोग ने कहा कि हर विधानसभा क्षेत्र का कम-से-कम एक पोलिंग स्टेशन को वीवीपैट की पर्चियों से मिलाया जाएगा। इसके बाद यह आंकड़ा बढ़कर 4,300 से भी अधिक पहुंच गया। बाद में कुछ राजनीतिक पार्टियां सुप्रीम कोर्ट चली गईं। कोर्ट ने एक विधानसभा क्षेत्र के एक पोलिंग स्टेशन की जगह हर विधानसभा के पांच पोलिंग स्टेशन पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों से मिलान की बात कही। अब पूरे देश में आम चुनाव के लिए बने 10 लाख 50 हजार पोलिंग स्टेशनों में 21 हजार से अधिक पोलिंग स्टेशनों पर ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों का मिलान कराया जाता है। आज तक एक भी पोलिंग स्टेशन का रिजल्ट ईवीएम और वीवीपैट में अलग-अलग नहीं निकला।

क्या देश में बढ़ रहे हैं अमीरी गरीबी के विवाद?

वर्तमान में देश में अमीरी गरीबी के विवाद बढ़ते ही जा रहे हैं! क्या भारत हाल के दशकों में तेज आर्थिक विकास के बावजूद आय और संपत्ति के बंटवारे के मामले में दुनिया के कुछ सबसे अधिक गैर-बराबर मुल्कों में से एक बनता जा रहा है? पेरिस स्थित World Inequality Lab की एक ताजा रिपोर्ट, ‘The Rise of the Billionaires Raj’ के मुताबिक, पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से भारत में तेजी से बढ़ रही आर्थिक गैर-बराबरी बीते साल 2022-23 में ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जो कि ब्रिटिशकालीन भारत के 1922 के दशक की तुलना में भी ज्यादा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आबादी में शीर्ष एक फीसदी सुपर अमीरों का देश की आय और संपत्ति में हिस्सा बढ़ते हुए क्रमशः 22.6% और 40.1% तक पहुंच गया है। इस मामले में भारत दुनिया के चुनिंदा देशों की सूची में सबसे ऊपरी पायदान पर पहुंच गया है।

यह रिपोर्ट बताती है कि देश में Dollar Billionaires की संख्या वर्ष 1991 में जहां सिर्फ एक थी, वह 2011 में बढ़कर 52 और 2022 में तिगुने से ज्यादा बढ़कर 162 हो गई। इन तीन दशकों में Billionaires की संपत्ति में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। कुल आय में उनका हिस्सा वर्ष 1991 में जहां एक फीसदी से भी कम था, वह 2022 में उछलकर 25% तक पहुंच गया। दरअसल, 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से तेज आर्थिक वृद्धि के बीच जहां एक ओर गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई, वहीं आर्थिक गैर-बराबरी में तेज बढ़ोतरी भी हुई। कई अर्थशास्त्री और सरकारी रिपोर्टें भी समय-समय पर इस विरोधाभास को उजागर करते रहे हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा ताजा रिपोर्ट में पेश इन तथ्यों से लगाया जा सकता है… देश में शीर्ष 10% भारतीय राष्ट्रीय आय का 60% हिस्सा बटोर ले जाते हैं लेकिन निचली 50% आबादी के खाते में मात्र 15% हिस्सा ही आता है।वर्ष 2022-23 के आंकड़ों के मुताबिक, एक औसत भारतीय की सालाना आय 2.3 लाख रुपये है, लेकिन शीर्ष एक फीसदी सुपर अमीरों की औसत सालाना आय 53 लाख रुपये है, जो आम भारतीय की औसत सालाना आय से 23 गुणा ज्यादा है। आबादी के निचले 50% भारतीयों की औसत सालाना आय सिर्फ 71 हजार रुपये राष्ट्रीय औसत का एक तिहाई और बीच के 40% भारतीयों की औसत सालाना आय 1.65 लाख रुपये राष्ट्रीय औसत का लगभग दो तिहाई है। शीर्ष एक फीसदी सुपर अमीर राष्ट्रीय आय का 22.6% ले जाते हैं, लेकिन उनमें से भी शीर्ष 0.1%, 0.01% और 0.001% अमीरों के हिस्से में राष्ट्रीय आय का क्रमशः 10%, 4.3% और 2.1% आता है।

यह रिपोर्ट चार अर्थशास्त्रियों ने तैयार की है, जिनमें फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी के अलावा नितिन कुमार भारती, लुकास चांसेल और अनमोल सोमंची शामिल हैं। रिपोर्ट के लिए इन लोगों ने राष्ट्रीय आय, सकल परिसंपत्तियों, आयकर के आंकड़ों, अमीरों की सूचियों के अलावा आय-उपभोग और संपत्ति सर्वेक्षणों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने यह भी माना है कि भारत में आय और संपत्ति संबंधी आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं और उनमें कई विसंगतियां हैं। इस आधार पर कई आलोचक इस शोध रिपोर्ट के दावों पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं।

कुछ साल पहले जाने-माने अर्थशास्त्री प्रो. जगदीश भगवती और नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के बीच चली चर्चित बहस के केंद्र में भी यही सवाल था। मुद्दा यह था कि आर्थिक वृद्धि दर को तेज करने या राष्ट्रीय आय और संपत्ति के न्यायसम्य वितरण सुनिश्चित करने में से किसे प्राथमिकता देनी चाहिए? दूसरे, क्या नीति-निर्माताओं को गैर-बराबरी पर अंकुश लगाने के लिए सुपर अमीरों पर ऊंची दरों से टैक्स या संपत्ति कर लगाने जैसे कदम उठाने चाहिए? उनके मुताबिक, इससे आर्थिक गैर-बराबरी बढ़ती है तो उसे लेकर नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। उनका तर्क है कि भारत में पिछले तीन दशकों में तेज आर्थिक वृद्धि के कारण गरीबी कम करने में मदद मिली है। इसलिए पुनर्वितरण के बजाए आर्थिक वृद्धि पर जोर बना रहना चाहिए। इस कारण वे मानते हैं कि सुपर अमीरों पर टैक्स बढ़ाने या उनकी संपत्ति पर संपदा कर लगाने से निवेश पर उल्टा असर पड़ेगा और आर्थिक वृद्धि को धक्का लग सकता है।

नीति-निर्माताओं के लिए यह दुविधा का विषय है। लेकिन यहां गांधी जी की बात याद रखनी चाहिए कि कोई भी फैसला करने से पहले सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को याद करना और उसकी भलाई को तरजीह देनी चाहिए। यही नहीं, अब तो दुनिया भर में Billionaires की बड़ी संख्या सुपर अमीरों पर टैक्स की दरें बढ़ाने की मांग कर रही है ताकि गैर-बराबरी पर अंकुश लगाया जा सके और सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बड़ा और मजबूत बनाया जा सके। इस साल दावोस में 250 से ज्यादा Billionaires ने यह मांग दोहरा कर नीति-निर्माताओं के लिए रास्ता खोल दिया है।

क्या संजय सिंह की जमानत से आम आदमी पार्टी को मिलेगी राहत ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या संजय सिंह की जमानत से आम आदमी पार्टी को राहत मिलेगी या नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने आप नेता संजय सिंह को जमानत दी तो यह कानूनी सवाल उठ गया कि क्या दिल्ली शराब घोटाले के बाकी आरोपियों को भी इसका लाभ मिल सकेगा? हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि यह मामला नजीर नहीं बनेगा। तो क्या अन्य आरोपियों को इस फैसले का लाभ नहीं मिलेगा? वैसे कानूनी जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस ऑर्डर के बाद बाकी आरोपियों की ओर से भी जमानत की गुहार लगाई जा सकती है, लेकिन ईडी के रुख पर काफी कुछ निर्भर करेगा। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट विकास सिंह बताते हैं कि राइट टु साइलेंस भी मौलिक अधिकार है। किसी भी आरोपी को उसके चुप रहने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और कोई जांच एजेंसी यह नहीं कह सकती कि आरोपी चुप रहकर उसे सहयोग नहीं कर रहा है। सहयोग का मतलब यह नहीं है कि आरोपी गुनाह कबूल कर ले। तेलंगाना हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि चुप रहना भी मौलिक अधिकार है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट खुद अपने एक अन्य फैसले में कह चुका है कि ईडी के समन के बावजूद उसे सहयोग न करना गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता। साथ ही, रिमांड के वक्त यह देखना जरूरी है कि गिरफ्तारी वैलिड है या नहीं।

मौजूदा मामले में संजय सिंह छह महीने से जेल में थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संजय सिंह के पास से रिकवरी नहीं है। ईडी से सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या संजय सिंह को हिरासत में रखने की आवश्यकता है? संजय सिंह छह महीने से जेल में हैं। ईडी ने जब कहा कि उन्हें जमानत दिए जाने से आपत्ति नहीं है, तब सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी है। आबकारी नीति मामले में आप नेताओं की गिरफ्तारी हुई है और पहले नेता को जमानत मिली है। ऐसे में अब आनेवाले दिनों में बाकी आरोपियों के लिए एक राह जरूर बनी है, ताकि वे जमानत की अर्जी दाखिल कर सकें।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट एमएल लाहौटी बताते हैं कि अगर किसी आरोपी को दूसरे आरोपी से आमना-सामना न करना हो तो ऐसे आरोपी को जमानत मिलना मुश्किल होता है। हालांकि, अगर पूछताछ हो चुकी हो और आगे जांच के दौरान पूछताछ की जरूरत न हो तो उस आधार पर बाकी आरोपी भी जमानत की मांग कर सकते हैं। तब उस विशेष केस में ईडी का क्या रुख रहता है, यह भी अहम है क्योंकि मौजूदा मामले में ईडी ने सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर खुद कहा कि जमानत दिए जाने पर उसे आपत्ति नहीं है। ऐसे में बाकी मामलों में जब जमानत पर सुनवाई होगी, तब ईडी का रुख भी देखना होगा कि ईडी को कोई आपत्ति है या नहीं? या वह मेरिट पर जमानत का विरोध कर रही है। अगर मेरिट पर जमानत का ईडी विरोध करती है तो फिर उस केस विशेष में अदालत केस की मेरिट पर जमानत का फैसला देगी।

सीनियर क्रिमिनल लॉयर रमेश गुप्ता का कहना है कि संजय सिंह को जमानत देने का ईडी ने विरोध नहीं किया है। अब बाकी मामले में ईडी का रुख क्या होता है, यह भी देखना होगा। हालांकि अन्य आरोपियों की ओर से जमानत की अर्जी दाखिल किए जाने का रास्ता जरूर खुलेगा। वैसे भी, सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा था कि ट्रायल में अगर देरी हो तो आरोपी जमानत की अर्जी दाखिल कर सकता है। अभी हाल ही में 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पीएमएल की धारा 45 के संवैधानिक अधिकार को नहीं छीन सकता और यह सिसोदिया के केस में साफ किया जा चुका है। अगर ट्रायल में देरी हो रही है तो कोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के अधिकार पर कोई रोक नहीं है।

अदालत ने कहा था कि यहां अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और आजादी के अधिकार का मसला है। ऐसे में ट्रायल में देरी के आधार पर जमानत देने में कोई बाधा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग केस के ट्रायल में अगर देरी हो तो जमानत दिए जाने पर रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना ने मनी लॉन्ड्रिंग केस से संबंधित एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा था कि पीएमएलए एक्ट की धारा 45 ऐसे मामले में जमानत दिए जाने पर रोक नहीं लगाती है, जिसमें ट्रायल में देरी हो।

संजय सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट में ईडी ने कहा है कि उन्हें जमानत दिए जाने पर आपत्ति नहीं है। अब ऐसे में बाकी मामले में यह सवाल उठेगा कि क्या अन्य मामले में भी आरोपी को हिरासत में रखना जरूरी है? तब ईडी का जवाब देखना दिलचस्प होगा। हालांकि ट्रायल में होने वाली देरी के आधार पर भी जमानत अर्जी दाखिल की जा सकती है। गौरतलब है कि इस मामले में आप नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन, बीआरएस नेता के. कविता आदि जेल में हैं।

आखिर विदेश मंत्री एस जयशंकर के लिए क्या बोल गए पी चिदंबरम?

हाल ही में कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने विदेश मंत्री एस जयशंकर के लिए एक बयान दिया है! कच्‍चाथीवू द्वीप को लेकर छिड़े विवाद में कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता पी चिदंबरम ने एंट्री मारी है। चिदंबरम ने कच्‍चाथीवू द्वीप विवाद पर विदेश मंत्री एस जयशंकर की टिप्‍पणी पर तीखी प्रतिक्रिया दी और सवाल किया कि विदेश मंत्री इस मुद्दे को लेकर कलाबाजी क्‍यों कर रहे हैं। दरअसल विपक्ष के कई नेताओं ने सोमवार को कच्चातिवु द्वीप के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर पलटवार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस द्वीप के मामले में मोदी सरकार ने अपने रुख में बदलाव किया है। विपक्ष की प्रतिक्रिया विदेश मंत्री एस जयशंकर के सोमवार के उस दावे के बाद आई है कि कांग्रेस से संबंध रखने वाले प्रधानमंत्रियों ने कच्चातिवु द्वीप के बारे में उदासीनता दिखाई और इसके विपरीत कानूनी विचारों के बावजूद भारतीय मछुआरों के अधिकारों को छोड़ दिया। चिदंबरम ने सवाल किया कि विदेश मंत्री और उनका मंत्रालय अब कलाबाज़ी क्यों खा रहे हैं?

चिदंबरम ने कहा, ‘लोग कितनी जल्दी रंग बदल सकते हैं। एक सौम्य उदार विदेश सेवा अधिकारी से लेकर एक चतुर विदेश सचिव और आरएसएस-भाजपा के मुखपत्र तक, जयशंकर का जीवन और समय कलाबाजी के इतिहास में दर्ज किया जाएगा।’जयशंकर ने यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देने के एक दिन बाद की, जिसमें कहा गया था कि नए तथ्यों से पता चलता है कि कांग्रेस ने ‘कच्चातीवू द्वीप’ श्रीलंका को दे दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने इस मुद्दे पर सरकार पर निशाना साधा।

उन्होंने कहा, ‘जैसे को तैसा पुरानी बात है। ट्वीट के बदले ट्वीट नया हथियार है। क्या विदेश मंत्री जयशंकर कृपया 27-1-2015 के आरटीआई जवाब का संज्ञान लेंगे…उस उत्तर में उन परिस्थितियों को उचित ठहराया गया जिसके तहत भारत ने स्वीकार किया कि एक छोटा द्वीप श्रीलंका का है।’ चिदंबरम ने सवाल किया कि विदेश मंत्री और उनका मंत्रालय अब कलाबाज़ी क्यों खा रहे हैं? चिदंबरम ने कहा, ‘लोग कितनी जल्दी रंग बदल सकते हैं। एक सौम्य उदार विदेश सेवा अधिकारी से लेकर एक चतुर विदेश सचिव और आरएसएस-भाजपा के मुखपत्र तक, जयशंकर का जीवन और समय कलाबाजी के इतिहास में दर्ज किया जाएगा।’

पूर्व गृह मंत्री ने कहा, ‘यह सच है कि पिछले 50 वर्ष में मछुआरों को हिरासत में लिया गया है। इसी तरह, भारत ने कई श्रीलंकाई मछुआरों को हिरासत में लिया है। हर सरकार ने श्रीलंका के साथ बातचीत की है और हमारे मछुआरों को मुक्त कराया है।’ उन्होंने यह सवाल भी किया कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और भाजपा सत्ता में थी और तमिलनाडु के विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन में थी, तब क्या मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में नहीं लिया था? चिदंबरम ने कहा, ‘मोदी जी 2014 से सत्ता में हैं तो क्या इस दौरान मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में नहीं लिया?’ शिवसेना UBT नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने 2015 में विदेश मंत्रालय से आरटीआई आवेदन के जवाब ‘एक्स’ पर साझा किया। इस जवाब में कहा गया था कि कच्चातिवु द्वीप भारत-श्रीलंका अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा के श्रीलंका की तरफ स्थित है। प्रियंका चतुर्वेदी ने 27 जनवरी, 2015 के आरटीआई जवाब को टैग करते हुए कहा, ‘शायद विदेश मंत्रालय 2024 की तुलना में 2015 में अपने आरटीआई जवाब में इस विसंगतियों को दूर करने में सक्षम होगा।’ उनका कहना है, ‘2015 में आरटीआई जवाब के अनुसार जब वर्तमान विदेश मंत्री विदेश सचिव के रूप में कार्यरत थे।’ कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस आरटीआई जवाब का हवाला देते हुए कहा, ‘जीवन और समय कलाबाजी के इतिहास में दर्ज किया जाएगा।’जयशंकर ने यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देने के एक दिन बाद की, जिसमें कहा गया था कि नए तथ्यों से पता चलता है कि कांग्रेस ने ‘कच्चातीवू द्वीप’ श्रीलंका को दे दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने इस मुद्दे पर सरकार पर निशाना साधा।विपक्ष की प्रतिक्रिया विदेश मंत्री एस जयशंकर के सोमवार के उस दावे के बाद आई है कि कांग्रेस से संबंध रखने वाले प्रधानमंत्रियों ने कच्चातिवु द्वीप के बारे में उदासीनता दिखाई और इसके विपरीत कानूनी विचारों के बावजूद भारतीय मछुआरों के अधिकारों को छोड़ दिया।यह दिखाता है कि विदेश सचिव ने विदेश मंत्री बनते ही कितनी जल्दी अपना रंग बदल लिया।’ रमेश ने आरोप लगाया, ‘जहां तक मोदी सरकार की बात है तो पाखंड या झूठ बोलने की कोई सीमा नहीं है।’

क्या तमिलनाडु में मछुआरों का सहारा लेकर जीत पाएगी बीजेपी?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि तमिलनाडु में मछुआरों का सहारा लेकर बीजेपी जीत पाएगी या नहीं! लोकसभा चुनाव में 400 पार के BJP के लक्ष्य में तमिलनाडु का गणित पार्टी के सामने बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे में कच्चातिवु द्वीप को लेकर BJP के आक्रामक तेवर देखकर लगता है कि ये मुद्दा इस चुनाव में छाया रहेगा। हालांकि, सच यह भी है कि चुनाव आते ही मछुआरे के मुद्दे सामने आते रहते हैं। तमिलनाडु में करीब 1000 किलोमीटर लंबी कोस्टलाइन है। इसके इर्द-गिर्द 600 से ज्यादा गांव ऐसे हैं जहां मछुआरा समुदाय रहता है। उसकी टेरेटरी में लोग आ गए हैं। साथ ही फिशिंग करने की टेक्निकल क्षमता भी नहीं थी। केंद्र की BJP सरकार दावा करती है कि उसने ब्लू इकॉनमी कॉन्सेप्ट के जरिए मछुआरों के हालात बेहतर करने की कोशिश की है।’ सवाल 2020 में सामने आई राष्ट्रीय मत्स्य पालन नीति को लेकर रहा है। इस समुदाय से जुड़ा एक तबका इस नीति के जरिए कॉरपोरेट का पक्ष लेने का आरोप लगाता रहा है।इस कोस्टलाइन में करीब 10 लाख मछुआरों की रिहाइश है। जानकार कहते हैं कि मछुआरा समुदाय कई विधानसभा क्षेत्रों और लोकसभा क्षेत्रों में दखल रखते हैं। उनके वोट से चुनाव का नतीजा निर्णायक स्तर तक पहुंच सकता है। राज्य सरकार चला रहे DMK गठबंधन, NDA और AIADMK बीच त्रिकोणीय कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

DMK की ओर से केंद्र सरकार पर मछुआरों की उपेक्षा का आरोप लगाया जा रहा है। पार्टी नेता आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार श्रीलंका को वित्तीय सहायता देती है, जबकि श्रीलंका झूठे आरोप लगाकर मछुआरों को अपनी गिरफ्त में लेता रहता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि 20 वर्षों में श्रीलंका ने 6184 भारतीय मछुआरों की हिरासत में लिया और इस दौरान 1175 भारतीय मछली पकड़ने वाली नौकाएं श्रीलंका ने जब्त की। ये मुद्दा लोकल लेवल पर गर्म रहेगा क्योंकि कराईकल में मछुआरों ने श्रीलंकाई सेना की ओर से गिरफ्तार मछुआरों की रिहाई की मांग को लेकर 4 अप्रैल से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने और लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया है।पिछले लोकसभा चुनाव में DMK की अगुवाई वाले अलायंस ने 39 में से 38 सीटें जीतीं थीं। 2014 में 37 सीटों पर जीत हासिल करने वाली AIADMK को पिछली बार महज एक सीट मिल सकी। BJP का प्रदर्शन निराशाजनक था। 2014 में उसे 5.56% वोट मिले थे, जो 2019 में घटकर 3.66% रह गया। पिछले चुनाव में पार्टी ने सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।लोगों की शिकायतें हैं कि 2014 में नेता सुषमा स्वराज की ओर से रामेश्वरम में पार्टी के प्रचार के दौरान श्रीलंकाई विवाद को सुलझाने का वादा किया गया था। हालांकि सत्ता में आने के बाद सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्रालय भी संभाला, लेकिन हकीकत जस का तस है।

राजनीतिक विश्लेषक शेखर अय्यर का कहना है कि चुनाव को लेकर BJP के अपने वादे हैं। वह कहते हैं, ‘मछुआरों कि दिक्कतें बहुत हैं। उनके पास छोटी बोट और मोटर थी, जिससे वे समुद्र में गहरे नहीं जा पाते थे। मैरीटाइम टेरेटरी के बहुत साफ न होने की वजह से श्रीलंका कहता रहता है कि उसकी टेरेटरी में लोग आ गए हैं। साथ ही फिशिंग करने की टेक्निकल क्षमता भी नहीं थी। केंद्र की BJP सरकार दावा करती है कि उसने ब्लू इकॉनमी कॉन्सेप्ट के जरिए मछुआरों के हालात बेहतर करने की कोशिश की है।’ सवाल 2020 में सामने आई राष्ट्रीय मत्स्य पालन नीति को लेकर रहा है। इस समुदाय से जुड़ा एक तबका इस नीति के जरिए कॉरपोरेट का पक्ष लेने का आरोप लगाता रहा है।

पिछले लोकसभा चुनाव में DMK की अगुवाई वाले अलायंस ने 39 में से 38 सीटें जीतीं थीं। 2014 में 37 सीटों पर जीत हासिल करने वाली AIADMK को पिछली बार महज एक सीट मिल सकी। तमिलनाडु में करीब 1000 किलोमीटर लंबी कोस्टलाइन है। इसके इर्द-गिर्द 600 से ज्यादा गांव ऐसे हैं जहां मछुआरा समुदाय रहता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि 20 वर्षों में श्रीलंका ने 6184 भारतीय मछुआरों की हिरासत में लिया और इस दौरान 1175 भारतीय मछली पकड़ने वाली नौकाएं श्रीलंका ने जब्त की। ये मुद्दा लोकल लेवल पर गर्म रहेगा क्योंकि कराईकल में मछुआरों ने श्रीलंकाई सेना की ओर से गिरफ्तार मछुआरों की रिहाई की मांग को लेकर 4 अप्रैल से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने और लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया है।इस कोस्टलाइन में करीब 10 लाख मछुआरों की रिहाइश है। जानकार कहते हैं कि मछुआरा समुदाय कई विधानसभा क्षेत्रों और लोकसभा क्षेत्रों में दखल रखते हैं।BJP का प्रदर्शन निराशाजनक था। 2014 में उसे 5.56% वोट मिले थे, जो 2019 में घटकर 3.66% रह गया। पिछले चुनाव में पार्टी ने सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।

चीन को फटकार लगाते हुए क्या बोले भारतीय विदेश मंत्री?

हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री ने चीन को फटकार लगाई है! चीन ने अरुणाचल प्रदेशों के कुछ और जगहों के नए नाम दिए हैं। उसकी चौथी सूची में 30 जगहों के नए नाम शामिल हैं। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को मजबूती देने के लिए यहां की जगहों के नए नाम जारी करता रहा है। हालांकि भारत इन्हें खारिज करता रहा है। उसका कहना है कि चीन के नए नामों से सच्चाई नहीं बदलेगी और वो ये कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने जांगन अरुणाचल प्रदेश के लिए चीन की ओर से दिया गया नया नाम में 30 जगहों के नए नाम जारी किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के नए नामों की पहली सूची जारी की थी। इसमें छह नए नाम शामिल थे। 2021 में 15 जगहों के नए नाम दिए गए थे। वहीं 2023 में 11 नए नाम की सूची जारी की गई थी। वहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अरुणाचल प्रदेश पर चीन द्वारा बार-बार किए जा रहे दावे को 23 मार्च को बेतुका करार देते हुए इसे खारिज कर दिया था और कहा था कि यह सीमांत राज्य ‘भारत का स्वाभाविक हिस्सा’ है।

अरुणाचल प्रदेश पर दावे को लेकर चीन की ओर से हालिया बयानबाजी तब शुरू हुई थी जब पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था। उस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने अरुणाचल प्रदेश के 13 हजार फुट की ऊंचाई पर बनी सेला सुरंग को राष्ट्र को समर्पित किया था। चीन में भारत के राजदूत रह चुके जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि सीमा पर तनाव ने भारत-चीन संबंधों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा, जैसा कि आप जानते हैं , सीमा पर (चीन के साथ) तनाव है और इससे हमारे संबंधों में विसंगति आई है। इसके लिए हमारी सोच बहुत साफ है कि जब तक सीमा पर शांति और स्थिरता नहीं होगी, तब तक रिश्ते नहीं सुधरेंगे।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को कहा कि आर्थिक मोर्चे पर चीन से मुकाबला करने के लिए भारत को विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा प्रमुख क्षेत्र है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने से पहले की सरकारों ने नजरअंदाज किया था। उन्होंने कहा कि चीन के साथ सीमा पर तनाव के चलते नई दिल्ली-पेइचिंग संबंधों में असामान्यता पैदा हुई है। भारत की सोच बिलकुल स्पष्ट है कि जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता नहीं होगी, तब तक दोनों एशियाई शक्तियों के बीच संबंधों में सुधार नहीं होगा। जयशंकर ने सूरत में एक कार्यक्रम में उद्योग जगत के नेताओं के साथ चर्चा के दौरान कहा, ‘अगर हमें चीन से मुकाबला करना है, जो करना भी चाहिए, तो इसका समाधान यही है कि हम यहीं विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करें। पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद विनिर्माण के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल गया है। इससे पहले लोग विनिर्माण पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।’

बता दे कि अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा पेश करने की चीन की हालिया कोशिशों के बीच बीजिंग ने भारतीय राज्य में विभिन्न स्थानों के 30 नए नामों की चौथी सूची जारी की है। चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के स्थानों का नाम बदलने की कवायद को भारत खारिज करता रहा है। भारत का कहना है कि यह राज्य देश का अभिन्न अंग है और ‘‘काल्पनिक’’ नाम रखने से इस वास्तविकता में कोई बदलाव नहीं आएगा। सरकारी ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने रविवार को बताया कि चीनी नागरिक मामलों के मंत्रालय ने ‘जंगनान’ में मानकीकृत भौगोलिक नामों की चौथी सूची जारी की। चीन की इस हिमाकत पर एक्सपर्ट ने चीन को फटकार लगाई है। रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने कहा कि “भारत को चीन को याद दिलाना चाहिए कि उसने अंतरराष्ट्रीय कानून का मजाक उड़ाकर तिब्बत पर कब्जा कर लिया है और अब वह तिब्बत पर कब्जे का विस्तार अरुणाचल तक करना चाहता है, जिसे भारत कभी अनुमति नहीं देगा।” चेलानी ने भारत को सलाह दी कि उसे चीन को साफ-साफ समझा देना चाहिए कि असल बात तो ये है कि बीजिंग खुद तिब्बत पर कब्जा करके भारत का पड़ोसी बना बैठा है।

चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘जंगनान’ कहता है और दक्षिण तिब्बत के हिस्से के रूप में इस राज्य पर अपना दावा करता है। मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर क्षेत्र के लिए 30 अतिरिक्त नाम पोस्ट किए गए। यह सूची एक मई से प्रभावी होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुच्छेद 13 के अनुसार, इस घोषणा के क्रियान्वयन में कहा गया है कि ‘‘चीन के क्षेत्रीय दावों और संप्रभुता अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकने वाले विदेशी भाषाओं में रखे गए, स्थानों के नामों को बिना प्राधिकार के सीधे उद्धृत या अनुवादित नहीं किया जाएगा।’’ चीनी नागरिक मामलों के मंत्रालय ने ‘‘जंगनान’’ में छह स्थानों के ‘‘मानकीकृत नामों’’ की पहली सूची 2017 में जारी की थी, जबकि 15 स्थानों की दूसरी सूची 2021 में जारी की गई थी। इसके बाद 2023 में 11 स्थानों के नामों के साथ एक और सूची जारी की गई थी।

क्या भारतीय इसरो ने लगा दी है एक और बड़ी छलांग?

भारतीय इसरो ने वर्तमान में एक और बड़ी छलांग लगा दी है! भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अपने गगनयान मिशन पर काम रही है। चंद्रयान और आदित्य एल-1 की सफलता के बाद ये मिशन इसरो को और ऊंचाइयों पर पहुंचाएगा। गगनयान भारत का पहला मानव मिशन होगा। इसरो ने गगनयान मिशन के लिए ‘सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन’ तैयार कर लिया है। इसरो ने इस इंजन का सफल परीक्षण भी किया। गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए एलवीएम लॉन्चिंग पैड के ‘क्रायोजेनिक चरण’ को शक्ति प्रदान करता है। इसरो ने कहा कि सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन मानव मिशन के लिए अंतिम परीक्षणों में सफल रहा। इंजन की टेस्टिंग से इसकी क्षमता का पता चलता है।इससे पहले इसरो कई स्तरों पर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इस मिशन में कोई कमी न रह जाए। इसलिए पिछले साल एजेंसी ने टेस्ट फ्लाइट किया, जिसके जरिए ये टेस्ट किया गया कि इंसानों को ले जाने वाला कैप्सूल सुरक्षित रूप से धरती पर वापस लौट सकता है। इसरो के मुताबिक, पहली मानव रहित उड़ान ‘एलवीएम3 जी1’ के लिए पहचाना गया सीई-20 इंजन सभी जरूरी परीक्षणों से गुजरा। अब मिशन के अगले चरण के लिए इसरो तैयार है। पहले लॉन्च पैड के आसपास के चार किलोमीटर के दायरे में कोई नहीं होता था। यहां तक की लॉन्च पैड को सुरक्षा देने वाले सीआईएसएफ कर्मी भी उड़ान भरने से दो घंटे पहले पोस्ट छोड़ देते थे। लेकिन 2025 में पहली बार भारतीय अंतरिक्ष यात्री स्पेससूट पहनकर एक विशेष मंच के माध्यम से लॉन्च पैड तक पहुंचेंगे। इसरो 19 साल पुराने लॉन्च पैड को भी अपग्रेड कर रहा है।

सतीश धवन स्पेस सेंटर के निदेशक ए. राजराजन ने कहा कि एक अलग लॉन्च पैड को तैयार करने में समय लगता है। इसलिए दूसरे लॉन्च पैड में सुधार का काम किया जा रहा है। हर बार जब हम कुछ प्रयोग करते हैं तो कुछ नए संशोधन भी करते हैं। उन्होंने कहा कि यह करीब 2000 करोड़ का निवेश है। जिस भी रॉकेट से अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा जाएगा, उसमें भी अधिक सुरक्षा सुविधाएं जोड़ी जाएंगी। मिशन आठ घंटे से एक दिन तक चल सकता है। अंतरक्षि यात्री पूरे समय क्रू मॉड्यूल में ही रहेंगे। इसमें 25 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान बनाए रखा जाएगा। सेंटर के अधिकारियों ने कहा कि मिशन के दौरान कई बातों को ध्यान में रखने की भी जरूरत है।

जैसे मिशन के दौरान ईंधन लीक हो सकता है, ऐसी स्थिति में रॉकेट में विस्फोट भी हो सकता है। उन्होंने बताया कि गगनयान मिशन साल 2025 तक लॉन्च होगा। हालांकि इसके शुरुआती चरणों को इसी साल यानी 2024 तक पूरा किया जा सकता है। इसमें दो मानवरहित मिशन को अंतरिक्ष में भेजना शामिल है। जब ये मिशन सफल होंगे उसके बाद ही एस्ट्रोनॉट को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

गगनयान मिशन ISRO की ओर से विकसित भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मिशन में तीन अंतरिक्ष मिशन शामिल हैं। इन तीन मिशनों में से दो मानवरहित होंगे, जबकि एक मानव युक्त मिशन होगा। गगनयान मिशन भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है। इस मिशन के तहत तीन चालक दल के सदस्यों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों के मिशन के लिए लॉन्च करना और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इसरो ने इस मिशन की टेस्टिंग पिछले साल की थी। वहीं हाल ही में इसरो ने इसके क्रायोजेनिक इंजन की टेस्टिंग की।

गगनयान मिशन पांच चरणों में पूरा होगा। इसका अंतिम चरण तब खत्म होगा जब एक अंतरिक्ष यान में तीन इंसान को बैठाकर अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इससे पहले इसरो कई स्तरों पर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इस मिशन में कोई कमी न रह जाए। इसलिए पिछले साल एजेंसी ने टेस्ट फ्लाइट किया,लॉन्च पैड के आसपास के चार किलोमीटर के दायरे में कोई नहीं होता था। यहां तक की लॉन्च पैड को सुरक्षा देने वाले सीआईएसएफ कर्मी भी उड़ान भरने से दो घंटे पहले पोस्ट छोड़ देते थे। लेकिन 2025 में पहली बार भारतीय अंतरिक्ष यात्री स्पेससूट पहनकर एक विशेष मंच के माध्यम से लॉन्च पैड तक पहुंचेंगे। इसरो 19 साल पुराने लॉन्च पैड को भी अपग्रेड कर रहा है। जिसके जरिए ये टेस्ट किया गया कि इंसानों को ले जाने वाला कैप्सूल सुरक्षित रूप से धरती पर वापस लौट सकता है। यह सुनिश्चित किया गया है कि हवा से जमीन पर कैप्सूल गिरने से क्या कोई नुकसान हो रहा है या नहीं।

जब राजनीतिक मैदान में उतरे रामायण और महाभारत के किरदार!

हाल ही में रामायण और महाभारत के किरदार राजनीतिक मैदान में उतर चुके हैं! 1987 में दूरदर्शन पर आए टीवी सीरियल रामायण और 1988 में प्रसारित हुए महाभारत के किरदार आज भी घर-घर में पहचाने जाते हैं। उनमें से कई किरदारों ने राजनीति में सफल पारियां भी खेलीं। रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी हों या सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका चिखलिया या हनुमान की भूमिका में दिखे दारा सिंह, सभी ने राजनीति में हाथ आजमाया। इन सभी को बीजेपी ने राजनीति के मैदान में उतारा था। भगवान राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल 2024 के लोकसभा चुनाव में मैदान में है। BJP ने उन्हें मेरठ लोकसभा सीट से टिकट दिया है। 2021 में BJP में शामिल हुए अरुण गोविल का जन्म मेरठ में हुआ था। उन्होंने BJP के मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल की जगह ली है। महाभारत में श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज, द्रौपदी बन लोगों को अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली रूपा गांगुली, भीम का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार, युधिष्ठिर बने गजेंद्र चौहान भी राजनीति में किस्मत आजमा चुके हैं और ज्यादातर कलाकारों ने BJP को ही चुना है।

1991 के लोकसभा चुनाव में रामायण के दो बड़े कलाकार संसद पहुंचे थे। सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका चिखलिया और रावण के किरदार से हर किसी को प्रभावित करने वाले अरविंद त्रिवेदी गुजरात के चुनावी मैदान में उतरे। दोनों ही कलाकारों को BJP ने लोकसभा का टिकट दिया था। राजनीतिक दलों ने रामायण और महाभारत धारावाहिक के कलाकारों की लोकप्रियता को भांप लिया था और यही कारण था कि कई कलाकारों को चुनावी मैदान में उतारने के लिए कोशिशें शुरू हुई थीं। दीपिका चिखलिया को वडोदरा (बड़ौदा) से चुनावी मैदान में उतारा गया था। वह तब 26 साल की थीं। उन्होंने चुनाव में जीत भी हासिल की। रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी ने 1991 में गुजरात के साबरकांठा से जीत हासिल की थी। अरविंद त्रिवेदी अब हमारे बीच नहीं है। 6 अक्टूबर 2021 को 82 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया था। BJP ने अरुण गोविल को उत्तर प्रदेश के मेरठ लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है। सवाल यह है कि 1990 के समय जब रामायण के कलाकारों की लोकप्रियता आसमान छू रही थी तो गोविल को किसी दल ने चुनावी मैदान में क्यों नहीं उतारा? कहा जाता है कि कांग्रेस उन्हें चुनावी मैदान में उतारना चाहती थी, लेकिन अरुण गोविल इसके लिए तैयार नहीं हुए। हालांकि, अब बीजेपी ने उन्हें टिकट दिया है। देखना होगा कि क्या अरुण गोविल अपने साथी कलाकारों अरविंद त्रिवेदी और दीपिका चिखलिया की तरह ही चुनावी राजनीति की शुरुआत जीत से कर पाते हैं या नहीं?

अरविंद त्रिवेदी की तरह दारा सिंह भी अब हमारे बीच नहीं हैं। रामायण में हनुमान का किरदार निभाने वाले दारा सिंह को कौन भूल सकता है। दारा सिंह को BJP ने 2003 में राज्यसभा भेजा था। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय वह राज्यसभा सांसद बने थे। दारा सिंह ने कुश्ती, एक्टिंग, राइटिंग और राजनीति हर जगह अपना प्रभाव छोड़ा। पर्दे पर श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज भी BJP में रह चुके हैं। उन्होंने BJP के टिकट से जमशेदपुर से 1996 में चुनाव लड़ा था। उन्होंने जीत भी हासिल की थी। 1996 के चुनाव में अनुभवी इंदर सिंह नामधारी को हराकर जमशेदपुर से संसद सदस्य के रूप में लोक, महाभारत में द्रौपदी की भूमिका निभाने वाली रूपा गांगुली भी राज्यसभा की मनोनीत सदस्य रह चुकी हैं। BJP ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्हें हावड़ा नॉर्थ से चुनाव लड़ाया था लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली थी। युधिष्ठिर का किरदार निभाने वाले गजेंद्र चौहान भी BJP का हिस्सा रह चुके हैं। उन्होंने साल 2004 में पार्टी की सदस्यता ली थी। पार्टी ने उन्हें 2015 में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया का चेयरमैन बनाया था। भीम का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार को भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। उन्होंने BJP के मौजूदा सांसद राजेंद्र अग्रवाल की जगह ली है। महाभारत में श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज, द्रौपदी बन लोगों को अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली रूपा गांगुली, भीम का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार, युधिष्ठिर बने गजेंद्र चौहान भी राजनीति में किस्मत आजमा चुके हैं और ज्यादातर कलाकारों ने BJP को ही चुना है।प्रवीण एक जाने-माने रेसलर थे। 2014 में प्रवीण को आम आदमी पार्टी की ओर से टिकट मिला। वह दिल्ली के वजीरपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े लेकिन वह हार गए। इसके बाद वह BJP में शामिल हो गए। प्रवीण कुमार का फरवरी 2022 में निधन हो गया।

भ्रामक विज्ञापन के लिए रामदेव बाबा से क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

हाल ही में भ्रामक विज्ञापन के लिए रामदेव बाबा को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है! पंतजलि आयुर्वेद के भ्रामक विज्ञापन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि को फटकार लगाई है। अदालत ने कहा है कि वो पंतजलि के जवाब से संतुष्ट नहीं है। योगगुरु बाबा रामदेव सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए हैं। उनके साथ आचार्य बालकृष्ण भी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बाबा रामदेव को अदालत में पेश होने का समन जारी किया था। अदालत ने पतंजलि और आचार्य बालकृष्ण को अदालत के नोटिस का जवाब नहीं देने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में बाबा रामदेव की ओर से सीनियर वकील बलवीर सिंह पेश हुए। अदालत ने कहा कि आपके खिलाफ दो मामले हैं, जिनका जवाब देना होगा। पंतजलि विज्ञापन मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने सुनवाई की। जस्टिस कोहली ने पूछा कि बाबा रामदेव और दूसरे अवमाननाकर्ता का हलफनामा कहां है? पतंजलि के वकील ने जवाब दिया कि वे कोर्ट के अंदर हैं, भीड़ के कारण हम उन्हें यहां नहीं लाए। जस्टिस कोहली ने पूछा कि बाबा रामदेव के जवाब के बारे में क्या कहना है? वकील ने जवाब दिया कि प्रतिवादी 5 कंपनी है और प्रतिवादी 6 प्रबंध निदेशक है। जस्टिस कोहली ने कहा हम 27 फरवरी के आदेश के पैरा 9 को देख रहे हैं और यह इस बारे में था कि कंपनी और प्रबंधन के खिलाफ अवमानना क्यों नहीं होनी चाहिए और फिर उस हलफनामे को दाखिल न करने का आदेश दिया जाए।

जस्टिस अमानतुल्लाह ने कहा आपको पहले हमें दिखाना होगा कि दोनों जवाब कहां हैं। इसके बाद बाबा रामदेव के वकील ने आचार्य बालकृष्ण का हलफनामा पढ़ा। न्यायमूर्ति कोहली ने कहा एक बार जब यह अदालती कार्यवाही है और निर्देश हैं तो इसकी जानकारी देने के लिए कौन जिम्मेदार है। यदि यह बचाव योग्य नहीं है तो आपकी माफी काम नहीं करेगी। यह सुप्रीम कोर्ट को दिए गए वचन का घोर उल्लंघन है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके वचन का पालन किया जाना चाहिए जो कि गंभीर है। न्यायमूर्ति कोहली ने आगे कहा जो बात हमें प्रभावित करती है वह यह है कि आपने उसके बाद क्या किया। आपने अदालत के नोटिस का उल्लंघन किया। हम इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

जस्टिस कोहली ने कहा आपकी माफी स्वीकार करने का क्या कारण है? आपको मंत्रालय को सूचित करना चाहिए था। आपको यह सब सरकार को बताना चाहिए था। सीनियर वकील सांघी ने कहा कि ये यह व्यावसायिक नहीं है। 24 घंटे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करना दिखाता है कि आपको कार्यवाही के बारे में पता था और फिर भी आपने इसका उल्लंघन किया।इसके जवाब में जस्टिस कोहली बोले कि यह एक व्यावसायिक संगठन है। जस्टिस अमानतुल्लाह ने कहा कि यह मत कहिए कि आप सार्वजनिक हित या सार्वजनिक भलाई की सेवा कर रहे हैं।

इसके बाद बाबा रामदेव के वकील ने अदालत में गलती मानते हुए कहा, ‘चूक हो गई’। जस्टिस कोहली ने कहा कि तो यह अंत है। अगर ये आपसे चूक है तो बस इतना ही। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। सीनियर वकील सिंह ने कहा कि हम बिना शर्त माफी मांग रहे हैं। वह माफी मांगने के लिए यहां व्यक्तिगत रूप से मौजूद हैं।’जस्टिस कोहली ने कहा हमें एक हलफनामे की जरूरत है। इस अवमानना को गंभीरता से लें। कोर्ट को लग रहा है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो इस अदालत को दिए गए वचन पत्र के अनुरूप है। आपका एक कदम आगे बढ़ना और 24 घंटे में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करना दिखाता है कि आपको कार्यवाही के बारे में पता था और फिर भी आपने इसका उल्लंघन किया।

अदालत की सख्ती के बाद बाबा रामदेव के वकील ने फिर से गलती मानने की बात दोहराई। वकील ने जवाब दिया कि प्रतिवादी 5 कंपनी है और प्रतिवादी 6 प्रबंध निदेशक है। जस्टिस कोहली ने कहा हम 27 फरवरी के आदेश के पैरा 9 को देख रहे हैं और यह इस बारे में था कि कंपनी और प्रबंधन के खिलाफ अवमानना क्यों नहीं होनी चाहिए और फिर उस हलफनामे को दाखिल न करने का आदेश दिया जाए।जस्टिस कोहली ने कहा 24 घंटे के अंदर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई.. क्या आपको जानकारी है? सिंह ने जवाब दिया यह एक गलती है और अदालत की महिमा का अनादर नहीं किया जा सकता, यह एक सीख है। जस्टिस कोहली ने कहा कि तो फिर सबक को तार्किक अंत तक ले जाना चाहिए था।

आखिर बीजेपी के घोषणा पत्र में इस बार क्या-क्या होगा?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस बार बीजेपी के घोषणा पत्र में क्या-क्या होगा! लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। इस बार चुनावी रण में एनडीए को टक्कर देने के लिए नया विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ है। पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए 400 पार का टार्गेट सेट कर चुका है वहीं, विपक्ष का कहना है कि सत्ताधारी दल को 200 सीटें भी नसीब नहीं हो रही हैं। दोनों के अपने-अपने दावे हैं जिसका फैसला 4 जून को आएगा। उससे पहले भारतीय जनता पार्टी ने सोमवार रात खूब मंथन किया। मंथन चुनावी घोषणापत्र को लेकर हुआ। इस बार के मेनिफेस्टो में बीजेपी का ध्यान गरीबों और किसानों के कल्याण वाले वादों और महिलाओं-युवाओं के लिए नौकरियों पर ध्यान केंद्रित करने पर है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली 27 सदस्यीय चुनाव घोषणापत्र समिति की बैठक में लोगों से ली गई राय के आधार पर चर्चा हुई।भाजपा की चुनाव घोषणापत्र समिति की पहली बैठक में सरकार के ‘विकसित भारत’ एजेंडे के लिए रोडमैप ने केंद्र में जगह बनाई है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने संकेत दिया कि घोषणापत्र ‘मोदी की गारंटी’ और ‘विकसित भारत’ के इर्द-गिर्द हो सकता है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भाजपा को अपनी मिस्ड कॉल सेवा के माध्यम से 3.75 लाख से अधिक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐप पर लगभग 1.70 लाख सुझाव प्राप्त हुए हैं।भाजपा ने 30 मार्च को 27 सदस्यों वाली समिति की घोषणा की थी, जिसमें एक-एक मुस्लिम, सिख और ईसाई नेता भी शामिल थे। बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी संयोजक हैं और इसके अलावा कई अघोषणा पत्र के लिए लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी, प्रधानमंत्री पर उनके विश्वास और उनसे उनकी उम्मीदों को दर्शाती है। गोयल ने बताया कि 35 दिन के अभियान के दौरान जानकारी इकट्ठी की गई। 300 से ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में 916 वीडियो वैन भेजी गईं। उन्होंने बताया कि व्यापार और उद्योग संघों से भी सुझाव मिले।न्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं। कई दशकों में शायद यह पहली बार है जब इसके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य वैचारिक वादों का उल्लेख नहीं किया गया है।

बीजेपी ने देशभर से आए लोगों के सुझाव को ध्यान में रखते हुए रात में करीब दो घंटे तक मंथन किया। लोगों ने मिलकर सरकार को जनकल्याण के सुझाव दिए हैं। दिल्ली में सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीयूष गोयल ने बताया कि समिति की बैठक में 2047 तक विकसित भारत के लिए रोडमैप पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि हमारे घोषणा पत्र के लिए लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी, प्रधानमंत्री पर उनके विश्वास और उनसे उनकी उम्मीदों को दर्शाती है। गोयल ने बताया कि 35 दिन के अभियान के दौरान जानकारी इकट्ठी की गई। 300 से ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में 916 वीडियो वैन भेजी गईं। उन्होंने बताया कि व्यापार और उद्योग संघों से भी सुझाव मिले।

भाजपा ने 30 मार्च को 27 सदस्यों वाली समिति की घोषणा की थी, जिसमें एक-एक मुस्लिम, सिख और ईसाई नेता भी शामिल थे। बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी संयोजक हैं और इसके अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं। कई दशकों में शायद यह पहली बार है जब इसके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य वैचारिक वादों का उल्लेख नहीं किया गया है। 27 सदस्यों वाली समिति की घोषणा की थी, जिसमें एक-एक मुस्लिम, सिख और ईसाई नेता भी शामिल थे। बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसकी संयोजक हैं और इसके अलावा कई अन्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं।इसने इस बारे में आम जिज्ञासा को बढ़ा दिया है व्यापार और उद्योग संघों से भी सुझाव मिले।न्य केंद्रीय मंत्री, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी नेता भी इसके सदस्य हैं। कई दशकों में शायद यह पहली बार है जब इसके चुनावी घोषणापत्र में मुख्य वैचारिक वादों का उल्लेख नहीं किया गया है।कि इस बार सत्तारूढ़ दल की चुनावी प्रतिज्ञाओं के मुख्य आकर्षण क्या होंगे। घोषणा पत्र समिति की अगली बैठक 4 अप्रैल को होने की संभावना है। लोकसभा चुनाव 19 अप्रैल से 1 जून के बीच होने हैं।